श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 21–30

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

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वशीकृतो ह्यहं तैश्च सत्स्त्रिया सत्पतिर्यथा ॥ ३१ ॥

सुव्रत! जो लोग मेरे पर्वोंसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी उत्सवोंमें मेरी प्रसन्नताके लिये वस्त्र, आभूषण, पुष्प, धूप और दीप आदि उपहार अर्पण करते हुए परम उत्तम श्रीमद्भागवतपुराणका भक्तिपूर्वक श्रवण करते हैं, वे मुझे उसी प्रकार अपने वशमें कर लेते हैं, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने साधुस्वभाववाले पतिको वशमें कर लेती है । ( स्कन्दपुराण, विष्णुखण्ड, मार्गशीर्षमाहात्म्य अ ० १६ )

पृष्ठ 22

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श्रीशुकदेवजीको नमस्कार यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं

द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।

पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम् । संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥ स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो-ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ ( १।२।२ ) ( १।२।३ ) ( १२ | १२ | ६८ ) श्रीशुकदेवजी महाराज अपने आत्मानन्दमें ही निमग्न थे । इस अखण्ड अद्वैत स्थितिसे उनकी भेददृष्टि सर्वथा निवृत्त हो चुकी थी । फिर भी मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरकी मधुमयी, मंगलमयी मनोहारिणी लीलाओंने उनकी वृत्तियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्होंने जगत्के प्राणियोंपर कृपा करके भगवत्तत्त्वको प्रकाशित करनेवाले इस महापुराणका विस्तार किया । मैं उन्हीं सर्वपापहारी व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीके चरणोंमें नमस्कार जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत - संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक-वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके उद्देश्यसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे — ' बेटा! बेटा! ' उस समय तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे वृक्षोंने उत्तर दिया । ऐसे, सबके हृदयमें विराजमान श्रीशुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ । यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय - रहस्यात्मक पुराण है । यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है । संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करनेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है । वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े - बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है । मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ ।

पृष्ठ 23

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पृष्ठ 24

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श्रीमद्भागवतकी महिमा श्रीमद्भागवतकी महिमा मैं क्या लिखूँ? उसके आदिके तीन श्लोकोंमें जो महिमा कह दी गयी है, उसके बराबर कौन कह सकता है? उन तीनों श्लोकोंको कितनी ही बार पढ़ चुकनेपर भी जब उनका स्मरण होता है, मनमें अद्भुत भाव उदित होते हैं । कोई अनुवाद उन

श्लोकोंकी गम्भीरता और मधुरताको पा नहीं सकता । उन तीनों श्लोकोंसे मनको निर्मल करके

फिर इस प्रकार भगवान्का ध्यान कीजिये—

ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा ।

औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ॥

प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।

आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥

रूपं भगवतो यत्तन्मनःकान्तं शुचापहम् ।

अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद् दुर्मना इव ॥

मुझको श्रीमद्भागवतमें अत्यन्त प्रेम है । मेरा विश्वास और अनुभव है कि इसके पढ़ने और सुननेसे मनुष्यको ईश्वरका सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है और उनके चरणकमलोंमें अचल भक्ति होती है । इसके पढ़नेसे मनुष्यको दृढ़ निश्चय हो जाता है कि इस संसारको रचने और पालन करनेवाली कोई सर्वव्यापक शक्ति है—

एक अनन्त त्रिकाल सच, चेतन शक्ति दिखात ।

सिरजत, पालत, हरत, जग, महिमा बरनि न जात ॥

इसी एक शक्तिको लोग ईश्वर, ब्रह्म, परमात्मा इत्यादि अनेक नामोंसे पुकारते हैं । भागवतके पहले ही श्लोकमें वेदव्यासजीने ईश्वरके स्वरूपका वर्णन किया है कि जिससे इस संसारकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, जो त्रिकालमें सत्य है— अर्थात् जो सदा रहा भी, है भी और रहेगा भी — और जो अपने प्रकाशसे अन्धकारको सदा दूर रखता है, उस परम सत्यका हम ध्यान करते हैं । उसी स्थानमें श्रीमद्भागवतका स्वरूप भी इस प्रकारसे संक्षेपमें वर्णित है कि इस भागवतमें - जो दूसरोंकी बढ़ती देखकर डाह नहीं करते, ऐसे साधुजनोंका सब प्रकारके स्वार्थसे रहित परम धर्म और वह जाननेके योग्य ज्ञान वर्णित है जो वास्तवमें सब कल्याणका देनेवाला और आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक – इन तीनों प्रकारके तापोंको मिटानेवाला है । और ग्रन्थोंसे क्या, जिन सुकृतियोंने पुण्यके कर्म कर रखे हैं और जो श्रद्धासे भागवतको पढ़ते या सुनते हैं, वे इसका सेवन करनेके समयसे ही अपनी भक्तिसे ईश्वरको अपने हृदयमें अविचलरूपसे स्थापित कर लेते हैं । ईश्वरका ज्ञान और उनमें भक्तिका परम साधन — ये दो पदार्थ जब किसी प्राणीको प्राप्त हो गये तो कौन - सा पदार्थ रह गया, जिसके लिये मनुष्य कामना करे और ये दोनों पदार्थ श्रीमद्भागवतसे पूरी मात्रामें प्राप्त होते हैं । इसीलिये यह पवित्र ग्रन्थ मनुष्यमात्रका उपकारी है । जबतक मनुष्य भागवतको पढ़े

पृष्ठ 25

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नहीं और उसकी इसमें श्रद्धा न हो, तबतक वह समझ नहीं सकता कि ज्ञान - भक्ति- वैराग्यका यह कितना विशाल समुद्र है । भागवतके पढ़नेसे उसको यह विमल ज्ञान हो जाता है कि एक ही परमात्मा प्राणी- प्राणीमें बैठा हुआ है और जब उसको यह ज्ञान हो जाता है, तब वह अधर्म करनेका मन नहीं करता; क्योंकि दूसरोंको चोट पहुँचाना अपनेको चोट पहुँचानेके समान हो जाता है । इसका ज्ञान होनेसे मनुष्य सत्य धर्ममें स्थिर हो जाता है, स्वभावहीसे दया- धर्मका पालन करने लगता है और किसी अहिंसक प्राणीके ऊपर वार करनेकी इच्छा नहीं करता । मनुष्योंमें परस्पर प्रेम और प्राणिमात्रके प्रति दयाका भाव स्थापित करनेके लिये इससे बढ़कर कोई साधन नहीं । वर्तमान समयमें, जब संसारके बहुत अधिक भागों में भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ है, मनुष्यमात्रको इस पवित्र धर्मका उपदेश अत्यन्त कल्याणकारी होगा । जो भगवद्भक्त हैं और श्रीमद्भागवतके महत्त्वको जानते हैं, उनका यह कर्तव्य है कि मनुष्यके लोक और परलोक दोनोंके बनानेवाले इस पवित्र ग्रन्थका सब देशोंकी भाषाओंमें अनुवाद कर इसका प्रचार करें । — मदन मोहन मालवीय

पृष्ठ 26

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श्रीमद्भागवतकी पूजन विधि तथा विनियोग, न्यास एवं ध्यान प्रातःकाल स्नानके पश्चात् अपना नित्य - नियम समाप्त करके पहले भगवत् - सम्बन्धी स्तोत्रों एवं पदोंके द्वारा मंगलाचरण और वन्दना करे । इसके बाद आचमन और प्राणायाम करके-ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ १ ॥

—इत्यादि मन्त्रोंसे शान्तिपाठ करे । इसके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीव्यासजी, शुकदेवजी तथा श्रीमद्भागवत ग्रन्थकी षोडशोपचारसे पूजा करनी चाहिये । यहाँ श्रीमद्भागवत - पुस्तकके षोडशोपचार पूजनकी मन्त्रसहित विधि दी जा रही है, इसीके अनुसार श्रीकृष्ण आदिकी भी पूजा करनी चाहिये । निम्नांकित वाक्य पढ़कर पूजनके लिये संकल्प करना चाहिये । संकल्पके समय दाहिने हाथकी अनामिका अंगुलिमें कुशकी पवित्री पहने और हाथमें जल लिये रहे । संकल्पवाक्य इस प्रकार है— ॐ तत्सत् । ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ओ ३ मद्यैतस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशान्तर्गते पुण्यस्थाने कलियुगे कलिप्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे शुभपुण्यतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्नस्य अमुकशर्मणः ( वर्मणः गुप्तस्य वा ) मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य अमुकयोगवारांशकलग्नमुहूर्तकरणान्वितायां श्रीगोवर्धनधरणचरणारविन्दप्रसादात् भगवदनुग्रहपूर्वक भगवदीयप्रेमोपलब्धये श्रीभगवन्नामात्मकभगवत्स्वरूप श्रीभागवतस्य श्रीमद्भागवतस्य प्रतिष्ठां पूजनं चाहं करिष्ये । सर्वसमृद्धिप्राप्त्यर्थं च पाठेऽधिकारसिद्ध्यर्थं इस प्रकार संकल्प करके-तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शंय्योऽस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम् । अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय ॥२ ॥

- यह मन्त्र पढ़कर श्रीमद्भागवतकी सिंहासन या अन्य किसी आसनपर स्थापना करे । तत्पश्चात् पुरुषसूक्तके एक - एक मन्त्रद्वारा क्रमशः षोडश उपचार अर्पण करते हुए पूजन करे । १ – देवताओ! हमें अपने कानोंसे ऐसे ही वचन सुननेको मिलें, जो परिणाममें कल्याणकारी हों । हम यज्ञकर्ममें समर्थ होकर अपनी इन आँखोंसे सदा शुभ - ही - शुभ देखें—

पृष्ठ 27

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अशुभका कभी दर्शन न हो । हमारा शरीर और उसके अवयव स्थिर हों — पुष्ट हों और उनसे परमात्माकी स्तुति — भगवान्‌की सेवा करते हुए हम ऐसी आयुका उपभोग करें, ऐसा जीवन बितायें जो देवताओंके लिये हितकर हो, जिसका देवकार्यमें उपयोग हो सके । २ – परमात्मन्! आप सबके मित्र - हितकारी होनेके कारण मित्र नामसे पुकारे जाते हैं, सबसे वर — श्रेष्ठ होनेसे आप वरुण हैं, सबको ग्रहण करनेवाले होनेके कारण अग्नि हैं । हम आपको इन ‘ मित्र ', ' वरुण ' एवं ' अग्नि ' नामोंसे सम्बोधित करके प्रार्थना करते हैं कि यह सूक्त ( आपके सुयशसे पूर्ण यह श्रीमद्भागवतरूप सुन्दर उक्ति ) अत्यन्त प्रशस्त हो — सर्वोत्तम होनेके साथ ही इसकी ख्याति एवं प्रसार हो तथा यह सूक्त हमलोगोंके लिये ऐसा सुख, ऐसी शान्ति प्रदान करे, जिसमें दुःख या अशान्तिका मेल न हो, अर्थात् इससे नित्य सुख, नित्य शान्ति प्राप्त हो । हम चाहते हैं अविचल स्थिति, हम चाहते हैं शाश्वत प्रतिष्ठा, इसे इस सूक्तके द्वारा हम प्राप्त कर सकें । देवदेव! यह जो आपका अत्यन्त प्रकाशमान परम महान् समस्त लोकोंका आश्रयभूत ‘ सूर्य ' नामक स्वरूप है, इसे हम सदा ही नमस्कार करते हैं ।

पृष्ठ 28

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पूजन- मन्त्र

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।

स भूमिं सर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । आवाहयामि । - इस मन्त्रसे भगवान्के नामस्वरूप भागवतको नमस्कार करके आवाहन करे ।

ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यम् ।

उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । आसनं समर्पयामि । - इस मन्त्रसे आसन समर्पित करे ।

ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । पाद्यं समर्पयामि । - इस मन्त्रसे पैर पखारनेके लिये गंगाजल समर्पित करे ।

ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।

ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि ॥४ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । अर्घ्यं समर्पयामि । -इस मन्त्रसे अर्घ्य ( गन्ध - पुष्पादिसहित गंगाजल ) निवेदित करे ।

ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।

स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः ॥५ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । आचमनं समर्पयामि । - इस मन्त्रसे आचमनके लिये गंगाजल अर्पित करे ।

ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम् ।

पशून् ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये ॥६ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । स्नानं समर्पयामि । - इस मन्त्रसे स्नानके लिये गंगाजल अथवा शुद्ध जल अर्पित करे ।

ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तमादजायत ॥७ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । वस्त्रं समर्पयामि ।

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- इस मन्त्रसे वस्त्र समर्पित करे ।

ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।

गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥८ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । - इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत अर्पित करे ।

ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।

तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥९ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । गन्धं समर्पयामि । - इस मन्त्रसे गन्ध - चन्दनादि चढ़ाये ।

ॐयत् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।

मुखं किमस्यासीत् किम्बाहू किमूरू पादा उच्येते ॥१० ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । तुलसीदलं च पुष्पाणि समर्पयामि । - इस मन्त्रसे तुलसीदल एवं पुष्प चढ़ावे ।

ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥११ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । धूपमाघ्रापयामि । - इस मन्त्रसे धूप सुँघाये ।

ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।

श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥१२ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । दीपं दर्शयामि । - इस मन्त्रसे घीका दीप जलाकर दिखाये । ( उसके बाद हाथ धो ले । )

ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षॊशीर्णोद्यौः समवर्तत ।

पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥१३ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । नैवेद्यं निवेदयामि । – इस मन्त्रसे नैवेद्य अर्पित करे । नैवेद्यके बाद " मध्ये पानीयं समर्पयामि ” एवम् ‘ उत्तरापोशनं समर्पयामि ' कहकर तीन - तीन बार जल छोड़े ( प्रसाद ) ।

ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।

वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥१४ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः ॥ एलालवङ्गपूगीफलकर्पूरसहितं ताम्बूलं समर्पयामि । - इस मन्त्रसे ताम्बूल समर्पण करे ।

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ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिःसप्त समिधः कृताः देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवध्नन् पुरुषं पशुम् ॥१५ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । दक्षिणां समर्पयामि । - इस मन्त्रसे दक्षिणा समर्पित करे । ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे । सर्वाणि भूतानि विचिन्त्य धीरः नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते ॥१६ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । नमस्कारं समर्पयामि । ॐ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान् प्ररिशश्चतस्रः । तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥१७ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । प्रदक्षिणां समर्पयामि । - इस मन्त्रसे प्रदक्षिणा समर्पण करे । ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा-स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥१८ ॥

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । मन्त्रपुष्पं समर्पयामि । – इस मन्त्रसे पुष्पांजलि समर्पित करे । १ – सर्वान्तर्यामी परमात्मा इस समस्त ब्रह्माण्डकी भूमिको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित हैं और इससे दस अंगुल ऊपर भी हैं । अर्थात् ब्रह्माण्डमें व्यापक होते हुए वे इससे परे भी हैं । उन परमात्माके मस्तक, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और चरण आदि कर्मेन्द्रियाँ हजारों हैं— असंख्य हैं । २ – यह जो कुछ इस समय वर्तमान है, सब परमात्माका ही स्वरूप है, भूत और भविष्य जगत् भी परमात्मा ही है । इतना ही नहीं, वह परमात्मा मुक्तिका स्वामी है, तथापि ये जो अन्नसे उत्पन्न होनेवाले जीव हैं, उन सबका भी शासन - सबको नियमके अंदर रखनेवाला वह परमात्मा ही है । ३ – भूत, भविष्य और वर्तमान कालसे सम्बन्ध रखनेवाला जितना भी जगत् है — यह