श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 181–190
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 181–190
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१२८ ' सुश्रुतसंहिता ।
अवाङ्मुखस्तून्मुखो वा क्षीणमांसबलो नरः ।
जागरिष्णुरसन्देहमुन्मादेन विनश्यति ॥ २५ ॥
जो अपना मुख नीचे को या ऊपर को रखता हो तथा । जिसका मांस और वल क्षीण हो गया हो एवं जो नींद नहीं आने से जागरण करता हो वह निश्चय ही उन्माद से मर जाता है || २५ ॥
बहुशोऽपस्मरन्तन्तु प्रक्षीणं चलितभ्रुवम् ।
नेत्राभ्याञ्च विकुर्वाणमपस्मारो विनाशयेत् ॥ २६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽवारणीयो नाम त्रयत्रिशत्तमोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
111111 जो व्यक्ति अनेक वार अपस्मार के वेग से पीडित होता हो । तथा जो क्षीण हो गया हो व जिसके भौहें चलायमान होते हों और नेत्रों में विकृति हो गई हो ऐसे मनुष्य को अपस्मार विनष्ट कर देता है ॥ २६ ॥
इत्यायुर्वेदत्तत्त्वसन्दी पिकाभाषायां सूत्रस्थानेऽवारणीयो नाम त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ २३ ॥
चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ।
अथातो युक्तसेनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अव इसके अनन्तर ' युक्तसेनीय ' नामक अध्याय का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ विमर्श. -- युक्तसेनीय - युक्ता सग्रामार्थं नियुक्तता सेना यस्य स युक्तसेनो राजा तमनिकृत्य कृतोऽध्याय • ।
युक्तसेनस्य नृपतेः परानभिजिगीषतः ।
भिषजा रक्षणं कार्यं यथा तदुपदेक्ष्यते ॥ ३ ॥
विजिगीषुः सहामात्यैर्यात्रायुक्तः प्रयत्नतः ।
रक्षितव्यो विशेषेण त्रिपादेव नराधिपः ॥ ४ ॥
शत्रुओं को जीतने की इच्छा वाले तथा सेना से युक्त राजा की रक्षा वैद्य के द्वारा जैसी होनी चाहिये उसका वर्णन किया जाता है । जय की इच्छा रखने वाले अतएव युद्ध के लिये प्रयाण किया हुआ राजा मन्त्रियों सहित विशेषरूप से चिप से रक्षित होना चाहिये ॥ ३-४ ॥ पन्थानमुदकं छायां भक्तं यवसमिन्धनम् ।
दूपयन्त्यरयस्तच्च जानीयाच्छोधयेत्तथा ।
तस्य लिङ्गं चिकित्सा च कल्पस्थाने प्रवक्ष्यते ॥ ५ ॥
शत्रु राजा के मार्ग, जल, छाया, भोजन, हाथी घोड़ों के वास तथा जलाने की लकड़ी, एवं कण्डे को विप से दूषित कर देते हैं अतएव वैद्य लक्षणों से उनकी दृष्टि का ज्ञान करके उनका शोधन करे | उनकी दृष्टि के लक्षण तथा चिकित्सा ' क्ल्पस्थान ' में कही जायगी ॥ ५ ॥
एकोत्तरं मृत्युशतमथर्वाणः प्रचक्षते ।
तत्रैकः कालसंयुक्तः शेषा आगन्तवः स्मृताः ॥ ६ ॥
अथर्ववेद को जानने वाले एक सौ एक मृत्यु मानते हैं ।
इनमें से एक काल मृत्यु है तथा शेष सब आगन्तुक हैं ॥ ६ ॥
विमर्श: - कहीं कहीं इस श्लोक के वाट निम्न श्लोक है । विष्वग्वातादिभिर्यद्वद्दीपो वत्र्त्यादिसयुत । निर्वात्यते क्षणाद्देही तथैवा-गन्तुमृत्यु || अकालमृत्यवो यथा -- जलमग्निर्विषं शस्त्र स्त्रियो राजकुलानि च । अकालमृत्यवो ह्येते तेभ्यो विभ्यति पण्डिताः ॥
दोषागन्तुजमृत्युभ्यो रसमन्त्रविशारदौ ।
रक्षेतां नृपतिं नित्यं यत्तौ वैद्यपुरोहितौ ॥ ७ ॥
रसविशारद वैद्य तथा मन्त्रविशारद पुरोहित वातादि दोप, अभिघात, अभिचार, अभिशाप, अभिपद्म तथा विप इन भागन्तुक कारणों से जो मृत्यु होती है उससे सदा राजा की यत्नपूर्वक रक्षा करे ॥ ७ ॥
ब्रह्मा वेदाङ्गमष्टाङ्गमायुर्वेदमभापत ।
पुरोहितमते तस्माद्वर्तेत भिषगात्मवान् ॥ ८ ॥
ब्रह्मा ने वेदों के अगभूत शल्य, शालाक्यादि आठ अङ्ग वाले आयुर्वेद को कहा है अतएव आत्मज्ञानी वैद्य पुरोहित मतानुसार चिकित्लादि कार्य करे ॥ ८ ॥
सङ्करः सर्ववर्णानां प्रणाशो धर्मकर्मणाम् ।
प्रजानामपि चोच्छित्तिर्नृपव्यसनहेतुतः ॥ ६ ॥
राजा के व्यसनी ( कुमार्गी ) होने से ब्राह्मणादिक सर्व वर्णों का संकर, धर्म तथा यज्ञादि कर्मों का विनाश और प्रजा । का क्षय होता है ॥ ९ ॥
विमर्श: -- वर्णसकर हेतु -- व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च । स्वकर्मणा त्यागेन जाय ते वर्णंसकरा ॥ ( मनु ० ) । चारों वर्णों का नाश होकर वर्णरहित प्रजा होना, अनुलोम, ' प्रतिलोम विवाह तथा वर्णविहित कर्म का त्याग वर्णसंकर में हेतु है ।
पुरुषाणां नृपाणाञ्च केवलं तुल्यमूर्त्तिता ।
आज्ञा त्यागः क्षमा धैर्य विक्रमश्चाप्यमानुषः ॥ १० ॥
तस्माद्देवमित्राभीक्ष्णं वाङ्मनः कर्मभिः शुभैः ।
चिन्तयेन्नृपति वैद्यः श्रेयांसीच्छन् विचक्षणः ॥ ११ ॥
साधारण मनुष्य तथा राजाओं में शरीर को समानता होती है किन्तु राजाओं में आज्ञा, दानादि सत्कार्य में धन का त्याग, क्षमा, धीरज और अमानुष अर्थात् दैविक पराक्रम ये विशेष होते हैं इसलिये निरन्तर देवता की तरह शुभ वाणी, मन और कर्म से कल्याण चाहने वाला विचारशाली वैद्य राजा के शरीर - रक्षण की चिन्ता करे ॥ १०-११ ॥ विमर्शः - नृपवैशिष्टयम् -- रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् । प्रभु । इन्द्रानिलय मार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च ॥ चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वती । यस्मादेषा सुरेन्द्राणा मात्राभ्यो निर्मितौ । नृप. ॥ तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा । बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिप । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ ( मनु ) ।
स्कन्धावारे च महति राजगेहादनन्तरम् ।
भवेत् सन्निहितो नित्यं सर्वोपकरणान्वितः ॥ १२ ॥।
तत्रस्थमेनं ध्वजवद्यशः ख्यातिसमुच्छ्रितम् ।
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श्रध्यायः ३४ ] सूत्रस्थानम् । १२६
उपसर्पन्त्यमोहेन विषशल्यामयादिताः ॥ १३ ॥
स्वतन्त्रकुशलोऽन्येषु शास्त्रार्थेष्वबहिष्कृतः ।
वैद्य इवाभाति नृपतद्विद्यपूजितः ॥ १४ ॥
बडे स्कन्धावार ( लश्कर की छावनी या Camp ) में राजा के निवास के पास ही सर्व साधनों के सहित वैद्य को सुसजित रहना चाहिये । वहां पर पताका की तरह यश और ख्याति से विख्यात ऐसे चिकित्सक के पास विप शल्य और रोगों से पीडित मनुष्य बिना मोह ( शंका ) के उपस्थित होते हैं | अपने तन्त्र अर्थात् वैद्यविद्या में निपुण तथा वैद्यकोपयोगी अन्य ( न्याय, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष ) शास्त्रों में भी आवश्यक ज्ञान रखने वाला ऐसा चिकित्सक राजाओं तथा वैद्य से सम्मानित होकर पताका की तरह सर्वोपरि सुशोभित होता है ॥ १२-१४ ॥ विमर्शः — स्कन्धार्थं सैन्यार्थमावार. = युद्धार्थमुयुक्ताना सैन्याना सन्निवेश ' । सर्वोपकरणान्वित. - यन्त्र, शस्त्र, क्षारौषध, बन्धन, कुशा तथा सैनिक सेवा सुश्रूषा करने को स्त्रियां ( Nurses ) भी हों ।
वैद्यो व्याभ्युपसृष्टच भेषजं परिचारकः ।
एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः ॥ १५ ॥
गुणवद्भिस्त्रिभिः पादैश्चतुर्थो गुणवान् भिषक् ।
व्याधिमल्पेन कालेन महान्तमपि साधयेत् ॥ १६ ॥
वैद्य, रोगी, औषध तथा परिचारक ये चिकित्सा के च पाद हैं तथा धातु साम्यरूपी या आरोग्यरूपी कर्म की सिद्धि में कारण हैं । अपने अपने गुणों से युक्त रोगी, औषध और परि चारक इन तीन पादों से युक्त चौथा गुणवान् वैद्य बढी भारी ब्याधि को भी थोड़े समय में ठीक कर देता है ॥ १५-१६ ॥
वैद्यहीनास्त्रयः पादा गुणवन्तोऽप्यपार्थकाः ।
उद्गातृोवृत्रह्माणो यथाऽध्वर्युं विनाऽध्वरे ॥ १७ ॥
वैद्यस्तु गुणवानेकस्तारयेदातुरान् सदा ।
प्लवं प्रतितरैर्हीनं कर्णधार इवाम्भसि ॥ १८ ॥
वैसे रहित तीन पाद गुणयुक्त होने पर भी निरर्थक हो जाते हैं जैसे यज्ञ में अर्ध्वयु ( उपाध्याय ) के बिना उद्गाता ( सामवेद गायक ), होता ( ऋग्वेदज्ञ ) और ब्रह्मा ये निरर्थक होते हैं । गुणवान् एक ही वैद्य रोगियों को रोगरूपी समुद्र से सदा पार कर देता है जैसे कि जल में फॅसी हुई तथा अन्य प्रतितरों ( मल्लाहों ) से रहित नौका को कुशल कर्णधार तार देता है ॥ १७-१८ ॥ विमर्शः — चिकित्सापादचतुष्टयम् - भिपग् द्रव्याण्यधिष्ठाता रोगी पादचतुष्टयम् । गुणवत्कारणं ज्ञेय विकारव्युपशान्तये ॥ वैद्यप्रधानता-विधाता शासिता योक्ता प्रधान भिषगत्र तु । पक्तौ हि कारण पक्तुर्यथा पात्रैन्धनानला ' ॥ विजेतुर्विजये भूमिश्चम् प्रहरणानि च स्तथा सिद्धौ पादा कारणसचिता ॥ मृद्दण्टचक्रमुत्रापा दृते यथा । न वहन्ति गुण वैधाइते पादत्रय तथा ॥ तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयङ्कृती लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः ॥
प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी विशारद. ।
सत्यधर्मपरो यच स भिषक् पाद उच्यते ॥
१७ सु ०
। आतुराद्या-कुम्भकारा-।
१६ ॥
२० ॥
वैद्यगुण - जिसने यथार्थरूप से शास्त्र के अर्थ को पढ़ाया समझा हो, स्वयं जिसने प्रथम औषधनिर्माण तथा चिकित्सादि कर्म को देखा हो एवं फिर अपने आप रस - भस्मादि निर्माण व चिकित्सादि कार्य किया हो, जिसका हाथ लघु या हलका हो, एवं शुचि, शूरवीर, सर्व प्रकार की साधन सामग्री सज ( तैय्यार ) रखता हो, जिसकी बुद्धि प्रत्युत्पन्न अर्थात् सद्यः उचित निर्णय देनेवाली हो, बुद्धिमान्, व्यवसाय करने वाला, सर्व क्रियाओं में विशारद ( दक्ष ) तथा सत्य और धर्म में तत्पर हो ऐसा मनुष्य भिषक्पाद कहा जाता है ॥ १ ९ –२० ॥
आयुष्मान् सत्त्ववान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि ।
आस्तिको वैद्यवाक्यस्थो व्याधितः पाद उच्यते ॥ २१ ॥
रोगिगुण - आयुष्मान् सत्त्ववान्, साध्य, रुपये पैसे वाला, आत्मवान्, भास्तिक तथा वैद्य के कथन को मानने वाला ' व्याधितपाद ' कहा जाता है ॥ २१ ॥
विमर्श: - आढ्यो रोगी भिपग्वश्य. । शापकत्वञ्च रोगाणामातुरस्य गुणा स्मृता ॥
प्रशस्तदेशसम्भूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् ।
युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ २२ ॥
दोषघ्नमग्लानिकरमविकारि विपर्यये ।
समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ॥ २३ ॥
ओषधिगुण - अच्छी भूमि में उत्पन्न हुई, अच्छे दिन में उखाड़ी हुई, योग्य मात्रा में दी हुई, मन को प्रसन्न करनेवाली गन्ध, वर्णं तथा रस से युक्त दोपनाशक, ग्लानि नहीं करने वाली, पथ्यादि विपर्यय होने पर भी अन्य विकार नहीं करने वाली, परीक्षा करके योग्य समय पर दी हुई औषध भेषजवाद कही जाती है ॥ २२-२३ ॥
स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे ।
वैद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः ॥ २४ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने युक्तसेनीयो नाम चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
---परिचारक गुण रुग्ण में स्नेह रखने वाला, रोगी के मल-मूत्र -वमनादि करने पर निन्दा या घृणा नहीं करने वाला, बलशाली, रोगी को रक्षा में तन - मन से लगा हुआ, वैद्य के वाक्य के अनुसार रोगी की सेवा करने वाला तथा अधिक काम करने पर भी नहीं थकने वाला परिचारकपाद कहलाता है ॥ विमर्शः - उपचारता दाक्ष्यमनुरागश्च भर्तरि । शोचेति चतुष्कोऽय गुण. परिचरे जने ॥ ( चरक ) । पाश्चात्य देशों में परिचर्या करने के लिये पुरुषों की अपेक्षा त्रियों ( Nurses ) का प्रचार अधिक है । उनमें सेवा करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है तथा उनसे पुरुष का मन, हृदय आत्मा अधिक प्रफु ल्लित होने से रोगनिवृत्ति में अच्छा सहारा मिटता है । वाग्भट तथा चरक के मतानुसार वंद्य, द्रव्य, परिचारक और रोगी इन प्रत्येक के चार चार गुणों को मिटाने से सोलह गुण होने से चिकित्सा को पोडशगुण या पोढशक्लायुक्त मानी
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१३० सुश्रुतसहिता । है— कारण घोडशगुण सिद्धौ पादचतुष्टयम् । चतुष्पाद पोडशकल भेषज मिति भिपजो भाषन्ते ॥ इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां सूत्रस्थाने युक्तसेनीयो नाम चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
- ~
अथ पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः ।
अथात आतुरोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर ' आतुरोपक्रमणीय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ आतुरमुपक्रममाणेन भिषजाऽऽयुरादावेव परीक्षि-तव्यम् । सत्यायुषि व्याध्यत्वग्निवयोदेहबलसत्त्वसात्म्य-प्रकृतिभेषज देशान् परीक्षेत ॥ ३ ॥
रुग्ण की चिकित्सा शुरू करने के पूर्व वैद्य प्रथम उसकी आयु की परीक्षा करे । क्योंकि आयु के शेष होने पर ही रोग, ऋतु, अग्नि, वय, देह, वल, सत्त्व, सात्म्य, प्रकृति, भेषज और देश इनकी परीक्षा करनी चाहिये ॥ ३ ॥
विमर्श: - यह दोपादि प्रकृति के अनुसार दीर्घायु, मध्यायु और अल्पायु का विचार किया गया है । आयु प्रमाणज्ञानोपाया प्रमाणमायुपस्त्वर्थेन्द्रियमनोबुद्धिचेष्टादीना विकृतिलक्षणैरुपलभ्यतेऽ-निमित्तै । देहप्रकृतिलक्षणमधिकृत्य चोपदिष्टमायुष प्रमाणमायुर्वेदे | श्लेष्मला आयुष्मन्तश्च भवन्ति, पिप्तला मध्यायुषो भवन्ति, वातला अल्पायुपश्च भवन्ति । ( चरक ) । आयु प्रमाणज्ञानप्रयोजनम्— औषध मङ्गल मन्त्रो धन्याश्च विविधा क्रिया । यस्यायुस्तस्य सिद्धयन्ति न सिधन्ति गतायुष ॥ ( योगरत्नाकर ) । तत्र महापाणिपादपार्श्वपृष्ठस्तनाग्रदशनवद्नस्कन्ध-ललाटं दीर्घाङ्गुलिपर्वोच्छ्रास प्रेक्षणबाहुं विस्तीर्ण स्तना-न्तरोरस्कं हस्वजङ्घा मेवं गम्भीरसत्त्वस्वरनाभि-मनुच्चैर्बद्धस्तनमुपचितमहारोमशकर्ण पश्चान्मस्तिष्कं स्नातानुलिप्तं मूर्द्धानुपूर्व्या विशुष्यमाणशरीरं पश्चाश्च विशुष्यमाणहृदयं पुरुषं जानीयाद्दीर्घायुः स्वल्व-यमिति । तमेकान्तेनोपक्रमेत् । एभिर्लक्षणैर्विपरीतैर-ल्पायुः, मिश्रैर्मध्यमायुरिति ॥। ४ ॥ दीर्घाल्पमिश्रायु लक्षण --- जिस पुरुष के हाथ, पैर, पसवादे, पीठ, स्तनाग्र, दांत, मुख, कंधा और ललाट ये अधिक बड़े हों तथा अंगुलियां, उनके पर्व, श्वास, नेत्र और बाहु ये लम्बे हों एवं भौं, स्तनमध्यभाग तथा छाती विस्तीर्ण हो, जङ्घा, शिश्न और ग्रीवा ये छोटे हों, सत्त्व ( मन या स्वभाव या सात्विक वृत्ति ), स्वर और नाभि ये गहरे हों, जिसके स्तन न अधिक ऊँचे और न अधिक कड़े हों, जिसके कान मांसयुक्त, विस्तीर्ण और लोमयुक्त हों, जिसका मस्तिष्क या खोपड़ी पीछे से अधिक ऊँची हो, स्नान और अनुलेपन करने के पश्चात् मस्तिष्क की तरफ से जिसका शरीर सूखने लगता हो तथा बाद में हृदयप्रदेश सुखता हो ऐसे पुरुष को निश्चय ही दीर्घायु समझना चाहिये तथा उसकी चिकित्सा निःशंक होकर करनी चाहिये । उक्त लक्षणों से विपरीत लक्षण वाले को अल्पायु समझो तथा मिले हुये लक्षणों से मध्यमायु जानना चाहिये ॥ भवन्ति चात्र-गूढसन्धिसिरास्नायुः संहताङ्गः स्थिरेन्द्रियः उत्तरोत्तर सुक्षेत्रो यः स दीर्घायुरुच्यते ॥ ५
गर्भात् प्रभृत्यरोगो यः शनैः समुपचीयते ।
शरीरज्ञानविज्ञानैः स दीर्घायुः समासतः ॥
दीर्घायु लक्षण - जिस मनुष्य की सन्धियां, स्नायु ये मांस की अधिकता होने से ढके हों, अन
।
॥ -६ ॥
सिरा और गठीला हो, इन्द्रियां स्थिर हों एवं पैरों से शिर की तरफ उत्तरोत्तर अङ्ग सुडौल हों वह दीर्घायु कहलाता है । जो व्यक्ति गंर्भ धारण से लेकर जन्म होने तथा उसके बाद से भी रोगरहित हो तथा जिसका शरीर ज्ञान और विज्ञान ये धीरे धीरे अवस्थानुसार वद रहे हों वह साधारणतया दीर्घायु है ॥ ५-६ ॥ विमर्श - ' चक्र ' के अनुसार उत्तरोत्तर सुक्षेत्र का अर्थ-उत्तरोत्तरदीर्घायु. पुरुषकुलजात, क्षेत्र प्रभवस्थानमिह कुलपुरुषा । जो बच्चे छोटी आयु में बुद्धि आदि में विलक्षण होते हैं वे अक्सर अल्पायु होते हैं यह निश्चित ही है । व्यञ्जनादिशुभा
विद्या मेदोमेधादयो यशः । अल्पे वयसि यस्यैतन्न स जीवेत् कदाचन ॥
मध्यमस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे । " अधस्तादक्षयोर्यस्य लेखाः स्युर्व्यक्तमायताः ॥ ७ ॥
arrals धिका वापि पादौ कर्णौ च मांसलौ ।
नासाग्रमूर्ध्वञ्च भवेदूर्ध्व लेखाश्च पृष्ठतः ॥
यस्य स्युस्तस्य परममायुर्भवति सप्ततिः ॥ ८ ॥
मध्यमायु लक्षण -- इसके अनन्तर मध्यम आयु का ज्ञान । मेरे से जानो । जिस मनुष्य के नेत्रों के नीचे दो, तीन या अधिक लम्बी तथा साफ रेखायें दिखाई देती हों तथा पांव और कान मासल हों, नासा का अग्रभाग ऊपर की ओर उठा हुआ हो तथा पीठ पर ऊर्ध्वमुखी रेखाएं हों उसकी ज्यादा से ज्यादा सत्तर वर्ष की आयु होती है ॥ ७-८ ॥
जघन्यस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे ।
हस्वानि यस्य पर्वाणि सुमहच्चापि मेहनम् ॥ ६ ॥
तथोरस्यवलीढानि न च स्यात् पृष्ठमायतम् ।
- ऊर्ध्वं च श्रवणौ स्थानान्नासा चोच्चा शरीरिणः ॥ १० ॥
हसतो जल्पतो वाऽपि दन्तमांसं प्रदृश्यते ।
प्रेक्षते यश्च विभ्रान्तं स जीवेत्पञ्चविशतिम् ॥ ११ ॥
अल्पायु लक्षण - इसके अनन्तर हीनायु के लक्षण मेरे से जानो । जिस मनुष्य के अड्डुलिपर्व छोटे तथा शिश्न दीर्घ हो एवं पर्शुकाएं छाती में अवलीढ ( दवी ) हों और पीठ चौड़ी न हो । जिसके कान अपने स्वभाविक स्थान से ऊंचे उठे हों तथा नासा भी कुछ ऊंची हो एवं हंसते तथा बोलते दांतों के ( मसूढे ) दिखाई देते हों और जो विभ्रान्त होकर ( आंख घुमाते हुये ) देखता हो वह मनुष्य पच्चीस वर्षं तक जीवित रहता है ॥ ९ -११ ॥ विमर्श: - विकृत छाती पंखवत् ( Alar ), चपटी ( Flat )
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Ho ३५ ] सूत्रस्थानम् । १३१ ....... की भांति ( Pigeon ), कुबड़ी ( Reokety ), बेलनाकार । 1 ) आदि रूप की होती है । उक्त प्रकार की छाती वालों में राजयक्ष्मा होने की अधिक सम्भावना रहती है । अथ पुनरायुपो विज्ञानार्थमग प्रत्यङ्ग प्रमाणसारानुप-देक्ष्यामः । तत्राङ्गान्यन्तराधिसक्थिबाहुशिरसि तदूव यवाः प्रत्यङ्गानीति । तंत्र, स्वैरङ्गुलैः पादाङ्गुष्टप्रदेशि-न्यौ द्व्यङ्गुलायते । प्रदेशिन्यास्तु मध्यमाऽनामिकाकनि-ष्टिका यथोत्तरं पञ्चमभागहीनाः । चतुरङ्गुलायते पञ्चा-हुलविस्तृते प्रपदपादतले । पञ्चचतुरङ्गुलायतविस्तृता पार्ष्णिः । चतुर्दशाङ्गुलायतः पादः । चतुर्दशाङ्गुलपरि-णाहानि पाढगुल्फजङ्घाजानुमध्यानि । अष्टादशाङ्गुला
जङ्घा, जानूपरिष्टाच्च द्वात्रिंशदङ्गुलमेवं पञ्चाशत् ।
जङ्घायामसमावूरू ॥। १२ ॥
शरीर प्रमाण वर्णन – आयुष्य के ज्ञान के लिये शरीर के अङ्ग और प्रत्यह्नों के प्रमाण तथा सार इनका वर्णन करते हैं । उनमें शरीर का मध्यभाग ( अन्तरावि ), दो सक्थि ( टाँगें ), दो बाहु और शिर ये है अन ( पढन ) कहलाते हैं तथा उनके अवयव प्रत्यङ्ग कहलाते हैं । उनमें अपने अङ्गुलों से पांव के अगूठे और प्रदेशिनी की लम्बाई दो दो अगुल होती है । प्रदेशिनी से मध्यमा, मध्यमा से अनामिका और अना-मिका से कनिष्ठिका क्रमशः पांचवां भाग कम होती जाती है । प्रपद और पादतल चार अड्गुल लम्बे और पांच अङ्गुल चौड़े होते हैं । एढी पांच अद्गुल लम्बी और चार अड्डुल चौड़ी होती है । पांव चौदह अङ्गुल लम्बा होता है । पांव का मध्य, गुल्फ का मध्य, जंघा का मध्य तथा घुटने का मध्य भाग चौदह अद्गुल परिणाह के होते हैं । जङ्घा अट्ठारह अड्डुल लम्बी होती है । जानु सन्धि से ऊपर कटिसन्धि तक का भाग बत्तीस नगुल लम्बा होता है । इस तरह जंबा, जानु और ऊपर का भाग मिलकर सबकी लम्बाई पचास अड्गुल होती है । लंबा के समान प्रमाण के ऊरु अर्थात् भट्ठारह अगुल लम्बे होते हैं ॥ १२ ॥
विमर्श: - आयाम, दैर्घ्य, लम्बाई ( Length ), विस्तार, ब्यास, चौड़ाई ( Breadh ) । परिणाह - परिवर्तुत्व, घेरा ( Circumference ) । पाद के तीन विभाग होते हैं । ( १ ) प्रपद — अङ्गुल्यन्तरं पादाग्रन् । ( इन्डु ) । Part of the foot antarior to the arch । ( २ ) पादतल - पादमध्य ( Aroh of the foot ) । ( ३ ) पारिंग, एडी, खुड्डिका भाग । द्व्यङ्गुलानि वृषणचिवुकदशननासापुटभागकर्णमू लनयनान्तराणि । चतुरङ्गुलानि मेहनवदनान्तरनासा -कर्णललाटग्रीवोच्छ्रायदृष्ट्यन्तराणि । द्वादशाङ्गुलानि भगविस्तारमेह्ननाभिहृदयग्रीवास्तनान्तरमुखायाममणि-वन्धप्रकोष्ठस्थौल्यानि । इन्द्रबस्तिपरिणाहांसपीठकूर्प-रान्तरायामः घोडशाङ्गुलः । चतुर्विंशत्यङ्गुलो हस्तः । द्वात्रिंशदङ्गुलपरिमाणौ भुजौ । द्वात्रिंशत्परिणाहावूरू । मणिबन्धकूर्परान्तरं षोडशाङ्गुलम् । तलं षट्चतुर-गुलायामविस्यारम् । अङ्गुष्ठमूलप्रदेशिनीश्रवणापा-द्वान्तरमध्यमाङ्गुल्यौ पञ्चाङ्ले | अर्द्धपञ्चाङ्गुले प्रदेशि-न्यनामिके | सार्घत्र्यङ्गुलौ कनिष्ठाङ्गुष्ठौ ॥ १३ ॥
वृषण ( अण्ड ग्रन्थियां ), ठोढी, दांत, नासापुट, कर्णमूल और नेत्रों का मध्यभाग ये दो दो अड्डुल के होते हैं । शिरन, मुख, नासावंश, कर्ण, ललाट, ग्रीवा और दृष्टिमण्डल के बीच का अन्तर ये सब चार चार अड्डुल के होते हैं । भग ( योनि ) विस्तार, शिश्न और नाभि का अन्तर, नाभि और हृदय का अन्तर, हृदय और ग्रीवामूल का अन्तर, दोनों स्तनबीच का अन्तर, टोडी से ललाट के अन्त तक मुख की लम्बाई एवं मणिबन्ध और प्रकोष्ठ का परिणाह ( गोलाई ) ये प्रत्येक वारह बारह अङ्गुल के होते हैं । इन्द्रवस्ति अर्थात् जंघा के मध्य का परिणाह, स्कन्ध और कोहनी के मध्य का अन्तर ये सोलह अड्डुल के होते हैं । कोहनी से मध्यमा अङ्गुली के अग्र तक चौवीस अङ्गुल का हस्त होता है । दोनों भुजाएं वत्तीस अङ्गुल की होती हैं । दोनों ऊरु प्रत्येक वत्तीस अड्गुल के घेरे वाले होते हैं । मणिबन्ध से कोहनी तक की लम्बाई सोलह अड्गुल की होती है । हथेली चार अङ्गुल चौड़ी और छ अड्डुल लम्बी होती है । अङ्गुष्ठ के मूलभाग से तर्जनी का अन्तर, नेत्र के वाह्यकोण का अन्तर एवं मध्यमाङ्गुली की लम्बाई प्रत्येक पांच पांच अङ्गुल होती है । प्रदेशिनी तथा अनामिका साढ़े चार अङ्गुल की एवं अङ्गुष्ठ और कनिष्ठिका साढ़े तीन अङ्गुल के होते है ॥ १३ ॥
चतुर्विशतिविस्तार परिणाहं मुखग्रीवम् | त्रिभागा-झूलविस्तारा नासापुटमर्यादा | नयनत्रिभागपरिणाहा तारका | नवमस्तारकांशो दृष्टिः । केशान्तमस्तकान्त-रमेकादशाङ्गुलम् । मस्तकादवटुकेशान्तो दशाङ्गुलः । कर्णावट्वन्तरं चतुर्दशाङ्गुलम् । पुरुपोरःप्रमाणविस्तीर्णा खीश्रोणिः । अष्टादशाङ्गुलविस्तीर्णमुरः । तत्प्रमाणा । पुरुषस्य कटी । सविंशमङ्गुलशतं पुरुषायाम इति ॥ १४ ॥
मुख चार अड्गुल चौड़ा तथा ग्रीवा बीस अड्डुल चारों ओर से गोल ( वर्तुल ) होती है । 13 अड्गुल नासापुट का विस्तार होता है । नेत्र के आयाम का तिहाई कृष्णमण्डल ( Cornea ) होता है । कृष्णमण्डल का नवमांश दृष्टिमण्डल । होता है । केशों के अन्त ( शंखप्रदेश ) से शिरोमध्यभाग ग्यारह अङ्गुल का होता है । मस्तकमध्यभाग से ग्रीवा पश्चिमभाग का केशान्त प्रदेश दस अङ्गुल का होता है । कर्ण और अवटु का बीच का भाग चौदह अङ्गुल का होता है । मनुष्य की छाती के प्रमाणानुसार विस्तीर्ण स्त्रीश्रोणी होती है । स्त्रियों की छाती अट्ठारह अङ्गुल की होती है तथा उसके बराबर पुरुषों की कटि होती है । इस तरह पुरुष के समस्त शरीर की लम्बाई एक सौ बीस अङ्गुल की होती है ॥ १४ ॥
विमर्शः - तारका - कृष्णमण्डल ( Cornea ) नेत्रायामत्रि-भागन्तु कृष्णमण्डलमुच्यते । दृष्टि, पुतली, ( Papil ) यह आंख के परदे ( Iris ) का छेट है । इसे े माना है । कृष्णात् सप्तम्-मिच्छन्ति दृष्टि दृष्टिविशारदा । आंख का पर्दा मांस तन्तुओं से
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सुश्रुतसंहिता । १३२ बना है । इसमें जो तन्तु चक्र के समान वर्तुलाकार लगे है । मुत्तमबलं स्निग्धगम्भीरस्वरं सौभाग्योपपन्नं महानेत्र उनके संकोच से पुतलो छोटी होती है तथा जो तन्तु पहिये मज्ञा | महाशिरः स्कन्धं दृढदन्तहन्वस्थिनखमस्थि-के बारे के समान लगे हैं उनके संकोच से पुतली मोटी हो भिः । स्निग्धमूत्रस्वेदस्वरं बृहच्छरीरमायासासहिष्णुं जाती है । दृश्य की वस्तु की दूरता, समीपता तथा प्रकाश की तीव्रातीव्रता के अनुसार दृष्टिमण्डल के परिमाण में परि वर्तन होता रहता है । सुन पुरुष की लम्बाई १२० अङ्गुल मानता है किन्तु चरक, अष्टाङ्गसग्रह, अष्टाङ्गहृदय तथा कौटिलोय अर्थशास्त्र ने पुरुष को लम्बाई ८४ अड्डुल ही मानी है 1 । चक्रपा-दिच सुश्रुत की मानुमती टीका में सुश्रुत के अड्डलिमान को अल्प मानकर चरकादि के साथ होने वाले विरोध का परिहार । कर दिया है । टहणाचार्य ने पादाग्र पर खड़े हुये और ऊपर हाथ उठाये हुए पुरुष का पादाग्र से हस्ताग्र तक का यह ( १२० अङ्गुल ) आयाम है । ऐसे विरोध परिहार किया है ।
भवन्ति चात्र-पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ।
समत्वागतवीर्य्यो तौ जानीयात् कुशलो भिषक् ॥ १५ ॥
पुरुष पच्चीसवें वर्ष तथा स्त्री सोलहवें वर्ष में समान वीर्य या परिपूर्ण वीर्य हो जाते हैं ऐसा कुशल वैद्य जान लेवे ॥१५ ॥
विमर्श: - स्त्री और पुरुष जव यौवनावस्था में प्रवेश करते हैं तब स्त्रियों में आर्त्तव और स्त्रीबीज ( Ova ) एवं पुरुषों में वीर्य का निर्माण प्रारम्भ होता है । साधारणतया स्त्री में १२ वर्ष की आयु तथा पुरुष में १६ वर्ष की आयु मानी है । इस समय दोनों की वीजग्रन्थियों ( Testes and overy ) में जो अन्तः-स्राव बनता है वह रक्त के साथ मिलकर शरीर के समस्त अङ्ग - प्रत्यङ्गों में जाकर उन्हें प्रबल और पुष्ट बनाता है । इसके पूर्व कवी आयु में मैथुन तथा सन्तानोत्पत्ति करना दोनों की शरीर की वृद्धि में रुकावट डालता है तथा जायमान सन्तति जीवित नहीं रहती या निर्वल और सदा रोगी; रहने वाली उत्पन्न होती है । इसके लिये १६ वर्ष की स्त्री तथा २५ वर्ष का पुरुष योग्य माना है । ऊनपोडशवर्षायामप्राप्त पञ्चविंशतिम् । यद्याथत्ते पुमान् गर्भ कुश्चिस्थ स विपद्यते ॥ जातो वा न चिरञ्जीवेद
जोवेदा दुईलेन्द्रिय । तस्मादत्यन्तनालाया गर्भाधान न कारयेत् ॥
मेदसा । अच्छिद्रगात्रं गूढास्थिसन्धि मांसोपचितञ्च मांसेन | स्निग्धताम्रनखनयनतालुजिह्वौष्ठपाणिपादतलं रक्तेन । सुप्रसन्नमृदुत्वग्रोमाणं त्वक्सारं विद्यादिति येषां । पूर्वं पूर्व प्रधानमायुः सौभाग्ययोरिति ॥ १८ ॥
अव मनुष्य के सारों का वर्णन करते हैं । स्मृति, भक्ति, प्रज्ञा, शौर्य और शौच ( पवित्रता ) से युक्त एवं शुभ कार्यों में प्रयत्न करने वाले व्यक्ति को सत्त्वसार जानो । स्निग्ध और गठीला शरीर वाले तथा जिसके अस्थि, दांत और नख श्वेत हों और कामशक्ति तथा प्रजा ( सन्तान ) अधिक हो उसे शुक्रसार जानो । दुर्वलता से रहित, उत्तम वल वाला, स्निग्ध और गम्भीर स्वर वाला, सौभाग्य लक्षणों से युक्त और बड़े नेत्रों वाला मनुष्य मज्जसार का होता है । जिसका शिर और कन्धा वढा हो तथा दांत, हनु, अस्थि और नख, ये दृढ हों उसे अस्थिसार जानो । जिसके मूत्र, स्वेद और स्वर में स्निग्ध-ता हो और शरीर बड़ा हो तथा परिश्रम को सहन करने का सामर्थ्य न हो उसे नेदसार जानना चाहिये । जिसके शरीर में छिद्र न हों तथा अस्थियां और सन्धियां मांस से खूब ढकी हो और मांस बढा हुआ हो उसे माससार युक्त कहते हैं । जिस मनुष्य के नख, नेत्र, तालु, जिह्वा, ओष्ठ, पाणितल और पादतल ये चिकने और ताम्र ( लाल सुर्ख ) हों उसे रक्तसार । जानो । जिसको त्वचा तथा रोम सुप्रसन्न और मुलायम हो वह वक्सार युक्त है । इन सारों में पूर्व पूर्व के सार वाले मनुष्यों को आयु तथा सौभाग्य की दृष्टि से प्रधान समझना | चाहिये ॥ १८ ॥
विमर्श: सर्वसारयुक्त पुरुपलक्षण चरके - तत्र सर्वैः सारैरुपेता पुरुषा भवन्त्यतिवला परमगौरवयुक्ताः क्लेशसहा; सर्वारम्भेष्वा-त्मनि जातप्रत्यया कल्याणामिनिवेशिन, मन्दजरसो मन्दविकाराः प्रायस्तुल्यगुणविस्तीर्णापत्याश्चिरजीविनश्च प्रायो भवन्ति । ( सुश्रुत ) । सोलह वर्ष की स्त्री तथा २० वर्ष का पुरुष यह विशेषतोऽङ्गप्रत्यङ्ग प्रमाणादथ सारतः । आयुमर्यादा सन्तानोत्पत्ति की दृष्टि से होनी ही चाहिये । परीक्ष्यायुः सुनिपुणो भिषक् सिध्यति कर्मसु ॥ १६ ॥
देहः स्वैरङ्गुलै रेप यथावदनुकीत्तितः । विशेषरूप से शरीर के अङ्ग तथा प्रत्यह्नों के प्रमाणों और युक्तः प्रमाणेनानेन पुमान् वा यदि वाऽङ्गना || १६ || सार की परीक्षा कर के सुनिपुण वैद्य चिकित्सा कर्म में सफ-दीर्घमायुरवाप्नोति वित्तञ्च महच्छति । लता प्राप्त कर सकता है ॥ १ ९ ॥ मध्यम मध्यमैरायुवित्तं हीनैस्तथाऽवरम् ॥ १७ ॥ व्याधिविशेपास्तु प्रागभिहिताः । सर्व एवैते त्रिवि -इस तरह अपने अपने अड्डुल प्रमाणों से यथावत् इस धाः - साध्या, याप्याः, प्रत्याख्येयाश्च । तत्रैतान् भूयस्त्रि-देह के प्रमाण का वर्णन कर दिया है । इस प्रमाण से युक्त | धा परीक्षेत किमसावौपसर्गिकः, प्राक्केवलः, अन्य-पुरुष अथवा स्त्री दोनों दीर्घ आयु तथा सम्पत्ति को प्राप्त करते
हैं । मध्यम प्रमाण वाले मध्यम वायु तथा धन प्राप्त करते हैं लक्षण इति ॥ २० ॥
और हीन प्रमाण वाले हीन ( कम ) आयु तथा अल्प धन प्राप्त आये व्याधियों हैं की विशेषताओं को पहले प्रथमाध्याय में कह करते हैं ॥ १६-१७ ॥ । ये सर्वप्रकार की न्याधियां साध्य, याप्य और प्रत्या-अथ सारान् वक्ष्यामः - स्मृतिभक्तिप्रज्ञा ख्येय भेद से तीन प्रकार की होती हैं । उनमें से इन की फिर शौर्य्यशौ- तीन तरह से परीक्षा करनी चाहिये कि यह रोग औपसर्गिक चोपेतं कल्याणाभिनिवेशं सत्त्वसारं विद्यात् । स्निग्ध- है या प्राक्केवल है अथवा अन्य लक्षण वाली है ॥ २० ॥
संहतश्वेवास्थिदन्तनखं बहुलकामप्रजं शुक्रेण । अकृश- तत्र, औपसगिको यः पूर्वोत्पन्नं व्याधिं जघन्यका-
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श्रध्यायः ३५ ] सूत्रस्थानंम् । १३३ लजातो व्याधिरुपसृजति स तन्मूल एवोपद्रवसंज्ञः । प्राक्केवलो यः प्रागेवोत्पन्नो व्याधिरपूर्वरूपोऽनुपद्र-वश्च । अन्यलक्षणो यो भविष्यद्वयाधिख्यापकः, स पूर्व -रूपसंज्ञः ॥ २१ ॥
उनमें से जो प्रथम उत्पन्न हुई व्याधि के उत्तरकाल में उत्पन्न होता है तथा उसी के साथ मिलता है तथा प्रथम व्याधि के मूल में ही जिसका मूल है वह औपसर्गिक या उपद्रवसंज्ञक व्याधि है । प्राक्केवल व्याधि वह है जो प्रथम उत्पन्न होकर पूर्वरूपसंज्ञक व्याधि नहीं होती है तथा उप द्रवस्वरूप भी नहीं होती है । अन्यलक्षण व्याधि वह है जो भविष्य में होने वाली व्याधि की सूचना देती है तथा उसी को पूर्वरूप भी कहते हैं ॥ २१ ॥
विमर्शः -- औपसर्गिक व्याधि को अनुबन्ध, अप्रधान, परतन्त्र ( Secondary ) कहते हैं । उपद्रवस्तु खलु - रोगारम्भक-दोषप्रकोपजन्योऽन्यविकारः । चरक में भी लिखा है - उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजी रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणुर्वा रोगात्पश्चा-ज्जायत इति उपद्रवसज्ञ । रोगारम्भकदोषस्य प्रकोपादुपजायते । योऽन्यो विकार स बुधैरुपद्रव इहोदित • ॥ प्राक्केवल ', प्रधानः, स्वतन्त्रः, अनुबन्ध्यः ( Primary ) अन्यलक्षण पूर्वरूपः, Prodrome or remontary Stage. डाक्टरी में रोगों के Primary या प्राक्केवल और Secondary या औपद्रविक ऐसे भेद होते हैं । तत्र, सोपद्रवमन्योन्याविरोधेनोपक्रमेत, बलवन्त-मुपद्रवं वा । प्राक्केवल यथास्वं प्रतिकुर्वीत । अन्यल -क्षणे त्वादिव्याधौ प्रयतेत ॥ २२ ॥
उनमें उपद्रवयुक्त व्याधि की चिकित्सा मूलव्याधि तथा उपद्रव में परस्पर विरोध न हो उस तरह से करनी चाहिये । अथवा बलवान् उपद्रव की चिकित्सा प्रथम करनी चाहिये । प्राक्केवल ( प्रधान ) व्याधि में यथादोषानुसार उसी की विशेष चिकित्सा करे । अन्यलक्षण व्याधि ( पूर्वरूपावस्था ) में व्याधि की प्रथमावस्था की चिकित्सा करने का प्रयत्न " करना चाहिये ॥ २२ ॥
विमर्श: - उपद्रव दुर्बल होने पर प्रधान रोग की चिकित्सा करने से उपद्रव अपने आप ठीक हो जाता है । ' तस्य प्रायः प्रधानप्रशमे प्रशमो भवति ' ( चरक ) । किन्तु उपद्रव के प्रबल होने पर मूलरोग से विरोध न करते हुए प्रथम उसी की चिकित्सा करे । ' स्वरित वा बलवन्तमुपद्रव प्रधानाविरोधेन ' ( भ ० संग्रह ) आदिव्याधिः -- व्याधेरादि प्रथमावस्था । इति आदिव्याधिः । चिकित्साक्रमः — ज्वरस्य पूर्वरूपेषु वर्तमानेषु बुद्धि-मान् । पाययेत घृत स्वच्छ ततः स लभते सुखम् ॥ विधिर्मारुतजे
ष्वेषु पैत्तिकेषु विरेचनम् । मृदु प्रच्छर्दन तद्वत् कफजेषु विधीयते ॥
( सुश्रुत ) । पूर्वरूप विकाराणां दृष्ट्वा प्रादुर्वविष्यताम् । या क्रिया क्रियते सा च वेदना हन्त्य नागताम् ॥ ( चरक ) ।
भवति चात्र-नास्ति रोगो विना दोषैर्यस्मात्तस्माद्विचक्षणः ।
अनुक्तमपि दोषाणां लिङ्गैर्व्याधिमुपाचरेत् ॥ २३ ॥
दोषों के ( प्रकोप ) बिना रोग उत्पन्न नहीं होता है इस लिये लक्षणादि से अनुक्त ( अज्ञात ) रोग की चिकित्सा दोषों के लक्षणानुसार करनी चाहिये ॥ २३ ॥
विमर्श: - आचार्यों ने होने वाले रोगों के नाम, लक्षण आदि लिखकर भविष्य में नये होने वाले रोगों के नामकरण के विना ही उनकी दोषानुसार चिकित्सा करने की व्यवस्था कर दी है । अधिकतर आज कल भी जब तक रोग का यथार्थ निदान ( Diagnosis ) नहीं होता है तब तक दोपविज्ञान या प्रकृतिविज्ञान ( Pathology ) की सहायता से आवस्थि-की या लाक्षणिक चिकित्सा ( Symptomatic treatment )
की जाती है ।
प्रागभिहिता ऋतवः ॥ २४ ॥
ऋतुओं का वर्णन पहले ऋतुचर्याध्याय में किया गया है ॥
शीते शीतप्रतीकारमुष्णे चोष्णनिवारणम् ।
कृत्वा कुर्य्यात् क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥
अप्राप्ते वा क्रियाकाले प्राप्ते वा न कृता क्रिया । क्रिया होना s तिरिक्ता वा साभ्येष्वपि न सिध्यति २६
या ह्युदीर्ण शमयति नान्यं व्याधिं करोति च ।
साक्रिया न तु या व्याधिं हरत्यन्यमुदीरयेत् ॥ २७ ॥
शीत ऋतु में शीत का प्रतिकार और उष्ण ( ग्रीष्म ) ऋतु में उष्णता का प्रतिकार करके प्राप्त क्रिया ( चिकित्सा ) करनी चाहिये | योग्य चिकित्सा समय का उल्लंघन नहीं करना चाहिये । अप्राप्त समय में की हुई चिकित्सा तथा प्राप्त समय ' के पश्चात् की हुई चिकित्सा, आवश्यकता से ( कम ) तथा अतिरिक्त ( अधिक ) या मिथ्या चिकित्सा साध्य रोगों में भी सफल नहीं होती है । जो बढ़े हुये दोष को शान्त करे तथा अन्य रोग को उत्पन्न नहीं करे उसी को यथार्थ क्रिया ( चिकित्सा ) कहते हैं किन्तु जो मूल रोग को नष्ट करने के साथ साथ अन्य रोग को उत्पन्न करे वह योग्य क्रिया नहीं है ॥ २५-२७ ॥ विमर्श: - योग्य काल के अतिरिक्त तथा न्यूनाधिक क्रिया व्यर्थ होती है । ' न ह्यतिपातितकालमप्राप्तकाल वा भेषजमुपयुज्यमानं यौगिक भवति । ( चरक ) । अप्राप्तकालोदाहरणम् - भेषज ह्यामदोषस्य भूयो ज्वलयति ज्वरम् । न तु सग्रहण देय पूर्वमामातिसारिणे । विवध्यमाना प्राग्दोषा जनयन्त्यामयान् वहून् ॥ आमच्छेदे मा-ससिरास्नायु सन्धिन्यापादनमतिमात्रशोणितातिप्रवृत्तिर्वेदनाप्रादुर्भावो भवति । प्राप्तचिकित्सापेक्षया हानि - यदा पक्वमप्यपक्वमिति मन्य-मानश्विरमुपेक्षते व्याधिं वैद्यस्तदा द्वारमलभमान. पूयः स्वाश्रयमव-दार्योत्सङ्ग महान्तमवकाशनाडीं जनयित्वा कृच्छ्रसाध्यो - भवति । ही नातिरिक्तौषधोदाहरणम् - सहसा यतिबलमौपधमपरीक्षक प्रयुक्तमल्प-वलमातुरमभिघातयेत् । तथा बलवति बलवद्वयाधिपरिगते स्वल्पबल-मौषधमपरीक्षकप्रयुक्तमसाधकं भवति ( चरक ) | योग्यक्रिया यथा । वाग्भटे - प्रयोगः शमयेद्वयार्थि योऽन्यमन्यमुदोस्येत् । नाऽसौ विशुद्धः शुद्धस्तु शमयेधो न कोपयेत् ॥ प्रागभिहितोऽग्निरन्नस्य पाचकः । स चतुर्विघो भवति - दोषानभिपन्न एकः । विक्रियामापन्नस्त्रिविधो भवति - विषमो वातेन, तीक्ष्णः पित्तेन, मन्दः श्लेष्म-। णा, चतुर्थः समः सर्वसाम्यादिति ॥ २८ ॥
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१३४ सुश्रुतसहिता । पहले व्रण प्रश्न नामक २१ वै अध्याय में अन्न को पचाने वाली अग्नि का वर्णन किया गया है, वह चार प्रकार की होती है । वातादि दोषों से रहित एक तथा विकारयुक्त के तीन भेद होते हैं । बात से विषम, पित्त से तीक्ष्ण, कफ से मन्द तथा सर्व दोषों की समानता से चौथी समानि ॥ २८ ॥
विमर्श - - यद्यपि पचमहाभूतों की पांच, रसरक्तादि सात घातुओं की सात और एक जाठराग्नि ऐसे कुल अनि के तेरह भेद होते हैं किन्तु विशेषतया जाठराग्नि के चार भेद होते हैं ।
मन्दस्तीक्ष्गॊऽथ विषम समश्चेति चतुर्विध. । कफपित्तानिलाधि - ।
क्यात्तत्सान्याज्जाठरोऽनल. ॥
तत्र, यो यथाकालमुपयुक्तमन्नं सम्यक् पचति स समः, समैर्दोषैः । यः कदाचित् सम्यक् पर्चात, कढ़ा-चिदाध्मानशुलोदावर्तातिसारजठरगौरवान्त्रकूजनप्रवाह-णानि कृत्वा स चिपमः । यः प्रभूतमप्युपयुक्तमन्नमाशु पचति स तीक्ष्ण '; स एवाभिवर्द्धमानोऽत्यग्निरित्वाभा ष्यते । स मुहुर्मुहुः प्रभूतमप्युपयुक्तमन्नमाशुतरं पचति, पाकान्ते च गलताल्वोष्ठशोपदाहसन्तापान् जनयति । यस्त्वल्पमप्युपयुक्तमुदरशिरोगौरवकासश्वासप्रसेकच्छ-दिंगात्रसदनानि कृत्वा महता कालेन पचति स मन्दः ॥ उनमें से जो उपयुक्त समय पर खाये हुये अन्न को ठीक तरह से पचाती है वह सम अग्नि है तथा यह दोपों के समान मात्रा में होने से होती है । जो कभी कभी ठीक पचाती हो तथा कभी कभी अफरा, शूल, उदावर्त, अतिसार, पेट में भारी-पन, आतों में फूजन और प्रवाहण आदि विकार उत्पन्न करती हो उसे ‘ ' विपमाग्नि ' कहते हैं । जो अधिक खाये हुये अन्न को भी शीघ्र पचाती हो उसे तीक्ष्गानि कहते हैं तथा वही जब अधिक बढ़ जाती है तब उसे अत्यनि कहते हैं एवं यह अग्नि बार बार तथा अधिक खाये हुये अन्न को अत्यन्त शीघ्र पचा देती है तथा पाक के अन्त मे गले, तालु और ओष्ट में शोप, दाह तथा सन्ताप आदि उत्पन्न करती है । जो थोडे खाये हुए अन्न को भी उदर और शिर में भारीपन तथा कास, श्वास, प्रसेक ( लार टपकना ), बमन और अंगों में थकावट आदि विकार उत्पन्न करके अधिक देर में पचाती है उसे नन्दाग्नि कहते हैं ॥ २ ९ ॥ विमर्श: - अत्यग्नि को भस्मकानि कहते हैं । वर्धमानो भवेत्ती-क्ष्णो मस्मकाख्यो महानछ.। ( वृन्दमाधव ) । मुक्तं क्षणाद्भस्म करोति यस्मात्तस्मादय भस्मक्रसहनोऽभूत् । ( योगरत्नाकर ) । डाम्टरी मैं भस्मकाग्नि आमाशयिकरस की अधिकता ( Hyper chlorpydria ), मधुमेह, हिस्टीरिया तथा आन्त्रस्यकृमि के कारण होती है तथा भस्मकरोग को वुलिमिक्षा ( Balimis ) अथवा पोलिफेगिआ ( Polyphagia ) कहते हैं ।
विषमो वातजान् रोगांस्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तजान् ।
करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान् कफसम्भवान् ॥ ३० ॥
विषम अग्नि वातजन्य रोगों को, तीक्ष्ग अग्नि पित्तजन्य रोगों को और मन्दाग्नि कफजन्य विकारों को उत्पन्न करती है ॥ तत्र, समे परिरक्षणं कुर्वीत । विषमे स्निग्धाम्लल -वणैः क्रियाविशेषैः प्रतिकुर्वीत । तीक्ष्णे मधुरस्निग्धशी- । तैर्विरेकैश्च । एवमेवात्यग्नौ विशेपेण माहिपैश्च क्षीर-दधिसर्पिर्भिः । मन्दे कटुतिक्तकपायैर्वमनैश्च ॥ ३१ ॥
इनमें से समाग्नि की सर्व प्रकार से रक्षा करनी चाहिये । विषमाग्नि में स्निग्ध, अम्ल तथा लवण रस प्रधान विशेष क्रियाओं से प्रतिकार ( चिकित्सा ) करना चाहिये । तीक्ष्णाग्नि में मधुर, स्निग्ध और शीत खाद्यपेय तथा विरेचन से चिकित्सा करे । इसी तरह अत्यग्नि में भैंस के दुग्ध, दही और घृत से प्रतिकार करना चाहिये । मन्दाग्नि होने पर कटु, तिक्त और कपाय रस द्रव्य तथा वमन से प्रतिकार करना चाहिये ॥ ३१ ॥
जाठरो भगवानग्निरीश्वरोऽन्नस्य पाचकः ।
सौक्ष्म्याद्रसानाददानो विवेक्तुं नैव शक्यते ॥ ३२ ॥
अन्न को पचाने वाली तथा भोज्य रसों का ग्रहण करने वाली और शरीर को अपने शासन में रखने वाली व ऐश्वर्ययुक्त | जाठराग्नि होती है तथा उसका विशेष विवेचन करना सूक्ष्म होने से असम्भव है ॥ ३२ ॥
विमर्श: - ईश्वरः - आयुर्वर्णो बल स्वास्थ्यमुत्साहोपचनी प्रभा । । ओजस्तेजोऽग्नय प्राणाश्चोक्का देहाग्निहेतुका ॥ शान्तेऽग्नौ त्रियते युक्ते चिर जोवत्यनामय ' । रोगी स्याद्विकृते मूलमग्निस्तस्मान्निन्च्यते ॥ प्राणापानसमानैस्तु सर्वतः पवनैखिभिः । मायते पाच्यते चापि स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थितैः ३३ अपने अपने स्थानों में रहने वाले प्राण, अपान और समान इन तीन प्रकार की वायुओं से जठराग्नि दीप्त होती है जिससे अन्न का पाचन होता है ॥ ३३ ॥
विमर्शः: - जठराग्नि पाचन की दृष्टि से शरीर की ईश्वर है किन्तु वह स्वय प्राण, अपान, समान इन त्रिविध वायु के अधीन होती है । डाक्टरी में भी पचन का Nervous control माना है तथा वात संस्थान की खरावी से पाचन में भी खराबी होते | देखा गया है । वयस्तु त्रिविधं - बाल्यं, मध्यं, वृद्धमिति । तत्रो-नपोडशवर्पा वालाः । तेऽपि त्रिविघाः - क्षीरपाः, क्षीरा-| नादा, अन्नादा इति । तेषु संवत्सरपराः क्षीरपाः, द्विसं-वत्सरपराः क्षीरान्नादाः, परतोऽन्नादा इति ॥ ३४ ॥
वय ( अवस्था ) तीन प्रकार की होती है । वाल्य, मध्य और वृद्ध अवस्था । सोलह वर्ष तक वालक संज्ञा मानी गई है । वालक भी तीन प्रकार के होते हैं । दुग्ध पीने वाले, दुग्ध और | अन्न दोनों का सेवन करने वाले तथा केवल अन्न का सेवन करने वाले । उनमें एक वर्ष तक की आयु वाले दुग्धपायी, दो वर्ष की आयु वाले दुग्ध और अन्न उभय का सेवन करने वाले तथा दो वर्ष के बाद अन्नसेवी वालक होते हैं ॥ ३४ ॥
विमर्शः -- वयः -- कालप्रमाणविशेषापेक्षिणी हि शरीरावस्था वयोऽ-भिधीयते 1 षोडशसप्तत्योरन्तरे मध्यं वयः । तस्य विकल्पो वृद्धियौवनं सम्पूर्णता हानिरिति । तत्र, आविशतेर्वृद्धि, आत्रिंशतो यौवनम् " आचत्वारिंशतः सर्वधात्विन्द्रिय-बलवीर्य्यसम्पूर्णता, अत ऊर्ध्वमीषत्परिहाणिर्यावत् सप्त-तिरिति ॥ ३५ ॥
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श्रध्यायः ३५ ] सूत्रस्थानम् । १३५ सोलह वर्ष की आयु से लेकर सत्तर वर्ष की अवस्था पर्यन्त मध्य अवस्था होती है उसके भी वृद्धि, यौवन, सम्पूर्णता और । हानि ऐसे चार भेद होते हैं । उनमें वीस वर्ष की आयु तक । शरीर के अङ्ग - प्रत्यङ्गों के वृद्धि की अवस्था होती है तथा तीस वर्ष तक यौवन एवं चालीस वर्ष तक रस- रक्तादि सर्व धातु, इन्द्रिय, वल और वीर्य इनकी सम्पूर्णता की अवस्था तथा उसके पश्चात् सत्तर वर्ष की आयु तक कुछ २ क्षोणता होने की आयु मानी जाती है ॥ ३५ ॥
विमर्शः- चरक ने शरीर की वृद्धि तीस वर्ष की आयु तक मानी है । विवर्धमानधातुगुणमात्रिशदर्पमुपदिष्टम् । डाक्टरी में शरीर की वृद्धि की मर्यादा पच्चीस वर्ष तक की मानी है तथा यह अस्थि वृद्धि के लिये है । मांसादि अन्य धातुओं की वृद्धि इससे अधिक आयु तक भी होती रहती है । चरक ने मध्यमवय सत्तर के बजाय साठ वर्ष की हो मानी है । ' मध्य पुन पित्तधातु-प्रायमाषष्टिवर्षमुपदिष्टम् ’ ॥ सप्ततेरूर्ध्वं क्षीयमाणधात्विन्द्रियबलवीर्योत्साहम-हन्यहनि वलीपलितखालित्यजुष्टं कासश्वासप्रभृतिभि-रुपद्रवैरभिभूयमानं सर्वक्रियास्त्रसमर्थं जीर्णागारमिवा-भिवृष्टमवसीदन्तं वृद्धमाचक्षते ॥ ३६ ॥
वृद्धावस्था – सत्तर वर्ष के अनन्तर रसरक्तादि धातु, इन्द्रिय, चल, वीर्य और उत्साह ये दिन प्रतिदिन जिसके क्षीण हो रहे हों, चर्म में सलवटें ( वली ), पलित ( बालों का श्वेत होना ) । और खालित्य ( वालों का गिरना = गआपन ) से युक्त एवं कास, श्वास आदि उपद्रवों से आक्रान्त, सर्व प्रकार की क्रियाओं में असमर्थ तथा अभिवृष्टि ( मेघ वर्पण ) से पुराने मकान की तरह जो गिर रहा हो ऐसे मनुष्य को वृद्ध कहते हैं ॥ ३६ ॥
विमर्श: - चरक ने साठ से सौ वर्ष तक वृद्धावस्था मानी है । अतः परं वायुधातुप्राय क्रमेण जीर्णमुच्यते वर्षशतान्तम् । भारतीय शास्त्रज्ञ तथा फ्लोरेन्स आदि पाश्चात्य विद्वान् मनुष्य की आयुमर्यादा १२५ तक की मानते हैं किन्तु इससे अधिक आयु वाले प्राचीन तथा इस समय में भी मिलते हैं । तत्रोत्तरोत्तरासु वयोऽवस्थासूत्तरोत्तरा भेपजमात्रा-विशेषा भवन्ति, ऋते च परिहाणेः । तत्राद्यापेक्षया _ प्रतिकुर्वीत ॥ ३७ ॥
ओषधि मात्रा — हीन या वृद्ध अवस्था को छोड़ कर उत्तरो तर वर्धमान वयोवस्थाओं में उत्तरोत्तर औषध की मात्रा भी वढती जाती है । वृद्धावस्था में आद्य ( बाल ) अवस्था की अपेक्षा रोगों का प्रतीकार करना चाहिये ॥ ३७ ॥
विमर्शः — औषधमात्रावृद्धे ' क्रम – बालस्य प्रथमे मासि देया । भेषजरत्तिका । अवलेहीकृतैक्व क्षीरक्षौद्र सिताघृतै । वर्धयेत्तावदे -कैका यावद्भवति वत्सर. । मापैर्वृद्धिस्तदूर्ध्वं स्याद्यावत पोडशवत्सर । तत स्थिरा भवेत्तावद्यावद्दर्पाणि सप्तति. ॥ ( शार्ङ्गधर ) । विडङ्गफल-मात्रन्तु जातमात्रस्य भेषजम् । एतेनैव प्रमाणेन मासि मासि प्रव-तिम् ॥ कोलास्थिमात्र क्षीरादेर्दद्याद्वैपज्यकोविद 1 क्षीरानादे कोल • मात्रामन्नादे दुम्बरोपमम् ॥ ( विश्वामित्र ) । सत्तर वर्ष के बाद औषध मात्रा धीरे धीरे कम करनी चाहिये । ततो बालकवन्मात्रा हासनीया शनैः शनै । ( शार्ङ्गधर ) । प्रायः वृद्ध और बालकों । में कई दृष्टि से समता रहती है । Old age 1s Second Childhood । २० से ६० वर्ष तक की औषधमात्रा को पूर्ण-मात्रा ( Adult dose ) कहा जाता है एक वर्ष से बारह वर्ष तक Young's rule ( रोगी की आयु में १२ मिला कर उससे आयु को भाग देने पर जो फल मिलता है वह पूर्णमात्रा का अंश है ) के अनुसार अथवा Cowling's rule ( रोगी की आयु में एक मिला कर उस सख्या को २४ से भाग जो फल मिलता है उतनी पूर्णमात्रा है ) के अनुसार रोगी को । देनी चाहिये । १२ से १६ वर्ष तक ई से और सोलह से वीस वर्ष तक से दें तक की मात्रा दी जाती है ।
भवन्ति चात्र-बाले विवर्द्धते श्लेष्मा मध्यसे पित्तमेव तु ।
भूयिष्ठं वर्द्धते वायुर्बुद्धे तद्वीक्ष्य योजयेत् ॥ ३८ ॥
अग्निक्षारविरेकैस्तु बालवृद्धौ विवर्जयेत् ।
तत्साध्येषु विकारेषु मृद्वीं कुर्य्यात् क्रियां शनैः ॥ ३६ ॥
वाल्यावस्था में कफ वढता है तथा मध्यमावस्था में पित्त चढता है और वृद्धावस्था में वायु अधिक बढती है अत एव इन दोपादिकों का तथा वय का विचार कर भेपज की कल्पना करनी चाहिये | अग्निकर्म, क्षारकर्म और विरेचनकर्म बालक और वृद्धों के लिये वर्जित है किन्तु बालक और वृद्धों के रोग अग्नि, हार, विरेककर्म से ही साध्य हो तो मृदु ओषधियों के प्रयोग से वह कर्म करना चाहिये ॥ ३८-३९ ॥ विमर्श. - मृदी क्रिया - बकरी की मीगणी आदि मृदुद्रन्यः संश्रित अग्नि, मृदुत्तार तथा गुलाव के पुष्प, मुनक्का अमल-तास के गुद्दे आदि मृदु द्रव्यों का विरेचन देना चाहिये । देहः स्थूलः कृशो मध्य इति प्रागुपदिष्टः ॥ ४० ॥
स्थूल, कृश और मध्य ऐसे देह के तीन भेद पंद्रहवें अध्याय में कह आये है ॥ ४० ॥
कर्शयेद् वृंहयेच्चापि सदा स्थूलकृशौ नरौ ।
रक्षणञ्चैव मध्यस्य कुर्वीत सततं भिषक् ॥ ४१ ॥
सर्वदा स्थूल देह का कर्पण, कृश देह का बृहण और मध्य देह का संरक्षण निरन्तर करते रहना चाहिये ॥ ४१ ॥
बलमभिहितगुणं, दौर्बल्यञ्च स्वभावदोषजरादिभि-रवेक्षितव्यम् | यस्माद्बलवतः सर्वक्रियाप्रवृत्तिस्तस्माद्बल-| मेव प्रधानमधिकरणानाम् ॥ ४२ ॥
बल के गुणों का वर्णन पन्द्रहवें अध्याय में हो चुका है । दौर्बल्य का विचार स्वभाव, वातादि दोप तथा वृद्धावस्था आदि से करना चाहिये | चिकित्सा की सर्व क्रियाओं की प्रवृत्ति बलवान् रोगी के लिये ही लाभदायिनी हो सकती है अतः चिकित्सा के अधिकरणों ( आधारों ) में रोगी का बल ही प्रधान है ॥ ४२ ॥
केचित् कृशाः प्राणवन्तः स्थूलाश्चाल्पबला नराः ।
तस्मात् स्थिरत्वव्यायामैर्बलं वैद्यः प्रतर्कयेत् ॥ ४३ ॥
कुछ दुर्बल मनुष्य भी बलवान् होते हैं तथा स्थूल आदमी अल्प वले वाले होते है इसलिये देह की स्थिरता ( दृढत्व ) और व्यायाम से वैद्य बल की तर्कणा ( अनुभव ) करे ॥ ४३ ॥
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१३६ सुश्रुतसंहिता ।
सत्त्वं तु व्यसनाभ्युदयक्रियाऽऽदिस्थानेष्वविक्त्रकरम् ॥
सत्त्वगुण व्यसन और अभ्युदय तथा छेद्य - भेद्यादि शस्त्रकर्म के समय मनुष्य को विक्लवित ( दुःखी ) नहीं होने देता है ॥
विमर्शः -- दु सेग्ननुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्पृह । वीतरागभ- ।
यक्रोध ' स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
सत्त्ववान् सहते सर्वं संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
राजसः स्तभ्यमानोऽन्यैः सहते नैव तामसः ॥ ४५ ॥
सत्वगुण वाला मनुष्य स्वयं आत्मबल से आत्मा या मन को दृढ कर के शारीरिक तथा मानसिक सर्व प्रकार के दुःखों को सहन करता है । रजोगुणी मनुष्य दूसरों से सहारा मिलने पर दुःखों को सहन करता है किन्तु तामसी मनुष्य किसी तरह से भी दुःख को सहन नहीं कर सकता है ॥ ४५ ॥
सात्म्यानि तु देशकालजात्यृतुरोगव्यायामोदकदि-वास्वरसप्रभृतीनि प्रकृतिविरुद्धान्यपि यान्यबाधकराणि भवन्ति ॥ ४६ ॥
सात्म्य भाव वे हैं जो देश, काल, जाति, ऋतु, रोग, व्यायाम, जल, दिवाशयन आदि प्रकृति विरुद्ध होने पर भी बाधा पहुचाने वाले नहीं होते हैं ॥ ४६ ॥
यो रसः कल्पते यस्य सुखायैव निपेवितः ।
व्यायामजातमन्यद्वा तत् सात्म्यमिति निर्दिशेत् ॥४७ ॥
जो सेवन किया हुआ मधुर - लवणादिरस, व्यायाम अथवा अन्य पदार्थ जिस के लिये सुखकारी होता है उसे ' साम्य ' कहते हैं ॥ ४७ ॥
विमर्श: --- सात्म्यम् - सह आत्मना भवतीति सात्म्यम् । सात्म्य नाम तत् यदात्मन्युपशेते । सात्म्य नाम तत् यत् सातत्येनो-पसेव्यमानमुपशेते । ( चरक ) । सात्म्यभेद – जातिसात्म्य - सलिल घृतदुग्धौदनप्रभृतीनि । ऋतुसात्म्य स्वस्थवृत्तोक्तम् ऋतुसात्म्यम् । देशसात्म्य – देशानामामयाना च विपरीतगुण गुणे । सात्म्य मि-च्छन्ति सात्म्यशाश्चेष्टित चाथमेव च ॥ ( चरक ) । रोगसात्म्यम् -उपशयो हेतुव्याधिविपरीतैर्विपरीतार्थंकारिभिश्चोपधाहारविहारे सुखा-नुबन्ध । स हि व्याधिसात्म्यस । ( अ ० सं ० ) । व्यायाम ` सात्म्य — शरीरमन.सुखकरचेष्टा । उदकसात्म्यम्, निद्रासात्म्य -निद्रा सात्म्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा । न तेपा स्वपता दोपो जाग्रताचीपजायते ॥ प्रकृतिं भेषजं चोपरिष्टाद्वक्ष्यामः ॥ ४८ ॥
शारीर स्थान के चतुर्थ अध्याय में प्रकृति और सूत्रस्थान के अन्तिम अध्याय में भेपज का वर्णन किया गया है ॥ ४८ ॥
देशस्त्वानूपो जाङ्गलः साधारण इति । तन्त्र, बहूद्दू-कनिम्नोन्नतनदीवर्पगहनो मृदुशीतानिलो बहुमहापर्व -तवृक्षो मृदुसुकुमारोपचितशरीरमनुष्यप्रायः कफवातरो-गभूयिष्ठश्चानूपः ॥ ४६ ॥
भूमिभेद - आनूप, जागल और साधारण ऐसे कर के देश तीन तरह का होता है । उनमें से जहां जल अधिक वर्षता हो या भरा रहता हो या भूमि में खोदने पर पास ही निकलता हो, पृथ्वी अधिक नीची और ऊंची हो, नदी नाले अधिक हों, वर्षा अधिक होती हो, पवन कोमल और शीतल चलता हो, पर्वत और वृक्ष ये अ बढ़े बढ़े हों, जहां अधिक सख्य पुरुष और स्त्री कोमल अंग वाले, सुकुमार और हृष्ट पुष्ट शरीर वाले हों और जहां तथा वायु के रोग अधिक होते हो उसे ' आनूपदेश ' कहते हैं ॥ आकाशसमः प्रविरलाल्पकण्टकिवृक्षप्रायो ऽल्पवर्ष-प्रस्रवणोदपानोदकप्राय उष्णदारुणवातः प्रविरलाल्पशैलः स्थिरकृशशरीर मनुष्यप्रायो वातपित्तरोगभूयिष्ठश्च जा-ङ्गलः । उभयदेशलक्षणः साधारण इति ॥ ५० ॥
जो देश आकाश की तरह ऊंचाई तथा नीचाई से रहित हो कर सम हो, जहां अत्यन्त विरल, छोटे और कांटेदार वृक्ष हो, पानी कम वरसता हो तथा झरने, कूप, बावड़ी आदि में भी पानी कम हो एवं गरम और तेज हवा चलती हो, जहां छोटे छोटे पहाड़ किसी किसी जगह स्थित हों, जहां के मनुष्य अधिकतर दृढ और कृश शरीर वाले हों एवं जहां वायु तथा पित्त के रोग अधिक होते हों उसे ' जाङ्गल देश ' कहते हैं । जहां दोनों के लक्षण मिलते हों उसे ' साधारण देश ' कहते हैं ॥ ५० ॥
भवन्ति चात्र ।
समाः साधारणे यस्माच्छीतवर्णेज्ममारुताः ।
दोषाणां समता जन्तोस्तस्मात्साधारणो मतः ॥ ५१ ॥
क्योंकि जहां शीत, वर्षा, गरमी और हवा ये समान रहते हों तथा मनुष्यों के वातादि दोष भी समानावस्था में रहते हों उसे उस कारण से ' समान देश ' माना है ॥ ५१ ॥
न तथा बलवन्तः स्युर्जलजा वा स्थलाहृताः ।
स्वदेशे निचिता दोपा अन्यस्मिन् कोपमागताः ॥ १२ ॥
उचिते वर्तमानस्य नास्ति देशकृतं भयम् ।
आहारस्वप्नचेष्टाऽऽदौ तद्देशस्य गुणे सति ॥ ५३ ॥
अपने देश में इकट्ठे हुये दोष अन्य देश में कुपित होनेपर उतने बलवान् नहीं होते हैं जैसे कि जल में रहने वाले जीव स्थल ( पृथ्वी ) पर बलवान् नहीं होते हैं । आहार, निद्रा और व्यायामादि चेष्टा आदि में उचित रूप से आचरण करने वाले मनुष्य के लिये देश के गुण होने पर भी देशजन्य रोगादिभय नहीं रहता है ॥ ५२-५३ ॥ विमर्श. - ये श्लोक जल - वायुचिकित्सा ( Climatio treatment ) का वर्णन करते हैं । दोप अन्य स्थान में कुपित होने से अधिक बलवान् नहीं होते हैं जैसे नक्र अपने स्थान ( जल ) में रह कर हाथी को भी खींच लेता है किन्तु स्थल पर आने से कुत्ते से भी डर जाता है । नक्र ' स्वस्थानमासाद्य गजेन्द्रमपि कर्षति । स एव प्रच्युत स्थानाच्छुनापि परिभूयते ॥ आनूपोचित. कफः अन्य-स्मिन् विरुद्धगुणदेशे यथा जागलदेशे कुपित कफ बलवान् न भवति । चिकित्सा की सुकरता या रोगसाध्यता के लिये भी काल, देशादि रोग के समान गुणधर्मी नहीं होना श्रेष्ठ माना है ॥ न च कालगुणस्तुल्यो न देशो दुरुपक्रम ' । ( चरक ) । देश-प्रकृतिसात्म्यर्तुविपरीतोऽचिरोत्थित ' । ( सुश्रुत ) । अतुल्यदूष्यदेश-र्तुप्रकृति पादसम्पदि । ( वाग्भट ) ।
देशप्रकृतिसात्म्यर्तुविपरीतोऽचिरोत्थितः ।
सम्पत्तौ भिषगादीनां बलसन्त्वायुषां तथा ॥ ५४ ॥
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श्रध्यायः ३६ ] सूत्रस्थानम् । १३७
केवलः समदेहाग्नेः सुखसाध्यतमो गदः ।
अतोऽन्यथा त्वसाध्यः स्यात् कृच्छ्रो व्यामिश्रलक्षणः ॥
साध्यासाध्यता – देश, प्रकृति, सात्म्य और ऋतु के विप रोत तथा चिरकाल से नहीं उत्पन्न हुआ ( नवीन ) एवं मिपकू, औषध आदि की सुसम्पत्ति तथा बल, सत्व और आयु से भी, समृद्ध केवल ( उपद्रवरहित ), समान देह और पाचकानि वाले रोगी का रोग अतीव ' सुखसाध्य ' होता है किन्तु इन लक्षणों से विपरीत लक्षण वाला रोग ' असाध्य ' होता है और मिश्रित लक्षणों वाला रोग ' कृच्छ्र साध्य ' होता है ॥ ५४-५५ ॥ विमर्शः—— देशविपरीत - जाङ्गल देश में कफरोग, प्रकृति विपरीत - पित्त प्रकृति के मनुष्य में कफरोगोत्पत्ति, सात्म्यविप • रीत कटुसात्म्य मनुष्य में कफरोग, ऋतु विपरीत शरद ऋतु में वातरोग, एवं दूष्य विपरीत रोग ' सुखसाध्य ' होते हैं । कहीं कहीं तुल्य दूप्यादिक सुखसाध्यता के जनक होते हैं - अरे तुल्यर्तुदो-पत्व प्रमेहे तुल्यदूष्यना । नवीन रोग भी सुखसाध्य होते हैं किन्तु रक्तगुल्म पुराना होने पर हो सुखसाध्य होता है - रक्त गुल्मै पुराणत्व सुखसाध्यस्य लक्षणम् । आयु. सम्पत्ती - यस्यायुन्तस्य सिद्ध्यन्ति न सिद्ध्यन्ति गतायुषि । समदेहे - सममासप्रमाणस्तु सम सहननो नरः । दृढेन्द्रियत्वाद् व्याधीनां न वलेनाभिभूयते ॥ क्षुत्पि-पासानपसहः शीतव्यायामससह । समपक्ता समजर सममासचयो मतः ॥ ( चरक )
क्रियायास्तु गुणालाभे क्रियामन्यां प्रयोजयेत् ।
पूर्वस्यां शान्तवेगायां न क्रियासङ्करो हितः ॥ ५६ ॥
एकक्रिया ( वमन, विरेचनादि में से कोई एक अथवा रस-भस्म घृत - तैलासव अवलेहादि चिकित्सा में से एक ) के द्वारा गुणलाभ ( रोग नाश ) न होने पर उस क्रिया के वेग के शान्त हो जाने पर दूसरी क्रिया करनी चाहिये किन्तु दोनों क्रियाओं का सहप्रयोग कर सार्य उत्पन्न करना ठीक नहीं है ॥ ५६ ॥
गुणालाभेऽपि सपदि यदि सैव क्रिया हिता ।
कर्नव्यैव तदा व्याधिः कृच्छ्रसाध्यतमो यदि ॥ ५७ ॥
क्रिया के परिवर्तन करने से भी यदि रोग ठीक होने रूपी गुण का लाभ प्रतीत नहीं हो तथा रोग भी अत्यन्त कृच्छ साध्य हो और उसमें पूर्व क्रिया शास्त्र और अनुभव प्रमाणों से हितकारी ज्ञात होती हो तो उसी को ही कुछदिन तक प्रारम्भ करनी चाहिये ॥ ५७ ॥
विमर्श - प्रायः सगे सम्बन्धियों के बहकाने से एवं रोग के पुराना होने से २-४ दिन औषध लेने पर लाभ नहीं दीखने से लोग औपधपरिवर्तन में उतावलापन करते हैं इस लिये कम से कम ऐसे रोगों में एक औषध का प्रभाव सात दिन तक अवश्य देखना चाहिये । ' यस्या अपि फल न दृश्यते साऽपि सप्तरात्र प्रतिकर्तव्या । ' ( ढल्हण ) य एवमेनं विधिमेकरूपं बिभर्त्ति कालादिवशेन धीमान् । - १८ सु ० स मृत्युपाशान् जगतो गदौघान् छिनत्ति भैषज्य परश्वधेन ॥ ५८ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने आतुरोपक्रमणीयो नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
जो बुद्धिमान चिकित्सक ऋत्वग्निसाल्यादि का ठीक विचार करके उक्त प्रकार की मुख्य विधि को चिकित्सा करते । समय शाखानुसार व्यवहार में लाता है. वह । मृत्यु के पाश ( फन्दे ) तुल्य ससार के रोगसमूहों को भैषज्यरूपी कुठार से नष्ट कर देता है ॥ ५८ ॥
इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां सूत्रस्थाने आतुरोपक्रमणीयो नाम पञ्चत्रिशत्तमोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ।
अथातो मिश्रकमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर ' मिश्रक ' नामक अध्याय का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥
मालुलुङ्गाग्निमन्थौ च भद्रदारुमहौषधम् ।
अहिंसा चैव रास्ना च प्रलेपो वातशोफजित् ॥ ३ ॥
दूर्वा च नलमूलञ्च मधुकं चन्दनं तथा ।
शीतलाच गणाः सर्वे प्रलेपः पित्तशोफहृत् ॥ ४ ॥
आगन्तुजे रक्तजे च ह्येष एव विधिः स्मृतः ।
विधिविपन्नो विषजे पित्तन्नोऽपि हितस्तथा ॥ ५ ॥
अजगन्धाऽश्वगन्धा च काला सरलया सह ।
एकैषिकाऽजशृङ्गी च प्रलेपः श्लेष्मशोफहृत् ॥ ६ ॥
एते वर्गास्त्रयो लोध्रं पथ्या पिण्डीतकानि च ।
अनन्ता चेति लेपोऽयं सन्निपातकशोफहृत् ॥ ७ ॥
विजोरा निम्बू, अरणी, देवदारु, सोंठ, अहिंस्रा, रास्ना इनका प्रलेप ' वातिक शोफ ' को नष्ट करता है । दूर्वा, नरसल की जड़, मुलेठी, लालचन्दन तथा अन्य शीतलगण की | ओषधियों का लेप ' पैत्तिक शोफ ' को नष्ट करता है । ' भागन्तु -कशोफ ' तथा ' रक्तदुष्टिजन्य शोफ ' में भी यही विधि कही गई है । ' विपजन्य शोफ ' में विष को नष्ट करने वाली भोषधियों । का लेप तथा पित्तनाशक विधि हितकारक होती है । जगली अजवायन, असगन्ध, मजीठ, लाल निशोथ, सफेद निशोथ, अजशृङ्गी ( काकडासिंगी या मेढासिङ्गी ) इनका लेप ' कफजन्य शोफ ' को नष्ट करता है । ये उपर्युक्त तीनों दोषों के लिये प्रयुक्त हुये तीनों वर्गों के द्रव्य तथा लोध, हरड, मदनफल और अनन्तमूल ( सालसा ) इनका लेप ' सान्निपातिक शोफ ' को नष्ट करता है ॥ ३-७ ॥ विमर्श: - कषायलेपयो प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम् । शीतल गण से काकोल्यादि, उत्पलादि और न्यग्रोधादिगण समझें ।
स्निग्धाम्ललवणो वाते कोष्णः शीतः पयोयुतः ।
पित्ते, चोष्णः कफे क्षारमूत्राढ्यस्तत्प्रशान्तये ॥ ८ ॥