श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 51–60
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 51–60
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कल्पस्थान- विषयसूची विषय पृष्टाक | पहला अध्याय अन्नपान रचाकल्प का उपक्रम १ विष से राजा की रक्षा २ । राजा को विश्वास करने का निषेध II पाकशाला में नियुक्त करने योग्य वैद्य " पाकशाला के लक्षण I राजसेवा के योग्य परिचारक 22 ' पाकशाला में वैद्य की सावधानी " पाकशाला के परिचारकों को वैद्य के अधीन रहने का निर्देश 33 विष देने वाले का लक्षण ५ त्रिप देने वाले की परीक्षा " g विष देने के साधन 33 वियमिश्रित अन्न के लक्षणादि विमिश्रित अन्न के बाप के कार्य ६ विपमिश्रित अन्न के हाथ में लगने पर प्रभाव के लक्षण " सविष अन्न के भोजन करने में दोष 33 आमाशयगत त्रिप के लक्षण तथा चिकित्सा ७ पकाशयगत विष के लक्षण # 3 सविपद्रव द्रव्य के लक्षण 31 सविष शाक, दाल तथा भचय फल के लक्षण 53 सविष दांतुन आदि के लक्षण तथा feferen ८ सविष जोभी, क्वलादि की चिकित्सा " सविष अभ्यङ्ग आदि के लक्षण तथा चिकित्सा- ९ सचिप उरसादन, परिषेक, कपाय अनुलेपन, शय्या, वस्त्र तथा कवच के लक्षण और चिकित्सा सविष कवी आदि के प्रयोग करने पर लक्षण तथा चिकित्सा 23 सविष तैलादि का शिर पर अभ्य एवं सविष कवच, साफा तथा माला धारण करने पर लक्षण तथा चिकित्सा 53 विषय पृष्ठाङ्क सविष आलेप द्रव्य से मुख लिप्त होने पर लक्षण तथा चिकित्सा ९ । विषयुक्त वाहन के लक्षण तथा १० सविष नस्य तथा धूम के लक्षण तथा चिकित्मा 23 सविष पुष्प के लक्षण तथा चिकित्सा " कर्ण में छोड़े हुये सविष तैल के लक्षण तथा चिकित्सा " सविष अञ्जन के लक्षण तथा चिकित्सा 39 सचिप जूते आदि के लक्षण तथा चिकित्सा ११ सविष भूषणादि धारण करने पर लक्षण तथा चिकित्सा " पूर्वोक्त विषों का उपद्रव होने पर अवस्थानुसार चिकित्सा 22 हृदय पर विपव्याप्ति के प्रतिपेध 39 भचय भोग्न पदार्थों में विपन्न द्रव्यों योग १३ विपक्षण करने पर वमन प्रयोग १४ दूसरा अध्याय -स्थावर विषविज्ञान का उपक्रम १५ विष के दो प्रकार 93 स्थावर विष के १० अधिष्ठान १७ ५५ स्थावर विषों का निर्देश 19 कन्दवियों के अवान्तर भेट १ ९ स्थावर विषों के पत्रादि विशेष से गुण विशेष 33 कन्दवियों के लक्षण २० विषों के ददा गुण तथा उनके कार्य २३ दश गुणों से युक्त चिप की मारकता २४ । दूषी चिप के लक्षण " 2 अवयव गत दूषी चिप के लक्षण 33 दूपविष के पूर्वरूप २५ दूषीदिप के कार्य " दूपचिप की निरुक्ति 29 स्थावर विषों के ७ वेगों के लक्षण 23 विषय पृष्ठा स्थावर विष वेगों की चिकिसा २६ वेगान्तरों में कालवाती विष का प्रतिकार २७ विपन्न अजेय घृत 13 दूषी विद्यारि अगद 99 दूपविष के उपद्रव की चिकित्सा २८ दूपचिप की साध्यासाध्यता के लक्षण " तीसरा अध्याय जनम - विपविज्ञान का उपक्रम २८ जगम विष के १० अधिष्ठान 13 विदूषित तृणादियों के ज्ञान २ ९ विपदूषित जल के लक्षण और उसकी चिकित्सा " दूषित जल की शोधक ओषधि I विपदूषित भूमि के लक्षण और उसकी चिकित्सा " विपदूषित तृण और भोजन द्रव्य के लक्षण 22 विपदूषित धूम तथा वायु के लक्षण और चिकित्मा ३० | विपोत्पत्ति का पुराना इतिहास 91 विप के नाना वीर्य होने में कारण " " विष की सर्वदोष प्रकोपकता ३१ उसने के समय सर्पों के विप छोड़ने की प्रक्रिया 39 सभी विपों में शीतक्रिया का उपदेश ३२ सविषमांसभक्षण के दोप 21 विष खाये हुए के लक्षण 33 विशिष्ट देश आदि में सर्पदष्टों की चिकित्सा करने का निर्देश ३३ अवस्था विशेष में विपवृद्धि का कथन " चिप रोग से पीडित की अमाध्यता 13 चौथा अध्याय सर्पदष्टविपविज्ञानीय का उपक्रम I सर्पों के महाविपशाला होने का निर्देन " सपों के ५ मेट " सों के डंसने के हेतु ३५ सर्प दंग के ३ प्रकार
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त्रिषय पृष्ठाङ्क । सर्पविष की अवस्था विशेष से अपचिपता ३६ दर्वीकर मण्डली राजिल के लक्षण 13 सर्पों की ब्राह्मणादि जाति का निरूपण " दकरादियों की वातादिप्रकोपकता " तीन प्रकार के साँपों के विचरण काल " सर्पों की उग्रविपता ३७ सर्पों की अपविषता में हेतु " दर्वीकर, मण्डली, राजिमान, निर्विष, वैकरक्ष सर्पों के नामादि निर्देश 13 सर्पों के पुरुषादि जाति का लक्षण ३८ सामान्य रूप से सर्पदष्ट के लक्षण ३ ९ दकरादि सर्प से दष्ट के लक्षण 39 पुरुषादि जाति के सर्पों से दष्ट के लक्षण III ø सर्पविष के सात वेगों के लक्षण ४१ वेगान्तर के लक्षण ४२ पशु पक्षियों में विप वेगों के लक्षण " } पाँचवा अध्याय सर्पदष्ट विपचिकित्सा का उपक्रम I दर्पदष्ट में अरिष्टान् बन्धन " सर्प से हँसे जाने पर आचूषण, छेदन तथा दाह ४३ आचूपण विधि " मण्डली ( सर्प ) द्वारा डॅमे जाने परदाह का निषेध ' सर्पदष्ट में मन्त्रों द्वारा अरिष्टाबन्धन ४४ मन्त्रशक्ति की प्रशसा " 3 मन्त्रग्रहण की विधि " हीनस्वरादि वाले मन्त्र को असिद्धि मैं अगद का क्रम 19 सर्पदंश में रक्त निकालने की विधि ” सर्पदश में वल्मीक की मिट्टी आदि का योग $ 3 सर्पदश में तैलादि द्रव का निषेध " सर्पविष में वमन " विषयसूची विषय पृष्ठ | वातपित्त त्रिपातुर रोगी के लिए aft तथा विरेचन ४६ | विपातुर में अञ्जन 22 विपातुर में शिरोविरेचन $ 1 संज्ञाहीन विधातुर चिकित्सा ४७ अरिष्टा बन्धन से दूषित शोणित चिकित्सा " विष निकाले जाने के बाद कुपित दोपों की चिकित्सा 93 नष्टसाचिकित्सा के योग्य अन्य अवस्थाओं का निर्देश | विप से मांस गलने पर चिकित्सा " 2 सभी विपों में महागद ४८ 33 39 अजित अगद " 1 15 " 3 तार्य अगद " " 23 ऋषभ अगद ४ ९ 31 33 सजीवन अगद " दवकर और राजिल विप में अगद " 9 मण्डली विप में अगद लूतादि चिप में वशस्वगादि भगद " 1 विष में विशेष योग ५० मूपक विष में अगद 19 सर्पविष में एकसर योग " छठा अध्याय दुन्दुभिश्वनीय कल्प का उपक्रम ५१ सर्वविप में क्षारागद 33 सर्वविप में कल्याणक सर्पि सर्वविप में अमृत सर्पि ५२ सर्वविप में महासुगन्धि अगदराज " विधातुरों को स्वेदन का निषेध 33 विपातुरों के लिए पथ्यापथ्य " विषमुक्त के लक्षण ७३ मूपिक कल्प का उपक्रम ५३ अट्ठारह प्रकार के मूपकों के नाम " मूपकदष्ट के सामान्य लक्षण " दकर विष के ७ वेगों की चिकित्सा ४५ लालन दष्ट के लक्षण और चिकित्सा ५४ मण्डली विष के ७ वेगों की चिकित्सा " पुत्रक दृष्ट के लक्षण और चिकित्सा 33 राजिल विष के ७ वेगों की चिकित्सा " कृष्णदष्ट के लक्षण और चिकित्सा " " गर्भिणी आदि की विप चिकित्सा ४६ हंसिर दृष्ट के लक्षण और चिकित्सा " पशुओं की विपचिकित्सा में मात्रा की विशेषता तथा पक्षियों की विपचिकित्सा विपचिकित्मा में अञ्जनादि की मात्रा " विपचिकित्सा में देशादि विचार " 9 श्वस्थाविशेषानुसार विपचिकित्सा ” कफ - विपातर में वमन चिक्किर दष्ट के लक्षण और चिकित्सा ५५ दुछुन्दर दष्ट के लक्षण और चिकित्सा " अलस दष्ट के लक्षण और चिकित्सा " कपायदन्तदष्ट के लक्षण और 13 " 3 कुलिङ्ग दष्ट के लक्षण और चिकित्सा 35 भजित दृष्ट के लक्षण और चिकित्सा ” कपिल दृष्ट के लक्षण और चिकित्सा " विषय पृष्ठाङ्क कोकिल दष्ट के लक्षण तथा चिकित्सा ५५ अरुणादि मे दष्ट के लक्षण तथा " " मूषिक विष में दाह, चित्रावण और प्रलेप ५६ मूषिक विप में शुक्रादि योग 91 मूपक विष में फलादि योग " 1 मूषिक विष में विरेचन तथा शिरोविरेचन योग 99 मूपिक विष में संशमन योग 39 मूषिक विष के शान्त होने पर भी शोधन कार्य ५७ आखुचिप कर्णिका की चिकित्सा 39 उन्मत्त कुत्ता, शृगाल आदि से दृष्ट के लक्षण " उन्मत्तवादिष्ट के अरिष्ट लक्षण ५८ उन्मत्त वादि से दष्ट की चिकित्सा ५ ९ पागल कुत्ते से दष्ट के चिप में दवा 19 पागल कुत्ते से दष्ट में तीक्ष्ण शोधन " उन्मत्त व्याल से दष्ट के लक्षण और चिकित्सा Το कीटकल्प का उपक्रम ६० कीटों की उत्पत्ति " १४ प्रकार के वायव्य कोटों के नाम ६१ २४ प्रकार के आग्नेय कीटों के नाम 19 १३ प्रकार के सौम्य कीठों के नाम " " १२ प्रकार के सांनिपातिक कीटों के नाम तीन विष कीट के लक्षण " मन्द विष कीट के लक्षण II गर विप के लक्षण " ४ प्रकार के कणभ के नाम और उससे दृष्ट के लक्षण ६३ ५ प्रकार के विपखोपरा के नाम तथा उसके दृष्ट के लक्षण 99 ६ प्रकार के गलगोली के नाम तथा उसके दष्ट के लक्षण ८ प्रकार के गोजर के नाम और उसके दुष्ट के लक्षण ८ प्रकार के मेढक के नाम और उसके दुष्ट के लक्षण 23 विश्वम्भरा दष्ट के लक्षण ६४ अहिण्डुका कण्डमका - शूकवृन्ता के दृष्ट लक्षण 3 ) ६ प्रकार की चींटियों के नाम और उनसे दृष्ट के लक्षण 23 ६ प्रकार की मक्खियों के नाम और उनसे दुष्ट के लक्षण 99
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त्रिषय पृष्ठाव ५ प्रकार के मच्छरों के नाम और उनसे दष्ट के लक्षण III नत्र से खरोंच हो जाने पर तरपन विष के लक्षण एक जातियों में असाध्य कोटविष 22 विषाक्त शव, सूत्र, पुरोष के स्पर्श से होने वाले लचण और चिकित्सा ६५ । सुखसाध्य कीटदृष्ट के लक्षण 19 टप्रविए कोट की चिकित्सा 21 कीट में सामान्य विमा " वातादिदोष विषहर स्वेद द्रव्य 23 वृश्चिक के देश में स्वेदन निषेध 33 त्रिकण्टक में कुष्टादि अगद 23 गलगोली विष में रजन्यादि अगद " शतपदी विष में कुङ्कुमादि अगद 99 मण्डूक विप में मेषशृंगयादि अगढ़ ६६ free for में धवादि अगद 3 अहिका विष में शिरीपादि ” augeet for after 17 शून्त for faar सा " पिपीलिका, मक्षिका, मशक विष चिकित्सा 23 विषयसूची | विषय पृष्ठाक | नस से खरोंच लगने व प्रतिसूर्यक दष्ट की चिकित्सा ६६ वृश्चिक की उत्पत्ति तथा संख्या " 3 मन्द मध्य तथा तीचग विप वृश्चिकों के नाम, लक्षण तथा कर्म ६७ । उग्र - मध्यविष वृचिकदष्ट चिकित्सा ६८ । मन्दविष वृश्विक देश की चिकित्सा ६ ९ । लुना विष की घोरतरता 13 अगद प्रयोग के लिये विष के निश्चय " लूना त्रिप की दुर्विज्ञेयता लूता विषका दिनों में पृथक पृथक लक्षण " arer मध्य - मन्द विपवाली लताओं काल की अवधि ७० अधिष्ठान विशेष से लूता विष के विशेष लक्षण लूना की प्रथमोत्पत्ति का वर्णन कृच्छ्रसाध्यासाध्य लतार्दश लक्षण ७१ त्रिमण्डला दृष्ट के लक्षण और चिकित्सा 39 श्वेतादष्ट के लक्षण और चिकित्सा 13 विषय पृष्ठाक कपिला लूना दृष्ट के लक्षण और ७२ पीतिका दष्ट के लक्षण और चिकित्सा 19 आठविष दष्ट के लक्षण और चिकित्सा " मूत्रविषादष्ट के लक्षण और चिकित्सा " रक्तादन के लक्षण और चिकित्सा 19 कसनादृष्ट के लक्षण और चिकित्सा " कृष्णादष्ट के लक्षण और चिकित्मा " अग्निवादष्ट के लक्षण 37 " लूनाओं की सामान्य चिकित्सा " असाध्य विपवाली लूनाओं के लक्षण ७३ साध्यासाध्य लूना विष चिकित्सा " " लूना विष में देश का ठरकर्तन " लूना में १० प्रकार के उपक्रम " } दुष्टत्रण चिकित्सा का कोट दुष्ट व्रणादि में अतिदेश 29 दाहादि के निवृत्त होने पर व्रण में विपोरपन्न कर्णिका की चिकित्सा ७४ कटिकल्प का उपसंहार 33 चिकित्सा के पुण्यतमरव का कथन
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|| eft: 11 आयुर्वेद - तत्त्वसंदीपिकाख्यव्याख्या - समुल्लसिता सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थानम् प्रथमोऽध्यायः । अथातो वेदोत्पत्ति मध्यायं व्याख्यास्यामः, यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ १ ॥
अव इसके अनन्तर यहां से वेदोत्पत्ति नामक अध्याय का ते हैं भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुतके प्रति ) कहा है ॥ १ ॥
विमर्श: - " ग्रन्थसमाप्तिकामो मङ्गलमाचरेत् " इस श्रुति के अनुसार यहां प्रारम्भ में अथ शब्द मङ्गलाचरण का द्योतक है । जैसा कि कहा है “ ॐकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठं भिक्ष्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥ ” चरक तथा महा-भाष्य में भी सर्वप्रथम मङ्गलार्थ अथ शब्द का प्रयोग हुआ है । “ अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्याम. ” ( च ० सू ० अ ० १ ), “ अथ शब्दानुशासनम् " ( व्या ० म ० भा ० अ ० १, पा ० १, आ ० १ ), “ अथातो धर्मं व्याख्यास्याम " ( वै ० अ ० १ आ ० १ सू ० १ ) वेदोत्पत्ति- " उपस्थित परित्यज्नानुपस्थितकल्पने मानाभावात् " इस नियमानुसार तथा प्रकरणवशाद् वेद शब्द से आयुर्वेद का ग्रहण किया गया है क्योंकि उच्चरित नामैकदेश समग्र नाम मात्र का परिचायक होता है । चरक ने भो बेद शब्द से
आयुर्वेद का ग्रहण किया है । यथा - " तस्यायुष. पुण्यतमो वेदो ।
वेदविदा मत । वक्ष्यते यन्मनुष्याणा लोकयोरुभयोर्हितम् ॥
( च ० सू ० अ ० १ ) | आयुर्वेदोत्पत्तिः- आयुर्वेद आयु के हित, अहित द्रव्य गुणकर्मों का प्रतिपादक विज्ञान ( Sonence of fe ) है और विज्ञान की उत्पत्ति न होकर स्मृति ही हुआ करती है । वर्तमान । में जितने भी आविष्कार हो रहे हैं वे सब रात्रिन्दिव अन्वेषण । ( Researoh ) की धुन में लगी हुई उच्च आत्माओं की स्मृति । स्वरूप हैं अत एव चरक में स्पष्ट कहा है कि " ब्रह्मा स्मृत्वाऽऽ । युषो वेदम् ” ब्रह्मा ने आयुर्वेद का स्मरण किया, इसीलिये वेदों को अपौरुपेय ( कर्तृरहित ) माना गया है । यहां पर भी वेदोत्पत्ति से आयुर्वेद की उत्पत्ति अर्थ न कर उसका अवबोध और उपदेश का व्याख्यान करेंगे यही अर्थ ग्रहण किया जाता । है जैसा कि चरक में भी कहा गया है - " न हथायुर्वेदस्याभूत्वो-त्पत्तिरुपलभ्यते, अन्यत्राववोधोपदेशाभ्याम् । एतद्वै द्वयमधिकृत्यो-त्पत्तिमुपदिशन्त्येके " ( च ० सू ० अ ० ३० ), अवबोधादुत्पत्ति यथा - ब्रह्मण आयुर्वेदोत्पत्ति, उपदेशाश्चोत्पत्तिर्यथा - इन्द्रो-पदेशाद्भरद्वाजेन मर्त्यलोके आयुर्वेद उत्पादित इत्यादि, आयु वेददीपिका । इस तरह जब से सृष्टि का आविर्भाव हुआ है तभी से आयुर्वेद भी विद्यमान है । यूरोप के विद्वानों ने भी संसार में सब से प्रथम व प्राचीन ऋग्वेद को माना है । जब कि पाश्चात्य देश अज्ञानरूपी निद्रा में थे उस समय भारतवर्ष के चिकित्सा विज्ञान, गणित विज्ञान, अस्त्र शस्त्र द्वारा युद्धकला विज्ञान, शिल्पविज्ञान और दार्शनिक विज्ञान उन्नत शिखर पर थे । समस्त ससार को ज्ञान प्रकाश देने का गौरव इसी परम पुनीत आर्यावर्त को है अत एव हम निःशङ्क तथा साभिमान इसे जगद्गुरु घोषित करते हैं । ' एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन. । स्व स्व चरित्र शिक्षेरन् पृथिव्या सर्व मानवा ॥ ( मनुस्मृतिः ) भारतवर्ष से ही आयुर्वेद का ज्ञान यूनान में गया तथा वहा से ग्रीस और ग्रीस से इग्लैण्ड निवासियों ने ग्रहण कर निरन्तर अन्वेषण करते हुए आज इस रूप में पहुंचा दिया है । भगवान् शब्द का प्रयोग पडूविध ऐश्वर्य सम्पन्न विशिष्ट आत्मा ( अवतार धारी ) के लिये होता है । ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशस. श्रिय । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव पण्णा भग इतीङ्गना ॥ ( विष्णुपुराण ) अन्यश्च - उत्पत्तिं प्रलयश्चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्याञ्च स वाच्यो भगवानिति ॥ इससे धन्वन्तरि की योग्यता, सर्वज्ञता, एव विश्वसनीयता प्रदर्शित होती है । चरक में ऐसे शक्तिसम्पन्न पुरुष को योगि-कोटि में माना है तथा योगियों का अष्टविध ऐश्वर्य ( बल )
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सुश्रुतसंहिता | स्पष्टतया वर्णित है । आवेशश्वतसो ज्ञानमर्थाना चन्दत क्रिया । दृष्टि यत्रं स्मृति कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ इत्यष्टविधमाख्यात
योगिना वलमैश्वरम् । शुद्धसत्त्वसनाधानात् तत्सर्वमुपजायते ॥
( च ० शा ० अ ० १ ) धन्वन्तरि —— धनु शल्य, तस्यान्त = पारमियर्ति गच्छतीति धन्वन्तरि । राख्यशास्त्र का आद्यन्त सम्यग्ज्ञाता धन्वन्तरि कहलाता है । वर्तमान में ऐसे विद्वान् को सर्जन कहा जाता है । भानुमती में धन्वन्तरि की निम्न व्याख्या है - जगदर्थ -साधनाद् धनुर्धर्मंस्तस्यान्तो व्याधिरका लमृत्युसम्पादकोऽधर्म-स्तस्यारिः शत्रुर्योऽसौ धन्वन्तरिः ॥ भागवतमें विष्णु के अशांश से धन्वन्तरि की उत्पत्ति मानी है स वै भगवत साक्षात् विष्णो-रशाशसम्भव । धन्वन्तरिरितिख्यात आयुर्वेदह गिज्यभाक् ॥ विष्णुपुराण में अमृतपूर्णकलश को लिये हुए धन्वन्तरि की उत्पत्ति समुद्र से मानी गई है । मन्यान मन्दर कृत्वा नेत्र कृत्वा च वामुकिम् । ततो मथितुमारब्धा मैत्रेय तरसाऽमृतम् ॥ ततो धन्त्र-न्तरिर्देव ज्वेताम्बरघर स्वयम् । विभ्रत्कमप्टलु पूर्ण मन्नृतस्य समुत्थित ॥ अन्यच्चन्वन्तरि धर्मनृतां वरिष्ठममृतोद्भवन् ॥ १ ॥
अथ खलु भगवन्तममरवरसृपिगणपरिवृतमाश्र-मस्थं काशिराजं दिवोदासं धन्वन्तरिमौपधेनवचैतर-णौरभ्रपौष्कलावतकरवीर्यगोपुररक्षितसुश्रुतप्रभृतयऊचु । सर्व देवताओं में श्रेष्ठ, महर्षियों के समुदाय से परिवेष्टित, अपने आश्रम में विराजमान काशिराज दिवोदास भगवान् धन्वन्तरि को औपधेनव, वैतरण, औरभ्र, पौष्कलावत, करवीर्य, गोपुररक्षित, सुश्रुत आदि ऋषि प्रश्न करने लगे ॥२ ॥
विमर्श - सुश्रुतप्रभृतयः -- भगवान् धन्वन्तरि के पास शल्य शास्त्र अध्ययन करने के लिये अनेक ऋषि आये थे । उनमें जो प्रधान थे, उनका नाम मूल में लिखा है किन्तु शेप को प्रभृति शब्द से सम्बोधित किया है जैसे भोज, निमि, काङ्कायन, गार्ग्य, गाल आदि का प्रभृति से ग्रहण होता है ॥२ ॥
भगवन् । शारीरमानसागन्तुव्याधिभिर्विविधवेद-नाऽभिघातोपद्रुतान् सनाथानप्यनाथवद्विचेष्टमानान् विक्रोशतश्च मानवानभिसमीच्य मनसि नः पीडा भवति । तेपां सुखैषिणां रोगोपशमार्थमात्मनश्च प्राणयात्राऽर्थं प्रजाहितहेतोरायुर्वेदं श्रोतुमिच्छाम इहोपदिश्यमानम् ॥ ३ ॥
हे भगवन् । शारीर, मानस और आगन्तुक रोगों से, अनेक प्रकार की पीड़ा से दुखित तथा मित्र, नृत्य, धन आदि वस्तुओं के होने से सनाथ होते हुए भी अनार्थों की तरह तडफते और चिलाप करते हुए मनुष्यों को देखकर हमारे मन में पीडा उत्पन्न होती है । इसलिये सुखको चाहने वाले उन रोगियों के रोगों को नष्ट करने के लिये तथा अपने प्राणों को रोगादिकों से रक्षा करने के हेतु एवं सर्व साधारण प्रजा की हितकामना से आप द्वारा उपदिश्यमान आयुर्वेदशास्त्र को हम सुनना चाहते हैं ॥ ३ ॥
विमर्श: - रोगभेदा - यद्यपि इसी ग्रन्थ के प्रथमाध्याय में म्याथियों के चार भेद सलक्षण बताये हैं तथा शार्ङ्गधर में भी “ न्वामाविकागन्तुककायिकान्तरा " चार भेद लिखे हैं किन्तु चिकित्सा शारीरिक, मानसिक और आगन्तुक इन तीन रोगों की ही हो सकती है अतः यहां तीनों रोगों का ही निर्देश है । इसी हेतु चरक भी रोगों के तीन मुख्य भेद करता 1 " त्रयो रोगा निजागन्तुमानसा. ” ( च ० सू ० श्र ० ११ ) चौथे प्रकार । ले स्वाभाविक रोग अचिकित्स्य होते है । कालत्य परिणामेन । जरामृत्युनिमित्तजाः । रोगा स्वाभाविका दृष्टा स्वभावो निष्प्रति-किन ॥ ( च ० ० १ ) " साभाविकास्तु क्षुत्पिपासा जरामृत्युनि-द्राप्रभृतय " ( सुश्रुत ) सुखेषिणाम् - अर्थ, मित्र, द्वारा, सुत, | भृत्यादि सुख की अपेक्षा आरोग्य इस शास्त्र में प्रधान सुख माना गया है तथा शोक, चिन्ता, दारिद्रयादिक दुःख की अपेक्षा रोगों को ही यहा प्रधान दुःख माना है । ' मुखस-इकमारोग्य विकारो दु समेत्र च " प्राणयान्त्रार्थ का वृत्तिकर | ( धनोपार्जन ) अर्थ यहा उचित नहीं है क्योंकि आयुर्वेद परमार्थ के लिये बना है । नाथार्थं नापि कामार्थमथ भूनदयाम्प्र-हि । प्रकाशितो धर्मपरैरायुर्वेद महर्षिभिः ॥ चिकित्सा की वज में धन लेने की निन्दा की गई है कुर्वने मे तु वृत्त्यर्थं चिकित्सा पुण्यविक्रयम् । ते हित्वा काञ्चन रात्रि पाशुरानिमुपासते ॥ ३ ॥
अत्रायत्तमैहिकमामुष्मिकच श्रेयः ।
तद्भगवन्तमुपपन्नाः स्मः शिष्यत्वेनेति ॥ ४ ॥
इस आयुर्वेद में सासारिक और पारलौकिक क्ल्याण है, इस लिये हम शिष्यभाव से आप के पास आये हैं ॥ ४ ॥
विमर्श - वेदों के अध्ययन से केवल पारलौकिक सुख प्राप्त होता है किन्तु आयुर्वेद उभयलोक हितकारक है । स पुण्यकर्मा मुवि पूजितो नृपरसुतये शक्रसलोकता त्रजेत् । ( सुं ० भ ० १ ) धर्मा सदृशस्तस्य दाता नेहोपलम्यते । न हि जीवितदानादि दान-| मन्यद्विशिष्यते ॥ तस्यायुप पुण्यतमो वेदो वेदविदा मत । वक्ष्यते । यन्मनुष्याणा लोकयोरुभयोर्हित ॥ ( च ० सू ० अ ० १ ) तानुवाच भगवान् - स्वागतं वः सर्व एवामीमांस्या अध्याप्याश्च भवन्तो वत्साः । ॥ ५ ॥
भगवान् धन्वन्तरि ने उन शिष्यों को कहा कि आप अच्छे कार्य के लिये आये हैं अतएव शाप सब शिज्य कुलशीला-दिष्टि से अविचारणीय और पढाने योग्य है ॥ १ ॥
विमर्शः -- योग्य शिष्याध्यापकलक्षणम् -अध्यापने कृतबुद्धिरा-चार्य शिष्यमेवादित परीक्षेत्, ततोऽनन्तरमाचार्य परीक्षेत् ॥ अध्याप्यशिष्यलक्षणम् --- कृतज्ञाऽद्रोहि मेधाविशुचिकल्पानुसूयका । अध्याध्या धर्मन साधुशक्ताप्तज्ञानवित्तदः ॥ ( याज्ञवल्क्यस्मृति अ ० १-२८ ) योग्याध्यापकलक्षणम् - " पर्यवदातश्रुत, परिदृष्टकर्माणं, दक्ष, दक्षिण, शुचि, जितहस्तमुपकरणवन्त, सर्वेन्द्रियोपपन्न, प्रकृतिश प्रतिपत्तिशमनुपस्कृतविद्यमनहङ कृतमनसूयकम कोपन क्लेशक्षम, शिप्यवत्सलमध्यापक ज्ञापनसमर्थचेति । एव गुणो ह्याचा-ये सुक्षेत्रमार्त्तवो मेघ इव शस्यगुणै स॒शिष्यमाशु वैद्यगुणै सम्पा-दयति । ( ६० वि ० अ ० ८ ) इह् खल्वायुर्वेद मष्टाङ्ग सुपाङ्गमथर्ववेदस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्रञ्च कृतवान् स्त्रयम्भूः । ततोऽल्पायुष्टुमल्पमेधस्त्वञ्चालोक्य नराणां भूयोऽष्टधा प्रणीतवान् ॥ ६ ॥
आयुर्वेद अथर्ववेद का उपान है और इसके आठ भाग हैं ।
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सूत्रस्थानम् | 3 पूर्वकाल में ब्रह्मदेव ने सृष्टिरचना के पूर्व इस आयुर्वेद को एक लक्ष श्लोकों और एक हजार अध्यायों के रूप में बनाया था पश्चात मनुष्यों को अल्प आयु तथा स्वल्प बुद्धि वाले जान कर पुन ' उस आयुर्वेद को आठ भागों में विभक्त कर दिया ॥ ६ ॥
विमर्शः — चरक तथा हस्त्यायुर्वेद में आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपान माना है किन्तु व्यासकृत चरणन्पूह एवं शङ्करोक्त आयुर्वेद ग्रन्थों में इसे ऋग्वेद का उपवेद माना है । अष्टाङ्गस-डुग्रहकार ने सुश्रुतसंहितानुसार आयुर्वेद की अष्टाङ्गों में विभक्ति ब्रह्मदेव कृत न मानकर अग्निवेपादिकृत मानी है । आयुर्वेद इलोकलक्षेण पूर्व ब्राह्मत्वासीदग्निवेशादयन्तु । कृच्छ्राज्ये-प्राप्तपारा सुनन्त्रास्तस्यैकैकं नेकधाङ्गानि तेनु ॥ ६ ॥
तद्यथा – शल्यं, शालाक्यं, कायचिकित्सा, भृत विद्या, कौमारभृत्यम्, अगदतन्त्रं, रसायनतन्त्रं, वाजी-करणतन्त्रमिति ॥ ७ ॥
शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतन्त्र, रसायनतन्त्र और वाजीकरणतन्त्र ये इसके आठ अङ्ग हैं ॥ ७ ॥
अधाम्य प्रत्यङ्गलक्षणसमासः ॥ ८ ॥
तत्र, शल्यं नाम विविधतृणकाष्ठपाषाणपांशुलोह-लोष्टास्थिबालनखपूयास्राव दुष्टव्रणान्तर्गर्भशल्योद्धरणार्थ, यन्त्रशस्त्रक्षाराग्निप्रणिधानाविनिश्चयार्थम् ॥ ६ ॥
अब इस आयुर्वेद के आठों अह्नों के सक्षिप्त लक्षण कहते हैं ॥ ८ ॥ आयुर्वेद के जिस अङ्ग में अनेक प्रकार के तृण
( घास ) काष्ट ( लकडी ), पत्थर, धूलि के कण, लौह, मिट्टी, हड्डी, देश, नाखून, पूय ( मवाद = Pus ), स्राव ( Dischar -ge ), दूषित व्रण, अन्त शल्य तथा गर्भ ( मृतगर्भ ) शल्य आदि को निकालने का ज्ञान, यन्त्र, शस्त्र, क्षार और अग्निकर्म करने का ज्ञान तथा व्रणों का आम, पच्यमान और पक आदि का निश्चय किया जाता हो उसे शल्यतन्त्र कहते हैं ॥ ६ ॥
विमर्शः –टल्हणोक्तशल्पलत्क्षणम् - अतिप्रवृद्धं नल्डोपज वा शरीरिणा स्थावरजद्गमानाम् । यत्किञ्चिदावाधकरं शरीरे तत्सर्वमेव प्रवदन्ति शल्यम् ॥ शल् हिंसाया धातुस्तस्माच्छल्यं, गल् रूजाया
वा वातुस्तस्मादनि शल्य सिद्धयति । शल्यतन्त्र को पाश्चात्य ।
वैद्यक में सर्जरी ( Surgery ) कहते हैं ॥ ९ ॥
शालाक्यं नामोर्ध्वजत्रुगतानां रोगाणां श्रवणनयन -चदनम्राणादिसंश्रितानां व्याधीनामुपशमनार्थम्, शला-कायन्त्रप्रणिधानार्थं च ॥ १० ॥
आयुर्वेद के जिस अङ्ग में जत्रु के ऊर्ध्वभाग स्थित कान, । नेत्र, मुख, नासिका आदि में होने वाले रोगों की शान्ति का वर्णन किया गया हो तथा शलाकायन्त्रों के स्वरूप तथा प्रयोग करने की विधि का वर्णन किया गया हो उसे शालाक्य- । तन्त्र कहते हैं ॥ १० H विमर्शः —–शालाक्यन्युत्पत्ति ' - गलाका, तस्या कर्म, तत्प्र-धान तन्त्र शालाक्य, शलाकया यत्कर्म क्रियते तच्छालाक्यम् । अष्टाङ्गहृव्य में उसे ऊर्ध्वाह्न शब्द से वोधित किया है । हारी । तसहिनामते शालाक्यन्य्क्षणम् - गिरोरोगा नेत्ररोगा कर्णेरोगा विशे-पत । भ्रुकण्ठशद्दमन्यामु ये रोगा सम्भवन्ति हि ॥ तैपा प्रतीकारकर्म
नस्यवर्त्त्यझनानि च । अभ्यद्गमुखगण्डूपक्रिया शालाक्यसंमिता ॥
जत्रु शब्द से ग्रीवा, कण्ठनाड़ी, ग्रीवामूल, वक्षऽससन्धि, हनु-सन्धि आदि अनेक अर्थ गृहीत होते हैं किन्तु गणनाथ सेनजी ने प्रत्यक्षशारीर में जत्रु का पर्याय अक्षकास्थि देकर उसे क्लेविकिल ( Clariole ) माना है । “ अक्षक नाम असमूलादुर् -फल्कसङ्गत वनुर्वक नलकास्थि, तदेव जनुसंज्ञमिति प्राञ्च । चरक ने ' हावक्षको, एकं जत्रु ' इस प्रकार दोनों शब्दों को भिन्नार्थ में प्रयुक्त किया है । इस तरह अक्षक से दोनों हंसलिया ( Clavioles ) और जत्रु से कण्ठनाडी ( Trachea ) मानना श्रेष्ठ है । डाक्टरी में शालाक्य के तीन विभाग किये गये है । नं ० १ में कर्ण, नासा और कण्ठ ( Ear, Nose, Throat ), नं ० २ में | आंख का विभाग है जिसे ( Ophthalmology ) कहते हैं और नं ० ३ में दन्तविभाग आता है जिसे ( Dentistry ) कहते हैं । शालाक्य में समाविष्ट शिरोरोग विभाग डाक्टरी में काय-चिकित्सा का ही अङ्ग माना गया है ॥ १० ॥
कायचिकित्सा नाम सर्वाङ्गसंश्रितानां व्याधीनां ज्वररक्तपित्तशोपोन्मादापस्मारकुष्ठमेहातिसारादीनामु-पशमनार्थम् ॥ ११ ॥
आयुर्वेद के जिस अङ्ग में सर्वशरीरगत रोगों जैसे ज्वर, रक्तपित्त, शोष, उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ, प्रमेह, अतिसार आदि की शान्ति का वर्णन हो उसे कायचिकित्सा कहते हैं ॥ ११ ॥
विमर्शः — कायशब्देन सकल शरीर गृह्यते । अथवा कायति शब्द करोतीति कायो जाठराग्निस्तदुक्त भोजे - जाठर प्राणिना-मग्नि काय इत्यभिधीयते । यस्त चिकित्सेत सीवन्त स वै. कायचि • कित्सक ॥ प्रायेणाग्निविकृतिमूला अरातिसारप्रभृतयो रोगास्तथा च चरक - शान्तेऽग्नी त्रियते युक्ते चिर जीवत्यनामय । रोगी स्यादविकृते मूलमग्निस्तस्मान्निरच्यते ॥ ११ ॥
भृतविद्या नाम देवासुरगन्धर्वयक्षरक्षः पितृ पिशाच-नागग्रहाद्युपसृष्टचेतसां शान्तिकर्मव लिहरणादिग्रहोप-शमनार्थम् ॥ १२ ॥
आयुर्वेद के जिस अङ्ग में देव, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर, पिशाच, नाग आदि ग्रहों से पीड़ित चित्तवाले रोगियों की शान्ति के लिए शान्ति पाठ, बलिप्रदान हवन आदि ग्रह दोषशामक क्रियाओं का वर्णन किया गया हो उसे भूत विद्या कहते हैं ॥ १२ ॥
विमर्श: -- भूतविद्या नाम देवासुरगन्धर्वयक्षरच पितृनागपिशाच ग्रहात्मकानि भूतानि वेत्ति अनयेति, भूतावेशनिराकरणार्थ विद्यति वा भूतविधा । ढाक्टरी में इसे ( Demnology ) कहते हैं ॥१२ ॥
कौमारभृत्यं नाम कुमारभरणधात्रीक्षीरदोपसंशो-धनार्थं दुष्टस्तन्यग्रहसमुत्थानाञ्च व्याधीनामुपश-मनार्थम् ॥ १३ ॥।
आयुर्वेद के जिस भङ्ग में बालकों के पोषण, धात्री के दुग्ध के दोपों के संशोधन उपाय तथा दूषित दुग्धपान और ग्रहों से उत्पन्न व्याधियों की चिकित्सा का वर्णन हो उसे कौ -मारभृत्यतन्त्र कहा गया है ॥ १३ ॥
विमर्श ' - कुमाराणा भृतिर्धारण पोषण चेति कुमारभृति, कुमा •
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४ सुश्रुतसहिता | रमृतेरिट कोमारभृत्यन् । अष्टाङ्गहृदय तथा संग्रह में इसे वाल-चिकित्सा तथा डाक्टरी में इसे ( Science of Paediatrics ) कहते हैं ॥ १३ ॥
चगदतन्त्रं नाम सर्पकीटलूता सूपिकादिदृष्टविप-व्यञ्जनार्थं विविधविपसंयोगोपशमनार्थं च ॥ १४ ॥
सर्प, कोट, लता ( मकडी ) चूहे आदि के काटने से उत्पन्न विष लक्षणों को पहचानने के लक्षण तथा अनेक प्रकार के स्वाभाविक, कृत्रिम और संयोग त्रिपों से उत्पन्न विकारों के प्रशमन का जहां वर्णन हो उसे अगदतन्त्र कहते है ॥ १४ ॥
विमर्श'ढो रोग, अगदी रोगप्रतीकार, तदर्थ तन्त्रमग-दतन्त्रम् । अष्टाह्नहृदय तथा सङ्ग्रह में दंष्ट्रा चिकित्सा तथा वर में विपगरवैरोधिकप्रशमन तथा जागलि, एव ढाक्टरी मैं ( Toxicology ) कहते हैं ॥ १४ ॥
रसायनतन्त्रं नाम वय स्थापनमायुर्मे बाबलकरं रोगापहरणसमर्थञ्च ॥ १५ ॥
युवावस्था को अधिक समय तक बनी रखने के उपाय, आयु, धारणा शक्ति और बल की वृद्धि करने के प्रकार, एवं दशरीर की स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक शक्ति ( Natural immunity ) की वृद्धि के तरीकों का जहां वर्णन हो उसे रसा-यनतन्त्र कहते है ॥ १५ ॥
विमर्श - रसाना रसरक्तादीनामयन प्रापणमाप्यायन वेति रसायनम् । अथवा रसाना रमनीयेविपाकादीनामायुगढिकारणा
नामयन निशिष्टभोपायो रसायन नदर्य तन्त्रं रसायनतन्त्रम् ।
तदुक्त तरके “ लाभोपायो हि शस्ताना रसादांना रसायनम् ॥
रसायनफलम् - दीर्घमायु स्मृति मेधामारोग्य तरण दय । प्रभाव । खरोदार्य देहेन्द्रियर परम् ॥ वाक्सिद्धि प्रणति कान्ति लभते ना रसायनात् ॥ अस्य प्रयोगाच्च्यवन सुवृद्धोऽभूत्पुनर्युवा । ( च ० चि ० अ ० १ ) वाजीकरणतन्त्रं नामाल्पदुष्टक्षीणविशुष्करेतसामा-ध्यायनप्रसादोपचयजनननिमित्तं प्रजननार्थ || १६ || अल्प, दुष्ट, क्षोण और शुष्कवीर्यवाले मनुष्यों के वीर्य को पुष्टि, शोधन, वृद्धि और उत्पत्ति तथा स्वस्थ लोगों में मैथुन के समय हर्प बढाने के लिए जो वर्णन किया जाता है उसे वाजीकरणतन्त्र कहते है । विमर्शः --- वाजीकरणव्युत्पत्ति - वजन वाज शुक्रस्य वेग, स विद्यते येषान्ते वाजिनः, अनाजिनो वाजिन क्रियन्तेऽनेनेति वाजी-करणम् अथना स्त्रीउ विषये नरो राजीव शक्ति प्राप्नोतीति तद्वाजी करणम् । येन वाऽन्यर्थं व्यज्यते स्त्रीषु शुक्र तद्वाजीकरणम् । “ येन नारीषु मामथ्र्य वाजिवलभते नर । व्यज्यते चाधिक येन वाजीकर - } णमेव तत् ॥वाज शुक्र सोऽस्यास्तीति वाजी, अनाजी बाजी क्रियते येन । तद्वाजीकरणम् । किंना बाजो मैथुन तथा च हारीत -बाजी नाम । प्रकाशत्वात्तच्च मैथुनसचिनम् । वाजीकरणसचामि पुस्त्वमेन प्रच-क्षते ॥ वाजीकरणभेदात्रय - शुक्रनुतिकर किञ्चित् किञ्चिष्टुकवि-बर्द्धनम् । स्रुतिवृद्धिकर किचिद त्रिविध वृष्यमुच्यते । तत्र स्रुतिकर स्पर्शादि वृद्धिकर चीरादि, स्रुतिधृद्धिकर मापादि । अल्परेतस पञ्चविंदातिमप्राप्ता ', क्षीणरेतसत्तु मध्यमवयस कारणावरपीमृतरेतस शुष्करेतसो वृद्धाः । इति चरण, बाल तथा वृद्ध पुरुष के लिये स्त्रीगमन निषिद्ध है । जैसा कि कहा भी है - अति वालो यस न्पूर्णसर्वधातु स्त्रिय वनन् उपतप्येन सहसा तागमिव कान-लम् ॥ शुष्क रूक्ष यथा काष्ठ जन्तुद्रग्ध विजर्जरम् । स्पष्टमाशु वि-शीर्येत तथा वृद्धः स्त्रियो वजन || ( च ० चि ० अ ० २ ) अतएव वाजीकरण का प्रयोग कारणवश अल्प, दुष्ट, क्षीण
और शुष्क वीर्यं पुरुषों के लिये मुख्यतः माना गया है ।
एवमयमायुर्वेदोऽष्टाङ्ग उपदिश्यते; अत्र कस्मै किमु-च्यतामिति ॥ १७ ॥
इस तरह यह आयुर्वेद अष्टाह कहलाता है, इन अह्नों में से किस शिष्य को कौन सा अङ्ग पढ़ावें ॥ १७ ॥
त ऊचु: - अस्माकं सर्वेषामेव शल्यत्रानं मूलं कृत्वो-पदिशतु भगवानिति ॥ १८ ॥
शिष्यों ने कहा कि आप हम सब को शल्यज्ञान प्रधान आयुर्वेद का उपदेश करें ॥ १८ ॥
स उवाचैवमस्त्विति ॥ १ ९ ॥ भगवान् धन्वन्तरि ने कहा कि ऐसा ही किया जायगा ॥ त ऊचुर्भूयोऽपि भगवन्तम्- अस्माकमेकमतीनां मतमभिसमीच्य सुश्रुतो भगवन्तं प्रच्यति, अस्मै चोप-| दिश्यमानं वयमप्युपधारयिष्यामः ॥ २० ॥
उन शिष्यों ने फिर भगवान् धन्वन्तरि से कहा कि एक ही मत ( विचार ) वाले हम में से सुश्रुत हमारी आन्तरिक इच्छा का ध्यान रख कर आप प्रश्न करेगा और आप द्वारा उसके प्रश्नों के उत्तर के रूप में दिये गये आयुर्वेदोपदेश को हम सब धारण करेंगे ॥ २० ॥
aaaaaa || २१ ॥ भगवान् धन्वन्तरि ने कहा कि ऐसा ही होगा ॥ २१ ॥
वत्स सुश्रुत! इह खल्वायुर्वेदप्रयोजनं - व्याध्युप सृष्टानां व्याधिपरिमोक्षुः स्वस्थस्य रक्षणञ्च ॥ २२ ॥
| हे वत्स सुश्रुत! रोगों से व्याप्त मनुष्यों की रोगों से मुक्ति तथा स्वस्थ के स्वास्थ की रक्षा ये ही दो आयुर्वेद के मुख्य प्रयोजन हैं ॥ २२ ॥
विमर्शः -- चरक ने भी यही आयुर्वेद का मुख्य प्रयोजन माना है किन्तु वहाँ प्रथम स्वास्थ्य रक्षण ततः रोग मुक्ति यह उपयुक्त क्रम दिया है । " प्रयोजन चान स्वस्थस्य स्वास्थर-क्षणमातुरस्य विकारप्रशमन " ( च ० सू ० ० ३० ) चरक ने प्रकारान्तर से रसरक्तादि धातुओं की सामता रखना भी इस तन्त्र का उद्देश्य माना है जो इन्हीं दोनों में समाविष्ट - सा है । ' वातुसाम्यक्रिया प्रोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् । ( च ० सू ० अ ० १ ) ढाक्टरी में स्वास्थ्यरक्षण विभाग को ( Preventive Medicine and Hygiene तथा चिकित्सा विभाग को Curatare Mediane ) कह कर ये ही दो विभाग माने हैं । श्रायुरस्मिन् विद्यतेऽनेन वा आयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः ॥ आयु ( के हिताहित ) का विचार जिसमें हो तथा ( दीर्घ ) आयु की प्राप्ति जिसके उपदेशों से होती हो उसे आयुर्वेद कहते हैं ॥ विमर्शः - चरकेऽपि न ० १ आयुर्वेदयतीत्यायुर्वेद. ( सू ० अ ० ३० ) । नं ० २ हिताहित सुख दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् । मानञ्च तच्च
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सूत्रस्थानम् । यत्रोक्तमायुर्वेद स उन्यते ॥ ( मू ० अ ० १ ) नं ० ३ शरीरेन्द्रियसत्त्वा-त्मसंयोगो धारि जीवितन् । नित्यगश्चानुवन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥ तत्यायुप. पुण्यतनो वेदो वेदविदा नत ॥ ( नू ० अ ० २ ) नं ० ४ शरीरेन्द्रियमत्त्वान्नमयोगविशिष्टत्वे सति धार्याधनेपर्यायवाचकैर्ना-मभिरभिधीयमानत्वमायुष्ट्वमिनि परिष्कृतोऽर्थः नं ०५ “ यतश्रायु-वाप्यनायुचाणि च द्रव्यगुणकर्माणि वेदयत्यनोऽप्यायुर्वेद. " ( मू ० श्र ० ३० ) नं ० ६ आयुर्हिताहिन व्यार्धे नंदानं शमनं तथा । विद्यते यत्र विद्वद्भिस आयुर्वेद उच्यते ॥ तस्यारमाद्यं प्रत्यक्षागमानुमानोपमानैरविरुद्धमुच्य-मानमुपधारय ॥ २४ ॥
इस आयुर्वेद के सर्वश्रेष्ठ और आद्य अङ्ग का प्रत्यक्ष, भागम, अनुमान और उपमान इन चारों प्रमाणों से अविरुद्ध जो उप-देश कर रहा हूं उसको तुम धारण करो ॥ २४ ॥
विमर्श: - यहाँ पर वर्णित प्रत्यक्षादि चार प्रमाण महर्षि गौतम के मत से है । " प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ” ( न्यायसूत्र ) वैशेषिक तथा सांरय के मत में प्रमाण तीन होते हैं और उपमान को अनुमान में ही प्रविष्ट करते हैं । किन्तु चरक ने चार और तीन प्रमाण माने हैं । “ द्विविधमेव सलु सर्व सच्चा ` सच्च । तन्य चतुर्विधा परीक्षा - आप्तोपदेश प्रत्यक्षमनुमानं युक्तिचं त्रि ( सू ० अ ० ११ ) त्रिविध कलु रोगविशेषविज्ञान भवनि तद्यथा-आप्तोपदेश प्रचक्षमनुमानन्चेनि ( वि ० अ ० ४ ) । एतद्ध्यङ्गं प्रथमम्, प्रागभिघातत्रणसंरोहाद्यज्ञ-शिरःसन्धानाञ्च । श्रूयते हि यथा - " रुद्रेण यनस्य शिरश्छिन्न मिति, ततो देवा श्रश्विनावभिगम्योचुः -भगवन्तौ! नः श्रेष्ठतमौ युवां भविष्यथः, भवद्भयां यत्रस्य शिरः सन्धातत्र्यमिति । तावूचतुरेवमस्त्विति । अथ तयोरर्थे देवा इन्द्र यज्ञभागेन प्रासादयन् । ताभ्यां यन्नस्य शिरः सहितम् ” इति ॥ २५ ॥
शल्य शालाक्यादि आठ भट्ठों में शल्य अन ही मुरय है क्योंकि पूर्व समय में देवदानव युद्ध में प्रहारजन्य व्रणों के रोपण करने से तथा यज्ञ के कटे हुए शिर का सन्धान कर देने से इसी अङ्ग को प्रधान माना है । यह सुनने में आता है कि प्रकृपित शिव ने यज्ञ का शिररच्छेदन कर दिया था, तब देवताओं ने अश्विनीकुमारों के पास जाकर कहा कि आप हमारे में अतिश्रेष्ठ होंगे । आपको यज्ञ के कटे शिर का सन्धान करना चाहिये । दोनों ने कहा ऐसा ही हो, तत्र देवताओं ने अश्विनीकुमारों को यज्ञ का भाग मिलने के लिये इन्द्र को प्रसन्न किया । इस तरह अश्विनीकुमारोंने यज्ञ के कडे शिर का सन्धान किया || २५ ॥ विमर्श: - इस वर्णन से शल्यशास्त्र का महत्व तथा शल्य कोविद का सम्मान विदित होता है । चरक में भी यह वर्णन है । अश्विनो देवभिपजो यद्यवाहाविनि स्मृनो । दक्षस्य हि शिररिध न पुनलाग्या समाहितम् ॥ ( चि ० ० १ ) अष्टावपि चायुर्वेदतन्त्रेष्वेतदेवाधिकमभिमतम्, आशुक्रियाकरणात् यन्त्रशस्त्रक्षाराग्निप्रणिधानात्, सर्वतन्त्रसामान्याच्च ॥। २६ ॥ आशु ( शीघ्र ) किया करने से, यन्त्र, शस्त्र, क्षार और अभि का प्रयोग करने से, तथा अन्य सर्वतन्त्रों के समान चिकित्सा इसमें होने से आठों तन्त्रों में यही शल्यतन्त्र अधिक माननीय है ॥ २६ ॥
विमर्गः - चरक में भी अनेक स्थल पर शल्यचिकित्सा का महत्व स्वीकृत किया गया है । गुल्मरोगे - धान्वन्तरी-याणानांधकार क्रियाविधो । वैद्याना कृनयोग्याना व्यधशोधनरो-पणे ॥ उदररोगे — इदन्तु शल्यहतुजा कर्म स्याद् दृष्टकर्मणान् । अर्शसि - हुरेके शत्रेण कर्त्तन हितमर्शसान् । ढाह क्षारेण चा-प्येके दाने के तथाग्निना ॥ ( च ० चि ० अ ० १३ ) तदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं वृत्तिक-रञ्चेति ॥ २७ ॥
यह शल्यतन्त्र शाश्वत ( नित्य ), पुण्यदायक, स्वर्गदायक, यश करने वाला, आयु के लिये हितकर तथा जीविकोप योगी है ॥ २७ ॥
। विमर्श - चिकित्सा की एवज में धनादिग्रहण करना निन्दित है 1 । कुर्वने ये तु वृत्यर्थ चिकि सापण्यविक्रयन् । ते हित्वा काजन राशि पाशुराशिनुपानते ॥ ( चि ० अ ० १ ) वरमाशीविषविषं कथितं ताम्रमेव वा । पोनमत्यग्निमन्तप्ता भक्षिना वाप्ययोगुटा ॥ न तु श्रुतवता वेशं विनता शरणागतात् । गृहीतमन्न पान वा विश्व वा रोगपीडितात् ॥ ( च ० सू ० अ ० १ ) " या पुनरीश्वराणा वसुमता | वा सकाशात्लुग्गोपहारनिमित्ता भवत्यर्थानामवाप्ति. " ( च ० सू ० अ ० ३० ) आज का चिकित्सक अधिकतर लुटेरा वन गया है । शास्त्रमर्यादा को कौन माने । डाक्टर लोग तो मनुष्य मरा पढ़ा हो फिर भी उसकी फीस लेते है और न देने पर मुकदमे तक करते हैं । यह अतीव निन्दाजनक है । यदि चिकित्सक उदारहृदय होकर सेवा करे तो उसकी सेवा निष्फल नहीं हो सकती । कचिद्दर्म कचिन्मैत्रो क्वचिदर्थः कचियाः । कर्माभ्यास कचिच्चेति चिकित्सा नास्ति निष्फला ॥ नाथथ नापि कामार्थमथ-भूतदयाप्रति । वर्तने यश्चिकित्साया स सर्वमतिवर्तते ॥ न हि जीवितदानादि दानमन्यद्विशिष्यते । सन्निपातार्णवे मग्नं योऽभ्युद्धरति । मानव । कस्तेन न कृतो धर्मं काञ्च पूजा न सोऽर्हति ॥ ब्रह्मा प्रोवाच ततः प्रजापतिरधिजगे, तस्माद-श्विनौ, अश्विभ्यामिन्द्रः, इन्द्रादहं, मया त्विह प्रदेय-मर्थिभ्यः प्रजाहितहेतोः ॥ २८ ॥
इस आयुर्वेद को सर्वप्रथम ब्रह्मा ने कहा । ब्रह्मा से प्रजापति दक्ष ने प्राप्त किया । दक्षप्रजापति से अश्विनीकुमारों ने इसका अध्ययन किया । अश्विनीकुमारों से इन्द्र ने पढ़ा तथा इन्द्र से मैने ( धन्वन्तरि ने ) पढ़ा । प्रजा के हित के लिये याचकरूप में आये हुये तुम सबको मुझे अध्यापन रूप से देना है ॥ २८ ॥
विमर्श: - गुरुमुख से पढ़ी विद्या का शिष्यों में सवार न करने से वह ऋणी तथा पापभागी होता है । सम्यग् गुरुमुसा-दधीत्य यो न प्रयच्छत्यन्तेवासिभ्य स सलु ऋणी गुरुजनस्य महुदेनो विन्दति । भवति चात्र-अहं हि धन्वन्तरिरादिदेवो जरारुजामृत्युहरोऽम-