श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 941–950
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 941–950
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यः षट् सपत्नान् विजिगीषमाणो गृहेषु निर्विश्य यतेत पूर्वम् । अत्येति दुर्गाश्रित ऊर्जितारीन् क्षीणेषु कामं विचरेद्विपश्चित् ॥१८ त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश-दुर्गाश्रितो निर्जितषट्सपत्नः । भुङ्क्ष्वेह भोगान् पुरुषातिदिष्टान् विमुक्तसङ्गः प्रकृतिं भजस्व ॥१९ श्रीशुक उवाच इति समभिहितो महाभागवतो भगवतः त्रिभुवनगुरोरनुशासनमात्मनो लघुतयावनत-- शिरोधरो बाढमिति सबहुमानमुवाह ॥ २० ॥
भगवानपि मनुना यथावदुपकल्पितापचितिः प्रियव्रतनारदयोरविषममभिसमीक्षमाणयोरात्म - समवस्थानमवाङ्मनसं क्षयमव्यवहृतं प्रवर्तयन्नगमत् ॥२१ ॥
मनुरपि परेणैवं सुरर्षिवरानुमतेनात्मजमखिलधरामण्डलस्थिति - गुप्तय स्वयमतिविषमविषय - विषजलाशयाशाया उपरराम ॥ २२ ॥
प्रतिसन्धितमनोरथः आस्थाप्य जो पुरुष इन्द्रियोंके वशीभूत है, वह वन - वनमें विचरण करता रहे तो भी उसे जन्म-मरणका भय बना ही रहता है; क्योंकि बिना जीते हुए मन और इन्द्रियरूपी उसके छः शत्रु कभी उसका पीछा नहीं छोड़ते । जो बुद्धिमान् पुरुष इन्द्रियोंको जीतकर अपनी आत्मामें ही रमण करता है, उसका गृहस्थाश्रम भी क्या बिगाड़ सकता है? ॥१७ ॥ जिसे इन छः
शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा हो, वह पहले घरमें रहकर ही उनका अत्यन्त निरोध करते हुए उन्हें वशमें करनेका प्रयत्न करे । किलेमें सुरक्षित रहकर लड़नेवाला राजा अपने प्रबल शत्रुओंको भी जीत लेता है । फिर जब इन शत्रुओंका बल अत्यन्त क्षीण हो जाय, तब विद्वान् पुरुष इच्छानुसार विचर सकता है || १८ || तुम यद्यपि श्रीकमलनाभ भगवान्के चरणकमलकी कलीरूप किलेके आश्रित रहकर इन छहों शत्रुओंको जीत चुके हो, तो भी पहले उन पुराणपुरुषके दिये हुए भोगोंको भोगो; इसके बाद निःसंग होकर अपने आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ॥१९ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- जब त्रिलोकीके गुरु श्रीब्रह्माजीने इस प्रकार कहा, तो परमभागवत प्रियव्रतने छोटे होनेके कारण नम्रतासे सिर झुका लिया और ' जो आज्ञा ' ऐसा कहकर बड़े आदरपूर्वक उनका आदेश शिरोधार्य किया ॥२० ॥ तब स्वायम्भुव मनुने प्रसन्न
होकर भगवान् ब्रह्माजीकी विधिवत् पूजा की । इसके पश्चात् वे मन और वाणीके अविषय,
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अपने आश्रय तथा सर्वव्यवहारातीत परब्रह्मका चिन्तन करते हुए अपने लोकको चले गये ।
इस समय प्रियव्रत और नारदजी सरल भावसे उनकी ओर देख रहे थे ॥२१ ॥
मनुजीने इस प्रकार ब्रह्माजीकी कृपासे अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेपर देवर्षि नारदकी आज्ञासे प्रियव्रतको सम्पूर्ण भूमण्डलकी रक्षाका भार सौंप दिया और स्वयं विषयरूपी विषैले जलसे भरे हुए गृहस्थाश्रमरूपी दुस्तर जलाशयकी भोगेच्छासे निवृत्त हो गये ॥२२ ॥
इति वाव स जगतीपतिरीश्वरेच्छया - धिनिवेशित कर्माधिकारोऽखिलजगद्बन्धध्वंसन - परानुभावस्य भगवत आदिपुरुषस्याङ्घ्रियुगला-नवरतध्यानानुभावेन परिरन्धितकषायाशयो ऽवदातोऽपि मानवर्धनो महतां महीतलम-नुशशास ॥२३ ॥ अथ च दुहितरं प्रजापतेर्विश्वकर्मण उपयेमे बर्हिष्मतीं नाम तस्यामु ह
वाव आत्मजानात्मसमानशीलगुणकर्मरूप - वीर्योदारान्दश भावयाम्बभूव कन्यां च यवीयसीमूर्जस्वतीं नाम ॥२४ ॥
आग्नीध्रेध्मजिह्वयज्ञबाहुमहावीरहिरण्यरेतो घृतपृष्ठसवनमेधातिथिवीतिहोत्रकवय इति सर्व एवाग्निनामानः ॥ २५ ॥ एतेषां कविर्महावीरः सवन इति त्रय
आसन्नूर्ध्वरेतसस्त आत्मविद्यायामर्भभावादारभ्य कृतपरिचयाः पारमहंस्यमेवाश्रममभजन् || २६ || तस्मिन्नु ह वा उपशमशीलाः परमर्षयः सकलजीव-निकायावासस्य भगवतो वासुदेवस्य भीतानां श्रीमच्चरणारविन्दाविरतस्मरणा - विगलितपरमभक्तियोगानुभावेन न्तर्हृदयाधिगते भगवति सर्वेषां शरणभूतस्य परिभाविता-भूतानामात्म - भूते प्रत्यगात्मन्येवात्मनस्तादात्म्यमविशेषेण समीयुः || २७ || अन्यस्यामपि जायायां त्रयः पुत्रा आसन्नुत्तमस्तामसो रैवत इति मन्वन्तराधिपतयः ॥२८ ॥
अब पृथ्वीपति महाराज प्रियव्रत भगवान्की इच्छासे राज्यशासनके कार्यमें नियुक्त हुए । जो सम्पूर्ण जगत्को बन्धनसे छुड़ानेमें अत्यन्त समर्थ हैं, उन आदिपुरुष श्रीभगवान्के चरणयुगलका निरन्तर ध्यान करते रहने से यद्यपि उनके रागादि सभी मल नष्ट हो चुके थे और उनका हृदय भी अत्यन्त शुद्ध था, तथापि बड़ोंका मान रखनेके लिये वे पृथ्वीका शासन करने लगे ॥२३ ॥
तदनन्तर उन्होंने प्रजापति विश्वकर्माकी पुत्री बर्हिष्मतीसे विवाह किया । उससे उनके दस पुत्र हुए । वे सब उन्हींके समान शीलवान्, गुणी, कर्मनिष्ठ, रूपवान् और पराक्रमी थे । उनसे छोटी ऊर्जस्वती नामकी एक कन्या भी हुई ॥ २४ ॥
पुत्रोंके नाम आग्नीध्र इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, महावीर, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, सवन,
मेधातिथि, वीतिहोत्र और कवि थे । ये सब नाम अग्निके भी हैं ॥२५ ॥
इनमें कवि, महावीर और सवन – ये तीन नैष्ठिक ब्रह्मचारी हुए । इन्होंने बाल्यावस्थासे आत्मविद्याका अभ्यास करते हुए अन्तमें संन्यासाश्रम ही स्वीकार किया ॥२६ ॥
इन निवृत्तिपरायण महर्षियोंने संन्यासाश्रममें ही रहते हुए समस्त जीवोंके अधिष्ठान और भवबन्धनसे डरे हुए लोगोंको आश्रय देनेवाले भगवान् वासुदेवके परम सुन्दर चरणारविन्दोंका
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निरन्तर चिन्तन किया । उससे प्राप्त हुए अखण्ड एवं श्रेष्ठ भक्तियोगसे उनका अन्तःकरण सर्वथा शुद्ध हो गया और उसमें श्रीभगवान्का आविर्भाव हुआ । तब देहादि उपाधिकी निवृत्ति हो जानेसे उनकी आत्माकी सम्पूर्ण जीवोंके आत्मभूत प्रत्यगात्मामें एकीभावसे स्थिति हो गयी ॥२७ ॥
महाराज प्रियव्रतकी दूसरी भार्यासे उत्तम, तामस और रैवत- ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपने नामवाले मन्वन्तरोंके अधिपति हुए ॥२८ ॥
एवमुपशमायनेषु स्वतनयेष्वथ जगतीपतिर्जगतीमर्बुदान्येकादश परिवत्सराणामव्याहता - खिलपुरुषकारसारसम्भृतदोर्दण्डयुगलापीडित-मौर्वीगुणस्तनितविरमितधर्मप्रतिपक्षो बर्हिष्मत्या-श्चानुदिनमेधमानप्रमोद ' प्रसरणयौषिण्यव्रीडा - प्रमुषितहासावलोकरुचिरक्ष्वेल्यादिभिः पराभूय - मानविवेक ' इवानवबुध्यमान इव महामना बुभुजे ॥२९ ॥
यावदवभासयति ४ सुरगिरिमनुपरिक्रामन् भगवानादित्यो वसुधातलमर्धेनैव तपत्यर्धेनाव - च्छादयति तदा हि भगवदुपासनोपचिताति - पुरुषप्रभावस्तदनभिनन्दन् समजवेन थे ज्योतिर्मयेन रजनीमपि दिनं करिष्यामीति सप्तकृत्वस्तरणिमनुपर्यक्रामद् द्वितीय इव पतङ्गः || ३० || ये वा उह तद्रथचरणनेमिकृत - परिखातास्ते सप्त ' सिन्धव आसन् यत एव कृताः सप्त भुवो द्वीपाः ॥३१ ॥
जम्बूप्लक्षशाल्मलिकुशक्रौञ्चशाकपुष्कर - संज्ञास्तेषां पूर्वस्मात्पूर्वस्मादुत्तर उपक्लृप्ताः ॥३२ ॥
परिमाणं उत्तरो यथासंख्यं द्विगुणमानेन ६ बहिः समन्तत इस प्रकार कवि आदि तीन पुत्रोंके निवृत्तिपरायण हो जानेपर राजा प्रियव्रतने ग्यारह अर्बुद वर्षोंतक पृथ्वीका शासन किया । जिस समय वे अपनी अखण्ड पुरुषार्थमयी और वीर्यशालिनी भुजाओंसे धनुषकी डोरी खींचकर टंकार करते थे, उस समय डरके मारे सभी धर्मद्रोही न जाने कहाँ छिप जाते थे । प्राणप्रिया बर्हिष्मतीके दिन - दिन बढ़नेवाले आमोद-प्रमोद और अभ्युत्थानादि क्रीडाओंके कारण तथा उसके स्त्री- जनोचित हाव - भाव, लज्जासे संकुचित मन्दहास्य - युक्त चितवन और मनको भानेवाले विनोद आदिसे महामना प्रियव्रत विवेकहीन व्यक्तिकी भाँति आत्म - विस्मृत से होकर सब भोगोंको भोगने लगे । किन्तु वास्तवमें ये उनमें आसक्त नहीं थे ॥२९ ॥
एक बार इन्होंने जब यह देखा कि भगवान् सूर्य सुमेरुकी परिक्रमा करते हुए लोकालोकपर्यन्त पृथ्वीके जितने भागको आलोकित करते हैं, उसमेंसे आधा ही प्रकाशमें रहता है और आधेमें अन्धकार छाया रहता है, तो उन्होंने इसे पसंद नहीं किया । तब उन्होंने यह संकल्प लेकर कि ‘ मैं रातको भी दिन बना दूँगा; ' सूर्यके समान ही वेगवान् एक ज्योतिर्मय रथपर चढ़कर द्वितीय सूर्यकी ही भाँति उनके पीछे - पीछे पृथ्वीकी सात परिक्रमाएँ कर डालीं ।
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भगवान्की उपासनासे इनका अलौकिक प्रभाव बहुत बढ़ गया था ॥३० ॥
उस समय इनके रथके पहियोंसे जो लीकें बनीं, वे ही सात समुद्र हुए; उनसे पृथ्वीमें सात द्वीप हो गये ॥३१ ॥
उनके नाम क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर द्वीप हैं । इनमेंसे पहले - पहलेकी अपेक्षा आगे - आगेके द्वीपका परिमाण दूना है और ये समुद्रके बाहरी भागमें पृथ्वीके चारों ओर फैले हुए हैं ॥३२ ॥
क्षारोदेक्षुरसोदसुरोदघृतोदक्षीरोददधिमण्डोद - शुद्धोदाः सप्त जलधयः सप्त द्वीपपरिखा ' इवाभ्यन्तरद्वीपसमाना एकैकश्येन यथानुपूर्वं सप्तस्वपि बहिद्वपेषु उपकल्पितास्तेषु जम्ब्वादिषु बर्हिष्मती-पृथक्परित ४ पतिरनुव्रतानात्मजानाग्नीध्रेध्मजिह्वयज्ञबाहु'-हिरण्यरेतोघृतपृष्ठमेधातिथिवीतिहोत्रसंज्ञान् यथासंख्येन ' एकैकस्मिन् एकमेवाधिपतिं विदधे ॥३३ ॥ दुहितरं चोर्जस्वतीं नामोशनसे प्रायच्छद्यस्यामासीद् देवयानी नाम
काव्यसुता ॥३४ ॥
नैवंविधः पुरुषकार उरुक्रमस्य
पुंसां तदङ्घ्रिरजसा जितषड्गुणानाम् ।
चित्रं विदूरविगतः सकृदाददीत यन्नामधेयमधुना स ‘ जहाति बन्धम् ॥३५
स एवमपरिमितबलपराक्रम एकदा तु देवर्षि-चरणानुशयनानुपतितगुणविसर्गसंसर्गेणानिर्वृत - मिवात्मानं मन्यमान आत्मनिर्वेद इदमाह ॥३६ ॥ अहो असाध्वनुष्ठितं यदभिनिवेशितोऽहमिन्द्रियै-रविद्यारचितविषमविषयान्धकूपे तद् अलम् अलम् अमुष्या वनिताया विनोदमृगं मां
धिग्धिगिति गर्हयाञ्चकार ॥३७ ॥
सात समुद्र क्रमशः खारे जल, ईखके रस, मदिरा, घी, दूध, मट्ठे और मीठे जलसे भरे हुए हैं । ये सातों द्वीपोंकी खाइयोंके समान हैं और परिमाणमें अपने भीतरवाले द्वीपके बराबर हैं । इनमेंसे एक - एक क्रमशः अलग - अलग सातों द्वीपोंको बाहरसे घेरकर स्थित हैं । * बर्हिष्मतीपति महाराज प्रियव्रतने अपने अनुगत पुत्र आग्नीध्र, इध्यजिह्व, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, मेधातिथि और वीतिहोत्रमेंसे क्रमशः एक - एकको उक्त जम्बू आदि द्वीपोंमेंसे एक-एकका राजा बनाया ॥३३ । उन्होंने अपनी कन्या ऊर्जस्वतीका विवाह शुक्राचार्यजीसे किया; उसीसे शुक्रकन्या देवयानीका जन्म हुआ ॥३४ ॥ राजन्! जिन्होंने भगवच्चरणारविन्दोंकी
रजके प्रभावसे शरीरके भूख - प्यास, शोक - मोह और जरा - मृत्यु – इन छः गुणोंको अथवा मनके सहित छः इन्द्रियोंको जीत लिया है, उन भगवद्भक्तोंका ऐसा पुरुषार्थ होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि वर्णबहिष्कृत चाण्डाल आदि नीच योनिका पुरुष भी भगवान्के नामका केवल एक बार उच्चारण करनेसे तत्काल संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता
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है ॥३५ ॥
इस प्रकार अतुलनीय बल पराक्रमसे युक्त महाराज प्रियव्रत एक बार, अपनेको देवर्षि नारदके चरणोंकी शरणमें जाकर भी पुनः दैववश प्राप्त हुए प्रपंचमें फँस जानेसे अशान्त - सा देख, मन - ही - मन विरक्त होकर इस प्रकार कहने लगे || ३६ || ' ओह! बड़ा बुरा हुआ! मेरी विषयलोलुप इन्द्रियोंने मुझे इस अविद्याजनित विषम विषयरूप अन्धकूपमें गिरा दिया । बस! बस! बहुत हो लिया । हाय! मैं तो स्त्रीका क्रीडामृग ही बन गया! उसने मुझे बंदरकी भाँति नचाया! मुझे धिक्कार है! धिक्कार है! ' इस प्रकार उन्होंने अपनेको बहुत कुछ बुरा - भला कहा ॥३७ ॥
परदेवताप्रसादाधिगतात्मप्रत्यवमर्शेनानुप्र - वृत्तेभ्यः पुत्रेभ्य इमां यथादायं विभज्य भुक्तभोगां च महिषीं मृतकमिव सह महाविभूतिमपहाय स्वयं निहितनिर्वेदो हृदि गृहीतहरिविहारानुभावो भगवतो नारदस्य पदवीं पुनरेवानुससार ॥३८ ॥
तस्य ह वा एते श्लोकाः—
प्रियव्रतकृतं कर्म को नु कुर्याद्विनेश्वरम् ।
यो नेमिनिम्नैरकरोच्छायां घ्नन् सप्त वारिधीन् ॥३९
भूसंस्थानं कृतं येन सरिद्गिरिवनादिभिः ।
सीमा च भूतनिर्वृत्यै द्वीपे द्वीपे विभागशः ॥४०
भौमं दिव्यं मानुषं च महित्वं कर्मयोगजम् ।
यश्चक्रे निरयौपम्यं पुरुषानुजनप्रियः ॥ ४१
परमाराध्य श्रीहरिकी कृपासे उनकी विवेकवृत्ति जाग्रत् हो गयी । उन्होंने यह सारी पृथ्वी यथायोग्य अपने अनुगत पुत्रोंको बाँट दी और जिसके साथ उन्होंने तरह - तरहके भोग भोगे थे, उस अपनी राजरानीको साम्राज्यलक्ष्मीके सहित मृतदेहके समान छोड़ दिया तथा हृदयमें वैराग्य धारणकर भगवान्की लीलाओंका चिन्तन करते हुए उसके प्रभावसे श्रीनारदजीके बतलायेहुए मार्गका पुनः अनुसरण करने लगे ॥३८ ॥
महाराज प्रियव्रतके विषयमें निम्नलिखित लोकोक्ति प्रसिद्ध है-— ‘ राजा प्रियव्रतने जो कर्म किये, उन्हें सर्वशक्तिमान् ईश्वरके सिवा और कौन कर सकता है? उन्होंने रात्रिके अन्धकारको मिटानेका प्रयत्न करते हुए अपने रथके पहियोंसे बनी हुई लीकोंसे ही सात समुद्र बना दिये || ३ ९ || प्राणियोंके सुभीतेके लिये ( जिससे उनमें परस्पर झगड़ा न हो ) द्वीपोंके द्वारा पृथ्वीके विभाग किये और प्रत्येक द्वीपमें अलग - अलग नदी, पर्वत और वन आदिसे उसकी सीमा निश्चित कर दी ॥४० ॥ वे भगवद्भक्त नारदादिके प्रेमी भक्त थे ।
उन्होंने पाताल - लोकके, देवलोकके, मर्त्यलोकके तथा कर्म और योगकी शक्तिसे प्राप्त हुए ऐश्वर्यको भी नरकतुल्य समझा था ' ॥४१ ॥
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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे प्रियव्रतविजये प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥
१. प्रा ० पा ० — निवासोऽयम् । १. प्रा ० पा ० — परमात्मतत्त्वो । २. प्रा ० पा ० - प्रवरगुणैकान्त । ३. प्रा ० पा ० — न वाभ्यनन्दद्यदपि तदप्रत्याम्नातं । ४. प्रा ० पा ० — सर्गस्य बृंहणा । ५. प्रा ० पा०-रखिलनिजगणपरिवेष्टितः । ६. प्रा ० पा ० — तत्र गगनतले । ७. प्रा ० पा०-ममरपरिवृन्दैरभिपू ० । १. प्रा ० पा ० – प्रमोदमोद प्रसरण ० । २. प्रा ० पा ० – यौषण्यव्रीडाप्रमोदित ० । ३. प्रा ० पा०- विवेको नावबुध्यमा ० । ४. प्रा ० पा ० – यदेवाभासयति । ५. प्रा ० पा ० — सप्त सप्त सिन्ध ० । ६. प्रा ० पा ० – द्विगुणेन बहिः समन्ततः । १. प्रा ० पा ० – द्वीपशिखाभ्यन्तरे द्वीप ० । २. प्रा ० पा ० - एकैकस्येव । ३. प्रा ० पा०— पृथक् परिधय उपकल्पिता ० । ४. प्रा ० पा ० – तेषु बर्हिष्मतीपति ० । ५. प्रा ० पा ० — वाह ० । ६. प्रा ० पा ० — यथासंख्यकमेकैकस्मिन्नेकमेवाधि ० । ७. प्रा ० पा ० – सुकृदाददीत । ८. प्रा ० पा ० - सहजातितत्त्वम् । * इनका क्रम इस प्रकार समझना चाहिये – पहले जम्बूद्वीप है, उसके चारों ओर क्षार समुद्र है । वह प्लक्षद्वीपसे घिरा हुआ है, उसके चारों ओर ईंखके रसका समुद्र है । उसे शाल्मलिद्वीप घेरे हुए है, उसके चारों ओर मदिराका समुद्र है । फिर कुशद्वीप है, वह घीके समुद्रसे घिरा हुआ है । उसके बाहर क्रौंचद्वीप है, उसके चारों ओर दूधका समुद्र है । फिर शाकद्वीप है, उसे मट्ठेका समुद्र घेरे हुए है । उसके चारों ओर पुष्करद्वीप है, वह मीठे जलके समुद्रसे घिरा हुआ है ।
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अथ द्वितीयोऽध्यायः आग्नीध्र चरित्र श्रीशुक उवाच एवं पितरि सम्प्रवृत्ते तदनुशासने वर्तमान आग्नीध्रो जम्बूद्वीपौकसः प्रजा औरस-वद्धर्मावेक्षमाणः पर्यगोपायत् ॥१ ॥
स च कदाचित्पितृलोककामः सुरवरवनिताक्रीडाचलद्रोण्यां भगवन्तं विश्वसृजां पतिमाभृतपरिचर्योपकरण आत्मैकाग्रयेण तपस्व्याराधयाम्बभूव ॥ २ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं – पिता प्रियव्रतके इस प्रकार तपस्यामें संलग्न हो जानेपर राजा आग्नीध्र उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हुए जम्बूद्वीपकी प्रजाका धर्मानुसार पुत्रवत् पालन करने लगे ॥१ ॥ एक बार वे पितृलोककी कामनासे सत्पुत्रप्राप्तिके लिये पूजाकी सब सामग्री
जुटाकर सुरसुन्दरियोंके क्रीडास्थल मन्दराचलकी एक घाटीमें गये और तपस्यामें तत्पर होकर एकाग्रचित्तसे प्रजापतियोंके पति श्रीब्रह्माजीकी आराधना करने लगे ॥२ ॥
तदुपलभ्य भगवानादिपुरुषः सदसि गायन्तीं पूर्वचित्तिं नामाप्सरसमभियापयामास || ३ || सा च तदाश्रमोपवनमतिरमणीयं विविधनिबिड-विटपिविटपनिकरसंश्लिष्टपुरटलतारूढस्थल - विहङ्गममिथुनैः प्रोच्यमानश्रुतिभिः प्रतिबोध्यमान - सलिलकुक्कुटकारण्डवकलहंसादिभिर्विचित्रमुप-कूजितामलजलाशयकमलाकरमुपबभ्राम ॥४ ॥
तस्याः सुललितगमनपदविन्यासगतिविला - सायाश्चानुपदं खणखणायमानरुचिरचरणा - भरणस्वनमुपाकर्ण्य नरदेवकुमारः सुमनस समाधियोगेनामीलितनयननलिनमुकुलयुगल मीषद्विकचय्य व्यचष्ट || ५ || तामेवाविदूरे मधुकरीमिव उपजिघ्रन्तीं दिविज-मनुजमनोनयनाह्लाददुघैर्गतिविहारव्रीडाविनया - वलोकसुस्वराक्षरावयवैर्मनसि नृणां कुसुमायुधस्य विदधतीं विवरं निजमुख - विगलितामृतासवसहासभाषणामोदमदान्ध-मधुकरनिकरोपरोधेन द्रुतपदविन्यासेन वल्गुस्पन्दनस्तनकलशकबरभाररशनां देवीं तदवलोकनेन विवृतावसरस्य भगवतो मकरध्वजस्य वशमुपनीतो जडवदिति होवाच ॥६ ॥
आदिदेव भगवान् ब्रह्माजीने उनकी अभिलाषा जान ली । अतः अपनी सभाकी गायिका पूर्वचित्ति नामकी अप्सराको उनके पास भेज दिया || ३ || आग्नीध्रजीके आश्रमके पास एक अति रमणीय उपवन था । वह अप्सरा उसीमें विचरने लगी । उस उपवनमें तरह - तरहके सघन तरुवरोंकी शाखाओंपर स्वर्णलताएँ फैली हुई थीं । उनपर बैठे हुए मयूरादि कई प्रकारके स्थलचारी पक्षियोंके जोड़े सुमधुर बोली बोल रहे थे । उनकी षड्जादि स्वरयुक्त ध्वनि सुनकर
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सचेत हुए जलकुक्कुट, कारण्डव एवं कलहंस आदि जलपक्षी भाँति - भाँति से कूजने लगते थे । इससे वहाँके कमलवनसे सुशोभित निर्मल सरोवर गूँजने लगते थे ॥४ ॥
पूर्वचित्तिकी विलासपूर्ण सुललित गतिविधि और पाद विन्यासकी शैलीसे पद - पदपर उसके चरणनूपुरोंकी झनकार हो उठती थी । उसकी मनोहर ध्वनि सुनकर राजकुमार आग्नीध्रने समाधियोगद्वारा मूँदे हुए अपने कमल - कलीके समान सुन्दर नेत्रोंको कुछ - कुछ खोलकर देखा तो पास ही उन्हें वह अप्सरा दिखायी दी । वह भ्रमरीके समान एक - एक फूलके पास जाकर उसे सूँघती थी तथा देवता और मनुष्योंके मन और नयनोंको आह्लादित करनेवाली अपनी विलासपूर्ण गति, क्रीडा - चापल्य, लज्जा एवं विनययुक्त चितवन, सुमधुर वाणी तथा मनोहर अंगावयवोंसे पुरुषोंके हृदयमें कामदेवके प्रवेशके लिये द्वार - सा बना देती थी । जब वह हँस - हँसकर बोलने लगती, तब ऐसा प्रतीत होता मानो उसके मुखसे अमृतमय मादक मधु झर रहा है । उसके निःश्वासके गन्धसे मदान्ध होकर भौंरे उसके मुखकमलको घेर लेते, तब वह उनसे बचनेके लिये जल्दी - जल्दी पैर उठाकर चलती तो उसके कुचकलश, वेणी और करधनी हिलनेसे बड़े ही सुहावने लगते । यह सब देखनेसे भगवान् कामदेवको आग्नीध्रके हृदयमें प्रवेश करनेका अवसर मिल गया और वे उनके अधीन होकर उसे प्रसन्न करनेके लिये पागलकी भाँति इस प्रकार कहने लगे- ॥ ५-६ ॥ का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले मायासि कापि भगवत्परदेवतायाः । विज्ये बिभर्षि धनुषी सुहृदात्मनोऽर्थे किं वा मृगान्मृगयसे विपिने प्रमत्तान् ॥७ बाणाविमौ भगवतः शतपत्रपत्रौ शान्तावपुङ्खरुचिरावतितिग्मदन्तौ । कस्मै युयुङ्क्षसि वने विचरन्न विद्मः क्षेमाय नो जडधियां तव विक्रमोऽस्तु ॥८ शिष्या इमे भगवतः परितः पठन्ति गायन्ति साम सरहस्यमजस्रमीशम् । युष्मच्छिखाविलुलिताः सुमनोऽभिवृष्टीः सर्वे भजन्त्यृषिगणा इव वेदशाखाः ॥९ वाचं परं चरणपञ्जरतित्तिरीणां ब्रह्मन्नरूपमुखरां शृणवाम तुभ्यम् । लब्धा कदम्बरुचिरङ्कविटङ्कबिम्बे यस्यामलातपरिधिः क्व च वल्कलं ते ॥१० किं सम्भृतं रुचिरयोर्द्विज शृङ्गयोस्ते मध्ये कृशो वहसि यत्र दृशिः श्रिता मे । पङ्कोऽरुणः सुरभिरात्मविषाण ईदृग्
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येनाश्रमं सुभग मे सुरभीकरोषि ॥ ११ ' मुनिवर्य! तुम कौन हो, इस पर्वतपर तुम क्या करना चाहते हो? तुम परमपुरुष श्रीनारायणकी कोई माया तो नहीं हो? [ भौंहोंकी ओर संकेत करके- ] सखे! तुमने ये बिना डोरीके दो धनुष क्यों धारण कर रखे हैं? क्या इनसे तुम्हारा कोई अपना प्रयोजन है अथवा इस संसारारण्यमें मुझ - जैसे मतवाले मृगोंका शिकार करना चाहते हो! ॥७ ॥ [ कटाक्षोंको
लक्ष्य करके— ] तुम्हारे ये दो बाण तो बड़े सुन्दर और पैने हैं । अहो! इनके कमलदलके पंख हैं, देखनेमें बड़े शान्त हैं और हैं भी पंखहीन । यहाँ वनमें विचरते हुए तुम इन्हें किसपर छोड़ना चाहते हो? यहाँ तुम्हारा कोई सामना करनेवाला नहीं दिखायी देता । तुम्हारा यह पराक्रम हम-जैसे जड - बुद्धियोंके लिये कल्याणकारी हो ॥८ ॥ [ भौंरोंकी ओर देखकर— ] भगवन्! तुम्हारे
चारों ओर जो ये शिष्यगण अध्ययन कर रहे हैं, वे तो निरन्तर रहस्ययुक्त सामगान करते हुए मानो भगवान्की स्तुति कर रहे हैं और ऋषिगण जैसे वेदकी शाखाओंका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार ये सब तुम्हारी चोटीसे झड़े हुए पुष्पोंका सेवन कर रहे हैं ॥९ ॥ [ नूपुरोंके शब्दकी
ओर संकेत करके— ] ब्रह्मन्! तुम्हारे चरणरूप पिंजड़ोंमें जो तीतर बन्द हैं, उनका शब्द तो सुनायी देता है; परन्तु रूप देखनेमें नहीं आता । [ करधनीसहित पीली साड़ीमें अंगकी कान्तिकी उत्प्रेक्षा कर— ] तुम्हारे नितम्बोंपर यह कदम्ब - कुसुमोंकी - सी आभा कहाँसे आ गयी? इनके ऊपर तो अंगारोंका मण्डल - सा भी दिखायी देता है । किन्तु तुम्हारा वल्कल - वस्त्र कहाँ है? ॥१० ॥ [ कुंकुममण्डित कुचोंकी ओर लक्ष्य करके - ] द्विजवर! तुम्हारे इन दोनों
सुन्दर सींगोंमें क्या भरा हुआ है? अवश्य ही इनमें बड़े अमूल्य रत्न भरे हैं, इसीसे तो तुम्हारा मध्यभाग इतना कृश होनेपर भी तुम इनका बोझ ढो रहे हो । यहाँ जाकर तो मेरी दृष्टि भी मानो अटक गयी है । और सुभग! इन सींगोंपर तुमने यह लाल - लाल लेप - सा क्या लगा रखा है? इसकी गन्धसे तो मेरा सारा आश्रम महक उठा है ॥११ ॥
लोकं प्रदर्शय सुहृत्तम तावकं मे यत्रत्य इत्थमुरसावयवावपूर्वी । अस्मद्विधस्य मनउन्नयनौ ” बिभर्ति बह्वद्भुतं सरसराससुधादि वक्त्रे ॥१२ का वाऽऽत्मवृत्तिरदनाद्धविरङ्ग वाति
विष्णोः कलास्यनिमिषोन्मकरौ च कर्णौ ।
उद्विग्नमीनयुगलं द्विजपङ्क्तिशोचि-रासन्नभृङ्गनिकरं सर इन्मुखं ते ॥१३
योऽसौ त्वया करसरोजहतः पतङ्गो दिक्षु भ्रमन् भ्रमत एजयतेऽक्षिणी मे ३ । मुक्तं न ते स्मरसि वक्रजटावरूथं
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कष्टोऽनिलो हरति लम्पट एष नीवीम् ॥१४ रूपं तपोधन तपश्चरतां तपोघ्नं ह्येतत् केन तपसा भवतोपलब्धम् । चर्तुं तपोऽर्हसि मया सह मित्र मह्यं किं वा प्रसीदति स वै भवभावनो मे ॥ १५ न त्वां त्यजामि दयितं द्विजदेवदत्तं यस्मिन्मनो दृगपि नो न वियाति लग्नम् । मां चारुशृङ्ग्यर्हसि नेतुमनुव्रतं ते चित्तं यतः प्रतिसरन्तु शिवाः सचिव्यः ॥१६ मित्रवर! मुझे तो तुम अपना देश दिखा दो, जहाँके निवासी अपने वक्षःस्थलपर ऐसे अद्भुत अवयव धारण करते हैं, जिन्होंने हमारे - जैसे प्राणियोंके चित्तोंको क्षुब्ध कर दिया है तथा मुखमें विचित्र हाव - भाव, सरसभाषण और अधरामृत - जैसी अनूठी वस्तुएँ रखते हैं ॥१२ ॥
' प्रियवर! तुम्हारा भोजन क्या है, जिसके खानेसे तुम्हारे मुखसे हवनसामग्रीकी - सी सुगन्ध फैल रही है? मालूम होता है, तुम कोई विष्णुभगवान्की कला ही हो; इसीलिये तुम्हारे कानोंमें कभी पलक न मारनेवाले मकरके आकारके दो कुण्डल हैं । तुम्हारा मुख एक सुन्दर सरोवरके समान है । उसमें तुम्हारे चंचल नेत्र भयसे काँपती हुई दो मछलियोंके समान, दन्तपंक्ति हंसोंके समान और घुँघराली अलकावली भौंरोंके समान शोभायमान है ॥१३ ॥
तुम जब अपने करकमलोंसे थपकी मारकर इस गेंदको उछालते हो, तब यह दिशा-विदिशाओंमें जाती हुई मेरे नेत्रोंको तो चंचल कर ही देती है, साथ - साथ मेरे मनमें भी खलबली पैदा कर देती है । तुम्हारा बाँका जटाजूट खुल गया है, तुम इसे सँभालते नहीं? अरे, यह धूर्त वायु कैसा दुष्ट है जो बार - बार तुम्हारे नीवी - वस्त्रको उड़ा देता है ॥१४ ॥
तपोधन! तपस्वियोंके तपको भ्रष्ट करनेवाला यह अनूप रूप तुमने किस तपके प्रभावसे पाया है? मित्र! आओ, कुछ दिन मेरे साथ रहकर तपस्या करो । अथवा, कहीं विश्वविस्तारकी इच्छासे ब्रह्माजीने ही तो मुझपर कृपा नहीं की है ॥१५ ॥
सचमुच, तुम ब्रह्माजीकी ही प्यारी देन हो; अब मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता । तुममें तो मेरे मन और नयन ऐसे उलझ गये हैं कि अन्यत्र जाना ही नहीं चाहते । सुन्दर सींगोंवाली! तुम्हारा जहाँ मन हो, मुझे भी वहीं ले चलो; मैं तो तुम्हारा अनुचर हूँ और तुम्हारी ये मंगलमयी सखियाँ भी हमारे ही साथ रहें ' ॥१६ ॥
श्रीशुक उवाच