श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 521–530

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 521–530

पृष्ठ 521

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II सुश्रुतसंहिता प्रवेश करना चाहिये और अधोवायु निकलने के लिए, मध्य में छेद वाली, चमड़े की गोफणा बन्धन ( T. Bandage ) से पट्टी बाँधनी चाहिये तथा धीरे - धीरे स्वेदन करना चाहिये ॥ ६१ ॥

क्षीरे महत्पञ्चमुलं मूषिकां चान्त्रवर्जिताम् ॥ ६२ ॥

पक्त्वा तस्मिन् पचेत्तैलं वातघ्नौपधसंयुतम् ।

. गुदभ्रंशमिदं कृच्छ्रं पानाभ्यङ्गात् प्रसाधयेत् ॥ ६३ ॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने क्षुद्ररोगचिकि • ।

त्सितं नाम विशोऽध्यायः ॥ २० ॥

दूध में बृहत् पञ्चमूल तथा आंतरहित चूहे को पकाकर, इस दूध के द्वारा, वातघ्न औषधियों के कल्क के साथ, तेल पाक किया जावे । इस तैल के पीने तथा लगाने से कष्ट साध्य गुदाश रोग नष्ट होता है ॥ ६२-६३ ॥ इस्यायुर्वेदतत्त्व संदीपिकाभापाटीकायां विंशोऽध्यायः ॥२० ॥

एकविंशतितमोऽध्यायः अथातः शुकदोपचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके अनन्तर शुक रोग की चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसाकि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रमृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥

संलिख्य सर्पपीं सम्यक् कपायैरवचूर्णयेत् ।

कपायेष्वेव तैलं च कुर्वीत व्रणरोपणम् ॥ ३ ॥

सर्पपीचिकित्सा -- सर्पपी को भली भाँति खुरच कर कपाय वृक्षों का चूर्ण ( मिश्रकोक्त शोधन द्रव्य ) पर लगाना चाहिये तथा व्रण रोपण के लिए, कपाय द्रव्यों के कल्क के साथ ही तैल पाक करना चाहिये ॥ ३ ॥

अष्ठीलिकां जलौकोभिर्ग्राहयेच पुनः पुनः ।

तथा चानुपशाम्यन्तीं कफप्रन्थिवदुद्धरेत् ॥ ४ ॥

अष्टीलिका - चिकित्सा - कुशल चिकित्सक, अष्ठीलिका में जोक लगाकर वारवार रक्तमोक्षण करावे तथा इस प्रकार शान्त न होने वाली अष्टोलिका को कफज ग्रथि की भाँति शस्त्र से काट कर निकाले ॥ ४ ॥

स्वेदयेद् ग्रथितं शश्वन्नाडीस्वेदेन बुद्धिमान् ।

सुखोष्णैरुपना सुस्निग्धैरुपनाहयेत् ॥ ५ ॥

प्रथित - चिकित्सा - युद्धिमान् वैद्य प्रथित में नादी स्वेद तिन्दुक ( तेंदू ) और आमड़े से सिद्ध तैल के द्वारा रोपण करना चाहिये ॥ ६ ॥

ग्राहयित्वा जलौकोभिरलजीं सेचयेत्ततः ।

कपायैस्तेषु सिद्धं च तैलं रोपणमिष्यते ॥ ७ ॥

अलजी चिकित्सा - अलजी में जलौका के द्वारा रक्तमोक्षण कर कपाय वृक्षों के काथ से परिपेक तथा इन्हीं कपायवृक्षों के काथ और कल्क से सिद्ध तैल से ऋण का रोपण करना चाहिये ॥ ७ ॥

वलातैलेन कोष्णेन मृदितं परिपेचयेत् ।

मधुरैः सर्पिपा स्निग्धैः सुखोष्णैरुपनाहयेत् ॥ ८ ॥

मृति चिकित्सा - मृदित में सुखोष्ण बलातैल से परिपेक और मधुर द्रव्यों में घृत मिलाकर सुखोष्ण उपनाह ( पुलटिस ) बाँधना चाहिये ॥ ८ ॥

संमूढपिडकां क्षिप्रं जलौकोभिरुपाचरेत् ।

भित्त्वा पर्यागतां चापि लेपयेत् क्षौद्रसर्पिपा ॥ ६ ॥

संमूढ पिडिका चिकित्सा - संमूढपिडिका में, जलौका द्वारा शीघ्र रक्तमोक्षण कराना चाहिये तथा पकी हुई को चीर कर मधु और घृत का लेप लगाना चाहिये ॥ ९ ॥

ran ते पार्क भन्ने तैलं विधीयते ।

धवाश्वकर्णपत्तङ्गसल्लकीतिन्दुकीकृतम् ॥ १० ॥

अवमन्य चिकित्सा - अवमन्थ के पककर फूटने पर, धव अश्वकर्ण ( गन्धमुण्ड ), पतन, साल और तेंदू के क्वाथ पूर्व कल्क से सिद्ध तैल का प्रयोग करना चाहिये ॥ १० ॥

क्रियां पुष्करिकायां तु शीतां सर्वां प्रयोजयेत् ।

जलौकोभिर्हरेश्चासृक् सर्पिपा चावसेचयेत् ॥ ११ ॥

पुष्करिका - चिकित्सा - पुष्करिका में सम्पूर्ण शीतल क्रियाओं का प्रयोग, जॉक के द्वारा रक्तमोक्षण तथा घृत से परिपेक करना चाहिये ॥ ११ ॥

स्पर्शहान्यां हरेद्रक्तं प्रदिह्यान्मधुरैरपि ।

क्षीरेक्षुरससर्पिर्भि. सेचयेश्च सुशीतलैः ॥ १२ ॥

स्पर्शहानि · चिकित्सा - स्पर्शहानि में रक्तमोक्षण कर, मधुर द्रव्यों के कल्क का लेप तथा शीतल दूध, गन्ने के रस, और घृत के द्वारा परिपेक करना चाहिये ॥ १२ ॥

पिडकामुत्तमाख्यां च बडिशेनोद्धरेद्भिषक् ।

उधृत्य मधुसंयुक्तैः कपायैरवचूर्णयेत् ॥ १३ ॥

उत्तमा पिढका चिकित्सा - उत्तमा नामक पिढका को वैद्य वढिशशस्त्र से निकाले और मधुयुक्त कपाय द्रव्यों के से प्रतिदिन स्वेदन करे और भली भाँति स्निग्ध एव सुसोष्ण चूर्ण से अवचूर्णन करे ( व्रण पर चूर्ण छिड़के ) ॥१३ ॥

उपनाह ( पुलटिस ) बाँधे ॥ ५ ॥ रसक्रिया विधातव्या लिखिते शतपोनके ।

कुम्मीकां पाकमापन्नां भिन्द्याच्क्रुद्धां तु रोपयेत् । पृथक्पर्ण्यादिसिद्धं च देयं तैलमनन्तरम् ॥ १४ ॥

तैलेन त्रिफलालोधतिन्दुकाम्रातकेन तु ॥ ६ ॥ शतपोनक चिकित्सा - शतपोनक में पहले लेखन

कुम्भीका चिकित्सा - पकी हुई कुम्भीका को शस्त्र से ( Soraping ) कर, रसक्रिया और इसके पश्चात् पृष्ठपर्ण्या-चीरकर, घण को शुद्ध करके, हरद, बहेडा आँवला, लोध, दिगण से सिद्ध तेल का प्रयोग करना चाहिए ॥ १४ ॥

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अध्याय २१-२२ | चिकित्सास्थानम्

क्रियां कुर्याद्भिपक प्राज्ञस्त्वक्पाकस्य विसर्पवत् ।

रक्तविद्रधिवच्चापि क्रिया शोणितजेऽर्बुदे ॥ १५ ॥

कपायकल्कसपपि तैलं चूर्णं रसक्रियाम् ।

शोधनं रोपणं चैव वीक्ष्य वीक्ष्यावचारयेत् ॥ १६ ॥

हितं च सर्पिषः पानं पथ्यं चापि विरेचनम् ।

' हितः शोणितमोक्षश्च यश्चापि लघु भोजनम् ॥ १७ ॥

स्वकूपाक तथा रक्तजार्बुद चिकित्सा - विद्वान् वैद्य को स्वकूपाक की चिकित्सा विसर्प की भाँति करनी चाहिये । रक्तन अर्बुद में रक्तज विद्रधि की भाँति चिकित्सा करनी चाहिए तथा काथ, कल्क, घृत, तेल, चूर्ण, रसक्रिया, शोधन और रोपण कर्म द्वित्रणीयोक्त अवस्था के अनुसार प्रयोग में लाना चाहिये । दोषों के अनुसार घृतपान, विरेचन, रक्तमोक्षण तथा लघु भोजन, रक्तज अर्बुद में हितकर होता है ॥१५- १७ ॥

अर्बुदं मांसपाकं च विद्रधिं तिलकालकम् ।

प्रत्याख्याय प्रकुर्वीत भिपक् सम्यक् प्रतिक्रियाम् ॥ १८ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने शूकरोग-चिकित्सितना मैकविशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

अर्बुद, मांसपाक, विद्वधि और तिलकालक को असाध्य समझते हुए, वैद्य को भलीभाँति चिकित्सा करनी चाहिये ॥ इत्यायुर्वेदतस्त्र संदीपिकाभापाटीकायामेकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

द्वाविंशतितमोऽध्यायः अथातो मुखरोगचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके अनन्तर मुखरोग की, चिकित्सा विधि का वर्णन

किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत ।

प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥

चतुविधेन स्नेहेन मधूच्छिष्टयुतेन च ।

वातजेऽभ्यञ्जनं कुर्यान्नाडीस्वेद च बुद्धिमान् ॥ ३ ॥

ओष्ठरोग चिकित्सा - वातज ओष्ठ रोग में, मोम युक्त चतुर्विध स्नेह ( घृत, तेल, वसा, मज्जा ) की मालिश और नाड़ी स्वेद का प्रयोग बुद्धिमान् वैद्य को करना चाहिये ॥ ३ ॥

विदध्यादो कोपे तु साल्वणं चोपनाहने ।

मस्तिष्के चैव नस्ये च तैलं वातहरं हितम् ॥ ४ ॥

वातज ओष्ठरोग में सावण की पुलटिस, शिरोवस्ति, और वातहर द्रव्यों से सिद्ध तैल का नस्य हितकर होता है ॥

श्रीवेष्टकं सर्जरसं सुरदारु सगुग्गुलु ।

यष्टीमधुकचूर्णं तु विदध्यात् प्रतिसारणम् ॥ ५ ॥

वातज ओष्ट रोग में विरोजा, राल, देवदारु, गुग्गुल और मुलेठी के चूर्ण से प्रतिसारण ( घर्षण ) करना चाहिये ॥ ५ ॥

पित्तरताभिघातोत्थं जलौकोभिरुपाचरेत् ।

पित्तविद्रधिवच्चापि क्रियां कुर्यादशेषतः ॥ ६ ॥

पित्तज, रक्तज और अभिघातज भोष्ठ रोग में जॉक के द्वारा रक्तमोक्षण तथा विधि की भाँति सम्पूर्ण ( सोन-सशमनरूपा वाह्यामाभ्यन्तरीच ) क्रिया करनी चाहिये ॥ ६ ॥

शिरोविरेचनं धूमः स्वेदः कवल एव च ।

हृते रक्ते प्रयोक्तव्योष्ठकोपे कफात्मके ॥ ७ ॥

त्र्यूपणं स्वजिकाक्षारो यवक्षारो विडं तथा ।

क्षौद्रयुक्तं विधातव्यमेतच्च प्रतिसारणम् ॥ ८ ॥

कफज ओष्ठ रोग में, रक्तमोक्षण के अनन्तर शिरोविरेचन, धूम, स्वेद और कवल का प्रयोग तथा सोंठ, मरिच, पिप्पल, सज्जीखार, यवक्षार और विटनमक में मधु मिलाकर प्रतिसारण करना चाहिये ॥ ७-८ ॥

मेदोजे स्वेदिते भिन्ने शोधिते ज्वलनो हितः ।

प्रियङ्गुत्रिफलालोध्रं सक्षौद्रं प्रतिसारणम् ॥ ६ ॥

मेदज ओष्ठरोग में स्वेदन के पश्चात् शस्त्र से चीरकर व्रण का शोधन, अग्निकर्म तथा प्रियंगु, त्रिफला और लोध्र में मधु मिलाकर प्रतिसारण करना चाहिए ॥ ९ ॥

एतदोष्ठप्रकोपानां साध्यानां कर्म कीर्तितम् ।

दन्तमूलगतानां तु रोगाणां कर्म वक्ष्यते ॥ १० ॥

साध्य ओष्ठरोगों के लिए यह चिकित्सा विधि बतलाई गई है, दाँतों की जड ( मसूड़ा ) में होने वाले रोगों की चिकित्सा का वर्णन किया जा रहा ॥ १० ॥

शीता तर तु तोये नागरसर्षपान् ।

निष्का r य त्रिफलां मुस्तं गण्डूपः सरसाञ्जनः ॥११ ॥

प्रियङ्गवश्च मुस्तं च त्रिफला च प्रलेपनम् ।

नस्यं च त्रिफलासिद्धं मधुकोत्पलपद्मकैः ॥ १२ ॥

शीताद ( Spongy Cums ) में रक्तमोक्षण के अनन्तर सोंठ, सरसों, त्रिफला, नागरमोथा और रसोत के काथ का गण्डूप धारण ( मुख में क्वाथ रखना ) तथा प्रियंगु, नागर • मोथा और त्रिफला कल्क का लेप एवं त्रिफला, मुलेठी, कमल और पद्माख से सिद्ध तैल के नस्य का प्रयोग करना चाहिये ॥ दन्तपुष्पुटके कार्य तरुणे रक्तमोक्षणम् ।

सपञ्चलवणः क्षारः सक्षौद्रः प्रतिसारणम् ।

हितः शिरोविरेकच नस्यं स्निग्धं च भोजनम् ॥ १३ ॥

नवीन दन्तपुष्पुटक ( Gum boil ) में रक्तमोक्षण, पाँचों लवण और यवतार में मधु मिलाकर प्रतिसारण तथा शिरो-विरेचन, नस्य एव स्निग्ध भोजन हितकर होता है ॥ १३ ॥

विस्राविते दन्तवेष्टे व्रणांस्तु प्रतिसारयेत् ॥ १४ ॥

रोध्रपत्तगन्यष्ट्याह्वलाक्षाचूर्णैर्मधूत्तरैः ।

गण्डूपे श्रीरिणो योज्याः सक्षौद्रघृतशर्कराः ।

arata यादौ दक्षीरसिद्धं सर्पिश्च नस्यतः ॥ १५ ॥

दन्तवेष्टक ( Pyorrhoea ) में रक्तमोक्षण के बाद लोध, पतन, मुलेठी और लाख के चूर्ण में विशेष मधु मिलाकर a णों का प्रतिसारण, क्षीरिवृत्तों के क्वाथ में मधु, घृत और

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II सुश्रुतसंहिता शर्करा मिलाकर गण्डूप धारण तथा काकोल्यादि के कल्क के साथ दशगुने दूध में सिद्ध घृत का नस्य प्रयोग करना चहिये ॥ १४-१५ ॥ शौपिरे हृतरके तु रोधमुस्तरसाञ्जनैः ॥ १६ ॥

सक्षौद्रैः शस्यते लेपो गण्डूपे क्षीरिणो हिताः ।

सारिवोत्पलयष्ट्याह्वसावरागुरुचन्दनैः ॥ १७ ॥

क्षीरे दशगुणे सिद्ध सर्पिर्नस्ये च पूजितम् ।

क्रियां परिदरे कुर्याच्छीतादोक्तां विचक्षणः ॥ १८ ॥

शौपिर में, मसूड़े से रक्त निकाल कर, लोध, नागरमोथा और रसोत के चूर्ण में मधु मिला हुआ लेप तथा क्षीरिवृक्षों hat का गधारण और सारिवा, कमल, मुलेठी, लोध, अगर एवं चन्दन के कल्क के साथ दशगुने दूध से सिद्ध घृत का नस्य हितकर होता है । बुद्धिमान् वैद्य परिदर में शीताद के लिए कही गई चिकित्सा विधि का प्रयोग करे ॥ १६-१८ ॥

संशोध्योभयतः कार्यं शिरश्चोपकुशे तथा ।

काकोदुम्बरिकागोजी पत्रैविस्रावयेदसृक् ॥ १६ ॥

क्षौद्रयुक्तेश्व लवणैः सव्योपैः प्रतिसारयेत् ।

पिप्पलीः सर्पपान् श्वेतान्नागरं नैचुलं फलम् ॥ २० ॥

सुखोदकेन संसृज्य कवलं चापि धारयेत् ।

घृतं मधुरकैः सिद्धं हितं कवलनस्ययोः ॥ २१ ॥

उपकुश में वमन, विरेचन के द्वारा, दोनों मार्गोंों से शरीर को तथा शिरोविरेचन के द्वारा शिरको शुद्ध कर कटगूलर और गो जहा के पत्ते से मसूड़े को रगड़ कर रक्त निकालना चाहिए तथा मधु युक्त पाँचो नमक और सोंठ, मरिच, पिप्पल के चूर्ण से प्रतिसारण करना चाहिए एव पिप्पल, सरसों, सोंठ और वेतसफल के चूर्ण को गुनगुने जल में मिला कर कवल धारण करना चाहिए । मधुर द्रव्यों ( काकोल्यादि गण ) से सिद्ध घृत, कवल धारण तथा नस्य दोनों के लिए हितकर होता है ।

शस्त्रेण दन्तवैदर्भे दन्तमूलानि शोधयेत् ।

ततः क्षारं प्रयुञ्जीत क्रियाः सर्वाश्च शीतलाः ॥ २२ ॥

दन्तवैदर्भ में, दाँतों की जड़ को शस्त्र से स्वच्छ कर क्षार-प्रयोग तथा सम्पूर्ण शीतल क्रिया करनी चाहिए ॥ २२ ॥

उधृत्याधिकदन्तं तु ततोऽग्निमवचारयेत् ।

कृमिदन्तकवच्चापि विधिः कार्यो विजानता ॥ २३ ॥

अधिकदन्त ( अथवा वर्द्धन Extra tooth ) को उखाड़ कर, अग्निकर्म तथा कृमिदन्त की भाँति, कुशल वैद्य को चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २३ ॥

छित्त्वाऽघिमांसं सक्षौद्रैरेभिश्वणैरुपाचरेत् ।

वचातेजोवतीपाठास्वर्जिकायावशूकजैः ॥ २४ ॥

क्षौद्रद्वितीयाः पिप्पल्यः कवलश्चात्र कीर्तितः ॥

पटोलत्रिफलानिम्बकपायश्चात्र धावने ।

हितः शिरोविरेकश्च धूमो वैरेचनश्च यः ॥ २५ ॥

अधिमम ( Impacted wisdom tooth ) को काट कर षच, तेजवल, पाठा, सज्जीगार और यवचार के चूर्ण में मधु मिला कर लगाना चाहिए तथा पिप्पली चूर्ण और मधु का कवल धारण करना चाहिए । व्रण धोने के लिए ( कुल्ला करने के लिए ) परवल की पत्ती, त्रिफला और नीम का क्वाथ तथा शिरोविरेचन और वैरेचनिक धूम का प्रयोग हितकर होता है ।

सामान्यं कर्म नाडीनां विशेपं चात्र मे शृणु I ।

नाडीव्रणहरं कर्म दन्तनाडीपु कारयेत् ॥ २६ ॥

यं दन्तमभिजायेत नाडी त दन्तमुद्धरेत् ।

छित्त्वा मांसानि शस्त्रेण यदि नोपरिजो भवेत् ॥ २७ ॥

शोधयित्वा दच्चापि क्षारेण ज्वलनेन वा ।

भिनन्त्युपेक्षिते दन्ते हनुकास्थिगतिर्ध्रुवम् ।

समूलं दशनं तस्मादुद्धरेद्भग्नमरिथरम् ॥ २८ ॥

दन्तनादी में, सामान्य नाडी ( Synus ) चिकित्सा विधि का प्रयोग किया जाता है, विशेष चिकित्सा विधि का वर्णन मुझ से सुनो - जिस दाँत के समीप नाडीव्रण ( Synus ) उत्पन्न हो उस दाँत को, यदि ढाँत ऊपर की पक्ति में न हो तो मसूढे का मांस शस्त्र से काट कर, निकाल देना चाहिए और व्रण को शुद्ध कर क्षार अथवा अग्नि से जलाना चाहिए | क्योंकि, दाँत की उपेक्षा करने पर अर्थात् दाँत को न निकालने पर, नाडीव्रण निश्चय ही हन्वस्थि का भेदन कर देता है । इसलिए टूटे तथा हिलते हुए दाँत को जड़ से निकालना चाहिए ॥ २६–२८ ॥ उद्धृते तूत्तरे दन्ते समूले स्थिरबन्धने ॥ २६ ॥

रक्तातियोगात् पूर्वोक्ता रोगा घोरा भवन्ति हि ।

काणः संजायते जन्तुरर्दितं चास्य जायते ॥ ३० ॥

चलमप्युत्तर दन्तमतो नापहरेद्भिपक् । उपर की पंक्ति में स्थित, स्थिर बन्धन युक्त अर्थात् हद दाँत को जड़ से उखाड़ने पर, अत्यधिक रक्तस्राव होने के कारण, ऊपर कहे गए भयङ्कर रोग उत्पन्न हो जाते हैं । मनुष्य काना तथा अर्दित रोग ग्रस्त हो जाता है । इसलिए वैद्य को ऊपर के हिलते हुए दाँत को भी नहीं उखाडना चाहिए ॥ धावने जातिमदन स्वादुकण्टकखादिरम् ॥ ३१ ॥

कपायं जातिमदन कटुकस्वादुकण्टकैः ।

यष्टयाह्नरोधमञ्जिष्ठाखदिरैश्वापि यत् कृतम् ।

तैलं संशोधनं तद्धि हन्याद्दन्तगतां गतिम् ॥ ३२ ॥

दन्तनाडी को धोने के लिए चमेली, मैनफल, गोखरू, और खैर का क्वाथ तथा व्रण को शुद्ध करने के लिए चमेली मैनफल, कुटकी, गोखरू, मुलेठी, लोध्र, मजीठ और खैर के काथ से सिद्ध तेल का प्रयोग करना चाहिए । क्योंकि यह तैल दन्तगत नाड़ी को नष्ट करता है ॥ ३१-३२ ॥ कीर्तिता दन्तमूले तु क्रिया दन्तेषु वक्ष्यते ॥ ३३ ॥

दन्तमूल के [ ( मसूड़े ) रोगों की चिकित्सा का वर्णन तो किया गया अब दन्त रोगों की चिकित्सा कही जा रही है ॥३३ ॥

स्नेहानां कलाः कोष्णाः सर्पिपत्रैवृतस्य वा ।

निर्यूहाचानिलन्नानां दन्तहर्पप्रमर्दनाः ॥ ३४ ॥

चतुर्विध स्नेह ( घृत, तेल, वसा, मज्जा ) अथवा

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श्रध्याय २२ ] चिकित्सास्थानम् १३ - त्रैवृतघृत ( महावातव्याधि- पठित ) एवं वातघ्न द्रव्यों के काका, सुखोष्ण कवल धारण, दन्तहर्ष को नष्ट करता है । : स्नैहिकच हितो धूमो नस्यं स्निग्धं च भोजनम् ।

रसो रसयवाग्वश्च क्षीरं सन्तानिका घृतम् ।

शिरोबस्ति हितश्चापि क्रमो यश्चानिलापहः ॥ ३५ ॥

;. हिक धूम, नस्य, निग्ध भोजन, मांसरस, मांसरस में सिद्ध यवागू, दूध, मलाई, घी, शिरोवस्ति और वायुनाशक 1 सभी क्रियायें, दन्तहर्ष में हितकर होती हैं ॥ ३५ ॥

अहिंसन् दन्तमूलानि शर्करामुद्धरेद्भिषक् ॥ ३६ ॥

लाक्षाचूर्णैर्मधुयुतैस्ततस्ताः प्रतिसारयेत् ।

दन्तहर्षक्रियां चापि कुर्यान्निरवशेषतः ॥ ३७ ॥

तों की जड़ को हानि पहुँचाये बिना वैद्य को, दन्तशर्करा i ( Tartar ) निकालनी चाहिए और लाख के चूर्ण में मधु . मिला कर प्रतिसारण तथा दन्तहर्ष के लिए कथित सम्पूर्ण । क्रियाओं का भी प्रयोग करना चाहिए ॥ ३६-३७ ॥ } कपालिका कृच्छ्रतमा तत्राप्येषा क्रिया हिता । कपालिका ( Inamel ) कष्टसाध्य रोग है, इसमें भी उपर्युक्त चिकित्सा हितकर होती है ॥ ३७ ॥

जयेद्विस्रावणैः स्विन्नमचलं कृमिदन्तकम् ॥ ३८ ॥

तथाऽवपीडैर्वातघ्न्नैः स्नेहगण्डूषधारणैः ।

भद्रदार्वादिवर्षाभूलेपैः स्निग्धैश्च भोजनैः ॥ ३६ ॥

न हिलने वाले कृमिदन्त ( Dental caries ) की चिकित्सा, स्वेदन, रक्तमोक्षण, वातघ्न अवपीडनस्य, स्नेहों के गण्डूप धारण, भद्रदार्वादि तथा पुनर्नवादि गण के लेप और स्निग्ध आहार के द्वारा करनी चाहिए ॥ ३८-३९ ॥ चलमुद्धृत्य च स्थानं विदहेच्छुपिरस्य च ।

ततो विदारीयष्टयाह्वशृङ्गाटककसेरुकैः ।

तैलं दशगुणे क्षीरे सिद्धं नस्ये हितं भवेत् ॥ ४० ॥

हिलते हुए दाँत को उखाड़ कर, उस खोखले स्थान तथा शौपिरजन्य छिद्र को अग्नि से जलाना चाहिए फिर विदारी कन्द, मुलेठी, सिंघाड़ा और कशेरुके कल्क द्वारा, दशगुने दूध से सिद्ध, तैल के नस्य का प्रयोग करना चाहिए ॥ ४० ॥

हनुमोचे समुद्दिष्टां कुर्याञ्चादितवत् क्रियाम् ॥ ४१ ॥।

हनुमोक्ष ( Dislocation of the lower jaw ) में अर्दित के लिए कथित ( शिरोबस्ति, नस्य, धूम, उपनाह आदि ) चिकित्सा विधि का प्रयोग करना चाहिए ॥ ४१ ॥

विमर्श: --- चरक तथा अष्टाङ्ग संग्रह में ' हनुमोक्ष ' का नाम वात रोग की श्रेणी में रखा गया है । सुश्रुत इसे दन्तरोग की पङ्क्ति में रखते हैं । ' हनुमोक्ष ' वस्तुतः हन्वस्थि की स्थान-च्युति है । इस दृष्टि से दन्त रोग की श्रेणी में इसे स्थान प्राप्त नहीं होता, किन्तु हन्वस्थि निम्न दन्तपंक्ति की आधार - शिला भी है और हन्वस्थि की भनेक व्याधियाँ दन्त-विद्रधि के कारण हो जाती हैं । सम्भवतः सुश्रुत ने इसी कारण से ' हनुमोक्ष ' का नाम दन्त रोगों के साथ रखा है । पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान भी, दन्तरोग को हन्वस्थि की । व्याधियों का उत्पादक कारण मानता है । जहाँ तक चिकित्सा | का सम्बन्ध है, सुश्रुत ने भी, अन्य आचार्यों की भाँति ' हनुमोक्ष ' के लिए वातव्याधि - चिकित्सा विधान का ही परामर्श दिया है ।

फलान्यमानि शीताम्बु रूक्षान्नं दन्तधावनम् ।

तथाऽतिकठिनान् भक्ष्यान् दन्तरोगी विवर्जयेत् ॥४२ ॥

दन्तरोग से पीडित व्यक्ति को खट्टे फलों का सेवन, शीतल जल, रूक्ष अन्न, दतौन से दाँत धोना तथा अत्यधिक कडे भोज्य पदार्थों को त्याग देना चाहिए ॥ ४२ ॥

साध्यानां दन्तरोगाणां चिकित्सितमुदीरितम् ।

जिह्वागतानां साध्यानां कर्म वक्ष्यामि सिद्धये ॥ ४३ ॥

साध्य दन्त रोगों की चिकित्सा विधि का वर्णन किया गया है । जिह्वागत साध्य रोगों में सफलता के लिए । चिकित्सा कर्म का निर्देश किया जा रहा है ॥ ४३ ॥

ओष्ठप्रकोपेनिलजे यदुक्तं प्राक् चिकित्सितम् ।

कटकेष्वनिलोत्थेषु तत् कार्य भिषजा भवेत् ॥४४ ॥

वातज भोट • प्रकोप के लिए जिस चिकित्सा - विधि का वर्णन पहले किया गया है, उसका प्रयोग वैद्य को, वातज जाकण्टक में करना चाहिए ॥ ४४ ॥

पित्तजेषु विघृष्टेषु निःसृते दुष्टशोणिते ।

प्रतिसारणगण्डूषं नस्यं च मधुरं हितम् ॥। ४५ ॥

पित्तज जिह्वाकण्टक में, जिह्वा को रगड कर, रक्त निकालने के पश्चात् मधुर द्रव्यों से प्रतिसारण, गण्डूप धारण और नस्य का प्रयोग हितकर होता है ॥ ४५ ॥

कटकेषु कफोत्थेषु लिखितेष्वसृजः क्षये ।

पिप्पल्यादिर्मधुयुतः कार्यस्तु प्रतिसारणे ॥ ४६ ॥

गृह्णीयात् कवांश्चापि गौरसर्षपसैन्धवैः ।

पटोलनिम्बवार्ताकुक्षारयूषैश्च भोजयेत् ॥ ४७ ॥

कफज जिह्वाकण्टक में, जिह्वा को खुरच कर रक्त निकालने के अनन्तर पिप्पल्यादि गण के द्रव्यों में मधु मिलाकर प्र सारण, पीली सरसों और सेन्धा नमक का कवल धारण तथा परवल, नीम, बड़ी कटेरी और यवक्षार मिश्रित यूप के साथ भोजन हितकर होता है ॥ ४६-४७ ॥

उपजिह्वां तु संलिख्य क्षारेण प्रतिसारयेत् ।

शिरोविरेकगण्डूषधूमैश्चैनमुपाचरेत् ॥ ४८ ॥

उपजिह्वा ( Rannla ) को खुरच कर, क्षार से प्रतिसारण तथा शिरोविरेचन, गण्डूप धारण और धूम ( वैरेचनिक धूम ) के द्वारा उपचार करना चाहिए ॥ ४८ ॥

जिह्वागतानां कर्मोक तालव्यानां प्रवक्ष्यते ।

अङ्गुष्ठाङ्गुलिसंदशेनाकृष्य गलशुण्डिकाम् ॥ ४६ ॥

छेदयेन्मण्डलाग्रेण जिह्वोपरि तु सस्थिताम् ।

नोत्कृष्टं चैव हीन च त्रिभागं छेदयेद्भिषक् ॥ ५० ॥

जिह्वागत रोगों की चिकित्सा विधि का वर्णन किया गया, तालुगत रोगों की चिकित्सा का कथन किया जा रहा है ।

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६४ सुश्रुतसंहिता जिह्रा के उपर स्थित गलशुण्डिका ( Elongated Uvala ) । को अंगूठा और अंगुलि के संदेश से ( अंगूठा और तर्जनी अंगुलि को मिलाकर चिमटी का रूप देना ) खींच कर मण्डलाग्र शस्त्र ( Round head knife ) के द्वारा, न तो बहुत अधिक और न बहुत कम अपि तु तृतीयांश भाग, वैद्य को काटना चाहिए ॥ ४ ९ -५० ॥

अत्यादानात् स्रवेद्रक्तं तन्निमित्तं त्रियेत च ।

हीनच्छेदाद्भवेच्छोको लाला निद्रा भ्रमस्तमः ॥ ५१ ॥

तस्माद्वैद्यः प्रयत्नेन दृष्टकर्मा विशारदः ।

गलशुण्डी तु सन्धि कुर्यात् प्राप्तमिमं क्रमम् ॥ ५२ ॥

अधिक काट देने पर रक्तस्त्राव होने के कारण, रोगी की मृत्यु हो जाती है । अल्प मात्रा में काटने पर शोथ, लालास्राव, अधिक निद्रा, भ्रम और आँखों के सामने अन्धकार होता है । इसलिए शल्य क्रिया से पूर्ण परिचित विद्वान् वैद्य, सावधानी के साथ, गलशुण्डी को काट कर, अधोलिखित चिकित्सा का प्रयोग करे ॥ ५१-५२ ॥

मरिचातिविपापाठावचाकुष्ठकुटन्नटैः ।

क्षौद्रयुक्तैः सलवणैस्ततस्तां प्रतिसारयेत् ॥ ५३ ॥

वचामतिविपां पाठां रास्नां कटुकरोहिणीम् ।

निष्काथ्य पिचुमन्दं च कालं तत्र योजयेत् ॥ ५४ ॥

इङ्गुदी किणिहीदन्तीसरला सुरदारुभिः ।

पञ्चाङ्ग कारयेत् पिष्ठैर्वति गन्धोत्तरां शुभाम् ॥ ५५ ॥

ततो धूम पिवेज्जन्तुर्द्विरह्न • कफनाशनम् ।

क्षार सिद्धेषु मुद्रेषु यूपञ्चाप्यशने हितः ॥ ५६ ॥

मरिच, अतीस, पाठा, वच, कूठ, भरल और सेन्धानमक के चूर्ण में मधु मिलाकर प्रतिसारण करना चाहिए । चच, अतीस, पाठा, राना, कुटकी और नीम के क्वाथ का कल धारण कराना चाहिए । हिगोट, किणिही ( अपामार्ग ), दन्ती, निशोथ और देवदार, इन पाँच द्रव्यों को पीस कर, सुन्दर -सुगन्धित पञ्चाद्गीचतिं ( पञ्चभिरङ्गभूतैर्द्रव्यैः कृता पञ्चाङ्गी ) बनावे, कफनाशक इस वर्ति का धूम, रोगी को दिन ढो चार पिलाना चाहिए तथा मृग के यूप में यवक्षार मिला कर भोजन के लिए देना चाहिए ॥ ५३-५६ ॥ विमर्श. - पाश्चात्य चिकित्सा - विज्ञान के अनुसार भी जब गटशुण्डी ( Elongated Uvala ) Chronic हो जाती है और शो बना रहता है, उस अवस्था में शल्य चिकित्सा की आवश्यस्ता पडती है— The treatment of this Cond1-tion Consists in removing the lower half of the Uvala after painting it with cocaine, by puling it down with forceps and snipping it off with scissors. The Science and Practice of Surgery '

तुण्डिकेर्य कूर्मे सङ्घाने तालुपुप्पुटे ।

एप एव विधिः कार्यो विशेष शस्त्रकर्मणि ॥ ५७ ॥

तुण्डिरी ( Tonsillitis मे समानता ) अधूप ( Palati-१० मे समानना ), पूर्व ( Adenom of the Palate- से समाना ), मोसमात ( Fibroma मे समानता ), और तालुपुप्पुट ( Epuls of the Palate से समानता ) में उपर्युक्त विधि का प्रयोग तथा विशेष रूप से शस्त्र कर्म करना चाहिए ॥ ५७ ॥

तालुपाके तु कर्तव्यं विधानं पित्तनाशनम् । तालुपाक ( Ulceration of the Palate ) में पित्तनाशक क्रिया का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५७३ ॥

स्नेहस्वेदौ तालुशोपे विधिश्वानिलनाशनः ।

कीर्तितं तालुजानां तु कण्ठ्यानां कर्म वक्ष्यते ॥ १८ ॥

तालु शोप में स्नेहन तथा स्वेदन और वायुनाशक क्रिया का प्रयोग करना चाहिए । तालु रोगों की चिकित्सा का वर्णन किया गया, कण्ठरोगों की चिकित्सा विधि बतलाई ना रही है ॥ ५८ ॥

साध्यानां रोहिणीनां तु हितं शोणितमोक्षणम् ॥ ५६ ॥

छर्दनं धूमपानं च गण्डूषो नस्यकर्म च । साध्य रोहिणी रोगों में ( Diphtheria ) रक्तमोक्षण, वमन, धूम्रपान, गण्डूप धारण और नस्य कर्म, हितकर होता है ॥ ५ ९ ॥ वातिकीं तु हृते रक्ते लवणैः प्रतिसारयेत् ॥ ६० ॥

सुखोष्णान् स्नेहगण्डूपान् धारयेच्चाप्यभीक्ष्णशः ।

पतङ्गशर्कराक्षौद्रैः पैत्तिकीं प्रतिसारयेत् ॥ ६१ ॥

द्राक्षापरूपककाथो हितश्च कवलग्रहे ।

अगारधूमकटुकैः श्लैष्मिक प्रतिसारयेत् ॥ ६२ ॥

श्वेताविडङ्गदन्तीषु तैलं सिद्धं ससैन्धवम् ।

नस्यकर्मणि योक्तव्यं तथा कवलधारणे ॥ ६३ ॥

पित्तवत् साधयेद्वैद्यो रोहिणीं रक्तसंभवाम् ।

विस्राव्य कण्ठशालूकं साधयेत्तुण्डिकेरिवत् ॥ ६४ ॥

वातज रोहिणी में रक्तमोक्षण के अनन्तर, पञ्च लवण से प्रतिसारण ( घर्पण ) तथा बार - बार स्नेहयुक्त सुखोष्ण गण्डूप धारण कराना चाहिए । पित्तज रोहिणी में पतन, शर्करा और मधु के द्वारा प्रतिसारण तथा मुनक्का और फालसे के क्वाथ । का कवल धारण हितकर होता है । कफज रोहिणी में गृहधूम्र और कुटकी चूर्ण से प्रतिसारण तथा श्वेता, विग, दन्ती और सेन्धा नमक के द्वारा सिद्ध तेल, नस्य एव कवल धारण में प्रयोग करना चाहिए । रक्तज रोहिणी की चिकित्सा, वैद्य को पित्तज रोहिणी की भाँति करनी चाहिए । कण्ठशालूक से रक्त निकाल, तुण्डिकेरी की भाँति चिकित्सा करनी चाहिए || ६०-६४ ॥ विमर्श: -- रोहिणी ( Diphtheria ) एक प्रकार की घातक व्याधि है । सद्यः सुचारु उपचार न होने पर इसकी घातकता में सन्देह नहीं रहता । सुश्रुत तथा चरक दोनों आचार्यों ने इस रोग को प्राणहारक माना है । ' प्रदूष्य म रोधिनोऽङ्कुरानू, सृजन्नि यान् साऽसुहरा हि रोहिणी । " ( सु ० नि ० अ ० १६ ) ' त्रिरात्र परम तस्य जन्नोर्भवनि जीवितम् । कुशलेम त्वनुकान्त क्षिप्र सम्पद्यते इसी ( च ० सू ० अ ० १८ इस रोग का प्रधान कारण, पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान के अनुमार ( Diphtheria BreIllas ) नामक दण्डाकार जीवाणु

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श्रध्यायः २२ ] चिकित्सास्थानम् होता है । बच्चों में इस रोग का प्रकोप अधिक पाया जाता है । रोग की प्रबलता को रोकने के लिए ( Diphtherin Anttoxin ) का प्रयोग आजकल किया जाता है । Antitoxin के प्रयोग से रोग की असाध्यता में न्यूनता हुई है । ( Anti- । toxin ) के प्रयोग के साथ साथ हृदय को बल देने वाली औषधियों का प्रयोग भी करते रहना चाहिये । 1

एककालं यवान्नं च भुञ्जीत स्निग्धमल्पशः ।

उपजिह्विकवच्चापि साधयेदधिजिह्विकाम् ॥ ६५ ॥

रोगी को एक समय स्नेहयुक्त जौ का अल्प आहार देना चाहिये तथा अविजिह्वा की चिकित्सा, उपजिहा की भाँति करनी चाहिये ॥ ६५ ॥

एकवृन्दं तु विस्राव्य विधि शोधनमाचरेत् ।

गिलायुश्चापि यो व्याधिस्तं च शस्त्रेण साधयेत् ॥ ६६ ॥

एकवृन्द रोग में रक्तमोक्षण के पश्चात् शोधन विध ( शिरोविरेचन, धूम, लेप, क्षार आदि ) का प्रयोग तथा गिलायु नामक व्याधि में शस्त्र के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६६ ॥

अमर्मस्थं सुपक्कं च भेदयेद्गलविद्रधिम् । 1

मर्मस्थान से रहित और भलीभाँति पकी हुई गलविद्रधि ।

( Peritonsillar abscess ) में चीरा लगाना चाहिए ॥ ६६३ ॥

विमर्शः - पाश्चात्य चिकित्सा शास्त्र भी इस व्याधि में शस्त्रक्रिया काही विधान बतलाता है । ' Once fluctuation is detected or there is sufficient indication that pus is definitely localised, the Condition must be dealt with by incision and evacuation of the pus, " " The Science & Practice of Surgery ) वातात् सर्वसरं चूर्णैर्लवणैः प्रतिसारयेत् ॥ ६७ ॥

तैलं वातहरैः सिद्धं हितं कवलनस्ययोः ।

ततोऽस्मै स्नैहिकं धूममिमं दद्याद्विचक्षणः ॥ ६८ ॥

वातजसर्वसर ( मुख ओष्ठ आदि का पाक Stomatitis ) में पंचलवण के चूर्ण से प्रतिसारण, वातहर द्वन्यों से सिद्ध तैल का कबल धारण तथा नस्य हितकर होता है । बुद्धिमान् वैद्य, इस रोग से पीडित व्यक्ति के लिए अधोलिखित ( स्नैहिक ) धूम का प्रयोग करे ॥ ६७-६८ ॥ शालराजादनैरण्डसारैङ्गुद्द्मधूकजाः ॥

मज्जानो गुग्गुलुध्याममांसी कालानुसारिवाः ।

श्रीसर्जरसशैलेयमधूच्छिष्टानि चाहरेत् ॥ ६६ ॥

तत्सर्वं सुकृतं चूर्ण स्नेहेनालोड्य युक्तितः ।

टिकवृत्तं सक्षौद्रं मतिमांस्तेन लेपयेत् ॥ ७० ॥

एष सर्वसरे धूमः प्रशस्तः स्नैहिको मतः ।

कफन्नो मारुतन्नश्च मुखरोगविनाशनः ॥ ७१ ॥

शाल, खिरनी, एरण्ड, सारवृक्ष ( खदिर आदि ), हिंगोट, महुआ को मज़ा ( वृक्ष का सार भाग ), गुग्गुलु, ध्याम ( गन्धतृण ), जटामांसी, तगर, श्री ( लवङ्ग ), राल, भूरिधरीला और मोम, इन द्रव्यों का महीन चूर्ण । चनाकर, युक्तिपूर्वक ( जितने स्नेह में चूर्ण लेप लग । योग्य हो ) स्नेह मिलाया जावे । बुद्धिमान् वैद्य इस चूर्ण का लेप मधु लगे हुए अरलू की टहनी पर लगावे । सर्वसर रोग के लिये यह स्नैहिक धूम श्रेष्ठ समझा जाता है । यह कफनाशक, वातहर एवं मुखरोग को नष्ट करता है ॥ ६ ९ -७१ ॥

पित्तात्मके सर्वसरे शुद्धकायस्य देहिनः ।

सर्वः पित्तहरः कार्यो विधिर्मधुरशीतलः ॥ ७२ ॥

पित्तज सर्वसर रोग में वमन, विरेचन आदि से शुद्ध | शरीर वाले रोगी के लिये, सम्पूर्ण पित्तनाशक, मधुर और । शीतल क्रिया करनी चाहिये ॥ ७२ ॥

प्रतिसारणगण्डूपौ धूमः संशोधनानि च ।

कफात्मके सर्वसरे विधिं कुर्यात् कफापहम् ॥ ७३ ॥

पिवेदतिविषां पाठां मुस्तं च सुरदारु च ।

रोहिणीं कटुकाख्यां च कुटजस्य फलानि च ॥ ७१ ॥

गवां मूत्रेण मनुजो भागैर्धरणसंमितैः । ' एप सर्वान् कफकृतान् रोगान् योगोऽपकर्षति ॥ ७५ II कफज सर्वसर रोग में प्रतिसारण, गण्डूप धारण, संशोधन तथा कफनाशक क्रिया करनी चाहिये । अतीस, पाठा, नागर-मोथा, देवदारू कुटकी और इंन्द्रयव का एक धरण ( २४

रत्ती ) चूर्णं गोमूत्र के साथ रोगी को पिलाना चाहिये ।

यह योग सम्पूर्ण कफजन्य विकारों को नष्ट करता है ॥७३-७५ ॥

क्षीरेक्षुर सगोमूत्रदधिमस्त्वम्लकाञ्जिकैः ।

विदध्यात् कबलान् वीक्ष्य दोषं तैलघृतैरपि ॥ ७६ ॥

दूध, गन्ने का रस, गोमूत्र, दही, मस्तु ( दधिजल ), अम्ल ( धान्याम्ल ), काञ्जी तथा तैल और घृत का भी दोषों के प्रकोप के अनुसार कवल धारण करना चाहिये ॥ ७६ ॥

रोगाणां मुखजातानां साध्यानां कर्म कीर्तितम् ।

असाध्या अपि वक्ष्यन्ते रोगा ये तत्र कीर्तिताः ॥७७ ॥

साध्य मुख रोगों की चिकित्सा बतलाई गई है, असाध्य पूर्वनिर्दिष्ट मुखरोगों की चिकित्सा का कथन किया जा रहा है ॥ ७७ ॥

. ओष्ठप्रकोपे वर्ज्याः स्युर्मासरक्तत्रिदोषजाः ।

दन्तमूलेषु वय तु त्रिलिङ्गगतिशौषिरौ ॥ ७८ ॥

मांसज, रक्तज तथा सन्निपातज ओष्टरोग तथा सन्नि-पातजगति ( नाडी ) और शौपिर दन्तरोग त्याज्य होते हैं |

दन्तेषु च न सिध्यन्ति श्यावदालनभञ्जनाः ।

जिह्वागतेष्वलासस्तु तालव्येष्वर्युदं तथा ॥ ७६ ॥

स्वरन वलयो वृन्दो विदार्यलस एव च ।

लौघो मांसतानश्च शतघ्नी रोहिणी च या ॥ ८० ॥

दन्तरोगों में, श्यावदन्तक, दालन और भञ्जनक असाध्य होते हैं तथा जिह्वागत रोगों में अलास, तालुगत में अर्बुद एवं ( कण्ठगत में ) स्वरन्न, वलय, वृन्द, विदारी, अलस, गलौघ, मांसतान, शतघ्नी और रोहिणी असाध्य होती है ॥ ७ ९ -८० ॥

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६८ सुश्रुतसंहिता जैसे कि - शोथ का नाश चाहने वाले रोगी को, पिट्टी के । बने आहार, सट्टे पदार्थ, लवण, मिट्टी, दिन में सोना, आनूप

जीवों का मांस, स्त्रीप्रसग, घृत, तैल, दूध तथा भारी पदार्थों ।

का सेवन त्याग देना चाहिए ॥ १३ ॥

इत्यायुर्वेदतत्सम्पदीपिकाभापाटीकायां त्रयोविंशोऽध्याय ॥२३ ॥

चतुर्विंशतितमोऽध्यायः अथातोऽनागताबाधप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके अनन्तर अनागताबाधप्रतिषेध ( ईषद् आगतः अनागत ', आयाधो दुष्यं, तस्य प्रतिपेधश्चिकित्सितम् ) अर्थात् सम्भावित दुखों को रोकने के लिये, चिकित्सा विधिका वर्णन किया जा रहा है, जैसाकि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृतिशिष्यों मे ) कहा ॥ १-२ ॥ उत्थायोत्थाय सतत स्वस्येनारोग्यमिच्छता ॥ धीमता यदनुप्रेय तत् सर्वं संप्रवक्ष्यते ॥ ३ ॥

आरोग्य की कामना करने वाले बुद्धिमान् स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन निरन्तर जिन दैनिक कार्यों में प्रवृत्त होना चाहिये, उनका कथन किया जाता है ॥ ३ ॥

तत्रादो दन्तपवनं द्वादशाङ्गुलमायतम् ॥ कनिष्ठिका परीणाहमृज्य ग्रन्थितमन्त्रणम् ॥ ४ अयुग्मग्रन्थ यचापि प्रत्ययं शस्तभूमिजम् अवेच्यतुं च दोप च रसं वीर्यं च योजयेत् कपायं मधुरं तिक्कं कटुकं प्रातरुत्थितः ॥ निम्न तितके श्रेष्ट कपाये खदिरस्तथा मधूको मधुरे श्रेष्ठः करजः कटुके तथा ॥ श्री द्रव्योपरिगतं सतैलं मैन्धवेन च ॥ ॥ ॥ ५ ॥

॥ ६ ॥

॥ ७ ॥

चूर्णेन तेजोवत्याश्च दन्तान्नित्यं विशोधयेत् ॥ एकै घर्मयेद्दन्तं मृदुना कूर्चकेन च ॥ ८

दन्तशोवन चूर्णेन दन्तमांसान्यबाधयन् ।

नहन्यपतु लेप्माणं चापकर्षति ॥

शयन्नाभिरुचि सामनम्यं करोति च ।

नाटजिहारोगममुद्भवे ॥

अथास्यपारे श्वासे च कामहिकावमीषु च दुर्वतोऽजीर्ण भवन मृन्यांत मदपीडितः ॥ ॥ ६ ॥ १० ॥

।

११ ॥

शिरोगजातस्यपिनः श्रान्न. पानकुमान्त्रितः ।

विपन्नरोगी च मानवः ॥ १२ ॥

रावस्या याग पर याद अली, के समान मोटी गांधी, पिना ग ( भाग ), गादी गाँठ में रहित, नवीन ( * ), मम भूमि में परों के अनुपू हाम प्रदेश बना पाए सारे द्रव्यों में नीम, कपाय रस मे महुआ तथा कटु रस में करञ्ज की दतवन श्रेष्ठ होती है । मधु, सौंठ, मरिच, पिप्पल, दालचीनी, इलाइची, तेजपात, ( त्रिवर्गात त्रिसुगन्धिना लिप्तं ) तेल, सेन्धानमक और तेजवल के चूर्ण से लिप्त दतवन के द्वारा दाँतों को प्रतिदिन शुद्ध करना चाहिये । दवन की कोमल कूँची से दन्तशोधन चूर्ण के द्वारा एक एक दाँत को पृथक् पृथक् मसूड़ों की रक्षा करते हुए, रगड़ना चाहिये । इस दन्तशोधन चूर्ण के प्रयोग से मुख की दुर्गन्धि, दाँतों के मैल और कफ का नाश होता है तथा निर्मलता, अन्न में रुचि एव प्रसन्नता उत्पन्न होती है । गला, तालु, ओष्ठ और जिह्वा के रोग, मुखपाक, श्वास, कास, हिक्का और चमन से ग्रसित तथा दुर्बल, अजीर्णावस्था में भोजन किये हुये, मूर्च्छा एवं मद से पीडित, शिरःशूल से दुखी, प्यासे, थके हुए, मद्यपान की थकावट से युक्त, अर्दित, कर्णशूल और दन्तरोग प्रस्त मनुष्य को दतवन नहीं करनी चाहिये ॥ ४-१२ ॥

जिह्वा निर्लेखनं रौप्य सौवर्णं वार्क्षमेव च ।

तन्मलापहरं शस्तं मृदु ऋणं दशाङ्गुलम् ॥ १३ ॥

मुखवैरस्य दौर्गन्ध्यशोफजाड्यहर सुखम् ।

दन्तदाकर रुच्यं स्नेहगण्डूपधारणम् ॥ १४ ॥

चाँदी, सोना तथा वृक्ष के टहनियों से निर्मित, कोमल, चिकनी, दस अगुल लम्बी जिभ्भी जिह्वा के मल को खुरचने के लिये श्रेष्ठ होती है । इसके प्रयोग से मुख की विरसता, दुर्गन्ध, शोथ और जडता का नाश तथा प्रसन्नता उत्पन्न होती है । स्नेह ( तैल ) का गण्डूप धारण दाँतों को दृढ़ तथा रुचि उत्पन्न करता है ॥ १३-१४ ॥

क्षीरवृक्षकपायैर्वा क्षीरेण च विमिश्रितैः ।

भिल्लो ककपायेण तथैवामलकस्य वा ॥ १५ ॥

प्रक्षालयेन्मुख नेत्रे स्वस्थः शीतोदकेन वा ।

नीलिका मुखशोप च पिडकां व्यङ्गमेव च ॥ १६ ॥

रक्तपित्तकृतान् रोगान् सद्य एव विनाशयेत् ।

मुखं लघु निरीक्षेत दृढ पश्यति चक्षुपा ॥ १७ ॥

क्षीरवृक्ष के फाथ अथवा चीरवृक्ष के काय में दूध मिला कर या लोध्र ( भिल्लो रोध ) अथवा आँवले के काथ या शीतल जल से स्वस्थ मनुष्य को मुख तथा नेत्रों को धोना चाहिये । ( इस नियम का पालन ) नीलिका, मुपशोष, पिका, व्यङ्ग तथा रक्तपित्तजन्य रोगों का शीघ्र नाश करता है । मुलका ( सुदर ) दिपलाई देता है तथा नेत्रों की ज्योति स्थिर होती है ॥ ४५-६७ ॥

मतं स्रोतोञ्जन श्रेष्ठ विशुद्धं सिन्धुमभवम् ।

दाहक मलन्नं च दृष्टिलेटरुजापहम् ॥। १८ ॥

तेजोरूपावलं चैव सहते मारुतातपा ।

न नेत्ररोगा जायन्ते तर मादनमाचरेत् ॥ १६ ॥

सिन्धुनदी में उपर ग्रोमोशन मल्रहिन तथा उत्तम होता है । यह आँपों की जलन, गुगली, मल, पानी जाना और पाय दूर करता है । नेत्रों में तेज आता है तथा वायु और धूप को गहने की शधि प्राप्त होती है । इसके

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श्रध्यायः २४ ] चिकित्सास्थानम् प्रयोग से नेत्र रोग उत्पन्न नहीं होते, इस लिये नेत्रों में अजन लगाना चाहिये ॥ १८-१९ ॥

भुक्तवाञ्छिरसा स्नातः श्रान्तश्छर्दनवाहनैः ।

रात्र जागरितश्चापि नाज्याज्ज्वरित एव च ॥ २० ॥

भोजन तथा शिर से स्नान किए हुए, वमन एवं चाहन ( सवारी ) से श्रान्त, रात्रि में जगे हुये और ज्वर मे पीडित व्यक्ति को अंजन नहीं लगाना चाहिये ॥ २० ॥

कर्पूर जातीकको ललवङ्ग कटुकाह्वयैः ।

सचूर्णपूगैः सहितं पत्रं ताम्बुलजं शुभम् ॥ २१ ॥

मुखवैशद्यसौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम् ।

हनुदन्तस्वर मलजिह्वेन्द्रियविशोधनम् ॥ २२ ॥

प्रसेकशमनं हृद्यं गलामयविनाशनम् ।

पथ्यं सुमोत्थिते भुक्ते नाते वान्ते च मानवे ॥ २३ ॥

रक्तपित्तक्षत क्षीणतृष्णामूर्च्छापरीतिनाम् ।

रूक्षदुर्बलमर्त्यानां न हितं चास्यशोषिणाम् ॥ २४ ॥

कपूर, जायफल, शीतलचीनी, लवंग, लताकस्तूरी, चूना और सुपारी के साथ ताम्बूल ( पान ) का सेवन कल्याणकारी होता है । पान खाने से मुख में निर्मलता, सुगन्धि, कान्ति एवं सुन्दरता आती है । हनु ( मसूढा ), दाँत, स्वर, जिह्वा का मल और इन्द्रियाँ शुद्ध होती हैं । मुख - प्रसेक ( मुख से पानी आना ) शान्त होता है । हृदय में शक्ति भाती है और गले की व्याधियों का नाश होता है । सोकर उठने वाले तथा भोजन, स्नान और वमन किए हुए मनुष्य के लिये पान हितकर है । रक्तपित्त, क्षतक्षीण, तृष्णा और मूर्च्छा से पीडित एवं रूक्ष, दुर्बल तथा मुखशोप वाले व्यक्तियों के लिये पान हितकर नहीं होता ॥ २१-२४ ॥

शिरोगतांस्तथा रोगान्धिरोऽभ्यङ्गोऽपकर्षति ।

केशानां मार्दव दैर्घ्यं बहुत्वं स्निग्धकृष्णताम् ॥ २५ ॥

करोति शिरसस्तृप्तिं सुत्वक्कमपि चाननम् ।

सन्तर्पणं चेन्द्रियाणां शिरस प्रतिपूरणम् ॥ २६ ॥

शिर पर तेल की मालिश करने से शिर में होने वाले रोग दूर होते है । केश कोमल, लम्बे, घने, चिकने और काले

बनते हैं । शिर की तृप्ति तथा मुख की त्वचा सुंदर होती है ।

इन्द्रियां शक्तिसम्पन्न और शून्य मस्तिष्क पुन. पूर्ण होता है ॥

मधुकं क्षीरशुक्का च सरल देवदारु च ।

क्षुद्रकं पञ्च नामानं समभागानि सहरेत् ॥ २७ ॥

तेषां कल्ककपायाभ्यां चक्रतैलं विपाचयेत् ।

सदैव शीतलं जन्तोर्मूर्ध्नि तैलं प्रदापयेत् ॥ २८ ॥

मुलेठी, क्षीरविदारी, सरलकाष्ट्, देवदारु और लघुपञ्चमूल को समभाग में एकत्रित कर, इनके काथ और कल्क के द्वारा चक्रतैल ( कोल्हू का तेल ) का पाक करके मनुष्य के शिर पर सदा ठण्डे तेल की मालिश करनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥

केशप्रसाधनी केश्या रजोजन्तुमलापहा ।

हनुमन्याशिरः कर्णशूलघ्नं कर्णपूरणम् ॥ २६ ॥

केशप्रसाधनी ( कधी ) का व्यवहार केशों को सुन्दर । बनाता है तथा धूलि, जॅ और मल को दूर करता है । कर्ण-पूरण ( कान में तेल डालना ) के व्यवहार से हनु ( ठोढ़ी ), मन्या, शिर और कान की पीडा नष्ट होती है ॥ २ ९ ॥

अभ्यङ्गो मार्दवकरः कफवातनिरोधनः ।

धातूनां पुष्टिजननो मृजावर्णबलप्रदः ॥ ३० ॥

अभ्यङ्ग ( मालिश ) का अभ्यास शरीर में कोमलता लाता है, कफ और वात को रोकता है, धातुओं को पुष्ट करता है, तथा शरीर को शुद्ध और बल, वर्ण से सम्पन्न बनाता है ॥

सेकः श्रमन्नोऽनिलहन सन्धि प्रसाधकः ।

क्षताग्निदग्धाभिहतविघृष्टानां रुजापहः ॥ ३१ ॥

सेक ( सर्वांगपरिपेक ) थकावट मिटाता है, वायु को नष्ट करता है, भग्नसन्धि ( Dislocation ) को स्थिर करता है, तथा क्षत, अग्निदग्ध, अभिघात और रगड़ से उत्पन्न पीड़ा को दूर करता है ॥ ३१ ॥

जलसिक्तस्य वर्धन्ते यथा मूलेऽङ्कुरास्तरोः ।

तथा धातुविवृद्धिर्हि स्नेहसिक्तस्य जायते ॥ ३२ ॥

जड में जल से सींचे गए वृक्ष के अंकुर जिस प्रकार | बढ़ते हैं उसी तरह स्नेहसिक्त ( मालिश करने से ) व्यक्ति । की धातुये वृद्धि को प्राप्त होती हैं ॥ ३२ ॥

सिरामुखै रोमकूपैर्धमनीभिश्च तर्पयन् ।

शरीरवलमाधत्ते युक्तः स्नेहोऽवगाहने ॥ ३३ ॥

स्नान करने में प्रयुक्त किया गया स्नेह शिराओं के मुख रोमकूप और धमनियों के द्वारा शरीर को तृप्त करता हुआ वल उत्पन्न करता है ॥ ३३ ॥

तत्र प्रकृतिसात्म्यर्तु देशदोषविकारवित् ।

तैलं घृतं वा मतिमान् युञ्ज्यादभ्यङ्गसेकयोः ॥ ३४ ॥।

प्रकृति, साम्य, ऋतु, देश तथा दोपों की विकृति के ज्ञाता बुद्धिमान् वैद्य को तेल या घी का प्रयोग अभ्यंग ( मालिश ) और सेक ( स्नान ) में करना चाहिये ॥ ३४ ॥

केवलं सामदोपेषु न कथञ्चन योजयेत् ।

तरुणज्वर्यजीर्णी च नाभ्यक्तव्यौ कथञ्चन ॥ ३५ ॥

तथा विरिक्तो वान्तश्च निरूढो यश्च मानवः ।

पूर्वयोः कृच्छ्रता व्याधेरसाध्यत्वमथापि वा ॥ ३६ ॥

शेषाणां तदहः प्रोक्ता अग्निमान्द्यादयो गढ़ाः ।

सन्तर्पणसमुत्थानां रोगाणां नैव कारयेत् ॥ ३७ ॥

आम दोषों में स्नेह ( असंस्कृत स्नेह ) का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिये । नवीन ज्वर तथा भजीर्ण से पीड़ित और विरेचन, चमन एव निरूहवस्ति से युक्त मनुष्य को अभ्यंग कभी नही करना चाहिये । प्रथम दो अवस्थाओं ( नवीन ज्वर तथा भजीर्ण ) में अभ्यग करने से व्याधि कष्ट-साध्य या असाध्य भी हो जाती है । शेष अवस्थाओं ( विरेचन, चमन एवं निरूह ) में उस दिन अभ्यङ्ग का प्रयोग अग्निमांद्य आदि रोगों को उत्पन्न कर देता है । सन्तर्पणजन्य व्याधियों में अभ्यङ्ग नहीं करना चाहिये । ३५-३७ ॥

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१०२ सुश्रुतसंहिता बढती है, थकावट और झुनझुनी मिटती है, तथा पैरों की

त्वचा कोमल बनती है । पादाभ्यङ्ग सदा हितकर होता है ॥

पादरोगहर वृष्यं रक्षोन्नं प्रीतित्रर्धनम् ॥ ७१ ॥

सुखप्रचारमोनस्य सदा पादत्रधारणम् ।

अनारोग्यमनायुष्यं चक्षुषोरुपघातकृत् ॥ ७२ ॥

पादाभ्यामनुपानद्भयां सदा चङ्क्रमणं नृणाम् । पैरों में जूता या खडाऊँ धारण के गुण- पैरों में जूता या ग्लडाऊ पहनना पैर के रोगों को दूर करता है, शक्ति देता है, । राक्षसों का नाश करता है, प्रसन्नता लाता है, सुख की वृद्धि करता है तथा ओज को बढ़ाता है । पैरों में बिना जूता पहने । भ्रमण करना मनुष्य को रोगी और अल्पायु बनाता है तथा नेत्रों की ज्योति नष्ट करता है ॥ ७१-७२ ॥ पाप्मोपशमन केशनखरोमापमार्जनम् ॥ ७३ ॥

हर्पलाघव सौभाग्यकर मुत्साहवर्धनम् । 1 केश, नख, रोम कटवाने के गुण - केश, नख और रोम कटवाने से पाप ( कलुप ) का शमन होता है, प्रसन्नता । प्राप्त होती है, शरीर हल्का होता है तथा सौभाग्य की उत्पत्ति और उत्साह की वृद्धि होती हैं ॥ ७३ ॥

चाणवारं मृजावर्णतेजोबलविवर्धनम् ॥ ७४ ॥

कवच धारण के गुण - दारीर पर कवच धारण करने से शरीर शुद्धि तथा वर्ण, तेज और बल की वृद्धि होती है ॥ ७४ ॥

पवित्र केश्यमुष्णीयं वातातपरजोऽपहम् ।

वर्षानिलरजोधर्महिमादीनां निवारणम् ॥ ७५ ॥

वयं चक्षुष्यमोजस्य शंकरं छत्रधारणम् । पगडी तथा छत्र धारण के गुण - शिर पर पगड़ी बाँधने पवित्रता ( स्वच्छता ) रहनी है, बालों की वृद्धि तथा बायु, धूप और धूलि मे रक्षा होती है । छत्र धारण वर्षा, बायु, धूलि, धूप और तुपार आदि का निवारण करता है, वर्ण, नेत्रों की ज्योति और ओज को बढाता है एव कल्याण-वारी होता है ॥ ७५ ॥

शुनः सरीसृपत्र्यालविपाणिभ्यो भयापहम् ॥ ७६ ॥

श्रमस्खलनदोपन्न स्थविरं च प्रशस्यते ।

सत्त्वोत्माह्वलस्थैर्य वेर्यवीर्यविवर्धनम् ॥ ७७ ॥

अवस्भकर चापि भवन्न दण्डधारणम् । दण्डधारण के गुणदण्ड धारण कुत्ता, सर्प, व्याघ्र हिंसक जन्तु तथा मींग वाले पशुओं के भय को मिटाता है, थकावट एवं फिसलने के दोष को दूर करता है, वृद्धावस्था में मात्र है, सच ( मत्रगुग ), दमाह ( वल ), वल ( तेज ), स्थिरता, धीरता और वीर्य ( शक्ति ) की वृद्धि करता है, महारा देता है और भय का नाश करता है ॥ आस्या वर्गकफस्थौल्यसौकुमार्यकरी सुला ॥ ७८ ॥

करने के गुवपूर्वक बैठना ( विश्राम करना ) पण और सुकुमारता खाता है तथा लुम प्रदान करना है ॥ ७८ ॥

अन्त्रा वर्ण कफस्थौल्य सौकुमार्यविनाशनः ।

अत्यध्वा विपरीतोऽस्माज्जरादौर्बल्यकृच्च सः ॥ ७६ ॥

मार्ग चलने के गुण, अधिक मार्ग चलने के दोष - मार्ग चलना वर्ण, कफ, स्थूलता और सुकुमारता को नष्ट करता है तथा इसके विपरीत अधिक मार्ग चलना, बुढ़ापा और दुर्बलता लाता है ॥ ७ ९ ॥

यत्तु चक्रमणं नातिदेहपीडाकरं भवेत् ।

तदायुर्बलमेधाग्निप्रदमिन्द्रियबोधनम् ॥ ८० ॥

टहलने के गुण - जिस परिभ्रण से शरीर में विशेष वेदना उत्पन्न न हो अर्थात् स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से किया गया भ्रमण आयु, वल, मेघा और अग्नि को बढाता है तथा इन्द्रियों को चैतन्य करता है ॥ ८० ॥

श्रमानिलहरं वृष्यं पुष्टिनिद्रावृत्तिप्रदम् ।

सुखं शय्यासनं, दुःखं विपरीतगुणं मतम् ॥ ८१ ॥

सुखकर शय्या तथा आसन के गुण कोमल विस्तर पर सोने से थकावट और वायु का नाश होता है, वल, शरीर की पुष्टि, निद्रा और धीरता की प्राप्ति होती है तथा सुख मिलता है । इसके विपरीत कठिन गय्या दुःखदायिनी होती है ॥ ८ ॥

वालव्यजनमोजस्यं मक्षिकादीनपोहति ।

शोपदाहश्रमस्त्रेदमूर्च्छानो व्यजनानिलः ॥ ८२ ॥

चॅवर दुलाने के गुण - चॅवर डुलाना ओज की वृद्धि करता है और मक्खियों को भगाता है तथा ताड आदि के पंखे से हवा करना शोष, दाह, श्रम, स्वेद एवं मूर्च्छा नाशक है ॥ ८२ ॥

प्रीतिनिद्राकरं वृष्यं कफवात श्रमापहम् ।

संवाहनं मांसरक्तत्वक्प्रसादकरं सुखम् ॥ ८३ ॥

पैर दबाने के गुण- हाथों से धीरे - धीरे पैर दबाना प्रसन्नता और निद्रा लाता है, बल उत्पन्न करता है, कफ, वात और श्रम का नाश करता है, मांस, रक्त एवं त्वचा की पुष्टि करता है तथा सुखदायक होता है ॥ ८३ ॥

प्रवातं रौच्यवैवर्ण्य स्तम्भकृद्दाहपक्तिनुत् ।

स्वेदमूर्च्छापिपासान्नमप्रत्रातमतोऽन्यथा ॥ ८४ ॥ ।

सुखं वातं प्रसेवेत ग्रीष्मे शरदि मानवः ।

निवातं ह्यापे सेव्यमारोग्याय च सर्वदा ॥ ८५ ॥

तेज वायु सेवन के दोष गुण तथा निर्वात स्थान के गुण-। सामने को तेज वायु का सेवन रूक्षता, विवर्णता और जकडा-| हट उत्पन्न करता है, दाह एवं पाचकानि का नाश करता है तथा स्वेद, मूर्च्छा और प्यास मिटाता है । विपरीत दिशा की वायु में इम्पले विरुद्ध गुण होते है । ग्रीष्म और शरद् ऋतुओं में मनुष्य को प्रसन्नतापूर्वक सामने की तेज वायु का सेवन करना चाहिये | आयु की वृद्धि और आरोग्यलाभ के लिये सदा तेज वायु मे रहिन स्थान का सेवन करना चाहिये ॥

आतपः पित्ततृष्णाग्निस्वेदमूर्च्छाभ्रमास्रकृत् ।

दावैवर्ण्यकारी च च्छाया चैतानपोहति ॥ ८६

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श्रध्यायः २४ | चिकित्सास्थानम् १०३ धूप तथा छाया सेवन के गुण दोष - धूप का सेवन पित्त, तृष्णा, अग्नि, स्वेद, मूर्च्छा, भ्रम और रक्त ( रक्तपित्त ) की वृद्धि तथा दाह एवं विवर्णता उत्पन्न करता है और छाया इनका नाश करती है ॥ ८६ ॥

अग्निर्वातकफस्तम्भशीतवेपथुनाशनः ।

आमाभिष्यन्दजरणो रक्तपित्तप्रदूषण. ॥ ८७ ॥

अग्निसेवन के गुण – अग्निसेवन ( आग तापना ) वात, कफ, स्तम्भ ( जकड़ाहट ), शीत और कम्प का नाश करता है, आम और अभिप्यन्द ( स्रोतों की रुकावट ) को जलाता है तथा रक्त एवं पित्त को दूषित करता है ॥ ८७ ॥

पुष्टिवर्णचलोत्साहमग्निदीप्तिमतन्द्रिताम् ।

करोति धातुसाम्यं च निद्रा काले निपेविता ॥

निद्रा के गुण - समय पर निद्रा का सेवन शरीर की पुष्टि तथा वर्ण, चल और उत्साह की वृद्धि करता है, अनि को बढाता है, आलस्य को दूर करता है, और धातुओं को साम्यावस्था में लाता है ॥ ८८ ॥

तत्रादित एव नीचनखरोम्णा शुचिना शुक्लवाससा लघूष्णीषच्छत्रोपानत्केन दण्डपाणिना काले हितमि-तमधुर पूर्वाभिभाषिणा बन्धुभूतेन भूतानां गुरुवृद्धानुम-तेन सुसहायेनानन्यमनसा खलूपचरितव्यं तदपि न रात्रौ, न केशास्थिकण्टकाश्मतुपभस्मोत्करकपालागा -रामेध्यस्नानवलिभूमिषु, न विषमेन्द्रकीलचतुष्पथश्व-भ्राणामुपरिष्टात् ॥ = ॥ प्रस्थान के पूर्व पालन करने योग्य सद्वृत्त - ( प्रस्थान से ) पूर्व ही नख और केश कटवाये हुए, पवित्र, श्वेत वस्त्र धारण किये हुए, छोटी पगडी, छाता एवं जूता पहने हुए, हाथ में छड़ी लिये हुए, समय पर हितकर, अल्प और मधुर वाणी बोलने वाले, जीवों के प्रति बन्धुभाव रखने वाले, गुरु एवं वृद्ध पुरुषों की अनुमति प्राप्त और अच्छे सहायकों से युक्त मनुष्य को यात्रा प्रारम्भ करनी चाहिये । फिर भी रात्रि मैं नहीं चलना चाहिये । केश, अस्थि, काटे, पत्थर, भूसा, राख, Tere ( घास की ढेर ), मिट्टी के ठीकरे, अङ्गार, अपवित्र भूमि, स्नान और वलि प्रदान की भूमि, ऊँची नीची भूमि, इन्द्रकील । ( यज्ञ के लिये गाडे गये यूप ( स्तम्भ ) की भूमि ), चौराहे, और श्व ( गड्ढे ) के ऊपर से नहीं चलना चाहिये ॥ ८ ९ ॥ न राजद्विष्टपरुषपैशुन्यानृतानि वदेत्, न देवत्राह्म-पितृपरिवादांश्च, न नरेन्द्रद्विष्टोन्मत्तपतितक्षुद्रनीचा नुपासीत ॥ १० ॥

राज्य के त्रिल्द, कठोर, चुगली और असत्य वाणी नहीं बोलनी चाहिये । देवता, ब्राह्मण और पूजन लोगों को निन्दा । नहीं करनी चाहिये । राजद्रोही, पागल, धर्मभ्रष्ट, छुद्र और नीच भाचार वाले व्यक्तियों का नङ्ग नहीं करना चाहिये ॥९ ० ॥ । वृक्षपर्वत प्रपातविपमत्रल्मीकदुष्प्रवाजिकुञ्जराद्यधि-रोहणानि परिहरेन, पूर्णनदी समुद्राविदितपल्वलश्वभ्र कूपावतरणानि, भिन्नशून्यागारश्मशान विजनारण्यवा / सान्निसंभ्रमन्यालभुजङ्गकीटसेवाश्च, ग्रामाघात कलह-| शस्त्रसन्निपातव्यालसरीसृपतिसन्निकर्पाश्च ॥ ६१ ॥

वृक्ष, पर्वत, झरना, ऊँची नीची, वल्मीक ( दीमक युक्त ) भूमि, तथा दुष्ट घोडे, हाथी आदि पर चढना त्याग देना ' चाहिये । जल से भरी हुई नदी, समुद्र, विना जाने हुए छोटे तालाब, गड्ढे और कूप में नहीं उतरना चाहिये, टूटे हुए एवं जनरहित मकान, श्मशान, निर्जन तथा वन में नहीं रहना चाहिये | अग्निसम्भ्रम ( ऊपर टटती हुई ज्वाला वाली अग्नि ), व्याघ्र, सर्प तथा कीड़े मकोडों का सेवन ( इनके समीप वास ) नहीं करना चाहिये । ग्रामाघात ( महामारी युक्त ), कलह, युद्ध, व्याघ्र, सर्प और सींग वाले पशुओं के समीप नहीं जाना चाहिये ॥ ९ १ ॥ नाग्निगोगुरुत्राह्मणप्रेह्लादम्पत्यन्तरेण यायात् । न शवमनुयायात् । देवगोब्राह्मण चैत्यध्वज रोगिपतितपाप-कारिणां च छायां नाक्रमेत । नास्तं गच्छन्तमुद्यन्तं वाऽऽदित्यं वीक्षेत्र । गां धापयन्तीं धयन्तीं परसस्यं वा चरन्तीं न कस्मैचिदाचक्षीत, न चोल्कापातोत्पातेन्द्र-धनूंषि । नाग्नि मुखेनोपधमेत् । नापो भूमिं वा पाणिपादेनाभिहन्यात् ॥ ६२ ॥

अग्नि, गौ, गुरु, ब्राह्मण, प्रेङ्गा ( झूला ) और स्त्री - पुरुष के बीच में से होकर नहीं निकलना चाहिये । शव के पीछे । नहीं चलना चाहिये । देवता, गौ, ब्राह्मण, श्मशानवृक्ष, ध्वजा, रोगी, धर्मभ्रष्ट और पापकर्म में लिप्त व्यक्तियों की छाया नहीं लाँघनी चाहिये । डूबते और निकलते हुए सूर्य की ओर नहीं देखना चाहिये । बछड़े को दूध पिलाती हुई, स्वयं | कुछ पीती हुई या दूसरे का खेत चरती हुई गौ, उल्कापात एवं इन्द्रधनुष की चर्चा किसी से नहीं करनी चाहिये | अग्नि को मुख से नहीं फूँकना चाहिये । जल या भूमि को हाथ पैर से नहीं पीटना चाहिये ॥ ९ २ ॥ न वेगान् धारयेद् वातमूत्रपुरीपादीनाम् । न बहि-वेगान् ग्रामनगरदेवतायतनश्मशानचतुष्पथसलिलाश-यपथिसन्निकृष्टानुत्सृजेन्न प्रकाशं न वाय्वग्निसलिलसो-मार्कगोगुरुप्रतिमुखम् ॥ ६३ ॥

मल - मूत्र आदि के उपस्थित वेग को नहीं रोकना चाहिये, मल, मूत्र आदि वाह्य वेगों का उत्सर्ग, ग्राम, नगर, मन्दिर, श्मशान, चौराहा, तालाब और मार्ग के निकट तथा खुले हुये स्थान में नहीं करना चाहिये । वायु, अग्नि, जल, चन्द्रमा, सूर्य, गौ और गुरु को ओर मुख करके मलोत्सर्ग नहीं करना चाहिये ॥ ९ ३ ॥ न भूमिं विलिखेत्, नासंवृतमुख, सदसि जृम्भो द्वारका सश्वासक्षवथूनुत्सृजेत, न पर्यकिावष्टम्भपाद-प्रसारणानि गुरुसन्निधौ कुर्यान् ॥ ६४ ॥

भूमि को नम से नहीं कुरेदना चाहिये । मुग को बिना ढके हुए सभा में जम्भाई, डकार, श्वाम और छींक नहीं करनी चाहिये । गुरु के समीप पलंग पर सहारा लेकर नया पैर फैलाकर नहीं बैठना चाहिये ॥ ९ ४ ॥