श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 31–40

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

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सब इस पुरुषकी महिमा है, इस परमात्माका विभूति - विस्तार है । उसका पारमार्थिक स्वरूप इतना ही नहीं है, वह पुरुष इस ब्रह्माण्डमय विराट्स्वरूपसे भी बहुत बड़ा है । यह सारा विश्व ( ये तीनों लोक ) तो उसके एक पादमें है, उसकी एक चौथाईमें समाप्त हो जाते हैं । अभी उसके तीन पाद और शेष हैं । यह त्रिपादस्वरूप अमृत है— अविनाशी है और परम प्रकाशमय द्युलोक अर्थात् अपने स्वरूपमें ही स्थित है । ४ — यह त्रिपाद पुरुष ऊपर उठा हुआ है अर्थात् वह परमात्मा अज्ञानके कार्यभूत इस संसारसे पृथक् तथा यहाँके गुण - दोषोंसे अछूता रहकर ऊँची स्थितिमें विराजमान है । उसका एक अंशमात्र मायाके सम्पर्कमें आकर यहाँ जगत्के रूपमें उत्पन्न हुआ, फिर वह मायावश जड - चेतनमयी नाना प्रकारकी सृष्टिके रूपमें स्वयं ही फैलकर सब ओर व्याप्त हो गया । ५ — उस आदिपुरुष परमात्मासे विराट्की उत्पत्ति हुई— यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ । इस ब्रह्माण्डके ऊपर इसका अभिमानी एक पुरुष प्रकट हुआ । तात्पर्य यह कि परमात्माने अपनी मायासे विराट् ब्रह्माण्डकी रचना कर स्वयं ही उसमें जीवरूपसे प्रवेश किया । वे ही जीव ब्रह्माण्डका अभिमानी देवता ( हिरण्यगर्भ ) हुआ । इस प्रकार उत्पन्न होकर वह विराट् पुरुष पुनः देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि अनेकों रूपोंमें प्रकट हुआ । इसके बाद उसने भूमिको उत्पन्न किया, फिर जीवोंके शरीरोंकी रचना की । ६ – जिसमें सब कुछ हवन किया गया, उस पुरुषरूप यज्ञसे दही- घी आदि सामग्री उत्पन्न हुई । पुरुषने वनमें उत्पन्न होनेवाले हिरन आदि और गाँवोंमें होनेवाले गाय, घोड़े आदि, वायु - देवता - सम्बधी प्रसिद्ध पशुओं को भी उत्पन्न किया । ७ — जिसमें सब कुछ हवन किया गया है उस यज्ञपुरुषसे ऋग्वेद और सामवेद प्रकट हुए, उसीसे गायत्री आदि छन्दोंकी उत्पत्ति हुई तथा उसीसे यजुर्वेदका भी प्रादुर्भाव हुआ । ८ — उस यज्ञपुरुषसे घोड़े उत्पन्न हुए, इनके अतिरिक्त भी जो नीचे - ऊपर दोनों ओर दाँत रखनेवाले खच्चर, गदहे आदि प्राणी हैं, ये भी उत्पन्न हुए । उसीसे गौएँ उत्पन्न हुईं और उसीसे भेड़ों तथा बकरोंकी उत्पत्ति हुई । ९ – सबसे पहले उत्पन्न हुआ वह पुरुष ही उस समय यज्ञका साधन था, देवताओंने उसे संकल्पद्वारा यूपमें बँधा हुआ पशु माना और उस मानसिक यज्ञमें उस संकल्पित पशुका भावनाद्वारा ही प्रोक्षण आदि संस्कार भी किया । इस प्रकार संस्कार किये हुए उस पुरुषरूपी पशुके द्वारा देवताओं, साध्यों और ऋषियोंने उस मानसिक यज्ञको पूर्ण किया । १० – जब प्राणमय देवताओंने उस यज्ञपुरुष ( प्रजापति ) - को प्रकट किया, उस समय उसके अवयवोंके रूपमें कितने विभाग किये । इस पुरुषका मुख क्या था, दोनों बाहें क्या थीं । दोनों जाँघें और दोनों पैर कौन थे । ११ – ब्राह्मण इसका मुख था अर्थात् मुखसे ब्राह्मणकी उत्पत्ति हुई । दोनों भुजाएँ क्षत्रिय जाति बनीं, अर्थात् उनसे क्षत्रियोंका प्राकट्य हुआ । इस पुरुषकी दोनों जंघाएँ वैश्य हुईं— जंघाओंसे वैश्य जातिकी उत्पत्ति हुई और दोनों पैरोंसे शूद्र जाति प्रकट हुई । १२ — इसके मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए, नेत्रोंसे सूर्यकी उत्पत्ति हुई । श्रोत्र ( कान ) -से वायु

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और प्राणकी उत्पत्ति हुई और मुखसे अग्निका प्रादुर्भाव हुआ । १३ – नाभिसे अन्तरिक्ष- लोककी उत्पत्ति हुई, मस्तकसे स्वर्गलोक प्रकट हुआ, पैरोंसे पृथिवी हुई और कानसे दिशाएँ प्रकट हुईं । इस प्रकार उन्होंने समस्त लोकोंकी कल्पना की । १४ — उस समय देवताओंने यज्ञ करना चाहा, परन्तु यज्ञकी कोई सामग्री उपलब्ध न हुई, तब उन्होंने पुरुषस्वरूपमें ही हविष्यकी भावना की । जब पुरुषरूप हविष्यसे ही देवताओंने यज्ञका विस्तार किया, उस समय उनके संकल्पानुसार वसन्त ऋतु घी हुई, ग्रीष्म ऋतुने समिधाका काम दिया और शरद् ऋतुसे विशेष प्रकारके चरु - पुरोडाशादि हविष्यकी आवश्यकता पूर्ण हुई । १५ – प्रजापतिके प्राणरूपी देवताओंने जब मानसिक यज्ञका अनुष्ठान करते समय संकल्पद्वारा पुरुषरूपी पशुका बन्धन किया था, उस समय सात समुद्र इस यज्ञकी परिधि थे और इक्कीस प्रकारके छन्दोंकी समिधा हुई । ( गायत्री आदि ७, श्रुति जगती आदि ७ और कृति आदि ७ — ये ही २१ छन्द हैं । ) १६ — धीर पुरुष समग्र रूपोंको परमात्माके ही स्वरूप विचारकर, उनके भिन्न - भिन्न नाम रखकर जिस एक तत्त्वका ही उच्चारण और अभिवन्दन करता है, उसको ज्ञानी पुरुष इस प्रकार जानते हैं - अविद्यारूपी अन्धकारसे परे आदित्यके समान स्वप्रकाश इस महान् पुरुषको मैं अपने ' आत्मा ' रूपसे जानता हूँ । १७ – ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिसका स्तवन किया था, इन्द्रने सब दिशा - विदिशाओंमें जिसे व्याप्त जाना था, उस परमात्माको जो इस प्रकार जानता है, वह इस जीवनमें ही अमृत ( मुक्त ) हो जाता है । मोक्ष अथवा भगवत्प्राप्तिके लिये इसके सिवा दूसरा मार्ग नहीं है । १८ – देवताओंने पूर्वोक्त मानसिक यज्ञद्वारा यज्ञस्वरूप पुरुष - प्रजापतिकी आराधना की । इस आराधनासे समस्त जगत्को धारण करनेवाले वे पृथ्वी आदि मुख्य भूत प्रकट हुए । इस यज्ञकी उपासना करनेवाले महात्मालोग उस स्वर्गलोकको प्राप्त होते हैं, जहाँ प्राचीन साध्यदेवता निवास करते हैं ।

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प्रार्थना वन्दे श्रीकृष्णदेवं मुरनरकभिदं वेदवेदान्तवेद्यं लोके भक्तिप्रसिद्धं यदुकुलजलधौ प्रादुरासीदपारे । यस्यासीद् रूपमेवं त्रिभुवनतरणे भक्तिवच्च स्वतन्त्रं शास्त्रं रूपं च लोके प्रकटयति मुदा यः स नो भूतिहेतुः ॥ जो इस जगत्में भक्तिसे ही प्राप्त होते हैं, जिनका तत्त्व वेद और वेदान्तके द्वारा ही जाननेयोग्य है, जो अपार यादवरूपी समुद्रमें प्रकट हुए थे, मुर और नरकासुरको मारनेवाले उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं सादर सप्रेम प्रणाम करता हूँ । जो इस संसारमें अपने स्वरूप तथा शास्त्रको प्रसन्नतापूर्वक प्रकट किया करते हैं तथा सचमुच ही जिनका स्वरूप इस त्रिभुवनको तारनेके लिये भक्तिके समान स्वतन्त्र नौकारूप है, वे भगवान् श्रीकृष्ण हमलोगोंका कल्याण करें ।

नमः कृष्णपदाब्जाय भक्ताभीष्टप्रदायिने ।

आरक्तं रोचयेच्छश्वन्मामके हृदयाम्बुजे ॥

कुछ - कुछ लालिमा लिये हुए श्रीकृष्णका जो चरणकमल मेरे हृदयकमलमें सदा दिव्य प्रकाश फैलाता रहता है और भक्तजनोंकी मनोवांछित कामनाएँ पूर्ण किया करता है, उसे मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ ।

श्रीभागवतरूपं तत् पूजयेद् भक्तिपूर्वकम् ।

अर्चकायाखिलान् कामान् प्रयच्छति न संशयः ॥

श्रीमद्भागवत भगवान्‌का स्वरूप है, इसका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये । यह पूजन करनेवालेकी सारी कामनाएँ पूर्ण करता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । विनियोग दाहिने हाथकी अनामिकामें कुशकी पवित्री पहन ले । फिर हाथमें जल लेकर नीचे लिखे वाक्यको पढ़कर भूमिपर गिरा दे— ॐ अस्य श्रीमद्भागवताख्यस्तोत्रमन्त्रस्य नारद ऋषिः । बृहती छन्दः । श्रीकृष्णः परमात्मा देवता । ब्रह्म बीजम् । भक्तिः शक्तिः । ज्ञानवैराग्ये कीलकम् । मम श्रीमद्भगवत्प्रसादसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः । ‘ इस श्रीमद्भागवतस्तोत्र - मन्त्रके देवर्षि नारदजी ऋषि हैं, बृहती छन्द है, परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र देवता हैं, ब्रह्म बीज है, भक्ति शक्ति है, ज्ञान और वैराग्य कीलक है । अपने ऊपर भगवान्‌की प्रसन्नता हो, उनकी कृपा बराबर बनी रहे - इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पाठ करनेमें इस भागवतका विनियोग ( उपयोग ) किया जाता है । '

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न्यास विनियोगमें आये हुए ऋषि आदिका तथा प्रधान देवताके मन्त्राक्षरोंका अपने शरीरके विभिन्न अंगोंमें जो स्थापन किया जाता है, उसे ' न्यास ' कहते हैं । मन्त्रका एक - एक अक्षर चिन्मय होता है, उसे मूर्तिमान् देवताके रूपमें देखना चाहिये । इन अक्षरोंके स्थापनसे साधव स्वयं मन्त्रमय हो जाता है, उसके हृदयमें दिव्य चेतनाका प्रकाश फैलता है, मन्त्रके देवता उसके स्वरूप होकर उसकी सर्वथा रक्षा करते हैं । इस प्रकार वह ' देवो भूत्वा देवं यजेत् ’ इस श्रुतिके अनुसार स्वयं देवस्वरूप होकर देवताओंका पूजन करता है । ऋषि आदिका न्यास सिर आदि कतिपय अंगोंमें होता है । मन्त्रपदों अथवा अक्षरोंका न्यास प्रायः हाथकी अँगुलियों और हृदयादि अंगोंमें होता है । इन्हें क्रमशः ' करन्यास ' और ' अंगन्यास ' कहते हैं । किन्हीं-किन्हीं मन्त्रोंका न्यास सर्वांगमें होता है । न्याससे बाहर - भीतरकी शुद्धि, दिव्यबलकी प्राप्ति और साधनाकी निर्विघ्न पूर्ति होती है । यहाँ क्रमशः ऋष्यादिन्यास, करन्यास और अंगन्यास दिये जा रहे हैं— ऋष्यादिन्यास नारद नमः शिरसि ॥१ ॥ बृहतीच्छन्दसे नमो मुखे ॥२ ॥

श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमो हृदये || ३ || ब्रह्मबीजाय नमो गुह्ये || ४ || भक्तिशक्तये नमः पादयोः || ५ || ज्ञानवैराग्यकीलकाभ्यां नमो नाभौ || ६ || विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥७ ॥

ऊपर न्यासके सात वाक्य उद्धृत किये गये हैं । इनमें पहला वाक्य पढ़कर दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे सिरका स्पर्श करे, दूसरा वाक्य पढ़कर मुखका, तीसरे वाक्यसे हृदयका, चौथेसे गुदाका, पाँचवेंसे दोनों पैरोंका, छठेसे नाभिका और सातवें वाक्यसे सम्पूर्ण अंगोंका स्पर्श करना चाहिये । करन्यास इसमें ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' इस द्वादशाक्षरमन्त्रके एक - एक अक्षरको प्रणवसे सम्पुटित करके दोनों हाथोंकी अंगुलियोंमें स्थापित करना है । मन्त्र नीचे दिये जा रहे हैं— ' ॐ ॐ ॐ नमो दक्षिणतर्जन्याम् ' ऐसा उच्चारण करके दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी तर्जनीका स्पर्श करे । ' ॐ नं ॐ नमो दक्षिणमध्यमायाम् ' – यह उच्चारण कर दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी मध्यमा अंगुलिका स्पर्श करे । ' ॐ म ॐ नमो दक्षिणानामिकायाम्’— यह पढ़कर दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी अनामिका अंगुलिका स्पर्श करे । ‘ ॐ भं ॐ नमो दक्षिणकनिष्ठिकायाम् ' – इससे दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका अंगुलिका स्पर्श करे । ' ॐ गं ॐ नमो वामकनिष्ठिकायाम्’– इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी कनिष्ठिका अंगुलिका स्पर्श करे । ‘ ॐ वं ॐ नमो वामानामिकायाम् ' – इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी

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अनामिका अंगुलिका स्पर्श करे । ॐ तें ॐ नमो वाममध्यमायाम् ' – इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी मध्यमा अंगुलिका स्पर्श करे । ॐ वां ॐ नमो वामतर्जन्याम्’– इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी तर्जनी अंगुलिका स्पर्श करे । ॐ सुं ॐ नमः ॐ दें ॐ नमो दक्षिणाङ्गुष्ठपर्वणोः ' - इसको पढ़कर दाहिने हाथकी तर्जनी अंगुलिसे दाहिने हाथके अँगूठेकी दोनों गाँठोंका स्पर्श करे । ' ॐ वां ॐ नमः ॐ यं ॐ नमो वामाङ्गुष्ठपर्वणोः’- -इसका उच्चारण करके बायें हाथकी तर्जनी अंगुलिसे बायें हाथके अँगूठेकी दोनों गाँठोंका स्पर्श करे । अङ्गन्यास यहाँ द्वादशाक्षरमन्त्रके पदोंका हृदयादि अंगोंमें न्यास करना है-' ॐ नमो नमो हृदयाय नमः ' - इसको पढ़कर दाहिने हाथकी पाँचों अंगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे । -‘ ॐ भगवते नमः शिरसे स्वाहा ' – इसका उच्चारण करके दाहिने हाथकी सभी अंगुलियोंसे सिरका स्पर्श करे । ॐ वासुदेवाय नमः शिखायै वषट् ' – इसके द्वारा दाहिने हाथसे शिखाका स्पर्श करे । ' ॐ नमो नमः कवचाय हुम् ' – इसको पढ़कर दायें हाथकी अंगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अंगुलियोंसे दायें कंधेका स्पर्श करे । ‘ ॐ भगवते नमः नेत्रत्रयाय वौषट् ' – इसको पढ़कर दाहिने हाथकी अंगुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रोंका तथा ललाटके मध्यभागमें गुप्तरूपसे स्थित तृतीय नेत्र ( ज्ञानचक्षु ) ) - - का स्पर्श करे । ‘ ॐ वासुदेवाय नमः अस्त्राय फट् ' - इसका उच्चारण करके दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे उलटा अर्थात् बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले जाये और तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये । अंगन्यासमें आये हुए ‘ स्वाहा ', ' वषट् ', ' हुम् ', ' वौषट् ' और ' फट् ' – ये पाँच शब्द देवताओंके उद्देश्यसे किये जानेवाले हवनसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं । यहाँ इनका आत्मशुद्धिके लिये ही उच्चारण किया जाता है । ध्यान इस प्रकार न्यास करके बाहर - भीतरसे शुद्ध हो मनको सब ओरसे हटाकर एकाग्रभावसे भगवान्का ध्यान करे—

किरीटकेयूरमहार्हनिष्कै-र्मण्युत्तमालङ्कृतसर्वगात्रम् ।

पीताम्बरं काञ्चनचित्रनद्ध-मालाधरं केशवमभ्युपैमि ॥

‘ जिनके मस्तकपर किरीट, बाहुओंमें भुजबन्ध और गलेमें बहुमूल्य हार शोभा पा रहे हैं, मणियोंके सुन्दर गहनोंसे सारे अंग सुशोभित हो रहे हैं और शरीरपर पीताम्बर फहरा रहा है

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सोनेके तारद्वारा विचित्र रीतिसे बँधी हुई वनमाला धारण किये, उन भगवान् श्रीकृष्ण मैं मन - ही - मन चिन्तन करता हूँ । '

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श्रीमद्भागवत सप्ताहकी आवश्यक विधि पुराणोंमें श्रीमद्भागवतके सप्ताहपारायण तथा श्रवणकी बड़ी भारी महिमा बतलायी गयी है, अतः यहाँ श्रीमद्भागवत - प्रेमियोंके लिये संक्षेपसे सप्ताह - यज्ञकी आवश्यक विधिका दिग्दर्शन कराया जाता है । मुहूर्तविचार — पहले विद्वान् ज्योतिषीको बुलाकर उनके द्वारा कथा - प्रारम्भके लिये शुभ मुहूर्तका विचार करा लेना चाहिये । नक्षत्रोंमें हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, अश्विनी, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा तथा पूर्वाभाद्रपदा उत्तम हैं । तिथियोंमें द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी तथा द्वादशीको इस कार्यके लिये श्रेष्ठ बतलाया गया है । सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र - ये वार सर्वोत्तम हैं । तिथि, वार और नक्षत्रका विचार करनेके साथ ही यह भी देख लेना चाहिये कि शुक्र या गुरु अस्त, बाल अथवा वृद्ध तो नहीं हैं । कथारम्भका मुहूर्त भद्रादि दोषोंसे रहित होना चाहिये । उस दिन पृथ्वी जागती हो, वक्ता और श्रोताका चन्द्रबल ठीक हो । लग्नमें शुभ ग्रहोंका योग अथवा उनकी दृष्टि हो । शुभ ग्रहों की स्थिति केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो उत्तम है । आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक और मार्गशीर्ष ( अगहन ) —ये मास कथा आरम्भ करनेके लिये श्रेष्ठ बतलाये गये हैं । किन्हीं विद्वानोंके मतसे चैत्र और पौषको छोड़कर सभी मास ग्राह्य हैं । कथाके लिये स्थान - सप्ताहकथाके लिये उत्तम एवं पवित्र स्थानकी व्यवस्था हो । जहाँ अधिक लोग सुविधासे बैठ सकें, ऐसे स्थानमें कथाका आयोजन उत्तम है । नदीका तट, उपवन ( बगीचा ), देवमन्दिर अथवा अपना निवास - स्थान- ये सभी कथाके लिये उपयोगी स्थल हैं, स्थान लिपा - पुता स्वच्छ हो । नीचेकी भूमि गोबर और पीली मिट्टीसे लीपी गयी हो । अथवा पक्का आँगन हो तो उसे धो दिया गया हो । उसपर पवित्र एवं सुन्दर आसन बिछे हों । ऊपरसे चंदोवा तना हो । चंदोवा आदि किसी भी कार्यमें नीले रंगके वस्त्रका उपयोग न किया जाय । यजमानके हाथसे सोलह हाथ लम्बा और उतना ही चौड़ा कथा - मण्डप बने । उसे केलेके खम्भोंसे सजाया जाय । हरे बाँसके खंभे लगाये जायँ । नूतन पल्लवोंकी बंदनवारों, पुष्पमालाओं और ध्वजा - पताकाओंसे मण्डपको भलीभाँति सुसज्जित किया जाय । उसपर ऊपरसे सुन्दर चँदोवा तान दिया जाय । उस मण्डपके दक्षिण - पश्चिम भागमें कथावाचक और मुख्य श्रोताके बैठनेके लिये स्थान हो । शेष भागमें देवताओं और कलश आदिका स्थापन किया जाय । कथावाचकके बैठनेके लिये ऊँची चौकी रखी जाय । उसपर शुद्ध आसन ( नया गद्दा ) बिछाया जाय । पीछे तथा पार्श्वभागमें मसनद एवं तकिये रख दिये जायँ । श्रीमद्भागवतको स्थापित करनेके लिये एक छोटी - सी चौकी या आधारपीठ बनवाकर उसपर पवित्र वस्त्र बिछा दिया जाय । उसपर आगे बतायी जानेवाली विधिके अनुसार अष्टदल कमल बनाकर पूजन करके श्रीमद्भागवतकी पुस्तक स्थापित की जाय ।

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कथावाचक विद्वान्, सर्वशास्त्रकुशल, दृष्टान्त देकर श्रोताओं को समझानेमें समर्थ, सदाचारी एवं सद्गुणसम्पन्न ब्राह्मण हों । उनमें सुशीलता, कुलीनता, गम्भीरता तथा श्रीकृष्णभक्तिका होना भी परमावश्यक है । वक्ताको असूया तथा परनिन्दा आदि दोषसे सर्वथा रहित निःस्पृह होना चाहिये । श्रीमद्भागवतकी पुस्तकको रेशमी वस्त्रसे आच्छादित करके छत्र- चँवरके साथ डोलीमें अथवा अपने मस्तकपर रखकर कथामण्डपमें लाना और स्थापित करना चाहिये । उस समय गीत - वाद्य आदिके द्वारा उत्सव मनाना चाहिये । कथामण्डपसे अनुपयोगी वस्तुएँ हटा देनी चाहिये । इधर - उधर दीवालोंमें भगवान् और उनकी लीलाओंके स्मारक चित्र लगा देने चाहिये । वक्ताका मुँह यदि उत्तरकी ओर हो तो मुख्य श्रोताका मुख पूर्वकी ओर होना चाहिये । यदि वक्ता पूर्वाभिमुख हो तो श्रोताको उत्तराभिमुख होना चाहिये । सप्ताह - कथा एक महान् यज्ञ है । इसे सुसम्पन्न करनेके लिये अन्य सुहृद्-सम्बन्धियोंको भी सहायक बना लेना चाहिये । अर्थकी भी समुचित व्यवस्था पहलेसे ही कर लेना उत्तम है । पाँच - सात दिन पहलेसे ही दूर - दूरतक कथाका समाचार भेज देना चाहिये और सबसे यह अनुरोध करना चाहिये कि वे स्वयं उपस्थित होकर सप्ताह - कथा श्रवण करें । अधिक समय न दे सकें तो भी एक दिन अवश्य पधारकर कथाश्रवणका लाभ लें । दूरसे आये हुए अतिथियोंके ठहरने और भोजनादिकी व्यवस्था भी करनी चाहिये । वक्ताको व्रत ग्रहण करनेके लिये एक दिन पहले ही क्षौर करा लेना चाहिये । सप्ताह - प्रारम्भ होनेके एक दिन पूर्व ही देवस्थापन, पूजनादि कर लेना उत्तम है । वक्ता प्रतिदिन सूर्योदयसे पूर्व ही स्नानादि करके संक्षेपसे सन्ध्या - वन्दनादिका नियम पूरा कर ले और कथामें कोई विघ्न न आये, इसके लिये नित्यप्रति गणेशजीका पूजन कर लिया करे । सप्ताहके प्रथम दिन यजमान स्नान आदिसे शुद्ध हो नित्यकर्म करके आभ्युदयिक श्राद्ध करे । आभ्युदयिक श्राद्ध और पहले भी किया जा सकता है । यज्ञमें इक्कीस दिन पहले भी आभ्युदयिक श्राद्ध करनेका विधान है । उसके बाद गणेश, ब्रह्मा आदि देवताओंसहित नवग्रह, षोडशमातृका, सप्त चिरजीवी ( अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान्, विभीषण, कृपाचार्य तथा परशुरामजी ) एवं कलशकी स्थापना तथा पूजा करे । एक चौकीपर सर्वतोभद्र - मण्डल बनाकर उसके मध्यभागमें ताम्रकलश स्थापित करे । कलशके ऊपर भगवान् लक्ष्मीनारायणकी प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये । कलशके ही बगलमें भगवान् शालग्रामका सिंहासन विराजमान कर देना चाहिये । सर्वतोभद्र-मण्डलमें स्थित समस्त देवताओंका पूजन करनेके पश्चात् भगवान् नर - नारायण, गुरु, वायु, सरस्वती, शेष, सनकादि कुमार, सांख्यायन, पराशर, बृहस्पति, मैत्रेय तथा उद्धवका भी आवाहन, स्थापन एवं पूजन करना चाहिये । फिर त्रय्यारुणि आदि छः पौराणिकोंका भी स्थापन - पूजन करके एक अलग पीठपर उसे सुन्दर वस्त्रसे आवृत करके, श्रीनारदजीकी स्थापना एवं अर्चना करनी चाहिये । तदनन्तर आधारपीठ, पुस्तक एवं व्यास ( वक्ता आचार्य ) - का भी यथाप्राप्त उपचारोंसे पूजन करना चाहिये । कथा

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निर्विघ्न पूर्ण हो– इसके लिये गणेशमन्त्र, द्वादशाक्षरमन्त्र तथा गायत्री - मन्त्रका जप और विष्णुसहस्रनाम एवं गीताका पाठ करनेके लिये अपनी शक्तिके अनुसार सात, पाँच या तीन ब्राह्मणोंका वरण करे । श्रीमद्भागवतका भी एक पाठ अलग ब्राह्मणद्वारा कराये । देवताओंकी स्थापना और पूजाके पहले स्वस्तिवाचनपूर्वक हाथमें पवित्री, अक्षत, फूल, जल और द्रव्य लेकर एक महासंकल्प कर लेना चाहिये । संकल्प इस प्रकार है-ॐ तत्सदद्य श्रीमहाभगवतो विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते विष्णुप्रजापतिक्षेत्रे वैवस्वतमनुभोग्यैकसप्ततियुगचतुष्टयान्तर्गताष्टाविंशति - तमकलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे अमुकसंवत्सरे अमुकायने अमुक अमुकराशिस्थिते भगवति॒ सवितरि अमुकामुकराशिस्थितेषु चान्येषु ग्रहेषु महामाङ्गल्यप्रदे मासानामुत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे अमुकमुहूर्तकरणादियुतायाम् अमुकतिथौ अमुकगोत्रः अमुकप्रवरः अमुकशर्मा ( वर्मा, गुप्तः ) अहं पूर्वातीतानेकजन्मसंचिताखिलदुष्कृतनिवृत्तिपुरस्सरैहि-काध्यात्मिकादिविविधतापपापापनोदार्थं दशाश्वमेध-यज्ञजन्यसम्यगिष्टराजसूययज्ञसहस्रपुण्यसमपुण्यचन्द्रसूर्यग्रहणकालिकबहुब्राह्मणस सर्वरत्नोपशोभितमहीदानपुण्यप्राप्तये श्रीगोविन्द - चरणारविन्दयुगले निरन्तरमुत्तरोत्तरमेधमाननिस्सीम प्रेमोपलब्धये तदीयपरमानन्दमयगोलोकधाम्नि नित्यनिवासपूर्वकतत्परिचर्यारसास्वादनसौभाग्यसिद्धये अमुकगोत्रामुकप्रवरामुकशर्मब्राह्मणवदना - रविन्दाच्छ्रीकृष्णवाङ्मयमूर्तीभूतं श्रीमद्भागवतमष्टादशपुराणप्रकृतिभूतमनेकश्रोतृश्रवणपूर्वकममुकदिनादारभ्यामुर्का सप्ताहयज्ञरूपतया श्रोष्यामि * प्राप्स्यमानेऽस्मिन् सप्ताहयज्ञे विघ्नपूगनिवारणपूर्वकं यज्ञरक्षाकरणार्थं गणपतिब्रह्मादिसहितनवग्रह-षोडशमातृकासप्तचिरजीविपुरुषसर्वतोभद्रमण्डलस्थ - देवकलशाद्यर्चनपुरस्सरं श्रीलक्ष्मीनारायण - प्रतिमाशालग्रामनरनारायणगुरुवायुसरस्वतीशेषसनत्कुमार-सांख्यायनपराशरबृहस्पतिमैत्रेयोद्धवत्रय्यारुणिकश्यप-रामशिष्याकृतव्रणवैशम्पायनहारीतनारदपूजनमाधारपीठ - पुस्तकव्यासपूजनं च यथालब्धोपचारैः करिष्ये । संकल्पके पश्चात् पूर्वोक्त देवताओंके चित्रपटमें अथवा अक्षत - पुंजपर उनका आवाहन - स्थापन करके वैदिक - पूजा - पद्धतिके अनुसार उन सबकी पूजा करनी चाहिये । सप्तचिरजीविपुरुषों तथा सनत्कुमार आदिका पूजन नाम- मन्त्रद्वारा करना चाहिये । कथामण्डपमें चारों दिशाओं या कोणोंमें एक - एक कलश और मध्यभागमें एक कलश — इस प्रकार पाँच कलश स्थापित करने चाहिये । चारों ओरके चार कलशोंमेंसे पूर्वके कलशपर ऋग्वेदकी, दक्षिण कलशपर यजुर्वेदकी, पश्चिम कलशपर सामवेदकी और उत्तर कलशपर अथर्ववेदकी स्थापना एवं पूजा करनी चाहिये । कोई - कोई मध्यमें

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सर्वतोभद्र - मण्डलके मध्यभागमें एक ही ताम्रकलश स्थापित करके उसीके चारों दिशाओंमें सर्वतोभद्रमण्डलकी चौकीके चारों ओर चारों वेदोंकी स्थापनाका विधान करते हैं । इसी कलशके ऊपर भगवान् लक्ष्मी - नारायणकी प्रतिमा स्थापित करे और षोडशोपचार - विधिसे उसकी पूजा करे । देवपूजाका क्रम प्रारम्भसे इस प्रकार रखना चाहिये— पहले रक्षादीप प्रज्वलित करे । एक पात्रमें घी भरकर रूईकी फूलबत्ती जलाये और उसे सुरक्षित स्थानपर अक्षतके ऊपर स्थापित कर दे । वह वायु आदिके झोंकेसे बुझ न जाय, इसकी सावधानीके साथ व्यवस्था करे । फिर स्वस्तिवाचनपूर्वक मंगलपाठ एवं सर्वदेव - नमस्कार करके पूर्वोक्त महासंकल्प पढ़े । उसके बाद एक पात्रमें चावल भरकर उसपर मोलीमें लपेटी हुई एक सुपारी रख दे और उसीमें गणेशजीका आवाहन करे – ‘ ॐ भूर्भुवः स्वः गणपते इहागच्छ इह तिष्ठ मम पूजां गृहाण । ' इस प्रकार आवाहन करके ‘ गणानां त्वा ० ' इत्यादि मन्त्रोंको पढ़े । फिर ' गजाननं भूत ० ' इत्यादि

श्लोकोंको पढ़ते हुए तदनुरूप ध्यान करे । ॐ मनो जूतिः ० ' इत्यादि मन्त्रसे प्रतिष्ठा

करके विभिन्न उपचारसमर्पणसम्बन्धी मन्त्र पढ़ते हुए अथवा ' श्रीगणपतये नमः ’ इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए गणेशजीको क्रमशः पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नानीय, पुनराचमनीय, पंचामृतस्नान, शुद्धोदकस्नान, वस्त्र, रक्षासूत्र, यज्ञोपवीत, चन्दन, रोली, सिन्दूर, अबीर, गुलाल, अक्षत, फूल, माला, दूर्वादल, आभूषण, सुगन्ध ( इनका फाहा ), धूप, दीप, नैवेद्य ( मिष्टान्न एवं गुड़, मेवा आदि ) तथा ऋतुफल अर्पण करे । गंगाजलसे आचमन कराकर मुखशुद्धिके लिये सुपारी, लवंग, इलायची और कर्पूरसहित ताम्बूल अर्पण करे । अन्तमें दक्षिणा द्रव्य एवं विशेषार्घ्य, प्रदक्षिणा एवं साष्टांग प्रणाम निवेदन करके प्रार्थना करे । ॐ लम्बोदरं परमसुन्दरमेकदन्तं रक्ताम्बरं त्रिनयनं परमं पवित्रम् । उद्यद्दिवाकरकरोज्ज्वलकायकान्तं विघ्नेश्वरं सकलविघ्नहरं नमामि ॥ त्वां देव विघ्नदलनेति च सुन्दरेति भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति । विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव ॥ ——अनया पूजया गणपतिः प्रीयतां न मम । ' यों कहकर गणेशजीको पुष्पांजलि दे । इसके बाद ' ॐ भूर्भुवः स्वः भो ब्रह्मविष्णुशिवसहितसूर्यादिनवग्रहा इहागच्छतेह तिष्ठत मम पूजां गृह्णीत ' इस प्रकार या वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मादिसहित नवग्रहोंका आवाहन करे । फिर पूर्ववत् उपचार- मन्त्रोंसे अथवा ॐ ब्रह्मणे