श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 401–410
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 401–410
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अध्यायः ६ ] शारीरस्थानम् ५१ मर्मके विभागों की संख्या - मांसमर्म ११, शिरामर्म, ४१, स्नायु मर्म २७, अस्थिमर्म ८, और सन्धिमर्म २०; इस प्रकार कुल १०७ मर्म है ॥ ४ ॥
विमर्शः — आगे की गद्य - संख्या ७ में उपर्युक्त स्थानोंमें कौनसे मर्म होते है । यह बताया जावेगा । तेषामेकादशैकस्मिन् सक्थिन भवन्ति, एतेनेत सक्थि बाहूच व्याख्यातौ । उदरोरसोर्द्वादश, चतुर्दश पृष्ठे, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्व सप्तत्रिंशत् ॥ ५ ॥
देशमेदसे मर्मोकी सख्या - इन ममों में से ११ मर्म पैर में होते हैं । इसी प्रकार दूसरा पैर और दो बाहुओं में भी समझना चाहिये । सब शाखाओं में ४४ मर्म होते हैं । पेट और छाती १२, पीठमें १४ इस प्रकार कोष्टमें २६ मर्म होते है । गर्दन के ऊपर ३७ मर्म हैं । कुल मिलाकर ४४ + २६ + ३७ = १०० मर्म ॥ ५ ॥
विमर्श. —शासा, कोष्ठ और ऊर्ध्वजत्रुके अनुसार ममका भी विभाग बताया है । तत्र सक्थिमर्माणि क्षिप्र - तलहृदय - कूर्च - कूर्चशि रो - गुल्फे - न्द्रबस्ति- जान्त्राण्यूर्वी - लोहिताक्षाणि विटपं चेति, एतेनेतरसक्थि व्याख्यातम् । उदरोरसोस्तु गुद - बस्ति - नाभि - हृदय स्तनमूल-स्तन रोहिता - पलापान्य - पस्तम्भौ ( अपस्तम्भाव पलापौ चेति पाठ: ) चेति ॥ पृष्ठमर्माणि तु कटीकतरुण - कुकुन्दर - नितम्ब पार्श्व -सन्धि - वृहत्य - सफल कान्यंसौ चेति । बाहुमर्माणि तु क्षिप्र - तलहृदय - कूर्च - कूर्चशिरो-मणिबन्धेन्द्रबस्ति - कूर्परा प्यूर्वी - लोहिताक्षाणि कक्षधरं चेति, एतेनेतरो बाहुर्व्याख्यातः । जत्रुण ऊर्ध्वमर्माणि तु चतस्रो घमन्योऽष्टौ मातृकाः, काटके, द्वे विधुरे, द्वे फणे, द्वावपानौ, द्वावावन्तों, द्वावुत्क्षेपौ द्वौ शङ्खावेका स्थपनी, पञ्च सीमन्ताश्च वारि शृङ्गाटकान्येोऽधिपतिरिति ॥ ६ ॥
पैरके मर्म - १ क्षिप्र, २ तलहृदय, ३ कूर्च, ४ कूर्चशिर, ५ गुल्फ, ६ इन्द्रवस्ति, ७ जानु, ८ आणि ९ ऊर्बी, १० लोहि-ताक्ष, ११ विटप, ये सक्थि ( पैर ) में मर्म होते हैं । इसी प्रकार दूसरे पैर में होते हैं । उदर और ऊरु में गुद, वस्ति, नाभि मूल, दो स्तनरोहित, दो अपलाप और दो मिलकर १२ मर्म है | पीठ में दो कटीकतरुण, दो कुकुन्दर, पार्श्वसन्धि, दो बृहती, दो अंसफलक और प्रकार १४ पृष्ठमर्म है । , हृदय, दो स्तन अपस्तम्भ, सव दो नितम्ब, दो दो अंस । इस बाहुम - ( १ ) क्षिप्र, ( २ ) तलहृदय, ( ३ ) कूर्च, ( ४ ) कूशिर, ( ५ ) मणिबन्ध, ( ६ ) इन्द्रवस्ति, ( ७ ) कूर्पर, ( ८ ) आणि, ( ९ ) ऊर्वी, ( १० ) लोहिताक्ष, ( ११ ) कक्षधर ये बाहु के मर्म हैं । इसी प्रकार दूसरी वाहु में भी समझना चाहिये । जत्रु ( गर्दन ) के ऊपर - चार धमनियां, आठ मातृकायें; दो कृकाटिका, दो विधुर, दो फण, दो अपाङ्ग, दो भावर्त, दो उत्क्षेप, दो शङ्ख, एक स्थपनी, पाच सीमन्त, चार शृङ्गाटक । और एक अधिपति । इस प्रकार ३७ मर्म हैं । भागे चलकर प्रत्येक मर्म का स्थान और इसके वि होने से उत्पन्न होने वाले लक्षण बता दिये गये हैं ॥ ६ ॥
तत्र तलहृदयेन्द्रवस्ति - गुद - स्तनरोहितानि मांस-मर्माणि, नीलाधमनी - मातृका - शृङ्गाटका - पान - स्थपनी-फण- स्तनमूला - पलापा - पस्तम्भ हृदय - नाभि - पार्श्वस न्धि - बृहती - लोहिताक्षोः शिरामर्माणि, आणि विटप - कक्षधर - कूर्च शिरो - वस्ति - क्षिप्रां स विधुरो त्क्षेपाः कूर्चमर्माणि, कटीकतरुण- नितम्बां - सफलक- शंखास्त्वस्थिम | र्माणि, जानु - कूर्पर - सीमन्ता धिपति गुल्फ - मणिबन्ध-कुकुन्दरा - वर्त - कृका टिकाश्चेति संधिमर्माणि ॥ ७ ॥
मासादि मर्मों के नाम -- १. मांसमर्म: - ४ तलहृदय, ४ इन्द्र-वस्ति, १ गुदा, और २ स्तनरोहित | सब मिलकर ११ मांसमर्म होते है । २. सिराम: -- ४ नीलाधमनियां, ८ मातृका, ४ शृङ्गाटक, २ अपाङ्ग, १ स्थपनी, २ फण, २ स्तनमूल, २ अपलाप, २ अप • स्तम्भ, १ हृदय, १ नाभि, २ पार्श्वसन्धि, २ बृहती, ४ लोहि-ताक्ष, ४ कर्बी । सब मिलकर ४१ शिरामर्म है । ३. स्नायु मर्म. - आणि ४, विटप २, कक्षधर २, कूर्च ४, कूर्वशिर ४, वस्ति १, क्षिप्र ४, अंस २, विधुर २, उत्क्षेप २ । ये २७ स्नायु मर्म है । ४. अस्थिमर्म. - कटीकतरुण २, नितस्त्र २, अंसफलक २, शंख २ । कुल अस्थिमर्म ८ है । ५. सन्धिमर्मः - जानु २, कूर्पर २, सीमन्त ५, अधि-पति १, गुल्फ २, मणिबन्ध २, कुकुन्दर २, आवर्त्त २, कृका-टिका २ । कुल संख्या २० | इस प्रकार १०७ मर्म होते हैं ॥७ ॥
विमर्श: - उपर्युक्त मर्मों के स्थान - शाखा, कोष्ठ और ऊर्ध्वजत्रुगत अङ्गों के व्यतिरिक्त नहीं होते हैं । अतः उनका स्थान शाखादिकों में समझ लेना ठीक है । तान्येतानि पञ्चविकल्पानि मर्माणि भवन्ति । तद्यथा – सद्यः - प्राणहराणि, कालान्तरप्राणहराणि, विशल्यध्नानि, वैकल्यकराणि, रुजाकराणि चेति । तत्र सद्यःप्राणहराण्ये कोनविंशतिः, कालान्तरप्राण-हराणि त्रयस्त्रिंशत्, त्रीणि विशल्यघ्नानि, चतुश्चत्वा-रिशद्वैकल्यकराणि, अष्टौ रुजाकराणीति ॥ ८ ॥
मर्मों के प्रकार - मर्म पांच प्रकार के होते है । जैसे-( १ ) सद्यःप्राणहर १ ९, ( २ ) कालान्तरप्राणहर ३३, ( ३ ) विश-ल्यघ्न ३, ( ४ ) वैकल्यकर ४४, ( ५ ) रुजाकर ८ । कुल संख्या १०७ है ॥ ८ ॥
विमर्श: - कोई मर्म तत्काल प्राणहरण करने वाले होते है, उनको सद्य. प्राणहर मर्म कहते हैं । कालान्तरप्राणहर मर्म कई दिनों के पश्चात् प्राण लेते हैं । विशल्यध्न मर्म - शल्य को
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५३ सुश्रुतसंहिता निकालने से प्राण लेने वाले, वैकल्यकर मर्म - विकलता उत्पन्न करने वाले और जाकर मर्म - पीड़ा करने वाले होते है । इनकी संख्या ऊपर बतायी गयी है ।
शृङ्गाटकान्यधिपतिः शङ्खो कण्ठसिरा गुदम् ।
हृदय वस्तिनाभी च घ्नन्ति सद्योहतानि तु ॥ ६ ॥
सद्यःप्राणहर मर्म – शृङ्गाटक ४, अधिपति १, शंख २, । कण्ठसिरायें ८, गुदा, हृदय, वस्ति और नाभि, इन पर आघात होने से तत्काल मृत्यु होती है ॥ ९ ॥
विमर्श: -- इनकी संख्या १ ९ होती है । वक्षोमर्माणि सीमन्तत लक्षिप्रेन्द्रवस्तयः ।
कटीकतरुणे सन्घी पार्श्वजो बृहती च या ।
नितम्बावित चैतानि कालान्तरहराणि तु ॥ १० ॥
कालान्तर प्राणहर मर्म - वक्षोमर्म ८ ( छातीके मर्म - २ स्तनमूल, २ स्तनरोहित, २ अपलाप, २ अपस्तम्भ ), सीमन्त ५, तलहृदय ४, क्षिप्र ४, इन्द्रचस्ति ४, कटीकतरुण २, सन्धि ( पार्श्वसन्धि ) २, बृहती २, नितम्व २ । ये कालान्तर प्राणहर मर्म होते है ॥ १० ॥
विमर्श: -- सब मिलकर ३३ कालान्तर प्राणहर मर्म
होते है ।
उत्क्षेपौ स्थपनी चैव विशल्यघ्नानि निर्दिशेत् ॥ ११ ॥ ।
मर्माणि नाम मांससिरास्नाय्वस्थिसन्धिसन्नि • पाताः तेपु स्वभावत एव विशेपेण प्राणास्तिष्ठन्ति; तस्मान्मर्मस्वभिहतास्तांस्तान् भावानापद्यन्ते ॥ १६ ॥
मर्म का लक्षण - मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि और सन्धि इनका एकत्र होना यह ममां का लक्षण है । इन ममों में ही स्वाभाविक प्रकार से प्राण रहते हैं । इस लिये ममों के ऊपर आघात होने से शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि इन्द्रियायों का ज्ञान नष्ट हो जाता है और मन तथा बुद्धि बदल जाती है । दूसरे विद्वानों का कहना है कि भ्रम, प्रलाप ( असंबद्ध भाषण ), पतन ( गिरना ) और प्रमोह ये लक्षण होते हैं ॥ १६ ॥
विमर्श - मर्म की व्याख्या अध्याय के प्रारम्भ में अच्छी प्रकार दी गयी है । तत्र सद्यः प्राणहाण्याग्नेयानि, अग्निगुणेष्वाशु क्षीणेपु क्षपयन्ति । कालान्तरप्राणहराणि सौम्याग्नेयानि, अग्निगुणे प्वाशु क्षीणेपु क्रमेण च सोमगुणेषु कालान्तरेण क्षपयन्ति । विशल्यप्राणहराणि वायव्यानि शल्यमुखावरुद्धो यावदन्तर्वायुस्तिष्ठति तावज्जीवति उद्धृतमात्रे तु विशल्यध्न मर्म - उत्क्षेप २ और स्थपनी १। ये तीन मर्म । शल्ये मर्मस्थानाश्रितो वायुर्निष्क्रामति, तस्मात् स-विशल्यप्न होते हैं ॥ ११ ॥
विमर्शः - जिसमें शल्य रहने तक प्राण रहते हैं, किन्तु शल्य निकालने पर मृत्यु होती है; वे विशल्यघ्न मर्म है ।
लोहिताक्षाणि जानूर्वी कूर्चविटपकूर्पराः ।
कुकुन्दरे कक्षधरे विधुरे सकृकाटिके ॥ १२ ॥
सांसफलका पाना नीले मन्ये फणौ तथा ।
वैकल्यकरणान्याहुरावर्ती द्वौ तथैव च ॥ १३ ॥
वैकल्यकर मर्म - लोहिताक्ष ४, आणि ४, जानु २, ऊर्वी ४, कूर्च ४, विटप २, कूर्पर २, कुकुन्दर २, कक्षधर २, विधुर २, कृकाटिका २, अस २, अंसफलक २, अपांग २, नीला २, मन्या
२, फण २, आवर्त्त २ । ये वैकल्यकर मर्म है ॥ १२-१३ ॥
विमर्श - चैकल्यकर ( विकलता करने वाले मर्म ) सख्यामे ४ होते हैं ।
गुल्फौ द्वौ मणिबन्धौ द्वौ द्वे द्वे कूर्चशिरांसि च ।
जाकराणि जानीयादष्टावेतानि बुद्धिमान् ॥ १४ ॥।
रुनाकर मर्म -- गुल्फ २, मणिवन्ध २, कूर्चशिर ४, ये आठ मर्म जाकर ( पीडा देने वाले ) समझना चाहिये ॥ १४ ॥
विमर्श. -- वैकल्यकर और रुजाकर ममों में भेद निम्न प्रकार है । वैकल्यकर स्थायी विकार पैदा करते हैं किन्तु पीढाकर मर्म केवल पीडा ही पैदा करते हैं, स्थायी विकृति
उत्पन्न नहीं करते है ।
क्षिप्राणि विमात्राणि घ्नन्ति कालान्तरेण च ॥ १५ ॥
क्षिप्र मर्म का लक्षण - चित्र मर्म वेधन मात्र से ही कई दिनों के पश्चात् मृत्यु लाते है ॥ १५ ॥
विमर्श - इस मर्म में चोट आना ही मृत्युका विप्रकृष्ट कारण हो जाता है । शल्यो जीवत्युदुद्धृतशल्यो म्रियते । ( पाकात्पतितशल्यो वा जीवति ) वैकल्यकराणि सौम्यानि, सोमो हि स्थिरत्वाच्छे-त्याच्च प्राणावलम्बनं करोति । रुजाकराण्यग्निवायु गुणभूयिष्ठानि, विशेषतश्च तौ जाक, पाश्र्चभौतिकीच रुजामाहुरेके ॥ १७ ॥
मर्मों के साथ महाभूतों का सम्बन्ध - सद्यः प्राणहर मर्म आग्नेय होते हैं । अग्निगुण शीघ्र कम होने के कारण शरीर को नष्ट कर देते हैं । कालान्तर प्राणहर मर्म सौम्य ( सोम - जल - सम्बन्धी ) और आग्नेय ( अग्नि सम्बन्धी ) होते हैं । अग्निगुण शीघ्र कम होने से और सोम गुण शनैः २ कम होने के कारण ये कालान्तर से प्राण लेते है । विशल्यप्राणहर मर्म. -ये मर्म वायव्य होते है । इन मम में मुख में शल्य के होने से जब तक वायु रुकी रहती है ra तक प्राणी जीवित रहता है किन्तु शल्य निकालने मात्र से मर्मस्थान से वायु निकल जाती है इसीलिये यावत् | कालपर्यन्त शल्य रहता है तब तक ( पुरुष ) जीवित रहता है किन्तु शल्य निकालने से मृत्यु को प्राप्त होता है । ( व्रण का पाक होने पर शल्य निकल जायगा तो जीवित रहता है ) वैकल्यकर मर्म -- सौम्य गुण वाले होते है । सोम स्थिर होने के कारण और शैत्य के कारण प्राणों का अवलम्वन करता है । रुजाकर मर्म अग्नि और वायु गुण युक्त होते हैं । अग्नि और वायु विशेष प्रकार से पीडा करने वाले होते है । | कई आचायों के मत में रुजा पाञ्चभौतिक ( पाच भूतों से सम्बन्ध रखने वाली ) होती है ॥ १७ ॥
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अध्याय 1 शारीरस्थानम् ५३ विमर्श. - यद्यपि सर्व मर्म प्राण लेने वाले होते हैं तथापि कालान्तर प्राणहर वगैरह भेद उन ममों की विशेषता बताते है । सर्व ममों में सोम, मारुत, तेज, तथा सत्व, रज और तम, एवं भूतात्मा रहता है तो भी तेजोगुण, जलीय गुण इत्यादि गुण अधिकता से उन ममों में विद्यमान रहने के कारण भिन्न बताये गये हैं । केचिदाहुमोसादीनां पनानामपि समस्तानां विवृद्धानां ( समवृद्धानां ' पा ० ' ) च समवायात् सद्यः-प्राणहराणि, एकहीनानामल्पानां वा ( च ' पा ० ' ) कालान्तरप्राणहराणि द्विहीनानां विशल्यप्राणहराणि ( विशल्यध्नानि ' पा ० ' )
त्रिहीनानां वैकल्यकराणि, एकस्मिन्नेव रुजाकराणीति ।
नैवं यतोऽस्थिमर्मस्वप्यभिहतेषु शोणितागमनं भवति ॥
अन्य आचार्यों का मत — कई आचायों का मत है ि मांसादि पांचों के समान प्रकार से एकत्र संयोग होने और बढ़ने पर सद्य प्राणहर मर्म होते हैं । कालान्तर प्राणहर मर्म एक कम अर्थात् चार रचना के मेल से होते हैं या पांचों रचना अल्प प्रकार से मिलने से कालान्तर प्राणहर मर्म होते हैं । पांचां में से दो कम अर्थात् तीन रचना का सयोग होने से विशल्य प्राणहर मर्म होते है । तीन कम मर्मों का अर्थात् दो का संयोग होने से वैकल्य-कर नर्म होते हैं । खाली एक ही प्रकार की रचना ( मांसादि ) का होना यह रुजाकर मर्म है । उपर्युक्त मत ठीक नहीं क्योंकि अस्थि मर्म पर ताडन होने पर भी रक्त का आगमन होता है अर्थात् ममाँ में मांसादि पांचों प्रकार होते हैं । अन्यथा खाली हड्डियों पर चोट लगने से रक्त कैसे आता १ ॥१८ ॥
विमर्शः - प्रत्यक्ष ढेखने पर ऐसा कोई मर्म नहीं दीखता है जो मांस, शिरा, स्नायु आदि से हीन हो । अस्थियां वि होने पर रक्त निकलता है अर्थात् उस जगह मांस और शिराओं का सम्बन्ध तो अवश्य ही मानना पडेगा । अतः सर्व ममों में मांस, शिरा, स्नायु, इत्यादि पांचों वस्तुओं को मानना ही पड़ता है । भवति चात्र-चतुर्विधा यास्तु सिराः शरीरे प्रायेण ता मर्मसु सन्निविष्टाः । स्नाय्वस्थिमांसानि तथैव सन्धीन् सन्तर्प्य देह प्रतिपालयन्ति ॥ ( यापयन्ति पा ० ) ॥ १६ ॥
उपर्युक्त विधान की पुष्टि - जो चार प्रकार की सिरायें शरीर में विद्यमान हैं । वे बहुशः मर्म स्थानों में प्रविष्ट होती हैं और स्नायु, अस्थियां, मांस और सन्धियां इनको पुष्ट करती हुई देह का पालन करती हैं ॥ १ ९ ॥ विमर्श - चार प्रकार की शिरायें ( वातवह, पित्तवह, कफवह और रक्तवह ) इस प्रकार से होती है । ततः क्षते मर्मणि ताः प्रवृद्धः समन्ततो वायुरभिस्तृणोति । विवर्धमानस्तु स मातरिश्वा रुजः सुतीघ्राः प्रतनोति काये ॥ २० ॥
रुजाभिभूतं तु ततः शरीरं
प्रलीयते नश्यति चास्य संज्ञा ।
अतो हि शल्यं विनिहर्तुमिच्छन्-मर्माणि यत्नेन परीक्ष्य कर्पेत् ॥ २१ ॥
शल्य चिकित्सा में मर्मों की रक्षा करनी चाहिये - मर्म में चोट आने पर कुपित हुई वायु चारों ओर से ( उन शिराओं को ) ढक लेती है । इस प्रकार प्रवृद्ध हुई वायु शरीर में खूब वेदनाओं को उत्पन्न करती है । रुजा के पश्चात् शरीर सुन्न होता है । अनन्तर शरीर की संज्ञा नष्ट होती है । अतः शल्य निकालने की इच्छा करने वाले लोगों को प्रयत्नपूर्वक मर्मों की रक्षा करके शल्य निकालना चाहिये ॥ २०-२१ ॥ विमर्श - ' ता. प्रवृद्ध: ' इस स्थल में ' तासु प्रवृद्ध ' ऐसा भी पाठ -भेद है । शिराओं मे क्रुद्ध हुई वायु प्रथम पाच-भौतिक शरीरयन्त्र को विघटित करती है । पश्चात् संज्ञा
नाश होता है ।
एतेन शेपं व्याख्यातम् ॥ २२ ॥
कुपित कफ - पित्तों का लक्षण - वायु के लक्षणों के समान पित्त और कफ के भी लक्षण पैदा होते हैं । अत. मर्मों की परीक्षा अच्छी तरह करना उचित है ॥ २२ ॥
विमर्शः - पित्त के लक्षण दाह, चोप, औरण्य इत्यादि होते हैं । कफ के लक्षण स्रोतोनिरोध, तन्द्रा आदि उत्पन्न होते है । अतएव दोप कुपित न हो किन्तु शल्योद्धरण हो । ऐसी व्यवस्था होने के लिये ममो का भलीप्रकार ज्ञान आवश्यक है । एक प्रकार के मर्म दूसरे मम के समान भी कारणवश कार्य करते हैं ॥ तत्र सद्यः प्राणहरमन्ते विद्धं कालान्तरेण मारयति । कालान्तरप्राणहरमन्ते विद्ध वैकल्यमापादयति । विशल्यध्नं वैकल्यकरं च भवति । वैकल्यकरं कालान्तरेण क्लेशयति रुजां रुजाकरमतीव्र वेदनं भवति ॥ २३ ॥
सद्यः प्राणहर ममाँ के समीप आवात होने ' मृत्यु होती है । कालान्तर प्राणहर मर्मों के समीप विद्ध विकलता पैदा करते हैं । विशल्यन मर्म ( के समीप विघात होने करने वाला होता है । वैकल्यकर मर्मों के समीप चोट लगने से में पीड़ा देते हैं और वेदना उत्पन्न करते हैं । जाकर ममों के समीप आघात होने से पीडा न देते हुवे थोडी तकलीफ देते है ॥ २३ ॥
विमर्श: - ममों के बगल में चोट आने च करोति से कालान्तर होने से मर्म से ) विकल वे कालान्तर वे मर्म तीव्र से वे अपने तकलीफ देने के कार्य भलीप्रकार नही कर सकते किन्तु यदि वे ही मर्मों पर बीच मे आघात अच्छी तरह हो जावे तो वे अपना कार्य शीघ्र कर ढालते है ।
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५४ सुश्रुतसंहिता उसी प्रकार निम्न श्रेणियों के ममों में विशेष जोर के भाघात होंगे तो वे अपने सदृश कार्य न करते हुए उच्च माँ के जो कार्य है वे करते हैं । जैसे रुजाकर ममों का काम पीडा देना है, तथापि वे मर्म अपने से उच्च मर्म जो वैकल्यकर है, उनके तुल्य काम कर देते है । तात्पर्य यह है कि उच्च श्रेणी के मर्म कम आघातों से या समीप में आघात होने से जैसे निम्न श्रेणी के ममों का काम करते हैं, उसी प्रकार निम्न श्रेणी के मर्म भी आघात के तरतम भेद से अपने से उच्च श्रेणियों के कार्य कर सकते हैं । तत्र सद्यःप्राणहराणि सप्तरात्राभ्यन्तरान्मारयन्ति, कालान्तर प्राणहराणि पक्षान्मासाद्वा, तेध्वपि तु क्षिप्राणि कदाचिदाशु मारयन्ति, विशल्यप्राणहराणि वैकल्यकराणि च कदाचिदत्यभिइतानि मारयन्ति ॥ २४ ॥
मर्मों का कार्य करने का काल - सद्य प्राणहर मर्म सात दिन के भीतर मारते है । कालान्तर प्राणहर मर्म एक पक्ष ( १५ दिन ) में अथवा एक महीने मे मार डालते है । कालान्तर प्राणहर ममाँ में भी क्षित्र नामक मर्म कढाचित् शीघ्र ही मार देता है । विशल्य, प्राणहर तथा वैकल्य र ममों पर कदाचित् विशेष आघात होने से वे ( मर्म ) मार देते है ॥ २४ ॥
विमर्श -यहां रुजाकर ममों का काल नहीं बताया है । उनकी कार्य करने की शक्ति विशल्य, प्रागहर तथा वैकल्यकर मर्मों के समान समझना चाहिये । यदि विशल्य, प्राणहर, वैकल्यकर और रुजाकर ममपर गहरी चोट न आवे तो मृत्यु प्राप्त नहीं होती है । अत ऊर्ध्व सक्थिमर्माणि व्याख्यास्यामः । ( अ ) तत्र पादस्यांगुष्ठाङ्गुल्योर्मध्ये ' क्षिप्र ' नाम मर्स, तत्र विद्धस्याक्षेपेण मरणम् । ( आ ) मध्यमाङ्गुलिमनुपूर्वेण मध्ये पादतलस्य तलहृदय नाम, तत्र रुजाभिर्मरणम् । ( इ ) क्षिप्रस्योपरिष्टादुभयतः कूर्चो नाम, तत्र पादस्य भ्रमणवेपने भवतः । ( ई ) गुल्फसन्धेरच उभयतः कूर्च्चशिरो नाम, तत्र रुजाशोफौ । ( उ ) पादजङ्घयोः सन्धाने गुल्फो नाम, तत्र रुजः स्वव्घपादता खञ्जता वा । ( ऊ ) पाणि प्रति जङ्घामध्ये इन्द्रवस्तिर्नाम, तत्र शोणितक्षयेण मरणम् । ( ए ) जङ्घोव. सन्धाने जानु नाम, तत्र खञ्जता । ( ऐ ) जानुन ऊर्ध्वमुभयतस्त्र्यंगुलमाणी नाम, तत्र शोफाभिवृद्धिः स्तव्ध सक्थिता च । ( ओ ) ऊरुमध्ये ऊर्जा नाम, तत्र शोणितक्षयात् । सक्थिशोषः । ( औ ) ऊर्ध्या ऊर्ध्वमधो वक्षणसन्धेरुरुमूले । लोहिताक्षं नाम, ( ऊरुमूले लोहिताख्यं ' पा ० ' ) । ar लोहितक्षण मरणं पक्षाघातो वा । ( अं ) वङ्क्षणवृपणयोरन्तरे विटपं नाम, तत्र पाण्ड्यमल्पशुक्रता वा भवति । एवमेतान्येकादश सक्थिमर्माणि व्याख्यातानि । एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ । विशेषतस्तु यानि सक्थिन गुल्फजानुविटपानि तानि बाहौ मणिबन्धकूर्परकक्षधराणि । यथा वक्षण - वृषणयोरन्तरे विटपमेवं वक्षः कक्ष-योर्मध्ये कक्षधरं तस्मिन् विद्धे त एवोपद्रवाः । विशेष · तस्तु मणिबन्धे कुण्ठता, कूर्पराख्ये कुणिः, कक्षघरे पक्षाघातः । एवमेतानि चतुश्चत्वारिशच्छाखासु मर्माणि व्या • ख्यातानि || २५ || सधि ( शाखाओं ) के मर्म और उन पर आघात होने पर होने वाले उपद्रव - इसके पश्चात् सक्थि ( शाखाओं ) के मर्मों का वर्णन दिया जाता है । ( अ ) पैर का अंगूठा और समीपस्थ अङ्गुलि के मध्य भागने ' चित्र ' नामका मर्म है । इस मर्म पर आघात होनेसे ( आक्षेपसे ) मृत्यु होती है । ( आ ) मध्यमा अड्गुलिके अनुसार पावके मध्य प्रदेश में तलहृदय नाम का मर्म विद्यमान है । उसके विद्ध होनेपर पीडार्भोसे मृत्यु होती है । ( इ ) क्षिप्र मर्मके ऊपर दोनों ओर कूर्व नामक मर्म है । उसमें भावात होनेपर पैर तिरछा होता है और उसमें कम्प पैदा होता है । ( ई ) गुल्फ सन्धिके नीचे दोनों ओर ( दोनों वगल ) ' कूर्चशिर ' नामका मर्म है । उस जगह विद्ध होनेसे वेदना और सूजन उत्पन्न होते हैं । ( उ ) पैर और जङ्घा की सन्धियोंमें ' गुल्फ ' नामका मर्म है | वहां पर विद्ध होनेसे पीडा और पादस्तब्धता ( पैरमें जकड़न ) अथवा खञ्जता ( लंगडापन ) पैदा होती है । ( ऊ ) पाणि और जङ्घाके मध्य भागमें ' इन्द्रवस्ति ' मर्म है । उस मर्म पर आघात होनेसे रक्त का निर्गम होकर मृत्यु होती है । ( ए ) जङ्घा और ऊरु के जोडपर ' जानु ' मर्म है । वह मर्म विद्ध होनेसे खञ्जता ( लड्गडापन ) होती है । ( ऐ ) जानु ( घुटना ) के ऊपर तीन अड्डुल दोनों ओर ' आणी ' नामक मर्म है । इस पर चोट लगने से शोफकी वृद्धि होती है और पैर जकड जाता है । ( ओ ) ऊरुके मध्य भागमें ' ऊर्वी ' नामक मर्म है, वह विन्द्ध होनेसे रक्त का क्षय होकर पैर सूखता है । ( औ ) ऊर्वी नामक मर्मके ऊपर और वंक्षण सन्धिके नीचे करकी जडमें ' लोहिताक्ष ' नामका मर्म है । वह विद्ध होनेपर खून का निर्गम होकर मृत्यु अथवा पक्षाघात ( Paralysis ) होता है ।
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श्रध्यायः I ६ ] शारीरस्थानम् ५५ ( अं ) वडक्षण और वृपण के मध्य में ' विटप ' नामका मर्म है । वह विन्दु होनेसे पाण्डय ( नपुंसकता ) अथवा अल्पशुक्रता पैदा होती है । इस प्रकार पैरोंके ११ ममका वर्णन हो चुका है । इसी प्रकार दूसरे पैर और दोनों बाहुओं का वर्णन समझना चाहिये । पैरके मर्म और बाहुओं के ममों में इतनी ही विशेषता है कि जहाँ पैर में गुल्फ, जानु और चिटप ये मर्म हैं वहां बाहुओं में मणिबन्ध, कूर्पर और कक्षधर नामक मर्म हैं । जैसे वंक्षण और वृपर्णी के बीच में विटप नामका मर्म है, उसी प्रकार वक्ष स्थल और कक्षा के बीच में ' कक्षधर ' नामक मर्म है । उसमें विद्ध होने से विटपादि ममों के विद्ध होने के समान लक्षण पैदा होते हैं । मणिबन्ध विद्ध होने पर विशेषतया हाथ रुकते हैं । कूर्पर ( कोहनी ) में विद्ध होने से लूलापन और कक्षधर मर्म विद होने पर पक्षाघात
( Paralysis ) उत्पन्न होता है ।
इस प्रकार शाखाओं में ४४ मर्मों का वर्णन किया है ॥२५ ॥
अत ऊर्ध्वमुदरोरसोर्मर्माण्यनुव्याख्यास्यामः । ( अ ) तत्र बात - वर्चो - निरसनं स्थूलान्त्रप्रतिबद्धं गुदं नाम मर्म, तत्र सद्योमरणम् । ( आ ) अल्पमांसशोणितोऽभ्यन्तरतः कट्यां मूत्रा यो वस्तिर्नाम तत्रापि सद्यो मरणमश्मरीत्रणाहते, तन्त्राप्युभयतो भिन्ने न जीवति, एकतो भिन्ने मूत्र-स्राव व्रणो भवति, स तु यत्नेनोपक्रान्तो रोहति । ' ( इ ) पक्कामाशययोर्मध्ये सिराप्रभवा नाभिः, तत्रापि सद्यो मरणम् । ( ई ) स्तनयोर्मध्यमधिष्ठायोरस्यामाशयद्वारं स-त्वरजस्तमसामधिष्ठानं हृदयम् । तत्रापि सद्य एव मरणम् । ( उ ) स्तनयोरधस्ताद् द्वन्यङ्गुलमुभयतः स्तन-मृले, तत्र कफपूर्णकोष्ठतया ( कासश्वासाभ्यां ) म्रियते । ( ऊ ) स्तनचूचुकयोरूर्ध्वं द्वयङ्गुलमुभयतः स्तन · रोहितौ ( स्तन चूचुकयोर्मध्ये स्तनरोहितौ ' पा ० ' ), तत्र लोहितपूर्णकोष्ठतया ( कासश्वासाभ्यां च म्रियते । ( ए ) अंसकूटयोरधस्यात् पार्श्वोपरिभागयोरप-पौ नाम, तत्र रक्तेन पूयभावं गतेन मरणम् । ( ऐ ) उभयत्रोरसो नाड्यौ वातवहे अपस्तम्भौ
नाम, तत्र वातपूर्णकोष्ठतया कासश्वासाभ्यां च मरणम् ।
एवमेतान्युदरोरसोर्द्वादश मर्माणि व्याख्यातानि ॥ २६ ॥
पेट और छाती के मर्म तथा उनके विद्ध होने पर पैदा होनेवाले उपद्रवः — इसके पश्चात् उदर और उर ( वक्षःस्थल ) के मम की व्याख्या करेंगे । 1 ( अ ) गुदमर्म - वायु और वर्च ( मल - पाखाना ) इनको निकालने वाला तथा स्थूलान्त्र ( Large intestine ) बृहदन्त्र में लगा हुआ रहता है । उस जगह वेधन होने से तत्काल मृत्यु होती है । ( आ ) वस्तिमर्म अल्प मांस और अल्प शोणित युक्त होता है और वह अन्दर की ओर कटि प्रदेश में रहता है और मूत्र का आशय ( स्थान ) है । यह मर्म अश्मरी ( पथरी ) के व्रण के अतिरिक्त अन्य ब्रणों से विद्ध होने पर तत्काल मृत्यु करता व्रण भी वस्ति के दोनों ओर होगा तो मृत्यु । वस्ति मर्म के एक तरफ व्रण होने से मूत्र का वाला व्रण होता है । यह व्रण चिकित्सा करने ठीक होता है । ( इ ) पक्वाशय और आमाशय के मध्य में उत्पत्तिस्थान ' नाभि ' नामक मर्म है । उसके भी प्राणी तत्काल मृत्यु को प्राप्त करता है । है । अश्मरी हो जायगी । स्त्रवण करने पर कष्ट से शिराओं का विन्द्ध हो ( ई ) ' हृदय ' नामक मर्म दोनों स्तनों के मध्य में वक्षः-स्थल में रहता है । वह सत्व, रज और तमोगुणों का स्थान है । आमाशय के द्वार के समीप रहता है । वहां भी विद्ध होने से तत्काल मृत्यु हो जाती है । ( उ ) स्तनमूलः – ये दो मर्म, स्तनों के दो अंगुल नीचे, दोनों ओर रहते हैं । उनमें कफ से कोष्ठ पूर्ण होने से ( कास । और श्वास से ) मृत्यु होती है । ( ऊ ) स्तनरोहितः - स्तनच्चुकों के ऊपर दोनों ओर स्तनरोहित नाम के दो मर्म हैं । उनमें रक्त से कोष्ठ भर जाने पर श्वास और कास से मृत्यु होती है । ( ए ) अपलाप नामक दो मर्म अंसकूटों के नीचे और पार्श्वभागों के ऊपर होते हैं । उन मम का रक्त पूयरूप होने से मृत्यु होती है । ( ऐ ) अपस्तम्भ नामक दो मर्म, छाती के दोनों ओर वात को वहन करने वाली जो नाडियां होती हैं, उन्हें कहते हैं । इन मम में वायु से कोष्ठ पूर्ण होने के कारण, श्वास और कास से मृत्यु होती है । इस प्रकार उदर और उरस् ( छाती ) के वारह ममाँ का वर्णन किया गया है ॥ २६ ॥
विमर्श: - ( १ ) गुदा मर्म ( Rectum ) ( २ ) वस्ति मर्म ( Bladder ) ( ३ ) नाभि मर्म ( Umbilical ) ( ४ ) हृदय मर्म ( Heart ) ( ५, ६ ) स्तनमूल ( Root of the lungs ) ( ७, ८ ) स्तनरोहित मर्म ( Base of lung ) ( ९, १० ) अपलाप ( Apex of lungs ) ( ११, १२ ) अपस्तम्भ मर्म ( Branchu ) अत ऊर्ध्व पृष्ठमर्माणि व्याख्यास्यामः । ( अ ) तत्र पृष्ठवंशमुभयतः प्रतिश्रोणिकाण्डम-स्थिनी कटीकत रुणे, तत्र शोणितक्षयात् पाण्डुविवर्णो हीनरूपश्च म्रियते । ( आ ) पार्श्वयोर्जघनबहिर्भागे पृष्ठवंशमुभयतः कुकुन्दरे, तत्र स्पर्शाज्ञानमधः काये चेष्टोपघातच । ( इ ) श्रोणिकाण्डको रुपर्याशयाच्छादनौ पार्श्वा-न्तरप्रतिबद्धौ नितम्बौ, तत्राधः कायशोषो दौर्बल्याच्च मरणम् ।
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५६ सुश्रुतसंहिता ( ई ) अधःपार्श्वान्तरप्रतिबद्धौ जघनपार्श्वमध्ययो. स्तिर्यगूर्ध्व च जघनात् पार्श्वसन्धी, तत्र लोहितपूर्ण कोष्ठता म्रियते । ( 3 ) स्तनमूलाद्यजूभयतः पृष्ठवंशस्य वृहत्यो नाम, तत्र शोणितातिप्रवृत्तिनिमित्तैरुपद्रवै म्रियते । ( ऊ ) पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतस्त्रिकसंबद्धे श्रंस-फल के नाम, तत्र बाहोः स्वापशोपौ । ( ए ) बाहुमूर्ध - प्रीवामध्येऽसपीठ -स्कन्ध - निब-न्धनावं सौ नाम, तत्र स्तब्धबाहुता । एवमेतानि चतुर्दश पृष्ठमर्माणि व्याख्यातानि ॥ २७ ॥
पृष्ठ मर्म - अपृष्टमों का वर्णन करेंगे । ( अ ) पृष्ठवंशों से दोनों ओर प्रत्येक श्रोणिकाण्ड में कीकतरुण नामक अस्थिमर्म हैं । यहाँ पर विद्व होने से रक्त का क्षय होकर शरीर पाण्डु, विवर्ण और होनरूप होकर मृत्यु हो जाती है । ( आ ) कुकुन्दर नामक मर्म पृष्ठवंश के दोनों ओर जघन के बाह्य भागों में रहते हैं । यहाँ पर चोट आने से स्पर्श ज्ञान नष्ट होता है और शरीर के अधोभाग की चेष्टाओं का नाश होता है । ( इ ) नितम्ब नामक मर्म श्रोणिकाण्ड के ऊपर आशयों ( मूत्राशय और मलाशय ) को ढकने वाले, पार्श्वोको बाँधे होते है ये मर्म विन्दु होनेसे अधः काय ( नीचे का शरीर ) सूर जाता है और दुर्बलता होकर मृत्यु प्राप्त होती है । ( ई ) पार्श्वसन्धि नामक मर्म पावोंके नीचे लगे हुए, जघन और पाश्र्वों के बीच में, जघन के ऊपर और तिरछे होते है । उनमें रक्त कोष्ठ भरने पर मृत्यु प्राप्त होती है । ( उ ) बृहती मर्म. -- स्तनमूलके सीधे, पृष्ठवंशके दोनों ओर बृहती नाम के मर्म हैं । इनके विन्दु होनेसे रक्त का अधिक निर्गम होकर मृत्यु हो जाती है । ( ऊ ) असफलष्ठवं दोनों ओर पीठ के ऊपर, त्रिकास्थि की रेखा में लगे हुए हैं । उनपर चोट आनेसे चे सुन और शुष्क हो जाते हैं । ( प ) ' अंस ' नामक मर्म - बाहुमूर्ध ( कन्धा ) और ग्रीवा मध्य भागमें, अंसपीठ और स्कन्ध को बाँधने वाले ' स ' नामका स्नायु मर्म है । इन पर चोट आनेसे बाहु
जकड़ जाते हैं ।
इस प्रकार १४ पृष्टममका व्याख्यान गया है ॥ २७ ॥
विमर्शः -- प्रत्येक मर्म दो दो होनेसे १४ मर्म हो जाते है । अत ऊर्ध्वमूर्ध्वजगतानि व्याख्यास्यामः । ( अ ) तत्र कण्ठनाडीमुभयतश्चतस्रो धमन्यो द्वे नीले द्वे च मन्ये, व्यत्यासेन तत्र मूकता - स्वर वैकृत-माहिता च । ( आ ) ग्रीवायामुभयतश्चतस्रः ( चतस्रः चतस्रः ' पाठ ' ) सिरामातृकाः, तत्र सद्यो मरणम् । ( इ ) शिरोग्रीवयोः सन्धाने कृकाटिके, तत्र चलमूर्द्धता । ( ई ) कर्णपृष्टतोऽधः संश्रिते विधुरे, तत्र बाधिर्यम् । ( उ ) घ्राणमार्गमुभयतः स्रोतोमार्ग प्रतिबद्धे अभ्य न्तरतः फणे, तत्र गन्धाज्ञानम् । ( ऊ ) भ्रूपुच्छान्तयोरधोऽक्ष्णोर्वा हातोपानी, तत्रान्ध्यं दृष्टपघातो वा । ( ए ) भ्रुवोरुपरि निम्नयोरावत नाम, तत्राप्या-न्ध्यं दृष्टपघातो वा । ( ऐ ) भ्रुवोरन्तयोरुपरि कर्णललाटयोर्मध्ये शंखौ, तत्र सद्योमरणम् | ( ओ ) शंखयोरुपरि केशान्त उत्क्षेपो, तत्र सशल्यो जीवेत, पाकात् पतितशल्यो वा, नोद्धृत • शल्यः । ( ओ ) भ्रत्रोमध्ये स्थपनी, तत्रोत्क्षेपवत; ( अं ) पञ्च सन्धयः शिरसि विभक्ताः सीमन्ता नाम, तत्रोन्मादभय - चित्तनाशैर्मरणम् । ( अ ) प्राण - श्रोत्रा - क्षि- जिल्हा - संतर्पणीनां सिरा-णां मध्ये सिरासन्निपातः शृङ्गाटकानि तानि चत्वारि मर्माणि तत्रापि सद्यो मरणम् । ( क ) मस्तकाभ्यन्तरत उपरिष्टात् सिरासन्धिस-निपातो रोमावर्तोऽधिपतिः, तत्रापि सद्य एव ( सद्यो मरणं पा ० ) । ahara सप्तत्रिशदूर्ध्वजयुगतानि मर्माणि व्याख्यातानि ॥ २८ ॥
ग्रीवाके ऊपर के मर्म --- ऊर्ध्वजत्रुगत ममाँ का वर्णन करते है । ( अ ) चार धमनियां - कण्ठनाढ़ी के दोनों ओर चार धमनियां है । उनमें दो नीला और दो मन्या । वे व्यत्यासेन ( चैपरीत्येन ) अर्थात् दोनों ओर एक एक है । उनमें चोट आनेने मूकस्व और विकृतस्वर तथा रसग्राहक शक्ति का । अभाव, ये दोप पैदा हो जाते हैं । ( आ ) ग्रीवाके दोनों ओर चार सिरा ' मातृका ' नामकी हैं । उनके विद्ध होनेसे तत्काल मृत्यु प्राप्त होती है । ( इ ) दो कृकादिका मर्म, शिर और ग्रीवाके सन्धि पर । हूँ । वहां पर भाघात होनेसे शिर हिलता रहता है । ( ई ) दो विधुर नामक मर्म, कानोंके पीछे और नीचे की ओर रहते है । उन पर चोट आने से वधिरता ( बहिरापन ) उत्पन्न होती है । ( उ ) दो फण मर्म, घ्राणमार्ग के दोनों ओर भीतर । स्रोतोमार्ग में लगे हुए होते हैं, उनके विद्ध होने पर गन्ध-| ज्ञान का अभाव होता है । ( ङ ) दो ' अपांग ' मर्मं, भ्रूपुच्छों के सिरों के नीचे और आंखों के बाह्य भाग पर रहते हैं । उनके विद्ध होने से अन्धता अथवा दृष्टि कम हो जाती है । ( ९ ) दो आवर्त नामक मर्मं भौहों के ऊपर निम्न भागों | पर रहते हैं, उनमें भी अभिघात होनेसे आन्ध्य अथवा दृष्टि का विघात होता है ।
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श्रध्यायः ६ ] शारीरस्थानम् ५७ ( ऐ ) दो शख नाम के ' मर्म भौंहों के अन्त पर, कान और ललाट के मध्य में होते है । उनमें विघात होने से । काल मृत्यु हो जाती है । ( ओ ) दो उत्क्षेप नाम के मर्म शंखों के ऊपर ' तथा वालों के समीप भागों में होते हैं । यदि उनमें शल्य रहने दें अथवा व्रणस्थान पक कर शल्य निकल जावे तो मृत्यु नहीं होती परन्तु यदि शल्य निकाला जाय तो जीवन नहीं रहता । ( औ ) भ्रुकुटियों के मध्य में स्थपनी नामक मर्म है, वहां भी विद्ध होने पर उत्क्षेप के समान कष्ट समझना चाहिये । ( अं ) शिर में सीमन्त नामक पाँच सन्धियाँ होती हैं, उनके विद्ध होने पर उन्माद, भय तथा चित्तनाश होकर मृत्यु होती है । ( अ ) शृङ्गाटक मर्म चार होते हैं । और वे घाण ( नासिका ), श्रोत्र ( कर्ण ), अक्षि ( नेत्र ) भौर जिह्वा -इनको सन्तर्पण करने वाली शिराओं के बीच में, शिराओं के समुदायात्मक हैं । उस जगह चोट आने पर भी सद्यः मृत्यु होती है । ( क ) अधिपति नाम का मर्म, मस्तक के भीतर ऊपर की ओर शिरा सन्निपात युक्त वालों के आवर्त ( चक्कर ) सहश होता है । यहाँ विद्ध होने से सद्यः मृत्यु होती है । इस प्रकार ऊर्ध्वजत्रुगत ३७ मर्मों की व्याख्या कर दी गयी है ॥ २८ ॥
विमर्शः – ४. धमनियां । ८. मातृका । २. कृकाटिका । २. वि २. फण २. आवर्त २. शंख २. उत्क्षेप १. स्थपनी ५. सीमन्त २. अपांग ४. शृङ्गाटक १. अधिपति मर्मों का प्रमाण - सब मिलाकर ३७ मर्म होते हैं । ' भवन्ति चात्र श्लोका: -ऊर्व्यः शिरांसि विटपे च सकक्षपार्श्व एकैकमङ्गुलमितं स्तनपूर्वमूलम् । विद्धयङ्गुलद्वयमितं मणिबन्धगुल्फं त्रीण्येव जानु सपरं सह कूर्पराभ्याम् ॥२६ ॥
हृद्वस्ति - कूर्च - गुद - नाभि वदन्ति मूर्ध्नि चत्वारि पञ्च च गले दश यानि च द्वे । तानि स्वपाणितलकुञ्चितसंमितानि शेषाण्यवेहि परिविस्तरशोऽङ्गुलार्धम् ॥ ३० ॥
एतत्प्रमाणमभिवीक्ष्य वदन्ति तज्ज्ञाः शस्त्रेण कर्मकरणं परिहृत्य कार्यम् ( मर्म ' पा ० ' ) । पार्श्वाभिघातितमपीह निहन्ति मर्म तस्माद्धि मर्मसदनं परिवर्जनीयम् ॥ ३१ ॥
उर्वी, शिर ( कूर्च शिर ), विटप, कक्ष ( कक्षधर ) पार्श्व, स्तन पूर्वमूल ( स्तनमूल ) ये एक एक अङ्गुल परिमित होते हैं । मणिबन्ध और गुल्फ ये दो दो अंगुल होते हैं । जानु, सपर ( दूसरा जानु ) और दो कूर्पर ( कोहनी ) इनका तीन प्रमाण होता है । हृदय, वस्ति, कूर्च, गुदा, नाभि और शिर में जो चार चार ( शृङ्गाटक ), पांच ( सीमन्त ) और गले में दस तथा ६ सु ० शा ० दो अर्थात् बारह ( दो नीला, दो मन्या, आठ मातृकायें ) हैं, वे हथेली के गढ्ढे के बराबर होते हैं । शेष मर्म को आधा अगुल लम्बा चौडा समझना चाहिये । यह प्रमाण जान कर मर्म को छोडकर शस्त्र कर्म करना चाहिये । चूँकि मर्मों के पार्श्व भागों में भी अभिघात होने पर मृत्यु होती हैं अतः मर्म स्थान छोड़ कर शस्त्र कर्म करना चाहिये ॥ २ ९ -३१ ॥, विमर्श: - मर्मों के आकार और उनके स्थान ( Position ) का शस्त्रकर्म वालों ( Surgeons ) को खूब ख्याल रखना चाहिये । छिन्नेषु पाणिचरणेषु सिरा नराणां सोमीयुरसृगल्पमतो निरेति । प्राप्यामितव्यसनमुग्रमतो मनुष्याः संच्छिन्नशाखतरुवन्निधनं नयन्ति ॥ ३२ ॥
. क्षिप्रेषु तत्र सतलेषु हतेषु रक्तं 1 गच्छत्यतीव पवनश्च रुजं करोति । एवं विनाशमुपयान्ति हि तत्र विद्वा वृक्षा इवायुधनिपातनिकृत्तमूलाः ॥ ३३ ॥
तस्मात्तयोरभिहतस्य तु पाणिपादं छेत्तव्यमाशु मणिबन्धनगुल्फ देशे ॥ ३४ ॥
1- शाखा नष्ट होने से मृत्यु नहीं होती- हाथ पैर काटने पर मनुष्यों की शिराओं ( Blood vessels ) के संकोच को प्राप्त होने के कारण थोडा सा रक्त बाहर निकलता है । यद्यपि ( हाथ पैर काटने पर ) पुरुष भयङ्कर सकट को प्राप्त होत है तथापि शाखा काटने पर भी जैसे तरु नष्ट नहीं होता उसी प्रकार पुरुष मृत्यु को प्राप्त नहीं होता । चित्र और तलहृदय मर्म विद्ध होने से रक्त अधिक आता है और वायु भी अधिक पीडा देती है । इस प्रकार के मर्म विद्ध होने से, आयुध के घावों से काटे हुए हैं मूल जिनके, ऐसे पेडों के समान मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है । इसलिये तलहृदय और क्षिप्र मर्म विद्ध होने पर मणि-वन्ध और गुल्फ प्रदेशों में हाथ और पैरों को काट डालना चाहिये ॥ ३२-३४ ॥ विमर्श: -मर्म कट जाने से रक्त का खूब निर्गमन होता है । अतः वह रक्त रोकने के लिये हाथ पैरों को काटने का प्रसग आवे तो काटकर रक्त की रक्षा करना श्रेयस्कर होता है । 1 मर्माणि शल्यविपयार्धमुदाहरन्ति यस्माच्च मर्मसु हता न भवन्ति सद्यः । जीवन्ति तत्र यदि वैद्यगुणेन केचित् ते प्राप्नुवन्ति त्रिकलत्वमसंशयं हि ॥ ३५ ॥
संभिन्न जर्जरित कोष्ठशिरःकपाला
जीवन्ति शस्त्रनिहतैश्च शरीरदेशैः ।
छिन्नैश्च सक्थिभुजपादकरैरशॆपै-येषां न मर्मसु कृता विविधाः प्रहाराः ॥ ३६ ॥
मर्मों का प्राधान्य- माँ पर आघात होने से deare मृत्यु होती है । अतः मर्म शल्य विषय ( Surgery ) का अर्ध भाग कहलाता है । यदि कोई चतुर वैद्य की चिकित्सा से जीवित भी रहे तो नि.सशय विकलता को प्राप्त होता है ।
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सुश्रुतसंहिता ५८ कोष्ट, शिर · कपाल, ये फूटकर जर्जरित हो गये हों, टाँग, छेदभेदाभिघातेभ्यो दहनाद्दारणादपि । , पैर और हाथ सम्पूर्ण भी कट गये हों, शस्त्रों के उपघातं विजानीयान्मर्मणां तुल्यलक्षणम् ॥ ४२ ॥
बाहु घातों से सर्व शरीर जर्जरित हो तो भी, ममों पर यदि छेद, भेद, वल्न इनसे होने वाले लक्षण - ममों के समीप घाव न हुए हों तो जीवित रह सकते हैं ॥ ३५-३६ ॥ भाग पर, छेदन, भेदन, अभिघात ( चोट ), जलन और विमर्श - मर्मों पर आघात होने से जीवित रहना ( फटना ) इन सबसे ममाँ के अनुरूप लक्षण होते हैं ॥ असंभव है । सव शरीर पर घाव होने से बच सकते हैं । दारण अतः ममों की रक्षा जीवन - रक्षा के लिये एक आवश्यक उपाय है । जिस प्रकार वस्ति यह काय चिकित्सार्धं उसी प्रकार मर्म यह शस्त्रक्रिया ( Surgery ) का अर्ध विषय है ।
सोम - मारुत - तेजांसि रज सत्त्वतमांसि च ।
मर्मसु प्रायशः पुंसां भूतात्मा चावतिष्ठते ॥
जीवन्ति शरीरिणः ॥ ३७ ॥
मर्मस्त्रभिहितास्वस्मान्न नर्मों नें त्रिगुण, भूतात्मा आदि रहते हैं - ममों में प्रायः । सोम ( जल ), भारत ( वायु ), तेज ( अग्नि ) [ त्रिदोष ] तथा सत्व, रज, तम ' और भूतात्मा रहते हैं । इसलिये माँ पर आघात होने से प्राणी जीवित नहीं रहते हैं ॥ ३७ ॥
विमर्श - यद्यपि तीनों शारीरिक और मानसिक दोष सर्व शरीर में विद्यमान हैं तथापि मर्म प्रदेशों में उनका आधिक्य रहता है | इसलिये भमों पर आघात होने से शारीरिक और मानसिक दोष कुपित होकर देह और मन को दूषित कर देते है | आधारभूत शरीर और मन उनका नाश होने मे भूतात्मा भी चला जाता है । इन्द्रियार्थेष्वसंप्राप्तिर्मनो बुद्धि - विपर्ययः 1 राजश्च विविधास्तीत्रा भवन्त्याशुहरे हते ॥ ३८ ॥
हते कालान्तरने तु ध्रुवो धातुक्षयो नृणाम् ।
ततो घातुक्षयाज्जन्तुर्वेदनाभिश्च नश्यति ॥ ३६ ॥
हते वैकल्यजनने केवलं वैद्यनैपुणाद् ।
शरीरं क्रियया युक्तं विकलत्वमवाप्नुयात् ॥ 8० ॥
जाकराणि मर्माणि क्षतानि विविधा रुजः ।
कुर्वन्त्यन्ते च वैकल्यं कुवैद्यवशगो यदि ॥ ४१ ॥
विविध नम पर आवान होने से उत्पन्न होने वाले लक्षण -आशु हर ( सद्य प्राणहर ) मर्मों पर नाघात होने से रूप, रसादि इन्द्रियायों का ज्ञान नहीं होता और मन तथा बुद्धि विपरीत होती है तथा विविध प्रकार की पीडा होती है । कालान्तर प्राणहर नमों पर आघात होने से धातुक्षय निश्चय होता है । धातुक्षय के पश्चात् वेदनाओं से प्राणी मरता है । वैकल्य कर नमों का व्यावात होने से केवल वैद्यों के नैपुण्य से शरीर क्रियायुक्त रहते हुए भी विकलता को प्राप्त होता है । विशल्यन मर्मों का विधात होने से पूर्वोक कारणों के अनुसार जानना चाहिये अर्थात् ' जब तक शल्य रहता है तब तक जीवित रहता है । ' इत्यादि । रुजाकर मर्मों पर आघात होने में नाना प्रकार की पीढ़ायें होती हैं । यदि अज्ञ वैद्यों द्वारा चिकित्सा की जाय तो विकलता को भी प्राप्त होता है ॥ ३८-११ ॥ विमर्श - पांचों प्रकारों के ममों के विद्व होने पर उत्पन्न होने वाले लक्षण बताये गये हैं । मर्माभिघातस्तु न कश्चिदस्ति योऽल्पात्ययो वाऽपि निरत्ययो वा । मर्मस्वभिताडितास्तु वैकल्यमृच्छन्त्यथवा म्रियन्ते ॥ ४३ ॥
मर्मों पर आघात कम उपद्रव वाले अथवा निरुपद्रव होते हों ऐसा नहीं है, किन्तु प्राय ' ममाँ पर विघात होने से विकलता अथवा मृत्यु अवश्य होती है ॥ ४३ ॥
विमर्श: - ममों पर आघात होने से विक्लता और मृत्यु अवश्य होती है । मर्माधिष्ठाय हि ये विकारा मूर्च्छन्ति काये विविधा नराणाम् ॥ प्रायेण ते कृच्छ्रतमा भवन्ति नरस्य यन्नैरपि साध्यमानाः ॥ 28 ॥
इति षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
-oopeçoo मर्मों के विकार कृच्छ्रसाध्य होते हैं - तथा लो कोई भी निज विकार मर्मों को आश्रय करते हुए शरीर में होते हैं, वे प्रयत्नपूर्वक चिकित्सा करने पर भी प्राय ' कृच्छ्रतम ( अत्यन्त क्टसाध्य ) होते हैं ॥ ४४ ॥
विमर्शः - ममों के विकार कष्टसाध्य होने से वैद्यों को । खूब प्रयत्नपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये । इति सुश्रुते शारीरस्थाने पष्ठोऽध्यायः समाप्त । ( १ ) ( २ ) ( ३ ) ( ४ ) । ( ५ ) ( ६ ) शारीरे प्रश्नाः-मर्मणः का व्याख्या? शल्यशास्त्रे कथ तेपा प्राधान्यम् । मर्मणा का सत्या? तेषा प्रकारा के? स्थानानि चकानि? तथा कोष्ठगनममंगा विवरणं कार्यम् । मर्मणा विधातेऽपि कथं न प्रागहानि.? दलि - कूर्च - गुद - नाभि वदन्ति मूर्ध्नि चत्वारि पद च गले दश यानि च द्वे । तानि स्वपाणितलकुञ्चितसमितानि शेषाण्यवेहि परिविस्तरशोऽङ्गुलोर्वम् ॥ अस्य टोकस्य व्याना विधेया । क्षिप्राधिपति - विधुर - विटपापलाप - स्थपनी - फणापस्तम्मा-पां वर्णनं कृत्वा, मर्मगामन्यासेन किं प्रयोजनन्? कस्मान्मर्मणा भेदः? सद्य. प्राणदराणि विशल्यप्तानि च कानि मर्माणि -0020400
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श्रध्यायः ७ ] शारीरस्थानंम् सप्तमोऽध्यायः अथातः सिरावर्णन - विभक्तिनाम शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब मिरावर्णन विभक्ति नामक शारीर अध्याय कहेंगे ।
जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि कह चुके हैं ॥ १-२ ॥
विमर्श'– सिरावर्णन विभक्ति की जगह सिरा - वर्ण-विभक्तिशारीरं ऐसा भी पाठभेद है । इस अध्याय में Angology का वर्णन किया है । सप्त शिराशतानि भवन्ति; याभिरिदं शरीरमा राम इव जलहारिणीभिः केदार इव च कुल्याभिरु परिनह्यतेऽनुगृह्यते चाकुञ्चनप्रसारणादिभिर्विशेषैः, द्रुमपत्रसेवनीनामिव तासां प्रतानाः, तासां नाभिर्मूलं ततश्च प्रसरन्त्यूर्ध्वमवस्तिर्यक् च ॥ ३ ॥
शिराओं की संख्या और दृष्टान्न - सात सौ शिरायें होती हैं । जलहारिणी ( करिया ) द्वारा जैसे आराम ( उपवन ) अथवा कुल्या ( छोटे जलमार्ग ) के द्वारा जिस प्रकार केदार ( खेत ) का उपस्नेहन होता है, उसी प्रकार शिराओं से यह शरीर पोषित होता है । पेड़ के पत्तों की सोवनियों के समान शिरायें फैली हुई होती हैं । उन शिराओं का मूल स्थान नाभि है । नाभि से ये शिरायें ऊपर, तिरछे और नीचे की ओर फैलती हैं । इन शिराओं द्वारा ( आकुचन, प्रसारणादि द्वारा ) शरीर का उपकार होता है ॥ ३ ॥
विमर्श ' यद्यपि शिरा हजारों होती हैं तो भी ७०० संख्या सामान्यतया बता दी गयी है । उपर्युक्त गद्य में तीन दृष्टान्त शिराओं के स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतम भेदों का निदर्शन करने के लिये है । शिराओं के द्वारा यदि सर्वदा शरीर पुष्ट होता ही रहता तो वृद्धावस्था में गात्र शिथिल नहीं होते । इसलिये समझना पडता है कि तारुण्य में इन शिराओं द्वारा पुष्टि मिलती है, किन्तु वृद्धावस्था में शरीर ' याप्य ' होता है, ' पुष्ट ' नहीं । ' प्रसारणादिभि. ' इस जगह आदि शब्द से स्वप्न, प्रबोध, भाषण इत्यादि कर्म समझने चाहिये | भवतश्चात्र लोकौ —
यावत्यस्तु सिराः काये संभवन्ति शरीरिणाम् ।
ताभ्यां सर्वा विवद्धास्ताः प्रतन्वन्ति-( प्रवर्तन्ते ' पा ० ' ) समन्ततः ॥४ ॥
नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणान्नाभिर्युपाश्रिता ।
सिराभिरावृता नाभिश्चक्रनाभिरिवारकैः ॥ ५ ॥
पुष्टि के श्लोक – शरीर में जितनी शिरायें हैं वे सब नाभि में ही लगी हुई हैं । उसी जगह मे सर्वत्र फैलती हैं । ( यह वर्णन गर्भावस्था का है ) । नाभि में प्राणियों के प्राण रहते हैं और प्राणों मे नाभि आश्रित है । शिराओं से नामि घिरी है जैसे पहिये की ( चक्र की ) नामि भरों द्वारा घिरी रहती है ॥ ४-५ ॥ विमर्श: - जिस प्रकार अरों पर चक्रनामि आश्रित रहती है और चक्रनाभि पर अरे आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार नाभि में प्राण रहते हैं और नाभि का आधार प्राण होते हैं । यहाँ पर प्राण शब्द से रक्त यह अर्थ अभिप्रेत है, क्योंकि नाभि के द्वारा ही रक्त का संवहन ( गर्भावस्था में ) हुआ करता है । इसी रक्तसंवहन पर भ्रूण का शरीर निर्भर होता है । यदि रक्तसंवहन रुक जावे तो भ्रूण नष्ट हो जाता है ॥ तासां मूलशिराचत्वारिशत्; तासां वातवाहिन्यो दश, पित्तवाहिन्यो दश, कफवाहिन्यो दश, दश रक्तवाहिन्यः । तासां तु वातवाहिनीनां वातस्थानगतानां पञ्च-सप्ततिशतं भवति, तावत्य एव पित्तवाहिन्यः पित्त-स्थाने, कफवाहिन्यश्च कफस्थाने, रक्तवाहिन्यश्च यकृत्प्लीह्वोः | एवमेतानि सप्त सिराशतानि भवन्ति ॥ ६ ॥
सात सौ सिराओं का विवरण- सात सौ शिराओं की । मूलशिरा ४० हैं । उनमें से दस वातवहा, दस पित्तवहा, दस कफवहा और दस रक्तवहा होती हैं । वातवह स्थानों में रहने वाली तथा वायु को वहन करने वाली शिरायें १७५ होती हैं । उतनी ही पित्तस्थान में पित्त को वहन करने वाली शिरायें होती है । इसी प्रकार कफ को | वहन करने वाली और कफ के स्थान में रहने वाली शिराएँ होती हैं । यकृत् ( जिगर ), प्लीहा ( तिल्ली ) इनमें उतनी ही रक्तवाहिनी शिरायें होती हैं ॥ ६ ॥
विमर्श - इस जगह मात सौ शिरा चार विभागों में विभक्त कर दी गई हैं । तत्र वातवाहिन्यः सिरा एकस्मिन् सक्थिन पञ्च-विंशतिः, एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ । विशे-पतस्तु कोष्ठे चतुस्त्रिशत्, तासां गुनमेदश्रिताः श्रोण्यामष्टौ द्वे द्वे पार्श्वयो ', पट् पृष्ठे, तावत्य एव चोदरे, दश वक्षसि । एकचत्वारिंशज्जत्रुण ऊर्ध्वं, तासां चतुर्दश ग्रीवायां, | कर्णयोश्चतस्रः, नव जिह्वायां, पण नासिकायां, अष्टौ नेत्रयोः " एवमेतत् पञ्चसप्ततिशतं वातवहानां सिराणां व्याख्यातं भवति ॥ ७ ॥
वानवह शिराओं का विभाग - प्रत्येक टांग में वातवाहिनी शिराये २५ हैं । इस प्रकार दूसरी टांग और बाहुओं में समक्ष लेना चाहिये । कोष्ठ में ३४ शिरायें होती हैं । इसमें से गुदा और मे ( शिक्ष ), इनको आश्रय करके श्रोणि में आठ शिरायें होती हैं । दो दो पार्श्वों में, छः पीठ में, पेट में उतनी ही, वक्षःस्थल दुस । के ऊपर ४१ शिरायें होती हैं । में, ४ कानों में, ९ जिद्दा में, ६ नासिका प्रकार वातवह शिरायें १७५ होती है ॥ विमर्श. - सक्थि में १०० कोट में ३४ १७ जत्रुके ऊपर ४१ होती उनमें से १४ गर्दन में, ८ आंखों में । इम ७ ॥ सर्व मिलाकर शिरायें है ।
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६० सुश्रुतसंहिता एप एव विभागः शेषाणामपि । विशेषतस्तु पित्त वाहिन्यो नेत्रयोर्दश, कर्णयोर्के, एवं रक्तवहाः कफ-वाच । एवमेतानि सप्त सिराशतानि सविभागानि व्याख्यातानि ॥ ८ ॥
शेष शिराओं का विभाग – शेष अर्थात्, पित्त, कफ और रक्तवह शिराओं का इसी प्रकार विभाग होता है । भेद इतना ही है कि नेन्नों में १० और कानों में २ पित्तवाहिनियाँ होती हैं । इसी प्रकार रक्तवहा और कफवहा शिराय समझना चाहिये । हमी प्रकार ७०० शिराओं का विभाग कहा गया है ॥ ८ ॥
विमर्श: - चारों प्रकारों की शिराओं का विभाग वता चुके हैं ।
क्रियाणामप्रतीघातममोहं कर्मणाम् ।
करोत्यन्यान् गुणांश्चापि स्वाः सिराः पवनश्चरन् ॥ ६ ॥
( यदा वायुरदुष्टस्तु सेवते स्ववहाः सिराः । तदा तु बलवणजः प्रसीदे व मनस्तथा || ' पा ' ० )
चदा तु कुपितो वायु ' स्वाः शिराः प्रतिपद्यते ।
तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते वातसंभवाः ॥ १० ॥
शिराचारी अकुपित और कुपित वायु का कार्य - वायु अपने शिराओं में कायिक और मानसिक कार्य ठीक प्रकार से चलाता है । बुद्धि के काम में भ्रम नहीं रहता । उसी प्रकार और भी दूसरे दूसरे गुणों को वायु करता है जिनका वर्णन स् अ. १५ में ' तत्र प्रस्पन्दनोद्वहनपूरण ' इत्यादि प्रकार से किया गया है 1 ( पाठभेद के अनुसार अदुष्ट वायु अपनी शिराओं में जब रहता है, तब बल ( शक्ति ), वर्ण ( कान्ति ) और ओज तथा मनप्रमाद को करता है ) । जब चायु कुपित होकर अपनी शिराओं को प्राप्त होता है तो बात संबधी, नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं ॥९ -१० ॥ विमर्शः - शारीरिक, मानमिक कार्यों को वायु अदुष्ट होकर अपनी शिराओं में घूमकर कराता है । वही यदि विकृत हो तो नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करता है । भ्राजिष्णुतामन्नरुचिमग्निदीप्तिमरोगताम् संसर्पन् स्वा सिरा. पित्तं कुर्याञ्चान्यान् गुणानपि ॥ ( यदा त्वकुपित पित्तं सेवते स्वत्रहाः सिरा. 1 अव्यापन्नस्तदाऽग्निस्तु सम्यक् पचति भोजनम् ॥ करोत्यन्यान् गुणांश्चापि पित्तमात्मसिराश्चरन् । ' पा'० )
या प्रकुपितं पित्तं सेवते स्ववहाः सिराः ।
तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते पित्तसभवाः ॥ १२ ॥
शिरा।चारां अकुपित दथा कृपित पित्त के कार्य- अकुपित पित्त अपनी शिराओं में फिरता हुआ, कान्ति, अन्न की रुचि, अग्नि का दीपन, नीरोगता और अन्य अन्य गुर्गो को सू. अ १७ में के ' रागपक्रयोज ' इत्यादि उत्पन्न करता है । ( पाठ भेद के अनुसार जन पित्त अनूपिन रहता हुआ अपनी शिराओं में घूमता है तब अति भी निर्दोष होकर अच्छी तरह भोजन पचाती है । और अन्य गुण भी पैदा । होते हैं ) जब प्रकुपित पित्त शिराओं में जाता है तो नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न करता है ॥ ११–१२ ॥ विमर्श.- अदुष्ट पित्त अपनी शिराओं में घूम कर अग्नि की वृद्धि करता है । वही विकृत होने से पित्तजन्य रोगों को पैदा करता है ।
स्नेहमद्ङ्गेषु सन्धानां स्थैर्चं बलमुदीर्णताम् ।
करोत्यन्यान् गुणांश्चापि वलासः स्वाः सिराश्चरन् ॥
( यदा त्वकुपितः श्लेष्मा स्वाः सिराः संप्रपद्यते । आशयाः सन्धयश्चैव वर्तन्तेऽस्य निरामयाः || ' पा'० )
यदा तु कुपितः श्लेष्मा स्वाः सिराः प्रतिपद्यते ।
तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते श्लेष्मसंभवाः ॥ १४ ॥
शिराचारी अकुपित और कुपित कफ के कार्य- कफ अपनी शिराओं में घूमता हुआ, अंगों में स्नेह ( चिणता ), संधियों में स्थैर्य ( स्थिरता ), चल और अपने अन्य गुणों को करता है । ( पाठभेद के अनुसार जब अदुष्ट कफ अपनी शिराओं में गति करता है तब आशय और सन्धियाँ नीरोग होकर काम करती हैं । ) दूषित कफ अपनी शिराओं को ग्राप्त होने पर कफ संबंधी नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न करता है ॥ १३-१४ ॥
धातूनां पूरणं वणं स्पर्शज्ञानमसंशयम् ।
स्वाः सिराः संचरद्रक्तं कुर्य्याच्चान्यान् गुणानपि ॥ १५ ॥
( यदा त्वकुपित रक्तं सेवते स्ववहाः सिराः ।
तदा सम्यक् प्रजानाति स्पर्शनानां शुभाशुभम् ॥
वर्णप्रसादनं स्थैर्य धातूनां पुष्टिमेव च । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि रक्तमात्मसिराश्चरन् ॥ )
यदा तु कुपित रक्तं सेवते स्त्रवहाः सिराः ।
तदास्य विविधा रोगा जायन्ते रक्तसंभवाः ॥ १६ ॥
निजशिगगन अकुपित और कुपित रक्त के कार्य - ( अच्छा ) रक्त अपनी गिराओं में फिरता हुआ धातुओं का पूरण, कान्ति, अच्छी तरह से स्पर्श ज्ञान और अन्य गुण ' रक्तं वर्णप्रद ' ( सू.अ. १५ ) में कहे हुए को उत्पन्न करता है । ( पाठभेद के अनुसार अकुपित रक अपनी शिराओं में फिरता हुआ भली प्रकार इन्द्रियों के शुभाशुभ को जानता है । तथा वर्ण, स्थिरता, धातुओं की पुष्टि और अन्य अन्य गुणों भी करता है | )
किन्तु कुपित रक्त लव अपनी शिराओं को प्राप्त होता है ।
तो रक्तजन्य नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं ॥ १५-१६ ॥
विमर्श - शुद्ध रक्त और अशुद्ध रक्त अपनी शिराओं में क्या कार्य करते हैं, यह इन श्लोकों में बताया गया है ।
नहि वातं सिराः केचिन्न पित्तं केवलं तथा ।
लेप्माणं वा वहन्त्येता अतः सर्ववहाः स्मृताः ॥ १७ ॥
प्रायः सभी शिराव टोप का वहन करती है - कोई भी शिरा केवल वात, पित्त अथवा कफ का संवहन नहीं करती, किन्तु तीनों दोषों का वहन करती हैं । अत ' वे सर्ववहा कही जाती है ॥ १७ ॥
विमर्श. - पीछे की ओर तो ' विशेषतस्तु पित्तवाहिन्यो नेत्रयोदश ' इत्यादि प्रकार मे पित्तवह कफवह शिराओं का