श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 361–370
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 361–370
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१० सुश्रुतसहिता होते । व्याधि के स्वभाव के कारण ऐसा होता है । आर्त्तव क्षय के लक्षण ' यथोचित कालादर्शनमल्पता वा योनिवेदना च ' ऐसे है । उसमें योग्य काल में आर्चव नहीं आता है या आने पर भी उसकी मात्रा कम रहती है और योनि में पीड़ा होती है ।
भवन्ति चात्र-तेष्वाद्यान् शुक्रदोषांखीन् स्नेहस्वेदादिभिर्जयेत् ।
क्रियाविशेपैमतिमांस्तथा चोत्तरवस्तिभिः ॥ ६ ॥
इनसे से पहले तीन शुक्रदोष स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन और निरूह तथा अनुवासन वस्तिओं से, विशेष क्रियाओं के द्वारा तथा उत्तरवस्तिओं से शुक्रदोषों को जीतना चाहिये ॥ ६ ॥
विमर्शः – जो साध्य शुक्र दोष हैं उनको पञ्चकर्म द्वारा हितकर, वाजीकरण ओषधियों से, रक्तपित्तहर प्रयोगों से, जीव नीयघृत, च्यवनप्राश, शिलाजतु आदि के प्रयोगों से हरण करना चाहिये । वातिक शुक्रदोप में निरूह और अनुवासन उपयुक्त है । पैत्तिक दोपयुक्त शुक्र में अभयामलक रसायन हितकर | उसी प्रकार कफ से दूषित शुक्र में त्रिफला रसायन उत्तम है । इसके अतिरिक्त उत्तरवस्ति का प्राधान्य होने से उसका अलग निर्देश किया है । वह भी शुक्रदोषों में उपयुक्त है । यद्यपि पञ्चकर्म में यस्ति का विधान है तो भी उत्तरवस्ति का चिकित्सा में प्राधान्य बताने के लिए स्वतन्त्र नाम निर्देश किया है । पाययेत्तु नरं सर्पिर्भिपक् कुणपरेतसि ।
घातकीपुष्पखदिरदाडि मार्जुनसाधितम् ।
पाययेदथवा सर्पि. शालसारादिसाधितम् ॥ ७ ॥
कुणपगन्धि बीर्य की चिकित्सा – वद्य मुर्दों की गन्ध वाले वीर्य के लिये धाय के फूल, खैर की लकड़ी, अनार और अर्जुन की छाल द्वारा साधित या शालसारादिगण साधित घी का प्रयोग करे ॥ ७ ॥ से
विमर्श: - अब वीर्य के कष्टसाध्य विकारों पर उपाय बताते है - प्रथम शव की गन्ध वाला वीर्य ठीक करने के हिये धाय के फूल से, खैर की लकड़ी से और अनार तथा अर्जुन की छाल से सिद्ध किया हुआ घृत लेना चाहिये | इस घृत में १ मेर कल्क, चार सेर घी और सोलह सेर जल रहना चाहिये । मात्रा में यह घी आधा तोला रहना चाहिये । दूसरा घृत शालसारादि गण से सिद्ध किया हुआ लेना चाहिये । यहाँ गण के नाम का निर्देश किया है, इसलिये यही गण घृत बनाते समय फाय और कल्क दोनों में लेना चाहिये । यह घी बनाने के लिये क्वाथ्य द्रव्य ८ सेर, जल ६४ मेर, अवशिष्ट १६ सेर कपाय, ओषधि क्ल्क १ सेर, जल १६ सेर और ४ सेर घृत लेकर घी शेष रहने तक पकाना और जब फेन की शान्ति हो तब और मध्यम पाक होने पर निकाल लेना चाहिये । इम घृत की भी मात्रा छः मासे समझनी चाहिये । | ग्रन्थिभूते शटीसिद्धुं पालाशे चापि भस्मनि ॥ ८ ॥
ग्रन्थिभूत शुक्र को चिकित्मा - ग्रन्थिभूत वीर्य में शटी ( कचूर ) या पाठभेद मे अश्मभित्, अर्थात् पापाणभेद से घी बनाकर या पलाशचार से घी बनाना चाहिये ( ' शटीसिद्ध ' की जगह ' अश्ममिस्सिद्धम् ' पाठान्तर है । ) ॥ ८ ॥
विमर्श: - कचूर या पाषाणभेद से बनाये जाने वाले घृत में कल्क और काथ दोनों देना चाहिये और पलाश चार में
केवल भस्मोदक दिया जाता है ।
परूपकवटादिभ्यां पूयप्रख्ये च साधितम् ॥ ६ ॥
दोष युक्त शुक्र की चिकित्सा - परूपक गण से और वटादि गण से साधित घृत पूयाख्य शुक्रदोष में देना चाहिये ॥ विमर्श - पूय के समान निकलने वाला शुक्र ठीक करने के लिये परूपकादिगण और वटादि गण से सिद्ध किया हुआ घृत देना चाहिये । घृत बनाने के लिये दोनों गणों का कल्क और काढ़ा का प्रयोग करना चाहिये क्योंकि यहां गणों का निर्देश ' आदि ' पदसे किया है । परूपकादि गण में आठ औषधियां हैं । वे ये हैं -१ परूपक ( फालसा ), २ द्राक्षा ( काली मुनक्का ), ३ कट्फल ( कायफल ), ४ दाडिम ( अनार ) ५ राजादन ( खिरनी ), ६ कतकफल ( निर्मली ), ७ शाकफल ( सागवान का फल ) और ' त्रिफला ' परूपकादि गण, सुश्रुत सूत्रस्थान ३८ वें अध्याय में दिया है यथा परूपक- द्राक्षा-कट्फल दाडिम राजादन कर्तका फल शाकफलानि त्रिफला चेति । चटादि गण में २४ औषधियाँ हैं । वे १ न्यग्रोध ( वट ), २ उदुम्बर ( गूलर ), ३ अश्वस्थ ( पीपल ), ४ पुस ( पाकर ), ५ मधुक ( मुलेठी ), ६ कपीतन ( आम्रातक ), ७ कुकुभ ( अर्जुन ), ८ आम्र, ९ कोशास्त्र, १० चोरकपत्र ( लाक्षा वृक्ष ), ११ जम्बूद्रय ( जामुन और राजजामुन ), १२ प्रियाल ( चिरोंजी ), १३ मधूक ( महुवा ), १४ रोहिणी ( कट्फला ), १५ वल ( त ), १६ कदम्ब ( कदम ), १७ बदरी ( वेर ), १८ तिन्दुकी ( तेन्दु ), १ ९ सल्लकी ( सलाई - सर्ज भेद ), २० रोध ( लोध ), २१ सावर रोध ( शावर लोध्र ), २२ भल्लातक ( भिलावा ), २३ पलाश ( ढाक ) और २४ नन्दी-वृक्ष । यह भी गण सुश्रुत सूत्रस्थान ३८ वें अध्याय दिया है । में प्रागुक्तं त्रयते यच्च तत् कार्यं क्षीणरेतसि ॥ १० ॥
क्षीणरेतस को चिकित्सा - वीर्य क्षीण रहने पर स्वयोनि वर्धन द्रव्य से सूत्रस्थान के दोपादिविज्ञानीय नामक अध्याय में लिखे हुए और चिकित्सा स्थान ' क्षीणचलीय ' नामक २६ वें अध्याय में कहे जाने वाले कार्य करना चाहिये ॥ १० ॥
विमर्श: - शुक्र क्षीण रहने पर शुक्र बढाने वाले द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये । उसी प्रकार वाजीकरण प्रयोग करके शुक्र की वृद्धि करना चाहिये, उसके प्रयोग चिकित्सा स्थान में क्षीणवलीयवाजीकरण चिकित्सित अध्याय में दिये हैं ।
प्रशस्त गुण वाले हैं और अमोघ वीर्यवर्धक है ।
विप्रभे पाययेत् सिद्धं चित्रकोशीर हिडुभिः ॥ ११ ॥
( स्नेहादिश्च क्रमः कार्यः पदस्वेतासु विजानता-इत्यधिकः क्वचिदुपलभ्यते पाठः । ) पुरीपगन्धि शुक्र चिकित्सा - पुरीपगन्धि शुक्र में चित्रक, खस और हींग से घनाया हुआ घी प्रयोग करना चाहिये । शेष पाठ का अर्थ - ऊपर निर्दिष्ट छः शुक्रधिकारों में स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचनादि क्रम रखना चाहिये ॥ ११ ॥
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श्रव्याः २ ] शारीरस्थानम् ११ विमर्शः यहाँ विम और सूत्र वाचक है । यद्यपि पुरी और सूत्रान्त्रि वीर्य अमान्य माना गया है तो और मूत्र का दुर्गं दुखदायक होने से नमका निराकरण करने के लिए उपरि निर्दिष्ट घृत बताया है क्योंकि माय रोग साध्य नहीं हो सकता है । अधिक पाठ ६ का वपाय वेदनादि बताया है । यहां विवाद से और सूत्र गन्ध बारे ऐसा अर्थ निकाटने पर ही कृपगन्त्रि, ग्रन्यिनून वीर्यः पूयप्रन्य, भीगतम गैर मल तथा सूत्र गन्च वाले ये हा प्रकार होते हैं ।
निग्वं वान्तं विरितं च निमनुवासिनम् ।
योजयेच्छुदोषार्त्त सम्यगुत्तरवस्तिना ॥ १२ ॥
वागतत्रिन्वा — स्नेछन्, मन, विरेचन, निम्ति और अनुवासन यह शुक्रदोष वालों को देने के बाद उत्तर-वस्ति देश चाहिये ॥ ३२ ॥
त्रिस्शः - शुक्र दोषों की बग अलग चिकित्सा कहने के बाद मामान्य चिकित्सा सूत्र बनाने हैं । यहां यह ध्यान वर्षे किमों में स्वेदन किया नहीं दी गयी है । क्योंकि शुक्र यह सौम्य गुगवाला और स्वेदन यह प्रदर गुग वाला होने से विशेष न हो इसलिए स्वेदन का विधान नहीं बनाया है और यह चिकित्सा मी छः वीर्य दोषों की है । वे द्वेष कुगन्धि, ग्रन्यिनून, पूनम श्री और सूत्रान्बि, ये हैं । व शुक्र दोष लेने से ' वाद्यञ् शुक्रदोषांची स्नेहस्वेदादिभिजन ' इस वक्त के साथ विरोव होगा । अत्र तीनों दोषों से व्याह शुक्र के तीन विकारों को छोड़कर बाकी छ शुक्र दोषों का लेना ठीक है । उनग्वस्ति पुरुषों को शिन द्वारा और स्त्रियों को योनिमार्ग से दी जानी है ।
सनटिकामं तवं न्निग्यं मधुरं मधुगन्धि च ।
शुमिच्छन्ति केचित्तु तैलट्रोनिमं तथा ॥ १३ ॥
शुद्ध शुरुका लक्षण टिक के समान स्वच्छ, पनला, faee ( चिकना ), मीठा और लघु के समान वाटा शुक्र होता है यह मन सुयुत का है । दूसरों के मनों से विशुद्धवीर्य के समान या मधु के वर्ग का होता है । विमर्श - शुद्ध शुक्र का लद इसी जगह बताने का प्रयोजन स्पष्ट ही होगा कि ' वात - पित्त - केन- योगित - कुण पान्त्रि - प्रन्यि - पून पूर्ण - श्री - सूत्र - पुरीपचेतसः प्रतीपादने समय न भवन्ति ' इस वाक्य में कहे हुये दोषों का कैसे निराकरण करना चाहिये । यह बताने के बाद शुद्ध शुक्र । मन जरूरी हो जाता है, इसलिये उसका लग दिया है । शुक्र के लच्चन के क्षेत्रत्व, द्रवन्त्र ( liquid in from ), स्निग्व, narea और naffare दिया है । सर की परीक्षा चिदूकस नामकं पीत्रोपयोगी पत्र से की जाती है । इसमें बार या अम्ल के बर्न नहीं मिलेंगे । चार और पदार्थ एकत्र होने से प्राप्त होता है यह तो निन दही और नमक के प्रयोग से मालूम होता है और कार दुग्ब हुये । क्यान की विक्रिया पदार्थ के प्रयोग से की जाती है । परिणाम यह होता है कि टम जगह मधुरता लाने से जैसे कति को शान्ति जलद्वारा होती है उसी प्रकार चारदग्व की । गान्ति अन् य से होती है । कहा भी है ' अस्टेन मह | संयुक्त मीठो रम | माधुर्य भजतेऽत्ययं तीच्णभाव विमुखति मार्याच्ममानोति वह्निरद्भिरिवाप्लुतः ॥ बहुत | से आचार्यों के मन में शुद्ध शुक्र चैन्द्र और म के वर्ग का । होता है । उपर्युक्त तीन प्रकार के मतों का समन्वय परिणामों से स्पष्ट होगा । सफेद शुक्र का परिणाम गौरव की संतान के लिये है, तैल वर्ग के शुक्र से काला रह होता है, यथा-| ' तत्र शुक्रे शुक्ता वा गर्भस्य गौरवं तैलाने कृष्णवं सव्वा श्यामवन ' | टाइसंग्रह के मतानुसार वीर्य काल - ' तन् सौन्यं, निग्धं, गुरु शुक्ल, मन्त्रि, मथुरं पिन्छि, बद्दल, घृततैलचौद्वान्यतमवच शुक्रं गर्भावानयोग्यं भवति ' । चाक के मन में शुद्ध शुक्र का वर्णन निम्नप्रकार से: है - त्रिग्य बनं पिच्छिले च मधुरं चावाहि तः शुद्धं विजानीयाच्छुतं कविकसन्निभम् ॥ इंग्लि अन्यों में उसका वर्णन ऐसा है - The semen is liquid in form, viscid, neutral in reaction or alkaline. The odour of it though compared With other things still it his own recalisr smell इसका अभिप्राय यह है कि वीर्य निच्छिन्द्र रहता है, पतला होता है, चारीय प्रतिक्रिया । या निष्क्रिय होता है । उसकी गन्ध स्वतन्त्र होती है जिसका अनुभव की गन्वमे ही होता है । जिसकी तुलना दूसरी
चीजोंसे नहीं की जा सकती है ।
विधिमुत्तरवस्त्यन्तं कुर्यादा ॥ १४ ॥
आव चिकित्सा - आतंत्र शुद्धि के लिए उत्तरवति तक । चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १४ ॥
विमर्श -वशुद्धि के लिये भी शुक्रयुद्धि के समान ययादोष वमन विरेचनादि पञ्चकर्म करना चाहिये । जिस प्रकार का दोष हो उस प्रकार का पञ्चकर्मों में से कर्म करना चाहिये किन्तु नरवस्ति सव प्रकार के आतंत्र दोषों में देना चाहिये । टमी प्रकार वातहर द्रव्य मिलाकर टनका काय बनाकर freete और स्नेह मिलाकर fave aft देना चाहिये |
त्रीणां स्तंहादियुक्तानां चतसृष्वात्तेवार्त्तिषु ।
कुर्यात्कल्कान् पिचापि पय्यान्याचमनानि च ॥१५ ॥
स्नेहन स्वेदनाविकों से शुद्ध की हुई त्रियों की योनि में वात, पित्त, कफ और रक्त से दूषित गर्त्तत्रों की पीड़ा के दिये कक ग्ले, पित्रु ( Grauve ) धारण करे और दोषों के अनुकूल हितकर प्रचालनों ( Lotions ) का उपयोग करना चाहिये ॥ १५ ॥
विमर्श - यह शब्द से ही अर्थापत्ति से स्त्रियों का ग्रहण होता है वो भी स्त्रियों का निर्देश इमलिये किया है कि युवतियों का बोध हो । कुमपगन्धि और कुल्पशुक्राव रक्त से टम्पन्न होनेवाले शुक्रदोष पुरुषों में बतायें हैं, उसी प्रकार रक्त से उत्पन्न होने वाला कुणान्वित्व का ग्रहण इस जगह नहीं कर सकते हैं क्योंकि कुपणगन्वि असाध्य होता है । इसलिये कृपान्वि से विस्तगन्वि तात्पर्य है । का वर्णन
योनिश्यापन में दिया है ।
ग्रन्थिभूते पिवेत पाठां त्र्यूषणं वृक्षकाणि च ॥ १६ ॥
ग्रन्थिमून की चिकित्सा - अन्यियुक्त तंत्र में पड़ा,
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१२ सुश्रुतसंहिता
यूपण - सोंठ, मरिच और पीपल तथा वृक्षक ( मोखा ) इनका ।
काथ पीना चाहिये ॥ १६ ॥
विमर्श - यहाँ काथ्य द्रव्य दो तोला, जल सोलह गुणा और अवशिष्ट आठ तोला रहने पर उतार कर पिलाना चाहिये ॥
दुर्गन्धिपूयसङ्काशे मज्जतुल्ये तथाऽऽर्त्तवे ।
पिवेद्भद्रश्रियः क्वाथं चन्दनक्वाथमेव च ॥ १७ ॥।
दुर्गन्ध युक्त आर्तव के लिये - दुर्गन्धयुक्त, पूतिगन्धवाला, मक्षा के समान आर्त्तव होने पर सफेद चन्दन या रक्तचन्दन का कपाय देना चाहिये ॥ १७ ॥
विमर्श ॰ — यहाँ ' तथा ' पदसे मूत्र पुरीप का गन्ध समझना चाहिये । ' भद्रश्रिय. ' यहाँ ' भद्रश्रियं ' ऐसा भी पाठ है । भद्रश्री का अर्थ ' गोपीचन्दन ' ऐसा महाराष्ट्र भाषा में होता है । वह यहाँ अभिप्रेत नहीं है । वह तो केवल सफेद वर्ण का वैचपन्थीय लोगों के चन्दन के लिये होता है । उसमें दुर्गन्ध हरण करने की ताकत नहीं होती है ।
शुक्रदोपहराणां च यथास्वमवचारणम् ।
दोषाणां शुद्धिकरणं शेषास्त्रप्यार्त्तवार्त्तिषु ॥
अन्नं शालियवं मद्यं हित मास च पित्तलम् ॥ १८ ॥
वातादिदुष्ट आतवों की चिकित्सा- शुक्र दोष हरण करने वाली ओषधियों का आर्त्तव दोषों में भी प्रयोग करना चाहिये । इसमें शालिधान्य, जौ, मद्य, मांस तथा पित्तवर्धक हितकर है । विमर्श: - आर्त्तव के दोषों का शुक्र दोषों के समान स्नेहन स्वेदादिकों द्वारा निराकरण करना चाहिये । ' दोषाणाम् ' इस जगह ' योगाना ' भी पाठ है । वे योग रसायन, वाजीकरण इत्यादि मूत्रदोष प्रतिपेधके लिये लिखे हुये समझना चाहिये ।
शशासृक्प्रतिमं यत्तु यद्वा लाक्षारसोपमम् ।
तदार्त्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ॥ १६ ॥
( ' यद्वाऽप्सु न चिरव्यते ' पाठभेदः । ) शुद्ध आर्त्तत्र का लक्षण- आर्त्तव - दोप- निराकरण विधि बताने के बाद शुद्ध आर्त्तव का लक्षण बताते हैं- शुद्ध आर्त्तव खरगोश के रक्त के समान काला सा लाल होता है या लाचा रस तुल्य होता है । इसी प्रकार जिसको धोने से कपड़ा पर दाग न रहे ऐसा भार्त्तव प्रशंसनीय होता है । पाठ भेद के अनुमार जो पानी में घुल न सके ॥ १ ९ ॥ विमर्श - आधुनिक दृष्टि से २८ दिन के बाद प्राय ' गर्भा-शय से निकलने वाला रक्तस्राव ' आर्त्तव ' होता है । यह प्रायः ४ से ८ दिन तक भी रहता है । इसकी मात्रा: ( चार ) से १० ( दस ) औंम भी होती है । अर्थात् १० तोला से लेकर २५ तोला तक होता है । यह आयु के बारह वर्ष या उसके उपरान्त आरम्भ होता है । और ४० या १८ साल तक रहता है । किन्तु सगर्भावस्था में और दुग्धपानावस्था में बन्द रहता है | वृद्ध वाग्भट ने लिखा है कि- ' आर्त्तवं पुनः शश-धिरलाक्षारसोपम धौतं च विरज्यमानं शुद्धमाहुः ' इनका मत सुश्रुत के मत से मिलता है । व्यवहार में दोनों प्रकार के आर्त्तव मिलते हैं । प्रथम जो कपडा में लगा धोने से छूट सके । जैसे शुक्र का धन्ना नहीं छूटता है उसी प्रकार आर्त्तव का भी त्रा नहीं छूटना चाहिये । चरकसहिता में इसका ऊहापोह किया ही नहीं । उनके मत के अनुसार- ' गुजफलसवर्ण च
पद्मालक्ककसन्निभम् । इन्द्रगोपकसङ्काशमार्त्तवं शुद्धमेव तत् ॥
मासान्निपिच्छदाहाति पञ्चरात्रानुबन्धि च । नैवातिबहुला-स्यल्पमार्त्तवं शुद्धमादिशेत् ' | यह लक्षण है । अर्थात् जो गुञ्जाफल ( घुघुची ), लाल कमल या भलता ( टाक्षारस ) अथवा वीरबहूटी के समान वर्ण वाला हो उसे ' शुद्ध आर्जव ' समझना चाहिये | और महीने के बाद निकलने वाला, पिच्छिलता से रहित, जलन और पीड़ा से शून्य, पाँच दिन रहने वाला तथा जो परिमाण अत्यधिक और अति न्यून न हो उसे शुद्ध समझना चाहिये । आर्त्तव काल समाप्त होने के बाद स्त्री डिम्ब शुक्र कीटाणु के साथ मिलने के लिये उत्सुक होता है । इसीलिये यह काल गर्भाधान के लिये योग्य माना गया है । तदेवातिप्रसङ्गेन प्रवृत्तमनृतावपि 1 अमृग्दरं विजानीयादतोऽन्यद्रक्तलक्षणात् ॥ २० ॥
असुन्दर का लक्षण - वही आर्त्तव अतिमैथुन के कारण, ऋतुकाल से भिन्न समय में होने वाला और उक्त आर्तव से भिन्न लक्षण वाला होने से ' असृग्दर ' या ' रक्तप्रदर ' कहा जाता है ॥ २० ॥
विमर्श: - ' अतोऽन्पद्वक्तलक्षणात् ' इस जगह ' उक्त लक्षण-लक्षितम् ' ऐसा पाठ है । इसका अर्थ ' शशासृक्प्रतिमम् ' इस प्रकार का लक्षण चाहिये न कि रक्तपित्त के गुण वाला । प्राय रक्तपित्त और असुन्दर ये दोनों विकार एक दूसरे से भ्रम उत्पन्न करने वाले होते हैं । ' अतिप्रसङ्गेन ' इसका अर्थ-' बहुत समय तक, अत्यधिक मात्रा में ' ऐसा भी होना है । कम मात्रा में होने वाला आर्त्तव यदि ऋतुभिन्न काल में आवे तो भी उसे ' असृग्दर ' समझना चाहिये न कि रक्तपित्त । रक्तपित्त और असृग्दर का भेद: -असृग्दर-१ नियत क्रम से आने वाला । । २ योनिमार्ग से ही आता है । ३ गन्ध रहित । ४ इन्द्रगोपकसङ्काश । ५ कम दिन रहने वाला । रपित्त-१ अनियत क्रमसे आने वाला । २ गुदामार्ग और मूत्रमार्ग से भी आता है । ३ दुर्गन्ध युक्त | ४ नीला, पीला, हरे वर्ण का । ५ बहुत दिन रहने वाला । ६ अधिक पतला भी नहीं और ६ गाढ़ा न होने वाला । ज्यादा गाढ़ा भी नहीं । ७ पिपीलिका और मक्षिकाओं ७ पिपीलिका और मक्खियों को प्रिय । को अप्रिय । असृग्दरो भवेत् सर्वः साङ्गमर्दः सवेदनः । तस्यातिवृत्तौ दौर्बल्यं भ्रमो मूर्च्छा तमस्तृपा ( मदस्तृपा ' पा ० ' ) दाहः प्रलापः पाण्डुत्वं तन्द्रा रोगाश्च वातजाः ॥२१ ॥
असृग्दर का लक्षण - सम्पूर्ण रक्तप्रदर में अन में पीड़ा और । वेदना होती है । उसी के अधिक बढ़ने पर दुर्बलता, भ्रम, मूर्च्छा ( fits- आंखों के सामने अघेरा ), तम, तृपा ( प्यास ), बदन में उष्णता का अनुभव, प्रलाप, पाण्डुता ( Anaemia ), तन्द्वा और वात के दूसरे विकार ( वातज रोग ) उत्पन्न होते हैं । विमर्शः -- यहां सामान्य रक्तप्रदर के और अतिवृद्ध रक्त •
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अध्याय ' २ ] शारीरस्थानम् १३ प्रदर के लक्षण बताये हैं । तन्द्रा - यह निद्रा का भेद है-' निद्रार्त्तस्यैव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ' । वातज रोग आक्षेप आदि समझना चाहिये । असृग्दर की अधिक वृद्धि होने मे तीनों दोषों का सम्बन्ध दिखाई देता है परन्तु सामान्य असुग्दर में केवल एक ही दोष का वर्णन है ।
तरुण्या हित से विन्यास्तमल्पोपद्रवं भिषक् ।
रक्तपित्तविधानेन यथावत् समुपाचरेत् ॥ २२ ॥
अल्पोपद्रुन रक्तप्रदर की चिकित्सा -- हितकर आहार- बिहार का सेवन करने वाली, तरुणी, थोड़े उपद्रव वाली स्त्री को रक्तपित्त की चिकित्साविधि से यथावत् ओषधि दे ॥ २२ ॥
विमर्श. - आयु में न तो बाला रहे न प्रौढा और न वृद्धा हो किन्तु पोडशवर्ष से ३० वर्ष की हो तथा उसका आहार विहार रोग को बढ़ाने वाला न होता हो, प्रदर के लक्षण बढ़े हुये न हों तो, रक्तपित्त में जो हितकर आहार - विहार हो उन्हें कराकर चिकित्सा करनी चाहिये । रक्तपित्त के विकार में वासा ( अडूसा ) का प्रयोग करना चाहिये । यथा - ' वासाया विद्यमानत्वे आशाया जीवितस्य च । रक्तपित्ती चयी कासी किमर्थमवसीदति ' । दोषैरावृतमार्गत्वादार्त्तवं नश्यति स्त्रियः ।
तत्र मत्स्यकुलत्थाम्लतिलमापसुरा हिताः ।
पाने मूत्रमुदश्विञ्च दधि शुक्तं च भोजने ॥ २३ ॥
नष्टात्र का कारण और चिकित्सा - जब बात और कफ । दोपों मे आतंत्रवाहिनी शिराओं का मार्ग रुक जाय तो । नष्टार्त्तव होता है । उसके लिये भोजनार्थ मछली, कुलथी, खट्टे पदार्थ, तिल, उड़द, मद्य, गोमूत्र, छाछ, दही और मिरका देना चाहिये ॥ २३ ॥
विमर्श: - यहाँ ' दोष ' पद मे चात और कफ या द्वन्द्वज से सम्बन्ध है । पित्त का सम्बन्ध होने से आर्त्तव की अति प्रवृत्ति होती है । मत्स्य, कुलस्य इत्यादि पदार्थ भी वात और कफ दोपहर हैं । बे पित्तदोष का हरण नहीं करते । इससे भी यह मिट्ट होता है कि नष्टार्त्तव के लिये बात और कफ ये ही दो दोष कारण होते हैं । उदश्वित् ( छाछ ) में आधा पानी दही में मिलाया हुआ रहता है । ' नश्यति ' ऐसा कहने से ' आर्त्तव बिलकुल नष्ट हो जाता है ऐसा नहीं किन्तु निकलता हुआ दीखता नहीं ' इतना ही उसका अभिप्राय है |
क्षीणं प्रागीरितं रक्तं सलक्षण चिकित्सितम् ।
तथाऽप्यत्र विधानव्यं विधानं नष्टरक्तवत् ॥ २४ ॥
क्षीगाचंव की चिकित्सा - क्षीणार्त्तव के लक्षण तथा चिकित्सा पूर्व ( सूत्रस्थान- दोषधातुमलक्षयवृद्धिविज्ञानीय अध्याय ) में दिया है । तथापि नष्टार्त्तव के सदृश चिकित्सा करनी चाहिये ॥ विमर्श: धीणा के निम्न लक्षण होते हैं और उसकी चिकित्सा भी दी जाती है - ' आर्त्तवदये यथोचितकाला दर्शनमल्पता वा योनिवेदना च । तत्र संशोधनमाग्नेयानाञ्च द्रव्याणां विधिवदुपयोग । ' आर्त्तव का क्षय होने से योग्य काल में आर्त्तव का दर्शन नहीं होता है या कम आर्त्तव होता है और योनि में वेदना होती है । उस समय संशोधन और
आप्नेय इव्यों का विधिपूर्वक उपयोग करना हितकर है ।
एवमदुष्टशुक्रः शुद्धार्त्तवा च ॥ २५ ॥
इस प्रकार शुद्ध शुक्र और शुद्ध आर्त्तव होता है ॥ २५ ॥
विमर्श: - यहाँ ' शुद्धार्त्तवा च ' इसके बाद ' भवति ' का अध्याहार करना चाहिये । इस प्रकार के पुरुष और स्त्री प्रजोत्पादन के लिये समर्थ होते हैं । जैसे-- उत्तम क्षेत्र और बीज अनुकूल ऋतु और नल के सम्पर्क से अडर उत्पन्न करते हैं । उसी प्रकार शुद्ध शुक्र वाला पुरुष और शुद्ध आर्त्तव वाली स्त्री उत्तम सन्तान उत्पन्न कर सकती है । ऋनौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नाञ्जनाश्रुपातस्नानानुलेपनाभ्यङ्गनखच्छेदन-प्रधावनहसनकथनातिशब्दश्रवणात्रलेखन निलायासान् परिहरेत् । किं कारणं? दिवा स्वपन्त्या ' स्वापशीलः, अञ्जनादन्धः रोदनाद्विकृतदृष्टिः, स्नानानुलेपनाद् दु खशीलः, तैलाभ्यङ्गात् कुष्ठी, नखापकर्त्तनात् कुनखी, प्रधावनाञ्चञ्चलः, हसनाच्छ चावदन्तोष्ठतालुजिह्न, प्रलापी चातिकथनाद्, अतिशब्दश्रवणाद्वधिर.; अव-लेखनात् खलति, मारुतायाससेवनादुन्मत्तो गर्भो भवतीत्येवमेतान् परिहरेन ॥ २६ ॥
ऋतुकाल में वर्ज्य – ऋतुकाल में पहले दिन से ही ब्रह्मचारिणी होकर, दिन में सोना, आंख में अञ्जन करना, रोना, स्नान, चन्दन आदि का शरीर पर अनुलेपन, तेल का अभ्यङ्ग, नखों का काटना, दौड़ना, हँसना, बोलना, बहुत ऊँचे शब्द का सुनना, अचलेखन ( सिर में कंघी करना ), वायुमेवन करना इत्यादि कमाँ को त्याग देना चाहिये । क्योंकि दिनमें सोने से बच्चा निद्रालु, अञ्जन करने से अन्धा, रोने से विकृतदृष्टि वाला, स्नान या उबटन करने से दुःखी, तैलमर्दन से कोढी, नस्लों को काटने से बुरे वाला, दौड़ने से वच्चा चचल होता है । हँसने से दांत, ओष्ठ, तालु और जिह्वा ये सब काले होते हैं, अधिक बोलने से बच्चा वकवादी होता है, उच्च शब्द सुनने से बधिर, केशसमार्जन से ( गंजा ), वायु सेवन और परिश्रम से गर्भस्थित बा उन्मत्त होता है । इसलिये उपरिनिर्दिष्ट बातें छोड़ देनी चाहिये ॥ २६ ॥
विमर्श - ऋतुकाल गर्भधारण योग्य काल को कहते हैं । वृद्ध वाग्भट ने लिखा है कि- ' ऋतुस्तु दृष्टार्त्तवो द्वादशरात्रं भवति, पोढदारात्रमित्यन्ये । शुद्धयोनिगर्भाशयार्त्तवाया मासमपि के चित् । तद्वददृष्टार्त्तवोऽप्यस्तीत्यपरे ' ऋतुकाल आर्त्तव के बाद बारह दिन का होता है । किसी के मत में ( १६ ) सोलह दिन है । कोई कहते हैं कि -योनि, गर्भाशय और आर्त्तव शुद्ध हो तो एक महीने तक भी हो सकता है । उसी प्रकार कतिपय स्थितियों में अदृष्ट आर्त्तव होने को भी ऋतुकाल मानते हैं । दुर्भसस्तरशायिनीं करतलशरावपर्णान्यतमभी-जिनीं हविष्यं, त्र्यहं च भर्तुः संरक्षेत् । ततः शुद्ध-स्नातां चतुर्थेऽहन्यहतवासां समलङ्कृतां कृतमङ्गल-स्वस्तिवाचनां भर्त्तारं दर्शयेत् ॥ २७ ॥
ऋतुकाल के नियम - दर्भ ( कुश ) के बिछोने पर सोने
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सुश्रुतसंहिता वाली, हाथ, मृत्पात्र या पत्तों पर हविष्यान्न भोजन करने वाली स्त्री तीन दिन तक पति से अलग रखना चाहिये । पश्चात् चौथे दिन स्नान द्वारा शुद्ध होकर अच्छे कपडे ।
पहिना कर, आभूषणादि द्वारा विभूषित तथा मङ्गलपाठ ।
और स्वस्तिवाचन कराकर पति का दर्शन कराना चाहिये ॥ ।
विमर्श: --- चारपाई पर न सोवे तथा घी, दूध और भात । का सेवन करे | बाद शुद्धा याने पुराना शोणित निकलने के बाद खान किये हुई ऐसी स्त्री को पति का दर्शन । कराना चाहिये । कहा भी है- ' नवे ऋतौ ( तनौ ' पा ० ' ) च सक्षाते विगते जीर्णशोणिते । नारी भवति संशुद्वा पुंसा सृज्यते तदा ' इति । तत् कस्य हेतोः?
पूर्व पश्येतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना ।
तादृशं जनयेत् पुत्रं भर्त्तारं दर्शयेदतः ॥ २८ ॥
इस प्रकार करने का फल -- पहिले पति का दर्शन कराना चाहिये ऐसा क्यों ऋतुस्राता स्त्री प्रथम जिस प्रकार के पुरुष । को देखेगी वैसे ही सन्तान को जन्म देती है इसलिये पहले उसे पति का ही दर्शन कराना चाहिये ॥ २८ ॥
विमर्श: -- इस श्लोक में पति ही पतिव्रता स्त्री का आराध्य देव होता है । इसलिये उसकी भी इच्छा पतिदर्शन के लिये । रहती है, और पति के गुणावगुण स्त्री को प्यारे रहने से उसी प्रकार की सन्तान की इच्छा उसके हृदय में रहती है, अतः उसके ही पति का दर्शन करवाना चाहिये ।
ततो विधानं पुत्रीयमुपाध्यायः समाचरेत् ।
कर्मान्ते च क्रमं ह्येनमारभेत विचक्षणः ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् सन्तान के लिये हितकर कर्म करे - इसके बाद उपाध्याय से पुत्र के लिये feast कर्म करना चाहिये । और उस कार्य की समाप्ति होने के उपरान्त निम्नलिखित कार्य पति को करना चाहिये ॥ २ ९ ॥ विमर्श - पतिदर्शन के अनन्तर उपाध्याय से पुत्र संता-नोत्पत्ति के लिये मग पाठ, स्वस्तिवाचन, यज्ञकर्म इत्यादि कराना चाहिये । पुत्रीयविधान निम्न लिखित प्रकार से होता हैः- यदि यजमान ब्राह्मण हो तो उसे सफेद और अध्यह्न कपड़ा पहनाकर मृगचर्म पर बैठावे, राजा हो तो व्याघ्र के चर्म पर बैठावे, वैश्य को रुरु के चर्म पर और शुद्ध हो तो बकरे के आसन पर बैठावे । चार हाथ का स्थण्डिल ( चबू-तरा ) बनाकर गोबर से लीपे, उसपर कुश से उल्लेखन करे, स्थण्डिल के चारो ओर बास के काष्टों को फैलावे, दक्षिण की ओर ब्रह्मा की स्थापना करे, श्वेत पुष्प, गन्ध, वलियों से पूजा करे, अग्नि लावे, पलाश की समिधा से अग्नि का संस्कार करे, अग्नि के सामने मन्त्रोपधि से भरा हुआ जल का पात्र रखे, मन में पुत्र जन्म की आशा रखते हुए महाव्याहृति से घी का हवन करना चाहिये । पति के साथ स्त्री अग्नि के पश्चिम दिशा में और ऋत्विज के दक्षिण दिशा में बैठे । इसके बाद प्रजापति को उद्देश्य करके इच्छित कार्य सम्पादन करने के लिये मन से पुत्रोत्पत्ति के लिये काम्य दृष्टि का विधान करे । विष्णु दम्पति के लिए सतान है, ब्रह्मा उसके स्वरूप की रचना करें । तदनन्तर स्थालीपाक बनाकर । तीन बार हवन करे । तत्पश्चात् मन्त्रयुक्त जलपात्र यजमान को देना चाहिये । पत्नी को दक्षिण पैर से प्रारम्भ करते हुए प्रदक्षिणा करना चाहिये । ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराना चाहिये । पति के साथ स्त्री को शेपघृत का प्राशन करना चाहिये । प्रथम पुरुष को घी देवे तत्पश्चात् स्त्री स्वयम् अव शिष्ट घृत का पान करे । ततो s पराह्ने पुमान् मासं ब्रह्मचारी सर्पि स्निग्धः . सर्पिःक्षीराभ्यां शाल्योदनं भुक्त्वा मासं ब्रह्मचारिणीं तैलस्निग्धां तैलमापोत्तराहारां नारीमुपेयाद्रात्रौ सामादिभिरभिविश्वास्य विकल्प्यैवं चतुर्थ्या पष्ठयाम-टम्यां दशम्यां हवन के बाद सायंकाल में जो घृत द्वारा स्निग्ध को खाकर, एक स्त्री को तैल से जिनमें अधिक द्वादश्यां चोपेयादिति पुत्रकाम ॥ ३० ॥
का कर्त्तव्य - पुत्रीय विधान करने के पश्चात् पुरुष एक मास तक ब्रहाचारी रहा हो और हुआ हो, वह दूध और घी से शालि चावलों महीना से ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने वाली स्निग्ध कराके तेल और उड़द की मात्रा हो ऐसा आहार खिला कर, साम, दाम इत्यादि मीठी - मीठी बातों से आश्वासन देकर, पुत्र की इच्छा करने वाले पुरुष को चौथी, छठीं, आठवीं, दशवीं और चारहवीं रात्रि में सम्भोग करना चाहिये ॥ ३० ॥
विमर्श: -- पुरुष को घृत से स्निग्ध कराके और स्त्रो को तेल से तदनन्तर पुरुष को घृत, दुग्ध युक्त और स्त्री को तैल, उदद आदि मिश्रित अन्न देकर सामान्य पुत्र - जनन काल जो ऋतुकाल है उन दिनों में पुत्र की इच्छा वाले को ४, ६, ८, १०, १२ वीं रात्रि में सम्भोग करना और पुत्री की भाशा रखने वालों को ५, ७, ९, ११ वीं रात्रि में गमन करना चाहिये ।
एपूत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च ।
प्रजासौभाग्यमैश्वर्य बलं च दिवसेषु वै ॥ ३१ ॥
उत्तरोत्तर की रात्रियों में गमन करने से लाभ - टक्त रात्रियों में सम्भोग करने पर उत्तरोत्तर आयुष्य, आरोग्य, पौरुप, प्रजा, सौभाग्य, ऐश्वर्य और वल की अधिकाधिक प्राप्ति होती है । विमर्शः -- ऋतुकाल के चौथे दिन की अपेक्षा छुटी रात, छठी से आठवी, आठवीं से दसवीं और उससे बारहवीं रात अच्छी होती है । इस लिये उत्तरोत्तर दिनों में स्त्री गमन करना चाहिये । अतः परं पञ्चम्यां सप्तम्या नवम्यामेकादश्यां च स्त्रीकामः । त्रयोदशीप्रभृतयो निन्द्या. ॥। ३२ ॥ पुत्री पैदा होने के लिये दिन- पुत्री की इच्छा करने वाले | आदमी को पञ्चमी, सप्तमी, नवमी या एकादशी रात्रि में गमन करना चाहिये | त्रयोदशी से लेकर शेष सब रात्रियों को निषिद्ध समझना चाहिये ॥ ३२ ॥
विमर्श: -- पुत्र के दिन से अतिरिक्त दिन पुत्री के लिये है । चिपम ( odd ) नम्बर पुत्री के लिये और HTM even ) नम्बर पुत्र के लिये है । इसमें भी उत्तरोत्तर दिन शुभफलप्रद समझने चाहिये । दोष सोलह दिन तक या किसी के मत से । तीस दिन तक अशुभ दिन समझने चाहिये । तत्र प्रथमे दिवसे ऋतुमत्यां मैथुनगमनमनायुष्य पुंसां भवति, यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो
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श्रध्यायः २ ] शारीरस्थानम् विमुच्यते ( ' प्राणैः ' पा ० ) । द्वितीयेऽप्येवं सूतिकागृहे वा, तृतीयेऽप्येवमसम्पूर्णाङ्गोऽल्पायुर्वा भवति । चतुर्थे तु सम्पूर्णाङ्गो दीर्घायुश्च भवति । न च प्रवर्त्तमाने रक्ते बीजं प्रविष्टं गुणकरं भवति, यथा नद्यां प्रतिस्रोतः लाविद्रव्यं प्रक्षिप्तं प्रतिनिवर्त्तते नो गच्छति तद्वदेतद् द्रष्टव्यम् । तस्मान्नियमवतीं त्रिरात्रं परिहरेत् । अतः परं मासादुपेयात् ॥ ३३ ॥
ऋतुमती के साथ संभोग करने से दोप ' - ऋतुकाल के चार दिनों में से पहले दिन में मैथुन करने से पुरुष की आयुष्य का नाश होता है । उसी समय यदि गर्भ रहेगा भी तो वह पैदा होते ही मरता है । दूसरे दिन में मैथुन करने से जन्मतः ही सन्तान मरता है या प्रसूतिगृह में ही अर्थात् दस दिन के भीतर मरता है । तीसरे दिन में भी मैथुन करने से द्वितीय दिन के समान मृत्यु को प्राप्त होता है । चौथे दिन में संभोग करने से बचा संपूर्ण अङ्गयुक्त होकर दीर्घायु होता है । यदि भाव होता ही रहे तो शुक्र ( बीज ) पढ़ने से भी फलप्रद नहीं होता है, जैसे नदी के प्रवाह में ढाला हुआ तैरने वाला पदार्थ ऊपर को न जाता हुआ वापिस चला आता है । उसी प्रकार आर्त्तवस्त्राव वाली स्त्रियों में शुक्र के कीटाणु बाहर फेके जाते हैं । इस लिये नियम का पालन कराते हुए स्त्री को अलग रखना चाहिये । तदुपरान्त मासिकधर्म समाप्त होने पर मैथुन कर सकते है ॥ ३३ ॥
विमर्श: -- ऋतुकाल के तीन दिनों तक मैथुन से प्रजाहानि होने के कारण चौथे दिन गमन करना उचित है । अनेक स्त्रियों में आर्त्तव स्राव ८ दिन भी होता है । इस लिये स्राव के दिनों को छोड़ कर बाद में मैथुन करना चाहिये । चार दिन के पहिले गमन करने से गर्भ रहने पर भी गर्भ का स्राव होता है । एक मास के बाद यदि पुनः ऋतु प्राप्त न हो तो गर्भ रहा ऐसा समझ कर फिर से गमन नहीं करना चाहिये । लव्धगर्भायाश्चैतेष्वहःसु लक्ष्मणा वटशुङ्ग सहदेवा-विश्वदेवानामन्यतमां क्षीरेणाभिषुत्य त्रींश्चतुरो वा बिन्दून् दद्याद्दक्षिणे नासापुटे पुत्रकामायै ( ' वामे दुहितृका -मायै ' अधिकः पाठः क्वचित्पुस्तके ) न च तान्निष्ठीवेत् ॥ पुत्र की इच्छा रखने वालों के लिये प्रयोग - - जब गर्भ रह जाय तो लक्ष्मणा, वटपत्र के नवीन अडर, सहदेवी ( पीत पुष्पा - कधी ), विश्वदेवा ( गगेरन ), इनमें से किसी एक को दूध के साथ पीस कर पुत्र की इच्छा वाली स्त्री के दाहिने
नासापुट में तीन चार चूद डालना चाहिये । वह उसे न थूके ।
कन्या की इच्छा वाली स्त्री के वाम नासापुट में देना चाहिये ॥
विमर्श: - लक्ष्मणा की परीक्षा उसके लक्षण से होती है— ' पुत्रकाकार रक्ताल्पविन्दुभिर्लातिच्छा | लक्ष्मण पुत्र जननी वस्तगन्धाकृतिर्भवेत् ' इसकी जड़ का आकार गोल लम्बा सा होता है । इसकी पत्ती लाल और छोटे छोटे बिन्दुओं से व्याप्त रहती है । बकरी के अंग की गन्ध सहश इसकी गन्ध होती है । इस प्रकार वनस्पति की परीक्षा कराके, फल पुष्प वाली लक्ष्मणा को शरद ऋतु में शनिवार के दिन रात के आखीर समय के काल में वनस्पति के चारों ओर खैर को १५ खूटी गाढे तथा दूसरे दिन हस्त, मूल, या पुण्य नक्षत्र में सूर्य धाने से मन्त्रपूर्वक उस वनस्पति को उखाडना चाहिये । ' लब्धगर्भायाश्च ' इस जगह चकार ' अलब्धगर्भा ' का बोध होता है । गर्भ प्राप्त होने के पूर्व भी नस्य देकर पाँच दिन तक दूध भात खिलाना चाहिये । उसके बाद प्राम्य धर्म का सेवन करे । गर्भ रहने पर उसे स्थिर करने के लिये और स्थिर गर्भ होने के बाद पुत्रप्राप्ति के लिये नस्य देना चाहिये ।
ध्रुवं चतुर्णां सान्निध्याद्गर्भः स्याद्विधिपूर्वकः ।
ऋतुक्षेत्राम्बुबीजानां सामग्य्यादङ्कुरो यथा ॥ ३५ ॥
गर्म और अकुर का साम्यः - अनुकूल ऋतु, हल जुता हुआ क्षेत्र, वर्षाकाल का जल या केवल जल और वीज इनकी सामग्री से जिस प्रकार अङ्कुर उत्पन्न होता है उसी प्रकार ऋतु काल, शुद्धगर्भाशय, आहार रस और शुक्र - शोणित के एकन्न सहवास होने से गर्भ की प्राप्ति होती है ॥ ३५ ॥
विमर्श: - इन चारों पदार्थों के एकत्र सहवास होने से और उनका विधिपूर्वक उपयोग करने से गर्भ की उत्पत्ति होती है । इनमें से एक या दो या तीनों के रहने पर भी गर्भो-श्पत्ति नहीं होती है । उसी विधि का पालन करते हुए एक होना चाहिये । नहीं तो खारी क्षेत्र है, दूषित बीज है, अति दृष्टि, अनावृष्टि से युक्त वर्षा काल है और विकृत ऋतु है । इनमें एक के भी रहने पर जैसे अङ्कुर उत्पन्न नहीं होता उसी प्रकार गर्भ भी चारों पदार्थों के शुद्ध रहने पर ही उत्पन्न होता है । एवं जाता रूपवन्तः सत्त्ववन्तश्विरायुषः । ( महासत्त्वाश्चिरायुषः ' पा ० ' ) भवन्त्यणस्य मोक्तारः सत्पुत्राः पुत्रिणे हिताः ॥ ३६ ॥
विधिपूर्वक गर्भधारण का फल - इस प्रकार विधिवत् उत्पन्न होने वाले सत्पुत्र, सौन्दर्यवान, बलवान, दीर्घायु, पिता के ऋण को चुकाने वाले और माता पिता को सौख्य देने वाले होते हैं ॥ ३६ ॥
विमर्श: -- सुन्दर और गठीले शरीर वाले, रजोगुण और तमोगुण से विहीन, आरोग्य वाले और पिता के ऋण को चुकाने वाले ( सन्तति को पैदा करने वाले ) ऐसे सन्तान होते हैं । तत्र तेज धातुः सर्ववर्णाना प्रभवः, स यदा गर्भो -त्पत्तावन्धातुप्रायो भवति तदा गर्भ गौरं करोति, पृथि-वीधातुप्रायः कृष्णं, पृथिव्याकाशधातुप्रायः कृष्णश्यामं, तोयाकाशधातुप्रायो गौरश्यामम् । यादृग्वर्णमाहारमुप-सेवते गर्भिणी तादृग्वर्णप्रसवा भवतीत्येके भाषन्ते ॥ वर्णोति के कारण - बालकों का वर्ण तेजो धातु से उत्पन्न होता है । वह तेज जब गर्भोत्पत्ति में जलधातुप्राय होता है, ( जलीयांश के आधिक्य से युक्त होता है ) तो गर्भ गौर वर्ण का होता है । यदि वही तेजो धातु पृथ्वी धातु के आधिक्य से युक्त होता है तो गर्भ कृष्ण वर्ण का उत्पन्न होता है । पृथ्वी और आकाश धातु के आधिक्य से कृष्ण - श्याम तथा जल और आकाश धातु की अधिकता से गौर श्याम वर्णं होता है । | कई आचार्यों का मत है कि - जिस वर्ण का आहार गर्भिणी । सेवन करती है उसी वर्ण की सन्तान पैदा होती है ॥ ३७ ॥
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१६ सुश्रुतसहिता विमर्श -यह तेजो धातु लब गर्भाधान काल में अन्य धातुओं के साथ मिलती है तो भिन्न भिन्न वर्णों को उत्पत्ति होती है । जिस प्रकार का आहार गर्भिणी को मिलेगा उसी प्रकार के आहार के वर्ण की सन्तान होती है । इस तत्व के अनुमार, व्यवहार में भी सबेरे घी और हल्दी युक्त त्रिचडी । देने की प्रथा है । शरीर के रक्षक पदार्थ ( pigments ) शीत या उष्ण स्पर्श के अनुसार शरीर का वर्ण बदल देते हैं । शीत काल में, शीत प्रदेशों में शरीर का वर्ण गौर होता है और वही वर्णं उष्ण काल में, उष्णप्रदेशों में कृष्ण होता है । निम्न लिखित कोष्टक ( Table ) शुक्र के वर्ण के अनुसार, प्रदेशानु । कूल, पचमहाभूतों के सम्बन्ध से और भोजन द्रव्यों अनुमार बनाया है-शुक्र 1 शुक्र तैलाभ शीत प्रदेश, उष्णप्रदेश, क्षीरादिमधुरगण से तिलआदिविदाही पदार्थों से तेजोधातु तेजोधातु जलधातुप्राय । पृथ्वीधातुप्राय । अष्टसंह गौरवर्णः कृष्णवर्णः के मत से तेजो धातु तेजो धातु भू उदक, आकाश और वायु के सम्पर्क तत्र दृष्टिभागमप्रतिपन्नं तेजो तदेव रक्तानुगतं रक्ताचं, पित्तानुगतं मध्वाभ 1 समशीतोष्ण विदाही और मथुर vetries for or | वहार से 1 तेजोधातु पृथ्वी आकादश धातुप्राय श्यामवर्णः 1 सर्व धातु-साम्य से जात्यन्धं करोति, पिङ्गाक्षं, श्लेष्मानु गतं शुक्लाक्षं, वातानुगतं विकृताक्षमिति ॥ ३८ ॥
तेजोधातु का नेत्र के ऊपर परिणाम- जय तेजोधातु दृष्टि भाग में नहीं पहुँचता तो गर्म जन्म से अन्ध होता है, जब वह तेजो धातु रक्त के साथ मिलता है, तो लाल आंख करता है, पित्त सम्बन्धित होने से पीली आंख वाला, कफ से युक्त होने से श्वेत आंख वाला और बात से अनुगत होने पर तिरछे आंख वाला गर्म पैदा होता है ॥ ३८ ॥
विम: - चतुर्थ मास में पूर्व कर्म के कारण यदि तेजो धातु चतुरिन्द्रिय को प्राप्त नहीं होता है तो बालक जन्मतः अन्धा होता है । Syphalis का असर होने पर भी गमों के नेत्र में विकृति होती है । क्योंकि Syphalis में शरीर तेजो. धातु विकृत रहता है ।
घृतपिण्डो यथैवाग्निमाश्रितः प्रविलीयते ।
विसर्पत्यार्त्तवं नार्यास्तथा पुंसां समागमे ॥ ३६ ॥
स्त्रियों का आर्श्वव शुक्र के साथ कैसे मिलता है - जिस प्रकार अग्नि के ऊपर रखा हुआ घी का गोला पिघलता है । उसी प्रकार स्त्रियों का नूतन आर्त्तव जो कि गाढ़ा रहता है वह पुरुषों के माथ समागम करने से द्रवित होकर गर्भाध्पत्ति के लिये शुक्र के समागम में प्रयुक्त होता है ॥ ३ ९ ॥ विमर्श: - आव यह दो प्रकार का माना जाता है । पुराना आर्त्तव तीन दिन से लेकर आठ दिन भी कभी कभी बहता है । नया आर्त्तव थोड़ा होता है । और वह गाढ़ा बन कर रहता है । अब यह शङ्का पैदा होती है कि गाढ़ा आव शुक्र से कैसे मिलेगा? इसलिये घृत का और अग्नि का दृष्टान्त देते हुये बताते हैं कि वह नया आर्त्तव पुरुष के समागम से पिघलता है और वही शुक्र के साथ मिलकर गर्भस्पत्ति कर देता है । जिस प्रकार नूतन आर्त्तव का क्षरण होता है उसी प्रकार खियों के शुक्र का भी क्षरण होता है किन्तु वह गर्भो त्पत्ति के लिये अनुपयुक्त होने से उसका विचार नहीं किया गया है । श्रीशुक्र विचार - वृद्धवाग्भट में लिखा है- ' योपि तोऽपि स्रवन्त्येव शुक्रं पुंसां समागमे । तन्न गर्भस्य किचित्तु करोतीति न चिन्त्यने ॥ ( अ ० सं ० शा ० अ ० ) अब यहां यह शङ्का नहीं रहती है कि स्त्रियोंको शुक्र नहीं होता । किन्तु उसका विचार कम किया जाता है । यदि खियों में शुक्र ही न मानेंगे तो पढ् धारवात्मक स्त्री - शरीर मानना पडेगा । स्त्रियोंका शरीर अल्प बलवाला होने में भी ' अल्प • शुक्रत्वादल्पबलवत्वं स्त्रीणाम् ' ऐसा वचन मिलता है । और । ' यदा नार्यावुपेयातां वृपस्यन्त्यौ कथञ्चन । सुझन्त्यौ शुक्रम न्योन्यमनस्थिस्तत्र जायते ' ऐसा भी वर्णन है । इनसे भी | सिद्ध होता है कि दो स्त्रियां जब किसी भी प्रकार से आपस में मैथुन कर लेती हैं तो वहां अस्थिविरहित सन्तान पैदा होती है । उपर्युक्त विधानों से यह सिद्ध होता है कि स्त्रियों में वीर्य होता है किन्तु गर्भ के लिये उसकी कोई आवश्यकता नहीं है । गर्भोत्पत्ति के लिये तो शुक्र और शोणित की आवश्यकता है । ' ध्रुवं चर्तुणां सान्निध्याद्गर्भ ' स्याद्विधिपूर्वकः ' ऐसा सुश्रुत का वचन है । चरक में भी ' शुक्र- शोणित - जीच-सयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसज्ञा भवति ' ऐसा लिखा है । इनसे यह सिद्ध होता है कि गर्भ के लिये स्त्री के शोणित की आवश्यकता है न तु शुक्र की । इस लिये उसका ( स्त्री - शुक्र । का ) वर्णन नहीं है । आधुनिक दृष्टि से डिम्बग्रन्थि ( overy ) से डिम्ब ( ovum ) निकलकर, शुक्राणु ( spermatozoa ) के साथ मिलता है और इनके योग से गर्भ उत्पन्न होता है । यहां ' स्त्री से आर्त्तव निकलता है ' ऐसा नहीं समझते आर्त्तव होता तो उसका वर्ण लाल होने से हग्गोचर होता । वह जब कि हग्गोचर नहीं होता है तो उसे मानना ही क्यों? इसी प्रकार स्त्रियों के शरीर में न तो testis ( अण्डकोप ) है जहां शुक्र का सञ्चय होता है । न तो शुक्रमार्ग ( vasa - differe ntia ) है, न तो शुक्रग्रन्थियां ( seminal vesicles ) है, न तो पौरुपग्रन्थि ( prostate glands ) जिससे होकर शुक्र निकलता है । इनसे यह निश्चय होता है कि शुक्र नाम का पदार्थ स्त्रियों के शरीर में रहता ही नहीं । मैथुन के समय सफेद और चिवचिवा पदार्थ योनि में दीखता है वह क्या है? वही तो शुक्र है । ऐसा कहने पर इसका उत्तर यह मिलता है कि वह तो योनिद्वार में रहने वाली ग्रन्थियों का स्राव है जिससे योनि की झिल्लियों में रगड़ न बैठे । इसी स्राव को ] साधारण लोगों के समान शुक्र नहीं समझना चाहिये ।
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श्रध्यायः २ ] शारीरस्थानम् १७ आयुर्वेदीय मतसे सिद्ध होता है कि स्त्रियों के शरीर में शुक्र रहता है क्योंकि पुरुष के वीर्य के समान काम करने वाली वस्तु स्त्रियों में भी होना आवश्यक है, अतः स्त्रियोंमं शुक्र होता है यह सिद्धान्त दृढ है ॥ ३ ९ ॥
बीजेन्तर्वायुना भन्ने द्वो जीवौ कुक्षिमागतौ ।
यमावित्यभिधीयेते धर्मेतरपुरम्सरौ ॥ ४० ॥
दो गर्मी की उत्पत्ति ॰ — अधर्म के कारण वायु द्वारा बीज का गर्भाशय में विभाग होने से दो गर्भों का प्रादुर्भाव ( गर्भ-स्थान में ) होता है । उन्हें ' यमौ ' ऐसा कहते है ॥ ४० ॥
विमर्श ॰— ‘ यमौ ' नाम ( ढो ) जीवों की उत्पत्ति अधर्म के कारण होती है ऐसा श्रुति स्मृति में भी उल्लेख है । इसके लिये प्रायश्चित्त का भी विधान है । आधुनिक मत से दो शुक्राणु जब दो डिस्त्रों के साथ मिलकर गर्भाशय ( uterus ) में प्रविष्ट होते है तो उनमें दो गर्भ बढने लगते है । इनको ' यम ' कहते है । इनमें यह विशेषता रहती है कि पीछे से होने वाला बच्चा बडा समझा जाता है । क्योंकि उसका गर्भ में प्रवेश प्रथम रहता है । इसलिये उसको पीछे से बाहर आना पडता है । वास्तव में वही पहिले गर्भाशय में आता है इस कारण वही बडा माना जाता है ॥ ४० ॥
पित्रोरत्यल्पबीजत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत् ।
स शुक्रं प्राश्य लभते ध्वजोच्छ्रायमसंशयम् ॥ ४१ ॥
नपुसकों के प्रकार में आसेक्य नपुंसक - माता - पिता के अत्यल्प शुक्र के कारण ‘ आसेक्य ' नामक नपुंसक पैदा होता है । वह जब दूसरों का शुक्रपान करता है - तब उसके दिन में चेतना प्राप्त होती है इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ४१ ॥
विमर्श - - इसका दूसरा नाम ' मुखयोनि पुरुष ' भी है । वह अपने मुख में दूसरों से मैथुन करवाता है और मुख मै शुक्र आने पर जब वह उसका स्वाद लेता है तब उसके ध्वज का उत्थान होता है ॥ ४१ ॥
य प्रतियोनौ जायेत स सौगन्धिकसब्ज्ञितः ।
स योनिशेफसोर्गन्धमाघ्राय लभते बलम् ॥ ४२ ॥
सौगन्धिक नपुसक— जो दूषित योनि में पैदा होता है वह सौगन्धिक नामक नपुंसक है । उसको योनि और लिङ्ग की सुगन्धि आने से मैथुन में बलप्राप्ति होती है ॥ ४२ ॥
सौगन्धिक नपुंसक का ' नासायोनि ' ऐसा भी नाम है । क्योंकि नासा ही उसे मैथुन में प्रविष्ट करने के लिये कारण है ॥ ४२ ॥
स्वे गुदेऽत्रह्मचर्याद्यः स्त्रीषु पुंवत् प्रवर्त्तते ।
कुम्भोकः स तु विज्ञेयः ॥ ४३ ॥
कुम्भीक नपुसक ' - जो मनुष्य दूसरे पुरुष से अपने गुद-द्वार में मैथुन कराने के बाद स्त्रियोंका सेवन करता है उसे कुम्भीक कहते हैं ॥ ४३ ॥
विमर्श ॰ — इसका दूसरा नाम ‘ गुदयोनि ' है । कोई लोक • अन्तः स्राव ( Internal Secration or a type of Hormons ) ३ सु ० शा ० इस श्लोक का ऐसा अर्थ लगाते हैं कि- जो आदमी प्रथम स्त्री के गुदद्वार पर शिथिल लिन से प्रयोग करता है । तत्-पश्चात् उसमें उत्थापन होता है तब फिर स्त्री का उपभोग करता है उसे ' कुम्भीक ' कहते हैं ॥ ४३ ॥
....... •. " ईयकं शृणु चापरम् ॥
दृष्ट्रा व्यवायमन्येषां व्यवाये यः प्रवर्त्तते ।
ईकः स च विज्ञेयः ॥ ४४ ॥
ईक नपुसक का लक्षण: - अब ईयक नामक अन्य नपुंसक के लक्षणों को सुनो, दूसरों को मैथुन करता हुआ देख कर जो मनुष्य मैथुन में प्रविष्ट होता है उसे ईयक | कहते हैं ॥ ४४ ॥
विमर्शः – इसे ' हग्योनि ' इस नाम से भी सम्बोधित करते है । चरक में इसका कारण बताया है । ' ईर्ष्याऽभिभूता-वपि मन्दहर्पावीर्यायस्यापि वदन्ति हेतुम् ' ॥ च ० शा ० | अ ० २ ॥ ४४ ॥
........ घण्डकं शृणु पञ्चमम् ॥
यो भार्यायामृतौ मोहादङ्गनेव प्रवर्त्तते ।
ततः स्त्रीचेष्टिताकारो जायते पण्डसंज्ञितः ॥ ४५ ॥
पण्डका लक्षण: - पांचवें पण्ड नामक नपुंसक के लक्षण सुनो । स्त्री के ऋतुकाल में जो मनुष्य मोहवश से स्त्री के सदृश स्वयं नीचे होकर मैथुन करता है । और बाद में यदि स्त्री को सन्तान पुत्र हो तो वह स्त्रियों के समान चेष्टा करने वाला और उसी के आकार का होता है उसे पण्ड | कहते हैं ॥ ४५ ॥
विमर्श: - जब पढ पैदा होकर तारुण्य को प्राप्त होता है । तो वह अपने मेढ में दूसरे पुरुष से वीर्यस्राव करवाता है । स्त्री के समान स्वयम् उत्तान होकर पडता है । स्त्री के चेष्टा के
। समान चेष्टा भी करता है । इसको नरपण्ड कहते है ॥ ४५ ॥
ऋतौ पुरुषवद्वाऽपि प्रवर्त्तेताङ्गना यदि ।
तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नरचेष्टिता ॥ ४६ ॥
नारीपण्ड - यदि स्त्री, पुरुष के समान रतिकाल में पति को नीचे सुलाकर स्वयम् ऊपर होती हुई मैथुन करेगी और उसी से यदि कन्या पैढा हो तो वह पुरुष के समान दूसरी स्त्री को नीचे लिटाती हुई स्वयं ऊपर रहती है और मनुष्य के समान मैथुन करती है ॥ ४६ ॥
विमर्शः -- नर के समान चेष्टा करने वाली स्त्री को नारी-पण्ड कहते हैं । दोनों के भी स्त्री होने से एक का शुक्र दूसरे में किसी प्रकार जाता है जिससे वहां अनस्थि ( कोमल अस्थि वाली ) सन्तान पैदा होती है ॥ ४६ ॥
आसेक्यश्च सुगन्धी च कुम्भीकश्चेर्ण्यकस्तथा ।
सरेतसस्त्वमी ज्ञेया अशुक्रः पण्डसंज्ञितः ॥ ४७ ॥
नपुसकों की परिगणना - आसेक्य ( मुंह में वीर्य लेनेवाला ), सुगन्धी ( ' योनि और लिग की सुगन्ध लेने वाला ), कुम्भीक ( गुद में मैथुन कराने वाला ) और ईयक ( दूसरों का मैथुन देखकर उत्तेजित होने वाला ) ये चार नपुंसक होने पर भी इनको शुक्र रहता है । जिनको शुक्र होता ही नहीं उसे पण्ढ कहते हैं ॥ ४७ ॥
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II सुश्रुतसंहिता ॐ विमर्श - नपुंसक दो प्रकार के होते हैं, उनमें से शुक्र चाले नपुंसक सन्तान उत्पन्न करते हैं किन्तु उनको उत्तेजित होने के लिये उपाय करना पडता है । जिनको शुक्र रहता ही
नहीं उन्हें पण्ड कहते हैं । पण्ड सन्तान उत्पन्न करने मे समर्थ ।
नहीं रहते हैं ॥ ४७ ॥
अनया विप्रकृत्या तु तेषां शुक्रवहाः सिराः ।
हर्षात् स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ॥४८ ॥
शुक्र होने पर घण्ड क्यों --मुस में चीर्य लेना, सुगन्ध लेना इत्यादि प्रकारों से उनकी शुक्र को वहन करने वाली शिराये
हर्ष के कारण उत्तेजित होती है जिसके कारण इन्द्रिय उत्तेजित ।
होती है ॥ १८ ॥
विमर्श - चरक के मत से पण्ढ नर के समान नारी भी पण्ड होती है । उन स्त्रियों को भी उत्तेजना पैदा करने के लिये प्रकारान्तरों का अवलम्बन करना पड़ता है ॥ ४८ ॥ ।
आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ ।
स्त्रीपुंसी समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ॥ ४६ ॥
शुभाशुभ कार्यों का परिणाम- दम्पति जिस प्रकार के आहार और व्यवहार तथा चेष्टाओं से युक्त होकर समागम करते है उसी प्रकार उनका पुत्र भी होता है ॥ ४ ९ ॥ विमर्श: - संभोग के समय कायिक, वाचिक और मान-सिक भावों का परिणाम सन्तान के ऊपर पडता है । यदि चे शुभ हो तो सन्तान अच्छी होती है । उनमें भिन्नता होगी तो सन्तान में भी दोषों का उद्रेक होगा ॥ ४ ९ ॥
यदा नार्यावुपेयातां वृषस्यन्त्यो कथञ्चन ।
मुन्त्यो शुक्रमन्योऽन्यमनस्थिस्तन जायते ॥ ५० ॥
अस्थि गर्म- जब दो नारी कामाभिभूत होकर किसी प्रकार से मैथुन करें तो एक दूसरे का चीर्य परस्पर में जाता । हुआ गर्भ को धारण करता है, किन्तु वह गर्भ कोमलास्थि युक्त होता है ॥ ५० ॥
विमर्गः -- इस श्लोक में शुक्र और शोणित से गर्भात्पत्ति होती है - ऐसा क्रम होने पर भी उसका निर्देश नहीं किया । इसमें विशेषता तो स्त्रियों में वीर्य या शुक्र होने की है । कलल का वर्णन - इस प्रकार स्वप्न में पेंढा हुआ गर्म हर एक मास में बढ़ता है । मगर वह मांस का गोला मात्र रहता है उसमें केश, मूल, दादी, लोम, नग्न, दांत, सिरा, स्नायु, धमनी, चीर्य इत्यादि पिता के गुण नहीं होते हैं ॥ ५२ ॥
विमर्श. - यह भी श्लोक जेज्जदाचार्य को संमत नहीं है ॥ ५२ ॥
सर्पवृश्चिक कूष्माण्ड विकृताकृतयश्च ये ।
गर्भास्त्वेते स्त्रियाचैव ज्ञेयाः पापकृतो भृशम् ॥ ५३ ॥
विकृत गर्भ - सर्प, बिच्छू, कोहडा, आदि के महावित आकृति वाले जो गर्भ स्त्रियों को होते है उन सबों को पापकर्मों का फल समझना चाहिये ॥ ५३ ॥
विमर्श - विकृत गर्भ - स्त्रियों के गर्भाशय में विकृति होने से, डिम्ब दूषित होने से तथा शुक्र कीटाणु सदोष होने से गर्भों में विचित्र आकृतियां पायी जाती है ॥ ५३ ॥
गर्भो वातप्रकोपेण दौहृदे वाऽवमानिते ।
भवेत् कुजः कुणिः पङ्गुर्मू को मिन्मिन एव वा ॥ ५४ ॥
दोहद की पूर्ति न होने से - वायु के प्रकोप से या दोहद की पूर्ति न होने से बालक कुवढा, लला, लगडा, गूंगा या मिन्मिन ( अव्यक्त शब्द उच्चारण करने वाला ) होता है ॥ ५४ ॥
विमर्श - दोहदों का परिपूरण ठीक न होने से बालकों के सर्वाङ्ग पूर्ण नहीं हो सकते हैं । इसलिये गर्भिणी की दोहद्-पूर्ति करनी चाहिये उससे अन्नरस यथेच्छ बनता है जिससे माता और गर्भ का पोषण ठीक तरह से होता है । दोहद का वर्णन सुश्रुत शारीरस्थान ३ रे अध्याय में श्लोक १ ९ से
श्लोक २८ तक बटा सुन्दर है ॥ ५४ ॥
मातापित्रोस्तु नास्तिक्याशुभैश्व पुराकृतैः ।
वातादीनां प्रकोपेण गर्भो वैकृतमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥
विकून सन्तति उत्पन्न होने के कारण - माता - पिता की नास्तिकता के कारण, पिछले जन्म के कुकमों से, वात-पित्तादिकों के प्रकोप से गर्भ विकृत होता है ॥ ५५ ॥
विमर्श - गर्भ की विकृति में जैसे उसके पूर्व जन्म के इसलिये उसका निर्देश किया है । शोणितों का तो चरणकर्म कारण होते हैं वैसे ही माता - पिताओं का परलोक में होना यह विशेष बात नहीं है । इसलिये उसका उल्लेख । नहीं है । ' अनस्थि ' इसका अर्थ ' ईपढये नज् ' से ' कोमलास्थि ' ऐसा होता है । उस गर्भ में माता के गुण रहते हैं । पिता । का प्राधान्यत ' गुण जो अस्थिमयता, उसका अभाव ही रहता है ॥ ५० ॥
ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्ने मैथुनमावहेत् ।
आ वायुरादाय कुओ गर्भं करोति हि ॥ ५१ ॥
स्वप्न में मैथुन से गर्म- जो ऋतुप्राप्ता स्त्री स्वप्न में मैथुन का उपयोग करती है । उसके आर्त्तव को वायु लेकर गर्भाशय में गर्भ को पैदा करती है ॥ ५१ ॥
विमर्दाः — यह श्लोक जेज्जटाचार्य ने नहीं दिया है । उनके मत में ऐसा गर्भ होना असम्भव सा प्रतीत होता है । इसी प्रकार आगे का भी रोक उन्होंने नहीं दिया है ॥ ५२ ॥
मासि मासि विवर्द्धत गर्भिण्या, गर्भलक्षणम् ।
कलल जायते तस्या बर्जितं पैतृकैर्गुणैः ॥ ५२ ॥ 1
विश्वास न होना, देवता को न मानना इत्यादिकों से भी और शारीरिक दोपों से भी गर्भ में विकृति पैदा होती है ॥ ७५ ॥
मलाल्पत्वादयोगाच्च वायोः पक्वाशयस्य च ।
वातमूत्रपुरीषाणि न गर्भस्थः करोति हि ॥ ५६ ॥।
गर्म की मलोत्सर्ग क्रिया- गर्भस्थ बालक में मल थोडा होने से, वायु कम होने से और पक्काशय छोटा होने से मल, मूत्र और अपान वायु की प्रवृत्ति नही होती है ॥ ५६ ॥
विमर्शः -- गर्भ के पोषण क्रम के साथ उसकी मलोत्सर्ग-क्रिया का ( excretion ) होना भी उचित है । वह होता ही है किन्तु राशि में स्वल्प होने से वह गर्भाशय में रुक जाता है । अतः स्पष्टतया मालूम नहीं होता ॥ ५६ ॥
जरायुणा मुखे च्छन्ने कण्ठे च कफवेष्टिते ।
वायोर्मार्गनिरोधाच न गर्भस्थः प्ररोदिति ॥ ५७ ॥
गर्म रोता क्यों नहीं? - मुख जरायु से ढका होने से,
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श्रध्यायः २ ] शारीरस्थानम् गले में कफ रहने से, वायु का मार्ग खुला न होने से गर्भस्थ बालक नहीं रोता है ॥ ५७ ॥
विमर्शः - घोषजनक मार्ग में मुख ( Buccal curity ), गला ( Pharynxs ) और स्वरयन्त्र ( Larynxs ) आते हैं । आवाज निकलने के लिये घोपजनक वायु की प्रवृत्ति भी होनी चाहिये? वह न होने से और स्वरमार्ग बन्द होने से बच्चों का रोना नही मालूम होता है ॥ ५७ ॥
निःश्वासोच्छ्वास सड्सोभ - स्वप्नान् गर्भोऽधिगच्छति ।
मातुर्निश्वसितोच्छ्वास सक्षोभस्वप्नसम्भवान् ॥ १८ ॥
गर्भ के लिये व्यवहार - माता का श्वास लेना, श्वास छोडना, सङ्क्षोभ ( घूमने - फिरने से श्रम ) और नींद लेना इत्यादि से ही बच्चों के सब व्यवहार होते है ॥ ५८ ॥
विमर्श - माता के व्यवहार से गर्भका व्यवहार हो जाता है 1 । जैसे माता का श्वासोच्छ्वास का परिणाम गर्भ को प्राप्त होता है, वैसे माता के आराम और परिश्रम का भी फल गर्भ को माता के द्वारा ही प्राप्त होता है । गर्भ की श्वास - प्रणाली बन्द होने से वह स्वतन्त्रतया श्वास - प्रश्वास नहीं करता उसी प्रकार माता के रक्कद्वारा पोपण से गर्भका पोषण हो जाता है । इसके लिये foetal । Cerculation देखना चाहिये । वह इस प्रकार है । गर्भ में अधोमहाशिरा ( Inferior Vena - Cara ) से विशुद्ध रक्त दक्षिण अलिद ( Right auricle ) में जाता है । तत्पश्चात् ऊर्ध्वमहाशिराओं से अशुद्ध रक्त ढहिने अलिंद ( Right auricle ) को आता है वहां से ढहिने निलय । ( Right Ventricle ) को जाता है । वहा से फुफ्फुसीय धमनी ( Pulmonary artery ) द्वारा फुप्फुस को न जाते हुये च ही सेतु धमनी ( Ductus arteriosus ) से मिलकर तोरणी महाधमनी ( Aoho are ) में खुलती है । वाद औदरीय महाधमनी ( Abdominal aorta ) अधः-श्रोणिका साधारणी ( illinc artery ) और हर एक अन्तः और वाह्य अघ. श्रोणिका ( hypogastric artery ) में जाता है । जन्म होने पर बच्चा रोने लगता है, जिससे फुप्फुस ( lungs ) काम करने लगते है और जिससे फुप्फुसीय रक्त भ्रमण ( Pulmonary circulation ) आरम्भ होता है । दूसरी भिन्नता यह होती है कि जाम्बवविवर या शुक्तिच्छिद्र ( foramine ovalis ) बन्द हो जाता है जिससे दक्षिण अलिन्द का रक्त वाम अलिद ( left auricle ) के साथ नहीं मिलता है ॥ ५८ ॥
सन्निवेशः शरीराणां दन्तानां पतनोद्भवौ ।
तलेष्वसम्भवो यच रोम्णामेतत् स्वभावतः ॥ ५८ ॥
स्वाभाविक कार्य - शरीर की रचना होना, दांतों का गिरना और पैदा होना, हाथ - पैरों के तल भागों में बालों का
न होना सब स्वाभाविक है । इनके लिये ऐसा क्यों होता है ।
ऐसा पूछने से ' स्वभाव ' यही उसका उत्तर है ॥ ५८ ॥
विमर्श - शारीरिक रचना, सौन्दर्य या कुरूपता, यह आदमी के हाथ की बात नहीं है । उसी प्रकार ( Temperary ) १६ अस्थायी और स्थायी | Permanant ) दांतों का होना यह भी अपने आधीन नहीं है । उसी प्रकार हाथ - पैरों में वालों का न होना यह भी स्वभाव से ही होता है ॥ ५८ ॥
भाविताः पूर्वदेहेषु सततं शास्त्रबुद्धयः ।
भवन्ति सवभूयिष्ठाः पूर्वजातिस्मरा नराः ॥ ५६ ॥
भूयिष्ठों का उत्पत्ति में कारण - पूर्व जन्म में रात - दिन शास्त्रों का मनन करने से पूर्वजन्म का स्मरण करने वाले और सच्चगुणों से युक्त शरीर चाले होते है ॥ ५ ९ ॥ विमर्श - पहिले जन्म में रात - दिन शास्त्रों का अभ्यास करने से मन सत्व गुणों से युक्त होता है, वह रजोगुण तथा तमोगुण से रहित हो जाता है । जिससे पिछले जन्म का भी अच्छी तरह से स्मरण होता है । यह सात्विक और विशुद्ध बुद्धिका निर्देशक है जो अच्छे भावों का विचार करने पर पैदा होता है ॥ ५ ९ ॥
कर्मणा चोदितो येन तदाप्नोति पुनर्भवे ।
अभ्यस्ताः पूर्वदेहे ये तानेव भजते गुणान् ॥ ६० ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने द्वितीयोऽध्यायः । कर्मानुसार जन्म की और अभ्यासानुसार गुणों की प्राप्ति--पूर्व जन्म में किये हुए कर्म के अनुसार पुनर्जन्म प्राप्त होता है । और पूर्व देह में संस्कारित गुणों का प्रादुर्भाव इस जन्म में होता है ॥ ६० ॥
विमर्श: - कोई आदमी कुबड़ा, कोई लंगड़ा, कोई लुला, कोई मूक इस प्रकार कोई कुरूप तो कोई सुन्दर होता है । इसमें पूर्व जन्म के कर्म ही कारण है । उसी प्रकार किसी को कोई विद्या अथवा गुण अति शीघ्र प्राप्त होते हैं । इसका कारण पूर्वजन्म का संस्कार ही माना जाता है ॥ ६० ॥
इति शारीरस्थाने शुक्रशोणितशुद्धिशारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः । शारीरे प्रश्नाः--( Anatomy ) ( १ ) शुद्धमदोपयो. शुक्रार्त्तवयोर्लक्षणपुरस्सर चिकित्साक्रमो देय. । स्त्रीणा शुक्रमस्ति न वा । ( २ ) नपुंसकस्य प्रकारा लक्षणानि च लेख्यानि । ( ३ ) गर्भस्य मलोत्सर्ग - श्वसन - रक्तस वाहन- पोषणप्रकाराश्च वर्णनीया । ( ४ ) असृग्दररक्तपित्तयोर्भेदः प्रदर्शनीय । शारीरक्रियाविज्ञाने प्रश्नाः ( Physiology ) -( १ ) पुसवनप्रयोग विशदतया विलिख्य, ' ध्रुव चतुर्णी सांनि-ध्याद् गर्भः स्याद्विधिपूर्वकः ' अस्य पद्यस्य व्याख्यां विधाय, अलब्धगर्भायै पुसवनस्य फल किमपि भवति न वेति लेखनीयम् | ( २ ) शारीरवर्णानां प्रभवे कारणानि लेख्यानि । ( ३ ) पुत्रोत्पत्तौ स्त्रीजन्मनि च कारणानि प्रदर्शनीयानि । ( ४ ) यदि चेत् स्वभावत एवाङ्गानि जायन्ते तर्हि विकृत-शरीरनिर्माण को हेतु । 4