श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 341–350

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 341–350

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२६२ सुश्रुतसहिता । के दोनों टुकडों के बीच में अन्तराल दिखाई देता है किन्तु भग्न भाग के अन्तराविष्ट होने पर यह अन्तराल नहीं दिखाई देता है इसका भी ध्यान रख कर वहां लक्षणों से निदान करे । विशेषतस्तु सम्मूढमुभयतोऽस्थिमध्ये भग्नं ग्रन्थि -रिवोन्नतं कर्कटकम्, अश्वकर्णवदुत्तमश्वकर्णकं स्पृश्य-मानं शब्दवच्चूर्णितमवगच्छेत्, पिञ्चितं पृथुतां गतमन-ल्पशोफम्, पार्श्वयोरस्थि हीनोद्गतमस्थिच्छल्लितम्, वेल्लते प्रकम्पमानं काण्डभग्नम्, अस्ध्यवयवोऽस्थिम ध्यमनुप्रविश्य मज्जानमुन्नद्यतीति मज्जानुगतम्, अस्थि निःशेपतरिछन्नमतिपातितम्, आभुग्नमविमुक्तास्थि वक्रम्, अन्यतरपार्श्वावशिष्ट छिन्नम्, पाटितमरगुबहु-विदारितं वेदनाबच्च, शुकपूर्णमिवाध्यातं विपुलं विस्फु टीकृतं स्फुटितमिति ॥ १० ॥

काण्डमग्नादिविशेष लक्षण -- अधिकतर दोनों ओर उठा हुआ तथा मध्य में भग्न ( टूटा ) हुआ तथा ग्रन्थि के समान उन्नत जो हो उसे कर्कटभग्न कहते हैं । घोडे के कान की तरह ऊंचा उठा हुआ अश्वकर्ण भग्न होता है । अस्थि को स्पर्श करने पर शब्द सुनाई दे तो उसे चूर्णित जानो, जिसमें शोफ अधिक हो तथा आकार में चौड़ा हो उसे पिच्चित तथा जिस में अस्थि एक तरफ नीची तथा दूसरी तरफ ऊंची उठ जाय उसे अस्थिच्छलित एवं जो हिलाने से कम्पन करे उसे काण्ड • भग्न तथा जिसमें टूटा हुआ अस्थि का अवयव अस्थि के भीतर घुस कर मज्जा को बाहर निकाल दे उसे मज्जानुगतभन्न तथा जिसमें पूरी अस्थि टूट जाय उसे अतिपावितभन्न एवं जो अस्थि वक्र हो जाय पर टूटे नहीं उसे वक्रभग्न और एक तरफ से अवशेष ( टूटे नही ) तथा दूसरी तरफ से टूट जाय उसे छिन्नभन तथा जिसमें छोटी - छोटी बहुत सी दरारें हों जाय तथा पीढा हो उसे पाडित तथा जो धान्य के शूकों से पूर्ण हुआ सा प्रतीत हो और पीढाकारक तथा अधिक फटा हुआ हो उसे स्फुटित भन्न कहते हैं ॥ १० ॥

विमर्ग –१ – कर्कटकभग्न २- अश्वकर्ण भग्न को Oblique fracture कहते हैं । ३ चूर्णित भग्न को Comminnted fracture कहते हैं । ४ - पिच्चितभन को Complicated frac ture कहते हैं । इसमें रक्तवाहिनियां, वातसूत्र और पेशियां भी विदीर्ण हो जाती है । ५- अस्थिच्छक्षित को Longitudinal fracture कहते हैं । एषा अस्थिच्छल्लिका पार्श्वगतस्तोकास्थि-विलेपाद्भवति । ( मधुकोपः ) । ६ - काण्डभग्न को व्यव्यस्त या अनुप्रस्थ Transverse fraoture कहते हैं । ७ - मज्जानुगत को अन्तराविष्ट Impacted fracture कहते हैं । ८ - अतिपातितभग्न को पूर्णमग्न Complete fracture कहते हैं । ९ - वक्रभग्न को Green stick fraotare कहते हैं । इसमें अस्थि मुलायम होने से टूटती नहीं है किन्तु देवी हो जाती है । यह बच्चों में होता है । { ० - छिन्नमग्न को Incomplete अपूर्ण भग्न कहते हैं । ११ - पाटित भग्न को Depressed fractura कहते हैं । १२- स्फुटित को Fissured fracture रन्ध्रित भग्न कहते हैं । तेषु चूर्णितच्छिन्नातिपातितमज्नानुगतानि कृच्छु-साध्यानि, कृशवृद्धवालानां क्षतक्षीणकुछश्वासिनां स न्ध्युपगतं चेति ॥ ११ ॥

कृच्छ्रसाध्यभग्न — उक्त भग्नों ने चूर्णित, छिन्न, अतिपातित तथा मज्जानुगत कृच्छ्रसाध्य होते हैं एव कमजोर, बूढ़े, वालक क्षतक्षीण, कुष्ठरोगी तथा श्वास के रोगी के भग्न और सन्धियों के पास में होने वाले भग्न भी कृच्छ्रसाध्य होते हैं ॥ ११ ॥

विमर्श: -- अल्पाशिनोऽनात्मवतो जन्तर्वातात्मकस्य च । उपद्र देव जुस्य भग्न कृच्छ्रेग सिद्धयति ॥ ( मा ० नि ० ) । उपद्रवों में स्तब्धता ( Sho OK ), भग्नज्वर, बसारकावरोध, सकरप उन्माद, रक्तप्रवाह, धमनी, नाडी, मांसपेशीक्षत, जीवाणुमयता आदि प्रधान हैं ।

भवन्ति चात्र-भिन्नं कपालं कट्यां तु सन्धिमुक्तं तथा च्युतम् ।

जघनं प्रतिपिष्टं च वर्जयेत्तश्चिकित्सकः ॥ १२ ॥

असाध्य भग्न- कपालास्थियां ( Flat Bones ) अथवा कपाल ( खोपडी Scull ) के भिन्न भग्न तथा कटि के मिन्न भग्न होने पर एवं सन्धिमुक्त तथा सन्धिच्युत और जघन सन्धि के उत्पिष्ट भग्न की चिकित्सक चिकित्सा न करे ॥१२ ॥

असंश्लिष्टं कपालं तु ललाटे चूर्णितं च यत् ।

भग्नं स्तनान्तरे शङ्खे पृष्ठे मूर्ध्नि च वर्जयेत् ॥१३ ॥

शिरःकपाल की सन्धिर्यो के पृथक होने पर या केवल ललाटप्रदेश की पूर्विकास्थि ( Frontal Bone ) के चूर्णित हो जाने पर, किंवा दोनों स्तनों के मध्य से तथा शङ्खप्रदेश और पृष्ठप्रदेश, मूर्ध ( शिर के मध्य भाग ) में भग्न होने पर वर्जित कर देना चाहिये ॥ १३ ॥

विमर्शः - भालुकि ने भी कहा है कि ' गड्से मूर्ध्नि स्तना-न्तरे वा काण्टे मग्न मरणाय ' ।

आदितो यच्च दुर्जातमस्थि सन्धिरथापि वा ।

सम्यग्यमितमप्यस्थि दुर्व्यासाद् दुर्निबन्धनात् ॥ १४ ॥

सोभाद्वाऽपि यद् गच्छेद्विक्रियां तच्च वर्जयेत् ॥ १५ ॥

जो अस्थि तथा सन्धि भग्न होने के पूर्व ही में खराव हो या जन्म से ही खराब हो तथा जिस टूटी हुई स्थ सम्यभ्यमित ( ठीक सन्धित ) करने पर भी अनुचित रखनेसे, अनुचित बन्धन बांधने से एव भग्न को हिलाने से विकृति हो जाती है, ऐसे रोगी की भी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये ॥ विमर्श - आदितो यश्च दुर्जातन्- भग्न के पूर्व में यदि अस्थि के रोग जैसे - अस्थिवक्रता, अस्थिभङ्गुरता, अस्थिमृदुता और अस्थि | के अर्बुद हों तथा अस्थि के समीप धमनीग्रन्थि ( Aneurism ) हो तथा फिरङ्ग के कारण जो अस्थि गल गई हो तथा पक्षावात के होने के बाद अस्थि भग्न हुई हो तो वैसे रोगी असाध्य होते हैं । दुर्व्यासात् दुःस्थापनात् अर्थात् भग्नाद्ग को योग्यस्थिति ( Correct postion ) में न रखने से, दुर्निरन्धनात् - कुशातूलि-कादिवन्धन वस्तुभिर्दृढतयावन्यनात् अर्थात् कुशा ( Splint ), रुई आदि योग्य उपकरणों से भग्नाग को भलीभांति न बांधने । कुशाद्वव्य - मघृकोदुम्बराश्वत्यपलाशककुभत्वच । वासवटा-। नाश्च कुशार्थमुसहरेत् ॥ विक्रिया गच्छेत् — उक्त प्रकार से भग्नाः स्यि का ठीक मिलान न करने पर या दुर्बन्धन, संक्षोभ आदि कारणों से ठीक मिलाई हुई अस्थि भी योग्य स्थान से हट कर सन्धित हो जाती है । प्रायः सन्धान के बाद भग्नस्थान की अस्थि में नई धातु बनती है । प्रारम्भ में यह धातु मुलायम होती है अत एव दुर्बन्धन, दुर्म्यास तथा संज्ञो इसमें विगाद ( विकृति ) हो जाता है । जब अस्थि के भिन्न भागों

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अध्यायः १६ ] निदानस्थानम् । २६३ का सन्धान ठीक नहीं होता है तो दोनों भागों के बीच में रह जाता है अथवा एक भाग दुसरे पर चढ़ जाता हो जाता है इसे उपयोजन ( Malarion ) कहते हैं । अस्थियों का न जुड़ना - ( 1 ) उचित मन्धान न होना, ( 2 ) अस्थि - भागों के बीच में पेशियों, रक्तवाहिनियों का जाना, ( ३ ) श्रम को विश्राम न मिलना, ( ४ ) अन्थिरोग, ( ५ ) रोगी की शारीरिक दशा का छीन होना, ( ६ ) दुर्व्याम, ( ७ ) दुर्निबन्धन, ( ८ ) धमनी के हट जाने से अस्थि से रक्त न मिठना नादि हैं । आजकल सर्वसाधन - सम्पन अस्पतालों से । भग्न के रोगी को रखने से कुमंयोजन का भय बहुत कम हो जाता है । उसके दिये अनेक प्रकार की बुझाए ( Splinte ) तथा चांदी के नार, धातु की पट्टियां दीया इग्निदन्त । की पेटियां होती है । धातु निर्मित वस्तुओं का कम प्रयोग करें । चांदी के तार उत्तन होते है । संयोजन के पूर्व एप से भग्न का चित्र लेना भी आवश्यक है ।

मध्यस्य वयोवस्थास्तित्त्रां याः परिकीर्त्तिताः ।

तत्र स्थिरो भवेजन्तुरुपत्रान्वो विजानता ॥ १६ ॥

मध्यमायु की जो तीन अपत्याए बाट, युत्रा नया प्रगल्भ या प्रौद कही गई हैं । उनमें विद्यमान मनुष्य का भग्न विज्ञ बैद्य द्वारा विकिम्मा करने से स्थिर ( ठीक ) हो जाता है ॥ १६ ॥

विमर्श - पना गरी भेा वृनि सम्पूर्णता पानिरिनि, योनपोच्या " मागुन प्रायेणा-नातिनाद्विमुपदिष्टन् र पोटासप्तन्योरन्तरे मध्य यिन महानिरिनि । शिते यौन अत्याधिः न्द्रियार्य सम्पूर्धजिनिक्तिनिरिति । ( सु ० सू ० ० ३० ) । प्रथयम से भग्न करनादिशेष ॥ ४० से ७० तर कृष्द्रयायु तथा ७० के पश्चात् आयु - दृष्टि में भग्नों को अमाध्य समना ।

तन्गान्धीनि नम्यन्ते भव्यन्ते नलकानि तु ।

कपालानि विभिद्यन्ते सुदन्ति मचकानि च ॥ १७ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने भग्ननिदानं नाम पञ्चदशोऽध्याय ॥ १५ ॥

तरगास्थियां - आघात से नम जाती है, नटकास्थियां टूट जाती हैं, पाठास्थिया विदीर्ण हो जाती हैं तथा रुचकास्थियां और बयास्थियां फूट जाती है ॥ १७ ॥

विमर्श -स्थियों को Cartilage करते हैं । इनमें लचक होती है नामा, वर्ण, उपपर्शुकाएं तथा गर्भावस्था और बाल्यावस्था में भी अनेक अस्थियां कार्टिलेज के समान ही मुलायम होती है अन एव प्रेमी अन्थियों पर आघात लगने में वे नम जाती है छूटती नहीं अतः इस प्रकार के भग्न को चक्र या नवजात भग्न Green stick fracture कहते है । हाथ पैर आदि की नन्दकास्थियों को Long Bones कहते हैं । कपा-लाग्थियों को Flat Bones कहते हैं, दन्तों को रचास्थियां नया बयास्थियों को Short and erregular Bones कहते है । छत्यायुर्वेदतत्व सन्दीपिकाभाषायां भग्ननिदानं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

पोडशोऽध्यायः ।

अथातो मुखरोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके अनन्तर सुग में होने वाले रोगों के निदान का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत मे हाथा ॥ १-२ ॥ मुखरोगाः पञ्चषष्टिः सप्तस्वायतनेषु । तत्रायत-नानि- ओष्ठा, दन्नमृलानि, दन्ता ', जिल्हा, तालु, कष्ट, सर्वाणि चेति ॥ ३ ॥

रोग संख्या में पंसठ होते है तथा वे मान स्थानों में उपन्न होते हैं । उनमे निम्न यात आयतन हैं, जैसे- दोनों थोष्ट, दन्तमूल, दुन्न, जिल्हा, तालु, कण्ठ तथा समग्र मुख है ॥ ३ ॥

विमर्श - मुखपरिभाषा - ओष्ठी च दन्तमूलानि दन्ता जिल्हा चालुच । गोद समप्ता मुमुच्यते ॥ ( भाव प्र ० ) । भिन्न - भिन्न धाचायों ने मुखरोगों की संख्या भिन्न - भिन्न मानी है । भोजमत से ६५ मुसरोग होते है- उन्ष्टावोष्ठ

यो मूलेषु दश पत्र च । नव नाउनि जिल्लाया पाया ॥

कण्ठे सर्वसंग एकपटिनु परा ॥ चरक ने ६१ मुसरोग माने हैवानध्यानिनाममेाचे चनु. पष्टिनि भवन्ति ( च चि अ. २६ ) । शार्ङ्गवर ने ७४ मुमरोग माने हैं- चतु -सुप्तनिमस्याका मुखरोगाग्नयोदिताः । भावप्रकाश ने ६७ मुखरोग माने हैं -- युग्टष्टयोराले तु दशपद् तथा । दन्तेष्टीच निद्वाया पद्म स्युर्नर तालुनि ॥ कण्ठे लष्टादश प्रोक्तास्तय. सर्वषु च स्मृता । व सुग्गामा सर्वे सप्तषष्टिर्मना चुवै ॥ वाग्भट ने ७५ मुनरोग माने है - सर्वत्र चेत्युक्ता पमप्ततिरामया । तथा गण्ड को सुर का अवयव मान कर सात के स्थान पर आठ आयनन माने हैं । तत्राष्टाष्टयोः पञ्चदश दन्तमूलेपु, श्रष्टो दन्तेपु, पञ्च जिह्वायाम, नव तालुनि, सप्तदश कठे, त्रयः सर्वेप्वायतनेषु ॥ ४ ॥

उनमें से दोनों ओष्टों में आट, दन्तमूलों ( मसूढी ) में पन्द्रह, दांतों में आठ, जिल्ला मे पाच, तालु में नौ, कण्ठ में सत्तरह तथा सकल मुग में तीन ॥ ४ ॥

तत्रौष्टप्रकोप वातपित्तश्लेष्मसन्निपातरक्तमांसमे-दोऽभिघातनिमित्ताः ॥ ५ ॥

ओष्ट के रोग वात, पित्त, कफ, सन्निपात, रक्त, मांस । मेद तथा आघात इनके कारण आठ होते हैं ॥ ५ ॥

विमर्श - वाग्भट ने इन रोगों के अतिरिक्त ओष्ट के तीन रोग अधिक माने हैं जिससे उनकी सख्या ग्यारह हो जाती है । ( १ ) तत्र गण्डश्रेष्ठ इत्युक्तो गतेनोष्ठो दिन त । खण्डोष्ट का साम्य हेयर लिप से ( Hare hp ) किया जाता है । ( २ ) ओष्टा-| र्बुद - खजूरसदृश चान क्षीणे रक्तऽर्बुद भवेत् । यह इपिथिलियोमा ( Epithelioma ) है । ( ३ ) जलार्बुद - जलबुदबुद वद्वात कफ दोष्ठं । जगदन । यह एक प्रकार से म्यूकससिस्ट ( Incuscyst ) है ।

कर्कशी परुपी स्तब्धौ कृष्णो तीव्ररुगन्वितौ ।

दाल्येते परिपाटयेते ह्योष्ठौ मारुतको पूतः ॥ ६ ॥

" वातप्रकोप से ओट स्पर्श में सुरदरे, कठिन, स्तब्ध ( सुन्न ) तथा वर्ण में काले एवं तीव्र पीड़ा तथा विदीर्णयुक्त हो जाते हैं एव इनकी त्वचा भी उखड़ जाती हैं । इसे ( Craoked cha • pped lips ) कहते हैं || ६ ||

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२६४ सुश्रुतसहिता ।

आचितौ पिडकाभिस्तु सर्पपाकृतिभिर्भृशम् ।

सदाहपाकसंस्राव नीलौ पीतौ च पित्ततः ॥ ७ ॥

पित्त - प्रकोप से ओष्ठ सरलों के प्रमाण की अनेक पिड़काओं से आचित ( युक्त ) तथा दाह, पाक और स्रावयुक्त एव वर्ण मैं नील तथा पीत दिखाई देते है ॥ ७ ॥

सवर्णाभिस्तु चीयेते पिडकाभिरवेदनौ ।

कण्डूमन्तौ कफाच्छूनौ पिच्छिलौ शीतलौ गुरू ॥ ८ ॥

कफ के प्रकोप से ओष्ठ स्त्रसमान वर्णवाली पिडकाओं से युक्त तथा वेदनारहित, कण्डुयुक्त, शोथयुक्त, चिपचिपे, ठण्डे और भारी होते हैं ॥ ८ ॥

सकृत्कृष्णौ सकृत्पीत सकृच्छ वेतौ तथैव च ।

सन्निपातेन विज्ञेयावनेकपिडकाचितौ ॥ ६ ॥

सन्निपात ( त्रिदोष - प्रकोप ) से ओष्ठ कभी काले, कभी पीले और कभी श्वेत दिखाई देते हैं तथा विविध प्रकार की पिकाओं से युक्त होते हैं ॥ ९ ॥

विमर्श - पित्त, कफ तथा त्रिदोष से उत्पन्न ओष्ठप्रकोप का साम्य Herpes labialis के साथ हो सकता है ।

खर्जूरफलवर्णाभिः पिडकाभिः समाचितौ ।

रक्तोपसृष्टौ रुधिरं स्रवतः शोणितप्रभौ ॥ १० ॥

रक्तप्रकोप से ओष्ट खर्जूरफल ( छुहारा या पिण्डखजूर )

के समान रङ्गवाली पिडकाओं से व्याप्त होते हैं तथा रक्त ।

वहाते हैं और देखने में रक्त के समान सुर्ख होते हैं ॥ १० ॥

मांसदुष्टौ गुरू स्थूला मांसपिण्डवढुगतौ ।

जन्तवश्चात्र मुर्च्छन्ति सृक्कत्योभयतो मुखात् ॥११ ॥

मांसदुष्ट ओष्ठ भारी, मोटे मांस के पिण्ड के समान उठे ( उभरे हुये होते हैं एवं मुख के उभयपार्श्व में उत्पन्न व्रणों में कृमि पड जाते है ॥ ११ ॥

विमर्श: - यह ओष्ठ का Epithelioms हो सकता है ।

मेदसा घृतमण्डाभौ कण्डूमन्तौ त्थिरौ मृदू ।

अच्छस्फटिकसङ्काशमास्रावं स्रवतो गुरू ॥ १२ ॥

मेदोदृष्टि से अष्ट घृतमण्ड के समान रङ्गवाले, कण्डुयुक्त, स्थिर तथा मुलायम होते हैं एवं स्वच्छ स्फटिक के समान नाव वहाते हैं और भारी होते हैं ॥ १२ ॥

क्षतजाभौ विदीर्येते पाठ्येते चाभिघाततः ।

ग्रथितौ च समाख्यातावोष्टौ कडूसमन्वितौ ॥ १३ ॥

अभिघात से ओष्ठ चतन ( रुधिर ) के समान रंगवाले तथा विदीर्ण, छिन्न, गांठदार और कण्डुयुक्त होते हैं ॥ १३ ॥

विमर्शः - अभिघातजन्य ओष्ठप्रकोप में आघात के बाद कफ तथा रक्त का सम्बन्ध हो जाता है जैसा कि भोज ने कहा । है - श्रुतावभिती वाऽपि रक्तावोष्ठौ सवेदनौ 1 । भवतः सपरित्नावौ कफरक्तप्रदूषितौ ॥ दन्तमूलगतास्तु - शीतादः, दन्तपुप्पुटकः, दन्तवे-ष्टकः, शौषिरः, महाशौपिरः परिदरः, उपकुशः, दन्त-वैदर्भः, वर्द्धनः, अधिमासः, नाड्यः पचेति ॥ १४ ॥

दन्तमूल में होनेवाले रोग - जैसे - शीताद, दन्तपुष्पुटक, दन्तवेष्टक, शौपिर, महाशौपिर, परिदर, उपकुश, दन्तवैदर्भ, वर्धन, अघिमांस तथा पांच प्रकार के नाटीरोग, ऐसे मिलकर पन्द्रह होते हैं ॥ १४ ॥

विमर्श. - वाग्भट ने दन्तवेष्ट तथा परिदर को नहीं माना है जिससे उनके मत से दन्तमूल में १३ रोग ही होते हैं । वर्धन को दन्तरोगों में गिना है । दन्तविद्रधि ( एल्बिओलर एक्सेस Alveolar abscess ) एक पृथक मानी है - उन्तमासे म. सानेर्वाह्यान्त.न्वयथुर्गुम् । सरुग्दाहः स्रवेद्भिन्नः पूयास्र दन्त-विद्रधि. ॥ ( अ. सं. ) । शार्ङ्गधर ने भी दन्तमूल रोग १३ ही माने है - था त्रयोदशमिता दन्तमूलामयाः स्मृताः ।

शोणितं दन्तवेष्टेभ्यो यस्याकश्मात् प्रवर्त्तते ।

दुर्गन्धीनि सकृष्णानि प्रक्लेदीनि मृदूनि च ॥ १५ ॥

दन्तमांसानि शीर्यन्ते पचन्ति च परस्परम् ।

शीतादो नाम स व्याधिः कफशोणितसम्भवः ॥ १६ ॥

शीताद - जिस मनुष्य के दन्तवेष्टों ( मसूड़ों ) से बिना कारण सहसा रक्तस्राव होने लगता है एवं जिसके दन्तमांस ( मसूढे ) दुर्गन्धयुक्त, काले, छेदयुक्त तथा मृदु ( ढीले या पिलपिले ) हो जाते हैं । तथा उन मसूढों का मांस गल कर गिरने लगता है एवं जिनमें पाक हो जाता है उसे कफ - रक्त से उत्पन्न हुई शीताद नामक व्याधि कहते हैं ॥ १५–१६ ॥ विमर्श - शीताद को Bleeding or Spongy gums कहते हैं । मुख साफ न रखने से या कोई वस्तु खाने के बाद कुल्ला न करने पर मसूडों और दांतों के बीच में अन्नादि के लगे रह जाने से तथा अशुद्ध पारद के योग सेवन एवं स्क्व नामक रोग इसकी उत्पत्ति में कारण होते हैं ।

दन्तयोस्त्रिषु वा यस्य श्वयथुः सरुजो महान् ।

दन्तपुष्पुटको ज्ञेयः कफरक्तनिमित्तजः ॥ १७ ॥

दन्तपुष्पुटक — कफ और रक्त की खरावी से जिस मनुष्य के दो दांत या तीन दांतों के मूल ( मसूड़ों ) में पीढादायक महान शोध उत्पन्न हो जाता है उसे दन्तपुप्पुटक रोग जानना चाहिये ॥१७ ॥

विमर्शः - दन्त विद्रधि की अपेक्षा मसूड़ों में कभी - कभी छोटी - छोटी फुन्सियां हो जाती है जो कि मसूड़े को छेद कर फूट जाती हैं और उनसे पूय निकल जाता है इसे गम्बोइल ( Gumboil ) कहते हैं ।

स्रवन्ति पूयरुधिरं चला दन्ता भवन्ति च ।

दन्तवेष्टः स विज्ञेयो दुष्टशोणितसम्भवः ॥ १८ ॥

दन्तवेष्ट - जिस मनुष्य के दांत ( तथा मसूडे ) पीव और रक्त बहाते हों और हिलते हों उसे दूषित रक्तजन्य दन्तवेष्ट रोग जानना चाहिये ॥ १८ ॥

विमर्श: - यह पायरिया एल्वियोलेरिस ( Pyorrhoea alveolarIs ) अथवा सप्युरेटिव जिजिवाइटिस ( Suppurative gmgivitis ) रोग है ।

श्वयथुर्दन्तमूलेषु रुजावान् कफरक्तजः ।

लालास्रावी स विज्ञेयः कण्डूमाञ शौषिरो गदः ॥१६ ॥

शौपिर - कफ और रक्त की खराबी से जिस मनुष्य के दन्तमूलों में पीडादायक, लाला बहाने वाला तथा कण्डुयुक्त शोध होता है उसे शौपिर रोग जानना चाहिये ॥ १ ९ ॥

दन्ताश्चलन्ति वेष्टेभ्यस्तालु चाप्यवदीर्यते ।

दन्तमांसानि पच्यन्ते मुखं च परिपीड्यते ॥ २० ॥

यस्मिन् स सर्वजो व्याधिर्महाशौषिरसंज्ञकः ॥ २१ ॥

महाशौ पिर - जिस मनुष्य के दांत मसूड़ों को छोड़ देते हैं | अर्थात् हिलने लग जाते हैं तथा तालु फट जाता है एवं मुख

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श्रध्यायः १६ ] निदानस्थानम् । २६५ में पीड़ा होती रहती है वह सर्वदोष ( सन्निपात ) जन्म महागौपिर नामक रोग है ॥ २०-२१ ॥ विन्शी यह भी पानरिया का रूप ही है । इसका पूय रक्त में मिलकर दूयसयता तथा विनयता दोनों हो जाती हैं । अस एव भोज ने इससे सात दिन हो में मृत्यु होना लिखा है — विवृद्वातिशं दतस्तत्रोठमा | महाशषि इत्येव सन्गन्त्रान्निहन्त्रमन् ॥ चसन्निज्जरकन् सनूवर विकृति । ( अ.सं. ) । महाक्षौषित नोंग्रीनस न्टोसेटायटिस ( Gangress somatic tis ) या केंकन लोरिस ( Ganerum oris ) है । इसमें नई पर या कपोल के अन्तः प्रदेश से होकर तालु तथा जिहा बादि स्थलों में भी फैल जाता है । इसमें स्वर तेज होता है । रोगी की शीघ्र ( दा दिन के भीतर ) मृत्यु भी हो जाती है ।

दन्तमांसानि शीर्यन्ते चन्मिन् टीवति चाप्यनुकू ।

पित्तामृक्कननो व्याविज्ञेयः परिदरो हि सः ॥ २२ ॥

परिवर - जिस रोग में इन्तमांस ( मई ) गलते हों तथा थूकने से बार - बार खून आता हो वह विच, रक तथा क से उत्पन्न हुई परिवर नामक व्याबि है । २२ ॥

वैष्ठेषु दाहः पाञ्च तेभ्यो दन्ताचलन्ति च ।

आट्टिताः प्रनन्ति शोधितं मन्दवेदनाः ॥ २३ ॥

आम्नायन्ते सुने रक्ते मुखं पूति च जायते ।

यस्मिन्नुपकुशः स स्वगत् पित्तरक्तकृतो गढ़ः ॥ २४ ॥

उपकृध - जिस मनुष्य के पेष्ट ( मसूडों ) में दाह तया पात्र हो, मसूड़े से दांत ढीले होकर हिने हो, परस्पर दांतों को साड़ने से या उन्हें दबाने से खून निकलता हो, मन्द पीड़ा होती हो वया रक निकल जाने के बाद मसूड़े फूल दुर्गन्ध हो जाता हो वह वित्त तथा रक से वपन टपकुम नामक रोग है ॥ २३-२४ ॥

घृष्टेषु इन्द्रमूतेषु संरम्भो लाग्ने महान् ।

भवन्ति च चला दन्दाः स वैदर्मोऽभिवातजः ॥ २ ॥

वैदर्न इन्तमूल में रगड़ने से अत्यधिक संरन्न ( सह-सराहट, झोय, लागि ) होती है तथा दन्तपंकि हिलती है । इसे नवाजन्य वैदर्म रोग कहते हैं ॥ २५ ॥

मारतेनाविको दन्तो जायते तत्रवेदनः ।

बर्द्धनः स मनो व्याविजने नक्कू च प्रशाम्यति ॥२६ ॥

वर्वनाम के कारण अत्यधिक पीडाकारक अधिक दाँत पैदा होता है उसे वर्जन रोग कहते हैं । इसमें इन्वोदन के पश्चात् वेदना स्वयं शान्त हो जाती है ॥ २६ ॥

विमान में वर्धन को अविदन्त तथा वल वर्बन लिखा है । यह एक्स्ट्रा य ( Iatra tooth ) है । कुछ टीकाकारों ने इसे । G कलढाउ ( विस्तम व्य ( WirIom tooth ) नाना है परन्तु इसके ढलाने तथा बप्ति - अवचारण करने का उपदेश ( किन्तु दोनचारयेद ) शान्त्रों में होने से लकलाट नहीं है । ना तो इन्ही की आखिरी है भी नहीं कह सकते ।

हाचे पश्चिम दन्ते मद्दाञ्छोयो नहानजः ।

लाडाना विज्ञेयः सोऽविमांसकः ॥ २७ ॥

अमिनुत्रि के पास हनु के अन्तिम दंव में महान् शोथ होता है तथा उसमें नीत्र पोड़ा और crocana होता है । यह कफजन्य अविनय रोग है ॥ २७ ॥

विमर्श -यह इम्पेक्टेड विन्न थ ( Impacted wis • dom tooth ) है तथा इस पर मसूड़े का कुछ मांस चढ़ जाता है तथा चर्वगादि के समय कुचल जाने से हनुमन्त्रि तथा कान वेदना तथा ग्राम उतारने में कष्ट होता है । अष्टसंग्रह में इसके

ये वेग स्पष्ट लिखे हैं - नुकगंजाकरः । प्रतिहन्यन्यवह्नर्निम् ॥

दन्तमूलगना नाड्यः पञ्च ज्ञेया चथेरिताः ॥ २८ ॥

दन्तनाडियां - दांतों की जड़ों ( मसूड़ों ) में उत्पन्न यथा-शाम्रो पांच प्रकार के दन्तनाडी रोग होते हैं ॥ २८ ॥

विमर्शः — दशमध्यायनाडी निद्राने वानपिचकत्मन्निदाना-गन्नुरूपौरिताः प्रोता. पन नाडीमैडा दन्द्रनामेऽपि भवन्तीतिशेवा " । प्रायः दन्तोदून्चल तथा मसूड़ों में गहरी विधियां बन जाती हैं जिनमें पूय बनकर बाहर नाडी - द्वारा निकलता रहता है । दन्तगनान्तु - दालन:, क्रिमिदन्तको, दन्तहर्षो, भख-नकः, शर्करा, कपालिकाः श्यावदन्नको, हनुमोदचेति ॥ दन्तगत रोग - दालन, क्रिमिदन्न, दन्तहर्ष, भञ्जनक, शर्करा, कपालिका, श्यावदन्तक और हनुमोच ये नाव दन्तरोग होते हैं ॥ विमर्श - शाईवर ने दन्तरोग दल माने हैं - लगेगा दशाननः । इस तरह कराल तथा दन्तचाल ये दो रोग अधिक माने हैं- रागः. प्रकुरुते वायुर्दन्नममायतः । करालान् विदान् दन्तान् बगलो न मसिन्न ' इनि, ' साविव्यथे । वाग्भट ने भी दुन्वरोग दस माने हैं - जैसे कराल मग नानां दशनानां समुद्भव – दन्तचाल आदि । दन्नभेद लग - इन्तदे दिनास्तदमेदरनान्त्रिताः ।

दायन्ते बहुधा दन्ता यस्मिन्नीन्त्रिताः ।

दालन: स इति ज्ञेयः सदागतिनिमित्तजः ॥ ३० ॥

दालन -- जिसमें दांत अनेक प्रकार से फट जाते हैं । तथा तीव्र पीड़ा होती हो वह सदागनि ( वात ) के कारण टरपन्च दालन रोग है ॥ ३० ॥

विमर्श - दालन को ट्र्य पुत्र ( Tooth ache ) अथवा श्रोडोप्टोडाईनिया ( Odontodynia ) कहते हैं । संग्रह मैं इसे श्रीतन्त्र लिखा है - नादुपासा दन्दा. श्रीक व्ययाः । दायन्न इव शूलेन श्रीनाय दालन. ॥

कृष्णरिद्री चलः स्त्राी ससंरम्भी महारुजः ।

अनिमित्तन्जो वाताद्विज्ञेयः कृमिदन्तकः ॥ ३१ ॥

कृमिदन्त- -वात के कारण जो दांत प्रथम काला हो, फिर उसले छिद्र हो जाय, पश्चात् हिलने लगे और फिर उससे नाव निकले तथा गोय और भयकर पीडा हो तथा कभी २ बिना कारण के ही पीड़ा हो उसे महत्व समझना चाहिये ॥ विमर्श: -- दांतों में अन्नादि के फम कर सढ़ने से दरपन्न अम्ल की क्रिया में वे गड़कर पीले हो जाते हैं तथा उनमें कोडे भी पड़ जाते हैं । केदिननम तथा विद्यामीन डी की अल्पता से भी यह रोग पैदा होता है, इसे टेन्टल केरिज ( Dental caries ) कहते हैं ।

दशनाः शीतमुष्णं च सहन्ते स्पर्शनं न च ।

यस्य तं दन्तय तु व्यार्थि विद्यान् नमीरणान् ॥ ३२ ॥

दन्तहर्ष - जिस मनुष्य के दांत शीत तथा दष्ण स्पर्श को या केवट स्पर्श को ही सहन नहीं कर सकते हों उसे वानजन्य इन्तहर्ष रोग बानो ॥ ३३ ॥

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२६६ सुश्रुतसंहिता । विमर्श: --- माधव ने इसे पित्त - मारुतकोपजन्य माना है । गच्छति ॥ त कृच्छ्रमनिलव्याधिं हनुमोक्ष विनिर्दिशेत् ॥ हनुमोच ' वित्तमारुतकोपेन ' इसमें दन्तगत वातसूत्र खुले हो जाते हैं या हनुखंस डिस्लोकेशन ऑफ दि लोअर क्षा ( Dislocation जिससे किसी भी स्पर्श से हर्प होता है । यह ओडोण्टायटिस of the lower jaw ) है तथा हनुग्रह को लाक झा ( Lock ( Odontitis ) है । Jaw ) अथवा ट्रिस्मस ( Trismus ) कहते है । हनुखंस या वक्त्रं वक्रं भवेद्यस्मिन् दन्तभङ्गश्च तीव्ररुक् । हनुमोक्ष --- कारण - हनुसन्धि - बन्धनों के ढीले होने से तथा कफवातकृतो व्याधिः स भञ्जनकसंज्ञितः ॥ ३३ ॥ हंसते या जृम्भा लेते समय अधिक मुख खोलने से किवा

भञ्जनक- जिसमे वक्त्र ( मुख ) वक्र ( टेढा ) हो नाय । खुले मुख पर भाघात होने से, किंवा दन्तोत्पाटन के समय तथा दांतों का भङ्ग ( त्रोटन ) हो जाय और तेज पीडा हो उसे कफ वातजन्य भञ्जनक नामक रोग जानो ॥ ३३ ॥

शर्करेव स्थिरीभूतो मलो दन्तेषु यस्य वै ।

सादन्तानां गुणन्नी तु विज्ञेया दन्तशर्करा ॥ ३४ ॥

दन्तशर्करा - जिस मनुष्य के दांतों पर शर्करा ( महीन बालू - रेत ) के समान मल जम जाता है वह दन्तों के दृढ तथा रूप सौन्दर्यादिगुण को नष्ट करने वाली दन्तशर्करा ( Tarter ) व्याधि है ॥ ३४ ॥

दन्तिदन्तकानि यदा शर्करया सह ।

ज्ञेया कपालिका सैव दशनानां विनाशिनी ॥ ३५ ॥

अधोहन्विका पर ज्यादा जोर पढ़ने से हनुमुण्ड हनुखात के अर्बुद पर से फिसलता हुआ उसके आगे पहुच जाता है । हनुकुन्त पर लगी हुई संकोचपेशियां भी अस्थि को आगे की ओर खींचती हैं । लक्षण -- ( १ ) रोगी का सुख खुला रह जाता चिवुक नीचे को दब जाती है, कपोल पर कर्णमूल के आगे एक गढा और उसके आगे एक उभार दिखाई देता है -करोति विवृतास्यस्वम् । ( २ ) रोगी चर्वण तथा भाषण नहीं कर सकता है- इनुत्रस स तेन स्यात्कृच्छ्राच्चर्वणभाषणम् । ( अ सं. ) । हनुग्रह - इसमें मुख बन्द हो जाता है -- अथवा सवृतास्यताम् । इस रोग का कारण सुख की पेशियों का समुचित हो जाना है । जिह्वागतास्तु --- कण्टकास्त्रिविधास्त्रिभिर्दापैः, अ कपालिका - जब दांतों पर पूर्वोक्त जमी हुई शर्करा केलास, उपजिह्निका चेति ॥ ३८ ॥

साथ दन्तवल्क ( दन्त - कवच ) उतरने लगता है, तब उसी शर्कराको दन्तनाशिनी कपालिका कहते हैं ॥ ३५ ॥

विमर्श: -- दांतों के ऊपर एक अतिदृढ तथा श्वेत आवरण चढा रहता है उसे तल्क या दन्तकवच ( इनेमल Inamel ) कहते हैं । मनुष्य अतिकठिन पदार्थों को इसी की सहायता से वाता है । सुख की ठीक तरह से शुद्धि न रखने से इस पर मैला जम जाता है और वह जब अधिक हो जाता है तव लोहे पर लगे हुये मोर्चे के समान उत्तर कर पृथक हो जाता है ।

यो मिश्रेण पित्तेन दुग्धो दन्तस्त्त्रशेपतः ।

श्यावतां नीलतां वाऽपि गतः स श्यावदन्तकः ॥ ३६ ॥

श्यावदन्तक -- जो दांत रक्त तथा पित्त के प्रकोप से अशेष ( पूर्ण ) रूप में ढग्ध होकर श्याव ( धूमिल ) अथवा नीला हो जाता है वह श्यावदन्तक रोग कहलाता है ॥ ३६ ॥

वातेन ततैर्भावैस्तु हनुसन्धिविसंहतः ।

हनुमोक्ष इति ज्ञेयो व्याधिरर्दितलक्षण- ॥ ३७ ॥

हनुमोक्ष - उच्चभाषण, हसन, जृम्भण आदि भिन्न - भिन्न भावों के कारण कुपित हुये बात से हनुसन्धि विसहत ( स्वस्थान-त ) हो जाती है तथा इसमें अर्दित ( मुख के लकवे ) के

समान लक्षण होते हैं । इसको हनुमोक्ष जानना चाहिये ॥ ३७ ॥

विमर्श: - यद्यपि चरक तथा अष्टांगसग्रह में हनुमोक्ष का वातरोगों के अन्दर हनुस्रंस के नाम से हनुग्रह के साथ लिखकर वर्णन किया है किन्तु सुश्रुत ने दन्तस्थान - सामीप्य अर्थात् दंतों का आधार हन्त्रस्थि के होने से तथा दन्तपीडाकर होने से हनु के होने वाले मोच को भी दन्तरोग में मान लिया है । वास्तव में यह दुन्तरोग नहीं है । भावप्रकाश ने भी इसे वातरोगों में लिखा है । माधवनिदान में भी इस रोग को वातरोगाधिकार में हनुस्रंस के नाम से लिखा है -जिहानि-लैसनाच्छुष्कभक्षणादभिघातत । कुपितो हनुमूलस्थ स्रसयित्वाऽ-निलो हुन् ॥ करोति विवृतास्यत्वमथवा सवृतास्यताम् || धनुग्रह, स तेन स्यात्कृच्छ्राच्चर्वणभाषणम् । तन्त्रान्तरीयवर्णनं - भारामि घातान्नन्तोश्च हनुसन्धिर्विमुच्यते । निरस्तनिह • कृच्छ्रेण भाषितु तत्र जिह्वारोग - वात, पित्त तथा कफ इन तीनों दोपों से तीन प्रकार के कण्टक, चौथा अलास तथा पांचवां उपजिहिका ऐसे जिहा में ५ रोग होते हैं ॥ ३८ ॥

विमर्श: -- वाग्भट जिह्वा में ६ रोग मानता है । शार्ङ्गवर ने भी जिहारोग ६ माने है । अधिजिह्वा अधिक माना है । सुश्रुत ने अधिजिहा को कण्ठरोगों में लिखा है ।

जिह्वाऽनिलेन स्फुटिता प्रसुप्ता भवेच्च शाकच्छदनप्रकाशा ।

पित्तेन पीता परिदह्यते च चिता सरक्कैरपि कण्टकाश्च ॥

कफेन गुर्वी बहुला चिता च मांसोद्गमैः शाल्मलिकण्टकाभैः । त्रिविध जिह्वाकण्टक - वायु के प्रकोप से जिल्हा फट जाती है, सुप्त या रसज्ञान - रहित तथा शाक ( सागवान ) के पत्र के समान खुरदरी हो जाती है । पित्तप्रकोप से वर्ण में पीली, दाहयुक्त तथा लालवर्ण के कण्टकों ( अङ्कुरों ) से व्याप्त हो जाती है । कफ के प्रकोप से भारी, मोटी और सेमल के कांटों के समान मासाङ्कुरों से व्याप्त हो जाती है ॥ ३ ९ ॥ विमर्श- ये तीनों प्रकार के जिह्वाकण्टक रोग जीर्णजिह्वाशोथ ( Chronia Superficial Glossitis ) से समता रखते हैं । वातज जिहाकण्टक Craoked या Fissured tongue, पित्तज | जिह्वाकण्टक Red glazed tongue तथा कफज जिल्हाकण्टक । को Ichthyosis कहते हैं । डाक्टरी में जिह्वारोग ( Glossitis ) के वणन कई प्रकार से हैं । ( १ ) Acute superficial type यह सारे मुखपाक से होता है । ( २ ) Acute patenohyma • tous type. यह पारदसेवन, आघात, दुष्टन्त्रण तथा पूयजनक जीवाणु ( Strepto cocons pyogenes ) के सक्रमण से होता है । | इसी तरह जीर्ण प्रकार ( Chronic type ) भी होते हैं जिनके मुख्य कारण फिरङ्ग को तृतीयावस्था, अधिक धूम्रपान, दन्त रोगों के उपसर्ग या रगड, तेज मयों का सेवन, अधिक मिर्च मसालेदार शाकादि सेवन होता है । कभी - कभी ये जिह्वाशोथ घातकार्बुद ( Epetheloma ) में परिणत हो जाते हैं ।

जिह्वातले यः श्वयथुः प्रगाढः सोऽलास संज्ञः कफरक्तमूर्त्तिः ।

जिह्वां स तु स्तम्भयति प्रवृद्धो मूले तु जिह्वा भृशमेति पाकम् ॥

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निदानस्थानम् । २ ९ ७ अलाल - जिह्वा के तल ( नीचे के ) भाग में कफ और रक्त के कारण गम्भीर शोथ उत्पन्न होता है, उसे अलास कहते हैं तथा यह बढ़कर जिह्वा को जकड देता है तथा जिह्वा के मूलभाग में तीव्र पाक हो जाता है ॥ ४० ॥

विमर्गः - अलास त्रिदोषजन्य तथा असाध्य होता है । मन्त्र कफरक्तयो. प्राधान्य, जिह्वास्तम्भेन वायुरम्यस्ति, नृन पाकेन पित्तमध्य-स्ति, अत एव त्रिदोषन्वेनासाध्यत्वमपि दुरुपक्रमत्वात् । ( उल्हणः ) । डा ० श्रीघाणेकरजी ने इसे Sublingual abscess माना है । वाग्भट में मत्स्यगन्धी तथा मांसनाशक इसकी दो विशेषताएँ लिखी हैं— कफपित्ताद्र्धः शोफो जिह्वास्तम्भकृदुन्नतः । मत्स्यगन्धिर्म वेत् पक्त्रः सोऽलसो मासत्रातन ॥ ( अ. उ २१ ) । इससे इसक जिह्वा का घातक अर्बुद ( Carcinoma ) समझ सकते हैं ।

जिह्वाग्ररूपः श्वयथुर्हि जिह्वामुन्नम्य जातः कफरक्तयोनिः ।

प्रसेककण्डूपरिदाहयुक्ता प्रकथ्यतेऽसावुपजिह्निकेति ॥

उपजिह्निका— कफ और रक्त के प्रकोप से होने वाला, बिा के अग्रभाग के समान स्वरूप का तथा जिह्वा को ऊपर उठा कर उत्पन्न हुआ शोथ जिससे लार टपकती हो, तथा जो कण्डु और दाह से युक्त हो उसे उपजिह्निका कहते हैं ॥ ४१ ॥

विमर्शः — चरक ने इस रोग को केवल कफजन्य माना है – यस्य श्लेष्मा प्रकुपिनो जिह्वामूलेऽवतिष्ठते । आशु सजनयेच्द्रोथ नायतेऽस्योपजिह्विका ॥ ( च. अ. सू. १८ ) । वाग्भट में इसी को अधिनिहा कहा है – ' अविजिङ सन्ककण्डूवाक्याहारविघातकृत् ' डाक्टरी में इसको रेन्यूला ( Ranals ) कहते हैं । इसमें यहां की लसीकावाहिनियों में अवरोध उत्पन्न होने से जिहा के नीचे ' शोथ उत्पन्न होकर एक ग्रन्थि का रूप हो जाता है जिससे जिह्वा ऊंची उठ जाती है । यह स्थानान्तरित हो जाती है । तालुगतास्तु —– गलशुण्डिका, तुण्डिकेरी, अध्रुप:, मांसकच्छपः, अर्बुद, मांसङ्घातः, तालुपुप्पुटः, तालु-शोपः, तालुपाक इति ॥ ४२ ॥

तालुगत रोग गलशुण्डिका, तुण्डिकेरी, अधुप, मांस-कच्छप, अर्बुद, मांससंघात, तालुपुष्पुट, तालुशोप और तालु पाक ऐसे तालु में नौ रोग होते हैं ॥ ४२ ॥

विमर्श: - भावप्रकाश ने भी सुश्रुतानुसार तालुरोग ९ ही माने हैं । वाग्भट ने तालु में ८ रोग माने हैं । शाघर है ने भी ८ ही माने हैं - थाऽष्टौ तालुमा नहीं श्लेष्मासृग्भ्यां तालुमूलात् प्रवृद्धो दीर्घः शोफो ध्मातबस्तिप्रकाशः । तृष्णाकासश्वासकृत्सम्प्रदिष्टो व्याधिवैद्यैः कण्ठशुण्डीति नाम्ना ॥ ४३ ॥

शुण्डिका - कफ और रक्त के प्रकोप के कारण तालुमूल से उत्पन्न होकर विवृद्ध हुआ तथा फूली हुई बस्ति ( या मशक ) के स्वरूप का और तृष्णा, कास तथा श्वास को करने वाले रोग को वैद्य कण्ठशुण्डी नाम से कहते हैं ॥ ४३ ॥

विमर्श. - गलशुण्डी या कण्ठशुण्डी ( Elongated uvula ) -कारण - पुरानी खांसी या वात कास के कारण होता है । लेटते समय गलझुण्डी गले के पिछले भाग को छूती है जिससे क्षोभ ( Irritation ) उत्पन्न हो जाने से खांसी अधिक चलती है । इसमें वमन भी हो जाता है - कण्ठोपरोधतृकासव मिकूद् गल • शुण्डिका ' ( अस. ) । ३८ सु ० शोकः स्थूलस्तोददाहप्रपाकी प्रागुक्ताभ्यां तुण्डिकेरी मता तु । शोफः स्तन्धो लोहितस्तालुदेशे रक्ताब्ज्ञेयः सोऽध्रुषो रुग्ज्वराढ्य ं ॥ ४४ ॥

तुण्डिकेरी - पूर्व में कहे हुये कफ और रक्त के प्रकोप से उत्पन्न तथा सुई चुभोने की सी पीढा, दाह और पाक से युक्त स्थूल शोथ तुण्डिकेरी कहा जाता है । अनुप - तालुप्रदेश में रक्त की दृष्टि से उत्पन्न तथा तीव्र पीडा और ज्वर से युक् एवं लाल रंग का कठिन शोथ अधुप जानना चाहिये ॥ ४४ ॥

विमर्श: - तुण्डिकेरी शब्द का अर्थ वनकार्पासीफल है तथा इस रोग का स्वरूप इसी के समान होता है अत एव इसे भी तुण्डिकेरी कह दिया है । अष्टा में इसको कार्पासीफल-सन्निभ नाम से ही लिखा है- हनुमन्ध्याश्रित कष्ठे कार्पासीफ-लसन्निभ । पिच्छिलो मन्दरक शोफ कठिनस्तुण्डिकेरिका । वाग्भट में इसे कण्ठरोगों में लिखा है । तुण्डिकेरी का साम्य Enlarged tonsil or Tonsillitis के साथ हो सकता है । इसकी उत्पत्ति में विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं का उपसर्ग कारण होता है । अधुष को तालुप्रकोप ( Palatatas ) कह सकते हैं । कूर्मोत्सन्नोऽवेदनोऽशीघ्रजन्मा-' रक्तो ज्ञेयः कच्छपः श्लेष्मणा स्यात् । पद्माकारं तालुमध्ये शोफं विद्याद्रक्तार्बुदं प्रोक्तलिङ्गम् ॥ ४५ ॥

कच्छप - कफ के प्रकोप से उत्पन्न तथा कछुए की भांति ऊपर को उठा हुआ, पीडारहित तथा धीरे - धीरे बढ़ने वाला कच्छप रोग होता है । अर्बुद रक्त की दृष्टि से तालु के मध्य में कमल के समान आकार वाले तथा पूर्वोक्त अर्बुद के लक्षणों से युक्त रोग को अवुद जानो ॥ ४५ ॥

विमर्श: - कच्छप - इसकी कृच्छ्रसाध्यता, दीर्घकालीन वृद्धि और छेदन - चिकित्सा का विचार करने से यह एक प्रकार का घातक अर्बुद है, इसे Adenoma of the palate अथवा तालु का सार्कोमा ( Sarcoma ) कह सकते हैं । अर्बुद--भोजोक्त लक्षणन् - उपर्येव भवेन्नद्धो यथा पद्मस्य कर्णिका । पार्श्वतश्चा-कुरेदनोसा चाप्यवसीदति प्रकार का तालु ॥ इलेष्मरक्तसमुत्थान का Cancer है तत्ताल्वर्बुदसचि- । ॥ यह एक दुष्टं मांसं श्लेष्मणा नीरुजं च

ताल्वन्तःस्थं मांससङ्घातमाहुः ।

नीरुक् स्थायी कोलमात्रः कफात् स्या-न्मेदोयुक्तात् पुप्पुटस्तालुदेशे ॥ ४६ ॥

मांससंघात - कफ के प्रकोप से तालु के अन्तःप्रदेश में दूषित हुये मांस को जो कि पीडारहित हो मांससंघात कहते हैं । तालु पुप्पुट - मेदायुक्त कफ के प्रकोप से तालुप्रदेश में पीढारहित, स्थिर तथा कोल ( बदर ) के प्रमाण का पुष्पुट रोग होता है । विमर्श -- मांससंघात के लक्षण Fibroma ( सौम्य अर्बुद ) के समान हैं । तालुपुप्पुर को Epuls of the palate कह सकते हैं । यह तालु मे होने वाला सद्भव ग्रन्थिरूप ( Cystic swelling ) है । शोपोऽत्यर्थं दीर्यते चापि तालु श्वासो वातात्तालुशोपः सपित्तात् ।

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२६८ सुश्रुतसहिता । पित्तं कुर्यात् पाकमत्यर्थघोरं तालुन्येनं तालुपाकं वदन्ति ॥ ४७ ॥

तालुशोप - पित्तसहित बात के प्रकोप अत्यन्त शोप ( खुश्की ) होता है तथा वह विदीर्ण भी हो जाता है एवं श्वाम्म का क्ष्ट होता है । इसे तालुशोप कहते हैं | | तालुपाक - प्रकुपित पित्त तालुप्रदेश में अत्यन्त भयकर पाक उत्पन्न करता है, इसको तालुपाक रोग कहते हैं ॥ ४७ ॥

विमर्शः- तालुशोप - भोज ने केवल बात से तालुशोष होना लिखा है — ' तालुद्योषो भवेद्वानात् ' वाग्भट ने वातपित्तज्वराया-सेस्नालुशोपम्नद्रायः । तालुपाक का साम्य Ulceration of the palate से हो सकता है । इसके चार भेद होते हैं । ( १ ) Simple या साधारण, ( २ ) फिरङ्गजन्य ( Syphilitic ) फिरन की द्वितीयावस्था में दोनों तालु में अनेक व्रण वन जाते हैं तथा तृतीयावस्था में गया का रूप होकर फूट के Ulcer ( छिद्र ) बन जाता है । ( ३ ) चर्मकीलजन्य ( Lupondal ) तालुपाक-यह प्रायः बच्चों में होता है । ( ४ ) घातकार्बुद ( Epithelioma ) के कारण भी तालुपाक हो सकता है । कण्ठगतास्तु - रोहिण्यः पञ्च, कण्ठशालूकम्, अत्रि-जिह्नो, वलयो, बलास, एकवृन्दो, वृन्द, शतघ्नी, गिलायुः, गलविद्रधिः, गलौघः, स्वरनो, मासतानो, विदारी चेति ॥ ४८ ॥

कण्टगतरोग - पांच प्रकार की रोहिणी, कण्टशालक, अधि-जिह्न, बल्य, बलास, एकवृन्द, वृन्द, शतघ्नी, गिलायु, गलवि दधि, गौध, स्वरन, मांसतान और बिढारी ऐसे सत्तरह होते हैं । विमर्श: - शायर ने कण्टरोगों को गलरोग नाम से लिखा है तथा इन्ह १८ माना है— रोगास्तथा न्याना अष्टाद-शमिता बुधै । रक्तजरोहिणी की जगह मेदोजरोहिणी मानी है । वाग्भट तथा भावप्रकाश ने भो १८ प्रकार के कण्ठरोग माने हैं । गलेऽनिलः पित्तकफ च मृच्छितो पृथक् समस्ताश्च तथैव शोणितम् । प्रदृष्य मांसं गलरोधिनोऽङ्कुरान् सृजन्ति यान् साऽसुहरा हि रोहिणी ॥ ४६ ॥

पृथक पृथक तथा तीनों मिलकर एवं रक्त थे प्रकुपित होकर गले में मांस को दूषित करके गले के मार्ग में रुकावट करने वाले जिन अनुरों को उत्पन्न करते हैं उसे प्राणनाशक रोहिणी नामक रोग कहते हैं । विमर्शः -- चरक ने रोहिणी को त्रिदोपजन्य मानी है तथा जिह्वामूल में प्रकुपित दोषों का अवस्थान माना है और कुशल वैद्य द्वारा चिकित्मा न करने से तीन रात में ही प्राणहारक होती है ऐसा लिखा है- त्रानपित्तकफा यस्य युगपत कुपितास्त्रय । निहामूलेऽवतिष्ठन्ते वि. समुच्छिता ॥ जनयन्ति भृश शोध वेदनाश्च पृथग्विनातं शीघ्रकारिण रोग रोहिणोनि विनिर्दिशेत् ॥ त्रिरात्र परम तस्य जन्तोर्भपनि जीवितम् । कुशलेन त्वनुकान्त क्षिप्र सम्पद्यते मुली ॥ ( च ० सू ० अ ० १८ ) । रोहिणी को डिफ्थीरिया ( Diphtheria ) Diphtherial inflamation of the agroat कहते हैं । इसका प्रधान कारण डिफ्थीरिया बेसीस ( Diphtheria Bacillus ) नामक ढण्ढाकार जीवाणु है । इस रोग में गले के भीतर एक झिल्ली बनती है जो स्वरयन्त्र तथा नासा में फैल कर श्वासावरोध करती है । यह मिली ग्रस निका, नासिका, स्वरयन्त्र, श्वासमार्ग, हृदय, आमाशय, फेफडे तथा ,, भग आदि स्थानों पर भी बन सकती है । इस झिल्ली में रोग के जीवाणु होते हैं जो बोलने, छींकने तथा खांसने के समय थूक तथा क्षिप्ली के सूचम कर्णों के साथ बाहर आते हैं और पास में बैठे हुये मनुष्यों के गले में वायु के साथ प्रविष्ट होकर रोग पैदा करते हैं । रोहिणी रोग बच्चों में ज्यादा होता है । प्रायः सण बच्चे के इस्तेमाल में आये हुए पेन्सिल, रुमाल, तौलिया, गिलास आदि से स्वस्थ बच्चों में फैलती है । लक्षण - ज्वर तीघ्र, प्रायः १०४, नाडी तेज, हृदय दुर्बल होता है । बोलने में असमर्थ, श्वासकृच्छ्रता आदि । जिह्वां समन्ताद् भृशवेदना ये मांसाहूराः कण्ठनिरोधिनः स्युः । तां रोहिणीं वातकृतां वदन्ति वातात्मकोपद्रवगाढयुक्ताम् ॥ ५० ॥

वातरोहिणी - जिह्वा के चारों ओर, अधिक पीड़ाकारक, कण्ठावरोधक तथा वात के भयङ्कर उपद्रवों से युक्त जो मांसाहर उत्पन्न होते हैं उसे वातजन्य रोहिणी कहते हैं ॥५० ॥

विमर्शात्मकोपद्रवगाढयुक्तानान्मका उपद्रवाः कम्प-विनामरतम्मादयस्तैर निश्चयमनुगना । ( मधुकोपः ) । रोहिणी त्रिदो-नही होती है किन्तु यहां ' यपटेशन्तु भूयता ' इस न्याय से उसके भेद किये हैं । उपद्रव - ( Ccmpications ) - श्वासावरोध । या हृदयावसाद प्रधान मारक उपद्रव हैं । भाग्य से बच जाने पर तालु और प्रसनिका की पेशियों का घात होने से स्वर अनुनासिक हो जाता है तथा ग्रासादि के निगलने में कष्ट होता है । नेत्र की पेशियों का घात होने से भंगापन ( द्विधादृष्टि ) हो जाती है किसी किसी में पक्षाघात ( Hemiplegia ) तथा पह्नुता ( Paraplegia ) भी हो जाती है । क्षिप्रोद्गमा चिप्रविदाहपाका तीव्रन्वरा पित्तनिमित्तजा स्यात् । स्रोतोनिरोधिन्यपि मन्दपाका गुर्वी स्थिरा सा कफसम्भवा वै पित्तकफन रोहिणी - शीघ्र पैदा होने वाली, शीघ्र ही दाह और पाक करने वाली तथा तीव्रज्वर से युक्त रोहिणी पित्त से उत्पन्न होती है । श्वासमार्ग आदि स्रोतसों का अवरोध करने वाली, मन्दपाक से युक्त, भारी तथा अधिक नहीं फैलने वाली कफज रोहिणी होती है ॥ ५१ ॥

गम्भीरपाकाऽप्रतिवारवीर्या

त्रिदोपलिङ्गा त्रयसम्भवा स्यात् ।

स्फोटाचिता पित्तसमानलिङ्गाऽ-साध्या प्रदिष्टा रुधिरात्मिकेयम् ॥ ५२ ॥

त्रिदोषज तथा रक्तज रोहिणी - जिसमें भयङ्कर पाक हो या गहरी धातुओं में पाक हो, जिसका वेग औषधादि से रोकना असम्भव हो, तीनों दोपों के लक्षण जिसमें हों वह सन्निपात-जन्य रोहिणी होती है । गले में स्फोट ( फुन्सियां ) हों तथा पित्त के शेप शीघ्र दाह - पाकादि लक्षण जिसमें हों उसे रुधिर ( रक्त ) जन्य रोहिणी कहते हैं तथा यह असाध्य होती है ॥ ५२ ॥

विमर्श: - ढाक्टरी में रोहिणी । स्थानानुसार अनेक भेद किये गये हैं । ( १ ) गलतोरणिकागत रोहिणी ( Fancial ) ( २ ) स्वरयन्त्रगतरोहिणी, ( ३ ) अनुनासिक रोहिणी, ( ४ ) कर्ण-

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निदानस्थानम् । २ ९९ रोहियो, ( ६ ) नेत्रकलागन रोहिनी ( Conjunctival ) ( ६ ) योनि से प्रनोकार नहीं करने योग्य अत एव विवर्जनीय वलय

नगि, ( ७ ) गप रोहिगी । त्रिदोषज्ञ रोहिणी रोग कहते हैं ॥ ७७ ॥

सद्योमारक होती है— हन्ति व्हावा । विमर्श - अन्नगतिः - अन्नम्य गतिर्यन खोनमा मोन्नगनिरन्न-प्रकाशन निमन्भूता सप्ताह । ( खरनादः ) 1 | वहमार्गः अस्य प्रवेशो बा । ( मधुकोषः ) । वलय का साम्य चरक चरक ने आखिरी मर्यादा तीन रात की लिखी है - | चि ० अ ०१२ में वर्णित विज्ञालिका से है नन्दी चिबुके पर्स तस्य जन्तोर्भवति जीवनम् । वानाद विवाद का त्रियोगले च माहरा वसोच्छु म । शोफ मृगार्निन्दु fasto का ईरितः अन्ये यो मन्यत वास्निन्तः क्रियां विना ॥ ( हरक्षण: ) । प्रतिविष ( Artitonn ), स्को के इन श्वासावरोध में प्रमुनिका - भेदन ( Trashes ' orny ) Penicflin के सुबह — धाम इङ्गेदान, मक्काट्टाईड आदि के प्रयोगों से इसकी असाध्यता बहुत कुछ कम हो गई है अतः इस चिक्रिया का लाभ लेना चाहिये । कोलास्थिमान्त्रः कफमम्भको यो प्रन्थिर्गत कण्टकशुकभूतः खरःस्थिरःरान्ननिमानसाव्यन्तं कण्ठशालूकमिति ब्रुवन्ति । कळगावल —– कोल ( बडे बदरीफल ) की गुठली के स्वरूप की गले में कके कारण हुई तथा कण्टक अथवा शुक्र के समान, स्वर, स्थिर और शस्त्रप्रयोग से साध्य ग्रन्थि को मालूक कहते हैं ॥ ५३ ॥

विमर्श - शादूक का अर्थ कमलकन्द होता है । कष्ट में शालूक ( एडिनोइड्स Adenoides ) कहते है | इस रोग से गले में कार्ड या गृक के समान प्रतीत होता है- शुकण्डकवत् कटे ' ( ० सं ० ) । ' लवद् अनिताशन ' ( अ ० सं ० ) । यह विकार गले के नाम्रापश्चिम भाग में होता है जिससे नासामार्ग का अवरोध होता है - इसी लिये शालूक शब्द का प्रयोग किया है — ' ग्राको नगरोवन ' हुसमें रोगी सुगंद के साथ सुख से सांस लेना है । ' अन्टर्गले छुरिकान्विन् शाल्लमुच्छ्रद्वामविरो - वारि ( च ० वि ० अ ० १३ ) | यह रोग प्रायः बच्चों में होना है । तीव्रमनिश्याय, नामान्नाद ( Nasal caria ), रोहिणी, रोमान्तिका आदि के कारण होता है । छन्नग —— श्वासमार्ग बन्द होने से सुख खोल कर श्वास लेना, खोते समय खुरद्धि से सांस लेना, भोजन में कष्ट, अधिक देर तक सुन्न खुला रखने में उसकी ए के आकार की आकृति हो नाना, मन्द्रञ्चर आदि लग होते हैं ।

जिह्वाग्ररूपः श्वयथुः कस्तत्तु जिह्वाप्रबन्योपरि रक्तमिश्रात् ।

योऽविजिह्नः खलु रोग एप विवर्ज बेदागतपाक्रमेनम् ॥

अविजिह्न – रक्तमिश्रित कफ की दृष्टि के कारण जिह्वामूल । के ऊपर, विह्ना के अग्रभाग के आकार का शोथ अविजिह्न रोग है । संक्रमण से पाक हो जाने पर इसकी चिकित्सा न करें ॥ ५ ॥

विमर्शः -- अष्टाइन्संग्रहो लक्षण — विनिः सन्कूकण्डूवा-व्याहारविधा | चरक तथा वाग्भट में जिह्वोपरिगोय को ' टपजिह्ना ' तथा नीचे होने वाले श्रीय को ' अविजिह्वा ' लिखा है - ' जिहॉ रिचदुपजिविका बना कमाववस्तादनिजिडिका च ' ( च ० चि ०० १२ ) । डाक्टरी में जिला के ऊपर होने वाले इस प्रकार । शोथ को Epiglottitis कह सकते हैं । । स्वादन्याद गले चेली न ॥ वाग्भटने गलौच तथा वय को एक ही रोग माना है - ' वलयं नातिक्क् शोपम्नहृद्वैवान्तोन्ननः ।

गले तु शोफंकुनः प्रवृद्धी श्लेष्मा निलो श्वासरुजोपपन्नम् ।

मर्मच्छिदं दुस्तरमेतदाहुर्बलासमंत्र निपुणा विकारम् ॥

चन्द्राम - कफ तथा वायु विवृद्ध होकर गले में श्वास तथा वेदनायुक्त शीय दत्पन्न करते हैं, निपुण वैद्य इसको मर्मवाती । तथा दुनिकिन्स्य बलास रोग कहते हैं ॥ ५६ ॥

वृत्तोन्नतोच. श्वयथुः सदाहः कुण्डयन्त्रितोऽपाक्यनृदुर्गुरुश्च ।

नान्नैकवृन्दः परिकीर्तितोऽसौ व्याधिर्बलासनतजप्रसूतः ॥

एकवृन्द - बलास ( कफ ) तथा चतज ( रक्त ) के प्रकोप से गले में उत्पन्न गोल, टन्न, दाहयुक्त, कण्डुयुक्त, पाकरहित, मुलायम तथा भारी शोथ को नाम से एकवृन्द रोग कहते हैं ॥ ७७ ॥

समुन्नतं वृत्तममन्ददाहं नीत्रज्वर वृन्दमुदाहरन्ति ।

नं चापि पित्तनतज प्रकोपाद्विद्यान् सतीदं पवनाम्नज तु ॥

वृन्द- अधिक टटा हुला, गोल, अधिक दाहयुक्त तथा । तीव्रज्वर - युक्त शोथ को वृन्द कहते । इसे पित्त तथा रक्त के प्रकोप से उत्पन्न हुआ जानो । यदि इसमें सूई चुभोने की सी पीडा हो तो वायु तथा रक्त से उत्पन्न हुआ जानो ॥ ७८ ॥:

वतिर्थना कण्ठनिरोधिनी या चिताऽतिमात्रं पिशिनप्ररोहैः । नानामजोच्छ्रायकरी त्रिदोषान्ज्ञेया शतन्नीय शतघ्न्यसाव्या अवनी – त्रिदोषप्रकोप के कारण वनस्वरूप की वर्ति जो कि कष्ट ( मार्ग ) को रोकती हो तथा refer मांसा से युक्त हो एवं अनेक प्रकार की पीड़ा तथा उच्छ्राय ( उन्नतता ) को पैदा करनेवाली तथा मतली के समान ग्रन्थि दिखाई देती हो उसे असाध्य शतनी कहते हैं ॥ ५ ९ ॥ विमर्श - अनकण्टक्स च्छिन्ना शनी महती शिला । वचत्य-व्याधि को शतस्ती कह सकते हैं । भोजोक्तवर्णनंनतिकफा दुष्टां मांसाङ्कुरसमाचिताम् | मध्यकच या वर्ति जनयन्ति -क्षिताः ॥ नेव गले विद्वा शतव्येण न सिद्ध्यति ॥ ग्रन्थिले त्वामलकास्थिमात्रः स्थिरोऽल्परुक् स्यात् कफरक्तमूर्त्तिः संलक्ष्यते सक्तमिवाशनं च स शन्न्रसाव्यत्तु गिलायुसन्नः ॥ ६० ॥

विलायु कफ तथा रक्त के प्रकोप से गले के भीतर उत्पन्न आंवले की गुठली के बराबर तथा स्थिर, स्वल्प पीडायुक्त और जैन भोजन का टुकड़ा गले में अटका हुआ हो ऐसा प्रतीत होनेवाली ग्रन्थि शस्त्रकर्म से साध्य गिलायु है ॥ ६० ॥

बलास एवायतमुन्नतं च शोफं करोत्यन्नगति निवार्य | सर्व गलं व्याप्य समुत्थितो यः शोफो रुजी यत्र च सन्ति सर्वा.। तं सर्वयैगप्रतिरवीर्यं विवजनीयं वलयं वदन्ति ॥ स सर्वदोषो गलविद्रधिस्तु तस्यैव तुल्यः खलु सर्वजस्य ॥ वलय - कफ ही प्रकुपित होकर अन्नमार्ग को रोक कर गले गलविवि सर्वदोषों के प्रकोप से सम्पूर्ण गले को में विस्तृत तथा ऊंचा शोध उत्पन्न करता है इसको सर्व प्रकार | व्याप्तकर उत्पन्न शोय जिस में सर्वदोषों की पीढाएं प्रतीत

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३०० सुश्रुतसंहिता । हों वह सर्वदोषजन्य गलविद्रधि रोग है तथा त्रिदोषजन्य विद्रधि के समान लक्षणों से युक्त होता है ॥ ६१ ॥

विमर्श: -गलविद्रधि के लक्षण ( Pharyngeal abscess । अथवा Peritonsilor abscess ) से मिलते हैं ।

शोफो महानन्नजलावरोधी तीव्रज्वरो वातगते निहन्ता ।

कफेन जातो रुधिरान्वितेन गले गलौचः परिकीर्त्यतेऽसौ ॥

गलौच - रक्तसहित कफ के प्रकोप से गले में उत्पन्न महान शोथ जो कि अन्न तथा जल की गति को रोक देता हो, तीनज्वर से युक्त हो तथा कण्ठदेशस्य उदान वायु के सचार ( गति ) का भी विनाश कर दे उसे गलौव रोग कहते हैं ॥ ६२ ॥

योऽतिप्रताम्यञ श्वसिति प्रसक्तं भिन्नस्वरः शुष्कविमुक्तकण्ठः कफोर्पादग्धेष्वनिलायनेषु ज्ञेयः स रोग. श्वसनात् स्वरघ्नः । स्वरन्न - जो मनुष्य अत्यन्त कष्ट के साथ निरन्तर ( प्रसक्त ) सास लेता हो तथा स्वर भिन्न हो गया हो तथा जिसका कण्ठ खुश्क और विमुक्त सा प्रतीत हो तथा वायु के मार्ग ( स्रोतस ) कफ से लिप्त हो गये हों उस के श्वसन ( बात ) के प्रकोप से उत्पन्न स्त्ररम्न रोग जानना चाहिये ॥ ६३ ॥

प्रतानवान् य ' श्वयथु सुकष्टो गलोपरोधं कुरुते क्रमेण । स मांसतानः कथितोऽवलम्बी प्राणप्रगुन् सर्वकृतो विकारः मांसतान - सर्व दोषों के प्रकोप के कारण गले में फैलने घाटा, अतिकष्टदायक शोथ जो कि क्रमश ' बढकर गले में अवरोध उत्पन्न कर देता है तथा जो बाहर से नीचे लटकता हुआ दिखाई दे उसे प्राणनाशक मांसतान कहते हैं ॥ ६४ ॥

सदाहतोदं श्वयथु सरक्तमन्तर्गले पूतिविशीर्णमासम् । पित्तेन विद्याद्वदने विदारीं पार्श्वे विशेषात् स तु येन शेते । विहारी - पित्त के प्रकोप से मुख में गले के भीतर दाह तया चुभोने की सी पीड़ा से युक्त तथा खालवर्ण एव दुर्गन्धित तथा विदीर्णं ( छिन्न - भिन्न ) मांस जिस में हो जाय ऐसे शोथ को विदारी जानो । जिम पार्श्व से मनुष्य अधिक सोता हो उसी पार की तरफ गले में यह रोग होता है ॥ ६५ ॥

विमर्श - विहारीको ( Gangrenous stomatitis अथवा caneru moris of Noma ) कह सकते हैं इसमें नीर्जीवाङ्गता हो जाती है ।

सर्वसररोगः ।

सर्वसरास्तु वातपित्तकफशोणितनिमित्ताः ॥ ६६ ॥

सर्वमररोग चात, पित्त, कफ और रक के कारण सर्वसर रोग होते हैं ॥ ६६ ॥

विमर्श. - सर्वनर - ( २ ) मुखमनीष्ठादिसप्तस्थानव्यापकतया सर्व मरत्वं चैवन् । ( मधुकोषः ) । ( २ ) सर्वस्मिन् सुने ये भवन्ति ते

सर्वसरा । मनुग्वेऽन्भिन् नरतीनि सर्वसर । ( शार्ङ्गधरे आढमल ) ॥

इति श्रीमुश्रुतसंहिताया साहित्यायुर्वेदाचार्य सम्पूर्ण मुख में व्याप्त होकर होनेवाले रोगों को सर्वसर रोग कहते हैं । यह एक प्रकार से मुखपाक ( Stomatitis ) है जो कई कारणों से उत्पन्न होता है । भेद - सुश्रुत ने इस अध्याय के पूर्व में इनकी सख्या तीन लिखी है । कुछ लोग यहां वात, पित्त, कफ और रक्त ऐसे चार कारणों से इसे चार प्रकार का मानते हैं किन्तु मूल ग्रन्थ तथा ढल्हण तीन ही होना मानते हैं- ' रक्तेन पित्तोटित एक एव ' ( सुश्रुतः ) । सर्वसरा. किन्तु त्रय-एव । ( डल्हणः ) । शार्ङ्गधर ने सर्वसर रोगों ' मुखान्त सम्भव-| रोग नाम से आठ भेद माने हैं - मुसान्तसम्भवा रोगा अष्टौ ख्याता महर्षिभिः । मुखपाको भवेद्वातात्पित्तात्तद्वत्कफादपि ॥ रक्ताश्च सन्निपानाश्च पूत्यास्योदर्ध्वगुदादपि । अर्बुदश्चेति । वाग्भट ने इस के पांच भेद माने हैं किन्तु पूतिमुख, उद्र्ध्वगुढ का भी वर्णन किया है । भावप्रकाश ने सुश्रुत की तरह तीन ही भेद माने है— पृथग्दो पैत्रयो रोगा ' समस्तमुखजाः स्मृता ॥ डाक्टरी में मुखपाक के मुख्य निम्न भेद होते हैं - ( १ ) स्त्रावी ( Catarrhal ), ( २ ) निर्जीवातजन्य ( Gangrenous ), ( ३ ) पारद सेवनजन्य सुखपाक, ( ४ ) फिरङ्गजन्य मुखपाक ( Syph1-|| 1t10 ) तथा मन्दाग्नि, यकृत की खराबी, आन्त्र को खराबी, सग्रहणी आदि रोगों के कारण भी मुखपाक हो जाता है ।

स्फोटैः सतोदैर्घदन समन्ताद्यस्याचितं सर्वसरः स वातात् ।

रक्त. सदा हैस्तनुभि सपीतैर्यस्याचितं चापिस पित्तकोपात् ॥

वातजमुखपाक - जिस मनुष्य का सारा मुख पीडायुक्त स्फोट ( व्रणों ) से व्याप्त हो जाता है वह बातजसर्वसर रोग है । पित्तजमुखपाक - जिसका सारा मुख दाहयुक्त, लाल तथा पीले रंग के स्फोट ( व्रणों ) से व्याप्त हो जाता है, वह पित्तप्रकोपजन्य सर्वसर रोग है ॥ ६७ ॥

कएड्यूतैरल्परुजे, सवर्णैर्यस्याचितं चापि स वै कफेन ।

। रक्तेन पित्तोदित एक एव कैश्चित् प्रदिष्टो मुखपाकसंज्ञः ॥

इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण महर्षिण सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने मुखरोगनिदानं नाम पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

कफजमुखपाक -- जिस मनुष्य का सारा मुख कण्डुयुक्त, अल्पपीडादायक तथा समान वर्ण के स्फोटों ( व्रणों ) से व्याप्त हो जाता है, वह कफ से उत्पन्न सर्वसर रोग है । रक्त की खरावी से पृथक् रोग न होकर जो पेंत्तिक सर्वसर रोग कहा है, वही मुखपाकसज्ञक सर्वसर रोग है ॥ ६८ ॥

विमर्श - पित्तोदित - मुसस्य पित्तजे पाके दाहोपो तित्त-वक्त्रता | क्षारोक्षितचनसमा व्रणास्तद्वच्च रक्तजे ॥ ( अ ० सं ० ) । इन्दौरनगरीयश्रीराजकुमारसिंहाऽऽयुर्वेद - साहित्यरत्न - काव्यपुराणतीर्थादिलच्धाने कपदवीकेन, अनेकायुर्वेदग्रन्थसम्पादकेन स्याऽऽयुर्वेदुकाजस्य च भूतपूर्वाध्यक्षण कालेजस्य, जयपुरीयदिगम्बरजैनसंस्कृतकालेजीयाऽऽयुर्वेद रामगढस्याऽऽयुर्वेद महाविद्यालयस्य गुरुकुलका गढी ( हरद्वार ) मेदपाटदेश ( मेवाड़ ) वासिना, श्रीकृष्णतनुजेन गुर्जरगोदन श्री अम्बिकादत्तशास्त्रिणा विभागस्याध्यक्षेण, तवमन्दीपिकाभापाया निदानस्थाने मुखरोगनिदान त्रिरचितायामायुर्वेद-नाम पोढशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

समाप्तञ्चेदं निदानस्थानम् ।

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॥ श्रीः ॥ काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १५६ महर्षिणा सुश्रुतेन विरचिता सुश्रुतसंहिता ' आयुर्वेदतत्त्वसन् दीपिका ' हिन्दीव्याख्या - वैज्ञानिकविमर्शोपेता ( शारीरस्थानम् ) " चौरखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस वाराणसी- १ -apesbc-