श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 951–960
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960
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इति ललनानुनयातिविशारदो ग्राम्यवैवग्ध्यया परिभाषया तां विबुधवधूं विबुधमतिरधि - सभाजयामास ॥१७ ॥ सा च ततस्तस्य
वीरयूथपतेर्बुद्धिशीलरूपवयः श्रियौदार्येण पराक्षिप्तमनास्तेन सहायुतायुतपरिवत्सरोप-लक्षणं कालं जम्बूद्वीपपतिना भौमस्वर्गभोगान् बुभुजे || १८ || तस्यामु ह वा आत्मजान् स राजवर आग्नीध्रो नाभिकिम्पुरुषहरिवर्षेलावृत-रम्यकहिरण्मयकुरुभद्राश्वकेतुमालसंज्ञान्नव पुत्रानजनयत् ॥१९ ॥
सा सूत्वाथ सुतान्नवानुवत्सरं गृह एवापहाय पूर्वचित्तिर्भूय एवाजं देवमुपतस्थे || २० || आग्नीध्रसुतास्ते मातुरनुग्रहादौत्पत्तिकेनैव संहननबलोपेताः पित्रा विभक्ता आत्मतुल्यनामानि यथाभागं जम्बूद्वीपवर्षाणि बुभुजुः || २१ || आग्नीध्रो राजातृप्तः कामानामप्सरसमेवानु - दिनमधिमन्यमानस्तस्याः सलोकतां श्रुतिभि-वारुन्ध यत्र पितरो मादयन्ते || २२ || सम्परेते पितरि नव भ्रातरो मेरुदुहितृर्मेरुदेवीं प्रतिरूपामुग्रदंष्ट्रीं लतां रम्यां श्यामां नारीं भद्रां देववीतिमितिसंज्ञा नवोदवहन् ॥२३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! आग्नीध्र देवताओंके समान बुद्धिमान् और स्त्रियोंको प्रसन्न करनेमें बड़े कुशल थे । उन्होंने इसी प्रकारकी रतिचातुर्यमयी मीठी - मीठी बातोंसे उस अप्सराको प्रसन्न कर लिया ॥१७ ॥ वीर समाजमें अग्रगण्य आग्नीध्रकी बुद्धि, शील, रूप,
अवस्था, लक्ष्मी और उदारतासे आकर्षित होकर वह उन जम्बूद्वीपाधिपतिके साथ कई हजार वर्षोंतक पृथ्वी और स्वर्गके भोग भोगती रही ॥ १८ ॥ तदनन्तर नृपवर आग्नीध्रने उसके
गर्भसे नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल नामके नौ पुत्र उत्पन्न किये ॥१९ ॥
इस प्रकार नौ वर्षमें प्रतिवर्ष एकके क्रमसे नौ पुत्र उत्पन्न कर पूर्वचित्ति उन्हें राजभवनमें ही छोड़कर फिर ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हो गयी ॥ २० ॥ ये आग्नीध्रके पुत्र माताके
अनुग्रहसे स्वभावसे ही सुडौल और सबल शरीरवाले थे । आग्नीध्रने जम्बूद्वीपके विभाग करके उन्हींके समान नामवाले नौ वर्ष ( भूखण्ड ) बनाये और उन्हें एक - एक पुत्रको सौंप दिया । तब वे सब अपने - अपने वर्षका राज्य भोगने लगे || २१ || महाराज आग्नीध्र दिन - दिन भोगोंको भोगते रहनेपर भी उनसे अतृप्त ही रहे । वे उस अप्सराको ही परम पुरुषार्थ समझते थे । इसलिये उन्होंने वैदिक कर्मोंके द्वारा उसी लोकको प्राप्त किया, जहाँ पितृगण अपने सुकृतोंके अनुसार तरह - तरहके भोगोंमें मस्त रहते हैं ॥२२ ॥ पिताके परलोक सिधारनेपर नाभि आदि
नौ भाइयोंने मेरुकी मेरुदेवी, प्रतिरूपा, उग्रदंष्ट्री, लता, रम्या, श्यामा, नारी, भद्रा और देववीति नामकी नौ कन्याओंसे विवाह किया ॥ २३ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे आग्नीध्रवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२ ॥
१. प्रा ० पा ० — उन्नयनैर्बिभर्ति । २. प्रा ० पा ० – स्मरसराससुधादि । ३. प्रा ० पा ० — ते । ४. प्रा ० पा ० — भवतेह लब्धम् । ५. प्रा ० पा ० – भावनोऽसौ । ६. प्रा ० पा ० – दयितां । -
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अथ तृतीयोऽध्यायः राजा नाभिका चरित्र श्रीशुक उवाच नाभिरपत्यकामोऽप्रजया मेरुदेव्या भगवन्तं यज्ञपुरुषमवहितात्मायजत ॥१ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- राजन्! आग्नीध्रके पुत्र नाभिके कोई सन्तान न थी, इसलिये उन्होंने अपनी भार्या मेरुदेवीके सहित पुत्रकी कामनासे एकाग्रतापूर्वक भगवान् यज्ञपुरुषका यजन किया ॥१ ॥
तस्य ह वाव श्रद्धया विशुद्धभावेन यजतः प्रवर्त्येषु प्रचरत्सु द्रव्यदेशकालमन्त्रर्त्विग्दक्षिणा- विधानयोगोपपत्त्या दुरधिगमोऽपि भगवान् भागवतवात्सल्यतया सुप्रतीक आत्मानमपराजितं निजजनाभिप्रेतार्थविधित्सया गृहीतहृदयो हृदयङ्गमं मनोनयनानन्दनावयवाभिराम - माविश्चकार || २ || अथ ह तमाविष्कृतभुज - युगलद्वयं हिरण्मयं पुरुषविशेषं कपिशकौशे - याम्बरधरमुरसि विलसच्छ्रीवत्सललामं दरवर वनरुहवनमालाच्छूर्यमृतमणिगदादिभिरुपलक्षितं स्फुटकिरणप्रवरमुकुटकुण्डलकटककटिसूत्र-हारकेयूरनूपुराद्यङ्गभूषणविभूषितमृत्विक्सदस्य- गृहपतयोऽधना इवोत्तमधनमुपलभ्य सबहुमानमर्हणेनावनतशीर्षाण उपतस्थुः ॥३ ॥
ऋत्विज ऊचुः अर्हसि मुहुरर्हत्तमार्हणमस्माकमनुपथानां नमो नम इत्येतावत्सदुपशिक्षितं पुमान् प्रकृतिगुणव्यतिकरमतिरनीश ईश्वरस्य परस्य प्रकृतिपुरुषयोरर्वाक्तनाभिर्नामरूपाकृतिभी रूपनिरूपणम् ॥४ ॥
सकलजननिकायवृजिन - निरसनशिवतमप्रवरगुणगणैकदेशकथनादृते ॥ ५ ॥
यद्यपि सुन्दर अंगोंवाले श्रीभगवान् द्रव्य, देश, काल, मन्त्र, ऋत्विज्, दक्षिणा और विधि —इन यज्ञके साधनोंसे सहजमें नहीं मिलते, तथापि वे भक्तोंपर तो कृपा करते ही हैं । इसलिये जब महाराज नाभिने श्रद्धापूर्वक विशुद्धभावसे उनकी आराधना की, तब उनका चित्त अपने भक्तका अभीष्ट कार्य करनेके लिये उत्सुक हो गया । यद्यपि उनका स्वरूप सर्वथा स्वतन्त्र है, तथापि उन्होंने प्रवर्ग्यकर्मका अनुष्ठान होते समय उसे मन और नयनोंको आनन्द देनेवाले अवयवोंसे युक्त अति सुन्दर हृदयाकर्षक मूर्तिमें प्रकट किया ॥२ ॥ उनके श्रीअंगमें रेशमी
पीताम्बर था, वक्षःस्थलपर सुमनोहर श्रीवत्सचिह्न सुशोभित था; भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा गलेमें वनमाला और कौस्तुभमणिकी शोभा थी । सम्पूर्ण शरीर अंग - प्रत्यंगकी कान्तिको बढ़ानेवाले किरणजालमण्डित मणिमय मुकुट, कुण्डल, कंकण, करधनी, हार,
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बाजूबंद और नुपुर आदि आभूषणोंसे विभूषित था । ऐसे परम तेजस्वी चतुर्भुजमूर्ति पुरुषविशेषको प्रकट हुआ देख ऋत्विज्, सदस्य और यजमान आदि सभी लोग ऐसे आह्लादित हुए जैसे निर्धन पुरुष अपार धनराशि पाकर फूला नहीं समाता । फिर सभीने सिर झुकाकर अत्यन्त आदरपूर्वक प्रभुकी अर्घ्यद्वारा पूजा की और ऋत्विजोंने उनकी स्तुति की ॥३ ॥
ऋत्विजोंने कहा— पूज्यतम! हम आपके अनुगत भक्त हैं, आप हमारे पुनः - पुनः पूजनीय हैं । किन्तु हम आपकी पूजा करना क्या जानें? हम तो बार - बार आपको नमस्कार करते हैं — इतना ही हमें महापुरुषोंने सिखाया है । आप प्रकृति और पुरुषसे भी परे हैं । फिर प्राकृत गुणों के कार्यभूत इस प्रपंचमें बुद्धि फँस जानेसे आपके गुणगानमें सर्वथा असमर्थ ऐसा कौन पुरुष है जो प्राकृत नाम, रूप एवं आकृतिके द्वारा आपके स्वरूपका निरूपण कर सके? आप साक्षात् परमेश्वर हैं || ४ || आपके परम मंगलमय गुण सम्पूर्ण जगताके दुःखोंका दमन करनेवाले हैं । यदि कोई उन्हें वर्णन करनेका साहस भी करेगा, तो केवल उनके एक देशका ही वर्णन कर सकेगा ॥५ ॥
परिजनानुरागविरचितशबलसंशब्दसलिल - सितकिसलयतुलसिकादूर्वाङ्कुरैरपि सम्भृतया सपर्यया किल परम परितुष्यसि ॥ ६ ॥
अथानयापि न भवत इज्ययोरुभारभरया समुचितमर्थमिहोपलभामहे ॥ ७ ॥
आत्मन एवानुसवनमञ्जसाव्यतिरेकेण बोभूयमानाशेषपुरुषार्थस्वरुपस्य किन्तु नाथाशिष आशासानानामेतदभिसंराधनमात्रं भवितुमर्हति ॥ ८ ॥
तद्यथा बालिशानां स्वयमात्मनः श्रेयः परमविदुषां परमपरमपुरुष प्रकर्षकरुणया स्वमहिमानं चापवर्गाख्यमुपकल्पयिष्यन् स्वयं नापचित एवेतरवदिहोपलक्षितः ॥ ९ ॥
अथायमेव वरो हार्हत्तम यर्हि बर्हिषि राजर्षेर्वरदर्षभो भवान्निजपुरुषेक्षणविषय आसीत् ॥१० ॥
असङ्गनिशितज्ञानानलविधूताशेषमलानां भवत्स्वभावानामात्मारामाणां मुनीनामनवरत - परिगुणितगुणगण परममङ्गलायनगुणगण - कथनोऽसि ॥११ ॥
किन्तु प्रभो! यदि आपके भक्त प्रेम गद्गद वाणीसे स्तुति करते हुए सामान्य जल, विशुद्ध पल्लव, तुलसी और दूबके अंकुर आदि सामग्रीसे ही आपकी पूजा करते हैं, तो भी आप सब प्रकार सन्तुष्ट हो जाते हैं ॥६ ॥
हमें तो अनुरागके सिवा इस द्रव्य - कालादि अनेकों अंगोंवाले यज्ञसे भी आपका कोई प्रयोजन नहीं दिखलायी देता; ॥७ ॥ क्योंकि आपके स्वतः ही क्षण - क्षणमें जो सम्पूर्ण
पुरुषार्थोंका फलस्वरूप परमानन्द स्वभावतः ही निरन्तर प्रादुर्भूत होता रहता है, आप साक्षात् उसके स्वरूप ही हैं । इस प्रकार यद्यपि आपको इन यज्ञादिसे कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि अनेक प्रकारकी कामनाओंकी सिद्धि चाहनेवाले हमलोगोंके लिये तो मनोरथसिद्धिका पर्याप्त साधन यही होना चाहिये || ८ || आप ब्रह्मादि परम पुरुषोंकी अपेक्षा भी परम श्रेष्ठ हैं । हम तो यह भी नहीं जानते कि हमारा परम कल्याण किसमें है, और न हमसे आपकी यथोचित पूजा
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ही बनी है; तथापि जिस प्रकार तत्त्वज्ञ पुरुष बिना बुलाये भी केवल करुणावश अज्ञानी पुरुषोंके पास चले जाते हैं, उसी प्रकार आप भी हमें मोक्षसंज्ञक अपना परमपद और हमारी अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करनेके लिये अन्य साधारण यज्ञदर्शकोंके समान यहाँ प्रकट हुए हैं ॥९ ॥ पूज्यतम! हमें सबसे बड़ा वर तो आपने यही दे दिया कि ब्रह्मादि समस्त
वरदायकोंमें श्रेष्ठ होकर भी आप राजर्षि नाभिकी इस यज्ञशालामें साक्षात् हमारे नेत्रोंके सामने प्रकट हो गये! अब हम और वर क्या माँगें? ॥१० ॥
प्रभो! आपके गुणगणोंका गान परम मंगलमय है । जिन्होंने वैराग्यसे प्रज्वलित हुई ज्ञानाग्निके द्वारा अपने अन्तःकरणके राग - द्वेषादि सम्पूर्ण मलोंको जला डाला है, अतएव जिनका स्वभाव आपके ही समान शान्त है, वे आत्माराम मुनिगण भी निरन्तन आपके गुणों का गान ही किया करते हैं ॥११ ॥
अथ कथञ्चित्स्खलनक्षुत्पतनजृम्भण- दुरवस्थानादिषु विवशानां नः स्मरणाय ज्वरमरणदशायामपि सकलकश्मलनिरसनानि तव गुणकृतनामधेयानि वचनगोचराणि भवन्तु ॥१२ ॥
किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि भवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमिव-धनःफलीकरणम् || १३ || को वा इह तेऽपराजितोऽपराजितया माययानवसितपदव्या-नावृतमतिर्विषयविषरयानावृतप्रकृतिरनुपासित - महच्चरणः ॥१४ ॥ यदु ह वाव तव
पुनरदभ्रकर्तरिह समाहूतस्तत्रार्थधियां मन्दानां नस्तद्यद्देवहेलनं देवदेवार्हसि साम्येन सर्वान् प्रतिवोढुमविदुषाम् ॥१५ ॥
श्रीशुक उवाच इति निगदेनाभिष्ट्रयमानो भगवान् अनिमिषर्षभो वर्षधराभिवादिताभिवन्दित-चरणः सदयमिदमाह || १६ || श्रीभगवानुवाच अहो बताहमृषयो भवद्भिरवितथगीर्भिः वरमसुलभमभियाचितो यदमुष्यात्मजो मया सदृशो भूयादिति ममाहमेवाभिरूपः कैवल्या - दथापि ब्रह्मवादो न मृषा भवितुमर्हति ममैव हि मुखं यद् द्विजदेवकुलम् ॥१७ ॥
अतः हम आपसे यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने अथवा जँभाई लेने और संकटादिके समय एवं ज्वर और मरणादिकी अवस्थाओंमें आपका स्मरण न हो सकनेपर भी किसी प्रकार आपके सकलकलिमल - विनाशक ' भक्तवत्सल ', ' दीनबन्धु ' आदि गुणद्योतक नामोंका हम उच्चारण कर सकें ॥१२ ॥
इसके सिवा, कहनेयोग्य न होनेपर भी एक प्रार्थना और है । आप साक्षात् परमेश्वर हैं;
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स्वर्ग - अपवर्ग आदि ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे आप न दे सकें । तथापि जैसे कोई कंगाल किसी धन लुटानेवाले परम उदार पुरुषके पास पहुँचकर भी उससे भूसा ही माँगे, उसी प्रकार हमारे यजमान ये राजर्षि नाभि सन्तानको ही परम पुरुषार्थ मानकर आपके ही समान पुत्र पानेके लिये आपकी आराधना कर रहे हैं ॥ १३ ॥ यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । आपकी
मायाका पार कोई नहीं पा सकता और न वह किसीके वशमें ही आ सकती है । जिन लोगोंने महापुरुषोंके चरणोंका आश्रय नहीं लिया, उनमें ऐसा कौन है जो उसके वशमें नहीं होता, उसकी बुद्धिपर उसका परदा नहीं पड़ जाता और विषयरूप विषका वेग उसके स्वभावको दूषित नहीं कर देता? ॥१४ ॥ देवदेव! आप भक्तोंके बड़े - बड़े काम कर देते हैं । हम
मन्दमतियोंने कामनावश इस तुच्छ कार्यके लिये आपका आवाहन किया, यह आपका अनादर ही है । किन्तु आप समदर्शी हैं, अतः हम अज्ञानियोंकी इस धृष्टताको आप क्षमा करें ॥१५ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- राजन्! वर्षाधिपति नाभिके पूज्य ऋत्विजोंने प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके जब पूर्वोक्त स्तोत्रसे स्तुति की, तब देवश्रेष्ठ श्रीहरिने करुणावश इस प्रकार कहा ॥१६ ॥
श्रीभगवान्ने कहा — ऋषियो! बड़े असमंजसकी बात है । आप सब सत्यवादी महात्मा हैं, आपने मुझसे यह बड़ा दुर्लभ वर माँगा है कि राजर्षि नाभिके मेरे समान पुत्र हो । मुनियो! मेरे समान तो मैं ही हूँ, क्योंकि मैं अद्वितीय हूँ । तो भी ब्राह्मणोंका वचन मिथ्या नहीं होना चाहिये, द्विजकुल मेरा ही तो मुख है ॥१७ ॥
तत आग्नीध्रीयेंऽशकलयावतरिष्यामि आत्मतुल्यमनुपलभमानः ॥१८ ॥
श्रीशुक उवाच इति निशामयन्त्या मेरुदेव्याः पतिमभिधा - यान्तर्दधे भगवान् ॥१९ ॥ बर्हिषि
तस्मिन्नेव विष्णुदत्त भगवान् परमर्षिभिः प्रसादितो नाभेः प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यां धर्मान्दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानामृषी - णामूर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तनुवावततार || २० || इसलिये मैं स्वयं ही अपनी अंशकलासे आग्नीध्रनन्दन नाभिके यहाँ अवतार लूँगा, क्योंकि अपने समान मुझे कोई और दिखायी नहीं देता ॥ १८ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— महारानी मेरुदेवीके सुनते हुए उसके पतिसे इस प्रकार कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये || १ ९ || विष्णुदत्त परीक्षित्! उस यज्ञमें महर्षियोंद्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये जानेपर श्रीभगवान् महाराज नाभिका प्रिय करनेके लिये उनके रनिवासमें महारानी मेरुदेवीके गर्भसे दिगम्बर संन्यासी और ऊर्ध्वरेता मुनियोंका धर्म प्रकट करनेके लिये शुद्धसत्त्वमय विग्रहसे प्रकट हुए ॥२० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे नाभिचरिते ऋषभावतारो
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नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३ ॥
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अथ चतुर्थोऽध्यायः ऋषभदेवजीका राज्यशासन श्रीशुक उवाच अथ ह तमुत्पत्त्यैवाभिव्यज्यमान- भगवल्लक्षणं साम्योपशमवैराग्यैश्वर्यमहा-विभूतिभिरनुदिनमेधमानानुभावं ’ प्रकृतयः प्रजा ब्राह्मणा ’ देवताश्चावनितलसमवनायातितरां जगृधुः || १ || तस्य ह वा इत्थं वर्ष्मणा वरीयसा बृहच्छ्लोकेन चौजसा बलेन श्रिया यशसा वीर्य शौर्याभ्यां च पिता ऋषभ इतीदं नाम चकार || २ || तस्य ' हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवानृषभदेवो योगेश्वरः प्रहस्यात्मयोगमायया ॰ स्ववर्षमजनाभं नामाध्यवर्षत् ॥३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! नाभिनन्दनके अंग जन्मसे ही भगवान् विष्णुके वज्र-अंकुश आदि चिह्नोंसे युक्त थे; समता, शान्ति, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि महाविभूतियोंके कारण उनका प्रभाव दिनोंदिन बढ़ता जाता था । यह देखकर मन्त्री आदि प्रकृतिवर्ग, प्रजा, ब्राह्मण और देवताओंकी यह उत्कट अभिलाषा होने लगी कि ये ही पृथ्वीका शासन करें ॥१ ॥
उनके सुन्दर और सुडौल शरीर, विपुल कीर्ति, तेज, बल, ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणोंके कारण महाराज नाभिने उनका नाम ' ऋषभ ' ( श्रेष्ठ ) रखा ॥२ ॥
एक बार भगवान् इन्द्रने ईर्ष्यावश उनके राज्यमें वर्षा नहीं की । तब योगेश्वर भगवान् ऋषभने इन्द्रकी मूर्खतापर हँसते हुए अपनी योग - मायाके प्रभावसे अपने वर्ष अजनाभखण्डमें खूब जल बरसाया ॥३ ॥
नाभिस्तु यथाभिलषितं सुप्रजस्त्व - मवरुध्यातिप्रमोदभरविह्वलो गद्गदाक्षरया गिरा स्वैरं गृहीतनरलोकसधर्मं भगवन्तं पुराणपुरुषं मायाविलसितमतिर्वत्स तातेति सानुराग - मुपलालयन् परां निर्वृतिमुपगतः ॥ ४ ॥
विदितानुरागमापौरप्रकृति जनपदो राजा नाभिरात्मजं समयसेतुरक्षायामभिषिच्य ब्राह्मणेषूपनिधाय सहर मेरुदेव्या विशालायां प्रसन्ननिपुणेन तपसा समाधियोगेन नरनारायणाख्वं भगवन्तं वासुदेवमुपासीनः कालेन तन्महिमानमवाप ॥ ५ ॥
यस्य ह पाण्डवेय श्लोकावुदाहरन्ति - को नु तत्कर्म राजर्षेर्नाभेरन्वाचरेत्पुमान् ।
अपत्यतामगाद्यस्य हरिः शुद्धेन कर्मणा ॥ ६
ब्रह्मण्योऽन्यः कुतो नाभेर्विप्रा मङ्गलपूजिताः ।
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यस्य बर्हिषि यज्ञेशं दर्शयामासुरोजसा ॥७ ५ अथ ह भगवानृषभदेव: ' स्ववर्षं कर्मक्षेत्रमनु- मन्यमानः प्रदर्शितगुरुकुलवासो लब्धवरैर्गुरुभिरनुज्ञातो गृहमेधिनां धर्माननुशिक्षमाणो जयन्त्यामिन्द्रदत्तायामुभय-लक्षणं कर्म समाम्नायाम्नातमभियुञ्जन्नात्मजाना - मात्मसमानानां शतं जनयामास ॥८ ॥
महाराज नाभि अपनी इच्छाके अनुसार श्रेष्ठ पुत्र पाकर अत्यन्त आनन्दमग्न हो गये और अपनी ही इच्छासे मनुष्यशरीर धारण करनेवाले पुराणपुरुष श्रीहरिका सप्रेम लालन करते हुए, उन्हींके लीला - विलाससे मुग्ध होकर ' वत्स! तात! ' ऐसा गद्गद - वाणीसे कहते हुए बड़ा सुख मानने लगे ॥४ ॥
जब उन्होंने देखा कि मन्त्रिमण्डल, नागरिक और राष्ट्रकी जनता ऋषभदेवसे बहुत प्रेम करती है, तो उन्होंने उन्हें धर्ममर्यादाकी रक्षाके लिये राज्याभिषिक्त करके ब्राह्मणोंकी देख-रेखमें छोड़ दिया । आप अपनी पत्नी मेरुदेवीके सहित बदरिकाश्रमको चले गये । वहाँ अहिंसावृत्तिसे, जिससे किसीको उद्वेग न हो ऐसी कौशलपूर्ण तपस्या और समाधियोगके द्वारा भगवान् वासुदेवके नर - नारायणरूपकी आराधना करते हुए समय आनेपर उन्हींके स्वरूपमें लीन हो गये ॥५ ॥
पाण्डुनन्दन! राजा नाभिके विषयमें यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है-राजर्षि नाभिके उदार कर्मोंका आचरण दूसरा कौन पुरुष कर सकता है - जिनके शुद्ध कर्मोंसे सन्तुष्ट होकर साक्षात् श्रीहरि उनके पुत्र हो गये ॥६ ॥ महाराज नाभिके समान
ब्राह्मणभक्त भी कौन हो सकता है - जिनकी दक्षिणादिसे सन्तुष्ट हुए ब्राह्मणोंने अपने मन्त्रबलसे उन्हें यज्ञशालामें साक्षात् श्रीविष्णुभगवान्के दर्शन करा दिये || ७ || भगवान् ऋषभदेवने अपने देश अजनाभखण्डको कर्मभूमि मानकर लोकसंग्रहके लिये कुछ काल गुरुकुलमें वास किया । गुरुदेवको यथोचित दक्षिणा देकर गृहस्थमें प्रवेश करनेके लिये उनकी आज्ञा ली । फिर लोगोंको गृहस्थधर्मकी शिक्षा देनेके लिये देवराज इन्द्रकी दी हुई उनकी कन्या जयन्तीसे विवाह किया तथा श्रौत - स्मार्त्त दोनों प्रकारके शास्त्रोपदिष्ट कर्मोंका आचरण करते हुए उसके गर्भसे अपने ही समान गुणवाले सौ पुत्र उत्पन्न किये ॥८ ॥
येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीद्येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति || ९ || तमनु कुशावर्त इलावर्तो ब्रह्मावर्तो मलयः केतुर्भद्रसेन इन्द्रस्पृग्विदर्भः कीकट इति नव नवतिप्रधानाः ॥१० ॥
कविर्हरिरन्तरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः ।
आविर्होत्रोऽथ द्रुमिलश्चमसः करभाजनः ॥११
इति भागवतधर्मदर्शना नव महाभागवता - स्तेषां सुचरितं भगवन्महिमोपबृंहितं वसुदेवनारदसंवादमुपशमायनमुपरिष्टाद् वर्णयिष्यामः || १२ || यवीयांस एकाशीति-र्जायन्तेयाः पितुरादेशकरा महाशालीना महाश्रोत्रिया यज्ञशीलाः कर्मविशुद्धा ' ब्राह्मणा
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बभूवुः ॥१३ ॥
भगवानृषभसंज्ञ े आत्मतन्त्रः स्वयं नित्यनिवृत्तानर्थपरम्परः केवलानन्दानुभव ३ ईश्वर एव विपरीतवत्कर्माण्यारभमाणः कालेनानुगतं धर्ममाचरणेनोपशिक्षयन्नतद्विदां सम उपशान्तो मैत्रः कारुणिको धर्मार्थयशः प्रजानन्दामृतावरोधेन गृहेषु लोकं * नियमयत् ॥१४ ॥
यद्यच्छीर्षण्याचरितं तत्तदनुवर्तते लोकः || १५ || यद्यपि स्वविदितं सकलधर्मं “ ब्राह्मं गुह्यं ब्राह्मणैर्दर्शितमार्गेण सामादिभिरुपायैर्जनतामनुशशास ॥ १६ ॥
द्रव्यदेशकाल - वयःश्रद्धर्त्विग्विविधोद्देशोपचितैः सर्वैरपि क्रतुभिर्यथोपदेशं शतकृत्व इयाज ॥१७ ॥
-॥१६ ॥
उनमें महायोगी भरतजी सबसे बड़े और सबसे अधिक गुणवान् थे । उन्हींके नामसे लोग इस अजनाभखण्डको ' भारतवर्ष ' कहने लगे ॥९ ॥ उनसे छोटे कुशावर्त, इलावर्त, ब्रह्मावर्त,
मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्पृक्, विदर्भ और कीकट - ये नौ राजकुमार शेष नब्बे भाइयोंसे बड़े एवं श्रेष्ठ थे ॥१० ॥ उनसे छोटे कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र,
द्रुमिल, चमस और करभाजन – ये नौ राजकुमार भागवतधर्मका प्रचार करनेवाले बड़े भगवद्भक्त थे । भगवान्की महिमासे महिमान्वित और परम शान्तिसे पूर्ण इनका पवित्र चरित हम नारद - वसुदेवसंवादके प्रसंगसे आगे ( एकादश स्कन्धमें ) कहेंगे ॥११-१२ ॥ इनसे छोटे जयन्तीके इक्यासी पुत्र पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले, अति विनीत, महान् वेदज्ञ और निरन्तर यज्ञ करनेवाले थे । वे पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेसे शुद्ध होकर ब्राह्मण हो गये थे ॥१३ ॥
भगवान् ऋषभदेव, यद्यपि परम स्वतन्त्र होनेके कारण स्वयं सर्वदा ही सब प्रकारकी अनर्थपरम्परासे रहित, केवल आनन्दानुभवस्वरूप और साक्षात् ईश्वर ही थे, तो भी अज्ञानियोंके समान कर्म करते हुए उन्होंने कालके अनुसार प्राप्त धर्मका आचरण करके उसका तत्त्व न जाननेवाले लोगोंको उसकी शिक्षा दी । साथ ही सम, शान्त, सुहृद् और कारुणिक रहकर धर्म, अर्थ, यश, सन्तान, भोग - सुख और मोक्षका संग्रह करते हुए गृहस्थाश्रममें लोगोंको नियमित किया || १४ || महापुरुष जैसा जैसा आचरण करते हैं, दूसरे लोग उसीका अनुकरण करने लगते हैं ॥ १५ ॥ यद्यपि वे सभी धर्मोंके साररूप वेदके गूढ
रहस्यको जानते थे, तो भी ब्राह्मणोंकी बतलायी हुई विधिसे साम - दानादि नीतिके अनुसार ही जनताका पालन करते थे ॥१६ ॥ उन्होंने शास्त्र और ब्राह्मणोंके उपदेशानुसार भिन्न - भिन्न
देवताओंके उद्देश्यसे द्रव्य, देश, काल, आयु, श्रद्धा और ऋत्विज् आदिसे सुसम्पन्न सभी प्रकारके सौ - सौ यज्ञ किये ॥१७ ॥
भगवतर्षभेण परिरक्ष्यमाण एतस्मिन् वर्षे न कश्चन पुरुषो वाञ्छत्यविद्यमानमिवात्मनो ऽन्यस्मात्कथञ्चन किमपि कर्हिचिदवेक्षते भर्तर्यनुसवनं विजृम्भितस्नेहातिशयमन्तरेण || १८ || स कदाचिदटमानो भगवानृषभो ब्रह्मावर्तगतो ब्रह्मर्षिप्रवरसभायां प्रजानां निशामयन्तीनामात्मजानवहितात्मनः प्रश्रयप्रणय-