श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 621–630
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 621–630
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श्रध्यायः २ ] कल्पस्थानम् २३ रोगी की ११. स्वचा की आर्द्रता १२. मुख श्वेत १२. चमन अवस्था विप का अनुमान १. अहिफेन २. वरसनाभ १. मद्य ४. नीलाञ्जन ५. तम्बाकू ६. किसी भी चिप के कारण हृदयाव • साद की अवस्था । होना १. कार्बोनिक एसिड २. रसकर्पूर ३. दाहक अम्ल तथा क्षार १. संखिया ( रकमिश्रित कपिल वर्ण का वमन ) २. नीलाञ्जन ( श्वेत वर्ण का वमन ) २. डिजिटेलिस ४. वत्सनाभ ५. अमोनिया ६. फास्फोरस आदि इन विशेष लक्षणों के ज्ञान से विषजुष्ट व्यक्ति का निदान बहुत ही सरलता एवं शीघ्रता से हो जाता है तथा आहार पूर्व पेय द्रव्यों में विप मिला कर सेवन करने वाले सभी व्यक्तियों में प्रायः समान क्षण प्रकट होते हैं । इन लक्षणों को देख कर आसानी से विष का अनुमान लगा लेना चाहिए साथ ही विषाक्त व्यक्ति की पारिवारिक अवस्था एवं उसकी दिनचर्या आदि का भी पता लगाना चाहिए क्योंकि
इससे भी निदान करने में बहुत सहायता मिल सकती है ।
कन्दजान्युग्रवीर्याणि प्रत्युक्तानि त्रयोदश ॥ १८ ॥
सर्वाणि कुशलैर्ज्ञेयान्येतानि दशभिर्गुणैः । उग्रवीर्य वाले तेरह कन्द विष जो ऊपर कहे गए हैं इन सबको बुद्धिमान मनुष्यों द्वारा निम्न लिखित दस गुणों से पहचानना चाहिए ॥ १८ ॥
रुक्षमुष्णं तथा तीक्ष्णं सूक्ष्ममाशु व्यवायि च ॥ १६ ॥
विकाशिविशदं चैव लव्वपाकि च तत् स्मृतम् ।
तोदयात् कोपयेद्वायुमण्यात् पित्तं सशोणितम् ॥ २० ॥
मतिं च मोहयेत्तैक्ष्ण्यान्मर्मबन्धान् छिनत्ति च ।
शरीरावयवान् सौक्ष्म्यात् प्रविशेद्विकरोति च ॥ २१ ॥ ।
आशुत्वादाशु तद्धन्ति व्यवायात् प्रकृतिं भजेत् ।
क्षपयेच विकाशित्वाहोपान्धातून्मलानपि ॥ २२ ॥
वैशद्यादतिरिच्येत दुश्चिकित्स्यं च लाघवात् ।
दुर्हरं चाविपाकित्वात्तस्मात् क्लेशयते चिरम् ॥ २३ ॥
वियों के दश गुण तथा उनके कार्य - विप रूच, उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, आशु, व्यवायी, विकाशी, विशद, लघु और अपाकी होता है । रूप होने से वह वायु को, उष्ण होने से रक्त के साथ पित्त को प्रकुपित करता है । वीक्ष्ण होने के । कारण बुद्धि को मोहग्रस्त करता है एवं मर्म बन्धनों को काट देता है । सूक्ष्म होने से शरीर के अवयवों में शीघ्र प्रवेश । करके विकार उत्पन्न करता है । आशुकारी होने के कारण शीघ्र प्राणों का विनाश करता है । व्यवायी होने से सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है । विकाशी होने से दोप, धातु एवं मलों को नष्ट करता है । विशद होने के कारण कहीं पर भी रुकता नहीं ( चिपकता नहीं ) तथा लघु गुण वाला होने के कारण दुश्चिकित्स्य होना है । अविपाकी होने से बड़ी कठिनाई | से निकाला जाता है इसी कारण मनुष्य को अधिक समय तक कष्ट देता है ॥ १ ९ -१३ ॥ विमर्श: - कविराज हाराणचन्द्र महोदय ने एक पाठान्तर को नित्य प्रदान किया है । वे मति च मोहयेत्तेचण्यान्मर्मबन्धान् छिनत्ति च । " के स्थान पर ' मानस मोदयेत्तदण्यादबन्धरिछन-त्यपि । का पाठ उचित मानते हैं । विष के दश गुणों की चर्चा करते हुए चरककार कहते हैं, कि - ' लघु रूक्षमाशु विशदं व्यवायि तीक्ष्ण विकाशि सूक्ष्मं च । उष्णमनिर्देश्यरस दशगुणमुक्त विष तज्ज्ञः ॥ ( च चि. अ. २३२३ ) विपज्ञाता चिकित्सकों ने चिप के दश गुण कहे हैं । १ लघु, २ रू ६, २ शीघ्रकारी, ४ विशद, ५ व्यवायी, ६ तीक्ष्ण, ७ विकाशी, ८ सूघम, ९ उष्ण, १० अनिर्देश्यरस ( जिसके रस का निर्देश नहीं किया जा सकता ) । विप के गुणों का देह पर प्रभाव बताते हुए चरककार पुनः आगे लिखते हैं कि - रोयाद्वातमशैत्या-पिच सौदम्यादक् प्रकोपयति । कफमव्यक्तरसत्वादन्नरसांश्चानु-वर्तते शीघ्रम् ॥ ( च.चि. अ. २३/२४ ) विप रूक्षता के कारण | बात को उष्ण होने के कारण पित्त को, सूक्ष्म होने से रक्त को, अव्यक्त रस होने से कफ को प्रकुपित करता है तथा यह शीघ्र ही सब रसों का अनुवर्तन करता है क्योंकि सूक्ष्म होने के कारण विप शरीर के छोटे से स्रोत में भी प्रवेश कर जाता है । रक्त भी इसी प्रकार सूचम मार्गानुसारी है अतएव विप सूक्ष्म - भागों में पहुँच कर रक्त को भी प्रकुपित कर देता है इसके साथ ही अपने ' उष्णता ' नामक गुण के कारण भी । यह रक्त की दुष्टि कर सकने में समर्थ होता है । यद्यपि कफ अध्यक्त रस है किन्तु यह भी योगवाही हो जाता है । कफ स्थान में पहुँच कर अन्न के साथ योगवाही होने से कफ को । प्रकुपित कर देता है । सब अन्नरसों के साथ यह देह में प्रविष्ट हो जाता है और अन्न के रस के अनुसार तत्सम्बन्धी दोष अथवा दोपों को प्रकुपित करता है । इसी विषय पर मत | प्रकट करते हुए आगे चरककार लिखते हैं कि - शीघ्रव्यवायि-भावादाशु व्यामोति केवलं देद्दम् | तीक्ष्णत्वान्ममंधनं प्राणधनं तद्वि-| काशित्वात् ॥ दुरुपक्रम लघुत्वाद्वैशद्यात् स्यादमक्तगति दोषम् ॥ ( च. चि. अ. २३ २५ २६ ) शीघ्र गुण और व्यवायी गुण होने से विप शीघ्र ही सम्पूर्ण देह में व्याप्त हो जाता है तीक्ष्ण होने से मनाशक होता है । हृदय आदि ममों पर अपना घातक प्रभाव करता है विकाशी होने से यह प्राणनाशक है । तात्पर्य यह है कि शरीर की स्थिति ओज पर है और विप भोज का नाशक होता है तथा सन्धिधन्धों को शिथिल भी कर देता है जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु हो जाती है । लघु गुण वाला होने से इसकी चिकित्सा अत्यन्त कठिन होती है । विशद गुण युक्त होने के कारण दोष किसी एक स्थान पर टिकता ही नहीं । लघु एवं विशद होने के कारण ही विष सदैव अस्थिर होता है तथा अस्थिर होने के कारण ही उसे दुश्चिकित्स्य
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२४ सुश्रुतसंहिता माना जाता है । अष्टाङ्ग संग्रह के उत्तर तन्त्र में भी इसी अभिप्राय का वर्णन मिलता है यथा - तत्र तैक्ष्ण्यौष्ण्यात्पित्त रक्त च कोपयनि । रौक्ष्याद्वायुम् । वैशयादसक्तवेग प्रसरति । सौक्ष्म्यादथबायित्वाच्च दोषधातुमलादीन् समस्तान् शरीरावयवा -ननुप्रविशति । आशुकारित्वादाशु व्यापादयति । विकाशित्वान्म च्छेदेन मनिं व्यामोहयति । लाघवाद् दुर्निर्हरमव्यक्तरसत्वाच्छ् लेष्म-प्रकोपणमन्नरसश्च सर्वाननुवर्तते ( अत एव च प्रयलेनान्नानि विषतो रक्षेदित्युक्तम् ) । अपाकित्वानरां नो याति । तेनाभ्यवहृतमवश्यं मारयति । मन्त्रोषधवलेन चोपशमितमपि प्रत्ययमामाद्य पुनः प्रकुप्यतीति ॥ इसी प्रकार भोज तथा विप के गुणों का वर्णन तथा तुलना करते हुए आचार्य ने एक स्थल पर कहा भी है कि- विप और मद्य के गुण समान होते हैं तथा ओज और गोदुग्ध के गुण समान होते हैं इसलिए जहाँ विष भोज का विनाश करता है वहाँ गाय का दूध भोज बढ़ाने वाला होता है क्योंकि चिप और ओज के गुण प्रायशः विपरीत ही माने गये हैं, यथा - ' गुरु शीत मृदु ऋण बद्दल मधुरं स्थिरम् । प्रसन्न पिच्छिल स्निग्धमोजो दशगुणं स्मृतम् ॥ आदि । किन्तु शार्ङ्गधर संहिताकार ने विष के केवल आठ गुण ही लिखे हैं यथा - व्यवायी, विकाशी, सूक्ष्म, छेदी, मदावह, आग्नेय, जीवितहर तथा योगवाही । अतः जो जो विष द्रव्य उपलब्ध होते हैं उनमें उक्तगुण वर्तमान अवश्य होते हैं और ये गुण जिस द्रव्य में जितने ही उग्र या तीव्र होते हैं वह द्रव्य उतना ही उग्र या तीघ्र विप माना जाता है ।
स्थावरं जङ्गम यच्च कृत्रिमं चापि यद्विपम् ।
सद्यो व्यापादयेत्तत्तु ज्ञेयं दशगुणान्वितम् ॥ २४ ॥
दश गुर्गों से युक्त विष की तत्काल मारकता - स्थावर, जंगम अथवा कृत्रिम जो भी चिप तुरन्त आदमी के प्राण हरण कर लेता है उसको दस गुणों से युक्त जानना चाहिए ॥ २४ ॥
यत्स्था वर जङ्गमकृत्रिमं वा देहादशेषं यदनिर्गतं तत् । विपन्न पचिभिर्हतं वा दावाग्निवातातपशोपितं वा २५ स्वभावो वा गुणविहीनं विपं हि दूपविपतामुपैति । वीर्योल्पभावान्न निपातयेत्तत् कफावृत वर्पगणानुबन्धि २६ दुपीत्रिप के लक्षण – स्थावर, जगम या कृत्रिम विप जो कि शरीर मे पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकलना किन्तु पचकर या विपन्न औषधियों से नष्ट होकर अथवा दावानल, वायु, धूप से सूम जाने के कारण या अपने ही स्वभाव से ही गुणों में कुछ कम गुणों का हो जाता है उस विष की सज्ञा दूपीविप की हो जाती है । यह दूपचिप चीर्य ( शक्ति ) के कम होने के कारण मनुष्य को शीघ्र ही तो नहीं मारता अपि तु कफ से आत होने मे बहुत वर्षों तक बना रहता है । २५-२६ ॥ निमर्श: - कविराज हाराण चन्द्र जी ' यद्विप ' के स्थान पर ' हिप ' का पाठ प्रहण करते हैं । प्रायः इस प्रकार के को मन्द नि ( Slow roison ) भी कहा जाता है । यह विष मारक तो नहीं होता परन्तु शरीर में विकार उत्पन्न करता है । ऐसे विष प्राय पारद, मीसा, मसिया आदि हैं जो धीरे धीरे शरीर में एकत्रित होते रहते हैं और काफी मात्रा में होने पर ( Cumulative effect ) विषजन्य | प्रभाव उत्पन्न करते हैं इसी को ' वर्षगणानुबन्धी ' संज्ञा भी दी जा सकती है ॥ तेनार्दितो भिन्नपुरीपवर्णो विगन्धवैरस्यमुखः पिपासी । | मूर्च्छन् वमन् गद्गदवाग्विषण्णो भवेश्च दूष्योदरलिङ्ग जुष्टः आमाशयस्थे कफवातरोगी पकाशयस्थेऽनिलपित्तरोगी । भवेन्नरो ध्वस्तशिरोरुहाङ्गो विपक्षस्तु यथा विहङ्गः ॥ २८ ॥
शरीर के अवयव विशेषगत दूषीविष के लक्षण - दूपी विप से पीड़ित मनुष्य को अतीसार रहता है, उसका रंग बदल | जाता है, उसके मुख में दुर्गन्धि एवं विरसता तथा पिपासा । रहती है । मूर्च्छा, वमन, स्वरविकृति नामक लक्षण उत्पन्न । हो जाते हैं । वह मनुष्य सदैव उदास रहता है तथा दूप्योदर । के लक्षणों से पीड़ित रहता है । यदि दूपचिप आमाशयस्थ हो तो कफ बात के लक्षण होते हैं, पक्वाशय स्थित होने पर वायु - पित्त के लक्षण होते हैं । रोगी के शिर के बाल एव | शरीर पर के रोम झड जाते हैं और वह पर कटे हुए पक्षी की भांति गंजा दिखाई पड़ता है । इसी प्रकार रस, धातु आदि में स्थित हुआ दूपविष धातुजन्य रोगों को करता है और शीत, वायु तथा मेघाच्छन्न आकाश के होने पर यह कुपित | होता है ॥ २७-२८ ॥ विमर्श: -- चरककार इस ' विषय में अपना मत प्रदर्शित करते हुए कहा है कि -दोषस्यानप्रकृतीः प्राप्यान्यतम छुदीर-| यति । स्याद्वातिकस्य वातस्थाने कफपित्त लिङ्गमीषत् ॥ तृण्मूर्च्छा ' रतिमोहगलग्रहच्छर्दिफेनादि । पित्ताशय स्थित पैत्तिकस्य कफवात-योविष तद्वत् ॥ तृट्कासज्वर व मथुक्ल मदाइतमोऽतिसारादि । कफ-देशगत कफाधिकस्य वातपित्तयोश्च दर्शयति । लिङ्ग श्वासगलग्रह-कण्डुलालावमथ्वादि ॥ ( च. चि. अ. २३/२६ - २ ९ ) विप यद्यपि तीनों दोपों को प्रकुपित करता है परन्तु दोष के स्थान और व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार उस दोष को अधिक प्रकुपित करता है । वातिक पुरुष के वातस्थान में चिप के पहुँचने पर कफ और पित्त के लक्षण अल्प होते हैं । प्यास, मूर्च्छा, भरति, मोह, गलग्रह, कै ( वमन ), झाग आना आदि लक्षण विशेष दृष्टिगोचर होते हैं । उसी प्रकार पैत्तिक पुरुष के पित्ताशय में स्थित विप में कफ - वात के लक्षण अल्प होते हैं और प्यास, कास, ज्वर, वमन, कुम, दाह, तमः प्रवेश, अतिसार आदि लक्षण होते हैं जो प्रायः पैत्तिक प्रकार के होते हैं । कफाधिक पुरुष में कफाशय गत विपचात पित के लक्षणों को अल्प मात्रा में प्रकट करता है और श्वास, गलग्रह, कण्डू, लालास्राव आदि विशेष लक्षण समूह को उत्पन्न करता है | अभिप्राय यह है कि वातस्थान में स्थित विप श्लेष्मन रोगों को भी करता है अर्थात् वातिक रोग तो मुख्य रूप से होंगे ही किन्तु पित्तज द कफज लक्षणों की उपस्थिति भी रहेगी । इसी प्रकार पित्ताशय एव कफाशय में स्थित विष पित्तज और कफज रोगों को तो मुख्यतः उत्पन्न करता ही है किन्तु साथ ही साथ यथा क्रम वात कफज और वातपित्तज रोगों को भी उत्पन्न करता है । अष्टाङ्गसग्रह के उत्तर तत्र में भी इसी भाव का वर्णन प्राप्त होता है यथा-
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अध्याय २ ] कल्पस्थानम् २५ दोषदिपश्येदन वरिष्ठ विभागन वाग्देवी नाशय नलिएको ॥ मंद सर त भ ४० ) एक स्थान पर भरवारी ( मन्दनिय ) के विषय में पुनः निर्देश करते हैं कि योनि म युगा नगयो निप्रिया aumzepaku ( a. fax. 4. > 218 ~ s ) वह से होने के कारण वर्षाशन में गुद्द समान हिना को प्राप्त होने में रिसर्पण करता है । पाट जाने पर अगम्यनय उमे नष्ट करता है । वीर्य ( णि ) मन्द पद जाता है । प्राय. शिरीन मगिया पित्र की विपाकता { Cluton * Arseni Poining ) ही अवस्था में सुध शिर तथा शरीर पर मे शद जाना एवं गजापन आदि ष्टिगोचर होते हैं । स्थितं रमावि यथोपान करोनि धानुप्रभवन विकाशन् । कोपं च शीतानिलदुर्दिनेषु a. पूर्व शृणुत्र रूपम् ॥ २६ ॥
( शेष की व्याग्या १०२४, नाम २, १८ में देगें । निद्रा गुरुत्वं विजृम्भणं च विलेपनः दुपनिष के पूर्वरूप - निद्रा जाना, भारीपन, जग्हाई, मन्धियों की शिथिलता, रोमाज होना एव अङ्गमर्द ( दशरीर के अपटना ) आदि होता है ॥ २ ९ ३ ॥ तनः यन्नमदाविपाका बरोचकं मण्डलको मोहान् ॥ ३० ॥
धातुभ्यं पाकरारयशोकं दकोदरं छर्दिमथातिमारम् । वेवर्यमून्द्रविषमज्वरान् वा कुर्यात् प्रवृद्धां प्रचतां नृपां वा ॥ ३१ ॥
उन्मादमन्यजनयेत्तथाऽन्य-दानामन्यत् श्रपये शुक्रम् । गान्यमन्यज्जनयेश कुष्ठं तांस्तान विकारांच बहुप्रकारान् ॥ ३२ ॥
कार्य- इसके अनन्तर अन के कारण मद ( नशा होना ), अविपाक, अरोचक, चकरो और फोटो की उम्पत्ति, धातु, हाथ - पैरमुग में शोथ, उदर में जलवृद्धि, चमन, पतिमा, विवर्णता, मूर्खा, विषमज्जर, प्रबल तृष्णा टप करता है । कोई विष उन्माद, कोई आनाह, कोई शुक्र का विनाश, कोई स्वरविकृति, कोई कुष्ठ उत्पन्न करता है । इस प्रकार ये विप नाना प्रकार के रोग उत्पन्न
करते हैं ॥। ३०-३२ ॥
विमर्श: - इसी मग में चरककार का मत निम्नलिखित है यथा - पनिषतु श्रोणि दुष्टाः किटिमकोटलिङ्ग च । ४ सु ० क ० । विशेष सदृष्य रत्यनेवम् ॥ ( घ ० चि ० ४० २३ । ३० ) अर्थात दूषितो र को दूषित करके फोदे फुन्सियाँ, विटिभ तथा कोष्ट ( शीतपित्त, उदर्द, Urticaria ) को करना है | हम प्रकार दविर्षो की अधिक मात्रा । धातुओं में में भी एक को ही दुषित करती है । इस प्रकार वि एक एक दोष को अत्यधिक कुपित करके प्राणों का | हरण करता है अथवा प्रत्येक विष दोष को अत्यधिक दूषित करके जीवन नाश करता है । दूषितं देशकालान्न दिवास्वप्नैरभीक्ष्णशः यरमाद् दृपयते धातूंस्तस्माद् दूषीविषं स्मृतम् ॥ ३३ ॥
दुपचिप को निरकि यह रिष देश, काल, अक्ष, दिन: | मोने मे चार चार धातुओं को दूषित करता है इसलिये इस । विष को दुविष कहते हैं ॥ ३३ ॥
विमर्श - उपर्युक्त लोक की व्यागपा करते हुये आचार्य | दहण ने कहा है कि देश भानूपः प्रभूतानिलशीनवर्षः कालः श्री निनाद असुरानित्यानि मयोक्षणत्वाद व्यायामादिभिरपीत्यर्थः ॥ और इसके अनुसार व्यायाम, मैथुन, शोध आदि भी धातुओं के दूपक होते हैं अतः इनका समावेश भी अम में ही कर लेना चाहिये ।
स्थावरस्योपयुक्तरय वेगे तु प्रथमे नृणाम् ।
याचा जिल्हा भवेतच्धा मूर्च्छा श्वासश्च जायते ॥
द्वितीये वेपथुः माटो वाहः कण्टरुजस्तथा ।
विषमामाशयप्राप्तं कुरुने हृदि वेदनाम् ॥ ३५ ॥
तालुशोपं तृतीये तु शूलं चामाशये भृशम् ।
दुर्वर्णे हरिते शूने जायेते चारय लोचने ॥ ३६ ॥
पकामाशययोस्तोदो हिफा कासोऽन्त्रकूजनम् ।
चतुर्थ जायते वेगे शिरसश्चातिगौरवम् ॥ ३७ ॥
कफप्रसेको चैवर्ण्य पर्वभेदा पञ्चमे ।
सर्वदोषप्रकोपश्च पकाधाने च वेदना ॥ ३८ ॥
पटे प्रज्ञाप्रणाशश्च भृशं चाप्यतिसार्यते ।
exaggera: सन्निरोधश्च सप्तमे ॥ ३६ ॥
स्थावर निर्मा के ७ वेग के लक्षण - स्थावर विष के सेवन मे इसके प्रथम वेग में मनुष्यों की जोभ श्याववर्ण एवं जह हो जाती है, रोगी मूच्छित हो जाता है और श्वास से पीड़ित होता है । दूसरे वेग में कम्पन, शिथिलता, दाह, गले में दर्द होता है तथा आमाशय में विष के पहुँचने पर त्रिप हृदय में वेदना उत्पन्न करता है । तीसरे वेग तालुशोष, आमाशय में तीघ्र शूल होता है, नेत्र विचर्ण हो जाते हैं, हरे रंग के हो जाते हैं तथा शोफयुक्त हो जाते हैं । चौथे वेग में पकाशय ओर आमाशय में तोद, हिचकी, कास, आँहों में गड़गड़ाहट और शिर में भारीपन होता है । पाँचवें वेग में कफ का स्राव, विवर्णता, पर्वों ( जोदों ) का टूटना, सब दोषों का प्रकोप और पकाशय मे वेदना होती है । छठे वेग में बुद्धि और प्राणों का नाश और अतीच अतीसार होने लगता है । सातवें वेग में स्कन्ध, पीठ और कटि ( कम ) टूट जाते है तथा श्वासरोध होकर मृत्यु हो जाती है ॥ ३५-३९ ॥ विमर्श: -- विप की लहर को ही वेग कहते हैं । चरककार ने
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सुश्रुतसंहिता २८
चरे दाहे च हिक्कायामानाहे शुकसंक्षये ।
शोफेऽतिसारे मूर्च्छायां हृद्रोगे जठरेऽपि च ॥ २३ ॥
उन्मादे वेपथौ चैव ये चान्ये स्युरुपद्रवाः ।
यथास्त्रं ते कुर्वीत विपन्नरोपचैः क्रियाम् ॥ ५४ ॥
दुपविष के उपद्रव को चिकित्सा - उबर, दाह, हिफा, आनाह, शुक्रक्षय, शोफ, अतीसार, मूर्च्छा, हृद्रोग, उन्माद, कम्पन और जो अन्य उपद्रव हो उनमें उनकी अपनी चिकित्सा विपन्न औषधियों के प्रयोग से करे ॥ ५३-५४ ॥ साध्यमात्मवतः सद्यो याप्यं संवत्सरोत्थितम् । दूपविषमसाध्य तु क्षीणस्याहित सेविनः || ५ शा इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने स्थावरविपविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
-०० ९ ०० दृषीविषको साध्यामाध्यता के लक्षण - संयमी पुरुष में तुरन्त का विष साध्य है । एक वर्ष का पुराना विष यान है । क्षीण हुए एवं अहितसेवी पुरष में दूषीचिप भी असाध्य होता है ॥ ७७ ॥
विमर्श - दूपचिप को व्याख्या करते हुए आचार्य ढल्हण ने कहा है कि- ' पीविषस्य विपत्वेऽपि स्वेदो न निषिध्यने, येन मन्द्रवीर्यतया कफावरणाद विषवेगेनानुवन्धित्वमस्य, अत. स्वेटेन कफ्स्यावरक्स्योपश्चान्तावपहाय्यं विषं कोष्टगत शोधनेन सकलमेव-हियते ॥ इनि ॥ लिखा है कि - निःश्वासः फूत्कार, विशर्द्धित पायुन कुत्सित-शब्दः शुकं कीटलोम, कौटानां सणा विगतप्राणानां देह्नः शव || इस प्रकार ' विशति ' का अर्थ- गुदा से किया गया कुत्सित शब्द होता है । वृद्धवाग्भटकार ने निम्न अधिष्ठानों का वर्णन किया है यथा दृष्टिनिश्वासस्पष्ट्रा मुसनसायि मूत्रपुरीषशुक्रार्तवला या शुकपित्तशोणितशवानि ॥ " इस प्रकार सर्प बिच्छू, चूहा, ततैया, छिपकली, मकडी, शेर, चीता, रीछ, पागल गीदड़ और कुत्ता आदि के विष को जगम ( प्राणिज ) विष कहते हैं । चरककार ने जगम विष का वर्णन करते हुए लिखा है कि - सर्पा कोटोन्दुरा दना वृचिका गृह-गोधिका । जलौका मत्स्य मण्डूकाः कणमा ' सकृकण्टका • ॥ वहि-। व्याघ्रगोमायुनर नकुलादय । दृष्ट्रिणो ये विष नेषा दष्ट्रोत्थ जङ्गम मतम् ॥ घ. चि. अ. २३1८, ९ ) सांप, कीट, उन्दुर ( चूहा ), लूना ( मकड़ी ), वृश्चिक, गृहगोधिका ( छिपकली ), जलौका ( जोंक ), मछली, मण्डूक ( मेंढक ), कणभ, कृकण्टक ( गिरगिट ) तथा कुत्ता, सिंह, व्याघ्र, गोमायु ( गीदद्द् ), तर ( लकडबग्घा ), नेवला आदि जो दृष्ट्टी ( दाद वाले ) | पशु हैं उनको दाद से उत्पन्न होने वाले विप जगम चिप होते हैं । अभिप्राय यह है कि जितने ही सचिप प्राणी है उनके विषों का समावेश जगम विषों में ही होगा । तत्र दृष्टिनिःश्वासविषा दिव्याः सर्पा, भौमास्तु दंष्ट्राविपा, मार्जारश्ववानरमकर मण्डूकपाकमत्स्यगो-धाशम्बूकप्रचलाकगृहगोधिका चतुष्पादकीटास्तथाऽन्ये सर्पपकतो-इन सुश्रुतसहिताय कल्पस्थाने स्थावरविपविज्ञानीय नाम दंष्ट्रानखविषाः, चिपिटपिच्चिटककपायवासिक द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
-40400-तृतीयोऽध्यायः अथातो जगमविपविज्ञानीयं कल्पं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
टकवर्च कीटकौण्डिन्यकाः शकृन्मूत्रविपा., मूषिकाः शुक्रविपाः, लूतालालामूत्रपुरी पमुख सन्दंशन खशुक्रार्तच-त्रिषा, वृश्चिकविश्वम्भरवरटी राजीवमत्स्यो चिटिङ्गाः समुद्रवृश्चिकाञ्चाल ( र ) विपाः, चित्रशिरःसरावकुर्दिशतदा-रुकारिमेदकसारिकामुखा मुखसन्दशविशर्धितमूत्रपुरीष-विपाः, मक्षिकाकणभजलायुका मुखसन्दंशविधाः, विप-जगम - विष - विज्ञान का उपक्रम - अब इसके अनन्तर जंगम हतास्थि सर्पकण्टकत्ररटी मत्स्यास्थि चेत्यस्थिविपाणि, विष विज्ञानीय कल्प का व्याख्यान करेंगे - जैसा कि भगवान् शकुलीमत्स्यरक्त राजिवरकी ( टी ) मत्स्याश्च - पित्तचिपाः, धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १-२ ॥ सूक्ष्मतुण्डोबिटिङ्गवरटीशतपदीशूकवलभिकाशृङ्गिभ्रम-जगमस्य विपस्योक्तान्यधिष्ठानानि पोडश | राः शूक्रतुण्डविपाः, कीटसर्प देहा गतासवः शवविषाः; समासेन मया यानि विस्तरस्तंपु वद्यते || ३ || शेषास्त्वनुक्ता मुखसन्दंशविपेष्वेव गणयितव्याः || ५ || विप के १६ अधिष्ठान - जगम विप के मोलह स्थान इनमें दृष्टि - निश्वास में चिपवाले दिव्य सर्प हैं । भूमि पर ( अधिष्ठान ) [ जो द्वितीय अध्याय में ] सङ्क्षेप में कहे | पाए जाने वाले सांप दष्टाविप वाले हैं । बिल्ली, कुत्ता, बन्दर, थे उनका वर्णन अब यहाँ विस्तार से करेंगे ॥ ३ ॥ मकर, मण्डूक, पाकमत्स्य, गोह, शम्बूक, प्रचालक, गृह.
तत्र दृष्टिनिःश्वासदंष्ट्रान खमूत्रपुरीपशुक्रलालातच गोधिका, पशु, कोडे तथा अन्य दष्ट्टा एव नत्र चिप वाले हूँ । सुखसन्देशविशर्विततुण्डास्थिपित्तशुकशवानीति || ४ || चिपिट, पिचिटक, कपायवासिक, सर्पपक, तोटक, चर्च, कोट उनमें १ दृष्टि, निश्वास, ३ ष्ट्रा, नम्र, ५ मूत्र, तथा कौण्डिन्यक, इनके मल मूत्र में विष है । चूहों के शुक्र ६ पुरीष, ७ शुक्र, टाटा ( खार ), ९ आर्त्तव, १० मुग्त्र, में त्रिप है । उता ( मकडी ) के लाला, मूत्र, मल, मुख, १३ सन्देश, १२ विनर्वित, १३ तुण्डास्थि, १४ पित्त, १५ शुक | संदेश, नख, शुक्र और आर्तव में विष है । विच्छू, विश्वम्भर, और १६ शव मोह स्थान हैं ॥ ७ ॥ वग्दी, राजीवमत्स्य, उच्चिटिन, ( विषखोपरा ), समुद्रवृश्चिक,
विमर्श -कविराज हाराणचन्द्र महोदय ने ' तुण्डास्थि ' | इनके अगर ( पूछ में स्थित कांडा ) में विप है । चित्रशिर के स्थान पर ' गुवास्थि ' नामक पाठ का ओविय स्वीकार सराव, कुर्दिशत, द्वारकारि, मेढक, सारिकामुख इनके मुख • किया है । आचार्य दन्दण ने उस सूत्र की आया करते हुए ' सदरा, विधि, मूत्र एव मल में चिप होना है । मक्षिका
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अध्याय ३ ] कल्पस्थानम् I ( मक्खी ), कणभ और जॉक इनके मुसलदश में विष होता है । विप से मृत हुए प्राणी को अस्थि, मप का कण्टक ( दर्शन ), घरटी, मछली की स्थि ये अस्थिपि है । शकुल मध्य । राजी, वरटी, मरस्य ये पित्तविष - युक्त होते हैं । सूक्ष्मतुग, नचिटिम, वरटी, शनपदी ( कनजरा ), शुरु, चलभिका, शृंगी, भ्रमर इनके शुक और सुण्ड में विष है । कीट और सप
मृत है । शेष जिनका वर्णन नहीं किया ।
गया है उनको विष में गिनना चाहिये ॥ ५ ॥
रिमर्श ' - आर - भमा अथवा बैल आदि को मारने के लिए यम को पतली कमी ( चैत ) के लगले भाग में लगाई हुई! तेज ( तोपमधारयुक्त ) व पतली की होती है उसी को ' आर ' नाम से सम्वोधित किया जाता है । इसको दि को घुमते हैं इसी के समान रचना व कार्य होने के पारण बिष्ट के एक को भी ' नार ' शब्द में कहा है । चूहे के काटने! भी मनुष्य अथवा अन्य प्राणी विपाक हो जाता है । आधुनिक चिकित्सा शास्त्रों में इस प्रकार उत्पन्न हुई अवस्था को ' पदर ' Iatinte fever कहा जाता है, जिसके लिए ' आवर्तक उपर ' ‘ Relapsing fever ' नामक पर्याय भी प्रचलित है । वृद्ध वाग्भट ने तुष्ट विधिंत के स्थान पर ' स्पर्श एवं रक्त ' का पाठ दिया है ।
भवन्ति चात्र-रातोऽरदेशे रिपवस्तृणाम्बुमार्गान्नधूमश्वसनान् विषेण ।
सदूपयन्त्येभिरतिप्रदुष्टान् विज्ञाय लिन्द्वैरभिशोधयेत्तान् ॥ ।
विपदूषित तृणादियों के ज्ञान की आवश्यकता - ऐसा कहा भी है- देश में प्रविष्ट राजा के तृण ( धाम, भूमा आदि ), जल मार्ग ( पथ ), अन्न, एव वायु को शत्रु विष मे दूषित कर देते है । शत्रुओं द्वारा दृषित किए गये इन द्रव्यों । ( वस्तुओं ) को निम्न - लिपित उपण से पहिचान कर शोधन करे ॥ ६ ॥
दुष्टं जलं पिच्छिल मुगन्धि फेनान्त्रितं राजिभिरावृत च ।
मण्डूकमत्स्यं म्रियते विहगा मत्ताश्च सानूपचरा भ्रमन्ति ॥
जन्ति ये चात्र नराश्वनागा-स्ते च्छर्दिमोहज्वरदाहशोफान् । ऋ ( ग ) च्छन्ति तेपामपहृत्य दोपान् दुष्टं जलं शोधयितु यतेत ॥ ८ ॥
विप मे दूषित जल के लक्षण और उसकी चिकित्सा - विष से दूषित जल पिच्छिल, गन्ध युक्त, फेनयुक्त तथा रेखानों मे पूर्ण होता है, ( इसमें रहने वाले ) मेढक, मछली भर जाते हैं और अनूपचर जीवों के साथ पछि गण भी विष से मतवाले हो कर घूमते हैं । इस जल में मनुष्य, अश्व ( घोडे ), हाथी आदि जो भी स्नान करते हैं उनको वमन, मोह, ज्वर, दाह तथा शोफ हो जाता है । उनके दोषों को दूर करने के उपरान्त दूषित किए गए जल को शुद्ध करने का भी प्रयत्न करें ॥ ७-८ ॥ धवाश्वकर्णासन पारिभद्रान् सपाटलान् सिद्धकमोक्षको च वासराजद्रुम सोमवल्कांस्तद्भस्म शीतं वितरेत् सरःसु । भस्माञ्जलिं चापि घटे निवाय विशोधये दीप्सितमेवमम्भः । दूषित जल की शोधक भोपधि - धावदी ( धव अथवा धाय ), अश्वकर्ण, अमन ( विजयसार ), पारिभद्र ( फरहद ), पाटल, मिक ( निर्गुण्डी ), मोक्षक ( मोखा ), अमलतास ( राज डुम ), सोमनक ( विट्मदिर की छाल ), इनको जला कर इनकी शीतल हुई ( ठण्डी ) भस्म को जल में छिड़क देवे अथवा इम राम की एक अञ्जलि घड़े भर पानी में डाल कर पीने के लिए प्रयुक्त होने वाले जल का इच्छानुसार शोधन करें ॥ क्षिति प्रदेशं विपदूषितं तु शिलातलं तीर्थमथेरिणं वा ॥१० ॥
स्पृशन्ति गात्रेण तु येन येन गोवाजिनागोष्ट्रखरा नरा वा ।
तच्छूनतां यात्यथ दाने च विशीर्यते रोमनसं तथैव ॥
तत्राप्यनन्तां सह सर्वगन्धैः पिट्टा सुराभिर्विनियोज्य मार्गम् । सिचेन पयोभि. सुमृदयितं विडङ्गपाठाकट भी जलेबी ॥ १२ ॥
विपदूषित भूमि के लक्षण और उसकी चिकित्सा - विष मे दूषित हुए भूमि प्रदेश, शिलापृष्ट, तीर्थं ( घाट आदि ), ईरिण ( ऊसर भूमिका मैदान ) का गाय, बैल, हाथी, घोडे, उट, गधे तथा मनुष्य शरीर के जिस जिस भाग से स्पर्श होता है वहाँ यह अग शोध युक्त हो जाता है, उस अंग में जलन होती है, वहाँ पर के रोम तथा नख गिर जाते हैं । इसके प्रतिकार के लिए अनन्ता ( सारिया ) को एलादि गण के साथ सुरा में पीस कर दूध एवं काली मिट्टी अथवा चाल्मीक मृत्तिका मिला + र इससे छिड़काव करे fear areas, पाटा, कटभी ( अपराजिता ) आदि द्रव्यों के कपाय ( कादे ) से परिपेक क्रिया करे अर्थात् उन विपस्पर्शित अगों को उक्त काय से सींचता व स्नान कराता रहे ॥ १०-१२ ॥ तृणेषु भक्तेषु च हृषितेषु सीदन्ति मूर्च्छन्ति वमन्ति चान्ये । 1 विभेद छन्त्यथवा म्रियन्ते तेषां चिकित्सा प्रणयेद्यथोक्ताम् ॥ १३ ॥
त्रिपाऽप्यप्य वाद्यानि चित्राण्यपि वादयेत ।
तारः सुतारः ससुरेन्द्रगोपः सर्वेश्व तुल्यः कुरुविन्दभागः ॥
पित्तेन युक्तः कपिलान्वयेन वाद्यप्रलेपो विहितः प्रशस्तः । वाद्यस्य शब्देन हि यान्ति नाश त्रिपाणि घोराण्यपि यानि सन्ति ॥ १५ ॥
विपदूषित तृण और भोजन द्रव्य के लक्षण - घास भूसा आदि एवं भोजन द्रव्यों के विष से दूषित हो जाने पर जो प्राणी इनका प्रयोग करते हैं वे शिथिल ( ढोले ) पड़ जाते हैं, मूर्च्छामस्त और वमन, अतिसार से पीड़ित हो जाते हैं तथा मृत्यु को भी प्राप्त होते है । ऐसी अवस्था में निम्न लिखित चिकित्सा कर प्रयुक्त विष का प्रतिकार करना चाहिए । विप नाशक या अन्य अगदों से नाना प्रकार के वाद्य यंत्रों पर लेप कर उन्हें बजाए । चादी, पारा, स्वर्ण, सारिवा इन सबके घरावर भाग कुरुविन्द ( मुस्ता या रत्र विशेष अथवा शाण का पत्थर ), इनको कपिल वर्ण की गाय के वित्त में मिला कर
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३२ सुश्रुतसंहिता है । पृदाकु ( Vaper ) सर्प में यह विष यन्त्र पूर्णरूपेण विकसित हुआ रहता है अतः उसका विपदन्त जब उपयोग मैं नहीं रहता है नत्र एक कोर ( कजा Hinge ) द्वारा दुहरा । होकर मुड़कर सिह जाता है । दंश करने के लिने जब सर्प अपना मुख खोलता है तब यह विपन्त स्वयं खुलकर । निकल पड़ता है यदि इसकी ' विपदंष्ट्रा ' नष्ट भी कर दी जावे तो उसकी स्थान पर पूर्ति के लिये अन्य सुरक्षित विपदन्त । रहते हैं । आचार्य ल्हण ने भी उपर्युक्त श्लोक की व्याख्या । करते हुए लिखा है कि- अनुना अननुयोनिता अनुच्यदिना इति यावत, कर्षंणकृनपरावृत्या हि दंष्ट्राणामनोमुखतेनि ॥ कहने यह है कि सर्प काटने के बाद दृष्ट्रा अर्थात् फँसे हुये । दाँतों को मुक्त करने के लिये एक बार उलटा होता है और दाँतों का सुख नीचे की ओर हो जाता है परिणाम । स्वरूप छत में विष पक जाता है । इसीलिये कभी कभी काटने पर चिप का प्रभाव नहीं होता क्योंकि सर्प उलटे बिना ही दाँत निकाल कर अथवा दाँत तोड़कर भाग जाता है अतः त्रि व्रण में नहीं पहुँच पाता । आयुर्वेदीय ग्रन्थों में भी विषयन्त्र का वर्णन बहुत सुन्दर रूप से दिया है यथा-अतः पर प्रवक्ष्यामि दष्ट्रार्णा विषलक्षणम् । दष्ाणान्तु त्रिप नास्ति नित्यमेव भुजङ्गमे ॥ दक्षिण नेत्रमासाद्य विष सर्पस्य तिष्ठति । मकुद्वस्यैव सर्पस्य विष गच्छनि मस्तके ॥ मस्तकाद्धमन यानि तनो नाडीषु तिष्ठति । नाडीयो गच्छने दष्टे विष नत्र प्रवर्तते । ( शतानीकसुमन्तसंवादम् ) चरककार ने भी लिखा है कि-चतस्तु तास वामाषरामिता । पीना वामोत्तराष्टा रक्तय्यावेऽधरोत्तरे ॥ यन्मात्रः पतने बिन्दुगवालात्सलिलोद्र्धनात् । वामाघराय दाय तन्मात्र स्याद्देविषम् ॥ ( च ० चि ० अ ० २३ । १३८-१३९ ) साँप की चार दाएँ होती है । उनमें से वामपार्श्व में नीचे की ओर की कृष्ण होती है और ऊपर की पोल्ली, दाहिनी ओर को नीचे की लाल और ऊपर की श्याम वर्ण वाली होती है । इत्यादि ।
यस्मादत्यर्थमुष्णं च तीच्णं च पठितं विषम् ।
अत ' संर्वविषेपृक्तः परिपेकस्तु शीतलः ॥ ३० ॥
मन्दं कीटेषु नात्युष्णं बहुवातकफं विपम् ।
अतः कीटविपेचापि स्वेदो न प्रतिषिध्यते ॥ ३१ ॥
कीर्दष्टानुप्रविषैः सर्पवत् समुपाचरेत् । ta ा का उपदेश - चूँकि यह चिप अतिशय उष्ण और तीक्ष्ण गुण चाला कहा गया है अतः मत्र वियों में शीतल परिपेक करना चाहिये । कीटों का चिप मन्द न बहुत उष्ण और बहुत कफ वाला होता है इसलिये कीटों के विप में स्वेदन क्रिया का निषेध नहीं है । उग्रविष वाले कीटों के देश की चिकित्मा सर्पों के देश की भांति ही करे || ३०-३२ ॥ स्वभावादेव तिष्ठेत्त महाराशयोर्विषम् ॥ १२ ॥ ।
व्याप्य सावयव देहं दिग्धविद्धादिष्टयोः ।
लोन्याद्विपान्वितं मांसं यः खादन्मृतमात्रयोः ॥ ३३ ॥
यथापि स रोगेण हिश्यते म्रियतेऽपि वा ।
अतचाप्यनयोर्मासमभक्ष्य मृतमात्रयोः ॥ ३४ ॥
मुहूर्तात्तदुपादेयं प्रहारादंशवर्जितम् ममिक्षण के दोष - स्वभाव से हो विप दंश किये हुये स्थान पर रहता है । विषाक्त शस्त्र के द्वारा आवात होने पर तथा माँप के द्वारा काटे जाने पर विप अह्न के साथ माथ सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है । हमी प्रकार मरे हुये विषजुष्ट प्राणी का मांस लोभवन जो कोई खाता है, वह प्राणी उस विष के अनुसार लक्षण युक्त रोग से पीड़ित होता है अथवा मर जाता है । इसलिये विषाक्त बाण मे मारे गये या सर्पदंश के कारण मृत हुये प्राणी के मांग का भक्षण नहीं करना चाहिये और यदि माना ही हो तो प्रहार तथा दश के स्थान को छोड़कर शीघ्र ही एक मुहूर्त के अन्दर ही उस मृत प्राणी के मांग को काटकर निकाल लेना चाहिये ॥ ३३-३७ ॥ विमर्श - उपर्युक्त श्लोक को ब्यागया करते हुये आचार्य | द्दण लिखते हैं कि इदानीं दिग्वािटियो प्रहारदशदेश मांनममध्य मुहूर्ताच्च तदुपादेयमुद्दिशन्नाद - स्वभावादित्यादि । दिग्धविद्वानिष्टयो प्राणिनोरिति शेष । अत्र दिग्धविदोष-लिप्तकाण्डादिहन, अद्दिदृष्टः सर्पदृष्टः | इनि || सवातं गृहधूमाभं पुरीपं योऽतिसार्यते ॥ ३५ ॥
आमतोऽत्यर्थमुष्णासो विवर्णः सादपीडितः ।
उद्वमत्यथ फेनं च विपपीतं तमादिशेत् ॥ ३६ ॥
न चास्य हृदयं वह्निर्विपजुष्टं दहत्यपि ।
तद्धि स्थानं चेतनाया. स्वभावाव्याप्य तिष्ठति ॥ ३७ ॥
विष खाये हुए के लक्षण - वायु के साथ वर से निकलने वाले धूम ( गृहधूम = धुवांस ) के समान रंग का काला मल जिसे आता है, आध्मानग्रस्त, उष्ण अवाला, चिवर्ण हुआ, शिथिलतायुक्त, रोगी जिसको चमन होता हो, मुन्न से फेन ( नाग ) आता हो उस रोगी को ' विपपीत ' विषपान किया हुआ समझे । इस रोगी के विप से प्रभावित हृदय को आग में न जलावे क्योंकि हृदय चेतना का स्थान है अतः । त्रिष स्वभाव से ही उसमें व्याप्त होकर रहता है ॥ ३५-३७ ॥ विमर्श: -- चरककार ने भी इसी विषय के सम्बन्ध में लिखा है कि - पीत मृतस्य हृदि तिष्ठति दष्टविद्वयोर्दशदेशे स्यात् ॥ ( च ० चि ० अ ० २३।३१ ) जिस मनुष्य ने विषपान किया हो तो मरने पर उसका विष हृदय- प्रदेश में विशेषतया मिलता है तथा यदि दृष्ट अथवा विद हो तो वह दंश देश में अधिक स्थित रहता है । अष्टाङ्गसंग्रहकार ने भी लिखा है कि-पोनं मृतस्य हृदये जग्वदिग्धामिविढयो । दशे निष्ठति भूयिष्ठं मर्वतः पिण्डिन विषम् ॥ नाद्यादतो विशेषेण तेषां मांस नढाश्रयम् ॥ ( अ ० [ सं ० उ ० तं ० [ अ ० ४० ) आचार्य माघवकरजी चिपपीत के लक्षणों का निर्देश करते हुये लिखते हैं कि - गृह-धूमाम पुरीप योऽतिसायने । फेनमुद्दमते चापि विपीन तमादि-शेत् ॥ ( विषरोग निदान १५ ) । अश्वत्थदेवायतनश्मशान-वल्मीक सन्ध्यासु चतुष्पथेषु । याम्ये सपित्र्ये परिवर्जनीया ऋक्षे नरा मर्मसु ये च दृष्टाः ॥ ३८ ॥
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श्रध्यायः ३ ] कल्पस्थानम् ३३ विशिष्ट देश आदि में सर्पदष्टों की चिकित्मा करने का निर्देश । पीपल, मन्दिर, ग्मशान, चल्मीक, सन्ध्याकाल, चौराहा, भरणी या मघा नक्षत्र में तथा मर्मस्थानों पर काटे हुए मनुष्यों को चिकित्सा असाध्य होने के कारण नहीं करनी चाहिए ॥ ३८ ॥
विमर्श:: - - एक अन्य आचार्य ने भी असाध्यस्व का वर्णन करते हुए लिखा है कि - चत्यायननवत्मी कल्मशानेषु चतुष्पथे । आर्द्राग्पामधामूलकृत्तिकामरणीषु च ॥ पचम्यां मन्ध्ययोदेशे
नर्मस्वाशु हरेषु च । द्रष्टा ' कष्टेन जीवन्ति यदि ग्युनसम्पदः ॥
इसी प्रकार अवस्था - विशेष के अनुसार भी असाध्यता का कथन आचार्य करते हैं । चरककार ने लिखा है कि-श्मशानचैत्यवरमीकयाश्रममुराये । पक्षमन्धिषु मम्या वर्ध-राष्टमीषुच ॥ न सिध्यन्ति नरा दष्टाः पापण्डायतनेषु च । दृष्टिश्वासमस्पर्शविषैराशीविषैस्तथा ॥ विनश्यन्त्याशु मंप्राप्ता दष्टा मम । ( च. चि. न. २३ / १५८-१६० ) श्मशान, सैन्य, वल्मीक, यज्ञाश्रम, सुरालय में अथवा शुलपन और कृष्णपक्ष की सन्धियों ( अमावस्या तथा पूर्णिमा ) में, मध्याह्नकाल में, आधीरात के समय में, अष्टमी तिथि में तथा पाण्डियों के निवासस्थानों में दृष्ट व्यक्ति असाध्य होते हैं । दृष्टि, श्वाम, मल तथा स्पर्श से जो विपाकान्त कर देते हैं उनके तथा आशीविषों ( दिव्य सप ) का साथ ( सम्बन्ध ) होने से ही मृत्यु हो जाती है । इसी प्रकार जिस किसी भी साँप द्वारा ममों पर देंपे जाने से शीघ्र मृत्यु हो जाती है । मवि मप से श्मशान आदि स्थानों में तथा अमावस्या आदि काल में तथा मर्मस्थान पर दशित होने पर अष्टांग संग्रहकार भी असाध्यता का निरूपण करते है, यथा - मशानचेत्यवरमीकयशाश्रयमुरालये । चतुष्पधे जलस्थाने जीर्णोद्यानेषु कोटरे ॥ क्षीरिमे निम्त्रतरी निर्झरे गिरि -गरे । चकवजगढाकुन्नत्रिशूलाऊजटाधराः ॥ रक्तास्यनयना ये
च नै स्चुराशीविषोपमाः । न तेपा कारनियमो न च वेगेष्वनुक्रम ॥
मन्त्रत्रवान्नापि प्रमा विनिवर्तनम् । उपहारनमस्कारजपशा निपरायण ' ॥ कञ्चित्लोवति तर्दष्टो विरूपो विकलोऽपि वा । तथा-श्मशानचितिचेत्यादौ पद्ममीपमन्धिषु । अष्टमनवमीसन्ध्या मध्यरात्रिदिनेषु च ॥ याम्यनियमघा लेप विशाखा पूर्वनैर्ऋते । नैर्ऋताख्ये मुहूर्ते च दष्ट मर्मसु च त्यजेत् ॥ ( अ. सं. उ. तं अ. ४० ) अजीवितानपपोढिनेषु बालेषु वृद्धेषु बुभुक्षितेषु । श्री मेहिनि कुयुक्त रुक्षेऽवले गर्भवतीषु चापि ॥ ( मा. नि. विप रोग निदान २० ) अर्थात् अजीर्ण. पित्त और धूप से पीड़ित व्यक्तियों में, बालकों, वृद्धों और भूखों में, चक्षीण, मेह से पीड़ित, कुष्टी, रूक्ष, निर्बल व्यक्तियों एवं गर्भवती स्त्रियों में सर्पविष असाध्य होता है । दवकराणां विषमाशुघाति सर्वाणि चोष्णे द्विगुणीभवन्ति । अजीर्ण पित्तातपपीडितेषु बालप्रमेहिवथ गर्भिणीपु ॥ ३६ ॥
वृद्धातुरक्षीणबुभुक्षितेपु रूक्षेषु भीरुष्वथ दुर्दिनेषु । अवस्था विशेष में विपवृद्धि का कथन - दर्वीकर साप का ५ सु ० क ० विष शीघ्र मारक होता है । सभी विप उष्णकाल में । दुगुनी शक्ति से बढ़ते हैं । अजीर्णरोगी, पित्तरोगी, धूप से पीटित, बालक, प्रमेह रोगी, गर्भवती, वृद्ध रोगी, क्षीण, | भूखे, रूक्ष प्रकृति, भीरु एवं बादलों के आने पर सव त्रियों का वेग अधिक बढ़ता है ॥ ३ ९ ॥ शस्त्रक्षते यस्य न रक्तमेति राज्यो लताभिश्च न संभवन्ति ॥ ४० ॥
शीताभिरद्भिश्च न रोमहर्षो विपाभिभूतं परिवर्जयेत्तम् । जिहा सिता यस्य च केशशातो नासावभगश्च सकण्ठभङ्गः ॥ ४१ ॥
कृष्णः सरक्तः श्वयथुश्च दंशे
हन्वोः स्थिरत्वं च स वर्जनीयः ।
वर्तिर्घना यस्य निरेति वक्त्रा-द्रक्तं स्रवेदूर्ध्वमधश्च यस्य ॥ ४२ ॥
दंष्ट्रा निपाताः सकलाश्च यस्य तं चापि वैद्यः परिवर्जयेत्तु । उन्मत्तमत्यर्थमुपद्रुतं वा हीनस्वरं वाऽप्यथवा विवर्णम् सारिष्टमत्यर्थमवेगिनं च जह्यान्नरं तत्र न कर्म कुर्यात् ॥ इति श्रीसुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने विज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
४४ ॥ जङ्गमविप -|| ३ || विष रोग से पीडित की असाध्यता के लक्षण - शख से क्षत होने पर भी जिसका रक्त नहीं निकलता, लताओं से मारने या बाँधने पर जिसके ( त्वचा पर ) रेखाएँ नहीं उभरतीं, शीतलजल के स्पर्श से जिसको रोमहर्ष नहीं होता उस विषजुष्ट की चिकित्सा चिकित्सक को नहीं करनी चाहिए । तथा जिसका मुख टेढ़ा हो जावे, जिसके बाल गिर जायें, जिसकी नासा का भंग हो, जिसका स्वरभंग हो, जिसके दशस्थान पर लालिमा युक्त कृष्ण वर्ण का शोध हो और जिसका हनुस्तम्भ ( Lock jaw ) हो गया हो ऐसे रोगी को भी असाध्य मानकर उसका परित्याग कर देना चाहिए । एवं जिसके | मुख से मोटी वर्तिका के सदृश लालास्राव होता हो, जिसके निम्न तथा ऊर्ध्वं दोनों ही मार्गों से रक्त का स्राव हो रहा हो तथा जिसके दंशस्थान पर चार दंष्ट्राओं के चिह्न हो उसकी भी चिकित्सा वैद्य को नहीं करनी चाहिए । इसी प्रकार जो उन्मत्त हो, जिसमें अत्यधिक उपद्रव ( Compll 1. cations ) दृष्टिगोचर होते हों, जिसका स्वर नष्ट हो गया हो तथा जिसका वर्ण विकृत हो गया हो, जिसमें अरिष्ट के लक्षण दिखाई पढ़ें एवं जिसको किसी प्रकार ( मल, मूत्र ) का वेग अथवा गमनागमन की शक्ति न हो उस व्यक्ति की भी चिकित्सा असाध्य समझ कर नहीं करनी चाहिए ॥४०-४४ ॥ विमर्श - चरककार ने भी इस प्रसङ्ग में अपना मत निम्न प्रकार से व्यक्त किया है यथा - नीलौष्ठदन्तशैथिल्यकेशपतना-
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३४ सुश्रुतसंहिता ङ्गभङ्गविक्षेपाः । शिशिरैर्न लोमहर्षो नामिद्दते दण्डराजी च ॥ क्षतजं क्षनाच्च नायात्येतानि भवन्ति मरणलिङ्गानि ॥ ( च. चि. अ. २३३२ ) अर्थात् विपाक्रान्त पुरुष के यदि ओंठ नीले हो, दांत शिथिल हो गए हों, बाल झड़ते हों, अङ्ग टूटते हों अथवा नासाभङ्ग ( नाक का टेढ़ा पड़ जाना ) आदि हो, रोगी हाथ - पैरों को इधर - उधर फेंकता हो, शीतल द्रव्यों के स्पर्श आदि से भी यदि लोमा ( रोमहर्ष ) न होता हो, दण्डाघात करने पर उस पर अभिघात ( चोट ) का चिह्न न पडे, क्षत करने पर ( चाकू आदि से काटने पर भी ) रक्त न निकले तो रोगी की शीघ्र मृत्यु हो जायगी ऐसा समझना चाहिए । इसी प्रकार महर्षि भालम्बायन ने भी असाध्य रोगी के लक्षण बताते हुए कहा है कि नैति रक्त क्षतायस्य लताघातैर्न राजिकाः । न लोमहर्ष शीताद्भिर्वर्जयेत्त विपादितम् ॥ कहने का तात्पर्य यह है कि सर्पविष में एक शक्तिशाली तरच तत्व ( Fibrin ) नाम का होता है जो रक्त को शीघ्र ही जमा देता है । इसी प्रकार इसके विपरीत एक दूसरा पदार्थ प्रतितन्वि ( Antifihrin ) नामक भी रहता । यह पदार्थ मृत्यु के उपरान्त रक्त को पुन ' तरल वना देता है | अतः इस विप प्रभाव से रक्तस्कन्दन ( Blood coagulation ) हो जाने से शरीर के अवयवों को काटने पर भी रक्तस्त्राव नहीं होता तथा रोगी में सभी प्रकार की प्रत्यावर्तन - क्रियाओं ( Reflex actions ) नष्ट हो जाने के फलस्वरूप ठण्डे पानी के छिड़काव से भी रोमहर्ष नहीं होता । त्वचा की अवनाभ्यता ( Elastionty ) नष्ट हो जाती है इसलिए बेंत या लता के बाँधने पर भी चिह्न नहीं उभड़ता । चरककार ने साँप की चार दंष्ट्राओं में विष रहता है यह माना है अतः यदि सर्प चारों दंष्ट्राओं को लगाता है तो शरीर में विप की मात्रा अधिक प्रविष्ट हो गई है यह मान लिया जाता है अतः इसे असाध्य माना गया है । इसी प्रकार मनुष्य के शरीर में मृत्यूत्तर चिह्नों के स्पष्ट होने से ( रक्तसंचार के बन्द होने से चैत आदि से मारने पर भी त्वचा पर रेखाएँ नहीं उभरतीं । जलाने पर छाला नहीं पडता ) तथा इन लक्षणों के पूर्वरूप उपस्थित होने पर भी रोगी की मृत्यु अपरिहार्य समझ कर चिकित्सा निष्फल मानकर नहीं की जाती है । इति श्रीसुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने जगमविपविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
-000400-चतुर्थोऽध्यायः अथातः सर्पदष्टविपविज्ञानीयं कल्पं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
- अब इसके आगे सर्पदष्ट विपविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १-२ ॥ धन्वन्तरिं महाप्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् । पादयोरुपसंगृह्य सर्पसंख्यां सुश्रुतः परिपृच्छति ॥ ३ ॥
विभागं च दष्टलक्षणमेव च । ज्ञानं च विपवेगानां भगवन्! वक्तुमर्हसि || ४ || प्रकाण्ड बुद्धिमान्, सब शास्त्रों में निपुणता प्राप्त किये हुए भगवान् धन्वन्तरि के चरणों को छू कर निवेदन करते हुए सुश्रुत ने पूछा कि भगवन्! सर्पों की संख्या, उनके भेद, उनके काटने के लक्षणों तथा विष के वेगों के विषय में आप पूर्णरूपेण जानकारी रखते हैं, अतः कहें ॥ ३-४ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्राब्रवीद्विपजां वरः ।
असंख्या वासुकिश्रेष्ठा विख्यातास्तक्षकादयः ॥ ५ ॥
महीधराश्व नागेन्द्रा हुताग्निसमतेजसः ।
ये चाप्यजस्रं गर्जन्ति वर्पन्ति च तपन्ति च ॥ ६ ॥
ससागरगिरिद्वीपा यैरियं धार्यते मही ।
क्रुद्धा निःश्वासदृष्टिभ्यां ये हन्युरखिल जगत् ॥७ ॥
नमस्तेभ्योऽस्ति नो तेपां कार्यं किञ्चिच्चिकित्सया ।
ये तु दृष्ट्रात्रा भौमाये दशन्ति च मानुषान् ॥ ८ ॥
तेपा सङ्घयां प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः । सर्पों के महाविपशाली होने का निर्देश- अपने प्रिय शिष्य सुश्रुत के इन वचनों को सुन कर चिकित्सकों में श्रेष्ठ धन्वन्तरि ने कहा । वासुकि जिनमें श्रेष्ठ हैं ऐसे तक्षका दि | सर्प असंख्य हैं, ये पृथ्वी धारण करने वाले नागेन्द्र हवन की अग्नि के समान तेजस्वी हैं तथा जो निरन्तर गरजते हैं, परसते है, तपते है, सागर, पर्वत, द्वीप समेत पृथ्वी जिनके द्वारा धारण की गई है जो क्रुद्ध हो कर निःश्वास और दृष्टिमात्र से समस्त जगत् का विनाश कर सकते हैं, उन्हें सादर प्रणाम है, उनसे यहाँ चिकित्सा से कोई सम्बन्ध नहीं है । और जो दंष्ट्रा विष वाले तथा पृथ्वी पर विचरण करने वाले सांप हैं और जो मनुष्यों को काटते हैं उनकी संख्या को उचित क्रम से कहता हूँ ॥ ५-८ ॥ अशीतिस्त्वेव सर्पाणां भिद्यते पञ्चधा तु सा ॥६ ॥
दर्वी करा मण्डलिनो राजिमन्तस्तथैव च ।
निर्विषा वैकरञ्जाश्च त्रिविधास्ते पुनः स्मृताः ॥१० ॥
दर्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तञ्च पन्नगाः ।
तेषु दर्वीकरा ज्ञेया विंशतिः षट् च पन्नगाः ॥ ११ ॥
द्वाविंशतिर्मण्डलिनो राजिमन्तस्तथा दश ।
निर्विषा द्वादश ज्ञेया वैकरञ्जास्त्रयस्तथा ॥ १२ ॥
वैकरसोद्भवाः सप्त चित्रा मण्डलिराजिलाः । सर्पों के ५ भेद - ऐसे साँप संख्या में अस्सी होते हैं और इनके पाँच प्रकार होते हैं यथा दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्, निर्विष और वैकर | ये पुनः आकार की दृष्टि से तीन प्रकार के माने गए हैं, यथा- दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्नू । इनमें दवकर साँप छब्बीस ( २६ ), मण्डली सर्प वाईस ( २२ ), राजिमान् दस ( १० ), निर्विप बारह ( १२ ) तथा वैकर तीन ( ३ ) हैं । चित्रित मण्डली ( राजिमान तथा वैकरओं के संयोग से उत्पन्न ) साँप सात ( ७ ) हैं ( मण्डलि से चार तथा राजिमानू से तीन ) ॥ ९ -१२ ॥ विमर्श:: - - चरककार ने भी सर्पों के भेद - प्रभेद का वर्णन करते हुए मत व्यक्त किया है कि दर्वीकरा मण्डलिनो राजि मन्नस्तथैव च । सर्पा यथाक्रम वातपित्तश्लेष्म प्रकोपणा ॥ ( च. चि. अ. २३।१२३ ) सभी सर्प मुख्यतया तीन श्रेणियों में
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श्रध्यायः ४ ] कल्पस्थानम् विभक्त किए गये हैं, १ दर्वीकर, २ मण्डली, ३ राजिमान् । ये क्रमशः वात, पित्त व कफ को प्रकुपित करते हैं । इस प्रकार चरककार ने साँपों के तीन भेद ही कहे हैं और उन्होंने निर्विष तथा वैकरक्ष सर्पों के भेद का उल्लेख नहीं किया है क्योंकि उनके मतानुसार चिकित्सा में निर्विप साँपों के वर्णन की आवश्यकता नहीं होती तथा वैकरक्ष वे सर्प कहाते हैं जो सङ्कर - जाति से उत्पन्न हो अतः इनके दष्ट में मिश्रित चिकित्सा होने के कारण उनका समावेश भी उपर्युक्त तीनों भेदों में ही कर लिया गया है । आधुनिक विद्वानों ने भी इनको नौ विशाल गणों में विभक्त किया है जिनकी कुल ३२६ जातियाँ हैं, जिनमें ३८ जातियों के सर्प न्यूनाधिक विप वाले होते हैं शेष सर्प निर्विष होते हैं । साँप प्रायः २-३ " इञ्च से लेकर ३० -४० फीट तक लम्बे होते हैं तथा अपनी लम्बाई के अनुसार कभी कभी मन भारी होते हैं । उपर्युक्त नौ गणों में आज तक वैज्ञानिकों ने १७०० प्रकार के सर्प देखे हैं जिनमें ३०० प्रकार के विषैले होते हैं; जिनमें चाइपेरिडी ( Viperideae ) के १ ९ तथा कोलुविडी गण ( Colubrine ) के २३१ जातियों में से भी केवल १ ९ जातियाँ ही विषधर तथा प्राणघातिनी होती हैं । भारतवर्ष में प्रायः ३३० प्रकार के सर्प पाये जाते है इनमें से ६ ९ प्रकार के सर्प ही विषैले होते हैं, इन विषैले सर्पों की ४० जातियाँ भूमि पर रहने वाली और शेष २ ९ जातियों के सर्प समुद्र में पाये जाते हैं, अतः केवल भूमि पर पाये जाने वाले ४० प्रकार के सर्प ऐसे होते हैं जिनके काटने से मनुष्य विपजुष्ट हो जाता है । समुद्री सर्प प्रायः काटते ही नहीं क्यों कि उनको अवसर ही कम प्राप्त होता है । इस प्रकार आधुनिक मतानुसार साँप की दो तिहाई संख्या निर्विष तथा संख्या सविप होती है । भारत में पाये जाने वाले सर्पों के वश तथा अनुवशों का वर्णन सक्षेप में निम्न लिखित है - अन्धाहिक वश ( Type hlopidae ) - इसमें ब्राह्मणी, पिङ्गल तथा अन्धाहिक प्रमुख हैं । गौराहिक वश ( Glauconidae ) - इस वश में श्वेतहनु-पिच्छ नामक सर्प प्रमुख माना जाता है । अजगर वश ( Bo1 dae ) - यह एक है अतः इसके दो उपवंश ( १ ) महोरग तथा ( २ ) विशालाहिक किए गए है । महोरग उपवश में राजकीय महोरग, शिलोचन महोरग तथा हीरक महोरग ( The diamond python ) मुख्य कहे गये हैं । विशालाहिक उपवंश में द्वितुण्डी ( दुमुहाँ ), ककडिया, वर्षाहिक, कण्डेर, स्वर्णाभ विशालाहिक, रजताभ विशालाहिक, सकोचक विशा लाहिक तथा सिकताभ विशालाहिक मुख्य हैं । उपपक्षीय सर्प वंश ( Analdae ) - इसमें अहिपातक और मनोज्ञक नामक सर्प मुख्य हैं । त्राणपुच्छी सर्प वश ( Dropeltidae ) - इसमें कण्टकपुच्छ और पुच्छफलक नामक सर्प प्रधान होते हैं । विचित्रवर्णी सर्पं वश ( Xenopeltdae ) - इसमें विचित्राहि मामक सर्प होता है इसमें नील, पीत, श्वेत तथा लाल आदि विविध रंगों का मिश्रण होने के कारण यह अत्यन्त सुन्दर दृष्टि-गोचर होता है । चिपिटशिर वश ( Amlohkcephalidae ) -इस वंश में क्षामहान्व, ऋजुपुच्छ तथा पृथुशीर्ष नामक सर्प होते हैं । उरगवश ( Colabradae ) - यह बहुत बढ़ा वंश है । इसमें कृष्णोरग, पट्टिकाहिक, अनुशल्कक, रोहितसर्प, राज-सर्प, औरहा, पीतविन्दुक, हरानाग, पक्षनाग, पनियाँ साँप, | मणिपृष्ठ, रैखिक, असितधामिन, खुकरी, दीर्घमाल, रेणुक, वृद्धक आदि सर्प होते हैं । नागवश ( Elapidae ) - इसमें दर्वीकर ( Cobras ), शङ्खचूड, नागराज, राजनाग, काला | नाग, राजीमन्त ( Kraits, राजिल, करैत, कौड़िया, गंदैचा, गेहुअन, वैकरक्ष ( Coralsnakes ) आदि सर्प होते हैं । आर्णव सर्प वश ( Hydrophidae ) - इस वंश में असितोद-धिक, पृथुलार्णवक, पीताधरक आदि सर्प होते हैं । आखल मण्डलाक वश ( Viperidae or pitless nipers ) - यह | सर्पवंश भी बहुत बढा है, इनमें बभ्रुकपाय, स्फीतिगानव्याल, पूपतरोध्रपुष्प, शृङ्गनासन्याल ( Common European viper ), । गोनस, मण्डली, सूस्कार आदि सर्प आते हैं । सखलमण्डलीक | वश ( Crotalidae pitted vipers ) - इसमें पालिहिर ( Common | Himalayan viper ), धवलास्यक, शृङ्गकिंकणीक, रक्तमण्डल | ( The Anamalai viper, चित्रमण्डल, वेणुपत्रक, मिलिन्दक, एणीपद, पनसमण्डल आदि सर्प होते हैं । यह वंश भी बहुत घड़ा सर्प वंश माना जाता है । विपाक्त सर्पों को तीन बढे समुदायों में विभक्त किया गया है - १ नागवश ( कौलुबाइन ) २ पृदाकुवश ( वाइपराइन ), ३ सकर सर्प आदि । इन्हीं | दोनों के मिश्रण से सविप और निर्विष भेद से अनेक जातियाँ मिलती है । दश लक्षणों के आधार पर कुछ विष रक्त को जमाते है तथा कुछ प्रोटीन को नष्ट करते हैं और कुछ रक्त । को तरल बना कर अतिमात्रा में रक्तस्राव कराते हैं तथा कुछ | सीधे नाडीसस्थान पर प्रभाव करके श्वास तथा सज्ञा का नाश करने के बाद हृदयावसाद करके मृत्यु का कारण बनते है । इनमें रक्त को जमाने वाले श्लैष्मिक कोटि या राजिमान् श्रेणी में, रक्तस्रावी पैत्तिक मण्डली कोटि में तथा नाड़ी - सस्थान पर प्रभाव करने वाले वातिक या दर्वीकर के वर्ग में आ जाते
हैं । अस्तु ।
पादाभिमृष्टा दुष्टा वा क्रुद्धा प्रासार्थिनोऽपि वा ॥१३ ॥
ते दशन्ति महाक्रोधास्त्रिविधं भीमदर्शनाः । सर्पों के डसने के हेतु— पैर से छूजाने से, स्वभाव से दुष्ट, क्रुद्ध हुए अथवा भोजन की इच्छा से ये अतिशय क्रोधी, भीम दर्शन वाले साँप काटते हैं ॥ १३ ॥
सर्पित रहितं चापि तृतीयमथ निर्विषम् ।
सर्पासाभिहतं केचिदिच्छन्ति खलु तद्विदः ॥ १४ ।
पदानि यत्र दन्तानामेकं द्वे वा बहूनि वा ।
निममान्यल्परक्तानि यान्युवृत्य करोति हि ॥ १५ ॥
च सङ्क्षिप्तानि सशोकानि विद्यात्तं सर्पितं पिक् ॥१६ ॥
राज्य: सलोहिता यत्र नीलाः पीताः सितास्तथा ।
विज्ञेयं रदितं तत्तु ज्ञेयमल्पविपं च तत् ॥१७ ॥
अशोफमल्पदुष्टासृ प्रकृतिस्थस्य देहिनः ।
पदं पदानि वा विद्यादविषं तचिकित्सकः ॥ १८ ॥
सर्पस्पृष्टस्य भीरोहिं भयेन कुपितोऽनिलः ।
कस्यचित् कुरुते शोफं सर्पाङ्गाभिहतं तु तत् ॥१६ ॥
सर्प दश के ३ प्रकार - यह दंश भी तीन प्रकार का होता
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३६ सुश्रुतसहिता है । सर्पित, रति तथा निर्विष दंश । साँप के काटने को समझने वाले कुछ विद्वान् सर्पानाभिहत को भी चतुर्थ प्रकार का दंश मानते है । जहाँ पर एक - दो अथवा बहुत से दांतों के चिह्न, गहराई तक गडे हुए तथा थोड़े रक्त वाले होते हैं, जिन चिह्नों को सौंप उलटकर बनाता है, चुचमालक युक्त, विकार उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म शोफ युक्त होते हैं उनको वैद्य सर्प के । द्वारा काटा हुआ ' सर्पित दश ' समझे । जहाँ पर रेसाऍ लाल । अथवा नीली, पीली या श्वेत हों उसे ' रदित ' जानना चाहिए । यह अल्प चिप वाला होता है । जहाँ परशोथ कम हो तथा रक्त भी थोडा दूपिन हुआ हो और रोगी स्वस्थ रहे वहाँ पर एक । चिह्न या बहुन चिह्न होने पर भी चिकित्सक उम्मको ' निर्विप ' जाने । इसी प्रकार भी व्यक्ति में साँप के छूने मात्र से कृषित हुई वायु किसी - किसी में शोथ उत्पन्न कर देना है, इसको साहिन कहा जाता है ॥ १४-१९ ॥ विमर्श ' -- चरककार ने ' सर्पानाभिहत ' को शङ्काविप में मानते हुए लिखा है कि -दुरन्धकारे विद्वस्य केनश्विद्दष्टशङ्कया । विपद्वेगान्वरच्यर्दिर्मूर्च्छा दाहोऽपि वा भवेत् ॥ ग्लानिर्मोहोऽनिमा • रो वाऽप्येतापि मनम् । चिकित्मिनमिट नस्य कुर्यादाश्वासन बुध. । ( च.चि अ. २३२२८-२२१ ) घोर अन्धकार में किसी वस्तु के चुभने से पुरुष को यह शङ्का हो जाय कि किसी नविष प्राणी ने डस लिया है तो उसी शङ्का से विप का उद्देग हो जाता है जिससे ज्वर, वमन, मृर्च्छा व दाह भी हो सकता है अथवा ग्लानि, मोह व अतिसार हो जाता है । इमे शङ्का-विष जानना चाहिए ।
व्याधितोद्विग्नष्टानि ज्ञेयान्यत्परिपाणि तु ।
तथाऽतिवृद्धवालाभिदसल्पविष स्मृतम् ॥ २० ॥
सुपर्ण देवत्रह्मर्पियक्ष सिद्धनिपेविते विपन्न पधियुक्ते च देशे न क्रमते विषम् ॥ २१ ॥
सर्पविष की अवस्थानिशेष से अपना रोगी अथवा ( घ ) हुए साँप के द्वारा काटे हुए पुरुषों में चिप । अल्पवेग से थोड़ा चढ़ता है । इसी प्रकार अतिवृद्ध, बालक चम्या वाले सर्प के काटने मे भी विप थोडा ही चढ़ता है । तथा गरुड, देवता, ब्रह्मर्षि, यक्ष, मिद्धों से सेवित एव विपन्न ओषधियुक्त स्थानों में विष का संचार नहीं होता है ॥२०-२१ ॥ विमर्श. रुग्ण, उद्दिन, बाल अथवा वृद्ध सर्प में स्वभा वतः विप अप मात्रा में तथा अल्प वीर्य वाला होता है इसी कारण अल्प मात्रा में तथा अल्प वीर्य वाला सर्पविष दष्ट प्राणी के शरीर में पहुँच कर भी अल्प प्रभाव ही करता है । थाङ्गलाङ्गलच्छत्रस्वस्तिकाङ्गुशवारिणः 1 ज्ञेया दर्दीकराः सर्पाः फणिनः शीघ्रगामिनः ॥ २२ ॥ ।
मण्डलैर्विविधैश्चित्राः पृथवो मन्दगामिनः ।
या मण्डलिनः सर्पा ज्वलनार्कसमप्रभाः ॥ २३ ॥
स्निग्धा विविधवर्णाभिस्तिर्यगूर्ध्वं च राजिभिः ।
चित्रिता इव ये भान्ति राजिमन्तस्तु ते स्मृताः ॥ २४ ॥
डर्बीकर - मण्डली राजिल के लक्षण — चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक, अकुदा का चिह्न धारण करने वाले, फणयुक्त और शीघ्रगामी सर्प टवकर होते हैं । नाना प्रकार के मण्डलों से चित्रित, चिपटे, मन्दगति वाले, अग्नि और सूर्य के समान कान्ति बाले सौंप मण्डली है तथा चिकनी, नाना प्रकार के वर्णों की, निरछी और ऊर्ध्वगामी रेग्याओं से युक्त, चित्रित सर्प राजि-मानू होते हैं ॥ २२-२४ ॥ विमर्श - चरककार ने उक्त सपों का वर्णन निम्न प्रकार से किया है यथा - दवकर. फणी यो मण्डली मण्डनः । दिन्दुलसी विचित्राङ्ग पग स्यात्तु राजिमान् ॥ ( च.चि. अ. २३।१२४ ) अर्थात् दकर उन्हें कहते हैं जिनके फन होता है 1 । मण्डली उन्हें कहा जाता है जिन पर मण्डल होते हैं और फन नहीं होता । राजिमान् सर्प वे हैं जिन पर बिन्दु और रेखाएँ होती है और इन्हीं में जिनको देह विशेषतः । चित्रित रहती है । अष्टांगसंग्रहकार ने भी ' मण्डली ' सप के विषय में वर्णन किया है कि - ' या मण्डलिनो भोगा मण्ड-लेविविधश्चिता । प्राशवो म व्रगमना ॥ इति |
मुक्तारूण्यप्रभा ये च कपिला ये च पन्नगाः ।
सुगन्धयः सुवर्णाभास्ते जात्या ब्राह्मणाः स्मृताः ॥ २ ॥
क्षत्रियाः स्निग्धवर्णास्तु पन्नगा भृशकोपनाः ।
सूर्यचन्द्राकृतिच्छत्र लक्ष्म तेषां तथाऽम्बुजम् ॥ २६ ॥
कृष्णा वज्रनिभा ये च लोहिता वर्णतस्तथा ।
धूम्रा ' पारावताभाश्च वैश्यास्ते पन्नगाः स्मृताः ॥ २७ ॥
महिपद्वीपिवर्णाभास्तथैव पमुपत्वचः भिन्नवर्णाश्च ये केचिच्छुद्रास्ते परिकीर्तिताः ॥ २८ ॥
सर्पों की ब्राह्मगादि जाति का निरूपण - जो सर्प मोती, चाँदी की प्रभा के अथवा जो कपिल वर्ण के होते हैं, सुगन्धित होते हैं तथा सुवर्ण की कान्ति के होते हैं वे । साँप ब्राह्मण जाति के हैं । जो माँप स्निग्धवर्ण, अतिशय क्रोधी, सूर्य - चन्द्र की आकृति के या छत्र के अथवा कमल के चिह्नवाले होते हैं वे क्षत्रिय जाति के हैं । जो काले, वज्र के समान लाल वर्ण के, धूम्रवर्णं या घरेलू क्यूतर ( पारावत ) के ममान वर्ण वाले होते है, वे सर्प वैश्य जाति के होते हैं तथा भैस तथा चीता के वर्णं के, कठोर खच्चा वाले, नाना प्रकार के चित्र - विचित्र रगों वाले सर्प शुद्ध । जाति के होते हैं ॥ २५-२८ ॥
कोपयन्त्यनिल जन्तो ' फणिनः सर्व एव तु ।
पितं मण्डलिनश्चापि कफं चानेकराजयः ॥२६ ॥
अपत्यमसवर्णाभ्यां द्विदोपकरलक्षणम् । ज्ञेयौ दोपैश्च दम्पत्यो-दवदियों की वातादि प्रकोपकता- सब फणावाले ( ढर्वीकर ) सर्प वायु को प्रकुपित करते हैं । मण्डली साँप पित्त को और राजिमान् सर्प कफ को प्रकुपित करते हैं । असमानवर्णं माता - पिता की सन्तान दो दोषों के संसर्गरूप-जन्य लक्षण उत्पन्न करते हैं रजन्याः पश्चिमे यामे शेपेपूक्ता मण्डलिनो तीन प्रकार के माँपों के को कहते हैं रात्रि के पिछले | शेष रात्रि में अर्थात् रात्रि ॥ २ ९ ॥ - विशेपश्चात्र वक्ष्यते ॥ ३० ॥
सर्पाश्चित्राश्चरन्ति हि ।
दिवा दर्वीकराः स्मृताः ॥३१ ॥
विचरण काल - इसमें और भेदों प्रहर में रानिमान् घूमते हैं, के पहले, द्वितीय तथा तीसरे