श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 351–360

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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प्रकाशक- चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी. मुद्रक - विद्याविलास प्रेस, वाराणसी. संवत् २०१७ ( पुनर्मुद्रणादिका सर्वेऽधिकारा प्रकाशकाधीना. ) Chowkhamba Sanskrit Series Office, P. O. Box 8, Varanasi. ( INDIA ) 1960

पृष्ठ 352

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1 | ft: 11 सुश्रुतसंहिता शारीरस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातः सर्वभूतचिन्ताशारीरं व्याख्यास्याम ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

निदान स्थान समाप्त होने के बाद सर्व प्राणियों की चिन्ता के लिए शारीर स्थान की व्याख्या करेंगे, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है ॥ १-२ ॥ विमर्श: - ' अथ ' यह शब्द मङ्गलवाचक और कल्याण-प्रद होने से प्रत्येक स्थान के प्रारम्भ में ही नहीं किन्तु प्रत्येक अध्याय के प्रारम्भ में भी दिया जाता है । ' अथ ' शब्द का अर्थ उसके बाद भी होता है । निदान स्थान समाप्त होने के पश्चात् सर्व जो भूत स्थावर जङ्गमात्मक अथवा पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश इत्यादि जो पञ्चमहाभूत हैं, उनके लक्षण तथा कार्य जिस शारीरस्थान में वर्णित होंगे उसकी व्याख्या भगवान् धन्वन्तरि के निर्देश के अनुसार महर्षि सुश्रुत इस अध्याय में करते हैं । इस अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति के सिद्धान्त ( Creation Theory ) बताए गये हैं । सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षण-मष्टरूपमखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्तं नाम तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधिष्ठान समुद्र इवौदकानां भावानाम् ॥ ३ ॥

सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम - अव्यक्त सब भूतों का कारण है । किन्तु स्वयं अकारण है अर्थात् जिसका कोई कारण नहीं है । और सत्व, रज, तम गुण वाला तथा अष्टप्रकृत्यात्मक है । अव्यक्त ही सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण है । जैसे

समुद्र जलीय वस्तुओं का आधार है, उसी प्रकार यही एक ।

बहुत से जीवों का आधार है ॥ ३ ॥

विमर्श: -- सृष्टि का क्रम अव्यक्त से आरम्भ होता है । यही सब भूतों का प्रधान कारण है । इसे ही मूलप्रकृति कहते हैं, क्योंकि इसका कोई कारण नहीं है । यह सब भूतों का, जीवों का कारण है किन्तु इसका कोई भी कारण नहीं है । यह किसी का कार्य रूप भी नहीं है । सांख्यकारिका में ' मूल-प्रकृतिरविकृतिः ' ऐसा वर्णन है । इसमें सत्व, रज, तम गुण रहते हैं । ' शिलापुत्रक ' न्याय से इस स्वयम् अव्यक्त को लेकर अष्टप्रकृति होती हैं । अष्टप्रकृति में अव्यक्त, महान्, अहकार और पञ्चभूतों का समावेश है । किसी ने धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, वैराग्य होनता और अनैश्वर्य इनको भाठ प्रकृति माना है । दूसरों के मत से मन, बुद्धि, अहकार और पञ्चमहाभूत आठ प्रकृति है । जैसे- समुद्र सब जलीय वस्तुओं का विषय होता है वैसे ही यह अव्यक्त भी यावत् प्राणिमात्र के शरीर का विषय है । सब प्राणी इससे ही उत्पन्न होते और इसी में विलीन होते हैं । तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तल्लिन एव । तलि-ङ्गाच्च महतस्तल्लक्षण एवाहङ्कार उत्पद्यते, स त्रिविधो वैकारिकस्तैजसो भूतादिरिति ॥ ४ ॥

महान् और अहङ्कार को उत्पत्ति - उस अव्यक्त से महत्तस्व की उत्पत्ति होती है । जो कि अव्यक्त स्वरूप अर्थात् सत्त्व, रज, तम रूप है । उस प्रकार के महत्तत्व से अहङ्कार की उत्पत्ति होती है । वह भी सत्व, रज, तम गुणात्मक है । अहङ्कार वैकारिक, तैजस और भूतादि इस प्रकार से तीन भागों में विभक्त होता है ॥ ४ ॥

विमर्शः -- महत् यह बुद्धितत्व | इसकी उत्पत्ति अव्यक्त से होती है । यह बुद्धितत्व भी सवादि गुणत्रयात्मक है । इस बुद्धितत्व से अभिमान स्वरूप अहङ्कार पैदा होता है । वह सात्त्विक किंवा वैकारिक, राजस या तैजस और भूतादि या तामस स्वरूप होता है ।

पृष्ठ 353

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सुश्रुतसंहिता तत्र वैकारिकादहङ्कारात्तैजससहायात्तल्लक्षणान्येवै -कादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते || ५ || इन्द्रियों की उत्पत्ति — वैकारिक अहङ्कार से, तेजस अहङ्कार की सहायता से ग्यारह इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं जो कि साविक स्वरूप होती हैं ॥ ७ ॥

विमर्शः - अहङ्कार के तीन प्रकार ऊपर बताये हुवे हैं । घे सात्विक, राजस और तामम या वैकारिक, तैजम और भूतादि हैं । उनमें से पहिले दो अहकार मात्त्विक और राजस या वैकारिक और तेजस हैं । इनसे ग्यारह इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है । ये इन्द्रियाँ तेजस और सात्विक गुण वाली हैं क्योंकि वैकारिक अहकार जो साविक स्वरूप है उससे इनको प्राधान्य मे उत्पत्ति होती है । तेजस अहंकार गौण स्वरूप होने से टम्मके गुणों का निर्देश नहीं किया है क्योंकि ' प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति ' यह शास्त्र का न्याय है । तद्यथा - श्रोत्रत्वक्चक्षुजिह्वाघ्राणवाग्घस्तोपस्थपा -युपादमनांसीति । तत्र पर्वाणि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयात्मकं मनः ॥ ६ ॥

इन्द्रियों के प्रकार- इन्द्रियाँ इस प्रकार हैं । कर्ण, चर्म, नेत्र, जीभ, नामिका, वाणी, हाथ, लिंग, गुद, पैर और मन ।

इनमें से पहली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ है । दूसरी पाँच कर्मेन्द्रियाँ ।

हैं । मन ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियात्मक है ॥ ६ ॥

विमर्श. - इन्द्रियों के भेद ज्ञानेन्द्रियात्मक, कर्मेन्द्रियात्मक और उभयात्मक किये हैं । उनमें से चार ज्ञानेन्द्रियाँ गर्दन की ऊपरी भाग में और चर्मं सर्व शरीरव्यापी है । चार कर्मेन्द्रियाँ तो गर्दन के नीचे रहती हैं परन्तु वाणी नो पाँचवी कर्मेन्द्रिय है, वह गर्दन के ऊपर है । इनका वर्गीकरण ज्ञान और कर्म द्वारा किया है, स्थानानुसार नहीं । मन तो ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों में अधिष्टित होकर कार्य करता है इस लिये वह उभयात्मक है । भूतादेरपि तैजससहायात्तल्लक्षणान्येव पञ्च तन्मा-त्राण्युत्पद्यन्ते । तद्यथा - शतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रमिति । तेषां विशेषा शब्द स्पर्श - रूप - रस - गन्धाः, तेभ्यो भूतानि - व्योमा निलान-लजलोर्व्य ', एवमेपा तत्त्वचतुर्विंशतिर्व्याख्याता ॥ ७ ॥

तन्मात्रा, विशेष और भूतों को उत्पत्ति - भूतादि अहङ्कार से तैजस अहकार की सहायता से भूतादि अहङ्कार स्वरूप पाँच तन्मात्रायें उत्पन्न होती है । शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रमतन्मात्रा, गन्धतन्मात्रा ये पाँच तन्मात्राएं हैं । इन तन्मात्राओं के विशेष गुण - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये है । इनसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी उत्पन्न होती हैं । इस प्रकार २४ तत्वों की व्यारया बतायी गई है ॥ ७ ॥

विमर्श - एकादश इन्द्रियाँ, अव्यक्त, महानूं तथा अहंकार निरूपण के बाद ' तन्मात्रा ' का वर्णन किया जाता । यह तन्माना क्या वस्तु है? यह शका उत्पन्न होती है । इसका उत्तर यह है कि -- जब शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श अनुभूत रहते हैं और बाह्य इन्द्रियों से ग्रहण नहीं । किये जाते, तब उन्हें ' तन्मात्रा ' कहते हैं जो कि योगियों को ही प्रत्यक्ष होने हैं । इन सामान्य तन्मात्राओं से विशेष या भेदक गुण उद्भूत होते हैं । वे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध है । विशेष की career निम्न प्रकार की है - जैसी तन्मात्रा की व्याख्या- ' अनुद्भूतस्वभावानि वाह्येन्द्रिया • ग्राह्याणि शब्दादीन्येव तन्मात्राणि - यह है, उसी प्रकार विशेष की व्याख्या- ' अनुभवयोग्यैः सुखदुःखमोहरूपैर्धर्मे विशिष्यन्त इति विशेषा.। तात्पर्य यह है कि तन्मात्राओं का ज्ञान केवल योगियों को ही होता है और विशेषों का ज्ञान । उद्भून होने से सब लोगों को होता है । तन्मात्राओं से पचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है । उनमें भी यह नियम है कि पूर्व पूर्व की तन्मात्रायें आगे आगे की सहायता करती डुई वायु, तेज, जल और पृथ्वी की उत्पत्ति करती हैं । जैसे शब्द तन्मात्रा से आकाश की उत्पत्ति; शब्द और स्पर्श तन्मात्रा से वायु का प्रादुर्भाव; शब्द, स्पर्श और रूप से तेज का उद्भव और शब्द, स्पर्श, रूप और रस तन्मात्रा जल तव तथा पांचों के ऐक्य से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है । ऐसा क्रम है । इस प्रकार अव्यक्त, महान्, अहङ्कार, ग्यारह इन्द्रियां, पांच तन्मात्रायें और पांच महाभूत, इन २४ तत्वों और २५ चाँ पुरुष इनसे इस जगत् का प्रादुर्भाव होता है । चरक के मत से ' मनो दशेन्द्रियाण्यर्था: प्रकृतिश्चाष्टधातु की ' । इस प्रकार २४ तत्वों से जगत् की उत्पत्ति होती है । इससे यह स्पष्ट होता है कि - सुश्रुत सास्यशास्त्र का और चरक वेदान्त का अनुकरण करता है । तत्र - चुद्धीन्द्रियाणां शब्दादयो विषयाः, कर्मेन्द्रि-याणां यथासंख्यं वचनादानानन्दविसर्गविहरणानि ॥६ ॥

इन्द्रियों के विषय – - इनमें से शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श का श्रोत्र, चक्षु, जिह्वा, प्राणेन्द्रिय और त्वचा से यथा-क्रम ग्रहण होता है । कर्मेन्द्रियों से पूर्वकर्मानुसार वोलना, ग्रहण करना, विषय भोग करना, मल त्याग और घूमना-फिरना कार्य किये जाते हैं ॥ ८ ॥

विमर्श. - इन्द्रियों के भेद कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियों से किये हैं । अब उनके विषय बताते हैं । वे इन्द्रियां क्या काम करती है, इनका वर्णन निम्नलिखित यह है-इन्द्रियाँ -ज्ञानेन्द्रियाँ -नाम कार्य १ श्रोत्र १ शब्दग्रहण २ त्वक् २ स्पर्शग्रहण ३ चतु ३ रूपग्रहण जिह्वा ४ रसग्रहण ५ घ्राण ५ गन्धग्रहण कर्मेन्द्रियाँ -नाम कार्य ६ चाकू ( वाणी ) ६ वचन ( बोलना ) ७ हस्त ( हाथ ) ७ आदान ( ग्रहण करना और देना ) ८ उपस्थ ( मूत्रेन्द्रिय ) ८ आनन्द ( विषयोपभोग करना ) ९ पायु ( गुदद्वार ) ९ विसर्ग ( मलत्याग ) १० पाढ़ ( पैर ) १० विहरण ( घूमना फिरना )

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अध्याय १ ] शारीरस्थानम् इस प्रकार ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के विषयों का विवरण हो चुका है । " अव्यक्त महानहङ्कारः पञ्च तन्मात्राणि चेत्यो प्रकृतय ', शेषाः पोडश विकाराः ॥ ६ ॥

प्रकृति और विकृति - अव्यक्त, महान्, अहङ्कार और पुत तन्मात्रा यह भार प्रकृति हैं और शेप सोलह तत्र विकार हैं । विमर्शः- सांख्यकारिका में अव्यक्त को प्रकृति माना है और महत्तत्त्व, अहङ्कार और प तन्मात्रा इनको विकृति के साथ - साथ प्रकृति भी माना है क्योंकि ये अन्य तत्वों को उत्पन्न भी करते हैं । अत एव वे प्रकृति और विकृति दोनों हैं । शेष ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत विकृति हैं । ये किसी तत्र को उत्पन्न नहीं करती है । यथा - मूलप्रकृतिर विकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिचिकृतयः सप्त । शेषा. पोटश विकाराः............. ( सां. का. ) ॥ ९ ॥

स्व स्त्रश्चैषां विषयोऽविभूत स्वयमध्यात्मम्, अधिदैवतम् - अथ बुद्धेर्ब्रह्मा, अहङ्कारस्येश्वरः, मनस-चन्द्रमा, दिशः श्रोत्रस्य, त्वचो वायु, सूर्यश्चक्षुप ', रसनस्याप ', पृथिवी घ्राणम्य, वाचोऽग्निः, हस्तयो रिन्द्रः, पादयोर्त्रिष्णु ', पायोमिंत्र, प्रजापतिरुपस्थ-स्येति ॥ १० ॥

प्रकामान नेग्ट तत्त्वों का विवरण - इनका अपना अपना विषय आविभौतिक है । स्वयम् आध्यात्मिक हैं । अधिदैवत निम्न प्रकार में है । जैसे बुद्धि का देवता ब्रह्मा, अहङ्कार का ईश्वर, मन का चन्द्रमा, श्रोत्र का दिशायें, धर्म का वायु, नेत्र का सूर्य, जिहा का जल, नामिका का पृथ्वी, वाणी का अनि, हार्यो का इन्द्र, पैरों का विष्णु, पायु ( गुढा ) का मित्र और उपस्थ ( शिश्न ) का प्रजापति देवता है ॥ १० ॥

विमर्श -- चतुर्विंशति तत्वों में से केवल तेरह तत्व लेकर उनका विषय आधिभौतिक बताया जाता है किन्तु वे स्वय आध्यात्मिक हैं । इनके देवता भी भिन्न हैं । अब यहाँ यह दशङ्का उठनी है कि चतुर्विंशतितत्वों में से अव्यक्त, पञ्चतन्मात्रा और । पञ्च महाभूतों को क्यों छोड़ दिया? वे आध्यात्मिक है या नहीं? इनका भी न वर्णन ही किया तथा न इनके देवता भी बताये | उत्तर - चतुर्विंशतितत्वों में से बुद्धि, अहकार और एकादश इन्द्रियाँ प्रकाशक होने से उनका विवरण किया है । वे किस देवता की महायता से प्रकाशक होती हैं, यह बताने के लिये । उनके देवता बताये हैं । किस जगह रहकर प्रकाशक होती हैं यह बताने के लिये उनका विषय बतलाया है । बुद्धयादि शरीर में रहकर आत्मा के लिये उपयुक्त होने से आध्यात्मिक माने गये हैं । शेष तत्वों के प्रकाशक न होने के कारण उनका विषय नहीं बताया गया है । उनके विना आत्मा को विपयों का ज्ञान होने से वे आध्यात्मिक नहीं माने गये हैं । वेदान्तशास्त्र में भी बुद्धि को अध्यात्म माना है और उसका देवता ब्रह्मा माना है | अभिप्राय यह है कि विश्वरूप विष्णु के जिन भागों से जो देवता उत्पन्न हुये है वे देवता उस अङ्ग के देवता माने जाते हैं । अहङ्कार का देवता रुद्र, मन के देवता चन्द्रमा चन्द्रमा मनसो नात. ' इत्यादि । तत्र सर्व एवाचेतन एष वर्गः, पञ्चविंशतितमः कार्यकारणसंयुक्तश्चेतयिता भवति । सत्यप्य चैतन्ये प्रधा-नस्य पुरुपकैवल्यार्थं प्रवृत्तिमुपदिशन्ति क्षीरादीश्चात्र हेतूनुदाहरन्ति ॥ ११ ॥

जीवात्मा - ये मत्र चौबीस तत्र जड हैं । पुरुष यह पच्चीसवाँ तत्व है । महदादि विकारगण कार्य से तथा मूल प्रकृति रूप कारण से मिलता हुआ ज्ञान करने वाला है । मूल में कार्यकारण सयुक्त इस जगह ' कार्यकरणसयुक्त ' ऐसा भी पाठ है । उसका अर्थ देहरूप कार्य से और इन्द्रियरूप कारण से मिलता हुआ जीवात्मा चैतन्य को उत्पन्न करता है । यद्यपि प्रकृति अचेतन है तो भी पुरुष के मोक्ष के लिये उसकी प्रवृत्ति होती है । जैसे दुग्ध स्वयम् अचेतन होने पर भी बच्चे के लिये चैतन्य होकर बाहर निक्लता है । उसी प्रकार पुरुष के मोक्ष की चिन्ता होने से प्रकृति अचेतन होने पर भी चैतन्यता को प्राप्त होती है ॥ ११ ॥

विमर्श. - चौबीस तत्वों के विचार करने के बाद अब पच्चीसवाँ तत्र ' जीव ' का वर्णन करते हैं । यह जीवात्मा चैतन्य शक्ति वाला है । बाकी का चौबीस तत्वों का वर्ग अचेतन, क्रियाहीन है । उनमें चेतना इसी पच्चीसर्वे तत्त्व द्वारा होती है । अव्यक्त अर्थात् प्रकृति में चेतना का जो अनुभव होता है वह जीवात्मा के मोक्ष के लिये है । जैसा कि दूध में चैतन्य, द्रवण या सरण मालूम होता है वह बच्चों के लिए होता है उसी प्रकार प्रकृति में जो चैतन्य मालूम होता है वह पुरुष को, जीवात्मा को मुक्ति देने के लिये होता है । क्षीरादि में ' आदि ' शब्द से शुक्र का भी उदाहरण बताते है । जैसे - शुक्र स्वयम् अचेतन है तो भी अति सुन्दर कामिनी के साथ प्रसन में उसमें गति आती है । उसी प्रकार प्रकृति भी चैतन्य बनती है । अत ऊर्ध्वं प्रकृतिपुरुपयो. साबर्म्यवैधर्म्ये व्याख्या-स्यामः ' तद्यथा— उभावप्यनादी, उभावप्यनन्तौ उभा-वप्यलिङ्गी, उभावपि नित्यो, उभावप्यपरौ ( ' अनपरौ ’ पाठः ), उभौ च सर्वगताविति ॥ १२ ॥

एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा वीजधमिणी प्रस-वधर्मिण्य मध्यस्थधामणी चेति, बहवस्तु पुरुषाचेत-| नावन्तोऽगुणा अवीजधर्माणोऽप्रसवधर्माणां मध्यस्थ-धर्माणश्चेति ॥ १३ ॥

प्रकृति और पुरुष का साधर्म्य और वैधर्म्य - इसके बाद प्रकृति और पुरुष, इनके साधर्म्य और वैधर्म्यं बताये जायेंगे । प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं । अन्तरहित हैं । निराकार हैं । निरन्तर रहने वाले हैं । दोनों ही अपर हैं अर्थात् इनके परे ( पूर्व ) कोई भी नहीं है । ' अपरौ ' इस जगह ' अनपरौ ' ऐसा भी पाठ है जिसका अर्थ ' न विद्यतेऽपरो याभ्यां तावनपरौ ' ऐसा विग्रह करके प्रकृति और पुरुष ये दोनों ही महदादिकों से परे हैं । दोनों ही सर्वत्र व्यापक । अव दोनों की अस मानतायें बताते हैं । प्रकृति एक है, चैतन्य रहित है, सव रजतमो गुणात्मक ( त्रिगुणात्मक ) है, बीजधर्मिणी है, इसका अर्थ यह है कि जैसे वृक्ष वीज में रहता है उसी प्रकार यह भी संसाररूपी वृक्ष का बीन स्वरूप है । इसी से फिर संसार उत्पन्न होता है सत्व, रज और तम जब समान अवस्थाओं में

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४ सुश्रुतसंहिता रहते हैं तब सब महत, अहंकार आदि विकारों के लिये बीजस्वरूप में रहने वाली है । गयी नामक आचार्य के मत में सहारकाल में भूत, इन्द्रिय, पचतन्मात्रा, अहङ्कार, महादिकों के लिए आधारभूत होने से वोलधर्मिणी कहलाती है । और वह प्रसवधर्मिणी है, इसका अर्थ यह है कि जब बोजधर्मिणी प्रकृति उत्पन्न करने वाले व्यापक पुरुष के साथ मिलकर अपनी साम्यावस्था को छोड़ती है तब महत्, अहङ्कार इत्यादि क्रमानुसार स्थावर जगमात्मक जगत् का निर्माण करती है, इसलिये उसे प्रसवधर्मिणी कहते हैं । प्रकृति का एक और भी गुण बताया गया है, जिसे ' अमध्यस्थधर्मिणी ' कहते हैं । मध्यस्थ को सुख और दुःख का अनुभव नहीं होता है, इस प्रकृति को सुख - दुख का अनुभव होने से अमध्यस्थधर्मिणी कहते हैं । पुरुष प्रकृति । से निम्न लिखित प्रकल से पृथक है - पुरुष अनेक हैं, चैतन्य युक्त हैं, मत्व, रज, तम, गुणों से रहित है । वोजधर्मं वाले । नहीं है । यह ' प्रसवधर्मी ' भी नहीं और मध्यस्थधर्मी है । विमर्श - अव पुरुष और प्रकृति के साधर्म्य ( समानता Comparison ) और वैधर्म्यं ( विषमता Contrast ) बताते हैं । समानता ( Comparison ) -प्रकृति पुरुष १ अनादि । १ अनादि । २ अन्तरहित है । २ इनका अन्त नहीं है । ३ निराकार । ३ आकार से रहित । नित्य है । निरन्तर है । ५ इनके पर अर्थात् पहिले कोई ५ सबसे पूर्व यहीं है । नहीं है । ' अनपरी ' इस पाटमे सबमे ' पर ' ( प्रथम ) है । ६ व्यापक है । दोनों की विषमता प्रकृति १ एक है । २ जड है । चेतनारहित है । ३. त्रिगुणात्मक है । १ योजधर्मवाली है । ५ प्रमधर्म है । ६ सुख दुख को भोगने वाली है । इनके ' अपर ' कोई नहीं है । यही ६ सर्वत्र विद्यमान है । Contrast ( असमानता ) -पुरुष १ अनन्त, अनेक है । २ अचेतन नहीं है । चैतन्ययुक्त है । ३ त्रिगुणातीत है । " बोलधर्म से रहित है । ५ प्रसवधर्म से शून्य है । ६ सुख दुःख से शून्य है । सांख्यकारिका १ ९ में पुरुष के विषय में दिया है कि

' तस्माच्च विपर्यामात् मिद्धं साचित्वमस्य पुरुषस्य ।

कैचएयं माध्यस्थ्यं द्वट्टत्वमकर्त्तृभावञ्च ' ॥ १२-१३ ॥

तत्र कारणानुरूप कार्यमिति कृत्वा सर्व एवैते विशेषा; सत्त्वरजस्तमोमया भवन्ति, तदखनत्वात्तन्म-यत्वाच्च तद्गुणा एव पुरुपा भवन्तीत्येके भापन्ते || १४ || पुरुष के विषय में कीमत- कारण के अनुसार कार्य हुआ करता है, इसलिये प्रकृति जो कारण स्वरूप है उसके अनुसार ही यह पर्व महान् अकारादि विशेष कार्य भी त्रिगुणात्मक होते है । उसी प्रकार पुरुष को भी सत्व, रज, तमोगुणात्मक मानना चाहिये । निर्गुण नहीं, ऐसा कई विद्वानों का कथन है ॥ १४ ॥

विमर्श: - यह मत स्वय सुश्रुताचार्य का नहीं है इसलिये उपेचाबुद्धिपूर्वक एकीय मत बताते हैं । जहाँ जहाँ ' ए ' ऐसा दिया रहता है उसका अभिप्राय यही रहता है, वह मत इनको मान्य नहीं है । उस मत का उद्दरण इसलिये किया जाता है कि पाठकगण यथार्थ विचार कर सकें । पुरुष में जो सत्वादि गुणों का आरोप किया है वह भ्रमात्मक है क्योंकि मध्यस्थ होने पर उसे जो जो सुख दुःख का ज्ञान होता है वह प्रकृति के ससर्ग से है । उसके लिये तीन दृष्टान्त बताए हैं । पहिला । स्फटिक और जपाकुसुम । दूसरा चन्द्रमा और जल । तीसरा । आकाश और सूर्यको अरुण प्रभा । जैसे स्फटिक स्वच्छ होने पर भी उसका रंग, जपाकुसुम के संसर्ग में आने से जपाकुसुम के अनुसार लाल दीसता है । दूसरा उदाहरण - जैसे आका शस्थ चन्द्रमा स्थिर होने पर भी जल में चंचल दीखता है । तीसरा उदाहरण - आकाश नीलवर्ण होने पर भी सायंकालीन सूर्य की रक्तवर्ण प्रभासे लाल रंग का दीखता है । वास्तव में न तो स्फटिक लाल रंग का है । चन्द्रमा स्वयं चंचल है ऐसा भी नहीं । आकाश लाल वर्ण है यह भी असत्य है, उसी प्रकार पुरुष भी निर्गुण होने पर भी उसमें प्रकृति के संसर्ग सच्चादि गुणों का आरोप किया जाता है वास्तव में वह निर्गुण । है । पुरुष और प्रकृति निकट होने के कारण प्रकृति के गुण पुरुप में दीखते हैं, जैमा मलिन दर्पण में अपना मुस मलिन सा मालूम होता है उसी प्रकार प्रकृति के साथ रहने से प्रकृति के गुणधर्म पुरुष में भासमान होते हैं । इस प्रकार पुरुष त्रिगुणात्मक नहीं है यह बता कर अब वैद्यक शास्त्र के मत से जगत् के उपादान कारण का वर्णन करते हैं । अभी तक सांख्यशास्त्र के अनुसार प्रकृति और पुरुष का विवरण किया गया है । किन्तु वैद्यक शास्त्र के उपयुक्त कौनसी वस्तु है यह बताने के लिये निम्न श्लोक दिया जाता है । यहाँ यह भी शङ्का उपस्थित होती है कि प्रकृति और पुरुष का वर्णन करते करते फिर इकट्ठा उनका विवरण छोड़ कर जगत् के | उपादान कारणों का क्यों विचार हो रहा है? उत्तर में यह ' कहना पडता है कि वैद्यक में वे ही फलप्रद मालूम होते हैं

इस लिये लिखा है । वैद्यकेतु-स्वभावमीश्वर कालं यदृच्छां नियति तथा ।

परिणाम च मन्यन्ते प्रकृतिं पृथुशिनः ॥ १५ ॥

पृथुदर्शिनः, अर्थात् विशाल बुद्धि वाले लोग जगत् का कारण स्वभाव, ईश्वर, काल, यच्छा ( योगायोग ), नियति ( देव, भाग्य या पूर्वजन्मार्जिन धर्माधर्म ) तथा परिणाम को कारण समझते है ॥ १५ ॥

विमर्श - टपर्युक्त ६ वस्तुयें जगत् का कारण होती हैं ऐसा विशाल विचार वाले लोग मानते हैं । शरीर का अङ्ग-प्रत्यक्ष निर्माण होने में स्वभाव ही कारण है । ' अङ्ग प्रत्यह्न -निर्वृत्ति. स्वभावादेव जायते ' उसी प्रकार - ' सन्निवेशः शरी | राणां दन्तानां पतनोद्भवा । तलेवसम्भवो यत्र रोग्णामेत-प्रभावतः ॥ शरीर का पनना, दातों की उत्पत्ति तथा गिरना, हाथों में पाल का न आना, स्वभावत ' होता है । स्वभाववाड़ी लोक ऐसा कहते है । उसी प्रकार — ' कः क्ण्ट •

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श्रध्यायः १ ] शारीरस्थानम् कानां प्रकरोति तैक्ष्ण्यं, चित्रं विचित्रं मृगपक्षिणां च । माधुर्य-मिक्षौ कटुतां मरीचे, स्वभावतः सर्वमिदं प्रवृत्तम् ॥ ' कण्टकों की तीता, पशु पक्षियों को चित्र - विचित्रना, ईस में माधुर्य, गोल मरीच में कटुना स्वभावतः होती है । इस प्रकार स्वभाव को जगत् का कारण मानने वाले लोग समझते हैं । इसी प्रकार ईश्वर को भी कारण बताते हैं । ईश्वर ही पृथ्वी, पर्वन, पेड, जन्तु, स्वर्ग और नरकों के लिये कारण है । कहा भी है- ' भज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मन ' सुम्बदु खयोः । ईश्वर प्रेरितो गच्छेत् स्वर्ग नरकमेव वा ॥ इति । अभिप्राय यह है कि प्राणी ज्ञानरहित रहता है उसको अपने सुख दुख का विचार नहीं रहना । उसका नरक या स्वर्ग को प्राप्त होना ईश्वर की प्रेरणा से ही होता है अर्थात् जगत् का कारण ईश्वर ही है । काल भी टमी प्रकार जगत् का कारण है । वहीं जगत् में क्रान्ति करता है । विश्व की उत्पत्ति और नाश करना काल के अधीन है । काल चक्र के फेर में स्थावर जंगम आदि को पढना ही पडता है । कालचक्र का सम्बन्ध प्राणिमान्नों तथा जड़ जीवों मे अविछिन्न है । दोषों का संचय, प्रकोप और शान्ति काल के हो अधीन है । दौत्य और औष्ण्य काल का न है । जैसा कि - ' महाभून विशेषांस्तु शीतोष्णद्वयभेवत.। काल इत्यध्यवस्यन्ति ' । इसी प्रकार यहच्छा अर्थात् योगा योग को भी कारण मानते हैं । किसी प्रकार से अचानक कार्य का होना यदृच्छा है । जैमा कि - ' यहच्छया चोपगतानि पाक पाकक्रमेणोपचरेद्विधिज्ञ ' ' मी प्रकार ' तृणारणिनिमित्तो वह्निरिनि । ' वास्तव में न तो धाम में या अरणी ( काष्टविशेष ) मैं अग्नि है । नगर दोनों के संघर्ष से अग्नि की उत्पत्ति होती है इसमें कारण योगायोग ( यदृच्छा ) ही है । नियति या भाग्य को भी कारण बताते हैं । पूर्वजन्मार्जित पापपुण्यों का ही फल मिलता है । कोई - कोई व्याधि दोषजन्य न होते हुए कर्मजन्य होती है । जैसे —- कुष्ट रोग ब्राह्मण, त्री, सज्जन लोगों । का वध करने से, दूसरों के धनादि हरण करना इत्यादि पाप क्मों से टम्पन्न होता है । इसमें भाग्य या दैव हो कारण है । इसके । ara परिणामवाद का कहना है कि सबका कारण परिणाम है, क्योंकि art at महदहङ्कारादि रूपों में परिणत होकर सर्वो का कारण होता है । उसी प्रकार - ' जारानेतु संयो. गाद्यदुदेनि रसान्तरम् । रसानां परिपाकान्ते स विपाक इवि समझते हैं कि स्वभाव, ईश्वर, काल, यहच्छा और नियति | तथा परिणाम सब प्रकृति हैं अर्थात् वे जगत् के उसी प्रकार उपादन कारण हैं जैसे मिट्टी पेड़ का उपादान कारण है ।

तन्मयान्येव भूतानि तद्गुणान्येव चादिशेत् ।

तैश्च तल्लक्षणः कृत्नो भूतग्रामो व्यजन्यत ॥ १६ ॥

स्थावर - जगम भूतग्रामों के लक्षण - तन्मयानि माने पोला. पन, चाञ्चल्य, उष्णता, द्रवस्व, खरख, स्वभावादि गुणों की विशेषता से व्याप्त जो प्रकृति उनके परिणाम युक्त, भूत जो नाकाशादि, तद्गुणान्येव सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, युक्त समझना चाहिये । इस प्रकार आकाशादि पञ्चमहाभूत और प्रकृति के गुण वाले अर्थात् सच्च, रज, तमोगुणात्मक । सम्पूर्ण भूतग्राम स्थावर जङ्गमात्मक - उत्पन्न हुआ है ॥ १६ ॥

विमर्श - स्थावरजङ्गमात्मक सर्वभूतसमूह पृथ्वी, जल, । तेज, वायु, आकाश के गुणों से युक्त तथा सत्व, रज, तमो. गुणात्मक उत्पन्न हुआ है । जैसे सम्पूर्ण प्राणिमात्र कठिन, शीत, उष्ण, चलत्व, सौपिरस्व गुणों से युक्त है उसी प्रकार प्रकृति के गुणों से सवादि युक्त हैं अर्थात् भूतमान में प्रकृति के गुण तथा पञ्चमहाभूतों के गुण भरे हुए हैं । तस्योपयोगोऽभिहितचिकित्साम्प्रति सर्वदा । भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिन्ता चिकित्सिते १७ भूत ही चिकित्सोपयोगी है- भूतग्राम चिकित्सा के लिये । उपयोगी हैं । भूतों से अन्य जो अव्यक्त आदि हैं वे चिकित्सा के लिये कोई उपयोगी नहीं हैं ॥ १७ ॥

विमर्शः - चिकित्सा के लिये ' पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष. ' यही उपयुक्त है । वह पुरुष स्थावर - वृक्षादि रहे या | जंगम - मनुष्य, पशु, पचयादि स्वरूप रहे उसकी ही चिकित्सा की जाती है, केवल पचमहाभूतांसे भी चिकित्साका कोई प्रयोजन नहीं है या पञ्चमहाभूतविरहित जीवात्मा भी । कोई प्रयोजन नहीं है । जहां पञ्चमहाभूत और जीवात्मा का एकत्र सम्बन्ध हो वही पुरुष चिकित्सा के उपयुक्त है 1 यतोऽभिहित ' तत्सम्भवद्रव्यसमूहो भूतादिरुक्त. ' भौतिकानि चेन्द्रियाण्यायुर्वेदे वर्ण्यन्ते तथेन्द्रियार्थाः १८ इस भूतग्राम का चिकित्सा के लिए प्रयोजन क्यों है? स्मृत ' । ' जठराग्नि के साथ मिलकर जो दूसरा रस पैदा होता । यह बताने के लिए लिखते हैं । उस भूतग्राम की उत्पत्ति के है वह विपाक कहा जाता है । अभिप्राय यह है कि एक रस का गुण बदलकर उसका परिणाम अन्त में विपाक स्वरूप । होता है । उसी प्रकार ' सम्यक् परिणतस्याहारस्य सारो रस ' अच्छी तरह से परिणत हुए, लाहार का सार रस है । जगत् इस प्रकार परिणततापर या परिणामपर ही का कार्य होता है, और भी देखिए - ' एवं बालानामपि वयः परिणामा-प्रादुर्भावो भवति ' शुक्र की उत्पत्ति के लिये भी उम्र का परिणाम ही कारण है । इस प्रकार ये छ ' मत आयुर्वेद शास्त्र को मान्य हैं, क्योंकि आयुर्वेद में सर्व तवों का सग्रह है और । वह अच्छे मतों का ग्रहण करने वाला भी है । यद्यपि ये छः भीत्रिम प्रकृति में अन्तर्भूत होते हैं तो भी उनकी उस समय स्वभाव आदि के स्वरूप में अभिव्यक्ति होने से नाम दिये गए हैं । हाराणचन्द्र जी पृथुदर्शी का अर्थं मोटे विचार करने वाले ( नतु सूक्ष्म विचार वाले ) करते हैं । यह । लिये भूतादि द्रव्यसमूह है । इन्द्रिया भी भौतिक है और इन्द्रियार्थ भी भौतिक है । इस प्रकार भूतों की चिन्ता रखने से प्राणिमात्र, इन्द्रियाँ और इन्द्रियार्थं सका विचार होता है । अत एव लिखा है कि ' भूतेभ्यो हि पर यस्मान्नास्ति चिन्ता चिकित्रिमते ॥ १८ ॥

विमर्श. - उस भूतग्राम का स्थावर जगमात्मक प्राणिमात्र का भूतादि अर्थात् पञ्चमहाभूत आदि कारण है । उसी प्रकार इन्द्रियां भी पञ्चमहाभूतों से ही उत्पन्न हुई हैं लिखा भी है कि इन्द्रियों के पञ्चमहाभूतात्मक होने पर भी— ' ख श्रोत्रे स्पर्शने वायुर्दर्शने तेज उत्कटम् । सहिलं रसने भूमिर्धाणे तज्ज्ञैर्निरूपितम् ' उसी प्रकार इन्द्रियार्थं भी भौतिक माने गये हैं । लिसा भी है - शब्दो वायसः स्पर्शो चायवीयः प्रकीर्त्तितः । रूपमाग्नेयमाप्योत्र रसो वस्तु पार्थिव. |

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६ सुश्रुतसहिता

भवति चात्र-इन्द्रियेणेन्द्रियार्थं तु स्वं स्वं गृहाति मानवः ।

नियतं तुल्ययोनित्वान्नान्येनान्यमिति स्थितिः ॥ १६ ॥

अपनी भौतिक इन्द्रियों से अपने भौतिक इन्द्रियार्थ का ग्रहण-अपनी अपनी इन्द्रियों ने अपने अपने अर्थ को मनुष्य ग्रहण करता है । क्योंकि वे इन्द्रियार्थ और इन्द्रियां एक से ही टत्पन्न हुई होती हैं, दूसरे से उत्पन्न हुई इन्द्रियां दूसरों के अर्थ को कापि ग्रहण नहीं करती है ॥ १ ९ ॥ विमर्श. - आकाश से उत्पन्न हुई श्रोत्रेन्द्रियां आकाश से । ही उत्पन्न होने वाले शब्दरूप इन्द्रियार्थ को ग्रहण करती हैं । वे न तो रूप को ग्रहण करती हैं, और न न्द्रिय- को छोडकर नेत्र का आश्रय करता है । पाचों इन्द्रियों की तथा पञ्च इन्द्रियायों की तुल्ययोनि होने मे अपने अपने भूनों से आश्रित इन्द्रियाँ इन्द्रियार्थो का ही ग्रहण करती हैं । टत्पन्न हुई इन्द्रिया दूसरे भूतों से उत्पन्न इन्द्रियार्थ को कदापि ग्रहण नहीं करती हैं । शब्द श्रोत्रे -इसी प्रकार स्थिति है । रहने वाली एक भूत से होने वाले न चायुर्वेदशाखे पढिश्यन्ते सर्वगताः क्षेत्रज्ञा । नित्याश्च | असर्वगतेषु च क्षेत्रज्ञेषु नित्यपुरुपख्यापकान् नुदाहरन्ति || २० || " आत्मा की नारयमन में भिन्नता - आयुर्वेदशास्त्र में नित्य क्षेत्रज्ञ अर्थात् आत्मा को सर्वगत नहीं मानते । आस्माको । होती है | चेतनायुक्त, निरन्तर रहने वाली ( ' नित्य ) और शुक्र तथा रक्त का सयोग होने पर भी व्यक्त होती है । उस पुरुष को पढ़ धात्वात्मक पुरुष बताने के लिए कहा है, जहा पञ्चमहाभूत और आत्मा का सयोग हो । केवल पञ्चमहाभूत रहने से शरीर में चैतन्य का भान नहीं होता है उसी प्रकार उसमें नाड्य की प्रतीति भी होती है । यही कर्मपुरुष चिकित्सा के लिये उपयुक्त है । चरकसहिता में लिखा है-सच्चमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत् । लोकस्तिष्ठति सयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ स पुमांश्चेतन तच्च तच्चाधि करण स्मृतम् । वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽय सम्प्रकाशितः २१ विमर्श.- - इस गद्य में आत्मा का नित्यत्व बताकर उस का भिन्न भिन्न योनि में क्यों प्रवेश होता है? वह भी बताया है । आत्मा तो प्रत्यक्ष नहीं दीखता है । इस लिये प्रत्यक्ष प्रमाण से उसकी सिद्धि नहीं होती है । जिस कारण से शरीर में चैतन्य है उसी कारण से यह सिद्ध होता है कि पञ्चमहाभूत के अतिरिक्त कोई ऐसा पढार्थ है जो कि चैतन्य पैदा करता है, वही चैतन्य गुण वाला आत्मा है । आत्मायुक्त पञ्चमहाभूतात्मक शरीर को ही चिकित्सा के लिये उपयुक्त कर्म पुरुष मानते हैं । चरक संहिता में मन, आत्मा और शरीर इसको पुरुष मानते हैं । सुश्रुत महिता में पञ्चमहाभूत और आत्मा के सयोग को पुरुष कहते हैं । तस्य सुसदु खे इच्छाद्वेपौ प्रयत्नः प्राणापानावु-न्मेपनि मेपो बुद्धिर्मन सङ्कल्पो विचारणा स्मृतिर्विज्ञा-अपर्वगत मानने पर भी पुरुष को नित्य मानने के लिए हेतु । नमध्यवसायो विपयोपलब्धिश्च गुणाः || २२ ॥ बताते हैं ॥ २० ॥ 1

विमर्श - सांख्यशास्त्र में सर्वगत आत्मा होने से उसे नित्य समझते है । चैद्यक शास्त्र में असर्वगत होने पर भी नित्य हो मानते है | उसे यदि नित्य न मानेंगे तो जन्मप-रम्परा मानना अगम्भव हो जायगा । एक जन्म के बाद दूसरा जन्म ही नहीं होगा । उसी प्रकार बाल्यावस्था में प्राप्त हुआ सुग वृद्धावस्था में प्रतिकूल रहेगा । सत्तावान् रहकर जो कारणहीन होगा वह भी नित्य माना जाता है । आत्मा की सना का ज्ञान होता है f न्तु उसे कारणहीन होने से नित्य मानना चाहिये । भोजने लिखा है- ' शुभाशुभाम्यां कर्मभ्यां प्रेरणान्मनमो गते । देहाद् देहान्तर यानि क्रिमिवच्छाश्व तो s व्यय । नित्य इत्युच्यते सद्भिः मन्नकारणवान् यत. ' । आयुर्वेदशास्त्रसिद्धान्तेष्वसर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च तिर्यग्योनिमानुषदेवेषु मञ्चरन्ति धर्माधर्मनिमित्तम् त एतेऽनुमानग्राद्याः परमसूक्ष्माश्चेतनावन्तः शाश्वता लोहितरेतसोः सन्निपातप्यभिव्यज्यन्ते, यतोऽभिहि तं - ' पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष ' इति । स एव कर्मपुरुपश्चिकित्माऽधिकृतः ॥ २१ ॥

आत्मा के निन्यत्वम हेतु - आयुर्वेदान्त्र के सिद्धान्तों से पुरुष निम्य है और नत्र प्याप्त नहीं है । अपने पापपुण्यों के अनुसार, शुभाशुभ कार्यों के कारण, आत्मा पशु - पक्षियों में, मनुष्य वर्ग से तथा देवयोनि में प्रवेश करती है । आत्मा प्रण प्रमाण से सिद्ध न होते हुवे भी अनुमान प्रमाण द्वारा ज्ञात होती है । अत्यन्त सूक्ष्म - छोटे प्रमाण चाली आत्मा के गुण – उस आत्मा ( कर्म पुरुष ) के गुण - सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयल, प्राणवायु का धारण करना, अपान वायु छोडना, आँख खोलना, आँख मूँद लेना, बुद्धि, मनः सकल्प, विचारणा, स्मरण करना, विज्ञान, अध्यवसाय ( निश्चयात्मिका बुद्धि ) और विपयोपलब्धि ( इन्द्रिय द्वारा विषयज्ञान ) ये गुण आत्मा के या कर्म पुरुष के हैं ॥ २२ ॥

विमर्शः कर्म: पुरुष के गुण बताते हैं - मन के अनुकूल होने वाला ' सुख ' है । उसके विरुद्ध ' दुख ', किसी वस्तु की अभिलापा यह ' इच्छा ' है । अप्रीति होना ' द्वेप ' है । कार्य करने के लिये उद्योग करना ' उत्साह ' है । मुख में सचार करने वाली वायु ' प्राण वायु ' है । पकाशय में रहकर नीचे की ओर जाने वाली ' अपान ' वायु है । ' उन्मेष ' आँख का खोलना और ' निमेष ' आँख का बन्द करना । निश्चयात्मिका ' बुद्धि ', मन का कर्म ' सक्व ' है । तर्क वितर्क ॥ करके वस्तु का निश्चय करना विचारणा है । ' स्मृति ' अर्थात् | प्रथम अनुभव किये हुए अर्थ का स्मरण करना, ' विज्ञान ' अर्थात् शिल्प शास्त्रादिकों का ज्ञान रखना, ' अध्यवसाय ' निश्चयपूर्वक काम करने का उद्योग करना, विषय जो शब्दादि उनकी उपलब्धि अर्थात् प्राप्ति ( विषयों का ज्ञान होना ) । इस प्रकार कर्मपुरुष के १६ गुण हैं, इन्हें ' कला ' भी | कहते हैं । सात्त्विकास्तु - आनृशंस्यं सविभागरुचिता तितिक्षा । सत्यं धर्म आस्तिक्य ज्ञान बुद्धिर्मेघा स्मृतिर्धृतिरन-भिपन्नश्च ॥ २३ ॥

सात्त्विक मन के गुण - साविक मन के लक्षण अक्ररता,

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श्रध्यायः १ ] शारीरस्थानम् संविभागरुचिता ( अन्न वख का सम्यग् वितरण ), सुख दुःख भादि द्वन्द्वों को सहना, सत्य, धर्म, आस्तिकता, ज्ञान, बुद्धि, मेधा, स्मृति, धैर्य, अनभिपद्म अर्थात् निरिच्छापूर्वक अच्छे कार्यों को करना ॥ २३ ॥

विमर्श - साविक मन के बारह गुण बताये हैं । जो उच्च प्रकार के हैं धार्मिकता, सत्यता, दूसरों के जीवन की रक्षा करना, फल की उपेक्षा करते हुए कार्य करना, धैर्य रखना, स्मृति और मेधा अर्थात् ग्रन्थों के धारण करने की शक्ति इत्यादि प्रायः अच्छे गुणों का समूह साविक मन में रहता है । राजसास्तु - दु'खबहुलताऽटनशीलताऽधृतिरहङ्कार आनृतिकत्वमकारुण्यं दम्भो मानो हर्पः कामः क्रोधश्च । राजम मन के गुण- दु'खथाहुल्य, घूमने का स्वभाव, अधीरता, अहंकार, असत्यभाषण, क्रूरता, ढोंग, मान, आनन्द, विपयसम्बन्धी इच्छा और क्रोध ये राजसगुण हैं ॥ २४ ॥

विमर्शः- रजोगुण से होने वाले लक्षण प्राय ' दुर्गुणयुक्त होते हैं । उसमें सौख्य का अंश बहुत ही न्यून रहता है । दुःख की मात्रा अधिक होती है और छल - कपट, अहकार, काम, क्रोध इत्यादि दुर्गुण पर्याप्त रहते हैं । तामसास्तु - विपादित्वं नास्तिक्यमधर्मशीलता बुद्धेर्निरोधोऽज्ञानं दुर्मेधस्त्वमकर्मशीलता निद्रालुत्वं चेति ॥ २५ ॥

तामस मन के गुण - खेद करना, वेदादि को न मानना, धर्म के विरुद्ध आचरण करना, बुद्धि का उपयोग न करना, ज्ञान न होना, दुष्ट बुद्धि रहना, काम करने की इच्छा न होना, नींद लेने की आदत गुण हैं ॥ २५ ॥

विमर्श: - तामस गुण प्रायः राजस गुणों से भी निम्न कोटि के का विकार अधिक मालूम होता है आने लगती है । सदसद् - विवेक की बहुलता हो जाती है । आन्तरिक्षास्तु — शब्दः रहना इत्यादि ये तामस । सत्व गुणों के विरुद्ध तथा होते हैं । इसमें प्रायः निद्रा जिससे बुद्धि को भी निद्रा । नष्ट हो जाता है । आलस्य शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्र -समूहो विविक्तता च । वायव्यास्तु - स्पर्शः स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टासमूहः सर्वशरीरस्पन्दन लघुता च । तैज-सास्तु — रूपं रूपेन्द्रियं वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पक्तिरमर्षस्तैक्ष्ण्य शौर्यञ्च । आप्यास्तु - रसो रसने-न्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शैत्य स्नेहो रेतश्च । पार्थि वास्तु — गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्वमूर्त्तसमूहो गुरुता चेति ॥ पञ्चमहाभूतों के गुण - आकाश गुण - शब्द, शब्द की इन्द्रिय अर्थात् श्रोत्र, सब छिद्रों का समूह अर्थात् पोलापन और एक पदार्थ को दूसरों से अलग करना ये सब आकाश के गुण हैं । वायु के गुण - स्पर्श, स्पर्शेन्द्रिय अर्थात् चर्म ( त्वचा ), सम्पूर्ण चेष्टायें, करना, सब शरीरों का गतियुक्त होना । या हिलना- डोलना आदि और हलकापन ये वायु के गुण है । तेज के गुण - रूप, रूपेन्द्रिय चन्तु भर्थात् आँख, वर्ण, उष्णता, तेजस्विता, जठराग्नि से परिपाक होना, असह्यता, तीच्णता और शूरता ये गुण तेज के हैं । जल के गुण - रस, जिह्वे । ७ न्द्रिय, सब द्रव पदार्थों का समूह, गुरुता, शैत्य, स्नेह, वीर्य ये जलसम्बन्धी धर्म हैं । पृथ्वी के गुण - गन्ध, गन्धेन्द्रिय-घ्राण, सम्पूर्ण ठोस - भारदार पदार्थों का समूह और गुरुता, ये गुण पृथ्वी सम्बन्धी हैं ॥ २६ ॥

विमर्शः - अव पञ्च महाभूतों के गुणों का निर्देश करते हैं - प्रत्येक भूतों के धर्मों का विवेचन करने से किस द्रव्य से किन भूतों का सम्बन्ध है, जानना उपयुक्त होता है । यहाँ | अदृश्य भूत से प्रारम्भ करते हुये दृश्य भूत के धर्म अन्त बताते हैं । आकाश के गुण ( धर्म ) - शब्द, कर्णेन्द्रिय, शारीरिक तथा इतर सम्पूर्ण छिद्र स्थानों का समूह, शरीरगत शिरा, खायु, अस्थि, पेशी इनका स्वजातीय पदार्थों से पार्थक्य करना, इत्यादि । गयी के मत से विविक्तता के स्थान में विरिक्तता यह पाठ है । विरिक्तता का अर्थ शरीरगत पदार्थों का नाश या रिक्तता करते रहता है । वायु के गुण ( धर्म ) -| आकाश का तो ज्ञान होता ही नहीं, किन्तु स्पर्शेन्द्रिय से ज्ञात होने वाले तथापि अदृश्य ऐसे वायु के धर्म स्पर्श करना, चर्मगोचर होना, विनीत होना, उद्दण्ड होना इत्यादि सम्पूर्ण क्रिया करना, या शारीरिक, वाचिक और मानसिक क्रियाओं का समुदाय तथा सम्पूर्ण शरीरों का चलन वलन करना और लाघवता ये वायु के गुण हैं । तेज के गुण ( धर्मं ) - यह आकाश तथा वायु से अधिक हग्गोचर होने वाला है, इस लिये अब उसके गुण धर्म बताते हैं - रूप को देखना, सौन्दर्य तथा नेत्रेन्द्रिय का आश्रय करना, गौर वर्ण, उष्णता, तेजस्विता, आहारगत भोज्य, लेह्य, पेय, चोष्य पदार्थों का जठराग्नि द्वारा पाचन करना, क्रोध, शीघ्र कार्य करना और शौर्य ये तेज के गुण है । जलीय गुण ( धर्म ) - जल के दृश्य और स्पर्शवेद्य होने से तेज के बाद उसके गुण धर्म बताते हैं । यह रसों का आधार है, जिह्वेन्द्रिय से ज्ञात होता है, सम्पूर्ण आर्द्र पदार्थों का सग्रह स्थान है, भारी है, शीतलता युक्त है, इसमें स्नेह रहता है और बीज को ग्रहण करता है । ( रेत का अर्थ ' शुक्र तेजोरेतसी च वीजवीर्येन्द्रियाणि च ' इसके अनुसार बीजात्मक भी है । ) पृथ्वी के गुण ( धर्म ) - गन्ध, गन्धेन्द्रिय - प्राण, सर्वमूर्त्तपदार्थ ( ठोस ), गुरुता जो कफ-पित्तादि, मांस - मजादि धातुओं तथा मल में वर्त्तमान है; पृथ्वी के गुण ( धर्म ) हैं । तत्र सत्त्वबहुलमाकाशं, रजोबहुलो वायुः, सत्त्वर-जो बहुलोऽभिः, सत्त्वतमोबहुला आप, तमोबहुला पृथिवीति ॥ २७ ॥

आकाशादि भूतों में रहने वाले सात्त्विकादि गुण - आकाश यह सत्व गुणों की अधिकतायुक्त है । वायु रजोगुणाधिक्य वाला है । अग्नि सत्व और रजोगुणाधिक्य वाला है, जल साविक और तमोगुण की विशेषता से युक्त है 1 । और पृथ्वी तमोगुणवाहुल्य वाली है ॥ २७ ॥

विमर्श: - आकाश में प्रकाशकत्व गुण होने के कारण वह सत्व गुणों की अधिकता रखता है । वायु ' चाचत्य होने से वह रजोगुणाधिक्य वाला है । अग्नि या तेज प्रकाशक तथा चञ्चल होने से वह सत्व और रजो गुण वाला है । जल यह स्वच्छ होने से, प्रकाशक होने से, गुरुत्व गुण वाला होने से और आच्छादन करने वाला होने से सत्व और तमोगुणात्मक

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८ सुश्रुतसहिता है । पृथ्वी अत्यन्त आचरण करने वाली होने से तमोगुणबाहुल्य बुदबुदादि को उत्पन्न करने वाला वायु भी विद्यमान रहता वाली है । इस प्रकार सच्च गुण आकाश, अग्नि और जल में है । जल से अग्नि की उत्पत्ति होने से वह भी उसमें वर्त्तमान • है और रजोगुण वायु और अग्नि में है । तथा तमोगुण जल है । कहा भी है । ' अन्योऽग्निः ' इति । जल में अणुरूप से और पृथ्वी में है । इस प्रकार तीनों गुणों की प्रधानता से । महाभूतों के साथ निर्देश किया गया है ।

श्लोकौ चात्र भवत ' -अन्योऽन्यानुप्रविष्टानि सर्वाण्येतानि निर्दिशेत् ।

स्वे स्वे द्रव्ये तु सर्वेषां व्यक्तं लक्षणमिष्यते ॥ २८ ॥

उपमहार के लिये दो लोक देते हैं— ये जो आकाशादि पञ्च महाभूतों के गुण हैं वे अपने महाभूत में रहते हुये भी दूसरे महाभूतों में रहते हैं । किन्तु अपने महाभूत में स्पष्टता के साथ रहने के कारण उस महाभूत का गुण कहा जाता है । और अपने महाभूत अतिरिक्त दूसरे महाभूत में अव्यक्त रूप से रहने के कारण उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है । किंवा गन्ध आदि गुण अपने अपने द्रव्य में व्यक्त होते हैं । अर्थात् अपने द्रव्य के अतिरिक्त दूसरे द्रव्यों में उनका अनुप्रवेश रहता है प्रधानतया अपने द्रव्य में उस द्रव्य का ही गुण होता है | किसी के मत से एक भूत में अन्य भूतों का सम्बन्ध होता है । जैसे -- आकाश में अन्य चार महाभूतों का अनु प्रवेश है । इसी प्रकार एक एक भूत का अन्य अन्य भूतों के साथ अनुप्रवेश रहता है ॥ २८ ॥

विमर्श: - आकाश, वायु आदि पञ्चमहाभूतों के गुण उनसे भिन्न । क्रमत प्राप्त भूतों में मिलते हैं । इसलिये यह स्पष्ट है कि एक भूत का प्रवेश दूसरे भूतों में मिलता है । जैसे कि वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण मिलते हैं । शब्द तो आकाश का गुण है परन्तु वायु में आकाश के प्रविष्ट होने के कारण उसमें शब्द और निज गुण स्पर्श भी वर्तमान रहता है । उसी प्रकार तेज में आकाश और वायु दोनों ही रहते हैं इसलिये तेज में शब्द, स्पर्श और रूप तीनों गुणों का समूह रहता है । इस प्रकार जल में आकाश, वायु और तेज तीनों रहते हैं । इस कारण उसमें उसका निजका गुण जो रस है उसे लेकर शेष के शब्द, स्पर्श और रूप भी उसमें रहते है | इस प्रकार पञ्च महाभूतों का परस्पर अनुप्रवेश होने से ' अनुप्रविष्टानि ' कहा है । उपर्युक्त ' अन्योऽन्यानुप्रवि ष्टानि ' मत से भिन्न भी मत प्रचलित है । इस मत में आकाश में भी पृथ्वी का सूक्ष्म भाग मानते हैं । उसी प्रकार सूचमतया जल और तेज के साथ वायु का भी आकाश में सचार होने से आकाश में चारों महाभूतों का समावेश बताया है । जैसे आकाश में वायु है उसी तरह वायु में भी आकाश सर्वत्र व्याप्त होने से विद्यमान है । तेज और जल भी वायु में विद्यमान है क्योंकि ' अनुष्णशीतस्पर्शोऽयं द्रव्यज्ञैर्वायुरिष्यते । दाहकृत्तेजमा युक्त ' शीतकृत् सोमसंश्रयात् ' । इस कथन के अनुसार वायु में रहने वाले शीतत्व और अनुष्णत्व गुण जल और तेल का सम्बन्ध बताते हैं । पृथ्वी भी सूक्ष्म रूप से उसमें विद्यमान है । तथा तेज में आकाश सर्वत्र व्यापी होने से विद्यमान है । वायु तो प्रेरणा करने से तेज में रहता हो है । जल तत्र से तो तेज की उत्पत्ति ही होती है ' अद्भ्यो s मिरिष्युक्तत्वात् धूमादि रूप से तेज में पृथ्वी भी है । जलीय द्रव्यों में आकाश व्यापक होने से वर्त्तमान है । जल में तरंग पृथ्वी भी है । पृथ्वी में भी आकाश, वायु, अग्नि, जल ये हैं । क्योंकि भूमि का विभाग करते समय पाँच प्रकार की भूमि बताई है । इसी प्रकार आकाशादि महाभूतों का परस्पर महाभूतों में अनुप्रवेश बताया है । इस पर यह शङ्का होती है कि अलग अलग भूर्ती के गुणों का वर्णन किस प्रकार युक्ति संगत है । क्योंकि एक भूत से दूसरे भूतों का सम्बन्ध तो है ही इसका उत्तर उन द्रव्यों में व्यक्त लक्षणों के अनुसार पृथ्वी आदि का दिग्दर्शन किया है ।

अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्ता विकाराः पोडशैव तु ।

क्षेत्रज्ञश्च समासेन स्वतन्त्रपरतन्त्रयोः ॥ २ ९ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने प्रथमोऽध्यायः ॥

संक्षेप में आठ प्रकृति, सोलह विकार तथा आयुर्वेद के मतानुसार एव सांख्य शास्त्र के अनुसार आत्मा का वर्ण किया है ॥ २ ९ ॥ विमर्श - इस प्रथम अध्याय में अव्यक्त, महान्, अहङ्कार, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, गन्धतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा और शब्द तन्मात्रा ये आठ प्रकृति हैं और श्रोत्र, स्वक्, चक्षु, जिह्वा, घाण, वाकू, हस्त, पाद, उपस्थ, ( लिङ्ग ), पायु ( गुद ) और मन ये ग्यारह इन्द्रियाँ और आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये पञ्च महाभूत, इस प्रकार सोलह विकार और पचीसवाँ आत्मा ये पचीस तत्व स्वतन्त्र नाम आयुर्वेद में और परतन्त्र नाम सांख्य शास्त्र में बताये हुये हैं । चरक के मतानुसार चौबीस तत्व हैं । उनमें पुरुषों का अन्तर्भाव अव्यक्त में होता है । सुश्रुत सांख्य का मार्ग स्वीकार करते हुये २५ पचीस । तच्चों का उपादान करता है । और चरक - सांख्य और वेदान्त के घीच का मार्ग स्वीकार करते हुये २४ चौबीस तत्व को

मानता है ।

इति शारीरस्थाने सर्वभूतचिन्ताशारीरं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥

शारीरे प्रश्नाः-( १ ) आयुर्वेदे पुरा शारीरविधा सुविदिता ss सीदिति मत चारक सौश्रुतवचनपुरस्सर स्थापयन्तु । ( २ ) ' शारीरे सुश्रुतः श्रेष्ठः अस्मिन्विषये निबन्धो लेख्यः । ( ३ ) आयुर्वेदीय - शारीरं चिकित्साऽर्थं पर्याप्त न वा? ( ४ ) किं तावच्छारीरम्? तज्ज्ञानस्य च किं प्रयोजनम्? शारीरक्रियाविज्ञाने प्रश्नाः-( १ ) चरक - श्रुतमतेन शरीरनिर्मापका मावा. प्रदर्शनीयाः । ( २ ) प्रकृतिपुरुषयो. साधर्म्य वैधर्म्य लेखनीयम् ।

( ३ ) स्वभावमीश्वर काल यदृच्छां नियतिं तथा ।

परिणाम च मन्यन्ते प्रकृतिं पृथुदर्शिनः ॥

अस्य पद्यस्य विशदतया व्याख्या कर्त्तव्या ।

( ४ ) अन्योऽन्यानुप्रविष्टानि सर्वाण्येतानि निर्दिशेत् ।

स्वे स्वेद्रव्ये तु सर्वेषां व्यक्त लक्षणमिष्यते ॥

अस्य कस्य विस्तारपूर्वक व्याख्या विधेया ॥

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सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 360 का मूल पृष्ठ
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श्रध्यायः २ ] शारीरस्थानम् ε द्वितीयोऽध्यायः अथातः शुक्रशोणितशुद्धि नाम शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

तत्पश्चात् शुक्र और शोणित ( आर्त्तव ) शुद्धि नाम का शारीर स्थान सम्बन्धी अध्याय बतायेंगे । जैसा भगवान् धन्वन्तरि महाराज ने कहा है ॥ १-२ ॥ विमर्श:: - - प्रथम अध्याय समाप्त होने के पश्चात् शुक्र का स्वरूप, उसके दोष और उन दोषों का निराकरण इत्यादि शुकसम्बन्धी विचार तथा भार्त्तव का लक्षण, उसके दोप, उनका निराकरण इत्यादि आर्त्तव का विचार किया जायगा । ऐसा भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं । इस अध्याय में गर्भधारण प्रक्रिया ( Reproduction theory ) बतायी गई है । वात - पित्त - श्लेष्म- शोणित - कुणपगन्धि - ग्रन्थि पूति-पूय क्षीण मूत्रपुरीष- रेतसः प्रजोत्पादने न समर्था भवन्ति ॥ ३ ॥

शुक्र के दोष – वातदोष से दूषित शुक्र, पित्त से विकृत, कफ से व्याप्त, रक्त से युक्त, मुर्दों की गन्ध वाला, गांठ युक्त, सड़ी गन्ध चाला, पूययुक्त, प्रमाण में कम, मूत्र के समान गन्धवाला या मूत्रयुक्त, मल के समान दुर्गन्धवाला, वीर्यं प्रजोत्पादन में अर्थात् सन्तति उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होता है ॥ ३ ॥

विमर्श: -वीर्य के दोष ग्यारह होते हैं । सुश्रुत के मतानुसार चार दोषों से चार प्रकार की वीर्य की विकृति और कुछ गन्ध के अनुसार चार विकृतियाँ तथा तीन विकृतियाँ दार्शनिक बताई हैं । इन विकृतियों का परिणाम यह होता है कि पुरुष सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकता है । कुणपगन्धि में वीर्य कीट नष्ट हुये रहते हैं इसलिये वे खी-डिम्ब से मिलकर सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते । उसी प्रकार ग्रन्थियुक्त होने पर वह रज - डिम्ब के साथ मिल नहीं सकते या शुक्र का उत्सर्ग ठीक नहीं होता है, दुर्गन्ध वाला शुक्र स्वयं ही दूषित रहने से बेकार रहता है । पूयगन्ध वाला शुक्र ( Gonorrhea ) पूय प्रमेह या तत्सम व्याधियों से युक्त होता है । इसी प्रकार क्षीण वीर्य के जीवाणु क्षीण रहते हैं तथा मूत्र और मल के गन्ध वाले निरुपयोगी होते हैं । उपर्युक्त वीर्यं के प्रकारों में से कोई तो साध्य रहते हैं कोई कृच्छ्रसाध्य और कोई असाध्य रहते हैं । जिनका निर्देश आगे किया है । तेषु वातवर्णवेदनं वातेन, पित्तवर्णवेदनं पित्तेन श्लेष्मवर्णवेदनं श्लेष्मणा, कुणपगन्ध्यनल्पं च रक्तेन, ग्रन्थिभूतं श्लेष्मवाताभ्यां पूतिपूयनिभं पित्तश्लेष्मभ्यां क्षीण प्रागुक्तं पित्तमारुताभ्यां मूत्रपुरीषगन्धि सन्निपा-तेति । ते कुणपन्थ पूति- पूय - क्षीणरेतसः कृच्छु-साध्याः, मूत्रपुरीपरेतसस्त्वसाध्याः ( साध्यमन्यच्च ) इति ॥ वीर्यदोष के लक्षण - उपर्युक्त वीर्यदोषों में से वा दूषित वीर्यं वायु के रंग वाला और तजन्य वेदना से युक्त रहता है । पित्त से दूषित वीर्य में पित्त का रंग और तजन्य पीड़ा होती है । कफ से दूषितं वीर्य में उसका वर्ण और २ सु ० शा ० वेदना रहती है, रक्त से दूपित वीर्य में मुर्दों की गन्ध और वीर्य का बाहुल्य रहता है । कफ और बात से दूषित वीर्य । गांठदार होता है । पित्त और कफ से दूषित वीर्यं सड़ी गन्ध वाला और पूय के समान रहता है । पित्त और वायु से वीर्य क्षीण होता है और सूत्रस्थान १५ वें अध्याय में बताये हुये मेढ में वेदना होना, अण्डकोष में सवेदना, विषय - संभोग में देर से वीर्य का पतन होना और सम्भोग के समय पतन में थोड़ा सा रक्त और अल्प शुक दिखाई देना ये सब लक्षण होते हैं । सन्निपात से वीर्य में मूत्र और मल की दुर्गन्ध आती है । उनमें कुणपगन्धि, ग्रन्थियुक्त, दुर्गन्धि, पूययुक्त, वीर्य की अल्पता, ये दोष कष्टसाध्य हैं । मूत्र - मल के समान गन्ध वाला वीर्य असाध्य है । इनके अतिरिक्त शेष वीर्यदोष साध्य हैं ॥ ४ ॥

विमर्श:: - - वात दोष से लाल, काला इत्यादि वर्णं का शुक्र होता है । उसी प्रकार तोदन, भेदन इत्यादि वेदना भी वायु से होती है । वायु तो वर्णहीन है तब वह शुक्र में वर्ण परिवर्तन कैसे करता है? उत्तर यह है कि - वायु तो कुपित होकर दूष्य को दूषित करता है इसलिए दूप्य में वर्ण का परिवर्तन होता है नतु वायु में । पित्त से दूपित शुक्र में पीले, नीले इत्यादि रग आते हैं और ओप, चोप इत्यादि अनेक प्रकार की वेदना भी पित्त से दूपित शुक्र में होती है । कफ से दूषित शुक्र में श्वेतवर्ण और कण्डू आदि वेदना होती है । रक्त से दूपित शुक्र शवगन्धि और प्रमाण में अधिक होता है । कफ और वायु से दूपित शुक्र गाँठदार होता है । पित्त और कफ से दूषित शुक्र सड़ी हुई गन्ध वाला और पूय के समान रहता है । पित्त और वायु से दूषित शुक्र क्षीण और वेदनायुक्त होता है । सन्निपात से मूत्र और पुरीष गन्ध वाला होता है । उनमें शव के गन्ध वाला, गांठदार, सडी हुई गन्ध वाला और पूययुक्त तथा क्षीण शुक्र कष्ट-| साध्य होता है । चिकित्सा करने पर भी अच्छा न होने वाला वीर्य, मूत्र और मल के गन्ध वाला होता है । इनके अतिरिक्त वात, पित्त और कफ से दूषित वीर्यं साध्य रहता है । आर्त्तवमपि त्रिभिर्दोषैः शोणितचतुर्थेः पृथग्द्वन्द्वैः । समस्तैश्चोपसृष्टमबीजं भवति तदपि दोषवर्ण-वेदनाऽऽदिभिर्विज्ञेयम् । तेषु कुणपग्रन्थि पूर्ति - पूय-क्षीण - मूत्र - पुरीषप्रकाशमसाध्यं साध्यमन्यचेति ॥ ५ ॥

आर्त्तव की साध्यासाध्यता - आर्त्तव भी तीनों दोपों से तीन प्रकार का, रक्त दोष से चतुर्थ प्रकार का, द्वन्द्वात्मक वातकफ, वातपित्त और पित्त कफ से तथा त्रिदोष से युक्त प्रजोत्पादन में योग्य नहीं होता है । उनकी परीक्षा दोषों के वर्ण से तथा वेदनाओं से करनी चाहिये । इन आर्त्तवों के प्रकारों में से कुणपगन्धि, ग्रन्थि, पूर्ति, पूय, क्षीण तथा मूत्र और मल के गन्धों से युक्त भर्त्तव असाध्य समझना चाहिये । इनके अतिरिक्त शेष साध्य समझना चाहिये ॥ ५ ॥

विमर्शः -- आर्तवों का और शुक्र का साम्य होने से, शुक्र के समान आर्तव के भी दोप समझना चाहिये । इसमें भी शुक्र की तरह साध्यासाध्यता होती है । शुक्र और आर्त्तवों के विकार कष्टसाध्य, असाध्य या साध्य होते हैं, किन्तु वे याप्य नहीं