श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 611–620
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 611–620
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Stepper: 9 ] कल्पस्थानम् १३ in water, but it should not be used except in cases of poisoning by phosphorus 7. One tenth grain of apomorphine hydrochloride hypodermically. This acts promptly and produces vomitting with in three or four minutes, but it causes great prostra tion and its effects are occasionally greatly prolonged. Hence it must be used with caution. 2 Use of Antidotes: -Antidotes are remedies which counteracts the effects of poisons. They are devided in Mechanical, chemical and physiological. Mecha nical antidotes are those which render poisons inert by mechanical action, is charcoal acts mechanically by absorbing and retaining within its pores organic and also to a less degree, mineral poisons, Fats, oils and egg albumin prevent the actionof the poison by forming a coating on the mucous membrane of the stomach. Bally food acts as a mechanical antidote to glass as it prevents its action by imprisoning its particles with in its meshes. Chemical antidotes are those which counteract the actions of poisons by forming harmless or insoluble compounds when brought in to contact with them The examples are acids for albalies, alkaline carbonates and magnesia for mineral acids lime for oxalic acid, sodium sulphate for lead and tannin and albumin for alkaloids.. A very important chemical antidote for organic poisons is potassium permanganate owing to its oxidizing propert'es The following formula is a useful chemical antidote which is recommerded in cases where the nature of the poison swallo. wed is tot definitely known, or in cases where it is suspected that a combination of two or more poisonous substances had been taken. - Powdered charcoal...2 parts. Tannic Acid... 1 part Magresia ( Magnesium oxide ).. 1 part These drugs are mixed together, and the mixture is adminstered in the doses of a teaspoonful stirred up in a tambler fal of water, to be repeated frequently. Charcoal has the property of absorbing alkaloids Tannic acid precipitates alkaloidsglucosides and many of the metals Magresia neutralizes acids, and is used as an antidote to arsenic, if hydrated ferric oxide is not at hard Physiological antidotes or antagonists are those which act on the tissues of the body and produce symptoms exactly opposite to those caused by the poison acting on the same tissues ie Atropine and physostigmine atropine and pilocarpine Strychnine and bromides with chloral hydrate, digitalis and aconite and chloroform and amyl uitrites 3. Elimination of Absorbed poisons -The poison which has been absorbed into the system should be eliminated by the natural emunetory channels by giving hot baths, warm packs, diuretics and purgatives ( when not contra indicated. ) 4 Treatment of General symptoms: -Pain in the stomach due to the irritation of the gastric mucous membrane should be relieved the administration of anodynes and demulcents If it is very severe, one fourth grain of morphine should be administered hypodermically Shock and collapse should be combated by warmth to surface in the form of friction, a hot bath or hot bottles or by hypodermic injection of stimulants in the form of sulphuric ether, strychnine, digitalis or cuffine Water containing 40 grains of sodium chloride to the pint and sweetened with glucose should be given frequently by the mouth, if there is dehydration owing to intense vomitting or diarrhoes. If the water can not be retained by the mouth, an enema of two pints of warm normal saline should be administered. In severe cases it is advisable to administer intravenously normal saline particularly by the drip method. It also dilutes the poison in the blood and promotes its elimination from the system, especially by the kidreys, Respiratory failure should be treated by the hypodermic injection of atropine or strychnine by artificial respiration and by inhalation ofoxygen and carbon dioxide Coma should be treated by the hypodermic injection of 1/3 garin of strychnine, by the intravenous or intramuscular injection of 5 to 15 CC of a 25 % solution of coramine and by lumbar puncture In a case where com is prolonged, an intravenous injection of normal saline may be adminste.ed continuously by the drip method Convulsions should be controlled by chloroform or by a drug belonging to the borbituric acid group ( Med, gurisprudence and Toxicology - by JP modi 3 th edition, P. P. ) 431-434. ) उपर्युक्त गद्यांश का भावार्थ निम्न लिखित है: -- विपाक रोगी की चिकित्सा: - विषाक्त रोगी की चिकित्सा करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए । विषाक्त पुरुष के विष को नष्ट करना ही विपचिकित्सा का प्रधान उद्देश्य होता है । अत निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसार विपाक रोगी की चिकित्मा की जाती है । ( 1 ) अशोपित विष को शरीर से बाहर निकालना । २ ) प्रतिवियों का प्रयोग । ( ३ ) शरीर के संस्थानों में / शोषित हुए विष को बाहर निकालना । ( १ ) लाक्षणिक
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१४ सुश्रुतसंहिता चिकित्सा - ( १ ) गोपित चिप को शरीर से बाहर निकालना. -- इस उद्देश्य से निन्न उपाय करना चाहिए । ( अ ) आमाशय प्रचालन । ( 3 ) चमन कराना । ( म ) अन्य क्रियाएँ | ( अ ) आमाशय प्रचालन: - यदि रोगी ने विप सेवन मुख मार्ग से किया है और यदि इस बात का पता शीघ्र ही चल जावे तो सबसे पहले रोगी के आमाशय का प्रक्षालन ' प्रक्षालन नलिका ' अथवा ' परप ' से करना चाहिए । ( घ ) वमन कराना: - यदि रोगी होश में हो और तीव्र दाहक विप की आंशका न हो तो अशोपित त्रिप को बाहर निकालने के लिए रोगी को तुरन्त वामक औषधियों से मे किमी के द्वारा चमन कराना चाहिए । वामक औषधियाँ: -१ सैन्धव टवण ११ तो ०, रोगी को पिला देना चाहिए । २ राई का चूर्ण १४ तो ०, देना चाहिए । ३. जिंक सल्फेट १ माशा देना चाहिए । ४. टिचर इपीका ४ से मिला कर देना चाहिए । उष्णोदक ४ टोक बोल कर जल? छट्टोंक मिला कर पिला , जल ४ छटाँक घोल कर पिटा ६ नाम, उष्णोदक र छटाँक । " तुत्थ ३ मे " रत्ती तक टग्णोदक १ इटाँक घोट कर पिला देना चाहिए ( केवल फास्फोरम की विषाक्तता में ) ६. एपोमार्फीनरी जल में घोल कर अधस्त्वक सूचीवेधन करना चाहिए । अन्य चामक औषधियाँ - मैनफल, मुलहठी, कटुतुम्बी, नीम, इन्द्रायण, छुटज की छाल, सूर्या, देवदाली, वायविडन, चित्रकमूल, तुरई, अर्कमूल, अरिष्टक, लवण, राई, सरसों, करज, उष्ण जल आदि । अन्य क्रियाएँ - ( ३ ) यदि सर्प के डमने अथवा विषैले कीटादि के दया से विप शरीर में प्रविष्ट हो गया हो तो क्षतस्थान से ऊपर तुरन्त एक बन्धन बाँधकर यदि मुख पर किसी प्रकार का क्षत अथवा सरांचन आदि न हो तो विष को सुत्र से चूमना चाहिए । ( २ ) प्रतिवियों का प्रयोग: - प्रतिदिप तीन प्रकार के होते है । १ यात्रिक प्रति विष, २. रासायनिक प्रतिविष, ३. क्रियाविरुद्ध प्रतिविप । १- यान्त्रिक प्रतिविघ ' - मणि, कांच आदि का चूर्ण लय मुख्ख द्वारा सेवन कर लिया जाता है, तब वह अन्दर पहुँच कर अपनी यान्त्रिक क्रिया के कारण आमादाय और आन्त्र की श्लैष्मिक क्लाओं पर आघात पहुँचाता है और उन्हें स्थान -स्थान पर क्षत - विक्षत कर देता है जिसके परिणाम स्वरूप रक्तस्राव होता है और पीड़ा होती है किन्तु यदि स्निग्ध पदार्थ जैसे चसा, तेल, अण्टे की मफेदी ( अल्ब्यूमिन ) आदि का उपर्युक्त चित्रों का भक्षण करने के तुरन्त बाद अथवा उसके कुछ ढेर के बाद सेवन किया जाय तो आमादाय आदि । की श्लैष्मिक कलाएँ तयुक्त होने से बचाई जा सकती है । वसा, तेल आदि मामादाय और आन्त्र में पहुँच कर वहाँ की मिक कला पर एक आवरण की तरह चढ़ जाती है जिससे मणि, काच आदि की यान्त्रिक किरा फिर नहीं हो पाती । वानस्पतिक या खनिज वियों को आमाशय में निष्क्रिय करने के लिए सूक्ष्म पीने हुए कोयले का चूर्णं खिलाया जाता है २- रासायनिक प्रतिविषः -- ( १ ) यदि अम्लीय पदार्थों का । के रूप में सेवन किया गया हो तो उसके लिए क्षारीय पदार्थों विष| का प्रयोग प्रतिविष के रूप में कराना चाहिए और यदि क्षारीय पदार्थों का विष के रूप में प्रयोग किया गया हो तो अम्लीय पदार्थों को देना चाहिए । ( २ ) खनिज अम्लों के लिए मैग्नीशिया और कार्बोनेट्स देना चाहिए । ( ३ ) ऑक्जेटिक ( तिम्मिक ) अम्ल के लिए चूना । ( ४ ) नाग और टेनिन बिपी के लिए सोडियम सल्फेट । ( ५ ) रसकर्पूर चिप के लिए एल्ब्यूमिन । ( ६ ) दाहक क्षारीय विपों के लिए नींबू का रस अथवा सिरका | किन्तु इस बात का ध्यान अवश्य रमना | चाहिए कि ऐसे प्रतिविषों का सेवन कराना चाहिए जिसमे । शरीर पर किसी प्रकार का बुरा प्रभाव न हो । ३ - क्रिया विरुद्ध प्रतिविपः - ( १ ) एट्रोपीन के लिए मार्फिया । ( २ ) एट्रो. पीन के लिए पिलोसपन । ( ३ ) ट्रिकनीन के लिए घोमाइ-दूम, डोरल हाइड्रेट के साथ । ( ५ ) डिनिटेलिस के लिए वत्मनाम । ( ५ ) छोरोफार्म के लिए एमिल नाइट्राइट! निम्नलिखित रासायनिक प्रतिजिप अत्यन्त लाभप्रद है-सुचूर्णित कोयला २ भाग, दैनिक एसिड 1 भाग, मैग्नी • शियम ऑक्साइड १ भाग मिला कर रन देना चाहिए । आवश्यकता पढने पर हममें मेरे माझे लेकर " छटाँक जल में मिलाकर देना चाहिए । हमको पुन. दूसरी माना दी जा सकती है । कोयला क्षाराभों का शोषण करा देना है - दैनिकमि क्षाराभों, शर्कराओं या अन्य धातुओं का अवक्षेपण करता है और मंझेशिया अम्लों को निष्क्रिय करता है तथा फेनाम ( समिया ) के प्रतिविष के रूप मे प्रयुक्त होता है । ( ३ ) शरीर के संस्थानों में शोषित हुए त्रिप को बाहर निकालना. - इसके लिए स्वेदल, मूत्रल अथवा विरेचक ओषधियों का प्रयोग उचित अनुचित विचार कर यथास्थान करना चाहिए । ( ४ ) लाक्षणिक चिकित्सा -१. पीटा कम करने के लिए रुजाहर और निग्ध औषधियाँ देनी चाहिए अथवा मॉर्फिया का सूचीपेधन करना चाहिए । २. स्तब्धता और दावसाद की अवस्था में शरीर का ताप बनाए रखने के लिए उप्गोदक से भरी हुई बोतलों से उष्णता पहुँचानी चाहिए । अथवा तेलों से अभ्यन करना चाहिए और शरीर में उत्तेजना पहुंचानी चाहिए | इसके लिए ' स्ट्रिकनीन ' पढे ग्रेन, अथवा ' कैस्फर इन आयल ' अथवा कैम्फर इन ईथर का इजेक्शन लगाना चाहिए । ३. शिरामार्ग से लवणोदक ( नार्मल सैलाइन ) का प्रयोग उचित अवस्था में करना चाहिए । ४. श्वासावरोध की अवस्था में ऑक्सीजन की व्यवस्था करनी चाहिए । ५. श्वासकर्म मे बाधा पढने पर ' कृत्रिम श्वास किया ' करनी चाहिए तथा आवश्यकता पडने पर एट्रोपीन अथवा स्ट्रिकनीन का त्वचा के नीचे इलेक्शन लगाना रोगी के हित में लाभदायक होता है । पिप्पलीमधुक क्षौद्रशर्करेक्षुरसाम्बुभिः 1 छर्दयेद् गुप्तहृदयो भक्षित यदि वै विपम् ॥ ८५ ॥ ।
इति सुश्रुत सहितायां कल्पस्थानेऽन्नपानरक्षाकल्पो नाम प्रथमोऽव्ययः ॥ १ ॥
-xxx - en विपक्षण करने पर वमन प्रयोग - यदि रोगी ने विष पान किया हो तो विपन्न वस्तुओं से हृदय को ढक कर, पिप्पली
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श्रध्यायः २ ] कल्पस्थानम्_ १५ सुटी, मधु, शर्करा, व का रस, जल आदि का सेवन करा । प्राचीन संहिताओं में अधिष्ठान ( आश्रय ) के भेद से स्थावर कर वमन करावे ॥ ८५ ॥
विमर्शः - चरककार का भी इस प्रसन में निम्नलिखित मन है - आडावामागे वां चिकित्सां द्रोपद ë चैत्र हि ममीक्ष्य ॥ ( च.चि. अ. २३११२१ ) अर्थात् यदि विष आमाशय रात हो तो आदि ( प्रारम्भ ) में नम्न कराना चाहिए । यदि त्वचा में स्थित हो अर्थात् चित्र का बाघ प्रयोग हुआ हो तो प्रदेह और परिसेचन आदि का प्रयोग कराया जाता है । अतः विज्ञ चिकित्सक को चाहिए कि वह दोष बल आदि को टैग कर चिकित्सा करे । इसके अलावा एक और स्थान पर आचार्य कहते हैं कि - पीनम स॒द्यो हरेद्विरेकर्डिनीये तु ॥ ( च. चि. अ. २३३११ ) जब त्रिप पिया ही गया हो तो उसे वमन द्वारा निकाल देना चाहिए । दूसरे वेग में विरेचन कराना चाहिए अर्थात् जब विष आमाशय से निकल कर आगे चला गया हो तो तब विरेचन द्वारा ही वह शरीर के बाहर निकाला जा सकता है । aft सुश्रुतसंहितायां स्थानेऽन्नपानराको नाम ग्रथनो s - नाय ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः अथात. स्थावरविपविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
स्थावर विषविज्ञान का अन- अब इसके आगे स्थावर -विषविज्ञानीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श: - वनस्पति जगत ( Ventahle kingdom ) से अर्थात वृक्ष, लता आदि से प्राप्त होने वाले विप अथवा दिपों को स्थावर त्रिप ( Tezetable poisons ) कहा जाता है । इसी प्रकार जनम जगत ( Animal kingdom ) अर्थात् सर्प आदि प्राणियों में पाए जाने वाले विष को जनम विष कहा जाता है । धातुओं अथवा खनिजों से प्राप्त होने वाले विप का समावेश भी स्थावर वियों में कर लिया जाता है अतः स्थावर विप से पूरे अचेनन जगत् जिसके अनुसार ( Veget1-और जंगम ( प्राणिज ) भेद से दो प्रकार के विप लिखे हैं और पीछे के रसतंत्रों के आचायां ने विष तथा उपविप नाम से दो भेद किए हैं । स्थावर जंगम भेों को अकृत्रिम अथवा | प्राकृतिक विष कहते हैं इनके अतिरित गरपि नाम का कृत्रिमचिप भी कहा गया है । अष्टांगहृदय के रचयिता | आचार्य ने भी त्रिप की दो योनियों का वर्णन निम्न प्रकार से किया है - स्थावरं जगम चेनि विष प्रोक्तमकृत्रिमम् । कृत्रिम गर-सन्तु क्रियने विविधेः ( अष्टानहृदय उत्तरतन्त्र अ. ३१५ ) | त्रिपों का वर्गीकरण अनेकों प्रकार मे हुआ है इनमें प्राचीन अर्वाचीन विद्वानों के वर्गीकरण में बहुत असमानता है । अर्वाचीन आचार्य में भी कई मत है किन्तु क्रियानुरूप वर्गी-करण अधिक refer है यथा -१ दाहक ( Corrosives ) २ क्षोभक ( Irritants ),: दाहक - यह अधिक्तर आम्लिक ( Aold ) तथा क्षारीय ( Alkalies ) होते हैं । ये रासायनिक पदार्थ अपनी तोत्र क्रिया के कारण शारीरिक धातुओं के सम्पर्क में आते ही संहारक दिवा को तुरन्त प्रारम्भ कर देते हैं । इससे द्वार पीड़ा होती है परन्तु प्राय. शोथ नहीं होता, काएँ उनकी तीव्रता के अनुरूप लक्षण पैदा करती हैं । यथा गन्धकाल ( Sulphate read Hg S04 ) २. क्षोभक ( Irritants ) यह शरीर में क्षोभ तथा शोय उत्पन्न करते हैं । खाने पर वाह, वमन, रेचन तथा रक्तवमन आदि लक्षण उत्पन्न कर देते हैं । इसके अधिष्ठान तथा स्थानिक क्रिया के । आधार पर अनेकों भेद हैं । अधिष्ठान भेद से- सनिज ( Ore ) | मंत्रिया ( Arsenic ), अजन ( Antimony ), पारद ( Me | rcury ), सीस ( Lead ), ताम्र ( Copper ), यशद ( Zinc ) रजत ( Silver ), विस्मय ( Bismuth ), हीरक ( Diamond ), | कोच ( Glass ), फास्फोरस ( Phosphorus ) तथा वानस्पतिक ( Vegitable ), जमालगोटा ( Pargng croton ), मदार ( अर्क ) ( Calotropis giganticr ), भिलावा ( Larkang | nut ), इन्द्रायण ( Colocynth ), कुंचला ( Strychnos nung comica ), वत्सनाभ ( Aconite ), ननम ( Animal ), सर्प-विष ( Snake venom ), वृश्चिक दा ( Scorpion ), क्रीट दश, कैथेराइड तथा साधजन्य विप ( Ptom3ins ), वायु-नष्टगत - कार्बन डाइ ऑक्साइड स्थानिक क्रियाभेट: -१ मादक ( Inebriants ) - मघ, ईथर, कपूर, तारपीन, b'e and mineral or metallic poisons ) का ज्ञान हो । कारयोटिक अम्ल इत्यादि । २ निद्राकर ( Narcotic ) — जाता है । अहिफेन ( Morphia ). ३ प्रलापक ( Deliriants ) - धतूरा, स्थावरं जङ्गमं चैव द्विविधं विमुच्यते । खुरासानी अजवाइन, भाँग, बेलाडोना इत्यादि त्रिप । ये त्रिप दशाचानमाच तु द्वितीयं पोडशाश्रयम् || ३ || विशेष रूप से मस्तिष्क को प्रभावित कर कार्य करते हैं । दिप के दो प्रकार -- स्थावर और जंगम भेट मे विष दो । सज्ञाहारक ( Anaesthetising ) - कोरोफार्म, हाइडेट्
प्रकार का है । इसमें म्या er far के दस आश्रय स्थान हैं ।
और जंगम विष के अविष्ठान सोलह होते हैं ॥ ३ ॥
विमर्श - चरककार ने विष के दो भेद बताते हुए कहा है - स्वरायां तद्योनी त्रस्ता न्ययोजयत् । तदम्बुसम्भव तम्नाद् द्विविधं पावकोपमन् ॥ ( च. चि. अ. २७ ) तत्पश्चात् ब्रह्मा ने उस विष को स्थावर और जनम योनि में विभक्त कर दिया अत एव वह जल से उत्पन्न होने वाला विष दो प्रकार का हो गया: - स्थावर २ - जंगम विष । विप अग्नि के समान दाह करने वाला होता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि । कोकेन, मार्फिया क्षादि । " सुपुन्ना पर प्रभाव करने वाले-कुचडा ( Strychnine ) हृदय पर प्रभाव करने वाले-तम्बाकू ( Tobacco ), अतिचिपा, वत्सनाभ ( Aconite ) डिजीटेलिस और हाइड्रोसाइनिक एसिड आदि विष ७ फुफ्फुस पर प्रभाव करने वाले. कार्बनडाइ ऑक्साइड, कोलंगंस ( Coal gas ) ८ नाटी मण्डल के प्रभावक विप-कोनियम, क्यूरारे ( Curare ) विप आदि । निम्न लिखित तालिकाएँ उपर्युक्त विषय को और अधिक समझने में सहायक सिद्ध होंगी, अतः-
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१६ सुश्रुतसंहिता ( १ ) विपों का वर्गीकरण ( Classification of poisons ) ( १ ) दाहक ( Corrosives ) ( २ ) क्षोभक ( Irritants ) ( ३ ) वातनाडी प्रभावक ( Neurotics ) ( क ) तीघ्र अम्ल ( Strong acids ) ( ख ) क्षार ( Alkalies ) अनैन्द्रिक ( Inorganic ) १. गन्धकाम्ल H 2 So4 ( २. लवणाम्ल Hel ( ३. शोरकाम्ल HNo, आदि ( क ) निरिन्द्रय ( खनिज ) ( Inorganic ) ऐन्द्रिक ( Organic ) 1 ) आक्जेलिक अम्ल ( CooH 12 2 H20 11 ) कार्बोलिकाल ( C. H, OH ) आदि ( २ ) क्षोभक ( Irritants ) ( ख ) ऐन्द्रिक ( Organic ( 1 ) दाहक सोडा Na Ho ( Causticsoda ) ( 11 ) दाहक पोटाश KHo ( Caustic potash ) ( 111 ) अमोनिया NH3 ( Ammonia ) इत्यादि ॥ ) ( ग ) यांत्रिक ( Mechanical ) १ मणिचूर्ण ( Diamond dust ) २ काचचूर्णं ( Powderedglass ) आदि । ( 1 ) वानस्पतिक ( Vegetable ) ( 11 ) जाङ्गम ( Animal ) ( a ) एरण्ड ( Castorol seed ) ( a ) कैन्थेराइड्स ( Cantharides · ( b ) जयपाल ( Crotonoil seed ) ( b ) सर्पविप ( Snakevenom ) ( c ) अर्क ( मदार ) ( c ) कीटदृश ( Insectbite ) आदि । ( d ) मुसब्बर ( Aloes ) ( e ) इन्द्रायण ( Colocynth ) ( f ) भल्लातक ( Markingunt ) आदि । I धातवीय ( Metallic ) ( 3 ) नाग ( Lead ) ( b ) वर्ग ( Tin ) ( c ) यशद ( Zinc ) ( d ) पारद ( Mercury ) ( e ) ताम्र ( Copper ) ( f ) फेनाश्म ( Arsenic ) ( g ) नीलाञ्जन ( Antimony ) आदि । ( ( क ) मस्तिष्क प्रभावक ( ख ) सुपुन्नाप्रभावक II अधातवीय ( Non - Metallic ) ( a ) भास्वर ( स्फुर ) ( Phosphorus ) ( b ) हरिकी ( Chlorine ) ( c ) दुराधि ( Bromine ( b ) जाम्बुकी ( Iodine ) आदि । ३ ) वातनाडी संस्थान प्रभावक ( ग ) हृदयप्रभावक ( घ ) फुफ्फुस प्रभावक ( ड ) परिसरीय नाडीप्रभावक ( I ) निद्राकर ( 1 ) कुपीलु ( कुचला ) ( 1 ) वत्सनाभ ( 1 ) सल्फरडाइ भोक्साइड ( 11 ) जेल्सीमियम, आदि । ( 11 ) तम्बाकू ( 11 ) कार्बनडाइ ऑक्साइड ( 1m ) हृत्पन्न्री ( Dintalis ) ( 111 ) कार्बन मोनॉक्साइड ( 10 ) कनेर ( अश्वमारक ) ( 10 ) हाइड्रोजन सल्फाइड । ( v ) Hen हाइड्रोस्थेनिक अम्ल । ( II ) मादक ( III ) प्रलापक 1 ( 1 ) मद्य ( Alcohol ) ( 1 ) धतूरा ( 11 ) ईथर ( Ether ) ( 11 ) वेलाडोना ( 111 ) क्लोरोफार्म ( Chloroform ) आदि ( 111 ) भाँग ( 1 ) अहिफेन ( Opium ) ( iv ) खुरासानी अजवाइन आदि । ( 11 ) अहिफेन सच्च ( Morphine ) आदि । ( 1 ) कोनियम ( 11 ) कुरारे ( Curase )
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श्रध्यायः २ ] कल्पस्थानम् १७
मूलं पत्रं फलं पुष्पं त्वक् क्षीरं सार एव च ।
निर्यासो धातवश्चैव कन्दृश्य दशमः स्मृतः ॥ ४ ॥
त्यावर विष के १० अधिष्ठान - मूल, पत्र, फल, पुप्प, छाल, दूध, सार, गोंद, धातु और कन्द ये दश स्थावर विप के अधिष्ठान हैं ॥ ४ ॥
टिप्पणी: - अग्नि पुराण में भी विष के स्थावर तथा जंगम दो भेद माने गए हैं यथा - द्विविधं विषमुच्यते । नङ्गमं सर्पमूषादि श्रहादि स्थावरं स्मृतम् ॥ ( २ ९ ५३ ) तत्र, कृीतकाश्वमारगुञ्जासुगन्धगर्ग रेककर घाटविद्यु-च्छिखाविजयानीत्यष्टौ मूलविपाणि; त्रिपपत्रिकालम्बा वरद्वारुकरम्भमहाकरम्भाणि पञ्च पत्रविपाणि; कुमुद्वती-वेणुकाकरम्भमहाकरम्भकर्कोटकरेणुकखद्योतकचर्मरी-भगन्धासर्पघातिनन्दनसारपाकानीति द्वादश फल-विषाणि; वेत्रकादम्बवल्ली करम्भमहाकरम्भाणि पञ्च पुष्पविषाणि; अन्त्रपाचककर्तरीय सौरीयककरघाटक-रम्भनन्दननाराचकानि सप्त त्वक्सारनिर्यासविपाणि; कुमुदनीस्नुही जालक्षीरीणि त्रीणि नीरविपाणि; फेनाश्म ( भस्म ) हरितालं च द्वे धातुविपे; कालकूटवत्सना -भसर्पपपालककर्ड मकवैराटकमुस्त कशृङ्गीविषप्रपुण्डरी-कमूलकहालाहलमहाविषकर्कटकानीति त्रयोदश कन्द-त्रिपाणि; इत्येवं पञ्चपञ्चाशन् स्थावरविपाणि भवन्ति || ५ || ५५ स्थावर विषों का निर्देश- इसमें कोतक, कनेर, गुञ्जा, सुगन्ध, गर्गरक, करवाद, विद्युच्छिखा, विजया ये मूल विष हैं । विपपत्रिका, लम्बा, वरदार, करम्भ और महाकरम्भ ये पाँच पत्रविप हैं । कुमुद्वती, वेणुका, करम्भ, महाकरम्भ, कर्कोटक, रेणुक, खद्योतक, चर्मरी, इभगन्धा, सर्पधाती, नन्दन, सारपाक, ये वारह फल विप हैं । वेत्र, कादम्ब, वलीज, करम्भ और महाकरम्भ ये पाँच पुष्प विष हैं । अन्त्रपाचक, कर्त्तरी, सौरोयक, करघाट, करम्भ, नन्दन, नाराचक, ये सात स्वक् सार और निर्यास विप हैं । कुमुदन्नी, स्नुही, नालन्दीरी ये तीन चीर विप हैं । फेनाश्म और हरताल ये दो धातु विष हैं । कालकूट, वत्सनाभ, सर्पप, पालक, कर्दमक, वैराटक, मुस्तक, शृङ्गीविष,
प्रपुण्डरीक, मूलक, हालाहल, महाविष, कर्कटक ये तेरह ।
कन्द विष हैं । इस प्रकार पचपन स्थावर विष हैं ॥ ५ ॥
विमर्श ' - आचार्य गयदास द्वारा उपर्युक्त पाठ में कुछ परिवर्तन किए गये हैं यथा गयो तु गर्गेरक - स्थाने अनन्ता इति पठति । नाराच स्थाने वल्लोज पठति, पालक - स्थाने बलाह -निति पठति ॥ इसी प्रकार ' रेणुका ' के स्थान पर ' वेणुका ' तया ' जालचीरी ' के स्थान पर ' क्षीरिणी ' नामक पाठ के । औचित्य को कई विद्वान स्वीकार करते हैं । कविराज हाराणचन्द्र महोदय ' नाराचक ' के स्थान पर ' वराटक ' तथा ' सर्पप ' के स्थान पर ' सर्वपक ' एवं ' प्रपुण्डरीक ' के स्थान पर ‘ प्रपौण्डरीक ' नामक पाठ को रचित मानते हैं । इसी प्रकार कई विद्वान ' फेनाश्म ' से सखिया और कुछ विद्वान ' फेनाश्म ' से ' फेनाश्म भस्म ' का तात्पर्य ग्रहण ३ सु ० क ० करते हैं । उपर्युक्त सभी विषों में केवल वत्सनाभ, श्री विप ( सिंगिया विप ) हरताल नामक विषों को आज का चिकित्सक समाज जानता है तथा औषधि योगों में प्रयुक्त भी करता है । इसी प्रकार कीतक ( मुलेठी ), विजया ( भाँग ), कनेर, गुञ्जा, स्नुही ( सेहुण्ड ) का दूध भी परिचित पदार्थ हैं किन्तु बाकी अन्य विषों को चाहे वनवासी कोल, भिल्ल, किरात या पहाड़ी चरवाहे आदि का समाज भले ही जानता हो किन्तु आज का चिकित्सक समुदाय इनसे अनभिज्ञ है । मुलेठी वामक होती है तथा सेहुण्ड का दूध विरेचक होता है जिसके फलस्वरूप ये तत्काल शरीर से बाहर निकल जाते हैं । इसी प्रकार भाँग भी वामक गुणवाली होने के कारण शरीर के बाहर निकल जाती है । चुका है - पौधों के विप स्थावर विष निम्नलिखित दस लिखे हैं यया-१ मूल विप २ पत्र विप ३ फल विप पुष्प विष ५ व # ६ सार ७ निर्यास ८ वीर विष ९ धातु विप १० कन्द विप सुश्रुतकार का मत ऊपर के श्लोकों की टीका में बताया जा मूल, पत्र, फल आदि अधिष्ठान वाले कहलाते हैं । शास्त्रों में स्थावर विषों के अधिष्ठान ( आश्रय ) तथा ५५ प्रकार आश्रय I ५ II ५ ३ २ I योग ५५ उपर्युक्त सूत्र में स्पष्ट रूप से कहा ही गया है । चरककार के मतानुसार — मुस्तकं पौष्करं कौलं
वत्सनामं बलाहकम् । कर्कट कालकूटं च करवीरकसंज्ञकम् ॥
पालकेन्द्रायुधं तैल मेचक कुशपुष्पकम् । रोहिषं पुण्टरीकं च लाङ्गलक्यञ्जनामकम् ॥ सङ्कोचं मर्कटं गोविषं हालाहलं तथा एवमादीनि चान्यानि मूलजानि स्थिराणि च ॥ ( च. चि. भ. २३३१० - १२ ) अर्थात् मुस्तक, पौष्कर, क्रौञ्च, वत्सनाभ, ( मीठा विष ), वलाहक, कर्कट, कालकूट, करवीर, पालक, इन्द्रायुध, तैल, मेचक, कुशपुष्पक, रोहिप, पुण्डरीक, लाङ्गलकी, अञ्जनाम, सङ्कोच, मर्कट, श्रृङ्गी विप, हालाहल, इमी प्रकार अन्य जो विष मूलज हैं वे स्थावर विष हैं । स्थावर विपों में मूलवियों की प्रधानता के कारण उन्हें सामान्यत मूलज कहा जाता है । परन्तु पत्रविष, फलविष, क्षीरविप इत्यादि अन्य जो स्थावर विपों के अधिष्टान भेद से चिप हैं उनका भी मूलज विप से ही ग्रहण कर लिया लाता है । धातुवियों में सखिया, हरताल आदि का समावेश है । इस प्रकार चरककार ने २१ विप स्थावर विषों के भेद स्वरूप लिखे हैं । इन स्थावर विपों में मौलि ( मूलज ) विषों की प्रधानता होने के कारण चरककार ने उन्हें ' मूलज
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१८ सुश्रुतसहिता विप ' नामक सज्ञा प्रदान की है परन्तु वास्तव में इनमें वाग्भट को भी इन विषों का सम्यक् परिचय ज्ञात नहीं था । सुश्रुतकार द्वारा कहे गए ८ मूल विपों के अतिरिक्त १३ कन्द सहिताकारों के बहुत समय बाद रससिद्धों ने पारद के विप भी सम्मिलित हैं । इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रहकार के सस्कार करने के लिए औषधियों के साथ साथ विषों की भी मतानुसार ५५ विष हैं जो सुश्रुतकार के मतानुकूल ही हैं । खोज की और उनका निर्देश विपवर्ग में भी किया है । उन्होंने अष्टाङ्गहृदयकार के मतानुसार कालकूट, इन्द्रचरस, शृङ्गी, वत्सनाभ आदि तीव्र कन्द विपों को महाविप अथवा विप हालाहल आदि चार कन्द विपों का ही अत्युग्र विपों के उदाहरण स्वरूप निर्देश है । शार्ङ्गधर, धन्वन्तरि निघण्टु कार तथा आचार्य भावमिश्र के मतानुसार विपवर्ग में वत्सनाभ, हारिद्र, सक्तुक, प्रदीपन, सौराष्ट्रिक, अंगिक, कालकूट, हालाहल और ब्रह्मपुत्र इन ९ कन्द विपों का तथा सेहुण्ड, अर्क ( आक ), कनेर, कलिहारी, धतूरा, गुआ और अफीम इन सात उपविषों का निर्देश मिलता है । इस प्रकार मौल विप, जिनका प्राचीन वर्णन प्राप्त है, उन्हें नीचे
श्लोकों में दिया जा रहा है: -- वत्सनाभ - सिन्धुवारसदृक्पत्रो
वत्सनाभ्याकृतिस्तथा । यत्पार्श्वे न तरोवृद्धिर्वत्सनाभः स भावितः ॥
हारिद्र - हरिद्रातुल्यमूलो यो हारिद्रः स उदाहृतः । साक्तुक — यद् ग्रन्थिः सक्तुकेनैव पूर्णंमध्यः स सक्तुक | प्रदीपन - प्रदीप -होद्दितो य ' स्याद्दीप्तिमान् दद्दनप्रम | महादाइकर पूर्वैः कथितः स प्रदीपनः ॥ सौराष्ट्र - सुराष्ट्रविषये य ' स्यात्स सौराष्ट्रिक उच्यते । शृगक चिप - यस्मिन् गोटके वद्धे दुग्धं भवति लोहितम् । सशृङ्ग इति प्रोक्तो द्रव्यतत्व विशारदै ॥ कालकूट- देवासुररणे देवे तस्य पृथुमालिनः । दैत्यस्य रुधिराज्जात तरुरश्वत्थसन्निभ ' । निर्यासः कालकूटोऽस्य मुनिभिः परिकीर्तितः । सोऽहिच्छत्रे शृङ्गवेरे कोङ्कणे मलये भवेत् ॥ हालाहल - गोस्तनामफलो गुच्छस्तालपत्र-च्यदस्तथा । तेजसा यस्य दान्ते समीपस्था द्रुमादयः ॥ असौ छालाको शेय. किष्किन्धायां हिमालये । दक्षिणाग्धि तटे देशे को-णेऽपि च जायते ॥ ब्रह्मपुत्र - वर्णत. कपिलो यः स्यात् तथा भवति सारक. | ब्रह्मपुत्र सविशेयो जायते मलयाचले || यद्यपि हारिद्र, सक्क, प्रदीपन, सौराष्ट्रिक तथा ब्रह्मपुत्र का नाम तो प्रकृत संहिता में नहीं दिया हुआ है परन्तु प्रधानतया इन्हीं नौ विपों के स्वरूप का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में उपर्युक्त मिलता है । चरकोक लागली तथा कनेर प्रायः प्रसिद्ध ही हैं । इनके अतिरिक्त गुञ्जा, कुचला, अफीम, भाँग तथा धतूरा आदि जिनका वर्णन चरककार ने भी नहीं दिया है । प्रसिद्ध हैं । इसी प्रकार हरिताल और संखिया को भी सभी चिकित्सक जानते हैं अत ' उनका वर्णन विस्तार है । प्राचीन सहिताओं में विप का जो विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है उसको अपेक्षा पीछे के लिखे हुए सग्रह ग्रथों में विपों का बहुत थोड़ा वर्णन दिया गया है! बिषों के भेद, सख्या तथा परिचय आदि को के नाम से तथा कलिहारी आदि मूलविप और थूहर आदि क्षीर विप, कुचला आदि मूलविप को उपविष के नाम से वर्णित किया है । रसार्णव, रसेन्द्रचूड़ामणि, रसरत्नाकर, रसरत्नसमुचय, रससार तथा राजनिघण्टु में भी विपवर्ग में पाँच महावियों का निर्देश प्राप्त होता है जो शीघ्र ही अपना प्रभाव दिखाते हैं यथा - सक्तुक कालकूट च सितमुस्त तथैव च । शृी कृष्णविष चैव पश्चैते तु महाविषाः ॥ ( रसार्णव । ५ । ३३ ) यूनिक कालकूट न्च वत्सनाभं च सक्तुकम् । पीत च विषवर्गोऽय प्रवरः परिकीर्तितः ॥ ( रसेन्द्रचूडामणि ९ । ११ तथा रसरत्नसमुच्चय १०।८२ ) हारिद्र सक्तुक मुस्त रक्तशृङ्ग च कृष्णकम् । विषपञ्चकमेतद्धि शीघ्रसिद्धिकर परम् ॥ ( रससार १७,२७ ) उक्त रसग्रंथों के विपवर्ग में दिये गये विषों की गणना व नामों की तुलना के हेतु नीचे दी हुई तालिका बहुत उपयोगी सिद्ध होगी । सेन्द्रचूड़ामणि रसरत्नाकर रसार्णव तथा रसरत्न समुच्चय सच्छुक सक्छुक कालकूट कालकूट मुस्तक हारिद्र कृष्णविप वत्सनाभ सुश्रुत संहिता में वर्णित ( आश्रयों ) में से कन्द वियों शास्त्रों में लिखा है और शेष तथा राज रससार निघण्टु सक्तुक सक्तक कालकूट हारिद्र शृङ्गी मुस्तक मुस्तक चरसनाभ स्थावर विप के १० अधिष्ठानों को महावियों के नाम से रस मूल विष, चीर विष, निर्यास विष, फलविप, पत्रविप आदि को उपवियों के नाम से शार्ङ्गधर-सहिता, आयुर्वेद प्रकाश तथा रसेन्द्रसारसग्रह में कहा गया है । इनका उपयोग पारद के मुख करण क्रिया के लिए तथा अन्यत्र ओषधि के रूप में किया गया है । उपवियों की सख्या रसार्णव में ५, रससकेत कलिका में ६, रसेन्द्रचूडामणि, रसेन्द्र चिन्तामणि, रसरत्नाकर, वृहद्योगतरंगिणी, शार्ङ्गधर सहिता, रसरत्नसमुच्चय, धन्वन्तरि निघण्टु, भावप्रकाश, योगरत्नाकर, आयुर्वेदप्रकाश और रसेन्द्रसारसंग्रह पश्चात्कालीन वैद्य सम्भवत. भूल गये थे और इसका कारण रसग्रन्थों में ९, रसतरङ्गिणी में ७, कुछ यह था कि विपों को उत्पत्ति अधिकतर दुर्गम पर्वतों और वनों टन में होती है अतः वहाँ जाकर वहाँ के निवासियों से विपों का परिचय प्राप्त करने का परिश्रम ग्रन्धुओं ने नहीं किया था । यहाँ तक कि सुश्रुत पीछे के वैद्य प्रसिद्ध व्याख्याकार आचार्य रहण को भी इनका सहिता के नहीं था उन्होंने स्वय टिसा है कि परिचय परेरपि धातुमशक्यत्वात् तानि दिमवत्प्रदेशे ' मूलादि विपायन यक स्यानि ॥ इसी प्रकार उनके पूर्ववर्ती किरातशवरादिभ्यो अष्टाहृदयकार | में ११ और रसोपनिपद में ४० लिखी हैं । वर्णन तथा समझने की सुगमता के लिए निम्न ( १ ९ पृष्ठोक्क ) तालिका पुनः बड़ी सहायक सिद्ध होगी इनके अतिरिक्त अन्य बहुत से स्थावर विपों का ज्ञान प्रयोग आजकल चिकित्सा में होता है और उन सवा प्रत्येक वैध को होना चाहिए । आधुनिक विपतन्त्र सम्बन्धी ( Toxicology ) से भी अध्ययन - मनन कर उपर्युक्त विप ज्ञान को पूर्ण बना लेना ज्ञान तथा व्यवसाय की दृष्टि से लाभ कारक होता है ।
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अध्यायः २ ] कल्पस्थानम् & स्थावर विष ज्ञापक तालिका सख्या । रसार्णव संकेत foot १ ही om अर्क करवीर हयारि : लांगली लांगली उन्मत्त X 6 x X x X x ९ X x X x 99 X x चत्वारि वत्सनाभानि मुस्तके द्वे रसेन्द्र चिन्तामणि रसेन्द्र सार संग्रह योगरत्नाकर आदि अर्क लांगली धत्तूर गुञ्जा अहिफेन X X x x
प्रकीर्तिते ।
षट् चैत्र सर्पपाण्याहुः शेषाण्येकैकमेव तु ॥ ६ ॥
कन्दविर्षो के अवान्तर भेद – वत्सनाभ के चार, मुस्तक के दो, सर्षप के छः भवान्तर भेद हैं और अन्य सभी के एक एक भेद होते हैं ॥ ६ ॥
उद्वेष्टनं मूलविषैः प्रलापो मोह एव च ।
जृम्भाद्गोद्वेष्टनश्वासा ज्ञेयाः पत्रविषेण तु ॥ ७ ॥
मुष्कशोफः फलविषैर्दाहोऽन्नद्वेष एव च ।
भवेत् पुष्पविषैश्छर्दिराध्मानं मोह एव च ॥ ८ ॥
त्वक्सारनिर्यासविषैरुपयुक्तैर्भवन्ति हि ।
आस्यदौर्गन्ध्यपारुष्यशिरोरुक्कफसंस्रवाः ॥ ६ ॥
फेनागमः क्षीरविषैर्विड्भेदो गुरुजिह्नता ।
हृत्पीडनं धातुविषैर्मूर्च्छा दाहश्च तालुनि ॥ १० ॥
प्रायेण कालघातीनि विपाण्येतानि निर्दिशेत् । त्यावर विषों के पत्रादि विशेष से गुण विशेष- मूल विष से ऐंठन, प्रलाप तथा मूर्च्छा उत्पन्न होती है । पत्रविप से जृम्भा ( जमुहाई ), अंगों में ऐंठन तथा श्वासकष्ट होता है । फल विप से ( अण्डकोप ) में शोफ, दाह और भन्न में द्वेष । आदि लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं । पुष्पविष से वमन, आध्मान ( अफारा ) और मोह ( मूर्च्छा ) उत्पन्न होते हैं । त्वक् सार, निर्यास आदि विषों के प्रभाव से मुख में दुर्गन्धि, परुषता ( कठोरता ), शिर में दर्द, कफ का स्राव आदि लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं । क्षीर विपों के सेवन से मुख से झाग ( फेन ) निकलना, अतिसार तथा जिह्वा में भारीपन होता है । धातुजन्य विष के सेवन से हृदय में पीड़ा, मूर्च्छा, तालु में दाह आदि लक्षण होते हैं । प्रायः ये विष अपने विषैले प्रभाव से प्राणियों को एक दिन, पन्द्रह दिन तथा एक मास के समय में मारते हैं ॥ ७-१० ॥ विमर्श: - कविराज हाराण प्रन्द्र ' गुरुजिह्नता ' नामक शब्द के स्थान पर ' जिहा जिह्नता ' नामक पाठ को उचित । मानते हैं । चरककार ने स्थावर विपों के लक्षणों को बताते । रसेन्द्र चूडामणि तथा अन्य ग्रन्थ रसतरङ्गिणी रसरत्नसमुच्चय नीलक अर्क करवीर लांगली कनक विषमुष्टि जया X x x x सुही ही क्षीर अर्क अर्कतीर हयारि करवीर लांगली लांगली धत्तूर धतूर विषमुष्टि विषतिन्दुक अहिफेन गुञ्जा गुञ्जा जयपाल रेचक x भल्लातक X विनया हुए लिखा है कि - स्थावर तु जर हिक्कां दन्तहर्षं गलग्रहम् । । फेनवम्यरुचिश्वासमूर्च्छाश्च जनयेद् भृशम् ॥ ( च.चि. अ. २३।१५ ) अर्थात् स्थावर विप उवर, हिचकी, दन्तहर्षं, गलग्रह, झाग आना, वमन ( कै ), अरुचि, श्वास और मूर्च्छा इन्हें अधिक-तया उत्पन्न करता है । आधुनिक मतानुसार भी इन विषों की क्रिया तीन प्रकार की होती है - यथा १ - स्थानिक ( Local ). - यदि विप शरीर के किसी भाग में लग जावे तो केवल उसी स्थान की धातुओं ( Tissues ) का विनाश करता है यथा तीव्र अम्ल और क्षार जहाँ शरीर पर लग जाते हैं वहीं पर अपनी रासायनिक क्रिया द्वारा दाह एव व्रणोत्पत्ति करते हैं । इसी प्रकार रसकपूर, नीलाञ्जन आदि क्षोभक विषों के सम्पर्क में आने पर उस स्थान अथवा अंग में क्षोभ ( Irritation ) एवं शोथ उत्पन्न हो जाता है । तथा कुछ पदार्थ त्वचा और श्लैष्मिक कलाओं ( Mucous memb. rane ) के सम्पर्क में आने पर नाढ़ी को प्रभावित करते हैं । जैसे, बेलाडोना और एट्रोपीन के प्रयोग से आँखों की पुतलियाँ ( Papls ) प्रसारित हो जाती हैं एव वत्सनाभ के प्रयोग से झनझनाहट और सज्ञाहीनता उत्पन्न हो जाती है । २ - सर्वा • ङ्गिक क्रिया ( General or systemic action ): – विप का शरीर के संस्थानों में नव शोषण हो जाता है तय वे सर्वाङ्गिक क्रिया करते हैं यथा -- कुचला के सुषुम्ना पर प्रभाव करने के कारण धनुर्वात की भांति पेशियों में आक्षेप ( Cou = vulsions ) होने लगते हैं । तथा वृक्क पर कैन्थेराइट्स की क्षोभक क्रिया के कारण वृक्कशोथ ( Nephritis ) उत्पन्न हो जाता है । क्लोरोफार्म के नस्य लेने पर मूर्च्छा उत्पन्न हो जाती है, इत्यादि । ३ - स्थानिक एवं सर्वाङ्गिक मिश्रित क्रिया - इसी प्रकार कार्बोनिक एसिड, फास्फोरस आदि कुछ चिप ऐसे भी हैं जो अपने प्रभाव से धातुओं का नाश करके स्थानिक क्रिया करते हैं और साथ ही साथ शरीर में शोषित होकर सर्वाि क्रिया भी करते हैं । भिन्न - भिन्न विषों से भिन्न - भिन्न प्रभाव शरीर पर पडते हैं जैसे वमन, रेचन, आँखों की पुतली का प्रसारित अथवा संकुचित होना, यधिरता, अन्धापन, स्वेदाधिक्य, शीताङ्गावस्था ( Algd state ), प्रलाप, आक्षेप,
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२० सुश्रुतसंहिता पक्षावात, कम्पन, मूत्र की विवर्णता, नाडी की तीव्रता अथवा मन्द्रता आदि लक्षण होते हैं जो निदान करने में बहुत
सहायक होते हैं ।
कन्दजानि तु तीच्णानि तेषां वच्यामि विस्तरम् ॥ ११ ॥
स्पर्शाज्ञानं कालकूटे वेपथुः स्तम्भ एव च ।
ग्रीवास्तम्भो वत्सनाभे पीतविण्मूत्रनेत्रता ॥ १२ ॥
सर्पपे वातवैगुण्यमानाहो ग्रन्थिजन्म च ।
ग्रीवादी बल्यवाक्सङ्गी पालकेऽनुमताविह ॥ १३ ॥
प्रसेकः कर्दमाख्येन विभेदो नेत्रपीतता ।
बैराटकेनाङ्गदुःखं शिरोरोगश्च जायते ॥ १४ ॥
गात्रस्तम्भो वेपथुश्च जायते मुस्तकेन तु ।
शृङ्गीविपेणाङ्गसाददाहोदरविवृद्वयः ॥ १५ ॥
पुण्डरीकेण रक्तत्वमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे वैषण्यं मूलकैश्छर्दिर्हिकाशोफप्रमूढताः ॥ १६ ॥
चिरेणोच्छुसिति श्यावो नरो हालाहलेन वै ।
महाविपेण हृदये ग्रन्थिशूलोद्गमौ भृशम् ॥ १७ ॥
कर्कटेनोत्पतत्यूर्ध्वं हसन् दन्तान् दशत्यपि । कन्द्रवियों के लक्षण - कन्दविप तीक्ष्ण विप होते हैं, उनका वर्णन विस्तार से करूंगा, यथा कालकूट चिप के स्पर्श से । अज्ञान, कम्पन और जडता होती है । वत्सनाभ से ग्रीवास्तम्भ, मलमूत्र का पीले वर्ण का हो जाना तथा नेत्रों में पीलापन होता है, सर्प विष से वायु को विपरीतता, आनाह और ग्रन्थि ( गांठों ) को टत्पत्ति होती है । पालक विप से ग्रीवा की दुर्बलता, वाणी का अवरोध होता है । कर्दमविप के सेवन से मुख से पानी आना, अतीसार, आँखों में पीलापन होता है । वैराटक विप के प्रभाव से अगों का दुखना और शिरोरोग होता है । सुस्तक विप से शरीर में स्तम्भ, कम्पन और श्री-विप से अंगों में शिथिलता, ढाह और उदर की वृद्धि होती है । पुण्डरीक चिप के प्रभाव से आँखों में लालिमा, उटर की वृद्धि और मूलक विष से विवर्णता, हिक्का ( हिचकी ), शोफ, मूढत्व तथा हालाहल विष के प्रभाव से श्वास ढेर में आता है । और मनुष्य का रंग काला पड जाता है । महाविप के सेवन । से हृदय में ग्रन्थि और महान् शूल होता है, कर्कटक चिप के । प्रभाव में आकर मनुष्य ऊपर की ओर उछलता तथा कूदता है और हमता हुआ दाँतों को काटता है ॥ १६-१७ ॥ चिमर्गः- कविराज हाराणचन्द्र महोदय ने ' बातवैगुण्य ' । के स्थान पर ' तालुवैगुण्य ' एवं ' कईमारयेन ' के स्थान पर ' कईमास्ये ' पाठ किया है । रसशास्त्रों में उग्रवीर्य कन्दवियों को महाविप के रूप में प्रयुक्त किया गया है । रम्मरत्नसमुच्चय नामक ग्रन्थ में भी सुश्रुतोक तेरह प्रकार केन्द्रवियों का ही वर्णन मिलता है केवल सुश्रुत के पुण्डरीक, वैराटक और पालक कन्द्रदिप के स्थान पर हारिद्रक, सक्चुक और बालुक यह नामान्तर कर दिया । है । इसी प्रकार आनन्द, रमसार, रसमञ्जरी, रमेन्द्र सारमेन रसेन्द्र चिन्तामणि, बृहद्योगतर गिणी युर्वेदका १८ कन्दविप लिये मिलते हैं । रससार तथा तयाँ रसमञ्जरी के कुछ बिपों के नामों में परस्पर अन्तर है । | इन १८ कन्द विपों में से मक्तक आदि १८ कन्द विप सौम्य होने के कारण औषधियों के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं परन्तु शेष १० कन्दविप ( कालकूट आदि ) अति उग्र होने के कारण औषधि के रूप में ग्रहण नहीं किए जाते, केवल धातुरसवाद और विषवाद में ही ग्रहण किए जाते हैं । कुछ ग्रन्थों में निम्नलिखित ९ कन्दविप मिलते | हैं यथा - ( १ ) वस्मनाभ, ( २ ) हारिद्र, ( ३ ) सक्छुक, ( १ ) सौराष्ट्रिक, ( ५ ) प्रदीपन, ( ६ ) शृंगिक, ( ७ ) कालकूट, ( 4 ) हालाहल, ( ९ ) ब्रह्मपुत्र | रमोपनिषद्-नामक रसग्रन्थ में १० महावियों ( कन्दविषों ) का वर्णन मिलता है यथा - पत्तुक वत्सनाभ च द्विद्वान पीतमुस्तकम् । ..... चत्वारिंशन्महाविपा ॥ ( रमोपनिषद् अ. १११२-१७ ) || इस प्रकार रमप्रन्योक्त ( रसमञ्जरी तथा रस सार आदि ग्रन्थों में वर्णित ) विपों के तुलनात्मक अध्ययन के लिए निम्नलिखित नालिका बढी उपयोग प्रमाणित होगी: -आयुर्वेद प्रकाश, आनन्दकन्द, रसे रसमञ्जरी रससार न्द्रचिन्तामणि, बृहद्योगतरङ्गिणी संस्था १ सक्चुक २ मुस्तक ३ 2 ५ सालेप ६ श्वेतश्रृंगी Q वत्सनाभ Hea ९ कालकूट १० ११ १२ हालाहल १३ मेपशृंगी १४ यमद्रा १५ केशर १६ ग्रन्थि १७ रचभंगी II हारिद्र सक्तुक सक्चुक मुस्तक मुस्तक मयूर मयूर विन्दुक सुमङ्गल सुमनल शङ्खनाभ शंखनाभ वत्सनाभ वरमनाभ बालुक सुनाम कालकूट कालकूट कर्दम शुकुकन्द हालाहल हालाहल शिखि शृङ्ग चक्र विष पुष्कर पुष्कर भ्रामर रक्तग हारिद्र आधुनिक चिकित्साशास्त्रों में उग्र विषों के अथवा आत्ययिक ( Acute ) विर्षो के लक्षण निम्नलिखित होते हैं— १. वमन ( Vomiting ) – यह वमन क्रिया प्रायः निम्न विपों के सेवन की अवस्था में पाई जाती है- ( अ ) क्षोभक विप ( Irritants ) - जो आमाशय या गले में बेचैनी टम्पन्न करनेवाले यथा तुत्य, सख्त्रिया, जमालगोटा, फास्फोरस, पारट आदि । ( ब ) चात संस्थान अथवा वातनादियों पर प्रभाव करनेवाले विष - जो अपनी प्रत्यावर्तित क्रिया से वमन केन्द्र ( Vomiting centre ) को उत्तेजित करके वमन कराते हैं
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पध्यायः २ ] कल्पस्थानम ३१ यथा मैण्टोनीन, डिजिटेलिस आदि । इनरियों का वामक प्रभाव क्षामाशय वा ताल ( क्ण्ट ) में कोई विकृति कारक प्रभाव नहीं करता । ( म ) नींद लाने वाले नि यथा कार्बोलिक एसिड- यह पि निकल होने के साथ साथ चमन भी कराता है । ( द ) अन्नविप- पीतल अथवा फॉर्म के घर्तन में रखे हुए दधि आदि भव्य पदार्थों दे मेवन में यमन होने लगता है । किन्तु कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जिनमें लक्षण स्वरूप ' वमन ' होता है इसलिए घमन मे पटना का सन्देह करने के पहले उन रोगों का विचार भी करना आवश्यक हो जाता है । यह रोग यों से होते हैं, जैसे दर वृद्धि ( Herain ), शुद्ध ( Cole pains ), शोय, मग, त्रपु शो ( Appendicitis ), विसूचिका ( Cholers ), शोध ( Hepatitis ), पित्ताशय शोथ ( Coole yetitis ), गुदाशोध ( Pro - titis ), सथना गुदरोग, हीर, शोध, मद ( Tumours ), सामाशयान्त्र में ( विशेष रूप से सामादाय में ) आदि तथा परमार, र, मस्तिष्क विधि तथा मधुमेह आदि में भी चमन होता है । २. विरेचन ( Peretion ) - दिमीरमी पि को विधाता के कारण रोगी को अनिमार भी होने लगता है और टम क्षतिसार में मल के साथ रक्त की प्रवृत्ति होती । किन्तु कभी - कभी लेना । Maeoas ) भी निकलता है । यह उन प्रायः क्षोभक वियों के सेवन की नवस्था में मिला है । हकयों के मेवन की अवस्था में भी विरेधन के लक्षण ष्टिगोचर होने है इनके अतिरिक्त अविष ( Tool pmisoainz ) की लवस्था में भी अतिमार हो जाना । मल के मार की प्रवृत्ति होती है तो प्रायः । क वर्ग का होता है Tarry stools, Blei- stools ) किन्तु प्रवाहिका, स्वनिमार ( Bacillary dysentery, । विसूचिका, आन्त्रशोथ आदि रोगों में भी मल माथ कभी - कभी रफ प्रवृत्ति होती देखी जाती है अतः इन बातों को ध्यान में रमकर ही कोई निर्णय करना चाहिए । ३. मुख में हार का बहना ( कालामाव ) Shivation विप के कारण रोगी के गुप से लार गिरने लगती है प्रायः चमनाभ, वार, मनिया, तुरय, पारा, तम्बाकू, एर घोमाइड । वियों की अवस्था में यह लक्षण दृष्टिगोचर होता है । किन्तु मुखपाक Stomatitis ), मृगी, पापाणगडंम ( Mamps ) आादि । रोगों में भी ' अत्यधिक दालानाव ' लक्षण स्वरूप मिलता है । ta. सावधान होकर किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए । ४. आध्मान का होना ( Tympnitis ) - कुछ चिप वायु को रोककर उदर को फुला देते हैं । इन विष में उदर पर हाथ से उपण ( Percussion ) करने से वायु का । शब्द सुनाई देता है और रोगी का उदर फूला हुआ मालूम होता है । पारद, अफीम, मिट्टी का तेल तथा फास्फोरस आदि विपों के कारण यह लक्षण उत्पन्न होता है किन्तु गुदोदर, उदरावरणशोथ, प्रवाहिका, आन्त्रिक ज्वर ( टाइफाइड ) आदि रोगों की भवस्था में भी आँतों में मल का अवरोध होने से पेट में साध्मान हो सकता है । ५. उदर में तीव्रशूल युक्त मकुचन दोना ( Colic ): - कुछ । | वियों की अवस्था में उदर को पेशियों में प्रवल संकोच | ( ऐंठन होता है यथा मीमक चिप ( Tead poisoning ) की अवस्था में । किन्तु मन्त्रजन्यशूल तथा विसूचिका । रोग की सवस्था में भी आँतों में ऐंठन हो सकती है । ६. पुनम ( Papil ) पर प्रमान कुछ विपों के कारण | पुनली अपने स्वाभाविक आकार से छोटी हो जाती है अथवा संकुचित हो जाती है यथा अफीम, सर्पचिप तथा कमी - कभी चरमनाभ विष की अवस्था में | किन्तु मस्तिष्क में तय होने पर अथवा मस्तिष्क के तीच भाघात ( Concussion of the brain ) की तृतीयावस्था में भी पुतली सचिन हो जाती है । इसी प्रकार मद्यपान के उपरान्त अफीम का सेवन करने से पुतली अनियमित हो जाती है अर्थात् एक नेत्र की पुतली तो विस्फारित ) ( Dilated ) रहती है और दूसरे नेत्र की पुतली सकुचित या धनुभावित ( सामाजिक ) होती है । किन्तु इस अवस्था | में भी अपनाद पाया जाता है, यदि मस्तिष्क में रक्तस्राव हो जाये, अथवा अधिमन्य ( Glucomr ) रोग हो तो । भी पुतली अनियमित हो सकती है । इसी प्रकार बेला ढोना, धतूरा आदि विप के कारण दोनों नेत्रों की पुतलियाँ विस्फारित ( Dahteh ) हो जाती है । ७. वर्णपट ( Bazzing in the eirs ): - विज्वरी ( Qumne ) तथा मेलिसिलिक एमिट की विषाक्तता में पान में भनभनाहट होने लगती है । ८, पीने का आना: - पाइलोकार्पन, अफीम, चरसनाभ आदि विषों की अवस्था में पसीना बहुत आता है । ९. नाना ( Rise in temperature ) - धतूरा चेलाडोना, कोकोन आदि विपों से क्षथवा आमाशय में विक्षोभ करने वाले पदार्थों के प्रभाव से शरीर का ताप यढ़ जाता है तथा पसीना प्राय नहीं निकलता । १०. शीनांगना ( Collapsed for Algid state of the body ) · - विक्षोभक तथा दाहक पदयों के सेवन से, मद्य, सुरमा तथा सर्पविष आदि की विपाकता में शरीर cer पढ़ जाता है किन्तु शूल, उरःशूल, विसूचिका, अतिसार तथा अत्यधिक रक्तस्राव हो जाने की अवस्था में भी शरीर शीतल ( डण्डा ) हो जाना है । शरीर का नीला पट जाना ( श्यावना, Cyanosis ) - अफीम, कुचला, कार्बन डाइ आक्साइड, सल्फोनल, सर्पविष तथा अन्य दाहक विपों की अवस्था में शरीर में नीला रह भा जाता है किन्तु फुफ्फुसपाक ( श्वसनक Pneumon11 ) क्षय, रोहिणी ( Diphtheria ), उर.क्षत, ( छाती में रक्त-स्राव होने पर ), श्वासमार्ग में याधा तथा गलगण्ड ( Goitre ) की अवस्था में भी मुख अथवा शरीर नीलवर्ण अथवा कृष्णवर्ण ( काले रग ) का हो जाता है । १२. सन्याम की अवस्था ( Com ) - मद्य, धतूरा, तुरथ, भाँग, अफीम आदि विपों के प्रभाव से शरीर सन्यासग्रस्त ( Comatose ) अर्थात् सज्ञारहित हो जाता है । किन्तु मलेरिया, यूरीमिया, कोलीमिया, मधुमेह, प्लेग तथा विसूचिका आदि रोग भी मनुष्य में सन्यास ( Coma ) के लक्षण उत्पन्न कर देते हैं ।
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२२ सुश्रुतसंहिता १३. प्रलाप ( Dehrium ) - धतूरा, कर्पूर, भाँग, मद्यपान अफीम तथा हायोम्पायमम आदि विपों की विपाकता में रोगी प्रलाप करने लगता है । किन्तु पागलपन, मानसिक आघात, शूल, मधुमेह, उच्च ज्वर तथा यूरीमिया आदि की अवस्था मैं भी रोगी बकवाद अथवा प्रलाप करने लगता है । १४. आक्षेप तथा अन्य वातनाटी मण्टल जनित लक्षण Con, ulsions and other nervous symptoms- अर्क सखिया, अफीम, सीमा, तम्बाकू आदि विषों की अवस्था में आक्षेप ( Convulsions ) होने लगते हैं किन्तु अपस्मार, धनुःस्तम्भ ( Tetanus ), जलसन्नाम ( Hydrophobia ), नाढीजन्य फिरन, योपापस्मार, गर्भाक्षेपक ( Eclempsia ) तथा यूरी. मिया आदि रोगों में भी ये आक्षेप उत्पन्न हो जाते हैं । चस्मनाभ, ससिया, मीमा, सर्पविष आदि विषों के प्रभाव से शरीर के अन्दर ( विशेषकर जिहा में ) अकर्मण्यता आ जाती है । मदात्यय, सीसा, तथा संखिया विप की विपाकता में शरीर में क्षोभ होने के कारण कम्पन होने लगता है । तथा व t नाम चिप मे त्वचा में चुनचुनाहट ( टिङ्ग लिङ्ग ) उत्पन्न हो जाती है । १५ मूत्र पर प्रभाव - मनिया, पारद, फास्फोरस, शीतल चीनी आदि विपों के परिणाम स्वरूप रक्त से युक्त मूत्र की प्रवृत्ति होती है किन्तु मूत्राश्मरी आदि की अवस्था में भी vaara सूत्र निकल सकता है । सनाय, रेवन्दचीनी, तथा कार्बोलिक एमिदजन्य विपाच्छता में मूत्र का रग काला हो जाता है । धतूरा, विप के प्रभाव से मूत्र ज्याग करने में कठिनाई होती है किन्तु सूत्रामर्ग में अवरोध, प्रमेह, अष्टीला ( Prostate enlarged ) मन्त्राशय शोथ तथा गर्भा वस्था में भी यही लक्षण मिल सकता है अतः भलीभांति सोच विचार कर ही निश्चय करना चाहिए । १६. नाडी पर प्रभाव - धतूरा, मीसा आदि विपों के प्रभाव मे नाही कठोर हो जाती है । तथा भाँग, अफीम, तम्बाकू एवं चश्मनाम आदि विषों के प्रभाव से नाड़ी की गति धीमी ( मन्द्र ) पड़ जाती है किन्तु मधुमेह, मन्यास, कामला, और मस्तिष्कावरणशोय ( Meningitis ) की अवस्था में भी नाही मन्दगति से चलती है । इमी प्रकार कपूर, फास्फोरस मद्य तथा धत्तर विष की अन्तिम अवस्था में नाड़ी को गति तेज हो जाती है । किन्तु मर्च्छा, अपस्मार, लू लगने की अवस्था में भी नादी की गति तीव्र हो जाती है । १७. आम - प्रश्वास पर प्रभाव - वरमनाम, मध, सुरमा, तथा अहिफेन की विषमयता में श्वास की गति धीमी हो जाती है । किन्तु उन्माद, यूरीमिया, अपस्मार तथा मूर्च्छा आदि में भी श्वागति मन्त्र हो जाती है । छोरोफार्म, निद्रल विष आदि की अवस्था में श्वास के अन्दर घरघराहट होती है किन्तु मन्याम, मस्तिष्क पर चोट लगने मे भी श्वास में घरघराहट वा जानी है । कुछ विशेष लक्षण ऐसे भी होते हैं जिनको देकर विष विशेष की विपाचना का ज्ञान गुरन्त हो जाना है यथा-रोगी की रोगी की अवस्था १. तरकाल मृत्यु २. मूर्च्छा ३. हृदयावसाद ४. सुख का पीत वर्ण होना ५. प्रलाप अवस्थानुसार विप का निदान विष का अनुमान १. पोटेशियम साइनाइड kon. २. हाइड्रोसायेनिक एसिड hon, २. कार्बन मोनोऑक्साइड co ४. कार्बन डाइ ऑक्साइड CO2 ५. तीच अमोनिया ६. ऑक्जेलिक एसिड १. अहिफेन अथवा मार्फिया २. मद्य ३. क्लोरोफार्म ४. कोरल हाइड्रेट ५. कर्पूर १. तीव्र अम्ल २. चार ३. वत्सनाभ ४. फेनाश्म ५. तमालपत्र ६. नीलाञ्जन ७ एण्टीपाइरिन १. एण्टीफेन १. धत्तूर २. बेलाडोना ३. भाँग ४. मद्य ५. कर्पूर ६. खुरासानी अजवाइन ६. धनुर्वात की भांति १. कुचला पेशी आक्षेप ७. पक्षाघात ८. पुतलियों का २ सखिया ( फेनाश्म ) ३. नीलाञ्जन १. वत्सनाभ २. फेनाश्म २. नाग ४. कोनियम १. धतूरा विस्फारित होना २. बेलाडोना ९. पुतलियों का संकुचित होना १०. वचा की शुष्कता ३. खुरासानी अजवाइन ( प्रथम अवस्था ) ४. अहिफेन ( अन्तिम अवस्था ) ५. वत्सनाभ ६. मद्य ७. क्लोरोफार्म १. अहिफेन ( अफीम ) २. कार्बोनिक एसिट ३. लोरल हाइड्रेट १. धतूरा २. बेलाडोना ३. खुरासानी अजवाइन