श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 61–70

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 61–70

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सुश्रुतसंहिता | राणाम् | शल्याङ्गमङ्गैरपरैरुपेतं प्राप्तोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टुम् ॥ २ ९ ॥ " ' देवताओं की वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु को नष्ट करने ' वाला आदिदेव मैं धन्वन्तरि आयुर्वेद के अन्य अङ्गों के साथ शल्यतन्त्र का उपदेश करने के लिये फिर से इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ हूँ ॥ २ ९ ॥ विमर्शः - पुराणों में समुद्रमन्थन के समय धन्वन्तरि की ' उत्पत्ति लिखी है । अस्मिन् शास्त्रे पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष इत्युच्यते । तस्मिन् क्रिया, सोऽधिष्ठानम्; कस्मात्? । लोकस्य द्वैविध्यात् । लोको हिं द्विविध: - स्थावरो जङ्ग मव । द्विविधात्मक एवाग्नेयः सौम्यचं तद्भूयस्त्वात्; पञ्चात्मको वा । तत्र चतुर्विधो भूतग्राम - संवेदजजरा-युजाण्डजोद्भिज्जसंज्ञः । तत्र पुरुषः प्रधानं, तस्योपकर-णमन्यत् । तस्मात् पुरुपोऽधिष्ठानम् ॥ ३० ॥

इस आयुर्वेद शास्त्र में पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पञ्चमहाभूत तथा शरीरी ( आत्मा ) इनके संयोग को पुरुष कहा है । इसी पुरुष की चिकित्सा की जाती है एव यही पुरुष चिकित्सा तथा कर्मफल का अथवा स्वास्थ्य और रोगों का अधिष्ठान है क्यों कि ससार दो प्रकार का होने से सजीव सृष्टि स्थावर और जनम भेद से दो प्रकार की है । अथवा अग्नि तथा जल तत्व की अधिकता होने से आग्नेय और सौम्य ये इसके दो भेद हैं । किंवा पञ्च महाभूतों से चनी होने से यह सृष्टि पञ्चात्मिका है । इनमें सम्पूर्ण प्राणिवर्ग स्वेदज, जरायुज, अण्डज और उद्भिज्ज भेद से चार प्रकार के होते हैं । इनमें पुरुष प्रधान है तथा अन्य इसके साधन है इस हेतु पुरुष अधिष्ठान है ॥ ३० ॥

विमर्शः --- यद्यपि सामान्यतया पुरुष शब्द से, समस्त पशु आदि का बोध होता है तो भी यहां पर पुरुष से मनुष्य का ग्रहण करना चाहिये क्योंकि आयुर्वेद का उपदेश मनुष्य के लिये है । चरक ने भी ६ तत्वों के संयोग को पुरुष माना है । सादयश्चेतनापृष्ठधातर पुरुष स्मृत । पुरि शेते इति पुरुष । पुरुष के लिये चरक ने लोक शब्द का भी प्रयोग किया है । प समुदिता लोक इति शब्द लभन्ते ( च ० शा ० ) सत्वमात्मा शरीरल

त्रयमेतत्त्रिदण्डवत् । लोकस्तिष्ठति सयोगात् तत्र सर्व प्रतिष्ठितम् ॥

( च ० सू ० अ ० १ ) आग्नेय और सौम्य से आर्तव तथा शुक्र का अर्थ भी उचित है, क्योंकि इन्ही दोनों के योग से ही सजीव सृष्टि की रचना होती है । ' सौम्य शुक्रमार्त्तनमाग्नेयम् ' तदुखसयोगा व्याधय उच्यन्ते ॥ ३१ ॥ 1

जिनके संयोग से पुरुष ( मनुष्य ) को दुःख होता है उन्हें व्याधि ( रोग ) कहते है । विमर्श - सन्देनान्ननिर्दिष्ट पुरपोऽधिक्रियते, दुस काय-मानसीपीटा, विविध दु समादधतीति व्याधय । तस्य पुरुषस्य दुसय सयोगो येषा मागन्तुप्रभृतीना ते व्याधय् । अथवा तस्य पुरु-पस्य येषु मत्सु यैर्वा कारणभूतै, येभ्यो वा दु सजायते ते व्याधय । ते चतुर्विधाः -- आगन्तव, शारीराः, मानसाः, स्वाभाविकाश्चेति ॥ ३२ ॥

ये व्याधियां चार प्रकार की होती हैं - आगन्तुक, शारीरिक, मानसिक और स्वाभाविक ॥ ३२ ॥

विमर्श: - आयुर्वेद में रोगों के भेद कई तरह से किये गये हैं । " त्रयो रोगा निजागन्तुमानसा " तत्र निनः शारीरदोपसमुत्थ, आगन्तुर्भूतविपवाय्वग्निसम्प्रहारादिसमुत्य, मानस पुनरिष्टम्याला -भालाभाच्चानिष्टर योपजायते । ( च ० सू ० अ ० ११ ) चत्वारो रोगा भवन्ति -- आगन्तु वातपित्तश्लेष्म निमित्ता । विकारा पुनरपरिस-ख्येया, प्रकृत्यधिष्ठान लगायतन विकर पविशेषापरिसख्येयत्वात् । ( च ० सू ० अ ० २० ) हेतुमेदेन त्रिविधा व्याधयो भवन्ति, श्राग्नेया, सौम्या, वायव्याश्च द्विविधाश्यापरे राजसा, तामसाश्च । ( च ० नि ० अ ० १ ) शार्ङ्गधरमते चत्वारो रोगाः -- स्वाभाविकागन्तुककायिका-तरा रोगा भवेयु किल कर्मदोपजा । ढे वागन्तवोऽभिघातनिमित्ता: । शारीरास्त्वन्न । पानमूला वातपित्तकफशोणितसन्निपातवैषम्यनिमित्ताः मानसास्तु क्रोधशोकभयहर्षविषादेर्ष्याऽभ्यसूयादैन्यमा-त्सकामलोभप्रभृतय इच्छाद्वेषभेदैर्भवन्ति । स्वाभा-विकास्तु क्षुत्पिपासा जरामृत्युनिद्राप्रकृतयः ॥ ३३ । इनमें आगन्तुक रोग शख, लाठी, पाषाण आदि के आघात से उत्पन्न होते हैं । शारीरिक रोग हीन, मिथ्या और अति मात्रा में प्रयुक्त अन्नपान के कारण कुपित हुए या विषम हुए वात, पित्त, कफ, रक्त या इनके सन्निपात ( समूह ) से उत्पन्न होते हैं । मानस रोग क्रोध, शोक, भय, हर्प, विषाद, ईर्ष्या, अभ्यसूया, मनोदैन्य, मात्सर्य, काम, लोभ आदि से त इच्छा और द्वेष के अनेक भेदों से उत्पन्न होते हैं । स्वाभाविक रोग भूख, प्यास, वृद्धावस्था, मृत्यु और निद्रा आदि हैं ॥ ३३ ॥

विमर्श: - यद्यपि सुश्रुत ने कई जगह वातादि तीन ही दोप मानते हैं ' वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भवहेतव " ( सू. २१ ) “ सर्वेपाच व्याधीना, वातपित्तश्लेष्माण एव मूलम् " ( सू. अ ० २४ ) तथापि शल्यतन्त्र दृष्टि से व्रणोत्पत्ति और व्रण-सन्धान में रक्त की प्रधानता होने से उसे दोपरूप में माना है । किन्तु वह सर्वमति से दूष्य ही है । वस्तुतस्तु स्वतन्त्रदूषणात्म-कत्वाभावात्प्रकृत्यारम्भकत्वाभावाच्च दूष्यतैव गोणितस्य न दोषता ” इति गणनाथसेना. | त एते मनःशरीराधिष्ठानाः ॥ ३४ ॥

ये चारों प्रकार के रोग मन, और शरीर को आश्रित कर उत्पन्न होते हैं ॥ ३४ ॥

तेपां सशोधनसंशमनाहाराचाराः सम्यक्प्रयुक्ता निग्रहहेतवः ॥ ३५ ॥

इन रोगों का निप्रह या प्रतीकार देश, काल, वय, मात्रा | आदि रूपसे सम्यक्प्रयुक्त संशोधन, सशमन, आहार और विहार से होता है ॥ ३५ ॥

विमर्श: -- सशोधनलक्षणम् -- यदीरयेदहिदोषान् पञ्चधाशोधनच तत् । नीरूड़ो वमन कायशिरोरेकोऽस्रविस्रुति. ॥ ( अ ० स ० सू ० अ ० २४ ) सशमन लक्षणम् - न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीर-यत्यपि । समीकरोति विपमान् तत्सशमनमुच्यते ॥ आहारभेदा.-मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायभेदेन पवििध । भक्ष्यभोज्य तथा पैय चर्च्य चोय ह्यन पडूविध । शीतोष्णवीर्यभेदेन द्विविधः,

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सूत्रस्थानम् ।

“ पञ्चभूतात्मके देहे आहार पाञ्चभौतिक " इति पञ्चविधः ॥

प्राणिनां पुनर्मूलमाहारो बलवर्णौजसाञ्च, स षट्सु रसेष्वायत्तः, रसाः पुनर्द्रव्याश्रयाः, द्रव्याणि पुन-रोषधयः । तासु द्विविधाः -- स्थावरा जङ्गमाश्च ॥ ३६ ॥

प्राणियों की जीवन रक्षा का मूल कारण आहार ही है-तथा शरीर के बल, वर्ण और ओज ( Vatahty ) की रक्षा या वृद्धि में भी आहार ही कारण है । यह आहार परसात्मक या पढ् रसाश्रयी होता है । रस द्रव्यों के आश्रित होते हैं । ओषधियों को द्वन्य कहा " जाता है । स्थावर और जगम ये दो ओषधियों के भेद हैं ॥ ३६ ॥

विमर्शः– “ आहार प्राणिना प्राणा " वर्ण प्रसाद सौस्वयं जीवित प्रतिभा सुखम् । तुष्टि पुष्टिर्बल मेधा सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥ ( च ० सू ० अ ० २७ ) “ एकरसाहार. कर्शनीयाना, सर्वरसाभ्यवहारो वल्कराणाम् ” । ओषधिभ्योऽन्नम्, अन्नात्पुरुप, अन्नाद्भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते, अन्नभृताना स्येष्ठ तस्मात्सवोपधमुच्यते । ( तैत्तिरीयोपनिषद् ) परीक्ष्य हितमश्नीयाददेहो हुथाहारसम्भव ' । ( च ० सू ० अ ०२८ ) चरके द्रव्यलक्षणम् - यत्राश्रिता कर्मगुण / कारण समवायि यत् । तद्द्द्रव्यम् । खादीन्यात्मामन कालो दिशश्च द्रव्य-सग्रहः । सेन्द्रिय चेतन द्रव्य निरिन्द्रियमचेननम् ॥ किञ्चिद्दोषप्रश-मन किचिद्धातुप्रदूषणन् । स्वस्थवृत्तौ मत किञ्चित्त्रिविध द्रव्यमुच्यते ॥ तत्पुनस्त्रिविध प्रोक्त जगमद्भिःपार्थिवम् | ( च ० सू ० अ ० १ ) तासां स्थावराश्चतुर्विधाः- वनस्पतयो, वृक्षा, वीरुध, श्रोषधय इति । तासु, अपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः ।

पुष्पफलवन्तो वृक्षाः । प्रतानवत्य. स्तम्बिन्यश्च वीरुधः ।

फलपाकनिष्ठा श्रोषधय इति ॥ ३७ ॥

इनमें स्थावर औषधियों के चार भेद किये गये हैं । वनस्पति, वृक्ष, वीरुध और ओषधि । इनमें से जिनके पुष्प न हो किन्तु फल आते हों उन्हें वनस्पति, जिनके पुष्प और फल दोनों आते हों उन्हें वृक्ष, जो फैलने वाली या गुल्म के स्वरूप की हों उन्हें वीरुध तथा जो फलों के पकने तक ही जीवित या विद्यमान रहती हों उन्हें ओषधि कहते है ॥३७ ॥

विमर्शः - पुष्पा अविद्यमानपुप्पा इति ढल्हण, येपा पुष्पमन्तरे जैव फलजन्मे तिहाराणचन्द्र विट, औदुम्बर, पीपल इसके उदाहरण हैं । वैज्ञानिक मत से इनमें भी असंख्य पुप्प होते हैं अतः अपुप्प का अर्थ अदृश्यपुष्प यह वाणेकर जी का प्रशस्त है । वीरुध का उदाहरण त्रप ( खीरा ) अलाबु ( लौकी ) है । वीरुध । में तृणजाति ( शरेतुप्रभृति ) तथा गुल्म और वल्ली ( गुडच्या-दिक ) का भी समावेश मानना चाहिये । ओषधि में शालि -गोधूमय व तिलमुद्ग आदि हैं । जङ्गमाः खल्वपि चतुर्विधाः – जरायुजाण्डजस्वेद -जोद्भिज्जाः ॥ ३८ ॥

जगम के भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज ये चार भेद होते हैं ॥ ३८ ॥

विमर्श: - जङ्गम्यन्ते गच्छन्ति ये ते जङ्गमा । गर्भावरणं जरायु ( Placents with the membranes ), उद्भिद्य पृथिवों । जायन्ते इति उद्भिज्जा ( Vegetable kingdom ) तत्र पशुमनुष्यव्यालादयो जरायुजा । खगसर्पसरी सृपप्रभृतयोऽण्डजाः । कृमिकीटपिपीलिकाप्रभृतयः स्वे-दजाः । इन्द्रगोपमण्डूकप्रभृतय उद्भिज्जाः ॥ ३६ ॥

इन पशु, मनु, न्याल ( व्याघ्र सिंहादि हिंस्रक पशु ) आदि जरायुज हैं । पत्ती, सर्प, ( अजगर ), सरीसृप ( सांप, मत्स्य, मकर, छिपकली ), आदि अण्डज होते हैं । यूका, लिता आदि कृमि, कीट, चींटी, मकोडे आदि वे ' इन्द्रगोप ( वीरबहूटी ) मेढक आदि उद्भिज है ॥ ३ ९ ॥ विमर्श: - मनुस्मृति में जगन्म सृष्टि के तीन भाग ही किये है तथा यहां के उद्भिज जीवों का समावेश वहां अण्डज में ही कर दिया है । अन्य ग्रन्थों के उद्भिजगण के लिये यहां स्थावर का प्रयोग किया है । अण्डजा पक्षिण सर्पा नक्रा मत्स्याश्च कच्छपा । यानि चैवप्रकाराणि स्वलज्ञान्योदकानि च ॥ उद्भिजा स्थावरा सर्वे " बीजकाण्डप्ररोहिण । चरके औद्भिदन्तु चतुर्विधम् । वनस्पतिस्तथा वीरद्वानस्पत्यस्तथोपधि । भेलसहितायाञ्च - उद्भिज्जास्तु तृणलता-वृक्ष वनस्पतय । तत्र स्थावरेभ्यस्त्वक्पत्रपुष्पफलमूलकन्दनिर्यासस्त्र-रसादयः प्रयोजनवन्तः, जङ्गमेभ्यश्चर्मनखरोमरुधि-रादयः ॥ ४० ॥

इनमें स्थावर ओषधियों की छाल, पत्ते, पुप्प, फल, जड, कन्द, निर्यास ( गोंद ) और स्वरस कार्य में आते है एवं जहम ओषधियों में से चर्म, नख, रोम ( वाल ) और रक्त आदि का प्रयोग होता है ॥ ४० ॥

विमर्श. - आजकल डाक्टरी में यकृत, प्लीहा, मज्जा, अग्न्याशय, थायराइड, पेराथायराइट, यूटेरस, ओवरी, टेस्टि • किल्स, सुप्रारीनल, पेन्क्रियाज आदि अन्त. स्रावों का प्रयोग बहुत सफलता से हो रहा है किन्तु भारतीयों ने इस दिशा में अपने महर्षियों के निम्न वाक्यों पर कुछ भी शोध न की । यकृा भक्षयेदाजमाम पित्तसमायुतम् । ( उ ० अ ० ४५ ) मधूनि गोरसा पिप्त वसा मनासृगामिपम् । विण्मूत्रचर्मरेतोऽस्थिस्नायुश्शृङ्गनखा खुरा ॥ जङ्गमेभ्य प्रयुज्यन्ते केशलोमानि रोचना ॥ ( च ० सू ० अ ० १ ) पार्थिवाः सुवर्णरजतमणिमुक्तामनःशिलामृत्कपा-लादयः ॥ ४१ ॥

पार्थिव द्रव्योंमें सुवर्ण, रजत, मणि, मुक्ता, मैनसील, मिट्टी तथा कपाल ( ठिकरी ) का उपयोग होता है ॥ ४१ ॥

विमर्शः - पार्थिव द्रव्यों में शिलाजीत, सिकता, सुधा, हरताल, लवण, गैरिक और रसाञ्जन आदि भी महत्त्व के होने से गणनीय हैं । मोती समुद्री जन्तुकृत सीप में से निकलते हैं । अतः जन्तु है । कालकृतास्तु प्रवातनिवातातपच्छायाज्योत्स्नातम शी-तोष्णवर्षाऽहोरात्र पक्षमा सवयनादयः संवत्सर विशेषाः ॥ चिकित्सा हित की दृष्टि से कुछ काल कृत विशेषताए है जैसे वायु का अतिसञ्चार, वायु रहित प्रदेश, धूप, छाया, चांदनी रात, अधेरा, शीत, उष्ण, वर्षा, दिन, रात, पक्ष, महीना, ऋतु, अयन और संवत्सर आदि ॥ ४२ ॥

विमर्शः - स्वास्थ्यरक्षण, ओपधि सञ्चय, ओपधि निर्माण शस्त्रकर्म आदि में कालकृत विशेषता उपयोगी होती है । चरक ने भी कहा है- " कालो हि भैषज्यप्रयोगपर्याप्तिमभिनिवर्तयति ” ( च ० वि ० अ ० ८ ) चिकित्सा में भी काल विभाग लाभकारी है । यथा - प्रवात वर्जयेत्, निवातागारमाश्रयेत्, वायवश्चन्द्रपाढाश्च शीतदाहज्वरापहा ', न चालेप रात्रौ प्रयुञ्जीत, पक्षाज्जातरस पिवेद,

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८ सुश्रुतसहिता | • हरेद्वसन्ते इलेप्माण पित्त शरदि निर्हरेत् । वर्षातु शममेद्वायु प्राग्वि कारसमुच्छ्रयात् ॥ त एते स्त्रभावत एव दोपाणां सञ्चयप्रकोपप्रशमप्र तीकारहेतवः प्रयोजनवन्तश्च ॥ ४३ ॥

ये सव काल की विशेषताएं स्वभाव से ही टोपों के सञ्चय प्रकोप, प्रशमन और प्रतीकार में कारण हैं और चिकित्सा मैं उपयोगी है ॥ ४३ ॥

भवन्ति चात्र श्लोकाः-शारीराणां विकाराणामेप वर्गश्चतुर्विधः ।

प्रकोपे प्रशमे चैव हेतुरुक्तश्चिकित्सकै ॥४४ ॥

शारीरिक व्याधियों के प्रकोप और प्रशमन में यही स्थाव-रादि चार प्रकार का पूर्वोक्त वर्ग चिकित्सकों द्वारा कारण माना गया है ॥ ४७ ॥

विमर्श - स्थावर, जङ्गम, पार्थिव और कालकृत चतु • विंध वर्ग है ।

आगन्तवस्तु ये रोगास्ते द्विघा निपतन्ति हि ।

मनस्यन्ये शरीरेऽन्चे तेषान्तु द्विविधा क्रिया ॥ १५ ॥

शरीरपतितानां तु शारीरवदुपक्रमः ।

मानसानां तु शब्दादिरिष्टो वर्गः सुखावहः ॥४६ ॥

जो रोग आगन्तुक हैं उनके दो अधिष्ठान हैं । कुछ मन में और कुछ शरीर में उत्पन्न होते है । उनकी चिकित्सा भी दो प्रकार से होती है । शरीर में उत्पन्न रोगों की चिकित्सा शारीरिक रोगों के अनुसार होती है तथा मन में उत्पन्न रोगों को चिकित्सा सुखदायक शब्दादि वर्ग से करनी ठीक है ॥ ४५-४६ ॥ विमर्श - चरक में शारीर और मानस रोग चिकित्सा-प्रशाम्यत्योपधे पूर्वा दैवयुक्तिन्यपाश्रयै । मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्य-धृतिसमाधिनि ॥ मानस प्रति पन त्रिवर्गत्यान्ववेक्षणम् । तद्विद्यतेत्रा विज्ञानात्मादीना च सर्वत्र ॥ धीधैर्यात्मादिविज्ञान मनोदोषी-पर्व परन ॥ एवमेतत् पुरुषो व्याधिरौपथं क्रियाकाल इति चतु ट्र्यं समासेन व्याख्यातम्! तत्र पुरुषग्रहणात् तत्सम्भ-वद्रव्यसमूहो भूतादिरुक्तस्तदङ्गप्रत्यङ्गविकल्पाश्च त्वङ्मां-सास्थिसिरास्नायुप्रभृतयः । व्याधिग्रहणाद् वातपित्तक-फशोणितसन्निपातवैपम्यनिमित्ताः सर्व एव व्याधयो व्यास्याताः । औपधग्रहणाद् द्रव्यरसगुणवीर्यविपाका-नामादेशः । क्रियाग्रहणाच्छेद्यादीनि स्नेहादीनि च

कर्माणि व्याख्यातानि । कालग्रहणात् सर्वक्रियाकाला-नामादेशः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार पुरुष, व्याधि, औषध और क्रियाकाल इन चारों की संक्षेप में व्यारया कर दी है । इन में पुरुष शब्द से पुरुष की उत्पत्ति करने वाले पञ्चमहाभूतात्मक शुक्रशोणितादि तथा उम्म पुरुष के अद्ग प्रत्यग के भेद एव त्वचा, मांस, अस्थि सिरा, स्नायु आदि का ग्रहण होता है । व्याधि शब्द से वात, पित्त, कफ, रक्त और इनके सन्निपात ( समुदाय ) के विपम होने से उत्पन्न सर्वरोगों का ग्रहण करना चाहिये । इसी तरह औषध शब्द से द्रव्य, रस, गुण, वीर्ग और विपाक और प्रभाव का ग्रहण होता है । किया शब्द से छेद्य भेद्यादि अष्ट f शस्त्रकर्म तथा स्नेहन, स्वेटन व पञ्चकम का ग्रहण होता है । कालशब्द से चिकित्सादि सर्व कार्यों के लिये जो उपयोगी समय है उस का ग्रहण होता है ॥ ४७ ॥

विमर्शः - क्रियाणा स्नेहवननादीना तथा छेयादीनात्र प्रवृत्ति-निवृत्ति उपदर्शनकाल क्रियाकाल इनि भानुमत्यान् । भवति चात्र ।

बीजं चिकित्सितस्यैतत्समासेन प्रकीतितम् ।

सर्विशमध्यायशतमस्य व्याख्या भविष्यति ॥ १८ ॥

यहां पर समग्र चिकित्सा शास्त्र का बीज सक्षेप से कह दिया है तथा एक सौ बीस अध्यायों में इसकी व्यारया को जावेगी ॥ ४८ ॥

तच्च सर्विंशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु सूत्रनिदा-नशारीरचिकित्सितकल्पेष्वर्थवशात् संविभज्य, उत्तरे तन्त्रे शेपानर्थान् व्याख्यास्यामः ॥ ४६ ॥

इन एक सौ बीस अध्यायों को सूत्र निदान, शारीर, चि. कित्सा और कल्प इन पांच स्थानों में विपयानुसार विभक्तकर शेष विषय की उत्तरतन्त्र में न्यारया करेंगे ॥ ४ ९ ॥ भवति चात्र । स्वयम्भुवा प्रोक्तमिदं सनातनं पठेद्धि यः काशिपति-प्रकाशितम् । स पुण्यकर्मा भुत्रि पूजितो नृपैरसुक्षये । शक्रसलोकतां व्रजेत् ॥ ५० ॥।

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने वेदोत्पत्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

-0030400-ब्रह्मदेव से कहे हुए और काशिपति ( धन्वन्तरी ) से प्रकाशित इस सनातन ( नित्य ) आयुर्वेद शास्त्र को जो पढ़ेगा वह पुण्यकर्मा मनुष्य पृथिवी में राजाओं द्वारा पूजित होकर मरने पर इन्द्रलोक को प्राप्त करेगा ॥ ५० ॥

इति तत्वसन्दीपनी भाषायां प्रथमोऽध्यायः । -00000

द्वितीयोऽध्यायः ।

अथातः शिष्योपनयनीयमध्वायायं व्याख्यास्याम ', ॥१ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब यहां से शिष्योपनयनीय नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत के लिये कहा था ) ॥ १–२ ॥ विमर्श: - यहां उपनयन शब्द का अर्थ अध्ययन के लिये शिष्य का गुरु के समीप आना है । “ अध्ययनार्थमाचार्य-समीप नीयतेऽनेनेत्युपनयनम् ” वा शिष्यस्य उपनयनं ढीक्षा तद-| धिकृत्य कृतोऽध्याय शिष्योपनयनीय । गुरोर्व्रनाना वेदस्य

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श्रध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् । ε यमन्य नियमत्य च । देवताना समीर वा येनानो नीयते द्विज. ॥ ब्राह्मणत्रयाणां वर्णानामुपनयनं कर्तुमर्हति राजन्यो-नदुणनयन प्रोफन् । द्वयस्य, वैश्यो वैश्यस्यैवेति । शूद्रमपि कुलगुणसम्पन्नं त्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामन्यतममन्त्रयत्रयः शीलशौर्य- | मन्त्रवर्जमनुपनीतमध्यापयेदित्येके ॥ ५ ॥

शौचाचारविनयशक्तित्रलमेघाधृतिस्मृतिमतिप्रतिपत्ति- ब्राह्मण तीनों वर्णों के लडकों को उपनयन कर ( शिष्य युक्तं तन॒जिह्वौष्ठदन्ताप्रमृजुवक्त्राक्षिनासं प्रसन्नचित्तवा- बना ) सकता है, क्षत्रिय दो वर्ण तथा वैश्य केवल वैश्य का क्चेष्टं क्लेशसहव्च भिपक शिष्यमुपनयेत् । अतो विप- उपनयन कर सकता है । शुद्र भी उत्तम कुल और अच्छे रीतगुणं नोपनयेत् ॥ ३ ॥ गुणों वाला हो तो उसे वैदिकमन्त्रवर्जनपूर्वक तथा उपनयन-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन में से किसी एक को जो उत्तम कई

संस्कार आचार्यों के बिना ही आयुर्वेद का अध्यापन करा सकते है ऐसा कुल, योग्य आयु, सुशील, गौर्य, पवित्रता, आचार, नम्रता, उत्साह, बल, मेधा धृति, स्मृति, मनि और प्रतिपत्ति ( प्रौढता आदि गुणों से युक्त हो एवं जिस के जिह्वा, ओष्ट और दांतों के अग्रभाग पतले हों तथा मुख, आंख और नासिका ये सीधे हों और जिसका मन, वाणी और चेष्टाएं प्रसन्न ( उत्तम ) हॉ, जो क्लेश सहन करने की शक्ति रखता हो, ऐसे शिष्य को वैद्य ( अध्यापक ) इस शास्त्र को पढावे । इनसे विपरीत गुण-वाले शिष्य को कभी भी न पढावे ॥ ३ ॥

विमर्श ' — शौर्यगुण शस्त्रर्क्स में उपयोगी है । गौर्थनाशुक्रिया । वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि शन्यते । मेधा - धारणावती बुद्धिः । धृति हि नि मात्मिका । स्मृति - दृष्टथुनानुभूताना स्मरणात्स्मृतिमध्यते । ( चरक ), " अनुभूतविषयासंप्रनोप स्मृति । ( योगसूत्रम् ), प्रतिपत्ति - ' अर्या वत्रोधप्रागत्म्यमनुष्ठानं वा ' । उपनयनीयस्तु ब्राह्मणः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्त्तन-क्षत्रेषु प्रशस्तायां दिशि शुचौ समे देशे चतुर्हस्तं चतुरस्रं स्थण्डिलमुपलिप्य गोमयेन, दर्भैः संस्तीर्य्य, पुम्पैर्लाज-भक्तै रत्नैश्च देवताः पूजयित्वा विप्रान् भिषजश्च तत्रो-ल्लिख्याभ्युच्य च दक्षिणतो ब्रह्माणं स्थापयित्वाऽग्निमुप-समाघाय, खदिरपलाशदेवदारुविल्वानां समिद्भिश्चतुर्गा वा क्षीरवृक्षाणां ( न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थमधूकानां ) दधि-मधुघृताक्ताभिर्दार्वीहौमिकेन विधिना सुत्रेणाऽऽल्याहु-तीर्जुहुयात् सप्रणवाभिर्महाव्याहृतिभिः । ततः प्रतिदैव-तपश्च स्वाहाकारं कुर्यात्, शिष्यमपि कारयेत् ॥ ४ ॥

उपनयन करने वाला ब्राह्मण शुभ तिथि, करण, मुहूर्त्त नक्षत्रों में शुभ दिशा तथा पवित्र और समतल स्थान में चार । हाथ लम्बा और चौडा चौकोर स्थण्डिल बनाकर उसे गोवर से लीपकर उस पर दर्भ बिछाकर पुप्प, धान की लाजा और विविध रत्नों से देवता, ब्राह्मण और वैद्यों का पूजन कर के पश्चात् स्थण्डिल पर ऊर्ध्वमुखी लकीरें खींच कर जल से प्रोचित कर दक्षिण दिशा में ब्रह्मा की स्थापना कर और पास में अग्नि प्रज्वलित करे । खदिर, पलादा ( ढाक ), देवदार और बिल्व । की अथवा वट, गूलर, पीपल नौर महुआ इन चारों धीरी वृक्षों की दही, शहद और घृत से लिप्त समिधाओं से दावों । होम विधि की प्रथा से लकड़ी की दव से ॐकारपूर्वक महा-व्याहृतियों का उच्चारण करते हुए घृत की आहुति देवे । इसके अनन्तर प्रत्येक देवता तथा ऋषियों का नामोच्चारण करते हुये स्वाहाकार अर्थात् आहुति देवे और शिष्य से भी आहुतियां दिलावे ॥ ४ ॥

२० का मत है ॥ ५ ॥

ततोऽग्निं त्रिःपरिणीयाग्निसाक्षिकं शिष्यं ब्रूयात्— कामक्रोधलोभमोहमानाहङ्कारेर्ष्यापारुयवैशुन्यानृताल-स्यायशस्यानि हित्वा, नीचनखरोम्णा शुचिना कषाय-वाससा सत्यव्रतब्रह्मचर्य्याभिवादनतत्परेणाऽवश्य भत्रि-तव्यम् | मदनुमतस्थानगमनशयनासनभोजनाध्ययन-परेण भत्वा, मत्प्रियहितेषु वर्तितव्यम् । अतोऽन्यथा ते वर्त्तमानस्याधर्मो भवति, अफला च विद्या, न च प्राकाश्यं प्राप्नोति ॥ ६ ॥

( आहुति देने के ) पश्चात् हुताग्नि को तीन वार प्रदक्षिणा करके अग्निसाक्षिपूर्वक शिष्य से कहे कि तुम्हें काम, क्रोध लोभ, मोह, मान, अहङ्कार, ईर्ष्या, कठोरता, पिशुनता ( चुग-लखोरी ), असत्य, आलस्य तथा बदनाम करने वा | कार्य को छोड़ कर, नख और ( शिर के ) बाल कटा कर, पवित्र हो के कपाय वस्त्र पहन कर, सत्यभाषण, ब्रह्मचर्य और अभि-वादन ( गुरु को प्रणाम करने की प्राचीन पद्धति ) करने में अवश्य तत्पर रहना चाहिये । मेरे कहे हुए या मेरी अनुमति लेकर कहीं जाना, सोना, बैठना, भोजन करना और अध्ययन करने में तत्पर रहते हुये मेरे लिये प्रिय और हितकारक कार्य करते रहना चाहिये । यदि तुम इसके विपरीत बर्ताव करोगे तो अधर्म होगा तथा ( तुम्हारी पढ़ी हुई ) विद्या निष्फल होकर कहीं भी प्रसिद्ध न होगी ॥ ६ ॥

विमर्श: -यहां गुरु के प्रति शिष्य के कर्तव्य को कहा है 1 आयुर्वेद में पक्ष में तीन बार अर्थात् पांच २ दिन में नख, ढाढ़ी, केश और लोम काटने का उपदेश है । त्रि पक्षस्य नखश्म-श्रुकचरोमाणि वर्धयेत् । अहं वा त्वयि सम्यग्वर्त्तमाने यद्यन्यथादशी स्याम्, एनोभाग्भवेयम्, अफलबिद्यश्च ॥ ७ ॥

( अब गुरु भी अग्निसाक्षी कर प्रतिज्ञा करता है कि ) यदि मैं तेरे ठीक नियमपूर्वक रहने पर यथाक्रम से विद्योपडेश न करू तो मैं पाप का भागी होऊगा तथा मेरी बिद्या निष्फल हो जायगी ॥ ७ ॥

विमर्श: - यहां शिष्य के प्रति गुरु के कर्तव्य को बनाया गया है । पूर्वकाल में गुरु - शिष्य स्वकतव्य पालन में कितने रहते थे यह आज के छात्र और अध्यापकों को सीखना चाहिये । सवत्सरोषिते शिष्ने गुम्न निर्दिशन् । हरते दुष्टन नस्य विन्यस्य बसतो गुरोः ॥ ( इति कूर्मपुराणे )

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१० सुश्रुतसहिता | द्विजगुरुदरिद्रमित्रप्रत्रजितोपनतसाध्वनाथाभ्युपगता-नां चात्मबान्धवानामिव स्वभेपजैः प्रतिकर्त्तव्यमेवं साधु भवति । व्याधशाकुनिकपतितपापकारिणां च न प्रति-कर्त्तव्यम् । एवं विद्या प्रकाशते मित्रयशोधर्मार्थकामांश्च प्राप्नोति ॥ ८ ॥

ब्राह्मण, गुरू, दरिद्री ( गरीब ), मित्र, संन्यासी, पास में पूर्व आये हुये, साधु, अनाथ और अभ्यागत इनकी चिकित्सा अपने बान्धवों की तरह अपनी ओषधियों से करनी चाहिये । किन्तु व्याध ( जाल से पशु - पक्षियों को फसाने वाला ), चिड़ीमार, पतित ( स्वकीय आचार भ्रष्ट या महापातकी ) और पापियों की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । इस नियम का पालन करने से विद्या प्रकाशित होती है तथा मित्र, यश, धर्मं, अर्थ और कामादि अभीष्ट प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥

चरक में इस विषय का वर्णन विमानस्थान के अध्याय ३, में हैं । भवतश्चात्र--कृष्णेऽष्टमी तन्निधनेनी है. शुक्ले तथाऽप्येवमहद्विसन्ध्यम् । अकालविद्युत्स्तनयित्नुघोपे स्वतन्त्रराः क्षितिपत्र्यथासु ॥ ६ ॥

श्मशानयानायतनाहवेषु महोत्सवौत्पातिकदर्शनेपु । नाध्येयमन्येषु च येषु वा नाधीयते नाशुचिना च नित्यम् ॥ १० ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शिष्योपनयनीयो-नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

-कृष्णपक्ष की अष्टमी और कृष्णपक्ष की समाप्ति के दो दिन ( अर्थात् चतुर्दशी तथा अमावस ), इसी प्रकार शुकपक्ष की ( अष्टमी, चतुर्दशी और पूर्णिमा ), सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय, अकाल ( वर्षा ऋतु के बिना ) में विजली चमकना तथा मेघगर्जन होना, अपने ( शरीर ) तथा ( अपने ) सम्बन्धी तथा राष्ट्र और राजा के आपत्काल में, श्मशान में, सवारी ( यात्रा काल ) में, चघस्थान में तथा युद्ध के समय, महोत्सव तथा उत्पात ( भूकम्पादि ) के दिन तथा जिन दिनों में ब्राह्मण अनध्याय रखते हों उन दिनों में एवं अपवित्र अवस्था में अध्ययन नहीं करना चाहिये ॥ ९ -१० ॥ इत्यायुर्वेदतच्चसन्दी पिकाभाषायां द्वितीयोऽध्यायः ।

तृतीयोऽध्यायः ।

अथातोऽध्ययनसम्प्रदानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब यहां से अध्ययनसम्प्रदानीय अध्याय का वर्णन करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत के लिये ) उपदेश दिया था ॥ १-२ ॥ विमर्शः सम्यक् प्रनिमज्य दान मम्प्रदानम्, अध्ययन शास्त्र तस्य मम्प्रदानमित्यध्ययनमन्प्रदान तमधिकृत्य कृनमध्यायमिति । प्रागभिहितं सविंशमध्यायशतं पचसु स्थानेषु । तत्र सूत्रस्थानमध्यायाः पट्चत्वारिंशत्, पोडश निदा-नानि, दश शारीराणि चत्वारिंशचिकित्सितानि अष्टो कल्पाः, तदुत्तरं पट्पष्टिः ॥ ३ ॥

पूर्व अध्यायों में कहा है कि इस महिला के एक सौ बीस अध्याय हैं वे पांच स्थानों में विभक्त हैं । उन में सूत्रस्थान के ४६ अध्याय, निदानम्थान के १६ अध्याय, शारीरस्थान के १० अध्याय, चिकित्सास्थान के ४० अध्याय, कल्पस्थान के । ८ अध्याय तथा इनके पश्चात् उत्तरस्थान के ६६ अध्याय हैं ॥३ ॥

वेदोत्पत्तिः शिष्यनयस्तथाऽध्ययनदानिकः ।

प्रभापणाग्रहरणावृतुचर्याऽथ यान्त्रिकः ॥ ४ ॥

शस्त्रावचारणं योग्या विशिखा क्षारकल्पनम् ।

अग्निकर्मजलोकाख्यावध्यायां रक्तवर्णनम् ॥ ५ ॥

दोपधातुमलाद्यानां विज्ञानाध्याय एव च ।

कर्णव्यधामपक्कैपावालेपो व्रएयुपासनम् ॥ ६ ॥

हिताहितो व्रणप्रश्नो व्रणास्रावश्च यः पृथक् ।

कृत्याकृत्यविधिर्व्याधिसमुद्देशीय एव च ॥ ७ ॥

विनिश्वयः शस्त्रविध प्रनष्टज्ञानिकस्तथा ।

शल्यो दधृतिर्व्रणज्ञानं दूतस्वप्न निदर्शनम् ॥ ८ ॥

पञ्चेन्द्रिय तथा छाया स्वभावाद्वैकृत तथा ।

वारणो, युक्तसेनीय श्रातुरक्रमभूमिको ॥ ६ ॥

मिश्रकाख्यो द्रव्यगणः संशुद्धी शमने च यः ।

द्रव्यादीनाञ्च विज्ञानं विशेपो द्रव्यगोऽपरः ॥ १० ॥

रसज्ञानं वमनार्थमध्यायो रेचनाय च ।

द्रवद्रव्यविधिस्तद्वदन्नपानविधिस्तथा ॥ ११ ॥

सूचनात् सूत्रणाच्चैव सवनाच्चार्थसन्ततेः ।

पट्चत्वारिंशदध्यायं सूत्रस्थानं प्रचक्षते ॥ १२ ॥

वेदोत्पत्ति, शिष्योपनयनीय, अध्ययनसम्प्रदानीय, प्रभाष-णीय, अग्रपहरणीय, ऋतुचर्या, यन्त्रविधि, शस्त्रावचारणीय, योग्यासूत्रीय, विशिखानुप्रवेशनीय, क्षारपाकविधि, अग्निकर्म-विधि, जलौकावचारणीय, शोणितवर्णनीय, दोपधातुमलक्षय-वृद्धि विज्ञानीय, कर्णव्यधवन्धविधि, आमपफैपणीय, व्रणालेप-नवन्ध विधि, प्रणितोपासनीय, हिताहितीय, व्रणप्रश्न, घणस्त्रा-वविज्ञानीय, कृत्याकृत्य विधि, व्याधिसमुद्देशीय, अष्टविधश खकर्मी, प्रनष्टशल्यविज्ञानीय, शल्यापनयनीय, विपरीता. विपरीतत्रणविज्ञानीय, विपरीताविपरीतदूतशकुन स्वप्न निद र्शनीय, पञ्चेन्द्रियार्थं विप्रतिपत्ति, छायाचिप्रतिपत्ति, स्वभाव-विप्रतिपत्ति, अवारणीय युक्तसेनीय, आतुरोपक्रमणीय, भूमि. प्रविभागविज्ञानीय, मिश्रक, द्रव्यसंग्रहणीय, संशोधनशमनीय, द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकविज्ञानीय, द्रव्यविशेषविज्ञानीय, रसः विशेषविज्ञानीय, वमनद्वन्यविकल्पविज्ञानीय, विरेचनद्रव्य-विकल्पविज्ञानीय, द्रवद्रव्यविधि और अन्नपानविधि ये सून्न-स्थान के ४६ अध्यायों के नाम हैं । आयुर्वेद के सूचन करने

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यायः ३ ] सूत्रस्थानम् । I से, क्यों की योग्यम्यान पर रखने से तथा अर्थ समुदाय की करना करनेसे इन ४६ अध्यायों का नाम सूत्रस्थान है ॥ ८-१२ ॥ विमर्शः सूचना अर्थात् कोई विषय एक देशरूप से कहे जाने पर भी उससे अनुवार्य का बोध करा देना जैसे ब्यावर द्रव्यों में व पत्रपुष्पादि से अनुक्त कण्टक । भस्म का भी ग्रहण हो सकता है । स॒न्वेः सूत्रणात् – इससे अलावरमन्द्रियं नारवहि-उनी मुम् । श्रोम सूत्रं विदो विदुः " ॥ इस

श्लोकोच आशय का ग्रहग होना है । जैसे संगेगा व्याधयः ।

इतना मात्र कथन करने से सर्वव्यावियों का सूत्र हो जाता है । मुत्रनादर्यसन्तनैः — हारानचन्द्रकी सुश्रुत में सन्मानार्थ सुन्वनेः ' ऐसा पाठ मानकर सन्धान शब्द का अनुसन्धान या अन्य अर्थ किया है और उदाहरण के लिये औपव के ग्रहग । सेन्य, रम, गुग, वीर्य, विपाक और प्रभाव का बोध किया है । और मद को इन्यनरक माना और द्वय रसगुणादि । के बिना नहीं होता ऐसा अनुसन्धान किया है ।

वातव्याधिक्रमशसि साश्मरित्र भगन्दरः ।

कुटमेहोदरा मूढां विद्रविः परिसर्पणम् ॥ १३ ॥

ग्रन्यिवृद्धिभन्नात्र मुखगेगिकम् ।

हेतुलचणनिर्देशान्निदानानीति षोडश ॥ १४ ॥

वातत्र्यावि, धर्म, अरमरी, भगन्दर कुछ प्रमेह, उदर, गर्भ, विवि, परिसर्प ( त्रिसर्प नाडीस्तन गंग ), ग्रन्थि ( अन्यपच्यर्बुगड ), वृद्धि ( ड्युपगरीपद ), चद्र-रोग, शुक्रदोष, मन और सुखरोग ये सोलह निदान निदान-स्थान के अध्याय है । गोत्ति का हेतु ( कारण ) तथा रोगों के नग का निर्देश ( ज्ञापन ) करने से इन सोलह अध्यायों को ' निदानस्थान ' के नाम से कहे हैं । १३-१४ ॥ विमर्श - हेतुच्छ से रोगजनक कारणों का बोध होता है जैसा कि अमरकोष में कहा है " कारण बोर्ड निदानं खादि-कारणम् ' रोगजनक कारणों में सामन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञा-पराव और परिणाम मुख्य हैं । उन शब्द से जिन तरीकों से व्याधि का ज्ञान हो ( लक्ष्य वायने व्याविनेनेति क्षम ) जैसे निदान, पूर्वरूप, रूप, उपाय और सम्माति इन पांचों से रोग भलीभांति जाना जाता है । निदान शब्द की व्याख्या कई प्रकार से की गई है । निर्दि कविनेनेनि निहानन् निश्रित्य व प्रतिगयने काबिनेनेति निदानम् । रोगनिश्रय-करी निद्रानम् । निर्वायने नियत हलादिननेनि निदा-नम् । वस्तुतस्तु निदान शब्द के मुख्य दो अर्थ हैं । १- : - रोगो त्यत्ति में हेनु को निदान कहते है । ' रोगीलाको हेतुर्निदानम् " हेतुनां कारणं बीजं निदानं त्वादिकारणम् । २ - जिन उपायों से रोगों का स्वरूपज्ञान या निश्चित ( Diagnosis ) हो उसे भी निदान कहते हैं ।

भूतचिन्ता रजःशुद्विर्गर्भाविकान्तिरेव च ।

व्याकरणं च गर्मस्य शरीरस्य च चक्रमृनम् ॥ १५ ॥

प्रत्येकं मर्मनिर्देशः सिरावर्णनमेव च ।

सिराव्यवो धमनीनां गर्भिण्या व्ययकृतिस्तथा ॥ १६ ॥ ।

निर्दिष्टानि दशैतानि शारीराणि महर्षिणा ।

विज्ञानार्थ शरीरम्य भिषजां योगिनामपि ॥ १७ ॥

सर्वभूतचिन्ता, शुक्रगणितशुद्धि, गर्भावक्रान्ति, गर्मव्याक ग्ण शरीरसंस्याच्याकरण, प्रत्येकमर्सनिर्देश, मिरावर्णनविभक्ति, मिराज्यवविवि, वमनीव्याकरण और गर्भिणीच्याकरण ये दा शरीराच्या आदरणीय वन्वन्तरि भगवान् ने वैद्य तथा योगियों को शरीरज्ञान सम्यक हो जाय तदर्थ कहे हैं ॥१५- १७ ॥ विसर्गः– शारीर — गीत यत्तच्छरीरं तत्र भवं दानं शारीर-दानम् । इदं शरीरं कौन्तय क्षेत्रभित्यभिर्वायते ' । ( गीता ) व्याकरण - विवरण या विस्तार । भिषजां शरीरस्य विज्ञानायें - इस वैज्ञानिक युग में प्राच्य शारीर के साथ साथ पाश्चात्त्य अंगप्रत्यग विज्ञान ( Anatomy ) का अध्ययनात्मक और क्रियात्मक ( प्रत्यक्ष ) ज्ञान अर्थार्थी और राज्यप्रज्ञासन्मानार्थी चिकित्सक के लिये परमा-वश्यक है । इसके बिना आयुर्वेद की तथा वैद्यों की उन्नति हो ही नहीं सकती । सुश्रुत में कहा है — ' शरीर चैत्र शास्त्रे च दृष्टार्थं स्वाविशारद. | दृष्टान्यां सन्देहमवानोद्याचरेत्क्रिया ' ॥ चरके -पि — ' शरीरं सर्वया सर्व सर्वदा यो भिषक् । मायुर्वेदं स कार्त्स्न्येन वेट टोक्दम् ॥

त्रिणीचो व्रणः सद्यो भन्नानां वातरोगिकम् ।

महागतिकमर्शासि सारमरिच भगन्दरः ॥ १८ ॥

कुष्टानां महतां चापि मैहिकं पैडकं तथा ।

मधुमेहचिकित्सा च तथा चोदरिणामपि ॥ १ ९ ॥

मूढगर्भचिकित्सा च विद्रवीनां विसर्पिणाम् ।

ग्रन्थिवृद्धद्युपदेशानां तथा च क्षुद्ररोगिकम् ॥ २० ॥

शूकदोषचिकित्सा च तथा च मुखरोगिणाम् ।

शोफस्यानागतानाञ्च निषेधो मिश्रकं तथा ॥ २१ ॥

वाजीकरं च यत् क्षीणे सर्वाबाधशमोऽपि च ।

ess करणञ्चापि स्वभावव्याधिवारणम् ॥ २२ ॥

निवृत्तसन्तापकरं कीर्त्तितव रसायनम् ।

स्नेहोपयौगिकः वेदो वमने च विरेचने ॥ २३ ॥

तयोर्व्यापञ्चिकित्सा च नेत्रवस्तिविभागिकः ॥।

नेत्रवस्तिविपत्सिद्धिन्तथा चोत्तरवस्तिकः ॥ २४ ॥

निरूह्क्रमसंज्ञश्च तथैवातुरसंज्ञकः ।

घूमनस्य विधिश्चान्त्यञ्चत्वारिंशदिति स्मृताः ॥ २५ ॥

प्रायश्चित्तं प्रशमनं चिकित्सा शान्तिकर्म च ।

पर्यायास्तस्य निर्देशाञ्चिकित्सास्थानमुच्यते ॥ २६ ॥

त्रिणीय, सद्योग, भम, वातव्याधि, महावातव्याधि, अर्ज, अरमरी, भगन्दर, कुट, महाकुछ, प्रमेह, प्रमेह पिडका, मधुमेह, उदर, सूढगर्भ, विद्रधि, विसर्प ( त्रिसूर्य-नाडीस्तनरोग ), ग्रन्यि ( अन्य्यपच्यर्बुद्गल्याण्ड ), वृद्धि ( वृद्धि, उपदंश, रीपद ), क्षुद्ररोग, शूकरोग, मुखरोग, शोक, अनागताबाधप्रतिषेधनीय, मिश्रक, क्षीणवलीयवाजीकरण, सर्वाबाधमनीय रसायन, मेघायुष्कामीय रसायन, स्वभाव-व्याविप्रतिधनीय रसायन, निवृत्तसन्तापीय रसायन, स्नेहो -पयौगिक, स्वेदावचारणीय, यमनविरेचनसाध्योपद्रव, वमन-

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१२ सुश्रुतसंहिता विरेचनव्यापत्, नेत्रवस्तिप्रमाणप्रविभाग, नेत्रवस्तिव्यापत्, अनुवासनवस्ति, निरूहक्रम, आतुरोपद्रव और धूम नस्य कव लग्रह इस तरह ये ४० चिकित्सा अध्याय इस चिकित्सा स्थान में हैं । प्रायश्चित्त, प्रशमन, चिकित्सा और शान्तिकर्म ये सब शब्द परस्पर पर्यायवाचक हैं । इनका व्याख्यान इन अध्यायों करने से इसको ' चिकित्सास्थान ' कहते हैं ॥ १८-२६ ॥ विमर्शः -- प्रत्यश्चिप्तं- ' प्रायो नाम तप प्रोक्त चित्त निश्चय-' उच्यते । तपोनिश्चयसयोगात्प्रायश्चित्तमितीयते ' ॥ चक्रपाणिदन्तेन च-' प्रायश्चित्तमिति भेषजसंज्ञा, प्रायश्चित्तापनस्याऽधर्मकार्यव्याधिहर-स्वेन । तथा च चग्केऽपि - ‘ चिकित्सित व्याधिहर पथ्य साधनमोप-धम् । प्रायश्चिन्त प्रशमनं प्रकृतिस्थापनं हितम् ॥ ' विद्यापजनामानि । का नाम चिकित्सा - ' यामि क्रयाभिर्जायन्ते शरीरे धातव समा । सा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद्भिषजा स्मृतम् ॥ चतुर्णी मिपगादीना शस्ताना धातुवैकृते । प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्थी चिकित्से-त्यभिधीयते ' ॥ ' संक्षेपत क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम् । या -दोर्ण शमयति नान्य व्याधिं करोति च । सा क्रिया न तु या व्यापि हुरत्यन्यमुदीरयेत् ’ ॥

अन्नस्य रक्षा विज्ञानं स्थावरस्येतरस्य च ।

सर्पदष्टविषज्ञानं तस्यैव च चिकित्सितम् ॥ २७ ॥

दुन्दुभेर्मूषिकाणाञ्च कीटानां कल्प एव च ।

अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषभेपजकल्पनात् ॥२८ ॥

अन्नपानरक्षाविज्ञान, स्थावरविपविज्ञान, जङ्गमविप विज्ञान, सर्पदष्टविपविज्ञान, सर्पदष्टविपचिकित्सित, दुन्दुभि स्वनीय, मूपिककल्प और कीटकल्प, इस तरह इन आठ अध्यायों में विपचिकित्सा की कल्पना होने के कारण इनको

' कल्पस्थान ' कहते है । २७-२८ ॥

अध्यायानां शतं विंशमेवमेतदुदीरितम् ।

अतः परं स्वनाम्नैव तन्त्रमुत्तरमुच्यते ॥

श्रधिकृत्य कृतं यस्मात्तन्त्रमेतदुपद्रवान् । औपद्रविक इत्येष तस्याग्न्यत्वान्निरुच्यते इस प्रकार पूर्व प्रतिज्ञानुसार एक सौ वीस वर्णन किया गया तथा यहा से भागे अपने नाम तन्त्र ' का वर्णन किया जाता है ॥ व्रणों के ज्वरादि उपद्रवों का विचार करने २६ ॥ ॥ ३० ॥

अध्यायों का से ही ' उत्तर के लिये यह तन्त्र बनाया गया है इस लिये इस तन्त्र के प्रारम्भिक अध्या य को ' औपदविक अध्याय ' कहते हैं ॥ २ ९ -३० ॥

सन्धौ वर्त्मनि शुक्ले च कृष्णे सर्वत्र दृष्टिपु ।

संविज्ञानार्थमध्याया गदानां तु प्रति प्रति ॥ ३१ ॥

चिकित्साप्रविभागीयो वाताभिष्यन्दवारणः ।

पैत्तस्य श्लैष्मिकस्यापि रौधिरस्य तथैव च ॥ ३२ ॥

लेख्यभेद्य निषेधौ च छेद्यानां वर्त्मदृष्टिषु ।

क्रियाकल्पोऽभिघातश्च कर्णोत्थास्तचिकित्सितम् ॥३३ ॥

घ्राणोत्थानाच विज्ञानं तद्गदप्रतिषेधनम् ।

प्रतिश्यायनिषेधश्च शिरोगद विवेचनम् ॥

चिकित्सा तद्दानाञ्च शालाक्यं तन्त्रमुच्यते ॥ ३४ ॥

सन्धि, वर्त्म, शुक्ल, कृष्ण, सर्वगत और दृष्टि इनके रोगों को जानने के लिये प्रत्येक के लिये पृथक २ अध्याय कहे गये हैं । इस प्रकार ये ६ अध्याय तथा चिकित्सित प्रविभाग विज्ञानीय, वाताभिप्यन्दप्रतिषेध, पित्ताभिष्यन्दप्रतिपेध, | श्लेष्माभिप्यन्दप्रतिपेध, रक्ताभिप्यन्दप्रतिपेध, लेख्यरोग प्रतिपेध, भेद्यरोगप्रतिषेध, छेद्यरोगप्रतिषेध, पच्मकोपप्रतिषेध, दृष्टिगतरोगप्रतिपेध, क्रियाकल्प, नयनाभिघातप्रतिषेध, कर्ण -गतरोगविज्ञानीय, कर्णगतरोगप्रतिषेध, नासागतरोगविज्ञा । नीय, नासागतरोगप्रतिपेध, प्रतिश्यायप्रतिषेध, शिरोरोगविज्ञा-नीय, शिरोरोगप्रतिषेध इन २६ अध्याया को ' शालाक्यतन्त्र ' कहते हैं । अर्थात् इनका ' शालाक्यतन्त्र ' में समावेश है ॥३१-३४ नवग्रहाकृतिज्ञानं स्कन्दस्य च निपेधनम् ॥ ३५ ॥

अपस्मार कुन्योश्च रेवत्याश्च पुनः पृथक् ।

पूतनायास्तथाऽन्धाया मण्डिका शीतपूतना ॥ ३६ ॥

नैगमेपचिकित्सा च ग्रहोत्पत्तिः सयोनिजा ।

कौमारतन्त्रमित्येतच्छारीरेषु च कीर्त्तितम् ॥ ३७ ॥

नवग्रहाकृतिविज्ञानीय, स्कन्दग्रहप्रतिपेध, स्कन्दापस्मा-रप्रतिषेध, शकुनिप्रतिषेध, रेवतीप्रतिषेध, पूतनाप्रतिषेध, अन्धपूतनाप्रतिषेध, शीतपूतनाप्रतिषेध, सुखमण्डिकाप्रतिषेध, नैगमेपप्रतिषेध, ग्रहोत्पत्ति, योनिव्यापव्यतिषेध एव शारीर-स्थान में वर्णित रज. शुद्धि, गर्भावक्रान्ति आदि ' कौमारतन्त्र ' है । विमर्श. - आयुर्वेदिक ' कौमारभृत्य ' में योनिव्यापच्चिकित्सा | ( Gynaecology ), प्रसूतितन्त्र ( Midwifery ) और पाल • । रोग चिकित्सा ( Paediatrics ) इनका समावेश होता है । डाक्टरी में ये तीनों विभाग स्वतन्त्र है । हातिसहिोक्त - कुमार-तन्त्र व्याख्या -- गर्भोदकमविज्ञान सूतिकोपक्रम तथा । बालाना रोगश-मन क्रिया बालचसितम् ॥ ' श्रीगणनाथसेनजी ' ने प्रसूतितन्त्र को ' शारीर ' से तथा मूढगर्भचिकित्सा को ' शल्यतन्त्र ' में समा • विष्टकर प्रसूतितन्त्र को ' कौमारभृत्य ' से भिन्न माना है ।

ब्रातिसारशोषाणां गृल्महद्रोगिणामपि ।

पाण्डूनां रक्तपित्तस्य मूर्च्छाया. पानजाश्च ये ॥ ३८ ॥

तृष्णायाश्छदिहिकाना निषेधः श्वासकासयोः ।

स्वरभेदचिकित्सा च कृम्युदावर्त्तिनोः पृथक् ॥ ३६ ॥

विसूचिकाऽरोचकयोर्मूत्राघातविकृच्छ्रयोः ।

इति कायचिकित्सायाः शेषमत्र प्रकीर्त्तितम् ॥ ४० ॥

ज्वर, अतिसार, शोप, गुल्म, हृदयरोग, पाण्डुरोग, रक्त-पित्त, मूर्च्छा, पानात्यय, तृष्णा, छर्दि, हिक्का, श्वास, कास, स्वरभेद, कृमिरोग, उदावर्त्त, विसूचिका, अरोचक, मूत्राघात | और मूत्रकृच्छ्र इन शेष काय रोगों की चिकित्सा का इस ' उत्तर-तन्त्र ' के ३ ९ वें अध्याय से ५ ९ वें अध्याय तक वर्णन कर दिया है ॥ ३८-४० ॥

श्रमानुषनिषेधश्च तथाऽऽपस्मारिकोऽपरः ।

उन्माद्प्रतिपेधश्च भूर्तावद्या निरुच्यते ॥ ४१ ॥

अमानुषोपसर्गप्रतिषेध, अपस्मारप्रतिषेध और उन्मादः । प्रतिपेध इनको ' भूतविद्या ' कहते हैं ४१ ॥

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श्रव्ययः ३ ] सूत्रस्थानम् । १३

रसभेदा स्वम्यवृत्तं युक्तयन्तान्त्रिकाञ्च याः ।

दोषभेदा इति ज्ञेया व्यायात्तत्रभवा ॥ ४२ ॥

रमभेद्रविकल्प, स्वस्यवृत्त, तन्त्रयुक्ति और दोषमंददि कल्प ये चार अध्याय ' उत्तरतन्त्र ' के भूषणभूत हैं ॥ २२ ॥

श्रेष्टत्वादुत्तरं ह्येवचन्त्रमाहुर्महर्षयः ।

वह्वर्थसङ्ग्रहाच्छ्रेष्टमुत्तरचापि पश्चिमम् ॥ ४३ ॥

महर्षियों ने इसु तन्त्र को श्रेष्ट होने के कारण ' उत्तर ( श्रेष्ठ ) तन्त्र ' कहा है क्योंकि इस तन्त्र में अनेक शाळाच्या दिक तन्त्रों के अर्थों का सङ्ग्रह है । पश्चिम अर्थात् अन्तिम होने के कारण भी इसे ' उत्तरतन्त्र ' कहते हैं ॥ २३ ॥

शालाञ्चतन्त्रं कौमारं चिकित्सा कायिकी चया ।

मृतविद्येति चत्वारि तन्त्रे नूत्तरसंहिते ॥ ४४ ॥

वाजीकर चिकित्सासु रसायनविधित्तया ।

विषतन्त्रं पुनः कल्पाः शन्यज्ञानं समन्ततः ॥ १५ ॥

इत्याङ्गमिदं तन्त्रमादिदेवप्रकाशितम् ।

विविनाऽधीत्य खाना भवन्ति प्राणदा भुवि ॥ ४६ ॥

शालाक्यतन्त्र, कौमारतन्त्र, कायचिकित्सा और भूतविद्या ये चार विषय ' उचरतन्त्र ' में वर्णित हैं । वाजीकरण और रसा • विधे ' चिकित्सास्थान ' में वर्णित है । ' कल्पस्थान ' में विष तन्त्र का वर्णन है और धनशास्त्र का वर्णन सर्वत्र किया है । इस तरह लादिदेव ( भगवान् बन्वन्तरि ) द्वारा प्रकाशित । इस वटा ( सुश्रुत ) को यथाविधि पढकर चिकित्पादि - का प्रयोग करनेवाले मनुन्य ( वैद्य ) संसार में रोगियों के प्रागरक होंगे | 22-१६ ॥

एतद्वृचवश्यमध्येचम्, अवीत्य च कर्माप्यवश्य ।

मुपासितव्यम्; उभयत्रो हि भिषग् राजार्हो भवति ॥ १७ ॥

इस तन्त्र को अवश्य हो पढ़ना चाहिये एवं पढकर प्रत्यज्ञकर्म ( रसरसायन - निर्माण, चीरा- काही तया कायचि कित्सारूप कार्य ) मी निश्चय करना चाहिये क्योंकि उमयज्ञ यदि शात्र और कर्मानुभवी वैद्य ही राजाओं की चिकित्सा में सफल होने से सम्मानित होता है ॥ 23 ॥

भवन्ति चात्र-यन्तु केवलशास्त्रज्ञः कर्मन्त्रपरिनिष्ठितः ।

समुझत्यातुरं प्राप्य प्राप्य मीरुरिवाहवम् ॥ ४८ ॥

यन्तु कर्मसु निष्णातो वाच्छावहिष्कृतः ।

स सत्सु पूजां नाप्नोति वयं चार्हति राजतः ॥ ४६ ॥

उभावेतावनिपुगात्रसमर्थौ स्वकर्मणि ।

अर्थवेदवरावेतावेकपक्षात्रित्र द्विजौ ॥ ५० ॥

जो केवल को जानता है किन्तु प्रत्यकर्म में निपुग नहीं है वह रोगी के चिकित्सार्थ आने पर कर्तव्याकर्त व्य चिकित्सारूप कार्य में व्यामोह को प्राप्त होता है जैसे डरपोक आदमी युद्ध में जाकर घबरा जाता है । इसी तरह जो वैध निरन्तर कर्मोपासनाजन्य प्रगरमता से प्रत्यक्ष कर्म मैं तो नियुग हो किन्तु शास्त्रीयज्ञान में शून्य हो उसको सजनों ( विद्वान् वैद्यों ) में पूजा नहीं होती है । और वह राजा से वध का दण्ड पाने के योग्य है । ये दोनों प्रकार के व्यक्ति ( चिकित्सक ) अर्थात् एक शास्त्र में निपुण किन्तु क्रिया से अनिपुण और दूसरा क्रिया में निपुण किन्तु शास्त्र में अनिपुण एक २ पत्र को धारण करने वाले दो पक्षी की तरह आवे वेद ( ज्ञान ) को जानने वाले समय पड़ने पर अपने अपने कार्य में असमर्थ और अयोग्य प्रमाणित होते हैं ॥ १८-५० ॥

घोषोऽमृतकल्पान्तु शत्राशनिविषोपमाः ।

भवन्त्यनैरुपहतास्तस्मादेतान् विवर्जयेत् ॥ ५१ ॥

अमृत के समान प्रभाव करने वाली ओषधियां ( चिकि • त्सोपयोगी समस्त द्रव्य ) मूर्ख वैद्यों के द्वारा दी जाने पर अम्न, वज्र ( विद्युत्पात ) और विषके समान नुक्रमान करती हैं इस लिये इन ( उपर्युक्त शास्त्र ज्ञान रहिन मूर्ख चिकित्सकों ) का परित्याग करना चाहिये ॥ ५१ ॥

विमर्गः - कुछ टीकाकारों ने " एतान विवर्जयेत् " इसका अर्थ अज्ञद्वारा प्रयुक्त ओषवि किया है वह भी ठीक है जैसा कि चरक

में लिखा है - यथाविधं व्याच यथानिरवानिर्यथा ।

तपनमविज्ञातं विद्यानमनृतं यथा ॥

योगादपि विषं चामुत्तमं मेपनं भवेत् ।

मेष चानिर्युकं ती सन्नद्यने विषम् ॥

( च ० सू ० अ ० २ ) ॥

चरके मूर्खवैद्यनिन्दा - श्रुतदृष्टक्रियाकालमात्राद्या नवहिष्कृता ।

वर्जनीया हि ते नृत्योश्चरन्तोऽनुचरा नुवि ॥

स्नेहादिध्वनभिन्ना ये छेद्यादिषु च कर्मसु ।

ते निहन्ति जनं लोभात् कुवैद्या नृपदोषतः ॥ ५२ ॥

जो बंध स्वेहन - स्वेदनपूर्वक पञ्चकमों में और छेद्य, भेद्य आदि अष्टविध कर्म करने में असमर्थ हैं वे वैद्य ( न्य के ) लोभ से ( चिकित्सा में प्रवृत्त होने पर ) मनुष्यों को मार डालते हैं । प्रान ' राजा के दोष से ही कुध का जन्म ( प्रचार ) होता है ॥ ५२ ॥

विमर्श: - राजा ऐसे चिकित्सकों को चिकित्सा न करने दे और करे तो भारी दण्ड देवें तो कदापि संसार में कुवैद्यों का प्रचार न हो । वर्तमान में प्रतिदिन समाचार - पत्रों में झूठे विज्ञापन तथा सड़कों पर मजमा लगाने वाले एवं अष्टाद्गायु · वेद में प्रत्यक्ष - क्रियाशून्य लोगों की भरमार है । इसी से आयुर्वेद बदनाम है । यह वर्तमान शासन प्रणाली का दोष है ।

वस्तूभयत्रो मतिमान् स समर्थोऽर्थसावने ।

हवे कर्मनिर्वोढुं द्विचक्रः स्यन्दनो यथा ॥ ५३ ॥

जो वैद्य और प्रत्यक्षज्ञान को भलो भावि जानता है और साथ साथ मतिमान् ( ऊहापोहचन सहज बुद्धियुक्त ) भी | है वही सुचिकित्सारूपी नयं ( प्रयोजन ) के साधन में समर्थ हो सकता है । जैसे दोनों पहियोंवाला रय युद्ध में कार्य करने में समर्थ होता है || विमर्शः - अर्थसाधन से आयुर्वेद के दो प्रयोजन गृहीत होते हैं । ' स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरन्य विकारप्रशमनच ” । चिकित्सा में सफलता प्राप्त करने के लिये चिकित्सक को केवल शात्र और कर्माभ्यास में ही निपुण होना पर्याप्त नहीं है किन्तु उसे बुद्धिमान् होना भी आवश्यक है । चक्रेप्युक्त्त् — ' शाल

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सुश्रुतसंहिता | १४ ज्योतिः प्रकाशार्थ दर्शन बुद्धिरात्मन । ताभ्या भिपक मुयुक्ताभ्या चिकित्सन्नापराध्यति ॥ ( सू ० अ ० ९ ) अथ वत्स! तदेतदध्येयं यथा तथोपधाग्य मया प्रोच्यमानम् - अथ शुचये कृतोत्तरासङ्गायाव्याकुला-योपस्थितायाध्ययनकाले शिष्याय यथाशक्ति गुरुरुप -दिशेत् पदं पादं श्लोकं वा । ते च पदपादश्लोका भूयः क्रमेणानुसन्धेयाः । एवमेकैकशो घटयेदात्मना चानुप-ठेत् | अद्भुतमविलम्वितमविशङ्कितमननुनासिकं व्य-काक्षरमपीडितवर्णमतिभ्रष्ट हस्तैरनभिनीतं सुसंस्कृतं नात्युच्चैर्नातिनीचैश्च स्वरैः पठेत् । न चान्तरेण कश्चिद् व्रजेत् तयोरधीयानयोः ॥ ५४ ॥

हे वत्स सुश्रुत! विधि से इस आयुर्वेद शास्त्र को पढ़ना चाहिये वह विधि मैं बतलाता हूँ उसे श्रवण कर हृदय । मैं धारण करो । गुरु का कर्तव्य है कि वह शौच, स्नान सन्ध्या-दि नित्यकमों से पवित्र हुये, उत्तरीय वस्त्र धारण किये हुये, अन्याकुल अर्थात् शान्त चित्तवाले तथा अध्ययन के समय पढ़ने के लिये उपस्थित हुये शिष्य को यथाशक्ति पद ( श्लोक का एक छोटा अवयव ), पाद ( श्लोक का चौथा भाग ) अथवा पूरा श्लोक पढावे । तदनन्तर पढाये हुये पद, पाद और श्लोक को चार बार क्रम से एक साथ मिला लेवे । इस प्रकार एक एक छात्र को ( या श्लोक को ) पढावे पश्चात् अध्ययन के अन्त ( पार ) जाने का इच्छुक छात्र सदा वाणी के सौष्ठव ( अर्थात् स्पष्टोच्चारण और हित - मधुर भाषण ) में, अर्थविज्ञान में तथा धाष्टर्य तथा क्रियानैपुण्य प्राप्ति में, शास्त्र के अभ्यास और वान्छितार्थ की सिद्धि में सदैव प्रयत्न करता रहे ॥ ५६ ॥

इत्यायुर्वेदतस्वसन्दीपिकाभापायां तृतीयोऽध्यायः ।

चतुर्थोऽध्यायः ।

अथातः प्रभापणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अव यहां से प्रभापणीय नामक अध्याय का व्याख्यान किया जाता है । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श: -- पढ़े हुये शास्त्र का विशेष ध्यान से अर्थानुस. न्धानपूर्वक जो व्यारयान किया जाता है उसे ' प्रभाषण ' कहते है । अधीतशास्त्रस्य प्रकर्पेणार्थानुसन्धानपूर्वक व्याख्यान प्रभाषणम् ।

तदधिकृत्य कृतोऽध्यायस्तन् ।

अधिगतमध्यध्ययनमप्रभाषितमर्थतः खरस्य चन्द्र-। नभार इव केवलं परिश्रमकर भवति ॥ ३ ॥

सम्पूर्ण पढ़े हुये शास्त्र को फिर से उसका तत्वरूप में अर्थ स्वय पढे । न अधिक शीघ्रता से, न ज्यादा विलम्ब से तथा । न जाना जाय तो वह गर्दभ के पीठ पर रखे हुये चन्दन के नि'शङ्क हो कर अनुनासिकोच्चारण न करते ( घृवे की तरह न बोलते ) हुये स्पष्ट शब्दोच्चारणपूर्वक अक्षरों के ऊपर अधिक जोर न लगा कर ( अर्थात् मव्यस्वर से ) तथा नेत्र, भ्रुकुटी, ओष्ट तथा हाथों से किसी प्रकार का विकृत भाव ( हास्य, कटाक्षादि ) न दिखाते हुये, सुसस्कृत ( अनुस्वार विसर्गादि सहित ) रूप से, न बहुत जोर से और न अधिक धीरे स्वरों से पढ़े एव गुरु और शिष्य के अध्ययन करते समय दोनों के मध्य से कोई न जावे ॥ ५४ ॥

त्रिमर्श. - यहां पर प्राचीन पठन - पाठन विधि का वर्णन किया गया है । प्राचीनकाल में आजकल के समान पुस्तकें नही रहती थीं । इसलिये सम्पूर्ण शास्त्र कण्ठस्थ करने पढते थे और इसीलिये उपर्युक्त विशिष्ट पद्धति से अध्ययन करना पढ़ता था । अन्तरागननेऽनध्याय – पशुमण्डूकमानरश्वसर्पनकुटा सुभि । अन्तरागमने विद्यादनध्यायमहर्निशम् ॥ ( ननु ० अ०४-२२६ )

भवतश्चात्र-शुचिर्गुरुपरो दक्षस्तन्द्रानिद्राविवर्जितः ।

पठन्नेतेन विधिना शिष्यः शात्रान्तमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥

शौच - स्नानादि से पवित्र, गुरुभक्त, दक्ष, तन्द्रा तथा निद्रा से रहित हो कर जो छात्र इस विधि से पठन करता है वह शास्त्र में पारङ्गत हो जाता है ॥ ५५ ॥

वाक्सौष्ठवेऽर्थविज्ञाने प्रागल्भ्ये कर्मनैपुणे ।

तदभ्यासे च सिद्धौ च यतेताध्ययनान्तगः ॥ ५६ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽध्ययनसम्प्रदानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

MCG । भार की भांति परिश्रमकारक या निरर्थक होता है ॥ ३ ॥

भवति चात्र-यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य । एवं हि शास्त्राणि बहून्यघीत्य चार्थेषु मूढाः खरवहन्ति ॥ ४ ॥

जिस तरह चन्दन की लकड़ी को वहन करने ( ढोने ) चाला गदहा केवल उसके भार का ही ज्ञान रखता है किन्तु चन्दन ( की सुगन्ध और शीतादि आह्लादजनक गुणों ) को नहीं जान सकता उसी प्रकार अनेक शास्त्रों का अध्ययन कर | लेने वाले किन्तु उन शास्त्रों के तात्त्विक अर्थों में मूढ पुरुष ( छात्र ) केवल उन गढ़ों की तरह ग्रन्यभार मात्र के वाहक है ॥ ४ ॥

तस्मात् सविंशमध्यायशतमनुपदश्लोकमनुवर्णयित-व्यमनुश्रोतव्यञ्च । कस्मात्? सूक्ष्मा हि द्रव्यरसगुण-चीर्यविपाक दोपधातुमलाशयमर्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थिग-र्भसम्भवद्रव्यसमूह विभागास्तथा प्रनष्टशल्योद्धरणत्रण-| विनिश्चयभग्नविकल्पाः साध्ययाप्यप्रत्याख्येयता च विका-राणामेवमादयश्चान्ये सहस्रशो विशेषा ये विचिन्त्यमाना-विमलविपुलबुद्धेरपि बुद्धिमाकुलीकुर्युः किं पुनरल्पबुद्धेः । तस्मादवश्यमनुपदपादश्लोकमनुवर्णयितव्यमनुश्रोतव्यच ॥ इस लिये एक सौ बीस अध्यायों के एक एक पद, एक एक चरण और प्रत्येक श्लोक का गुरु वर्णन ( अर्थसहित व्यारयान ) करे और शिष्य श्रवण करे क्योंकि स्थावरादि द्रव्य, मधुरा-

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अध्यायः ८-५ ] सूत्रस्थानम् । I स्टादि रस, गुर्वादिगुन, श्रीतोष्णादिवीर्य, मधुराद्विविपाक, वातादि दोष, रसादि घाट. सूत्रामित्र, वानादि के काय ( स्थान ) तथा मर्म, पिरा, स्नायु, सन्धि अस्थि! शुक्रार्नवादि गर्मीव्पादक समूह एवं प्रनष्ट अन्य का आह का विनिश्रय, करन के क्षेत्र तथा रोगों के साथ याम्य और प्रत्याना तथा इन के अतिरिक्त हजारों सूक्ष्म विपन होते हैं जिनका ठीक विचार करने पर विनय ( निर्मक ) । और विपुल ( विशाल ) बुद्धिवाले मनुष्य की बुद्धि को भी के व्याकुल कर देवें हैं । फिर स्वज्य बुद्धिवाले का तो ठिकाना । ही क्या है । नए आचार्य निश्वन ही एक २ पत्र, पाठ नया

श्लोक का वर्णन को रशिष्य श्रवण करे ॥ ५ ॥

अन्यशान्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपत्नीनानामर्थत्र-शात्तेषां तद्विद्येभ्य एव्याख्यानमनुतव्यम् । क्रम्मां-त? न ह्येकस्मिन् शात्रे शक्यः सर्वशात्रागामवरोधः कर्त्तुम् ॥ ६ ॥

प्रयोजनवच यहां लिखे हुये अन्य शास्त्रों के अर्थों को उन शात्रों के विशेषज्ञों से ही श्रव को क्यों कि एक शास्त्र में अन्य आवश्यक सूत्र शात्रों का विस्ताररूप से समावेश करना क्य नहीं है ॥ ६ ॥

भवन्ति चात्र-एक शास्त्रमवीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ।

तस्माद्वहुश्रुतः शान्त्रं विजानीयाचिकित्सकः ॥ ७ ॥

केवल एक शघ्र को पढनेवाला मनुष्य उस शाम्र के सिद्वान्तों को भी ठीक नहीं जान सकता है अतएव चिकित्सक आवश्यक अन्य शखों का प्रथम अभ्ययन कर पश्चात इस आयुर्वेद मन्त्र को पढ़े ॥ ७ ॥

विमर्श - आयुर्वेद में पूर्ण पाण्डित्य प्राप्त करने के दिये प्रवेशार्थी छात्र को अन्य आवश्यक शास्त्र प्रथम पढ लेना चाहिये । व्याकरण, साहित्य, न्याय तथा सांय का ज्ञान संस्कृत की दृष्टि से तथा रखा कीता के लिये रसा यनशास्त्र ( Chemisžry ) पदार्थविज्ञान के लिये भौतिकवि ज्ञान ( Paysics ), इव्यगुण मात्र के लिये वनस्पतिशास्त्र । ( Boisy ) तथा शारीरशास्त्र और Anatomy के पूर्वज्ञान के लिये बन्तुना ( Zoology ) पढ़ना तस्ली है । शालं गुरुमुखोद्वीर्गमादाद्योपान्य् चासकृन् I यः कर्म कुत्ते वैद्यः स वैद्योऽन्ये तु तस्कराः ॥ ८ ॥

गुरु के सुख से कहे हुये शात्र को पढ वर तथा अनेक बार उसका प्रन्यामक और क्रियात्मक अभ्यास ( अनुभव ) कर के जी चिकित्सारूपी कार्य करता है वही वैद्य है इसके विपरीत अन्य सब चोर हैं ॥ ८ ॥

विमर्श: - आयुर्वेद उपवेद होते हुवे भी शान भी है । शास्त्रपरिभाषा – धाननाच्यंसनाच्चैव चान्नमिनभिवयते । रो गान् शान्तीति शानम् । आयुरारोग्यदर्शनेन धर्मार्थकामादीना शासनादा शान्नम् । नरणात् श्राविव शानम् । “ शन ज्योतिः प्रक्राद्यार्थम् ” सर्वस्य लोचनं शान्तं यत्य नाम्यन्य एव सः । आज अविकतर हिन्दी के ग्रन्थों को बांच कर तेली, तमोली, भिस्ती, आदि भी अपने को चिकित्सक घोषित कर देने हैं तथा ये अन अनेक पोधे तथा श्रीणियां जुटा कर भव्य दवाखाना खो देते हैं । इसी से आयुर्वेद, अवैज्ञानिक नाम से कठिन है । शात्र ऐसे वैयों की निन्दा करता है । ' भव्य-डोपः पुनः पखकः । वैद्य लमन्ते ये समान्ने प्रतिक. ' ॥ ऐसे चिकित्सकों को फांसी दे देनी चाहिये । ' स यो व्यमईति । मद्यनशसा - ये तु शास्त्रविदो दक्षा. शुचयः कोविदाः । विदुला जितात्मानन्नेन्यो नियं कृतं नमः ॥ चोपवेनयमारभ्रं सौश्रुतं पौष्कलावतम् 1 । शेषाणां शल्यतन्त्राणां मूलान्येतानि निर्दिशेत् ॥ ६ ॥

! इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने प्रभाषणीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

औपवेव, और, मौत और पौष्कलावत ये चार तन्त्र क्षेत्र ( अन्य ) सर्व शल्यतन्त्रों के मूल ( प्रधानतया ) है ॥ ९ ॥

विमर्श - अन्य विज्ञान में दक्षता प्राप्त करने के लिये इन चार तन्त्रों को पढना चाहिये परन्तु खेद है कि ये चारों तन्त्र अप्राप्य हैं । वर्तमान प्रतिसंस्कृत सुश्रुत ' सौश्रुत तन्त्र ' से भिन्न

है यह भी इसी ग्लोक से निर्विवाद मित्र होता है ।

इत्यायुर्वेदतत्त्वमन्दीपिकाभाषायां चतुर्थोऽध्यायः ॥

पञ्चमोऽध्यायः ।

अथातोऽयोपहृरणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब यहां से ' अग्रो पहरणीय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्ग: गानने टहरणं येषा यन्त्रनादीनां तान्यो-पहरणानि नान्यधिकृत्य कृतोऽव्यायोऽग्रोव्हरगीयत्वमिति चकः ।

त्रिविधं कर्म - पूर्वकर्म, प्रधानकर्म, पश्चात्कर्मेति ।

तद्वद्याधिं प्रति प्रत्युपदेच्यामः ॥ ३ ॥

कर्म तीन प्रकार का होता है । पूर्वकर्म, प्रधानकर्म और पश्चात् कर्म तथा इन का उपदेश प्रत्येक व्याधि के वर्णन करते । समय किया जायगा ॥ ३ ॥

विमर्श: - ' नाहिरेकान्तं पूर्वकर्म व्रणस्य च । पाटनं रोपण | बच्च प्रधान कर्म तत्स्मृतम् ॥ बलवर्णाग्निकार्यन्तु पश्चात्कमं समादि-' दोन ' | ' प्रधानकर्मफलानुवृत्तिर कर्म पश्चात्कर्म ' प्रति हारागचन्द्रः । दादरी में भी तीन कर्म प्रधान हैं । लंबन, विरेचन, वस्ति तथा कर्मस्थानसशोधन ( Sterilization ) इन्हें पूर्वकर्म ( Preparation of the Pationt ) कहते हैं । प्रधान कर्म में मुख्य अत्रक्रिया है जिसे Main operation कहते हैं । व्रणि-ढोपचारादि उपाय तथा अगचिकित्सा पश्चात्कर्म After treatment है ।