श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 391–400

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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प्रायः / -1 ] शारीरस्थानम?? वानस्पत्य सुख के लक्षण एक ही जगह पर रहने की इन्छा करना, केवल बाहार में नामानि धर्म और इसे रहित होना ये वानस्पत्य सत्त्व ल है । इस प्रकार तीन प्रकार के नाम गुरु वाले काय बनाते हैं ॥ १६-२६ ॥ त्रिनर्गः – नाम्य गुण वाले तीन काय बनायें है । सव किर ( साविक राज्य और ताल ३ ) १६ काय के प्रकार हैं ।

सहाप्रकृतयस्वेता रजःसन्यनमःङ्कृताः ।

योगः सम्यग्भिवकू नाथ विभावयेत् ॥ ६ ॥

इनि सुश्रुतसंहितागं शारीरस्थानं गर्भव्याकरण-शारीरं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ १ ॥

B उत्तर - मत्व, रज और तम

प्रकृतियां बनाई गई है ।

तरह लेना चाहिये ॥ ९ ७ ॥

विचिकित्सा के लिये इन होती है । इसलिये इनके उपर यान इति शारीरस्थान गर्नव्याकारी से की हुई ये महा वैयों को इनकी अन्टी कार्यों की आवश्यकता देना चाहिये । नाम चतुर्थी । गारी घटना -( १ ) ममैथुनवीर पुरस्कृत्य त्वग्वर्गनं कार्यम् । ( ६ ) कविभिः क्या नानि यानानि च वयन्तु । ( 2 ) Grenetan: gaPII ( < ) merafci zone: ag cara qing शारीरक्रियाविज्ञान प्रश्नाः--( १ ) कविः के च है? ( २ ) विविंग निद्राः?: के? करी के? ( ३ ) सेवक -गानि कानि? ( ४ ) विविधाःमः कानि कानि? पञ्चमोऽध्यायः अयानःशरीरसंख्याव्याकरणशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

ययोवाच भगवान बन्वन्नरिः ॥ २ ॥

गर्भव्याक्तता शरीर कहने के अनन्तर शरीरसङ्ख्यान्या-करण नामक शरीर कहेंगे ।

जैसा भगवान धरि ने कहा है ॥ १-२ ॥

विमर्श ' – गर्भ - व्याकरण में गर्ल की वृद्धि ( Develop rect of the foetr: ) अथवा गर्न विज्ञान ( Embryology ) कह चुके । के त्योंकी उत्पत्ति होने के पश्चा उसे शरीर सज्ञा प्राप्त होती है । अब शरीर के अवयवों की । संख्या करना आवश्यक है । इस लिये ऐसा गारीर कहेंगे शरीर के अवयवों की संख्या का विवरण है । शुक्रशोणितं गर्भाशयस्यमात्मप्रकृतिविकारसंमू चितं ' गर्भ ' इत्युच्यते । तं चेननावस्थितं वायुर्वि । ६ सु ० शा ० भजति, तेज एनं पचति, आपः क्लेदयन्ति पृथिवी | मंहन्ति, आकाशं विवर्धयति, एवं विवर्धितः स यदा हस्त - पाद- जिल्हा -: त्राण - कर्ण - नितन्त्रादिभिरङ्गैरुपेत-स्दा ' शरीर ' इति मंत्रां लमते । तच पडनं - शास्त्रा श्रनन्तो मध्यं पञ्चमं पर्ट शिर इति ॥ ३ ॥

शरीर - मंद्राः – गर्भाशय में रहने वाले शुक्रवार और श्रीगिन टिग्वजय आमा, प्रधानादि अष्ट प्रकृति और सोलह विकारों से मिलने हैं तो ' गर्भ ' कहा जाता है | चेतनायुक्त | उम गर्न को वायु विभन्छ करना है, तेज उसको पता है, जल को गीला करना है, पृथ्वी उसको संगठित करती है, उसने बढ़ाता है । इसी प्रकार बढा हुआ गर्भ जब हाथ, पैर, जिल्हा, नामित, कर्ण ( कान ), नितम्व ( न ) इत्यादि अट्टों से युक्त होना है तो ' शरीर ' मंज्ञा को प्राप्त होता है । वह अट्टींबाला जैसे गायें चार | ( दो हाथ, दो पांव ), ( घड ) पांचवां और छठां गिर ' ' कहलाता है ॥ ३ ॥

विमर्शः - इस गद्य में योगियों की दृष्टि से पत्रीम तत्वा-के राशि पुरुष बनाया गया है । वैद्यों की दृष्टिसे उसके अह है । आमारी में चेतना उत्पन्न करके उसे सहने से बचाती है । वायु उसको दोष, धातु, मल, अङ्ग, यों में भी है । तेज उस गर्म का पाचन करता हुआ रूपान्तर करता है । जब उसको गीला करना है । पृथिवी उसको पुनः गाया करती है । वायु और अग्नि में बनाए हुये सों को आकाश फुलाना है जिससे नीचे, ( ऊपर, निरा यथासम्भव बढना हुआ शरीर बन जाता है ॥ ३ ॥

अतः परं प्रत्यङ्गानि वच्यन्ते । मस्तको दर-पृष्ट्र - नाभि- तलाट - नासा - चिबुक - बस्ति प्रीथा इत्येता एकैकशः, कर्ण - नेत्र- शङ्खां - स - गण्ड - क्रश्न - स्तन-वक्षण वृषण - नार्थ- स्फिग- जानु - कूर्पर - त्राहृ - रु - प्र-तो हे हे, विंशतिरनुनयः, स्रोतांसि वच्यमा-णानि । एप - प्रत्यगविभाग उक्तः ॥ ४ ॥

प्रत्यह - विभाग- इसके पश्चात् प्रयह कहे जाते है-मम्नक ( माया ), उदर ( पेट ), पृष्ट ( पीठ ), नाभि ( ढोडी ) ललाट ( भाल प्रदेश ), नामा ( नाक ), चिबुक ( ढुड्डी ), बस्ति ( सूत्रागय ), श्रीचा ( गर्दन ) ये प्रत्येकाः एक २ हैं । कान, आंत्र, मह, मंत्र, अम ( कन्वे ), गण्ड | ( कनपटी ), कक्ष ( कांय ), स्तन, वृपग ( अण्ड ), पार्व ( बगल ), सिह ( चूतड ), जानु ( घुटने ), कूर्पर ( हनी ), बाहु ( हम्न ), ( जांब ) आदि दो २, बीस अगुलियां

और स्त्रीन इनका वर्णन आगे होगा । यह प्रत्यहीं का वर्गी-करण किया गया है ॥ ४ ॥

विमर्श - ' बाहूरप्रभृतय. ' इसमें मृति शब्द से ओष्ट, मुक्कणी और कुकुन्दरों का ग्रहण होता है । तस्य पुनः सुख्यानं त्वचः कला धातवो मला दोषा लहान फुफ्फुस उण्डुको हृदयमाशया अन्त्राणि वृक्को स्रोतांसि कण्डरा - जालानि कूर्चा रज्जवः सेवन्यः सङ्घाताः सीमन्ता अस्थीनि सन्धयः

पृष्ठ 392

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४२ सुश्रुतसंहिता स्नायवः पेश्यो मर्माणि सिरा धमन्यो योगवहानि ( योगवाहीनि ' पा ० ' ) स्रोतांसि च ॥ ५ ॥

मी अप्रत्यक्ष का वर्णन. --- उन अङ्ग - प्रत्यङ्गों की पुनः गिनती करते हैं । यथाः खचायें, कलायें, धातु, मल, दोप, यकृत् ( जिगर ), प्लीहा ( तिल्ली ), फुप्फुस, उण्डुक, हृदय, आशय, अंतडियां, दो वृक्क, स्रोत, कण्डरा, जाल, कूर्च, रज्जु, सीवनी, संघात, सीमन्त, अस्थियां, सन्धियां, स्नायुयें, मासपेशियां, मर्म, शिरायें, धमनियाँ और योगवह स्रोत ॥ ५ ॥

विमर्शः – प्राण, उदक, अन्न आदि वहन करने वाले योगवह स्रोत है । त्वचः सप्त, कलाः सप्त, आशयाः सप्त, धातवः सप्त, सप्त सिराशतानि, पश्च पेशीशतानि, नव स्नायुशतानि त्रीण्यस्थिशतानि, द्वे दशोत्तरे संधिशते, सप्तोत्तरं मर्मशतं चतुर्विंशतिर्धमन्य ', त्रयो दोषाः, यो मलाः, नव स्रोतांसि षोडश कण्डरा, पोडश जालानि, षट् कूर्चाः, चतस्रो रज्जवः, सप्त सेवन्यः, चतुर्दश सघाताः, चतुर्दश सीमन्ताः, द्वाविंशतिर्योग-वहानि स्रोतांसि द्विकान्यत्राणि चेति समासः ॥ ६ ॥

अन्तस्थ अङ्ग - प्रत्यङ्गों की संख्या - सात त्वचायें, सात कलायें, सात आशय, सात धातुयें, सात सौ शिरायें, पांच सौ पेशियां, नौ सौ स्नायुयें, तीन सौ हड्डियां, दो सौ दस सन्धियाँ, एक सौ सात मर्म, चौवीस धमनियां, तीन दोप, तीन मल, नौ स्रोत, सोलह कण्डरायें, सोलह जालक, छः कूर्च, चार रज्जुयें, सात सेवनियां, चौदह संघात, चौदह सीमन्त, बाईस योगवह स्रोत और दो भांतें । इस प्रकार संक्षेप में परिगणन है ॥ ६ ॥

विमर्श - वचा ( skins ), कला ( membranes ), आशय, धातु ( Tissues ), स्नायु, मांसपेशी ( ligaments or muscles ), अस्थि ( bones ), सन्धि ( joints ), मर्स ( Vital Weak Spots ), धमनी ( Arteries ), दोप, मल ( exoretions ) और स्रोत ( tracts ) eto I विस्तारोऽत ऊर्ध्वम् — त्वचोऽभिहिताः धातवो मला दोपा यत्कृप्लीहानौ फुफ्फुस उडुको कला हृदयं वृक्कौ च ॥ ७ ॥

और भी परिगणन - अब इनका विस्तार से वर्णन किया जाता है— त्वचाओं का वर्णन हो चुका है । कला, धातु, मल, दोष, यकृत, प्लीहा, फेफडा, उण्डक, हृदय और गुर्दों का भी वर्णन हो चुका है ॥ ७ ॥

विमर्श: - सुश्रुत शारीरस्थान - चतुर्थ अध्याय ( गर्भ व्याकरण में ) इनका वर्णन हो चुका है । आशयास्तु - वाताशयः, पित्ताशयः, श्लेष्माशयो, रक्ताशय, आमाशयः, पक्काशयो, मूत्राशयः स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टम इति ॥ ८ ॥

आशयों का वर्णन - वाताशय, पित्ताशय, श्लेप्माशय, रक्ताशय, आमाशय, पक्काशय, मूत्रादाय ये सात आशय पुरुषों और स्त्रियों में समान होते हैं किन्तु स्त्रियों में एक आशय अधिक होता है जिसका नाम गर्भाशय है ॥ ८ ॥

विमर्शः -- चतुर्थ अध्यायके १ ९ वें श्लोक में आशय की निरुक्ति दी गई है । आशय शब्द का अर्थ केवल अधिष्ठान मात्र है । दोप, दूप्य और मल यथासम्भव आशयों में निवास करते हैं । आशयों की स्थिति वाग्भट में निम्न प्रकार की बतायी गई है । यथा ' रक्तस्याधः क्रमात् परे । कफाम-पित्तपक्वानां वायोर्मूत्रस्य च क्रमात् । गर्भाशयोऽष्टमः स्त्रीणां पित्तपकाशयान्तरा ' वा ० शा ० अ ० ३ ॥ प्रथम रक्ताशय है, पश्चात् क्रमतः कफाशय, आमाशय ( Stamach ), पित्ताशय ( Gall bladder ), पक्वाशय ( Ducdenum and Intestine ) वाताशय, उण्डक ( ceacun ) मूत्राशय, | ( Bladder ) और आठवां गर्भाशय ( uterus ) केवल स्त्रियों में ही रहता है ॥ ८ ॥

सार्धत्रिज्या मान्यन्त्राणि महीनानि ॥ ६ ॥

अन्त्रों की दीर्घता - पुरुषों की लम्बी होती है । स्त्रियों की पुरुषों कम अर्थात् तीन व्याम होती है ॥ विमर्श - व्याम का प्रमाण जाता है । एक हाथ के बीच की पुसां, स्त्रीणामर्धव्या-अंतटों साढ़े तीन व्याम की अपेक्षा आधा व्याम ९ ॥ दोनों हाथ फैलाकर लिया अडली के अन्त से आरम्भ करते हुए दूसरे हाथ की अडली के अन्त तक की लम्बाई ' न्याम ' होती है । आधुनिक मत से वह अन्तर पुरुषों में लध्वन्त्र का २२ फूट छ इट और स्त्रियों में २३ फुट ६ इश्च का होता है तथा बृहदन्त्र ( Large intestine ) ५ फूट होता है । श्रवण - नयन- वदन- प्राण- गुद- मेढाणि नव स्रोतांसि नराणां बहिर्मुखानि, एतान्येव स्त्रीणाम पराणि च त्रीणि द्वे स्तनयोरधस्ताद्रतवहं च ॥ १० ॥

स्रोतों का वर्णन. - दो कान, दो आंख, एक मुख, दो नासिका छिद्र, गुद और एक मेढ ( लिंग या स्त्रियों में मूत्र-वह स्रोत ) ये कुल ' नौ ' बहिर्मुख स्रोत स्त्री और पुरुषों में होते हैं । परन्तु स्त्रियों में तीन अधिक स्रोत होते हैं, दो स्तनों में और एक रजोवह स्रोत ॥ १० ॥

विमर्श: - इस जगह वहिर्मुख स्रोत बताये हैं । अन्त-र्मुख स्रोतों का वर्णन धमनीव्याकरण नामक ( नवम ) अध्याय में करेंगे । आर्त्तवह स्रोत यह स्मतिपत्र के नीचे रहता है । स्मरातपत्र यह भग के ऊपरी भाग मे रहता है ।

कहा भी है-विपुलपिप्पलपत्रसमाकृतेरवयवस्य शिरस्तलमाश्रितम् ।

सकलकामसिरामुखचुम्बितं निगदितं मदनातपवारणम् ' ॥

पोडश कण्डरा: - तासां चतस्रः पादयोः, तावत्यो हस्त- प्रीवा - पृष्ठेपु, तत्र हस्तपादगतानां कण्डराणां नखा अग्रप्ररोहाः, ग्रीवा - हृदयनिबन्धिनीनामधोभाग-गतानां मेढू, श्रोणि - पृष्ठ- निबन्धिनीनामधोभाग-गतानां बिम्बम् ( नितम्बं ' पा ' ), ऊरुवक्षों सपिण्डादि-गतानां च मूर्धा ॥ ११ ॥

पृष्ठ 393

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श्रध्यायः ५ ] शारीरस्थानम् II कटराओं का वर्णनः– कण्डराएं मोलह हैं । उनमें से चार दोनों पैरों में, चार हाथों में, उतनी ही गर्दन में और उसी प्रकार पीठ में भी चार रहती हैं । हाथ और पैरों में रहने वाली कण्डराओं के अग्र प्ररोह ( अङ्कुर ) स्वरूप ' नन ' हैं । गर्डन, हृदय इनके साथ लगी हुई और नीचे जाने वाली ( कण्डराओं का ) अग्र प्ररोह मेटू ( शिश्न ) है । नितम्य और पृष्ठ के साथ लगी हुई और नीचे जाने वाली कण्डराऔं का अग्रप्ररोह विम्ब है । उर से आरम्भ करते हुए वक्षःस्थल, अंस - पिण्डक इत्यादियों का अग्रग्ररोह सूर्वा ( गिर ) है ॥ ३६ ॥

विमर्श: रा ( Tendons ) कुल मिलकर सोल्ह हैं । वे चार भागों में विभक्त हैं । उनके अड्डर स्वरूप नत्र, मेनू ( लिंग- Penis ), चित्र ( नितम्ब Glateal region ) और मूत्र ( गिर Head ) हैं । मांस- सिरा - स्नाय्व - स्थि- जालानि प्रत्येकं चत्वा रि, तानि मणिबन्ध - गुल्फ- संश्रितानि परस्पर- निब-द्वानि परस्परसंश्लिष्टानि परस्परगवाक्षितानि चेति येर्गवाक्षितमिदं शरीरम् ॥। १२ ॥ जाली का वर्णन — मांस, गिरा, स्नायु और अस्थि, इनमें से प्रत्येक के चार जाल होते हैं । वे मगिबन्ध ( क्लाई ) और गुल्क में आश्रित हैं । वे एक दूसरों से बंबे हुए हैं,

एक में सटे हैं, तथा परसर गवाचित ( छिद्रित ) हैं ।

इन नालों द्वारा यह शरीर गवाचित हुआ है ॥ १२ ॥

त्रिमर्गः – इन नालों के ( Networks ) द्वारा शरीर गवाचित ( Spongy ) बनता है । जैसे नाले के सूत्र एक दूसरे से मिलते - जुलते हुए ' लाला ' बनाने हैं उसी प्रकार शारीरिक मांस, शिरा, अस्थि और सन्धियों के लिये ये जाल बनाये हैं । वे जालसूत्र मणिबन्ध ( Wrist ) और गुल्फ पर आश्रय करते हुये स्थित हैं । पद् कूर्चा: - ते हस्त - पाद- प्रीवा - मेढू पु; हस्त योद्वों, पाइयो, ग्रीवामेढ्योरकैकः ॥। १३ ॥ कू का वर्णन - - कूर्च छ ' होते हैं । दो हाथों में, दो पैरों

में, एक ग्रीवा में और एक मैटू ( मूत्रन्द्रिय ) में, इस प्रकार ।

कुल छः कूर्च होते है ॥ ६३ ॥

विमर्शः कूर्च खुरचनी के सहा होते है । वे नाटकों से निकलने वाले अङ्कुरों से बनते हैं । महत्यो मांसरज्जवञ्चतन्त्रः- पृष्ठवंशमुभयतः पेशी निबन्धनाय द्वे बाह्ये, आभ्यन्तरे च द्वे ॥ १४ ॥

मांसरवनुओं का वर्णन - चार बढी बड़ी मांसर हैं । पृष्ठवंश के दोनों ओर पेशियों के बांघने के लिये होती हैं । दो मरज्जु बाहर होती हैं और दो भीतर की और होती हैं ॥ ६१ ॥

विमर्श - ' गयी के मत में आठ मांमरज्जुये हैं । वे पृष्टवंग के दोनों ओर चार चार रहती हैं । सप्त वन्यः शिरसि विभक्ताः पञ्च, जिहाशेफ सोरकैका, ताः परिहर्त्तव्याः शत्रेण ॥ १५ ॥

मीवनियाँ - मीत्रन सात हैं । मस्तक पर पांच, जिह्नातल में एक और मेनू ( सृत्रेन्द्रिय ) के नीचे एक । इस प्रकार • सब मिलकर मान सीवन हैं । शर्म करने के समय उनको बचाना चाहिये ॥ १५ ॥

विमर्श - मीवन ( Satares ) हैं । वे मस्तक की हड्डियों पुर स्पष्टतया कंधी के दांतों के परस्पर फंसाने के समान । बटाये हुए दीखते हैं । उसी प्रकार जिह्वा और मुत्रेन्द्रिय के नीचे भागों में मीवन के तुल्य सीवनियां दृष्टिगोचर होती हैं । ये अत्र से करने पर शीघ्र नहीं जुड़ती ॥ चतुर्दशास्नां संघाताः तेषां त्रयो गुल्फजानु-वक्षणेषु, एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातो, त्रिक-शिरसोरेकैकः ॥ १६ ॥

सवात - हडियों के संधान ( दृढ जोड ) चौदह होते है । उनमें से गुल्फ, जानु ( घुटना ) और वक्षण प्रदेश में एक २ मिलकर तीन होने हैं । इसी प्रकार दूसरे पर और दोनों हाथों में समझना चाहिये | far और मिर की हड्डियों में एक २ संघात है । इस प्रकार चौदह संघात है । त्रिमर्गः -- संघातः - ( Jount ) हैं । उपरि निर्दिष्ट स्थानों में प्रायः वे बहुत ह अवस्थाओं में मिलते हैं । ये संधान ( Joints ) दो दो या तीन - तीन हड्डियों से बनते है । वे Antle, knee ( बुटना ) और कटि प्रदेश में विशेषत. रहते हैं । और Pelvis ( त्रिक ) तथा गिर ( Shall ) में एक रहते हैं । चतुर्दशेत्र सीमन्ताः, ते चास्थिसंघातवगणनीयाः, यतस्तैर्युक्ता अस्थिसंघाताः, ये संघातस् । खल्वष्टादशैकेषाम् ॥ १७ ॥

सॉमन - सीमन्त भी ११ ही है । अस्थिसंघात के समान सीमन्तों की गणना करना चाहिये, उन्हीं से अस्थिमघात

। युक्त होते हैं । किमी मत से १८ सीमन्त हैं ॥ १७ ॥

विमर्श - वृद्ध वाग्भट के मत में गिरःकपाल में पाँच सीमन्त होते हैं । इसलिए उनके मन से अठारह सीमन्त होते हैं । दूसरों के मन से एक श्रोणिकाण्ड के ऊपर, एक वक्ष के ऊपर, एक उदर और डर के सन्धान में, एक अंद के ऊपर, इन सर्वो को मिला र बाग्छ होते है । भोज ने सीमन्तो की व्याख्या ' संघाना मीत्रिता यस्तु सीमन्तांस्तान् प्रम ' हम प्रकार की है । त्रीणि सपष्टीन्यस्थिशतानि वेदवादिनो भापन्ते, शल्यतन्त्रे तु त्रीण्येव शतानि । तेषां सत्रिंशमस्थिशतं शाखासु सप्तदशोत्तरं शतं श्रोणिपार्श्वपृष्टोर, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्व त्रिषष्टिः एवमनां त्रीणि शतानि पूर्यन्ते ॥ अस्थियों की मरया - वेदवादी ( अग्निवेश आदि ) हड्डियों की संख्या ३६० मानते है । परन्तु भरतन्त्र तीन मौ हड्डियां मानते है । उनमें से एक सौ बीस हड्डियां शाखाओं में रहती है । एक सौ सतरह श्रीगि, पार्श्व - ( बगल ), पृष्ठ ( पीठ ), डर ( छाती ) इनके ऊपर रहती हैं । ग्रीवा ( रन ) के उपर निरमर हडियां होती हैं । इस प्रकार १२० + ११ + ६३ = ६०० सब मिटाकर कुल तीन सौ हड्डियां होती हैं ॥ १८ ॥

विमर्श - चरक के मतानुसार ३६० हटिया । मुश्रुत " ३०० आधुनिक मनानुसार

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सुश्रुतसंहिता ४४ होने के कारण: - ग्यारहवीं और बारहवीं अस्थियों का उरःफलक के साथ प्राचीनों के मत मे ज्यादा हर्द्वियां कोई सम्बन्ध न होने से उनकी तरुणास्थियां ( Cartilages ) ( १ ) किसी जगह प्रतिसंस्कर्ता की भूल | से नहीं मिलती शेप पर्शुकाओं की तरुणास्थियां २ ) तरुणास्थि और दातों की परिगणना करना । उरःफलक हैं । ( ३ ) वाल्यावस्था में हड्डी न मिलने से भिन्न प्रतीत उरःफलक से मिलती Facets ) होना । सुश्रुत के मत में पर्शुका ( Ribs स्थालक ( ( ४ ) स्थालक, अर्बुद और उदूखल इनको भिन्न सम और स्थालकाबु ' द ( Tubercule ) इस प्रकार एक एक पार्श्व झना । आधुनिक मत मैं दांत और तरुणास्थि को छोड में १२४३ = ३६ हड्डियां होती है, अतः दोनों पार्श्व में देते है । ७२ हड्डियां होती है । एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां त्रीणि त्रीणि तानि पञ्च- हाराचन्द्र के मत से पृष्ठ में ३४ हड्डियां होती हैं । दश, तलकूर्चगुल्फसंश्रितानि दश, पार्यामेकं सुश्रुत के मत से ३० और आधुनिक मत से ३४ कशेरुकायें जङ्घायां द्वे, जानुन्येकम्, एकमूराविति त्रिंशदेवमे । ( Vertebra ) होते है । कस्मिन् सक्थिन भवन्ति, एतेनेतरसक्थिबाहू च सुश्रुत भत सेउरःस्थल में ८ हड्डिया है । ( उनमे से व्याख्यातौ ॥ १६ ॥ छः ठरः फलक में और दो अक्षक ) । हाराणचन्द्र मत से

शाखागत अस्थियों का परिगणन - पैर की प्रत्येक अङ्गुलि में उरःस्थल में तीन और दो अक्षकसंज्ञक तथा कण्ठनाडी तीन तीन हड्डियां है । इस प्रकार पन्द्रह हड्डियां होती है । Trachae में २१ हड्डियां होती हैं । तल, कूर्च, गुल्फ देश की दस अस्थिया हैं । एक पाणि देश मैं, दो जंघा में, एक जानु ( घुटना ) मे, एक ऊरु प्रदेश मे । इस प्रकार एक टाग में तीस अस्थियां होती हैं । इसी प्रकार दूसरी टाग और बाहुओं ( भुजाओं ) की अस्थिया समझनी चाहिये । विमर्शः — प्रत्यक्ष देखने से और हाराणचन्द्र के मता-नुसार उपर्युक्त पाठ में थोडा - सा फरक दीखता है । पांव की अड्डलियों और अनुष्ठों में मिलाकर चौदह हड्डियां होती हैं । तल, कूर्च और गुल्फ में ग्यारह हड्डिया होती है, ( तल प्रदेश में पाच, कूर्च मे ३ और गुल्फ प्रदेश में ३ ) । अन्य शेप हड्डियों के बारे में दोनों के मतों में समानता है । जानु मे जान्वस्थि के समान वाहु में कूर्परास्थि नहीं होती है तो भी वाहु के कूर्च देश में एक अस्थि अधिक होती है, इस प्रकार हाथों की और पैरों की हड्डिया समान होती है । श्रोण्यां पञ्च, तेपा गुदभगनितम्बेषु चत्वारि, त्रिकसंश्रितमेक पार्श्वे पत्रिंशदेकस्मिन्, द्वितीये-sc येव, पृष्ठे त्रिशत्, अप्रावुरसि, द्वे असफल | ( ' द्वे अक्षकसंज्ञे ' इति पा ० ) ॥ २० ॥

श्रोणि, पाश्र्व, वक्ष स्थल और स्कन्ध प्रदेश की अस्थियाँ-श्रोणि प्रदेश मे पाच हड्डियां रहती है । चार तो गुदा, भग ( योनि ), और दोनों नितम्बों की अस्थियों को मिलाकर होती है, पाचवी त्रिक प्रदेश में आश्रित रहती है । पार्श्व छत्तीस हड्डिया एक तरफ होती हैं, दूसरे पार्श्व मे भी इसी प्रकार समझना चाहिये । तीस हड्डिया पृष्ठ में, आठ उर ( छाती ) में, दो असफलकास्थि होती है । ( यहां अक्षक-संज्ञे - अक्षक नाम की दो हड्डियां ऐसा भी पाठ है ) ॥ २० ॥

विमर्श. -- हाराणचन्द्र के मत में श्रोणि में पाच ( सुश्रुत के समान ), पार्श्व में ४८ इन्हें पर्शुकास्थि ( Ribs ) कहते है । इनमें एक तरफ १२ तरुणास्थिया ( Cartilages ) और उतनी ही अस्थिया होती है । इस प्रकार दोनों ओर मिलकर ४८ हड्डियां होती है । कभी कभी १३ वीं पर्शुका ( Rib ) भी मिलती है । ग्रीवायां नव, कण्ठनाड्यां चत्वारि, द्वे हन्वोः, दन्ता द्वात्रिंशत्, नासायां त्रीणि, एकं तालुनि, गण्ड-कर्णशङ्खेष्वेकैकं, षट् शिरसीति २१ । गर्दन और उसके ऊपर की हड्डिया - ग्रीवा ( गर्दन ) में नौ, कण्ठनाडी में चार हनु, देश में दो, बत्तीस दांत, नाक में तीन तालु में एक, गण्ड, कर्ण और शंख इनमें एक एक, और शिर में छः होती हैं ॥ २१ ॥

विमर्श:: - - सब मिला कर ' तिरसट ' अस्थियां गर्दन में होती हैं । अस्थिसंख्या को क ऊर्ध्व ( शिर और ग्रीवा चरक सुश्रुत ग्रीवाकी अस्थियां १५ 39 ९ जत्रु १ कण्ठनाडी ४ १ " २ हनुमूलबन्धने २ | शिर. कपाल ४ " 3 ६ तावस्थिया २ 29 शंखास्थियां २ " " २ नासास्थि ] " " ३ गण्डकूट " २ ललाट कर्णास्थियां ३२ 29 २ दन्तोदूखल ३२ " " ३२ | जनुकादि अन्तः -अस्थियां ९ २ ६३ ) की अस्थियों आधुनिक Cervical Vertebra 7 mandible 1 Forntal 1 Parietal 2 Occipital 1 Palatines 2 Temporal 2 Nasal 2 Malar 2 Auditory Ossicles 6 sphenoidal & Ot her. Bones 10 36

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अध्याय ५ ] शारीरस्थानम् ४५ चरक श्रोणिफलक २ भगास्थि १ त्रिक अनुत्रिक पृष्ठास्थियां ४५ पर्शुकास्थियां २४ पशुका २४ पर्शुक स्थालक २४ उर की अस्थियां १४ अक्षकास्थियां २ अंस I असफलक २ १४० घड़ की अस्थियाँ सुश्रुत आधुनिक | श्रोणी ४ Innominate Bone 2 | 33 १ Sacrum 1 | Coccyx 1 | 33 ३० Thorrcic & La -17 २४ mber Vertebra 23 39 २४ Ribs 24 " २४ " ६ Sternum 1 39 २ Clavical 2 " 3 २ Scapula 2 ११७ 50 शाखा की अस्थियाँ चरक नख २० पादाङ्गुलियां ३० पादशलाकाऍ १० 23 अधिष्ठान २ " गुल्फ ४ " पाणि I हस्त अङ्गुलियां ३० ,, शलाकाएँ १० अधिष्ठान २ | " मणिक २ अन्तर्जास्थि २ बहिर्जास्थि २ जानुकपालिका २ जानु २ ऊरु या नलक २ अन्त. प्रकोष्ठास्थि २ यहि प्रकोष्ठास्थि २ कूर्परास्थि बाहुनलक २ १२८ शिर और ग्रीवा ९ २ धडकी अस्थियां १४० शाखाकी १२८ ' ३६० सुश्रुत आधुनिक ३० Phalanges 28 39 Meta Tarsals 10 तल १० कू }: 30 Tarsus 12 | गुल्फ 33 २ Os calcis, Qs 2 33 ३० Phalanges 28 | तल १० Meta carpus 10 कूर्च १२ Carpus 16 मणिक " २ Tibia 2 33 २ Fibula 2 " २ Patelia 2 २ Femur 2 " Ulna 2 2 | 33 २ Radius 2 19 २ 23 २ " २ Hamuras 2 १२० 120 कुलयोग ६३ 36 ११७ 50 १२० 120 ३०० 206 ऊपर दिये गये कोष्ठक से मत - मतान्तरों की कल्पना की जा सकती है ॥ २१ ॥

एतानि पञ्चविधानि भवन्ति तद्यथा - कपाल-रुचक- तरुण - वलय- नलकसज्ञानि । तेषां जानु-नितम्बां - स - गण्ड तालु - शङ्ख - शिरःसु कपालानि, दश-नास्तु रुचकानि, घ्राणकर्णग्रीवाक्षिकोपेषु ( घ्राण - कण्ठ-कर्णा - क्षिकूटेषु ' पा ० ' ) तरुणानि, पार्श्वपृष्ठोरःसु वल-यानि, शेषाणि नलकसंज्ञानि ॥ २२ ॥

अस्थियों के प्रकार- इन अस्थियों के पांच प्रकार होते हैं । यथा- कपाल, रुचक, तरुण, वलय, नलक | उनमें से कपाल-संज्ञक अस्थियां जानु ( घुटना ), नितम्ब, अंस, गण्ड, तालु, शङ्ख और शिर इनमे होती है । रुचकसंज्ञक अस्थियों में दांतों की गणना की जाती है । घ्राण, कान, ग्रीवा और अक्षिकोपों की ( पाठान्तर मे नाक- कण्ठ - कान- अक्षिकूटों की ) भरियां तरुणास्थि कही जाती है । पार्श्व, पृष्ठ और उर इनकी अस्थियां वलयसंज्ञक है । शेष अस्थियां नलकसंज्ञक होती है ॥ २२ ॥

विमर्श: - कपाल नामक अस्थियां कटोरी के समान रहती है । रुचक ( Dental ), तरुण ( cartilage ), वलय ( Round bones ), नलक ( Long bones ), आकार में यथानाम होती है । भवति चात्र-अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनां ध्रुवम् ॥ २३ ॥

तस्माच्चिरविनष्टेषु त्वङ्मांसेपु शरीरिणाम् ।

अस्थीनि न विनश्यन्ति साराण्येतानि देहिनाम् ॥ २४ ॥

मांसान्यत्र निबद्धानि सिराभिः स्नायुभिस्तथा ।

अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतन्ति वा ॥ २५ ॥

शरीर - धारण में अस्थियों की प्रधानता - जैसे वृत्त अन्तःस्थ सारों पर निर्भर होते हैं उसी प्रकार प्राणियों का शरीर अस्थिरूपी सारों से धारण किया जाता है । अतः त्वचा और मांस नष्ट होने पर भी देह की सारभूत अस्थियां नही नष्ट होती है । शिराओं तथा स्नायुओं से बंधे हुये मांसपिण्ड अस्थिओं का आश्रय करने से नहीं गिरते और ढीले भी नहीं होते ॥ २३-२५ ॥ विमर्श. - जैसे लोहों के छड पर सीमेन्ट लगाकर खम्भे बनाये जाते है । उसी प्रकार अस्थियां ( Bones ) छुड़ स्वरूप है । सन्धयस्तु द्विविधाश्चेष्टावन्तः स्थिराश्च ।

शाखासु हन्वोः कटयां च चेष्टावन्तस्तु सन्धयः ।

शेषास्तु सन्धयः सर्वे विज्ञेया हि स्थिरा बुधैः ॥ २६ ॥

सन्धियां - सन्धियां दो प्रकार की होती है— प्रथम चेष्टायुक्त और दूसरी स्थिर । शाखाओं में, हनुप्रदेश में और कमर में चेष्टायुक्त सन्धियां रहती है । शेष स्थिर सन्धिया समझनी चाहिये ॥ २६ ॥

विमर्शः -- चेष्टायुक्त सन्धिया ( Morable or Diarthroses ) दो प्रकार की होती है । बहुचेष्टायुक्त और अल्पचेष्टा-

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४६ सुश्रुतसंहिता युक्त । शासाओं में तथा अधोहनु में बहुचेष्टायुक्त सन्धियां होती हैं और पृष्ठवंश ( vertabral colum ) मे अल्पचेष्टा वाली ( Amphiarthroses ) होती है । सख्यातस्तु दशोत्तरे द्वे शते; तेषा शाखास्वष्ट-षष्टि ', एकोनषष्टिः कोष्ठे ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं त्र्यशीतिः ॥२७ ॥

सन्धियों की सख्या — सन्धियों की संख्या दो सौ दस है । उनमें से ६८ शाखाओं में, ५ ९ कोष्ठ में और ८३ ग्रीवा ( गर्दन ) के ऊपर होती हैं ॥ २७ ॥

विमर्श: -- अस्थियों के समान सन्धियों के भी तीन विभाग किये गये है | एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां त्रयस्त्रयः, द्वावङ्गुष्ठे, ते चतुर्दश, जानुगुल्फत्रणेष्वेकैकः, एवं सप्तदशैकस्मिन् सक्थिन भवन्ति; एतेनेतर - सक्थिबाहू च व्या-ख्यातौ ॥ २८ ॥

शाखागन सन्धियां - प्रत्येक पैर की अंगुलि में तीन - तीन सन्धियां होती है और दो अंगूठे में, इस प्रकार १४ सन्धियां हुई | जानु ( घुटना ), गुल्फ और वंक्षण में एक - एक, इस प्रकार तीन सन्धिया हुई । इस प्रकार एक - एक पैर मे १७ सन्धिया होती है । इसी प्रकार दूसरे पैर और बाहु मे भी इतनी ही सन्धियां होती हैं । अतः शाखाओं मे १७४ ४ = ६८ सन्धियां होती है ॥ २८ ॥

विमर्श. -- सन्धियों के वर्णन मे अंगूठे में केवल दो सन्धिया बतायी है, तीन नहीं । इससे अंगूठे में दो हड्डिया देना रहा, किन्तु अस्थियों की गणना में अगूठे में तीन । अस्थियां दी गई है । त्रय कटीकपालेपु, चतुर्विंशतिः पृष्ठवशे, तावन्त एव पार्श्वयोः, उरस्यष्टौ ॥ २६ ॥

कोष्ठगत सन्धियाँ — कटी और कपालों मे तीन सन्धिया है । २४ सन्धियां पृष्ठवंश में हैं । पार्श्व में भी इतनी ही 1 अर्थात् २४ तथा छाती में ८ है । सब मिलकर ५ ९ सन्धिया है ॥ विमर्श - हाराणचन्द्र के मतानुसार कटिकपालों में ५ सन्धिया है । पृष्ठवंश और दोनों पाश्र्वों में चौवीस । चौवीस, छाती में १६ । फुप्फुसों के साथ लगी हुई कण्ठ नाडी ( Trachea ) में बीस । इस प्रकार ये सन्धियां ८ ९ होती है । तावन्त एव ग्रीवायां त्रयः कण्ठे, नाडीषु हृदय-क्लोमनिबद्धास्वष्टादश, दन्तपरिमाणा दन्तमूलेषु, एकः काकलके, नासायाञ्च, ( नासायां पञ्च, द्वौ द्वावेव द्वयोर्तेनयोर्भवत: पा ० ) द्वौ वर्त्ममण्डलजो नेत्राश्रयौ, गण्डकर्णशङ्खेष्वेकैकः, द्वौ हनुसन्धी, द्वावुपरिष्टाद् वोः शङ्खयो, पञ्च शिरः कपालेषु, एको मूर्ध्नि ॥ ऊर्ध्वजयुगत सन्वियां - उतनी ही गर्दन में अर्थात् ८, कण्ठ में २, हृदय, क्लोम - सम्बद्ध नाडियों में १८, दन्तमूलों में ३२, काकलक मे १, नासिका में भी १, नेत्राश्रित वर्त्ममण्डल मे २, गण्ड में १ -१ ( मिलाकर २ ), कार्नो में १ -१ ( मिलाकर २ ), शङ्खों में १ -१ ( मिलाकर २ ), हनुसन्धियों में २, भ्रुकुटी के ऊपर २, शंसों के ऊपर २, शिरःकपालों में ५, मूर्धा में १ ॥ विमर्शः -- ऊर्ध्वजत्रु में सब मिलाकर ८३ सन्धियां हैं । हाराणचन्द्र के मत में ग्रीवा की ८ सन्धियां, हृदय, क्लोम से सम्बद्ध नाडियों की १८, काकलक की १, भ्रुकुटों की २ सन्धियां तथा मूर्धा की १, सब मिलाकर ३० सन्धियां कम है । अर्थात् उनके मत में ५३ सन्धियां है । के मतानुसार ६८ + ५ ९ +८३ = २१० सन्धिया होती हैं । त ते सन्धयोऽष्टविधा - कोरो - लूखल - सामुद्र-प्रतर- तुन्नसेवनी वायसतुण्ड - मण्डल - शङ्खावर्त्ताः ॥ सन्धियों के प्रकार- ये सन्धियां आठ प्रकार की हैं, यथा-कोर, उलूखल, सामुद्र, प्रतर, तुन्नसेवनी, वायसतुण्ड, मण्डल और शङ्खावर्त ॥ विमर्शः -- ये सन्धियां केवल हड्डियों के संयोग स्थान पर ही रहती है । तेषामङ्गुलि - मणिबन्ध - गुल्फ - जानु - कूर्परेपु कोराः सन्धयः । कक्षावड क्षणदशने पूलूखलाः, अंसपीठ - गुद भग- ( पाद ' पा ० ) नितम्बेषु सामुद्राः, ग्रीवापृष्ठ-वंशयोः प्रतराः, शिरःकटीकपालेषु तुन्नसेवन्यः, हनो ( हन्वोः ' पा ० ' ) रुभयतस्तु वायसतुण्डः, कण्ठहृदय-नेत्रक्लोम नाडीपु मण्डलाः, श्रोत्रशृङ्गाटकेषु शङ्खा • वर्ताः । तेषां नामभिरेवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ सन्धियों के स्थान इन सन्धियों में से कोर सन्धियां भङ्गुलि, मणिवन्ध ( कलाई ), गुल्फ ( एडी ), जानु ( घुटने ), और कूर्पर ( कोहनी ) में होती हैं । कक्षा, वंक्षण, दात इनमें उलूखल सन्धिया है । अंसपीठ, गुद, भग, नितम्बों में सामुद्ग सन्धिया होती है । ग्रीवा ( गर्दन ) और पृष्ठवश में प्रतर नामक सन्धिया है । शिर और कटी, कपालों में तुन्नसेवनी हैं । हनु के दोनों ओर वायसतुण्ड सन्धियां है । कण्ठ, हृदय, नेत्र, क्लोमनाडी, इनमें मण्डल नाम की सन्धिया है । श्रोत्र और शृङ्गाटक इनमें शंखावर्त सन्धियां हैं । उनके नामों पर से ही आकृतियों का वर्णन होता है । विमर्श: - ( १ ) कोरसन्धि ( Hinge joints or ginge mus ) ( २ ) उलूखल ( Ball & socket joints ) ( ३ ) सामुद्र ( सम्पुट के आकार का Cavity joints ) ( ४ ) प्रतर । ( ५ ) तुन्नसेवनी ( सीवन के सदृश Sutures ) ( ६ ) वायसतुण्ड ( कौवे की चोंच के समान. Crow beak joints ) ( ७ ) मण्डल ( वर्तुलाकार. Annular joints ) ( ८ ) शंखाचर्त ( शंख के तुल्य ) ।

अस्थमा तु सन्धयो होते केवलाः परिकीर्तिताः ।

पेशीस्नायुशतानां तु सन्धिसङ्ख्या न विद्यते ॥

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श्रध्यायः ५ ] शारीरस्थानम्? केवट दृट्टियों में मन्त्रि – क्षयों में केवल ये सन्धियां | एवमेव शरीरेऽस्मिन् यावन्तः सन्धयः स्मृताः । कही गई हैं ॥ ३३ ॥ स्नायुभिर्बहुभिर्बद्धास्तेन भारसद्दा नराः ॥ ४२ ॥

विनः - यहां ( Syndesmology ) सन्विप्रकरण समाप्त नास्थीनि न वा पेश्यो न सिरा न च सन्धयः । होना है । नव स्नायुशतानि । तासां शाखासु षट्शतानि, द्वे शते त्रिंशन कोठे, ग्रीवां प्रत्यूर्व सप्रतिः ॥ ३१ ॥

स्नायु संन्या - स्नायु ९ ०० है । उनमें से शास्त्राओं में ६००, कोट में ०३०, ग्रीवा के ऊपर ७० | इस प्रकार ९ ०० हैं ॥ ३१ ॥

विमर्शः - स्नायु को कोई ( Nerves ) कहते हैं । बहुत ढंग ( Yassles ) कहते हैं । दूसरे Lomments कहते हैं । इस जगह Legsments को मानते हुए लिखा जाता है । स्नायुओं का वर्णन भी लागत कोष्ठगत तथा जत्रुगत इस प्रकार किया गया है । एकैकस्यां तु पादाङ्गुत्त्यां घट् षट् ( पण्निचिताः ' पा ० ' ) ताबिशन्, वाचत्य एव तलकूर्च - गुल्फे, तात्रत्य एत्र जंबायां द्वरा जानुनि चत्वारिंशदूरो, दश वझणे, शतमध्यर्वमेवमेकस्मिन् सक्ति भवन्ति, एनेने तरसक्थिवाहू च व्याख्यातौ ॥ ३५ ॥

शाकारत स्त्य – - पैरों की प्रत्येक अंगुलि में छः कः स्नायु हैं । सब मिलाकर पैर में ३० स्नायु रहते है । उतनेही तल, चूर्च और गुरुतों में हैं, और जंबा में भी इतनेही है । जानु ( घुटना ) में १०, उर में १०, बंद में 10, इस प्रकार एक पैर में १५० स्नायु होते हैं । वह दूसरे पैर और बाहुमें समझना चाहिये ॥ ३५ ॥

विमर्श -पाठ मेड ' पग्निचिता ' ऐसा है । उसका अर्थ छः स्नायुओं से निवन्द इस प्रकार होता है । षष्टिः कथाः पृष्टेऽशीतिः, पार्श्वयोः षष्टिः, उरसि त्रिंशन ॥ ३६ ॥

कोडनायु कवि में ६०, पृष्ट में ८०, पावों में ६०, और वर में ३० ॥ २६ ॥

विनर्गः — कोट में २३० स्नायु होने हैं ।

पत्रिंशद् ग्रीवायां मूर्ध्नि चतुविशत् ॥ ३७ ॥

ऊर्ध्वजत्रुगत स्नायु — प्रीत्रा में ३६ और सूर्वा में ३४, इन प्रकार ऊर्ध्वजत्रुगत ७० स्नायु होते हैं ॥ ३७ ॥

विसर्ग –पत्र मिलाकर ६०० + २३० + ७० = होते हैं ।

भवन्ति चात्र-स्नायूचतुर्विधा विद्यात्तास्तु सर्वा निबोध मे ।

प्रतानवत्यो वृत्ताच पृव्वश्च शुषिरास्तथा ॥

प्रतानत्रत्यः शाखासु सर्वसन्धिषु चाप्यथ ।

वृत्तास्तु कण्डराः सर्वा विज्ञेयाः कुरासैरिह ॥

आमपक्काशयान्तेषु बस्तौ च शुषिराः खलु । १०० स्नायु ३८ ॥ ३८ ॥ पार्श्वोरसि तथा पृष्ठे प्रयुताच शिरस्यय ॥ ४० ॥

नोर्यया फत्तत्रास्तीर्णा बन्चनैर्बहुभिर्युता ।

भारतमा भवेदसु नूयुक्ता मुसमाहिता ॥ ४१ ॥

व्यापादितास्वथा हन्युर्यथा स्नायुः शरीरिणाम् ॥ ४३ ॥

यः स्नायूः प्रविजानाति बाह्याञ्चाभ्यन्तरास्तथा ।

। स गृहं शल्यमादन्तु देहाच्यक्नोति देहिनाम् ॥ ४४ ॥

इन्द्रोकबद्धस्नायुर्योका वर्णन - स्नायु चार प्रकार की होती हैं ।

मानवती, वृत्ता, पृथु और शुपिरा ( पोली, छिद्रयुक्त ) ॥ 22 ॥

मानवती शाखाओं में तथा सब सन्धियों में रहती है । सभी गोल स्नायुओं को कण्डरा कहते हैं, ऐसा तज्ज्ञ लोगों को समझना चाहिये । शुपिरा स्नायु आमाशय और पकाशय । के अन्न भाग पर तथा बस्ति प्रदेश में होती है । चौड़ी स्नायु पार्श्व, छाती, पृष्ठ और शिर में होती है । जिस प्रकार अच्छी तरह से बनाई हुई, तम्तों से तैयार की हुई, बहुत से बन्धनों से युक्त नौका पुरुषों के सहित भार वहन करने में समर्थ होती है | तहत् शरीर में भी जितनी सन्धियां हैं, वे बहुत से स्नायुओं से बंधी हुई हैं । अनः मनुष्य ग्रागी का भार सहन करने में समर्थ हैं । अस्थियां, मांसपेशियां, मिराये और सन्धियां खराब होने से शरीर जितना बेकाम नहीं होता है, उतना स्नायु में विकृति पैदा होने से होता है; तात्पर्य यह कि स्नायु वराव । होने में शरीर अवश्य अकर्मण्य बन जाता है । जो अन्तःस्य और बहिस्थ स्नायुओं को जानता है, वह गहराई में स्थित शदय को भी शरीर से निकालने में समर्थ होता है । विमर्श - स्नायुओं का महत्त्व यहां भली प्रकार बताया जा चुका है ।

श्लोक १० में प्रथम चरणार्थं द्वितीय अर्ध में होता तो

क्रम ( यथासंख्य ) ठीक बैठना और ' पृथुलाश्च शिरस्यथ ' इसमें के र्य का अन्वय ठीक हो जाता । पञ्च पेशीशतानि भवन्ति । तासां चत्वारि शतानि शाखासु, कोष्ठे घट्षष्टि ", ग्रीवां प्रत्यूर्ध्व चतुविशत् ॥ ४५ ॥

पेशियों का वर्णन - पेशियां पांच मौ होती हैं । उनमें में शाखाओं में चार सौ, कोष्ठ में ६६ और गर्दन के ऊपर ३१ । विमर्श -पेशियां ( Muscles ) | ' गयी ' के मत में कोष्ट में ६० और गर्दन के ऊपर 20 पेशियां होती हैं । एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां तिस्रस्तिस्रस्ताः पञ्च-दश, दश प्रपदे, पादोपरि कूर्चसन्निविष्टास्तावत्य एव दश गुल्फतलयोः, गुल्फजान्वन्तरे विंशतिः, पञ्च जानुनि, विंशतिरूरो, दश वक्षणे, शतमेवमेकस्मिन् सक्थिन भवन्ति, एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ ॥ शाखागत पेशिया - प्रत्येक पादांगुली में ३-३ = पाचों अंगुलियों में १७, प्रपद में १०, पैर के ऊपर कूर्च में सटी हुई १०, गुल्फनटों में १०, गुल्फ और जानु के बीच में २०, जानु ( बुटना ) में ", उदेश में २०, बंग में १० । इस प्रकार प्रत्येक पैर ( सक्थि ) में १०० पेशियां होती है ।

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मुथुनमंहिता 25 दूसरे पैर में और दोनों बाहुओं में समझना | गिराए ( Blood vessels ) उनमेंसे निकलती हैं और दूसरी इस प्रकार २०० मांसपेशियां है । उसके नीचे रहती है । चाहिये | सब मिलाकर विमर्श - पद का अर्थ पादाग्र होता है । तिस्रः पायो, एका मेढू, सेवन्यां चापरा, हे वृपणयोः, स्फिचोः पञ्च पञ्च, द्वे बस्तिशिरसि, पञ्चो-दरे ( पञ्चदश ' पा ० ' ), नाभ्यामेका, पृष्ठोर्ध्वसन्निविष्टाः पञ्च पञ्च दीर्घाः पट् पार्श्वयोः, दश वसि ( पार्श्वयो । देश, द्वे. वक्षसि ' पा ० ' ), अक्षकांसाँ प्रति समन्तान् सप्त, द्वे हदयामारायचो., पट् यकृतली होण्डु ( न्दु ) केषु ॥ कोष्ठगत पेशिया — गुदद्वार में तीन, मंटू ( सूत्रेन्द्रिय, लिंग ) में एक, मंत्रनी में, अण्डकोषों में दो, नितम्ब अथवा चूतड़ों में पांच पांच - = १०, वस्तिशीर्ष में २, में पांच ( पाठभेद के अनुसार १७ ), नाभि में एक, पीठ के ऊर्ध्व भाग में नदी हुई दौर्व पांच - पांच = १० पेशियां, पार्श्व में ६, बज्ञःम्थल में १०, अक्षक और अंग के चारों ओर उण्डुक में है, इस प्रकार सब मिलाकर ६६ मांसपेशियां हुई । त्रिमर्गः वृद्धवाग्भट और गयी के मत में कोड में ६६ पेशियों की जगह ६० ही पेशियां बताई हैं ॥ ४७ ॥

गनी के मतानुसार परिगगन. - मंदू ( मूत्रेन्द्रिय ) में, मेचनी में ३. वृषणों में ३, दोनों नितम्बों से १०, गुदद्वार से बल्सिंज्ञक ३, वस्तिशीर्ष में है, यदादिकों के साथ उदर फाटक में ७, नाभि में १, पृष्ठमन्धि, पार्श्वो में व. म्थलसें १०, अत्रक और अंसके चारो ओर ७, हृदयमें २, आमाशय में 1, कोष्टक भीतर २ | इस प्रकार ८० पेशियां होनी है । ग्रीवायां चतन्त्रः, अष्टौ इन्वोः ( हनुसमास्ये ' हाराणचन्द्रः ' ), एकैका का कलकगलयोः, द्वे तालुनि, एका जिह्वायां ( जिह्वाया द्वे ' पा ' ), ओष्टयो, नाम्रायां हे, हे नेत्रयोः, ( चतस्रो नेत्रयोः ' पा ० ) गण्डयोश्चतस्त्र ', कर्णयोर्द्व, चतन्त्रो ललाटे, एका शिरसीति ( पट् शिरसि इति पा ० ' ) । एवमेतानि पञ्च पेशीशतानि ॥ ४८ ॥

उर्ध्वजत्रुगत पेशिया - ग्रीवामें 2, हनुओंमें १, काकलिकामें १, गले, वालु २, जिह्वामें १, ओष्टमें नासिका २, आंग्लोंमें २, गण्डमें ४, कानोंमें २, ललाटमें १ 2,, शिव ( मस्तक ) में १, इस प्रकार ३१ पेशियां होती है । इस प्रकार सम्पूर्ण पेशियां २०० + ६६ + ६२ = ००० होती है ॥ १८ ॥

त्रिमर्ग –गायकं मनमें उर्ध्वजत्रुगत 20 पेत्रियां है ॥ २८ ॥

भवति चात्र-सिरास्नास्थि पर्वाणि सन्धया शरीरिणाम् ।

पेशीमिः संवृतान्यत्र बलवन्ति भवन्त्यतः ॥ ४६ ॥

पेक्षिरों के दृढ होने के कारण- सिरा, स्नायु, अस्थियां, स्त्रीणां तु विंशतिरधिका । दश तासा स्तनयोरेकै कस्मिन् पञ्च पचेति, यौवने तासां परिवृद्धिः ॥ ५० ॥

अपत्यपथे चतन्नः - तासां प्रसृतेऽभ्यन्तरतो हे, मुखाश्रिते बाह्ये च वृत्ते द्वे गर्भच्छिद्रसंश्रितास्तिस्र., शुक्रार्न त्रप्रवेशिन्यस्तिस्र एव । पित्तपक्वाशययोमध्ये गर्भशय्या, यत्र गर्भस्तिष्ठति ॥ ५१ ॥

स्त्रियों की पेशिया स्त्रियों में श्रीस पेशिया अधिक होनी है । इनमें से प्रत्येक स्वमें पांच पनिया होती है अर्थात दोनों स्तनोंमें दस पेशियां । उनकी यौवनावस्था में वृद्धि होती है । अपत्यमार्ग में चार मांसपेशिया होती है । उनमें दो ( फैली हुई ) भीतर की और, और दो ( गोलाकार तथा मुख में आश्रित ) बाहर की ओर होती है, इस प्रकार अपयमार्ग की चार मांसपेशियां हुईं । गर्नटिव के आश्रित तीन पेशिया होती है । शुक्र और आर्तवाको प्रवेश कराने वाली तीन पंशियां होती हैं । गर्भशय्या, विनाशय तथा पाशय इनके मध्य में रहती है । इसमें गर्म रहना है ॥ ५०-७५ ॥ विमर्श - स्तन ( Breast ), गर्भाशय ( Uterus ) और योनि ( Vegina ) इनको आश्रय करके स्त्रियोंमें अधिक पेशियां रहती है । तासां बद्दल - पेलव - स्थूलागु - पृथु - वृत्त - हस्त्र-दीर्घ- स्थिर - मृदु - श्लच्ण - कर्कशभावाः सन्ध्यस्थिसिरा-स्नायु - प्रच्छादका यथाप्रदेशं स्वभावत एव भवन्ति ॥ पेशियों के स्वरूपः — बीच बीच में सन्धियां, अस्थियां, शिराएँ, स्नायु, इनको टकने के कारण पेशियों में बहलता ( चौडापन ), पेटवत्व ( अल्पना ), न्यूटन्त्र ( मोटापन ), अणुत्र ( छोटापन ), पृथुस्त्र ( विस्तीर्णता ), वृत्तत्व ( गोलाई ), हस्वत्व ( छोटा होना ), दीर्घच ( बढा होना ), स्थिरव्य, मृदुत्व, ग्लचगन्त्र ( चिकनापन ) और कर्कशन्त्र ( खुदरापन ), ये भाव स्वभाव से ही होते हैं ॥ ७२ ॥

विमर्गः -- पेत्रियों के गुणधर्म बदलने के कारण उनकी । यथास्थान स्थिति है ।

भवति चात्र-पुंसां पेश्यः पुरस्ताद्याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कजाः ।

वीणामावृत्य तिष्ठन्ति फलमन्तर्गतं हि ताः ॥ ५३ ॥

लिंग भेट रहने पर भी सामान्य पेशीसंनायें समानना-पुरुषों के लक्षण ( टिङ्ग ) और ( अण्डकोप ) रहने वाली जो पेशियां कही गई हैं, वही पेशियां स्त्रियों में अन्तर्गत फल ( डिम्भ ) ग्रन्थि को ढके हुए रहती हैं ॥ ७३ ॥

विमर्गः - यह तन्त्रान्तरीय ग्लोक गयी को संगत नहीं है । पर्व तथा सन्धि पेशियोंसे आच्छादित हैं इस कारण वे दृढ़ | उसके मतने त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा तीन पेशियां कम होती हैं ॥ २ ९ ॥ होती है । भोज का भी मत गयी के मत को पुष्टि देने वाला है । विमर्श -पेशियों ( Muscles ) के नीचे अस्थियां ( Blones ), ' पञ्च पेशीशतान्येव स्त्रीवजं विद्धि भूमिप । ( Ligaments ), और सन्धियां होती है । किन्तु कोई २ अतश्च विनो हीयन्ते स्त्रीणां शेफसि सुप्क्यो. ॥

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श्रध्यायः ५ ] शारीरस्थानम् ४६ उपर्युक्त श्लोक में अन्तर्गत फलका चीज - ग्रन्थि ( Omry )

तात्पर्य है ।

मर्मसिरा - धमनी - स्रोतसामन्यत्र प्रविभागः ॥ ५४ ॥

मर्मादिकों के प्रकार - मर्म, शिरा, धमनी और खोतसोंका विभाग दूसरी जगह बताया जायेगा ॥ ५४ ॥

विमर्श: -मर्मी ( Vatal weak spots ) का वर्णन पष्ठ अध्याय में, शिराओं ( Blood vessels ) का सप्तम अध्याय । में, और धमनियों ( Arteries ) तथा स्रोतसों का वर्णन नवम अध्याय में दिया गया है ।

शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्ता सा प्रकीर्तिता ।

तस्यास्तृतीये त्वावर्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ॥ ५५ ॥

गर्भशय्या - योनि, शंखनाभि के आकारकी, तीन आवर्ती से युक्त होती है । उसके तीसरे आवर्त में गर्भशय्या रहती है । विमर्श: -- योनि ( Vegina ) के आखीर भाग में गर्भाशय ( Uterus ) रहता है ।

यथा रोहित मत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः ।

तत्संस्थानां तथारूपां गर्भाशय्यां विदुर्बुधाः ॥५६ ॥ ।

जैसी रोहित मत्स्य के मुख की आकृति होती है, उसी प्रकार गर्भशय्या होती है, ऐसा तज्ज्ञ लोग कहते हैं ॥५६ ॥

विमर्शः -- गर्भशय्या का मुख छोटा होता है, किन्तु पीछे का भाग वढा होता है । गर्भशय्या ( Uterus ) प्रथम तो बहुत छोटी होती है, यहां तक कि भगसन्धि ( Symphysis ( pubis ) तक गर्भ के तीन महीने के होने पर आती है, किन्तु बढ़ते - बढ़ते वह महाप्राचीरक ( Diaphragm ) तक पहुंच जाती है ।

आग्नोऽभिमुखः शेते गर्भो गर्भाशये स्त्रियाः ।

स योनिं शिरसा याति स्वभावात् प्रसवं प्रति ॥ २७ ॥

गर्भस्थित शिशु की स्थिति - स्त्रियों के गर्भाशय में गर्भ संकुचित तथा अभिमुख होता है, किन्तु प्रसव के समय स्वाभाविक प्रकार से वह शिर से योनि को प्राप्त होता है ॥ विमर्श: -- शिशु की स्थिति का ज्ञान बहुत आवश्यक होता है । शिशु जब शिर से आता है तो सुभीता से पैदा होता है, किन्तु तिरछा आने पर, उसका नितम्व प्रथम आने से, मृत होने से, विकृत रहने से उसमें कठिनता उत्पन्न होती है । कभी - कभी तो पेट चीर कर भी बच्चे निकालने पढते है | वस्ति गहर के चार भाग प्रथम करते है । एक रेखा एक बगल से दूसरे वगल को और दूसरी भगसन्धि के बीच से पीछे की ओर । इन चार भाग का नाम दक्षिण - पूर्वानु शीर्षासन ( RO A Right oculpito anterior ), दक्षिण -पश्चिमानु - शीर्पासन ( R. O P ), उसी प्रकार वाम पूर्वानु-शीर्षासन ( L, O 4 ) और वाम - पश्चिमानु - शीर्पासन ( L. O. P. Left occupito pasterior ) यह है । इन चार भागों में बच्चा शिर द्वारा या नितम्व द्वारा आता है । सबसे अच्छा प्रकार वाम - पूर्वानु शीर्पासन ( LOA ) है | इस अवस्था में बच्चे का जन्म सुगमता पूर्वक होता है । और भी प्रकारों की स्थिति होती है । वह विस्तार भय से नहीं ७ सु ० शा ० 1 चालक जीवित होने के प्रायः दो लक्षण होते हैं । प्रथम-हृत्स्पन्दन सुनना और दूसरा - बच्चे की हलचल । कभी - कभी वस्तिगर छोटा ( Contracted ) होता है । तो बच्चा कठिनता से निकलता है । वह समझने के लिए पुरोर्ध्वकूटों के ( Sup anterior spine ), मध्य का और दोनों जघन - चूढाम्रों के ( Orest of ilam ) मध्यका तथा भगसन्धि से पाँचवे कटिकशेरुकाग्र ( Symphysis pupis ) से पञ्चम ( Lumber Vertedra के Spine external conjumate ) का अन्तर लेते है, जो निम्न प्रकार से होना चाहिये-( १ ) कूटान्तरिक व्यास ( Interspinous diameter ) ९ ॥ से १० इञ्च । ( २ ) जघनशिखान्तरिक व्यास ( Inter crestal diameter ) १० से ११ इञ्च । ( ३ ) वाह्य अनुदीर्घव्यास ( External conjugate ) ७॥ इछ ।

त्वक्पर्यन्तस्य देहस्य योऽयमद्गविनिश्चयः ।

शल्यज्ञानादृते नैष ( नैव ' पा ० ' ) वर्ण्यतेऽङ्गेषु केषुचित् ॥

शल्यज्ञान की आवश्यकता— यह जो देह का त्वक् ( चर्म ) पर्यन्त भट्ट विनिश्चय है, उसका किसी भी प्रकार शल्यज्ञान के विना वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥ ५८ ॥

विमर्श: - शल्यज्ञान से ही प्रत्यह्नों का और चर्मों के । सूक्ष्म भागों का वर्णन किया जा सकता है । अन्यथा नहीं ।

तस्मान्निःसंशयं ज्ञानं हर्त्रा शल्यस्य वाञ्छता ।

शोधयित्वा मृतं सम्यग् द्रष्टव्योऽङ्गविनिश्वयः ॥ ५६ ॥

प्रत्यक्षतो हि यद् दृष्टं शास्त्रदृष्टञ्च यद् भवेत् ।

समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्द्धनम् ॥ ६० ॥

शवच्छेदन की आवश्यकता — इसी लिये शल्य के हरण करने वालों को मृत शरीर का शोधन करके अच्छे प्रकार अङ्ग का निश्चय करना चाहिये । संक्षेप में प्रत्यक्ष देखा हुआ और शास्त्रसे ज्ञात, ये दोनों ही क्रियाएं ज्ञान की वृद्धि मैं कारण होती हैं । ५ ९ -६० ॥ विमर्श: -- अह्नों का ज्ञान ( Anotomy ) जानने के लिए मृत शरीर का शोधनकर प्रत्यक्ष कर्म ( Practical ) करना चाहिये । ( Practical ) के साथ शास्त्रज्ञान ( Theory ) भी जानना आवश्यक होता है । दोनों प्रकार के अभ्यास से निःसंदेह ज्ञान होता है । चरकमें भी शारीर ज्ञान का महत्त्व बताया है । यथा-' शरीर विचयः शरीरोपकारार्थमिष्यते । ज्ञात्वा हि शरीर-तत्त्वं शरीरोपकारकेषु भावेषु ज्ञानमुत्पद्यते तस्माच्छरीरविचयं प्रशंसन्ति कुशलाः ' ॥

और भी - शरीरं सर्वथा सर्व सर्वदा वेद यो भिषक् ।

आयुर्वेद स कार्त्स्न्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥

तस्मात्समस्तगात्रमविषोपहत मदीर्घव्याधिपीडि-तमवर्षशतिकं निःसृष्टान्त्रपुरीष पुरुषमवहन्त्यामाप-गायां निबद्धं पञ्जरस्थं मुझवल्कलकुशशणादीनामन्य-तमेनावेष्टिताङ्गप्रत्यङ्गमप्रकाशे देशे कोथयेत्, सम्यक् प्रकुथितं चोद्धृत्य ततो देहं सप्तरात्रादुशीरबालवेणु-

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सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 400 का मूल पृष्ठ
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yo सुश्रुतसंहिता वल्कलकूर्चानामन्यतमेन शनैः शनैरव र्पयंस्त्वगादीन् सर्वानेव बाह्याभ्यन्तराङ्गप्रत्यङ्गविशेषान् यथोक्तान् लक्ष्येच्चक्षुषा ॥ ६१ ॥

शवच्छेदन को विधि --- दशवच्छेदनकी आवश्यकता होनेके कारण सम्पूर्ण अवयव वाले, चिपमे मृत्यु न हुई हो और दीर्घ व्याधिसे न मरा हुआ, सौ वर्ष आयुकं पूर्वका अन्य से पुरीष ( मल ) निकाले हुए पुरुष को, न बहनेवाली नदीमें, पिअरे में बांधकर मुंज, पेड़का छिलका ( वल्कल ), कुश, क्षण ( सन ); इनमेसे किसी एक वस्तु अङ्ग - प्रत्य को लपेटकर अन्धेरेमें सडावे | अच्छे प्रकारसे सड़ने पर उसे निकालकर पश्चात् उक्षीर ( सस ), बाल, वेणु ( बांस ), वल्कल ( वृक्षकी छाल ), इनमें से किसी एक से तैयार की हुई चीसे धीरे धीरे सुरचते हुए पूर्वोक्त मय त्वचाओं को, वाह्य तथा भीतरी अङ्ग, प्रत्यह्नों को ७ दिननक आंखों से देगे । विमर्श: - प्रथम शरीरको लेकर सदाचे पश्चात् वनस्पति-ओंके या बनाकर उसे सुरचते २ अङ्गप्रत्यङ्गका प्रत्यक्ष ज्ञान कर लेना चाहिये ।

न शक्या ष्टुं देहे सूक्ष्मतमो विभुः ।

दृश्यते ज्ञानचक्षुर्भिस्तपञ्चक्षुर्भिरेव च ॥ ६२ ॥

श्रात्माका दर्शन --- शरीर में बहुतही सूक्ष्म आत्माको देन नहीं सकते । यह ज्ञान चक्षुओं मे अथवा तपश्चक्षुओंसे देगा जा सकता है ॥ ६२ ॥

विमर्श: - यहां आत्माका अस्तित्व और उसको देखनेके उपाय - ज्ञान ( सद्गुरूपदेश और तपश्चर्या ( चान्द्रायणा-दित ) बताए हैं ।

शरीरे चैव शास्त्रे च दृष्टार्थः स्याद्विशारदः ।

ताभ्यां सन्देहमवापोहा घरेलू क्रियाः ॥ ६३ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शरीरसंख्याव्या-करणशारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥

निःमनेद्द शानके पचात् चिकित्मा करे- शरीर के विषय में और शा as fava में भली प्रकार ज्ञान होना चाहिये । देखनेसे और शास्त्राबलोकनमे संदेहको हटाकर क्रिया ( चिकित्सा अथवा शल्यकर्म ) करना चाहिये ॥ ६३ ॥

विमर्शः- ~~ -चरकर्म भी ' दशरीरसंख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिपक् । तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते ' ॥ तथा-' केवलं चिडितं ह्यस्य शरीरं सर्वभावतः । शारीराः सर्वरोगाश्च कर्मसु न मुह्यति । इस प्रकार चिकित्साकर्म और शल्यकर्म

में संदेह निरसन के लिये शरीर ज्ञान का कितना महत्व है-यह बताया है ।

इति शारीरस्थाने पञ्चमोऽध्यायः ॥

शारीरे प्रश्नाः-( १ ) चरकताधुनिकमतपुरस्सरं त्वग्विवेचन कार्यम् । ( २ ) आशयशन्द्रस्य निरुक्ति प्रर्व्याशयानां नामानि देयानि । ( 9 ) चरक सुश्रुतार्वाचानमनपुरस्सरमस्थन परिगणन कृत्वा, ari प्रकारान् विलिख्य मतभेदे च कानि कारणानि? ( ४ ) स्नायु - सन्धि - स्रोतम पेशीनाज मरयाया प्रकाराणी स्त्रीविषयक मेद पुरस्मर निर्देशः करणीयः । ( ५ ) शरीरस्य का व्यारया? तज्ज्ञानस्य का आवश्यकता तथा शवछेदनस्य प्राचीनार्वाचीनकाले विधिश्व लेखनीय. । ( ६ ) विशाने आत्मनोऽप्रत्यक्षत्वेऽपि कय तस्यास्तित्वे विश्व. सभूमिः । ( 3 ) षष्टोऽध्यायः अथातः प्रत्येकमर्मनिर्देशं शारीर व्याख्यास्यामः ॥ ॥ १ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके पश्चात् प्रत्येक मर्मनिर्देश नामक शारीर की व्याख्या

की जायेगी ।

जैसा कि भगवान् धन्वन्तरिने कहा है ॥ १-२ ॥

विमर्शः -- प्रत्येक मर्मनिर्देश के ' प्रत्येक ' के आगे मांग, शिरा, स्नायु, अस्थि और मन्धि ये शब्द समझने होंगे । ऐसा करनेका फल प्रत्येक शिरामर्मनिर्देश, प्रत्येक स्नायुमनिर्देश इत्यादि होता है । मर्मस्थान ( Vital weak spots ) है । ममों में अग्नि, सोम, वायु, मत्व, रज, तम, । पन्चेन्द्रियां और भूतात्मा ये रहते हैं । इनको ही जीवनाधार कहते हैं । यथा - ' जीवनाधाराणि प्रायेण मुनयो जगुः । अथवा ' मारयतीति मर्म ' यह भी मर्मकी व्यारया है, क्योंकि ममों का विघात होनेसे मृत्यु होती है । सुश्रुतमें भी मर्मकी - ' मर्माणि नाम मांसशिरास्नाय्वस्थिसन्धिसन्निपाताः, तेषु स्वभावत एव विशेषेण प्राणास्तिष्ठन्ति । तस्मान्मर्मस्व भिहताम्तास्तान् भावानापद्यन्ते ' इस प्रकार व्याख्या है । उसी प्रकार ' येवहितेषु त्रियन्ते नरास्तानि मर्माणि ' यह भीम की व्याख्या ( Defination ) है । सप्तोत्तरं मर्मशतम् । तानि मर्माणि पञ्चात्मकानि भवन्ति, तद्यथा - मांसमर्माणि, सिरामर्माणि, स्नायु मर्माणि, अस्थिमर्माणि सन्धिमर्माणि चेति । न खलु मांससिरास्नाय्वस्थिसन्धिव्यतिरेकेणान्यानि । मर्माणि भवन्ति, यस्मान्नोपलभ्यन्ते ॥ ३ ॥

मर्मों की संख्या तथा प्रकार मर्म एक सौ सात है । उनके पांच प्रकार होते हैं । उदाहरणार्थ ( १ ) मासममे, ( २ ) शिरा-मर्म, ( ३ ) स्नायु मर्म, ( ४ ) अस्थिमर्म और ( ५ ) सन्धिमर्म । मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि और सन्धि - मर्मों से अतिरिक्त मर्म न मिलने के कारण दूसरे मर्म होते ही नहीं ॥ ३ ॥

विमर्शः -- यद्यपि स्रोतों की हानि होने पर भी मृत्यु होती है, तथापि उनसे मृत्यु निश्चित होगी ही, ऐसा नहीं । इसलिये स्रोतोममं माने नहीं गये हैं । ' स्रोतोविद्धं तु प्रत्याख्यायोप-' चरेत् ' शा. अ. ९ में वचन भी मिलता है कादश मांसमर्माणि, एकचत्वारिशत् सिरा-मर्माणि, सप्तविंशतिः स्नायुमर्माणि, अष्टावस्थि-मर्माणि, विंशतिः सन्धिमर्माणि चेति । तदेतत् सप्तोत्तरं मर्मशतम् ॥ ४ ॥