श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 421–430

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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अध्याय ८ ] शारीरस्थानम् ७१ गयी के मत में रूपरसादि पञ्चक चक्षु, जिह्वा इत्यादि इन्द्रिय - पञ्चकको पाच धमनियां लगाती हैं । किन्तु वे मन के साथ संसक्त होती हुई भिन्न - भिन्न समयों में इन्द्रियार्थ पञ्चकों का ज्ञान कराती है । क्योंकि शरीर में मन तो एक ही है और मन को लेकर ही इन्द्रियार्थों का ग्रहण होता रहता है । किन्तु मृत्यु के समय वे धमनियाँ अपने अपने भूतों में विभक्त होती हुई उनमें लीन हो जाती हैं । ग्रन्थान्तर में धमनियों के जो कार्य बताये गये हैं वे

इस प्रकार हैं-' रसवहनं कुर्वन्ति धमन्यः सततं तथा ।

शब्दादिग्रहणोच्छ्वास निःश्वासवचनानि च ॥

भावयन्ति पृथक् पश्चात् प्रत्ययाः खलु पञ्चसु ।

तरसल्याकरणं यान्ति नाशकाले तु पञ्चताम् ॥

शरीर हि गते तस्मिञ् शून्यागारमचेतनम् ।

पञ्चतत्वावशेषत्वात् पञ्चतां गतमुच्यते ' ॥

अर्थात् धमनियाँ रस का निरन्तर वहन करती हैं और शब्दादिकों को ग्रहण करती हैं, श्वासोच्छ्वास और वचनों को भी ग्रहण करती है । इसके बाद पांच प्रकारों का ज्ञान होता है । किन्तु मृत्यु के समय पांच महाभूतों में विभक्त होती हैं । विनाशकाल में शरीर अचेतन और शून्य वासस्थान के समान अचेतन होना है और पञ्चतत्वों में अवशेष रह जाने से पचत्व को प्राप्त हुआ कहलाता है ॥ ११ ॥

विमर्श: - तक के वर्णन से धमनी को वातनाडी ( Nerve ) समझना योग्य प्रतीत होता है । किन्तु रूढार्थ तो धमनी ( Artery ) है । तन्त्रान्तरों में भी वर्णन है कि अष्ठ मूलभाग में धमनी ( Radial artery ) होती है । raat धमनियाँ ( Olfactory nerves ), रूपवह ( Optic nerves ), रसवह ( Lingual nerves ), शब्दवहू | ( Auditory nerves ), इत्यादि प्रकारों से धमनी का अर्थ वातनाडी ( Nerve ) होता है । और शुद्ध रक्तवाहिनी की सज्ञा रोहिणी ( Artery ) है । वृद्धवाग्भट में ' समागूढाः farar रोहिण्यः शुद्धरक्तम् ' ऐसा वचन भी है । इससे यह सिद्ध है कि रोहिणी शुद्ध रक्तवाहिनी की संज्ञा है । अत ऊर्ध्वं स्रोतसां मूलविद्धलक्षणमुपदेक्ष्यामः । तानि तु प्राणान्नोदक - रस - रक्त मांस- मेदो - मूत्र पुरीप - शुक्रार्त्तववहानि येष्वधिकारः, एकेषां बहूनि एतेषां विशेपा बहवः । स्रोतों के मूलों में विद्ध होने पर पैदा होने वाले लक्षण -अव स्रोतों के मूल में विद्ध होने वाले लक्षण कहेंगे । वे स्रोतवह, अन्नवह, उदकवह, रसवह, रक्तवह, मासवह, मेदोवह, मूत्रवह, पुरीपवह, शुक्रवह और भार्त्तववह होते हैं । इन्हीं का ( ११ प्रकारों के स्रोतों का शल्यतन्त्र में ) अधिकार है । एक स्रोत के बहुत स्रोत होते हैं । इनके भी बहुत से भेद होते हैं । ( अ ) तत्र प्राणवहे द्वे, तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च ( प्राणवाहिन्यश्च ) धमन्य ', तत्र विद्धस्याक्रोशन विनमन मोहन - भ्रमण - वेपनानि मरणं वा भवति । ( अ ) प्राणवह स्रोत दो हैं - उनका मूलस्थान हृदय और रक्तवाहिनी धमनियाँ हैं । उनके विद्ध होने से आक्रोश ( चिल्लाना ), विनमन ( झुकना ), मोहन ( मूर्च्छा ), भ्रम | ( चक्कर ) और वेपन ( कम्प ) अथवा मरण भी प्राप्त होता है । विमर्श:: -- - प्राणवह स्रोत फुप्फुस होते हैं । वे भी दो । होते हैं । इनका भी मूलस्थान फुप्फुसीय रक्तवाहिनियां और | हृदय होता है, उसी प्रकार फेफडे ( Lungs ) विद्ध होने पर । प्राणवह स्रोतों के समान लक्षण पैदा होते हैं । ( आ ) अन्न द्वे, तयोर्मूलमामाशयोऽन्नवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्धस्याध्मानं शूलोऽन्नद्वेषश्छर्दिः पिपा-साऽऽन्ध्यं मरणं च । ( आ ) अन्नवह स्रोत दो होते हैं । उनका मूल आमा-शय और अन्नवह धमनियां हैं, उनके विद्ध होने से आध्मान ( पेट फूलना ), शूल ( पेट में दर्द ), अन्नद्वेप ( खाने की इच्छा का अभाव ), छर्दि ( कै ), पिपासा ( प्यास ), आ-न्ध्य ( दृष्टि घटना अथवा सर्वथा नाश ) और मरण भी प्राप्त होता है । विमर्श: --- अन्नवह स्रोत ( Pharynx ) और अन्ननलिका । ( Oesophagus ) दो हैं । और धमनियाँ या नाडियां ( Vagi ) और ( Sympathetic nerves ) भी दो हैं । ( इ ) उदकत्र द्वे, तयोर्मूलं तालु क्लोम च, तत्र | विद्धस्य पिपासा ( पिपासाऽसाध्या श्यावाङ्गता पाठः ) | सद्योमरणं च । ( इ ) उदकवह स्रोत दो हैं । उनका मूल स्थान तालु और क्लोम है । उनके विद्ध होने पर प्यास लगती है और काल मृत्यु होती है । ( पाठभेद के अनुसार असाध्य पिपासा और कृष्णाङ्गता ) । विमर्श - उदकवह स्रोत गल और कण्ठनाडी दो हैं । उनके मूल तालु ( Palate ) और क्लोम ( Pharynx ) हैं । a ( ई ) रसवहे द्वे. तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्धस्य शोपः प्राणवहविद्धवच्च मरणं तलिङ्गानि च । ( ई ) रसवहस्रोत दो हैं । उनके मूल हृदय और रस-वाहिनी धमनियाँ हैं, उनके विद्ध होने पर शोप ( चय ) और प्राणवह स्रोतों के विद्ध होने के समान लक्षण होते हैं और मृत्यु होती है । विमर्श: - रसवहस्रोत ( Lymphatic and Thoracio Duct ) दो हैं । और उनके मूल हृदय. Heart ) तथा रसवह धमनियाँ ( Glosso pharyngeal and Lingual nerves ) हैं । ( ङ ) रक्तव द्वे, तयोर्मूलं यकृत् प्लीहानौ रक्तवाहि-न्यश्च धमन्यः, तत्र विद्धस्य श्यावाङ्गता ज्वरो दाहः पाण्डुता शोणितागमनं रक्तनेत्रता च । ( उ ) रक्तवह स्रोत दो हैं । इनके मूल यकृत ( जिगर Laver ), प्लीहा ( तिल्ली spleen ) और रक्त को वहन करने वाली धमनिया हैं । इन स्रोतों के विद्ध होने से शरीर काला पड़ जाता है, ज्वर भाता है, दाह होता है, शरीर सफेद होता । है ( Anemia ), रक्त निकलता है और आंखें लाल होती हैं ।

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७२ सुश्रुतसंहिता ( ऊ ) मांसवहे द्वे, तयोर्मूल स्नायुत्वचं रक्तवहाश्च धमन्यः, तत्र विद्धस्य श्वयथुर्मासशोपः सिराग्रन्थयो मरणं च | ( ऊ ) मांसवहस्रोत दो हैं । उनका मुल स्नायु, स्वचा और रक्तवह धमनियाँ है । उनका वेध होने से सृजन, मांस शोप ( शरीर का सूसना ), शिरा - ग्रन्थि और मृत्यु, ये लक्षण होते हैं । ( ए ) मेदोवहे द्वे, तयोर्मूलं कटी वृक्कौ च तत्र विस्य स्वेदागमनं स्निग्धाङ्गता तालुशोपः स्थूलता शोफः पिपासा च | ( ए ) मेदोवह स्रोत दो हैं । उनके मूल कटि और दो वृक्क ( गुर्दे Kidneys ) हूँ । इनके विद्ध होने से पसीना, अह्न की स्निग्धता, तालुशोप, स्थूलता, सूजन और प्यास इत्यादि लक्षण होते हैं । ( ऐ ) मूत्र द्वे, तयोर्मूलं मेढ ' च, तत्र विद्धस्या-नवस्तिता मूत्रनिरोधः स्तब्धमेढ्रता च । ( ऐ ) मनवह स्रोत दो हैं । उनके मूल बस्ति ( Bladder ) और मेट ( मवेन्द्रिय ) हैं । उनके विद्ध होने से बस्ति फूलती है । मूत्र रुकता है और मूत्रेन्द्रिय स्तब्ध होती है । ( ओ ) पुरीपवहे द्वे, तयोर्मूलं पक्काशयो गुदं च, तत्र विद्धस्यानाहो दुर्गन्धता प्रथितान्त्रता च । ( ओ ) पुरीषवह स्रोत दो हैं । उनके मूल पक्वाशय ( Large Intestine ) स्थूलान्त्र और गुद ( Rectum ) हैं । इनके वि होने से आनाह ( पेट फूलना ), दुर्गन्ध और आंतों में ग्रंथि ये लक्षण होते हैं । ( अ ) शुक्रवहे द्वे, तयोर्मूलं स्तनौ वृपणौ च तत्र विद्वस्य क्क़ीबता चिरात्प्रसेको रक्तशुक्रता च ( वाऽ-प्रसेक. पाठः ) । ( औ ) शुरुवह स्रोत ( Seminiferous Tabales ) दो हैं । उनके मूल दो स्तन ( Nipples ) और दो वृपण ( restes ) हैं । इनके चिह्न होने से क्लैव्य, देर से शुक्र का प्रसेक होना ( अर्थात् वीर्य का क्षीण होना और शुक्र का रक्तयुक्त हो जाना ), ये लक्षण होते हैं । ( i ) आवहे द्वे, तयोर्मूलं गर्भाशय आर्त्तव-वाहिन्यश्च धमन्यः । तत्र विद्वायां बन्ध्यात्त्रं मैथुना-सहिष्णुत्वमार्त्तवनाशश्च | ( अ ) आर्तववह स्रोत दो हैं । उनके मूल गर्भाशय ( Uterus ) और आतंत्र को वहन करनेवाली धमनियाँ हैं । वे चिढ़ होने पर कीवता ( Impotency नपुंसकता ), बन्ध्यापन ( Sterility ), मैथुन सहन करने की सामर्थ्य का न होना, आर्तवनाश ( Amenorrhea ) ये लक्षण होते हैं ( अ ) सेवनीच्छेदानुजाप्रादुर्भावः । ( अ. ) सेवनी विद्व होने पर वेदना उत्पन्न होती है । ( क ) बस्तिगुडविलक्षण प्रागुक्तमिति - स्रोतो-विद्ध. तु प्रत्याख्यायोपचरेत् । उद्धृतशल्यं तु क्षतविधा-नेनोपचरेन ॥ १२ ॥

( क ) वस्ति और गुद विद्ध होने के लक्षण पहिले क गये हैं । स्रोतोविद्ध होने पर ' प्रत्याख्येय ' ( अच्छा न हो सकेगा ), यह कह कर चिकित्सा करनी करानी चाहिये ॥ १२ ॥

विमर्श: - शल्य निकालने पर क्षत के समान चिकित्सा करनी चाहिये । यद्यपि अस्थि मज्जा स्वेदवाहि स्रोत भी होते हैं, तथापि उनका शल्यतन्त्र में कोई प्रयोजन न होने के कारण निर्देश नहीं दिया है ।

भवति चात्र-मूलात् खादन्तरं देहे प्रसृतं त्वभिवाहि यत् ।

स्रोतस्तदिति विज्ञेयं सिराधम निवर्जितम् ॥ १३ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने धमनीध्याकरण-शारीरं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥

स्रोत का लक्षण - शरीर में मूल छिद्र से फैले हुये और रस को अभिवहन करने वाले अन्तर ( छिद्र अथवा अवकाश ) को स्रोत समझना चाहिये ॥ १३ ॥

विमर्श: - चरक में स्रोत का लक्षण निम्न प्रकार से दिया - स्वधातुममवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च । स्रोतांसि दीर्घा-व्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ॥ ' चरक - विमानस्थान ५ अ ० । इति सुश्रुते शारीरस्थाने नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ९ ॥

शारीरे प्रश्नाः ( १ ) स्रोतसो लक्षण सोदाहरण लेसनीयम् । शल्यशास्त्रे च कतिविधानि स्रोतामि तेपा नामानि च कानि? ( २ ) धमनीशब्दस्य कोऽर्थं । तत्प्रभवस्थान किम्? तिर्यग्गत-वाहिनीना कर्माणि च कानि?

( ३ ) पचाभिभूतास्त्वथ पकृत्व पञ्चेन्द्रिय पञ्चसु भावयन्ति ।

पन्चेन्द्रिय पक्षसु भावयित्वा पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले ॥

अस्य पचस्य विस्तारपूर्वक व्याख्या करणीया । ( ४ ) केपा स्रोतसा विद्धत्वेन निश्चित मरणं भवति? ( ५ ) पिपासा स्वेदागमन - स्थूलत्व शोफता तालुशोपन्च कस्य स्रोतसो वेधनेन भवन्तीति नामनिर्देश कृत्वा लेसनीयम् । दशमोऽध्यायः

अथातो गर्भिणीव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ।

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ १ ॥

अथ गर्भिणी व्याकरण नामक शारीर की व्याख्या करते हैं, जैसे भगवान् धन्वन्तरि कह गये हैं ॥ १ ॥

विमर्श: -- इस अध्याय में प्रसूति तन्त्र ( Midwifery ) | और चालकों के विकार तथा स्तन्यदोष इत्यादि विषयों का विचार किया गया है । गर्भिणी प्रथमदिवसात्प्रभृति नित्यं प्रहृष्टा शुच्य-लंकृता शुक्लवसना शान्तिमङ्गलदेवतात्राह्मण गुरुपरा

पृष्ठ 423

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श्रध्यायः १० ] शारीरस्थानम् ७३ च भवेत्, मलिनविकृतहीनगात्राणि न स्पृशेत्, दुर्गन्ध-दुर्दर्शनानि परिहरेत्, उद्वेजनीयाश्च कथाः शुष्कं पर्यु · पितं कुथितं क्लिन्नं चान्नं नोपभुञ्जीत, बहिर्निष्क्रमणं शून्यागारचैत्य- श्मशानवृक्षाश्रयान् ( क्रोधभयभास्करांश्च ' पा ' ) भावानुच्चैर्भाष्यादिकं च परिहरेद् यानि च गर्भं व्यापादयन्ति न चाभीक्ष्णं तैलाभ्यङ्गोत्सादनादीनि निषेवेत, न चायासयेच्छरीरं पूर्वोक्तानि च परिहरेत् शयनासनं मृद्वास्तरणं नात्यु-च्चमपाश्रयोपेतमसंबाधं च विदध्यात्, हृद्यं द्रवं मधुर-प्रायं स्निग्धं दीपनीयसंस्कृतं च भोजनं भोजयेत्, सामान्यमेतदाप्रसवात् ॥ २ ॥

गर्मिणी के लिये सामान्य नियम- गर्भिणी पहले दिन से सदा प्रसन्न, पवित्र अलङ्कारयुक्त, श्वेत कपडे धारण करने वाली, शान्ति रखने वाली, मंगल कार्य रत, देवता की पूजा करने वाली हो, ब्राह्मण तथा गुरु लोगों की सेवा में तत्पर रहे । मैले, विकृत, हीन ( न्यून ) अवयवों को स्पर्श न करे । दुर्गन्धयुक्त ( सडे हुए ), दुर्दर्शन ( बुरे दृश्य ), और उद्वेग ( ग्लानि ) करने वाली कथाओं को छोड़ दे । सुखा, पर्युपित ( वामी ), कुथित ( सदाहुआ ) तथा क्लिन्न ( झरने वाले ) अन्न को न खाये । बाहर निकला, शून्य गृह, चैस्य ( देव ताओं से आश्रित वृक्ष अथवा बौद्धालय ), श्मशान वृक्षों का भय, क्रोध, तथा भय युक्त पदार्थ, उसी प्रकार जोर से बोलना, हसना आदि गर्भ में बाधक बातों को छोड दे । वार-Fare तैल की मालिश तथा उबटन आदि का प्रयोग न करना चाहिये । शरीर को कष्ट नहीं देना चाहिये । उसी प्रकार गर्भावक्रान्ति अध्याय में जिन बातों का त्याग बताया है, उनका अवश्य त्याग करे । शयन और आसन पर नरम बिछौना बिछाना चाहिये । वे ( शयन, आसन आदि ) बहुत ऊंचे न हों । अपाश्रयोपेत ( निराधार न हों, असंबाध ( पीढा रहित ) हों । हृद्य ( मन को प्रसन्न करने वाली ), द्रव ( पतली ) । मधुर प्राय ( मीठी ), स्निग्ध ( स्नेिहयुक्त ), दीपनीय ( अग्निका

वर्धन करने वाली ) वस्तुओं से युक्त भोजन कराना चाहिये । ।

ये साधारण नियम प्रसूति होने तक के लिये हैं ॥ २ ॥

विमर्श - अच्छे प्रकार का भोजन करे तथा शारीरिक परिश्रम न करे, मन को कष्ट देने वाली बातों का ख्याल न करे | आराम करे | मलिन वस्त्र का परिधान न करे । ग्राम्य-धर्म ( मैथुन ), गाड़ी की सवारी आदि त्याग दे । विशेषतस्तु गर्भिणी प्रथमद्वितीयतृतीय मासेषु मधुर-शीतद्रवप्रायमाहारमुपसेवेत, विशेषतस्तु तृतीये पष्टि कौदनं पयसा भोजयेत, चतुर्थे दुधना पञ्चमे पयसा, षष्टे सर्पिषा चेत्येके ॥ ३ ॥

विशेष नियम - महीने महीने के हिसाब से - विशेष करके गर्भिणी पहले, दूसरे, तीसरे महीनों में मीठा, ठण्डा, पतला, आहार सेवन करे | बहुत से लोगों का अभिप्राय है कि तृतीय महीने में साठो चावल दूध से खिलाना चाहिये । चौथे महीने में साठी चावल दही से, पाँचवें महीने में दूध से और छठे में घी से खिलाना चाहिये ॥ ३ ॥

१० सु ० शा ० विमर्श - चरक के मतानुसार, पहले मास में दूध ठण्डा ठण्डा और वार - चार गर्भिणी पान करे और साम्य भोजन करे । द्वितीय मास में मधुर औषधों से सिद्ध किया हुआ केवल दूध का सेवन करे । तृतीय मास में दूध में घृत और मधु मिला कर | सेवन करे । चौथे मास में एक अक्ष प्रमाण में दूध का निकाला हुआ मक्खन लेना चाहिये । पचम मास में क्षीरसर्पि ( दूध - घृत ) का पान करे । पष्ठ मास में मधुर औषधों से सिद्ध किया हुआ चीरसर्पि ( दूध - घृत ) ले । चतुर्थे पयोनवनीत संसृष्टमाहारयेज्जाङ्गलमांस-सहितं हृद्यमन्नं च भोजयेत्, पञ्चमे क्षीरसर्पिः संसृष्टं, षष्ठे श्वदष्ट्रासिद्धस्य सर्पिषो मात्रां पाययेद् यवागूं वा, सप्तमे सर्पिः पृथक्पर्ण्यादिसिद्धम्, एवमाप्यायते गर्भः ॥ चौथे से सातवें महीने तक के नियम- चौथे महीने में दूध का मक्खन मिला कर सेवन करना चाहिये और जांगल मांस के साथ हृदय का हितकर भोजन करना चाहिये । पांचवे महीने में दूध और घी मिलाया हुआ ( अन्न देना चाहिये ) छठे महीने में गोखरू से पकाये हुए घी अथवा यवागू का पान कराना चाहिये । सातवें महीने में पृथक्पर्ण्यादि से बनाया हुआ घी

पिलावे ।

इस प्रकार करने से गर्भ पुष्ट होता है ॥ ४ ॥

विमर्श: - चरक के मतानुसार चतुर्थ महीने में एक अक्ष प्रमाण में क्षीर नवनीत ( दूध का मक्खन ) दे । पञ्चम महीने में क्षीरसर्पि ( दूध - घृत ) पिलावे । पष्ठ महीने में मधुर औषधों से सिद्ध किया हुआ हीर-सर्वि ( दूध घृत ) का पान करावे । सातवें महीने में छठे महीने के आहार के समान आहार देना चाहिये | अष्टमे बदरोदकेन बलाऽतिबला- शतपुष्पा-पलल पयो- दधिमस्तु - तैल- लवण - मदनफल - मधु - घृत-मिश्रेणास्थापयेत्; पुराणपुरीषशुद्ध धर्थमनुलोमनार्थं च वायोः, ततः पयोमधुरकषायसिद्धेन ( पयो-मधुकपायसिद्धेन ' पा ' ) तैलेनानुवासयेत्, अनुलोमे हि वायौ सुखं प्रसूयते निरुपद्रवा च भवति, अत ऊर्ध्वं स्निग्धाभिर्यवागूभिर्जाङ्गलर सैश्चोपक्रमेदाप्रसवकालात्, एवमुपक्रान्ता स्निग्धा बलवती सुखमनुपद्रवा प्रसूयते ॥ आठवें महीने से प्रसवपर्यन्त के नियम - आठवें महीने में चदर ( बेर ) के काढ़े में वला ( खिरेंटी ), अतिवला ( कंधी ), शतपुष्पा ( सौंफ ), पलल ( मांसरस अथवा तिलकल्क ), दूध, दही का पानी, तैल, लवण, मदन ( मैनफल ), शहद और घी को मिला कर उसकी आस्थापन वस्ति दे । यह पुराने मल के शोधन के लिये और वायु का अनुलोमन करने

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७४ सुश्रुतसंहिता के लिये है । इसके पश्चात् दूध और मधुर गण से सिद्ध किये हुए तैल से अनुचामन कराना चाहिये । चायु का अनुलोमन होने पर सुख मे और उपद्रवों मे रहित प्रसव होता है । इसके पश्चात् स्निग्ध यवागुओं से और जागल रमों से प्रसव काल तक चिकित्सा करनी चाहिये । हम प्रकार चिकित्मा करने से गर्भिगी स्नेहयुक्त बलि और उपद्रव रहित होती हुई सुम्बपूर्वक प्रस्ता होती है ॥७ ॥

विमर्श - चरक के मनानुसार आठवें महीने में क्षीर मे बनाया हुआ यवागू घी मिला कर बार - बार पिलाना चाहिये । इससे गर्भिणी स्वस्थ रहती हुई स्वास्थ्य, बल, वर्ण तथा स्वर जिम्मका ठीक हो ऐसे उत्तम पुत्र को पैदा करती है । नवें महीने में मधुर औषधों मे सिद्ध किये हुए तेल का अनुवासन करना चाहिये । योनि में तेल का पिचु ( लुगदी ) वना कर रखना चाहिये । इसमे गर्भस्थान के मार्ग का

स्नेहन होता है ।

नवमें मासि सूतिकागारमेनां प्रवेशयेत्; प्रशस्त-तिध्यादौ ॥ ६ ॥

नवम मास में मृतिकागार में रसे नवम महीने में शुभ मुहूर्त, प्रशस्त तिथि आदि देस + र सूतिकागार में प्रवेश कराना चाहिये ॥ ६ ॥

विमर्श: - चरक शारीरस्थान अध्याय अष्टम में निम्न प्रकार से करना लिखा है-' ततः प्रवृत्ते नवमे मामे पुण्येऽहनि प्रशस्त नक्षत्रयोग-सुपागते भगवति शशिनि कल्याणकरणे मैत्रे मुहूर्त्ते शान्ति कृग्वा गोब्राह्मणमग्निमुदक चादौ प्रवेश्य गोभ्यस्तृणोदक मधुलानांश्च प्रदाय ब्राह्मणेभ्योऽश्तान् सुमनसो नान्दीमुखानि च फलानीष्टानि दत्वोदकपूर्वमापनस्येभ्योऽभिवाद्य पुनराचम्य स्वस्ति वाचयेत् । तत ॰ पुण्याहशब्देन गोब्राह्मणमनुवर्त्तमाना प्रदक्षिणं प्रवेशयेत्सूतिकाऽऽगारम् । तत्रस्था च प्रसवकाल प्रतीचेत् । ' तत्रारिष्ट ( तत्रारिष्टमगारं पा ० ) ब्राह्मण - क्षत्रिय-वैश्य शूद्राणां श्वेत - रक्त - पीत - कृष्णेषु भूमि- प्रदेशेषु विल्व- न्यग्रोध- तिन्दुक - भलातकनिर्मितं सर्वागारं यथासंख्य तन्मयपर्यङ्कं समुपलिप्तमिति सुविभक्त-परिच्छदं प्राग्द्वारं दक्षिणद्वारं वाऽष्टहस्तायतं चतु र्हस्तविस्तृतं रक्षामङ्गलसम्पन्नं विधेयम् ॥ ७ ॥

मृतिकागार कैसा हो - सूतिकागार वर्ण के अनुसार होता है । श्वेतभूमि ब्राह्मणों के लिये, रक्त ( लाल ) क्षत्रियों के लिये, पीली वैश्यों के लिये और काली शूड़ों के लिये होती है । इनमें बेल, न्यग्रोध ( वटवृक्ष ), तिन्दुक ( तेंदुवा ) और भल्लानक ( भिलावा ) के काष्टों से ब्राह्मणादि क्रम के अनुसार सूतिकागृह बनाये । इन्हीं की लकडी के पलग रहे । दिवाले लिपी हुई हो । सब प्रकार के परिच्छद ( उप युक्त सामग्री ) स्थान - स्थान पर रखे हों । सूतिकागार का द्वार पूर्व अथवा दक्षिण में हो । आठ हाथ लम्बा और चार हाथ चौडा, रक्षा करने के योग्य वस्तुओं मे और मंगल-मय वस्तुओं से युक्त अरिष्ट ( सूतिकागार ) बनाना चाहिये । विमर्श: - चालक और माता के लिये उपयुक्त वस्तुएँ निम्न प्रकार की अवश्य रखनी चाहिये-( १ ) माफ कपडे, ( २ ) रेंडी का तेल ( Castor oil ), ( ३ ) गरम पानी की व्यवस्था, ( ४ ) धागा, ( ५ ) कैची, ( ६ ) निद्राप्रद ओषधियाँ, ( ७ ) दाई ( Nurce ) इत्यादि ।

जाते हि शिथिले कुन मुक्त हृदयबन्धने ।

सशूले जघने नारी ज्ञेया सा तु प्रजायिनी ॥ ८ ॥

प्रसूति के लक्षण - कुक्षि शिथिल होने से, हदय - वधन ढोले होने मे, जघनप्रदेश में शूल होने मे प्रसूति होगी, ऐसा | समझना चाहिये ॥ ८ ॥

विमर्श: - प्रसूति होने के पहिले दो प्रकार के दर्द होते हैं । एक अवास्तविक Palce ) और दूसरा वास्तविक ( True ) । अवाविक ( Pale ) - वास्तविक ( Trae ) -| ( १ ) इसकी वेदना पेट में ही ( १ ) कमर से नीचे की ओर रहती है, कटि की ओर नहीं । पीड़ा जाती है । ( २ ) इसमें गर्भाशय का मुग्न ( २ ) गर्भाशय का मुख नहीं खुलता और Tere ता है और वहाँ मा नहीं निकलता है | लगा हुआ दीसता है, तथा गर्भादक आने लगता है । ( ३ ) पाचक ओषधियों मे यह ( ३ ) पाचक ओषधियों से शान्त होती है । शान्त नहीं होती । ( ४ ) सकोच अनियमित रहता है । ( ४ ) नियतकाल में गर्भाशय का संकोच प्रतीत होता है । तत्रोपस्थित प्रसवायाः कटीपृष्टं प्रति समन्ताद्वेदना भवत्यभीच्ण पुरीपप्रवृत्तिर्मूत्रं प्रसिच्यते योनिमुखा -च्छ्नेष्मा च ॥ ६ ॥

आसन्न -प्रमूर्ति के लक्षण -जब प्रसूति होने का भाव भाता है तब कटि ( कमर ) और पीठ में चारों ओर पीडा होतो है । बार - बार मलत्याग की इच्छा होती है और मूत्र आने लगता है । उसी प्रकार योनि से श्लेष्मा निकलती है ॥ ९ ॥

विमर्श.- - ऊपर बताये हुए प्राय वास्तविक प्रसूति वेदना ( Trae laho is pins ) के लक्षण मिलते हैं । वे प्राय. तीन ही होते हैं । ( १ ) कटि से लेकर जंवा की तरफ पीडा का होना । ( २ ) योनि प्रदेश पर श्लेष्मा का आना । ( ३ ) गभोंदूक का आना । चरक में निम्न प्रकार के लक्षण दिये हैं ।: -' तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजनन कालमभितो भवन्ति । तद्यथा- गात्राणां ग्लानिराननस्याधगोर्विमुक्तबन्धन नत्वभित्र कुत्तेरवस्त्रंसनमधोगुरव बङ्खग- वस्ति - कटि कुक्षि-पार्श्व- पृष्टनिस्तोदो योनेः प्रखवणमनन्नाभिलापश्च । च ० शा ० ७ अ ० ३० गद्य । ' प्रसव काल की तीन अवस्थायें ( Three labour Stages ) प्रथमावस्थाः -- ( १ ) ततोऽनन्तरमावीनां प्रादुर्भावः प्रसे-कच गर्भोदकस्य गर्मनादी प्रबन्धविमुक्ति ' । द्वितीयावस्था: - ( २ ) श्रोणिवङ्खगग्रस्तिशिर.सु शूलं विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्त्वाविशति वस्तिशिरोऽवगृह्णाति । आवीनां स्वरणम् । गर्भम्य परिवर्तनम । योनिमुखं प्रपत्तिर्वि-। शल्यभावश्च ।

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अध्यायः १० ] शारीरस्थानम् तृतीयावस्थाः - ( ३ ) यदा च प्रजाता स्यात्तदैवैनाम-वेनेत -- कदाचिदस्या अपरा प्रपन्नाऽप्रपन्ना वेति । प्रसूति की प्रथमावस्था में - आवी आने लगती है, और गर्भोदक ( Liquor amna ) आने लगता है । द्वितीयावस्था में -- श्रोणि, वङ्क्षण और वस्तिशिर में शूल होता है । गर्भ हृदय ( अर्थात् महाप्राचीरक Diaphragm ) से हटकर उदर को प्राप्त होकर वस्तिशिर को प्राप्त होता है । भावी शीघ्र शीघ्र आती है, गर्भ का परिवर्तन होता है । योनिद्वार पर गर्भ आता है और गर्भ बाहर आने से भाराम । मिलता सा मालूम होता है । तृतीयावस्था में - प्रसूति के उत्तरकाल में कहीं अपरा ( Placenta ) का पतन हुआ या नहीं, यह देखना चाहिये । प्रजनयिष्यमाणां कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां कुमार-परिवृतां पुन्नामफलहस्तां स्वभ्यक्तामुष्णोदकपरिषिक्ता मथैनां ( संभृतां ‘ पा’० ) यवागूमाकण्ठात् पाययेत्, ततः कृतोपधाने मृदुनि विस्तीर्ण शयने स्थितामामु नसक्थीमुत्तानामशङ्कनीयाश्चतस्त्रः, स्त्रियः परिणतवयस प्रजननकुशला कर्त्तितनखाः परिचरेयुरिति ॥ १० ॥

आसन्न प्रसूति के समय का कर्त्तव्य - जो गर्भिणी आसन्न प्रसवा हो उसको अभ्यङ्ग कराकर गरम जल से स्नान करावे । पश्चात् मंगल और स्वस्तिवाचन करके, बालक और बालि-काओं से वेष्टित होकर वह पुन्नाम फल हाथ में ले । इसके पश्चात् उसको घृत के साथ आकण्ठ ( पर्याप्त ) यवागू पिलाना । चाहिये । अनन्तर विस्तीर्ण और मृदु शयन पर तकिया । लगा कर उत्तानावस्था में ( ऊपर मुँह करके ), पैरों को खींच कर बैठे और निःशंक ( पुनः पुनः प्रसूति कराने के कारण )

वृद्धा ( बुढ़िया ), प्रसूति कराने में कुशल, नख जिनके कटे ।

हुए हैं ऐसी चार स्त्रियाँ उसकी सेवा में रहें ॥ १० ॥

विमर्श: - अशकनीय स्त्रियाँ वे होती है जिनके सामने । गर्भिणी को दर या लज्जा न हो । चरकसंहिता To r ष्टम अध्याय में दिया है, ' आवी-प्रादुर्भावे तु भूमौ शयन विदध्यान्मृद्वास्तरणोपपन्नम् । | तदध्यासीत सा । ततस्तां ता. समन्ततः परिवार्य यथोक्त-: गुणा. स्त्रियः पर्युपासीरन्नाश्वासयत्न्यो वाग्भिग्रहिणीभि. सान्त्वनीयाभिः = ३५ ॥ १० ॥

अर्थात् आवी प्रारम्भ होने पर मृदु वस्तुओं से युक्त बिछौना जमीन पर विछाना चाहिये । उस पर वह आसन्न प्रसवा स्त्री बैठे । बाद उससे चारों ओर से घेर कर सौम्य और मधुर तथा सान्स्वनायुक्त शब्दों से आश्वासन देती हुई अच्छे गुणवाली स्त्रियाँ उसकी सेवा करे । अथास्या विशिखान्तरमनुलोममनुसुख ( मुख ' पा ' ) मभ्यज्यानुब्रूयाञ्चैनामेका - सुभगे । प्रवाह-स्वेति, न चाप्राप्ताची प्रवाहस्त्र, ततो विमुक्तगर्भना | डीप्रवन्धे सशुनेषु श्रोणिव वस्तिशिरस्सु च प्रवा । हेथाः शनैः शनैः । ततो गर्भ निगमे प्रगाढं, ततो गर्भे योनिमुख प्रपन्ने गाढतरमाविशल्यभावात्; अकालप्र ।

वाहणाद्वधिर् मूकं कुब्ज व्यस्तहनुं मूर्द्धाभिघातिनं ।

कासश्वासशोणपद्रुतं विकटं वा जनयति ॥ ११ ॥

७५ प्रवाहण विचार - जव स्त्री बैठ जाय तब विशिखान्तर ( अपत्य मार्ग ) को अन्दर से बाहर की ओर मालिश करती | हुई सेविका उससे कहे कि हे सुभगे! प्रवाहण करो किन्तु भावी न होने पर प्रवाहण न करो । गर्भनाडी प्रबन्ध छूटने पर श्रोणि, वंक्षण, वस्तिशिर में पीडा होने पर धीरे - धीरे प्रवाहण करो । गर्भ निकलने पर जोर से प्रवाहण करो । गर्भ योनि मुख को प्राप्त होने पर अधिक जोर लगाओ, जब तक गर्भ का निर्गमन नही होता । वेदना के पूर्व यदि प्रवाहण ( कुधन ) करे तो बहिरा, गूगा, कुवडा, ठेगी - ठोढी वाला, शिर में चोट वाला, कास ( खाँसी ), श्वास ( दमा ) और शोप ( क्षय ) से पीडित तथा विकट ( विलक्षण आकृति ) वाला पुत्र उत्पन्न होता है ॥ ११ ॥

विमर्श - आविओं का प्रादुर्भाव न होने पर भी प्रवाहण करने पर होने वाले उपद्रवों का चरक संहिता में भी उल्लेख किया गया है यथा-- ' ताश्चैनां यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युर-नागताऽऽवीर्मा प्रवाहिष्ठाः । या अनागताऽऽत्री प्रवाहते । व्यर्थमेवास्यास्तत्कर्म भवति । प्रज्ञा चास्या अविकृता विकृति-मापन्ना वा श्वासकासशोषली प्रसक्ता भवति । यथा तवथू द्वारवातमूत्रपुरीपत्रे गान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालान्न लभते कृच्छ्रेण वाऽप्यवाप्नोति, तथानागतकाल गर्भमतिप्रवाहमाणा । यथा चैपामेव क्षवथ्यादीनां सन्धारणमुपघातायोपपद्यते, तथा-प्राप्तकालस्य गर्भस्याप्रवाहणम् । स यथानिर्देश कुरुष्वेति वक्तव्या । तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहेत । ततोऽ • नन्तरं बलवत्तरम् । च ० शा ० अ ० ८ । ' तत्र प्रतिलोममनुलोमयेद् नाकालमा कर्पेत् ॥ १२ ॥।

गर्भ सीधा करे - यदि गर्भ उलटा हो तो उसको सीधा कर दे ॥ १२ ॥

विमर्श:: - - जब गर्भ तिरछा आवे अथवा ललाटोदय किंवा मुखोदय हो अथवा अपरा का अवरोध हो तो गर्भ को घुमाना पढ़ता है । उसको वाह्यत, अन्तस्थत ' और मिश्रविधि से करना पडता है । उद्देश्य यह कि -- स्फिविवर्तन अगर हो तो शिरोविवर्तन कर दे जिससे बालक ठीक से निकले । गर्भसङ्गे तु योनिं धूपयेत् कृष्णसर्पनिर्मोकेण पिण्डीतकेन वा, बध्नीयाद्धिरण्यपुष्पीमूल हस्तपादयो-र्धारयेत् सुवर्चलां विशल्यां वा ॥ १३ ॥

गर्म रुकने पर उपाय - गर्भ सङ्ग होने पर काले सर्प को केंचुली ( Covering ) से अथवा पिण्डीतक से योनि का धूपन करे । हिरण्यपुप्पी ( लागली कलिकारिका ) का मूल हाथ और पैर में बाँधे । सुवर्चला ( सूर्यभक्ता ) अथवा विशल्या ( पाटला ) को धारण करे ॥ १३ ॥

विमर्श - पिण्डीतक का अर्थ मैनफल है, यथा - ' मदन-रछन पिण्डी राठः पिण्डीतकस्तथा । करहादो मरुवकः शल्यको विपपुष्पकः ॥ ' मदनपाल निघण्टु । अथ जातस्योल्वमपनीय, मुख च सैन्धवसर्पिपा विशोध्य घृताक्त मूर्ध्नि पिचु दद्यात्; ततो नाभिनाडी-मष्टाङ्गुलमायम्य सूत्रेण बद्ध्वा छेढयेत्, तत्सूत्रैकदेशं च कुमारस्य ग्रीवायां सम्यग् बध्नीयान् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 426

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७६ सुश्रुतसहिता बालक पैदा होने पर - बालक पैदा होने पर प्रथम जरायु को हटाने, वी और सेंधा नमक से बालक का मुख साफ करे, गोया हुआ प ( फोहा ) मूर्धा ( ब्रह्मरन्ध्र ) पर रसे पश्चात् आठ अंगुल गर्भनाडी लेकर उसे खींचे और धागे से उसको बाँधकर गर्भनाल का छेदन करे और धागे के एक प्रदेश को बालक की गर्दन में अच्छी तरह बाँध दे ॥ १४ ॥

त्रिमर्श – जरायु हटाते समय नाक और मुख पर का जरायु प्रायः शीघ्र हटाना चाहिये, नहीं तो श्वास रुकने का भय रहता है । फिर गर्भनाढी को सींच कर उसके एक सिरे को बाँधे । यदि न बाँधकर काटा जाय तो रक्त का स्राव होगा और उससे बालक के जीवन को हानि होगी । अथ कुमारं शीताभिरद्भिराश्वास्य जातकर्मणि कृते मधुसर्पिरनन्तचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लहयेत्, ततो बालतैलेनाभ्यज्य क्षीरवृक्षकपायेण सर्वगन्धोदकेन वा । रूप्य- हेमप्रतप्तेन वा, वारिणा न्नापयेदेनं कपित्थपत्र -कषायेण वा कोष्णेन यथादोपं यथाविभवं च ॥ १५ ॥

बालक का अन्यग लग्न आदि - नालछेश्न के पश्चात् ठंडे जल से बालक को आश्वासित करके, जातकर्म करने के पश्चात्, घी और मधु मे मिश्रित थोडा सुवर्ण भस्म अनामिका से चटावे । पश्चात् बलातैल से अभ्यङ्ग कराके वीरवृक्षों की स्वचा से बनाये हुए क्वाथ से अथवा सर्वगन्धों ( एलादिकों ) के जल से, अथवा चाँदी या सुवर्ण को तपा कर उसे बुझा कर गरम किये गये जल से अथवा कैंथ के पत्तों के गर्म कपाय से यथाकाल, यथादोप और यथावैभव बालक को स्नान करावे ॥ १५ ॥

विमर्श -यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि पुत्री हो तो बिना मन्त्र के चटाना चाहिये और पुत्र हो तो निम्नलिखित मन्त्र मे चटाना चाहिये । प्राशनमन्त्र - ' प्रते ददामि मधुनो घृतस्य बेदं सवित्रा प्रसृतं मघोनाम् । आयु मान गुप्तो देवताभि. गत जीव शरदो लोके अस्मिन् । क्षीरिवृक्ष मे – गूलर, वर्गढ़, पीपल, वेत, पाकर का ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि कहा है- ' उदुम्बरो वटोऽश्वत्यो वेतस प्लच एव च । पञ्चते चीरिणो वृक्षा ' संज्ञया समुदाहृतः ॥ सर्वगन्ध से - चातुजांतक ( तज, इलायची, तेजपात, नागकेशर ), कपूर, शीतलचीनी, अगर, शिलारस, लौंग का ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि कहा है- ' चातुर्जातं समाख्यातं स्वगेळापत्रकेशरैः । चातुर्जात कर्पूरक्कोलागुरु सिह्नकम् । लबङ्गसहितं चैव सर्वगन्ध विनिर्दिशेत् ' | अथवा सर्वगन्ध से-- इलायची, सफेद चन्दन, केशर, मुरामांसी, शीतलचीनी, जटामांसी, कचूर, गन्धाविरोला, तेजपात, गठिवन, कपूर, लोहबान, खस, कस्तूरी, नखी, पूति खटासी, छरीला, गज पीपल, फूल प्रियद्धु, मेथी, वन आदि इन सब द्रव्यों को समझना चाहिये । इन सबका उपयोग श्री विष्णु तैल आदि के गन्धपाक में होता है । क्योंकि कहा है- ' एलाचन्दन-कुङ्कुमागुरुमुराक्कोलमांसीदाटी श्रीवासच्छुदुग्रन्थिपर्णशशभृत् क्षौणिध्वजोशीरकम् । क्स्तूरी नस्त्रपूतिशैल्जशुभामेथीलचना दिकं गन्धद्रव्यमिढ प्रद्वेयमखिल श्रीविष्णुतैलादिपु ' ॥ दूर्वा और ब्राह्मी का स्वरस मधु और घृत तथा सुवर्ण के साथ चहा, ऐसा भी एक पाठ है ।

धमनीनां हृदिस्थानां विवृतत्वादनन्तरम् ।

चतूरात्रात्रिरात्राद्वा स्त्रीणां स्तन्यं प्रवर्त्तते ॥ १६ ॥

स्नन्य प्रवर्त्तन काल - स्त्रियों के हृदयस्थ धमनियों के खुल जाने के पश्चात् तीन या चार रात बीतने पर दूध आने लगता है ॥ १६ ॥

विमर्श - पहिले दो तीन दिन आने वाले दूध ' को Colo • stram कहते है । ' यह पिलाना चाहिये ' ऐसा कई विद्वानों का अभिप्राय है । दूसरे लोग कहते हैं, इसे नहीं पिलाना चाहिये । कहने वालों का कथन है कि यह कुछ मारक ( Laxative ) होता है और बालक को बल देता है । तस्मात्प्रथमेऽह्नि मधुसर्पिरनन्त ( अनन्ता ' पा ' ) मिश्र मन्त्रपूतं त्रिकालं पाययेन, द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सर्पिः, तृतीये चः ततः प्रानिवारितस्तन्यं मधुसर्पिः स्त्रपा • णितलसमितं द्विकाल पाययेत् ॥ १७ ॥

शिशु को तीन दिन तक देने के पदार्थ- बालक को पहले दिन घी और शहद के साथ थोड़ा - सा सुवर्ण अथवा पाउमेद के अनुसार अनन्ता ( दूर्वा ) मन्त्र से पवित्र करके तीन बार पिठावे । दूसरे और तीसरे दिन लक्ष्मणा से मिट किया हुआ वृत है । उसके पश्चात् विषम प्रमाण में घी और शहद बच्चे के पाणितल प्रमाण में दो बार देकर दूध पिलाना चाहिये ॥ १७ ॥

विमर्श: -- वृद्ध वाग्भट में ' अनन्तामि मधुसर्पिषी ' | ( अ. स. उ. अ १ ) ऐसा पाठ है 1 अथ सूतिकां बलातैलाभ्यक्तां वातहरोपनिष्का-येनोपचरेत् । सशेषदोषां तु तदहः पिप्पली - पिप्पली-मूल - हस्ति पिप्पली चित्रक - शृङ्गवेरचूर्णं गुडोदकेनो-ष्णेन पाययेत, एवं द्विरात्रं त्रिरात्रं वा कुर्यादादुष्टशो-णितात् विशुद्धे ततो विदारिगन्धाऽऽदिसिद्धां स्नेहय-बागू क्षीरयवागू वा पाययेत्रिरात्रम् | ततो यत्र- कोल-कुलत्थसिद्धेन जाङ्गलरसेन शाल्योदनं भोजयेद्बल-मग्निबलं चावेच्य । अनेन विधिनाऽध्यर्धमासमुप-संस्कृता विमुक्ताहाराचारा विगतसूतिकाऽभिधाना स्यात्, पुनरार्त्तवदर्शनादित्येके ॥ १८ ॥

मूर्तिका को चिकित्ण - इसके पश्चात् प्रसूता स्त्री को बला-तेल मे अभ्यंग कराके चान को दूर करने वाली औषधों के काथ से चिकित्सा करनी चाहिये । यदि ( रक्त ) टोप वाकी हो तो उसी दिन पिप्पली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, चीता और सोंठ के चूर्ण को गरम गुडोटक के साथ पिलाना चाहिये । इसी प्रकार जब तक दुष्ट रक्त आता है तब तक दो या तीन दिन करे । रक्त शुद्ध होने पर विदारीगन्धा से सिद्ध किया हुआ यवागू अथवा क्षीरयवागू तीन दिन तक पिलावे । इसके वाद यव ( नौ ), कोल ( बैर ) और कुलथी से सिद्ध किये हुए जांगल रस के साथ शाली का भात अग्नि चल और ताकत देखकर सिलावे । इस प्रकार ॥ महीने करके प्रसूति के लिये उपयुक्त आहार और विहारों को छोड़ने से उसका ' विगत- सूतिका ' शब्द से निर्देश किया जाता है । कई विद्वानों

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अध्याय १० ] शारीरस्थानम् ७७ के मत से पुनः प्रथम मासिक धर्म होने तक वह प्रसूता रहती है । पश्चात् ' विगत - सूतिका ' हो जाती है ॥ १८ ॥

विमर्श – यहाँ ' विगत - सूतिका ' किसे कहते हैं यह वाया गया है । धन्वभूमिजातां तु सूतिकां घृततैलयोरन्यतरस्य मात्रां पाययेत्, पिप्पल्यादिकषायानुपानां, स्नेहनित्या च स्यात्त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा बलवतीम् ( बलवती ) अबलां यवागूं पाययेत्त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा । अत्र ऊर्ध्वो स्त्रिग्वेनान्न संसर्गेणोपचरेत् ॥ १६ ॥

सूतिका चिकित्सा - धन्वभूमि ( मरुप्रदेश ) में उत्पन्न हुई प्रसूता को घी अथवा तेल में से किसी एक की मात्रा पिप्प ल्यादि कषाय के अनुपान के साथ पिलावे । बलवान् स्त्री को तीन या पांच दिन स्नेह का पान, अभ्यंग आदि करे । निर्वल प्रसूता खी को तीन अथवा पांच दिन तक यवागू देना चाहिये । इसके बाद स्नेहन युक्त भन्न खिलाना चाहिये ॥ १ ९ ॥ विमर्श: - भूख लगने पर, सात्म्य पदार्थों को सोच कर देना चाहिये । दशमूल के हाथ का प्रयोग व्यवहार में सर्वत्र दिखाई देता है गर्भ अपनी जगह पर स्थित हो, इस लिये स्वच्छ कपडे पेट पर बांधे । प्रायशश्चैनां प्रभूतेनोष्णोदकेन परिषिचेत् । क्रोधा ग्रासमैथुनादीन् परिहरेत् ॥ २० ॥

प्रसूता लिवर्ज्य - प्रायः पर्याप्त गरम जल से प्रसूता को स्नान करावे । उसको चाहिये कि क्रोध, श्रम तथा मैथुन आदि न करे ॥ २० ॥

विमर्शः- आतुरोपद्रव - चिकित्सित अध्याय में कही हुई क्रोधादि १५ चीजे छोड दे ।

मिथ्याऽऽचारात्सूतिकाया यो व्याधिरुपजायते ।

स कृच्छ्रसाध्योऽसाध्यो वा भवेदत्यपतर्पणात् ॥२१ ॥

तस्मात्तां देशकालौ च व्याधिसात्म्येन कर्मणा ।

परीक्ष्योपचरेन्नित्यमेवं नात्ययमाप्नुयात् ॥ २२ ॥

सूतिका के विकार कष्टसाध्य होते हैं - प्रसूता को मिथ्याऽऽ चार और अपतर्पण से जो रोग उत्पन्न होता है वह यथाक्रम कष्टसाध्य अथवा असाध्य होता है । इस लिये देश - काल और व्याधि के लिये साम्यकर्म कौन से है यह जान कर चिकित्सा करे । जिसमें अत्यय ( विनाश ) को वह प्राप्त न हो ॥२१-२२ ॥ । विमर्श: - प्रसूता के लिए साम्य चीजों का और देश तथा काल का विशेष ध्यान रखना चाहिये । एक ही प्रकार की चिकित्सा सर्वत्र अनुपयुक्त होती है । अथापराऽपतन्त्यानाहाध्मानौ कुरुते, तस्मात् कण्ठमस्याः केशवेष्टितयाऽङ्गुल्या प्रमृजेत् कटुका लाबुकृतवेधनसर्षपसर्पनिर्मोकैर्वा कटुतैलविमिश्रैर्योनि-मुख धूपयेत्, लाङ्गलीमूलकल्केन वाऽस्याः ( ' चा स्याः पाठः ) पाणिपादतलमा लिम्पेत्, मूर्ध्नि वाऽस्या ( ' चास्या ' पाठः ) महावृक्ष क्षीरमनुसेच येत्, कुठला ङ्गलीमूलकल्क वा मद्यमूत्रयोरन्यतरेण पाययेत्, शाल-( ' शालि ' पाठः ) मूलकल्कं वा पिप्पल्यादि वा मद्येन, | | सिद्धार्थक- कुछ लाङ्गली - महावृक्ष - क्षीर मिश्रेण सुराम • ण्डेन वाऽऽस्थापयेत्, एतैरेव सिद्धेन सिद्धार्थकतैले-| नोत्तरबस्ति दद्यात् । स्निग्धेन वा कृत्तनखेन हस्ते-नाचरेत् || २३ || अपरा पतन न होने पर - अपरा पतन न होने से पेट फूलना और आध्मान हो जाता है । इस लिये प्रसूता के गले में | अड्डलि को वाल से लपेट कर घुमावे, कडवी तुम्बी, कृतवेधन ( कडवी तरोई कोशातकी ), सरसो और सांप की केचुली कटुए तेल में मिला कर योनि का धूपन करे, अथवा लांगली ( कलिहारी ) की जड के कल्क से हाथ पैरों के तल प्रदेश पर लेप करे, किंवा प्रसूता के माथे पर सेहुण्ड के दूध का चिंसन करे अथवा कुष्ठ और कलिहारी की जड के कल्क को मद्य अथवा गोमूत्र के साथ पिलावे, शाल मूल- कल्क अथवा पिप्पल्यादि गण के चूर्ण को मद्य से पिलावे अथवा सरसो, कुष्ठ, लांगली ( कलिहारी ), सेहुण्ड के दूध के साथ अथवा सुरामण्ड से अस्थापन करे । इन्हीं औषधों से हुए सरसों के तेल से उत्तर वस्ति देना चाहिये अथवा नख काट कर, हाथ को चिकना बनाकर अपरा निकालना चाहिये ॥ विमर्श - अपरा का ( Placenta ) पतन न होने से नाना प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं । उसका अंश भी भीतर रहे तो बहुत उपद्रव होते हैं । अपरा निकालने के लिए ९ विधियाँ ऊपर बता दी गई है । चरकसंहिता में हस्तक्रिया से अपरा -पातन करने को लिखा है । दाहिने हाथ से नाभि के ऊपर दबावे और बायाँ हाथ पीठ पर रखे और अच्छी तरह हिलावे । इससे अपरा का पतन होता है । इसी से मिलती हुई आधुनिक काल की भी विधि होती है । प्रजातायाश्च नार्या रूक्षशरीरायास्तीक्ष्णैरविशो-धितं ( अवशोषितं ' पा ' ) रक्तं वायुना तद्देशगतेनाति-संरुद्ध नाभेरधः पार्श्वयोर्बस्तौ बस्तिशिरसि वा ग्रन्थि करोति; ततश्च नाभिवस्त्युदरशूलानि भवन्ति, सूची-भिरिव निस्तुद्यते भिद्यते दीर्यत इव च पक्काशयः, समन्तादाध्मानमुदरे मूत्रसङ्गश्च भवतीति मक्कल्ल लक्षणम् । मक्कल रोग के लक्षण – रूक्ष शरीर चाली प्रसूता स्त्री तीचग औपर्धी से सूखे हुए रक्त में, उस स्थान की वायु नाभि के नीचे, पावों में वस्ति में अथवा वस्तिशीर्ष में ग्रन्थि उत्पन्न करती है । पश्चात् नाभि, वस्ति और उदर शूल होता है, पक्काशय में सुई चुभने के समान पीडा में होती है । और वह फटता हुआ सा मालूम होता है । पेट चारो ओर से

फूलता है, मूत्र सकता है । ये मक्कल के लक्षण है ॥ २४ ॥

विमर्श - प्रसूता की प्रसूति के कारण न निकले हुए रक्क से उत्पन्न होने वाला शूल मक्कल कहा जाता है । सुश्रुत | संहिता में ' प्रजातायाश्चोत्तरकाल ती दगैरवशोषित रक्तं मछल्लं करोति ' ऐसा लक्षण है । ' च ' कारसे अप्रजाता भी समझना चाहिये । तत्र वीरतर्वादिसिद्ध जलमूषकादिप्रतीवाप पाय-येत्, यवक्षार चूर्ण वा सुखोदकेन पिप्पल्यादिक्वाथेन

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सुश्रुतसंहिता वा, पिप्पल्यादिचूर्ण वा सुरामण्डेन, वरुणादिक्कार्थं वा पञ्चकोलैलाप्रतीवापं, पृथकपर्यादिकार्थं वा भद्रदारु-मरिचसंसृष्टं, पुराणगुडं वा त्रिकटुचतुर्जातककुस्तुम्बु-रुमिश्रं खादेत्, अच्छ वा पिवेदरिष्टमिति || २५ || मक्कल रोग को चिकित्सा - मक्कल शूल पर वीरतर्वादिगण से सिद्ध किये हुए जल में ऊपकादिगण का प्रक्षेप करके पिलाना चाहिये । यवनार चूर्ण कोष्ण जल से अथवा पिप्प नादि क्वाथ से है । अथवा पिप्पल्यादि चूर्णं सुरामण्ड के साथ दे । वरुगादिगण के काय पञ्चकोल ( पिप्पली, । पिप्पली मूल, चन्य, चित्रक और सोंठ ) और इलायची का प्रक्षेप देकर पिलावे । पृथक् पर्ण्यादि - कपाय में देवदारु और काली मिर्च मिला कर दे । त्रिकटु, चतुर्जात और धनियां के

साथ पुराना गुड मिला कर दे । अथवा स्वच्छ अरिष्ट पिलावे ॥

विमर्श ' — उपर्युक्त सात प्रयोगों में से यथासम्भव किसी एक का प्रयोग करना चाहिये । अथ बाल श्लोमपरिवृतं क्षौमवखास्तृतायां शुय्यायां । शाययेत्, पीलु - बदरी - निम्ब परूपकशाखाभिश्चैन प-रिवीजयेत, मूर्ध्नि चास्याह रहस्तैलपिचुमवचारयेत्, धूपयेच्चैनं रमोन्नैर्धूपैः, रक्षोन्नानि चास्य पाणिपादशि रोग्रीवास्ववसृजेन्, तिलातसी सर्प पकणांश्चात्र प्रकिरेत्, अधिष्ठाने चाग्निं प्रज्वालयेत्, प्रणितोपासनीयं चावेक्षेत । बालक को सेवा – वालक को रेशमी कपड़ा पहना कर रेशम विछाये हुए बिछौने पर सुलाना चाहिये । पीलु - वेर-निम्ब और फालसे की ढाल से उसको पंखा करे । बालक के माथे पर तेल में भिगोया हुआ फोवा रखना चाहिये । रक्षोघ्न धूपों से उनको धूपन करे । हाथ, पैर, माया और गर्दन पर रक्षोघ्न्न पदार्थों को बाधे । तिल, तीसी और सरसों के कणों को फैलावे, सूतिकागार में अग्नि जलाये और व्रगितोपासनीय अध्याय में कहे हुए विधानों का आचरण करे ॥ २६ ॥

विमर्श -बालक का कोमल शरीर होने के कारण अत्यन्त सावधान रह कर सेवा करनी चाहिये । ततो दशमेऽहनि मातापितरौ कृतमङ्गलकौतुक स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्यातां यदभिप्रेतं नक्षत्र-नाम वा ॥ २७ ॥

नामकरण — बाढ ढमचे ढिन माता और पिता मंगलोरसव तथा स्वस्ति वाचन करके अभीष्ट अथवा नक्षत्र के अनुसार नामकरण करें ॥ २७ ॥

विमर्श - नक्षत्र नाम अर्थात् उस नक्षत्र के देवता का नाम रखना चाहिये । ततो यथावर्ण धात्रीमुपेयान्मध्यमप्रमाणां मध्यम-वयस्कामरोगां शीलवनी मचपला मलोलुपामकृशामस्थू-लां प्रमन्ननीरा मलम्बोष्ठीमल म्योर्ध्वस्ननीमव्यङ्गामत्र्य मनिनी जीवहत्मां दोग्ध्री बस्नलामक्षुद्रकर्मिणीं कुले जातामनो भूयिष्ठैश्च गुणैरन्वितां श्यामामारोग्यचलवृ-ये बालस्य । तत्रोस्तनी करालं कुर्यात्, लम्त्रस्तनी नासि-कामुखं छादयित्वा मरणमापादयेत् || २८ || धात्रोनियुक्ति- विचार - उसके पश्चात् ( बालक के ) ब्राह्म-णादि वर्ण के अनुसार धात्री ( दाई ) की योजना करे । वह धात्री मध्यम शरीरवाली, मध्यम वयस्का, नीरोग, शीलवती, अचचला, अलोमिनी होनी चाहिये, न दुबली हो, न मोटी, स्वच्छ दूध वाली हो, उसके ओट लम्बे न हों, स्तन भी लम्बे या ऊर्ध्व न हों, अध्यङ्ग, निर्व्यसन, जीवित बालक वाली, यथेष्ट दुग्ध युक्त, प्रेम करने वाली, नीच कर्म न करने वाली, अच्छे कुल में उत्पन्न होने के कारण बहुत गुणों से युक्त, एव श्यामा लक्षण विशिष्ट हो । इस प्रकार की धात्री बालक के आरोग्य और वल की वृद्धि करने के लिये होती है । ऊर्ध्वं स्तन वाली धात्री का दुग्ध पिलाने से कराल मुख होता है । बड़े स्तन होने पर बालक को नाक और मुख ढक जाने के कारण मरण तक हो सकता है ॥ १८ ॥

विमर्श. - माता के दुग्ध के अभाव धात्री का दुग्ध देना उचित होता है । मानव जाति से भिन्न प्राणियों का दुग्ध ( बालक को ) पिलाने से नाना प्रकार के अजीर्ण जन्य रोग उत्पन्न होते हैं । श्यामा के लक्षण –'शीतकाले भवेदुष्णा प्रीप्मे च सुखशीतला । तप्तकाञ्चनवर्णाभा सा स्त्री ज्यामेति कीर्त्तिता । ' ततः प्रशस्तायां तिथौ शिर ' न्नात महतवाससमुद्र-नखं शिशुमुपवेश्य धात्रीं प्राङ्मुखीं चोपवेश्य दक्षिणं स्तनं घौतमीपत्परिस्रुतमभिमन्ध्यं मन्त्रेणानेन पाययेत् । दुग्धपान विधि- अच्छे मुहूर्त्त में बालक को शिर मे स्नान कराकर, नये वस्त्र पहना कर उत्तर की ओर मुख करके बैठावे, ढाई को पूर्व की ओर मुख करके बैठाकर दक्षिण ( ढाहिना ) स्तन को धोकर, थोडा सा दूध बाहर निकालकर निम्नलिखित मन्त्र से अभिमन्त्रित करके पिलाना चाहिये ॥२ ९ ॥ विमर्श - - प्रथम वार मन्त्रपूर्वक पिलाया जाता है, जिससे चल और आयु प्राप्त होते है ।

मन्त्रः-चत्वारः सागरास्तुभ्यं स्तनयोः श्रीरवाहिनः ।

भवन्तु सुभगे! नित्यं बालस्य बलवृद्धये ॥ ३० ॥

पयोऽमृतरसं पीत्वा कुमारस्ते शुभानने! ।

दीर्घमायुरवाप्न तु देवाः प्राश्यामृतं यथा ॥ ३१ ॥

मन्त्रार्थ - हे सुभगे! तुम्हारे स्तनों में दुग्ध को वहन करनेवाले चारों समुद्र बालक के बल की वृद्धि के लिये हो । शुभानने! जिस प्रकार देवता अमृत का सेवन करने से दीर्घायु हुए, उसी प्रकार तुम्हारा अमृत - रसमय दुग्ध - पान कर बालक दीर्घायु हो ॥ ३०-३१ ॥ विमर्श -यहाँ दूध को अमृत की उपमा दी गई है । सब रोगों को दूर रखते हुए बलप्रद् केवल मांता का दुरध ही होता है । अन्य पेय उसके मामने तुच्छ हैं । अतोऽन्यथा नानास्तन्योपयोगस्या- सात्म्याद्वया | विजन्म भवति || ३२ ॥ अनेक दाइयों की नियुक्ति न करे - यदि वार - वार दाई

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श्रध्यायः १० ] शारीरस्थानम् चदली जाय तो नाना प्रकार के दूध मिलकर अमात्य के । कारण व्याधियाँ उत्पन्न करते हैं । इसलिये एक ही दाई को रखना चाहिये || ३२ ॥ विमर्शः -- यदि स्त्रियों का दूध न दिया जाय तो । स्वास्थ्य तो बिगडता है ही, साथ ही बालकों को भजी -ता के कारण यकृत् वृद्धि भी होती है । अपरिस्रुतेऽप्यतिस्तब्धस्तन्यपूर्ण स्तनपानादुत्सुहि- । तस्रोतसः शिशोः कासश्वासवमिप्रादुर्भावः । तस्मादे वविधं स्तन्यं न पाययेत् ॥ ३३ ॥

दूध पिन्गने के पूर्व दूध निकालने की आवश्यकता - यदि दुग्ध न निकालते हुए बालक को पिलाया जाय तो कास, श्वास, वमि ( कै ) को उत्पत्ति होती है क्योंकि बहुत ढेर से । रुके हुए दूध से पूर्ण स्तनों का पान करने मे स्रोत रुक जाते । है जिसमे उपर्युक्त उपद्रव होते हैं । अत इम प्रकार का ( दूध निकाले बिना ) दूध न पिलाना चाहिये ॥ ३३ ॥

विमर्श - स्तन से थोडा सा दूध निकाल देने पर स्तन के मार्ग का सशोधन होता है और ऊपर ही ऊपर रहा । हुआ गन्दा दूध निकल जाता है । क्रोधशोकावात्सल्यादिभिश्च खियाः स्तन्यनाशो भवति । अथास्याः क्षीरजननाथं सौमनस्यमुत्पाद्य - गोधूम - शालि पष्टिक - मांसरस सुरा - सौवीरक - पिण्याक लशुन मत्स्य कशेरुक - शृङ्गाटक - विस - विदारीकन्द - मधुक शतावरी नलिका लाबु- कालशाकप्रभृतीनि विद ध्यान ॥ ३४ ॥

स्तन्य नाम के कारण और उसके वर्धन के उपाय - क्रोध से, शोक से, तथा वात्सल्य ( प्रेम ) के न होने से स्त्रियों के दुग्ध का नाश होता है । स्त्री के दूध उत्पन्न होने के लिये उसे प्रसन्न करके जौ, गेहूँ, शालि - साठी चावल मांसरस ( सुर्वा ), सुरा ( मद्य ), सौवीरक ( काजी ), विण्याक ( तिलकल्क ), लहसुन, मरस्य ( मछली ), कशेरुक ( कमेरू ), सिंघाडा, बिस, विदारीकंद, मुलेठी, शतावर, नालिका ( शाकविशेष ), अलाडु ( कद्दू ), कालशाक इत्यादि पदार्थों को खिलाना चाहिये ॥ ३४ ॥

विमर्श - दुग्ध उत्पन्न करने के लिये मन की प्रसन्नता अत्यावश्यक है । मन प्रसन्न होने पर दुग्धोत्पादक ओषधि देने मे फल शीघ्र होता है -- अन्यथा नहीं अथास्या. स्तन्यमप्सु परीक्षेत, तच्चेच्छीतलममलं तनु शङ्खावभासामप्सु न्यस्तमेकीभारं गच्छत्यफेनि-लमतन्तु मन्नोत्प्लवतेऽवसीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यान, तेन कुमारस्यारोग्यं शरीरोपचयो बलवृद्धिश्व भवति ॥ ३५ ॥

दुग्ध - परीक्षा - धात्री का दूध जल में छोड़कर परीक्षा करनी चाहिये । वह दूध यदि टण्डा, स्वच्छ, पतला और सफेद हो तथा जल में छोड़ने पर उसमें घुलने वाला हो, उस पर फेन न आवे, तन्तु रहित हो, जल पर तैरने वाला अथवा डूबने वाला भी न हो तो उसे शुद्ध दूध समझना, चाहिये । उस दूध से बालक को अरोग्य, शरीर की पुष्टि और वल की वृद्धि प्राप्त होती है ॥ ३५ ॥

विमर्शः --- यहाँ दूध की स्वाभाविक परीक्षा ( Physical examination ) दी गयी है । न च क्षुधित - शोकार्त्त - श्रान्त- प्रदुष्टधातु, गर्भिणी-ज्वरिता ऽतिक्षीणा - तिल्थूल - विदुग्धभक्त ( भक्ष्य ' पा ' ) -विरुद्धाहार - तर्पितायाः स्तन्यं पाययेत्, नाजीर्णौषधं च बालं, दोपौपधमलानां तीव्रवेगोत्पत्तिभयात् ॥ ३६ ॥

किस प्रकार की दाई का दूध न पिलावे - जो धात्री भूखी हो, शोक से पीडित हो, थकी हुई हो, दुष्ट धातुवाली, गर्भिणी, ज्वर से पीडित, बहुत क्षीण, स्थूल, विदग्ध भोजन किये हुई, विरुद्ध आहार किये हुई हो तो उसका दूध न पिलाना चाहिये । चालक को दी हुई औषध जीर्ण न हुई हो तो भी न पिलाना चाहिये क्योंकि इससे दोप, औषध और मलों की तीव्र वेगोत्पत्ति होने का भय रहता है ॥ ३६ ॥

विमर्श: -टाई उपर्युक्त दोषों से रहित हो तो भी चालक के जीर्णाजीर्ण औषधों का ध्यान रखना ही चाहिये । उसी प्रकार बालक यद्यपि स्वस्थ हो तो भी धात्री को तो कोई विकार नहीं है इसका भी ध्यान रखना चाहिये अर्थात् दोनों को स्वस्थ होना चाहिये ।

भवन्ति चात्र --धात्र्यास्तु गुरुभिर्भोज्यैर्विपमैर्दो पलैस्तथा ।

दोपा देहे प्रकुप्यन्ति ततः स्तन्यं प्रदुष्यति ॥३७ ॥

मिथ्याऽऽहारविहारिण्या दुष्टा वातादयः स्त्रियाः ।

दूपयन्ति पयस्तेन शारीरा व्याघयः शिशोः ॥

भवन्ति कुशलस्तां भिपक् सम्यग्विभावयेत् ॥ ३८ ॥

धात्री के गुरुभोजन, विषम आहार और दोपयुक्त आहारों के कारण शरीर में दोप कुपित होते है । पश्चात् दुग्ध दूपित होता है । विरुद्ध आहार और विहार करने वाली खियों के वात पित्तादि दोप कुपित होते हुए दुग्ध को दूपित करते है, जिस कारण बालक के शारीरिक व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं । इसलिये कुशल वैद्य उन व्याधियों को अच्छी तरह समझ ले ॥ ३७-३८ ॥ विमर्शः -- बालक तीन प्रकार के होते हैं ।: -- स्तन्यपान करने वाले, २ - अन्न ग्रहण करने वाले और ३ अन्न और स्तन्यपान करने वाले । स्तन्य पान करने वाले वालकों को कोई भी रोग पैदा हो तो उसकी धात्री के आहार - विहार का विचार करना चाहिये । अन्न और स्तन्य लेने वाले वालकों के विकार में धात्री और बालक दोनों के आहार और आचारों का ख्याल रखे ।

अङ्ग - प्रत्यङ्ग - देशे तु राजा यत्रास्य जायते ।

मुहुर्मुहुः स्पृशति तं स्पृश्यमाने च रोदिति ॥ ३६ ॥

निमीलिताक्षो मूर्धस्थे शिरोरोगे न धारयेत् ।

बस्तिस्थे मूत्रसङ्गार्त्तो रुजा तृप्यति मूर्च्छति ॥४० ॥

विण्मूत्रसङ्ग - वैवर्ण्य - च्छर्द्यामानान्त्र क्रूजनैः 1 कोष्ठे दोपान् विजानीयात् सर्वत्रस्थांश्च रोदनैः ॥४१ ॥

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50 सुश्रुतसहिता बालक के रोग जानने का प्रकार - अङ्ग - प्रत्यङ्ग में जहाँ कहीं । रोग उत्पन्न होता है उस स्थान को बालक वार - बार स्पर्श । करता है और स्पर्श करने पर रोता है । ( मस्तक ) में विकार हो तो आँख बन्द कर लेता है और शिर को धारण नहीं कर सकता । बस्ति में पीढा हो तो मूत्र रुकता है और पीढा होती है, प्यास लगती है तथा मूर्च्छा आती है । मल - मूत्र का रुकना, चिवर्ण होना, कै हो जाना, पेट फूलना, पेट में शब्द होना इनसे कोष्टगत दोपों का होना समझना चाहिये और विशेष रोने से सर्व शरीर में दोष है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ३ ९ -४१ ॥ विमर्श ' - बालकों के विकारों की परीक्षा उसके रोने से और स्पर्श किये जाने वाले अह्नों से करनी पडती है । तेषु यथाऽभिहित मृद्वच्छेदनीय मौषधं मात्रया । क्षीरपस्य क्षीरसर्पिपा संयुक्तं विदध्यान, धान्याच केवलं, क्षीरान्नाद्स्यात्मनि धान्याश्च पूर्वयत, अन्नादस्य कपायादीनात्मन्येव न धाग्याः ॥ १२ ॥

बालकों के विकारों में औपन किसको देना चाहिये? - बालकों के विकारों में रोग के अनुसार मृदु और कफ तथा मेढ को नष्ट करने वाली ओवि मात्रापूर्वक दूध पीने वाले बालक को दूध और घी के साथ देनी चाहिये और धात्री को केवल । औषध ही देनी चाहिये । दूध और अन्न खाने वाला बालक हो तो उसे स्वयं और धात्री दोनों को देना चाहिये । अन्न खाने वाला बालक हो तो कपायादि औषध उसे ही देना चाहिये, धात्री को नहीं ॥ ४२ ॥

विमर्श: -- स्तन्यपान करने वाले वालक को उसकी ही धात्री के दूध के साथ औषध दी जाती है । तत्र मासादूध्वं क्षीरपायाङ्गुलिपर्वद्वयग्रहणसंमिता-मौषधमात्रां विदध्यात्, कोलास्थिसंमितां कल्कमात्रां क्षीरान्नादाय, कोलसमितामन्नादायेति ॥ ४३ ॥

औषध मात्रा - स्तन्यपान करने वाले एक महीने के ऊपर वाले बालक को एक चुटकी मात्रा देनी चाहिये । स्तन्य और अन्न ग्रहण करने वाले चालक को बेर की गुठली के बराबर मात्रा देनी चाहिये | केवल अन्न ग्रहण करने वाले बालक को बेर के बराबर मात्रा देनी चाहिये ॥ ४३ ॥

विमर्श -- औषध को दूध, घी और मिश्री में मिला कर देना चाहिये | तन्त्रान्तर में भी दिया है, यथा- ' प्रथमे मासि जाऩम्य शिशीपजरक्तिका । अवलेह्या तु कर्त्तव्या मधुतीर-मिताघृतं । एकैकां वर्धयेत्तावद्यावत् सवत्सरो भवेत् । तद्ध्वं मापवृद्धि ' म्याद्यावत्पोढाकादिक ' | यहाँ यह ख्याल रहे कि उपर्युक्त मात्रा नूतन वनस्पति की और अनुपान युक्त है । इसलिये अग्नि, वल, वय, द्रव्य इत्यादि को समझ कर मात्रा निर्धारित करे ।

येषां गढानां ये योगाः प्रवक्ष्यन्तेऽगदङ्कराः ।

तेषु तत्कत्कसलिप्त पाययेत् शिशुं स्ननो ॥ ४४ ॥

बल्क मे ग्रन - लेप करे जिन जिन विकारों के योग कहे जायेंगे उन उन रोगों में उन उन योगों के कल्क स्तनों पर लगा कर बालक को पिलाना चाहिये ॥ ४४ ॥

विमर्श ' -- यदि बालक औषधमात्रा ग्रहण न कर सके तो स्तनों पर औषध का लेप लगा दे और लेप सूखने पर निकाल दे । पश्चात् स्तनों को धोकर बालक को दूध पिला दे ।

एकं द्वे त्रीणि चाहानि वातपित्तकफज्वरे ।

स्तन्यपायाहितं सर्पिरितराभ्यां यथार्थतः ॥ ४५ ॥

न च तृष्णाभयादत्र पाययेत् शिशुं स्तनों ।

विरेक- वस्तिवमनान्यते कुर्याच नात्ययात् ॥ ४६ ॥

ज्वर की विशेष चिकित्मा - स्तन्य - पान करने वाले वालक को वात, पित्त और कफ ज्वरों में यथाक्रम एक, दो अथवा तीन दिन तक घी नहीं पिलाना चाहिये किन्तु दूध और अन्न | ग्रहण करने वाले बालक तथा अन्न ग्रहण करने वाले वालक को उचित जान पड़े तो घी देना चाहिये । प्यास लगेगी, ऐसा समझ कर दूध नहीं पिलाना चाहिये । उसी प्रकार वस्ति, विरेचन और वमन -आत्ययिक काल को छोड कर न देना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ विमर्शः - बालक के ज्वर में स्नेहन, वमन, विरेचन तथा आस्थापन न देना चाहिये । उसी प्रकार अग्नि प्रदीप्त होने के लिये दूध भी न देना चाहिये । उसके साथ - साथ यह भी ख्याल रखे कि बुसार का वेग कम होने पर और अग्नि प्रदीत होने पर दूध पिला सकते है । मस्तुलुङ्गभृयाद्यस्य वायुस्तात्वस्थि नामयेत् ।

तस्य तृड्दैन्ययुक्तस्य सर्पिर्मधुरकैः श्रुतम् ।

पानाभ्यञ्जनयोर्योज्यं शीताम्बूद्वेजनं तथा ॥ ४७ ॥

तालुपान की चिकित्सा - मस्तुलुङ्ग के क्षय के कारण वायु तात्वस्य को दबा देता है । तब बालक तृपा से दीन होता है । उसके लिये पान और अभ्यञ्जन के लिये मधुर द्रव्यों से बनाये हुए घी का प्रयोग करना चाहिये । उसी प्रकार ठण्डे जल से सिञ्चन करके बालक को उद्वेजित करना चाहिये ॥ १७ ॥

विमर्श. - मस्तुलुङ्ग ( Brain matter ) कम होने पर पान और अभ्यन के लिये मधुर द्रव्यों से बनाये हुए घृत का प्रयोग करना चाहिये ।

वातेनाध्मापिता नाभि सरुजां तुण्डिसंज्ञिताम् ।

मारुतन्नै. प्रशमयेत् स्नेहस्वेदोपनाहनैः ॥ ४८६ ॥

गुदपाके तु बालानां पित्तन्नीं कारयेत् क्रियाम् ।

रसाञ्जनं विशेषेण पानालेपनयोर्हितम् ॥ ४६ ॥

तुण्टनामि और गुढापाक चिकित्मा - वायु से नाभि फूल गई हो और उसमें वेदना हो तो उसे ' तुण्डिनाभि ' कहते हैं, उसको वातनाशक स्नेह, स्वंद और उपनाहों से शमन करना चाहिये । बालकों को गुदापाक हो तो उस पर पित्तघ्नी- चिकित्सा करे, विशेष कर रसाञ्जन ( रमत ) का पान और लेप के दिये प्रयोग हितकर होता है ॥ ४८-४९ ॥ विमर्शः तुण्डिनाभि होने मे उस जगह की पेशियाँ ढीली होती है जिस कारण आन्त्रवृद्धि ( Umbilical hernia ) । होना सम्भव होता है ।