श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 371–380

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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२० सुश्रुतसहिता तृतीयोऽध्यायः

" अथातो गर्भावक्रान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ।

तथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ १ ॥

तत्पश्चात् गर्भावक्रान्ति ( गर्भका उत्पत्तिक्रम ) शारीर को कहते हैं । जैसा कि धन्वन्तरि ने कहा है ॥ १ ॥

विमर्श: - शुद्ध शुक्र और शोणित का लक्षण बताने के पश्चात् और उनके सयोग के उपरान्त जब उसके साथ जीवात्मा की प्राप्ति होती है, तब उसकी ' गर्भ ' संज्ञा होती है । उस गर्भ की अवक्रान्ति याने अवतरण - उत्पत्तिक्रम - जिस

शारीर में है ऐसे शारीर का वर्णन करते है । इसमें ( Foetal ।

Development ) बताया है ॥ १ ॥

सौम्यं शुक्रमार्त्तवमाग्नेयमितरेपामप्यत्र भूतानां सान्निध्यमस्त्यगुना विषेपेण, परस्परोपकारात् ( पर-स्परानुग्रहात् ) परस्परानुप्रवेशाश्च ॥ २ ॥

शुक्र और आर्त्तवों का वर्णन - शुक्र सोमगुणयुक्त है । आर्त्तव अग्निगुणयुक्त है । इतर भूतों का उसके साथ थोड़ा - सा सम्पर्क है । क्योंकि भूत एक दूसरे के उपकार करने वाले होते है ' या ' आपस में एक दूसरे पर कृपा रखते है । अर्थात् अग्नि तत्त्व जल से बुझाया नही जाता । उसी प्रकार पृथ्वी तत्त्व का सर्वथा नाश अग्नि तत्त्व नहीं करता है । एक महा-भूत का दूसरे महाभूतों में अंशतः प्रवेश भी रहता है ॥ २ ॥

चिमर्श. - गर्भ का मूल शुक्रार्त्तव होने से उनके स्वरूपों का वर्णन करते है । यद्यपि सब पदार्थ पाञ्चभौतिक हैं तथापि सोम और अग्नि गुण की विशेषता के कारण उनका निर्देश किया है । जो पार्थिव द्रव्य रहता है उनमें पृथ्वी तत्व के अतिरिक्त और " चार महाभूतों का अनुबन्ध है । पीछे भी शा ० अ ० १ में कहा है ' अन्योऽन्यानुप्रविष्टानि सर्वाण्येतानि निर्दिशेत् ' । इसके अनुसार पीछे ही इसका वर्णन कर चुके है ॥ २ ॥

तत्र स्त्रीपुंसयोः संयोगे तेजः शरीराद्वायुरुदीरयति, ततस्तेजोऽनिलसन्निपाताच्छुक्रं च्युतं योनिमभिप्रति पद्यते संसृज्यते चार्त्तवेन, ततोऽग्नीषोमसयोगात संसृव्यमानो गर्भो गर्भाशयमनुप्रतिपद्यते । क्षेत्रज्ञो वेदयिता स्प्रष्टा घ्राता द्रष्टा श्रोता रसयिता पुरुषः स्रष्टा गन्ता साक्षी धाता चक्का यः कोऽसावित्येवमादिभिः पर्यायवाचकैर्नामभिरभिधीयते दैवसयोगादक्षयोऽव्य-योऽचिन्त्यो भूतात्मना सहान्वक्षं सत्त्वरजस्तमोभि देवासुरैरपरैश्च भावैर्वायुनाऽभिप्रेर्यमाणो गर्भाशय-मनुप्रविश्याऽवतिष्ठते ॥ ३ ॥

गर्भ की उत्पत्ति और उसके पर्याय - स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध से वायु शारीरिक तेज को बढाता है । तत्पश्चात् वह तेज वायु के साथ मिलकर स्थान से च्युत जो चीर्य है उसे योनि में ले जाता है, वहां आर्त्तव से वह वीर्यं मिलकर अग्नि और सोम के साथ गर्भाशय को प्राप्त होता है । वहां-क्षेत्रज्ञ, वेढयिता, स्प्रष्टा, धाता, द्रष्टा, श्रोता, रसयिता, पुरुष, स्रष्टा, गन्ता, साक्षी, धाता, वक्ता इत्यादि पर्यायवाची शब्दों से जो कोई भी हो वह कहा जाता है । दैववशात् अक्षय, अव्यय और अचिन्त्य ऐसा वह आत्मा पञ्चमहाभूतों साथ मिलकर सात्विक, राजस, तामस, दैव और आसुर तथा अन्य दूसरे भावों से मिलता हुआ, वायु प्रेर्यमाण ऐसा गर्भाशय में प्रविष्ट होकर रहता है ॥ ३ ॥

विमर्श: - इस गद्य में शुक्र की च्युति कैसी होती है और वह आर्त्तव को साथ लेकर गर्भाशय को प्राप्त होकर वहां गर्भ की स्थिति कैसे पैदा करता है? यह बताया है । गर्भ, कर्म पुरुष से साथ ही भौतिक लिङ्ग शरीर से भी युक्त होता है । वह प्रकृतिस्थित आत्मा सच्च रज - तम गुणों से युक्त, दैविक या आसुरी भावों को लेकर मन को प्राप्त करता हुआ, दुर्योध वस्तु स्वरूप गर्भाशय में रहता है । उसके सार्थक नाम भी बताये है ॥ ३ ॥

तत्र शुक्रबाहुल्यात् पुमान्, आवबाहुल्यात् स्त्री, साम्यादुभयोर्नपुसकमिति ॥ ४ ॥

लिङ्ग - भेद में कारण- संभोग में यदि शुक्र की अधिकता हुई तो पुत्र पैदा होता है, रज के आधिक्य से कन्या और दोनों के समान होने से नपुंसक पैदा होता है ॥ ४ ॥

विमर्श: - अब यह शका पैदा होती है कि शरीर में आर्त्तव चार अञ्जलि है और शुक्र तो प्रसृतिमात्र ही है! इससे तो हर समय आर्त्तव - बाहुल्यात् खी ही उत्पन्न होना चाहिये । उत्तर- ऐसा नहीं, क्योंकि यहां पर शरीर स्थित प्रमाण नहीं लेना चाहिये । किन्तु गर्भाशय में जिसकी अधिकता होगी, उससे जानना चाहिये । दोनों में जिसकी । अधिकता होगी । उसके प्रभाव से सन्तानोत्पत्ति होगी । उसका प्रमाण मैथुन के समय होने वाले हर्प पर निर्भर करता है । यदि ऐसा ही है तो विधिपूर्वक ऋतुकाल में गमन करना, पुंसवन संस्कार करना, अच्छे कर्म करना, पुत्र के लिये ४, ६, ८, १०, १२, दिन पर गमन सब व्यर्थ ही है । अच्छे कर्म करने पर अच्छे पुत्र प्राप्त होते है । पुत्र की उत्पत्ति शुक्रवाहुल्यात होने पर भी हर एक शुभ कर्मों के परिणाम सत्पुत्रों की उत्पत्ति का कारण होते हैं । कहा भी है । ' एवं जाता रूपवन्तः सवन्तश्चिरायुषः 1 । भवन्त्यूणस्य मोक्तारः सत्पुत्रा पुत्रिणे हिताः ' ॥ ४ ॥

ऋतुस्तु द्वादशरात्रं भवति दृष्टार्त्तवः । अदृष्टार्तवा व्यस्तीत्येके भाषन्ते ॥ ५ ॥

ऋतुकाल - ऋतुकाल भर्त्तव बंद होने के उपरान्त वारह दिन का माना जाता है । कई आचार्यों के मत से अदृष्टार्त्तवा स्त्री को भी ऋतुकाल होता है । वह उसके लक्षणों से जानना चाहिये ॥ ५ ॥

विमर्शः - पहिले तीन दिन और अन्त का सोलहवां दिन, इसमें गर्भाशय का मुख वद होने से गर्भोत्पत्ति नहीं होती है । कई आचार्यों का कहना है कि - ' पीनप्रसन्नवदनां प्रक्लिन्नात्म-मुखद्विजाम् ' इत्यादि लक्षणों से ऋतुमती को जानना चाहिये । क्योंकि कई स्त्रियों में मासिक धर्म का अभाव होते हुये भी संतानोत्पत्ति होती है । ऋतुकाल में डिम्ब ( oval ) शुक्राणु । के संयोग के लिये उत्सुक रहता है । और गर्भाशय भी उनकी

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श्रध्याय ३ ] शारीरस्थानम् ३१ स्थिति तथा वृद्धि हेतु व्यवस्था करता है । ऐसे समय मे गर्भा शय पुराने आर्त्तव के बाहर निकल जाने से शुद्ध हो जाता है । कई स्त्रियों में गर्भाशय के ऊपर दबाव के कारण या अन्य कारणों से आर्त्तव भी नही दीखता है, तो भी सतानोत्पत्ति होती है । सदुग्धावस्था ( Laotetion period ) में भी

‘ अदृष्टार्त्तव ' में गर्भ रहता है । ऐसा व्यवहार में दीखता है ॥ ५ ॥

पीनप्रसन्नवदनां प्रक्लिन्नात्ममुखद्विजाम् ।

नरकामां प्रियकथां स्रस्त क्रुदयक्षिमूर्धजाम् ॥

स्फुरद्भुजकुचश्रोणिनाभ्यूरुजघनस्फिचाम् । 1

हर्षोत्सुक्यपरां चापि विद्याद्यतुमतीमिति ॥ ६ ॥

ऋतुमती स्त्री के लक्षण - ऋतुमती स्त्री का चेहरा फूला हुआ मालूम होता है । प्रसन्नता होती है । आत्मा अर्थात् देह । एवं मुख और दांत अत्यन्त क्लेदयुक्त रहते है । पुरुष को वाहती है । मीठी बातचीत करने वाली होती है । उसकी कोख, आंख और वाल शिथिल होते हैं । बाहु, स्तन, श्रोणि-प्रदेश, नाभि, ऊरु, जघन तथा स्फिक ( नितम्व ) इनमें स्फु रण होता है रतिकार्य में हर्ष और उत्कण्ठा मालूम होती है । ऐसे लक्षण वाली स्त्री को ऋतुमती समझना चाहिये । विमर्श: - ऋतुमती स्त्री मदनोत्सुका होती हुई नाना प्रकार की शृङ्गारचेष्टा करती हुई कामवासना से पीढित होती है । इसलिये कुछ शारीरिक संस्कार छूटने से दात, सुख, क्लेदयुक्त होते हैं । बाल भी बिखरे हुए होते हैं । भङ्गों का स्फुरण सकी मदनोत्तेजिता अवस्था का सूचक है ॥ ६ ॥

नियतं दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुज यथा ।

ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संत्रियते तथा ॥ ७ ॥

ऋतुकाल से भिन्न काल में योनि का सकोच - जैसे दिन बीतने पर कमल सिकुड जाता है, उसी प्रकार ऋतुकाल बीतने पर स्त्रियों की योनि का द्वार बन्द हो जाता है ॥ ७ ॥

विमर्श. - योनि के संकोच से गर्भाशय तक वीर्य पहुच नहीं सकता है । जैसे भौंरा कमल के बन्द होने पर भीतर नही पहुँच सकता है । ऋतुकाल समाप्त होना — इसक नाम डिम्ब ( orul ) का पक्व ( mature ) होने का समय बीतना है । ऋतुकाल में स्त्री डिम्ब ( ovul ) के साथ शुक्राणु ( Sperm ) गर्भाशय में प्रविष्ट होता है मगर ऋतुकाल वीत जाने पर डिम्ब ( matu re ovul ) के अभाव में यदि किसी प्रकार शुक्र का गर्भाशय में प्रवेश भी हो गया तो भी गर्भधारणा नहीं हो सकती ॥ ७ ॥

मासेनोपचितं काले धमनीभ्या तदार्त्तनम् ।

ईषत् कृष्णं विगन्ध च वायुर्योनिमुखं नयेत् ॥ ८ ॥

मासिक धर्म - काल याने द्वादश वर्ष के ऊपर और ५० या ६० साल के पूर्व समय में, एक मास के सञ्चित आर्त्तव को धमनियों द्वारा वायु योनि के द्वार की ओर ले जाता है । वह आत्तव थोडा सा काला और विशिष्ट गन्ध वाला होता है ॥ ८ ॥

विमर्श: - आर्त्तच काल रक्त का वर्णन और निकलने के लिये कारण बताया है । यह आर्त्तव काल, देश, आचार, विचार, खाद्य - पेय और सङ्गति पर निर्भर करता है । ठण्डे प्रदेश में, सात्त्विक विचार और सात्त्विक आचरणों से, सात्त्विक आहारों से तथा सत्सङ्ग से बहुत ढेर के बाद मासिक धर्म की प्रवृत्ति होती है । वही स्त्री गरम प्रदेश में रहने से, गरम पदार्थ और मद्य - मांस सेवन करने से और बुरी सङ्गति में रहने से शीघ्र ही ऋतुमती होती है ॥ ८ ॥

तद्वर्षाद् द्वादशात् काले वर्त्तमानमसृक् पुनः ।

जरापक्कशरीराणां याति पञ्चाशतः क्षयम् ॥ ६ ॥

रजोनिवृत्ति काल - आर्त्तव वारह वर्ष की अवस्था से शुरू होता है और वृद्धावस्था से शरीर शिथिल होने से ५० वर्ष की आयु में रुक जाता है ॥ ९ ॥

विमर्श: - ५० वर्ष की अवस्था रजोनिवृत्ति की ( Meno pause ) है । इस समय नाना प्रकारकी व्याधियोंसे स्त्रियोंका शरीर भरा रहता है । कई स्त्रियों में यह स्थिति ५० वर्ष उन्न के पश्चात् भी ७१८ साल तक जाती है । ऐसी अवस्था शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है । इसी अवस्था तक प्रायः गर्भधारण की शक्ति स्त्रियों में रहती है । तत्पश्चात् वह नष्ट हो जाती है । आर्त्तव एकाएक नहीं रुकता है । वल्कि धीरे-धीरे, बीच - बीच में रुकते - रुकते बन्द होता है । जैसा कि एकाध महीने में मासिक धर्म हुआ फिर २-४ महीने तक के लिये रुक गया और फिर आरम्भ हुआ । इस प्रकार वह धीरे - धीरे रुकता है ॥ ९ ॥

युग्मेषु तु पुमान् प्रोक्तो दिवसेष्वन्यथाऽबला ।

g ष्पकाले शुचिस्तस्मादपत्यार्थी स्त्रिय व्रजेत् ॥ १० ॥

कन्या या पुत्र का उत्पत्ति काल सन्तान की इच्छा करने वाले लोगों को पवित्र होकर ऋतुकाल में युग्म दिनों में ( सम दिनों में जैसे - चौथे, छठे, आठवें, वारहवे ) तथा अयुग्म दिनों ( विषमसंख्यक दिनों में जैसे ५, ७, ९, ११ वें ) में गमन करना चाहिये । सम दिनों में गमन करने से पुत्र होता है और विपम दिनों में कन्या पैदा होती है ॥ १० ॥

विमर्गः - यहां यह शङ्का पैदा होती है कि शुक्रबाहुल्य से पुत्र और आर्त्तवबाहुल्य से कन्या - ऐसा भेद तो पूर्व में ही बताया गया अव दिनों का झगडा क्यों है? इसका उत्तर यह है कि स्त्रियों के शरीर में सम दिनों में रज कम होता है और विषम दिनों में उसकी वृद्धि होती है । सम दिनों में संयोग से पुत्र उत्पन्न होता है । और विषम दिनों में कन्या की उत्पत्ति होती है । भ भी कहा है-' अयुग्मे स्त्री पुमान् युग्मे सन्ध्ययोस्तु नपुंसकम् ।

शुक्राधिकत्वात् पुरुष. प्रमदा रजसोऽधिकात् ।

शुक्रशोणितयोः साम्यात्तृतीया प्रकृतिर्भवेत् ॥

अर्थात् सम दिनों में पुत्र, विषम दिनों में कन्या और सन्धि काल में नपुंसक पैदा होते हैं । क्योंकि युग्म दिनों में शुक्र की अधिकता होती है, विषम दिनों में रज की और शुक्र की समानता होने से नपुंसक पैदा होते हैं ॥ १० ॥

तत्र सद्यो गृहीतगर्भाया लिङ्गानि श्रमो ग्लानिः पिपासा सक्थिसदनं शुक्रशोणितयोरवबन्धः स्फुर-णन योनेः ॥ ११ ॥

सद्योगर्भधारण के चिह्न - गर्भधारण के निम्न लिखित

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सुश्रुतसंहिता लक्षण होते हैं — श्रम ( थकावट ), ग्लानि ( निष्क्रियता ), पि॒पामा ( प्यास ), सक्थिसदन ( पैर में शिथिलता ), शुक्र और गोगित की स् और योनि का स्फुरण होना ये लत्रण होते हैं ॥ ११ ॥

विमर्ग ' -- गर्म धारण हुआ या नहीं? यह जानना बहुत कठिन होता है । कुछ लोग मासिक स्राव रुकने से गर्म धारण हुआ समझते है । किन्तु यह तो पाण्डु रोग से, पेट में गुल्म रहने से भी रुकता है । इसलिये यह भी चिह्न ठीक नहीं है । ठीक चिह्न बच्चों के हृदय की धडकन और उसका चाञ्चल्य है । किन्तु वह पांचवें महीने में मालूम होता है ॥ ३६ ॥

स्तनयोः कृष्णमुखना रोमराब्युद्गमस्तथा ।

अक्षिपक्षमाणि चाप्यस्याः समील्यन्ते विशेषत. ॥

अकामत छर्दयति गन्धादुद्विजते शुभात् ।

प्रसेकः सदनं चापि गभिण्या लिङ्गमुच्यते ॥ १२ ॥

गृहनगर्न के उत्तरकालिक चिह्न - स्तनों के सुख काले होते हैं । रोएं खड़े होते हैं । आंखों के बाल चटकने लगते है । कोई भी कारण न होते हुवे भी वमन होता है । सुगन्धि से भी त्रस्त होती है । मुख मे लार ( Shiva ) स्राव होता है । हाथ - पैर शिथिल होते हैं । ये लक्षण गर्भिणी में होते है ॥ १२ ॥

विमर्श - गर्म रहने पर विविध अङ्गों में होने वाले परिवर्तन निम्नप्रकारके होते है-इटवर या गर्भाशय - गम जगभिवृद्धिम् गर्भ से पेट की वृद्धि होती है । २- योनि- ' आर्तवादनम् । योन्याश्च चाटल्बम् ॥ ' आर्नव नहीं आता है और योनि ( गर्भाशय ) से चाटाव । ( स्फुरण होना या वृद्धि होना ) । ३ -- योनि से स्त्राव होना न कि गर्भाशय से । क्योंकि मृतगभों के लक्षण में योनि का स्राव नही होता है । ऐसा चरक भगवान् ने शा ० ८ वें अध्याय में बनाया है । उससे

सिद्ध होता है कि जीविन गर्न में योनि का नाव होता है ।

१ - निन-' नयो. स्तन्यमष्टतनमण्डल्योः कामव्यर्थम ' ॥

च ० ० १ अ ० ॥

' तस्मादभिग्य पीनोपयोधरा भवन्ति ॥

सु ० आ ० १ अ ० ॥

स्तनों में दुग्ध का प्रादुर्भाव होता है । औष्ट और तन-मण्डल ( Areuls ) कृष्ण वर्ण को प्राप्त होते हैं । गर्भाशय से आने से गर्मिणी के स्तन पुष्ट और

उन्नन ( ) होते हैं ।

" बचा ' रोमराज्युङ्गम. ॥ सु ० झा [ ० ३ ० ॥

' नन. कण्डू. प्रजायते । मुल किमिावासि ' ।

त्वचा पर रोये ग्यदे होते हैं और उसमें ० श ०८ ३० ॥

खुजली जाती है । खुजली के कारण विकिप ( Stre gravadorum ) पैदा होता । है त चर्म पर लकीरें पैदा होती हैं । वर्गहानि और शिथिलता लक्षित होती है । * नाही नस्यान ( Morning sistrecs ) ' आस्यत्त्रवणम । अनन्नाभिलापा, छर्दि, अरोचकत्वम अम्लकामना दौह-दवेति ' । मुख से पानी आता है, अन्न से रचि हटती है, चमन होता है, और खड्डे पदार्थों के ऊपर इच्छा होती है । ८ - मूत्राशय और मलाशय - ' अभीच्णं पुरीपमवृत्तिः, मुत्रं प्रसिच्यते । सु ० शा ० १० अ ० । बार बार शौच होता है और मूत्र भी आने लगता है । ९ - सामान्य परिवर्तन - ' गुरुगात्रत्वं चचुपो ग्लानिः, ईपत् श्वयथुः पाइयो ', कार्य, बलवर्णहानिरतिशयेन । क्लान्तिश्च ॥ च ० ना ० ९ अ ० । हाथ - पैरों में गुस्ता मालूम होती है, आंखों में ग्लानि, पैरों में सूजन, कृशता, शारीरिक शक्ति और कान्ति की कमी होती है और थकावट भी मालूम होती है । इन लक्षणों से समझ लेना चाहिये कि स्त्री गर्भवती हो गई । आधुनिक मत से तीन प्रकार के लक्षण होते हैं--( क ) काल्पनिक चिह्न ( Presumptive signs ) ( ख ) सम्भवनीय चिह्न ( Probable signs ) ( ग ) निश्चयात्मक लक्षण ( Positive signs ) ( क ) काल्पनिक चिह्नों में --- मासिक धर्म का बन्द होना, २- जी मचलाना, के होना, ३ - स्तनों का परिवर्तन, 2 - तनों में दुग्ध आना, ५ - पेट का बड़ा होना, ६ – पेट में हलचल मालूम होना, योनि की श्लेष्मल त्वचा का रङ्ग बदलना, ८ - मानसिक विचारों में भिन्नता इत्यादि । ( १ ) मासिक स्राव रकने के लिये गर्भ के अतिरिक्त रजोदर्शन ( Ammenorrhea मासिक रुकना, युवा त्री का पाण्डुरोग ( Chlorosis ), राजयक्ष्मा, मधुमेह और रजा-निवृत्ति ( Menopause ) ये कारण होते हैं । उसी प्रकार कुछ स्त्रियों में मासिक धर्म का स्त्राव होते हुए भी गमों-त्यत्ति होती है । इसलिये मासिक धर्म का रुकना ये गर्भो-व्पत्ति के काल्पनिक चिह्न हैं, निश्चित नहीं । ( २ ) के होना, जी मचलाना - यह तो शारीरिक विकृति और अजीर्णजन्य भी हो सकता है । ( ३ ) स्तनों में परिवर्तन होना- यह भी रक्षित कणों में परिवर्तन होने से होता है । ( 2 ) स्तनों में दुग्ध का आना तो प्रथम गर्भ में सम्भव-नीय लक्षण है । और बार बार होने वाले प्रसूति में तो यह न्वास लक्षण नहीं हो सकता है । ( ५ ) पेट बड़ा होना - पेट में अर्बुद ( Tamour ) होने के कारण भी होता है । 2 ( ६ ) पेट में हलचल - पेट में वायु होने के कारण भी होता है । ( ७ ) योनि की ग्लेमल त्वचा का रंग बदलना यह परिवर्तन रक्तप्रवाह की रुकावट से होता है और इस रुकावट के लिये अर्बुद ( Tumour ) भी कारण होना है । ( ८ ) मानसिक विचारों में भिन्नता - मामूली रोगों से, भय से या आपत्ति से भी हो सकती है । ( ख ) सम्भवनीय चिह्न ( Probable signs ) ( 1 ) गर्भाशय वृद्धि ( Enlargement of uterus ) ( २ ) गर्भाशय का एक रककर स्पंदन । ( ३ ) हिंगर का लक्षण

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अध्यायः ३ ] शारीरस्थानम् २३ -, ( Higer's signs ) ( ४ ) अन्तःस्थ और वहिःस्थ परीक्षा 1 ( ५ ) गर्भाशय की ध्वनि । ( १ ) गर्भाशय वृद्धि - गर्भ रहने पर समान, जल्द और = एक क्रम से होती है । परन्तु रुग्णावस्था में वह रुक - रुककर और धीरे - धीरे तथा क्रमहीनता से युक्त होती है । गर्भाशय की वृद्धि का मासानुसार निर्देश— महीना २ रे महीने के आखीर | ३ रे 33 " 2 ४ थे 33 29 " " 99 " " ५ वे ap " " " " ६ महीना में 014 33 33 ७८ वें और ९ महीना में १० वें महीना में ( २ ) गर्भाशय का रुक महीने से प्रतीत होने लगता लहर सी मालुम होती है । ( ३ ) हिगर का चिह्न -गर्भाशय का आकार अण्डे के आकार का वडे सन्तरे का आकार भगास्थि ( Symphysis pubis ) के ऊपर ३ इञ्च नाभि के नीचे १ इञ्च नाभि के ऊपर १ इञ्च ६ महीना के उपरान्त नाभि के ऊपर हर एक महीना में १ इच बढ़ता है । ८ वें महीना के तुल्य क्योंकि उस समय गर्भाशय नीचे आता है । - रुक कर स्पन्दन - यह तीसरे है । ५ से १० मिनट के पश्चात् इसमें योनि में दो अड्डलियां ढालकर देखना पड़ता है । जिससे भीतर का भाग कडा और स्पक्ष के समान मालूम होता है । ( ४ ) अन्तःस्थ और वहिःस्थ परीक्षा - बाहर से दबाने से एक कडा गोला सा प्रतीत होता है । भीतर अङ्गुली डालकर बच्चे के माथा को ऊपर ढकेलने से फिर वह उसी जगह पर आता है । ( ५ ) गर्भाशय - ध्वनि — यह रक्तवाहिनियां बढ़ने से प्रतीत होती है । परन्तु ऐसी ध्वनि गुल्म ' ट्यूमर ' की वजह से भी प्रतीत हो सकती है । ( ग ) निश्चयात्मक चिह्न ( Positive Signs ) -१ ) बालक के हृदय का स्पन्दन, ( २ ) गर्भनाल का स्पन्दन ( Funne suffle ), ( ३ ) भ्रूण के भागों का प्रत्यक्षी करण, ( ४ ) भ्रूण - स्पन्दन, ( ५ ) ' एक्स - रे ' ( ' X ' Ray ) ( ६ ) रासायनिक परीक्षा Zondac and Ascheim's reaction--वालक के हृदय का स्पन्दन - नाभि और पुरोर्ध्व कूट को मिलाने के लिये एक लकीर खीचे और उसका मध्य विन्दु निकाले तो उस स्थान पर बालक के हृदय का स्पन्दन उसके जीवित होने से प्रतीत होता है । । ( २ ) कभी - कभी गर्भनाल का स्पन्दन मालूम होता है, यह धोखे का लक्षण है । ( ३ ) योनि द्वारा अन्तःस्थ परीक्षा करने से बालक के अड़ों का ज्ञान होता है । ( ४ ) भ्रूण स्पन्दन - यह चौथे महीने के उपरान्त और पञ्चम महीने के प्रारम्भ में प्रतीत होता है । ( ५ ) ' एक्स ' किरण ' X ' Ray से फोटो खींचना । -( ६ ) और एक परीक्षा होती है जिसमें मूपिका में गर्भिणी के मूत्र की सुई ( Injection ) लगाते हैं और तत्पश्चात् उसे काट कर वीजकोप ( Ovary ) की परीक्षा करते है । यह निश्चित परीक्षा है । इसमें १४ दिन के गर्भिणी की भी परीक्षा होती है ॥ १२ ॥

तदा प्रभृति व्यवायं व्यायाममपतर्पणमतिकर्शनं | दिवास्वप्नं रात्रिजागरणं शोक यानारोहणं भयमुत्कटु-कासनं चैवान्ततः स्नेहादिक्रियां शोणितमोक्षणं चाकाले वेगविधारणं च न सेवेत ॥ १३ ॥

गर्भधारण के बाद वर्जनीय. - गर्भ रहने पर मैथुन, कसरत, अपतर्पण ( लंघनादि - दुबले करने वाले प्रयोग ), अतिकर्शन ( ज्यादा कृश करने वाले ), दिवास्वप्न ( दिन में सोना ), रात में जागना, यानारोहण ( गाडी, घोडा, सायकल, मोटर और रेल पर चढ़ना ), स्नेहन, स्वेदनादि क्रिया का सेवन, शोणितमोक्षण ( शरीर से खून निकालना ) और वेगविधारण ( वमन विरेचनादि त्रयोदश वेगों को रोकना ) इत्यादि कर्म नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥

विमर्श: --- गर्भ - स्थापना होने पर मैथुन करने से गर्भ को पीडा होती है । व्यायाम से गर्भ की स्थिति में परिवर्तन होता है । लड्ङ्घन और कृशता करने वाले कार्यों से गर्भं के शरीर की वृद्धि नहीं होती है I । दिन में सोने से ' दिवास्वा-पादिदोपैश्च प्रतिश्यायश्च जायते । प्रतिश्यायादथो कासः कासात्सञ्जायते क्षयः । चयो रोगस्य हेतुत्वे शोषश्चाप्युपजायते ' प्रतिश्याय आदि रोगों का प्रादुर्भाव होता है । रात्रि जागने से प्रकृति खराब होती है । शोक से वायु विकृत होती है । यान- रोहण से एक तो शरीर को झटके लगते हैं । इस यान के वेग के कारण ' श्वासयन्त्रों में ज्यादा हवा भर जाती है । भय से खून ज्यादा जल्द दौड़ने लगता है 1 | बैठने से गर्भ पर भार पड़ता है और नीचे से गर्भ को आश्रय नहीं मिलता है । स्नेहन, स्वेदनादि पञ्चकर्मों में से अष्टम महीने में आस्थापन - अनुवासन देने का विधान है । उसी प्रकार ' वातविण्मूत्रजृम्भाऽश्रुक्षवोद्वारवमीन्द्रियैः । क्षुतृष्णोच्छ्वासनिद्रा " ' । इन त्रयोदश वेगों को धारण करने से उदावर्त्त होता है । इस लिये उपर्युक्त वस्तुओं का सेवन न करे ॥ १३ ॥

दोषाभिघातैर्गभिण्या यो यो भागः प्रपीड्यते ।

स स भागः शिशोस्तस्य गर्भस्थस्य प्रपीड्यते ॥ १४ ॥

निषिद्ध सेवन से परिणाम - ऊपर लिखित वस्तुओं के सेवन करने से दोष प्रकुपित होकर गर्भिणी के अङ्गों को दूषित बनाता है और उसके जो अङ्ग दूषित होते हैं वे ही गर्भस्थ शिशु के भी दूषित होते है ॥ १४ ॥

विमर्श: - इस लिये उपरि निर्दिष्ट चीजों का सेवन करना

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२४ सुश्रुतसहिना चाहिये । उनके सेवन से गर्भस्थित बालक पर वैसा ही । परिणाम होगा । इसलिये गर्भिणी की रक्षा सावधानीपूर्वक करने मे गर्भ की रना हो सकती है, अन्यथा नहीं ॥ १४ ॥

तत्र प्रथमे मासि कलल जायते । द्वितीये शीतोष्मानिलैरभिप्रपच्यमानानां महा भूतानां संघातो घनः सञ्जायते यदि पिण्डः पुमान् · स्त्री चेत् पेशी, नपुंसकं चेदर्बुदमिति । तृतीये हस्तपादशिरसां पञ्च पिण्डका निर्वर्त्त-न्तेऽङ्गप्रत्यङ्ग विभागश्च सूक्ष्मो भवति । चतुर्थे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्तो भवति । गर्भहृदयप्रव्यक्तिभावाच्चेतनाघातुरभिव्यक्तो भवति कस्मात्? तत्स्थानत्वान्, तस्माद्गर्भश्चतुर्थे मास्यभि । प्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति । द्विह्रदयां च नारीं दोईदिनी-माचक्षते दौर्हृदविमाननात कुजं कुणि खलं जढं वामनं विकृताक्षमनक्षं वा नारी सुतं जनयति तस्मात् सा यद्यदिच्छेत्तत्तस्यै दापयेत् । लब्धदा हि वीर्यवन्तं चिरायुष च पुत्र जनयति ॥ १५ ॥

गर्न का चार नाम तक वृद्धिक्रम. - शुक्र और शोणित के मयोग से पहिले महीने से गर्भ कल्ल ( सियागमस्य ) अर्थात् बुदबुदाकार होता है ॥ दूसरे महीने में शीत ( श्लेप्मा ), उप्मा ( पित्त ) और अनिल ( वायु ) इनसे पञ्चमहाभूतों का समूह गाटा बनता है यदि वह समूह पिण्डाकृति - गोल रहे तो पुत्र उत्पन्न होता है । पेशी ( दीर्वाकृति ) अधिक लम्बी और कम चौड़ा ऐसी हो तो क्न्या और लर्बुद ( गोला Tamonry के परिमाण की हो तो नपुंसक होता है । तीसरे महीने में दो हाय, दो पर और गिर ऐसे पाँच वयवों के पांच पिण्ड होते हैं और ग्रीवा, छाती, पृष्ठ तथा उदर ये अङ्ग और ठोडी, नासिका, कान, अङ्गुली, एडी इत्यादि प्रत्यह्नों का विभाग अस्पष्टतचा मान्द्रम होता है । चौथे महीने में सत्र अङ्ग - प्रत्यङ्ग के विभाग खून स्पष्ट हो जाते हैं । और गर्म का हृदय स्पष्ट होने से चेतना धातु व्यक्त होता है । क्योंकि हृदय चेतना धातु का स्थान ( आश्रय ) है । इसीलिये इन्द्रियार्थ शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इनकी अभिलाषा चौथे महीने में होती है । दो हृदय होने से गर्भिणी को दौर्हृदिनी कहते हैं । दौर्हद ( गर्भिणी की इच्छापूर्ति ) की अवहेलना करने से स्त्री - कुत्रा, कुगि ( ल्ला ), खक्ष ( लगन्डा ), जड, वामन ( नाटा ), विकृतान्त्र ( टेढी आँख वाला ), अनत्र ( अन्धा ) पुत्र पैदा करती है । इस लिये बहु जो जो चाहे उसको उसे देना चाहिये । उनकी इच्छापूर्ति करने से न्त्री चीर्यवान् ( पराक्रमी ) और - चिरायु ( दीर्घायु ) पुत्र पैदा करती है ॥ १५ ॥

विमर्श - इस गद्य में चार २ मास तक में होने वाले परिवर्तन बताये हैं । द्वितीय महीने में पुत्र या कन्या की पहचान होती है । आधुनिक मत से हृदयस्पन्डन से कन्या या पुत्र की परीक्षा करते है वह पञ्चम माम के बाद होती है । हृदय का स्पन्दन यदि १४५ प्रति मिनिट हो या उससे अधिक हो तो स्त्री और उससे कम होने से पुरुष उत्पन्न होता है । स्त्रियों का अधिक डरपोक होना उनके हृदय की गति का कारण है । इस प्रकार से उनका उष्णतामान Temperaturs ) भी पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा होता है । दोहद की पूर्ति न होने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बिगड जाता है । जिसका परिणाम सन्तान के ऊपर भी फलीमून होता है ॥ १५ ॥

भवन्ति चात्र-इन्द्रियार्थास्तु चान् यान् सा भोक्तमिच्छति गर्भिणी ।

गर्भाबाधभयात्तांस्तान् भियगाहृत्य दापयेत् ॥ १६ ॥

सा प्राप्तौ वा पुत्रं जनयेत गुणान्वितम् ।

अलब्धदौर्हदा गर्भ लभेतात्मनि वा भयम् ॥ १७ ॥

येषु येष्विन्द्रियार्थेषु दोई दे वै विमानना ।

प्रजायेत सुतस्यार्त्तिस्तस्मिंस्तस्मिंस्तथेन्द्रिये ॥ १८ ॥

पद्यों में डोडों का परिणाम - शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्त्र इनमें से जो भी गर्भिणी न्त्री चाहती हो, गर्म को पीडा न हो इसलिये उसे लाकर वैद्य को देना चाहिये । दौर्हृद की प्राप्ति होनेसे गर्भिणी सद्गुणी पुत्र को पैदा करती है । यदि दौहृद प्राप्त न हो तो स्वयं या पुत्र पीडित होता है । गर्भावस्था के समय जिन इन्द्रियायों की पूर्ति न होगी गभ की उन इन्द्रियों में पीड़ा या दोष उत्पन्न हो जाता है । विमर्श - दौर्हद की पूर्ति न होने से गर्भ को तो नय होता ही है किन्तु त्री को भी भय रहता है । कान से मनोहर शब्द सुनना, आंखों से अच्छे - अच्छे पढ़ार्थों का देखना, जिह्वा से रचिप्रद भोजन का स्वाद लेना, नाक से सुगन्वियुक्त द्रव्यों को संबना और स्पर्शसुम्न का अनुभव करना इत्यादि कार्यों की पूर्ति करने से जन्य पुत्र होता है । और गर्मिणी प्रसन्न रहती है, जिससे दीर्घायु सन्तति पैदा | होती है ॥ १६-१८ ॥

राजसन्दर्शने यस्या दौर्हृदं नायने बिगः ।

। अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते ॥ १६ ॥

दुकूल पट्टकौशेय भूषणादिषु दौर्हृदात् ।

। अलङ्कारैषिणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ॥ २० ॥

। आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते ।

देवताप्रतिमायां तु प्रसूते पार्षदोपमम् ॥ २१ ॥

दर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्रसूयते ॥ २२ ॥

गोघामांसाशने पुत्रं सुषुप्सुं धावनात्मकम् ( धारणात्मकम् ) गवां मांसे तु बलिनं सर्वक्लेशसहं तथा ॥

। माहिषे दौड़दाच्छुरं रक्तानं लोमसयुतम् ।

वराहमांसान् स्वप्नालुं शूरं सञ्जनचेत्सुतम् ॥

। मार्गोद्विक्रान्तजङ्घालं सदा वनचरं सुतम् ।

सुमराद्विग्नमनसं नित्यभीतं च तैत्तिरात् ॥

अतोऽनुक्तेषु या नारी समभिध्याति दौर्हृदम् । शरीराचारशीलैः सा समानं जनयिष्यति ॥ २३ ॥ २४ ॥ २५ ॥ | २६ ||

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श्रध्याय ३ ] शारीरस्थानम् २५ दौद से भावी सन्तान के गुणों की पहचान -- जिस स्त्री को राजा के दर्शन का दौर्हृद ( अभिलापा ) होता है, वह स्त्री धनवान् और भाग्यवान् पुत्र को उत्पन्न करती है । दुकूल ( शेला या शाल ), पट्ट ( जरीका वस्त्र ), कौशेय ( कोसा ), भूषण ( अलङ्कार ) इनमें दौर्हृद होने से अलङ्कार- प्रिय और ललित ( शृङ्गार - चेष्टा से युक्त ) पुत्र होता है । " देवताओं की प्रतिमा ( मूर्ति ) में ढोहट होने से पार्प-दोपम ( देवानुचर - तुल्य ) पुत्र उत्पन्न होता है । तपस्वी लोगों के आश्रमों मे इच्छा होने से धर्मशील और जितेन्द्रिय पुत्र उत्पन्न करती है । हिंसक जाति के जीवों के दर्शन में इच्छा होने से हिंसाशील ( दुष्ट प्रकृति वाला ) पुत्र उत्पन्न करती है । गोधा ( गोह ) के मांस खाने की इच्छा होने से निद्वालु तथा दौडने वाला पुत्र होता है ( पाठभेद के अनुसार धारणात्मकं = हृदयगृहीतवस्तूनाममोचकम् । जिस वस्तु के पीछे लगेगा उसको हस्तगत कर लेने वाला । गोह जिस प्रकार वस्तु को चिपक कर पकड़ लेती है । उस प्रकार यह भी हद हठ करनेवाला होता है ) । गो शब्द इन्द्रियों का वाचक है अर्थात् वकरा, भेडा वगैरः इन्द्रिय वाले जानवरों का मांस खाने की इच्छा होनेसे बलवान् और सर्व दुःखों को सहन करने वाले पुत्र को उत्पन्न करती है | भैंस का मांस खाने की इच्छा रखने से वीर ( पराक्रमी ), लाल आंख वाला तथा वदन पर केश होने वाले पुत्र को उसी प्रकार शूकर का मास खाने की इच्छा रखने से सोनेवाले और शूर पुत्र को उत्पन्न करती है । हरिण का मांस खाने की इच्छा रखने से उद्योगी, वेगवान और नित्य वनचर ( जगल में घूमने वाला ) ऐसे पुत्र को उत्पन्न करती है । सृमर ( महाशूकरः, अन्ये महाश्वाकारश्वमरानूकः ) गो-सह वनगाय या गवय के मास खानेकी इच्छा होने से विग्नमनस ( खिन्न प्रकृति का ) और तीतर के मांस खाने की इच्छा रखने से डरपोक ( या पाठान्तर से ' नित्यं शीलं च तैत्तिरात् ' इस वचन के अनुसार हर समय शील सम्पन्न ) पुत्र को उत्पन्न करती है । अनुक्त दौर्हृद का संग्रह बताते है - जिन चीजें का वर्णन नहीं दिया है ऐसे वस्तुओं का ध्यान ( इच्छा ) करने से उनके शरीर के समान उन्हीं के आचार और विचार वाला पुत्र पैदा होता है ॥ १ ९ -२६ ॥ विमर्श - दौर्हृद होने में कारण गर्भिणी के नित्य आचार-: विचार है । ये दौहृद ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्ध इन चार वर्णों के व्यक्ति में विभाजित मालूम होते हैं । ब्राह्मणों का जप, तप, आश्रम, देवता - विषयक प्रेम होता है । क्षत्रियों का वीरता में और राजेश्वर्य में प्रेम होता है । वैश्य - कपडा लत्ता, भूषण आदि का ध्यान रखते है । और शूद्ध - मांस, मद्य इत्यादि के खान - पान में लोलुप होते हैं । जिसका पूर्व कर्म के अनुसार जिस वर्ण में प्रेम होगा वैसा ही सन्तान पैदा होती है । ४ सु ० शा ०

कर्मणा चोदितं जन्तोर्भवितव्यं पुनर्भवेत् ।

यथा तथा दैवयोगाद्दौनं जनयेद्धृदि ॥ २७ ॥

दौर्हृदों में कारण - पूर्वजन्म के कर्म के अनुसार गर्भ में पैदा होने पर जैसा उसका भवितव्य होता है दैवयोग से मन में उसी प्रकार के दौर्हृद की आकांक्षा उत्पन्न होती है ॥ २७ ॥

विमर्श: - देव और कर्म इनकी संगति वरावर चलती आती है । कर्म के ऊपर दैव निर्भर करता है और देव के । अनुसार कर्म चलते हैं । ये दोनों गाडी चक्र है । जिस प्रकार पक्षी बिना पंख के उठ नहीं सकते वैसे ही प्राणियों के जीवन में कर्म और दैव ये दो पंखों के समान है । तो भी उसमे शुभ कर्म करते रहने से दैव की अनुकूलता प्राप्त होती है । इस लिये कर्म - योग का प्राधान्य रहना चाहिये । पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धतर भवति, पष्ठे बुद्धि:, सप्तमे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरः, अष्टमे -स्थिरी भवत्योजः, तत्र जातश्चेन्न जीवेन्निरोजस्त्वाद्

नैर्ऋतभागत्वाच्च ततो बलिं मांसौदनमस्मै दापयेत् ।

नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिञ्जायते, अतोऽ-न्यथा विकारी भवति ॥ २८ ॥

गर्भ का पञ्चम महीने से वृद्धिक्रम- पांचवे महीने में मन अधिक प्रबुद्ध एवं सचेत होता है । पष्ठ महीने में बुद्धि प्राप्त होती है । सातवें महीने में सब अङ्ग प्रत्यङ्गों की अभिव्यक्ति भलीभांति होती है । अर्थात् चार शाखा, शिर और कोष्ठ यह छ. अङ्ग और प्रत्यङ्ग - ग्रीवा, मूर्धा वगैर. स्पष्ट हो जाते है । आठवे महीने में ओज चंचल रहता है । इस महीने में बालक पैदा होने पर नैर्ऋत के भाग के कारण तथा भोज धातु क्षीण रहने से जीता नहीं । इस कारण नैर्ऋत को बलि देना चाहिये जो कि मास और भात का रहता है । नवम, दशम, ग्यारह या बारह महीने में बालक पैदा होने से जीवित रहता है । इसके बाद यदि प्रसव न हो तो वह विकारी गर्भ समझा जाता है ॥ २८ ॥

विमर्श -- बालक के आयु का निर्णय प्रायः करना पडता है, इसलिये किस महीने में कौन सा भाग बनता है, यह समझ लेना आवश्यक है । आठवे मास में आयुर्वेद के मत से | न बचने का कारण कुमारतन्त्र में दिया है यथा - ' नैर्ऋताय भागश्च वालेषु रुद्रेण दत्त. ' उसी प्रकार ' स्थिरीभवति ओजः ' यह भी पाठ ' अस्थिरीभवत्योज ' इस जगह है और उसीके पास ' निरोजस्त्वात् ' ऐसा भी पाठ है । यहाँ निरोज का अर्थ ' क्षीण ओज ' लेना चाहिये । तब सगति बैठती है । चरक के मत में आठवे महीने का भी बालक जीवित रह सकता है । यदि प्रसूति के समय ओज बालक में रहे । चरक के मत से गर्भ - प्रसूति - काल दशम महीने के अन्त तक है । आधुनिक मत से सात महीने के बाद पुत्र जीवित रह सकता है । आठवें महीने में शरीर के ऊपर का स्तर ( Epidermic layer ) पूरा वनता नहीं । इसलिये बालक का शरीर वृद्ध मनुष्य के समान वलीयुक्त होता है । उसका पालन - पोषण भी कठिन हो जाता है । ९

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२६ सुश्रुतसंहिता वालक का उत्पत्तिक्रम -पहिले दो सप्ताह में बुदबुद के आकार का होता है । तीसरे सप्ताह में हाथ, पैर और पेट का भाग तथा Nural canal बनता है । • चौथे सप्ताह में आंख, कान, नाक, बनते हैं । ५ मिली मिटर उसकी लम्बाई होती है । दूसरे महीने में एक इञ्च के लगभग लम्बाई होती है, और मनुष्य की आकृति आती है । तीसरे महीने में तीन इञ्च चढता है, हड्डी बनने की क्रिया प्रारम्भ होती है । प्रथम मृदु अस्थि ( Cartledge ) बनती है तदनन्तर उसमे खटिका ( Calorum ) संग्रह होने लगते है | चौथे महीने में ८ ~ ९ इञ्च के लगभग बढता है । पांचवे 33 १२ " 23 " 39 है 1 छठे 93 १४ 22 33 " है । सातवे महीने में त्रह स्वतन्त्रतया जीवन व्यतीत करता है । प्राण वायु ( Oxygen ) सेवन करता है, हिलता -डुलता है, बाह्य उष्णता का अपर उस पर पडता है । आठवें महीने में उसके शरीर का ऊपरी स्तर ( Epide rme ) बहुत थोडा बनता है । इसलिये वृद्ध पुरप के समान उसका शरीर झुर्रीदार दीखता है । नवें महीने में वृद्धावस्था के समान रहने वाले लक्षण दूर हो जाते है । दशम महीने में वह २० बीस इञ्च बढ़ता है, ५ से ७ पौड उसका वजन होता है, चर्म मुलायम और चिकना होता है । अङ्गुली, नख और अड्डष्ट मजे के बनते है । मातुस्तु खलु रसवहायां नाड्यां गर्भनाभिनाडी प्रतिबद्धा, साऽस्य मातुराहाररसवीर्यमभिवहति । तेनो-पस्नेहेनास्याभिवृद्धिर्भवति । असञ्जाताङ्ग - प्रत्यङ्ग वि-भागं तु गर्भ निषेकात् ( ' असञ्जाताङ्गप्रत्यङ्ग - प्रविभा-गमानिषेकात् ' पाठभेदः ) प्रभृति सर्वशरीरावयवानु-सारिणीनां रसवहानां तिर्यग्गतानां धमनीनामुपस्नेहो जीवयति ॥ २६ ॥

गर्म का पोषण प्रकार - माताके रसवहा नाडीमें गर्भ की नाडी लगी हुई रहती है । वह नाडी माता के आहार -रसके वीर्य को गर्भ पहुँचाती है । उसी उपस्नेह से गर्म की वृद्धि होती है । यहां यह होती है कि जब तक गर्भनाडी । बहती ही नही तब तक गर्भ का पोषण कैसे होता रहता है '? इसलिये बताते है कि गर्भोत्पत्ति के लिये जव शुक्र का निषेक ( गर्भाशय में पतन होना ) होता है तब वे शुक्र-कीटाणु शोणित डिम्ब के साथ मिलकर गर्भ को पैदा करने लगते है । इस गर्भ का पोषण होना आवश्यक है जो कि सब अङ्ग - प्रत्यङ्गों से हीन होता है । ऐसी अवस्था में ( गर्भ-नाडी न रहते हुये भी ) केदार कुल्या के अनुसार तिरछे जाने वाली सर्व शरीर के अवयवों का अनुसरण करने वाली, रसों को ले जाने वाली धमनियों का स्पल्पसार गर्भ को जीवन रस देता है ॥ २ ९ ॥ विमर्श: - गर्भनाडी होने के पहिले गर्भाशय की धमनियों द्वारा गर्भ का पोषण होता है पश्चात् गर्भनाडी से पोपण होता है । जैसे तडाग के किनारे के वृक्षों के लिये तडाग का जल अप्रत्यक्ष रूपसे वृद्धि का कारण होता है वैसे ही गर्भ का भी पोषण अप्रत्यक्षतया धमनियों द्वारा होता है । गर्भ का पोपणक्रम ( Nutrition of the oram ) एक स्वतन्त्र वृत्ति और दूसरी परतन्त्रवृत्ति होती है । स्वतन्त्र-वृत्ति वह है कि जब तक अण्ड के स्वरूप में गर्भ रहता है | तब तक वह स्वकीय शरीर में रहने वाले योल्क ( Yolk ) । भाग पर जीवन चलाता है । पश्चात अपरा का आश्रय लेकर के वह माता के शोणित से अपना जीवन - क्रम चलाता है ग्रह परतन्त्र वृत्ति जीवन - क्रम हुआ है । चरक में शारीर स्थान छठे अध्याय २३ वे गद्य में गर्भ का पोपणक्रम दिया है, जिसका भावार्थं निम्नलिखित है । भूख - प्यासहीन गर्भ माता के आश्रय में तथा उसके उपस्नेह और उपस्वेट से बढ़ता है । उपस्नेह रोमकूपों के मार्गों से बल और वर्ण उत्पन्न करता है । वह उपस्नेह | माता का पोषण करता है, गर्भ की वृद्धि करता है और स्तन्य । ( दुग्ध ) भी बढ़ाता है । गर्भस्य खलु सम्भवतः पूर्वं शिरः सम्भवतीत्याह शौनक, शिरोमूलत्वात् प्रधानेन्द्रियाणाम् । हृदयमिति कृतवीर्यो बुद्धेर्मनसश्च स्थानत्वात् । नाभिरिति पाराशर्यः, ततो हि वर्धते देहो देहिनः । पाणिपादमिति मार्कण्डेयः, तन्मूलत्वाच्चेष्टाया गर्भस्य । मध्यशरीरमिति सुभूतिर्गौतमः, तन्निबद्धत्वात् सर्वगात्रसम्भवस्य ॥ तत्तु न सम्यक् सर्वाण्यङ्गप्रत्यङ्गानि युगपत् सम्भ-वन्तीत्याह धन्वन्तरि, गर्भस्य सूक्ष्मत्वानोपलभ्यन्ते वशाङ्कुरबच्चूतफलवच्च । तद्यथा— चूतफले परिपक्वे केशर मांसास्थिमज्जानः पृथक् पृथग्दृश्यन्ते कालप्रक र्षात् । तान्येव तरुणे नोपलभ्यन्ते सूक्ष्मत्वात् तेषां " सूक्ष्माणां केशरादीनां काल प्रव्यक्ततां करोति, एते-नैव वंशाङ्कुरोऽपि व्याख्यातः एवं गर्भस्य तारुण्ये सर्वेष्वङ्गप्रत्यङ्गेषु सत्स्वपि सौक्ष्म्यादनुपलब्धिः, तान्येव कालप्रकर्षात् प्रव्यक्तानि भवन्ति ॥ ३० ॥ -गर्मोत्पत्तिक्रम - शौनक मुनि का मत है कि उत्पन्न होने

वाले गर्भ का प्रथम शिर उत्पन्न होता है । क्योंकि प्रधान इन्द्रिय कान, नाक, चक्षु, जिह्वा इत्यादि का निवास स्थान शिर ही हैं । कृतवीर्य मुनि का मत है कि बुद्धि और मनका स्थान हृदय है और उसकी प्रथम उत्पत्ति होती है । पाराशर्य मुनि का कहना है कि प्रथम नाभि उत्पन्न होती है क्योंकि उसी से प्राणी के शरीर की वृद्धि होती है । मार्कण्डेय मुनिका कथन है कि प्रथम हाथ और पैर पैदा होते है । क्योंकि गर्भ की चेष्टा उन पर निर्भर करती है ।

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अध्याय ३ ] शारीरस्थानम् २७ सुभूति गौतम कहते है कि मध्यशरीर प्रथम उत्पन्न 1. होता है क्योंकि सब गानो की उत्पत्ति का सम्बन्ध उसी से है । भगवान् धन्वन्तरि का कहना है कि, ऊपर के मत ठीक नहीं है क्योंकि एकसमयावच्छेद से अङ्ग और प्रत्यङ्ग उत्पन्न होते है । गर्भ छोटा होने से जैसे बांस का अड्डर या आम्र फल की किस प्रकार वृद्धि होती है इसका पता नहीं लगता वैसे ही गर्भ की वृद्धि का पता नहीं चलता है । जैसा आम का फल पकने पर उसमें केशर, मास ( गूढा ), अस्थि ( गुठली ), मज्जा ( गुठली के भीतर का भाग ), ये सब कुछ काल वाढ अलग अलग - दीखते है किन्तु वे ही भाग नये आम्र - फलों मे छोटे होने से नही मिलते । केशर, गुठली इनको काल ( समय ) ही व्यक्त करता है । इसी प्रकार बांस के अङ्कुरों की वृद्धि जाननी चाहिये । गर्भ छोटा होने से अङ्ग - प्रत्यङ्ग रहने पर भी छोटे होने के कारण उनका साक्षात्कार नहीं होता है । उनका साक्षात्कार समय से ही होता है ॥ ३० ॥

विमर्श - शरीर के सब अङ्ग महत्व रखते है । इसी लिये उनकी उत्पत्ति एकसमयावच्छेद से ही होती है । आकृति छोटी होने से उसका ज्ञान होना कठिन है । तत्र गर्भस्य पितृज मातृज रसजा - त्मज सत्त्वज-सात्म्यजानि शरीरलक्षणानि व्याख्यास्यामः । गर्भस्य, केश - श्मश्रु - लोमा - स्थि - नख - दन्त -सिरा- स्नायु - धमनी- रेतःप्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि । मांस- शोणित- मेदो - मज्ज - हृन्नाभि- यकृत् - प्लीहा न्त्र - गुदप्रभृतीनि मृदूनि मातृजानि । शरीरोपचयो बलं वर्णः स्थितिर्द्धानिश्च रसजानि । इन्द्रियाणि ' ज्ञानं विज्ञानमायुः सुखं दुःखादिकं चात्मजानि ।

सत्त्वजान्युत्तरत्र वक्ष्यामः ।

वीर्यमारोग्यं बलवर्णौ मेघा च सात्म्यजानि ॥३१ ॥

• गर्भ के पितृजादि लक्षण - अब गर्भ के पितृज ( पिता-सम्बन्धी ), मातृज ( माता -सम्बन्धी ), रसज ( रस से उत्पन्न ), आत्मज ( आत्मा - सम्बन्धी ), सत्त्वज ( मन-सम्बन्धी ), सात्म्यज ( प्रकृति - सात्म्य से होने वाले ), शारी-रिक लक्षण कहते है-पिता से - गर्भ के केश ( Hairs ), श्मश्रु ( दाढी, मूंछ ), लोम ( छोटे - छोटे बाल ), अस्थि ( हड्डी ), नख ( Nauls ), दन्त ( Teeth ), शिरा ( Veins ), स्नायु ( संहत्यर्थे Ligamments और व्यक्त्यर्थे Fibrous tissue ), धमनी ( Arteries ), रेतः ( वीर्य Semen ) इत्यादि स्थिर भाग होते है? माता से — मास ( Mascles के उत्पादक भाग ), शोणित ( खून Blood ), मेद ( Fat चर्बी ), मज्जा ( Marrow ), हृत् ( हृदय, Heart ), नाभि ( ढोंढी, Umblicus ), यकृत् ( जिगर - Laver ), प्लीहा ( Spleen - तिल्ली ), अन्त्र ( आंतडी, Tutestines ) तथा गुढ ( मलद्वार Ractum ) इत्यादि मृदु-भाग माता से उत्पन्न होते है । रससे उत्पन्न होने वाले —–— शरीर की पुष्टि, चल ( शक्ति ), वर्ण ( कान्ति ), स्थिर ( शरीर की विद्यमानता Persistancy ), हानि ( हास Decay ) ये है । आत्मा से उत्पन्न होने वाले - एकादश इन्द्रियां, ज्ञान, । विज्ञान, आयुष्य, सुख, दुःख इत्यादि है । सव से उत्पन्न होने वाले लक्षण आगे जाकर बतावेगे । सात्म्य से उत्पन्न होने वाले वीर्य ( पराक्रम ), आरोग्य ( Helth, स्वास्थ्य ), वल ( शक्ति, Strength ), वर्णं ( कान्ति ), मेधा - धारणात्मक बुद्धि Retentive power ) ये सवा हैं ॥ ३१ ॥

विमर्शः -- सच्च से उत्पन्न होने वाले ' चरक ' -- भक्तिः, शीलं शौचं द्वेप, स्मृतिः, मोह - स्त्यागो - मात्सर्य - भयं-क्रोध - स्तन्द्रो - रसाह -स्तैच्ण्य - मार्दवं - गाम्भीर्य - मनवस्थितत्व-| मित्येवमादयश्चान्ये । भक्तिः ( श्रद्धा करना ), शीलम् ( उत्कृष्ट वर्त्तन ), शौचम् | ( पावित्र्य ), द्वेप: ( ईर्ष्या करना ), स्मृति. ( स्मरण करना ), मोह: ( सन्देह होना ), व्यागः ( औदार्य ), मात्सर्यम ( मत्सर करना ), शौर्यम् ( शूरता ), भयम् ( भीरुता ), क्रोधः ( गुस्सा ), तन्द्रा ( निद्रा का प्रकार ), उत्साहः ( काम करने की इच्छा ), तैच्ण्यम् ( तेज रहना ), मार्दवम् ( मृदुता ), गाम्भीर्यम् ( खूब सोचना ), अनवस्थितत्वम् ( चाञ्चल्य ) इत्यादि और भी उस प्रकार के अन्य गुण समझना चाहिये । तत्र यस्या दक्षिणे स्तने प्राक् पयोदर्शनं भवति, दक्षिणाक्षिमहत्त्वं च पूर्व च सक्थ्युत्कर्षति, बाहुल्याच पुन्नामधेयेषु द्रव्येषु दौहृदमभिध्यायति, स्वप्नेषु चोपलभते पद्मोत्पलकुमुदाम्रातकादीनि पुन्नामान्येव, | प्रसन्नमुखवर्णा च भवति तां ब्रूयात् पुत्रमियं जनयि व्यतीति, तद्विपर्यये कन्याम्, यस्याः पार्श्वद्वयमुन्नतं पुरस्तान्निर्गतमुदरं प्रागभिहितलक्षणं च तस्या नपुंसक-मिति विद्यात् । यस्या मध्ये निम्न द्रोणीभूतमुदरं सा युग्मं प्रसूयत इति ॥ ३२ ॥

गर्भ / लङ्गनिश्चिति - तत्र ( वाक्यालङ्कारे ) जिस स्त्री के दहिने स्तन में प्रथमतः दुग्ध दीखेगा, दाहिनी आंख वडी होगी, प्रथम दाहिनी जघा बड़ी होगी, विशेष करके पुरुषवाचक पदार्थों में दौर्हृद होता है, स्वप्न में कमल, उत्पल ( श्वेत कमल ), कुमुद ( कमल का भेद ), आम्रातक ( लसोडा ) इत्यादि पुरुष -वाचक पदार्थों का दर्शन होता है, जिसका चेहरा और कान्ति प्रसन्नता के प्रदर्शक हों वह पुत्र को पैदा करेगी, ऐसा समझना चाहिये । इनके विपरीत लक्षण वाले चिह्न होने से कन्या उत्पन्न करेगी, ऐसा समझना चाहिये । जिसके दोनों कुक्षियां ऊची हों, आगे उदर ( पेट ) निकला हो, और पूर्वकथित लक्षण ( पुरुष जन्म के तथा स्त्री होने के चिह्न ) हो समझना चाहिये कि नपुंसक पैढा होगा । जिसका मध्य भाग निम्न ( गहरा ) द्रोणीभूत ( द्रोण के समान ) हो तो समझना चाहिये कि जोडी ( Twzus ) पैदा होगी ॥ ३२ ॥

विमर्श -- द्वन्द्व ( ' Twins, मिले बालक ) के लिए जि स्त्री की रोमावली गहरी हुई हो वह दो सन्तान उत्पन्न

पृष्ठ 379

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२८ सुश्रुतसंहिता करेगी ऐसा समझना चाहिये ' रोमराजी भवेन्निम्ना यस्या मा सूयते यमौ ' इति । चरक के शारीर स्थान के २ अध्याय में कन्या पैदा होने के लनग दिये हैं । उसके विरुद्ध पुत्र उत्पन्न होने के समझना चाहिये । यथा-सव्याङ्गत्वंष्टा पुरषार्थिनी स्त्री स्त्री स्वप्नपानाद्यनलीलचेष्टा । मव्यात्तगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यप्रदुग्धा स्त्रियमेव सृते ॥ पुत्रं तो लिहविपर्ययेण व्यामिश्रलिङ्कां प्रकृति तृतीयाम् ॥

भवन्ति चात्र -देवता ब्राह्मणपरा: शौचाचारहिते रताः ।

महागुणान् प्रसूयन्ते विपरीतान्तु निर्गुणान् ॥ ३३ ॥

सद्गुणी बाल्क के उन्म में कारण- देवताओं की पूजा करने वाले, ब्राह्मणों की सेवा करने वाले, शुद्ध तथा हितकर आचरण करने में तन्पर, ऐसे माता - पिता सद्गुणी बालकों को पैदा करते हैं । इससे विपरीत गुणवाले निर्गुणी बालकों को उत्पन्न करते है ॥ ३३ ॥

विमर्श - कायिक, वाचिक और मानसिक अच्छे कर्म का फल अच्छा ही होता है इसलिए इम्पति शुद्ध आचरण वाले हों तो अच्छी सन्तान पैदा होती है ।

अङ्ग - प्रत्यङ्ग - निर्वृत्तिः स्वभावादेव जायते ।

अङ्ग - प्रत्यङ्ग - निर्वृत्तौ ये भवन्ति गुणागुणाः ॥

ते ते गर्भस्य विज्ञेया धर्माधर्मनिमित्तजाः ॥ ३४ ॥

इति सुश्रुतसहिताया शारीरस्थाने शुक्रशोणितशुद्धि-शारीरं नाम तृतीयोऽध्यायः । विकृत अङ्गप्रत्यङ्कों में कारण- अग और प्रत्यङ्गों की उत्पत्ति स्वाभाविक तरह से होती है किन्तु उनमें उत्कृष्टता और निकृष्टता जो आती है वह गर्भ के धर्म या अधर्म के कारण आनी है ॥ विमर्शः – पीछे ' स्वभावमीश्वरं कालं यदृच्छां नियति तथा ' । इत्यादि श्लोक के अनुसार स्वभाव से ही अग-प्रायगो की उत्पत्ति होती है । उनके ऊपर धर्माधर्म का असर पहना है - इसलिए सउंच सन्मार्ग पर चलना सर्वोत्कृष्ट है । इनि शारीरस्थाने शुक्रनांगितशुद्दिशारीर नाम तृतीयोऽध्यायः । शारीरे प्रश्नाः--( Anatomy ) ( १ ) निश्चिनानि कानि ( २ ) गन्य वृद्धिक्रनन् । ( ३ ) पर्ननादांनिर्माांगत. प्रागू गर्भस्य पोषणक्रम कथ सवति ( ८ ) गर्भस्य निर्मितानि इनि ( ५ ) गर्भस्य कि पूर्व निर्वृत्तिप्रकार. । शारीरनियाविज्ञाने प्रश्ना ( Physiology-( १ ) गमस्य मातृ - पिट रमना मल - सत्वज - मात्म्यान भवान् यन्तु । ( १ ) यो जीवन योनी चतुर्थोऽध्यायः अथातो गर्भव्याकरणं नाम शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

विषय – अब गर्भव्याकरण नामक शारीर का व्यास्थान

करेंगे ।

जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि से कथन किया गया है ॥१-२ ॥

विमर्श - गर्भावक्रान्ति के पश्चात् गर्भ का व्याकरण ( विवरण ) जिसमें है ऐसा शरीर स्थान का वर्णन करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है । इसमें भी ( Development of the foetus ) गर्भ के अह्न बढने की प्रक्रिया दी गयी है । अग्निः सोमो वायुः सत्त्वं रजस्तमः पचेन्द्रियाणि भूतात्मेति प्राणाः ॥ ३ ॥

प्राण. - -अग्नि, सोम, वायु, सच्च, रज, तम, पञ्च इन्द्रियां ( ज्ञानेन्द्रियां ) और भूतामा ( जीवात्मा ) ये प्राण हैं ॥ ३ ॥

विमर्श. - ऊपर दिये हुये बारह प्राण हैं । प्रथम तो गरीर का वर्णन करना रहा किन्तु आधेय रूप प्राणों का वर्णन -देह की स्थिति उनके अधीन होने से करते हैं । आहार का पाचन करना, रस बनाना इत्यादि कर्मों द्वारा अग्नि - गरीर का रक्षण करता है । सोम - ओन इत्यादि सौम्य धातुओं का पोषण करके शरीर का रक्षण करता है । वायु - उच्छ्वास-निःश्वास द्वारा शरीर की रक्षा करता है । सत्व, रज और तम ये जीवात्मा तथा मन के ऊपर असर डालकर उसके । जीवन के कारण होते हैं । चचु - जिह्वा आदि पञ्च ज्ञानेन्द्रियां रूप - रस आदिकों के ग्रहण द्वारा शरीर को जीवित रखते हैं । उसी प्रकार भूतात्मा ( कर्मपुरप ) शरीर को चेतना देने वाला होता है । इस लिये ये सब प्राण हैं । तस्य खल्वेवं प्रवृत्तस्य शुक्रशोणितस्या - ( क्वचित् ' शुक्रशोणितस्य ' पाठो न विद्यते ) -भिपच्यमानस्य क्षीरस्येव सन्तानिकाः सम त्वचो - ( षट् त्वचः ' पा ० ' ) । भवन्ति । तासां प्रथमावभासिनी नाम, या सर्वान् वर्णानवभासयति पञ्चविधां च छायां प्रकाशयति । सा व्रीहेरष्टादशभागप्रमाणा, सिध्मपद्मकण्टकाधिष्ठाना । द्वितीया लोहिता नाम व्रीहिपोडशभागप्रमाणा, तिलकालकन्यच्छव्यङ्गाधिष्ठाना । तृतीया श्वेता नाम त्रीहिद्वादशभागप्रमाणा, चर्म-दुला जगल्लीमशकाधिष्ठाना । चतुर्थी ताम्रा नाम व्रीहेरष्टभागप्रमाणा, विविध-किलासकुष्टाधिष्टाना । पचमी वेदिनी नाम व्रीहिपञ्चभागप्रमाणा, कुष्ठ-विसर्पाधिष्टाना । घष्टी रोहिणी नाम ब्रीहिप्रमाणा, अन्ध्यपच्यर्बुद-श्लीपद्गलगण्डाधिष्टाना । सप्तमी मांसधरा नाम त्रीहिद्वयप्रमाणा, भगन्दर • विद्रध्यर्शोऽविष्टाना ।

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सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
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श्रध्याय ४ ] शारीरस्थानम् २६ यदेतत् प्रमाणं निर्दिष्ट तन्मास लेष्ववकाशेपु, न ललाटे सूक्ष्माङ्गुल्यादिपु च, यतो वक्ष्यत्युदरेषु ' ब्रीहि मुखेनाङ्गुष्ठोदर प्रमाणमवगाढ विध्येत् ' ( चि ० अ ० १४ ) इति ॥ ४ ॥

स्वचाओं का वर्णन - इस प्रकार भूतात्माधिष्ठित शुक्र और शोणित के पक्क होने पर, जिम प्रकार दूध पर मलाई आती है उसी प्रकार सात त्वचाओं के स्तर बनते है । उनमें से पहिली अवभासिनी नामक त्वचा होती है जो सब वर्णों को प्रकट करती है और पांच प्रकार की छाया को प्रकाशित करती है । वह चावल के अठारहवे भाग के समान मोटी होती है, इसी त्वचा में सिध्म, पद्मकण्टक आदि रोग होते है । दूसरी त्वचा लोहिता नाम की है । वह चावल के सोलहवे भाग के बरावर मोटी रहती है । इसमें तिलकालक, न्यच्छ, व्यन ( वांग या छाई ) रोग रहते है । तीसरी त्वचा श्वेता है । यह चावल के बारहवें भाग के तुल्य मोटी रहती है । उसमे चर्मदल, अजगल्लिका और मशक ( मस्सा ) का स्थान होता है । चौथी त्वचा ताम्रा नाम की है । वह भाग के बराबर मोटी होती है । उसमे नाना और कुष्ठ रोग होते हैं । पाचवी वेदिनी नाम की त्वचा है । पञ्चमांश भाग के बराबर मोटाई होती है विसर्प होते है | चावल के आठवे प्रकार के किलास इसमें चावल के । इसमे कुष्ठ और पष्ठी रोहिणी त्वचा है । यह चावल के बराबर मोटी रहती है । इसी में ग्रन्थि, अपची, अर्बुद, गलगण्ड विकार होते है सातवीं मांसधरा है । वह दो चावल के बराबर मोटाई में है । इसी में भगन्दर ( Fistula ), विद्रधि ( Abscess ), बवासीर ( Piles ) रोग होते है । यह जो प्रमाण बताया है, सो मांसल स्थानों में समझना चाहिये क्योंकि आगे चि ० अ ० १४ मे लिखा है कि ब्रीहिमुखेन ( ब्रीहिमुख नामक यन्त्र से ) अङ्गृठे की मोटाई के प्रमाण में गहरा छेद करना चाहिये । ऐसा न समझे कि उपरि निर्दिष्ट प्रमाण ललाट या छोटी - छोटी अंगुलियों में का है ॥४ ॥

विमर्श. - ये जो सप्त त्वचाऍ ( Layers of shin ) बतायी हैं । उनमे ऊपर से लेते हुए नीचे भाग के नाम बताते हुए उनमें होने वाले रोग बताये है । अवभासिनी पाच प्रकार की छाया बनाती है । छाया और प्रभा इनमें थोडासा अन्तर है । छाया समीप से देखी जाती है और प्रभा दूर से प्रकाशित होती है । प्रभा को कान्ति कहते है और छाया को वर्ण कहते है । इन त्वचाओं के प्रमाण में बीहि नाम का धान्य बताया है वह ' यव ' है । कोई उसका चावल भी अर्थ बताते है । यहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि यव ले या चावल, वह तो कभी प्रमाण में छोटा और कभी प्रमाण में मोटा मिलेगा तो उसमें कौन सा प्रमाण ठीक होगा? यह शङ्का ठीक है किन्तु शरीर भी तो सब लोगों का कसा नही रहता है । वह भी तो भिन्न - भिन्न प्रकारों सङ्गति ठीक होगी । चतुर्थ और पञ्चम स्तरों में कुष्ठ ( Skindi ease ) होता है । पञ्चम स्तर में विसर्प ( Erysipelas ) । भी रहता है । रोहिणी नाम छठी त्वचा में ग्रन्थि ( Tumour ) अपची, अर्बुद, ( Malignant Tumour ), श्लीपद ( Elephantiasis ), गलगण्ड ( Goitre ) विकार होते है । सप्तम त्वचा में भगन्दर ( Fistula in Ano ), विधि ( Abscess ) और अर्श ( Piles ) होते है । जिस कारण व्रीहिमुख ( Trochor and Canula ) से उदर में छेट करने को लिखा है अतः उपरि निर्दिष्ट प्रमाण मासल स्थानों में समझना चाहिये । चरक के मत मे छः त्वचाये है-( १ ) उदकधरा । ( २ ) असृग्धरा । ( ३ ) सिध्म ( Cloasme ), किलास ( I eucoderma ) जिसमे ये रहते है वह तृतीय त्वचा है । ( ४ ) चौथी त्वचा मे ददु ( Ring worm ) और कुष्ठ ( Skin Disease ) रहता है । ' ( ५ ) पञ्चमी त्वचा मे अलजी और विद्वधि ( Abscess ) होती है । ( ६ ) पीवचा फटने से अन्ध के माफिक चारों ओर अन्धकार होता है । इसी त्वचा में काले और लाल ढग की, बडे मूल वाली और चिकित्सा करने में कठिन ऐसी फुन्सियां होती है । आधुनिक मत से त्वचा दो प्रकार की है Epidermis और Dermis ( बाह्य और अन्तः त्वचा ) यद्यपि ये दो प्रकार की त्वचाये मालूम होती है तो भी इनमे भी, वाह्य त्वचा मे ' पांच ' और अन्तः स्वचा में दो स्तर मिलते हैं ।

कुल ये भी सात स्तर होते है ।

कलाः खल्वपि सप्त भवन्ति घात्वाशयान्तरमर्यादाः ॥ ५ ॥

कला वर्णन - कलाये भी सात होती हैं, वे धातु और आशयों के मर्यादा -स्थान पर होती है ॥ ५ ॥

विमर्श. - यहाँ यह शका अवश्य होती है कि आशय तो नियत स्थान पर है और कला तो सब शरीर पर है । फिर यह कला का वर्णन किस प्रकार संगतियुक्त है । इसलिये यहां आशय शब्द का अर्थ अवस्था प्रदेश ( मर्यादाभाग ) है | इससे यह सिद्ध होता है कि रस-रक्तादि के मर्यादा भागों को कला कहते हैं । इन्हें ही आधुनिक काल मे Mucous membrane, epithelium और synoviel_membrane कहते है । इसे cell कहना अधिक उपयुक्त होता है क्योंकि cell से टिसु बनते हैं, उसी प्रकार कलारस ही धातु बनाता है । वही कफ पित्तादिकों की उत्पत्ति करता है ।

भवतश्चात्र-यथा हि सारः काष्ठेषु विद्यमानेपु दृश्यते ।

तथा हि धातुर्मासेषु विद्यमानेषु दृश्यते ॥ ६ ॥

स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्तताश्च जरायुणा ।

श्लेष्मणा वेष्टितचापि कलाभागांस्तु तान् विदुः ॥७ ॥

कला - स्वरूप - जैसे लकडी काटने से सार का दर्शन होता का होता है, या ऐसा कर सकते है कि- त्रीहि पद से उत्तम है उसी प्रकार मांस को काटने पर धातु का दर्शन होता है । परिपक्व यव लेवे और शरीर अच्छे तरुण पुरुष का लेवे तो | वही रस और रक्त रूपी द्रव्य है ।