श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 411–420

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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श्रध्यायः ७ ] शारीरस्थानम् ६१ निर्देश किया गया है । वह उन उन दोपों की अधिकता के कारण समझना चाहिये । वस्तुतः सर्वं शिराओं में सर्व दोपों का अनुबन्ध अवश्य रहता है ।

प्रदुष्टानां हि दोषाणां मूच्छ्रितानां प्रधावताम् ।

ध्रुवमुन्मार्गगमनमतः सर्ववहाः स्मृताः ॥ १ ॥

उपर्युक्त मत की पुष्टि के लिए उदाहरण या प्रमाण- - दूषित हो कर दौडने वाले दोप अपने स्थान या मार्ग को छोडकर गलत मार्ग में जरूर जाते है । अतः शिराये सब दोपों को वहन करने वाली होती है और सर्ववदा कहलाती है ॥ १८ ॥

विमर्शः — चाहे कुपित हों, अथवा भकुपित हों, सब दोषों को सब शिराये वहन करती है । इसलिए सर्ववहा शिराये कही जाती हैं । तत्रारुणा वातवहाः पूर्यन्ते वायुना सिराः ।

पित्तादुष्णाश्च नीलाश्च शीता गौर्यः स्थिरा कफात् ।

असृग्वहास्तु रोहिण्यः सिरा नात्युष्णशीतलाः ॥ १६ ॥

शिराओं का वर्णं विभाग - वातवहा शिरा भरुण ( किंचित् लाल ) वर्ण की होती हैं । वे वायु से भरी हुई होती हैं । पित्त से नीली और उष्ण होती हैं । कफ से शीत ( ठडी ), स्थिर और गौरी ( श्वेत वर्ण की ) शिरायें होती हैं । रक्त को वहन करने वाली रोहिणी ( लाल रंग की और चमकदार ) तथा बहुत उष्ण और ठण्डी नहीं होती हैं ॥ १ ९ ॥ विमर्श: - कोई लोग सिरा को अशुद्ध रक्तवाहिनी ( Vein ) मानते है । किन्तु अन्य विद्वान् सिरा को रक्तवाहिनी ( Blood vessel ) मानते हैं । रक्तवह सिराये मानने वालों के मत के अनुसार नीला सिरा ( Veins ) होती है । गौर्य: ( Lympa hatics = रसायनी ) और असृग्वहा ( Arteries = धमनियां ) होती हैं । अरुण कौन सी होती हैं यह निश्चित नहीं है, किन्तु उसे वायु को वहन करने वाली अर्थात् चेष्टा युक्त होना चाहिये । अतः इनको ( Nerve ) कहेंगे किन्तु ( Nerve ) । पोली नहीं होती है । इसलिये अरुण सिराये कौन सी हैं यह विषय सदिग्ध ही है है ॥

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि न वियेद्याः सिरा भिषक् ।

वैकल्यं मरणं चापि व्यधात्तासां ध्रुवं भवेत् ॥ २० ॥

अवेध्य सिराओं का वेध करने से उपद्रव - इसके पश्चात् भवेध्य शिरायें कही जायेंगी । उनका वेध होने पर विकलता अथवा मरण निश्चय ही होता है ॥ २० ॥

विमर्शः - अवेध्य सिराओं का वेध होने से मृत्यु अथवा विकलता होती है । इसलिए इसका ज्ञान होना आवश्यक होता है ।

सिराशतानि चत्वारि विद्याच्छाखासु बुद्धिमान् ।

षट्त्रिंशश्च शतं कोष्ठे चतुःषष्टि च मूर्धनि ॥ २१ ॥

सब शिराओं का परिगणन - शाखाओं में ४०० शिरायें होती हैं । कोष्ठ में १३६ और ग्रीवा में १६४ शिरायें होती है ॥ विमर्श: - वेध्य और अवेध्य शिराओं का विभाग बनाने के लिये फिर से शिराओं का परिगणन करके उनका पढंगों में विभाग किया गया है ।

शाखासु षोडश शिराः कोष्ठे द्वात्रिशदेव तु ।

पञ्चाशज्जत्रुणश्चोर्ध्वमन्यध्याः परिकीर्तिताः ॥ २२ ॥

अध्य. शिरामों का परिगणन - १६ शाखाओं में, ३२ कोष्ठ में, ५० जत्रु के ऊपर भवेध्य शिरायें होती हैं ॥ २२ ॥

विमर्शः –१६ + ३२ + ५० = ९ ८ शिरायें अवेध्य होती हैं । तत्र सिराशतमेकस्मिन् सक्थिन भवति, तासां जालधरा विका, तिस्रश्चाभ्यन्तराः -- तत्रोवसंज्ञे द्वे

। लोहिताक्षसंज्ञा चैका, एतास्त्वव्यध्याः, एतेनेतर-सक्थि बाहू च व्याख्यातौ ।

एवमशस्त्रकृत्याः षोडश शाखासु ॥ २३ ॥

शाखागत अवेध्य शिरायें - प्रत्येक टांग में १०० शिरायें होती हैं । उनमें से जालधरा शिरा और अन्दर की भोर तीन शिरायें ( दो उर्बी और एक लोहिताक्ष ) अवेध्य होती हैं ।

इसी प्रकार दूसरे पैर और बाहुओं को समझना चाहिये ।

इस प्रकार सब शाखाओं में १६ अवेध्य शिरायें होती हैं ॥

विमर्श: -- जालधरा शिरा तलहृदय मर्म में रहती है । उर्वी और लोहिताक्ष स्वतन्त्र मर्म भी पहिले ही वर्णित है ( भ ० ६ ) । ( अ ) द्वात्रिंशच्छ्राण्यां, तासामष्टावशस्त्रकृत्याः द्वे द्वे विटपयोः कटीकत रुणयोश्च ।, कोष्ठगत अवेध्य शिरायें - ( अ ) श्रोणी में ३२ शिराये होती हैं । इनमें से आठ अवेध्य शिराये होती हैं । विटप मम में दो दो और कटीकतरुणों में दो - दो । ( आ ) अष्टावष्टावेकैकस्मिन्पार्श्वे तासामेकैकामू-र्ध्वगां परिहरेत्, पार्श्वसन्धिगते च द्वे । ( आ ) एक - एक पार्श्व में भाठ - भाठ शिरायें होती हैं । उनमें से ऊपर जानेवाली एक - एक शिराओं को बचाना चाहिये । पार्श्वसन्धिगत दो शिराओं को भी बचाना चाहिये । ( इ ) चतस्रो विशतिश्च पृष्ठे पृष्ठवंशमुभयतः, तासामूर्ध्वगामिन्यौ द्वे परिहरेद् बृहती सिरे । ( इ ) पृष्ठ में पृष्ठ वंश के दोनों भोर २४ शिराये है । उनमें से ऊपर जाने वाली दो बृहती नामक शिराओं को बचाना चाहिये | ( ई ) तावत्य एवोदरे तासां मेढोपरि रोमराजी -मुभयतो द्वे द्वे परिहरेत् । ( ई ) उदर मे भी २४ शिरायें होती हैं । इनमें से मे ( मूत्रेन्द्रिय ) के ऊपर रोमराजी के दोनों भोर दो - दो शिराओं को बचाना चाहिये । ( उ ) चत्वारिशद्वक्षसि तासां चतुर्दशाशस्त्रकृत्याः

द्वे हृदये, द्वे द्वे स्तनमूले, स्तनरोहितापलापस्तम्भेषू-भयतोऽष्टौ ।

एवं द्वात्रिशदशस्त्रकृत्याः पृष्ठोदरोरःसु भवन्ति ॥ २४ ॥

( उ ) वक्षःस्थल में चालीस शिरायें होती हैं । उनमें १४ शिरायें शस्त्र कर्म के लिये अयोग्य होती हैं । यथा - हृदय में दो, स्तनमूल में दो - दो अर्थात् चार, दोनों स्तन रोहित में दो दो अर्थात् चार, अपलाप और अपस्तम्भ के ( दोनों ओर के ) एक - एक अर्थात् दो दो इस प्रकार आठ शिरायें ।

पृष्ठ 412

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६२ सुतसंहिता इस प्रकार पृष्ट, पेट, छाती में ३२ शिराय शस्त्र कर्म में अवैध्य होती है ॥ २४ ॥

विमर्श: - मध्य शरीर में ८ उदर में ( मूत्रेन्द्रिय ) पर ४ ( विटप में ४ + ) वक्ष स्थल में १४ ( कटीकतरुण में २ = ८ ) ( हृदय में २+ पार्श्व में २ स्तनमूल में + पार्श्वसन्धिगत २ स्तनरोहित में ४ + पृष्ठ में २ अपलाप २+ अपस्तम्भ २ = १४ ) सब मिलकर ३२ शिराओं को बचाना चाहिये । चतुष्टि सिराशतं जत्रुण ऊत्वं भवति, ( अ ) तत्र पट्पञ्चाशच्छिरोधरायां, तासामष्टौ चतस्रश्च मर्मसन्नाः परिहरेत्, द्वे कृकाटिकयोः, द्वे विधुरयो ', एव श्रीवायां षोडशाव्यध्याः । ( गयी तु वातादिवहानां चतुर्भिरष्टकैर्द्वात्रिंशद् / ग्रीवायां तत्र पोडशाव्यध्या इति प्रतिपादयति ) ऊर्ध्व नन्रगल शिरायें -- जत्रु के ऊपर १६४ शिरायें है । ( अ ) ग्रीवा में ५६ शिरायें हैं । उनमें से १२ मर्म संज्ञक शिरायें, दो कृकाटिका, दो विधुर इस प्रकार ग्रीवा में १६ शिराओं को बचाना चाहिये । ( आ ) हन्वोरुभयतोऽष्टाष्टौ तासां तु सन्धि-धमन्यौ द्वे द्वे परिहरेत् । ( आ ) हनु के दोनों ओर आठ - आठ शिरायें हैं । उनमें से सन्धि में रहनेवाली दो दो धमनियों को छोड देना चाहिये । ( इ ) पत्रिंशज्जिह्वायां, तासामधः पोडशाशख-कृत्याः, रसवहे द्वे, वाग्वहे च द्वे । ( ४ ) जिह्वा में ३६ गिरायें होती हैं । उनमें से १६ जिहा के नीचे होती हैं । उनमें से दो रसवह और दो वाग्वह, शस्त्रकर्म में वेधनीय नहीं होती हैं । ( ई ) द्विर्द्वादश नासायां, तासामीपना सिक्य तत्र परिहरेत्, तासामेव च तालुन्येकां मृदावुद्देशे । ( ई ) नासिका में २४ शिरायें होती है । इनमें से नाक के पास की चार शिराओं को बचाना चाहिये । तालु के मृदु देश में की एक शिरा का भी परिहार करना चाहिये । ( उ ) अष्टत्रिंशदुभयोर्नेत्रयो. तासामेकैकामपा-द्वयोः परिहरेत् । ( उ ) दोनों नेत्रों में ३८ शिरायें है । इनमें से अपांगों की एक शिरा की रक्षा करना चाहिये । ( ऊ ) कर्णयोर्दश, तासां शब्दवाहिनी मेकैकां परिहरेत् | ( 3 ) कानों में शिराय हैं । इनमें से एक - एक refeat शिराओं को बचाना चाहिये । ( ए ) नामानेत्रगतास्तु ललाटे पष्टिः, तासां केशान्तानुगताश्चतस्र ', आवर्तयोरेकैका, स्थपन्यां चैका परिहर्तव्या । ( ए ) नासिका और नेत्रगत ललाट में ६० शिरायें होती हैं । उनमें से केशान्तों मे जानेवाली चार, आवर्त्त ममों में एक एक और स्थपनी में एक, सब मिलाकर ७ शिराओं को बचाना चाहिये । ( ऐ ) शखयोर्दश, तासां शखसन्धिगतामेकैकां परिहरेत् । ( ऐ ) शखों में दस शिराये होती हैं । उनमें से शंख सन्धि की एक - एक शिरा का परिहार करना चाहिये । ( ) द्वादश मूर्ध्नि, तासामुत्क्षेपयोर्द्वे परिहरेत्,

सीमध्येका एका मधिपताविति ।

एवमशस्त्रकृत्याः पञ्चाशजत्रुण ऊर्ध्वमिति ॥ २५ ॥

( ओ ) माथे में १२ शिरायें होती हैं । इनमें से उत्क्षेप ममाँ की दो, सीमान्त की एक ) अधिपति बचाना चाहिये । इस प्रकार ५० शिरायें अन्नु के विमर्श - ग्रीवा में १६ हनुसन्धि जिह्रा में ४ नासिका में ५ नेत्रों में २ भवति चात्र-सीमन्तों की पाँच ( प्रत्येक में से एक शिरा को ऊपर की अवेध्य होती है ॥ कान में २ नेत्र + नासिका ७ शख में २ शिर में ८ ५०

व्याप्नुवन्त्यभितो देहं नाभितः प्रसृताः शिराः ।

प्रताना पद्मिनीकन्दाद्विसादीनां यथा जलम् ॥ २६ ॥

इति सप्तमोऽध्यायः समाप्तः । शिराओं को विमतन्तुओं का दृष्टान्त - नाभि से फैली हुई शिराये चारों ओर से शरीर को व्याप्त कर देती है । जैसे कि पद्मिनी कन्द से विस आदि के प्रतान जल को व्याप्त कर देते हैं ॥ २६ ॥ ·

विमर्श. 1.--

- सब शरीर शिराओं के प्रतानों से व्याप्त होता है ।

इति सुश्रुते शारीरस्थाने सप्तमोऽध्याय. समाप्त ' ॥

@ शारीरे प्रश्ना: -( १ ) नाभिस्था प्राणिना प्राणा प्राणान्नाभिर्युपाश्रिता । शिराभिरावृना नाभिश्चक्रनामिरिवारकै अस्य ग्लोकस्य व्याख्या विधेया । ( 2 ) स्वशिरागताना कुपितानामकुपितानाञ्च दोपाणा गुणा दोषाश्च के? ( ३ ) कति च सिरा? तत्राणा वातवा पूर्यन्ते वायुना सिरा ' पिचादुष्णाश्च नीलाश्च शीता गौर्य ' स्थिरा ॥

।

. कफात् ॥

असृग्वद्दास्तु रोहिण्य. सिरा नात्युष्णशीतला । पद्यस्थास्य विवरण कार्यम् । तत्रारुगा वानवद्दा. का सिरा. १ ( ४ ) जण ऊर्ध्वमवेव्याः सिरा. का. १

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श्रध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६३ अष्टमोऽध्यायः श्रथातः निराव्यधविधि शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

- सिराव्यधविधि नामका शारीर कहेंगे ।

जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है ॥ १-२ ॥

विमर्शः- शिराओं का मोघ ( वैधन ) कैसे करना चाहिए? स्नि रोगों में करना चाहिये? कौन लोग शिरानेधके लिये योग्य है, कौन अयोग्य हैं? इत्यादि विचार इस अध्याय में किया जायेगा | बाल- स्थविर - क्ष - अनक्षीण - भीर - परिश्रान्त-मद्यपाव्यस्त्रीकशितत्रमित - विरिक्तारयापितानुवासित-जागरित - लीब - कृश - गर्भिणीनां कास- श्वास - शोष-प्रवृद्धज्यराक्षेपक- पक्षाघातोपवास - पिपासा मृच्छाप्रपी डिताना च सिरां न विध्येत्, ( अस्याग्रे ताडपत्रपुस्तके ' किं कारणम्? एषां खलु वेधादिन्द्रियसंमोहः शोपो वा भवति. रक्तपित्तिनो रक्तात्ययाद्वातप्रकोपो मृत्युर्वा सिरावेधेन संभवेत् ' इत्यधिकः पाठः ) याञ्चाव्यध्या ' व्यध्याश्रादृशः दृष्टाश्रायन्त्रिताः, यन्त्रितचानुत्थिता इति ॥ ३ ॥

दिन लोगों वा और किस दशा में सिरावेध न करे? - याल, स्थविर ( वृद्ध ), रूप, पतक्षीण ( व्रण से जिसका चल क्षीण हुआ है ), भीरु ( डरपोक ), परिश्रान्त ( थका हुआ ), मद्यपान - स्त्री और अध्र ( मार्ग ) से कृश, चमित ( जिसने वमन किया हो ), विरिक्त ( जिसने विरेचन किया हो ), आस्थापित, अनुवासित, जागरित ( जगा हुआ ), छीय ( नपुंसक ), कृश ( दुयला ) और गर्भिणी तथा कास ( गांसी ) -श्राम ( दमा ) - शोष ( राजजदमा ) - प्रवृढ उपर ( विशेष ज्वर ) -आक्षेपक ( Convulsions ) पक्षाघात, ( Paralysis ) उपवास -पिपासा ( प्याम ) - मूर्द्धा इत्यादि रोगों मे पीडित लोगों का शिराध नहीं करना चाहिये । वेध करने के लिये योग्य शिरा होने पर भी, न दीखने वाली, दीगने वाली होने पर भी न बंधी हुई, यंत्रित ( बधी हुई ) होने पर भी न उठी हुई शिराओं का वेध नहीं करना चाहिए ॥ ३ ॥

विमर्श - बाल और वृद्ध लोग यथाक्रम असंपूर्ण धातु अथवा क्षीणधातु रहते है । उसी प्रकार भीरु लोग मूर्छित होते हैं । अनुवासित लोगों के शिरावेध मे प्रथमत क्षीण । हुआ जठराग्नि और भी क्षीण हो जाता है । लीव ( नपुंसक ) लोगों का शुक्र क्षय होने के कारण अल्प शक्ति होती है, कृश । और गर्मिणी में जीवन नाश की आशका रहती है । इतर उपर्युक्त लोगों में शिरावेध से वायु कुपित होने का डर रहता । है । काम - धाम - शोप आदि रोगों से क्रान्त मनुष्यों में धातु क्षीण होने के कारण देह का सदेह रहता है । विशेष ज्वर वालों का शिराग्यध करने से प्रलाप की सभावना रहती है । शोणितावसेकसाध्याश्च ये विकाराः प्रागभिहिता स्तेषु चापक्केष्वन्येषु चानुक्तेषु यथाभ्यासं यथान्यायं सिरां विध्येत् ॥ ४ ॥

सिरावेध का करे? - सूत्रस्थान १४ अध्याय में कहे हुए रक्तमोक्ष से अच्छे होने वाले, अपक्क विकारों में, उसी प्रकार जो न कहे गये हों और रक्तमोक्ष से ठीक होने वाले हों उन विकारों में यथाभ्यास ( अभ्यास के अनुसार ) और यथा-न्याय ( विधि को न छोड़ते हुए ) शिरावेधन करना चाहिये ॥ विमर्श - यथाभ्याम ( जिन शिराओं का वेधन किया जाता हो ) और यथान्याय ( जन्तुन्न द्रव्यों से शस्त्र और । शरीर का वह भाग माफ रखते हुए ) शिरावेध करना चाहिये । प्रतिपिद्वानामपि च विपोपसर्गे आत्ययिके च सिराव्यधनमप्रतिषिद्धम् ॥ ५ ॥

अवध्य शिराओं का भी वेध करने का समय -- प्रतिषिद्ध शिराओं का भी विपों के उपद्रव में और भयप्रद अवस्थाओं में शिरावेध करना निषिद्ध नहीं है ॥ ५ ॥

विमर्श - बाल, वृद्ध, भीरु इत्यादिकों में भी विधि । आदि विकार होने पर शिरावेध करना उचित होता है । तत्र स्निग्ध स्विन्नमातुर यथादोपप्रत्यनीकं द्रव्य-प्रायमन्न शुक्तवन्तं यवागूं पीतवन्तं वा यथाकालमुप-रथाप्यासीनं स्थितं वा प्राणानबाधमानो वस्त्र - पट्ट-चर्मान्तर्वल्कल - लतामन्यतमेन यन्त्रयित्वा नातिगाढ नातिशिथिलं शरीरप्रदेशमासाद्य यथोक्तं शस्त्रं गृहीत्वा सिरां विध्येत् ॥ ६ ॥

शिरावेर को विधि- रोगी को नेहन - स्वेदन करा के दोप के विपरीत पतला - सा अन्न देकर अथवा यवागू का पान करा-कर योग्य काल में अपने समीप बैठाकर अथवा खड़ा करके जीवन में जिसमें बाधा न पढे ऐसे वख, पह, चर्म अन्त एकल ( अन्दर की छाल ), लतादि किसी चीज से बाधकर बहुत कडा अथवा शिविल न हो ऐसे टन से शरीर के उस भाग में उपर्युक्त शस्त्र से शिरा का वेध करे ॥ ६ ॥

विमर्श - प्रधान शस्त्र कर्म करते समय रक्त का परिभ्रमण अच्छे प्रकार होने के लिये द्रव प्राय अन्न खिलाया जाता है । वर्षादि ऋतुओं में मेघाच्छन्न दिन इसके लिये वर्ज्य है । मर्मप्रदेशों का ध्यान रख कर शस्त्र कर्म करना चाहिये ।

नैवातिशीते नात्युष्णे न प्रवाते न चाश्रिते ।

सिराणां व्यधनं कार्यमरोगे वा कदाचन ॥ ७ ॥

शिरावेध कब न करे? - कडे शीतकाल में, भधिक गरमी में, जोर की बहती हुई हवा में, आकाश के मेघाच्छन्न रहते तथा जब कोई रोग न हो, शिरावेध न करना चाहिये ॥ ७ ॥

विमर्श - उपरिनिदिष्ट ५ स्थितियों का ख्याल रखकर शिरावेध करने का विधान है । ( अ ) तत्र व्यध्यसिरं पुरुषं प्रत्यादित्यमुखमरनि-मात्रोच्छ्रिते उपवेश्यासने सक्थ्नोराकुञ्चितयोर्निवेश्य कूर्परौ सन्धिद्वयस्योपरि हस्तावन्तर्गूढाङ्गुष्ठकृतमुष्टी मन्ययोः स्थापयित्वा यन्त्रणशाटक ग्रीवा मुष्टयोरुपरि परिक्षिप्यान्येन पुरुपेण पश्चात्स्थितेन वामहस्तेनोत्ता-नेन शाटकान्तद्वय प्राहयित्वा ततो वैद्यो ब्रूयात्-दक्षिणहस्तेन सिरोत्थापनार्थ नात्यायत शिथिलं

पृष्ठ 414

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II सुश्रुतसंहिता यन्त्रमात्रेष्ठयेति, असुकुनावणार्थं च यन्त्रं पृष्टमध्ये ( ऊ ) उदरोरमोः प्रसारितो रम्कस्योन्नामित शिर • पीडयेति, कर्मपुरुपं च वायुपूर्णमुखं स्थापयेत, एप । स्कस्य विस्फूर्जितदेहस्य । उत्तमाङ्गगतानामन्तर्मुखवर्द्धानां निराणां व्यथने ( ऊ ) पेट और छाती में शिराध करना हो तो, शिर को यन्त्रणविधि. ॥ चाटा कर छानी तथा मध्य शरीर को फैलाकर शरीर में म्यमान शिराओं का वेध करें । मन - मन स्थानों के लिये नियन्त्रण विधि - ( अ ) जिस पुरुष पार्श्वयोः । का गिराबंधन करना हो उसका सूर्य की ओर मुग्न रहे, फिर ( v ) वाभ्यामवलम्बमानदेहस्य अरविमात्र ऊँची चौकी पर बैठे, मधियाँ ( पैर ) मिट्टी हुई ( ए ) पार्श्वो ( बगलों ) का शिगवेध करना हो तो बाहुन हों, दोनों सधियों पर केहुनियों को रखे, अगूठों को मुट्टियों पर से शरीर को अबलबन के शिराओं का वैध करे । बा और उनमुट्टियों को मन्याओं के उपर थे, फिर गर्दन और मुट्टियों पर यन्त्रशाटक डाले, पीछे की ओर कोई दूसरा व्यक्ति गडा हो और वह अपना बायां हाथ उठाकर शाटक के दोनों सिरों को पकड़ा कर, ( वैध ) पुरुष से कहे कि " दाहिने हाथ से शिराओं का उत्थान होने के लिये, न बहुत जोर मे और न बहुत धीमे, यन्त्र का आवेष्टन करो, रक का निर्हरण होने के लिये यन्त्र को पृष्टमध्य में दवाओ " और जिसका शिरावेध करना हो उसको मुख में हवा भर कर बैठायें । यह यत्रण- विवि अन्तर्गत शिराओं को छोट कर निरोगत शेप शिराओं के वेधन के लिये है । T ( आ ) पाढव्याध्यसिरस्य पादं समे स्थाने सुस्थिरं स्थापयित्वाऽन्य पादमीपत्संकुचितमुच्चै. कृत्वा व्यध्य-सिरपादं जानुसन्धेरघः शाटकेनावेष्टच हरताभ्यां । प्रपीड्यागुल्कं व्यध्यप्रदेशस्योपरि चतुरङ्गुले लोता-दीनामन्यतमेन बद्ध्वा वा पाइसिरां विध्येत् । ( आ ) पैरों के शिरावेधन का यन्त्र- प्रकार - जिम पुरुष के पैर का वैध करना हो उसका पैर पम स्थान पर अच्छे प्रकार रख कर दूसरे पैर को किंचित उठा कर जिस पैर में त्रिगवेध करना हो उम पैर को घुटने के नीचे शाटक ( यंत्रण वस्त्र ) से लपेटकर, गुल्फ पर्यन्त दोनों हाथों से दबा कर अथवा वेध्य प्रदेश के ऊपर चार अंगुल ष्टोत ( कपड़ा ), चर्म इत्यादि में से किसी एक से बाधे । इसके पश्चात पैर की शिरा का वेवन करे | ( इ ) अथोपरिष्टाद्धस्तो गूढाङ्गुष्ठकृतमुष्टी सम्यगा सने स्थापयित्वा सुखोपविष्टस्य पूर्ववद्यन्त्रं बद्ध्वा दस्त सिरां विध्येत् । ( ६ ) हाथों की शिराओं के लिये अंगूठ को मुष्टि के भीतर की ओर दबा कर अच्छे प्रकार से आसन पर सुनपूर्वक बैट हुए पुरुष के हाथ को पूर्वोच्च प्रकार से बाघ कर हाथ की शिरा का वेध करे | ( ई ) गृध्रसी विश्वाच्योः संकुचितनानुकूर्परस्य । ( i ) गृधसी और विश्वाची में घुटने और कूपर ( कोहनी ) को सिकोड़ ले पश्चात् यंत्रण करे । ( e ) श्रोणी पृष्ठस्कन्वेपून्नामित पृष्टस्यात्राकशिरस्क-स्योपविष्टस्य विस्फूर्जितप्रष्टस्य विव्येत् । ( ii ) अवनामितने मेढ़े । ( t ) मै ( टिन ) पर सिरावेध करना हो तो मेंदू को बिना काये न करे । ( पाठ में ' अमित ' मिलता है । म जगह " भेटू को झुका कर " ऐसा अर्थ है ) ( a ) उन्नतिजिहानस्या घोजिह्वायाम् । ( ओ ) जिला के नीचे निराध वरना हो तो जिल्हा को उपर उठा कर जिद्दाम को कर जिला के नीचे की शिराओं का वेध करना चाहिये । ( श्र ) अतिव्यात्ताननस्य नालुनि दन्तमृत्तेषु च । एव यन्त्रोपागानन्यांच मिरोत्थापन हेतून, बुद्धया-वेच्य शरीरवशेन व्याविवशेन च विद्यान ॥ ८ ॥

( औ ) तालु और दन्तमूली में वैध करना हो तो मुत्र को फादर तालु और दन्नमूलों में वेव करना चाहिये । इसी प्रकार अनु प्रदेशों में शिराओं को यन्त्रों से अथवा उपायान्तरों में बधार शिराओं के दत्थान करनेवाले उपायों को मोचर शरीर और व्याधि के अनुसार शिराओं का वैध करना चाहिये । मांमध्यवकाशेषु यवमात्रं शन्त्रं निदध्यात्, अतो-ऽन्येष्वर्धयवमात्रं त्रीहिमात्रं वा श्रीहिमुखेन, अस्टना-मुपरि कुठारिकया विध्येदुर्धयवमात्रम् ॥ ६ ॥

स्थान- भेदानुसार वेधविधि'- मांसल प्रदेशों में यच ( जो ) मात्र शस्त्र मे वेधन करे । ( मांसल स्थान से ) भिन्न प्रदेश में आधे जौ के बराबर अथवा यवमात्र श्रीहिमुत्र यन्त्र | से वैध करे । 1 अस्थियों के ऊपर ' कुठारिका ' नामक यन्त्र मे आधा यव ( जी ) के बराबर गहरा शिरावेध करे ॥ ९ ॥

विमर्श: - श्रीहिमुत्र यन्त्र ( Trocar & canals, और कुठारिका ( Axe shaped hufe or chisle ).

भवन्ति चात्र-व्य वर्षासु विध्येत ग्रीष्मकाले तु शीतले ।

हेमन्तकाले मध्याह्ने शस्त्रकालात्रय. स्मृताः ॥ १० ॥

शिरावेधन काल - वर्षा ऋतु में व्यत्र ( बादल जब न हों ऐसे ) काल में, ग्रीष्मऋतु में, ठण्डे समय में, हेमन्तऋतु में मध्याह्न में शस्त्रकर्म करना चाहिये ॥ १० ॥

विमर्श - आत्ययिक अवस्था में शिरावेध करना पडे तो ( 2 ) श्रोणि, पीठ और कंधे में शिरावेध करना हो तो उपर्युक्त तीन कालों का ध्यान रखना चाहिये । पीठ को ऊँचा करके और सिर को झुका कर बैठे हुए व्यक्ति सम्यक् शस्त्रनिपातेन धारया या स्रवेदसुकू । को सीधी तनी हुई पीठ होने की हालत में शिरावेध मुहूत्त मुद्रा तिष्टञ्च सुबिद्धां तां विनिर्दिशेत् ॥ ११ ॥

करना चाहिये । सुविद्ध के लक्षण - अच्छे प्रकार शस्त्र चलने से धारा के

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श्रध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६५ साथ समझना कुछ काल सून वहे, चाद रुक जाये तो सुविद्व ( अ ) तत्र पाददाह - पादह - वबाहुक - चिप्प - विमर्प चाहिये ॥ ११ ॥

विमर्शः -- रक्त का स्वभाव गाढ़ा होकर वातशोणित - वातकण्टक - विचर्चिका पाददारी प्रभृतिपु रुकने का होता है । ऐसा ही दीस पढ़े तो अच्छा ( congulate ) क्षिप्रमर्पण उपरिष्टाद् द्वयमुले ब्रीहिमुखेन शिरां रक्त भा रहा है, यह अनुमान होता है ।

यथा कुसुम्भपुष्पेभ्यः पूर्वं स्रवति पीतिका ।

तथा सिरासु विद्धासु दुष्टमग्रे प्रवर्त्तते ॥ १२ ॥

अशुद्ध रक्त प्रथम आने में दृष्टान्त - जिस प्रकार कुसुम्भ के फूलों से प्रथम पीलासा रन निकलता है, उसी प्रकार शिराओं का वेध करने से दुष्ट रक्त पहले बाहर भाता है ॥ १२ ॥

विमर्श - जब तक दुष्ट रक्त बहता है तब तक रक्त की संचित होने की ( corgulation ) शक्ति नष्ट हुई रहती है और इसीलिये पहले दुष्ट रक्त भाता है ।

मूच्छितस्यातिभीतस्य श्रान्तस्य तृपितस्य च ।

न वहन्ति सिरा विद्वास्तथाऽनुत्थितयन्त्रिताः ॥ १३ ॥

शिओं के बने के कारण - मूच्छित ( बेहोश ), अतिभीत ( वृत्र ढरे हुए ), श्रान्त ( थके हुए ), तृपित ( प्यासे ), उसी प्रकार अनुस्थित ( न उठे हुए ) और अयन्त्रित ( न बाँधे हुए ) की दशाओं में शिराओं का वेधन करने पर रक्त भले प्रकार नहीं बहता । विमर्शः -- उपर्युक्त अवस्थाओं में रक्त की गति मन्द रहने के कारण शिराओं में रक्त वहन नहीं होता ।

क्षीणस्य बहुदोपस्य मूर्च्छयाऽभिहतस्य च ।

भूयोऽपराहे विस्राव्या साऽपरेद्युस्त्र्यहेऽपि वा ॥ १४ ॥

क्षोणादि व्यक्तियों में स्रावण - क्षीण, बहुत दोपयुक्त, मूर्च्छा से आक्रान्त पुरुष का शिरावेध अपराह में दूसरे अथवा तीसरे दिन करना चाहिये ॥ १४ ॥

विमर्श - क्षीण आदि व्यक्तियों का शिरावेध करना हो तो दोपहर में दूसरे अथवा तीसरे दिन करना चाहिये ।

रक्तं सशेपदोपं तु कुर्यादपि विचक्षणः ।

न चाति प्रस्रुतं कुर्याच्छेपं संशमनैर्जयेत् ॥ १५ ॥

पूर्णतया दूषित रक्त न निकाले - दूषित पूर्णतया न करना चाहिये । शेष रक्त की चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १५ ॥

विमर्शः – ' रक्तं जीव. ' रक्त ही प्राण है रक्षा करना आवश्यक है । ' अधिक रक्त न इसलिये कहते हैं कि चाहे दूषित रक्त भले इसका अधिक नाश होना उचित नहीं । रक्त का भी स्राव संशमन विधि से । इसलिये उसकी निकल जाय ' ऐसा ही रह जाय, पर

बलिनो बहुदोपस्य वयःस्थस्य शरीरिणः ।

परं प्रमाणमिच्छन्ति प्रस्थ शोणितमोक्षणे ॥। १६ ॥

रक्त - निर्हरण का प्रमाण - चलिए, विपुल दोष वाले और तरुण व्यक्ति का रक्त अधिक से अधिक एक प्रस्थ निक-लना चाहिये ॥ १६ ॥

विमर्श ' - वमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण में एक प्रस्थ १३ ॥ पल का होता है । किन्तु इतना रक्त निकलना भाजकल असा होता है । इसलिये रोगी का चल देखकर उसका विचार करना चाहिये । ६ सु ० शा ० विध्येत् | किन - किन रोगों में कहाँ कहाँ सिरावेध करे? - ( अ ) व्रीहि-मुत्र से पाददाह, पादहर्ष, चिप्प, विसर्प, वातशोणित, वातकण्टक, विचर्चिका, पाददारी इत्यादि रोगों में क्षिप्रमर्स के ऊपर दो अंगुल शिरावेध करे । ( आ ) श्लीपदे तचिकित्सिते यथा वक्ष्यते । ( आ ) श्लीपद रोग के विषय में उसकी चिकित्सा बताते समय कहा जायगा । ( इ ) क्रोष्टुकशिरःखञ्जपङ्गुलवातवेदनासु जङ्घायां गुल्फस्योपरि चतुरङ्गुले । ( इ ) क्रोष्टुकशीर्प, खञ्जता, पगुता और वातवेदनाओं में जंघा मे गुल्फ से चार अंगुल ऊपर शिरावेध करे । ( ई ) अपच्या मिन्द्रत्रस्तेरधस्ताद् द्वयङ्गुले । ( ई ) अपची में इन्द्रयस्ति के नीचे दो अगुल शिरावेध करे । ( उ ) जानुसन्धेरुपर्यधो वा चतुरङ्गुले गृध्रस्याम् । ( उ ) गृध्रसी में जानुसन्धि के ऊपर अथवा चार अगुल नीचे शिरावेध करना चाहिये । ( ऊ ) ऊरुमूलसंश्रितां गलगण्डे । एतेनेतरसक्थि वाहू च व्याख्यातौ । ( ऊ ) गलगण्ड में ऊहमूल में रहने वाली शिरा का वेध करना चाहिये । इसी प्रकार से दूसरी टांग और दोनों बाहुओं के लिये भी शिरावेध का प्रकार कह दिया गया । ( ए ) विशेषतस्तु वामबाहौ कूर्परसन्धेरभ्यन्तरतो बाहुमध्ये हि कनिष्ठिका नामिकयोर्मध्ये वा । ( ९ ) विशेष करके प्लीहारोग में वामबाहु के मध्य में भीतर की ओर कूर्परसन्धि के समीप अथवा कनिष्ठिका और अनामिका ( छोटी अंगुली के पास की अंगुली ) के मध्यदेश में शिरावेध करे । ( ऐ ) एवं दक्षिण बाहौ यकृदाख्ये कफोदरे । ( ओ ) चैतामेव च कासश्वासयोरप्यादिशन्ति । ( ऐ, ओ ) इसी प्रकार यकृत् दाल्योदर नामक रोग में और कास, श्वास में भी दक्षिण वाहु में शिराओं का वेध करे । ( a ) गृध्रस्यामि विश्वाच्याम् । ( भ ) विश्वाची नामक रोग में गृध्रसी के समान शिरावेध करना चाहिये । ( अं ) श्रोणि प्रति समन्ताद् द्वयले शूलिन्याम् । ( अ ) शूलयुक्त प्रवाहिका में श्रोणि के चारों अन्तर पर शिरावेध करना चाहिये । ( अ ) परिवर्ति को पदेश- शूकदोप -मेमध्ये । प्रवाहिकायां ओर दो अंगुल शुक्र- व्यापत्सु

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६६ सुश्रुतसहिता ( अ ) परिवर्तिका, उपदेश, शूकदोप और शुक्र रोगों में मेढ़ के मध्य की शिरा का वेध करे । ( क ) वृषणयोः पार्श्वे मूत्रवृद्धयां, नाभेरधश्चतुरङ्गले सेवन्यां वामपार्श्वे दकोदरे । ( क ) मूत्रवृद्धि में वृपणों के बगल में और उदकोदर में नाभि के नीचे, सीवनी के बायीं ओर चार अंगुल पर शिरावेध करना चाहिये । ( ख ) वामपार्श्वे कक्षास्तनयोरन्तरेऽन्तर्विद्रधौ पार्श्व शूले च । ( ख ) अन्तर्विद्रधि तथा पार्श्वशूल में चाय बगल में, कक्षा और स्तन के बीच में शिरावेध करना चाहिये । ( ग ) बाहुशो पावबाकयोरप्येके वदन्त्यं मयोरन्तरे । ( ग ) चाहुशोप और अवचाहुक रोगों में कन्धे के बीच में शिरावेध करना चाहिये, ऐसा कई विद्वानों का कथन है । ( घ ) त्रिकसन्धिमध्यगतां तृतीयके ( च ) तृतीयक ज्वर में त्रिकसन्धि के मध्य की शिरा का वेध करना चाहिये । ( ङ ) अधःस्कन्धसन्धिगतामन्यतर पार्श्वसंस्थितां । चतुर्थ | ( ड ) चतुर्थक ज्वर में किसी भी एक पार्श्व में स्कन्ध-सन्धि के नीचे शिरा का वेध करे । ( च ) हनुसन्धिमध्यगतामपस्मारे । ( च ) अपस्मार में हनुसंधि के बीच में रहने वाली शिरा का वेध करे । ( छ ) शङ्खकेशान्त सन्धिगतामुरोऽपाङ्गललाटेपु चो-( छ ) अपस्मार और उन्माद में शंख तथा केशान्त सन्धि गत और वक्षःस्थल अपांग तथा ललाट में रहने वाली शिराओं का वेध करना चाहिये । ( ज ) जिह्वारोगेज्वधोजिह्वायां दन्तव्याधिषु च । ( ज ) जिह्वारोग और दन्तरोगों में जीभ के नीचे रहने वाली शिराओं का वेध करना चाहिये । ( झ ) तालुनि तालव्येषु । ( झ ) तालु के रोगों में तालु में शिरावेध करना चाहिये । ( ञ ) कर्णयोरुपरि समन्तात् कर्णशूले तद्रोगेषु च । । ( ज ) कर्णं - पीढा और कर्ण - रोगों में कानों के ऊपर चारों । ओर शिरावेध करना चाहिये । ( ट ) गन्धाग्रहणे नासारोगेषु च नासाऽग्रे । ( 2 ) गन्ध का ग्रहण न होने पर और नाक को बीमारियों में नाक के अग्रभाग में शिरावेध करना चाहिये । ( ठ ) तिमिराक्षिपाकप्रभृतिष्वदयामयेपूपनासिके लाला श्यामपाङ्गयां वा । ( 3 ) तिमिर रोग, अक्षिपाक इत्यादि आंखों के रोगों में नाक के समीप, ललाट किंवा अपांग में की शिराओं का वेध करे | एता एव च शिरोरोगा अधिमन्थप्रभृतिषु रोगे -त्रिति ॥ १७ ॥

शिरोरोग और अधिमन्थ इत्यादि रोगों में इन्हीं शिराओं का वेध करना चाहिये ॥ १७ ॥

विमर्श: -- अपची रोग में अपची उत्पन्न होने के पश्चात् । शिरावेध करे । रूढ ( पुराण ) अपची न हो । सन्धि में शस्त्रक्रिया नहीं करनी चाहिये | इसलिये कूर्परसन्धि का अर्थ कूर्परमन्धि के समीप समझना चाहिये । ( औ ) - में निर्दिष्ट विश्वाची में केहुनी के ऊपर अथवा नीचे चार अगुल समझना चाहिये । जिन - जिन रोगों में शिरावेध बताया गया है, वहां - वहां रक्तजन्य व्याधि हो अथवा रक्त का अनुबन्ध हो तो शिरावेध करना चाहिये । अत ऊध्वं दुष्टव्यधनमनुत्र्याख्यास्यामः-इसके बाद दुष्टवेध का वर्णन करेंगे । नत्र - दुर्विद्वाऽतिविद्धा कुञ्चिता पिश्चिता कुट्टिता • प्रस्रुताऽत्युदीर्णाऽन्तेऽभिहता परिशुष्का कृणिता वेपि-ताऽनुत्थितविद्धा शत्रहता तिर्यग्विद्धा विद्धा ( अप विद्धा ' पा ० ) ऽव्यध्या विद्रुता धेनुका पुनः पुनर्विद्धा मांससिरास्नाग्य्वस्थिसन्धिमर्मसु चेति विशतिर्दुष्ट-व्यधाः ॥ १८ ॥

दुष्टवेध के बौस प्रकार ---१ दुर्विद्ध, २ अतिविद्ध, ३ कृचित, ४ पिञ्चित, ५ कुट्टित, ६ अप्रस्रुत, ७ अत्युदीर्ण, ८ अन्तेविद्ध, ९ परिशुष्क, १० कूणित, ११ चेपित, १२ अनुस्थितविद्ध, १३ शस्त्रहत, १४ तिर्यग्विद्ध, | १५ विद्व ( अपविद्ध ' पा ० ), १६ अध्यध्य, १७ विद्रुत १८ धेनुक, १ ९ पुनः पुनर्विद्ध और १० मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि, सन्धि इत्यादिकों के मम में विद्ध दुष्टवैध के बीस प्रकार होते हैं ॥१८ ॥

( अ ) तत्र या सूक्ष्मशास्त्रविद्धाऽव्यक्त ( न व्यक्त ' पा ० ' ) मसृक् स्रवति रुजाशोफवती च सा दुर्विद्धा । दुष्टवेध के प्रकारों के लक्षण -थोडा ( अ ) दुर्विद्धा का लक्षण - सूक्ष्म शस्त्र मे वेध करने पर रक्त आता हो और जिसमें बेदना और सूजन हो उसे दुर्विद समझना चाहिये । ( आ ) प्रमाणातिरिक्तविद्धायामन्तः प्रविशति शोणितं शोणितातिप्रवृत्तिर्वा साऽतिविद्धा । ( आ ) अतिविद्धा का लक्षण: - प्रमाण से अधिक विद होने के कारण रक्त ( दशरीर के ) भीतर जाता हो अथवा बहुत रक्त निकलता हो तो उन शिराओं को अतिविद्ध जानना चाहिये । ( इ ) कुचितायामध्येवम् । ( इ ) कुलिता का लक्षणः - कुञ्चिता में अपविद्ध के समान लक्षण होते हैं । ( ई ) कुण्ठशस्त्रप्रमथिता पृथुलीभावमापन्ना पिश्चिता । ( ई ) पिचिता का लक्षण - कुण्ठित ( कुन्द धार वाले ) शस्त्र से कुचली जाने के कारण जो शिरा चौडी हो जाती है उसे पिचिका कहते हैं ।

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श्रध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् ६७ ( उ ) अनासादिता पुनः पुनरन्तयोश्च बहुशः शस्त्रा-भिहता कुट्टिता । ( उ ) कुट्टिता का लक्षणः - जो शिरा भनामादित ( मिली हो परन्तु अन्त ( समीप ) की शिराएँ पुनः पुनः उससे विद्ध हों, उसको कुट्टिता कहते हैं । ( ऊ ) शीतभयमूर्च्छाभिरप्रवृत्तशोणिताऽप्रस्नुता । ( ऊ ) अप्रस्रुता का लक्षणः - शीत, भय, मूर्च्छा ( बेहोशी ) से, यदि रक्त न निकले तो अप्रस्तुता कहते हैं । ( ए ) तीक्ष्णमहामुर्खशस्त्रविद्वाऽत्युदीर्णा । ( ९ ) अत्युदीणां का लक्षण: - तीच्ण ( तीखे ) और महा-मुख ( चौड़े मुख वाले ) शस्त्र से विट्ठ होने पर उसे अत्यु-दीर्णा कहते हैं । ( ऐ ) अल्परक्तस्राविण्यऽन्तेभिहता । ( ऐ ) अन्तेऽमिहना का लक्षण: - शिरा के अन्त ( अन्तिम ( भाग ) पर वेध करने के कारण थोड़ा रक्त निकलता हो तो उसे अन्तेऽभिहता कहते हैं । ( ओ ) क्षीणशोणितस्यानिलपूर्णा परिशुष्का । ( ओ ) परिशुष्का का लक्षण - जिसका रक्त क्षीण हो गया हो और उसमें वायु भर गया हो, उसे परिशुष्का कहते हैं । ( अ ) चतुर्भागावसादिता किञ्चित्प्रवृत्तशोणिता कूणिता | ( औ ) कूणिता का लक्षण. - जिस शिरा में शस्त्र ( शिरा के ) चतुर्थ भाग को प्राप्त होता है और उससे थोडा - सा रक्त निकलता हो, उसे कूणिता कहते हैं । ( अं ) दुःस्थानवन्धनाद्वेपमानायाः शोणितसंमोहो भवति सा वेपिता । ( अं ) वेपिता का लक्षण - स्थान को छोड कर शिरा को बांधने से कांपने वाली शिरा का रक्त बाहर नहीं आता । ऐसी शिरा को वेपिता कहते हैं । ( अ ) अनुत्थित विद्धायामप्येवम् । ( अः ) अनुत्थित विद्धा का लक्षण – जो शिरा उठी न हो उसे वैधने से भी पिता के तुल्य लक्षण पैदा होते हैं । ( क ) छिन्नाऽतिप्रवृत्तशोणिता क्रियासङ्गकरी शख- । हता । ( क ) शस्त्रहुता का लक्षण. - शस्त्र से कटने के कारण, बहुत परिमाण में रुधिर निकलता हो और वे शिरायें अपना काम न कर सकती हों, उनको शस्त्रहता कहते हैं । ( ख ) तिर्यक प्रणिहितशस्त्रा किञ्चिच्छेपा तिर्यग्विद्धा । ( ख ) तिर्यग्विद्धा का लक्षणः - तिरछा शस्त्र चलाने के कारण जो शिरा थोडी ( कटने से ) रह गयी हो, उसे तिर्यग्वा कहते है । ( ग ) बहुशः क्षता हीनशस्त्रप्रणिधानेनापविद्धा । ( ग ) अपविद्धा का लक्षण. - हीन शस्त्र प्रयोग के कारण बहुत जगह चोट लगी हो, उसे अपविद्या कहते हैं । ( घ ) अशस्त्रकृत्या व्यध्या । ( घ ) अन्यध्या का लक्षण - शस्त्र कर्म के भयोग्य शिराओं के व्यध होने को o यध्या कहते हैं । ( ड ) अनवस्थितविद्धा विद्रुता । ( ड ) विद्रुता का लक्षण - अनवस्थित ( चञ्चल ) शिराभ का यदि वेध हुआ हो तो वे विद्रुता कहलाती हैं । ( च ) प्रदेशस्य बहुशोऽवघट्टनादारोहव्यधा मुहुर्मुहुः शोणितस्रावा धेनुका । ( च ) धेनुका का लक्षण: - यदि शिराप्रदेश को जोर से दबाने के कारण तथा ऊपर ही ऊपर शस्त्र के चिह्न हो जाने के कारण पुन पुनः रक्त का स्राव होता हो, तो उसे धेनुका कहते हैं । इसमें गौ के स्तन के समान स्राव होता है । ( छ ) सूक्ष्मशस्त्रव्यधनाद् बहुशो भिन्ना पुनः पुनर्विद्धा । ( छ ) पुन. पुनः विद्धा का लक्षण. सूक्ष्मशस्त्र होने के कारण पुनः पुनः वेध करने से कटी हुई शिराओं को पुनः पुनः विद्वा कहते है । ( ज ) मांसस्नाय्वस्थिसिरासन्धिमर्मसु विद्वा रुजां शोफं वैकल्यं मरणं चापादयति ॥ १६ ॥

( ज ) मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि और सन्धिममों पर वेध करने से रुजा ( पीडा ), शोफ ( सूजन ), वैकल्य ( विकलता ) और मरण ( मृत्यु ) प्राप्त हो जाता है ॥ १ ९ ॥ विमर्श: - कुञ्चिता और अतिविद्धा में फर्क यह है कि कुञ्चिता शिरा कुटिलीभूत ( तिरछी ) होती है और अतिविद्धा में शिरा ज्यों की त्यों रहती है । दोनों में ही कभी - कभी रक्त ( शरीर के ) भीतर की भोर चला जाता है, अथवा कभी कभी - जोर से निकलने लगता है । अनुत्थितविद्धा और वेपिता में बहुत साम्य है । किन्तु अनुत्थितविद्धा में शिराएँ उठती नहीं और वेपिता में भी अन्य प्रदेश में बांधने से शिराएँ चञ्चल होती है । दोनों में भी रक्त का प्रवाह जोर से नहीं होता ।

भवन्ति चात्र-सिरासु शिक्षितो नास्ति चला ह्येताः स्वभावतः ।

। मत्स्यवत् परिवर्त्तन्ते तस्माद्यत्नेन ताडयेत् ॥ २० ॥

अजानता गृहीते तु शस्त्रे कायनिपातिते ।

भवन्ति व्यापदश्चैता बहवश्चाप्युपद्रवाः ॥ २१ ॥

स्नेहादिभिः क्रियायोगैर्न तथा लेपनैरपि ।

यान्त्याशु व्याधयः शान्ति यथा सम्यक् सिराव्यधात् ॥२२ ॥

शिराव्यधश्चिकित्साऽर्थं शल्यतन्त्रे प्रकीर्त्तितः ।

यथा प्राणिहितः सम्यग्वस्तिः कायचिकित्सिते ॥ २३ ॥

शिरावेध के उपद्रव, उपचार और उसका महत्त्व - शिराएँ स्वभावतः ही चञ्चल होती हैं । वे मछली की तरह परिवर्तन करती हैं । इसलिये शिरामों के विषय में तज्ज्ञ ( उनका जानकार ) कोई भी नहीं होता । अतः इनका वेध प्रयत्न-पूर्वक ही करे । शस्त्रकर्म में अज्ञ व्यक्ति यदि शरीर के ऊपर शस्त्र चलावे तो पहले कही हुई व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं । बहुत से उपद्रव भी पैदा होते हैं । शिरावेध अच्छे प्रकार करने पर जैसे व्याधियाँ शान्त होती हैं, वैसे स्नेहन - स्वेदनों से अथवा लेपों से शान्त नहीं होती ।

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सुश्रुतसंहिता कायचिकित्सा में जैसे अच्छे प्रकार दिया हुआ वस्ति का महत्व है वैसे ही शल्यतन्त्र ( शस्त्रकर्म ) में शिरावेध

चिकित्सार्ध है । २०-२३ ॥

विमर्श: -- शिरावेध का महत्व बताने के लिये और भी एक श्लोक मिलता है- ( मांसभेदोऽस्थिमज्जानः शोणितस्या वसेचनात् । धमन्यश्च विशुध्यन्ति दुष्टरक्तारत्वचश्च या. ॥ रसस्वेदादिनिप्यन्दा द्विशुष्यन्ति ) 1 तत्र स्निग्ध - स्विन्नवान्त - विरिक्ता स्थापितानुवासित शिराविद्धै ' परिहर्त्तव्यानि --क्रोधायास - मैथुन - दिवास्वप्न वाग्व्यायाम ' पा ० ' ) याना ध्ययन - स्थाना - सन- चङ्क्रमण तप विरुद्धा सात्म्या जीर्णान्याबललाभात्,

मन्यन्ते ।

एतेषां विस्तरमुपरिष्टाद्वच्यामः ॥ २४

स्नेहन - स्वेदनादि करने पर किन किन बातों को ( व्यायाम शीत वाता मासमेके ॥ वर्ज्य करन चाहिये – स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनु-वासन और शिरावेध करने पर क्रोध, आयास ( परिश्रम ), मैथुन ( स्त्रीप्रसङ्ग ), दिन में सोना, वाग्व्यायाम ( जोर से बोलना, गाना इत्यादि ), यान ( घोडा, गाडी की सवारी ), अध्ययन, स्थान ( खडे रहना ), आसन ( बैठे रहना ), चक्रमण ( घूमना ), शीत ( ठडक ), हवा ( भाँधी वगैरह ), आतप ( घाम या धूप ), विरुद्ध, असाम्य और अजीर्ण इत्यादिकों का, वल आने तक त्याग करना चाहिये । कई विद्वानों का मत है कि एक मास पर्यन्त उपर्युक्त वातों को छोडना चाहिये । इन सर्वो का विस्तार आगे चल कर करेंगे ॥ २४ ॥

विमर्श: - उपर्युक्त वातों का त्याग करने से वल भाता है तथा विद्ध स्थान शीघ्र भर जाते हैं ।

भवतञ्चात्र ---सिराविषाणतुम्बैस्तु जलौकाभिः पदैस्तथा ।

अवगाढं यथापूर्वं निर्हरेद् दुष्टशोणितम् ॥ २५ ॥

अवगाढे जलौका ' स्यात्प्रच्छन्नपिण्डिते हितम् ।

शिराऽङ्गव्यापके रक्ते शृङ्गा लावू त्वचि स्थिते ॥ २६ ॥

इति सुश्रुतसंहिताया शारीरस्थाने शिरा व्यधविधि-शारीर नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

रक्तनिर्हरण - साधनों का स्थानानुकूल प्रयोग- शिरामोक्ष ( रक्त निकलना ), विषाण ( सींगी लगाना ), तुम्बी, जलौका, पद ( प्रच्छान ) - पूर्व पूर्व प्रकार गंभीर देश के लिये करते हुए दुष्ट रक्त का निर्हरण करना चाहिए । अर्थात् खूब गभीर प्रान्त में रक्त दुष्ट हो तो शिरावेध करे, उसके ऊपर हो तो विपाण ( सींगी लगाने ) का प्रयोग करे, और थोड़ा ऊपर होने से तुम्बी, त्वचा के नीचे प्रदेश में होने से जलौका लगावे और त्वचा ( चर्म ) में हो तो पद ( प्रच्छान ) करना चाहिये । खूब गंभीर प्रान्त में रक्तदुष्टि हो तो जलौका ( जोक ) लगावे । पिंडित जगह में प्रच्छान करे, सर्व शरीर में रक्तदृष्टि हो तो शिरावेध करे और त्वचागत हो तो सींगो था अलाबू का प्रयोग करे ॥ २५-२६ ॥ विमर्श: - तुम्बी लगाने की विधि को ( capping ) और जलौका को ( leech ) जॉक कहते हैं । तुम्बी ( capping ) करना हो तो जहाँ दर्द अथवा दुष्ट रक्त हो उस जगह पर छोटी परई में बत्ती लगाकर, मृत्पात्र को उल्टा करके रखे । मृत्पात्र के स्थान में किसी धातु का पात्र नहीं लगाना चाहिये । परिणाम यह होता है कि बत्ती की उगता से जिस जगह बत्ती लगाई हो उसके ऊपर की हवा हट जाती है । और बाहर की हवा का दबाव मृत्पात्र के चारों ओर से उस स्थान के बाह्य भागों पर पड़ता है जिनके कारण शरीर का वह भाग पात्र में जाने लगता है । उसमे दर्द अथवा दुष्ट रक्त वाली जगह का दर्द उस प्रदेश की विस्तृति से हटता है अथवा दुष्ट रक्त बाहर ( फोड़े द्वारा ) चला आता है । पश्चात् कप ( cup ) अथवा मृत्पात्र को हटाते हैं । कभी वह पात्र द बैठने के कारण हटाया नहीं जा सकता है, तब उसे फोड देते हैं । पात्र फूट सके, इसी सुभीते के लिये मृत्पात्र अथवा कप लेना प्रशस्त होता है । धातु का पात्र फोड़ने में दिक्कत होती है । इससे कभी प्राणों पर भी बीतती है । अतः धातु पान्न का

तुम्बी ( cupping ) के लिये उपयोग न करे ।

इति सुश्रुते शारीरस्थानेऽष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ८ ॥

शारीरे प्रश्नाः--( १ ) शल्यशास्त्रे सिरावेधस्य प्राधान्य प्रद, कस्मादधुना तस्य प्रचारस्यावरोधी जात.? अवरोधनिवारणोपायाश्च के? ( २ ) रक्तमोक्षणे के च अन्य उआया? कुत्र कुत्र च तेषाप्रयोगा? केपा रक्तमोक्षण निपिडम्? ( ३ ) रक्तनिर्हरणे सामान्यविधिः सिरायन्त्रणप्रकार, तथा समुपयुक्तः कालच लेखनीय । ( ४ ) रक्तनिर्हरणे कानि च शखाणि प्रयुज्यन्ते १ केषु केषु रोगेषु कुत्र कुत्र कथ च सिरावेधः कर्तव्य इति स्पष्टतया लेखनीयम् । ( ५ ) सन्धिस्थाने, विश्वाच्याञ्च कुत्र सिरावेध कर्त्तव्य? ( ६ ) परिशुष्का - कूणिता - कुचिताना तथा अनुत्थितविद्वानां च लक्षणानि कानि १ -0070400- * नवमोऽध्यायः

। अथातो धमनी व्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ।

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ १ ॥

ra धमनी व्याकरण नामक शारीर कहेंगे । जैसा कि । भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है ॥ १ ॥

विमर्श -- पिछले अध्याय में शिराव्यध का वर्णन होने के पश्चात् शिरा और धमनी का साम्य होने से, अव धमनी का विवरण करेंगे । धमनी शब्द से कुछ विद्वान् ( cerebral | nerves नाडियाँ ) समझते हैं और कुछ ( arteries ) शुद्ध / रक्त चाहिनियाँ |

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अध्यायः ९ ] शारीरस्थानम् ६६ चतुविशतिर्धमन्यो नाभिप्रभवा अभिहिताः । तत्र केचिदाहुः - सिराधमनी - स्रोतसामविभाग, सिरावि कारा एव हि धमन्यः स्रोतांसि चेति । तत्तु न सम्यकू, अन्या एव हि धमन्यः स्रोतासि च सिराभ्यः, कस्मात्? व्यञ्जनान्यत्वात्, मूलसन्नियमात्, कर्मवैशेष्यात्, आगमाच्च, केवलं तु परस्परसन्निकर्षात् सदृशागमकर्म त्वात् सौक्ष्म्याश्च विभक्तकर्मणामप्यविभाग इव कर्मसु भवति ॥ २ ॥

धमनीविवरण: - नाभि से उत्पन्न होने वाली २४ धमनियाँ कही गई है । कई विद्वानों का मत है कि शिरा, धमनी और स्रोतस ये एक ही हैं, धमनियाँ और स्रोतस शिराओं के विकार हैं । किन्तु यह मत ठीक नही है । शिराओं से धमनियाँ और स्रोतस् भिन्न ही है । क्योंकि इनके व्यंजन ( आकृति, चिह्न अथवा लक्षण ) भिन्न हैं । इनके मूल भी भिन्न भिन्न हैं, कर्म भी अलग हैं और शास्त्र में भी इनको पृथक पृथक माना है । तथापि परस्पर में सम्बन्ध होने के । कारण, शास्त्र में ( शिरा, स्रोतस्, धमनी, आशय, ये सब आकाशीय माने गये हैं । ) समान वचन मिलने के कारण तथा इनके साधारण कर्म के कारण और सूक्ष्मता के कारण शिरा, स्नायु और धमनी के कार्य भिन्न होने पर भी ये सब एक ही मालूम होते हैं ॥ २ ॥

विमर्श - इस गद्य में शिराएँ, स्नायु और धमनियाँ भिन्न होने पर भी एक क्यों मालूम पढ़ते हैं, यह बताया गया है । तासां तु नाभिप्रभवाणां धमनीनामूर्ध्वगा दश, दश चाघोगामिन्यः, चतस्रस्तिर्यग्गाः ॥ ३ ॥

धमनी के प्रकार - नाभि से उत्पन्न होने वाली धमनियो में से दुस ऊपर को, दस नीचे की ओर और चार तिरछी जाती है ॥ ३ ॥

विमर्श: - गर्भावस्था में होने वाली २४ धमनियों का विभाग बताया गया है । ऊर्ध्वगाः – शब्द - स्पर्श - रूप - रस- गन्ध - प्रश्वासोच्छ्वा सजृम्भित - क्षुद्धसित कथित रुदितादीन् विशेषानभि-वहन्त्यः शरीरं धारयन्ति । तास्तु हृदयमभिप्रपन्ना-स्त्रिधा जायन्ते तात्रिंशत् । तासां तु वात - पित्त-कफ - शोणित - रसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश, शब्द रूप - रस-गन्धानष्टाभिर्गृह्णीते, द्वाभ्यां भाषते, द्वाभ्यां घोषं करोति, द्वाभ्यां स्वपिति, द्वाभ्यां प्रतिबुध्यते, द्वे चाश्रुवाहिन्यौ, द्वे स्तन्यं स्त्रिया वहतः स्तनसंश्रिते, ते एव शुक्रं नरस्य स्तनाभ्यामभिवहतः, तास्त्वेतास्त्रिशत् सविभागा व्याख्याताः । एताभिरुवं नाभेरुदर - पार्श्व-पृष्ठोरः - स्कन्ध - प्रीवा - बाहवो धार्यन्ते याप्यन्ते च ॥ ५ ॥

ऊपर जानेवाली धमनिया - ऊपर जानेवाली ( धमनियां ) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रश्वास, उच्छ्वास, जृम्भित ( जम्हाई ), तुत् ( छींक ), हसित ( हँसना ), कथित । ( बोलना ), रुदित ( रोना ) इत्यादि को वहन करती हुई शरीर को धारण करती हैं । वे धमनियाँ हृदय को प्राप्त होती हुई तीन भागों में विभक्त होने के कारण ३० हो जाती हैं । उनमें से वात, पित्त, कफ, रक्त और रसों को दो - दो वहन करती हैं । इस प्रकार वे दस होती है । आठ धमनियाँ शब्द, रूप, रस, गन्धों को वहन करती है । ' दो धमनियों से वोला जाता है । दो के द्वारा घोष अर्थात् अव्यक्त ध्वनि की जाती है । दो से सोया जाता है । दो से जागा जाता है । दो अश्रुओं को वहन करती है । दो स्त्रियों के स्तनों में रहती हुई दूध का वहन करती हैं । वे ही दो धमनियाँ पुरुष में स्तनों में । रह कर शुक्र का वहन करती हैं । इसी प्रकार तीस धमनियों का शाखा प्रशाखाओं में विभाग कर दिया गया है । इन्हीं से नाभि के ऊपर ( पेट ), पार्श्व ( बगल ), पृष्ठ ( पीठ ), उरः, स्कन्ध ( कन्धे ), ग्रीवा ( गर्दन ) और बाहु ( भुजाओं ) का धारण और पोषण होता है ॥ ५ ॥

विमर्श: - शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि को वहन करने वाली धमनियाँ कैसी होंगी? धमनी शब्द से शुद्ध रक्त-वाहिनी ( Artery ) लिया जाय तो, उसमें से शुद्ध रक्त ( Oxygenated blood ) का वहन होता है । यदि धमनी शब्द से वातनाडी ( Nerve ) समझें तो उनमें से पित्त, कफ और शोणित, का वहन नहीं होता तो भी वातनाडियाँ पित्ताशय, कफाशय, शोणिताशयों को जाती तो जरूर है । इस जगह धमनी से यह स्पष्ट होता है कि उनके द्वारा शब्द स्पर्शादि इन्द्रियों का पोषण ठीक प्रकार हो जाता है । कहा भी है " एताभिः " धार्यन्ते याप्यन्ते चेति " ।

भवति चात्र-ऊर्ध्वमास्तु कुर्वन्ति कर्माण्येतानि सर्वशः ।

अधोगमास्तु वक्ष्यामि कर्म तासां यथायथम् ॥ ६ ॥

ऊपर जाने वाली धमनियाँ पूर्ण प्रकार से ये सब कार्य करती हैं और नीचे की तरफ जाने वाली धमनियों को एवं उनके कार्यों का आगे यथोचित वर्णन करेगे ॥ ६ ॥

अघोगमास्तु वातमूत्रपुरी पशुक्रार्त्तवादीन्यधो वहन्ति । तास्तु पित्ताशयमभिप्रपन्नास्तत्रस्थमेवान्नपान-रसं विपक्कमौध्याद्विवेचयन्त्योऽभिवहन्त्यः शरीर तर्पयन्ति, अर्पयन्ति चोर्ध्वगानां तिर्यग्गाणां च रस-स्थानं चाभिपूरयन्ति, मूत्रपुरीषस्वेदांश्च विवेचयन्ति, आमपक्काशयान्तरे च त्रिधा जायन्ते, तात्रिंशत् । तासां तु वातपित्तकफशोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता द्श, द्वे अन्नवाहिन्यावन्त्राश्रिते, तोयवहे द्वे, मूत्रबस्ति-मभिप्रपन्ने मूत्रवहे द्वे, शुक्रवहे द्वे शुक्रप्रादुर्भावाय, द्वे विसर्गाय, ते एव रक्तमभिवहतो विसृजतश्च नारीणा-मार्त्तवसंज्ञम्, द्वे बचनिरसन्यौ स्थूलान्त्रप्रतिबद्धे अष्टावन्यास्तिर्यग्गामिनीनां धमनीनां स्वेदमर्पयन्ति, तास्त्वेतास्त्रिशत् सविभागा व्याख्याताः । एताभिरवो नाभे. पक्काशय - कटी मूत्र- पुरीप - गुद-वस्ति मेद्र - सक्थीनि धार्यन्ते याप्यन्ते च ॥ ७ ॥

अधोगामी धमनियों के कार्य- अधोगामी घननियाँ वात

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सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 420 का मूल पृष्ठ
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सुश्रुतसंहिता ७० वायु ), मूत्र, पुरीप ( मल ), शुक्र, आर्त्तव को | के मुख रोमकूपों से मिले होते हैं । इन ( मुसों ) के द्वारा ( नीचे अपना की ओर वहन करती हैं । वे पित्ताशय को प्राप्त होती । हुई अग्नि की उष्णता से वहाँ के चिपक्क ( ठीक पके हुए ) अन्नरस और जलीय रसों का विवेचन और वहन करती हुई शरीर का तर्पण ( पोषण ) करती हैं । ऊर्ध्वगत और तिर्यग्गत धमनियों का रस अर्पण करती हैं और रसस्थान ( हृदय ) को रस द्वारा भर देती हैं । मूत्र, पुरीप और स्वेद का अलग अलग विभाग कर देती हैं । आमाशय और पक्काशय के बीच । में ( इन धमनियों के ) तीन प्रकार होते हैं । इस प्रकार ३० धमनियाँ होती है । उनमें से बात, पित्त, कफ, रक्त और रसों को दो - दो धमनियाँ वहन करती हैं । इस प्रकार दस धमनियाँ हुई । अन्त्रों का आश्रय करके अन्न को वहन करने वाली दो, जल का वहन करने वाली दो, मूत्रवस्ति ( Bladder ) को प्राप्त होकर मूत्र का वहन करने वाली दो शुक्र की उत्पत्ति करने लिये शुक्र का वहन करने वाली दो, ( शुक्र का ) त्रिसर्ग ( बाहर निकालने ) के लिये दो, वे हो दो ( धमनियाँ ) स्त्रियों के आर्त्तव को वहन करती हैं तथा उसका विसर्ग करती हैं । दो स्थूलान्त्र ( बृहदन्त्र large intestine ) मैं लगी हुई मल को निकालती हैं । शेष आठ धमनियाँ तिर्यग जाने वाली धमनियों के स्वेद को अर्पण करती हैं । इसी प्रकार यथाविभाग तीम धमनियों की व्याख्या हुई । इन धमनियों से नाभि के नीचे के पक्वाशय, कमर, मूत्र, पुरीप ( मल ), गुढ, वस्ति ( Bladder मूत्राशय ), ढ ( मूत्रेन्द्रिय ) और सक्थि धारण की जाती है और इन्हीं से इनका पोषण होता है ॥ ७ ॥

विमर्श - उक्त श्लोकों में अधोगामी धमनियों को रक्ता-शय और विसर्ग संस्थानों में विभक्त करके स्पष्ट किया है ।

भवति चात्र-अधोगमास्तु कुर्वन्ति कर्माण्येतानि सर्वशः ।

तिर्यग्गाः संप्रवच्यामि कर्म चासां यथायथम् ॥ ८ ॥

अधोगामी सब धमनियाँ ( उपर्युक्त ) इन सब कार्यों को करती हैं । और आगे तिर्यग्गत धमनियों तथा इनके यथा-योग्य कर्मों को कहेंगे ॥ ८ ॥

तिर्यग्गाणां तु चतसृणां धमनीनामेकैका शतधा सहस्रधा चोत्तरोत्तरं विभज्यन्ते, तास्त्वसंख्येयाः, ताभि-रिडं शरीर गवाक्षितं विवद्धमाततं च तासां मुखानि रोमकूपप्रतिश्रद्धानि, यैः स्त्रेदमभिवन्ति रसं चाभि-तर्पयन्त्यन्तर्बहिश्च, तैरेवं चाभ्यास परिपेकावगाहालेपन-वीर्याण्यन्त शरीरमभिप्रपद्यन्ते त्वचि विपक्वानि, तैरेव च स्पर्श सुखमसुखं वा गृहीते, तास्त्वेताश्चतस्रो धमन्यः सर्वाङ्गगता. सविभागा व्याख्याताः ॥ ६ ॥

तिर्यग् वमनियों के कार्य --- चार तिर्यग्गत धमनियों में से प्रत्येक धमनी उत्तरोत्तर सैकडों और सहस्रों प्रकारों से विभक्त होती हैं । इस प्रकार वे शाखाएँ असरय होती हैं । धमनियों से यह शरीर गवाक्षित ( जाल ) के समान बँधा हुआ है और आत ( फैला हुआ है । टन धमनियों स्वेद ( पसीने ) का वहन होता है । रस द्वारा भीतर चाहर दोनों ओर तर्पण करती हैं । इन मुग्वों से अभ्यङ्ग ( मालिश ), परिषेक ( स्नान ), अवगाहन, आलेपन ( उबटन ) इत्यादिकों का त्वचा में परिपक्क हुआ वीर्य शरीर के भीतर पहुँचता है । इन्हीं के द्वारा सुखकर अथवा भसुखकर स्पर्श का ग्रहण किया जाता है । इस प्रकार सब शरीर में व्याप्त विभाग के साथ ये चार धमनियाँ बतायी गयी हैं ॥९ ॥

विमर्शः - तिर्यग्गत धमनियों को हजारों शाखाये होती हैं । उन शाखाओं के मुख होते हैं । इन्हीं मुखों द्वारा तेल, जल आलेपनों का शोषण होता है । स्पर्शज्ञान भी इनके ही द्वारा होता है ।

भवतश्चात्र-यथा स्वभावतः खानि मृणालेषु विसेषु च ।

धमनीनां तथा खानि रसो यैरुपचीयते ॥ १० ॥

धमनियों को मृणालों का दृष्टान्त- जिस प्रकार मृणाल ( कमलनाल ) और चिप्स ( सूक्ष्मतर कमलनाल ) में स्वभावतः छिद्र होते हैं, उसी प्रकार धमनियों में छिद्र होते हैं जिनके द्वारा रस का उपचय ( ग्रहण ) होता है ॥ १० ॥

विमर्श: - मृणाल में जिस प्रकार छिद्रों द्वारा जल का शोषण होता है, उसी प्रकार धमनियों द्वारा रस का शोषण हुआ करता है । पञ्चाभिभूतास्त्वथ पञ्चकृत्वः पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयन्ति । पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयित्वा पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले ॥ ११ ॥

( अथ पञ्चाभिभूता, पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु पक्ष कृरव, भावयन्ति । पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु, भावयित्वा, विनाशकाले, पञ्चत्वम्, आयान्ति ) । धमनियों की उत्पत्ति, कार्य और लय – पञ्चाभिभूताः ( पञ्च महाभूतों से उत्पन्न हुई धमनियां ), पञ्चेन्द्रिय ( पांच इन्द्रिय वाले कर्म पुरुष को ), पञ्चसु ( कर्ण, नेत्र, जिह्वा ss दि पञ्च इन्द्रियाधिष्ठानों में ), पञ्चकृत्व ' ( पर्याय से पांच बार ), भावयन्ति ( नियोजित करती हैं ) । पञ्चेन्द्रियं ( सूक्ष्म रूप इन्द्रिय - पञ्चक को ) पञ्चसु ( आकाशादि पञ्चमहाभूतों में ), भावयित्वा ( नियोजित करके ), विनाश-काले ( नाश होने के समय में ), पञ्चत्व ( नाश को ) आयान्ति ( प्राप्त होती है ) । इस प्रकार धमनियाँ पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश | से उत्पन्न होकर, इन्द्रियाधिष्ठान कर्ण, नेत्र, त्वचादिकों में पर्याय से पांच बार प्राणियों को लगाती है । किन्तु प्राणियों का नाश होते समय वे ही धमनियाँ पञ्चमहाभूतों में सूक्ष्म शरीर को व्याप्त करती हुई विनाश को प्राप्त होती हैं । ( अ ) कई विद्वानों के मत से " पञ्चादिभूतान्यथ पञ्च-कृत्वा " ऐसा पाठ है । ( आ ) दूसरे आचायों के मत से “ पञ्चादिभूतास्त्वथ । पद्मधा वा " ऐसा पाठ है ।