श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 381–390

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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३० सुश्रुतसंहिता स्नायुओं से ढके हुए और जरायु ( झिल्ली ) से व्याप्त तथा कफ से वेष्टित भागों को कलाभाग कहते है ॥ ६-७ ॥ विमर्श -यह वर्णन Mucous membrane, epithelium और synovial membrane: मिलता है । दो श्लोक कलाओं का स्वरूप बताते है । ' वृद्ध वाग्भट ' में कला का स्वरूप इस प्रकार है । यथा - ' यस्तु धात्वाशयान्तरेषु क्लेदोऽवतिष्ठते स यथास्वमूप्मभिर्विपक्व स्नायुश्लेप्मजरायु-च्छन्नः काष्ठ इव सारो धातुरसशेपो ( रसविशेषो पा ० ) -अल्पत्वात् कला संज्ञा ' ' अ ० सं ० शा ० अ ० ५ । ' तासा प्रथमा मांसधरा नाम, यस्यां मांसगताना ( ' मांसे ' वा ) शिरास्नायुधमनी - स्रोतसां प्रताना भवन्ति ॥ ८ ॥

प्रथम कला- उन सात कलाओं में से प्रथम मांसधरा नामक कला है, जिसमें शिरा, स्नायु, धमनी और स्रोतसों की शाखाएँ होती है ॥ ८ ॥

विमर्शः - प्रथम रसधरा कला का स्वरूप कहना रहा किन्तु उसका अन्तर्भाव पुरीपधरा में होता है । इस मांसधरा में शिराओं ( Veins ), स्नायुओं ( Ligaments या Nerves ), धमनियों ( Arteries ) और स्रोतसों ( Tissues ) की शाखा - प्रशासाएँ रहती है ।

यथा बिसमृणालानि विवर्द्धन्ते समन्ततः ।

भूमौ पोदकस्थानि तथा मांसे सिराऽऽदयः ॥ ॥

ऊपर के प्रतानों के लिये दृष्टान्त - भूमि पर पक ( कीचड ) और जल मे रहने वाले बिस तन्तु, मृणाल, ( कमलनाल ) जैसे चारों ओर बढ़ते है ॥ ९ ॥

विमर्श: - ऐसा विचार अवश्य होता है कि प्रथम रस, रक्त, मांस इत्यादि धातुओं का क्रम होते हुये भी प्रथम । मासधरा कला का वर्णन क्यों किया? प्रथम तो रसधरा का वर्णन तदनन्तर रक्तधरा का वर्णन उसके पश्चात् मास-धरा का वर्णन करना रचित था किन्तु यहा मांसधरा का वर्णन किया है इसका कारण यह है कि मांसधरा आधार है और रक्तधरा उसके ऊपर रहने वाली है इसलिये प्रथम मासधरा कला का वर्णन किया है । द्वितीया रक्तधरा मांसस्याभ्यन्तरतः, तस्यां शो-णितं विशेषतञ्च सिरासु यकृत्प्लीहोश्व भवति ( स्रवति पा ० ) ॥ १० ॥

रक्तभग कला – दूसरी रक्तधरा नामक कला है । यह मांस के भीतर से जाती है, इसमें रक्त का संवहन होता है । यह रक्तधरा कला विशेषतया शिराओं में, यकृत में और प्लीहा में होती है ॥ १० ॥

विमर्श - यकृत और प्लीहा ( Liver and spleen ) उसी प्रकार ' मिरासु ' इस जगह ' स्रोत. सु ' ऐसा पाठ मानने से यकृत, प्लीहा और स्रोतस् इन तीन स्थानों में रक्त को बनाने वाले तत्र रहते है । जिनमें रक्त बनकर मास के भीतर से वहन करने लगता है I

वृक्षाद्यथाऽभिहतात् क्षीरिणः क्षीरमास्रवेत् ।

मांसादेवं क्षतात् क्षिप्रं शोणित संप्रसिच्यते ॥ ११ ॥ ।

मांस से रक्त कैसे निकलता है इसका प्रमाण- दुग्ध वाले वृक्षों से आघात करने पर जैसे दुग्ध आता है । उसी प्रकार काटे हुये मांस से खून टपकने लगता है ॥ ११ ॥

विमर्श - रक्तधरा कला है, इसमें क्या प्रमाण है? इस लिये दृष्टान्त देकर सिद्ध करते है कि मांस काटने पर रक्त निकलने से रक्तधरा कला है, यह सिद्ध होता है । तृतीया मेदोधरा; मेदो हि सर्वभूतानामुदरस्थ-मण्वस्थिषु च महत्सु च मज्जा भवति ॥ १२ ॥

मेदोधरा कला - तीसरी मेदोधरा कला है । यह सर्व-प्राणिमात्रो के उदर में और छोटी - छोटी हड्डियों में रहती है । ast हड्डियों में मज्जा रहती है ॥ १२ ॥

विमर्श - मज्जा ( Bonemarrow ) और पेट के चर्म के नीचे भाग में रहने वाली चर्बी ' मेदोधरा ' कला है । ' अष्टाङ्ग-संग्रह ' में और भी थोडा अधिक वर्णन है ' तदेव च शिरसि | कपालप्रतिच्छन्नं मस्तिष्काख्यं मस्तुलुङ्गाख्यं च ' वही मेदो-धरा कला मस्तक मे, कपालों ( Skulls ) के भीतर मस्तु-लुग मस्तिष्काव्य है । मेदोधरा कला मे वसा का भी अन्त-र्भाव होता है ।

स्थूला स्थिपु विशेपेण मज्जा त्वभ्यन्तराश्रितः ।

अथेतरेषु सर्वेषु सरकं मेद उच्यते ॥

शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा बसा परिकीर्त्तिता ॥ १३ ॥

गद्योक्त मेद का स्पष्टीकरण- विशेष करके स्थूल हड्डियों के भीतर मज्जा रहती है । इनके ( स्थूल हड्डियों के ) अतिरिक्त इतर ( सूक्ष्म ) सब हड्डियों में रक्त के साथ मेढ रहता है । शुद्ध मांस का जो स्नेह रहता है, वह ' वसा ' नाम से कहा जाता है ॥ १३ ॥

विमर्श: -- वसा, मज्जा और मेद तीनों पदार्थ ' मेदोधरा ' कला के अन्तर्गत आते है । उनका परस्पर भेद निम्न प्रकार से है-मज्जा मेट वसा ( १ ) स्थूल अस्थियों ( १ ) सूक्ष्म हड्डियों मे ( १ ) शुद्ध मांस का में रहती है । रहता है । जो स्नेह है,

वह वसा है ।

चतुर्थी श्लेष्मधरा, सर्वसन्धिषु प्राणभृतां भवति ॥ १४ ॥

श्लेष्मधरा कला का वर्णन - प्राणियों की सर्व सन्धियों में रहने वाली कला ' श्लेप्मधरा ' है ॥ १४ ॥

विमर्श. – यह श्लेप्मधरा ( synovial fuid ) बनाने | बाली कला है ।

भवति चात्र-स्नेहाभ्यते यथा ह्यते चक्रं साधु प्रवर्त्तते ।

सन्धयः साधु वर्त्तन्ते संश्लिष्टा श्लेष्मणा तथा ॥१५ ॥

श्लेष्मधरा कला का कार्य - जिस प्रकार अक्ष ( चक्र में घूमने वाला दण्ड, महाराष्ट्र भाषामें के ऊपर तेल छोडने से गाडी का चक्र ( पहिया II ) अच्छी ) तरह घूमता है । उसी प्रकार श्लेप्मा से युक्त सन्धियाँ भी अच्छी तरह घूमती है ॥ १५ ॥

पृष्ठ 382

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श्रध्याय ४ ] शारीरस्थानम् ३१ विमर्श - श्लेष्मल द्रव ( Synovial fluid ) यह तेल के सन्धियों के भीतर रहता है जिस से सन्धिया आपस मे रगट नहीं जाती और एक दूसरे पर अच्छी तरह घूम सकती है । पञ्चमी पुरीषधरा नाम, याऽन्तः कोष्ठे मलम भिविभजते पक्वाशयस्था ॥ १६ ॥

यकृत्समन्तात् कोष्ठं च तथाऽन्त्राणि समाश्रिता ।

उडुकस्थं विभजते मलं मलधरा कला ॥ १७ ॥

पुरीपधरा का का वर्णन - पांचवी कला का नाम पुरीष-धरा है । जो कोष्ट में रहकर पक्वाशय का आश्रय करती हुई का विभजन ( पृथक्करण ) करती है । यकृत के पास कोष्ट और आंतों का आश्रय करती हुई, उण्डक में रहने वाले मल को विभक्त करने वाली कला ' मलधरा ' है ॥ १६-१७ ॥ विमर्श: - पांचवी कला ' पुरीपधरा ' है इसे वृहदन्त्र ( Large intestine ) कहते है | किन्तु श्लोक का वर्णन लघु अन्त्र और बृहद् अन्त्र दोनों को बताने वाला है । यहां यकृत् से आरम्भ होने वाला लध्वन्त्र ( small inte stine ) है और आगे उण्डुकस्थ ( उण्डक पर रहने वाला ) बृहदन्त्र ( Large intestine ), इस प्रकार दोनों अंतडियां आती हैं । आधुनिक मत मे बृहद् अन्त्र ( large intestine ) और ( Various parts of colon ) यह है | प्राचीन मतों में गयी, चरक, सुश्रुत और वृद्ध वाग्भट के मत वृहदन्त्र ही नहीं किन्तु आमाशय, पक्वाशय, मूत्राशय, रक्ताशय, हृदय, उण्डुक और फुफ्फुस आदि को भी कोष्ट कहते है । अर्थात इनमें से मल को पृथक करने वाली पुरीषधरा कला है । पष्ठी पित्तधरा या चतुर्विधमन्नपानमाशयात् प्रच्युतं पक्काशयोपस्थितं धारयति ॥ १८ ॥

पित्तधरा कला. – छुटी ‘ पित्तधरा ' नामक कला है जो अशित, खाद्य, पेय, लेटा, यह जो चार प्रकार का अन्न है उसको आमाशय से निकलते हुए पक्काशय की ओर जाते

हुए धारण करती है । यही पित्तधरा कला है ॥ १८ ॥

विमर्श - आधुनिक मत से यह Duodenum है । यहां पर ही पाचक रसों के एकत्र होने का केन्द्र है । इसे ग्रहणी नाम से प्राचीन लोग सम्बोधित करते है । अष्टाङ्गसंग्रह में । दिया है कि - ' ष्टी पित्तधरा नाम पक्कामाशयमध्यस्था, सा यन्तरग्न्यधिष्ठानतयाऽऽमपक्वाशययोर्मध्ये चतुर्विधमन्नं बलेन विधार्य पित्ततेजसा शोषयन्ती पचति ' अ ० सं ० श ० अ ० ५ ॥

अशितं खादितं पीत लीढं कोष्ठगतं नृणाम् ।

तब्जीर्यति यथाकालं शोपितं पित्ततेजसा । १६ ॥

ऊपर का अर्थ इलोक में — भोजन किया हुआ, खाया तथा । पान किया हुआ, लीढ ( चाटा हुआ ) यह चार प्रकार का । भुक्त पढार्थ मनुष्यों के पेट में पित्त के तेज से शोषित किया गया यथासमय जीर्ण हो जाता है ॥ १ ९ ॥ विमर्श. -- इस जगह ' यथाकाल ' ऐसा लिखने से तीच्णा-ग्नि, विषमाग्नि, मन्दाग्नि, मध्यमाझि के अनुसार और मात्रा | द्रव्य, गुरु द्रव्य, लघु मात्रा, अतिकाल में ली हुई मात्रा, काल के पूर्व ली हुई मात्रा का बोध होता है ॥ १ ९ ॥ सप्तमी शुक्रधरा, या सर्वप्राणिनां सर्वशरीरव्यापिनी ॥ शुक्रधरा कला: - सातवीं शुक्रधरा कला है जो सम्पूर्ण प्राणियों के अखिल शरीर में व्याप्त रहती है ॥ २० ॥

विमर्श. - शरीर में शुक्र ( Seminal fluid ) को सञ्चित करने वाली यह कला है । यद्यपि आधुनिक मत शुक्र का सर्वशरीर - ध्यापकत्व सिद्ध नहीं है तथा शुक्रधरा कला भी प्रत्यक्ष नहीं है । यदि शुक्र से तात्पर्य अण्डकोष के अन्तः-स्राव से हो तो शुक्रधरा कला का अर्थ रक्तवाहिनीगत श्लेप्मकला ( Indothelium ) किया जा सकता है ।

यथा पयसि सर्पिस्तु गुडश्चक्षुरसे यथा ।

शरीरेषु तथा शुक्र नृणां विद्यापिवरः ॥ २१ ॥

शुक्रव्यापकता के दृष्टान्त-: - जैसे दूध में घी सर्वत्र रहता है । ऊख ( गन्ना ) में जिस प्रकार गुट रहता है, उसी प्रकार पुरुषों के शरीर में शुक्र रहता है ॥ २१ ॥

विमर्श. -- जिस प्रकार दूध के वर्ण से घी का अनुमान होता है, ईख की पुष्टि से उसके मिठास का पता चलता है उसी प्रकार मनुष्य ( मानव ) शरीर देखने से उसके भीतर के शुक्र का पता चलता है । जिस प्रकार दूध के मथने से घी निकलता है उसी प्रकार अण्टकोप ( Testicle ) मे सञ्चित । हुआ शुक्र मैथुन से दृश्य होता है ।

द्वयले दक्षिणे पार्श्वे ' बस्तिद्वारस्य चाप्यधः ।

मूत्रस्रोतः पथाच्छुक्रं पुरुपस्य प्रवर्त्तते ॥ २२ ॥

शकमार्ग - वस्ति द्वार के भी नीचे दो अड्डल दक्षिण ( दाहिने ) और ( पाठभेद के अनुसार वायें तर्फ ) मूत्र चहन मार्ग से पुरुष का शुक्र निकलता है ॥ २२ ॥

विमर्श. -- -- पु पुरुष में मृत्रमार्ग और शुक्रमार्ग एक ही होता है । बाहर निकलने के लिए भिन्न मार्ग नही है । वस्ति के दोनों और दो शुक्राशय ( Seminal resicles ) रहते हैं जिनसे शुक्र मेदस्रोत ( urathral canal ) मे जाता है ।

कृत्स्नदेद्दाश्रितं शुक्र प्रसन्नमनसस्तथा ।

ay व्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् सम्प्रवर्त्तते ॥ २३ ॥

दर्पजन्य शुक्रप्रादुर्भाव - प्रसन्न मन होकर स्त्री - प्रसंग करने वाले पुरुष के सर्व शरीर में रहने वाला शुक्र हर्ष के कारण प्रवृत्त होता है ॥ २३ ॥

विमर्श. -- शुक्र तो शरीर में अदृश्य रहता है तो उसके प्रत्यक्ष होने का कारण क्या है? इसलिए बताते है कि प्रसन्नतापूर्वक स्त्रीप्रसन्न करने मे शुक्र का प्रत्यक्षीकरण होता है । गृहीतगर्भाणामार्त्तववहानां स्रोतसां वरुद्धयन्ते गर्भेण, तस्माद् गृहीतगर्भाणामार्त्तवं न दृश्यते, ततस्तदधः प्रतिहतमूर्ध्वमागतमपरं चोपचीय. मानमपरेत्यभिधीयते, शेपं चोर्ध्वतरमागतं पयोध-रावभिप्रतिपद्यते, तस्माद्गभिण्यः पीनोन्नतपयोधरा भवन्ति ॥ २४ ॥

१ - वामे ' प्रत्यक्ष शा ० ।

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३२ सुश्रुतसंहिता गर्भवती स्त्री के आर्तव न दीखने तथा पुष्ट स्तन और अपरा बनने में कारण – गर्भवती स्त्रियों में आर्त्तववह स्रोतों के मार्ग गर्भ के कारण रुक जाते है, इसलिए गर्भवती स्त्रियों का आर्त्तव दीखता नहीं, किन्तु वह रुका हुआ आर्त्तव नीचे न जाते हुए ऊपर की ओर ( गर्भाशय में ) एकत्र होता है जिसे ' अपरा ' कहते है, शेप रुका हुआ आर्त्तव स्तनों को प्राप्त होता है जिसमे गर्भिणी के स्तन पुष्ट और उन्नत हो जाते है ॥ २४ ॥

विमर्श. - अपरा का दूसरा नाम ' अमरा ' भी है । इसे । Placenta कहते है । इसके ऊपर एक पतली झिल्ली ( Membrane ) होती है । इसी झिल्ली के भीतर ' अपरा ' के । समीप बच्चा रहता है । वह देखने में अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होता है । गर्भस्य यकृत्प्लीहानी शोणितजौ, शोणितफेन-प्रभवः फुप्फुस ', शोणितकिट्टप्रभव उण्डुकः || २५ || यकृत, प्लीहा, फुफ्फुस और उण्डुक की उत्पत्ति - गर्भ के यकृत और प्लीहा रक्त ( ग्वून ) से पैदा होते हैं । फेफडा - । यह रक्त के फेन से उत्पन्न होता है । रुधिर के मल से ' उण्डुक ' पैदा होता है ॥ २७ ॥

विमर्श - यकृत, प्लीहा के महश क्लोम भी शोणित मे उत्पन्न होता है । वृद्ध वाग्भट ने लिसा है - ' रक्ताढनिल-युक्तात् कालीयकम् ' अ ० स ० शा ० अ ० ५ । फुप्फुम की उत्पत्ति बताते हुवे ' फुप्फुसा ' यह द्विवचन न देने का तात्पर्य यह है कि जातिवाचक शब्द के लिये एकवचन देने की प्रथा है । उडुक ( पोटुलक. Appendix ) यह रक्त के । aa से उत्पन्न होता है ।

असृजः श्लेष्मणश्चापि यः प्रसादः परो मतः ।

तं पच्यमानं पित्तेन वायुश्चाप्यनुधावति ॥

ततोऽस्यान्त्राणि जायन्ते गुढ़ बस्तिश्च देहिन. ॥ २६ ॥

आन्त्र, गुढ और वस्तिओं की उत्पत्ति - रक्त और कफ का जो उत्तम सार भाग है उसको पित्त से पचाते समय वायु भी उधर दौड़ती है । जिससे प्राणिओं की अतडी, गुढद्दार और वस्ति उत्पन्न होती है ॥ २६ ॥

विमर्श - शीसा फूकने वाले जिस प्रकार शीसे को फूक कर शीशी, बोतल बनाते हैं उसी प्रकार पोले अवयवों के निर्माणमें वायु कारण होता है ।

उदरे पच्यमानानामाध्मानाद्रुक्मसारवत् ।

कफशोणितमांसानां सारो जिह्वा प्रजायते ॥ २७ ॥

जिहा की उत्पत्ति - उदर ( पेट ) वाले ) कफ, रक्त और मास सच्च से जैसे — धौकने पर सुवर्ण का सार वैसे ही जिह्वा भी कफ, रक्त और मास विमर्श - ' उदरे पच्यमानानाम् ' मतानुसार ( ‘ हृढये पच्यमानानाम् ' ( Tongue ) की उत्पत्ति साररूप है । से पच्यमान ( पचने जिह्वा उत्पन्न होती है । भाग शेष रहता है | का सार होती है || २७ || इस जगह ' गयी ' क यह पाठ है । जिह्वा

- यथार्थमूष्मणा युक्तो वायु ' स्रोतांसि दारयेत् ।

अनुप्रविश्य पिशित पेशीर्विभजते तथा ॥ २८ ॥

स्रोतों का विदारण और पेशियों का बनना | - जैसे ममु. चित उष्णता मे युक्त होती हुई वायु स्रोतों को विदीर्ण करती है, उन्हें बढाती है । उसी प्रकार वही वायु मांस को प्राप्त होकर पेशियों के रूप में उसे विभक्त करती है ॥ २८ ॥

विमर्श -- यहा वायु स्रोतों ( Trat = मार्ग ) को कैसे विदीर्ण करती है, यह बताया है और ( Muscles ) पेशी बनने की क्रिया दी गई है । किसी के मत में पेशी आच्छादन ( Covering ) है | उदाहरणार्थ fasc11, sheath और Serous membrane हैं | हृदयपंथी ( Pericardium ), सिरा पेशी ( membranous coverings of Veins ), अम्धिपेशी ( Peri - ostium ) ।

मेदसः स्नेहमादाय सिरा स्नायुत्वमाप्नुयात् ।

सिराणां तु मृदुः पाकः रनायूनां च ततः खरः ॥

आशय्याभ्यासयोगेन करोत्याशयसम्भवम् ॥ २६ ॥

स्नायु और आशयों की उत्पत्ति - मिरा मेद का स्नेह लेकर स्नायुन्व को प्राप्त होती है । गिरा और स्नायु इनमें अन्तर यह है कि शिराओं का पाक मृदु रहता है और स्नायुओं का पाक उसमे ( शिराओ से ) खर ( कठिन ) रहता है । बारम्बार रहने का अभ्यास करते - करते ( वायु ) आशयों की उत्पत्ति करती है । लिसा भी है - ' स वायुर्मांसपेशीपु आशय्य आ समन्तात निवानं कृत्वा हृदयादायाना सम्भवमुत्पत्तिं | करोति ॥ २ ९ ॥ विमर्श - शिरा ( Veins ) और स्नायु ( Ligaments ) तथा आशय इनकी उत्पत्ति बतायी है । स्नायु किसी मत से muscles भी कहलाते है । जैसे प्रतानवती स्नायु, सुपिरा स्नायु, वृत्ता इत्यादि । उसी प्रकार स्नायुओं के कार्य भी ' उत्नेपणापक्षेपण ' इत्यादि है । ढल्हण में दिया भी है ' क्रिया-स्वशक्तिरिति ' । स्नायु को muscles मानने पर lgIments कौन से है, यह प्रश्न रह जाता है । सन्धिबन्धन यही ligra ments है । रक्तमेदः प्रसादाद् वृक्कौ, मांसासृक्कफमेदः प्रसादाद् वृषणौ, शोणितकफप्रसादज हृदय, यदाश्रया हि धमन्यः प्राणवहा, तस्याधो वामतः प्लीहा फुप्फुसश्च, दक्षिणतो यकृत् क्लोम चः तद्विशेषेण चेतनास्थानम्, अतस्तस्मिंस्तमसाऽऽवृने सर्व प्राणिनः स्वपन्ति ॥ ३० ॥

वृक्क, वृषण और हृदय की उत्पत्ति- रक्त और मेद के सार से वृक्क ( गुर्दे ) बनते है । मास, रक्त, कफ और मेद इनके सार से वृषण ( अण्ड ) वनते हैं । रक्त और कफ के सार से हृदय बनता है । जिसके आधार से प्राणवहा धमनिया रहती है । उसके नीचे बाई ओर प्लीहा और फुफ्फुस है । दक्षिण | ( दहिने ) ओर यकृत् ( जिगर ) और क्लोम है । हृदय-यह विशेष करके चेतनास्थान है । इसलिये तम से जब हृदय आच्छादित होता है तो सब प्राणिलोग सो जाते हैं ॥३० ॥

विमर्श - इस गद्यमे वृक्क ( Kid ey ) वृषण ( Test1-cles ), हृदय ( Heart ) की उत्पत्ति बतायी है । हृदय के बाईं ओर फुप्फुस बताया है, दाहिनी ओर नहीं, इसका कारण यह है कि हृदय स्पष्टतया उस ( फुप्फुस ) पर

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३४ सुश्रुतसंहिता teres ) वनती है और सेतुशिरा ( Ductus venosus १ ) तमोऽभिभूते तस्मिंस्तु निद्रा विशति देहिनाम् || ३३ ॥ से शिराबन्धनिका ( lgameut venosum of Iner ) बनती है । निद्रां तु वैष्णव पाप्मानमुपदिशन्ति, सा स्वभा-चत एव सर्वप्राणिनोऽभिस्पृशति । तत्र यदा संज्ञा • बहानि स्रोतांसि तमोभूयिष्ठः श्लेष्मा प्रतिपद्यते, तदा तामसी नाम निद्रा सम्भवत्यनवबोधिनी, स प्रलय काले, तमोभूयिष्ठानामह सु निशासु च भवति, रजो भूयिष्ठानामनिमित्तं सत्त्वभूयिष्ठानामर्धरात्रे, क्षीण श्लेष्मणामनिलबहुलानां मनःशरीराभितापिनां च नैव सा वैकारिणी भवति ॥ ३२ ॥

निद्रा - निद्रा - यह विष्णु की माया स्वरूप है और इसे पापिनी भी कहते है । क्योंकि वह सब शुभ कमों के व्यापार का नाश करती है । जब तमोगुण बाहुल्ययुक्त कफ, संज्ञावह स्रोतों को प्राप्त होता है तब तामसी निद्रा होती है जो ज्ञान नहीं होने देती है, वह प्रलय काल में आती है । तमोगुणयुक्त प्राणियों को दिन में और रात में निद्रा प्राप्त होती है । रजोगुण युक्त प्राणियों को ' अनिमित्तमः नियतकालम् ' कभी रात मे कभी दिन में निद्रा प्राप्त होती है । उनके निद्रा का समय निश्चित नहीं होता है क्योंकि रजोगुण चञ्चल प्रकृति वाला होता है । सवभूयिष्ठ लोगों को अर्द्धरात्रि में निद्रा प्राप्त होती हैं । जिनका कफ क्षीण हो गया हो और वायु बढ गया हो मन और शरीर में पीड़ा होती हो तो उन्हें निला आती ही नहीं, उसे वैकारिकी निद्रा कहते हैं ॥ ३२ ॥

विमर्श - निद्रा तीन प्रकार की होती है । एक तामसी प्रलयकाल दूसरी स्वाभाविकी और तीसरी वैंकारिकी । तामसी निद्रा में प्राप्त होती है । स्वाभाविकी निद्रा मनुष्य की प्रकृति के अनुसार कभी रात - दिन, कभी वेवक्त और कभी नर्धरात्रि में आती है । चैकारिकी निद्रा मन और शरीर क्ट में रहने से आती ही नहीं । वैकारिकी निद्रा का कारण कफ घटना और वायु बढ़ना है । ये दोप लइन और श्रमसे वैकारिकी निद्रा के अनुसार कहीं घटते और बढते हैं । बहुतों को श्रम से और घन से निद्रा आती है । उसका कारण यह होता है कि मन के क्लान्त ( थकने के ) होने के वाद कर्मात्मा भी श्रान्त होता है, तव विपयों से उसकी वासना हट जाती है जिससे निद्रा आती है । अष्टाङ्ग संग्रह के मत के अनुसार निद्रा सात प्रकार की होती है । यथा--' कालस्वभावामयचित्तदेहखेदै कफागन्तुतमोभवा च । निद्रा विभर्त्ति प्रथमा दशरीरं पाप्मान्तगा व्याधिनिमित्तमन्या । ( 1 ) स्वभावजन् द्रा ( २ ) आमय ( रोग ) जन्य निद्रा ( ३ ) चित्तखेदजन्य निद्रा ( ४ ) देहखेदजन्य निद्रा ( ५ ) कफजन्य निद्रा ( ६ ) आगन्तु निद्रा ( ७ ) तमोभवनिद्रा । इन निद्राओं में से प्रथम निद्रा शरीर की । उपस्तम्भ स्वरूप होती है, शेप ६ निद्राएँ पापस्वरूप ( विकार युक्त ) होती है । भवन्ति चात्र-हृदयं चेतनास्थानमुक्तं सुश्रुत! देहिनाम् ।

निद्रा हेतुस्तमः सत्त्वं बोधने हेतुरुच्यते ।

स्वभाव एव वा हेतुर्गरीयान् परिकीर्त्यते ॥ ३४ ॥

निद्रा का पक्ष में विषयः - हे सुश्रुत! व्यक्ति का चेतना स्थान हृदय है | जब वह तमोगुण से व्याप्त होता है तो । प्राणियों को निद्रा प्राप्त होती है । निद्रा का कारण तमोगुण है और जगने का कारण मध्य है । निद्रा में स्वभाव ही । प्रधान कारण है । उसके लिये दूसरे हेतुओं की आवश्यकता | नहीं है, नहीं तो मस्यभूयिष्ठ गुण वाला विचारा जागते २ ही रह जाता । इसलिये बताते है प्राणी को नींद आना स्व •

भावत. ही है । ३३-३४ ॥

विमर्श -- निद्रा आने के लिये हृदय के ऊपर तम का प्रादुर्भाव करना पडता है । इसलिये तमोगुण विशिष्ट महिपी का दूध और उसमें महिपी का ही ' घी ' ढाल कर देते हैं । जिससे हृदय तमोगुण से व्याप्त होता है और पर्याप्त निदा आती है । इस जगह यह भी ध्यान रखना चाहिये कि महिषी का दूध और घी दोनों कफवर्धक हैं । इसलिये जहा । कफ से विकार उत्पन्न होता हो और अग्नि मन्द हो ऐसे । स्थानों में न दे या सारासार विचार करके दे ।

। पूर्वदेहानुभूतांस्तु भूतात्मा स्वपतः प्रभुः ।

रजोयुक्तेन मनसा गृहात्यर्थान् शुभाशुभान् ॥ ३५ ॥

निद्रा तो बोध नहीं होने देती फिर स्वप्न - दर्शन कैसे होता हूँ- सोते हुए व्यक्ति का स्वामी भूतात्मा होता है । वही रजोयुक्त मन से पूर्वदेह में अनुभव किये हुए अच्छे या बुरे अर्थों को ग्रहण करता है ॥ ३५ ॥

विमर्श - निद्रा में तो बाह्य विषयों के अभाव में स्वप्न में देखना कैसे होता है? उसमें हेतु स्मृति है । नये पदार्थों की कल्पना होना असम्भव होता है । स्मृति में वे ही पदार्थ आते है जो कि देखे या सुने गये हों, अन्य नहीं, आत्मा जब तमोगुण से व्याप्त होता है तब जीवात्मा ही स्वतः आवरण युक्त हो जाता है । किन्तु रजोगुण युक्त मन के होने से निद्रा मैं भी स्वप्न की प्रतीति होती है । कारणानां तु वैकल्ये ( वैगुण्ये ' पा ' ) तमसाऽ-भिप्रवर्धिते । अस्वपन्नपि भूतात्मा प्रसुप्त इव चोच्यते ॥ ३६ ॥

निर्विकार भूतात्मा की निद्रा में कारणता - तम से जब इन्द्रियों की विकलता बढ़ जाती है तो न सोने वाला भूतात्मा भी सोया, ऐसा कहते है ॥ ३६ ॥

विमर्श - जिस प्रकार इन्द्रियों के विकल होने पर वाह्येन्द्रियों से रूप - रसादिकों का प्रत्यक्ष नहीं होता उसी प्रकार ' मन ' के त्रिकल होने से सुख - दुःख का भान नहीं होता है । इस प्रकार दोनों की विकलता के कारण भूतात्मा सोया ऐसा समझा जाता है । सर्वर्त्तृषु दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र ग्रीष्मात्, प्रतिषिद्धेष्वपि तु बाल - वृद्ध - स्त्री - कर्शित - क्षत - क्षीण-मद्य - नित्ययान- वाहना - ध्वकर्मपरिश्रान्तानामभुक्तवतां मेदःस्वेदकफरसरक्त - क्षीणानामजीणिनां च मुहूर्त्त

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श्रध्यायः ४ ] शारीरस्थानम् दिवास्वपनमनतिषिद्धम् । रात्रावपि जागरितवतां जागरित कालादर्द्धमिध्यते दिवास्वपनम् । विकृतिर्हि दिवास्वप्नो नाम, तत्र स्त्रपतामधर्मः सर्वदोषप्रकोपश्च, तत्प्रकोपाच कास- श्वास - प्रतिश्याय - शिरोगौरवा-नमर्दा - रोचक - ज्वरा - ग्निद्दौर्बल्यानि भवन्ति, रात्रावपि जागरितवतां वातपित्तनिमित्तास्त एवोपद्रवा भवन्ति ॥ ३७ ॥

निद्रा के नियम तथा उनके परिपालन न करने के दोष. - ~ सभी ऋतुओं में दिवानिद्रा ( दिन का सोना ) वर्ज्य है । बाल, वृद्ध ( बुड्ढे लोग ), स्त्रियों के कारण दुबले हुए ऐसे ( कामासक्त ), ` क्षत ( व्रणों से पीडित ), क्षीण ( दुबले ), नित्य मद्य पीने वाले, यान ( गाड़ी ) और वाहन ( घोटा ऊँट ) आदि से श्रमित, अध्वकर्म ( मार्ग चलना ), इनसे धान्त और भोजन न करने वाले, मेद, स्वेद, कफ, रस, रक्त की क्षीणता वालों को दिन में थोडा सोना निषिद्ध नहीं है । रात में जागने वालों के लिये जितनी देर तक रात में जगा हो उससे आधे समय तक दिनमें सोना इष्ट है । दिन में सोना विकृति है । उससे अधर्म और सब दोषों ( वात, पित्त, कफ ) का प्रकोप होता है । उनके प्रकोप से खांसी, श्वास ( दमा ), प्रतिश्याय ( जुखाम ), शिरोगौरव ( माथा भारी होना ), अङ्गमर्द ( वढन में पीडा ), अरुचि, ज्वर, अग्नि-मान्य ये विकार उत्पन्न होते हैं । रातमें भी जगनेसे बात, पित्त, दोषों से होने वाले ही विकार होते हैं ॥ ३७ ॥

विमर्शः - रातमें जागने वालों को दिन के आधा काल क्यों सोना चाहिये? अधिक ज्यादा सोने में सर्व दोष प्रकुपित होते हैं । दिन में सोने से रक्त भी बिगडता है । दिनमें सोना यद्यपि अधर्म है तो भी ग्रीष्म ऋतु में शरीर रक्षाकं निमित्त सोना अधर्म नहीं माना जाता है ॥

भवन्ति चात्र-तस्मान्न जागृयाद्रात्रौ दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।

ज्ञात्वा दोषकरावेतौ बुधः स्वप्नं मित चरेत् ॥ ३८ ॥

अरोगः सुमना ह्येवं बलवर्णान्वितो वृपः ।

नातिस्थूलकृशः श्रीमान् नरो जीवेत् समाः शतम् ॥ ३६ ॥ ।

( निद्रा सात्म्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा । )

दिवा रात्रौ च ये नित्यं स्वप्नजागरणोचिताः ।

न तेषां स्त्रपतां दोषो जायतां वाऽपि जायते ॥ ४० ॥

निद्रा के विषय में सह श्लोक - उपरि निर्दिष्ट कारणों से नागना नहीं चाहिये और दिन का सोना छोडना चाहिये । ये । दोनों भी दोषोंको उत्पन्न करने वाले है, यह समझकर विद्वान् पुरुष को चाहिये कि उचित प्रमाण में नींद ले । ऐसा करने का फल -- वह पुरुष नीरोग होता है, प्रसन्न मन बाला, शक्ति और कान्तियुक्त, वृप ( पराक्रमी ), बहुत मोटा नही या बहुत पतला नही ऐसा अर्थात् मध्यम शरीर । वाला, धनत्रान् होता हुआ सौ साल तक जीता है । ' निद्रा साम्यीकृता ' इत्यादि अर्ध श्लोक बहुत सी पुस्तकों में नहीं मिलता है । जिन लोगोंने रात्रि - जागरण और दिन का शयन अभ्यस्त किया हो, जो रात दिन जागने । । या सोने में अभ्यस्त हो ( यहां यथासंख्य अन्य करने से | ऊपर ) के पादसे द्विरुक्ति होती है इसलिये रातदिन ऐसा इकट्ठा अर्थ लेना ठीक होता है । ऐसे लोगोंको सोने से या जागने से कोई भी दोष उत्पन्न नही होता है ॥ ३८-४० ॥ विमर्श: - अभ्यास करते - करते सात्म्य हो जानेसे सदोप पदार्थों से भी दोप उत्पन्न नहीं होते है ।

निद्रानाशोऽनिलात् पित्तान्मनस्तापात् क्ष्यादपि ।

सम्भवत्यभिघाताच्च प्रत्यनीकैः प्रशाम्यति ॥। ४१ ॥

निद्रा - नाशके कारण - वायु से, पित्त से, मनके सन्ताप से, शारीरिक क्षीणता से या चोट से निद्रा- नाश उत्पन्न होता है । उपरि निर्दिष्ट कारणों के विरुद्ध चिकित्सा करने से निद्रा - नाश की शान्ति होती है ॥ ४१ ॥

विमर्श. - यहां कफसे निद्रानाश होता है ऐसा नहीं लिखा यह ख्याल रहे ।

निद्रानाशेऽभ्यद्योगो मूर्ध्नि तैलनिपेवणम् ।

गात्रस्योद्वर्त्तन चैव हित संवाहनानि च ॥ ४२ ॥

शालि - गोधूम - पिष्टान्न - भक्ष्यैरैश्वसस्कृतैः ।

भोजनं मधुरं स्निग्धं क्षीरमांसरसादिभिः ॥ ४३ ॥

रसैर्बिलेशयानां च विष्किराणां तथैव च ।

द्राक्षा- सितेक्षु - द्रव्याणामुपयोगो भवेन्निशि ॥ ४४ ॥

शयनासनयानानि मनोज्ञानि मृदूनि च ।

निद्रानाशे तु कुर्वीत तथान्यान्यपि बुद्धिमान् ॥ ४५ ॥

निद्रानाश हरण करने के उपाय: - निद्रा के नाश होनेपर शरीर में तेल की मालिश करना चाहिये, मायेपर तैंल लगाना चाहिये, हाथ, पैर और बदन पर उबटन लगाना चाहिये, उसी प्रकार सवाहन ( हाथ - पैर दबाना ) इत्यादि करना चाहिये । इनु ( ईख के बनाये हुए पदार्थ जैसे चीनी, गुड, खांड, मिश्री आदि, शालि चावल, गेहूँ तथा पिष्ट इत्यादि पदार्थों का सेवन करना चाहिये । दूध, मांसरस इत्यादिकों से स्निग्ध | ( चिकनाहट बाला ) और मधुर ( मीठा ) भोजन करना चाहिये । बिल में रहने वाले ( चूहा इत्यादि ) तथा विष्किर ( मुर्गा - जो बिखेर कर खाने वाले ) ऐसे जीवों का मांस खाना चाहिये उसी प्रकार दाक्षा ( अडगूर या मुनक्का ), सिता ( मिश्री ), इन्तु ( ईख, गन्ना ) तथा ईख से बने हुये पदार्थों जैसे चीनी, मिश्री, खाड, शिरका, गुड इत्यादि सेवन से निद्रा प्राप्त होती है । सोने के लिये विछौना, आसन तथा सवारियां ( मोटर, रेल, टांगा ) इत्यादि मृदु ( कोमल ) और मनोहर होने चाहिये । इनका उपयोग निद्रा नाग पर करना चाहिये । उसी प्रकार बुद्धिमान् वैद्यको अन्य वस्तुओं का जैसे वस्त्रों की निर्मलता, फूल, इत्र, धूप की सुगन्ध देना, मन्दमन्द प्रकाश रखना, सुरक्षित स्थान में निवास करना, मृदु भाषण करना या गान - वाद्य की मञ्जुल ध्वनि का कर्णगोचर होना, अच्छे समाचार - पत्रादि वगैरः श्रवण करना, इनका निदा का नाश होने पर उपयोग करना चाहिये ॥ ४२-४५ ॥ विमर्श - निद्रा लाने के उपायों में निम्न लिखित प्रकार से वर्गीकरण हो जाता है: --

पृष्ठ 386

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I सुश्रुतसंहितां ( १ ) वातजन्य निद्रानाश में मालिश, हाथ पैर दबाना इत्यादि शारीरिक क्रिया ( २ ) पित्तज निद्रानाश में मधुरान गान - पान सामान्य निद्रानाश में आसन, शयन कोमल रहना ( 2 ) मनोहारी सुगन्धि और चित्ताकर्षक का श्रवण ( ७ ) स्थान की स्वच्छता, स्वच्छन्द वायु ( ६ ) मन्द प्रकाश और सुरक्षित स्थान ( ७ ) निद्राप्रद औषध निद्राऽतियोगे वमनं हित संशोधनानि च लङ्घन रक्तमोक्षश्च मनोव्याकुलनानि च ॥ अतिनिद्रा की चिकित्सा - यदि अति निद्रा स्वच्छ और गान - वाद्य

।

४६ ॥

आती हो तो वमन ( के ), मशोधन ( विरेचन, आस्थापनों द्वारा ) देना चाहिये । लंघन ( भोजन न देना ), रक्तमोक्षण ( खून निकालना ), उसी प्रकार मन को सन्तप्त करने वाली वस्तुओं से निद्रा का नाश होता है ॥ ४६ ॥

विमर्श -- यहां सगोधन में वमन का अन्तर्भाव होता ही है किन्तु उसके विशेष उपादान का तात्पर्य निद्रानाश में उसकी विशेषता से है ।

कफ - मेदो- विषार्त्तानां रात्रौ जागरणं हितम् ।

दिवास्वप्नच तृट - शूल - हिक्काऽजीर्णा - तिसारिणाम् ॥ ३७ ॥

रात्रिजागरण और दिवास्वप्न किसके लिये लाभप्रद है कफ के विकारों में, मेदो रोग में, चिप से पीडित अवस्था में, रात में जागना हितकर होता है, और दिन में सोना तृट् ( तृपा ) रोग में, शूल ( पेट में पीडा होना ), हिक्का ( हिचकी ), अजीर्ण ( अपच ) और अतिसार ( दस्त ज्यादा होना ) आदि रोगों में हितकर है ॥ ४७ ॥

विमर्श -- पुष्टि से उत्पन्न होने वाले विकारों में रात में जागने से रूक्षता उत्पन्न होती है जिससे शरीर कृश होता है । कृश करने वाले विकारों में दिन में सोने से स्निग्धता प्राप्त होकर कृशता का हरण होता है । विपजन्य विकारों में सोनान चाहिये क्योंकि सोने से विष का प्रभाव अधिक होता है ।

इन्द्रियार्थेष्वसम्प्राप्तिर्गौरव जृम्भणं क्लमः ।

निद्राऽऽर्त्तस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ॥१४८ ॥

तन्द्रा का लक्षण - इन्द्रियार्य ( रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द ) का ज्ञान न होना, गौरव ( शरीर की गुरुता ), जृम्भण ( जम्भाई ), क्लम ( यकावट ) और निद्रा से पीडि व्यक्ति के महा जिस की चेष्टा होती है उसको तन्द्रा समझना चाहिये ॥ ४८ ॥

• विमर्श. - निद्रा और तन्द्रा में भिन्नता । निद्रा-( 1 ) नियत काल तक । जगाने से उठता है । ( ३ ) जगाने पर इन्द्रियार्थों का ज्ञान होता है । ३ ) आसों की कान्ति स्वच्छ रहती है १ ) थकावट हरण होती है । तन्द्रा ---( 1 ) अनियत काल तक 1 ( २ ) जगाने पर भी नहीं उठता । ( ३ ) जगाने पर भी इन्द्रियायों का ज्ञान नहीं होता है । ( ४ ) कान्ति निर्मल नही रहती है । ( ५ ) थकावट चढती है ।

पीत्वे क्रम निलोच्छ्वासमुद्वेष्टन् विवृताननः ।

यं मुवति नेत्राखं स जृम्भ इतिसन्नितः ॥ ४६ ॥

जृम्भा का लक्षण - मनुष्य विवृतानन ( मुख खोलते हुवे ), एक हवा का श्वास लेकर, उद्वेष्टन् ( वदन में पीड़ों सा मालूम करता हुआ ), जिस श्वास को, आंख में अश्रु लाते हुवे छोडा है उसे जृम्भ ( जम्भाई ) कहते है ॥ ४ ९ ॥ विमर्गः - जम्भाई की यह सुन्दर व्याख्या बताई है । छीक की भी व्याख्या बहुत से लोग निम्न प्रकार से करते

हैं । यथा-' प्राणोदानी समौ स्यातां मूर्ध्नि स्रोतः पथि स्थिती ।

नस्तः प्रवर्त्तते शब्दः क्षवथुं तं विनिर्दिशेत् ' ॥

प्राण और उदान वायु समान होकर शिरोरन्ध्रगामी होते हुये नाक से शब्द करते है, उसे क्षवथु ( छक ) कहते है ।

यो s नायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः ।

कुमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रबाधकः ॥ ५० ॥

घुमका लक्षण - जो अनायास ( श्रम बिना ) शरीरमें प्रवृद्ध श्रम ( विशेष परिश्रम ) करता हो, जिसमें श्वास ( दमा ) न आता हो, इन्द्रियार्थ ( शब्द, स्पर्श इत्यादि ) में विघ्न उत्पन्न करता हो उसे ' क्लेम ' कहते है ॥ ५० ॥

विमर्श: - श्रम और कम में भिन्नता-श्रम-( १ ) परिश्रमजन्य ( २ ) श्रमसे श्वास बढ़ता है । ( ३ ) शब्द, स्पर्श इत्यादिकों का ज्ञान रहता है । ( ४ ) शरीर को प्रसन्न रखने वाला । क्लम-( १ ) बिना परिश्रम । १ ) क्लम से श्वास नहीं बढ़ता । ( 3 ) इन्द्रियार्थ का ज्ञान नहीं रहता । ( ४ ) ग्लानि उत्पन्न करने वाला ।

सुखस्पर्शप्रसङ्गत्वं दुखद्वेषणलोलता ।

शक्तस्य चाप्यनुत्साह. कर्मस्वालस्यमुच्यते ॥ ५१ ॥

आलस्यका लक्षण - सुखकर स्पर्शो का अनुभव करना, दुःसकर वस्तुओं को दूर करने में इच्छुक, शक्ति होने पर भी

काम करने में उत्साह न रहना । उसे आलस्य कहते है ॥५१ ॥

विमर्श: - क्लम और आलस्य में अन्तर क्लम ----१ ) काम करने में शक्ति नही लगती है । १ ) सुख के लिये लोलुप न होना । ( 3 ) दुख में भी द्वेप न होना । ( ४ ) इन्द्रियायों का ज्ञान न होना ।

पृष्ठ 387

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श्रध्याय ४ | शारीरस्थानम् ३७ आलस्य ---( १ ) शक्ति रहते हुये भी काम नही करना । ( २ ) मुख की इच्छा । ३ ) दुख में द्वेप | ( ४ ) इन्द्रियार्थों का ज्ञान रहना ।

उत्क्लिश्यान्न न निर्गच्छेत् प्रसेकष्ठीवनेरितम् ।

हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्क्लेश विनिदिशेन ॥ ५२ ॥

उत्क्लेश का लक्षण - मुस में पानी आने से ( लालासाव से ) और थूक से प्रेरित हुआ अन्न उविलश्य ( वमन के समान पीडा देकर ) हृदय को दुःख देता है और स्वयं बाहर नहीं निकलता उसे उत्क्लेश कहते हैं ॥ ५२ ॥

विमर्श:: -- -I यह जी मचलना ( Vomiting sensation ) कहलाता है ।

वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्वेष्टन भ्रमः ।

न चान्नमभिकाङ्क्षत ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥

ग्लानि का लक्षण – इसमे तन्द्रा के अतिरिक्त सुख मीठा २ मालूम होता है । हृदय में सिकुडन, श्रम ( चक्कर ), अन्न की इच्छा न होना इत्यादि लक्षणों से ' ग्लानि ' समझना चाहिये ॥ ५३ ॥

विमर्श --- इसमें तन्द्रा के साथ और भी मस्तिष्कजन्य लक्षण, हृदय को दुःखदायक और आमाशय की विकृति के लक्षण होते है ।

आर्द्रचर्मावनद्ध वा यो गात्रमभिमन्यते ।

तथा गुरु शिरोऽत्यर्थ गौरवं तद्विनिदिशेत् ॥ ५४ ॥

गौरव का लक्षण - जो व्यक्ति गीले चर्म के लपेटने के समान अपने अवयवों को समझता हो तथा जिसका माथा अत्यन्त भारी हुआ हो उसे ' गौरव ' कहते है ॥ ५४ ॥

विमर्श - ऊपर के पक्तियों में ' वा ' का अर्थ विकल्प न समझकर ‘ इव ' ( तुल्य ) समझना चाहिये । उसी प्रकार यहां गान्नगौरव और शिरोगौरव के लक्षण बताये है ।

मूर्च्छा पित्ततमः प्राया रजः पित्तानिलाद् भ्रमः ।

antara फात्तन्द्रा निद्रा श्लेष्मतमोभवा ॥ ५५ ॥

मूर्च्छा, भ्रम, तन्द्रा और निद्रा के लक्षण: - मूर्च्छा - पित्तदोष और तमोगुण से होती है । भ्रम- रजोगुण, पित्त और वायु दोप से होता है । तन्द्रा - वात, कफ और तमोगुण से होती है । निद्रा - कफ और तमोगुण से उत्पन्न होती है ॥ ५५ ॥

विमर्श - मूर्च्छा, भ्रम, तन्द्रा और निद्रा में मनोदोप-तम और रज दोनों और शारीरिक तीनों दोपों में से यथासम्भव दो या तीन मिलकर मूर्च्छा, भ्रम इत्यादि उत्पन्न करते है । गर्भस्य खलु रसनिमित्ता मारुताध्माननिमित्ता व परिवृद्धिर्भवति ॥ ५६ ॥

गर्म की वृद्धि –गर्भ को वृद्धि अन्नरस से और वायु के आध्मान ( पूरण ) से होती है ॥ ५६ ॥ 1

विमर्श. - पीछे भी ' मातुस्तु खलु रसवहायां नाडयां गर्भनाभिनाडीप्रतिबद्धा ' ऐसा वर्णन है । यहां रस अर्थात् माता का अन्नरस ग्रहण करना चाहिये । उसी प्रकार । आध्मान शब्द का अर्थ स्रोतों का परिपूरण होता है । इसी प्रकार रस और मारुताध्मान के कारण गर्भ की वृद्धि होती है ।

भवतश्चात्र-तस्यान्तरेण नाभेम्तु ज्योतिः स्थान ध्रुवं स्मृतम् ।

तदा धमति वातस्तु देहस्तेनास्य वर्धते ॥ ५७ ॥

ऊष्मणा सहितश्चापि दारयत्यस्य मारुत ' ।

ऊर्ध्व तिर्यगधस्ताच स्रोतांस्यपि यथा तथा ॥ १८ ॥

श्लोकाद्ध गर्भवृद्धि – गर्भ के नाभि के अन्तरेण ( मध्य भाग

मे ) निश्चय से ज्योतिःस्थान ( अग्निस्थान ) है । वायु उसी

स्थान को फूकता है, जिससे गर्भ का देह बढता है । वायु उष्णता के साथ मिलकर ऊपर, नीचे और तिरछा जाता हुआ किसी प्रकार गर्भ के स्रोतों को फैलाता है ॥ ५७-५८ ॥ विमर्श. - तृतीय अध्याय ३४ वें गद्य में गर्भ के पोपण का विचार किया है । यहां स्रोतों की वृद्धि किस प्रकार होती है, बताई गई है ।

दृष्टिय रोमकूपाश्च न बर्धन्ते कदाचन ( कथंचन पा ० ) ।

ध्रुवाण्येतानि मर्त्यानामिति धन्वन्तरेर्मतम् ॥ ५६ ॥

न वढने वाले अब भगवान् धन्वन्तरि का मत है कि | मनुष्यों की दृष्टि और लोमकूप ( बाल निकलने के छिद्र ) कभी भी ( पाठभेद के अनुसार किसी भी प्रकार से ) निश्चय से नहीं बढ़ते है ॥ ५ ९ ॥ विमर्श: - सब शरीर की वृद्धि होती है तो भी दृष्टि और रोमकूप भी क्यों नही बढ़ते? इसमें कारण - ध्रुव हैं, निश्चित है, वे घट बढ़ नहीं सकते ।

शरीरे क्षीयमाणेऽपि चर्धेते द्वाविमौ सदा ।

स्वभावं प्रकृति कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ॥ ६० ॥

नित्य बढने वाले अङ्ग - शरीर क्षीण होने पर भी नख और केश ये दोनों अपनी प्रकृति के कारण निरन्तर बढते है, ऐसी स्थिति है ॥ ६० ॥

विमर्श - नख और केश वारम्बार काटने पर भी बढ़ते है । इसमें उन वस्तुओं का स्वभाव ही कारण है । ऐसा क्यों होता है? इसका उत्तर स्वभाव है । सप्त प्रकृतयो भवन्ति — दोषैः पृथग् द्विशैः समस्तैश्च ॥ ६१ ॥

प्रकृति के भेद -- तीन दोषों से तीन प्रकृति और दो २ ढोपों से तीन और एक सान्निपातिक कुल मिलाकर सात प्रकृतिया है ॥ ६१ ॥

विमर्श - सदोष होने पर भी इसे प्रकृति ही कहते हैं, विकृति नहीं । क्योंकि विकृति दुःख देने वाली होती है और प्रकृति विशेष दुःख नहीं देती है । इसलिये सदोप होते भी इनको प्रकृति ही कहते हैं ।

शुक्रशोणितसयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः । 1

प्रकृतिर्जायते तेन तस्या में लक्षणं शृणु ॥ ६२ ॥

प्रकृति बनने में कारण - शुक्र और आर्त्तव का संयोग होते समय जो दोप ( वात, पित्त, कफ ) प्रबल होता है । उससे प्रकृति बनती है । उस प्रकृति का लक्षण मुझसे सुनो ॥ ६२ ॥

पृष्ठ 388

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३८ सुश्रुतसंहिता विमर्शः - धन्वन्तरि महाराज सुश्रुत को प्रकृति के लक्षण बताते हैं । तत्र वातप्रकृतिः - प्रजागरूकः शीतद्वेषी दुर्भगः स्तेनो मत्सर्यनार्यो गान्धर्वचित्तः स्फुटितकरचरणोऽ तिरुक्षश्मश्रुनखकेशः क्रोधी ( क्राथीति पाठान्तरे ' हिंसाशील: ' ) दन्तनखखादी च भवति ॥ ६३ ॥

अधृतिरदृढसौहृदः कृतघ्नः कृशपरुषो धमनीततः प्रलापी । द्रुतगतिरटनोऽनवस्थितात्मा वियति च गच्छति सभ्रमेण सुतः ॥ ६४ ॥

अव्यवस्थितमतिश्चलदृष्टिर्मन्दरत्नधन संचयमित्रः ।

किञ्चिदेव विलपत्यनिबद्ध मारुत प्रकृतिरेष मनुष्यः ॥ ६५॥ ॥

वातिकाश्चाजगोमायुशशावृष्ट्रशुना तथा ।

गृध्रका कखरादीनामनूकै. कीर्त्तिता नराः ॥ ६६ ॥

वातप्रकृति के लक्षण — वातप्रकृति के लक्षणः - प्रजागरूक । ( अत्यन्त जागने वाला ), शीतद्वेपी- टण्डे पदार्थों से अनिच्छा रखने वाला ), दुभंग ( कुरूप ), स्तेन ( चोरी करने वाला ), मत्सरी ( दूसरों का द्वेए करने वाला ), अनार्य ( दुष्ट प्रकृति वाला ), गान्धर्वचित्त ( गान - वाद्य मे ध्यान देने वाला ), फटे हाथ-पैर वाला, अतिरुक्ष श्मश्रु ( कडी दाढी, मूछ ), नख और बाल वाला, क्रोधी ( गुस्सा करने वाला ), दन्त और नखों को खाने वाला, ऐसा पुरुष वातप्रकृति वाला है । धैर्यरहित, दृढ मैत्री न रखने वाला, कृतघ्न, कृश होने से रूक्ष शरीर वाला, शरीर पर रक्तवाहिनी नाढी हग्गोचर होने वाला, वकवादी, शीघ्रगामी, घूमने वाला, चञ्चल चित्त वाला, निद्रा में आकाश में गमन करने वाला होता है । जिसकी मति अस्थिर है, चञ्चल दृष्टि वाला, जिसके पास रत्न, पैसा और मित्र कम होते है । असम्बद्ध वार्त्तालाप करने वाला, पुरुष वात प्रकृति वाला होता है । बकरी, गोमायु ( शृगाल ), खरगोश, मूसा, ऊट, कुत्ता, स्यार, कौआ, गदहा इनके गील वाला अर्थात् इनके समान गुणवाला होता है ॥ ६३-६६ ॥ विमर्श - वातिक पुरुष के लक्षण नव विभागों में विभक्त किये है । नीट का विचार, स्वप्न, शरीर का दृश्य, न दीखने वाले गुण ( Symptoms ), गील ( स्वभाव ), नर्सों का विचार, धन, बोलना ( चकवाढ करना ) और आत्मशक्ति, ये नौ विभाग हैं । पित्तप्रकृतिः - स्वेदनो दुर्गन्ध. पीतशिथिलाङ्गस्ता नख - नयन - तालु - जिह्रौष्ठ - पाणि - पादतलो दुर्भगो वली पलितखालित्यजुष्टो बहुभुग् उष्णद्वेषी क्षिप्रकोप-प्रसादो मध्यमवलो मध्यमायुश्च भवति ॥ ६७ ॥

मेधावी निपुणमतिर्विगृह्य वक्ता तेजस्वी समिति दुर्निवारवीर्यः । सुप्तः सन् कनक - पलाश कर्णिकारान् सम्पश्येदपि च हुताशविद्युदुल्काः ॥ ६८ ॥

न भयात् प्रणमेदनतेष्वमृदु. प्रणतेष्वपि सान्त्वनदानरुचिः । भवतीह सदा व्यथितास्यगतिः स भवेदिह पिचकृतप्रकृतिः ॥ ६६ ॥

भुजङ्गोलूकगन्धर्वयक्षमार्जारवानरैः ।

व्याघ्रर्क्षनकुलानूकैः पैत्तिकास्तु नराः स्मृताः ॥ ७० ॥

पित्तप्रकृति के लक्षण -- पित्तप्रकृति के व्यक्ति को पसीना आता है, बदन में दुर्गन्धि आती है । अङ्ग पीला और शिथिल होता है । नाखून, आंख, तालु, जिह्वा, ओष्ठ ( होंठ ), पाणितल ( हाथ ), पादतल ( पैर ) ताम्रवर्ण के होते हैं । शरीर विकृत होता है । वली, पलित ( केश सफेद होना ), खालित्य ( खल्वाट ) इनसे युक्त होता है । बहुत खानेवाला, उष्ण चीजों से द्वेष रखने वाला और शीघ्र कुपित होने वाला 2 और शीघ्र शान्त होने वाला, मध्यम शक्तिवाला और मध्यम आयुष्य वाला होता है । मेधावी ( बुद्धिमान् ), निपुणमति ( तेज बुद्धि वाला ), विगृह्य वक्ता ( दूसरों का खण्डन करके मण्डन करने वाला ), तेजस्वी, समिति ( युद्ध ) में जिसका पराक्रम सहन नहीं किया जाता ऐसा होता है । नींद मे कनक ( सुवर्ण ), पलाश ( टाक ), कर्णिकार ( कनेर ), हुताश ( अग्नि ), विद्युत् ( बिजली ), उल्का ( ताराओं की स्थान -भ्रष्टता ) इन वस्तुओं को देखता है । डर से नम्र नहीं होता है, उद्धत लोगों के लिये कठिन ( उम्र ), नम्र लोगों के लिये सान्त्वना ( शान्ति ) करने में दत्त, व्यथितास्यगति ( बोलने में जिसे कष्ट हो ), क्योंकि उसे मुखपाक हरवख्त होता रहता है, ऐसा आदमी पित्त प्रकृति वाला होता है । सर्प, उल्लू, गन्धर्व, यक्ष, मार्जार ( विल्ली ), वानर | ( बन्दर, Monkey ), व्याघ्र ( शेर ), ऋक्ष ( रोड़ ), नकुल ( नेवला ) इनके समान प्रकृति वाले पित्त प्रकृति के होते है ॥ ६७-७० ॥ विमर्श - पित्त प्रकृति वाले के गुणों का ' नौ ' भागों में वर्गीकरण सामान्यत किया है । ( १ ) शरीर का रङ्ग, ( २ ) वालों की स्थिति ( ३ ) स्वभाव ( ४ ) बुद्धि ( ५ ) परा-क्रम ( ६ ) स्वप्न में देखना ( ७ ) मुखपाक इत्यादि रोग ( ८ ) जानवरों की प्रकृति से मिलना ( ९ ) मध्यम आयु इत्यादि । श्लेष्म प्रकृतिस्तु - दूर्वेन्दीवर - निख्रिशार्द्रारिष्टकशर-काण्डानामन्यतमवर्णः सुभगः प्रियदर्शनो मधुरप्रियः कृतज्ञो धृतिमान् सहिष्णुरलोलुपो बलवांश्विरग्राही । दृष्टवैरश्च भवति ॥ ७१ ॥

शुक्लाक्षः स्थिरकुटिलालिनील केशो लक्ष्मीवान् जलदमृदङ्गसिंहघोषः । सुप्तः सन् सकमलहसचक्रवाकान् संपश्येदपि च जलाशयान् मनोज्ञान् ॥ ७२ ॥

रक्तान्तनेत्रः सुविभक्तगात्रः स्निग्धच्छविः सत्त्वगुणोपपन्नः ।

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अध्यायः ४ ] शारीरस्थानम् ३६ क्लेशक्षमो मानयिता गुरुणां यो बलास - प्रकृतिर्मनुष्यः ॥ ७३ ॥

दृढशालमतिः स्थिर - मित्र - धनः परिगण्य चिरात् प्रददाति बहु । परिनिश्चितवाक्यपदः सततं गुरुमानकरश्च भवेत् स सदा ॥ ७४ ॥ ।

ब्रह्ममुद्रेन्द्रवरुणैः सिंहाश्वगजगोवृपैः ।

तार्क्ष्य- हंस - समानूकाः श्लेष्मप्रकृतयो नराः ॥ ७५ ॥।

कफ प्रकृति के लक्षण - क्फ प्रकृति वाला मनुष्य दूध, इन्दीवर ( कमल ), निम्निा ( तरबार ), आर्द्रारिष्ट ( ताजे नीम के पत्ते ), शरकाण्ड ( शरकण्डी ) इनमें से किसी एक वस्तु के वर्ण के समान वर्ण वाला होता है | सुन्दर शरीर वाला, प्रियदर्शन, मीठी वस्तुओं का खाने वाला, कृतज्ञ । ( उपकार को जानने वाला ), धृतिमान् ( धैर्यशील ), सहिष्णु ( सहनशील ), अलोलुप ( निरिच्छ ), शक्तिवाला और बहुत देर में ग्रहण करने वाला तथा पूर्ण शत्रुता रखने वाला होता है । उसकी आंखें सफेद होती हैं, कंा मजबूत, टेढ़े, और भ्रमर की नाई ( समान ) नील होते हैं । वह सम्पन्न और उसके शब्द मेव, मदन सिंहमा गम्भीर होते हैं । स्वप्न में कमलों के साथ हंस, चक्रवाक और सुन्दर जलाशयों को देखता है । नेत्रप्रदेश लाल होते हैं । शरीर गठीला होता है । कान्ति स्निग्ध होती है । सत्व गुण से युक्त होता है । कष्ट को सहन करने वाला, बड़े लोगों को मनानेवाला मनुष्य कफ प्रकृतिवाला होता है । शास्त्र में उसकी मति दृढ होती है ( निःसन्देह शास्त्र का ज्ञान होता है ), उसके मित्र और धन स्थिर रहते हैं । बहुत देर तक सोचने के बाद बहुत देता है । अच्छी तरह सोचकर पदों को, वाक्यों को कहने वाला और हर समय गुरु लोगों का मान करने वाला होता है । ब्रह्मा, रह ( शंकर ), वरुण देवताओंके, सिंह, अम्व ( बोड़ा ) गज ( हाथी ), वृप ( बैल ) जानवरों के; और गल्ड, राजहंस पक्षियों के समान शक्ति वाला होता है ॥ ७१-७५ ॥ विमर्शः कफप्रकृति के लक्षणों का भी वर्गीकरण ' नौ ' भागों में होता है । वे चक्षु बाल, ध्वनि, स्वप्न, शारीरिक शान्ति, शास्त्र प्रवेश, शील, भाव - भक्ति तथा छवि के अनुसार लक्षण होते हैं ।

द्वयोर्वा तिसृणां वाऽपि प्रकृतीनां तु लक्षणैः ।

ज्ञात्वा संसर्गज्ञो वैद्यः प्रकृतीरभिनिर्दिशेत् ॥ ७६ ॥

द्विदोषन और त्रिदोषज प्रकृति- वैद्य को दो या तीन प्रकृतियों के लक्षण के अनुसार संसर्गज प्रकृति का समझना चाहिये ॥ ७३ ॥

विमर्श - द्विदोषज और सान्निपातिक भी प्रकृति होती है ।

प्रकोपो वाऽन्यथा भावो क्षयो वा नोपजायते ।

प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥ ७७ ॥

प्रकृति स्थिर रहती है— स्वभाव से ही प्रकृति का कोप या अन्यथाभाव ( प्रकृति के दोष के कारण रोगोत्पत्ति ) या प्रकृति का हास नहीं होता है । ये सब तब होते हैं जब आयुष्य की अन्तिम अवस्था होती है ॥ ७७ ॥

विमर्गः - अरिष्टसूचक लक्षण जब होने लगते हैं तब प्रकृति में विकृति दीखने लगती है । नहीं तो प्रकृति के दोपों से कोई विशेष दुःख नहीं होता है ।

विषजातो यथा कीटो न विपेण विपद्यते ।

तद्वत्प्रकृतयो मत्यं शक्नुवन्ति न बाधितुम् ॥ ७८ ॥

प्रकृति बाधक न होने मे दृष्टान्त - जिस प्रकार विप में पैदा हुआ कीड़ा विप से नहीं मरता है । उसी प्रकार प्रकृति भी मनुष्य को विशेष बाधा देने में समर्थ नहीं होती है ॥७८ ॥

इस पद्य में ' न ' यह ' ईपदर्थ ' में आता है । यद्यपि प्रकृतिस्थ द्वेष अधिके दुख नही देते तो भी ' बातलाद्याः सदाऽऽतुराः ' च ० सू ० अ ० ७ और ' समधातुः प्रशस्यते ' ऐसा वर्णन है । इससे यह मालूम होता है कि प्रकृतिस्थ दोप थोड़ा दुःख अवश्य देते हैं । इसलिये समध अधिक अच्छा होता है । प्रकृतिमिह नराणां भौतिक केचिदाहुः

पवनदहनतोयैः कीर्त्तितास्तास्तु तिस्रः ।

स्थिर - विपुलशरीरः पार्थिवश्च क्षमावान्-शुचिरथ चिरजीवी नाभसः खैर्महद्भिः ॥ ७६ ॥

अन्य आचार्य का मत - किसी आचार्य के मत में पुरुषों को प्रकृति पंचमहाभूतों से पाच प्रकार की होती है । उनमें से पवन ( वायु ), ढहन ( अग्निपित्त ) और तोय ( जल-कफ ) इनकी तीन प्रकृति बतायी है, पृथ्वी सम्बन्धी शरीर | स्थिर ( मजबूत ) और विपुल ( बडा ) एवं क्षमाशील होता है । नाभस ( आकाशीय ) शरीर पवित्र, दीर्घायु और बडे बडे छिद्रों से युक्त होता है ॥ ७ ९ ॥ विमर्श: -- किसी के मत से बातिक, पैत्तिक और कफज यह तीन प्रकार की प्रकृति है । दूसरों के मत से पांच । भूतों से पांच प्रकार की । तीसरे के मत से इकतीस प्रकार की प्रकृति होती है । वह ३१ प्रकार निम्न प्रकार की है— पांच भूतों से पांच प्रकार की प्रकृति - दो - दो भूतों से १० प्रकृति, तीन - तीन भूतों से १० प्रकृति, चार चार भूतों से ७ प्रकृति, पांच भूतों से १ प्रकृति । वैशेषिक सूत्र के मत से तीन दोषों से ' सात ' प्रकारकी और तीन सवादि गुणोंसे ' सात ' महाप्रकृतियां बनती हैं ।

शौचमास्तिक्यमभ्यासो वेदेषु गुरुपूजनम् ।

प्रियातिथित्वमिव्या च ब्रह्मकाचस्य लक्षणम् ॥ ८० ॥

माहात्म्यं शौर्यमाज्ञा च सततं शात्रवुद्धिता ।

भृत्यानां भरणं चापि माहेन्द्र कायलक्षणम् ॥ ८१ ॥

शीतसेवा सहिष्णुत्वं पैङ्गल्यं हरिकेशता ॥

प्रियवादित्वमित्येतद्वारुणं कायलक्षणम् ॥ ८२ ॥।

मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसञ्चयौ ।

महाप्रसवशक्तित्वं कौवेरं कायलक्षणम् ॥ ८३ ॥

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सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 390 का मूल पृष्ठ
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४० सुश्रुतसंहिता

गन्धमाल्यप्रियत्वं च नृत्य - नादि - कामिता ।

विहारशीलता चैव गान्धर्व कायलक्षणम् ॥ ८४ ॥

प्राप्तकारी हढोत्थानो निर्भयः स्मृतिमान्छुचिः ।

रागमोहमद्वेपैर्वर्जितो याम्यसत्त्ववान् ॥ ८५ ॥

जपव्रतब्रह्मचर्य - होमाध्ययनसेविनम् । ज्ञान - विज्ञान - सम्पन्नमृपिसत्त्वं नर विदुः सप्तैते सात्त्विकाः काया ' —— ' ••• • ॥ ८६ ॥

के लक्षण - ब्राह्मकाय के लक्षण -- पवित्रता, आस्तिकता ( वेद में विश्वास रखना ), बेठों का अभ्यास करना, गुरुपूजन, अतिथिसत्कार ( मेहमानदारी ) और इज्या ( यज्ञ करना ) ये ब्रह्मकाय के लक्षण है । माहेन्द्र काय के लक्षण: - बडप्पन, शूरता, शासन, शास्त्रों की निरन्तर आलोचना, भृत्यों ( नोकर - चाकरो ) का पोषण ये माहेन्द्र काय के लक्षण है । वारुण काय के लक्षण - शीत सेवन करना, सहन-शीलता, पैंङ्गल्य ( आंखों का पीत वर्ण होना ), हरिकेशता ( बार्लो की कपिलता ), मीठा बोलना ये वरुण - सम्बन्धी काय के लक्षण है । कौबेर काय के लक्षण - मध्यस्थता, सहिष्णुत्व ( सहन-श्रीलता ), अर्थस्यागमसञ्चयौ ( पैमा लाना और रखना ), महाप्रसवशक्तिन्त्रं ( प्रजोत्पादन करना ) कौबेर काय के लक्षण है । गन्धर्वकाय के लक्षण - चटन और माला में प्रीति, नाच और वाद्य में इच्छा, घूमने की इच्छा, गान्धर्व शरीर के लक्षण है । याम्य काय के लक्षण --- प्राप्तकारी ( प्रसङ्गपर जो काम पढे सो करने वाला ), दृढ काम करने वाला, निर्भय, स्मरण शक्ति वाला, पवित्र, राग, मोह, मद, मत्सर इससे रहित यस्य ( यससम्बन्धी ) शरीर के लक्षण जानना चाहिये | ऋषि काय के लक्षण - जप, व्रत, नाचर्य, होम, अध्य-यन ये सब करने वाला, ज्ञान - विज्ञान से युक्त पुरुष को ऋपिसव ममझना चाहिये ॥ ८०-८६ ॥ विमर्शः — ये नात साविक काय के लक्षण हैं । सात्विक काय ( शरीर ) या चित्त के लक्षण बताएँ है । इनमें सौम्य प्रकृति, देव, धर्म पर निष्ठा या भक्ति रहती है । ... • राजसांस्तु निबोध मे । ऐश्वर्यवन्त रौद्रं च शूर चण्डमसूयकम् । एकाशिनं चोदरिक ( औपधिक ' पा ० ' ) मासुरं सत्त्वमीदृशम् ॥ ८७ ॥

तीक्ष्णमायासिन भीरु चण्ड मायाऽन्वितं तथा ।

विहाराचारचपलं सर्पसत्त्वं विदुर्नरम् ॥ ८८ ॥

प्रवृद्धकामसेवी चाप्यजस्राहार एव च ।

अमर्पणोऽनवस्थायी शाकुन कायलक्षणम् ॥ ८६ ॥

एकान्तग्राहिता रौद्र ( रौक्ष्य ' पा ० ) मसूया धर्मबाह्यता ।

भृशमात्मस्तवश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् ॥ ६० ॥

उच्छिष्टाहारता तैक्ष्ण्यं साहसप्रियता तथा ।

स्त्रीलोलुपत्वं नैर्लज्ज्य पैशाचं कायलक्षणम् ॥ ६१ ॥

असंविभागमलसं दु'खशीलमसूयकम् ।

लोलुपं चाप्यदातार प्रेतसत्त्वं विदुर्नरम् ।

पडेते राजसाः काया - ॥ ६२ ॥

राजस ' काय ' के लक्षण - राजस काय छः होते हैं । उनके लक्षण : -आसुर काय के लक्षण: -- ऐश्वर्यवान् ( धन, धान्य-संपन्न ), रौद्र ( भयंकर भीतिप्रद ), ग्रर, चण्ड ( अति-क्रोधी ), असूयक ( दूसरों के गुणों में दोपारोप करने वाला ) अकेला ' साने वाला, औढरिक ( पेटू ) पाठभेद का अर्थ-औपधिक ( कपटी ) मनुष्य आसुर कायवाला होता है । सर्पसच्च के लक्षण - तीक्ष्ण, आयासी ( दुःख देने वाला ), भीरु ( डरपोक ), चण्ड ( कोधी ), मायान्वित ( छुट्युक्त ), बिहार में चाचल्य और आहार में भी शीघ्रता करने वाला मनुष्य सर्पसत्व वाला होता है । शाकुन काय के लक्षण - अत्यन्त कामासक्त, निरन्तर | खाने वाला, अमर्पण ( सहन न करने वाला ), अनवस्थायी ( चञ्चल चित्त वाला ) पत्तिसम्बन्धी शरीर के लक्षण है । राक्षस काय के लक्षण - एक ओर ( चुप्पे से ) खाने वाला, भीषण, असूया ( गुणों में दोपाक्षेप ), धर्मबाह्यता ( अधर्माचरण ), खूब अपनी स्तुति करना राक्षस काय के लक्षण है । पैशाच काय के लक्षण -- असविभाग ( दूसरों को न देखकर खाना ), आलसी, दुःखी, असूयक ( दूसरों की निन्दा करने वाला ), लोलुप ( लोभी ), भढाता ( दान न करने वाला ), इन लक्षणों से युक्त पुरुष प्रेतसव होता है ॥ ८७ - ९ २ ॥ विमर्श: -- इस प्रकार छ राजस काय ( शरीर ) के लक्षण बताये है । तामसांस्तु निबोध मे ।

दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्ने मैथुननित्यता ।

निराकरिष्णुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः ॥ ६३ ॥

अनवस्थितता मौर्य भीरुत्वं सलिलार्थिता ।

परस्पराभिमर्दश्च मत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम् ॥ ६४ ॥

एकस्थानर तिर्नित्यमाहारे केवले रत. ।

वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकामार्थवर्जितः ॥ ६५ ॥

इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा ॥

कायानां प्रकृतोर्ज्ञात्वा त्वनुरूपां क्रियां चरेत् ॥ ६६ ॥

तामस काय के लक्षण - ( धन्वन्तरि ) तामस काय के लक्षण सुनाते हैं । पशुकाय लक्षण - प्रज्ञान का दूषित होना, मन्दता ( कार्य में शैथिल्य ), स्वप्न में नित्य मैथुन देखना, निराक-रण करने की इच्छा ये पाशव ( पशुसम्बन्धी ) गुण है । मत्स्यसर के लक्षण - चित्त स्थिर न रहना, मूर्खता, डरपोक रहना, जल की इच्छा करना, एक दूसरे के साथ झगडना ये मत्स्यसत्त्व के लक्षण हैं ।