श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 331–340
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 331–340
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सुश्रुतसंहिता । २८२ प्रदेश में उत्पन्न, अल्पपीड़ा वाले स्थिर ( कठिन ) शोथ को पापाणगर्दभ जानो ॥ १३ ॥
विमर्श - पापाणवत काठिन्यात्पापाणगर्दनः । ( मधुकोपः ) यह कर्णमूलिकलालाग्रन्थि ( Parotid gland ) के अर्बुद । जैसे एडिनोमा ( Adenoma ), फाईब्रोमा ( Fibroma ), इण्डोथिलियोमा ( Bndothel1oma ) में से कोई एक हो । सकता है । इसको कर्णमूलिक शोथ अथवा कर्णफेर ( Epide. mic parotitis or mumps ) मानना अनुचित है क्योंकि पाषाणगर्दभ में उबर नहीं होता किन्तु कर्णफेर में ज्वर होता है, पापाणगर्दभ एक तरफ पीढारहित, स्पर्श में कठिन तथा धीरे - धीरे बढने वाला होता है किन्तु कर्णफेर या मम्पम् दोनों तरफ, स्पर्श में मुलायम तथा शीघ्र बढने वाला होता है ।
विसर्पवत् सर्पति यो दाहज्वरकरस्तनुः ।
अपाकः श्वयथुः पित्तात् स ज्ञेयो जालगर्दभः ॥ १४ ॥
जालगम वर्णन - पित्त की प्रबलता से उत्पन्न तथा विसर्प के समान फैलने वाला एवं दाह और ज्वर युक्त कुछ पाक युद्ध शोथ को जालाईभ जानना चाहिये ॥ १४ ॥
विमर्श - जालम में बात - क्फ मन्द होते हैं तथा पित्त ree होता है जैसा कि चरक ने भी लिखा है. - मन्दास्तु पित्त-प्रबला प्रदुष्टा ढोपा मुनीनं तनुरक्तपाऊन् । ( चरक ' ) । भोज ने इसे विसर्प माना है- ' पिचोत्कटान्नयो दोपा जनयन्ति त्वगा-श्रिताः । व्याव रक्त तनु शोथमपाक नहुवेदनम् ॥ विसर्पिण सदाह
च तृष्णावरसमन्वितम् । विसर्पमाहुस्त व्याधिमपरे जाउगर्दमम् ॥
बाहुपार्श्वासकचाक्षु ' कृष्णस्फोटां सवेदनाम् ।
पित्तप्रकोपसम्भूतां कनामिति विनिर्दिशेत् ॥ १५ ॥
कचावर्णन - पित्त के प्रकोप से बाहु, पार्श्व, अंस ( स्कन्ध । प्रदेश ) तथा कक्षा ( Azilla ) इन स्थानों में उत्पन्न तथा वेदनायुक्त कृष्ण स्फोट को कक्षा समन्ननी चाहिये ॥ १५ ॥
विमर्श - कुछ पुस्तकों में १५ वें श्लोक के पश्चात् पिडिका-मुत्तमाद्गर्स्था वृत्तामुग्रन्जाज्वराम् । सर्वात्मिका सर्वलिङ्गा जानीया दिग्वेिस्स्किान || ऐसा अधिक पाठान्तर है किन्तु इद्ररोगोक • रोगगणना में इरिवेल्डिका का पाठ सुश्रुत में न होने से यहां मूल में उसे नहीं माना है । कहारोग का हर्पिस झोस्टर ( Herpes zoster ) के साथ मिलान हो सकता है । चरक ने -' यशोपवीनमनिमा ' प्रभूना पित्तानिलाभ्या जनितास्तु कक्षा. ' तथा अष्टांगसंग्रहकार ने कक्ष्येति कक्षासन्नेषु प्रायो देशेषु सानिलात । पित्ताद्भवन्ति पिटिका सूक्ष्मा खाजोपमा घना || कच्चा को चात पिचजन्य मानी है । सुश्रुतीय कक्षा के लक्षण वाग्भट तथा माधव की गन्धनामा से मिलते हैं जैसे- ग्वामेवविधा दृष्ट्वा
पिटिका स्कोरसन्निभम् । त्वग्गना विश्वको पेन बन्धनामा प्रचक्षते ॥
अग्निदग्धनिभाः स्फोटाः सव्वरा रक्तपित्ततः ।
क्वचित सर्वत्र वा देहे स्मृता विस्फोटका इति ॥ १६ ॥
' विस्फोट - रक्त तथा पित्त के प्रकोप से शरीर के किसी एक प्रदेश पर अथवा मारे शरीर पर अग्नि के नलने से जैसे स्फोट ( फफोले ) उत्पन्न हो जांय तथा वर भी हो तब उन्हें विस्कोट कहते हैं ॥ १६ ॥
विमर्श - विस्फोटक रोग को बुल्स हरदान ( Ballons eruptions ) किंवा पेस्फीग ( Pemphagus ) कह सकते हैं । माधवोक्त विस्फोटकवर्णन यथा- कट्वम्टतीक्ष्णोष्णविदाहिरुक्षारे-रजीर्णाध्यशनानपेश्च । तथर्तुदोषेण विपर्ययेण कुप्यन्ति दोपा पवना-दयन्तु ॥ त्वचमाश्रित्य थे रक्तमासाम्यीनि प्रदृष्य च । घोरान् कुर्वन्ति निस्फोटान् सर्वान्वरपुर सगन ॥
कक्षाभागेषु ये स्फोटा जायन्ते मांसदारणाः ।
अन्तर्दाहज्यरकरा दीप्तपावकसन्निभाः ॥ १७ ॥
सप्ताहाद्वादशाहाद्वा पक्षाद्वा नन्ति मानवम् ।
तामग्निरोहिणी विद्यादसाध्यां सन्निपाततः ॥ १८ ॥
अग्निरोहिणी - कक्षा प्रदेश में मांस को विदीर्ण करने वाले तथा प्रदीप्त अग्नि के समान अन्तर्दाह और ज्वरकारक स्फोट उत्पन्न होते हैं । ये स्फोट सात दिन में, या दस दिन में अथवा एक पक्ष में मनुष्य को मार देते हैं । इस प्रकार सन्निपात से उत्पन्न उस असाध्य रोग को अग्निरोहिणी जानो ॥
नखमांसमधिष्टाय पित्तं वातश्च वेदनाम् ।
करोति दाहपाकौ च तं व्याधिं चिप्पमादिशेत् ॥ १६ ॥
तदेव चतरोगाख्यं तथोपनखमित्यपि ॥ २० ॥
चिप्प - पित्त और वात नखमांस में अधिष्ठान करके पीढा, जलन और पाक उत्पन्न करते है उसे चिप्प रोग कहते है तथा उसी की चतरोग और उपनस भी कहते हैं ॥१ ९ -२० ॥ विमर्श - चिप्प को ओनिक्रिया परलेण्टा ( onychia purulenta ) कह सकते हैं । नखमांस ( Nail - matrix ) में क्षतादि होने से स्ट्रेप्टो स्टेफिलोकोकाय का उपसर्ग हो कर शोथ और पाक होता है । घरकोक्त क्षतरोग वर्णन - रोग. क्षत र्मनसान्तरे स्यान्मासास्रदूषी भृशशीघ्रपाक ॥ यह पारोनि-किया अथवा हिटलो ( Paronychia or whatlow ) है ।
अभिघातात् प्रदुष्टो यो नखो रूचोऽसितः खरः ।
भवेत्तं कुनख विद्यात् कुलीनमिति संज्ञितम् ॥ २१ ॥
कुनसवर्णन --चोट लगने से प्रदुष्ट हुआ नख रूक्ष, काला और कटिन ( खुरदरा ) हो जाता है उसे कुनख ( onycha • gryphosis ) जानो तथा उसी को कुलीन भी कहते हैं ॥२ ॥
गम्भीरा मल्पसंरभां सवर्णामुपरिस्थिताम् ।
कफादन्तःप्रपाकां तां विद्यादनुशयीं भिषक् ॥ २२ ॥
अनुदायी - कफ के प्रकोप से गहरी धातुओं में उत्पन्न, स्वल्प शोथयुक्त, त्वचा के समान वर्ण को शरीर के ऊर्ध्व-प्रदेश में स्थित एवं भीतरी भाग में पकने वाली पिटिका को वैद्य अनुशयी जाने ॥ २२ ॥
विदारीकन्दवद् वृत्तां कक्षावसन्धिषु ।
रक्तां विदारिकां विद्यात् सर्वजां सर्वलक्षणाम् ॥ २३ ॥
विदारिका --- वात - पित्तादि सर्व दोषों से उत्पन्न अतएव सभी दोषों के लक्षणों से युक्त तथा विदारीकन्द के समान गोल और कक्षा एवं वंक्षण की सन्धि में स्थित लालरंग ' की पिडिका को विदारिका जानो ॥ २३ ॥
विम: -- यह कक्षा वंक्षण प्रदेश की लसीका प्रन्थियों का शोध है । चरक ने इसे वात - कफजन्य मानी है - ज्वरान्विता वङ्क्षणकचसन्धी वर्तिर्निरति कठिना भता या । विदारिका सा कफ-। मारुताभ्यान् ।
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श्रध्यायः १३ ] निदानस्थानम् । २८३
प्राप्य मांससिरास्नायुः श्लेष्मा मेदस्तथाऽनिलः ।
ग्रन्थ कुर्वन्ति भिन्नोऽसौ मधुसर्पिर्व सानिभम् ॥ २४ ॥
स्रवत्यास्रावमत्यर्थं तत्र वृद्धि गतोऽनिलः ।
मांसं विशोष्य ग्रथितां शर्करां जनयेत् पुनः ॥ २५ ॥
दुर्गन्धं क्लिन्नमत्यर्थं नानावर्ण ततः सिराः ।
- स्रवन्ति सहसा रक्तं तद्विद्याच्छर्करार्बुदम् ॥ २६ ॥
शर्करार्बुद - कफ, मेद और बात ये मांस, सिरा और स्नायु में प्रविष्ट हो कर गांठ पढ़ा करते हैं फिर वह गांठ फूट कर शहद, घृत और वसा ( चरबी ) के सहरा अत्यधिक मात्रा में साव बहाती है । इस प्रकार उस विदीर्ण हुई ग्रन्थि में वायु विवृद्ध हो कर मांस को सुखा के ग्रन्थियुक्त शर्करा को उत्प देती है फिर उसकी सिराएं दुर्गन्धित एवं अत्यधिक किन्न और अनेक प्रकार के रंग का स्नाव अकस्मात् वहाती हैं उसे शर्करा -र्बुद जानो ॥ २४-२६ ॥ विमर्शः- भोजोक्त शर्करार्बुद -- नमेव भिन्न दुर्गन्धं घृतमेदो-निम सिरा । सवन्ति नावमनिश तदा स्याच्द्धर्करार्बुदम् ॥ शर्करा र्बुद का साम्य Cookers peculiar tumour के साथ हो
सकता है ।
पामाविचच्यौं कुष्ठेषु रकसा च प्रकीर्त्तिता ॥ २७ ॥
पामा, विचर्चिका तथा इनका कुष्ठ रोग में वर्णन कर दिया है || २७ ॥ परिक्रमणशीलस्य वायुरत्यर्थंरूनयोः । पादयोः कुरुते दारी सरुजां तलसंश्रिताम् ॥ २८ ॥,
- पाददारी - जो मनुष्य सदा घूमता फिरता है उसके अत्यन्त रुच हुये दोनों पावों में तलवों के आसपास किनारों पर ( पढ़ी में ) वायु पीडाजनक दरारें कर देता है उसे पाददारी ( विवाई या त्रिपादिका Rhagades ) कहते हैं ॥ २८ ॥
- शर्करोन्मथिते पाढ़े दाते वा कण्टकादिभिः ।
मेदोरक्तानुगैश्चैव दोषैर्वा जायते नृणाम् ॥ २६ ॥
' सकीलकठिनो प्रन्थिनिम्नमध्योन्नतोऽपि वा ।
कोलमात्रः सरुक् स्रावी जायते कदरस्तु सः ॥ ३० ॥।
कदर - चलते - फिरते समय शर्करा ( रेत, कंकड, पत्थर ) आदि से बार - बार चोट या टक्कर खाने पर अथवा कांटे आदि सेक्षत होने पर मेढ़ तथा रक्त का अनुसरण करते हुये कुपित दोपों से मनुष्यों के पांच में जो कीलयुक्त तथा स्पर्श में कठिन । एवं चारों ओर से निम्न किन्तु मध्यभाग में उन्नत ( उठी हुई तथा बेर के स्वरूप की पीढादायक गांठ उत्पन्न होती है और फूटने या काटने पर जिससे स्नाव बहता है उसे कदर कहते हैं । विमर्श: -- भोन ने इस कदर का मांसकील नाम रखा है । तथा हाथ और पांव दोनों में होना लिखा है- हस्तयो पाठयो-श्वापि गम्मीरानुगत खरम् । मासकील जनयत कुपितो कफमारुती ॥ शल्यमिव तं देश मन्यते तेन पीढित । शर्करा कटर केचिन्मन्यन्ते वातकण्टकन् ॥ कदर को कॉर्न ( Corn ) कहते है । किसी भी स्थान पर अधिक दवाव पढने से वहा की त्वचा की सेलों में वृद्धि हो कर यह पैदा होता है ।
क्लिन्नामुल्यन्तरौ पादो कहृदाहरुगन्वितौ ।
दुष्टकमसंस्पर्शादलसं तं विनिर्दिशेत् ॥ ३१ ॥
अल्स - वर्षा ऋतु में अथवा जहां पानी सदा वहता हो ऐसे स्थानों में खराव कीचढ का अत्यधिक सम्पर्क होने से जब पावों को अनुलियों के बीच के स्थानों ( अडल्यन्तर ) में द ( चिपचिपापन ), खुजली, जलन और पीड़ा होने लगती है, तब उसे अलस ( चिल्लेन Chilblain ) कहते हैं ॥ ३१ ॥
रोमकूपानुगं पित्तं वातेन सह मूच्छितम् । 1
प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणित. ॥ ३२ ॥
रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोऽन्येपामसम्भवः ।
तदिन्द्रलुमं खालित्यं रुन्येति च विभाव्यते ॥ ३३ ॥
खालित्य य - - वात के साथ मिला हुआ पित्त रोमकूपों में जा कर वालों को गिरा देता है तथा इसके अनन्तर रक्त के साथ | मिला हुआ कफ रोमकूपों ( छिद्रों ) को बन्द कर देता है जिस से उस स्थान में दूसरे बाल पैदा नहीं होते हैं इसी को इन्द्र-लुप्त, खालित्य तथा रूज्या कहा जाता है ॥ ३२-३३ ॥. विमर्श -- इन्द्रलुप्त को गंज ( अलोपेसिया ( Alopecia ) कहते हैं । सुश्रुत ने इन्द्रलुप्त, खालित्य तथा ल्ला को एक हो रोग माना है किन्तु वाग्भट ने वालों का सहसा गिरना इन्द्रलुप्त और धीरे धीरे गिरना खालित्य माना है -- सल्तेरपि जन्मैव श्चातन तत्र तु क्रमात् । ( अ ० सं ० ) । रुज्या को वाग्भट में रुढथा तथा माधव ने रुह्या तथा वाग्भट ने इसका चाच पर्याय भी लिखा है । ' तदिन्द्रलुप्त रुढया च. प्रादुश्चाचेति चापरे ' किन्तु कार्तिक ने ढाढी- मूछ का गिरना इन्द्रलुप्त, शिर के बालों का गिरना खालित्य और सर्व देह के वालों का गिरना रुह्या माना है । मधुकोपटीकाया कार्तिकस्त्वाह- इन्द्रलुप्त श्मश्रु-णि भवति खालित्य शिरस्येव, रुह्या च सर्वदेहे - इति । आगमस्त्वत्र नास्ति । खलतिरोग स्त्रियों में नहीं होता है-- अत्यन्त सुकुमारा-द्वयोरनो दुष्ट स्रवन्ति च । अव्यायामरता यस्मात्तस्मान्न खलति स्त्रियाम् ॥
दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपाट्यते ।
कफवातप्रकोपेण विद्याद्दारुणक तु तम् ॥ ३४ ॥
दारुणक -- कफ तथा वायु के प्रकोप से केशों का स्थान स्पर्श में कठिन ( दारुण ), कण्डुयुक्त, रूक्ष तथा दरारों ( चर्म में तेड़ें या धीरे से पढने सी रचना ) से युक्त हो जाता है तब उसे दारुणक जानो ॥ ३४ ॥
विमर्श - दारुणक का लाम्य Seborrhoea capitis or Pityriasis capitis के साथ हो सकता है । शिरःकपाल में इस रोग के अधिकतर होने से अष्टाङ्गसंग्रह मे इसका समा • वेश शिरोरोगों में किया गया है-- कण्डुकेशच्युतित्वा परोक्ष्यकृत् स्फुटन त्वच । सुसूक्ष्म कफवाताभ्या विद्याद्दारुणकन्तु तम् ॥ विदेह ने इस रोग में पित्त और रक्त का भी सम्बन्ध या कारण माना है - यदत्र पटलाभास सरुजस्क शिरस्त्वचि । परुप नायते जन्तो-स्तस्य रूपं विशेषतः ॥ तोटं समन्वितं वाताद सकण्डूगौरव कफात् । सपिपास सदाहातिरागं पिश्वास्रजं तथा ॥ ' इत्यत्र वचने मद्राहरागं च पितात, सातिं तु रक्तात्, अर्तिर्हि रक्तनाऽपि भवतीति श्रीकण्ठ ।
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२८४ सुश्रुतसहिता ।
अरूंपि बहुवक्त्राणि वहुक्लेदानि मूर्धनि ।
कफाक्कमिकोपेन नृणां विद्यादर्द्धपिकाम् ॥ ३५ ॥
अरूपिका- कफ, रक्त तथा कृमि इनके प्रकोप के कारण मनुष्यों के शिर में अनेक छोटे छोटे मुखवाली तथा अत्यधिक नावयुक्त पिटिकाएं हो जाती हैं उन्हें अरुपिका ( एग्जिमा आफ दी फेस एण्ड स्काल्प Eczema of the face and scalp ) जानो ॥ ३५ ॥
क्रोधशोकश्रमकृतः शरीरोष्मा शिरोगतः ।
पित्तं च केशान् पचति पलितं तेन जायते ॥ ३६ ॥
पलित - क्रोध, चिन्ता तथा श्रम से पैदा हुई शरीर को उष्णता तथा पित्त शिर में जाकर बालों को पका देते हैं उससे पलित ( बालों का सफेद होना ) रोग होता है ॥ ३६ ॥
विमर्शः- चरक ने पलित रोगोत्पत्ति में वातादि को भी कारण माना है — नेजोऽनिलाथै सह केशभूमिं दग्ध्वा तु कुर्यात् गन्तितिं नरस्य । किश्चित्तु ढग्या पलितानि कुर्याद्धरित्प्रभत्वन्न शिरो-रुडाणाम् ॥ किन्तु सुश्रुत ने व्यपदेशन्तु भूयमा ' इस नियम के अनुसार पित्त को ही इसमें प्रधान माना अतः अन्य दोष का निर्देश नहीं किया ऐसे कोई भी रोग बिना त्रिदोष के या एक दोप से होते नहीं ' न रोगोऽनेकटोपन ' ।
दाहज्वररुजावन्तस्ताम्रा स्फोटा: सपीतकाः ।
गात्रेषु वदने चान्तर्विज्ञेयास्ता मसूरिकाः ॥ ३७ ॥
मसूरिका - सारे शरीर में तथा मुंह और गले के भीतर पीलापन लिये हुए ताम्र ( रक्त ) वर्ण के स्फोट जो कि शरीर के भीतर दाह, उबर और पीडा के जनक हों उन्हें मसूरिका जानना चाहिये ॥ ३७ ॥
विमर्श: - मसूरिका - मसूर के समान आकार तथा वर्ण की पिटिकाएं इस रोग में होती हैं अतएव इसका नाम मसूरिका पढ़ा है — मनूरभात्रास्तद्वर्णास्तत्सना पिटिका घना ( अ ० सं ० ) । चरक ने भी ऐसा ही माना है - या सर्वगात्रेषु मसूर मात्रा ममू-रिका पित्तकफाट् प्रदिष्टा । इस रोग को लोक मैं माता या चेचक तथा शास्त्र में शीतला, मसूरिका या वसन्त रोग कहा है ध्रुव ढाक्टरी में इसे स्माल पाक्स ( Small pox ) अथवा बेरि ओला ( Variols ) कहते हैं । सुश्रुत, चरक, वाग्भट ग्रन्थों में इसे छुदुरोगों में रख कर संचेप से लिखा है जिससे उनके समय में इस का वर्तमान सा प्रकोप नहीं होता रहा होगा ऐसा जान सकते हैं । सहिता ग्रन्थों के बाद माधवकर ने मसूरिका नाम सेतथा भावप्रकाशकार ने अपने अपने ग्रन्थों में इसका स्वतन्त्र तथा विस्तृत चणन किया है किन्तु अन्य टीका ग्रंथों में दिय हुय प्राचीन विस्तृत वर्णनों से भी स्पष्ट है कि यह रोग मुश्रुतादि के पूर्व ही से भयङ्कर रूप में होता रहा था भाज तथा ठरत्र का निम्न वर्णन है - शाणितससृष्ट त्वच दूपथत यदा । कति पिटिका घोरा सर्वगात्रेषु देहिनाम् ॥ तिलस-पंपमापागा निष्पावा ॥ तथैव च । तुल्यप्रमाणसस्थाना ज्वरदाहस मन्वित्रान् ॥ विद्यान्मसूरिकामैठा पिटिका रक्तपित्तनाम् ॥ अष्ो भेदा ' — न जूरिया सर्पत्रिका अजका कोद्रवस्तथा । कविस्फोटको ऽबाकी विसप चाष्टमी स्मृना || सोपरुण्ड्रज्वरा ताम्रा सूक्ष्मामाडुर्म-सूरिकान् । म दाइ पाकनावनीम् ॥ रक्ताभमूत्रा माध्या विशाल सर्पनिका अगु ॰ । यमा गाग शाखापत्रस्य दु शोफिनीम् ॥ दाहक्लेटन्त्रणामृचुरनका लेप्मपित्तनाम् । कोद्रव कोद्रवाकार रक्तपित्तसमुद्भवम् ॥ कगोस्तलसकाशैर्निरन्तर विस-पिंमि. । स्फोट इलेप्मसमुद्भूतैरापूर्ण करिष्यते ॥ अग्निदग्धैरिव स्फोट - सङ्कीर्ण कफरक्तज । निर्विपाको विसर्पस्तु विस्फोटक इति स्मृत ॥ अपाक विरल शुष्क जायते मृत्युसन्निभम् । विसर्पवत् सर्पति सर्वगात्रे शोफान्विता च अरवाहयुक्ता । विसर्पिणी कांयसमानवर्णा कोलोपकल्पा कफरक्तनास्तु । भरद्वाजोक्तनवभेदा पृथग्दो पससर्ग-सन्निपातरक्तविपद्रुमप्रसत्रात्राणत्वभेदेनास्या नवविधत्वमाख्यातवान् भरद्वाज । वृद्धकाइन पोक्तपट्टा - पृथग्दोपसन्निपातरक्तागन्तुज त्वभेदेन पविधत्वमाह वृद्धकाश्यपः । माधवकर ने वात, पित्त, रक्त, कफ तथा सर्वदोषज एव द्वन्द्वज भेद लिखे हैं तथा त्वचा ( या स्वगाश्रितरूप ) रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सप्तधातुओं के आधार भेद से दोपज मसूरिका के सात भेद किये हैं ' ढोपमित्रास्तु सप्तैता द्रष्टव्या दोपलक्षणै. ' भावप्रकाश में मसूरिका तथा शीतला भिन्न २ मानी है । ढोपानुसार वातज, पित्तज, रक्तज, कफज और सर्व ( त्रि ) | दोपज ऐसे पांच भेद तथा रसादि - शुक्रान्त आश्रय भेद से सात प्रकार की मसूरिका मानी है । मसूरिका ही जब शीतला नामक देवी से आक्रान्त हो जाय तो उसे शीतला कहते हैं । ' देव्या श'नलयाऽऽक्रान्ना मसूर्येव हि शीतला ' इसको डाक्टरी में चिकन पाक्स या वेरिसेला ( Chicken pox or varicella ) कहते हैं । भावप्रकाश ने इसके सात भेद माने हैं ( 1 ) बृहती • शीतलावरपूर्वा बृहत्स्फोटः शतिला वृहती भवेत् । सप्ताहान्नि’-सरत्येव सप्ताहात् पूर्णता व्रजेत् ततस्तृतीये मप्ताहे शुष्यनि स्खलति स्वयम् ॥ ( २ ) कोद्रव शीतला, ( ३ ) पाणिसहा, ( ४ ) सर्पपिका, ( ५ ) राजिकाकृति, ( ६ ) वहुस्फोटा, ( ७ ) चर्मजा -- एकस्फोटा च कृष्णा च वोढव्या चमजाऽभिधा 1 गुरुवर्य स्व ० श्रीगणनाथसेन जी ने इसके तीन ही भेद माने हैं - मरिकाणा वैविध्य पूर्वर्य-द्यपि कार्तिनन् प्रावान्याछापत्राच्चेह वच्यन्ते तु त्रिधैव ताः ॥ तत्राद्या बृहती नाम द्वितीया लघुनामिका । रोमान्तिका तृतीया च त्रिया भिन्ना मसूरिका । ( सि ० नि ० ) । निदान ( कारण ) — कट्वम्ललवणक्षार विरुद्धाध्यशनाशने · दुष्टनिष्पावशाकाद्यैः प्रदुष्टप-वनोदके, क्रूर ग्रहेक्षणाचापि देशे दोपा समुद्धनाः । जनयन्ति शरी-रेऽस्मिन् दुष्टरक्तन सङ्गता ॥ इनि निदानभावप्रकाशादय । श्रीगण-णनाथसेनाश्च - भूवायुनलदोपादे भवन्त्यागन्तु हेतवः । सक्रामिण्यो विशेषेण निदाघादी मधौ च ना ॥ ( सि ० नि ० ) । इस रोग का कारण निप्यन्दन शील जीवाणु माना गया है । कुछ विद्वानों का कथन है कि इस रोग के जीवाणु सूक्ष्मदर्शकयन्त्र से देखे | जा सकते हैं किन्तु अभी तक इस विषय में निश्चित निर्णय नहीं हुआ है । सहायक कारण - टीका या पूर्व आक्रमण से जिसकी रक्षा न हुई हो ऐसा समस्त संसार का प्रत्येक व्यक्ति किसी भी आयु मैं इसका शिकार बन सकता है तथापि यह बाल्यावस्था में जन्म से चार वर्ष की आयु तक अधिक होता है । एक बार आक्रमण होकर मुक्त हो जाने पर शरीर में स्थायी । क्षमता हो जाने से दुबारा होने की सभावना प्रायः नहीं होती है । अन्य देशों की अपेक्षा भारतवर्ष इस रोग का मुख्य केन्द्र है । Bntish india being the most important focus of the disease in the world medical annul 1934 यह एक भपकर औपसगिंक रोग है जो घर में एक वर्षचे
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श्रध्यायः १३ ] निदानस्थानम् । २८५ को होने पर उसके संसर्ग से तथा पूय और खुरण्ड के सूक्ष्म-कणों से दूषित वायु से दूसरे बच्चों को भी हो जाता है तथा धीरे धीरे उस घर, मोहल्ले या गांव के समस्त बिना टीका । लगाये बच्चों को हो जाता है । रोगप्रसार - रोग का विष रोगी की स्वचा में, श्लेप्मलत्वचा में, मुस -नासा के स्रावों में, विस्फोटों केपीच में खुरण्ड में, मलमूनादि में अर्थात् शरीर के प्रत्येक स्राव और त्याज्यपदार्थों में होता है जो कपों, तौलियों, रुमाल, बर्तन इनमें लगकर तथा मक्सियों, चींटियों द्वारा एवं इनसे दूषित वायु द्वारा स्वस्थ बच्चों में फैल कर रोग पैदा करता है । जैसा कि उरभ ने भी लिखा है -- गक्षिरोगापस्मार राजयक्ष्ममरिका । दर्शनात् स्पर्शनाद् दानाव सक्रामन्ति नरा-शरन् । समय - प्रायः जनवरी से जून ( वसन्त, ग्रीष्म ) तक में अधिक होता है । भारत में प्रतिवर्ष ५०००० के लगभग मनुष्यों की इस रोग से मृत्यु होती है । प्रत्येक ५-६ वर्ष के याद इसका अधिक व्यापक तथा घातक आक्रमण होता है । बचने के उपाय - तीन है । ( १ ) मसूरिका से एक बार पीड़ित होना । ( २ ) मसूरिकाकरण ( Variolation ) -- अर्थात् मसूरिका विस्फोटों की लसीका लेकर स्वस्थ बच्चे की त्वचा । में प्रवेश करके मसूरिका पैदा कर क्षमता उत्पन्न करना । ऐसा प्राचीनकाल में भी होता था नुस्तन्यमसूरी वा नराणा च मसूरिका । उनल बाहुमूला च शस्त्रान्तेन गृहीतवान् । बाहुमूले च
शग रक्तोत्पत्तिकरेण च । तब्जल रक्तमिल्नि स्फोटकज्वरसम्भवम् ॥
( ३ ) टीका लगाकर ( Vaccination ) कृत्रिम क्षमता उत्पन्न करके रोग से बचना | इसका असर प्रायः सदा के लिये हो जाता है किन्तु प्रथम टीका के ६-७ वर्ष बाद पुनष्टीकाकरण ( Re raceinntion ) आवश्यक है । ऐसा करने से जर्मनी, हालेण्ट तथा यूरोप के देशों से मसूरिका की पूर्ण निकासी हुई है । पूर्वरूपात पूर्व ज्वर कण्डूगभजोरचिश्रम । त्वचि शोध सर्वत्रण्यों नेत्ररागश्च प्रायश्च ॥ ( सि. निदान ) । ज्वरात्सशोषाङ्गवि मर्दकासनन्निलयत्यारुचिरोमहर्षा । शिरोऽर्निनेत्रामयपीनसाश्च मनू-रिकाणा प्रभवन्ति चाग्रं ॥ ( उरस्रः ) । शीत लगना, १०४ तक ज्वर ( तनो ज्वर. स्यादनिधोरलिन ), प्रलाप, बच्चों को चौंकना या आक्षेप, वमन, शिरःशूल आदि होते हैं । विस्फोटदर्शन आक्रमण के बाद तीसरे या चौथे दिन मसूरिका के विस्फोट निकलने लगते हैं । प्रथम शिर पर, कनपटी पर और मणिबन्ध पर होता है पश्चात् २४ घण्टों के भीतर पैरों तक सारे शरीर में फैल जाते हैं । नीचे के अह्नों में कम तथा मध्याह्नों में कुछ अधिक तथा चेहरे पर सब से ज्यादा होते हैं । वाह्य त्वचा के समान ही गाल, गला, नासा, नेत्र, स्वरयन्त्र तथा स्त्रियों में योनि आदि की अन्तस्त्वचा पर भी दाने होते हैं । पूर्ण दाने निकलने पर ज्वर तथा अन्य लक्षण हलके हो जाते हैं । प्रायः भीतर प्रविष्ट विष बाहर दानों के रूप में निकलता है । दोपा विप तच्च वहि क्षिपन्ति । तृतीये तु दिने प्राप्तं ज्वरो व्रजति लाघवम् । पिढकाश्च प्रदृश्यन्ते गम्भीरास्वगध ' स्थिता ॥ केशान्तेषु ललाटे च तथा च मणिबन्धयोः । समुद्भूय प्रसर्पन्ति मुखेऽङ्गेषु च ताः क्रमात् ॥ ( सि. नि ) । प्रथमावस्था में दाने छोटे मटर के बराबर तथा स्पर्श में कड़े एवं त्वचा के नीचे हुर्रे निविष्ट हुये हों ऐसे दिखाई देते हैं किन्तु दो - तीन दिनके पश्चात् इनमें पानी भरने लगता है । जिससे ये अधिक बढ़े या उभरे हुये हो जाते है तथा मध्य में नाभि की तरह निम्न होते हैं । दो तीन दिन में पानी से पूरे भर जाते हैं पानीदार द्वितीयावस्था है । फिर इसके बाद पूय-जनक जीवाणुओं के उपसर्ग होने से इन में पीव पढ़ कर पीले हो जाते हैं तथा निम्नमध्यता मिट कर गोल हो जाते हैं । | साथ २ त्वचा में शोथ भी हो जाता है, पुनः ज्वर का वेग वढ जाता है, रोगी को कष्ट तथा बेचैनी रहती है । पीव पड़ने से कुछ बदबू भी आने लगती है । ' शीतले ज्वरदग्धस्य पूतिगन्धयु-तम्य च ' खाने पीने, बोलने, छीकने तथा देखने कष्ट होता है । यह तृतीयावस्था है । चतुर्थावस्था शुष्कीभवन की है जो उद्गम से नौवें दिन से प्रारम्भ होती है । इसमें जिस क्रम से दाने निकले हैं उसी क्रम से अर्थात् माथे से नीचे की और सूखने लगते है । ज्वर तथा अन्य लक्षण भी कम हो जाते हैं । एक सप्ताह में पूर्णरूप से सूख कर खुरण्ड वन कर गिरते हैं तथा उनके स्थान में दाग दिखाई देने लगते हैं । संक्षेप में यह है - कि स्फोटोद्गम के प्रथम तीन दिन तक गांठदार, तीसरे से पांचवें दिन तक पानीदार, पांचवें से नौवें दिन तक पूयदार एवं नौवें से सतरहवें दिन तक शुष्क होते हैं । सप्ताहान्नि सर-त्थव सप्ताहात् पूणता व्रजेत् । ततस्तृतीये सप्ताहे शुष्यति स्सलति स्वयम् । अथ पष्ठं तु दिवसे प्रपूर्यन्ते जलेन ता । अष्टमेऽह्नि च पूयेन वर्द्धते च ज्वरस्तत ॥ शनकयते चापि विपे प्रलघुता गते । प्रायशो द्वादशाहेन शुष्यन्ति पिडकाश्च ताः ॥ विशीर्यन्ते च पक्षेण त्रिसप्तास्तु नेरुजम् । यावज्जीवत लक्ष्माणि तिष्ठन्ति प्रायशस्त्वचि ॥ ( सि नि. ) । भेद - ( 1 ) सौम्य ( Variola minor ) में सभी लक्षण हल्के होते हैं । विस्फोट कम निकलते हैं । द्वितीयक ज्वर भी नहीं होता है । बच्चे खेलते - कूदते रहते हैं । ( २ ) असंमीलित ( Disorete ) — यह तीव्र स्वरूप का है तथा उक्त वर्णन इसी का है । ( ३ ) सम्मीलित ( Confluent ) - यह द्वितीय से अधिक तीव्र है । इसमें दाने अधिक और प्रथम अलग २ होते हैं किन्तु आगे जा कर मिल जाने से सुख तथा हाथ - पांवों पर विद्वधि सी बन जाती है । ( स्फोटाना मेलनादेपा बहुस्फोटाऽपि जायते, भावप्रकाशः ) । जिससे रोगी पहचाना भी नही जा सकता है । ज्वर तेज होता है, प्रलाप तथा आक्षेप, प्यास, तेज नाडी, । गले की ग्रन्थियों में शोथ आदि उपद्रव होते हैं । द्वितीय | सप्ताहान्त में विषमयता, जीवाणुमयता या हृदयावसाद से । मृत्यु हो जाती है । भाग्य या दैव - शक्ति प्रबल होने पर जीता है किन्तु २-३ माह में जा कर रोगी पूर्ण स्वस्थ होता है । ( ४ ) कृष्णमसूरिका ( Blaok small POX ) -- यह भयङ्कर | स्वरूप की मसूरिका जिन्हें टीका नहीं लगाया हो उन्हें युवा • वस्था में होती है । ( ५ ) रक्तस्रावी मसूरिका - यह भी भयङ्कर है । इसमें द्रवाचस्था या पाकावस्था में विस्फोटों में खून आ जाता है । तथा मल, मूत्र, वमन के साथ एव नासा से भी रक्त का स्राव होता है - मुखेन प्रस्रवेद्रक्त तथा घ्राणेन चक्षुषा । ( माधवनि ० ) । ( ६ ) मृदुल मसूरिका, ( ७ ) अप्रगल्भ मसूरिका, ( ८ ) क्षुद्र या लघु मसूरिका, ( ९ ) गाभिकी मसूरिका ( Foetal small pox ) | आदि भेद होते है । उपद्रव -- विसर्प, उपत्वचाशोथ ( Cellulitis ), कर्णशोथ | नेत्राभिष्यन्द, सन्रण शुक्ल, ग्रीवाकक्षालसीकाग्रन्थिशोथ पाक
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सुश्रवसंहिता | कास, न्युमोनिया, हृदयशोय, पचाघात, मूकता, स्मृतिनाश, । बाधिर्य, प्रवाहिका, त्रियों में गर्भस्त्रावादि । माध्यासाध्यता -- । यह अत्यन्त औपसर्गिक, वातक, वैरूप्य तथा बैंकल्प करने वाला रोग है । ढोका न लगाने से २०-३५ प्रतिशत मृत्यु होती है । लगता रक्ताचैव पित्तना भया । नपि कुत्राश्चैव सुखसाध्या मरिका ॥ अनामा सन्निनानोत्यातामा
वक्ष्यामि लक्षगन् । प्रवाला काथि काचिज्जन्बूकोपमा ॥
लौइनाङसना- काश्चिग्नसोण्डनमा । कानो दिक्का प्रमेह बरस्तीत्र. मुद्रान्त ॥ प्रकास्थारतिमूर्द्धा तृष्णा दाहोऽनिवर्तना । मुखेन प्रश्नवेद्रकं तथा प्राणेन चक्षु ॥ कण्ठे धुरक कृत्वा श्रमिन्य-त्यथत्रैग्नन् । नम्रित्र्यनिभूवो यो दृशं प्राणेन नियमेव ॥ म नृय | त्यति प्राणापान वानुदूषित | नमरिकन्ने शोथ स्यात् कूपरे मधित्रन्नके । तथाऽसफलके चापि दुश्चिकित्स्य ॥ ( माधव-निदानम् ) । विवाहकानिरजाऽनिमान् सुगार्निहिक्काच कासमोह. । युक्ता निहन्यगु मनरिमाना चा च ॥ ( उत्स्रः ) । काश्विद्विनाऽपि यत्नेन सिध्यन्त्याशु नमुरिका । दृष्टा. कृच्छ्रता • काचिद नाथित सिध्यन्ति वा न वा ॥ काधिदेव तु सिध्यन्ति साय्यनाना ' प्रयत्नन • ॥ ( भावप्रकाश ' ) । न मन्त्र । नौग्य तस्य पापरोगस्य विद्यते । ( शीतलास्तोत्रम् ) । ( २ ) लघुमसूरिका, मोतिया शीतला ( Chiken Pox ) कारण अज्ञात है । इसमें ज्वरादि - लक्षण सौम्य होते हैं, । ोट चौबीस घण्टे के भीतर निकल जाते हैं, कई दिन तक । मी निकलते रहते हैं । इसके शरीर पर दाग भी नहीं बनते हैं । विरा ' कतिचिद्यस्य पिडका. सन्भवाः । वर. सत्यव तत्यासी मेरा मरिन ॥ ( ३ ) रोमान्विका - खसरा ( मोजल्स Measles ) - यह मी एक बच्चों का स्वतन्त्र विस्फोटक ज्वर है जिसमें शीतपू ज्वर, अरोचक, वसन, नासान्नाव, छींके माना, प्रविश्याय, कास, आंखों की सुर्खी, गाल के भीतर कोप लिक के दाग ( नीलापन लिये सफेद धत्रे ) ये प्रधान लक्षण होते हैं । इस रोग का वास्तविक कारण भी अज्ञात है किन्तु कुछ लोग निष्यन्दनशील बीवाणु मानते हैं जो रोगी के रक्त में, नासा, सुन्नु तथा श्वसन - संस्थान के नाच में होते हैं । प्राय. आयुर्वेद में इसे मसूरिका का ही एक प्रकार माना है किन्तु इन दोनों में दोष तथा विस्फोटों के अनुसार भेद है - पुत्रप्रनागामिका शरीरे सगा सम्पदाहष्णाः । कण्डूयुता साचि सप्रतेक रोमान्निति प्रविष्ट ॥ ( चरक चि. ल. १३ ) । रोम-कुपोन्नतिमा रागिनः रुदिजाः । कानोरोचन्नयुक्ता रोमा न्यो नरपूर्तिका ॥ ( माधवनि ० ) ।
शाल्मलीकण्टकप्रख्याः कफमारवशोणितैः ।
जायन्ते पिडका यूनां वक्त्रे या मुखदूधिका ॥ ३८ ॥
सुखदूषिका - कफ, वात और रक के कारण युवा मनुष्यों के मुख पर सेमल के काटे के समान पिढकाएं उत्पन्न होती हैं उन्हें मुखदूषिका कहते हैं ॥ ३८ ॥
विमर्श -- तुखान्दिहारकत्वेन मुखदूषिका मुद्दामा ' इत्युच्यन्ते ठोके । इसे यौवनपिङका तथा डाक्टरी में एक्निक्लोरिस ( Ame Tulgaris ) कहते हैं । ' नेोगमां मुखे यूना नान्यान्व खदूषिका इस नष्टाङ्गसंग्रह के वर्णनानुसार सुख की त्वचा के मेदपिण्डद्दार बन्द हो जाते हैं जिससे उन पिढिकाओं में मेह भर जाती हैं तथा एक्नो बेमील्स का उपसर्ग होने से पाक होकर वे फूटनी हैं ।
कण्टकैराचितं वृत्तं कण्डूमत् पाण्डुमण्डलम् ।
पद्मिनीकण्टकप्रख्यैस्तदास्यं कफवातजम् ॥ ३६ ॥
पद्मिनीकपटक कफ और बात से उत्पन्न तथा कमलिनी के कांटों के समान कांटों मे भरा हुआ तथा गोल, कण्डयुक्त एवं पाण्डुरंग के मण्डल को पद्मिनीकण्टक कहते हैं ॥ ३ ९ ॥ विमर्श -- यह त्वचा का सौन्य अर्बुद हो सकता है तथा इसे पेपिलोमा ऑफ् दी स्किन ( Papilloma_of the skin ) कहते हैं ।
नीरुजं सममुत्सन्नं मण्डलं कफरक्तजम् ।
सहजं रक्तमीपत्र श्लच्णं जतुमणिं विदुः ॥ ४० ॥
ननुमणि कफ और रक्त के कारण उत्पन्न, वेदना रहित, चारों ओर समान उमरा हुआ मण्डल जो कि सहज ( जन्मजात ), कुछ लाल और मुच होता है उसे जतुमगि कहते हैं ॥ २० ॥
विमर्श - वचा पर मेल्यानिन ) ( Melanin ) नामक रंग के जम जाने से जो तिल या मस्सा जन्मजात होता है उसे जतुमणि ( Congenital mole ) कहते हैं । -कृप लियो अनुमगनैनो बानोचरंलिभि । अन्ज लपक लक्ष्ले-। गहुभिषग्वराः ॥
अवेदनं स्थिररूचैव यत्य गात्रेषु दृश्यते ।
मापवत्कृष्णमुत्सन्नमनिलान्मपकं वदेत् ॥ ४१ ॥
मपक -- मनुष्य के मिन्न २ नों पर बात के कारण उत्पन्न तथा पीडारहित, स्थिर एवं उडदी के समान काले रंग के टमार या चिह्न दिखाई देते हो तो उन्हें मपक ( Elevated | mole ) कहते हैं ॥ ११ ॥
विम - मपकनिकी माशा ' ईवे प्रतिकृती ' इति कन्, नैरुक्त्येन च विधिना हस्वत्वन् । भोनोचमपकलक्षगन् - वातेरित खचि यदा दुष्येते कफमेदसी । मृदु सवर्गञ्च कुरुतो मपकं वडे | यह Elevated mole है ।
कृष्णानि तिलमात्राणि नीरुजानि समानि च ।
वातपित्तकफोद्रेकात्तान् विद्याचिलकालकान् ॥ ४२ ॥
तिलकालक- वायु, पित्त और कफ के उद्वेक से काले | रंग के, तिल के समान नाकृति के, वेदनारहित तथा समान नो शरीर पर चिह्न होते हैं उन्हें तिलकालक कहते हैं ॥४२ ॥
विमर्श - तिलकालक को तिल ( None elevated mole ) । कहते हैं । ' वातपित्तकफोद्रेकात् ' की जगह ' वातपित्तककोच्छोषाद ' । ऐसा पाठान्तर है । तिब्लक्षगमन्यत्र -- मारत. पिचमादाय कफ-। रक्षसमात्रित । चिनोति विनात्राणि त्वचि ते तिलकालकाः ॥
मण्डलं महदल्पं वा श्यासं वा यदि वा सितम् ।
सहनं नीरुनं गाने न्वच्छमित्यभिधीयते ॥ ४३ ॥
यच्छ - शरीर के किसी भाग पर बड़ा या छोटा, स्वाम या सफेद तथा पीडारहित और सहन ( जन्मजात ) जो चिह्न होता है उसे न्यन्छ कहते हैं ॥ ४३ ॥
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श्रध्यायः १३ ] निदानस्थानम् । २८७ विमर्श -न्यच्छ को ' लान्छन कहा जाता है -- न्यच्छं लान्छ | सिस ( Paraphymosis ) कहते हैं । आघातादि द्वारा चर्म के नमुच्यते । भोजोक्त लक्षणं यथा - रक्तपित्तान्वितो वायुस्त्वक्प्रदेशा- ऊपर चढ जाने पर चर्म तथा शिश्न मणि में शोध हो जाता है । श्रितो यदा । जनयेन्मण्डलं कृष्ण श्याव वा न्यच्छमादिशेत् ॥ जिससे वह नीचे सुपारी पर नहीं उतर सकती है । शोथहर समुत्थाननिदानाभ्यां चर्मकीलं प्रकीर्त्तितम् ॥ ४४ ॥ तथा जीवाणुनाशक चिकित्सा न करने से व्रणोत्पत्ति हो कर
चर्मकील – समुत्थान ( सम्प्राप्ति ) तथा निदान की दृष्टि दोनों परस्पर जुड़ जाते हैं तथा कभी कभी इन्द्रिय में सड़न से अशनिदान में चर्मकील का वर्णन कर दिया गया है || ४४ || ( Putrefection भी होने लगती है । विमर्श - वाग्भट ने चर्मकील को मपक का ही एक भेद अल्पीय: खां यदा हर्षाद् बालां गच्छेत् खियं नरः ।
माना है - मषेभ्यस्तुन्नततराश्चर्मकीलान् सितासितान् ।
क्रोधायासप्रकुपितो वायुः पित्तेन संयुतः ॥ ४५ ॥
सहसा मुखमागत्य मण्डलं विसृजत्यतः ।
नीरुजं तनुकं श्यावं मुखे व्यङ्गं तमादिशेत् ॥ ४६ ॥
व्यङ्ग — क्रोध तथा परिश्रम से प्रकुपित वात पित्त के साथ संयुक्त होकर सुखप्रदेश में आकर अकस्मात् मण्डल उत्पन्न करता है जो कि पीडारहित, अल्प तथा श्याव वर्ण का होता है उसे व्यङ्ग कहते हैं ॥ ४५-४६ ॥ कृष्णमेवंगुणं गात्रे नीलिकां तां विनिर्दिशेत् ॥ ४७ ॥
नीलिका - व्यङ्ग के समान ही लक्षणों वाला किन्तु वर्ण में काला हो और मुख के अतिरिक्त अन्य अवयवों पर मण्डल हो उसे नीलिका कहते हैं ॥ ४७ ॥
विमर्श -- माधवकर ने इसे मुख पर भी होना माना है— कृष्णमेवगुण गात्रे मुखे वा नीलिका विदुः । किन्तु वाग्भट ने भी मुख से अन्यत्र होने वाले मण्डल को ही नीलिका कहा है-श्यामलं मण्डलं व्यद्ग वक्त्रादन्यत्र नीलिका । ( भ ० सं ० ) । डाक्टरी मत व्यङ्ग, न्यच्छ और नीलिका ये एक ही प्रकार के विकार के भिन्न २ नाम हैं । छोटी धमनियों, सिराओं तथा केशि-कार्यों का त्वचा में गुच्छ बनने से यह रोग होता है तथा इसे Capillary angiomata or Naeva कहा जाता है ।
मर्दनात् पीडनाच्चापि तथैवात्यभिघाततः ।
मेढ्रचर्म यदा वायुर्भजते सर्वतश्वरः ॥ ४८ ॥
तदा वातोपसृष्टं तु चर्म प्रतिनिवर्त्तते ।
मरधस्तात् कोशश्च ग्रन्थिरूपेण लम्बते ॥ ४ ९ ॥
सवेदनः सदाहश्च पाकं च व्रजति क्वचित् ।
मारुतागन्तुसम्भूतां विद्यात्तां परिवत्तिकाम् ॥ ५० ॥।
सकण्डूः कठिना चापि सैव श्लेष्मसमुत्थिता ॥५१ ॥
परिवर्तिका - हस्तादि द्वारा मर्दन करने से, अधिक दवाने तथा मैथुन के समय झगडा - फसाद होने के कारण अधिक चोट लगने से सर्व - शरीर - सञ्चारी व्यान वायु जब लिङ्ग के चर्म में प्रविष्ट होती है तव वायु से आक्रान्त हुभा वह चर्म ऊपर ' की ओर चढ़ जाता है तथा मणि ( सुपारी ) के नीचे ग्रन्थि रूप में हो कर लटकता है । कभी कभी उसमें पीड़ा, दाह और पाक भी होता है । इस प्रकार वायु तथा भात आदि आगन्तुक कारण से उत्पन्न हुये इस रोग को परिवर्तिका कहते । हैं । यदि इस रोग से खुजली चलना तथा कठिनता प्रतीत हो ' तो उसे कफजन्य परिवर्तिका समझनी चाहिये ॥ ४८-५१ ॥ विमर्श: - भोजोकपरिवर्तिका लक्षण - मणेरधो मेदूचर्म व्या-नस्तु परिवर्तयेत् । सशूलतोददाहाद्यैर्विज्ञेया परिवर्तिका । श्लैष्मिकी कठिना स्निग्धा कण्डूमत्यल्पवेदना || परिवर्तिका को पेराफाईमो -हस्ताभिघातादथवा चर्मण्युद्वर्त्तिते बलात् ॥ ५२ ॥।
मर्दनात्पीडनाद्वाऽपि शुक्रवेगविघाततः ।
यस्यावपाट्यते चर्म तां विद्यादवपाटिकाम् ॥ ५३ ॥
अवपाटिका - जब कोई मनुष्य अल्प योनिच्छिद्र वाली वाला ( अल्पवयस्का ) स्त्री के साथ प्रहर्ष ( संरम्भ या वेग ) पूर्वक सम्भोग ( वलात्कार ) करता है उससे अथवा तिला लगाते समय या हस्त मैथुन करते समय हाथ के अभिघात ( चोट ) से चर्म के ऊपर चढ जाने पर किंवा शिश्न के मर्दन और पीडन से एवं उपस्थित शुक्रवेग को रोकने से यदि उस मनुष्य का चर्म फट जाता है तब उसे भवपाटिका रोग जानो ॥ विमर्शः -- अल्पीयोऽल्पतर ख योनिमुख यस्याः सा ताम् । अव-पाटिका को Tear in the prepuce कहते हैं ।
वातोपसृष्टमेवं तु चर्म संश्रयते मणिम् ।
मणिर्मोपनद्धस्तु मूत्रस्रोतो रुणद्धि च ॥ ५४ ॥
निरुद्धप्रकशे तस्मिन्मन्दधारभवेदनम् ।
मूत्रं प्रवर्तते जन्तोर्मणिर्न च विदीर्यते ॥ ५५ ॥
निरुद्धप्रकशं विद्यात् सरुजं वातसम्भवम् ॥ ५६ ॥
निरुद्ध प्रकश - इसी प्रकार यदि वात से दूषित शिश्नचर्म मणि को पूर्णरूप से ढक देता है एवं चर्म से ढकी हुई वह मणि मूत्र निकलने के स्रोतस् ( मार्ग ) को अवरुद्ध कर देती है तथा मूत्रमार्ग के निरुद्ध होने पर पीड़ा के बिना ही मूत्र मन्द धार रूप मे निकलता है किन्तु मणि खुलती नहीं है इस तरह वात प्रकोप से उत्पन्न तथा कुछ पीडा देने वाला निरुद्धप्रकश रोग होता है ॥ ५४-५६ ॥ C विमर्शः -- निरुद्धप्रकाशत्वान्निरुद्धप्रकश । ( मधुकोषः ) । चर्म-द्वारा मणि ढक जाने से उस पर प्रकाश पढ़ना निरुद्ध ( बन्द ) हो जाता है । वाग्भट ने मणि का विकास निरुद्र होने से इसका निरुद्धमणि नाम रखा है - नणैर्विकासरोधश्च स निरुद्ध-मणिर्गद ' । डाक्टरी में इसको फायमोसिस ( Phimosis ) कहा है । इसके जन्मजात तया जन्मोत्तर ऐसे दो भेद किये गये हैं । जन्मजात का कारण गर्भवृद्धिदोष है । जन्मोत्तर बच्चों में शिश्नचर्म के बार बार खुजाने तथा पकड कर खींचने से युवाओं के पूयमेह होने से तथा वृद्धों में वस्तिगत अश्मरी, मूत्रामार्गसङ्कोच एवं अष्टीलावृद्धि के कारण खुजाने और मस, लने से उत्पन्न होता है ।
वेगसन्धारणाद्वायुर्विहतो गुदमाश्रितः ।
निरुणद्धि महत्स्रोतः सूक्ष्मद्वारं करोति च ॥ ५७ ॥
मार्गस्य सौक्ष्म्यात् कृच्छ्रेण पुरीषं तस्य गच्छति ।
सन्निरुद्धगुदं व्याघिमेनं विद्यात् सुदुस्तरम् ॥ ५८ ॥
सन्निरुद्धगुद – पान वात तथा मल - मूत्र के वेगों को
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सुश्रुतसंहिता | रोकने से कुपित वात गुढा में जाकर महास्रोत का अवरोध करके उसके नीचे का ( गुढ ) मार्ग सङ्कुचित ( छोटा ) कर देती है, इस तरह मार्ग के छोटा होने से उस मनुष्य का मल कठिनता से बाहर निकलता है । इस प्रकार उत्पन्न हुये सुदुस्तर ( कष्टसाध्य ) इम रोग को सन्निरुद्धगुद जानो ॥ विमर्श:: - - इस रोग को Stricture of the rectum कहते हैं । गुदा में व्रण होकर उनके स्थान पर सङ्कोच होने से यह रोग पैदा होता है । इसमें प्रथम विवन्ध पश्चात् क्रमशः विबन्ध और पतले दस्त होते हैं । यदि मल कड़ा तथा फीते के समान लम्बा और चपटा निकले एवं साथ में आंव तथा खून भी हो तो इसका निदान ( निर्णय ) पक्का हो जाता है ।
शकृन्मूत्रसमायुक्तेऽघौतेऽपाने शिशोर्भवेत् ।
स्विन्नस्याम्नायमानस्य कण्डू रक्तकफोद्भवा ॥ ५६ ॥
कण्डूयनात्ततः चित्र स्फोटाः स्रावश्च जायते ।
एकीभूतं व्रणैर्घोरं तं विद्यादहिपृतनम् ॥ ६० ॥
अहिपतन - भल तथा मूत्र से युक्त अपान ( गुदा ) के पानी द्वारा नहीं धोने पर तथा पमीना होने के बाद प्रायः मन्दोष्ण जल से स्नान नहीं कराने वाले बच्चे के रक्त और कफ के कारण गुढ़ा में कण्डू उत्पन्न होती है तथा उसे खुजाने से स्फोट उत्पन्न होकर उनसे स्राव वहता है । इस तरह व्रणों से युक्त एवं भयङ्कर स्वरूप के इस रोग को अहिपूतन जानो ॥ विमर्शः - अहिपूतन को Infantile erythema of Jacquet or Naphan rash or sore buttocks कहते हैं तथा मल, मूत्र और म्वेद से गुदा के सदा गोली और गन्टी रहने से होता है । दुष्टस्तन्यपान से भी होता है ऐसा भोज का मत है-दुष्टस्तन्यम्य पानेन मत्स्याक्षालनेन च । कण्डूढाहरजावद्धि पिट-कैश्च समाचिना ॥ सम्मवन्ति यथादीप दारुणा हिपूनना ॥ अष्टाङ्गहृदय में इसे मतान्तर से मातृकादोप, प्रष्टारु, गुदकन्द आदि लिखा है - केचित्त मातृकाप वदन्त्यन्येऽपि पूतनम् । प्रष्टारगुकुन्द केचिच्च तमनामिकम् ॥ लक्षण – स तेन सलिलो-पममच्यं विच्छिन्नमाम दुर्गन्धि नानावर्णवेदन फेनिलमतिसार्यते । ( अ ० सं ० ) ।
स्नानोत्सादनहीनस्य मलो वृपणसंश्रितः ।
प्रक्लिद्यते यदा स्वेदात् स कहूं जनयेत्तदा ॥ ६१ ॥
तत्र कण्डूयनात् चिप्रं स्फोटाः स्रावञ्च जायते ।
प्राहुर्वृपणकच्छू तां श्लेप्मरक्तप्रकोपजाम् ॥ ६२ ॥
वृपणकच्छ - नान तथा उबटन नही करने वाले बच्चे के वृषण प्रान्त में जमा हुआ मल जब पसीने से गोला होता है तब वह खुजली उत्पन्न करता है और वहा सुजलाने से शीघ्र ही स्फोट ( फुन्सिया ) निकल आते हैं और उन से स्राव भी बहता है । इस प्रकार कफ और रक्त के प्रकोप से उत्पन्न हुये इस रोग को घृपणकच्छू ( Eczema of the scrotum ) कहते हैं ॥ ६१-६२ ॥
प्रवाहणातिसाराभ्या निर्गच्छति गुढं बहिः ।
रूक्षदुर्बलदेहस्य तं गुदभ्रशमादिशेत् ॥ ६१ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने क्षुद्ररोगनिदानं ' नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
गुदभ्रंश - च तथा दुर्बल शरीर वाले मनुष्य के प्रवाहण
( कुन्थन ) तथा अतिसार से गुद बाहर निकल आती है ।
उसे गुदभ्रंश कहते हैं ॥ ६३ ॥
विमर्श: - गुदभ्रंश को प्रोलेप्सस रेक्टाई ( Prolapsus rect ) कहते है । इस के पूर्ण तथा अपूर्ण ऐसे दो भेद होते हैं । पूर्णगुदभ्रंश बच्चों को अधिकतर होता है तथा इस में गुदा की समग्र भित्ति बाहर निकल आती है । अपूर्णगुदभ्रंश अधिकतया युवकों में होता है तथा इसमें गुदा की केव । श्लेष्मल त्वचा मलद्वार से बाहर निकलती है । इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दी पिकाभापाटीकायां क्षुद्ररोगनिदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
P
चतुर्दशोऽध्यायः ।
अथातः शूकदोपनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरि ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर शूकदोपनिदान का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१-२ ॥ विमर्श: --- शूक अर्थात् कोई खास औषध किंवा वात्स्या • यनोक्त लिङ्गवृद्धिकारक योग उन के मिथ्या प्रयोग से उत्पन्न दोषों ( रोगों ) का वर्णन करते हैं । यहां पर दोष शब्द रोग अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जैसा कि चरक ने भी लिखा है-' दोषा ह्यपि रोगशब्द लभन्ते ' । लिङ्गवृद्धिकरयोग ' – भल्लातकास्थिजल-| शूक्रमथाब्जपत्रमन्तविंदा मतिमान् सह संन्धवेन । एतद्विरूढवृहती-फलतोयपिष्टमालेपन महिपविविमलीकृतेऽङ्गं ॥ स्थूल महत्तरतुरङ्ग-मतुल्यमाशु शेफ करोत्यभिमन नहि सगयोऽस्ति ॥ जल - शूकादि से रहित प्रशस्त तैलादि से शुकदोष नहीं होते हैं - यथा-| अश्वगन्यावरी कुष्ठमासीसिद्दीफलान्वितम् । चतुर्गुणेन दुग्धेन तिल-तेल विपाचयेत् । स्तनलिङ्गकर्णपाठीवर्धन त्रक्षणादिढम् ॥ लिङ्गवृद्धिमिच्छतामक्रमप्रवृत्तानां शूकदोषनिमित्ता दश चाष्टौ च व्याधयो जायन्ते । तद्यथा - सर्पपिका, अष्ठीलिका, ग्रथितं, कुम्भीका, अलजी, मृदितं, सम्मूढ-पिडका, अवमन्थः, पुष्करिका, स्पर्शहानिः, उत्तमा, शतपोनकः, त्वक्पाकः, शोणितार्बुद, मांसार्बुद, मांस-पाकः, विद्रधिः, तिलकालकश्चेति ॥ ३ ॥
शूकदो पजरोग - लिङ्ग की वृद्धि या स्थूलता चाहने वाले तथा शास्त्रीय क्रम से विपरीत योगों में प्रवृत्त हुये मनुष्यों के शक दोष के कारण अट्ठारह न्याधियां उत्पन्न होती हैं, वे रोग ये हैं जैसे - सर्पपिका, अष्टीलिका, ग्रथित, कुम्भीका, अलजी, मृदित, संमूढपिढका, अवमन्थ, पुष्करिका, स्पर्श-हानि, उत्तमा, शतपोनक, स्वकूपाक, शोणितार्बुद, मांसार्बुद, मांसपाक, विधि तथा तिलकालक ॥ ३ ॥
गौरसर्षपतुल्या तु शूकदुर्भुग्नहेतुका ।
पिडका कफरक्ताभ्यां ज्ञेया सर्पपिका बुधै ॥ ४ ॥
सर्पपिका – असम्यकू रूप से प्रयुक्त शूकों के प्रयोग के कारण कफ और रक्त से उत्पन्न तथा श्वेत सरसों के समान आकृति को पिढिका को सर्पपिका जाननी चाहिये ॥ ४ ॥
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श्रध्यायः १५ ] निदानस्थानम् । २८६ विमर्श. - कहीं कहीं ' शूकदुर्भगहेतुका ' ऐसा पाठान्तर है जिस का अर्थ ' शूक तथा निकृष्ट भंग ( दूषित योनि ) हेतुक ' करना चाहिये ।
कठिना विपमैरन्तैर्मारुतस्य प्रकोपतः ।
शूकैस्तु विपसम्भुग्नैः पिडकाऽष्टीलिका भवेत् ॥ ५ ॥
अष्ठोलिका - विषम ( अप्रशस्त ) तथा भल्लातकास्थिरूप विष से सम्भुन्न ( युक्त ) शूकों के अन्त ( प्रयोग ) से वायुका प्रकोप होकर कठिन पिडिका उत्पन्न होती है उसे अष्टीलिका कहते हैं ॥ ५ ॥
शूकैर्यत् पूरितं शश्वद् ग्रथितं तत् कफोत्थितम् ।
कुम्भीका रक्तपित्तोत्था जाम्बवास्थिनिभाऽशुभा ॥ ६ ॥
अलजीलचणैर्युक्तामलजीं च वितर्कयेत् ।
मृदितं पीडितं यत्तु संख्धं वायुकोपतः ॥ ७ ॥
पाणिभ्यां भृशसम्मूढे सम्मूढपिडका भवेत् ॥ ८ ॥
ग्रथितादिवर्णन —— चात्स्यायनोक्त विषयुक्त तिलों के लेप से लिङ्ग शूक से भरे हुये सा निरन्तर प्रतीत हो तो उसे कफ-जन्य ग्रथित रोग कहते हैं । तथा रक्त और पित्त के प्रकोप से उत्पन्न एवं जामुन की गुठली के समान वर्णं तथा आकृति की अशुभ पिडिका को कुम्भीका कहते हैं एवं प्रमेहपिडका में वर्णित जी के लक्षणों से युक्त पिडिका को भलजी कहते हैं तथा शुकपात ( शुकयुक्त औषध लगाने ) के पश्चात् वायु के प्रकुपित होने से प्रथम इन्द्रिय में संख्ध ( सर सराहट ) होती है जिस से वह व्यक्ति उसे हस्तादि द्वारा पीडित करता है उस से मृदित रोग उत्पन्न होता है । इसी तरह शुकपात के पश्चात् हाथों से शिश्न को अत्यधिक मस-लने पर संमूढपिडका रोग होता है ॥ ६-८ ॥ .
दीर्घा बह्वचश्च पिडका दीर्यन्ते मध्यतस्तु याः ।
सोऽत्रमन्थः कफासृग्भ्यां वेदनारोमहर्षकृत् ॥ ६ ॥
अवमन्थ - शिश्नपर कफ और रक्त के प्रकोप से अनेक वढी बढी पिडकाएं उत्पन्न होकर मध्य में से विदीर्ण हो जाती हैं तथा जिन में वेदना और रोमहर्ष होता है वह अवमन्य रोग है ॥
पित्तशोणितसम्भूता पिडका पिडकाचिता ।
पद्मपुष्करसंस्थाना ज्ञेया पुष्करिकेति सा ॥ १० ॥
पुष्करिका - शिश्न पर पित्त और रक्त के प्रकोप से अनेक छोटी छोटी पिडकाओं से घिरी हुई तथा कमल की कर्णिका के आकार की जो पिढका होती है उसे पुष्करिका कहते हैं ॥१० ॥
जनयेत् स्पर्शहानि तु शोणितं शूकदूषितम् ॥ ११ ॥।
स्पर्शहानि - रोग में शिश्नगत रक्त शूक ( लिङ्गवृद्धिकर योग ) से दूषित हो कर वहां के स्पर्श ज्ञान को हानि ( नुक-सान पहुंचाता है ॥ ११ ॥
मुद्रमापोपमा रक्ता पिडका रक्तपित्तजा ।
उत्तमैा तु विज्ञेया शूकाजीर्णनिमित्तजा ॥ १२ ॥।
उत्तमा - शिश्न पर वार वार शुक के प्रयोग करने से तथा अजीर्ण के कारण रक्तपित्त की दृष्टि से पैदा होने वाली मूंग तथा उड़दी के आकार की एवं रक्तवर्ण की जो पिढिका होती है उसे उत्तमा जाननी चाहिये ॥ १२ ॥
छिद्रैरणुमुखैर्वस्तु चितं यस्य समन्ततः ।
वातशोणितजो व्याधिर्विज्ञेयः शतपोनकः ॥ १३ ॥
शतपोनक—– मिय्याप्रयुक्त शुकदोष से जिस मनुष्य का । ३७ सु ० | वस्तु ( शिश्न ) ) सूचममुख वाले अनेक छिद्रों से चारों ओर व्याप्त हो जाय तब उस वातरक्तजन्य रोग को शतपोनक रोग जानना चाहिये ॥ १३ ॥
पित्तरक्तकृतो ज्ञेयस्त्वक्पाको ज्वरदाहवान् ।
कृष्णैः स्फोटैः सरक्कैश्च पिडकाभिश्च पीडितम् ॥ १४ ॥
यस्य बस्तिरुजश्चोण ज्ञेयं तच्छोणितार्बुदम् ।
मांसदोषेण जानीयादर्बुदं मांससम्भवम् ॥ १५ ॥
शीर्यते यस्य मांसानि यस्य सर्वाश्च वेदनाः ।
विद्यात्तं मांसपाकं तु सर्वदोषकृतं भिषक् ॥ १६ ॥
विद्रधिं सन्निपातेन यथोक्तमभिनिर्दिशेत् ॥ १७ ॥
त्वक्पाकादि वर्णन - जिस मनुष्य के शिश्न की त्वचा में पित्त और रक्त की दृष्टि से पाक उत्पन्न हो जाय तथा ज्वर और दाहकारक हो तो उसे स्वक्पाक जानना चाहिये तथा जिसका शिश्न लाल और काले स्फोटों और पिढकाओं से पीडित हो तथा वस्ति प्रदेश में भयङ्कर पीड़ा हो उसे शोणि-तार्बुद जानना चाहिये एवं शिश्न के मांस की दृष्टि से मांस-जन्य अर्बुद समझना चाहिये । इसी तरह जिस मनुष्य के शिश्न का मांस गल कर शीर्ण ( नष्ट ) होता हो तथा जिसके सर्व प्रकार की वेदना हो रही हो उसे वैद्य सर्वदोपोत्पन्न मांस-पाक हुआ जाने तथा सन्निपात ( त्रिदोष ) ही के कारण विद्रधि-निदानोक्त नानावर्ण वेदना और स्राव इन लक्षणों से युक्त जो हो उसे विद्वधि जाननी चाहिये ॥ १४–१७ ॥
कृष्णानि चित्राण्यथवा शूकानि सविषाणि च ।
पातितानि पचन्त्याशु मेढ्रं निरवशेषतः ॥ १८ ॥
कालानि भूत्वा मांसानि शीर्यन्ते यस्य देहिनः ।
सन्निपातसमुत्थानं तं विद्यात्तिलकालकम् ॥ १६ ॥
तिलकालककाले वर्ण के या चित्र - विचित्र वर्ण के अथवा भल्लातकादि विपयुक्त शूकों ( लिङ्गवृद्धिकर योगों ) के शिश्न पर पात ( प्रयोग ) करने से वे शीघ्र ही निरवशेष ( सम्पूर्ण ) मेढ ( शिश्न ) को पका देते हैं तथा जिस मनुष्य के शिश्न के मांस काले ( तिल समान ) होते हुये गल कर नष्ट होने लग जाते हैं ऐसे रोग को सन्निपातजन्य तिलकालक जानो ॥१८-१९ ॥
तत्र मांसार्बुदं यच्च मांसपाकश्च यःस्मृतः ।
विद्रधिश्च न सिध्यन्ति ये च स्युस्तिलकालकाः ॥ २० ॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने शूकदोपनिदानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
असाध्यता - शूकदोषों में जो मांसाद, मांसपाक और विद्वधि एवं तिलकालक कहे गये हैं वे साध्य नहीं होते हैं ॥२० ॥
इत्यायुर्वेदतच्चसन्दी पिकाभापायां शूकदोपनिदान नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः ।
अथातो भग्नानां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अव इसके अनन्तर भननिदान का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥
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II सुश्रुतसंहिता । पतनपीडनप्रहारात्क्षेपणव्यालमृगदशनप्रभृतिभिरभि-घातविशेषैरनेकविधमथ्नां भग्नमुपदिशन्ति ॥ ३ ॥
भग्न - कारण - कहीं से गिरना, किसी से अन का दवना, लाठी या शस्त्र का प्रहार, हन्त - पाढादि अट्टको सींचना तथा ब्याल ( सिंहादि हिंस्रक ) तथा हरिणादि अहिंसक पशुओं के दन्त - नव से काटना या फाढ देना आदि अनेक प्रकार के नावात - विशेषों से अस्थियों में अनेक प्रकार का भग्न होता है । विमर्श -भन शब्द का अर्थ टूटना है अतः इसका उपयोग केवल अस्थिभन ( Eracture ) के लिये ही होना चाहिये किन्तु सुश्रुत, चरक तथा वाग्भट में इसके अस्थिभन्न और सन्धिमुक्त ( Dislocation ) ढो भेद करके दोनों अर्थों में प्रयुक्त किया है । दादरी में अस्थिम ( Fracture ) तथा सन्धिविश्लेप या सन्धिति ( Dislocation ) ये दोनों स्वनन्त्र पृथक् २ रोग माने हैं । मन्धिविश्लेष में प्रायः अस्थि का भग्न कम या नहीं होता, अपि तु वह सन्धि - स्थान से कुछ हट जाती है । वाग्भट ने भन्न के स्थान भन शब्द का प्रयोग किया है और उसके सँ दो भेद माने हैं — सन्धिभङ्ग तथा अमन्विभङ्ग जैसे -- पान-घानादिभिर्देवा ग्नोऽम्य्नां सन्ध्यनन्धित । भावप्रकाश ने भी दो भेद माने हैं- ' मग्न नमामाद हिविथ हुताय । काण्डे च सन्धावपि ( वाग्भट उ ० २०२७ ) । भग्नपरिमापा - अस्थि के किमी स्थान पर टूट जाने को अस्थिभन ( Fracture ) कहते हैं । कारण-साधारणतया चोट लगने से अस्थि का भग्न होता है किन्तु कभी कभी अस्थि रोगग्रस्त होने पर थोटे ही भार से टूट जाती है । बहुधा जहां चोट लगती है उसी स्थान पर अस्थि टूटती है परन्तु देखा जाता है कि अस्थि के दोनों प्रान्तों पर दबने से बीच में से टूट जाती है । पेढ़ से गिरने पर जहां चोट लगती है उसे कुछ दूरी पर अस्थि टूटती है । पेशी कण्डराओं के कर्पण से भी सूक्ष्म अस्थियां टूट जाती हैं, जैसे जान्वस्थि ( Patella ) का भन्न इसी प्रकार का होता है । पतनपीडनादि भग्नके प्रधान या तात्कालिक कारण हैं तथा आयु, लिन, रोग, व्यवसाय, मन्धियों तथा अस्थियों के विकार सहायक या गौण कारण हैं । बाल्यावस्था में अस्थियां अधिक मुलायम होने से केवल मुड़ जाती हैं, टूटती कम हैं । २० से १० वर्ष की आयु में अस्थियां कठोर हो जाती हैं तथा मनुष्य अधिक उद्यमी एवं धनार्जन के लिये या मनोविनोद के लिये प्रायः आपत्तिजनक कार्यों को भी कर बैठते हैं अतः भग्न अधिक हुआ करते हैं । स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में भन्न अधिक होते हैं । अस्थिक्षय ( Bone TB or Caries of bone ), अस्थिचक्रता ( Rackets ), अम्भिरता, पचावात ( Paralysis ), फिरन आदि रोग भी भन की प्रवृत्ति उत्पन्न कर देते हैं । पैतृकभग्नप्रवृत्ति ( Praghtas ossium ) जो माता - पिता से बच्चों में आती है भग्न होने में कारण होती है । • तत्तु भगजातमनुसार्यमाणं द्विविधमेवोत्पद्यते सन्धिमुक्त काण्डभग्नं च ॥ ४ ॥
भग्नमेद - वह अनेक प्रकार का भग्न विश्लेपात्मक ( तात्त्विक या सूक्ष्म ) दृष्टि से विचार करने पर दो ही प्रकार का होता है जैसे सन्धिमुक्त तथा काण्डभन्न ॥ ४ ॥
विमर्शः - सन्धिमुक्त को सन्धिच्युत या सन्धिभंग या सन्धित्रिश्लेष ( Dislocation ) कहते हैं तथा काण्डभन्न को असन्धिभन ( Fracture ) कहते हैं । काण्डशब्दार्थ - पूर्वापर सच्छिन्नोऽस्य्यवयवः काष्ट, ( गान या Body ) तयोरेवास्थिका-पढयोर्मध्यसन्धानं सन्धिः ( Joint ) ( न्या ० चं ० ) । काण्डे सन्धि-पर्यन्ते एकग्वण्टे ( भाव प्र ० ) । तत्र सन्धिमुक्तम् - उत्पिष्टं विशिष्टं विवर्त्तितम्, अवचिप्तम्, अतिक्षिप्तं, तिर्य्यङ्क्षिप्तमिति पविधम् ॥ सन्धिमुक्त मेद - उनमें सन्धिमुक्त के उल्पिष्ट, विश्लिष्ट, विव-र्तित, अवक्षिप्त, अतिक्षिप्त और तिर्यक क्षिप्त ऐसे ६ भेद होते हैं ॥ विमर्श: - उत्पिष्ट में अस्थिसन्धि के विश्लेप के साथ - साथ उसका चूर्ण या पेपण भी हो जाता है इसे Fracture dislo-| cation कहते हैं । विश्लिष्ट में अस्थि का स्वल्पविश्लेप होता है इसकी Sublaxation or incomplete dislocation कहते हैं । विवर्तित में अस्थि दक्षिण या वाम में सरक जाती है । इसको Lateral displacement कहते हैं । अवक्षिप्त में अस्थि नीचे सरक जाती है इसे Downward displacement कहते है । अतिक्षिप्त में मांस तथा रक्तवाहिनियां भी विशीर्ण हो जाती हैं इसको Complicated dislocation कहते हैं एवं तिर्यक् चिप्स में सन्धि टेढी हो जाती है । यह Complete dislocation है । मधुकोपव्याख्या में भग्न के दो भेद माने है - द्विविध हि भग्न मन्त्रणमत्रण | सण सन्धिविश्लेप Open dislocation तथा अत्रण सन्धिविश्लेष Closed disloration कहते हैं । तत्र प्रसारणाकुञ्चनविवर्त्तनात्क्षेपणाशक्तिरुप्ररुजत्वं स्पर्शासहत्वं चेति सामान्यं सन्धिमुक्तलक्षणमुक्तम् ॥६ ॥
लक्षण - सन्धिमुक्त होने पर अनके प्रसारण, सङ्कोचन, इधर-उधर हिलाने ( विवर्तन ) तथा आक्षेपण करनेमें असमर्थता हो जाती है, तीव्र पीड़ा होती है तथा रोगी किसी भी वस्तु के स्पर्श को सहन नहीं कर सकता है ये सामान्य लक्षण कहे गये हैं ॥ विमर्श: - अन के आकार का विकृत हो जाना या विषमाता ( Deformity ) सन्धिविश्लेप का सबसे बडा लक्षण है । सन्धि में सम्मिलित अस्थियों के भाग अपने स्थान से हट कर | अन्य अस्वाभाविक स्थिति में पहुंच जाते हैं इससे अस्थि के पूर्व स्थान में गढा तथा दूसरे स्थान में उभार हो जाता है । परीक्षा के समय विश्लेपित सन्धि की दूसरी ओर की स्वस्थ सन्धि के साथ तुलना कर रोगनिर्णय करना चाहिये । अङ्ग को गति परिमित या वह अकर्मण्य हो जाता है तथा रोगी को स्वदप स्तब्धता, वेदना और शोथ ये अधिक लक्षण होते हैं । विशेपेणोत्पिण्टे सन्धावुभयतः शोफो वेदनाप्रादु-र्भावो विशेषतश्च नानाप्रकारा वेदना रात्रौ प्रादुर्भवन्ति । । विश्लिष्टेऽल्पः शोफो वेदनासातत्यं सन्धिविक्रिया च । | विवर्त्तिते तु सन्धिपार्श्वापगमाद्विपमाङ्गता वेदना च ॥ अवक्षिप्ते सन्धिविश्लेपस्तीत्ररुजत्वं च । अतिक्षिप्ते द्वयोः सन्ध्यस्थ्नोरतिक्रान्तता वेदना च । तिर्यकूक्षिप्ते त्वेकास्थिपार्श्वापगमनमत्यर्थं वेदना चेति ॥ ७ ॥
उष्पिष्टादि लक्षण -- उत्पष्ट होने पर विशेष कर सन्धि के | दोनों पाश्चों में शोध तथा वेदना होती है और ये वेदनाएं अनेक प्रकार की तथा रात्रि में विशेषरूपसे होती हैं । विशिष्ट में अल्प शोथ, निरन्तर वेदना तथा सन्धि के स्वरूप और कार्य में विकृति होती है । विवर्तित में सन्धि के एक पार्श्व में | सरक जाने से उस अङ्ग ( स्थान ) की विषमता तथा वेदना
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श्रध्यायः १५ ] निदानस्थानम् | २६१. होती है । अवक्षिप्त में सन्धि का विश्लेष तथा तीव्र पीड़ा होती है । अतिक्षिप्त में सन्धि बनाने में भाग लेने वाली दोनों अस्थियां दूर दूर हो जाती हैं तथा वेदना होती है । तिर्यक्क्षिप्त में एक अस्थि एक पार्श्व में सरक जाती है तथा अत्यधिक चेदना होती है ॥ ७ ॥
काण्डभग्नमत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः - कर्कटकम्, अश्वकर्णं, चूर्णितं, पिच्चितम्, अस्थिच्छल्लितं, काण्डभग्नं, मन्नानु-गतम्, अतिपातितं, वक्रं, छिन्नं, पाटितं, स्फुटितमिति द्वादशविधम् ॥ ८ ॥
• इसके अनन्तर काण्डभग्न का वर्णन करते हैं । इसके कर्कटक, अश्वकर्ण, चूर्णित, पिच्चित, अस्थिच्छल्लित, काण्डभग्न, मज्जानुगत, अतिपातित, चक्र, छिन्न, पाटित और स्फुटित ऐसे बारह भेद होते हैं ॥ ८ ॥
विमर्शः -- तन्त्रान्तर में काण्डभग्न के अनेक भेद माने गये हैं - ' मग्न तु काण्डे बहुधा प्रयाति समासतो नामभिरेव तुश्यम् ' ( मा ० नि ० ) डाक्टरी में भग्न ( Fracture ) के मुख्य दो भेद किये गये हैं । ( १ ) साधारण ( Simple fracture ) तथा ( २ ) संयुक्तभग्न ( Compound fracture ) । साधारण भग्न में केवल भीतर की अस्थि टूट जाती है । मांस तथा चर्म भिन्न नहीं होते हैं जिससे बाहरी वायु भग्न अस्थि तक नहीं जा सकती है । सयुक्तभग्न में चर्म, पेशी तथा श्लैष्मिक कला आदि छिन्न हो जाते हैं जिससे रक्त प्रवाह होता है तथा वायु टूटी अस्थि तक प्रविष्ट हो जाती है तथा जीवा णुओं के भी प्रविष्ट हो जाने से शोथ, ज्वरादि लक्षण भी होते हैं । भन्न के पूर्ण ( Complete ) तथा अपूर्ण ( Incomplete ) ऐसे भी दो भेद किये गये हैं । पूर्णभग्न ( Complete fracture ) के भी कई भेद होते है । ( १ ) अनुप्रस्थ भग्न ( Transverse fractare ) में अस्थि आघात के स्थान ही पर पूर्णरूप में टूट जाती है । ( २ ) तिर्यग्भग्न ( Oblique fracture ) में भन की रेखा देनी होती है । ( ३ ) अनुदैर्घ्य भन्न ( Longitudinal fra -cture ) में अस्थि का भग्न लम्बाई की ओर होता है । अस्थि का एक पतला लम्बा टुकड़ा टूट कर पृथक हो जाता है । बन्दूक की गोली से ऐसा भग्न होता है । ( ४ ) अनुवेलित भग्न ( Spiral fracture ) में भग्न की रेखा लहरदार या चक्रदार होती है । यह भग्न लम्बी अस्थियों में होता है । ( ५ ) अव-शीर्णभग्न ( Comminuted fracture ) में अस्थि कई छोटे - छोटे टुकड़ों में टूट जाती है । ( ६ ) अन्तराविष्ट भग्न ( Impaoted kraoture ) में अस्थि का टूटा हुआ एक भाग दूसरे में प्रविष्ट हो जाता है । ( ७ ) बहुभग्न ( Multiple fracture ) में अस्थि अनेक स्थानों पर टूट जाती है । अपूर्णमन में पूरी अस्थि नहीं टूटती है, केवल लम्बाई की ओर से उसका कुछ भाग टूट जाता है । बालकों में ऐसे भग्न हुआ करते हैं । इन्हें नवशाखा भग्न ( Green stick fracture ) कहते है । अवनतभग्न ( Depressed_fraoture ) कपाल की अस्थियों में होते हैं । रन्धित भग्न— ( Fissured fracture ) में अस्थि में दरारें पढ़ जाती हैं । श्वयथुबाहुल्यं स्पन्दनविवर्त्तनस्पर्शासहिष्णुत्वमव-पीड्यमाने शब्दः स्वस्ताङ्गता विविधवेदनाप्रादुर्भावः
सर्वास्ववस्थासु न शर्मलाभ इति समासेन काण्डभग्न ।
लक्षणमुक्तम् ॥ ६ ॥
काण्डभग्न लक्षण — सूजन का आधिक्य, अग के स्पन्दन, विवर्तन ( इधर - उधर हिलाने ) और स्पर्श करने में भी अस-हाता, उसे कुछ दबाने या रगढ़ने पर शब्द ( Crepitus ) का सुनाई देना, भग्नान का शिथिल होना, अनेक प्रकार की वेदनाओं की उत्पत्ति, ऊंची - नीची किसी भी अवस्था में उस अङ्ग को रखने पर भी सुख मालूम न होना, ये संचेप से काण्ड-भन्न के लक्षण कहे गये हैं ॥ ९ ॥
विमर्श: - डाक्टरी में स्थानिक तथा सार्वदेहिक ऐसे भग्न । के लक्षणों के दो भाग किये हैं । स्थानिक लक्षण - ( १ ) पोढ़ा ( Pain ) - अभिवात के स्थान पर वातसूत्र ( Nerve ) आदि के चत होने से पीडा होती है । ( २ ) भग्न के स्थान पर आघात के चिह्न, चर्म का छिलना, मांसपेशी - सूत्रों का टूटना तथा शोथ होता है । ( ३ ) अङ्गविकृति - ( Diformity ) भग्न भाग स्वस्थान से दूर होकर पूर्व स्थान में गढा तथा अन्यत्र उभार हो जाता है । ( ४ ) कर्महीनता ( Loss of fanction ) । ( ५ ) अस्वाभा • विक अस्थिरता या खस्ताङ्गता ( Preternatural mobility ) — भग्न के दोनों ओर से अङ्ग को पकड़ कर हिलाने से दोनों विश्लिष्ट भाग स्वतन्त्र दिशा में हिलेंगे किन्तु इस परीक्षा के करने से अक्षत वातसूत्र तथा रक्तवाहिनियों के टूटने का भय | रहता है अत एव यह परीक्षा न करें । ( ६ ) भग्नध्वनि ( Crepitus ) अवपीड्यमाने शब्दः, अङ्ग को हिलाने से दोनों टुक परस्पर रगड़ खाते हैं । यह परीक्षा भी प्रायः न करें । ( ७ ) भन्न से अग की लम्बाई कम हो जाती है । सार्वदेहिक लक्षण या उपद्रव - ( १ ) स्तब्धता ( Shock ) -प्रवल आघात या मर्म स्थान के आघात से गाढ़ी स्तब्धता होती है । ( २ ) भग्नज्वर ( Fracture fever ) -प्राय: दूसरे, तीसरे या किसी किसी में चौथे दिन ज्वर हो जाता है तथा दो - तीन दिन बाद चला भी जाता है । भग्न के जीवाणु द्वारा दूषित ( Septio ) न होने पर यह १०० ° तक तथा Septic होने पर अधिक हो जाता है । ( ३ ) वसारक्तावरोध ( Fat embolism ) - वसामय धातु के फटने से वसाकण पृथक् होकर रक्त द्वारा फेफडे तथा मस्तिष्क में पहुंच जाते हैं । फुफ्फुस में वसाकण अधिक जाने से श्वासावरोध तथा मस्तिष्क से अधिक जाने से मूर्च्छा उत्पन्न होती है । ( ४ ) सकम्पोन्माद ( Deliriumtremens ) मद्यपी तथा दुर्बल में यह दशा उत्पन्न होती है । निद्राल्पता, उन्मादाभास, भयानक स्वप्न आना जिससे शय्या से कूद जाना, सर्वाङ्गकम्पन तथा उन्मादावस्था के बाद अवसन्नता तथा सन्न्यास हो रोगी का प्राणान्त हो जाता है । ( ५ ) रक्तप्रवाह कम होता है, ( ६ ) धमनियों के क्षत होने से उस स्थान में रक्त जम कर निर्जीवह्निस्व हो जाता है । ( ७ ) वातसूत्र छत हो जाते हैं या आरोहण के समय सन्धान वस्तु के बीच में आजाने से उस भगकी सज्ञा - शक्ति या सज्ञालन - शक्ति नष्ट हो जाती है । ( ८ ) मासपेशीहानि सयुक्त-भग्न में अधिक होती है । ( ९ ) सन्धिहानि - आवरण शोथ तथा अस्थिशोथ होता है । ( १० ) सन्धिच्युति -- अस्थिभग्न मैं कभी २ सन्धि भी च्युत हो जाती है । निष्कर्ष - उक्त लक्षणों से भग्न का वास्तविक स्थान तथा अचूक निदान न हो सके तो X Ray चित्र लेना चाहिये । भग्नस्थान के चित्र में अस्थि