श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 431–440
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 431–440
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श्रध्यायः १० ] शारीरस्थानम् ८१ गुदपाक के लिये पेट में लेने के लिये गुलाबजल में घोट रसान की शुद्धि करने के पश्चात् उसका प्रयोग करना चाहिये । उसकी मात्रा से ई रत्ती होती है । क्षीराहाराय - सर्पिः पाययेत् सिद्धार्थक वचा मांसी - पयस्या - ऽपामार्ग - शतावरी सारिवा ब्राह्मी - पिप्पली-हरिद्रा - कुष्ठ - सैन्धव - सिद्धम् | क्षीरान्नादायमधुक - वचा - पिप्पली चित्रक - त्रिफला -सिद्धम् । अन्नादाय द्विपञ्चमूली क्षीर - तगरभद्रदारु - मरिच-मधुक - विडङ्ग- द्राक्षादि ( द्राक्षार्थि ' पा ' ) ब्राह्मीसिद्धम् । तेनारोग्यबल मेधाऽयूंषि शिशोर्भवन्ति ॥ ५० ॥
घृतपान विधि - स्तन्यपान करने वाले वालक को सिद्धार्थंक ( सफेद सरसों ), वच, जटामासी, पयस्या ( क्षीरकाकोली ), अपामार्ग ( चिंचेडा ), शतावर, सारिवा ( अनन्तमूल ), ब्राह्मी, पिप्पली, हल्दी, सुगन्ध कूठ और सेंधानमक से सिद्ध किया हुआ घृत पिलावे । तीर और अन्न लेने वाले बालक के लिये मुलेठी, वच, पिप्पली, चित्रक और त्रिफला से साधित घृत का प्रयोग करना चाहिये । अन लेने वाले बालकों को दोनों पञ्चमूल, क्षीरविदारी, तगर, भद्रदारु ( देवदारु ), गोलमिर्च, मधुक ( मुलेठी ), विडङ्ग ( वाय विडग ), द्राक्षा ( मुनक्का ) और दोनों ब्राह्मी ( मण्डूकपर्णी और ब्राह्मी ) साधित घृत दे । इस प्रकार का घृत देने से आरोग्य, वल, मेघा और आयु की वृद्धि होती है ॥ ५० ॥
विमर्श: - तीनों प्रकारों के बालकों को तीन प्रकारों के भिन्न - भिन्न घृत दिये जाते हैं । बालं पुनर्गात्रसुखं गृह्णीयात्, न चैवं तर्जयेत्, सहसा न प्रतिबोधयेद्वित्रासभयात्, सहसा नापहरे-दुत्क्षिपेद्वा वातादिविघातभयात्, नोपवेशयेत् कौव्य-भयात्, नित्यं चैनमनुवर्त्तेत प्रियशतैरजिघांसुः, एव-मनभिहतमना ह्यभिवर्धते नित्यमुदप्रसत्त्वसंपन्नो नीरोगः सुप्रसन्नमनाश्च भवति । वाता - ऽऽतप - विद्युत्प्रभा - पादप - लता शून्यागार -निम्नस्थान - प्रहच्छायाँऽऽदिभ्यो दुर्ब्रहोपसर्गतश्च बालं | रक्षेत् ॥ ५१ ॥
नाशुचौ विसृजेद्वालं नाकाशे विषमे न च ।
मारु वर्षेषु रजोधूमोदकेषु च ॥ ५२ ॥
वालक के साथ वर्ताव कैसा हो? – बालक को जिसमें तक-लीफ न हो, ऐसे लेना चाहिये । उसको तर्जन न करे । उसे भय मालूम न हो, इसलिये अकस्मात् कभी न जगावे । बालक को एकदम दूसरों से खींच न ले अथवा ऊपर न उठावे अन्यथा वातादि दोष कुपित होने का डर रहता है । उसको बैठा न रखे, नहीं तो उसके कुबड़ा होने का डर रहता है | अजिघांसु ( मन का उद्वेग न करते हुए ) प्रियकर पदार्थों से उसके मन की रक्षा करे । ११ सु ० शा ० इस प्रकार अनुद्विद्म मन वाला वालक हर समय बढ़ता है और बलिष्ठ, नीरोग एवं सुप्रसन्न रहता है । वायु ( आंधी ), कड़ी धूप, विद्युत्प्रभा ( बिजली की चमक ), पादप ( पेड़ ), लता, शून्यगृह, निम्नस्थान ( गुहा, कुवाँ वगैरह ), ग्रहच्छाया और दुष्टग्रहों की पीडा से बालक को रक्षा करनी चाहिये । अशुद्ध ( गन्दे ) स्थान में, आकाश में ( शून्य स्थान या अन्धेरा में ), ऊँची - नीची जगह पर, घाम, हवा, वर्षा, धूल, धूम और जल में उसको न छोडे ॥ ५१-५२ ॥ विमर्श: -- बालक को शारीरिक और मानसिक पीडा न हो इसके लिये सर्वप्रकार से प्रयत्न करना चाहिये ।
क्षीरसात्म्यतया क्षीरमाजं गव्यमथापि च ।
। दद्यादास्तन्यपर्याप्ते - बलानां वीक्ष्य मात्रया ॥ ५३ ॥
स्त्री दुग्ध न मिले तो क्या करे १ - चालक को दुग्ध साम्य जानकर उसे बकरी अथवा गौ का दूध, माता के पर्याप्त दूध न होने पर, यथोचित मात्रा में देना चाहिये ॥ ५३ ॥
विमर्श: --- यद्यपि स्त्रियों के दुग्ध से भिन्न दुग्ध पिलाने से बालक की पाचन शक्ति बिगड़ती है तो भी दुग्ध सात्म्य होने
के कारण देना चाहिये ।
षण्मासात् ( षण्मासं ' पा ' ) चैनमन्नं प्राशयेल्लघु हितं च ॥
अन्न प्राशन कब करावे - छः महीने के पश्चात् बालक को लघु और हितकर अन्न देना चाहिये ॥ ५४ ॥
G विमर्श: - छ: महीने के पश्चात् स्तन्य और लघु अन्न दोनों दिया जाता है । नित्यमवरोधरतश्च स्यात् कृतरक्ष उपसर्गभयात्, प्रयत्नतश्च ग्रहोपसर्गेभ्यो रच्या बाला भवन्ति ॥ ५५ ॥
बालक की रक्षा कैसे करे? - निरन्त अवरोध ( अन्तःपुर ) में बालक रहे । उपसर्ग ( गिरना इत्यादि ) भय से उसकी रक्षा करे । ग्रहों के उपद्रवों से यत्नपूर्वक बालक की रक्षा करे ॥ विमर्श: - मणि, मन्त्रादिकों से ग्रहों की शान्ति होती है और शारीरिक बाधा न हो इसके लिये आप्तवर्ग और नौकर-चाकरों के बीच में बालक को रखना चाहिये । - अथ कुमार उद्विजते त्रस्यति रोदिति नष्टसंज्ञो भवति, नखदशनैर्धात्रीमात्मानं च परिशुदूति दन्तान् खादति कूजति जृम्भते भ्रुवौ विक्षिपत्यूर्ध्व निरीक्ष फेनमुद्रमति सन्दष्टौष्ठः क्रूरो भिन्नामवर्चा दीनार्त्त -स्वरो निशि जागर्त्ति दुर्बलो म्लानागो मत्स्य - च्छुच्छु-न्दरी - मत्कुणगन्धो यथा पुरा धाग्याः स्तन्यमभिलषति तथा नाभिलषतीति सामान्येन ग्रहोपसृष्टलक्षणमुक्त, विस्तरेणोत्तरे वक्ष्यामः ॥ ५६ ॥
ग्रहों से पीडित वाल्क के लक्षण: - वालक खिन्न होता है, उसको पीढा होती है, रोता है, सज्ञाहीन होता है, नख और दांतों से अपने और धात्री को काटता है, दांत किटकिटाता है, कूं कूं भावाज करता है, जम्भाई लेता है, भृकुटियों को सिकोड़ता है, ऊपर देखता है, मुह से फेन निकालता है, क्रूर होते हुए होंठ काटता है, मल पतला और बचा ही निकलता है, दीन और दुःखयुक्त स्वर रहता है, रात में जागता है, दुर्बल होता है, अङ्ग ग्लान होते हैं, मछली,
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८ ९ सुश्रुतसहिता छछुन्दर और खटमलों के ममान शरीर से गन्ध आती है, पहले के समान दूध पीने की इच्छा नहीं करता है, ये सामान्यतया ग्रहों मे पीडित बालकों के लक्षण बताये गये हैं । उत्तर तन्त्र में विस्तार से वर्णन करेंगे ॥ ५६ ॥
विमर्शः - माधवनिदान में उपर्युक्त लक्षण पद्य में दिये
गये हैं । यथा'-' sigad बालः चणाञ्चस्यति रोदिति ।
नर्दन्तैर्दारयति धात्रीमात्मानमेव च ॥
उर्ध्व निरीक्षते दन्तान् खादेत् कूजति जृम्भते ।
aat क्षिपति दन्तौ पेनं चमति चासकृत् ॥
क्षामोऽति निशि नागति शूनाञ्चो भिन्नविद्स्वरः ।
मांसशोणितगन्धिश्च न चाश्नाति यथा पुरा ॥
सामान्यं ग्रजुष्टानां लक्षणं समुदाहृतम् । ( बालरोग निदानम् ) शक्तिमन्तं चैनं ज्ञात्वा यथावर्ण विद्यां ग्राहयेत् ॥ १७ ॥
विद्याग्रहणकालः– बालक जब शक्तिमान् हो जाय तो वर्ण के अनुसार उसको विद्या पढ़ानी चाहिये ॥ ५७ ॥
विमर्श ' – विद्याग्रहण सामर्थ्य मानसिक उन्नति पर निर्भर करती है | अतः स्ानमिक उन्नति होने पर ब्राह्मण को दण्ड-नीति और वैश्य को व्यापार विषयक ज्ञान कराना चाहिये । अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षा ( षोडश वर्षा ' पा ' ) पत्नीमावहेन् पित्र्यधर्मार्थकामप्रजाः प्राप्स्यतीति ॥ विवाह कान — विद्याध्ययन होने के पश्चात् पच्चीस वर्ष की अवस्था में युवक को ह्राढा वर्ष वाली, बाला के साथ विवाह कराना चाहिये । टसमे बह पितृकार्य ( श्राद्ध पचादि ), धर्म-कार्य ( यज्ञयागादि श्रुविन्तृति प्रमागिन ), अर्थ ( सुवर्ण, रौप्य, पैसा आदि ), काम और प्रज्ञा को प्राप्त करता है ६५८ ॥ विमर्श -धक और धर्मशास्त्र के मतानुसार विवाह विषय - टालमा की तृप्ति के लिये नहीं बल्कि धर्म, अर्थ आदि । के लिये होता है । ऊनपोडशवर्षाचा ( ऊनद्वादशवर्षायां ' पा ' )
मप्रानः पञ्चत्रिंशतिम् ।
यद्यावचे पुमान् गर्भ कुक्षिस्य स विपद्यते ॥ ५६ ॥
जातो वा न चिरं जीवेज्जीवेद्य दुर्बलेन्द्रियः ।
तस्मादत्यन्तबालायां गर्भाधानं न कारयेन् ॥ ६० ॥
उपर्युक काल से कम आयु वाले पति पत्नी होने पर टोप. -मोल्छ माल के पूर्व कन्या को यदि पचीस साल से कम शुम्प का गर्भ रहे तो वह गर्भ पेट में नष्ट होता है । यदि गर्म में बालक उत्पन्न हो तो वह बहुत दिन नहीं जीता, यदि जीवा रहे तो भी वह दुर्बलेन्द्रिय बन जाता है । इसलिये बहुत छोटी बाला को गर्भ धारण न करवावे ॥ ५ ९ –६० ॥ विमर्श – पाठ भेद के अनुसार मोलह साल के पूर्व स्थान में द्वाडदा वर्ष से कम वयस्क की बाला को गर्भ धारण न कराना कहा गया है । अतिवृद्धायां दीर्घरोगिण्यामन्येन वा विकारणोप-सृष्टायां गर्भाधानं नैव कुर्वीत | पुरुपस्याप्येवविवस्य न एव दोषाः सम्भवन्ति ॥ ६१ ॥
गर्भावान न करने योग्य व्यनिः- यदि उपर्युक्त अवस्था में गर्भ रहे तो वह कुक्षि में ही मरता है अथवा जीता रहने पर भी रोगयुक्त होता है ॥ ६१ ॥
( अ ) तत्र पूर्वोकैः कारणैः पतिष्यति गर्भे गर्भा · शय - कटी - वङ्क्षण - वस्तिशूलानि रचदर्शनं च तत्र शीतैः परिषेकावगाहप्रदेहादिभिरुपचरेज्जीवनीयशृत-क्षीरपानैश्च । गर्मदोष - चिकित्सा - ( अ ) पूर्वोक ( मूटगर्भ निदान में कहे अनुसार ) गर्भ पतन होनेवाला हो तो गर्भाशय, कमर, वलग और बस्ति प्रदेश में शूल तथा रक्त का प्रादुर्भाव लक्षण होते हैं । टम्म समय टण्डे परिषेक, अवगाहन और लेपों से उपचार करे । जीवनीय गणोक्त ओषधियों से मि । किये हुए दुग्ध से चिकित्सा करे । ( आ ) गर्भ स्फुरणे मुहुर्मुहुस्तत्संघारणार्थं श्रीर-मुत्पलादिसिद्धं पाययेत । ( आ ) गर्भस्फुरण हो तो उसका संधारण करने के लिये बार बार - उत्पलादि गग से सिद्ध किया हुआ दूब पिलाना चाहिये । ( इ ) प्रस्रंसमाने - सदाहपार्श्वगृदृशूलासृग्दरानाह-मूत्रसङ्गाः, स्थानात्स्थानं च प्रक्रामति गर्भे — कोष्ठे संरम्भः तत्र न्निग्धशीताः क्रियाः । ( इ ) गर्भ का स्त्राव होता हो तो ढाह के साथ वगल और पृष्ट में शूल होता है, असरदर ( रक्तप्रदर ), आनाह ( पेट फूलना ) और मूत्रमंग ( मत्रावरोध ) ये लक्षण होते है । गर्म एक स्थान से दूसरी ओर जाता हो तो कोष्ठ में लोभ होता है । उस पर न्निग्ध क्रिया करे । ( ई ) वेदनायां - महासहा क्षुद्रसहा मधुक - वदंष्ट्रा-कण्टकारिकासिद्धं पय शर्कराक्षौद्र मिश्रं पाययेत्; सूत्र-सङ्गे दुर्भादिसिद्धम्; आनाहे - हिङ्गु - सौवर्चल - लशुन-वचासिद्धम् । ( ई ) वेदना हो तो महासहा ( मापपर्णी ), क्षुद्रमहा ( मुद्रपर्णी ), मधुक ( मुलेटी ), श्वदंडा ( गोखरू ) और कण्टकारी ( भटकटैंया ) से सिद्ध किये हुए दूध में मिश्री और मधु मिलाकर पिलावे । मूत्रसंग होने पर दुर्भादि से सिद्ध किया हुआ दुग्ध पिलावें । आनाह ( पेट फूलता ) हो तो सौवर्चल का प्रक्षेप ढाल कर लहसुन और बच से सिद्ध क्रिया हुआ दूध हींग मिलाकर पिलाना चाहिये । ( 3 ) अत्यर्थं स्रवति रक्त कोष्टागारिकाऽगारमृ-त्पिण्ड - समङ्गाघातकी -कुसुम - नवमालिका गैरिक मर्ज-रस- रसाञ्जनचूर्ण मधुनाऽवलिह्यान, यथालाभं न्यग्रोधादित्वक प्रवालकल्कं वा पयसा पाययेत्, उत्पलादिकल्कं वा कशेर - शृङ्गाटक- शालुकककं वा शृतेन पयसा, उदुम्बरफलादककन्डक्कायेन वा शर्करा-मधुमधुरेण शालिपिष्टं न्ययोघादिस्वरसपरिपीतं बन्त्रावयवं योन्यां धारयेत् । वा ( ट ) रचन्नाव ज्यादा होता हो तो कोष्टागारिका नामक कोटक के घर की मृत्तिका, समङ्गा, धाय का फूल, नवमल्लिका
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अध्यायः १० ] शारीरस्थानम् ८३ ( वनमल्लिका ), गेरू, राल और रसाअन इनमें से जो द्रव्य मिल सकें उनका चूर्ण मधु के साथ चटावे, अथवा न्यग्रोधादि ( वटादि ) की छाल या उनके पत्तों का कल्क दूध के साथ पिलाना चाहिये । उत्पलादि कल्क अथवा कसेरू, सिंघाड़ा । और शाक ( कमलकन्द ) का कल्क उबाले हुए दुग्ध के साथ पिलाना चाहिये, भथवा गूलर के फल और जल में । पैदा होनेवाले कन्द के क्वाथ को शर्करा और मधु से मीठा बनाकर शालिधान्य का कल्क अथवा चूर्ण देना चाहिए, अथवा चटादि स्वरसों में भिगोये हुए वर्षो को योनि में धारण कराना चाहिये । ( ऊ ) अथादृष्टशोणितवेदनायां - मधुक - देवदारु - । मञ्जिष्ठा - पयस्यासिद्धं पयः पाययेत्, तदेवाश्मन्तक-शतावरी - पयस्यासिद्धं विदारिगन्धादिसिद्धं वा, बृहती | द्वयोत्पल - शतावरी - सारिवा - पयस्या - मधुकसिद्ध वा, एवमुपक्रान्ताया उपावर्त्तन्ते रुजो गर्भश्चाप्यायते । ( ऊ ) यदि वेदना हो पर रक्त का स्राव न दिखाई दे ।
तो, मुलेठी, देवदारु, मञ्जिष्ठा और पयस्या ( क्षीरकाकोली ।
ढल्हण के मत से अर्कपुष्पी ) से मिद्ध किया दुग्ध पिलावे ॥
अथवा अश्मन्तक ( पाषाणभेद ), शतावर और पयस्या ( क्षीरकाकोली ) से सिद्ध किया हुआ दूध पिलावे । अथवा विदारीगन्ध गण से सिद्ध किया हुआ दूध पिलाये । अथवा दोनों बृहती, नीलकमल, शतावर, सारिवा, क्षीरकाकोली और मुलेठी से साधित दुग्ध पिलाना चाहिये । इस प्रकार चिकित्सा करने पर पीड़ा शान्त होती है और गर्भ चढ़ने लगता है । ( ए ) व्यवस्थिते च गर्भे - गव्येनो दुम्बरशलाटु । सिद्धेन पयसा भोजयेत् । ( ए ) गर्भ व्यवस्थित होने पर गूलर के शलाटु ( कोमल । फल ) से सिद्ध किये हुए गोदुग्ध के साथ भोजन । कराना चाहिये । ( ऐ ) अतीते -- लवण स्नेहवर्ज्याभिर्यवागूभिरुद्दाल- । कादीनां पाचनीयोपसंस्कृताभिरुपक्रमेत् यावन्तो मासा गर्भस्य तावन्त्यहानि । ( ऐ ) गर्भपतन होने पर लवण और स्नेहों से रहित, उद्दालक ( जगी कोदो ) आदि से बनाया हुआ यवागू पाचनीय द्रव्यों के साथ जितने मास का गर्भपतन हो गया हो उतने दिन तक पिलाना चाहिये । ( ओ ) बस्त्युदरशूलेषु - पुराणगुडं दीपनीयसंयुक्तं पाययेदरिष्टं वा । ( ओ ) वस्ति और उदरशूल हो तो दीपनीय द्रव्यों से युक्त पुराना गुड़ अथवा अरिष्ट देना चाहिये । ( औ ) वातोपद्रव गृहीतत्वात् स्रोतसां लीयते गर्भः, सोऽतिकालमवतिष्ठमानो व्यापद्यते, तां मृदुना स्नेहा-दिक्रमेणोपचरेत्, उत्क्रोशरस संसिद्धामनल्प स्नेहां वागूं पाययेत्, माप - तिल - बिल्व- शलाटुसिद्धान् वा कुल्माषान् भक्षयेन्मधु माध्वीकं चानुपिवेत्सप्तरात्रम् । ( औ ) वात के उपद्रवों के कारण स्रोतसों में गर्भ लीन होता है, पश्चात् वहुत दिन वहाँ रहने पर मर जाता है, तब । मृदु स्नेह, स्वेदादि क्रम से चिकित्सा करनी चाहिये । उत्क्रोश | ( कुरर का भेद ) के मांस रस के साथ पकाया हुआ यवागू बहुत स्नेह देकर पिलावे, माप ( उड़द ), तिल, विश्व के कोमल फलों से सिद्ध किये हुए कुल्मापों को खिलाना चाहिये तथा सात दिन तक ऊपर से मधु और माध्वीक ( सुरा ) पिलाना चाहिये । ( अं ) कालातीत स्थायिनि गर्भे - विशेषतः सधा-न्यमुदूखलं मुसलेनाभिहन्याद्विपमे वा यानासने सेवेत । ( भ ) कालातीत गर्भ हो तो ऊखल में धान्य डालकर उसको मूसल से कूटना चाहिये अथवा विषम ( ऊँचा - नीचा ) भासन या सवारी पर बैठाना चाहिये । ( अ ) वाताभिपन्न एत्र शुष्यति गर्भः, स मातुः कुक्षिं न पूरयति मन्दं स्पन्दते च तं बृंहणीयैः पयो-भिर्मासरसैश्चोपचरेत् । ( अः ) जब गर्भ वायु से आक्रान्त होता है तब माता की कुक्षि को पूर्णतया व्याप्त नहीं करता है और उसका स्फुरण भी धीरे - धीरे होता है । उस अवस्था में वृंहणीय दूध और मांसरस देकर उसकी चिकित्सा करनी चाहिये ।. ( क ) शुक्रशोणितं वायुनाऽभिप्रपन्नमवक्रान्तजी-वमाध्मापयत्युदरं तं कदाचिद्यदृच्छयोपशान्तं नैग-मेपाहृतमिति भाषन्ते, तमेव कदाचित् प्रयमानं नागोदरमित्याहु, तत्रापि लीनवत् प्रतीकारः ॥ ६२ ॥
( क ) शुक्र और शोणित जब वायु से युक्त होते है तब उनमें जीवात्मा मिलता है भी कारण न होते हुए भी उसे नैगमेप ने हरण किया कदाचित् अत्यन्त लीन हो नैगमेप और नागोदर करनी चाहिये ॥ ६२ ॥
विमर्श: - गर्भस्राव के यहा बता दी गयी है । जिससे पेट फूलता है, किन्तु कोई कदाचित् पेट पिचक जाता है तो ऐसा लोग कहते हैं । यदि वही पेट जाय तो उसे नागोदर कहते हैं । में लीन गर्भ के समान चिकित्सा प्रकार, उनके लक्षण और चिकित्सा अत ऊर्ध्वं मासानुमासिकं व्याख्यास्यामः ।
मधुकं शाकबीज च पयस्या सुरदारु च ।
अश्मन्तकस्तिलाः कृष्णास्ताम्रवल्ली शतावरी ॥ ६३ ॥
वृक्षादनी पयस्या च लता सोत्पलसारिवा ।
अनन्ता सारिखा राना पद्मा मधुकमेव च ॥६४ ॥
बृहत्य काश्मरी चापि क्षीरिशुङ्गास्त्वचो घृतम् ।
पृश्निपर्णी बला शिंत्रुः श्वदंष्ट्रा मधुपर्णिका ॥ ६ ॥
शृङ्गाटकं बिसं द्राक्षा कशेरु मधुकं सिता ।
वत्सैते सप्त योगाः स्युरर्धश्लोकसमापनाः ।
यथासंख्यं प्रयोक्तव्या गर्भस्रावे पयोयुताः ॥ ६६ ॥
कपित्थ- वृहती - बिल्व- पटोले क्षु - निदिग्धिका-मूलानि क्षीरसिद्धानि पाययेद्भिषगष्टमे ॥६७ ॥
नवमे मधुका - नन्ता - पयस्या - सारिवाः पिवेत् ।
क्षीरं शुण्ठीपयस्याभ्यां सिद्धं स्याद्दशमे हितम् ॥ ६८ ॥
सक्षीरा वा हिता शुण्ठी मधुकं सुरदारु च ।
एवमाप्यायते गर्भस्तीत्रा रुकू चोपशाम्यति ॥ ६६ ॥
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५४ सुश्रुतसहिता गर्भस्राव न हो इसलिये मासानुमाम चिकित्सा - इसके पश्चात् प्रत्येक मास में देनेवाली ओषधियाँ कहेंगे । प्रथम महीने में मुलेठी, सागवान के बीज, तीरकाकोली और देवदारु; ये दूध के साथ देना चाहिये । दूध का सम्बन्ध प्रत्येक पदार्थ के साथ लगाना चाहिये । द्वितीय मास में--अश्मन्तक, काले तिल, ताम्रवली ( मञ्जिष्ठा ) और शतावर । तृतीय मास में — वृचादनी ( बाँदा ), पयस्या ( क्षीरकाकोली ), लता ( प्रियंगु ), नीलोत्पल तथा सारिवा ( अनन्तमूल ) । चतुर्थ मास में - अनन्ता ( दुर्वा ), सारिवा ( अनन्तमूल ) राखा, पद्मा ( पद्मचारिणी अथवा भार्गी ) और मुलेठी | पंचम मास में दोनों बृहती, काश्मरी ( गम्भारी ), तीरिवृक्षों के और छाल तथा घृत । पष्ठ मास में- पृक्षिपर्णी, वला, शि g ( सहजन ), श्वदंष्ट्रा ( गोखरू ) और मधुपर्णिका ( मधुयष्टिका ) । सप्तम मास में सिंघाड़ा, कमलकन्द, मुनक्का, कसेरू, मुलेटी और मिश्री । हे वरस! श्लोकार्ध में कहे गये इन सात योगों को दुग्ध के साथ यथासंख्य ( अर्थात् जो श्लोका की संख्या हो उसी मास के गर्भस्राव के लिये देना चाहिये । अष्टम मास में कैथ, बृहती ( चड़ी कटेरी ), बेल, परवल, ईख, निदिग्धिका ( भटकटैया ) की जड़ों से सिद्ध किया हुआ दुग्ध पिलावे । नवम मास में मुलेठी, दूर्वा, क्षीरविदारी, सारिवा ( अनन्तमूल ) का सेवन करे । दशम मास में -- सोंठ और चीरकाकोली से सिद्ध किया हुआ दुग्ध पिलाना अथवा सोंठ, मुलेठी और देवदारु दूध से पिलाना चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ पुष्ट होता है और तीव्र पीड़ा शान्त होती है ॥ ६३-६९ ॥ विमर्श: -- वाग्भट के शारीरस्थान द्वितीय अध्याय में भी इसी प्रकार की चिकित्सा बतायी गई है । निवृत्त प्रसवाया तु पुनः षड्भ्यो वर्षेभ्य ऊर्ध्व प्रसवमानायाः नार्याः कुमारोऽल्पायुर्भवति ॥ ७० ॥
निवृत्त - प्रमवा की सन्तति अल्पायु होती है - निवृत्त प्रसवा के पश्चात् यदि छः साल के ऊपर प्रसूति हो तो बालक अल्पायु होता है ॥ ७० ॥
विमर्शः - छः साल तक जिसको संतान उत्पन्न न हो, । उसे निवृत्तप्रसवा कहते हैं । अथ गर्भिणीं व्याभ्युत्पत्तावत्यये छर्दयेन्मधुरा-म्लेनान्नोपहितेनानुलोमयेष्व, संशमनीयं च मृदु विद-ध्यादन्नपानयोरनीयाच मृदुवीर्यं मधुरप्राय गर्भाविरुद्धं घ, गर्भावरुद्धाच क्रिया यथायोगं विदधीत मृदुप्रायाः ॥ गर्भिणी की चिकित्सा कैसी हो- प्राण - सकट प्राप्त होनेवाला रोग यदि गर्भिणी को हो तो कै कराना चाहिये । मधुर और अम्ल अन्न के साथ अनुलोमन करना चाहिये । मृदु संशोधन देना चाहिये । अन्न - पान मृदुवीर्यवाला, मधुरप्राय और गर्भ को घातक न हो ऐसा होना चाहिये । हीनयोग, मिथ्यायोग तथा अतियोग जिस प्रकार न हो, उस प्रकार और गर्भ के प्रतिकूल न रहे ऐसी मृदुप्राय चिकित्सा करनी चाहिये ॥७१ ॥
विमर्श: --- औषध, अन्न और विहार ये सच तीक्ष्ण न हो बल्कि मृदुप्राय हो । पञ्चकर्म करना हो तो गर्भ के विरुद्ध न पढ़े, इस पर ध्यान रहे ।
। भवन्ति चात्र-सौवर्ण सुकृतं चूर्ण कुष्ठं मधु घृतं वचा ।
मत्स्याक्षकः शङ्खपुष्पी मधुसर्पिः सकाञ्चनम् ॥ ७२ ॥।
अर्कपुष्पी मधु घृतं चूर्णितं कनकं वचा ।
हेमचूर्णानि कैडर्यः श्वेता दूर्वा घृतं मधु ॥ ७३ ॥।
चत्वारोऽभिहिताः प्राशाः श्लोकार्धषु चतुर्ष्वपि ।
कुमाराणां वपुर्मेधा चलबुद्धिविवर्धनाः ॥ ७४ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भिणीव्याकरणं शारीर नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
बालक के लिए हितकर योग - ( १ ) सुवर्णभस्म, सुगन्ध-कूठ, मधु, घृत और वच । ( २ ) ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मधु, घृत और सुवर्णभस्म । ( ३ ) अर्कपुष्पी ( पयस्या ), मधु, घी, सुवर्णभस्म और वध । ( ४ ) सुवर्णभस्म, पर्वत निम्ब, श्वेता ( अपराजिता ), दूर्वा, घृत और मधु । ये चार प्राश चार लोकाधों में बताये गये हैं । ये बालक के शरीर, स्मरणशक्ति, वल और बुद्धि के बढ़ानेवाले हैं ॥७४ ॥
विमर्श: -- विश्वामित्र के वाक्य से मात्रा का प्रमाण
घताया गया है । यथा-विफलमात्रं तु जातमात्रस्य भेषजम् ।
एतेनैव प्रमाणेन मासि मासि प्रवर्धितम् ॥
कोलास्थिमात्रं क्षीरादे दद्याद्वैपज्यकोविदः ।
क्षीरान्नादे कोलमात्र मन्नादोदुम्बरोपमम् ॥
जातमात्र बालक को वायविडङ्ग के फल प्रमाण मात्रा दे । उत्तरोत्तर मास में एक एक चायविटङ्ग फल प्रमाण मात्रा को चढ़ाना चाहिये । दुग्ध पीनेवाले बालक को बेर की गुठली के बराबर । दुग्ध और अन्न लेनेवाले बालक को बेर के प्रमाण में । अन्न ग्रहण करनेवाले बालक को उदुम्बर प्रमाण में मात्रा
देनी चाहिये ।
इति सुश्रुते शारीरस्थाने दशमोऽध्यायः समाप्तः ॥
शारीरे प्रश्नाः-( १ ) गर्भिण्या अनुमासिकान्नपानविधिर्देयः, गर्मिणीचिकित्सा -सूत्राणि च लेख्यानि । ( २ ) गर्भस्रावप्रकारास्तथा अनुमासिक गर्भस्राव चिकित्सा -लेखनीया | ( ३ ) अपराया अपतन्त्याः के के भवन्त्युपद्रवाः । तस्याः चिकित्सा विशदतया देया । ( ४ ) मफलस्य निदान लक्षण चिकित्सा च लेखनीया । ( ५ ) बालस्य रोगज्ञानोपायाः के? ग्रहोपसृष्टलक्षणानि च कानि? कीदृश सूतिकागारं प्रशस्तं भवति १ ( ६ ) धात्री परीक्षा कथं कर्त्तव्या १ समाप्तश्चेदं शारीरस्थानम् ।
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॥ श्रीः ॥ -काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १५६ महर्षिणा सुश्रुतेन विरचिता सुश्रुतसंहिता ' आयुर्वेदतत्त्वसन्दीपिका ' हिन्दीव्याख्या - वैज्ञानिकविमर्शोपेता ( चिकित्सास्थानम् ) व्याख्याकार -वैद्य प्रियव्रत सिंह एम. ए., ए. एम. एस. चिकित्सक, श्रीराम लक्ष्मीनारायण मारवाड़ी हिन्दू आतुरालय, वाराणसी. DANIL चौरखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस वाराणसी - १ -00000-
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प्रकाशक - चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी. मुद्रक - विद्याविलास प्रेस, वाराणसी, प्रथम संस्करण, संवत् २०१७ ( पुनर्मुद्रणादिका. सर्वेऽविकाराः प्रकाशकाधीनाः ) Chowkhamba Sanskrit Series Office, P. O. Box 8, Varanasi. ( INDIA ) 1960
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1 | ft: 11 सुश्रुतसंहिता ' आयुर्वेदतत्त्वसन्दीपिका ' व्याख्योपेता चिकित्सास्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातो द्वित्रणीयं चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके अनन्तर द्वित्रणीय अर्थात् शारीरिक और आगन्तुक द्विविध a णों की चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ व्रणौ भवतः - शारीरः, आगन्तुश्च । तयोः शारीरः पवनपित्तकफशोणितसन्निपातनिमित्तः, आग-न्तुरपि पुरुपपशुपक्षित्र्योल सरीसृप प्रपतनपीडनप्रहारा मिक्षारविपतीक्ष्णौपधशकैलकपलशृङ्गचक्रेपुपरशुशक्ति-कुन्ताद्यायुधाभिघातनिमित्तः । तत्र तुल्ये व्रणसामान्ये द्विकारणोत्थानप्रयोजनसामर्थ्याद् ' द्विव्रणीय ' इत्युच्यते ॥ व्रण — दो प्रकार के होते है - ( क ) शारीरिक और ( ख ) आगन्तुक । इन दोनों में ( क ) शारीरिक ऋण वह है जो - वात, पित्त, कफ, रक्त और सन्निपात ( इनमें से दो या अधिक के संयोग ) के कारण उत्पन्न होता है । ( ख ) आगन्तुक व्रण - पुरुष, पशु, पक्षी, हिंसकजीव तथा सर्प आदि से, गिरने, दबने चोट लगने और अग्नि से, क्षार, विष एवं तीच्ण औषधियों के प्रयोग से, लकड़ी पत्थर के टुकडों से, बड़े के खप्पर से, सींग से, चक्र, बाण, फरसा, १. व्याल – ' व्याला व्याघ्रादयो दुष्टजीवा ' व्याघ्र आदि हिंसक जीव | २. सरीसृप— “ सरीसृपाः कृष्णसर्पादयो मीनमकरौ च ' पेट । के बल चलने वाले जन्तु । ३. शकट – ‘ शकलं काष्ठादीना खण्डम् ' लकडी पत्थर के टुकड़े । ४. कपाल - ' घटादीना कर्पर ' मिट्टी के घड़े का टुकड़ा । ५. शक्ति - ' शक्तिरायुधविशेपत्रिमुखी ' तीन मुखवाला शस्त्र । शक्ति, भाला आदि शस्त्रों के अभिघात से उत्पन्न होता है । यद्यपि व्रण की दृष्टि से ये दोनों व्रण समान श्रेणी के हैं, ( जिससे इस अध्याय का नाम ' एकत्रणीय ' भी हो सकता था ) किन्तु इसे ' द्विद्यणीय ' कहने का प्रयोजन यह है कि इन द्विविध व्रणों के उत्पादक हेतु पृथक - पृथक है एवं इनकी प्रतिकार-पद्धति भी कुछ भिन्न है ॥ ३ ॥
विमर्श:: - - चरक तथा सुश्रुत दोनों आचायों ने इस अध्याय का नाम ' त्रिणीयं चिकित्सितम् ' ( द्वो व्रणावधिकृत्य कृत द्विन-णीयम्, चिकित्सितं विकारप्रतिकार ) रखा है । ' दौ प्रणाविति । निजश्चागन्तुश्च । निजः शरीरदोषोत्थ भागन्तुर्बाह्यहेतुज ' । ( चरक ) इन दोनों आचार्यों के साथ द्विविध व्रण की मान्यता के पोषक वाग्भट भी है. - ' व्रणो द्विधा निजागन्तु - दुष्ट - शुद्ध - विभेदतः ' । ar की इस द्विविधमान्यता पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि प्रधानतः उत्पादक हेतुओं की भिन्नता के कारण ही सभी प्रकार के व्रण इन दो श्रेणियों में विभक्त किए गए हैं । दोनों प्रकार के व्रणों में प्रारम्भिक प्रतिकार - पद्धति कुछ भिन्न अवश्य रहती है, किन्तु एक सप्ताह व्यतीत होने पर शारीरिक णों की भाँति आगन्तुक व्रणों में भी दोषों का प्रसार हो जाता है । भागन्तुक व्रण केवल एक सप्ताह तक ( सद्योव्रणत्वं सप्ताहमेव ) अपनी सज्ञा स्थिर रखने में समर्थ होते है । सुश्रुत ने स्पष्ट लिखा है – ' उत्तरकालन्तु दोषोपप्लवविशेषाच्छारीरवत् प्रतीकारः ' अर्थात् एक सप्ताह के बाद आगन्तुक घणों की चिकित्सा भी दोपों के प्रसार - भेद से शारीरिक व्रणों की भाँति ही करनी चाहिए | अध्याय की समाप्ति पर कहे गए चिकित्सा सूत्र - पष्टथा विधानैर्निर्दिष्टेश्चतुर्भिः साध्यते व्रण ” वाक्य में एकवचनान्त व्रण शब्द का प्रयोग चिकित्सा की दृष्टि से द्विविध व्रणों में समानता ही दर्शाता है । पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान शल्यकर्म में सुविधा की दृष्टि से समस्त व्रणों का विभाजन तीन श्रेणियों में करता है - The various ulcers
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२ सुश्रुतसहिता that are commonly met with in Surgical practice are Conveniently classified under the three following headings ( 1 ) Ulcers due to injury or pyogenic organi -sms, with or without predisposing circulatory or nervous disturbances. ( 2 ) Ulcers due to specific | micro - organisms. ( 3 ) Malignant ulcers. ( Elements of Sargical Diagnosis ) यद्यपि ऋणों का उपर्युक्त विभाजन आयुर्वेदीय ' द्विविध व्रण ' की पक्ति से पृथकू मालूम पडता । है, किन्तु उत्पादक - हेतुओं का जहाँ तक सम्बन्ध है, दोनों चिकित्सा पद्धतियाँ एक ही निर्णय पर पहुँचती है । आयुर्वेद -संहिताओं में हेतुभेद की दृष्टि से किया गया व्रणों का द्विविध वर्गीकरण; इन तीनों भेदों को अपने अन्दर अन्तर्भूत कर लेता है । पहला विभाग आगन्तुक व्रण की श्रेणी में, तथा दूसरा और तीसरा विभाग शारीरिक ऋण की श्रेणी में आता है । सर्वस्मिन्नेवागन्तुव्रणे तत्कालमेव क्षतोष्मणः प्रसृतस्योपशमार्थं पित्तवच्छीत क्रियावचारणविधिवि-शेषः सन्धानार्थं च मधुघृतप्रयोग इत्येतद्विकारणो-त्थानप्रयोजनम्, उत्तरकालं तु दोपोपप्लवविशेषा-च्छारीरवत् प्रतीकारः ॥ ४ ॥
सभी प्रकार के आगन्तुक व्रणों में, अभिघात से क्षत उत्पन्न होते ही, शरीर में व्याप्त चतजन्य उप्मा को शान्त करने के लिए, पित्त शमन की विधि के अनुसार शीतल क्रिया तथा घ्रण के मुख को बन्द करने के लिए मधु घृत का प्रयोग करना चाहिए । एक सप्ताह के बाद दोपों के प्रसारभेद से ( आगन्तुक वर्णों को ) शारीरिक घणों की भाँति चिकित्सा होनी चाहिए । द्विविध ( भिन्न ) कारणों से उत्पन्न व्रणों की यही चिकित्सा पद्धति है ॥ ४ ॥
विमर्शः - प्रहार से उत्पन्न क्षत के कारण, आन्तरिक अवयवों में एक प्रकार का विकार उत्पन्न होता है । आघात लगते ही हृदय में धक्का ( Shook ) लगता है । इस धक्के से हृदय की गति सामान्यावस्था की अपेक्षा बढ़ जाती है । परिणामस्वरूप रक्तवाहिनियों में रक्तप्रवाह अधिक होने लगता है और वे फैल जाती हैं । रक्तप्रवाह की सहसा तीव्रता से एवं स्नायु - मण्डल के उत्तेजित हो जाने के कारण सम्पूर्ण शरीर उष्ण हो जाता है । आगन्तुक व्रणों में यह स्थिति विशेष रूप से होती है । उपर्युक्त संदर्भ में ' क्षतोप्मा ' शब्द का प्रयोग शरीर के अन्दर होने वाले इसी विकार का निर्देशक है । इसकी शान्ति के लिए पित्तशमन - विधि का आश्रय लेना चाहिए और रक्त समान गुण वाले हैं । शीतल किया से पित्त की शान्ति होती है । रक्तवाहिनियों में रक्तप्रवाह का आधिक्य शरीर को उष्ण बना देता है । अतः चत की उप्मा को शान्त करने के लिए पित्तवत् शीत क्रिया के विधान की आवश्यकता पड़ती है । शीत क्रिया से रक्तवाहिनियों में सकोच होता है । रक्त के प्रवाह में शिथिलता आती है, जिससे छत से निकलने वाले रक्त का अवरोध होता है तथा मस्तिष्क रक्तवाहिनियों के दबाव से मुक्त हो जाता है । क्षत के रोगी को प्रकृतिस्थ करने के लिए शीतक्रिया आवश्यक होती है । पाश्चात्य चिकित्सा - विज्ञान के दृष्टिकोण से भी इस क्रिया का समर्थन होता है Head injury तथा Injuries of the spne ( शिर और पृष्ठवंश के अभिघात ) में Ice ( बर्फ ) का प्रयोग इसी दृष्टि से किया जाता है । रक्तस्राव को रोकने के लिए उत पर भी चर्फ ( Ice ) रखा जाता है तथा तृपा की शान्ति के लिए Cold drink ( शीतपेय ) का प्रयोग किया जाता है । दोपोपप्लवविशेषः पुनः समासतः पञ्चदृशप्रकारः प्रसरणसामर्थ्यात्, यथोक्तो व्रणप्रश्नाधिकारे; शुद्ध-त्वात पोडशप्रकार इत्येके ॥ ५ ॥
प्रसार की शक्ति के अनुसार कुपित दोपों का प्रसार भेद संक्षेप में पन्द्रह प्रकार का होता है । इनका वर्णन ' ब्रग प्रश्नाधिकार ' में किया जा चुका है । कुछ आचार्य इसमें व्रण के ' शुद्ध भेद ' को सम्मिलित कर दोपप्रसार - भेद को सोलह प्रकार का मानते है ॥ ५ ॥
विमर्शः-- यहाँ ' दोपोपप्लव ' शब्द का प्रयोग उनके प्रसार के अर्थ में किया गया है । इसका तात्पर्य है ( वातादीन शोणितचतुर्थानां पृथगन्योऽन्यसंसर्गः ) अर्थात्, वातादि दोष पृथक - पृथक, दो - दो अथवा तीनों मिलकर रक्त से सम्बन्ध स्थापित करके अपना विस्तार करते हैं । संक्षेप में इनका प्रसार पन्द्रह प्रकार का होता है । यदि रक्त की तरह अन्य दूय ( धातु मलादि ) पदार्थों के साथ भी दोपों के संसर्ग की कल्पना की जाय, और इनके प्रसारभेद की गणना हो तो यह संख्या असत्य हो जावेगी । इसीलिये पन्द्रह प्रकार का प्रसारभेद संक्षेप में माना गया है । दोपों के प्रसारभेद की संख्या शारीरिक व्रणों के भेदों का निरूपण भी करती है, क्योंकि तीनों दोप तथा रक्त ही शारीरिक वर्णों के उत्पादक कारण हैं । व्रण प्रश्नाधिकार में दोपों के प्रसार का वर्णन इस प्रकार है - ' एवं दोषाः कदाचिदेकशो द्विश. समस्ताः शोणितसहिता वाऽनेकधा प्रसरन्ति । तद्यथा - वात, पित्त, श्लेष्मा, शोणितम्, वातपिचे, वातश्लेष्माणी, पित्तश्लेष्माणौ, वातशोणिते, पित्त-शोणिते, श्लेष्मशोणिते, वातपित्तशोणितानि, वातश्लेष्मशोणितानि, पित्तश्लेष्मशोणितानि वातपित्तकफा वातपित्तकफशोणितानीत्येव पञ्चदशधा प्रसरन्ति । ( सु. सू. अ २१ ) व्रण के ' शुद्ध भेद ' ( शुद्ध सकलदोषोपप्लवरहितो व्रण ) को इस सख्या में सम्मिलित करने पर यह भेद सोलह प्रकार का हो जाता है । शुद्ध व्रण का लक्षण है- ' त्रिभिर्दोषैरनाक्रान्तः श्यावोष्ठः पिडकीसमः । अवेदनो निरास्रावो व्रणः शुद्ध इद्दोच्यते ॥ ' ( सु. सू.अ. २३ ) तस्य लक्षणं द्विविधं - सामान्यं वैशेषिकं च । तत्र सामान्यं रुक् । ' व्रण ' गात्रविचूर्णने, व्रणयतीति । व्रणः । विशेपलक्षणं पुनर्वातादिलिङ्गविशेषः ॥ ६ ॥
व्रण के लक्षण दो प्रकार के हैं- सामान्य और विशेष 1 । १. पीड़ा होना व्रण का सामान्य लक्षण हैं । व्रण धातु का अर्थ है शरीर को चूर - चूर करने वाला और इसकी व्युत्पत्ति है- ' व्रणयतीति व्रण ' अर्थात् शरीर को विवर्णं करने वाला । २. विशेष लक्षण - वातादि दोषों के अनुसार हुआ करते हैं ॥ ६ ॥
तत्र श्यावारुणाभस्तनुः शीतः पिच्छिलोऽल्प-स्रावी रूक्षश्चटचटायनशीलः स्फुरणायामतोदभेदवेद-नाबहुलो निर्मासचेति वातात्, क्षिप्रजः पीतनीलाभः
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प्रध्यान १ ] चिकित्सास्थानम् I किंवा दाहपाकरागत्रिकारकारी पीत के समान साव वाटा होता है । ६. वातश्लेप्मज प्रण - खुजली पिफाजुति पित्तान् + प्रततचण्डकण्डबहुलः स्थूल, पीयुक्त, रूप, भारी, पटिन तथा वारवार बहने लोट स्वच्चमिराग्नायुजालावततः कठिनः पाण्ट्य. यभासो मन्दवेदनः शुशीतसान्द्रपिन्छिलास्रावी गुरु-अनि कफात् प्रवालदलनिपयप्रकाशः कृष्णस्फोट पिटवाजा लोपचितस्तुरहस्थानगन्धिः सवेदनो धूमा वनशील रघवारी पित्तलित रचान, तोडदा धूमायनप्रायः पीनारणाभस्तद्वर्णनात्री चेति यानपि ताभ्यां ययनशीलः सनिस्तोदो रूत्री गुरुर्दारुणो मुटुर्मुहुः शीतपिन्छिलान्पस्त्रावी चेति बालेष्मभ्यां गुरुः सदाह उष्णः पीनपारस्रानी चेति पित्तर-पाया. natarate लः प्रयच राणा भस्त्रा f शोणिताभ्यां घृतमष्टाभो मीनवाबनतोयगन्धिमृदुर्विमर्धुष्णकृष्णाची चेति पित्तशोणिताभ्यां रतो गुग. ग्रिग्धः पिन्छिलः कण्डू प्रायः स्थिरः रक्तपाण्डुनावी चेति श्लेष्मशोणि -ताभ्यां स्फुरणधूमायनप्रायः पीततनुरतनानी चेति यात पित्तशोणितेभ्यः, कलस्कुरणचुमचुमायमा नप्रायः पाण्डुचनरचास्रानी चेति यावरलेप्मशोणि-तेभ्यः परागकण्ट्रप्रायः पाण्डुपनरच्चान्तारी चेनि पित्तशोणितेभ्यः, त्रिविधवणंवेदनान्नावनि शेषोपेनः पवनपित्तकफेभ्यः, निर्दहननिर्मधनस्फुरण. तोदाहपाकरागकण्डम्यापबहुला नानावर्णवदनास्राव विशेषतः पवनपित्तकफशोणितेभ्य, जिल्हातलाभो मृदु स्निग्धः णो विगतवेदनः सुव्यवस्थितो निरान्नाति शुद्धी व्रण इति ॥ ७ ॥
दक्षेत्रों में हमारा अशुरू और शुद्ध भेट -१ पान - मोटी दिए पाला ( श्याय शुद्धा । aft वर्ग ), लाटिमायुक्त, पता, शीवल रंमदार रणगाव या रूमा, घटपट ( वेदना विशेष ) करने घाटा, फरकन, नगाय, सूई शुमने तथा फटने पी. मी पीड़ा से युक्त, अनि पोदा वाला और मांमरहित होता है । २. पित्तन शीघ्र उत्पन होने वाला, पीला नील वर्ग युह, पलाशपुष्प को धोने पर निकलने वाले जल के समान उष्णा वारा, दुध, पाक और खालिमा आदि या टंगे और रुमीले ग्राथ से युक्त होना है । ७. पित्तश्लेप्मज मग भारी, दाहयुक्त, उष्ण तथा गहरे पीले रह के स्राव घाटा होता है । ८. यात रक्तन -, पतला, अत्यन्त | तुमने की भी पीटा वाला, सुन्न ( स्पर्शज्ञान रहित ) रक्त | के समान निमायुक्त एवं यातरक्त के वर्ण के तुल्य स्त्राव । वाला होता है । ९ पित्तर - नमण्ड ( घी के ऊपर । धान सन्द्र भाग ) के समान, मडली धोये हुए जल की | गन्धवाला, कोमल, फैने वाला, उष्ण और काले स्राव यात्रा होता है । १०. श्लेग्नल, भारी, रूमीला, गुनी युक्त, अचल नया रक्फ महिन पीले ग्राम पाला होता है । ११. वातपित्तरका - फउन, घुमने की सी पीटा, जलन और घुर्यो देने वाला तथा पीले रंग के पनले रक्तस्त्राव से युक्त | होता है । १२. यातश्लेम्मरतन - गुजली, फड़कन एवं सुन-नाष्ट मे युक्त ( चुमनुमायनं राजिकामपटिस एव वेदना ) और पीछे, गारघान वाला होता है । ९ ३. पित्तरलेप्म-रन मटन, पाक, लालिमा और गुजली से युक्त तथा पी, गारा घाटा होता है । ११. वातपित्तकफज - तीनों दोषों के वर्ग, वेदना और स्नान विशेष से युक्त होता है । ६०. यातपित्तरकरकन मग - जलने और मयने की तरह पीदा वाला, फदफन, चुभने की मी पीटा, जलन, पाक, | लात्रिमा तथा सुजी से युक्त, अत्यन्त सुन्न, निविध वर्ण ए वंदना मिश्रित या विशेष घाटा होता है । १६, शुद्ध मग - जिला की ऊपरी सतह के समान लाल, कोमल, स्निग्ध पूर्व चिकना, वेदना रहित, सुन्दर आहूति वाला स्राव रहित होता है ॥ ७ ॥
तस्य प्रणस्य पटिरुपक्रमा भवन्ति । तद्यथा-अपतर्पणमालेपः परिपेकोऽभ्यङ्गः स्वेदो विम्लापनमु-पनाहः पाचनं ि ara णं स्नेहो वमनं विरेचनं छेदनं भेटनं दारणं लेसनमेपणमाहरण व्यधनं विस्रावणं | सीवनं सन्धानं पीडनं शोणितास्थापनं निर्वापणसु-त्कारिका कपायो वर्तिः कल्कः सर्पिस्तैल रसक्रिया -बचूर्णनं व्रणधूपनमुत्सादनमवसादनं मृदुकर्म दारुण-कर्म क्षारकर्माभिकर्म कृष्णकर्म पाण्डुकर्म प्रतिसारणं रोममञ्जननं लोमापहरणं बस्तिकर्मोत्तरवस्तिकर्म वन्धः पत्रदानं कृमिघ्न बृंहणं विपन्नं शिरोविरेचनं विकार तथा पीली पुन्नियों से युक्त होता है । ३. कफजनस्यं कवलधारणं धूमो मधु सर्पिर्यन्त्रमाहारो रक्षावि • - निरन्तर भयर सुनी से युक्त, मोटे किनारों वाला, सिरास्नायुओं के जाट से बँधा हुआ, कठिन, टेपने में पी, मन्द पीड़ा वाला, सफेद, टढे, गाई तथा लमीले माव युद्ध और भारी होता है । ४. रक्तन यण - मूँगा के एक निकों के तुल्य वर्ग वाला, काले छाले एव फुन्सियों के जाल में भरा हुआ, तेज गारे गन्ध वाला, चंदनायुक्त धुआँ देने वाला ( धूम तुल्य बाप्प निकालने वाला ), तथा वाला एवं पित्त के लक्षणों से युक्त होता है ॥ ५. चानपिनज व्रण चुभने की सी पीड़ा, दाह तथा धुर्वी तुल्य
बाप से युक्त लालिमा लिए हुए पीला और वातपित्त के वर्ण ।
धानमिति ॥ ८ ॥
मन के साठ उपक्रम ( चिकित्सा विधान ) होते हैं- १. अपतर्पण २. आप २. परिषेक ४. अभ्यन ५. स्वेद ६. विम्लापन ७. उपनाह ८. पाचन ९ विस्रावण १०. स्नेह ११. वमन १२. विरेचन १३. छेदन १४. भेदन १५. दारण १६ लेखन १७. एषण १८. आहरण १ ९. व्यधन २०. विद्रावण २१. सीवन २२. सन्धान २३. पीढन २४. शोणितास्थापन २५. निर्वापण २६. उस्कारिका २७. कषाय २८ वर्ति २ ९ कल्क ३०. सर्पि ११. तेल ३२. रमक्रिया ३३ अवचूर्णन ३४. व्रणधूपन ३५. उत्सादन ३६ अवसादन ३७. मृदुकर्म ३८. दारुणकर्म
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I सुश्रुतसंहिता ३ ९. क्षारकर्म १०. अग्निकर्म ४१. कृष्णकर्म ४२. पाण्डुकर्म । ४३ प्रतिसारण ४४. रोमसञ्जनन ४५, लोमापहरण ४६ वस्ति कर्म ४७. उत्तरवस्तिकर्म ४८. बन्ध ४ ९. पत्रदान ५०. कृमिन ५१. बृंहण ५२. विपत्र ५३. शिरोविरेचन ५४. नस्य ५५. कवल. धारण ५६. धूम ५७, मधुसर्पि ५८. यन्त्र ५ ९. आहार ६०. रक्षाविधान ॥ ८ ॥
तेषु कपायो चर्तिः कल्कः सर्पिस्तैलं रसक्रियाऽ-वचूर्णमिति शोधनरोपणानि तेष्वष्टौ शस्त्रकृत्याः, शोणितास्थापनं क्षारोऽग्यिर्यन्त्रमाहारो रक्षाविधानं । बन्धविधानं चोक्तानि, स्नेहस्वेदनवमनविरेचनबस्त्यु-तरवस्ति शिरोविरेचननस्यधूमकवलधारणान्यन्यत्र व-क्ष्यामः, यदन्यदवशिष्टमुपक्रमजातं तदिह वक्ष्यते || ६ || इन उपक्रमों में से कपाय, वर्ति, कल्क, सर्पि, तैल, रसक्रिया और अवचूर्णन का प्रयोग व्रणों के शोधन तथा रोपण के लिये होता है । आठ इनमें शस्त्रकर्म है । शोणिता स्थापन, क्षार, अग्नि, यन्त्र, आहार, रक्षाविधान और वन्ध-विधान का वर्णन पहले किया जा चुका है । स्नेह, स्वेदन, चमन, विरेचन, वस्ति, उत्तरवस्ति, शिरोविरेचन, नस्य, धूम और कवलधारण का वर्णन दूसरे स्थान पर किया । जायगा । इन उपक्रमों में जो शेष बचते है उनका वर्णन यहाँ किया जा रहा है ॥ ९ ॥
विमर्श: -- चरक में केवल ३६ प्रकार के सिद्ध उपक्रमों काही वर्णन है । ' तथा चोपक्रमा. सिद्धाः पट्त्रिंशत्समुदाहृताः ' ( चरक चि. अ. १३ ) पङ्घ्रिधः प्रागुपदिष्टः शोफः, तस्यैकादशोपक्रमा भवन्त्यपतर्पणादयो विरेचनान्ताः, ते च विशेपेण शोथप्रतीकारे वर्तन्ते, व्रणभावमापन्नस्य च न विरु-ध्यन्ते; शेपास्तु प्रायेण व्रणप्रतीकारहेतव एव ॥ १० ॥
अपतर्पणमाद्य उपक्रमः, एप सर्वशोफानां सामा-भ्यः प्रधानतमश्च ॥ ११ ॥
पहले कहा जा चुका है कि शोथ ६ प्रकार का होता है । अपतर्पण से लेकर विरेचन पर्यन्त ग्यारह उपक्रम शोथ के । होते हैं । इन उपक्रमों का प्रयोग शोथ के प्रतिकार के लिए मुख्य रूप से होता है । शोथ के व्रण रूप में परिवर्तित हो जाने पर भी इन उपक्रमों के प्रयोग में कोई विरोध नहीं पड़ता । शेष उपक्रम प्रायः चण - चिकित्सा में प्रयुक्त होते हैं । अपतर्पण ( लङ्घन ) पहला उपक्रम है और सभी प्रकार के शोयों के लिये सामान्य तथा सर्वश्रेष्ठ विधि है ॥ १०-११ ॥ विमर्श - वात, पित्त, कफ, शोणित, सन्निपात और आगन्तुक भेद से ६ प्रकार के शोयों का वर्णन ' आमपक्केपणीय अध्याय ' में किया गया है । पवििध शोथ के उपचार के लिये अपतर्पण मे लेकर विरेचन तक केवल ग्यारह उपक्रमों का निर्देश इस स्थल पर है, किन्तु अपतर्पण से विरेचन तक की गणना में उपक्रमों की संख्या १२ होती है । इसके परिमार्जन के लिये इतना जान लेना चाहिये कि ' अपतर्पणादय. ' इस शब्द की व्युत्पत्ति ' अपतर्पणम् आदी येषा ते अपतर्पणादय ' ऐसी है यहाँ सविधानबहुत्रीहि समान होने के कारण ' अपतर्पण ' को छोड़कर शेष विधानों की गणना करना ही उचित है । इस प्रकार गणना करने से उपक्रमों की संख्या एकादश होगी ।
भवन्ति चात्र-दोपोच्या पशान्त्यर्थं दोपानद्धस्य देहिनः ।
अवेक्ष्य दोषं प्राणं च कार्य स्यादपतर्पणम् ॥ १२ ॥।
जैसे कि अपतर्पण - दोपों के प्रकोप से युक्त मनुष्य के । दोष और वलका विचार करके कुपित दोषों की शान्ति के लिये अपतर्पण ( लङ्घन ) कराना चाहिये ॥ १२ ॥
ऊर्ध्वं मारुततृष्णाक्षुन्मुखशोपश्रमान्वितैः ।
न कार्य गर्भिणीवृद्धबालदुर्बलभीरुभिः ॥ १३ ॥
ऊर्ध्ववात ( निरन्तर शब्द के साथ डकार आना ), प्यास, भूस, मुखशोप और परिश्रम से युक्त तथा गर्भवती, वृद्ध, बालक, दुर्बल एवं कायर को अपतर्पण नहीं कराना चाहिये ॥
श. पूत्थितमात्रेषु ब्रणेपूप्ररुजेषु च ।
यथास्यैरोपधैर्लेपं प्रत्येकश्येन कारयेत् ॥ १४ ॥
२. आलेप ( लेप ) -- उत्पन्न हुए शोथों में और तीव्र वेदना वाले घ्रणों में वातादि दोषों के अनुकूल ( मिश्रक अध्याय में वर्णित ) एक एक ( गण की ) ओषधियों का लेप करना चाहिये ॥ १४ ॥
यथा प्रज्वलिते वेश्मन्यम्भसा परिपेचनम् ।
क्षिप्रं प्रशमयत्यग्निमेवमालेपनं रुजः ॥ १५ ॥
जलते हुये घर में जल छिड़कने से जिस प्रकार अझि शीघ्र शान्त हो जाती है उसी प्रकार ( व्रण पर किया गया ) लेपपीडा को शीघ्र दूर करता है ॥ १५ ॥
प्रह्लादने शोधने च शोफस्य हरणे तथा ।
उत्सादने रोपणे च लेपः स्यान्तु तदर्थकृत् ॥ १६ ॥
लेप ( व्रण- वेदना को शान्त कर ) प्रसन्नता लाता है, व्रण को शुद्ध करता है, शोथ को मिटाता है, निम्न्न चण को ऊपर उठाता है और व्रण को भरता है । इस प्रकार यह इन समस्त कायो को करता है ॥ १६ ॥
वातशोफे तु वेदनोपशमार्थं सर्पिस्तैलन्धाया-म्लमांसरसवातहरौपधनिष्काथैरशीतैः परिपेकान् कुर्वी-त, पित्तरक्ताभिघातविपनिमित्तेषु क्षीरघृतमधुशर्करोद-केक्षुरस मधुरौपघक्षीरवृक्ष निष्काथैरनुष्णैः परिपेकान् कुर्वीत, श्लेष्मशोफे तु तैलमूत्रक्षारोदकसुराशुक्तकफ-नौपघनिष्काथैरशीतैः परिपेकान् कुर्वीत ॥ १७ ॥
यथाऽम्बुभिः सिच्यमानः शान्तिमग्निर्नियच्छति ।
दोपाग्निरेवं सहसा परिषेकेण शाम्यति ॥ १८ ॥
३. परिपेक ( सेक ) Fomentation - वातज शोथ में, वेदना की शान्ति के लिए, घृत, तेल, काक्षी, ( १ ) मांसरस और वातघ्न औपधियों के उष्ण क्काय से परिषेक करना चाहिए । पित्त, रक्त, चोट और विष से उत्पन्न ( शोथ ) में दूध, घृत, मधु, शर्बत, गन्ने के रस, मधुर औषधियों ( काकोल्यादि गण ) | तथा क्षीरवृक्ष ( वट गूलर आदि ) के शीतल क्काय से परिपेक करना चाहिए । कफज शोथ में तैल, मूत्र, क्षारयुक्त जल, | ( २ ) सुरा, ( ३ ) शुक्त और कफ को दूर करने वाली औषधियो