श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 321–330

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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२७२ सुश्रुतसहिता । भेट होते हैं । ( १ ) सामान्य ( Simple ) या सौम्य जिनके कारण मृत्यु होने का भय नहीं रहता है । ( २ ) घातक ( Malignent ) जिनके कारण जीवन का नाग या मृत्यु होती है । सामान्य अर्बुद में निम्न गुण होते हैं - ( १ ) प्रायः एक । अर्बुद होता है अधिक ( अध्यर्बुद या हिरवुड ) कम होते हैं । ( 2 ) इनको वृद्धि धीरे धीरे होती है ( चिरवृद्धि ) । ( ३ ) एक । कोप से परिवेष्टित होते हैं । जिससे छेदन करने पर समग्र निकाले जा सकते हैं अत एव छेदन के बाद पुनस्पत्ति होने का भय नही रहता है । ( १ ) इनमें बहुधा व्रणोत्पत्ति और रक्तन्नाव नहीं होता है । किसी किसी में दबाव के कारण ऊपर का धर्म चत हो जाता है तब ग बनते हैं । ( ७ ) शरीर पर बुरा प्रभाव नहीं डालते हैं किन्तु मर्मस्थान पर दबाव पडने से बुरा प्रभाव हो सकता है जैसे स्वरयंत्र में उत्पन्न हुये सामान्य अर्बुद की वृद्धि से श्वासावरोध ( Asphixia ) होकर मृत्यु हो सकती है । ( ६ ) इनको सूक्ष्म रचना आसपास की धातुओं की रचना से बहुत कुछ समान होती है । घातक अर्जुन - ( १ ) इनकी सामान्य अर्बुदों को अपेक्षा शीघ्र वृद्धि होती है । ( २ ) इनकी सीमा परिमित न होने से चारों ओर की धातुओं में फैले रहते हैं । कभी कभी इनका विस्तार अयन्त दूरवनों अट्ठों में हो जाता है । ( ३ ) इनमें छेदन के पश्चात् पुनस्पत्ति होने की अत्यन्त प्रवृत्ति होती है क्यों कि दूर दूर तक फैले हुये होने से मोष दोष रह जाते हैं-सचैषद्रोपाणि हि नोऽर्बुदानि करोनि नान्याशु पुनर्मवन्ति । तस्माद शेर्पाणि स्मुदरेषु हृचु सशेषाणि यथा हि हि ॥ ( ४ ) इस पर कोई आवरण नहीं होता है । ( ५ ) यद्यपि इनकी संरना एक होती है किन्तु दूरवर्ती अट्टों में गौण अर्बुद या द्विरर्बुद या अन्यर्बुद ( Metastat c growths or secondary diposite ) करने की प्रवृत्ति होती है । जिससे ये असाध्य हो जाते हैं - ' हिर्बुद तच्च स्वेत्रमाध्यन ' ( ६ ) चर्म को आक्रान्त कर उसमें बग वन जाता है जिससे रक्तस्त्राव हो कर पाण्डु रोग, अवसाद आदि उन दत्पन्न होते हैं - रक्तक्षयोपद्रवपीडितत्वा-न्याष्टमवेद्रर्बुदयोडिनस्तु । ( ७ ) इनसे एक प्रकार का विष उत्पन्न हो कर रक्त द्वारा शरीर में व्याप्त होता रहता है जिनमे रोगी कृश और दुर्बल हो जाता है । शरीर की भिन्न २ धातुओं में उत्पन्न होने के अनुसार भेद - संयोजक धातु से उत्पन्न सामान्य अर्बुद जैसे — मार्बुद ( Lipoma ), पीतार्बुद ( Zenthoma ), कार्डिलेार्बुड ( Caondroma ), लस्य्यर्बुद ( Oteo • ma ), मन्नार्बुद ( Myeloma ), मांसार्बुद ( Içoma ), मौत्रार्बुद ( Fibroma ), ग्लेप्मार्बुद ( Myxoma ) मिथार्बुद ( Gloma ), नाट्यर्बुद ( Searoma ), दन्तार्बुद ( Odontoma ), स्वगट्टरार्बुद ( Papilloma ); मयोजक धातु से उत्पन्न घातक अर्बुद – सार्कोमा ( Sar com3 ) यह अर्बुद अन्य्यावरण, अस्थि, मजा और चर्म में प्राय उत्पन्न होता है । इनमें रक्तसद्धार की अधिकता के कारण रक्तस्राव की आशङ्का रहती है । अर्बुद के कोषाणु या छोटे छोटे भाग अर्बुद से पृथक हो कर मिराओं द्वारा दूरवर्ती नों में पहुँच कर वहां गौण वृद्धि प्रारम्भ कर देते हैं । सार्कोमा के भेद- Small roand called, large round celled आदि सेल के अनुसार तथा Fibro sarcoma, ostleo sarcoma, myo sarcoma आदि धातु की अधिकता के उदाहरण हैं । कुछ का नामकरण उनके रंग के अनुसार भी होता है । उपकला से उत्पन्न अर्बुद - ( १ ) सामान्यार्बुद जैसे अर्बुद और ग्रन्थ्यर्बुद ( Adenoms ) । ( २ ) घातक अर्बुद जैसे कैंसर या कार्सिनोमा ( Cancer or carcinoma ) – यह वाह्य तथा श्लैष्मिक त्वचा में प्रायः उत्पन्न होता है । होठ, जिह्वा, मुख, अन्नप्रणाली, जठर, आन्त्र, मलाशय, स्त्रियों में गर्भाशय और स्तन, पुरुषों में अठोलाग्रन्यि तथा शिश्न इसके प्रधान स्थान हैं । प्रायः यह रोग ४० वर्ष की आयु के बाद होता है । इस अर्बुद के पृष्ठ पर कभी कभी गोभी के फूल के समान अडर उठ आते हैं ( मांसाङ्कुरेराचितम् ) तत्र इसे Fangating cancer कहते हैं । कभी २ कुछ काल के पश्चात् इसमें नग भी वन जाता है जिससे स्राव बहता रहता है ' यजत्र रुधिरम् ' । पयोत्पादक जीवाणुओं के प्रवेश से यह स्स्राव अत्यन्त दुर्गन्धित भी हो सकता है । गर्भाशय, गुदा आदि आन्तरिक अङ्गों के केन्सर में रक्तस्त्राव भी होता रहता है । अन्नप्रणाली में होने से भोजन निगलने में बाधा, आमाशय में होने से पाचननाश । तथा चमन होता है तथा साथ में रक्त भी निकलता है । रक्त-क्षयादि कारणों से रोगी दिन - प्रतिदिन क्षीण या शुष्क होता जाता है । यह रोग यूरोप तथा अमेरिका में अधिक होता है । वहां के निवासी मांसाहार अधिक करते है अत ' यह हो सकना । है ' एतद्भवेन्नास परायणस्य ' । अनेक प्रयोगों से सिद्ध हो गया है कि यह संक्रामक नहीं होता है । शस्त्रकर्म के समय अर्बुद शुद्ध-तौलियों से ढका रहे तथा छेदन के पश्चात् तौलियों से टके हुये अह्न को दूर हटा दिया जाय । चाकू के अर्बुद के सम्पर्क में आने पर उसके द्वारा अर्बुद के कोषाणुओं का दूसरे स्थानों में पहुंचना और गौण वृद्धि उत्पन्न करना सम्भव है । केन्सर चार प्रकार का होता है । ( १ ) एपिथिलियोमा ( Apithelioms ) ( २ ) Spheroidal - celled cancer, ( ३ ) Colnmnar cancer, ( 2 ) Coloid cancer, दोषः प्रदुष्टो रुधिरं सिरास्तु सम्पीड्य सङ्कोच्य गतस्तु पाकम् । सास्रावमुन्नह्यति मांसपिण्डं मांसाङ्करैराचितमाशु वृद्धिम् ॥ १६ ॥

स्रवत्यजस्रं रुधिरं प्रदुष्ट-मसाव्यमेतद्रुधिरात्मकं स्यात् । रक्तक्षयोपद्रवपीडितत्वात् पाण्डुर्भवेदर्बुदपीडितस्तु ॥ १७ ॥

/ रक्तार्बुद - मिथ्या आहार - विहार से दुष्ट हुए वातादि दोष रक्त तथा सिराओं को संपीड़ित तथा सङ्कुचित करके पाक को प्राप्त हो कर स्रावयुक्त तथा मांस के अङ्कुरों व्याप्त एवं शीघ्र वृद्धि से युक्त मांसपिण्ड को उत्सेध युक्त कर देते है तथा उससे निरन्तर दूषित रक्त बहता है । यह रक्तार्बुद असाध्य होता है । अर्बुद रोग से पीड़ित व्यक्ति रक्तचयरूपी उपद्रव से पीड़ित होने से वर्ण में पाण्डु ( श्वेत रक्त पीत ) हो जाता है । विमर्शः — ' गतस्तु पाऊन् ' इसके स्थान में ' तस्वपाकम् ’ ऐसा अन्यत्र पाठान्तर उत्तम है क्यों कि अर्बुदों में पाक नहीं | होता है ।

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अध्यायः ११ ] निदानस्थानम् । २७३ मुष्टिप्रहारादिभिरर्दितेऽङ्गे

मासं प्रदुष्टं प्रकरोति शोफम् ।

अवेदनं स्निग्धमनन्यवर्ण-मपाकमश्मोपममप्रचाल्यम् ॥ १८ ॥

प्रदुष्टमांसस्य नरस्य वाढ-मेतद्भवेन्मांसपरायणस्य । मांसार्बुदं त्वेतदसाध्यमुक्तं साध्येष्यपीमानि विवर्जयेत्त ॥ १६ संप्रस्रुतं मर्मणि यच्च जातं ॥ स्रोतःसु वा यच्च भवेदचाल्यम् ॥ २० ॥

मांसाद — मुष्टिप्रहार आदि से दशरीर प्रदेश पर आघात । पहुंचने पर वहां का मांस दूषित हो कर स्वल्प पीदाकारी, स्पर्श में चिकना, स्वाभाविक वर्णयुक्त, नहीं पकने वाला, पत्थर के समान कड़ा तथा अप्रचाल्य ( स्थिर ) शोफ पैदा होता है । जो व्यक्ति मांस खाने में अधिक तत्पर रहता है तथा जिसका मांस दूषित हो जाता है उसके देह में यह मांसार्बुद रोग पैदा होता है तथा यह असाध्य होता है तथा साध्य अर्बुदों में इतने को वर्जित कर देना चाहिये- जो बहुत वहता हो, जो मर्म स्थान पर पैदा हुआ हो तथा जो नासा या रस- रक्ता दिवह स्रोतस या अन्नवह महास्रोतस में उत्पन्न हुआ हो एवं जो चाय ( स्थिर ) हो ॥ १८-२० ॥ यज्जायतेऽन्यत् खलु पूर्वजाते ज्ञेयं तदध्यर्बुदमर्बुदज्ञैः । यद् द्वन्द्वजातं युगपत् क्रमाद्वा द्विरर्बुदं तच्च भवेदसाध्यम् ॥ २१ ॥

/ अध्यर्बुद तथा हिरर्बुद लक्षण - पूर्व में उत्पन्न हुये अर्बुद के स्थान में या उसके सन्निकट जो दूसरा अर्बुद उत्पन्न होता है उसे अर्बुदज्ञ विद्वान् वैद्य अध्यर्बुद कहते हैं । जो प्रारम्भ ही में दो संख्या में अर्बुद पैदा हुये हो अथवा क्रम से एक के बाद दूसरा अर्बुद पैदा हुआ हो उसको हिरर्बुद कहते हैं तथा ये दोनों असाध्य होते है ॥ २१ ॥

न पाकमायान्ति कफाधिकत्वा-मेदोऽधिकत्वाच्च विशेषतस्तु । दोपस्थिरत्वाद् ग्रथनाच्च तेपां सर्वादान्येव निसर्गतस्तु ॥ २२ ॥

अर्बुदों में कफ की अधिकता होने से तथा मेद की विशेष अधिकता होने से एवं दोपों की स्थिरता होने से तथा ग्रन्थि रूप ( कठिन ) होने से स्वाभाविक तौर पर सभी प्रकार के ही अर्बुद पकते नहीं है ॥ २२ ॥

वातः कफश्चैव गले प्रवृद्धौ मन्ये तु संसृत्य तथैव मेदः । कुर्वन्ति गण्डं क्रमशः स्वलिङ्गैः समन्वितं तं गलगण्डमाहुः ॥ २३ ॥

गलगण्डनिदानादि वर्णन - वायु और कफ कर मन्या और मेद का आश्रय करके क्रमशः ३५ सु ० गले में बढ अपने अपने लक्षणों से युक्त गण्ड रोग को उत्पन्न करते हैं उसे गलगण्ड कहते हैं ॥ २३ ॥

विमर्श: --- क्रमश इत्यनेन शनैरेव वर्धन दर्शयति, वातकफमेदा-सि पृथक् गलगण्डकारणानि तेन त्रय एव गलगण्डा., पैत्तिकस्तु न भवत्येव, व्याधिस्वभावात् चातुर्थिकज्वरवत् ॥ ( मधुकोपः ) । भोजो गलगण्डलक्षणम् -- महान्तं शोथमल्प वा हनुमन्यागला-श्रयम् । लम्बन्त मुष्कवद् दृष्ट्वा गलगण्ड विनिर्दिशेत् ॥ इसे घेघा या ग्वाइटर ( Goiter ) कहते हैं । यह गले की थायराईड ( Thyroid ) ग्रन्थि के चढने से होता है । यह ग्रन्थि बाल्यावस्था में शरीर की वृद्धि तथा आहार - परिवर्तन का नियन्त्रण करती है | यह ग्रन्थि खाद्य - पेय द्रव्यों से ( Iodine ) को ग्रहण कर थाईरोक्सिन ( Thyroxine ) बनाती है तथा यह रक्त में मिल । कर उक्त शरीरकार्य करता रहता है । थाइरोक्सिन की कमी से शरीर मोटा तथा अधिकता से दुबला हो जाता है । एक बहि नैत्रगलगण्ड ( Exophthalmic goiter ) भी होता है जिसमें | रोगी की आंखें बाहर निकल आती हैं, पलकें वन्द नहीं कर | सकता है, हृदय गति १२० से १५० तक हो जाती है, ग्रीवा की धमनियां दूर से ही फडकती हुई दिखाई देती हैं, हाथ कांपते हैं । रोगी चिढचिढा हो जाता है । तोदान्वितः कृष्णसिरावनद्धः

कृष्णोऽरुणो वा पवनात्मकस्तु ।

मेदो s न्वितश्चोपचितच काला-द्भवेदति स्निग्धतरोऽरुजश्च ॥ २४ ॥

पारुष्ययुक्तश्चिरवृद्ध्यपाको

यदृच्छया पाकमियात् कदाचित् ।

वैरस्यमास्यस्य च तस्य जन्तो-भवेत्तथा तालुगलप्रशोषः ॥ २५ ॥

वातिक गलगण्ड लक्षण -- सूई चुभाने की पीडा से युक्त, काली सिराओं से व्याप्त, वर्ण में काला या अरुण वातिक गल-गण्ड होता है । कुछ काल के पश्चात् वढ़ जाने पर चरवी से युक्त हो जाने से स्पर्श में अत्यन्त चिकना तथा वेदनारहित हो जाता है । एवं कठोरता युक्त, देर से वृद्धि और नहीं पकने वाला होता है । कभी कभी अदृष्टवश या आगन्तुक कारणों से पाक को भी प्राप्त होता है । इस प्रकार के गलगण्ड से पीडित मनुष्य के मुख की विरसता तथा तालु और गले में

शोप ये लक्षण होते हैं । २४-२५ ॥

स्थिरः सवर्णोऽल्परुगुग्रकण्डुः शीतो महांश्चापि कफात्मकस्तु । चिराभिवृद्धिं कुरुते चिराच प्रपच्यते मन्दरुजः कदाचित् ॥ २६ ॥

माधुर्यमास्यस्य च तस्य जन्तो-भवेत्तथा तालुगलप्रलेपः ॥ २७ ॥

कफजगलगण्ड लक्षण -- कफ से उत्पन्न गलगण्ड स्थिर, त्वचा के समान वर्ण का, भल्प पीड़ा वाला, तेज खुजली से | युक्त, स्पर्श में शीत, आकार में बढ़ा, देर से बढने वाला तथा देर से ही पकता है एवं पकने के समय कुछ पीड़ा होती है तथा

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२७४ सुश्रुतसहिता । उस मनुष्य का सुख मीठा हो जाता है और उसके तालु प्रदेश तथा गले में लेप सा बना रहता है ॥ २६-२७ ॥ स्निग्धो मृदुः पाण्डुरनिष्टगन्धो मेदःकृतो नीरुगथातिकण्डुः ॥ २८ ॥

प्रलम्बतेऽलावुत्रदल्पमूलो

देहानुरूप नयवृद्धियुक्तः ।

स्निग्धात्यता तस्य भवेच्च जन्तो-गलेऽनुशद्धं कुरुते च नित्यम् ॥

मेढोलन्य गलगण्ड लक्षण - यह स्पर्श मुलायम, वर्ण में पाण्डु, बुरी गन्ध वाला, अधिक खुजली वाला होता है तथा गले में २६ ॥ चिकना और पीडारहित तथा तोम्बी के समान लटकता है, मूलभाग में पतला होता है तथा शरीर के अनुसार ही घटना और बढ़ता है । इससे पीडित मनुष्य का सुख चिप चिपा सा रहता है । तथा उसके गले में सदा अस्पष्ट शब्द होता रहता है ॥ २८-२१ ॥ कृच्छ्राच्छ्वसन्तं मृदुसर्वगान्नं संवत्सरातीतमरोचकार्तम् । क्षीणं च वैद्यो गलगण्डिनं तं भिन्नस्त्ररं चैत्र विवर्जयेत्तु ॥ ३० ॥

असाध्यगलगण्ड लक्षण – कष्ट से सास लेते हुये, मृदु या दुर्बल सारे शरीर वाले, एक वर्ष से ज्यादा पुराने, अरोचक से पीडित, क्षीण हुये एवं भिन्नस्वर वाले गलगण्ड के रोगी को वैद्य वर्जित कर दे ॥ ३० ॥

विमर्श - गलगण्ड के बढ़ने से श्वासप्रणाली ( Trachea ) पर दबाव पहने से श्वासकृच्छ्र, अन्नप्रणाली पर दबाव पडने से भोजन निगलने में कठिनता, नर्व पर दबाव पडने से स्वर-भंग, रक्तवाहिनियों पर दबाव पढने से गलसिराओं का फूलना ( कृणमिरावनदः ) तथा मस्तिष्कगत रक्तसंवहन में कमी होने से भ्रमादि लक्षण होते हैं । यह रोग प्राय ' घातक नहीं होता है 1 । हां कभी कभी जब कैंसर या श्वासावरोध होता है तब घातक होता है ।

निवद्धः श्वयथुर्यस्य मुष्कत्रल्लम्वते गले ।

महान् वा यदि वा ह्रत्वो गलगएडं तमादिशेत् ॥ ३१ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने गलगण्डगण्डमा-लाऽपच्यर्बुदनिदानं नाम एकादशोऽध्यायः ॥११ ॥

गलगण्डसामान्य लक्षण — जिस मनुष्य के गले में शोथ निव ( मर्यादित ) हो कर मुष्क ( वृषण ) के समान लट. कता है चाहे वह नाकार में बढा हो या छोटा उसे गलगण्ड कहते हैं ॥ ३१ ॥

इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां गलगण्डगण्डमालाऽपच्च-निदान नामैकादशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

Lac - S

द्वादशोऽध्यायः ।

अथातो वृद्ध्यपदंशश्लीपदानां निदानं व्याख्यास्यामः ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर वृद्धि, उपदंश तथा श्लीपद के निदान का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ तत्रादौ वृद्धिनिदानम्— वातपित्तश्लेष्मशोणितमेदोसूत्रान्त्रनिमित्ताः सप्त वृद्धयः । तासां मूत्रान्त्रनिमित्ते वृद्धी वातसमुत्थे केवल-मुत्पत्तिहेतुरन्यतमः ॥ ३ ॥

वात, पित्त, कफ, रक्त, मेद, मूत्र तथा आन्त्र के कारण वृद्धि रोग सात प्रकार का होता है । इनमें से मूत्रजन्य तथा आन्त्रजन्न वृद्धि वात के कारण होता है केवल दोनों की उत्पत्ति में प्रधान कारण अन्यतम अर्थात् मूत्रवृद्धि में मूत्र का बढ़ना तथा आन्त्रवृद्धि में मन्त्र का आकार में वृद्धि न होकर स्वस्थान से आगे के स्थान में वटना ( उतरना या खसकना ) है ॥ ३ ॥

अघः प्रकुपितोऽन्यतमो हि दोपः फलकोशवाहिनी -रभिप्रपद्य धमनीः फलकोशयोर्वृद्धि जनयति, तां वृद्धि -मित्याचचते ॥ ४ ॥

उदरगुहा ( Abdominal cavity ) के नीचे के विभाग में । अर्थात् श्रोणिगुहा ( Pelvic cavity ) में प्रकुपित हुआ वातादि त्रिदोषों में से कोई भी एक ( वात ) दोष फल ( वृपण ) तथा उसके कोष में जाने वाली धमनी में जाकर फल तथा कोप को वृद्धि करता है उसे वृद्धि कहते हैं ॥ ४ ॥

विमर्श - अण्ड की वृद्धि या शोध को Orchitis कहते हैं तथा वृपणवृद्धि को Scrotal swelling कहते हैं । चरक ने वृद्धि को न लिखा है - प्रध्नोऽनिलाद्यैर्वृपणे स्वलिङ्गैरन्त्रं निरेति प्रविचेन्नुहुश्च ॥ मूत्रेण पूर्ण मृदु मेदसा चेत् स्निग्धं च विद्यात् कठिनन्द्र शोथन् ॥ ( च ० चि १२ ) । तासां भविष्यतीनां पूर्वरूपाणि - वस्तिकटीमुष्क-मेढ्र ेषु वेदना मारुतनिग्रहः फलकोशशोफश्चेति ॥ ५ ॥

वृद्धि पूर्वरूप उन होने वाली वृद्धियों के पूर्वरूप में वस्ति, कटी, मुष्क और लिन में पीडा, अधोवात का निरोध तथा फल और कोप में शोथ ये लक्षण होते हैं ॥ ५ ॥

तत्रानिलपरिपूर्णा वस्तिमित्राततां परुषामनिमि-चानिलरुजं वातवृद्धिमाचचते । पक्कोडुम्बरसङ्काशां

ज्वरदाहोष्मवतीं चाशुसमुत्थानपाकां पित्तवृद्धिम् ।

कठिनामल्पवेदनां शीतां कण्डूमतीं श्लेष्मवृदिवम् ॥

/ दन वृद्धियों में जो वात से भरी हुई मशक की तरह प्रतीत होती हो, स्पर्श में कठोर हो तथा विना कारण ही पीडा-कारक हो उसे वातजन्य वृद्धि कहते हैं । जो पके हुये गूलर के फल के समान वर्ण की तथा ज्वर, दाह और उष्णता से युक्त हो एवं शीघ्र ही पैदा होने वाली तथा पकने वाली हो उसे पित्तजन्य वृद्धि कहते हैं । जो स्पर्श में कठिन, अल्प

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श्रध्यायः १२ ] निदानम्यानम् । II पीढा बाली, शीत तथा कम्युक्त हो टने कफजन्य वृद्धि कहते हैं ॥ ६ ॥

कृष्णस्फोटानां पित्तवृद्धिलिङ्गां रक्तवृद्धि | मृदु-farai कण्डूमतीमल्पवेदनां तालफलप्रकाशां मेदोवृद्धिम् ॥ ७ ॥

रक्त - नेदो वृद्धि नग - जो काले फो फुन्सियों तथा पित्त की वृद्धि के लगों से युक्त हो उसे वृद्धि कहते हैं एवं जो स्पर्श में मृदु, निग्ध, करडयुक्त, अपीडा वाली तथा ताल फल के समान आकार की हो उसे मेदोवृद्धि कहते है ॥ ~ विमर्श- - वृद्धि को होनाटोशील ( Haematocele ) कहते हैं । यह रोग आचान ने सूत्र वृद्धि का पानी निका लने से या घृन में वात अर्बुद के होने से बृप कोश में रक्त का सझन होकर होती है । मेदोवृद्धि को कृपा का स्लीपर ( Eephantiasis of the scrotam ) कहते हैं । मूत्रसन्धारणशीलन्य सूत्रवृद्धिर्भवति सा गच्छ तोऽन्युपूर्गा हतिरिच क्षुभ्यति सूत्रकृच्छ्रं वेदनां वृषणयोः श्वयथुं कौशयोश्चापादयति, तां मूत्रवृद्धिं विद्यात् ॥ = ॥ सूत्रज वृद्धि नग - मूत्र के वेग को रोकने से मूत्रवृद्धि रोग होता है । बह चलते हुये मनुष्य के जलपूर्ण नशक की तरह झुमित होती है या उप - उप या यल - थल च करती । है एवं नूत्रकृच्छु, टप करती है वर्ग: पूय नहीं होता, ( Hydrocele ) काया सूत्र का लसीका होता है वृषण में पीडा तथा हृपगकोष में सूजन उसे सूत्रवृद्धि जाननी चाहिये ॥ ८ ॥

प तथा कृषण रख्नु में तरल द्रव्य नो सचिन होने को नृत्रवृद्धि या हायड्रोसील कहते हैं । इसके उत्पन्न होने में सूत्रसन्धारण कोई सम्बन्ध नहीं है क्योंकि यह तरल और जिस प्रकार जलोदर में लमीका चाहि । नियों से चूकर उसीका इकट्ठी होती है उसी तरह वृषण । कोप की लसीकावाहिनियों से चूर लमीका कोश में सचिव होती है । कारण- पूर्णरूप से वास्तविक कारण का पता नहीं लगा है । बिहार, यू ० पी ० की तरफ अधिक होता है । कुछ रोगियों में फिरह या मिफलिस तथा जन के साथ एवं जीर्ग । वृपग प्रकोप के साथ यह रोग मिलता है । कभी कभी चोट लाने के पश्चात् भी यह हो जाता है । लग - इव के सचित होने से अण्डकोष का लाकार बडा होकर गोल या अण्डे के समान दीखता है । अधिक द्रव के बढ़ने से बड़े नारियल तथा बड़ी एण्ड की सा भी दिखाई देने लगता है । टटोलने से वृषणप्रन्यि पीछे की ओर प्रतीत होती है तथा कोप के ऊपर की ओर वृषण रज्जु को प्रतीत किया जा सकता है । इसकी एक मुख्य परीक्षा यह है कि रोगी को अंधेरे कमरे में ले जाकर वृपगवृद्धि के एक पार्श्व में टार्च या प्रकाश डालने से या मोमबत्ती जलाने से दूसरी ओर हल्का प्रकाश दिखाई दूंगा तथा कोप के भीतर की वस्तु चमकती हुई लाल दिखाई देगी । भीतरी नृपण ग्रन्थि भी दिखाई देगी । रोग के पुराने होने पर यह प्रकादा परीक्षा ( Light transllumination ) नहीं मिलेगी । दूसरी परीक्षा कम्पन को है जो एक तरफ अकुद्धि द्वारा हल्का आधान करने से दूसरी ओर कंपन दिखाई देता है । कभी कभी अधिक वृद्धि होने से कोप के त्वचा के | भीतर शिश्न के चले जाने से मूत्र वृपग वचा पर होकर बहता है जिससे खुजली उत्पन्न होती है एवं वृपगरज्जु में । तनाव होने में पीडा प्रतीत होती है । सापेक्ष निदान में । हर्निया तथा अन्य अर्बुदों से पृथक करना जरूरी है । दावने से यह उदर में नहीं समाता तथा रोगी के खांसने पर उसमें सरसराहट सी प्रतीति भी नहीं होती है । हर्निया तथा अर्बुदों, में कोप द्वारा प्रकाश परीक्षा नहीं मिलती है । रोग के भेद - अण्डवेष्टन नलातिवृद्धि ( Vaginal hydrocele ', । इसके निम्न भेद हैं । ( 1 ) तद्गजलाविवृद्धि ( Asate hyd = rocele ) ( २ ) सहज जलातिवृद्धि ( Congenital hydroce'e ), | ( ३ ) शत्रीय जलातिवृद्धि ( Infantile hydrocele ), ( 2 ) द्विको-पीय जलातिवृद्धि ( Bilocular hydrocele ), ( ५ ) जातोचर-जलानिवृद्धि ( Aquired hydrocele ) | आवेष्टित नाति वृद्धि ( Eaeysted bydrocele ), ( अ ) उपाण्डीय जलाति वृद्धि ( Hydrocele of epididymis ', वृपगरज्जुगत । जलातिवृद्धि आदि । भारहरणबलवद्विग्रहवृक्षप्रपतनादिभिरायासविशेषै-र्वायुरतिप्रवृद्धः प्रकुपितच स्थूलान्त्रस्येतरस्य चैकदेशं विगुणमादायावो गत्वा वङ्क्षगसन्धिमुपेत्य ग्रन्थि-रूपेण स्थित्वाऽप्रतिक्रियमाणे च कालान्तरेण फलकोशं प्रविश्य मुष्कशोफमापादयति, आव्मातो वस्तिरिवाततः प्रदीर्घः स शोफो भवति, सशब्दमवपीडितचोर्ध्वमुपैति, विमुक्तश्च पुनराम्मायते, तामन्त्रवृद्धिमसाध्या-मित्याचचते ॥ ६ ॥

वृद्धि - वो उठाने से, अधिक बलवान् के साथ लड़ने से एवं वृक्ष से गिर पढ़ने आदि विशेष परिश्रम के कारण अन्यन्त वटी हुई तथा प्रकुपित हुई वायु स्थूलान्त्र तथा इदान्त्र के एक भाग को संकुचित करके नीचे की ओर जाकर वंजग सन्धि का आश्रय करके ग्रन्यिरूप से स्थित होकर | चिकित्मा नहीं करने से तथा कुछ समय बीतने पर फुलकोप में जाकर नुम्क ( अग्डग्रन्यि ) को शोथयुक्त कर देती है । इस तरह यह शोय आल्मानयुक्त तथा वस्ति के समान फूला हुआ होता है । इस शोध को दवाने से शब्द करता हुआ ऊपर की और उदर में चला जाता है तथा दवाव छोड देने पर पुनः फलकोष में आकर फूलने का सा हो जाता है । इसको असाध्य क्षात्रवृद्धि रोग कहते हैं ॥ ९ ॥

विमर्श इतरस्य चेति । चद्रात्रावयव दढा I ( अ ० सं ० ), विगुणीकृत्येति सङ्कुचीकृत्य, द्विगुणीकृत्येति पाठान्तरे तु सङ्कोचेन द्विगुगांकृत्येति ( मधुकोपकारः ) । वस्तुतस्तु न तो आन्त्र में वृद्धि और न संकोच होता है तथा न मन्त्र द्विगुणी हो होती है किन्तु मन्त्र अपने स्थान से मार्ग मिलने पर नीचे की ओर उतर जाती है अत एव अष्टाङ्गसंग्रहकार ने यही भाव सप्ट लिख दिया है ' निवेशा‌द्यो नयेत् ' । डाक्टरी में इस रोग को हर्निया ( Hernia ) कहते हैं । न केवल आंत किन्तु कोई भी वह अपने स्थान को छोड़ कर किसी मार्ग द्वारा अन्य स्थान में चला जाता है उसे Hernia कहते हैं । इस तरह मलिष्क, फुफ्फुम, आंत्र आदि की हनिया होती हैं जैसे उदर की पूर्वमिति में उत्पन्न पूर्वी हर्निया ( Ventral hernia ) एवं

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II सुश्रुतसंहिता | कटिपा हर्निया ( Lumbar hernis ) महाप्राचीरा का हर्निया ( Diaphragmatic hernia ) नाभिहर्निया ( Umbhical hernia ) आदि होते हैं । किन्तु आन्त्र की हर्निया अधिक होती है अत एव इसका नाम आन्त्रवृद्धि पड गया है । रोगी के खासने या किसी प्रकार के बल करने से आंतों या आंतों का कुछ भाग अण्डकोष, कर तथा नामि इन तीन में से किसी एक में उतर जाता है । नाभि को हर्निया अधिक्तर बच्चों में होती है । अन्त्रियों का कुछ भाग नाभि के छिद्र द्वारा चर्म के नीचे पहुंच जाता है जिससे उदर के ऊपर एक फूला हुआ सा उमार दीखने लगता है जिसे हाथ द्वारा दबाने से गड़गड शब्द करता हुआ उदर में चला जाता है । कारण प्रायः हर्निया के सहन तथा जन्मांतर ऐसे दो मुख्य कारण होते हैं-( १ ) सहन कारणों में लण्डग्रन्थि का उदरगुहा से देरी में वृषण में टतरना, उदर से वृषण तक के मार्ग का पूर्णरूप से बन्द न होना, उदरप्राचीर - मांसपेशी दौर्बल्य, आन्त्रनिवन्विनो की अविक लम्बाई आदि तथा नाभिहर्निया में नामिछिद्र का चन्द्र न होना आदि प्रधान हैं । ( २ ) जन्मोत्तर कारण - उदरपेशियों की दुर्बलता, उदरशन्न कर्म के पश्चात् वहां की नगदस्तु या रोहित धातु के दृढ न होने से या उदर पर जाबात होने से एवं बोझ उठाने, तीव्र पुराना विषन्ध, मलमूत्रादि के उत्सर्ग में जोर का कुन्थन, तीव्र कास आहि प्रधान हैं । जान्त्र का हर्निया भी कई प्रकार का होता है । आयुर्वेद मत से निम्न भेद हो सकते हैं-( i ) वंत्रण आन्त्रवृद्धि ( Ingainal hernia ) -- इसमें आन्त्र चंदगसुरङ्ग ( Ingmural caral ) में होती हुई फलोप की ओर जाती है जैसा कि भोज ने भी लिखा है-गमावान जन्तोर्नपनि बङ्गन् । ( २ ) अमाफलकोपवृद्धि या अपूर्ण आन्त्रवृद्धि ( Incomplete hernia or bibonocele ) अप्राप्तन्त्रकोशा गववृद्धि हिनः ॥ ( ३ ) कोपप्राप्तवृद्धि या पूर्ग आन्त्रवृद्वि { Complete hernia ) — ' कोपप्राप्तान्नु बननेव ' इसमें आन्त्र बंचगोहिड में से होकर अण्डग्रन्थि के ऊपर तक पहुंच जाती है । ऐसे हर्निया के मुख्य तीन भेद होते हैं— ( १ ) जब अन्त्रियां बंचणी नलिका में होकर अण्डकोष में पहुंचती हैं तब उसे चंडणी हर्निया ( Inguical hernia ) कहते हैं । इसके वक्र और ऋजु ऐसे दो मुख्य भेद होते हैं-चक्रवंक्षण हर्निया ( Obigue ingairal zernis ) के भी निम्न-मेद्र होते हैं -- जातीचर वक्रवंचणी हर्निया ( Acquired oblique inguinal hernia ) २ - सहन वक्रवंचणीहर्निया { Congenital obliqce inganal hernia ): -आवेष्टित हर्निया ( Irfantile or enrysted hernia ) वंक्षणीहर्निया के दूसरे नंद Izzads after ( Direct inguinal hernia ) कहते हैं । ( २ ) जब अन्त्रियां और्वानलिका ( Pemoral canal ) में होकर जिसके द्वारा और्वी धमनी और सिरा ऊरु प्रान्त के ऊपरी भाग में पहुंचती हैं तब मौर्वी हर्निया ( Pemoral herais ) कहलाता है । यह अधिकतर त्रियों में होता है । इसका कारण योगि का अधिक चौडा होना मालूम होता है जिससे नलिका की चौड़ाई भी बढ़ जाती है । औव नलिका के तीन भाग होते हैं । बाहरी भाग में और्वी धमनी, बीच के भाग में और्वी सिरा तथा तीसरा भीतर की ओर स्थित खाली भाग है जो कि ऊपर की ओर भी कुछ वसामय धातु से बन्द । रहता है, नीचे उरु की ओर इसमें एक अण्डाकार छिद्र रहना । है जिल पर चालनी प्रावरणी ढकी रहती है । जब हर्निया करु में उतरती है तो वह नलिका के इसी भाग में होती हुई आती है । ( ३ ) नामिहर्निया - इसने नाभिच्छिद्र द्वारा आन्त्रावयव बाहर निकल आते हैं तथा नाभिप्रदेश में टत्सेव उत्पन्न करते हैं । नाल काटने के बाद नाभिपाक होने से यदि नाभि दुर्बल हो गई हो तो शिशुओं और बालकों में यह रोग दिखाई देता है तो युवावस्था तक स्वयं ठीक हो जाना है । सुश्रुव तुण्डिसंज्ञा से दिखा है तथा चरक में आयामव्यायामण्डिता लिखा है । नाल काटने की खराबी इस में कारण माना है । हर्निया की रचना -जिस समय क्षत्रियां ausahe अथवा करु में उतरती है उस समय उन्हें टकी रखने वाली परिविस्तृत कला के एक भाग को भी अपने साथ नीचे को खीच लाती हैं जो इन्हें यहां भी टके रखता है वह हर्निया का कोप ( Sack ) कहलाता है तथा इसके भीतर जो अन होते हैं उन्हें उसके अवयव कहते हैं जो कि निम्न होते हैं —– नान्त्र का कुछ भाग, आन्त्रिककला ( Mesentry ), टण्डुक ( Coecum ). ठण्डुकपुच्छ, मूत्रागन तथा कभी कभी डिम्बयन्थि तथा त्रि-प्रगाली भी मिलते हैं । हर्निया की विकृत गाएं- जब हर्निया में कोई विकार जैसे उसमें गोथ, अवरोध होते हैं तभी रोगी चिकि के पास जाते हैं । तब तक हर्निया स्वयं ही उदर के भीतर लौट जाती है तब तक रोगी केवल एक पेटी ( Truss ) को लगाकर या कम कर लगोट बांध के काम चलाते रहते हैं । दीर्घकालिक हर्निया में रोगी स्वयं ही उसे दबाकर उदर | के भीतर कर देता है, नहीं दबने पर ही चिकित्सक की शरण लेनी पड़ती है । निम्नविकृत दशाएं होती हैं-( १ ) अवल्द हर्निया ( Strangulated Hernis ) होने पर पीडा, स्वच्धता, मुच्छा, नाडीमन्द, शीतस्वेद, आध्मान, चमन आादि तया अन्त में कोथ होकर मृत्यु । ~ ( २ ) शोथयुक्त हर्निया ( Inflamed Hernia ) - अभिवाद से या कर्पंग के समय अन्त्रियों को क्षति पहुंचने से होता है । स्वरूप मलनिसारण, मितली, चमन, ज्वर, हनिया स्थान तनाव युक्त, लाल, उष्ण और स्पर्शासा होता है । अवरुद हर्निया में स्वर नहीं होता है तथा आंत में अवरोध होने से मल वमन के साथ निकलता है तथा खांसने से सरसराहट नहीं होती है । इसमें उबर होता है, थोड़ा थोड़ा मल निकलते रहने से चमन में मल नहीं निकलता तथा खांसने । से सरसराहट होती है । - ( ३ ) अकर्षगीय हर्निया ( Irreducible Hernia ) — से कहते हैं जब कर्पग द्वारा हनिया के अवयवों को उदर में नहीं लौटाया जा सकता है । हुसका कारण प्रायः कोप तया अवयवों का जुड़ जाना होता है । हर्निया के जीर्ण होने पर तथा अनुचित पेढी के उपयोग से यह उत्पन्न होता है । ( 2 ) वन्वित हर्निया ( Obstructed Hernia ) — जिसमें हर्निया के कोप के भीतर स्थित अन्त्रियों द्वारा मल आगे नहीं जा सकता है वहीं एक जाता है । यह दवा बृहद्दन्त्र में । होती है तथा नामिहर्निया में पाई जाती है । कारण – पाचन

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श्रध्यायः १२ ] निदानस्थानम् । २७७ का विकार है, कोपस्थ आन्त्रभाग में अपक भोजन का अवशेष तथा शुष्क मल के टुकडे सचित होकर इसे पैदा करते हैं । वमन, उदरशूल आदि लक्षण होते हैं । सापेक्ष रोगनिर्णय - ( D diagnosis ) - निम्न दशाओं मैं कृपणवृद्धि हो जाया करती है । ( १ ) आन्त्रवृद्धि, ( २ ) मूत्रवृद्वि, ( ३ ) रक्तवृद्धि, ( १ ) मेदो-वृद्धि, ( ५ ) सिरावृद्धि, ( ६ ) अण्डशोथ, ( ७ ) उपाण्डशोय, ( ८ ) अण्ड के अर्बुद । आन्त्रवृद्धि में सांसने पर आंत का ऊपर नीचे जाना, दबाने पर उदर में समा जाना, प्रधान लक्षण है 1 । मूत्रवृद्धि में तरन प्रतीति, प्रकाशपरीक्षा मिलना प्रधान लक्षण है । रक्तजवृद्धि में वृषण पर चोट लगने का इतिहास, मेदोवृद्धि में वृषण की त्वचा मोटी तथा कर्कश एवं श्लीपद ज्वरादि लक्षणों का इतिहास, सिरावृद्धि में बाईं ओर की सिराओं का फूलना तथा झोले में भरे केचुओं का सा स्पर्श प्रतीत होना तथा यह युवावस्था में हस्तमैथुन करने से होता है | अण्ड - उपाण्डादिशोयों में आघात का इतिहास तथा फिरङ्ग या राजयक्ष्मा के अन्य लक्षण । मिलना फिरन । जन्य वृद्धि में केवल वृपणग्रन्थि का बढ़ना, पोढा न होना । तथा सवेदना ( ज्ञान ) का नाश होना एवं राजयचमाजन्य । वृद्धि वृपग, उपवृपण और रज्जु में भी विकृति होना, वृपण का सावेदनिक ज्ञान रहना एवं अर्बुदजन्य घृपणवृद्धि केवल । एक तरफ को ग्रन्थि में रोगारम्भ होना, धीरे धीरे रोग का । बढ़ना, पीडा होना, वृषण को लसीका प्रन्थियों का फूलना । आादि प्रधान लक्षण होते हैं । इस तरह वृपणवृद्धि में उक्त प्रधान लक्षणों की सहायता से तथा अन्य अपने अपने सार्व दैहिक लक्षणों का भलीभांति विचार कर रोग निर्णय करना चाहिये । ' रोगमादी परीक्षेन ' । ' व्याधेलनपरिधानन् ' । सर्वत. सर्व-मालोच्य यथासम्भवमर्थचित् । ततोऽध्यवस्येत्तत्त्वे च कार्ये च तद | नन्तरम् ॥ ( चरकः ) | First diagnosis then treatment, उपदंशनिदानम् तत्रातिमैथुनादतिब्रह्मचर्य्याद्वा तथाऽतित्रह्मचा रिणीं चिरोत्सृष्टां रजस्त्रलां दीर्घरोमां कर्कशरोमां सङ्की । रोमां निगूढरोमा मल्पद्वारां महाद्वारामप्रियामकामा- । मचौक्ष्यसलिलप्रक्षालितयोनिमप्रक्षालितयोनिं योनि - । रोगोपसृष्टां स्वभावतो वा दुष्टयोनिं वियोनिं वा नारीमत्यर्थमुपसेवमानस्य तथा करजदशनविषशुकनि पातनाद्बन्धनाद्भुस्ताभिघाताच्चतुष्पदीगमनादचौदयस - । लिलप्रक्षालनादद्वपीडनाच्छुक्रमूत्रवेगविधारणान्मैथुना-न्ते वाऽप्रक्षालनादिभिर्मेद्रमागम्य प्रकुपिता दोषाः क्षतेऽ-क्षते वा श्वयथुमुपजनयन्ति, तमुपदंशमित्याचक्षते ॥१० ॥

अधिक मैथुन से अधिक ब्रह्मचर्य से एवं अधिक दिनों तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण की हुई, चिरकाल से स्वभर्तृ आदि से । त्यागी हुई, रजोधर्म से युक्त, बड़े रोमवाली, रुखे लोमवाली, सङ्कीर्ण ( अधिक ) रोमवाली, योनि में रोम जिसके हों, अल्प या सचित योनिद्वार वाली, महा ( विस्तृत ) योनिद्वार वाली, प्रिय न लगने वाली, मैथुन कराने की अनिच्छा वाली, खराब जल से जिसने योनि प्रचालित की हो अथवा जिसको | योनि प्रचालित न की हो, योनिरोगों से व्याप्त, स्वभाव ही जिसकी योनि दुष्ट हो किवा जिसकी योनि विकृत या दूषित हो ऐसी खी के साथ अत्यधिक मैथुन करने वाले मनुष्य के तथा नख ( करज ), दांत ( दशन ), चिप और शूक के लगने से, लिङ्ग को बाँधने से, हस्तमैथुन के समय आघात लगने से, चतुप्पद वाली पशु जाति की स्त्री के साथ मैथुन करने से, खराब जल से लिन को धोने से तथा उसका पीडन करने से, शुक्र और मूत्र के वेग को रोकने से तथा मैथुन के अन्त में शिश्न को नहीं धोने आदि अनेक कारणों से प्रकु-पित हुये वातादि दोष त ( म्रुगयुक्त ) या अक्षत हुये शिश्न में आकर शोथ उत्पन्न कर देते हैं । इस प्रकार उत्पन्न हुये रोग । को उपदेश कहते है ॥ १० ॥

विमर्श: -- अष्टाङ्ग संग्रह में स्त्रीसम्भोग से निवृत्त का सहसा मैथुन करने को उपदेश में कारण माना है- त्री-| व्यवाय निवृत्तस्य सहसा भजतोऽथवा ' । वियोनिहस्तजङ्घान्तरमिति ढल्हण; या विकृतयोनि ( Malformation of the vagina ) । विप शुकचेति पृथक् किंवा विषयुक्त शुक तथा चाष्टाङ्ग संग्रहेऽपि -विपवच्छूकपातनैः । शुक. सजन्तुजलमलः, लिङ्गवृद्धिकरयोगो वेति टल्हण | ऊपरजलेषु वाहुल्येन दृश्यमानो जन्तुतुल्याकृति कश्चिदोषधि-विशेष शुरु । ते च शूका सविषनिर्विषभेदाद् द्विविधास्तत्र विपवन्तो रोगकारिणस्तथा चोक्तमपि कृष्णानि चित्राण्यथवा शुकानि सवि-पाणि तु । पातितानि पचन्त्याशु वात्स्यायनो ककामसूत्रे तु — एवं लिङ्ग दशरात्र तैलेन मृदित " " स विद्यानान् ॥ स पञ्चविधत्रिभिर्दोषैः यह उपदंश पांच प्रकार का पृथक् पृथक् तीन, तीनों दोषों के मेढ्र ं निरवशेषत ॥ ( इन्दुः ) वृक्षजाना जन्तूना शुक्ररुपलिप्त यावज्जीव शुकनो नाम शो पृथक् समस्तैरसृजा च ॥११ ॥

होता है । तीनों दोपों से मिलने से चौथा तथा रक्तदृष्टि से पांचवा उपदेश होता है ॥ ११ ॥

तत्र वातिके पारुष्यं त्वक्परिपुटनं स्तव्धमेढ्रता परुपशोफता विविधाश्च वातवेदनाः । पैत्तिके ज्वरः श्वयथुः पक्वोडुम्बरसङ्काशस्तीत्रदाहः क्षिप्रपाकः पित्त-वेदनाश्च । श्लैष्मिके श्वयथुः कण्डूमान् कठिनः स्निग्धः श्लेष्मवेदनाश्च । रक्तजे कृष्णस्फोटप्रादुर्भावोऽत्यर्थमसृ-प्रवृत्तिः पित्तलिङ्गान्यत्यर्थ ज्वरदाहौ शोषश्च याय-चैव कदाचित् । सर्वजे सर्वलिङ्गदर्शनमवदरणं च शेफ-सः कृमिप्रादुर्भावो मरणं चेति ॥ १२ ॥

वातिक उपदंश में कर्कशता, स्वचा में दरारें पड़ना, शिक्ष मैं स्तब्धता ( कर्कशता, कठोरता या सुन्नता ), रूक्ष शोथ तथा अनेक प्रकार की बातिक पीड़ाऍ होती हैं । पैत्तिक उपदंश में ज्वर, शिश्न में सूजन तथा पके हुये गुलरफल के समान उसका रङ्ग, तीघ्र जलन, शीघ्र पाक तथा पैत्तिक ( थोप चोपादि ) वेदनाएँ होती हैं । लैष्मिक उपदंश होने पर शिश्न में शोथ, खुजली, कठोरता, स्निग्धता तथा कफ की वेदनाएँ होती हैं । रक्तजन्य उपदंश में कृष्णवर्ण के स्फोट ( फोड़ों ) की उत्पत्ति, अत्यधिक रक्त का स्राव, एवं उपर्युक्त पित्तलक्षण तथा ज्वर, दाह तथा मुखशोप ये लक्षण होते हैं एवं कभी - कभी याप्य

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२७८ सुश्रुतसहिता । भी होता है । सर्व दोषजन्य उपदंश में वातादि सर्व दोषों के लक्षणों का दिखाई देना, शिश्न में दरारें पडना, उसमें कृमियों की उत्पत्ति तथा अन्त में मृत्यु तक होना ये लक्षण होते हैं ॥१२ ॥

विमर्श: - कुछ रोग ऐसे हैं जो कुप्रसङ्ग या मैथुनजन्य ( चीनिरियल डिसीजिज Venereal Diseases ) कहलाते हैं जैसे उपदेश फिरत, पूयमेह या सूजाक, गुह्यवंक्षणीय कर्णार्बुद, वद मुख्य हैं । ( १ ) उपदंश को सॉफ्ट ॉकर ( Soft chanore ) कहते हैं । इसकी उत्पत्ति का कारण ड्यूक्रे बेसीलस ( Duore's । Bacillus ) नामक जीवाणु है । उपदशपीडित व्यक्ति के साथ मैथुन करने से दूसरे से सातवें दिन के बीच में शिश्न के अग्रचर्म के नीचे मुण्डिका और उसके पीछे की धाई पर स्फोट उत्पन्न होकर कुछ समय में गल के पीडायुक्त व्रण में परिवर्तित हो जाता है । जननेन्द्रिय के अतिरिक्त अन्य अर्को पर यह व्रण नहीं होता है 1 | कभी - कभी इस ऋण के साथ फिरङ्ग रोग का भी उत्पन्न हो जाता है तथा साथ ही ऊरुप्रान्त की लसीका ग्रन्थिया भी वह जाती है । यह त्रण स्पर्श में मृदु होता है इसीलिये सॉफ्ट शकर कहा है । इससे कुछ दिनों तक गाढ़ा, पीला तथा रक्तयुक्त पूय बहता रहता है । जिन स्थानों पर हमका स्राव लग जाय वही व्रण उत्पन्न हो सकता है । यह स्त्री तथा पुरुष दोनों को होता है - तन्त्रान्तरे विशेष - भेदूसन्धी अगा. केचित् केचित् सर्वाश्रया स्मृता । कुल्त्याकृतय केचित् केचि -न्मुङ्गदलोपमा ॥ रजादाद्दपरौताश्च तृष्णामोहसमन्विता । शीघ्र केचि द्विमन्ति शनं केचित्तयाऽपरे ॥ स्त्रीणा च पुसां जायन्ते उपदशा मुदारुगा । इस रोग के उत्पन्न होते ही चिकित्सा न करने से शोथ, किमि, दाह, पाक और विशीर्णशिश्न होकर पुरुष की मृत्यु तक हो जाती है - सञ्जातमात्रे न करोति मूढ क्रिया नरो या निपने प्रसक्तः । कालेन शो यक्रिमिदाहपाकैचिंगोर्णगिरनो त्रियते स तेन ॥ ( माधव नि ० ) । यही रोग चरक चि ० अ ० ३० कृत क्लेव्य के नाम से वर्णित है । ( २ ) फिरन को गरमी या आतशक ( Syphyls ) कहते है । भावप्रकाश ने ही इसका सर्वप्रथम वर्णन निम्न रूप से क्रिया है— फिरनसयक देशे ( पोर्तुगाल ) बाहुश्येनैव यद्भवेद । तस्मात् विग्न इत्युक्तो व्याधित्र्यधिविशारदै ॥ गन्धरोग फिरनोऽ-य जायते देहिनाम् | फिर निगोनससर्गात् फिरङ्गिण्या प्रस-77 ॥ व्याधिरागन्तुजो ग्रंप दोषाणामत्र सक्रम । भवेत्तलक्षयेदेपा लक्षभिजावर ॥ किरनस्त्रिविधो शेयो वालो साभ्यन्तरतस्तथा । बहिरन्तथापि तेषा विज्ञानि च नवे ॥ तन बाल. फिरङ्ग स्या-डिस्कोटमटमोऽस्परम् । स्फुटितो व्रणवद्वेध सुससाध्योऽपि स ॥ मन्यिनाभ्यन्नेर म स्यादामात इन व्ययाम् । शोथञ्च जनयदप कष्टमाध्यो दुध मृत ॥ काय वल्क्ष्यो नासाम्यको यद्वेश्च नन्द्रा । अस्विशोपोऽन्विक्रत्व फिरोपद्रवा यमी ॥ वहि मंत्री नवे माध्यो नवीनो निन्दन । आभ्यन्तरन्तु कष्टेन साध्य स्यात्र्यमानय ॥ बहिरन्तर्भवो जीर्ण क्षाणस्योपद्रवैर्युत । व्याप्तो व्याविरसाध्योऽयमित्यादुर्भुनय पुरा । फिर रोगपीड़ित व्यक्ति के साथ सम्भोग करने से यह रोग उत्पन्न होता है । इसका कारण ट्रिपोनिमा पाटीढम् ( Treponema pallidum ) नामक पेचदार जीवाणु है जो बालों की रगढ़ या मैथुनजन्य-घर्षण से जननेन्द्रियों की श्लेष्मल त्वचा में उत्पन्न हुये छत के द्वारा प्रविष्ट हो जाता है । रोग की प्रथमावस्था में यह जीवाणु! । व्रण में उपस्थित रहता है । कभी - कभी यह रोग केवल रोगी के सम्पर्क से भी उत्पन्न हो जाता है । व्रण की परीक्षा करने से संक्रामक लोशन द्वारा हाथ ठीक न धोने से चिकित्सकों की | अद्भुलियों, ओष्ठ, स्तन और जिह्वा पर व्रण उत्पन्न होते देखे । गये हैं । परिचारिकाऍ भी रोगग्रस्त हो सकती हैं । इस रोग के लक्षणों को चार अवस्थाओं में विभक्त करते हैं । प्रथमावस्था -- सम्भोग के दूसरे या तीसरे सप्ताह में केवल शिश्न पर या शिश्न के अग्रचर्म के भीतर की ओर पीछे की धाई के पास अथवा नीचे की ओर सीवन पर तथा मूत्र-| दण्डिका ( Urethra ) में छिद्र के ओष्ठों के भीतर तथा खियों में वृहद्भगोष्ठ के भीतरी अङ्ग पर एक छोटा सा दाना पढ जाता है जो धीरे - धीरे बढ़ कर फूट जाता है और व्रण वन जाता है । स्पर्श में यह कठिन होता है अतएव इसे । कठिन व्रण ( Hard chanore हार्ड रॉकर ) भी कहते हैं । इस व्रण से केवल लसीका का स्राव होता है जिसमें रोग के जीवाणु होते हैं । वेदना, पूय और रक्तस्राव रहित होता है । व्रण होने के एक या दो सप्ताह पश्चात् वंक्षण की लसीका -प्रन्थियां फूलती हैं । द्वितीयावस्था में रोग का चिप सारे शरीर में रक्त द्वारा फैल जाता है ओष्ठ, जीभ, तालु, कपोल के भीतरी भाग और 1 गले के दोनों ओर की श्लेप्मल कला पर छाले पड़ जाते हैं जो गोल या अर्धचन्द्राकार, बिल्कुल साफ कटे हुये किनारे वाले होते हैं । ग्रीवा, कोहनी तथा कक्षा को लसीकाग्रन्थियां भी फूलती है । ज्वर, सिर तथा जोड़ों में पीढा और रक्ताल्पता आदि सार्वदेहिक लक्षण भी होते हैं । तृतीयावस्था - प्रथम व्रण बनने के छ माह बाद तथा दो तीन वर्ष बाद मे भी प्रारम्भ होती है । त्वचा, उपत्वचा, लसी-काग्रन्थियां, मांसपेशियां, अस्थ्यावरण, मस्तिष्कावरण, यकृत्, प्लीहा, वृपणग्रन्थि आदि अंगों में गांठदार और चपटी ग्रन्थियां बनने लगती हैं जिन्हें गमा ( Gumma ) कहते हैं । धीरे धीरे इनमे सहान होकर फूट के धूसर वर्ण का पूय वहता है । नासा में गमा होने से वह बैठ जाती है, तालु में होने से वहां छिद्र बन जाता है, मस्तिष्क तथा सुपुम्ना में होने से पक्षाघात, पटुता आदि विकार होते हैं, कान में होने से श्रवण शक्ति तथा आँख में होने से दर्शनशक्ति नष्ट हो जाती है । जिह्वा पर होने से वह फट जाती है । चतुर्थावस्था - इस अवस्था में फिरत विप का आक्रमण प्रथमाक्रमण के बाद तीन महीने के भीतर या पच्चीस तीस वर्ष बाद भी हो सकता है इसमें मस्तिष्क सस्थान पर विशेष प्रभाव होने से यदि प्रारम्भ में उचित चिकित्सा न कीजाय तो General paralysis of the Insane ( पागलपन ) तथा Locomotor ataxia or tabes dorsal19 ( लड़खड़ा कर चलना ) यह अवस्था उत्पन्न होती है । यह भयङ्कर व्याधि है । जो इससे पीड़ित व्यक्ति के होने वाली सन्तान को भी कष्ट पहुचाती है । ढा ० श्री घाणेकर जी ने अपनी सुश्रुत टीका में कुष्ट के श्लोकों का निम्नरूप से परिवर्तन कर इसकी कुलज-प्रवृत्तिका एक उत्तम फोटो सा खींच कर वर्णन कर दिया है--शुकस्थानगते दोपे सदारापत्यवाधक । योनिस्थानगते दोपे स्वभर्त्र-पत्यबाधक ' ॥ फिरदोपाद स्त्रीपुसोर्दुष्टशोणितशुक्रयो ' । यदपत्य तयोर्जात शेय तच फिरङ्गितम् ॥

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श्रध्यायः १२ ] निदानस्थानम् । III उपदेश - फिर - पाथक्यदर्शककोटक— उपदेश व्रण १ - सम्भोग के बाद तीसरे दिन दाने पैदा होते हैं । २-- अनेक दाने जो कि मृदु तथा पीडायुक्त । ३- पदाहत्रण से पूय - रक्त - उसीका स्राव । १ ] ओर की लसीका ग्रन्थियां बहती है, पकती हैं, फूटती हैं । ५-- स्त्रावपरीक्षा में ढके बेसीलम मिलना है । ६- स्राव का अन्यत्र प्रवेश होने से समान गोत्पत्ति । ७ – स्थानिकधातुनाशके सिवाय सार्वदेहिक लक्षण नहीं होते । ८ - विसंक्रामक विलयन से माफ करके आयढोफार्म छिडकना । केवल स्थानिक चिग से ही लाभ हो जाता है । पेनि-मीटिन के इंजेक्शन लगा सकते हैं । ३ - औौपसर्गिक पूयमेह, सुजाक ( गनोरिया Gonorrhen ) इसको उप्वान समझना भूल है । यह Gonococcus नामक जीवाणु के मैथुन के समय मूत्रमार्ग में प्रवेश कर शोथ पैदा करने मे उत्पन्न होता है । मैथुन के २ से ८ दिन के अन्दर शिनमगि फूली हुई तथा लाल डिसाई देती है । मूत्र में दाह तथा सूचना होती है तथा मूत्रमार्ग ने रक्तयुक्त पूय का नाव होना है । उचित चिकिया न करने पर पन्द्रह बीस दिन में रोग की तीव्रता कम होकर वह पुराना हो जाता है तथा जीवाणु अन्दर की ओर कोपरग्रन्थि, अष्टीलाग्रन्यि, बस्ति, वीर्याशय में जाकर वहां शोथ उत्पन्न करते हैं । इसी तरह जीवाणु रक्क द्वारा सन्धियों में पहुच कर आमवात ( गठिया ) तथा हृदय में शोथ पदा करते हैं । नावदूषित हस्त के आंखों, नामा और गुदा में लगने से वहां भी शोध होता है । न्त्रियों में रोग के जीवाणु पूर्व से प्रारम्भ होकर पीछे योनि, गर्भाशय, बीजवाहिनी, डिम्बग्रन्थि तथा उदर में जाकर शोथ पैदा करते हैं । ऐसे स्त्रियों से पैदा होते समय बच्चे की आंखों में पूरा के लगने से नवजात नेत्राभिष्यन्द ) ( Ophtha Imia Seonatorum ) उत्पन्न होकर बालक अन्धा हो जाता है । इससे बालक की आंखों को बचाने के लिये प्रसव के पूर्व उम स्त्री की योनि को विसंक्रामक लोशन से साफ कर लेवें तथा जन्म के बाद बच्चे की आंखें पोंछ कर उनमें २ % Silver Nitrate विलयन को एक २ बूंद एक एक आंख में टपका देनी चाहिये । पूयमेह से पुरुष नपुंसक तथा स्त्रियां बन्ध्या तक हो जाती हैं । यह रोग कुल्ज प्रायः नहीं होता है । ( 2 ) लिङ्गार्श - जायन्ते कुपितठों पे गुग्ाा सपिशिताश्रयै । अन्त-र्बहिर्वा मैद्रस्य कण्डुला मासकोटका ॥ पिच्छिलान्ननवा योनी तद्वच्च च्छत्रसन्निमा । तेऽशस्युपेक्षया ध्नन्ति मेढपुनमगार्तत्रम् । यह रोग गुह्यचंक्षणीय कर्णार्बुद ( Granuloms genito ingo nale ) के साथ मिलता हुआ है । ( ५ ) घट ( Climatio bnbo, lympho granuloma ) यह भी मैथुनजन्य व्यावि है । इसमें केवल जंवाओं की ग्रन्थियों में शोथ तथा पात्र होता है और अन्त में वे पक कर फूट के बहती है । जननेन्द्रिय पर कोई दाना या व्रण पैदा नहीं होता है 1 । ब्रध्नरोग के लक्षण इससे मिलते - जुलते हैं । फिरवण १ – तीसरे सप्ताह में दाना पैदा होता है । २ -- एक दाना जो कि कठोर तथा पीढा रहन । ३- निर्दाह व्रण में केवल लसीकालान । ४- दोनों ओर की उसीकाग्रन्थियां फूलती है किन्तु न पकती हैं और न पीडाकर होती है । ५- - ट्रिपानिमा पालीढा मिलता है । ६- प्रायः गोत्पत्ति नही होती है । ७ स्थानिक विकृति न होकर सार्वदेहिक लक्षण भयङ्कर होते है । ८ - नियो मालवर्सन के ६ इजेक्शन प्रति सप्ताह एक लगाने से तथा क्लोमल मरहम व्रण पर लगाने से लाभ होता है । । अत्यमिष्यन्दिनुन्नसेवनान्नित्रय गनः । करोति ग्रन्थिवच्द्रोय दोषो । वट्सगमन्धिषु ॥ जरानसाट्य त ब्रघ्नमिति निर्दिशेत् ॥ श्लीपदनिदानम् पितास्तु दोषा वातपित्तश्लेष्माणोऽथः प्रपन्ना बहुगोरुजानुजङ्घास्ववतिष्ठमानाः कालान्तरेण पादमा-श्रित्य शनैः शोकं जनयन्ति, तं श्लीपदमित्याचक्षते ॥ तत् त्रिविधं वातपित्तकफनिमित्तमिति ॥ १३ ॥

मिथ्या आहार - विहार मे कुपित हुये वात - पित्तादि दोप नीचे की ओर जाकर वंक्षण, ऊरु, जानु तथा जंघा इन स्थानों मे अवस्थित होकर कुछ समय पश्चात् पांव का करके | धीरे धीरे उसमें सृजन उत्पन करते हैं, उस शोफ को प कहते हैं । वह श्लीपद वात, पित्त और कफ के कारण तीन । प्रकार का होता है ॥ १३ ॥

विमर्श - इस रोग में पांच शिला के समान हो जाते हैं । अत एव इसका नाम श्लीपद रखा गया है - ' शिलावत् पढमिति । इटीपन् ' । ' शनै गर्नर्धन शोफ श्लीपद तत्प्रचक्षते ' । ( अ ० संग्रह ) । य ' । सञ्चरो वढ्क्षणजी भृशानि शोथो नृणा पादगत. क्रमेण । तच्छ्लीपद स्यात्करकर्णनेत्र शिघ्नीष्ठनासास्त्रपि केचिदाहु ॥ ( माधवनिदानम् ) । श्लीपद को हिन्दी में फीलपांच, हाथीपांव तथा डाक्टरी में इलिफेन्टियासिस ( Elephantiasis ) अथवा फायलेरियासिस ( Pilariasis ) कहते हैं । यह श्लीपदकृमि ( Filaria ) के । उपसर्ग से होने वाला रोग है जो क्यूलेक्स फेटिजिन्स मच्छर के काटने से होता है तथा जिसमें कृमि के भवस्थान करने से शरीर के विविध अङ्गों के लसीकाप्रवाह ( Lymph ourculation ) में बाधा उत्पन्न होकर अनेक उपद्रव पैदा होते है । प्रायः ये कृमि मच्छरी में निवास करते है तथा उसके काटने से या | मच्छर के पानी में मर जाने से उसमें स्थित कृमि समय मनुष्य के अन्नमार्ग द्वारा या उस पानी में स्नान करते समय या कपडा धोते समय या मलोत्सर्ग के बाद उस पानी | से अंग धोते समय या उस पानी मे चलते समय ये कृमि उस मनुष्य की त्वचा में छेद करके शरीर में प्रवेश करते हैं । इसीलिये जलभूयिष्ठ स्थानों में यह रोग अधिक होता है— दलीपद जायते तच्च देशेऽनूपे भृश भ्रमात् । ( अ ० सं ० ) । पुराणो-। दकभूयिष्ठा सर्वर्तुषु च शीतलाः । ये देशास्तेषु जायन्ते उलीपढानि

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२५० सुश्रुतसंहिता । विशेषन ॥ ( सुश्रुतः ) । भारतवर्ष में बंगाल, उडीसा, त्रावणकोर, कोचीन और मलावार में अधिक होता है । विहार तथा यू ० पी ० में मध्यम मात्रा में होता है तथा सिन्ध, राजस्थान, काश्मीर और मध्यभारत में प्रायः नहीं होता है । शरीर में उक्तमार्गों से प्रवेश के बाद इनका मुख्य निवास लसीका ग्रन्थियों, लसीकावाहिनियों तथा रसकुल्या में होता है । यहां स्वीकृमि असंरय बच्चे पैदा करती है जो रसरक्क - चाहिनियों में भ्रमण करते रहते हैं । ये कृमि सन्ध्या के समय से त्वचा के २ क में उपस्थित होने लगते हैं जो मध्यरात्रि तक प्रचुर मात्रा में हो जाते है पुनः कम होकर दिन में फेफडे, वृक्क तथा रक्त-वाहिनियों में चले जाते हैं । जब इन कृमियों की अधिकता के कारण जिस स्थान का लसीकाप्रवाह बन्द होता है तब वहां लसीका - सञ्चय होकर वह स्थान दुर्बल ( जीवाणु प्रति रोध - शक्तिहीन ) हो जाता है जिससे वहां स्ट्रेप्टोकोकाय, स्टेफिलोकोकाय का उपसर्ग होकर शोध होने लगता है जिससे वहां का चर्म कठिन और मोटा हो जाता है । कृमिविप के कारण ज्वर, वमन, शीतपित्त तथा असह्यता आदि लक्षण भी उत्पन्न होते हैं । श्लीपद के दौरे बार बार नियत समय पर आया करते हैं उस समय वंक्षण, वृषण, पांव आदि जहां भी विकृति हो वहां शोथ भी बढता रहता है । इस तरह बार बार के दौरों से वह स्थान मोटा पडता जाता है । उदर की रसा नियों में कृमि के होने से वहां उदरगुहा में रससचय होकर जलोदर, वस्ति में आने पर पिष्टमेह, आन्त्र में आने पर अति सार आदि उपद्रव भी होते रहते है । तत्र, वातजं खरं कृष्णं परुपमनिमित्तानिलरुजं परिस्फुटति च बहुशः । पित्तजं तु पीतावभासमीपन्मृ दुब्वरदाहप्रायं च । श्लेष्मजं तु श्वेतं स्निग्धावभासं मन्दवेदनं भारिकं महाग्रन्थिकं कण्टकैरुपचितं च १४ वातजादि - श्लीपद - लक्षण - वातजन्य श्लीपद जिस अड्ड में उत्पन्न होता है वह अन स्पर्श में खुरदरा, वर्ण में काला, कठिन, विना कारण ही वेदनायुक्त तथा अनेक दरारों से युक्त हो जाता है । पित्तजन्य लीपद में वह स्थान देखने में पीला सा, कुछ मुलायम तथा ज्वर और दाहयुक्त होता है । लेप्मा से उत्पन्न श्रीपद में वह स्थान श्वेत, चिकना सा, मन्द पीढायुक्त, भारी ग्रन्थिल तथा कण्टकों ( अङ्कुरों ) से व्याप्त होता है ॥ १४ ॥

तत्र संवत्सरातीतमतिमहद्वल्मीकजातं प्रसृतमिति वर्जनीयानि ॥ १५ ॥

असाध्य लक्षण - जो श्लीपद एक वर्ष का पुराना हो गया हो, वल्मीक के समान अनेक शिखरादि से युक्त हो तथा प्रसृत ( फैलने वाला या खावयुक्त ) हो वह वर्जनीय है ॥१५ ॥

विमर्श - प्रसृत से यहां त्वचा विदीर्ण होने पर लसीका स्त्राव होने लगता है अतएव स्त्रावयुक्त अर्थ ही ठीक है । सपरिश्रुति ( अ ० स ० ) । पिच्छिलजलन्नवणमितीन्दुः । भवन्ति चात्र-त्रीण्यप्येतानि जानीया-च्छलीपदानि कफोच्छ्रयात् । गुरुत्वं च महत्त्वं च यस्मान्नास्ति विना कफात् ॥ १६ ॥

यद्यपि ऊपर वात, पित्त तथा कफ से तीन प्रकार के श्लीपद | कह आये हैं किन्तु ये तीनों कफ की अधिकता होने ही से उत्पन्न होते हैं क्योंकि कफ के विना अन में भारीपन तथा मोटापन हो नहीं सकता है ॥ १६ ॥

पुराणोदकभूयिष्ठाः सर्वर्तुषु च शीतलाः ।

ये देशास्तेषु जायन्ते श्लीपदानि विशेषतः ॥ १७ ॥

जिन देशों में गर्त, तालाव आदि में पुराना पानी भरा रहता है तथा जो देश सभी ऋतुओं में शीतल ही रहते हो उनमें विशेष रूप से लीपद रोग हुआ करते है ॥ १७ ॥

विमर्शः -- पुराणोदकभूयिष्ठ अनूप देश होता है । वहां जल भरा ही रहता है जैसा कि मधुकोप व्याख्या में भी लिखा है-अनूपदेशे सल्लि पतिन बहूदक निम्नतया न शोषमुपयाति । चरक मत से अनूपदेश नदी समुद्र - समीपवर्ती माना है - मरित्स • मुद्रपर्यन्तप्राय ' । ऐसे देश में मच्छर तथा उनके अण्डे अधिक हुआ करते हैं अतः वहां यह रोग ज्यादा होता है ।

पादवद्धस्तयोश्चापि श्लीपदं जायते नृणाम् ।

कर्णाक्षिना सिकौष्ठेषु केचिदिच्छन्ति तद्विदुः ॥ १८ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने वृद्ध युपदंशश्लीपद-निदानं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

v श्लीपद स्थान- यह रोग जैसे पैरों में होता है उसी तरह मनुष्यों के हाथों में भी उत्पन्न होता है तथा कई श्लीपद रोग होना के विद्वान इस रोग को कर्ण, नेत्र, नासिका तथा ओष्टों में भी मानते हैं ॥ १८ ॥

इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दी पिकाभापायां निदानस्थाने वृद्धधुपदंश-श्रीपदनिदानं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

त्रयोदशोऽध्यायः ।

अथातः क्षुद्ररोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अव इसके अनन्तर क्षुद्र रोगों के निदान का वर्णन करते । हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ समासेन चतुश्चत्वारिंशत् क्षुद्ररोगाः भवन्ति । तद्य-| था- अजगल्लिका, यवप्रख्या, अन्धालजी, विवृता, कच्छपिका, वल्मीकम्, इन्द्रवृद्धा, पनसिका, पाषाणग-दूभः जालगर्दभः, कक्षा, विस्फोटक ', अग्निरोहिणी, चिप्पं, कुनखः, अनुशयी, विदारिका, शर्कराऽर्बुदम्, पामा, विचर्चिका, रकसा, पाददारिका, कदरम्, अल-सेन्द्रलुप्तौ, दारुणकः, अरुपिका, पलितं, मसूरिका, यौवनपिडका, पद्मिनीकटको, जतुमणिः, म चर्मकीलः, तिलकालकः, न्यच्छं, व्यङ्गः; परिवर्त्तिका, अवपाटिका, निरुद्धप्रकशः, सन्निरुद्धगुदः, अहिपूतनं, वृषणकच्छूः, गुदभ्रंशश्चेति ॥ ३ ॥

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अध्याय १३ ] निदानस्थानम् । २८१ संक्षेप से क्षुद्र रोग चव्वालीस होते हैं जैसे -अजगल्लिका, “ यवप्रख्या, अन्धालजी, विवृता, कच्छपिका, वल्मीक, इन्द्र-वृद्धा, पनसिका, पाषाणगर्दभ, जालगर्दभ, कक्षा, विस्फोटक, निरोहिणी, चिप्प, कुनख, अनुशयी, विदारिका, शर्करार्बुद, पामा, विचचिका, रकला, पाददारिका, कटर, भलस, इन्द्रलुप्त, दारुणक, अपिका, पलित, मसूरिका, यौवनपिडका, पद्मिनी-कण्टक, जतुमणि, मशक, धर्मकील, तिलकालक, न्यच्छ, व्यङ्ग, परिवर्तिका, अवपाटिका, निरुद्वप्रकश, सन्निरुद्धगुद, अहिपूतन, वृपणकच्छू तथा गुदभ्रंश ॥ ३ ॥

विमर्शः - संस्यादृष्टि से वाग्भट ३६, तथा माधवकर ने ४३ क्षुदरोग माने हैं । इसी तरह भोजने भी मूषिकाकर्णमुपक कोशफलार्थ प्रमृति अधिक चुद्ररोग लिखे हैं । वाग्भट ने निम्न रोग अधिक माने है - ( 1 ) गर्दभी - नाशमेव च गर्दभी मण्डला विपुलोत्पन्ना सरागनिटिकाचिना । ( २ ) गन्धनामा-पित्ताद्भवन्ति पिटिका: सूक्ष्मा लाजोपमा घना । तादृशी महता त्वेका गन्धनामेति कीर्तिता ॥ ( ३ ) राजिका - गर्मस्वेदपरीतेऽङ्ग पिटिका सरुजो घना. राजिकावर्णसस्थानप्रमाणा राजिकाहया ॥ ( ४ ) प्रसुप्तिः युनोदोरित. श्लेष्मा त्वच प्राप्य विशुष्यति । तत-स्त्वग्जायते पाण्डु क्रमेण च विचैनना ॥ अकण्डूरविक्लेदा सा प्रसुप्ति प्रसृप्तिनः । ( ५ ) इरिवेल्लिका — त्रिलिङ्गा पिटिका वृत्ता जत्रूर्ध्वमिरि-बेलिका माधवनिदानेऽपि --- पिडिकामुत्तमाङ्गस्था वृत्तामुग्ररुनाज-राम् । सर्वात्मिका सर्वलिङ्गा जानीयादिरिवेधिकान् ॥ ( ६ ) उत्कोठ, ( ७ ) कोठ—- असम्यग्वमनोदोर्णपित्तश्लेष्मान्ननिग्रहै । मण्डलान्यतिक-म्हूनि रागवन्ति वहूनि च । उत्कोठ सोऽनुवद्धस्तु कोठ इत्यभिधी-यते ॥ यह अर्टिकेरिया ( Urticaria ) हो सकता है । उत्कोठ को डाक्टरीमें अलर्जी ( Allergy ) को एक लक्षण माना है । यह खटिकको कमी, छिनाइन, संखिया आदि के सेवन, उदरस्थ कृमि तथा मानसिक उत्तेजनाजनक परिस्थिति इन कारणों से उत्पन्न होता है । इस रोग fara स्थानों पर मण्डल ( Wheals ) उत्पन्न होते हैं तथा शीघ्र उत्पत्ति और पुनः अदृर्शन इनका मुख्य लक्षण है । वह स्थान रक्तवर्ण या गुलाबी वर्ण का तथा उत्सेधयुक्त हो जाता है । कुछ खुजली चलती है । वरटीदष्टकण्डुमाल्लोहितोऽन्नकफपित्तात् । क्षणिकोत्पादविनाशः कोठ इति निगद्यते जनै ॥ ( भालु कितन्त्रे )

स्निग्धा सवर्णा प्रथिता नीरुजा ग्रन्थिसन्निभा ।

कफवातोत्थिता ज्ञेया बालानामजगल्लिका ॥ ४ ॥

अजगल्लिका — स्निग्ध, त्वचा के समान वर्ण वाली, गांठ युक्त, वेदनारहित, मूंग के प्रमाण को, कफ और बात से उत्पन्न होने वाली वालकों की पिढिका को कहते हैं ॥ ४ ॥

यवाकारा सुकठिना प्रथिता मांससंश्रिता ।

पिढका श्लेष्मवाताभ्यां यवप्रख्येति सोच्यते ॥ ५ ॥

यवप्ररया - जौ के समान आकार वाली, स्पर्श में अधिक कठिन, गांठदार तथा मांस में होने वाली कफ और से उत्पन्न पिडिका को कहते हैं ॥ ५ ॥

घनामवक्रां पिडकामुन्नतां परिमण्डलाम् ।

अन्धालजी मल्पपूयां तां विद्यात् कफवातजाम् ॥ ६ ॥

अन्धालजी - कठिन, मुखरहित, ऊंची उठी हुई, मण्डल ६३ सु ० युक्त या गोल तथा जिसमें पूय कम हो एवं कफ और बात से उत्पन्न पिडिका को अन्धालजी कहते हैं ॥ ६ ॥

विमर्श: - वाग्भट ने इसको अलजी नाम से तथा माधव-कर और भोज ने इसे अन्त्रालजी नाम से लिखा है- श्लेष्मा-निलौ श्रितौ स्नायु पिडका परिमण्डलान् दुष्टौ जनयतोऽवस्त्राम-ल्पपूयामकण्डुराम् ॥ आमोदुम्बरसङ्काशां विद्यादन्त्रालजीन्तु तान् ॥

विवृतास्यां महादाहां पक्कोडुम्बरसन्निभाम् ।

विवृतामिति तां विद्यात् पित्तोत्थां परिमण्डलाम् ॥ ७ ॥

विवृता - जिसका मुख चौड़ा हो, जिसमें अत्यधिक जलन होती हो तथा पके हुये गूलर के फल के समान वर्ण वाली एवं चारों ओर जिसके मण्डल हो या जो गोल हो एवं पित्त से उत्पन्न हुई पिढका को विद्युता कहते हैं ॥ ७ ॥

ग्रन्थयः पञ्च वा षड् वा दारुणाः कच्छपोन्नताः ।

कफानिलाभ्यामुद्भूतां विद्यात्तां कच्छपीमिति ॥ ८ ॥

कच्छपी --कफ और वायु के प्रकोप से उत्पन्न, कच्छुप के समान मध्य में ऊंची उठी हुई, पांच या छः भगकर पीड़ा देने वाली ग्रन्थियों को कच्छपी कहते हैं ॥ ८ ॥

पाणिपादतले सन्धौ ग्रीवायामूर्ध्वजत्रुणि ।

ग्रन्थिर्वल्मीकत्रद्यस्तु शनैः समुपचीयते ॥ ६ ॥

तोदक्लेदपरीदाहकण्डूमद्भिर्ब्रणैर्वृतः ।

व्याधिर्वल्मीक इत्येष कफपित्तानिलोद्भवः ॥ १० ॥

कफ, पित्त तथा वात से हस्त और पादतल में, सन्धियों, ग्रीवा और जत्रु ( हसली ) के ऊपर वल्मीक के स्वरूप की धीरे धीरे बढी हुई गांठ जो कि सुई चुभोने की सी पोड़ा, क्लेद ( स्त्राव ), दाह और खुजली से युक्त ऋणों से व्याप्त हो ऐसी व्याधि को वल्मीक कहते हैं ॥ ९ -१० ॥ विमर्श: - माधवोक्तविशिष्ट बदमीक - लक्षण - मुखैरनेकै स्रुतितोदवद्भिर्विसर्पवेद सर्पति चोनताम्रै । वस्मोकमाहुर्भिषनौ विकार निष्प्रत्यनीकं चिरज विशेषात् ॥ वल्मीक का साम्य Actinomy • cosis and mycetoms or madura foot इन रोगों के साथ हो सकता है ।

पद्मपुष्करवन्मध्ये पिडकाभिः समाचिताम् ।

इन्द्रवृद्धां तु तां विद्याद्वातपित्तोत्थितां भिषक् ॥ ११ ॥

इन्द्रवृद्वा - वर्णन ---: वात तथा पित्त के प्रकोप से उत्पन्न तथा कमल की कर्णिका के आकार की भांति छोटी छोटी फुन्सियों से व्याप्त ऐसी पिढिकाएं जिसमें हों उसे इन्द्रवृद्धा जानो ॥११ ॥

कर्णोपरि समन्ताद्वा पृष्ठे वा पिडकोग्ररुक् ।

शाकत्रत्पनसिकां तां विद्याच्छ्लेष्मवातजाम् ॥१२ ॥

पनसिका वर्णन दोनों कानों पर या उनके चारों ओर अथवा पीठ पर शाक ( कमलकन्द ) की आकृति की तथा तीव्रपीड़ा वाली एवं कफ और वायु से उत्पन्न पिडिका को पनसिका जानो ॥ १२ ॥

हनुसन्धौ समुद्भूतं शोफमल्परुजं स्थिरम् ।

पाषाणगर्दभं विद्याद्वलासपवनात्मकम् ॥ १३ ॥

पाषाणगर्दभ - वर्णन - कफ तथा वायु के प्रकोप से हनुसन्धि