श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित — पृष्ठ 81–90
श्रीमद्भगवद्गीता शाङ्करभाष्य हिन्दी अनुवादसहित · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * ८१ न च अर्जुनस्य एव ज्यायसी बुद्धिः न अनुष्ठेया इति भगवता उक्तं पूर्वम् इति कल्पयितुं युक्तम्, येन ' ज्यायसी चेत् ' इति प्रश्नः स्यात् । यदि पुनः एकस्य पुरुषस्य ज्ञानकर्मणोः विरोधाद् युगपद् अनुष्ठानं न सम्भवति इति भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वं भगवता पूर्वम् उक्तं स्यात् तत: अयं प्रश्न उपपन्नः ' ज्यायसी चेत् ' इत्यादिः । अविवेकतः प्रश्नकल्पनायाम् अपि भिन्न-पुरुषानुष्ठेयत्वेन भगवतः प्रतिवचनं न उपपद्यते । न च अज्ञाननिमित्तं भगवत्प्रतिवचनं कल्प्यम् । अस्मात् च भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वेन ज्ञानकर्म-निष्ठयोः भगवतः प्रतिवचनदर्शनात्, ज्ञानकर्मणोः समुच्चयानुपपत्तिः । तस्मात् केवलाद् एव ज्ञानाद् मोक्ष इति एषः अर्थो निश्चितो गीतासु सर्वोपनिषत्सु च । ज्ञानकर्मणोः एकं वद निश्चित्य इति च एकविषया एव प्रार्थना अनुपपन्ना उभयोः समुच्चयसम्भवे । ' कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम् ' इति च ज्ञाननिष्ठासम्भवम् अर्जुनस्य अवधारणेन दर्शयिष्यति । ऐसी तो कल्पना की ही नहीं जा सकती कि भगवान्ने पहले ऐसा कह दिया था कि उस श्रेष्ठ ज्ञानका अनुष्ठान अर्जुनको नहीं करना चाहिये, जिससे कि अर्जुनका ' ज्यायसी चेत् ' इत्यादि प्रश्न बन सके । हाँ, यदि ऐसा हो कि ज्ञान और कर्मका परस्पर विरोध होनेके कारण एक पुरुषसे एक कालमें ( दोनोंका ) अनुष्ठान सम्भव नहीं, इसलिये भगवान्ने दोनोंको भिन्न - भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेके योग्य पहले बतलाया है तो ' ज्यायसी चेत् ' इत्यादि प्रश्न बन सकता है । यदि ऐसी कल्पना करें कि ' अर्जुनने यह प्रश्न अविवेकसे किया है ' तो भी भगवान्का यह उत्तर देना युक्तियुक्त नहीं ठहरता कि ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा दोनों भिन्न - भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान की जानेयोग्य हैं । भगवान्के उत्तरको अज्ञानमूलक मानना तो ( सर्वथा ) अनुचित है | अतएव भगवान्के इस उत्तरको कि ' ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठाका अनुष्ठान करनेवाले अधिकारी भिन्न-भिन्न हैं, ' देखनेसे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानकर्मका समुच्चय सम्भव नहीं । इसलिये गीतामें और सब उपनिषदोंमें यही निश्चित अभिप्राय है कि केवल ज्ञानसे ही मोक्ष होता है । यदि दोनोंका समुच्चय सम्भव होता तो ज्ञान और कर्म इन दोनोंमेंसे एकको निश्चय करके कहो, इस प्रकार एक ही बात कहनेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना नहीं बन सकती । इसके सिवा ' कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम् ' इस निश्चित कथनसे भगवान् भी अर्जुनके लिये ( आगे ) ज्ञाननिष्ठा असम्भव दिखलायेंगे ।
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८२ * श्रीमद्भगवद्गीता * अर्जुन उवाच- अर्जुन बोले— ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां मां ज्यायसी श्रेयसी चेद् यदि कर्मणः सकाशात् ते तव मता अभिप्रेता बुद्धिः ज्ञानं हे जनार्दन । यदि बुद्धिकर्मणी समुच्चिते इष्टे तदा एकं श्रेयःसाधनम् इति कर्मणो ज्यायसी बुद्धिः इति कर्मणः अतिरिक्तकरणं बुद्धेः अनुपपन्नम् अर्जुनेन कृतं स्यात् । न हि तद् एव तस्मात् फलतः अतिरिक्तं स्यात् । तथा कर्मणः श्रेयस्करी भगवता उक्ता बुद्धिः अश्रेयस्करं च कर्म कुरु इति मां प्रतिपादयति तत् किं नु कारणम् इति भगवत उपालम्भम् इव कुर्वन् तत् किं कस्मात् कर्मणि घोरे क्रूरे हिंसालक्षणे मां नियोजयसि केशव इति च यद् आह तत् च न उपपद्यते । अथ स्मार्तेन एव कर्मणा समुच्चयः सर्वेषां भगवता उक्तः अर्जुनेन च अवधारितः चेत् तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि इत्यादि कथं युक्तं वचनम् ॥ १ ॥
किं च-नियोजयसि केशव ॥ ॥१ १ ॥ ॥ हे जनार्दन! यदि कर्मोंकी अपेक्षा ज्ञानको आप श्रेष्ठ मानते हैं ( तो हे केशव! मुझे इस हिंसारूप क्रूर कर्ममें क्यों लगाते हैं? ) यदि ज्ञान और कर्म दोनोंका समुच्चय भगवान्को सम्मत होता तो फिर ' कल्याणका वह एक साधन कहिये ' ' कर्मोंसे ज्ञान श्रेष्ठ है ' इत्यादि वाक्योंद्वारा अर्जुनका ज्ञानसे कर्मोंको पृथक् करना अनुचित होता । क्योंकि ( समुच्चय - पक्षमें ) कर्मकी अपेक्षा उस ( ज्ञान ) -का फलके नाते श्रेष्ठ होना सम्भव नहीं । तथा भगवान्ने कर्मोंकी अपेक्षा ज्ञानको कल्याण-कारक बतलाया और मुझसे ऐसा कहते हैं कि 4 ' तू अकल्याणकारक कर्म ही कर ' इसमें क्या कारण है - यह सोचकर अर्जुनने भगवान्को उलाहना – सा देते हुए जो ऐसा कहा कि ' तो फिर हे केशव! मुझे इस हिंसारूप घोर क्रूर कर्ममें क्यों लगाते हैं? ' वह भी उचित नहीं होता । यदि भगवान्ने स्मार्त- कर्मके साथ ही ज्ञानका समुच्चय सबके लिये कहा होता एवं अर्जुनने भी ऐसा ही समझा होता, तो उसका यह कहना कि ' फिर हे केशव! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? ' कैसे युक्तियुक्त हो सकता? ॥ १ ॥
तथा—
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥
व्यामिश्रेण इव यद्यपि विविक्ताभिधायी यद्यपि भगवान् स्पष्ट कहनेवाले हैं तो भी मुझ भगवान् तथापि मम मन्दबुद्धेः व्यामिश्रम् मन्दबुद्धिको भगवान्के वाक्य मिले हुए - से प्रतीत होते इव भगवद्वाक्यं प्रतिभाति । तेन मम बुद्धिं हैं, उन मिले हुए - से वचनोंसे आप मानो मेरी बुद्धिको मोहयसि इव । मोहित कर रहे हैं ।
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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * ८३ मम बुद्धिव्यामोहापनयाय हि प्रवृत्तः त्वं तु कथं मोहयसि अतो ब्रवीमि बुद्धिं मोहयसि इव मे मम इति । त्वं तु भिन्नकर्तृकयोः ज्ञानकर्मणोः एक-पुरुषानुष्ठानासम्भवं यदि मन्यसे तत्र एवं सति तत् तयोः एकं बुद्धिं कर्म वा इदम् एव अर्जुनस्य योग्यं बुद्धिशक्त्यवस्थानुरूपम् इति निश्चित्य वद ब्रूहि । येन ज्ञानेन कर्मणा वा अन्यतरेण श्रेयः अहम् आप्नुयां प्राप्नुयाम् । यदि हि कर्मनिष्ठायां गुणभूतम् अपि ज्ञानं भगवता उक्तं स्यात् तत् कथं तयोः एकं वद इति एकविषया एव अर्जुनस्य शुश्रूषा स्यात् । न हि भगवता उक्तम् अन्यतरद् एव ज्ञानकर्मणोः वक्ष्यामि न एव द्वयम् इति । येन उभयप्राप्त्यसम्भवम् आत्मनो मन्यमान एकम् एव प्रार्थयेत् ॥ २ ॥
वास्तवमें आप तो मेरी बुद्धिका मोह दूर करनेके लिये प्रवृत्त हुए हैं, फिर मुझे मोहित कैसे करते! इसीलिये कहता हूँ कि आप मेरी बुद्धिको मोहित-सी करते हैं I । आप यदि अलग - अलग अधिकारियोंद्वारा किये जाने योग्य ज्ञान और कर्मका अनुष्ठान एक पुरुषद्वारा किया जाना असम्भव मानते हैं तो उन दोनोंमेंसे ‘ ज्ञान या कर्म यही एक बुद्धि, शक्ति और अवस्थाके अनुसार अर्जुनके लिये योग्य है ' - ऐसा निश्चय करके मुझसे कहिये, जिस ज्ञान या कर्म किसी एकसे मैं कल्याणको प्राप्त कर सकूँ । यदि कर्मनिष्ठामें गौणरूपसे भी ज्ञानको भगवान्ने कहा होता तो ' दोनोंमेंसे एक कहिये ' इस प्रकार एकहीको सुननेकी अर्जुनकी इच्छा कैसे होती? क्योंकि ' ज्ञान और कर्म इन दोनोंमेंसे मैं तुझसे एक ही कहूँगा, दोनों नहीं ' - ऐसा भगवान्ने कहीं नहीं कहा कि जिससे अर्जुन अपने लिये दोनोंकी प्राप्ति असम्भव मानकर एकके लिये ही प्रार्थना करता ॥ २ ॥
प्रश्नानुरूपम् एव प्रतिवचनम्-श्रीभगवानुवाच-लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां लोके अस्मिन् शास्त्रानुष्ठानाधिकृतानां त्रैवर्णिकानां द्विविधा द्विप्रकारा निष्ठा स्थितिः अनुष्ठेयतात्पर्यं पुरा पूर्वं सर्गादौ प्रजाः सृष्ट्वा तासाम् अभ्युदयनिःश्रेयसप्राप्तिसाधनं वेदार्थ -सम्प्रदायम् आविष्कुर्वता प्रोक्ता मया सर्वज्ञेन ईश्वरेण हे अनघ अपाप । प्रश्नके अनुसार ही उत्तर देते हुए—
श्रीभगवान् बोले-पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥
हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्यलोकमें शास्त्रोक्त कर्म और ज्ञानके जो अधिकारी हैं, ऐसे तीनों वर्णवालोंके लिये ( अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके लिये ) दो प्रकारकी निष्ठा — स्थिति अर्थात् कर्तव्यतत्परता, पहले - सृष्टिके आदिकालमें प्रजाको रचकर उनकी लौकिक उन्नति और मोक्षकी प्राप्तिके साधनरूप वैदिक सम्प्रदायको आविष्कार करनेवाले मुझ सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा कही गयी हैं ।
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८४ * श्रीमद्भगवद्गीता * तत्र का सा द्विविधा निष्ठा इति आह -ज्ञानयोगेन ज्ञानम् एव योगः तेन साङ्ख्यानाम् आत्मानात्मविषयविवेकज्ञानवतां ब्रह्मचर्या -श्रमाद् एव कृतसन्यासानां वेदान्तविज्ञान-सुनिश्चितार्थानां परमहंसपरिव्राजकानां ब्रह्मणि एव अवस्थितानां निष्ठा प्रोक्ता । कर्मयोगेन कर्म एव योगः कर्मयोगः तेन कर्मयोगेन योगिनां कर्मिणां निष्ठा प्रोक्ता इत्यर्थः । यदि च एकेन पुरुषेण एकस्मै पुरुषार्थाय ज्ञानं कर्म च समुच्चित्य अनुष्ठेयं भगवता इष्टम् उक्त वक्ष्यमाणं वा गीतासु वेदेषु च उक्तम् । कथम् इह अर्जुनाय उपसन्नाय प्रियाय विशिष्ट -भिन्नपुरुषकर्तृके एव ज्ञानकर्मनिष्ठे ब्रूयात् । यदि पुनः अर्जुनो ज्ञानं कर्म च द्वयं श्रुत्वा स्वयम् एव अनुष्ठास्यति अन्येषां तु भिन्नपुरुषा-नुष्ठेयतां वक्ष्यामि इति मतं भगवतः कल्प्येत । तदा रागद्वेषवान् अप्रमाणभूतो भगवान् कल्पितः स्यात् । तत् च अयुक्तम् । तस्मात् कया अपि युक्त्या न समुच्चयो ज्ञानकर्मणोः । यद् अर्जुनेन उक्तं कर्मणो ज्यायस्त्वं बुद्धेः तत् च स्थितम् अनिराकरणात् । तस्याः च ज्ञाननिष्ठायाः सन्यासिनाम् एव अनुष्ठेयत्वं भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्ववचनात् च भगवत एवम् एव अनुमतम् इति गम्यते ॥ ३ ॥ ।
वह दो प्रकारकी निष्ठा कौन - सी हैं? सो कहते हैं— जो आत्म - अनात्मके विषयमें विवेकजन्य ज्ञानसे सम्पन्न हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य आश्रमसे ही संन्यास ग्रहण कर लिया है, जिन्होंने वेदान्तके विज्ञानद्वारा आत्मतत्त्वका भलीभाँति निश्चय कर लिया है, जो परमहंस संन्यासी हैं, जो निरन्तर ब्रह्ममें स्थित हैं ऐसे सांख्ययोगियोंकी निष्ठा ज्ञानरूप योगसे कही है । तथा कर्मयोगसे कर्मयोगियोंकी अर्थात् कर्म करनेवालोंकी निष्ठा कही है । यदि एक पुरुषद्वारा एक ही प्रयोजनकी सिद्धिके लिये ज्ञान और कर्म दोनों एक साथ अनुष्ठान करने योग्य हैं, ऐसा अपना अभिप्राय भगवान्द्वारा गीतामें पहले कहीं कहा गया होता, या आगे कहा जानेवाला होता ", अथवा वेदमें कहा गया होता तो शरणमें आये हुए प्रिय अर्जुनको यहाँ भगवान् यह कैसे कहते कि ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा अलग - अलग भिन्न - भिन्न अधिकारियोंद्वारा ही अनुष्ठान की जानेयोग्य हैं यदि भगवान्का यह अभिप्राय मान लिया जाय कि ज्ञान और कर्म दोनोंको सुनकर अर्जुन स्वयं ही दोनोंका अनुष्ठान कर लेगा, दोनोंको भिन्न - भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य तो दूसरोंके लिये कहूँगा । तब तो भगवान्को रागद्वेषयुक्त और अप्रामाणिक मानना हुआ । ऐसा मानना सर्वथा अनुचित है । इसलिये किसी भी युक्तिसे ज्ञान और कर्मका समुच्चय नहीं माना जा सकता । कर्मोंकी अपेक्षा ज्ञानकी श्रेष्ठता जो अर्जुनने कही थी वह तो सिद्ध है ही, क्योंकि भगवान्ने उसका निराकरण नहीं किया । उस ज्ञाननिष्ठाके अनुष्ठानका अधिकार संन्यासियोंका ही है; क्योंकि दोनों निष्ठा भिन्न - भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य बतलायी गयी हैं । इस कारण भगवान्की
यही सम्मति है । यह प्रतीत होता है ॥ ३ ॥
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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * ८५ मां च बन्धकारणे कर्मणि एव नियोजयसि इति विषण्णमनसम् अर्जुनं कर्म न आरभे इति एवं मन्वानम् आलक्ष्य आह भगवान् — ‘ न कर्मणामनारम्भात् ' – इति । अथ वा ज्ञानकर्मनिष्ठयोः परस्परविरोधाद एकेन पुरुषेण युगपद् अनुष्ठातुम् अशक्यत्वे सति इतरेतरानपेक्षयोः एव पुरुषार्थहेतुत्वे प्राप्ते -कर्मनिष्ठाया ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिहेतुत्वेन पुरुषार्थहेतुत्वं न स्वातन्त्र्येण, ज्ञाननिष्ठा तु कर्मनिष्ठोपायलब्धात्मिका सती स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुः अन्यानपेक्षा इति एतम् अर्थं प्रदर्शयिष्यन् आह भगवान्– बन्धनके हेतुरूप कर्मोंमें ही भगवान् मुझे लगाते हैं - ऐसा समझकर व्यथितचित्त हुए और मैं कर्म नहीं करूँगा, ऐसा माननेवाले अर्जुनको देखकर भगवान् बोले – ' न कर्मणामनारम्भात् ' इति । अथवा ज्ञाननिष्ठाका और कर्मनिष्ठाका परस्पर विरोध होनेके कारण एक पुरुषद्वारा एक कालमें दोनोंका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता । इससे एक दूसरेकी अपेक्षा न रखकर दोनों अलग - अलग मोक्षमें हेतु हैं, ऐसी शंका होनेपर— यह बात स्पष्ट प्रकट करनेकी इच्छासे कि ज्ञाननिष्ठाकी प्राप्तिमें साधन होनेके कारण कर्मनिष्ठा मोक्षरूप पुरुषार्थमें हेतु है, स्वतन्त्र नहीं है; और कर्मनिष्ठारूप उपायसे सिद्ध होनेवाली ज्ञाननिष्ठा अन्यकी अपेक्षा न रखकर स्वतन्त्र ही मुक्तिमें हेतु है, भगवान् बोले—
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
न कर्मणाम् अनारम्भाद् अप्रारम्भात् कर्मणां क्रियाणां यज्ञादीनाम् इह जन्मनि जन्मान्तरे वा अनुष्ठितानाम् उपात्तदुरितक्षयहेतुत्वेन सत्त्वशुद्धिकारणानां तत्कारणत्वेन च ज्ञानोत्पत्तिद्वारेण ज्ञाननिष्ठाहेतूनाम् — ' ज्ञान -मुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः ' ( महा ० शान्ति ० २०४ । ८ ) इत्यादिस्मरणाद् अनारम्भाद् अनुष्ठानात्-नैष्कर्म्यं निष्कर्मभावं कर्मशून्यतां ज्ञानयोगेन निष्ठां निष्क्रियात्मस्वरूपेण एव अवस्थानम् इति यावत्, पुरुषो न अश्नुते न प्राप्नोति इत्यर्थः । कर्मोंका आरम्भ किये बिना अर्थात् यज्ञादि कर्म जो कि इस जन्म या जन्मान्तरमें किये जाते हैं और सञ्चित पापोंका नाश करनेके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिमें कारण हैं एवं ' पाप कर्मोंका नाश होनेपर मनुष्योंके ( अन्तःकरणमें ) ज्ञान प्रकट होता है ' इस स्मृतिके अनुसार जो अन्तःकरणकी शुद्धिमें कारण होनेसे ज्ञाननिष्ठाके भी हेतु हैं, उन यज्ञादि कर्मोंका आरम्भ किये बिना— मनुष्य निष्कर्मभावको— कर्मशून्य स्थितिको, अर्थात् जो निष्क्रिय आत्मस्वरूपमें स्थित होनारूप ज्ञानयोगसे प्राप्त होनेवाली निष्ठा है, उसको नहीं पाता ।
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८६ * श्रीमद्भगवद्गीता * कर्मणाम् अनारम्भाद् नैष्कर्म्यं न अश्नुते इति वचनात् तद्विपर्ययात् तेषाम् आरम्भाद् नैष्कर्म्यम् अश्नुते इति गम्यते । कस्मात् पुनः कारणात् कर्मणाम् अनारम्भाद् नैष्कर्म्यं न अश्नुते इति । उच्यते, कर्मारम्भस्य एव नैष्कर्म्यापाय-त्वात् । न हि उपायम् अन्तरेण उपेयप्राप्तिः अस्ति । कर्मयोगोपायत्वं च नैष्कर्म्यलक्षणस्य ज्ञानयोगस्य श्रुतौ इह च प्रतिपादनात् । श्रुतौ तावत् प्रकृतस्य आत्मलोकस्य वेद्यस्य वेदनोपायत्वेन ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन ' ( बृह ० उ ० ४। ४। २२ ) इत्यादिना कर्मयोगस्य ज्ञानयोगोपायत्वं प्रतिपादितम् । इह अपि च-' सन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः, ' ‘ योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ' ' यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ' इत्यादि प्रतिपादयिष्यति । ननु च — ' अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् ' इत्यादौ कर्तव्यकर्मसन्न्यासाद अपि नैष्कर्म्यप्राप्तिं दर्शयति लोके च कर्मणाम् अनारम्भाद् नैष्कर्म्यम् इति प्रसिद्धतरम् अतः च नैष्कर्म्यार्थिनः किं कर्मारम्भेण इति प्राप्तम् अत आह- -न च सन्यसनाद् एव इति । न अपि सन्न्यसनाद् एव केवलात् कर्मपरित्यागमात्राद् एव ज्ञान-रहितात् सिद्धिं नैष्कर्म्यलक्षणां ज्ञानयोगेन निष्ठां समधिगच्छति न प्राप्नोति ॥ ४ ॥
पू ० – कर्मोंका आरम्भ नहीं करनेसे निष्कर्मभावको प्राप्त नहीं होता - इस कथनसे यह पाया जाता है कि इसके विपरीत करनेसे अर्थात् कर्मोंका आरम्भ करनेसे मनुष्य निष्कर्मभावको पाता है, सो ( इसमें ) क्या कारण है कि कर्मोंका आरम्भ किये बिना मनुष्य निष्कर्मताको प्राप्त नहीं होता? उ०- क्योंकि कर्मोंका आरम्भ ही निष्कर्मताकी प्राप्तिका उपाय है और उपायके बिना उपेयकी प्राप्ति हो नहीं सकती, यह प्रसिद्ध ही है । निष्कर्मतारूप ज्ञानयोगका उपाय कर्मयोग है, यह बात श्रुतिमें और यहाँ गीतामें भी प्रतिपादित है । श्रुतिमें प्रस्तुत ज्ञेयरूप आत्मलोकके जाननेका उपाय बतलाते हुए उस आत्माको ब्राह्मण वेदाध्ययन और यज्ञसे जाननेकी इच्छा करते हैं ' इत्यादि वचनोंसे कर्मयोगको ज्ञानयोगका उपाय बतलाया है । तथा यहाँ ( गीताशास्त्रमें ) भी - ' हे महाबाहो! बिना कर्मयोगके संन्यास प्राप्त करना कठिन है ', ' योगी लोग आसक्ति छोड़कर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं ', ' यज्ञ, दान और तप बुद्धिमानोंको पवित्र करनेवाले हैं ' इत्यादि वचनोंसे आगे प्रतिपादित करेंगे । यहाँ यह शंका होती है कि ' सब भूतोंको अभयदान देकर संन्यास ग्रहण करे, इत्यादि वचनोंमें कर्तव्यकर्मो के त्यागद्वारा भी निष्कर्मताकी प्राप्ति दिखलायी है और लोकमें भी कर्मोंका आरम्भ न करनेसे निष्कर्मताका प्राप्त होना अत्यन्त प्रसिद्ध है । फिर निष्कर्मता चाहनेवालेको कर्मोंके आरम्भसे क्या प्रयोजन? इसपर कहते हैं— केवल संन्याससे अर्थात् बिना ज्ञानके केवल कर्मपरित्यागमात्रसे मनुष्य निष्कर्मतारूप सिद्धिको अर्थात् ज्ञानयोगसे होनेवाली स्थितिको नहीं पाता ॥ ४ ॥
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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * ८७ कस्मात् पुनः कारणात् कर्मसन्यासमात्राद् बिना ज्ञानके केवल कर्मसंन्यासमात्रसे मनुष्य एव ज्ञानरहितात् सिद्धिं नैष्कर्म्यलक्षणां पुरुषो निष्कर्मतारूप सिद्धिको क्यों नहीं पाता? इसका न अधिगच्छति इति हेत्वाकाङ्क्षायाम् आह— | कारण जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं— न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म न हि यस्मात् क्षणम् अपि कालं जातु कदा-चित् कश्चित् तिष्ठति अकर्मकृत् सन् । कस्मात् कार्यते हि यस्माद् अवश एव कर्म सर्व: प्राणी प्रकृतिजै: प्रकृतितो जातैः सत्त्वरजस्तमोभिः गुणैः । अज्ञ इति वाक्यशेषो यतो वक्ष्यति – ' गुणैर्यो न विचाल्यते ' इति साङ्ख्यानां पृथक्करणाद् अज्ञानाम् एव हि कर्मयोगो न ज्ञानिनाम् । ज्ञानिनां तु गुणैः अचाल्यमानानां स्वतः चलनाभावात् कर्मयोगो न उपपद्यते । तथा च व्याख्यातं वेदाविनाशिनम् इति अत्र ॥ ५ ॥
सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
कोई भी मनुष्य कभी क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता; क्योंकि ' सभी प्राणी ' प्रकृतिसे उत्पन्न सत्त्व, रज और तम - इन तीन गुणोंद्वारा परवश हुए अवश्य ही कर्मोंमें प्रवृत्त कर दिये जाते हैं । यहाँ सभी प्राणीके साथ अज्ञानी ( शब्द ) और जोड़ना चाहिये ( अर्थात् ' सभी अज्ञानी प्राणी ' ऐसे पढ़ना चाहिये ); क्योंकि आगे ' जो गुणोंसे विचलित नहीं किया जा सकता ' इस कथनसे ज्ञानियोंको अलग किया है, अतः अज्ञानियोंके लिये ही कर्मयोग है, ज्ञानियोंके लिये नहीं । क्योंकि जो गुणोंद्वारा विचलित नहीं किये जा सकते, उन ज्ञानियोंमें स्वतः क्रियाका अभाव होनेसे उनके लिये कर्मयोग सम्भव नहीं है । ऐसे ही ' वेदाविनाशिनम् ' इस श्लोककी व्याख्यामें विस्तारपूर्वक कहा गया है ॥ ५ ॥
यः तु अनात्मज्ञः चोदितं कर्म न आरभते जो आत्मज्ञानी न होनेपर भी शास्त्रविहित कर्म नहीं करता, उसका वह कर्म न करना बुरा है; यह इति तद् असद् एव इति आह- कहते हैं—
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ॥६ ॥
कर्मेन्द्रियाणि हस्तादीनि संयम्य संहृत्य य जो मनुष्य हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंको रोककर आस्ते तिष्ठति मनसा स्मरन् चिन्तयन् इन्द्रियार्थान् इन्द्रियोंके भोगोंको मनसे चिन्तन करता रहता है, वह विषयान् विमूढात्मा विमूढान्तःकरणो मिथ्याचारो विमूढात्मा अर्थात् मोहित अन्तःकरणवाला मिथ्याचारी, मृषाचारः पापाचारः स उच्यते ॥ ६ ॥ ढोंगी, पापाचारी कहा जाता है ॥ ६ ॥
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८८ * श्रीमद्भगवद्गीता *
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥
यः तु पुनः कर्मणि अधिकृतः अज्ञो बुद्धीन्द्रियाणि मनसा नियम्य आरभते अर्जुन कर्मेन्द्रियैः वाक्पाण्यादिभिः । किम् आरभते इति आह-कर्मयोगम् असक्तः सन् स विशिष्यते इतरस्माद् मिथ्याचारात् ॥ ७ ॥
परंतु हे अर्जुन! जो कर्मोंका अधिकारी अज्ञानी, ज्ञानेन्द्रियोंको मनसे रोककर वाणी, हाथ इत्यादि कर्मेन्द्रियोंसे आचरण करता है । किसका आचरण करता है? सो कहते हैं— आसक्तिरहित होकर कर्मयोगका आचरण करता है, वह ( कर्मयोगी ) दूसरेकी अपेक्षा अर्थात् मिथ्याचारियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥
यत एवम् अतः - | ऐसा होनेके कारण–
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥
नियतं नित्यं यो यस्मिन् कर्मणि अधिकृतः फलाय च अश्रुतं तद् नियतं कर्म तत् कुरु त्वं हे अर्जुन! यतः कर्म ज्यायः अधिकतरं फलतो हि यस्माद् अकर्मणः अकरणाद् अनारम्भात् । कथं शरीरयात्रा शरीरस्थितिः अपि च ते तव न प्रसिद्ध्येत् प्रसिद्धिं न गच्छेद् अकर्मण: अकरणात् । अतो दृष्टः कर्माकर्मणोः विशेषो लोके ॥ ८ ॥
हे अर्जुन! जो कर्म श्रुतिमें किसी फलके लिये नहीं बताया गया है, ऐसे जिस कर्मका जो अधिकारी है उसके लिये वह नियत कर्म है, उस नियत अर्थात् नित्य कर्मका तू आचरण कर; क्योंकि कर्मोंके न करनेकी अपेक्षा कर्म करना परिणाममें बहुत श्रेष्ठ है । क्योंकि कुछ भी न करनेसे तो तेरी शरीरयात्रा भी नहीं चलेगी अर्थात् तेरे शरीरका निर्वाह भी नहीं होगा । इसलिये कर्म करने और न करनेमें जो अन्तर है वह संसारमें प्रत्यक्ष है ॥ ८ ॥
यत् च मन्यसे बन्धार्थत्वात् कर्म न कर्तव्यम् जो तू ऐसा समझता है कि बन्धनकारक होनेसे कर्म नहीं करना चाहिये तो यह समझना भी इति तद् अपि असत्, कथम्— भूल है । कैसे? यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥
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* शांकरभाष्य अध्याय ३ * ८ ९ ' यज्ञो वै विष्णुः ' ( तै ० सं ० १। ७। ४ ) इति श्रुतेर्यज्ञ ईश्वरः तदर्थं यत् क्रियते तद् यज्ञार्थं कर्म तस्मात् कर्मणः अन्यत्र अन्येन कर्मणा लोकः अयम् अधिकृतः कर्मकृत् कर्मबन्धनः कर्म बन्धनं यस्य सः अयं कर्मबन्धनो लोको न तु यज्ञार्थाद् अतः तदर्थं यज्ञार्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः कर्मफलसङ्गवर्जितः सन् समाचर निर्वर्तय ॥ ९ ॥
' यज्ञ ही विष्णु है ' इस श्रुतिप्रमाणसे यज्ञ ईश्वर है और उसके लिये जो कर्म किया जाय वह ' यज्ञार्थ कर्म ' है, उस ( ईश्वरार्थ ) कर्मको छोड़कर दूसरे कर्मोंसे कर्म करनेवाला अधिकारी मनुष्यसमुदाय, कर्मबन्धनयुक्त हो जाता है, पर ईश्वरार्थ किये जानेवाले कर्मसे नहीं । इसलिये हे कौन्तेय! तू कर्मफल और आसक्तिसे रहित होकर ईश्वरार्थ कर्मोंका भली प्रकार आचरण कर ९ ॥ इतः च अधिकृतेन कर्म कर्तव्यम्- इस आगे बतलाये जानेवाले कारणसे भी अधिकारीको कर्म करना चाहिये-सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष सहयज्ञा यज्ञसहिताः प्रजा त्रयो वर्णाः ताः सृष्ट्वा उत्पाद्य, पुरा सर्गादौ उवाच उक्तवान् प्रजापतिः प्रजानां स्रष्टा, अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वं प्रसवो वृद्धिः उत्पत्तिः तां कुरुध्वम् । एष यज्ञो वो युष्माकम् अस्तु भवतु इष्टकामधुक् इष्टान् अभिप्रेतान् कामान् फलविशेषान् दोग्धि इति इष्टकामधुक् ॥ १० ॥
वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१० ॥
सृष्टिके आदिकालमें यज्ञसहित प्रजाको अर्थात् ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य - इन ) तीनों वर्णोंको रचकर जगत्के रचयिता प्रजापतिने कहा कि इस यज्ञसे तुमलोग प्रसव - उत्पत्ति, यानी वृद्धिलाभ करो । यह यज्ञ तुमलोगोंको इष्ट कामनाओंका देनेवाला अर्थात् इच्छित फलरूप नाना भोगोंको देनेवाला हो ॥ १० ॥
कथम्— कैसे -देवान्भावयतानेन ते ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
देवान् इन्द्रादीन् भावयत वर्धयत अनेन यज्ञेन | तुमलोग इस यज्ञद्वारा इन्द्रादि देवोंको बढ़ाओ ते देवा भावयन्तु आप्याययन्तु वृष्ट्यादिना वो अर्थात् उनकी उन्नति करो । वे देव वृष्टि आदिद्वारा तुमलोगोंको बढ़ावें अर्थात् उन्नत करें । इस प्रकार एक-युष्मान् एवं परस्परम् अन्योन्यं भावयन्तः श्रेयः दूसरेको उन्नत करते हुए ( तुमलोग ) ज्ञानप्राप्तिद्वारा परं मोक्षलक्षणं ज्ञानप्राप्तिक्रमेण अवाप्स्यथ स्वर्गं मोक्षरूप परमश्रेयको प्राप्त करोगे । अथवा स्वर्गरूप वा परं श्रेयः अवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ परमश्रेयको ही प्राप्त करोगे ॥ ११ ॥
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९ ० * श्रीमद्भगवद्गीता *
किं च- दूसरी बात यह भी है कि-इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥१२ ॥
इष्टान् अभिप्रेतान् भोगान् हि वो युष्मभ्यं देवा दास्यन्ते वितरिष्यन्ति स्त्रीपशुपुत्रादीन् यज्ञभाविता यज्ञैः वर्धिताः तोषिता इत्यर्थः । तैः देवैः दत्तान् भोगान् अप्रदाय अदत्त्वा आनृण्यम् अकृत्वा इत्यर्थः एभ्यो देवेभ्यः, यो भुङ्क्ते स्वदेहेन्द्रियाणि एव तर्पयति, स्तेन एव तस्कर एव स देवादिस्वापहारी ॥ १२ ॥
यज्ञद्वारा बढ़ाये हुए - संतुष्ट किये हुए देवता लोग तुमलोगोंको स्त्री, पशु, पुत्र आदि इच्छित भोग देंगे । उन देवोंद्वारा दिये हुए भोगोंको उन्हें न देकर अर्थात् उनका ऋण न चुकाकर, जो खाता है— केवल अपने शरीर और इन्द्रियोंको ही तृप्त करता है, वह देवताओंके स्वत्वको हरण करनेवाला चोर ही है ॥ १२ ॥
ये पुनः- परंतु जो-| यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये देवयज्ञादीन् निर्वर्त्य तच्छिष्टम् अशनम् अमृताख्यम् अशितुं शीलं येषां ते यज्ञशिष्टाशिनः सन्त:, मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः सर्वपापैः चुल्यादि-पञ्चसूनाकृतैः प्रमादकृतहिंसादिजनितैः च अन्यैः । ये तु आत्मम्भरयो भुञ्जते ते तु अघं पापं स्वयम् अपि पापा ये पचन्ति पाकं निर्वर्तयन्ति आत्मकारणाद् आत्महेतोः ॥ १३ ॥
पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥
यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं अर्थात् देवयज्ञादि करके उससे बचे हुए अमृत नामक अन्नको भक्षण करना जिनका स्वभाव है, वे सब पापोंसे अर्थात् गृहस्थमें होनेवाले चक्की, चूल्हे आदिके पाँच पापोंसे * और प्रमादसे होनेवाले हिंसादिजनित अन्य पापोंसे भी छूट जाते हैं । तथा जो उदरपरायण लोग केवल अपने लिये ही अन्न पकाते हैं वे स्वयं पापी हैं और पाप ही खाते हैं ॥ १३ ॥
इतः च अधिकृतेन कर्म कर्तव्यम् । जगच्चक्र- इसलिये भी अधिकारीको कर्म करना चाहिये, क्योंकि कर्म जगत् - चक्रकी प्रवृत्तिका कारण है I । प्रवृत्तिहेतुः हि कर्म । कथम् इति उच्यते— कैसे? सो कहते हैं-अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥
* कण्डनं पेषणं चुल्ली उदकुम्भश्च मार्जनी । पञ्चसूना गृहस्थस्य पञ्चयज्ञात् प्रणश्यति ॥