भरतचरित : योगियों का मन उनके लिए सबसे बड़ा शत्रु क्यों है?
चित्त की चञ्चलता और आसक्ति
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 7–8 · पृष्ठ 954–985
2,553 शब्द · 13 मिनटका पाठ · 21 श्लोक
श्रीशुक ने राजा परीक्षित से कहा
परमार्थ की जिज्ञासा के निवारण हेतु
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— हे राजन्! वर्षाधिपति नाभि के यज्ञ में जब ऋत्विजों ने प्रभु के चरणों की वन्दना कर पूर्वोक्त स्तोत्र से उनकी स्तुति की, तब देवश्रेष्ठ श्रीहरि करुणावश इस प्रकार प्रकट हुए।
अथानयापि न भवत इज्ययोरुभारभरया समुचितमर्थमिहोपलभामहे ॥
यज्ञशाला का दृश्य अत्यन्त दिव्य था। वहाँ एक परम तेजस्वी चतुर्भुज मूर्ति पुरुष विशेष प्रकट हुए, जो बाजूबन्द और नूपुर आदि आभूषणों से विभूषित थे। उन्हें देखकर ऋत्विज, सदस्य और यजमान सभी इस प्रकार आह्लादित हुए जैसे कोई निर्धन व्यक्ति अपार धनराशि पाकर फूले नहीं समाता। सभी ने सिर झुकाकर अत्यन्त आदरपूर्वक प्रभु की अर्घ्य द्वारा पूजा की।
तत आग्नीध्रीयेंऽशकलयावतरिष्यामि आत्मतुल्यमनुपलभमानः ॥
इति निशामयन्त्या मेरुदेव्याः पतिमभिधा - यान्तर्दधे भगवान् ॥१९ ॥ बर्हिषि तस्मिन्नेव विष्णुदत्त भगवान् परमर्षिभिः प्रसादितो नाभेः प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यां धर्मान्दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानामृषी - णामूर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तनुवावततार || २० || इसलिये मैं स्वयं ही अपनी अंशकलासे आग्नीध्रनन्दन नाभिके यहाँ अवतार लूँगा, क्योंकि अपने समान मुझे कोई और दिखायी नहीं देता ।
ऋत्विजों ने अत्यन्त विनय के साथ कहा— "हे प्रभो! आप पूजनीय हैं, किन्तु हम आपकी पूजा करना क्या जानें? हम तो बार-बार आपको नमस्कार करते हैं— इतना ही हमें महापुरुषों ने सिखाया है। आप प्रकृति और पुरुष से भी परे हैं। इस प्रपञ्च में बुद्धि फँस जाने के कारण ऐसा कौन पुरुष है जो प्राकृत नाम, रूप एवं आकृति द्वारा आपके स्वरूप का निरूपण कर सके? आप साक्षात् परमेश्वर हैं। आपके मङ्गलमय गुण जगत् के दुःखों का दमन करने वाले हैं। यदि कोई उनके वर्णन का साहस भी करे, तो वह केवल एक देश का ही वर्णन कर सकेगा।"
आत्मन एवानुसवनमञ्जसाव्यतिरेकेण बोभूयमानाशेषपुरुषार्थस्वरुपस्य किन्तु नाथाशिष आशासानानामेतदभिसंराधनमात्रं भवितुमर्हति ॥
ऋत्विजों ने आगे कहा— "प्रभो! यदि आपके भक्त प्रेम से गद्गद वाणी में आपकी स्तुति करते हुए सामान्य जल, विशुद्ध पल्लव, तुलसी और दूब के अङ्कुरों जैसी सामग्री से पूजा करें, तो भी आप सन्तुष्ट हो जाते हैं। जिनके हृदय में वैराग्य की अग्नि ने राग-द्वेष के मलों को जला डाला है, वे आत्माराम मुनिगण भी निरन्तर आपके गुणों का गान करते हैं।"
परिजनानुरागविरचितशबलसंशब्दसलिल - सितकिसलयतुलसिकादूर्वाङ्कुरैरपि सम्भृतया सपर्यया किल परम परितुष्यसि ॥
किन्तु प्रभो! यदि आपके भक्त प्रेम गद्गद वाणीसे स्तुति करते हुए सामान्य जल, विशुद्ध पल्लव, तुलसी और दूबके अंकुर आदि सामग्रीसे ही आपकी पूजा करते हैं, तो भी आप सब प्रकार सन्तुष्ट हो जाते हैं ।
ऋत्विजों ने अपनी विवशता प्रकट करते हुए एक विशेष वर माँगा— "प्रभो! हम आपसे यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने अथवा जँभाई लेने और सङ्कटादिक के समय, या ज्वर और मृत्यु की अवस्था में यदि आपका स्मरण न हो सके, तो भी हम आपके 'भक्तवत्सल' और 'दीनबन्धु' जैसे गुणद्योतक नामों का उच्चारण कर सकें।" उन्होंने अपनी लघुता स्वीकार करते हुए कहा— "हे देवदेव! हम मन्दमति लोग कामवश इस तुच्छ कार्य के लिए आपका आवाहन कर रहे हैं, यह हमारा अनादर है; किन्तु आप समदर्शी हैं, अतः हमारी इस धृष्टता को क्षमा करें।"
अथ कथञ्चित्स्खलनक्षुत्पतनजृम्भण- दुरवस्थानादिषु विवशानां नः स्मरणाय ज्वरमरणदशायामपि सकलकश्मलनिरसनानि तव गुणकृतनामधेयानि वचनगोचराणि भवन्तु ॥
अतः हम आपसे यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने अथवा जँभाई लेने और संकटादिके समय एवं ज्वर और मरणादिकी अवस्थाओंमें आपका स्मरण न हो सकनेपर भी किसी प्रकार आपके सकलकलिमल - विनाशक ' भक्तवत्सल ', ' दीनबन्धु ' आदि गुणद्योतक नामोंका हम उच्चारण कर सकें ।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— राजन्! जब ऋत्विजों ने इस प्रकार स्तुति की, तब श्रीभगवान् ने करुणावश कहा— "ऋषियों! बड़े असमञ्जस की बात है। आप सत्यवादी महात्मा हैं और आपने मुझसे यह बड़ा दुर्लभ वर माँगा है कि मेरे समान पुत्र प्राप्त हो। मुनियो! मेरे समान तो मैं ही हूँ, क्योंकि मैं अद्वितीय हूँ। फिर भी ब्राह्मणों का वचन मिथ्या नहीं होना चाहिए, क्योंकि द्विजकुल मेरा ही मुख है।"
नाभिस्तु यथाभिलषितं सुप्रजस्त्व - मवरुध्यातिप्रमोदभरविह्वलो गद्गदाक्षरया गिरा स्वैरं गृहीतनरलोकसधर्मं भगवन्तं पुराणपुरुषं मायाविलसितमतिर्वत्स तातेति सानुराग - मुपलालयन् परां निर्वृतिमुपगतः ॥
महाराज नाभि अपनी इच्छाके अनुसार श्रेष्ठ पुत्र पाकर अत्यन्त आनन्दमग्न हो गये और अपनी ही इच्छासे मनुष्यशरीर धारण करनेवाले पुराणपुरुष श्रीहरिका सप्रेम लालन करते हुए, उन्हींके लीला - विलाससे मुग्ध होकर ' वत्स! तात! ' ऐसा गद्गद - वाणीसे कहते हुए बड़ा सुख मानने लगे ।
भगवान् ने आगे घोषणा की— "मैं स्वयं ही अपनी अंशकला से आग्निध्र नन्दन के रूप में नाभि के यहाँ अवतार लूँगा, क्योंकि अपने समान मुझे कोई और दिखाई नहीं देता।" यह कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गए।
भरसुयन्त्रितानप्युपशिक्षयन्निति होवाच ॥
भगवान् ऋषभदेवके शासनकालमें इस देशका कोई भी पुरुष अपने लिये किसीसे भी अपने प्रभुके प्रति दिन - दिन बढ़नेवाले अनुरागके सिवा और किसी वस्तुकी कभी इच्छा नहीं करता था । यही नहीं, आकाशकुसुमादि अविद्यमान वस्तुकी भाँति कोई किसीकी वस्तुकी ओर दृष्टिपात भी नहीं करता था ॥ १८ ॥ एक बार भगवान् ऋषभदेव घूमते - घूमते ब्रह्मावर्त देशमें पहुँचे । वहाँ बड़े - बड़े ब्रह्मर्षियोंकी सभामें उन्होंने प्रजाके सामने ही अपने समाहितचित्त तथा विनय और प्रेमके भारसे सुसंयत पुत्रोंको शिक्षा देनेके लिये इस प्रकार कहा ।
महारानी मेरुदेवी के सुनते हुए उनके पति ने इस प्रकार कहा और भगवान् लुप्त हो गए। इस प्रकार, यज्ञशाला में प्रसन्न हुए श्रीभगवान् ने राजा नाभि की इच्छा पूरी करने के लिए महारानी मेरुदेवी के गर्भ से शुद्ध-सत्त्वमय विग्रह में प्रकट होकर दिगम्बर सन्न्यासी और ऊर्ध्वरेता मुनियों का धर्म प्रकट किया।
विदितानुरागमापौरप्रकृति जनपदो राजा नाभिरात्मजं समयसेतुरक्षायामभिषिच्य ब्राह्मणेषूपनिधाय सहर मेरुदेव्या विशालायां प्रसन्ननिपुणेन तपसा समाधियोगेन नरनारायणाख्वं भगवन्तं वासुदेवमुपासीनः कालेन तन्महिमानमवाप ॥
जब उन्होंने देखा कि मन्त्रिमण्डल, नागरिक और राष्ट्रकी जनता ऋषभदेवसे बहुत प्रेम करती है, तो उन्होंने उन्हें धर्ममर्यादाकी रक्षाके लिये राज्याभिषिक्त करके ब्राह्मणोंकी देख-रेखमें छोड़ दिया । आप अपनी पत्नी मेरुदेवीके सहित बदरिकाश्रमको चले गये । वहाँ अहिंसावृत्तिसे, जिससे किसीको उद्वेग न हो ऐसी कौशलपूर्ण तपस्या और समाधियोगके द्वारा भगवान् वासुदेवके नर - नारायणरूपकी आराधना करते हुए समय आनेपर उन्हींके स्वरूपमें लीन हो गये ।
विष्णुदत्त परीक्षित! उस यज्ञ में भगवान् ऋषभदेव के प्रकट होने पर प्रजा, ब्राह्मण और देवता हर्षित हुए। जब वे बड़े हुए, तो उनके शरीर में विष्णु के वज्र-अङ्कुश आदि चिह्न थे। समता, शान्ति, वैराग्य और ऐश्वर्य जैसी महाविभूतियों के कारण उनका प्रभाव बढ़ता गया। यह देखकर मन्त्री, प्रजा और देवताओं की उत्कट अभिलाषा होने लगी कि ये ही पृथ्वी का शासन करें। उनके तेज और शूरवीरता को देखकर महाराज नाभि ने उनका नाम 'ऋषभ' रखा।
भगवानृषभसंज्ञ े आत्मतन्त्रः स्वयं नित्यनिवृत्तानर्थपरम्परः केवलानन्दानुभव ३ ईश्वर एव विपरीतवत्कर्माण्यारभमाणः कालेनानुगतं धर्ममाचरणेनोपशिक्षयन्नतद्विदां सम उपशान्तो मैत्रः कारुणिको धर्मार्थयशः प्रजानन्दामृतावरोधेन गृहेषु लोकं * नियमयत् ॥
एक बार इन्द्र ने ईर्ष्यावश वर्षा नहीं की, तब योगेश्वर ऋषभदेव ने अपनी योग-माया से स्वयं के राज्य अजनाभखण्ड में खूब जल बरसाया। राजा नाभि अपने श्रेष्ठ पुत्र को पाकर अत्यन्त आनन्दित हुए और उन्हें 'वत्स! तात!' कहकर गद्गद वाणी से प्रेम करने लगे। जब उन्होंने देखा कि जनता ऋषभदेव से बहुत प्रेम करती है, तो उन्होंने उन्हें राज्याभिषेक कर धर्म की रक्षा हेतु छोड़ दिया और स्वयं अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ बदरिकाश्रम चले गए। वहाँ वे समाधियोग द्वारा भगवान् वासुदेव की आराधना करते हुए अपने शरीर का त्याग कर दिया।
भगवान् ऋषभदेव ने अपने अजनाभखण्ड को कर्मभूमि मानकर कुछ काल गुरुकुल में वास किया। गुरुदेव को दक्षिणा देकर उन्होंने गृहस्थ धर्म में प्रवेश किया और देवराज इन्द्र की कन्या जयन्ती से विवाह किया। उनके सौ पुत्र थे, जिनमें बड़े ऋषि कवि, हरि, अन्तरिक्ष आदि थे। इनसे छोटे जयन्ती के इक्यासी पुत्र थे जो अत्यन्त विनीत और यज्ञ करने वाले ब्राह्मण बने।
ऋषभदेव के शासनकाल में प्रजा केवल भगवान् के प्रति बढ़ता अनुराग ही चाहती थी। एक बार जब वे ब्रह्मावर्त देश पहुँचे, तो वहाँ बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों की सभा में अपने सुसंयत पुत्रों को शिक्षा देने के लिए ठहर गए।
राजा नाभि ने अपने सौ पुत्रों को आत्मज्ञान का उपदेश दिया और अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को राजसिंहासन सौंपकर स्वयं सन्न्यास लेकर ब्रह्मावर्त देश से बाहर निकल गए।
एवमनुशास्यात्मजान् स्वयमनुशिष्टानपि लोकानुशासनार्थं महानुभावः परमसुहृद्भगवा - नृषभापदेश उपशमशीलानामुपरतकर्मणां महामुनीनां भक्तिज्ञानवैराग्यलक्षणं पारमहंस्यधर्ममुपशिक्षमाणः स्वतनयशतज्येष्ठं परमभागवतं भगवज्जनपरायणं भवन भरतं धरणिपालनायाभिषिच्य स्वयं एवोर्वरितशरीरमात्रपरिग्रह उन्मत्त इव गगन - परिधानः आत्मन्यारोपिताहवनीयो ब्रह्मावर्तात्प्रवव्राज ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन्! ऋषभ - देवजीके पुत्र यद्यपि स्वयं ही सब प्रकार सुशिक्षित थे, तो भी लोगोंको शिक्षा देनेके उद्देश्यसे महाप्रभावशाली परम सुहृद् भगवान् ऋषभने उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया । ऋषभदेवजीके सौ पुत्रोंमें भरत सबसे बड़े थे । वे भगवान्के परम भक्त और भगवद्भक्तोंके परायण थे । ऋषभदेवजीने पृथ्वीका पालन करनेके लिये उन्हें राजगद्दीपर बैठा दिया और स्वयं उपशमशील निवृत्तिपरायण महामुनियोंके भक्ति, ज्ञान और वैराग्यरूप परमहंसोचित धर्मोंकी शिक्षा देनेके लिये बिलकुल विरक्त हो गये । केवल शरीरमात्रका परिग्रह रखा और सब कुछ घरपर रहते ही छोड़ दिया । अब वे वस्त्रोंका भी त्याग करके सर्वथा दिगम्बर हो गये । उस समय उनके बाल बिखरे हुए थे । उन्मत्तका - सा वेष था । इस स्थितिमें वे आहवनीय ( अग्निहोत्रकी ) अग्नियोंको अपनेमें ही लीन करके संन्यासी हो गये और ब्रह्मावर्त देशसे बाहर निकल गये ।
ऋषभदेव जी ने योगियों के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने हेतु विभिन्न कठिन योगचर्याएँ अपनाईं। उन्होंने संसार की आसक्तियों को त्यागने के लिए स्वयं को अत्यन्त सरल और विरक्त बना लिया। जब वे भ्रमण पर निकले, तो उनका स्वरूप किसी अवधूत जैसा था—बिखरे हुए बाल, धूल से सना शरीर और वस्त्रहीन अवस्था। उनके नेत्र विशाल, लालिमा लिए हुए और शीतल थे, जो देखने में अत्यन्त मनोहर लगते थे। उनके मुख के आगे लम्बी घुँघराली लटें लटकती थीं, जिससे वे किसी ग्रहग्रस्त मनुष्य के समान प्रतीत होते थे।
महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते-स्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम् ।
महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधवो ये ॥
जब उन्होंने देखा कि जन-समूह उनकी योगसाधना में विघ्न डाल सकता है, तो उन्होंने 'अजगरवृत्ति' धारण कर ली। वे लेटे-लेटे ही भोजन करने लगे और अपने त्याग किए हुए मल में स्वयं को सानने लगे। किन्तु आश्चर्य की बात यह थी कि उनके उस मल में दुर्गन्ध नहीं, अपितु एक दिव्य सुगन्ध थी, जो वायु के माध्यम से दस योजन दूर तक पूरे देश को सुगन्धित कर रही थी।
देशं दशयोजन समन्तात् सुरभिं चकार || ३३ || एवं गोमृगकाकचर्यया व्रजंस्तिष्ठन्नासीनः शयानः काकमृगगोचरितः पिबति खादत्यवमेहति स्म ॥३४ ॥ इति नानायोगचर्याचरणो भगवान् कैवल्यपतिर्ऋषभोऽविरतपरममहानन्दानुभव आत्मनि सर्वेषां भूतानामात्मभूते भगवति वासुदेव आत्मनोऽव्यवधानानन्तरोदरभावेन सिद्धसमस्तार्थ - परिपूर्णो योगैश्वर्याणि वैहायसमनोजवान्तर्धान-परकायप्रवेशदूरग्रहणादीनि यदृच्छयोपगतानि नाञ्जसा नृप हृदयेनाभ्यनन्दत् ॥
राजा परीक्षित ने श्रीशुक से पूछा—"हे भगवन! यदि सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाएँ, तो वे क्लेश का कारण क्यों नहीं बनतीं?" श्रीशुक बोले—"राजन्! चञ्चल चित्त पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह काम और क्रोध के लिए अवसर देता है।" उन्होंने आगे बताया कि भगवान ऋषभदेव ने आत्मज्ञान प्राप्त कर अपने शरीर का त्याग कर दिया था। उन्होंने राजा भरत को पृथ्वी के पालन हेतु नियुक्त किया था। महाराज भरत ने श्रद्धापूर्वक यज्ञ किए और भगवान वासुदेव की आराधना की। एक करोड़ वर्ष बीतने के पश्चात, उन्होंने अपनी सम्पत्ति अपने पुत्रों में बाँट दी और स्वयं पुलहाश्रम चले गए। वहाँ वे पुष्प, पत्र और फलों के द्वारा एकान्त में भगवान की आराधना करते थे।
नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥
भरत जी की भक्ति इतनी गहरी थी कि परम आनन्द प्राप्त होने पर उन्हें नियमबद्ध पूजा का भी स्मरण नहीं रहा। वे सूर्यमण्डल में नारायण की स्तुति करने लगे। किन्तु उनके जीवन में एक मोड़ आया। गण्डकी नदी के तट पर तपस्या करते समय, उन्होंने एक मृग माता को देखा जो सिंह के भय से व्याकुल होकर उछली और उसका गर्भ (मृग शावक) नदी में गिर गया। भरत ने उस अनाथ मृग शावक को दयावश अपने आश्रम लाकर पाल लिया।
तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सनाभम् ।
अक्लिष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥
भरत की ममता और उस मृग शावक के प्रति उनकी अत्यधिक आसक्ति ने उनके योग साधना के मार्ग में बाधा डाल दी। इस आसक्ति के कारण वे अपने लक्ष्य से भ्रष्ट हो गए। अन्ततः, उन्हें उस मृगी माता का त्याग करना पड़ा।
लोकः स्वयं श्रेयसि नष्टदृष्टि-र्योऽर्थान् समीहेत निकामकामः ।
अन्योन्यवैरः सुखलेशहेतो-रनन्तदुःखं च न वेद मूढः ॥
राजा परीक्षित ने पूछा – “भगवन्! योग-रूप वायु से प्रज्वलित ज्ञानाग्नि से जिनके रागादि कर्म-बीज दग्ध हो गये हैं—उन आत्माराम मुनियों को यदि दैववश स्वयं ही अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त हो जायें, तो वे उनके राग-द्वेषादि क्लेशों का कारण तो किसी प्रकार नहीं हो सकतीं; फिर भगवान् ऋषभदेव ने उन्हें स्वीकार क्यों नहीं किया?”
श्रीशुक बोले— “राजन्! जिस प्रकार मोहिनी रूप में फँसकर महादेवजी का चिरकाल का सञ्चित तप क्षीण हो गया था, उसी प्रकार जो योगी अपने मन पर विश्वास करते हैं, उनका मन काम और उसके साथी क्रोधादि शत्रुओं को आक्रमण करने का अवसर देकर उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। वह चञ्चल मन ही काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और भय आदि शत्रुओं तथा कर्म-बन्धन का मूल है; इस पर कोई भी बुद्धिमान कैसे विश्वास कर सकता है? इसी कारण भगवान् ऋषभदेव, जो इन्द्रादि सभी लोकपालों के भूषण स्वरूप थे, वे जड पुरुषों की भाँति अवधूतों के वेश, भाषा और आचरण से अपने ईश्वरीय प्रभाव को छिपाए रहते थे।
अन्ततः, उन्होंने योगियों को देहत्याग की विधि सिखाने के लिये अपना शरीर छोड़ने का निर्णय लिया। वे अपने अन्तःकरण में अभेदरूप से स्थित परमात्मा को अभिन्न रूप से देखते हुए, वासनाओं की अनुवृत्ति से छूटकर और लिङ्ग-देह के अभिमान से मुक्त होकर उपराम हो गये। इस प्रकार, भगवान् ऋषभदेव का शरीर योगमाया की वासना के आश्रय में केवल अभिमानाभास के समान इस पृथ्वी पर विचरता रहा। वह दैववश कोंक, वेंक और दक्षिण आदि देशों में गया और उन्मत्त के समान दिगम्बर रूप में कुटकाचल के वन में घूमने लगा। उसी समय झञ्झावात से झकझोरे हुए बाँसों के घर्षण से एक प्रबल दावाग्नि धधक उठी और उसने सारे वन को अपनी लाल-लाल लपटों में लेकर ऋषभदेवजी सहित भस्म कर दिया।
भगवान् का यह अवतार रजोगुण से भरे हुए लोगों को मोक्षमार्ग की शिक्षा देने के लिये ही हुआ था। लोग इनके गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं— ‘अहो! सात समुद्रों वाली पृथ्वी के समस्त द्वीप और वर्षों में यह भारतवर्ष बड़ी ही पुण्यभूमि है, क्योंकि यहाँ के लोग श्रीहरि के मङ्गलमय अवतार-चरित्रों का गान करते हैं।’ अहो! महाराज प्रियव्रत का वंश बड़ा ही उज्ज्वल है, जिसमें पुराणपुरुष श्रीआदिनारायण ने ऋषभावतार लेकर मोक्ष प्रदान करने वाले पारमहंस धर्म का आचरण किया। इन जन्मरहित भगवान् ऋषभदेव के मार्ग पर कोई दूसरा योगी मन से भी कैसे चल सकता है? क्योंकि योगीलोग जिन सिद्धियों के लिये लालायित रहते हैं, उन्हें इन्होंने अपने आप प्राप्त होने पर भी असत् समझकर त्याग दिया था।
राजन्! महाराज भरत बड़े ही भगवद्भक्त थे। भगवान् ऋषभदेव ने अपने सङ्कल्पमात्र से उन्हें पृथ्वी की रक्षा के लिये नियुक्त कर दिया था। उन्होंने उनकी आज्ञा में स्थित रहकर विश्वरूप की कन्या पञ्चजनी से विवाह किया। जिस प्रकार तामस अहङ्कार से पाँच तन्त्राणि उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार पञ्चजनी के गर्भ से उनके सुमति, राष्ट्रभृत, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु नामक पाँच पुत्र हुए—जो सर्वथा उन्हीं के समान थे। इसी वर्ष को, जिसका नाम पहले अजनाभवर्ष था, राजा भरत के समय से ही ‘भारतवर्ष’ कहा जाने लगा।
महाराज भरत बहुज्ञ थे। वे अपनी प्रजा का अपने बाप-दादों के समान स्वधर्म में स्थित रहकर, अत्यन्त वात्सल्यभाव से पालन करने लगे। उन्होंने होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा—इन चार ऋत्विजों द्वारा कराये जाने वाले अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशु और सोम आदि यज्ञों का यथासमय श्रद्धापूर्वक यजन किया। इस प्रकार कर्म की शुद्धि से उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया। तब उन्हें हृदयाकाश में विराजमान, ब्रह्मस्वरूप भगवान् वासुदेव में—जो श्रीवत्स, कौस्तुभ, वनमाला, चक्र, शङ्ख और गदा आदि से सुशोभित हैं—दिन-दिन बढ़ने वाली उत्कृष्ट भक्ति प्राप्त हुई।
एक करोड़ वर्ष बीत जाने पर जब उनका राज्यभोग का प्रारब्ध क्षीण हुआ, तब उन्होंने अपनी समस्त सम्पत्ति पुत्रों में बाँट दी और स्वयं पुलहाश्रम (हरिहरक्षेत्र) चले आए। इस पुलहाश्रम में रहने वाले भक्तों पर भगवान् का बड़ा ही वात्सल्य है; वे आज भी अपने इष्ट रूप में उनसे मिलते रहते हैं। वहाँ चक्रनदी नाम की सरिता, जो शालग्राम शिलाओं से युक्त है, ऋषियों के आश्रमों को पवित्र करती रहती है।”
राजन्! भरत जी पुलहाश्रम के उस एकान्त उपवन में अकेले रहकर अनेक प्रकार के पत्र, पुष्प, तुलसीदल, जल और कन्द-मूल-फलादि से भगवान् की आराधना करने लगे। इस नियमपूर्वक की जाने वाली सेवा से उनका प्रेम का वेग बढ़ता चला गया। धीरे-धीरे उनका हृदय द्रवीभूत होकर शान्त होने लगा और आनन्द के प्रबल वेग से उनके शरीर में रोमाञ्च होने लगा। उत्कण्ठा इतनी तीव्र हुई कि उनके नेत्रों में प्रेम के आँसू उमड़ आए, जिससे उनकी दृष्टि ठहर गई। अन्ततः अपने प्रियतम के अरुण चरणारविन्दों के ध्यान से भक्तियोग का आविर्भाव हुआ। परमानन्द से सराबोर उनके हृदय रूपी गम्भीर सरोवर में बुद्धि डूब गई और उन्हें उस नियमपूर्वक की जाने वाली भगवत्पूजा का भी स्मरण न रहा।
वे भगवत्सेवा के नियम में ही तत्पर रहते थे। शरीर पर कृष्णमृगचर्म धारण करते और त्रिकालस्नान के कारण भीगे रहने से उनके केश भूरी-भूरी घुँघराली लटों में परिणत हो गए थे, जिससे वे बड़े सुहावने लगते थे। उदित सूर्यमण्डल में वे सूर्य-सम्बन्धी ऋचाओं द्वारा ज्योतिर्मय परमपुरुष भगवान् नारायण की आराधना करते हुए कहते— ‘भगवान् सूर्य का कर्मफलदायक तेज प्रकृति से परे है। उसी ने सङ्कल्प द्वारा इस जगत् की उत्पत्ति की है। फिर वही अन्तर्यामीरूप से इसमें प्रविष्ट होकर अपनी चित्-शक्ति द्वारा विषयलोलुप जीवों की रक्षा करता है। हम उसी बुद्धिप्रवर्तक तेज की शरण लेते हैं।’
तस्या उत्पतन्त्या अन्तर्वत्न्या उरुभयावगलितो योनिनिर्गतो गर्भः स्रोतसि निपपात ॥५ ॥ तत्प्रसवोत्सर्पण भयखेदातुरा स्वगणेन वियुज्यमाना कस्याञ्चिद्दर्यां कृष्णसारसती निपपाताथ च ममार ॥
राजन्! इसी समय एक हरिनी प्यास से व्याकुल होकर जल पीने के लिए अकेली ही उस नदी के तीर पर आयी। अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंह की एक लोकभयङ्कर दहाड़ सुनाई पड़ी। हरिनजाति तो स्वभाव से ही डरपोक होती है; वह पहले ही चौकन्नी होकर इधर-उधर देखती जाती थी। अब ज्यों ही उसके कान में वह भीषण शब्द पड़ा, सिंह के डर के मारे उसका कलेजा धड़कने लगा और नेत्र कातर हो गए। प्यास अभी बुझी भी न थी कि प्राणों पर बन आई। उसने भयवश एकाकी नदी पार करने के लिए छलाँग मारी। उसके पेट में गर्भ था, अतः उछलते समय अत्यन्त भय के कारण उसका गर्भ अपने स्थान से हटकर योनिद्वार से निकलकर नदी के प्रवाह में गिर गया। वह कृष्णमृगपत्नी अकस्मातक गर्भ गिरने, लम्बी छलाँग मारने और सिंह से डरी होने के कारण बहुत पीड़ित हो गई। अपने झुण्ड से बिछोह के कारण वह किसी गुफा में जा पड़ी और वहीं मर गई।
एकदा तु महानद्यां कृताभिषेक - नैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश ॥१ ॥ तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकै - वोपजगाम || २ || तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्नादो लोकभयङ्कर उदपतत् ॥३ ॥ तमुपश्रुत्य सा मृगवधूः प्रकृतिविक्लवा चकितनिरीक्षणा सुतरामपि हरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात् सहसैवोच्चक्राम ॥
धाराके पास बैठे रहे ॥१ ॥ राजन्! इसी समय एक हरिनी प्याससे व्याकुल हो जल पीनेके लिये अकेली ही उस नदीके तीरपर आयी || २ || अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंहकी लोकभयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी || ३ || हरिनजाति तो स्वभावसे ही डरपोक होती है । वह पहले ही चौकन्नी होकर इधर - उधर देखती जाती थी । अब ज्यों ही उसके कानमें वह भीषण शब्द पड़ा कि सिंहके डरके मारे उसका कलेजा धड़कने लगा और नेत्र कातर हो गये । प्यास अभी बुझी न थी, किन्तु अब तो प्राणोंपर आ बनी थी । इसलिये उसने भयवश एकाकी नदी पार करनेके लिये छलाँग मारी ।
जब भरत जी उस मृग शावक को देखते, तो उसे अपने कन्धे पर चढ़ा लेते या कभी गोद में लेकर, तो कभी छाती से लगाकर उसका दुलार करते। वे उसे पुचकारने और लड़ाने की चिन्ता में इतने डूबे रहते कि धीरे-धीरे उनके यम, नियम और भगवत्पूजा जैसे आवश्यक कृत्य छूटने लगे। नित्य नैमित्तिक कर्मों को करते समय भी भरत बीच-बीच में उठकर उस मृग बालक को देखते और उसकी मङ्गलकामना करते— 'बेटा! तेरा सर्वत्र कल्याण हो।' किन्तु यदि वह दिखाई न देता, तो उनका चित्त एक दीन मनुष्य की तरह उद्विग्न हो जाता। वे उस विरह में व्याकुल होकर कहने लगते— 'अहो! जब कभी मैं प्रणयकोप से खेल में झूठ-मूठ समाधिके बहाने आँखें मूँदकर बैठ जाता, तब वह चकित चित्त से मेरे पास आकर जलबिन्दु के समान कोमल और नन्हें-नन्हें सींगों की नोक से किस प्रकार मेरे अङ्गों को खुजलाने लगता था! मैं कभी कुशों पर हवन सामग्री रख देता तो वह उन्हें दाँतों से खींचकर अपवित्र कर देता; तब मेरे डाँटने-डपटने पर वह अत्यन्त भयभीत होकर ऋषि-कुमार के समान चुपचाप बैठ जाता था।'
तं त्वेणकुणकं कृपणं स्रोतसानूह्यमानमभि - वीक्ष्यापविद्धं बन्धुरिवानुकम्पया राजर्षिर्भरत आदाय मृतमातरमित्याश्रमपदमनयत् ॥७ ॥ तस्य ह वा एणकुणक उच्चैरेतस्मिन् अहरहस्तत्पोषणपालन-कृतनिजाभिमानस्य लालनप्रीणनानुध्यानेनात्मनियमाः सहयमाः पुरुषपरिचर्यादय एकैकशः कतिपयेनाहर्गणेन वियुज्यमानाः किल सर्व एवोदवसन् ॥
जब वे उसे देखते, तो सोचते— 'अहो! जिसकी माता सिंह के भय से मर गई थी, आज वही मृग-शिशु अपने आश्रम से बिछड़ गया है। क्या ये दीनवत्सल भगवान् नक्षत्रनाथ दयावश उसकी रक्षा कर रहे हैं?' अथवा वे सोचते कि उनके पुत्र वियोग रूपी दावानल की ज्वाला से हृदय दग्ध हो रहा है, तब ये शीतल और अमृतमयी किरणें उन्हें शान्त कर रही हैं।
इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्थाना - शनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥११ ॥ कुशकुसुमसमित्पलाश- फलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृका-दिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति || १२ || पथिषु च मुग्ध भावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप ॥१३ ॥ क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति ॥
किन्तु कुछ समय पश्चात भरत जी अत्यन्त पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे— 'अहो! बड़े खेद की बात है, मैं संयमशील महानुभावों के मार्ग से पतित हो गया! मैंने तो धैर्यपूर्वक आसक्ति छोड़कर इस पवित्र वन का आश्रय लिया था। यहाँ रहकर जिस चित्त को मैंने श्रीवासुदेव के गुणों के श्रवण, मनन और सङ्कीर्तन से स्थिर किया था, वह अज्ञानी मन अकस्मात् एक नन्हे-से हरिण-शिशु के पीछे अपने लक्ष्य से च्युत हो गया!'
एवमघटमानमनोरथाकुलहृदयो मृगदारका भासेन स्वारब्धकर्मणा योगारम्भणतो विभ्रंशितः स योगतापसो भगवदाराधनलक्षणाच्च कथमितरथा जात्यन्तर एणकुणक आसङ्गः साक्षान्निःश्रेयसप्रतिपक्षतया प्राक्परित्यक्तदुस्त्यज - हृदयाभिजातस्य तस्यैवमन्तरायविहतयोगा - रम्भणस्य राजर्षेर्भरतस्य तावन्मृगार्भकपोषण-पालनप्रीणनलालनानुषङ्गेणाविगणयत आत्मान- महिरिवाखुबिलं दुरतिक्रमः कालः करालरभस आपद्यत ॥
मृग-योनिकी प्राप्ति कराने वाले प्रारब्ध के क्षय की बाट देखते हुए, भरत जी अत्यन्त तप्यमान थे। अन्त में, उन्होंने अपने शरीर का आधा भाग गण्डकी के जल में डुबाये रखकर उस मृग शरीर को छोड़ दिया।
मनस्तत्तु इत्येवं निगूढनिर्वेदो विसृज्य मृगीं मातरं पुनः भगवत्क्षेत्रमुपशमशीलमुनिगणदयितं शालग्रामं पुलस्त्यपुलहाश्रमं कालञ्जरात्प्रत्याजगाम || ३० || तस्मिन्नपि कालं प्रतीक्षमाणः सङ्गाच्च भृशमुद्विग्न आत्मसहचरः शुष्कपर्णतृणवीरुधा वर्तमानो मृगत्वनिमित्तावसानमेव गणयन्मृगशरीरं तीर्थोदकक्लिन्नमुत्ससर्ज ॥
In English
The Life and Teachings of Rishabhadeva
King Nabhi performs a sacrifice, leading to the appearance of Lord Vishnu who promises an incarnation as Rishabhadeva. Rishabhadeva grows up to rule Ajnabhakhanda before renouncing his kingdom to teach asceticism and yoga. He eventually leaves his body through a forest fire after demonstrating total detachment from worldly life.
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Also written: Bharatacharita, Bharata, Ritvija, Merudevi, Indra, Vishnudatta, Ahankara, Agyaniyon, Shrishuka, Panchajani, Sumati, Rashtrabhrita, Sudarshana, Avarana, Dhumraketu, Sinha, भरतचरित