श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 171–180

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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सुश्रुतसंहिता ११६

दूतैरनिष्ट्टैत्तुल्यानामशस्तं दर्शनं नृणाम् ।

कृलत्यतिलकार्पासतुपपाषाणभस्मनाम् ॥ ३८ ॥

पात्रं नेष्टं तथाऽङ्गारतैलमपूरितम् ।

प्रसन्नेतरमद्यानां पूर्ण वा रक्तसर्पपैः ॥ ३६ ॥

शत्रकाटपलाशानां शुष्काणां पथि सङ्गमाः । नेप्यन्ते पतितान्तत्यदीनान्धरिपवस्तथा ॥ ४० ॥ ]

मृदुः शीतोऽनुकूलञ्च सुगन्धिश्चानिलः शुभः ।

खरोष्णोऽनिष्टगन्धञ्च प्रतिलोमा गहित ॥ ४१ ॥।

इसी प्रकार निन्दित दूतों के समान अन्य अनिष्ट मनुष्यों । के दर्शन भी बुरे हैं । कुलथी, निल, कपास, तुप, पापाग, राख्न इनसे भरे पात्र एवं जलते कोपले तेल और कीचड से भरे पात्र का दीखना शुभ है । प्रसन्ना के अतिरिक्त अन्य मद्यों से या रकपप से भरा पात्र शुभ नहीं है । रोगी के घर जाते समय रास्ते में मुद्दों, लकड़ियां, चुने हुये पलाश ( टाक ) का मिलना श्रेष्ठ नहीं है तथा दुराचारी, चाण्डाल, दीन, अंबे और शत्रुओं । का रास्ते में मिलना श्रेष्ट नहीं है । कोमल, शीतल, अनुकूल तथा सुगन्धित वायु का बहना शुभ होना है तथा रून, गरम, दुर्गन्वित और प्रतिलोम हवा निन्दित है ॥ ३८-२६ ॥

ग्रन्थ्यर्बुदादिषु सदा छेदशब्दस्तु पूजितः ।

विद्रव्युदरगुल्मेषु भेदशब्दस्तथैव च ॥ ४२ ॥

रक्तपित्तातिसारेषु रुद्धशब्दः प्रशस्यते ।

एवं व्याविविशेषेण निमित्तमुपचारयेत् ॥ १३ ॥

तथैाक्रुष्टहाकष्टमानन्दरुद्वितत्वना ।

द्य बातपुरीषाणां शब्दो वै गईभोष्ट्र्योः ॥ १४ ॥

ग्रन्थि तथा अर्बुद यदि रोगों में छेद्य वाचक शब्द का बोलना शुभ होता है । विद्रधि, जलोदर और गुल्म रोगों में मेद शब्द का बोलना श्रेष्ठ है । रक्तपित्त और अतिसार में द शब्द होता है । इसी प्रकार विशिष्ट व्याधियों में तदनु-कूल विष्ट निमित्च का निश्चय करना चाहिये । वैसे ही आष्ट ( और से चिहाना ), हा कष्ट ( हाय हाय ग्र ) करना, आक्रन्दन ( जोर से रुदन ), साधारण रदन, बात और नल के निकलने के शब्द एवं गढ़द्दे और कर का शब्द चमन रोग में नहीं है || 2२-22 || विमर्श: -टाइम शुभाशुभशन्धः न्युरादिषु प्रव-नचन्छ, मन्त्रत्र च चिल्यावर वर्षमान्यानाऽचत्रमशिवाय शब्दान्यगविलाः । विप्रहारच्छेनेट-ब्राहहाश - द्विषेगदिकष्त्राविचिन्नाद्विनेदार इन्दुकानपि यथा पान्डुरोगे शून्यः कशः वा दिन ।

प्रतिषिद्धं तथा भग्नं क्षुतं स्वलितमाहतम् ।

दोर्मनत्यञ्च वैद्यत्त्व यात्रायां न प्रशस्यते ॥ ४५ ॥

प्रवेशेऽप्येतदुद्देशाढ्वेच्यं च तथाऽऽतुरे ।

प्रतिहारं गृहे वस्त्र पुनरेवन्न गएयते ॥ ४६ ॥

केशभरमास्थिकाष्टारमतुपका सिकण्टकाः ।

खट्वे र्ध्वपादा मद्यापो बसा तैलं विलास्तृणम् ॥ ४७ ॥

नपुंसकव्यङ्गभन्ननन्नमुण्डासिताम्बरा. ।

प्रस्थाने व प्रवेशे वा नेप्यन्ते दर्शनं गताः ॥ ४८ ॥

रोगी को देखने जाते समय किसी के द्वारा वैद्य को शनि-पिढ ( मना ) करना, शरीर में या किसी भी आस - पास की वस्तु का भग्न होना, छींक होना, हाथ - पैर से कोई वस्तु या आनूपग का गिर जाना, आघात होना तथा किसी के भी मन की क्लुपता होना ये भाव शुभ नहीं हैं । रोगी के गृह में प्रवेश करते समय भी उक्त प्रकार के शुभाशुभ लक्षणों का विचार करना चाहिये । रोगी को देखते समय भी ऐसे ही | भावों का ध्यान रखें किन्तु प्रवेश करने के मुख्य कं पश्चात, भीतरी अनेक दरवाजों पर इनका विचार रखना आवश्यक नहीं है । कंा, भस्म, अस्थि, काट, पत्थर, तुप, कपाम, काटे, ऊंच पांच की हुई गायें, मद्यपी, रवी, तेल, तिल, घास, नपुंसक, नामा, वर्ग छिन्न होने से विवाह व्यक्ति, अस्यादि भन्न व्यक्ति, नंगा, मुंडमुटाया और काले कपडे पहना हुआ व्यक्ति ये वैद्य के रोगी को देखने के लिये प्रस्थान करते समय तथा रोगी के गृह में प्रवेश करते समय दिखाई दें तो शुभ नहीं हैं ॥ ४४-२८ ॥

भाण्डानां सङ्करस्थानां स्थानात् सञ्चरणं तथा ।

निखातोत्पाटनं भङ्गः पतनं निर्गमत्तथा ॥ ४ ॥

वैद्यासनावसादो वा रोगी वा स्वादधोमुखः ।

वैद्यं सम्भापमा गोऽङ्गं क्रुड्यमास्तरणानि वा ॥ ५० ॥।

प्रमृज्यादा घुनीयाहा की पृष्टं शिरस्तथा ।

हस्तं चाकृष्य वैद्यत्य न्यसेच्छिसि चोरसि ॥ ५१ ॥

यो वैद्यमुन्मुखः पृच्छेदुन्मार्ष्टि स्वाद्गमातुर्ः ।

न स सिध्यति वैद्यो द्या गृहे यत्य न पूज्यते ॥ ५२ ॥

भवने पूज्यते वाऽपि चत्य वैद्यः स सिध्यति ।

शुभं शुभेषु दूतादिष्वशुभं हाशुभेषु च ॥

आतुरस्य ध्रु बंतरमाद् दूतादीन् लक्षवेद्भिषक् ॥ ५३ ॥

लग के निवासस्थान में एक स्थान में सहर ( सहित ) किये हुये पात्रों का गिरना, पृथ्वी का खोदना, किसी वस्तु का उखाड़ना, भट्ट होना, गिरना या घर से निकल जाना वैद्य वहां जा कर जिस आसन पर बैठे उसका टूट जाना अथवा | उस समय रोगी अधोमुख करके सोया हुआ हो, अथवा वह रोगी वैद्य के साथ बातचीत करता हुआ अपने अंग, भिचितथा त्रिछोने को रगड़ता रहे । हाय, गिर और पीठ को हिलावे, वैद्य के हाथ को खींच कर अपने शिर और छाती पर रखे तथा रोगी अपने मुख को ऊपर या आसमान की ओर करके वैद्य से प्रश्न करे किंवा अपने शरीर को साफ करता हो तथा वैद्य की उस घर में उत्तम सम्भाषण, बैठने को शासन या कुर्सी | देना इत्यादि रूप से सत्कार न होता हो तोटस रोगी के रोगकी अच्छा होने रूपी सिद्धि नहीं होती है । जिसके घर में वैद्य का सत्कार होता है वह रोगी ठीक हो जाता है । दूत तथा अन्य भावों के शुभ होने से रोगी का शुभ तथा इनके अशुभ होने से रोगी का अशुभ निश्चित ही होता है इसलिये भिषक् दूतादि की अवश्य परीक्षा करे ॥ ४ ९ -२६ ॥ विमर्शः काव्यानाम् — नन्वन्यत्रेति सङ्करो नाण्डाधारः, नत्रस्थाना माण्डानां सहारण पनन चरकेऽपि आतुरस्य

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श्रध्यायः २ ९ ] सूत्रस्थानम् । ११६ गृहे यस्य भिद्यन्ते वा पतन्ति वा । अतिमात्रममत्राणि दुर्लभ तस्य जीवितम् ॥ प्रवेशे चातुरगृहात्पूर्वोक्तमाङ्गल्यनिर्गम । ( अ ० सं ० ) । प्रवेशे पूर्णकुम्भाग्निमृद्वीजफलसर्पिषाम् । वृपब्राह्मणरत्नान्नदेवताना विनिर्गतिम् ॥ ( चरक )

स्वप्नानतः प्रवक्ष्यामि मरणाय शुभाय च ।

सुहृदो यांश्च पश्यन्ति व्याधितो वा स्वयं तथा ॥५४ ॥

अब यहां से मरण के सूचक तथा शुभसूचक स्वप्नों को कहते हैं जिन्हें रोगी के मित्र देखते है अथवा रोगी स्वयं देखता है ॥ ५४ ॥

विमर्शः - स्वप्नविचार --- नातिप्रसुप्तः पुरुष सफलानफला-नपि । इन्द्रियेशेन मनसा स्वप्नान् पश्यत्यनेकधा ॥ ( चरक ) । स्वप्नभेदाः- दृष्ट श्रुनानुभूत प्रार्थित कल्पितं तथा । भाविक दोषज-चैव स्वप्न सप्तविध विदुः ॥ सफल निष्फलस्वप्नाः - तेष्वाद्या निष्फला पञ्च यथास्त्रप्रकृतिर्दिवा । विस्मृतो दीर्घहस्त्रोऽति । ( वाग्भट ) । दृष्ट प्र्थमरात्रे य. स्त्रघ्न ' सोऽल्पफलो भवेत् । न स्वपेद्य. पुनर्दृष्ट्वा स सद्य स्यान्महाफल ॥ अकल्याणमपि स्वप्न दृष्ट्वा तत्रैव यः पुन ।

पश्येत् सौम्य शुभाकार तस्य विद्याच्छुभ फलम् ॥ ( चरक ) ।

स्नेहाभ्यक्तशरीरस्तु करभव्यालगर्दभैः ॥ ५५ ॥

वराहैर्महिषैर्वाऽपि यो यायाद्दक्षिणामुखः ।

रक्ताम्बरधरा कृष्णा हसन्ती मुक्तमूर्द्धजा ॥ ५६ ॥

यं वा कर्षति वृद्धा स्त्री नृत्यन्ती दक्षिणामुखम् ।

अन्तावसायिभिर्यो वाऽऽकृष्यते दक्षिणामुखः ॥ ५७ ॥

परिष्वजेरन् यं वाऽपि प्रेताः प्रव्रजितास्तथा ।

मुहुराघ्रायते यस्तु श्वापदैर्विकृताननैः ॥ ५८ ॥

पिवेन्मधु च तैलञ्च यो वा पते ऽवसीदति ।

प्रदिग्धगात्रो वा प्रनृत्येत् प्रहसेत्तथा ॥ ५६ ॥

निरम्बरश्च यो रक्तां धारयेच्छिरसि स्रजम् ।

यस्य वंशो नलो वाऽपि तालो वोरसि जायते ॥ ६० ॥

यं वा मत्स्योद्यो वा जननीं प्रविशेन्नरः ।

पर्वताप्रात् पतेद् यो वा श्वभ्रे वा तमसाऽऽवृते ॥ ६१ ॥

हियते स्रोतसा यो वा यो वा मौण्ड्यमवाप्नुयात् । पराजीयेत बध्येत काकाद्यैर्वाऽभिभूयते ॥ ६२ ॥ '

पतनं तारकादीनां प्रणाशं दीपचक्षुपोः ।

यः पश्येदेवतानां वा प्रकम्पमवनेस्तथा ॥ ६३ ॥

यस्य च्छर्दिर्विरेको वा दशना प्रपतन्ति वा ।

शाल्मलीं किंशुकं यूपं वल्मीकं पारिभद्रकम् ॥ ६४ ॥

पुष्पाढ्यं कोविदारं वा चितां वा योऽधिरोहति ।

कार्पासतैलपिण्या कलोहानि लवणं तिलान् ॥ ६५ ॥

लभेताश्नीत वा पक्कमन्नं यश्च पिवेत् सुराम् ।

स्वस्थः स लभते व्याधिं व्याधितो मृत्युमृच्छति ॥ ६६ ॥

जो पुरुष अपने शरीर में तैल का अभ्यस कर उष्टू, हिंस्रक पशु, गधा, वराह, भैंसा इनके द्वारा दक्षिण दिशा की ओर ले जाया जावे तथा लाल कपडे पहनी हुई, काले वर्ण की, हंसती हुई, खुले केशवाली तथा नाचती हुई स्त्री जिस पुरुष को बांध कर दक्षिण दिशा की तरफ खींचती हो अथवा जो | मनुष्य अन्त्यजों ( शूद्धों ) के द्वारा दक्षिण दिशा की तरफ खींचा जा रहा है जिस पुरुष को स्वप्न में मरे हुये मनुष्य अथवा संन्यासी आलिङ्गन करे । जो मनुष्य विकराल मुख वाले व्याघ्रादि श्वापदों से सूंघा जा रहा हो । जो मनुष्य शहद या तैल का पान करता है अथवा जो स्वप्न में कीचड़ में फंस जाता है | जो कीचड़ से अपने शरीर को प्रदिप्त कर नाचता है तथा सता है । जो वस्त्ररहित होकर शिर पर लाल रंग की माला धारण करता है । अथवा जिसकी छाती पर वांस, नल या तालवृक्ष उत्पन्न होता है, जिस मनुष्य को मच्छ निगल जाता है, जो माता के उदर में प्रविष्ट हो जाता है, जो पर्वतों के अग्रभाग से गिर जाता है या अंधेरे गढ़ में fr जाता है । नदी आदि के स्रोत से जो वहा लिया जाता है, जो स्वप्न में मुण्डन करा लेता है । जो हरा दिया जाता है, वांध दिया जाता है अथवा कौआ, गिद्ध आदि से जो आक्रान्त होता है । जो तारकादिकों का पतन देखता है, दीपक और नेत्र विनाश देखता है अथवा देवताओं का नाश और भूकम्प देखता है । जो स्वप्न में वमन या विरेचन करता है, जिसके दांत गिर जाते हैं । जो मनुष्य सेमल, पलाश, यज्ञस्तम्भ, वल्मीक, निम्ववृक्ष, पुष्पित हुआ कचनार और चिता इनमें से किसी पर चढ़ता है । जो स्वप्न में कपास, तैल, खली, लौह, लवण, तिल इनको प्राप्त करता है अथवा खाता है, किंवा जो पके हुये अन्न को खाता है, जो सुरापान करता है ऐसे स्वप्न देखने वाला स्वस्थ पुरुष हो तो रोग को प्राप्त करता है तथा व्याधित हो तो मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ ५५-६६ ॥ विमर्शः - अन्तावसायी - निषादस्त्री तु चाण्डालात् पुत्रमन्त्या-वसायिनम् । श्मशानगोचर सूते वाह्यानामपि गर्हितम् ॥ ( मनु ) ।

यथास्वं प्रकृतिस्वप्नो विस्मृतो विहतस्तथा ।

चिन्ताकृतो दिवा दृष्टो भवन्त्यफलदास्तु ते ॥ ६७ ॥

अपनी वातपित्तादि प्रकृति के अनुसार देखा हुआ स्वप्न तथा जिस स्वप्न को देख कर भूल जावें, जो दूसरे स्वप्न से दवा दिया गया हो ऐसा स्वप्न तथा चिन्ता से आया हुआ | स्वप्न एवं दिन में जो दृश्य देखें हों वे रात को स्वप्न में आवें अथवा दिन में सोने पर देखा हुआ स्वप्न ये फलदाई नहीं होते हैं ॥ ६७ ॥

ज्वरितानां शुना सख्यं कपिसख्यं तु शोषिणाम् ।

उन्मादे राक्षसैः प्रेतैरपस्मारे प्रवर्तनम् ॥ ६८ ॥

मेहातिसारिणां तोयपानं स्नेहस्य कुष्ठिनाम् ।

गुल्मेषु स्थावरोत्पत्तिः कोष्ठे, मूर्ध्नि शिरोरुजि ॥ ६६ ॥

शष्कुली भक्षणं छर्धामध्वा श्वासपिपासयोः ।

हारिद्र भोजनं वाऽपि यस्य स्यात् पाण्डुरोगिणः ॥

रक्तपित्ती पिबेद्यस्तु शोणितं स विनश्यति ॥ ७० ॥

ज्वरग्रस्त की कुत्ते के साथ मैत्री, शोषरोगियों की वन्दर के साथ मैत्री, उन्माद रोग में राक्षसों के साथ मैत्री, अपस्मार रोग में भूतप्रेतों के साथ मैत्री, प्रमेह तथा अतिसार के रोगियों का जल पीना, कुष्ठियों का तेलपान, गुल्मरोगों में कोष्ठ पर | तथा शिरोरोग में शिर पर वृक्ष की उत्पत्ति, वमन रोग में पूड़ी

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सुतसंहिता । १२० खाना, श्वाम और तृषारोग में मार्ग में चलना, पाण्डुरोगी का हरिद्रायुक्त भोजन तथा रक्तपित्तरोगी का रक्त पान करना इन सबों से रोगी मृत्यु को प्राप्त होते है ॥ ६८-७० ॥ चिमर्ग. स्थावरंयत्ति ' – लना कण्डकिनी यस्य दारणा हृदि

जायते । त्रप्ने गुल्मस्तमन्नाय क्रूगे विशति मानवम् ॥ ( चरक ) ।

स्वप्नानेवविधान् दृष्ट्वा प्रातरुत्थाय यत्नवान् ॥ ७१ ॥।

दद्यान्मापांस्तिलांल्लोहं विप्रेभ्यः काञ्चनं तथा ।

जच्चापिपे शुभान् मन्त्रान् गायत्रीं त्रिपदां तथा ॥७२ ॥

दृष्ट्वा तु प्रथमे यामे स्वप्याद् ध्यात्वा पुनः शुभम् ।

जपेद्वा ऽन्यतमं देवं ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ७३ ॥

ना चाचक्षीत कस्मैचिद् दृष्ट्वा स्वप्नमशोभनम् ।

देवताऽऽयतने चैव वसेद्रात्रित्रयं तथा ।

विप्रांश्च पूजयेन्नित्यं दुःस्वप्नात् प्रविमुच्यते ॥ ७१ ॥

उक्त प्रकार के अशुभ स्वप्नों को देसने वाला मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रयत्नपूर्वक ब्राह्मणों को उड़द, तिल, लोह, सुवर्ण इनका दान करे तथा महामृत्युञ्जय आदि शुभ मन्त्रों का अथवा तीन व्याहृतियों वाली गायत्री का जप करे । रात्रि के प्रथम प्रहर में अशुभ स्वप्न देख कर विष्णु आदि स्वेष्ट देवता का ध्यान कर पुनः मो जावे अथवा सावधानी से ब्रह्मचर्य का पालन कर किसी एक वेदमन्त्र का या देवता के मन्त्र का जप करे । अशुभ स्वप्न देख कर किसी को कहना नहीं चाहिये । तीन दिन और रात तक देवता के मन्दिर में निवास करना चाहिये तथा प्रतिदिन ब्राह्मणों का भोजनादि द्वारा पूजन करते रहने से मनुष्य दुःस्वप्न से मुक्त हो जाता है ॥

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि प्रशस्तं स्वप्नदर्शनम् ।

देवान् द्विजान् गोवृषभान् जीवत. सुहृदो नृपान् ॥

समिद्धममं विप्रांश्च निर्मलानि जलानि च ।

पश्येत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ॥ ७६ ॥

मांसं मत्स्यान् स्रजः श्वेता वासांसि च फलानि च ।

लभन्ते धनलाभाय व्याधेरपगमाय च ॥ ७७ ॥

महाप्रासादसफलवृक्षवारणपर्वतान् ।

आरोहेद् द्रव्यलाभाय व्याधेरपगमाय च ॥ ७८ ॥

नदीनदसमुद्रांश्च क्षुभितान् कलुपोदकान् ।

तरेत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ॥ ७६ ॥

उरगो वा जलौको वा भ्रमरो वाऽपि यं दशेत् ।

आरोग्यं निर्दिशेत्तस्य धनलाभन्न बुद्धिमान् ॥ ८० ॥

एवंरूपान् शुभान् स्वप्नान् यः पश्येद् व्याधितो नरः ।

स दीर्घायुरिति ज्ञेयस्तस्मै कर्म समाचरेत् ॥ ८१ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विपरीताविपरीतस्वप्न-दर्शनीयो नाम एकोनत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ २६ ॥

( स्वच्छ ) जल इन्हें देखना हो तो उसके रोग नष्ट होकर आरोग्य की प्राप्ति होती है । मास, मडली, वनमाला, स्वच्छ व और फल इन्हें देखने से धन की प्राप्ति तथा रोग का नाम होता है । बडे बडे राजमहल, फल वाले वृक्ष, हाथी, पर्वन इनका स्वप्न में आरोहण करने से द्रव्य लाभ होता है तथा रोग का विनाश होता है । घुमित जल वाले तथा कलुपित | जल वाले नदी, नद और समुद्रों का स्वप्न में तैरना कल्याण लाभ और रोग नाश के लिये होता है । जिस मनुष्य को स्वप्न में सर्प, जोंक या भ्रमर काटना है उस पुरष को आरोग्य तथा धन की प्राप्ति होती है । इस प्रकार के शुभ | स्वप्नों को जो रोगी मनुष्य देवता है वह दीर्घ आयु वाला है तथा उसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ७१-८१ ॥ इत्यायुर्वेदतत्त्वमन्दीपिका भाषायां सूत्रस्थाने विपरीताचिपरी-तस्थादर्शनीयो नामको नत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥

त्रिंशत्तमोऽध्यायः ।

अथातः पचेन्द्रियार्थविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर पछेन्द्रियार्थविप्रतिपत्ति नामक अध्याय का व्यारयान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत को कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श: - मन पुरस्मराणि चेन्द्रियाण्यर्थसग्रममर्थानि भवन्तीनि चरको क्त्या पञ्चेन्द्रियाणा मनःपुरस्मराणा श्रोत्र - स्पर्शन - चक्षु-रसन - प्राणानामर्था. शब्द- सर्श - रूप - रस- गन्धास्तेषा विप्रतिपत्ति-हीनातियोगेन रिटारयो विपरीतावबोधो विद्यतेऽस्मिन्निति पचेन्द्रि यार्थविप्रतिपत्तिस्तम् ।

शरीरशीलयोर्यस्य प्रकृतेर्विकृतिर्भवेत् ।

तत्त्वरिष्टं समासेन व्यासतस्तु निवोध मे ॥ ३ ॥

जिस मनुष्य के शरीर, शील और प्रकृति इनमें सहसा विकार उत्पन्न होना यही सक्षेप से अरिष्ट है । विस्तार से आगे कहता हू सो सुनो ॥ ३ ॥

विमर्शः -- शरीर शोलप्रकृतीना भावाना विकृतिवैपरीत्य यद् भवत्तदरिष्ट मरणलक्षणमित्यर्थं । प्रकृति = सप्तसद्ध थाका ' सप्त प्रकृ-तयो दोपे. पृथक् ससर्गेण साम्येन च भवन्ति । टोपत्रञ्च गुणैरपि सत्त्वादिभि. सप्तप्रकृतयो भवन्ति । तथा पुन सप्तप्रकृतयो जातिकुल-देशकालवयोवलप्रत्यात्मसश्रया । दृश्यन्ते हि पुरुषाणा जात्यादि-नियतास्ते भावविशेपा । ' इत्यष्टाद्ङ्गसङ्ग्रह. ।

शृणोति विविधान् शब्दान् यो दिव्यानामभावतः ।

समुद्रपुरमेघानामसम्पत्तौ च निःस्वनान् ॥ ४ ॥

तान् स्वनान्नात्रगृहाति मन्यते चान्यशब्दवत् ।

ग्राम्यारण्यस्वनांच्चापि विपरीतान् शृणोति च ॥ ५ ॥

द्विषच्छब्देषु रमते सुहृच्छव्देषु कुप्यति । अब इसके अनन्तर प्रशस्त स्वप्नों का वर्णन करते हैं । जो न शृणोति च योऽकस्मात्तं ब्रुवन्ति गतायुषम् ॥ ६ ॥

मनुष्य स्वप्न में देवता, हिज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ), गाय, जो मनुष्य अनेक प्रकार के सिद्ध, किन्नर और गन्धवों के बैल, अपने जीवित मित्र, राजा प्रज्वलित अग्नि, साधु, प्रसन्न दिव्य शब्द सुनता हो तथा समुद्र, शहर और मेघ इनके शब्द

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श्रध्यायः ३० 1 सूत्रस्थानम् । १२१ उपस्थित न होने पर भी सुनना हो अथवा समुद्र, पुर और मेवों के शब्द बग्ने पर भी उन्हें नहीं सुनना हो अथवा अन्य ही प्रकार के शब्द सुनता हो एवं जो ग्रामवासी प्रागियों के गच्छों को जङ्गली प्रागियों के शब्द की तरह सुनता हो तथा जङ्गली ग्रागियों के शब्दों को ग्रामवासी प्राणियों के शब्दों के समान सुनता हो, इसी तरह दुश्मनों के शब्दों को अच्छा समझना हो तथा मित्रों के शब्दों पर क्रोध करता हो एवं जिसकी सुनने की शक्ति अम्मान नष्ट हो गई हो उसे विज्ञ जन न्द्रायु कहते हैं ॥ १–5 ॥ विमर्गः नाग - नक हि गनाथुन नरा हिनं न गृह्णन्ति महद्भिरितम् ।

" यस्तूष्णमित्र गृह्णाति शीतमुष्णञ्च शीतवत् ।

सखातशीतपिडको यश्च दाहेन पीड्यते ॥ ७ ॥

उष्णगात्रोऽतिमात्रञ्च यः शीतेन प्रवेपते ।

प्रहारान्नाभिजानाति योऽगच्छेदमथापि वा ॥ ८ ॥

जो मनुष्य शीतल वस्तुओं को प्ग भी समझता हो और उष्ण वस्तुओं को शीत के समान समझता हो एवं जिसकी देह मेंशीतलना की पिडकाएं हों पर वह दाह से पीड़ित होता हो । जिसका शरीर अधिक उष्ण होने पर भी कांपता हो एवं शरीराङ्ग पर लगी हुई चोट को तथा अङ्गच्छेदन को भी नहीं जानता हो उसे भी न्यु समझना चाहिये ॥ ७-८ ॥

पांशुनेत्रावकीर्णानि यश्च गात्राणि मन्यते ।

वर्णान्यता वा राज्यो वा यस्य गात्रे भवन्ति हि ॥ ६ ॥

जो मनुष्य अपने शरीर को धूलि, रेत आदि से व्याप्त न होने पर भी व्याप्त मानता हो तथा जिसके शरीर के रङ्ग में परिवर्तन हो गया हो किंवा शरीर पर रेखाएं उत्पन्न हो गई हों उसे न्यु कहते हैं ॥ ९ ॥

नातानुलिनं यञ्चापि भजन्ते नीलमक्षिकाः ।

सुगन्धिर्वाऽति योऽकरमात्तं ब्रुवन्ति गतायुपम् ॥१० ॥

जिस मनुष्य के स्नान करके चन्दुन कपूर नादि का शरीर पर लेपन कर देने पर भी वहां नीली मक्तियां बैठें, अथवा जिसके शरीर पर कोई लेप लगा न होने पर भी उससे सुगन्धि आने लगे, उसे गतायु समझना चाहिये ॥ १० ॥

विमर्शः - श्रत्यर्थरतिकं कामं कालपक्त्रस्य मक्षिका । अपि स्नातानुलिप्तस्य भृशन्गयान्ति सर्वशः ॥ ( चरक ) । सुगन्धिर्वा चरक में इसे पुपिन कहा है । नानापुष्योपमो गन्धो यस्य मानि । दिगनिशम् । पुष्पितस्य वनस्येव नानाडुम्लावन ॥ तमाडु पुष्पित

वीरा नरं नरगठश्चयै । स ना संवत्सराडेहूं जहानीति विनिश्चय ॥

ङाप्लुनानाप्लुताः काये यस्य गन्धा. शुभाशुभा । व्यत्यासेनाऽनि-मित्ताः स्युः तच पुष्पिते ॥

विपरीतेन गृह्णाति रसान् चश्चोपयोजितान् ।

उपयुक्ताः क्रमाद्यस्य रसा दोषाभिवृद्धये ॥ ११ ॥

यत्य दोपाग्निसाम्यञ्च कुयुर्मिथ्योपयोजिताः ।

यो वा रसान्न संवेत्ति गतासुं तं प्रचक्षते ॥ १२ ॥

जो मनुष्य खाद्यपदार्थको सेवन करने पर उनके जो रस हों उनले विपरीत रस का स्वाद लेता हो तथा उसके रोगहि-१६ सु ० तादि क्रम से प्रयुक्त ग्स भी दोषों को वृद्धि करते हों एवं ! मिय्याक्रम से प्रयुक्त रस दोष तथा अग्नि की समता कर । देते हों और जो मनुष्य किसी भी रस को अपनी रसनेन्द्रिय । द्वारा जानता नहीं हो उसे नष्टायु ही समझते हैं ॥ ११-१२ ॥

सुगन्धं वेत्ति दुर्गन्धं दुर्गन्धस्य सुगन्धिताम् ।

। गृहीते वाऽन्यथा गन्धं शान्ते दीपे च नीरुजः ॥

। यो वा गन्धान्न जानाति गतासुं तं विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥

1 जो मनुष्य सुगन्ध को दुर्गन्ध और दुर्गन्ध को सुगन्ध 1 जानता हो एवं जो गन्ध हो उससे विपरीत गन्ध को जानता हो तथा दीपक के शान्त होने पर अर्थात् प्रातः काल के समय रोग रहित हो जाय किंवा दीपक बुझाने पर उसकी गन्ध को ! नहीं जान सकता हो उसे ग्नायु कहना चाहिये ॥ १३ ॥

} इन्द्रान्युष्णहिमादीनि कालावस्था दिशस्तथा ॥ विपरीतेन गृहाति भावान्यांश्च यो नरः ॥ १४ ॥

जो मनुष्य कष्ट देनेवाले गीत - उष्ण इन्द्र को, काल को प्रवात- निर्वातादि अवस्था को, दिनाओं को तथा अन्य पदार्थों ( इन्य - गुग - कर्मादि ) को विपरीत रूप में ग्रहण करता है उसे नष्टायु कहते हैं ॥ ६४ ॥ -दिवा ज्योतींषि यश्चापि ज्वलितानीव पश्यति ॥ १५ ॥

रात्रौ सूर्य्य ज्वलन्तं वा दिवा वा चन्द्रवर्चसम् ।

अमेघोपप्लवे यश्च शक्रचापतडिद्गुणान् ॥ १६ ॥।

तडित्वतोऽसितान् यो वा निर्म्मले गगने घनान् ।

विमानयानप्रासादैर्यश्च सकुलमम्चरम् ॥ १७ ॥

यञ्चानिलं मूर्त्तिमन्तमन्तरिक्षञ्च पश्यति ।

घूमनीहारवासोभिरावृतामिव मेदिनीम् ॥ १८ ॥

प्रदीप्तमिव लोकञ्च यो वा प्लुतमिवाम्भसा ।

भूमिमष्टापदाकारां लेखाभिर्यश्च पश्यति ॥ १६ ॥

न पश्यति सनक्षत्रां यश्च देवीमरुन्धतीम् ।

ध्रुवमाकाशगङ्गां वा तं वदन्ति गतायुषम् ॥ २० ॥

जो मनुष्य दिन में नक्षत्रों को चमकते हुये से देखता हो, रात्रि में सूर्य को जलते या प्रकाश करते हुये तथा दिन में चन्द्रमा को प्रकाशित देखता हो एवं जो मेवरहित आकाश में भी इन्द्रधनुष तथा बिजली चमकती हुई देखता हो, जो स्वच्छ आकाश में बिजली के सहित काले मेघों को देखता हो तथा जो आकाश को विमान, रथ और राजमहलों से व्याप्त देखता हो । जो वायु को मूर्तिमान तथा आकाश को भी मूर्ति-मान देखता हो । जो पृथ्वी को धूएँ, कुहरे या ओस और कपड़ों से ढकी हुई देखता हो । जो समस्त संसार को विना ग्रीष्म के भी प्रदीप्त सा देखता हो अथवा जल से संसार को बा हुआ सा देखता हो, जो पृथ्वी को रेखाओं से आठ खानों मैं विभक्त हुई सी देखता हो, जो सप्तर्षियों के तारों से युक्त बरवती नक्षत्र को न देखता हो तथा ध्रुत्र एवं आकाश गड्ढा को भी नहीं देखता हो उसको निश्चित ही गनायु समझे ॥ १५-२० ॥ विमर्गः --- चरक - ' सप्तर्षीणां समीपस्था यो न पश्यत्यरुन्ध-नीन् । संवत्सरान्ते जन्तु स पश्यतीनि महत्तमः । ' इति

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१२२ सुश्रुतसंहिता । छायां चश्च न पश्यति । विमर्श - मृत्यु समीप होने पर प्रभा तथा छाया में भी ज्योत्स्नादर्शोधतोयेषु वा विकृनां वाऽन्यसत्त्वाम् ॥२१ ॥ अशुभददक परिवर्तन होते हैं । दोन प्रभा नया काराि

पश्यत्येकाङ्गहीनां मैंने यस्य स्वपि ॥ उयायो नमः विडि वक्तककङ्कगृभ्राणां प्रेतानां यक्षरक्षसाम् | केहि नृशुशुभाले छानाः प्र पिशाचोरगनागानां भूतानां विकृतामपि ॥ २२ ॥

यो ग मयूरकण्ठाभं विधूनं वह्निमीक्षते ।

आतुरस्य भवेन्मृत्युः स्वम्थो व्याधिमवाप्नुयान् ॥ २३ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने पञ्चेन्द्रियार्थविप्रतिपत्ति-नम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

जो मनुष्य चन्द्रिका, गीने, धूप और जल में अपनी छाया को नहीं देखता हो अथवा एक अह से रहित, विकृत किंवा । दूसरे प्रागियों की भी अपनी छाया को देले, जैन- कुत्ते, काप, कंक, गीव, भूत, प्रेत, यज्ञ, राइस, पिशाच, दरग, नाग अथवा नूत इन जैसी विनाकृति देवे । जो धूपुं ने रहित afra को मोर के कष्ट के समान नीली देवता हो ऐसे रोगी को दृष्ट होती है तथा स्वस्थ मनुष्य रोग को प्राप्त करता है ॥ त्रिसर्गः - छाया को प्रविच्छाया ( Ehadon, Image ) समझनी चाहिये । प्रदिषु । बाग साप्रविद्धान ( चरक ) । सा महाल्यौ गनन्चार्द्दन्चकः । छोइपृष्ठो दोनाः मन् ॥ इनि । पदिनः ॥ ३८ ॥

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः ।

अयातरछायात्रिप्रतिपत्तिमध्यायं व्यास्यास्यामः ॥१ ॥

योवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

ल्ब इसके अनन्तर छानविन नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विनी: - छाया को शरीर की कान्ति या ( Complexion ) कहते हैं प्रभा और वर्ग दोनों के संयोग से शरीर को तो वित्रे पता होती है वह छात्र है । केतु इनि । अनयोर्भेदोऽष्टाहरु ' छात्राल पत्रभूतान्त्राविष्कृते देव. ॥ ( चर ) |

हीरपक्रमते यस्य प्रभावृतिन्मृतिश्रियः ।

अकस्माद्यं भजन्ते वा स परासुरसंशयम् ॥ ४ ॥।

जिस पुरन की लज्जा नष्ट हो जाती है किंवा प्रभा, धृति, स्मृति और शोभा थे जिसको सहमा प्राप्त हो जाती हों रमे निश्चय हो गया समझना चाहिये ॥ १ ॥

विमर्श: -नि - निशिद्धि ' धृतिर्हि निनमा लिग | स्मृति - मृतिर्भूतार्धविद्यानन्दः संयोगविशे गव च मृति । ( वै ० दर्शन ) ' अनुभूतविण्यासप्रमोप. न्हति ' ( योगसूत्र ) ।

चन्यावरोष्ट पतितः मिश्रध्वं तथोत्तरः ।

माँ वा जाम्बवाभासां दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ५ ॥

जिसका नीचे का कष्ट गिर ( लटक ) गया हो तथा ऊनष्ट ऊपर को चढ गया हो अथवा दोनों ओष्ट जामुन के फल के समान नीले वर्ग के हो गये हो, उसका जीवित रहना दुर्लभ है ॥ ५ ॥

आरक्ता दशना चत्य श्याग वा स्युः पतन्ति वा ।

प्रतिभा वाऽपि तं गतायुपमादिशेत् ॥ ६ ॥

जिसके दांत लाल या काले वर्ग के हो जांब अथवा गिर जांय लयवा खञ्जन पक्षी की तरह नीलवर्ग के हो जाय, उसको भी नष्टाय कहना चाहिये ॥ ६ ॥

कृष्णा स्तब्धाऽवलिप्ता वा जिह्वा शूना च यस्य वै ।

कर्कशा वा भवेद् यत्य सोऽचिराद्विजात्यसून् ॥७ ॥

जिस मनुष्य की जिह्वा काठी, कटोर, अवलिप्तमी, गोययुक्त तथा कर्क होती है वह शीघ्र ही प्राणों को छोड देता है ॥ ७ ॥

विमर्श - लालास्ताव को अनता से त्रिह्ना शुष्क होकर उस पर मैल का एक पर्त चढ़ जाता है उसे ( Coated or । Plastered tongre ) कहते है । यह स्थिति प्रायः जदर रोग तथा ज्वरादि में होती है । कुटिला स्फुटिता वाऽपि शुष्का या यत्व नासिका । प्रस्वेव च । ' इति । चरकः – नान्सी निर्मल नवा सुत्नेहा | अक्स्फूर्जति मग्ना वा न स जीवति मानवः ॥ ८ ॥

चन्द्रादिन विभाग, रचना सिद्धा जिस मनुष्य को नासिका देवी, फटी हुई, शुष्क हो तथा हरिता मान्छु सि ' इत्यादिना विषाः कृण शब्द करती हो या बैठ गई हो वह मनुष्य जीवित नहीं कृष्णपक्ष्यामः, व्यावहाः अंडात ' इत्यादिना चतुविधा रहता है ॥ ८ ॥

वर्गीय प्रशिताः ।

श्याम लोहितिका नीला पीतिका सहिते विषमे स्वच्चे रक्त स्रत्ते च लोचने ।

अभिवन्ति वाऽपि मानवम् । स्यातां वा प्रस्रुते यस्य स गतायुर्नरो ध्रुत्रम् ॥ ६ ॥

चं छायाः स परासुरसंशयम् ॥ ३ ॥

जिस पुरुष के नेत्र संकुचित, विषम, स्तब्ध ( निश्चल ), नाकान्त · मनुष्य को काला, नीली जयबा पीली छाया नारक हो तथा नीचे को या बाहर को लटके हुये हों अथवा करती है वह निश्चय ही न है ॥ ३ ॥ बहते हों वह मनुष्य निश्चय ही गतप्राण है ॥ ९ ॥

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श्रध्यायः ३१ ] सूत्रस्थानम् । १२३ केशाः सीमन्तिनो यस्य सङ्क्षिप्ते विनते भ्रुवौ । लुनन्ति चाक्षिपक्ष्माणि सोऽचिराद् याति मृत्यवे १० जिस पुरुष के सिर के वालों में सीमन्त ( मांग ) हो गई हो तथा भौहें संकुचित और झुक गई हों तथा वह आंखों की पलकों के वालों को नोचता हो वह शीघ्र ही मृत्यु के अधीन हो जाता है ॥ १० ॥

नाहरत्यन्नमास्यस्थं न धारयति यः शिरः ।

एकाग्रदृष्टिर्मूढात्मा सद्यः प्राणाञ्जहाति सः ॥ ११ ॥

जो मनुष्य मुख में रखे हुये अन्न को गले के नीचे नहीं उतारता हो तथा जो सिर को धारित नहीं करता हो तथा जो मूढात्मा ( मोहितात्मा ) एक तरफ ही बिना पलक गिराये देखता हो वह शीघ्र ही प्राणों को छोड़ता है ॥ ११ ॥

-बलवान् दुर्बलो वाऽपि सम्मोहं योऽधिगच्छति ।

उत्थाप्यमानो बहुशस्तं पक्कं भिषगादिशेत् ॥ १२ ॥

जो बलवान् अथवा दुर्बल पुरुष उठाते समय मूच्छित हो ।

जाता हो उसे पक्क ( मरने वाला ) समझना चाहिये ॥ १२ ॥

विमर्शः – उठाते समय गिरने का कारण मस्तिष्क में रक्त की कमी ( Cerebra ' Anoemin ) है जिससे उसे संमोह ( Giddiness or fointing ) उत्पन्न होता है । यह हृदय की

दुर्बलता से होती है । ज्वरे प्रमोहो भवति स्वलैरप्यवचेष्टिते ।

निघण्ण भोजयेत्तस्मान्मूत्रोच्चारौ च कारयेत् ॥

उत्तानः सर्वदा शेते पादौ विकुरुते च य ' ।

विप्रसारणशीलो वा न स जीवति मानवः ॥ १३ ॥

जो मनुष्य सदा उत्तान ( सीधा, पीठ के वल ) सोता • है तथा पांचों को बार बार सिकोडता व फैलाता हो वह " मनुष्य जीवित नहीं रहता है ॥ १३ ॥

शीतपादकरोच्छा सश्छिन्नोच्छ्वासश्च यो भवेत् ।

काकोच्छ्वासश्च यो मर्त्यस्तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ १४ ॥

जिस मनुष्य के पैर, हाथ और श्वास ये ठंढे हों तथा जो छिन्न ( टूटते ) सांस लेता हो अथवा जो कौए की तरह मुख खोलकर सांस लेता हो उसे धीर वैद्य वर्जित कर दे ॥१४ ॥ ।

विमर्श: - मनुष्य के नासा से वापस बाहर निकलने वाली हवा गरम होकर निकलती है | शरीरादि की स्वाभाविक उष्णता जीवन का एक लक्षण है । इसका कम होना मृत्यु-सूचक है । को Period10 breathing कहते हैं । यह हृद्रोग, Uraemia, मस्तिष्कगतरक्तस्राव या संन्यास ( Apoplexy ), मस्तिष्कावरण शोथ ( Meningitis ) और ( Sun - Stroke ) में होती है । इस श्वास की खोज चेन और स्टोक्स नामक दो विद्वानों ने की है अतः इसका दूसरा नाम ( Cheyne - Stokes respiration ) भी है । इसमें कुछ काल के लिये श्वास - प्रश्वासक्रिया बंद हो जाती है, फिर धीरे २ चलने लगती है । फिर बंद हो जाती है, फिर चलती है ।

निद्रा न च्छिद्यते यस्य यो वा जागर्ति सर्वदा ।

Tags प्रत्याख्येयः स जानता ॥ १५ ॥

जिस रोगी की नींद खुलती ही न हो अथवा जो रोगी सदा जागता ही हो अथवा जो रोगी बोलने की चाहना करने पर मूच्छित हो जाता हो उसे विज्ञ वैद्य त्याग दे ॥ १५ ॥

। उत्तरौछन यो लिह्यादुत्कारांश्च करोति यः ।

प्रेतैर्वा भाषते सार्द्धं प्रेतरूपं तमादिशेत् ॥ १६ ॥

जो रोगी ऊपर के भोष्ठ को चूसता हो तथा उत्कार ( डकारें ) करता हो अथवा प्रेतों के साथ वात करता हो उसको प्रेतरूप ( मृत ) ही समझो ॥ १६ ॥

खेभ्यः सरोमकूपेभ्यो यस्य रक्तं प्रवर्तते ।

पुरुषस्याविषार्तस्य सद्यो जह्यात् स जीवितम् ॥ १७ ॥

जिस मनुष्य के विप खाया हुआ न होने पर भी रोमकूपों से तथा शरीर के अन्य द्वारों से रक्त वहता हो वह शीघ्र ही जीवन को त्यागता है ॥ १७ ॥

विमर्शः - मार्गों पुनरस्य द्वावू चाथश्च तत्, ऊर्ध्वं प्रपद्यमान कर्णनासिकाने त्रास्येभ्य, अथ प्रपद्यमान मूत्रपुरीषमार्गाभ्या प्रच्यवते तो मानौं प्रपद्यमानं सर्वेभ्य एव यथोक्तेभ्य · खेभ्यः प्रच्यवते शरी-रस्य ( चरक ) । यह रक्तपित्त में रिष्ट मिलता है । यदा तु सर्व-च्छिद्रेभ्यो रोमकूपेभ्य एव च । वर्त्तते तामसख्येया गतिं तस्याहुरन्ति-कीम् ॥ ( चरक ) । मसूरिका, टाइफस ज्वर, मस्तिष्कसुषुम्ना ज्वर ( Cerebrospinal fever ), प्लेग, पर्थुरा ( purpura ) इन रोगों में यह अवस्था होती है ।

वाताष्ठीला तु हृदये यस्योदुर्ध्वमनुयायिनी ।

रुजाऽन्नविद्वेषकरी स परासुरसंशयम् ॥ १८ ॥

जिस पुरुष के हृदय के अन्दर वायु की गांठ उत्पन्न होकर ऊपर को चढ़े तथा पीड़ा और अन्न में विद्वेष करती हो वह निश्चय ही गतायु है ॥ १८ ॥

अनन्योपद्रवकृतः शोफः पादसमुत्थितः ।

पुरुषं हन्ति नारीं तु मुखजो गुह्यजो द्वयम् ॥ १६ ॥

किसी अन्य रोगों के उपद्रवरूप में उत्पन्न न होकर स्वतन्त्रतया पावों में उत्पन्न शोथ पुरुष को मार डालता है इसी प्रकार मुख पर उत्पन्न शोथ स्त्री को मार डालता है । गुह्य स्थानों पर उत्पन्न हुआ शोथ स्त्री पुरुष दोनों को मार डालता है ॥ १ ९ ॥ विमर्शः - अनन्योपद्रवकृत. = नान्योपद्रवकृत इत्यर्थं, श्वास-पिपासाऽऽदिशोफोपद्रवैरेव कृत इति निष्कर्षं । शोफोपद्रवा वक्ष्यन्ते-' श्वास पिपासा दौर्बल्य ज्वरश्छर्दिररोचकः । हिक्काऽतिसारकासाश्च शोथिनं क्षपयन्ति हि ॥ ' इति । पादप्रवृत्त श्वयथुर्नृणां य. प्राप्नु-यान्मुसम् । स्त्रीणा वक्त्रादधो याति वस्तिजश्च न सिद्धयति ॥

अतिसारो ज्वरो हिका छर्दिः शूनाण्डमेढ़ता ।

वासिनः कासिनो वाऽपि यस्य तं क्षीणमादिशेत् ॥ २० ॥

अतिसार, ज्वर, हिक्का, वमन, अण्डग्रन्थि तथा मेढ ( इन्द्रिय ) में शोथ ये उपद्रव श्वास या कास रोगी के उत्पन्न होने पर उसे क्षीण समझना चाहिये ॥ २० ॥

स्वेदो दाहश्च बलवान् हिक्का श्वासश्व मानवम् ।

बलवन्तमपि प्राणैर्वियुञ्जन्ति न संशयः ॥ २१ ॥

अधिक पसीना का भाना, दाह होना तथा जोर की हिका

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१२४ सुश्रुतसहिता । और श्वास ये उपद्रव बलवान् रोगी को भी प्राणों से वियुक्त कर देते हैं इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ २१ ॥

श्यावा जिह्वा भवेद्यस्य सव्यं चाक्षि निमज्जति ।

मुखञ्च जायते पूति यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २२ ॥

जिस मनुष्य की जिह्वा काली हो गई हो, बायां नेत्र भीतर घुस गया हो तथा सुख में दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाय तो उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये ॥ २२ ॥

वक्त्रमापूर्यतेऽश्रृणांः स्विद्यतश्चरणावुभौ ।

चक्षुवाकुलतां याति यमराष्ट्रं गमिष्यतः ॥ २३ ॥

यमराज के राष्ट्र ( यमलोक ) में जाने वाले पुरुष का मुख आंसुओं से भर जाता है तथा दोनों पावों से पसीना आता है और नेत्र व्याकुल हो जाते हैं ॥ २३ ॥

अतिमात्रं लघूनि स्युर्गात्राणि गुरुकाणि वा ।

यस्याकस्मात् स विज्ञेयो गन्ता वैवस्वतालयम् ॥ २४ ॥

जिस मनुष्य के शरीर के अवयव सहसा अधिक मात्रा मैं हल्के हों जांय अथवा भारी हो जांय वह यमालय में जाने चाला है ॥ २४ ॥

पङ्कमत्स्यबसातैलघृतगन्धांश्च ये नराः ।

मृष्टगन्धांश्च ये यान्ति गन्तारस्ते यमालयम् ॥ २५ ॥।

,, वो, तेल, घृत इनकी गन्धयुक्त या अन्य मिलित गन्धयुक्त हो जाते हों वे यमलोक को जाने वाले होते हैं ॥ २५ ॥

यूका ललाटमायान्ति चलिं नाश्नन्ति वायसाः ।

येषां वाऽपि रतिर्नास्ति यातारस्ते यमालयम् ॥ २६ ॥

जिसके ललाट प्रदेश में जुए ना जाती हैं, जिसकी दो हुई बलि को कौए भी नहीं साते हों तथा जिनको कही भी आराम नहीं मिलता हो वे यमलोक को जाने वाले होते हैं ।

ज्वरातिसारशोफाः स्युर्यस्यान्योन्यावसादिनः ।

प्रक्षीणबलमांसस्य नासौ शक्यश्चिकित्सितुम् ॥ २७ ॥

जिस पुरुष में परस्पर एक दूसरों के उपद्रव के कारण ज्वर, अतिसार और शोफ रोग उत्पन्न हो गया हो तथा रोगी का बल और मां क्षीण हो गया हो तो उसकी चिकित्सा करना शक्य नहीं है ॥ २७ ॥

त्रिमर्शः ——- अन्योन्यात्रसादिन –ज्वरातिसारौ शोफान्ते श्वयथुर्वा तयो. क्षये । दुर्बलस्य विशेषेग नरस्यान्ताय कल्पते । ( चरक ) ।

क्षीणस्य यस्य क्षुत्तृष्णे हृद्यैमिष्ठैर्हितैस्तथा ।

न शाम्यतोऽन्नपानैश्च तस्य मृत्युरुपस्थितः ॥ २८ ॥

जिस क्षीण हुए मनुष्य की क्षुधा हितकारक तथा हृद्य मिष्टान्नों से शान्त न होती हो तथा प्यास ठंढा जल पीने से भी शान्त न होती हो उसकी मृत्यु उपस्थित समझो ॥ २८ ॥

प्रवाहिका शिरःशूलं कोष्टशूलञ्च दारुणम् ।

पिपासा बलहानिश्च तस्य मृत्युरुपस्थितः ॥ २६ ॥

जिस मनुष्य के प्रवाहिका, शिरःशूल, कोष्टशूल ये दारुण । हों तथा प्यास अधिक लगे और सहसा शरीर के बल की हानि हो जाय उसकी मृत्यु उपस्थित मानो ॥ २६ ॥

विपमेणोपचारेण कर्म्मभिश्च पुराकृतैः ।

अनित्यत्वाच्च जन्तूनां जीवितं निधनं व्रजेत् ॥ ३० ॥

विपम उपचार से, पूर्वजन्म में किये हुये कर्मों से तथा जीवधारियों की अनित्यता से मनुष्य का जीवन नष्ट होता है । विमर्शः -- अष्टाद्गसग्रहे मृत्यां कारणानि - मरण प्राणिना दृष्ट-मायु पुण्योभयक्षयात् । तयोरप्यक्षयाद् दृष्ट त्रिपमापरिहारिणाम् ॥

प्रेता भूताः पिशाचाश्च रक्षांसि विविधानि च ।

मरणाभिमुखं नित्यमुपसर्पन्ति मानवम् ॥ ३१ ॥

। तानि भेषजवीर्याणि प्रतिनन्ति जिघांसया ।

तस्मान्मोघाः क्रियाः सवां भवन्त्येव गतायुपाम् ॥ ३२ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने छायाविप्रतिपत्ति-मैकत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

- mum प्रेत, भूत, पिशाच, अनेक प्रकार के राक्षस ये निकट मृत्युवाले मनुष्य के पास नित्य ही आते हैं तथा उस मनुष्य को मारने की इच्छा से ओपधियों के वीर्य ( प्रभावादिक ) को नष्ट कर देते है इसीलिये गतायु पुरुषों के लिये प्रयुक्त सब प्रकार की चिकित्मारूपी क्रियाऍ निष्फल हो जानी हैं ॥ इत्यायुर्वेदतत्त्वस न्दी पिकाभाषायां सूत्रस्थाने छायाविप्रतिपत्ति-नमकत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

-numm

द्वात्रिंशत्तमोऽध्यायः ।

अथातः स्वभावविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर स्वभावविप्रतिपत्ति नामक अध्याय का वर्णन करते है जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ स्वभावप्रसिद्धाना शरीरैकदेशानामन्यभावित्वं मर-णाय । तद्यथा - शुक्लानां कृष्णत्वं, कृष्णानां शुक्लता, रक्तानामन्यवर्णत्वं, स्थिराणां मृदुत्वं, मृदूनां स्थिरता, | चलानामचलत्त्रम् अचलानां चलता, पृथूनां सङ्क्षिप्तत्वं, सहितानां पृथुता, दीर्घाणां ह्रस्वत्वं, ह्रस्वानां दीर्घता, अपतनधर्मिणां पतनघमित्वं, पतनधर्मिणामपतनधर्म-त्वम्; अकस्माच्च शैत्यौष्ण्यस्नैग्ध्यरौक्ष्य प्रस्तम्भवैवयव-| सादनञ्चाङ्गानाम् ॥ ३ ॥

स्वभाव से प्रसिद्ध शरीर के अवयवों का अन्यथाभाव होना मरण के लिये है । जैसे नेत्र का श्वेत भाग तथा दांत इनका काला पढना, केशादि काले अवयवों का श्वेत होना, जिह्वा, ओष्ठ आदि रक्त वर्ण के अह्नों का वर्ण विपरीत ( नीला, काला ) हो जाना, अस्य्यादि कठिन पदार्थों का मृदु होना तथा स्वचा, मांसादि मुलायम पदार्थों का कठिन होना, जिह्वा,

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ध्यायः ३२ ] सूत्रस्थानम् । १२५ सन्धि आदि चल भट्ठों का भचल होना या जकड़ जाना तथा अचल अह्नों का चल होना, पृथु ( चौदे ) पदार्थों का संक्षिप्त ( संकुचित ) होना, जंघा, बाहु आदि लग्ने पदार्थों का छोटा होना तथा छोटे पदार्थों का लम्बा होना, अपतनधर्मी ( नस शादि ) पदार्थों का गिरना तथा मूत्र, पुरीपादि पतनधर्मी पदार्थों का अवरोध होना, इसी तरह अकस्मात् ही शरीर के भिन्न अङ्गका शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, जकडन, विवर्णता और शक्तिरहित होना ॥ ३ ॥

स्वेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरैकदेशानामवस्रस्तोत्क्षिप्त भ्रान्तावक्षिप्तपतितविमुक्तनिर्गतान्तर्गतगुरुलघुत्वानि, प्रवालवर्णव्यङ्गप्रादुर्भावो व सिराणाञ्च दर्शनं ललाटे, नासावंशे वा पिडकोत्पत्तिः, ललाटे प्रभातकाले स्वेदः, नेत्ररोगाद्विना वाऽश्रुप्रवृत्तिः, गोम यचूर्णप्रकाशस्य वा रजसो दर्शनमुत्तमाङ्गे निलयनं वा कपोतकङ्ककाकप्रभृतीनां मूत्रपुरीपवृद्धिरभुञ्जानानां तत्प्रणाशो भुञ्जानानां वा, स्तनमूलहृदयोरःसु च शूलो-त्पत्तयः, मध्ये शूनत्वमन्तेषु परिमायित्वं विपर्ययो वा तथाऽर्द्धा श्वयथुः शोपोऽनपक्षयोर्वा नष्टहीनविक-लविकृतस्वरता वा, विवर्णपुष्पप्रादुर्भावो वा दन्तमुखन-खशरीरेषु ॥ ४ ॥

“ भ्रू, पलक, भष्ठ आदि शरीर के भट्ठों का अपने स्थानों से नीचे गिरना या ऊँचे उठ ( तन ) जाना, नेत्रादि का भ्रान्त होना या टेढ़ा हो जाना, सिर, ग्रीवा आदि की धारणशक्ति नष्ट होना, सन्धियों की विमुक्ति होना, जिहा - नेत्रादि का बाहर निकलना या भीतर को घस जाना, अङ्गों की गुरुता या लघुता होना, प्रवाल के रन का चेहरे या अन्य शरीर के भाग पर अकस्मात् व्यङ्ग उत्पन्न होना, ललाट प्रदेश में सिराओं का उभार दिखाई देना, नासा के ऊपर फुन्सियां उत्पन्न होना, प्रात काल के समय ललाट पर पसीना आना, नेत्रों में किसी प्रकार का रोग न होने पर भी आंसुओं का निकलना, शरीर के उत्तमाङ्ग ( सिर ) पर गोवर के चूर्ण के समान रज का दिखाई देना अथवा सिर पर कबूतर, कङ्क और कौए आदि का बैठना, भोजन नहीं करने पर भी मृत्र और मल की वृद्धि होना तथा भोजन करते रहने पर भी मूत्र और मल का क्षीण होना, स्तनमूल, हृदय और छाती में शूल उत्पन्न होना, शरीर के मध्य भाग में शोथ उत्पन्न होना और अन्त भाग ( हस्त-पादादि ) पर कृशता अथवा मध्यभाग में पतलापन तथा हस्त-पादादि भट्ठों पर मोटापन होना, शरीर के आधे भट्ठों में शोथ उत्पन्न होना, इसी तरह शरीर के एक आध अवयव में अथवा आधे अङ्ग में शुष्कता, स्वर का नष्ट, हीन, विकलस्व और विकृत होना और दन्त, मुख, नख या शरीर के अन्य भागों पर विकृत रंग के पुष्पों का प्रादुर्भाव होना ये सब मरण के दर्शक चिह्न हैं ॥ ४ ॥

यस्य वाऽप्सु कफपुरीषरेतांसि निमज्जन्ति, यस्य वा दृष्टिमण्डले भिन्नविकृतानि रूपाण्यालोक्यन्ते, स्नेहाभ्यक्तकेशाद्न इव यो भाति, यश्च दुर्बलो भक्तद्वेषा -तिसाराभ्यां पीड्यते, कासमानश्च तृष्णाऽभिभूतः, क्षीणश्छर्दिभक्तद्वेपयुक्तः, सफेनपूयरुधिरोद्वामी हृतस्वरः शूलाभिपन्नश्च मनुष्यः, शुनकरचरणवदनः क्षीणोऽन्न-द्वेपी स्रस्तपिण्डिकांसपाणिपादो ज्वरकासाभिभूतः, | यस्तु पूर्वाह्ने भुक्तमपराह्ने छर्दयत्यविदग्धमतिसार्यते वा ज्यरकासाभिभूतः स श्वासान्प्रियते ॥ ५ ॥

जिस मनुष्य के कफ, विष्ठा और वीर्य जल में डूबते हों | अथवा जिसके दृष्टिमण्डल में भिन्न और विकृत रूप दिखाई देते हों, जिसके केश और गन स्नेह से अभ्यक्त हुये से प्रतीत होते हों, जो दुर्बल भक्तद्वेप और अतिसार से पीड़ित हो तथा जो खांसता हुआ तृपा से पीडित हो, जो क्षीण होकर चमन और भक्तद्वेष से युक्त हो, जो व्यक्ति फेन के सहित मवाद और रुधिर का वमन करता हो तथा हतस्वर एवं भूल से युक्त हो, जो क्षीण हुआ मनुष्य हस्त, पाद और मुख पर शोथ से पीड़ित हो, अन्न में द्वेष रखता हो तथा जिसके पिण्डिलिकाएँ, कंधे, हाथ और पांच शिथिल हो गये हों एवं ज्वर और कास से आक्रान्त हो । जो व्यक्ति पूर्वाह में खाये हुये भोजन का अपराह्न में वमन कर देता हो अथवा अध पके अन्न के ही दस्त करता हो एव ज्वर और कास से पीड़ित हो कर वह श्वास से मरता है ॥ ५ ॥

बस्तवद्विलपन् यश्च भूमौ पतति स्रस्तमुष्कः, स्तब्धमेट्रो भग्नग्रीवः प्रनष्टमेहनश्च मनुष्यः, प्राग्विशुष्य-माणहृदय आर्द्रशरीरः, यश्च लोष्टं लोटेनाभिहन्त arg काठेन, तृणानि वा छिनत्ति, अधरोष्ठं दशति, उत्तरोष्ठं वा लेढि, आलुञ्चति वा कणों केशांश्च देवद्विजगुरु -सुहृद्वैद्यांश्च द्वेष्टि, यस्य वक्रानुवक्रगा ग्रहा गर्हितस्थान-गताः पीडयन्ति जन्म वा यस्योल्काऽशनिभ्यामभि-हन्यते होरा वा, गृहदारशयनासनयानवाहनमणिरत्नो-पकरणग हितलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावो वेति ॥ ६ ॥

जो व्यक्ति बकरी के बच्चे की तरह विलाप करता हुआ भूमि पर गिरता है तथा जिसके अण्डकोप गिर गये हों एवं जिसकी इन्द्रियां स्तम्भित हो गई हों, ग्रीवा भग्न हो गई हो, मूत्र नष्ट हो गया हो ऐसा मनुष्य तथा जिसका शरीर स्नान से गीला करने पर पहले हृदय प्रदेश सूखता हो तथा जो लोष्ट ( ढेले ) को लोष्ट से तथा काष्ट को काष्ठ से मारता हो या तृण को तोढता हो, अधरोष्ठ को काटता हो या ऊपर के ओष्ठ को चाटता हो अथवा कानों और केशों का लुञ्चन करता हो तथा देवता, द्विज, गुरु, मित्र और वैद्यों से द्वेष रखता हो तथा जिसके वक्र तथा अनुवक्र ग्रह निन्दित स्थान में स्थित होकर जन्मनक्षत्र को पीड़ित करते हों या जिसका जन्म लग्न उल्का और वन से अभिहत हो अथवा जिसके घर, स्त्री, शयन, आसन, यान, वाहन, मणि, रल और अन्य उपकरणों में निन्दित लक्षण और निमित्त की उत्पत्ति हो उस मनुष्य को गतायु समझना चाहिये ॥ ६ ॥

विमर्श: - प्रनष्टमेहन को मूत्राघात ( Snppression of urine ) समझना चाहिये । प्राग्विशुष्यमाणहृदय - यस्य स्नातानु-

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१२६ सुश्रुतसंहिता । लिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरो भृशम् | आर्द्रपु सर्वगात्रेषु सोऽर्धमास न जीवति ॥ ग्रहगनिमेवा कानुनका कुटिला मन्दा मन्दतरा समा । तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टा गति ॥ होराशब्देन जन्मराशि-जन्मनक्षत्र वा गृह्यते ।

भवन्ति चात्र-चकित्स्यमानः सम्यक् च विकारो योऽभिवर्धते ।

' प्रक्षीणबलमांसस्य लक्षणं तद्गतायुषः ॥ ७ ॥

जिसकी ठीक तरह से चिकित्सा करने पर भी रोग बढ़ता हो तथा शरीर का बल और मास क्षोण हो गया हो यह उसकी नष्ट आयु का लक्षण है ॥ ७ ॥

निवर्तते महाव्याधिः सहसा यस्य देहिनः ।

न चाहारफलं यस्य दृश्यते स विनश्यति ॥ ८ ॥

जिस मनुष्य की महान्याधि सहसा ही निवर्तित हो जाय तथा भोजन करने का तुष्टि - पुष्ट रूप फल भी न होता हो वह विनष्ट हो जाता है ॥ ८ ॥

विमर्श - चरके ओषधाहारविज्ञानम् - विज्ञात बहुश ' सिद्ध विधिवच्चात्रचारितम् । न सिद्ध्यस्योपध यस्य नास्ति तस्य चिकि-त्सितम् ॥ आहारमुपयुञ्जानो भिपजा रूपकलितम् । य फल तस्य नाप्नोति दुर्लभ तस्य जीवितम् ॥

एतान्यरिष्टरूपाणि सम्यग् वुध्येत यो भिपक् ।

साध्यासाध्य परीक्षायां स राज्ञः सम्मतो भवेत् ॥ ६ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने स्वभावविप्रति-पत्तिर्नाम द्वात्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

-इन उपर्युक्त अरिष्ट लक्षणों को जो वैद्य अच्छी प्रकार जानता है वह रोगों की साध्यासाध्यता ( Frogaosis ) की परीक्षा ( निर्णय ) करने में राजसंमत होता है ॥ ९ ॥

इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभापायां सूत्रस्थाने स्वभाववि-प्रतिपत्तिर्नाम द्वात्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

-www

त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ।

अथातोऽवारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर ' अवारणीय ' नामक अध्याय का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श: - उपद्रवविशेषजुष्टतया न विद्यते वारण येषा तेऽवारणा-व्याधयस्तानधिकृत्य कृतोऽध्यायोऽवारणीयनम् ।

उपद्रवैस्तु ये जुष्टा व्याधयो यान्त्यवार्यताम् ।

रसायनाद्विना वत्स! तान् शृण्वेकमना मम ॥ ३ ॥

रोग उपद्रवों से युक्त होने के कारण रसायन के विना अवार्य ( असाध्य ) हो जाती हैं उन्हे एकचित्त होकर मेरे से सुनो ॥ ३ ॥

विमर्श: - उपद्रव - - ( १ ) रोगारम्भकदोषप्रकोपजन्योऽन्यवि-कार उपद्रव ' । ( माधव ) । ( २ ) उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजो रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणु रोगात्पश्चाज्जायत इति उपद्रवसा । ( चरक ) | ( ३ ) य पूर्वोत्पन्न व्याधिं जघन्यकालजातो व्याधिरुप-सृजति स तन्मूल एवोपद्रवसा । ( सुश्रुत ) । उपद्रव को ( Comphoation and sequalae ) कहते हैं । रसायन से रसायन, तप, जप आदि का ग्रहण होता है । ध्रुवन्तु मरण रिष्टे ब्राह्मणैस्त-त्किलामले । रसायनतपो जप्यतत्परैस्तन्निवार्यते ।

वातव्याधिः प्रमेहश्च कुष्ठमर्शो भगन्दरम् ।

अश्मरी मूढगर्भश्च तथैवोदरमष्टमम् ॥ ४ ॥

अष्टावे प्रकृत्यैव दुश्चिकित्स्या महागदाः ।

प्राणमांस क्षयश्वासतृष्णाशोपवमीज्वरैः ॥ ५

मूर्च्छातिसारहिकाभिः पुनश्चैतैरुपद्रुताः । वर्जनीया विशेपेण भिपजा सिद्धिमिच्छता ॥ ॥ ६ ॥

वातव्याधि, प्रमेह, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, अश्मरी, मूढगर्भ ये सात तथा आठवां उदर रोग ये आठों महारोग हैं तथा स्वभाव से ही दुश्चिकिन्न होते हैं । किन्तु जब ये रोग प्राण ( चल ) क्षय, मांसक्षय, श्वास, तृष्णा, रसरक्तादि धातु शोप, वमन, ज्वर, मूर्च्छा, अतिसार, हिक्का इन उपद्रवों से युक्त हो तो सिद्धि चाहनेवाला इनकी चिकित्सा विशेष कर नहीं करे ॥ विमर्शः --- अष्टावेते महान्तस्तु व्याथयो दुस्तरा सदा ।

शूनं सुप्तत्वचं भग्नं कम्पाध्माननिपीडितम् । 9

नरं रुजार्त्तमन्तश्च वातव्याधिर्विनाशयेत् ॥ ७ ॥

शोथ से युक्त, सुन्नत्वचा चाले, अस्थ्यादि भग्न, कम्प और आध्मान से पीड़ित तथा वेदना और दुःख से पीड़ित मनुष्य को वातन्यधि नष्ट कर देती है ॥ ७ ॥

यथोक्तोपद्रवाविष्टमतिप्रस्रुतमेव वा ।

पिडकापीडितं गाढं प्रमेहो हन्ति मानवम् ॥ ८ ॥

अविपाक, अरुचि आदि यथोक्त उपद्रवों से पीड़ित तथा मूत्रादि का अधिक स्राव करनेवाले एव शराविका, कच्छपिका आदि पिडिकाओं से अत्यधिक पीडित मनुष्य को प्रमेह मार डालता है ॥ ८ ॥

विमर्श: - यथोक्तोपद्रवा यथा अष्टानसग्रहे - ' अविपाको रुचि -इछर्दिनिंद्रा कास सपीनस । उपद्रवाः प्रजायन्ते मेहाना कफजन्म-नाम् ॥ वस्तिमेहनयोस्तोदो मुष्कावदरण ज्वर । दाहरतृष्णाऽम्लको मूर्च्छा विड्मेद. पित्तजन्मनाम् ॥ वातिकानामुदावर्तकण्ठहृद्ग्रहलो लताः । शूलमुन्निन्द्रता शोष कास • श्वासश्च जायते ॥ ' इति ।

प्रभिन्नं प्रस्रुताङ्गञ्च रचनेत्रं हतस्वरम् ।

पञ्चकर्मगुणातीतं कुष्ठं हन्तीह कुष्ठिनम् ॥ ६ ॥

फटे शरीर वाले को, जिसके अङ्ग झरने या गलने लग गये हों, रक्तनेत्र, हतस्वर तथा पञ्चकर्म गुणों से भी अतिक्रान्त ऐसे मनुष्य को कुछ मार डालता है ॥ ९ ॥

विमर्श: - पञ्चकर्मगुणातीत के तीन अर्थ होते हैं । पांचवी | अस्थि धातु में स्थित हुये कुष्ठ के नासाभङ्गादि गुण, इन से भी अधिक गुणवाले मनुष्य को कुष्ठ मार डालता है । अधिक गुण

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श्रध्यायः ३३ ] सूत्रस्थानम् । १२७ जैसे नासामनोऽक्षिरागथ क्षते च कृमिसम्भव । भवेत् स्वरोपघातश्च सथिनसमाश्रिते । कौण्य गनिक्षयोऽनाना सभेव क्षनसर्पणन् । वस्तुतस्तु अस्थि, मना और शुक्र गत कुष्ठ लक्षण वाला कुठ मनुष्य को मार डालता है । जैसा कि कहा है- मेदोगन भवे-द्याप्यमसाध्यमत उत्तरम् । ‘ पचम नैव चोपक्रमेत् ' अन्यच चतुर्थ-कर्मगुप्तयाप्यमात्मवत संविधानवता | टरहणमते तु -पम-धात्वस्थिस्थिनं कुष्ठ, तत्र कर्माणि संशोधनसशमनाभ्यङ्गगुग्गुलु-जिन्राजतुप्रभृतीनि, तेषा गुणाः फलानि तेभ्योऽनीतम् । वमन, विरेचन, आस्थापन, शिरोविरेचन और शोगितावसेचन हुन पञ्चर्म से भी जो रोगी ठीक न हो उसे कुष्ठ मार डालता है ।

तृष्णारोचकशुलार्तमतिप्रस्तुतशोणितम् ।

शोफातीसारसंयुक्तमर्शोव्याधिर्विनाशयेत् ॥ १० ॥

तृष्णा, अरुचि और शूल से पीडित तथा जिसका रक्त अधिक निकल गया हो और शोफ तथा अतिसार से संयुक्त मनुष्य को अ मार डालता है ॥ १० ॥

वातमूत्रपुरीपाणि क्रिमयः शुक्रमेव च ।

भगन्दरात् प्रम्नवन्ति यस्य तं परिवर्जयेत् ॥

वायु, मूत्र, मल, कृमि और शुक ये जिस भगन्दर से निकलते हों उसकी चिकित्सा न करें ॥ प्रशूननाभिवृपणं रुद्वमूत्रं रुन्वितम् । अश्मरी नपयत्याशु सिकता शर्कराऽन्विता ११ ॥। मनुष्य के ११ ॥ ॥ १२ ॥

जिस रोगी की नाभि और कृपण सूज गये हों, मूत्र रुक गया हो तथा शूल हो रहा हो ऐसे मनुष्य को नश्मरी शीघ्र ही मार डालती है तथा शर्करायुक्त सिकतामेह में उपर्युक्त लक्षण होने से रोगी को मार डालते हैं ॥ १२ ॥

गर्भकोपपरासगो मक्कल्लो योनिसंवृतिः ।

हन्यात् त्रियं मूढगर्भे यथोक्ताञ्चाप्युपद्रवाः ॥ १३ ॥

गर्भकोप परासन, मक्कल शूल, योनि संवरण तथा ययोक्त उपद्रव ये मूढगर्भ में होने पर स्त्री को मार डालते हैं ॥ १३ ॥

विमर्शः - गर्भाशयस्य परोऽत्यर्थमासग. क्रियाहीनता ( Uter ine inertia ), योनिसंवृति ( Tonic spasm of uterius or tetanus uteri ) यथोक्ताश्रोपद्रवा. - विपरीतेन्द्रियार्याक्षेपकयोनि-अंश श्वासकासनमादय ।

पार्श्वभङ्गान्नविद्वेपशोफातीसारपीडितम् ।

विरिक्तं पूर्यमाणञ्च वर्जयेदुदरार्दितम् ॥ १४ ॥

पार्श्वभङ्ग, अन्न में द्वेष, शोफ, अतिसार से पीड़ित तथा विरेचन की दवा देने से उदर के खाली होने पर पुनः भर जाता हो इस प्रकार के उदर रोगी की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये ॥ १४ ॥

यस्ताम्यति विसंज्ञश्च शेते निपतितोऽपि वा ।

शीतार्दितोऽन्तरुष्णश्च ज्वरेण म्रियते नरः ॥ १५ ॥

यो हृष्टरोमा रक्तातो हृदि सङ्घातशूलवान् ।

नित्यं वक्त्रेण चोच्छ्रुस्यात्तं स्वरो हन्ति मानवम् ॥ १६ ॥।

हिक्काश्वासपिपासाऽऽत्र्त्तं मूढं विभ्रान्तलोचनम् ।

सन्ततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षपयति ज्वरः ॥ १७ ॥

आविलाक्षं प्रताम्यन्तं निद्रायुक्तमतीव च ।

चीणशोणितमांस नरं नाशयति ज्वरः ॥ १८ ॥

जो मनुष्य मुहुर्मुहुः मूच्छित अथवा बेहोश होकर शयन करता है या पड़ा रहता है एवं जो बाहर से शीत से पीड़ित और भीतर से दाह से पीडित हो ऐसा मनुष्य ज्वर से मर जाता है | जिसके शरीर के रोंगटे खडे होते हों तथा जिसकी | आंखे लाल हो एवं जिसके हृदयप्रदेश में अत्यन्त शूल होता हो तथा सदा मुख से उच्छ्वास करता हो ऐसे मनुष्य को ज्वर मार देता है । हिक्का, श्वास, पिपासा से पीडित तथा जिसका चित्त मूढ हो गया हो, नेत्र विभ्रान्त हो गये हों तथा जो निरन्तर श्वास लेता हो एवं क्षीण हो गया हो ऐसे मनुष्य को ज्वर नष्ट कर देता है जिसके नेत्र अश्रु से भर गये हों, जो अत्यन्त मोह और निद्रा से युक्त होता है तथा जिसका रक्त और मांस क्षीण हो गया हो ऐसे मनुष्य को ज्वर नष्ट कर देता है ॥ १५-१८ ॥

श्वासशूलपिपासाऽऽर्त्तं क्षीणं ज्वरनिपीडितम् ।

विशेषेण नरं वृद्धमतीसारो विनाशयेत् ॥ १६ ॥

श्वास, शूल और पिपासा से पीड़ित, क्षीण हुये, ज्वर से पीड़ित तथा विशेष कर वृद्ध मनुष्य को अतिसार नष्ट कर देता है ॥ १ ९ ॥

शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनिपीडितम् ।

कृच्छ्रेण बहु मेहन्तं यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ॥ २० ॥

जिसके नेत्र सफेद हो गये हों, जो अन्न में द्वेप रखता हो, जो ऊर्ध्वश्वास से पीड़ित हो एव अत्यन्त कृच्छ्रता से मूत्रत्याग करता हो । ऐसे मनुष्य को राजयक्ष्मा मार डालता है ॥ २० ॥

श्वासशूलपिपासाऽन्नविद्वेपग्रन्थिमूढताः ।

भवन्ति दुर्बलत्वञ्च गुल्मिनो मृत्युमेष्यतः ॥ २१ ॥

श्वास, शूल, पिपासा, अन्नविद्वेष तथा दुर्बलता ये लक्षण मृत्यु प्राप्त करनेवाले गुल्मरोगी के होते हैं ॥ २१ ॥

आध्मातं बद्धनिप्यन्दं छर्दिहिक्का तृडन्वितम् ।

रुजाश्वाससमाविष्टं विद्रधिर्नाशयेन्नरम् ॥ २२ ॥

भाध्मान से युक्त, मूत्रावरोधी, वमन, हिक्का और तृपा से युक्त तथा पीड़ा और श्वास से युक्त रोगी को अन्तर्विद्रधि नष्ट कर देती है ॥ २२ ॥

पाण्डुदन्तनखो यश्च पाण्डुनेत्रश्च मानवः ।

पाण्डुसङ्घातदर्शी च पाण्डुरोगी विनश्यति ॥

जिस मनुष्य के दन्त और नख पाण्डु रङ्ग के हो नेत्र भी पाण्डु हो जांय तथा जो सर्व पदार्थों को देखता हो ऐसा पाण्डु रोगी नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥

लोहितं छर्दयेद्यस्तु बहुशो लोहितेक्षणः ।

रक्तानान्न दिशां द्रष्टा रक्तपित्ती विनश्यति ॥

२३ ॥

जांय तथा पाण्डु ही २४ ॥ जो मनुष्य बार बार खून की उलटी ( कै ) करता हो तथा जिसके सब नेत्र लाल हो गये हों एवं जो सब दिशाओं को लाल ही देखता हो ऐसा रक्तपित्त का रोगी नष्ट हो जाता है ।