श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 551–560
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560
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आत्माके रूपमें होनेपर भी आप अपनेको छिपाये रखते हैं; क्योंकि आप पंचकोशरूप गुफाओंके भीतर रहते हैं । फिर भी पुरुषोत्तमके रूपमें, सबके नियन्ताके रूपमें और सबके साक्षीके रूपमें आपका अनुभव होता ही है ॥ १२ ॥ प्रभो! आप सबके अधिष्ठान और स्वयं
अधिष्ठानरहित हैं । अपने सृष्टिके प्रारम्भमें अपनी मायासे ही गुणोंकी सृष्टि की और उन गुणोंको ही स्वीकार करके आप जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय करते रहते हैं । यह सब करनेके लिये आपको अपनेसे अतिरिक्त और किसी भी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है । क्योंकि आप सर्वशक्तिमान् और सत्यसङ्कल्प हैं || १३ || वही आप दैत्य, प्रमथ और राक्षसोंका, जिन्होंने आजकल राजाओंका वेष धारण कर रखा है, विनाश करनेके लिये तथा धर्मकी मर्यादाओंकी रक्षा करनेके लिये यदुवंशमें अवतीर्ण हुए हैं ॥१४ ॥ यह बड़े आनन्दकी बात है
कि आपने खेल- ही - खेलमें घोड़ेके रूपमें रहनेवाले इस केशी दैत्यको मार डाला । इसकी हिनहिनाहटसे डरकर देवतालोग अपना स्वर्ग छोड़कर भाग जाया करते थे ॥१५ ॥
दिष्ट्या ते निहतो दैत्यो लीलयायं हयाकृतिः ।
यस्य हेषितसंत्रस्तास्त्यजन्त्यनिमिषा दिवम् ॥१५
चाणूरं मुष्टिकं चैव मल्लानन्यांश्च हस्तिनम् ।
कंसं च निहतं द्रक्ष्ये परश्वोऽहनि ते विभो ॥ १६
तस्यानु शंखयवनमुराणां नरकस्य च ।
पारिजातापहरणमिन्द्रस्य च पराजयम् ॥१७
उद्वाहं वीरकन्यानां वीर्यशुल्कादिलक्षणम् ।
नृगस्य मोक्षणं पापाद् द्वारकायां जगत्पते ॥ १८
स्यमन्तकस्य च मणेरादानं सह भार्यया ।
मृतपुत्रप्रदानं च ब्राह्मणस्य स्वधामतः ॥१९
पौण्ड्रकस्य वधं पश्चात् काशिपुर्याश्च दीपनम् ।
दन्तवक्त्रस्य निधनं चैद्यस्य च महाक्रतौ ॥२०
यानि चान्यानि वीर्याणि द्वारकामावसन् भवान् ।
कर्ता द्रक्ष्याम्यहं तानि गेयानि कविभिर्भुवि ॥२१
अथ ते कालरूपस्य क्षपयिष्णोरमुष्य वै ।
अक्षौहिणीनां निधनं द्रक्ष्याम्यर्जुनसारथेः ॥२२
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विशुद्धविज्ञानघनं स्वसंस्थया समाप्तसर्वार्थममोघवांछितम् । प्रभो! अब परसों मैं आपके हाथों चाणूर, मुष्टिक, दूसरे पहलवान, कुवलयापीड हाथी और स्वयं कंसको भी मरते देखूँगा ॥१६ ॥
उसके बाद शंखासुर, कालयवन, मुर और नरकासुरका वध देखूँगा । आप स्वर्गसे कल्पवृक्ष उखाड़ लायेंगे और इन्द्रके चीं - चपड़ करनेपर उनको उसका मजा चखायेंगे ॥१७ ॥
आप अपनी कृपा, वीरता, सौन्दर्य आदिका शुल्क देकर वीर- कन्याओंसे विवाह करेंगे, और जगदीश्वर! आप द्वारकामें रहते हुए नृगको पापसे छुड़ायेंगे ॥१८ ॥
आप जाम्बवतीके साथ स्यमन्तक मणिको जाम्बवान्से ले आयेंगे और अपने धामसे ब्राह्मणके मरे हुए पुत्रोंको ला देंगे ॥१९ ॥
इसके पश्चात् आप पौण्ड्रक - मिथ्यावासुदेवका वध करेंगे। काशीपुरीको जला देंगे । युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें चेदिराज शिशुपालको और वहाँसे लौटते समय उसके मौसेरे भाई दन्तवक्त्रको नष्ट करेंगे ॥ २० ॥
प्रभो! द्वारकामें निवास करते समय आप और भी बहुत - से पराक्रम प्रकट करेंगे जिन्हें पृथ्वीके बड़े- बड़े ज्ञानी और प्रतिभाशील पुरुष आगे चलकर गायेंगे । मैं वह सब देखूँगा ॥२१ ॥
इसके बाद आप पृथ्वीका भार उतारनेके लिये कालरूपसे अर्जुनके सारथि बनेंगे और
अनेक अक्षौहिणी सेनाका संहार करेंगे। यह सब मैं अपनी आँखोंसे देखूँगा ॥२२ ॥
प्रभो! आप विशुद्ध विज्ञानघन हैं । आपके स्वरूपमें और किसीका अस्तित्व है ही नहीं । आप नित्य-निरन्तर अपने परमानन्दस्वरूपमें स्थित रहते हैं । इसलिये सारे पदार्थ आपको नित्य प्राप्त ही हैं । आपका संकल्प अमोघ है । आपकी चिन्मयी शक्तिके सामने माया और मायासे होनेवाला यह त्रिगुणमय संसार-चक्र नित्यनिवृत्त है— कभी हुआ ही नहीं । ऐसे आप अखण्ड, एकरस, सच्चिदानन्दस्वरूप, निरतिशय ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान्की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥२३ ॥
स्वतेजसा नित्यनिवृत्तमाया- गुणप्रवाहं भगवन्तमीमहि ॥२३ त्वामीश्वरं स्वाश्रयमात्ममायया विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम् । क्रीडार्थमद्यात्तमनुष्यविग्रहं नतोऽस्मि धुर्यं यदुवृष्णिसात्वताम् ॥२४ श्रीशुक उवाच
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एवं यदुपतिं कृष्णं भागवतप्रवरो मुनिः ।
प्रणिपत्याभ्यनुज्ञातो ययौ तद्दर्शनोत्सवः ॥२५
भगवानपि गोविन्दो हत्वा केशिनमाहवे ।
पशूनपालयत् पालैः प्रीतैर्व्रजसुखावहः ॥२६
एकदा ते पशून् पालाश्चारयन्तोऽद्रिसानुषु ।
चक्रुर्निलायनक्रीडाश्चोरपालापदेशतः ॥२७
तत्रासन् कतिचिच्चोराः पालाश्च कतिचिन्नृप ।
मेषायिताश्च तत्रैके विजहुरकुतोभयाः ॥२८
मयपुत्रो महामायो व्योमो गोपालवेषधृक् ।
मेषायितानपोवाह प्रायश्चोरायितो बहून् ॥२९
गिरिदर्यां विनिक्षिप्य नीतं नीतं महासुरः ।
शिलया पिदधे द्वारं चतुःपंचावशेषिताः ॥३०
आप सबके अन्तर्यामी और नियन्ता हैं । अपने - आपमें स्थित, परम स्वतन्त्र हैं । जगत् और उसके अशेष विशेषों – भाव- अभावरूप सारे भेद - विभेदोंकी कल्पना केवल आपकी मायासे ही हुई है । इस समय अपने अपनी लीला प्रकट करनेके लिये मनुष्यका- सा श्रीविग्रह प्रकट किया है और आप यदु, वृष्णि तथा सात्वतवंशियोंके शिरोमणि बने हैं । प्रभो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ' ॥२४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान्के परमप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीने इस प्रकार भगवान्की स्तुति और प्रणाम किया । भगवान्के दर्शनोंके आह्लादसे नारदजीका रोम-रोम खिल उठा । तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्त करके वे चले गये ॥२५ ॥
इधर भगवान् श्रीकृष्ण केशीको लड़ाईमें मारकर फिर अपने प्रेमी एवं प्रसन्नचित्त ग्वाल-बालोंके साथ पूर्ववत् पशु- पालनके काममें लग गये तथा व्रजवासियोंको परमानन्द वितरण करने लगे || २६ || एक समय वे सब ग्वालबाल पहाड़की चोटियोंपर गाय आदि पशुओंको चरा रहे थे तथा कुछ चोर और कुछ रक्षक बनकर छिपने -छिपानेका - लुका- लुकीका खेल खेल रहे ॥२७ ॥
राजन्! उन लोगोंमेंसे कुछ तो चोर और कुछ रक्षक तथा कुछ भेड़ बन गये थे । इस प्रकार वे निर्भय होकर खेलमें रम गये थे ॥ २८ । । उसी समय ग्वालका वेष धारण करके व्योमासुर वहाँ आया । वह मायावियोंके आचार्य
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मयासुरका पुत्र था और स्वयं भी बड़ा मायावी था । वह खेलमें बहुधा चोर ही बनता और भेड़ बने हुए बहुत - से बालकोंको चुराकर छिपा आता ॥२९ ॥
वह महान् असुर बार- बार उन्हें ले जाकर एक पहाड़की गुफामें डाल देता और उसका दरवाजा एक बड़ी चट्टानसे ढक देता । इस प्रकार ग्वालबालोंमें केवल चार- पाँच बालक ही बच रहे ॥३० ॥
तस्य तत् कर्म विज्ञाय कृष्णः शरणदः सताम् ।
गोपान् नयन्तं जग्राह वृकं हरिरिवौजसा ॥३१
स निजं रूपमास्थाय गिरीन्द्रसदृशं बली ।
इच्छन् विमोक्तुमात्मानं नाशक्नोद् ग्रहणातुरः ॥३२
तं निगृह्याच्युत दोर्भ्यां पातयित्वा महीतले ।
पश्यतां दिवि देवानां पशुमारममारयत् ॥३३
गुहापिधानं निर्भिद्य गोपान् निःसार्य कृच्छ्रतः ।
स्तूयमानः सुरैर्गोपैः प्रविवेश स्वगोकुलम् ॥३४
भक्तवत्सल भगवान् उसकी यह करतूत जान गये । जिस समय वह ग्वालबालोंको लिये जा रहा था, उसी समय उन्होंने, जैसे सिंह भेड़ियेको दबोच ले उसी प्रकार, उसे धर दबाया ॥३१ ॥
व्योमासुर बड़ा बली था । उसने पहाड़के समान अपना असली रूप प्रकट कर दिया और चाहा कि अपनेको छुड़ा लूँ । परन्तु भगवान्ने उसको इस प्रकार अपने शिकंजेमें फाँस लिया था कि वह अपनेको छुड़ा न सका ॥३२ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने अपने दोनों हाथोंसे जकड़कर उसे भूमिपर गिरा दिया और पशुकी भाँति गला घोंटकर मार डाला । देवतालोग विमानोंपर चढ़कर उनकी यह लीला देख रहे थे ॥३३ ॥
अब भगवान् श्रीकृष्णने गुफाके द्वारपर लगे हुए चट्टानोंके पिहान तोड़ डाले और ग्वालबालोंको उस संकटपूर्ण स्थानसे निकाल लिया । बड़े- बड़े देवता और ग्वालबाल उनकी स्तुति करने लगे और भगवान् श्रीकृष्ण व्रजमें चले आये ॥३४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे व्योमासुरवधो नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥३७ ॥
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. सुविस्मितैः पद्मभवादिभिः सुरैः प्रसू० । :
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अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः अक्रूरजीकी व्रजयात्रा श्रीशुक उवाच
अक्रूरोऽपि च तां रात्रिं मधुपुर्यां महामतिः ।
उषित्वा रथमास्थाय प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥१
गच्छन् पथि महाभागो भगवत्यम्बुजेक्षणे ।
भक्तिं परामुपगत एवमेतदचिन्तयत् ॥२
किं मयाऽऽचरितं भद्रं किं तप्तं परमं तपः ।
किं वाथाप्यर्हते दत्तं यद् द्रक्ष्याम्यद्य केशवम् ॥३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! महामति अक्रूरजी भी वह रात मथुरापुरीमें बिताकर प्रातःकाल होते ही रथपर सवार हुए और नन्दबाबाके गोकुलकी ओर चल दिये ॥१ ॥ परम
भाग्यवान् अक्रूरजी व्रजकी यात्रा करते समय मार्गमें कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी परम प्रेममयी भक्तिसे परिपूर्ण हो गये । वे इस प्रकार सोचने लगे - ॥२ ॥ ' मैंने ऐसा कौन- सा शुभ
कर्म किया है, ऐसी कौन-सी श्रेष्ठ तपस्या की है अथवा किसी सत्पात्रको ऐसा कौन- सा महत्त्वपूर्ण दान दिया है जिसके फलस्वरूप आज मैं भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन करूँगा ॥३ ॥
ममैतद् दुर्लभं मन्य उत्तमश्लोकदर्शनम् ।
विषयात्मनो यथा ब्रह्मकीर्तनं शूद्रजन्मनः ॥४
मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम् ।
ह्रियमाणः कालनद्या क्वचित्तरति कश्चन ॥५
ममाद्यामंगलं नष्टं फलवांश्चैव मे भवः ।
यन्नमस्ये भगवतो योगिध्येयाङ्घ्रिपंकजम् ॥६
कंसो बताद्याकृत मेऽत्यनुग्रहं द्रक्ष्येऽङ्घ्रिपद्मं प्रहितोऽमुना हरेः । कृतावतारस्य दुरत्ययं तमः पूर्वेऽतरन् यन्नखमण्डलत्विषा ॥७ यदर्चितं ब्रह्मभवादिभिः सुरैः श्रिया च देव्या मुनिभिः ससात्वतैः । गोचारणायानुचरैश्चरद्वने
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यद् गोपिकानां कुचकुंकुमाङ्कितम् ॥८ द्रक्ष्यामि नूनं सुकपोलनासिकं स्मितावलोकारुणकञ्चलोचनम् । मुखं मुकुन्दस्य गुडालकावृतं प्रदक्षिणं मे प्रचरन्ति वै मृगाः ॥९ मैं बड़ा विषयी हूँ। ऐसी स्थितिमें, बड़े - बड़े सात्त्विक पुरुष भी जिनके गुणोंका ही गान करते रहते हैं, दर्शन नहीं कर पाते – उन भगवान्के दर्शन मेरे लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं, ठीक वैसे ही, जैसे शूद्रकुलके बालकके लिये वेदोंका कीर्तन ॥४ ॥ परंतु नहीं, मुझ अधमको भी
भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन होंगे ही । क्योंकि जैसे नदीमें बहते हुए तिनके कभी - कभी इस पारसे उस पार लग जाते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहसे भी कहीं कोई इस संसारसागरको पार कर सकता है ॥५ ॥ अवश्य ही आज मेरे सारे अशुभ नष्ट हो गये । आज मेरा जन्म सफल हो
गया । क्योंकि आज मैं भगवान्के उन चरणकमलोंमें साक्षात् नमस्कार करूँगा, जो बड़े - बड़े योगी- यतियोंके भी केवल ध्यानके ही विषय हैं ॥६ ॥ अहो! कंसने तो आज मेरे ऊपर बड़ी
ही कृपा की है । उसी कंसके भेजनेसे मैं इस भूतलपर अवतीर्ण स्वयं भगवान्के चरणकमलोंके दर्शन पाऊँगा। जिनके नखमण्डलकी कान्तिका ध्यान करके पहले युगोंके ऋषि- महर्षि इस अज्ञानरूप अपार अन्धकार- राशिको पार कर चुके हैं, स्वयं वही भगवान् तो अवतार ग्रहण करके प्रकट हुए हैं || ७ || ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र आदि बड़े - बड़े देवता जिन चरणकमलोंकी उपासना करते रहते हैं, स्वयं भगवती लक्ष्मी एक क्षणके लिये भी जिनकी सेवा नहीं छोड़तीं, प्रेमी भक्तोंके साथ बड़े - बड़े ज्ञानी भी जिनकी आराधनामें संलग्न रहते हैं —भगवान्के वे ही चरणकमल गौओंको चरानेके लिये ग्वालबालोंके साथ वन - वनमें विचरते हैं । वे ही सुर- मुनि-वन्दित श्रीचरण गोपियोंके वक्षः -स्थलपर लगी हुई केसरसे रँग जाते हैं, चिह्नित हो जाते हैं, ॥८ ॥ मैं अवश्य- अवश्य उनका दर्शन करूंगा। मरकतमणिके समान
सुस्निग्ध कान्तिमान् उनके कोमल कपोल हैं, तोतेकी ठोरके समान नुकीली नासिका है, होठोंपर मन्द मन्द मुसकान, प्रेमभरी चितवन, कमल से कोमल रतनारे लोचन और कपोलोंपर घुँघराली अलकें लटक रही हैं। मैं प्रेम और मुक्तिके परम दानी श्रीमुकुन्दके उस मुखकमलका आज अवश्य दर्शन करूंगा । क्योंकि हरिन मेरी दायीं ओरसे निकल रहे हैं ॥९ ॥ भगवान् विष्णु पृथ्वीका भार उतारनेके लिये स्वेच्छासे मनुष्यकी- सी लीला कर रहे
हैं! वे सम्पूर्ण लावण्यके धाम हैं । सौन्दर्यकी मूर्तिमान् निधि हैं। आज मुझे उन्हींका दर्शन होगा! अवश्य होगा! आज मुझे सहजमें ही आँखोंका फल मिल जायगा ॥१० ॥ भगवान् इस
कार्य - कारणरूप जगत्के द्रष्टामात्र हैं, और ऐसा होनेपर भी द्रष्टापनका अहंकार उन्हें छूतक नहीं गया है । उनकी चिन्मयी शक्तिसे अज्ञानके कारण होनेवाला भेदभ्रम अज्ञानसहित दूरसे ही निरस्त रहता है । वे अपनी योगमायासे ही अपने - आपमें भूविलासमात्रसे प्राण, इन्द्रिय और बुद्धि आदिके सहित अपने स्वरूपभूत जीवोंकी रचना कर लेते हैं और उनके साथ वृन्दावनकी कुंजोंमें तथा गोपियोंके घरोंमें तरह- तरहकी लीलाएँ करते हुए प्रतीत होते
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हैं ॥११ ॥ जब समस्त पापोंके नाशक उनके परम मंगलमय गुण, कर्म और जन्मकी
लीलाओंसे युक्त होकर वाणी उनका गान करती है, तब उस गानसे संसारमें जीवनकी स्फूर्ति होने लगती है, शोभाका संचार हो जाता है, सारी अपवित्रताएँ धुलकर पवित्रताका साम्राज्य छा जाता है; परन्तु जिस वाणीसे उनके गुण, लीला और जन्मकी कथाएँ नहीं गायी जातीं, वह तो मुर्दोंको ही शोभित करनेवाली है, होनेपर भी नहींके समान- व्यर्थ है ॥१२ ॥ जिनके
गुणगानका ही ऐसा माहात्म्य है, वे ही भगवान् स्वयं यदुवंशमें अवतीर्ण हुए हैं । किसलिये? अपनी ही बनायी मर्यादाका पालन करनेवाले श्रेष्ठ देवताओंका कल्याण करनेके लिये । वे ही परम ऐश्वर्यशाली भगवान् आज व्रजमें निवास कर रहे हैं और वहींसे अपने यशका विस्तार कर रहे हैं उनका यश कितना पवित्र है! अहो, देवतालोग भी उस सम्पूर्ण मंगलमय यशका गान करते रहते हैं ॥१३ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि आज मैं अवश्य ही उन्हें देखूँगा । वे बड़े - बड़े
संतों और लोकपालोंके भी एकमात्र आश्रय हैं । सबके परम गुरु हैं । और उनका रूप- सौन्दर्य तीनों लोकोंके मनको मोह लेनेवाला है । जो नेत्रवाले हैं उनके लिये वह आनन्द और रसकी चरम सीमा है । इसीसे स्वयं लक्ष्मीजी भी, जो सौन्दर्यकी अधीश्वरी हैं, उन्हें पानेके लिये ललकती रहती हैं । हाँ, तो मैं उन्हें अवश्य देखूँगा । क्योंकि आज मेरा मंगल- प्रभात है, आज मुझे प्रातःकालसे ही अच्छे- अच्छे शकुन दीख रहे हैं ॥१४ ॥ जब मैं उन्हें देखूँगा तब सर्वश्रेष्ठ
पुरुष बलराम तथा श्रीकृष्णके चरणोंमें नमस्कार करनेके लिये तुरंत रथसे कूद पडूंगा । उनके चरण पकड़ लूँगा । ओह! उनके चरण कितने दुर्लभ हैं! बड़े -बड़े योगी -यति आत्म-साक्षात्कारके लिये मन- ही- मन अपने हृदयमें उनके चरणोंकी धारणा करते हैं और मैं तो उन्हें प्रत्यक्ष पा जाऊँगा और लोट जाऊँगा उनपर । उन दोनोंके साथ ही उनके वनवासी सखा एक-एक ग्वालबालके चरणोंकी भी वन्दना करूँगा ॥१५ ॥ मेरे अहोभाग्य! जब मैं उनके चरण- कमलोंमें गिर जाऊँगा, तब क्या वे अपना करकमल मेरे सिरपर रख देंगे? उनके वे करकमल
उन लोगोंको सदाके लिये अभयदान दे चुके हैं, जो कालरूपी साँपके भयसे अत्यन्त घबड़ाकर उनकी शरण चाहते और शरणमें आ जाते हैं || १६ || इन्द्र तथा दैत्यराज बलिने भगवान्के उन्हीं करकमलोंमें पूजाकी भेंट समर्पित करके तीनों लोकोंका प्रभुत्व —–इन्द्रपद प्राप्त कर लिया । भगवान्के उन्हीं करकमलोंने, जिनमेंसे दिव्य कमलकी - सी सुगन्ध आया करती है, अपने स्पर्शसे रासलीलाके समय व्रजयुवतियोंकी सारी थकान मिटा दी थी ॥ १७ ॥
मैं कंसका दूत हूँ । उसीके भेजनेसे उनके पास जा रहा हूँ। कहीं वे मुझे अपना शत्रु तो न समझ बैठेंगे? राम - राम! वे ऐसा कदापि नहीं समझ सकते । क्योंकि वे निर्विकार हैं, सम हैं, अच्युत हैं, सारे विश्वके साक्षी हैं, सर्वज्ञ हैं, वे चित्तके बाहर भी हैं और भीतर भी । वे क्षेत्रज्ञरूपसे स्थित होकर अन्तःकरणकी एक-एक चेष्टाको अपनी निर्मल ज्ञान- दृष्टिके द्वारा देखते रहते हैं ॥१८ ॥ तब मेरी शंका व्यर्थ है। अवश्य ही मैं उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर
विनीतभावसे खड़ा हो जाऊँगा । वे मुसकराते हुए दया भरी स्निग्ध दृष्टिसे मेरी ओर देखेंगे । उस समय मेरे जन्म -जन्मके समस्त अशुभ संस्कार उसी क्षण नष्ट हो जायँगे और मैं निःशंक होकर सदाके लिये परमानन्दमें मग्न हो जाऊँगा ॥१९ ॥
अद्य विष्णोर्मनुजत्वमीयुषो
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भारावताराय भुवो निजेच्छया । लावण्यधाम्नो भवितोपलम्भनं मह्यं न न स्यात् फलमञ्जसा दृशः ॥१० य ईक्षिताहंरहितोऽप्यसत्सतोः स्वतेजसापास्ततमोभिदाभ्रमः । स्वमाययाऽऽत्मन् रचितैस्तदीक्षया प्राणाक्षधीभिः सदनेष्वभीयते ॥११ यस्याखिलामीवहभिः सुमङ्गले- र्वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः । प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगद् यास्तद्विरक्ताः शवशोभना मताः ॥१२ स चावतीर्णः किल सात्वतान्वये स्वसेतुपालामरवर्यशर्मकृत् । यशो वितन्वन् व्रज आस्त ईश्वरो गायन्ति देवा यदशेषमङ्गलम् ॥१३ तं वद्य नूनं महतां गतिं गुरुं त्रैलोक्यकान्तं दृशिमन्महोत्सवम् । रूपं दधानं श्रिय ईप्सितास्पदं द्रक्ष्ये ममासन्नुषसः सुदर्शनाः ॥ १४ अथावरूढः सपदीशयो रथात् प्रधानपुंसोश्चरणं स्वलब्धये । धिया धृतं योगिभिरप्यहं ध्रुवं नमस्य आभ्यां च सखीन् वनौकसः ॥१५ अप्यङ्घ्रिमूले पतितस्य मे विभुः शिरस्यधास्यन्निजहस्तपंकजम् । दत्ताभयं कालभुजंगरंहसा प्रोद्वेजितानां शरणैषिणां नृणाम् ॥१६ समर्हणं यत्र निधाय कौशिक-
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स्तथा बलिश्चाप जगत्त्रयेन्द्रताम् । यद् वा विहारे व्रजयोषितां श्रमं स्पर्शेन सौगन्धिकगन्ध्यपानुदत् ॥ १७ न मय्युपैष्यत्यरिबुद्धिमच्युतः कंसस्य दूतः प्रहितोऽपि विश्वदृक् । योऽन्तर्बहिश्चेतस एतदीहितं क्षेत्रज्ञ ईक्षत्यमलेन चक्षुषा ॥१८ अप्यङ्घ्रिमूलेऽवहितं कृतांजलिं मामीक्षिता सस्मितमार्द्रया दृशा । सपद्यपध्वस्तसमस्तकिल्बिषो वोढा मुदं वीतविशंक ऊर्जिताम् ॥१९ सुहृत्तमं ज्ञातिमनन्यदैवतं दोर्भ्यां बृहद्भयां परिरप्स्यतेऽथ माम् । आत्मा हि तीर्थीक्रियते तदैव मे बन्धश्च कर्मात्मक उच्छ्वसित्यतः ॥२० लब्धांगसंगं प्रणतं कृतांजलिं मां वक्ष्यतेऽक्रूर ततेत्युरुश्रवाः । तदा वयं जन्मभृतो महीयसा नैवादृतो यो धिगमुष्य जन्म तत् ॥२१ न तस्य कश्चिद् दयितः सुहृत्तमो न चाप्रियो द्वेष्य उपेक्ष्य एव वा । तथापि भक्तान् भजते यथा तथा सुरद्रुमो यद्वदुपाश्रितोऽर्थदः ॥ २२ किंचाग्रजो मावनतं यदूत्तमः स्मयन् परिष्वज्य गृहीतमंजलौ । गृहं प्रवेश्याप्तसमस्तसत्कृतं संप्रक्ष्यते कंसकृतं स्वबन्धुषु ॥२३ श्रीशुक उवाच इति सञ्चिन्तयन् कृष्णं श्वफल्कतनयोऽध्वनि ।