श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 631–640
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 631–640
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प्यायः ४ ] कल्पस्थानम् प्रहर में मण्डली सर्प और दिन के समय में दवकर सर्प
घूमते हैं ॥। ३०-३१ ॥
विमर्शः - चरककार ने भी लिखा है कि- विशेषाद्र्कड कमम्लोष्ण स्वादु शीतलम् । विष यथाक्रम तेपा तस्माद्वातादिकोप-नम् ॥ ( च.चि भ. २३ | १२५ ) इन सर्पों के विष क्रमशः रूच, कूटु, अम्ल, उष्ण तथा मधुर शीतल होते हैं और यहीं कारण है कि वे वात आदि दोषों को प्रकुपित करते हैं । फणी सर्प का चिप अम्ल तथा उष्ण होने से पित्त को प्रकुपित करता है तथा राजमान् सर्प का विष मधुर व शीतल होने के कारण कफ को प्रकुपित करता है ।
दर्वीरास्तु तरुणा वृद्धा मण्डलिनस्तथा ।
राजिमन्तो वयोमध्या जायन्ते मृत्युहेतवः ॥ ३३ ॥
अवस्था - विशेष से सर्पों को उग्रविपता- दवींकर साँप तरुणावस्था में, मण्डली सर्प वृद्धावस्था में तथा राजिमान् सर्प मध्यवय में मृत्यु के कारण होते हैं ॥ ३२ ॥
विमर्शः -- चरककार ने भी इस विषय में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा है कि - तरुणाः कृष्णसर्पास्तु गोनसा स्थविरास्तथा । राजिमन्तो वयोमध्ये भवत्याशीविषोपमाः ॥ ( च. चि. अ. २३१३५ ) कृष्ण सर्प तरुगावस्था में, गोनस वृद्धावस्था में तथा राजिमान् मध्य भायु में अत्यन्त तीव्र विपवाले होते हैं । यहाँ कृष्ण सर्प से दवकर सर्प का तथा गोनस से मण्डली सर्प का अभिप्राय है । अष्टांगलग्रह के उत्तरतंत्र में भी निम्न वर्णन मिलता है यथा- तारुण्यमध्यवृद्धत्वे वृष्टिशीतातपेषु च । विषोल्वणा भवन्त्येते द्वथन्तरा ऋतुसन्धिपु ॥ ( अ. सं उ तं. भ. ४० )
नकुलाकुलिता बाला वारिविप्रहताः कृशाः ।
वृद्धा मुक्तत्वचो भीताः सर्पास्त्वत्पत्रिपा. स्मृता ॥ ३३ ॥
सर्पों की अल्पविषता में हेतु - नेवले से घबराये ( भयभीत हुए ), बाल सर्प, जल के वेग से व्यथित हुए, कृश ( दुर्बल ), वृद्ध, केचुली उतारे हुए तथा डरे हुए साँप अल्प विपवाले कहे गये है ॥ ३३ ॥
विमर्श. -- चरककार ने भी कहा है कि - वारिविप्रहता क्षीणा भीता नकुल निर्जिताः । वृद्धा वालास्त्वचो मुक्ता ' सर्पा मन्द-विषाः स्मृता ॥ ( च. चि. अ. २३/१६२ ) अष्टांगसंग्रहकार ने भी लिखा है कि- जलाप्लुता रनिक्षाणा मीता नकुलनिर्जिता । शीतवातातपव्याधिक्षुत्तृष्णाश्रमपीडिताः ॥ तूर्णे देशान्तरायाता
विमुक्तविषक्काः । कुशोपधिकण्टकवद्ये चरन्ति च काननम् ॥
देश च विद्याभ्युपितं सर्पास्तेऽल्यविषा मताः ॥ ( भ. सं. उ. तं. अ ४० ) तत्र, दर्वीकराः - कृष्णसर्पो, महाकृष्णः, कृष्णो-दरः, श्वेतकपोतो, महाकपोतो, चलाहको, महासर्प, शङ्खकपालो, लोहिताक्षो, गवेधुकः, परिसर्पः, खण्ड-फणः, ककुदः, पद्मो, महापद्मो, दर्भपुष्पो, दधिमुख, पुण्डरीको, भ्रुकुटीमुखो, त्रिष्किरः, पुष्पाभिकीर्णो, गिरिसर्पः, ऋजुसर्पः, श्वेतोदरो, महाशिरा, अलगर्द, आशीविप इति ( १ ) । मण्डलिनस्तु - आदर्शमण्डलः, श्वेतमण्डलो, रक्त: मण्डलः, चित्रमण्डलः, पृपतो, रोधपुष्पो, मिलिन्दको, गोनसो, वृद्धगोनसः, पनसो, महापनसो, वेणुपत्रक ", शिशुको, मदन, पालिन्दिर पिङ्गल, तन्तुकः, पुष्प-पाण्डु ', पडङ्गः, अग्निको, बभ्रुः, कपायः, कलुप. पारा-। वतो, हस्ताभरण ', चित्रक, एणीपद इति ( २ ) । राजिमन्तस्तु - पुण्डरीको, राजिचित्र ', अङ्गुलराजि., विन्दुराजि, कर्दमकः, तृणशोपक, सर्पपक, श्वेतहनुः, दर्भपुष्पश्चक्रको, गोधूमक ', किक्किसाद इति ( 3 ) । निपातु - गलगोली, शुकपत्रः अजगरो, दिव्यको, वर्षाहिक, पुष्पशकली, ज्योतीरथ, क्षीरिकापुष्पक., अहिपताका, अन्धाहिको, गौराहि को, वृक्षेशय इति ( ४ ) । वैकरञ्जास्तु त्रयाणां दर्वी करादीनां व्यतिकराज्जाताः, । तद्यथा - माकुलिः, पोटगलः, स्निग्धराजिरिति । तत्र, कृष्णसर्पण गोनस्यां वैपरीत्येन वा जातो माकुलि; | राजिलेन गोनस्यां वैपरीत्येन वा जातः पोटगलः; | कृष्णसर्पेण राजिमत्यां वैपरीत्येन वा जातः स्निग्ध-राजिरिति । तेषामाद्यस्य पितृवद्विपोत्कर्पो, द्वयोर्मातृव-| दित्येके ( ५ ) । त्रयाणां वैकरजानां पुनर्दिव्येलकरो ध्रपुष्पकराजि-| चित्रकपोटगलपुष्पाभिकीर्णदर्भपुष्पवेल्लितकाः सप्त, तेपामाद्यास्त्रयो राजिलवत, शेषा मण्डलित्, एवमे-तेपां सर्पाणामशीतिर्व्याख्याता ॥ ३४ ॥
दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्, निर्विष, वैकर माँपों के नामादि का निर्देश- इनमें दर्वीकर सौंप - कृष्णसर्प, महाकृष्ण, कृष्णोदर, श्वेतकपोत, महाकपोत, बलाहक, महासर्प, शंस - कपाल, लोहिताक्ष, गवेधुक, परिमर्प, खण्डफण, ककुद, पद्म, महापद्म, दर्भपुष्प, दधिमुख, पुण्डरीक, भृकुटी | मुख, विष्किर, पुष्पाभिकीर्ण, गिरिसर्प, ऋजुसर्प, श्वेतोदर, महाशिर, अलगर्द और आशीविष होते हैं । मण्डली सप में आदर्श मण्डल, श्वेतमण्डल, रक्तमण्डल, चित्रमण्डल, पृपत, रोधपुष्प, मिलिन्दक, गोनम, वृद्धगोनस, पनस, महापनस, वेणुपत्रक, शिशुक, मदन, पालिन्दिर, पिंगल, | तन्तुक, पुष्पपाण्डु, पढम, अमिक, बभ्रु, पाय, पारावत, हस्ताभरण, चित्रक एणीपद होते हैं । राजिमान् सपों में--| पुण्डरीक, राजिचित्र, अंगुलराजि, बिन्दुराजि, कर्दमक, तृ-) शोषक, सर्पपक, श्वेतहनु, दर्भपुष्प, चित्रक, गोधूमक और साद होते हैं । निर्विप सर्प में -- गलगोटी, शुकपत्रक, अजगर, दिव्यक, वर्षाहिक, पुष्पशकली, ज्योतीरथ, हीरिका-पुष्पक, अहिपताक, अन्वाहिक तथा वृशय होते हैं-वैकर असांप - दवकर आदि तीनों प्रकार के मप में विपरीत जाति से उत्पन्न सपि यथा - मालि, पोटगट, स्निग्धराजि । इनमें काले साँप द्वारा गोनम में विपरीत जानि मे या विपरीतता मे माकुलि, राजिमान् सर्प विपरीतता से पोटगल सर्प उत्पन्न होता है । स्निग्धराजि सर्प कृष्णसर्प मे राजिमान् में या विपरीतता से उत्पन्न होता । है । इनमें पहला ( माकुल ) सर्प पिता की भाँति तेजिन्बी
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# सुश्रुतसहिता होता है और शेष दो माता के समान गुण व तेजवाले होते है । तीनों वैकरञ्ज सर्पों के सात भेद हैं यथा - दिव्येलक, रोध पुष्पक, राजिचित्रक, कपोटगल, पुष्पाभिकीर्ण, दर्भपुष्प, ति ॥ ३४ ॥
इनमें पहले तीन सर्पों का विष राजिमान् सर्पों की । भांति तथा शेष सपों का विष मण्डली सप के समान होता है । इस प्रकार अस्सी सर्पों का व्याख्यान हो गया ॥ ३४ ॥
तत्र महानेत्रजिह्वास्यशिरसः पुमांस, सूक्ष्मनेत्र जिह्वास्यशिरसः स्त्रिय ', उभयलक्षणा मन्दविषा अक्रोधा नपुंसका इति ॥ ३५ ॥
सर्पों के पुरुषादि जाति का लक्षण – इनमें बड़े नेत्र, जिह्वा, मुख और काले शिर वाले सर्प पुरुष जाति के, सूक्ष्म नेत्र जिह्वा, मुख तथा शिर वाले स्त्री जाति के होते हैं । दोनों जाति के लक्षण वाले, मन्दविष एवं क्रोधरहित सर्प नपुंसक होते हैं ॥ ३५ ॥
विमर्श: - चरककार ने भी सर्प, सर्पिणी और नपुंसक सर्प की पहचान करने के लिये निम्न श्लोक का पाठ किया है यथा - वृत्तभोगो महाकाय श्वसन्नूर्ध्वेक्षण. पुमान् । स्थूलमूर्धा समाङ्गश्च स्त्री स्त्रत. स्याद्विपर्ययात् ॥ क्कोव स्रस्त.,............ ॥ ( च चि अ. २३ | १२ ९ ) अर्थात् जिसका फन गोल हो, देह महानू हो, फुफकारता हो, जिसकी दृष्टि ऊपर की ओर हो, | शिर स्थूल हो और देह सम हो वह सर्प नर होता है और यदि इसके विपरीत लक्षण हों तो उसे सर्पिणी समझें । नपुंसक सर्प शिथिल होता है तथा उसका वेग मन्द होता है । गोधा ( गोह ) को भी द्विजिह्न होने के कारण सर्प वंश में ही गिन लिया जाता है । सर्पों के उपर्युक्त वर्णन को भली भांति समझने के लिए टिप्पणी की तालिकायें बड़ी लाभ • दायक सिद्ध होगीं । १. सर्पों का वर्गीकरण भ दिव्य ( ८० भेड ) ( वासुकि आदि दिव्य दृष्टि - निश्वास वाले देव रूप और पूजनीय ) सविष निर्विप ( १२ ) दर ( २६ ) ( फणवाले ) शीघ्रगामी चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक, अंकुशधारी वातप्रकोपक दिवाचारी तरुणावस्था में घातक मण्डली ( २२ ) राजिमान् ( १० ) वैकरञ्ज ( ७ + ३ ) = १० ( अरुप फणवाले ) ( फणविहीन ) दवकर, मण्डलिन तथा राजिमान् मन्दगामी, स्थूल विविध रंग की रेखाओं सर्पों की संकर सन्तान होते हैं । मण्डलाकार चकत्ते शरीर पर होते हैं । चमकते सूर्य के समान तेज युक्त पित्तप्रकोपक पूर्व रात्रि में विचरने वाले वृद्धावस्था में घातक भौम सर्पों का वर्ण श्लेष्मा प्रकोपक दिपप्रकोपक रात्रि के अन्तिम प्रहर में चित्र - विचित्र स्वभाव व आकृति के विचरण करने वाले मध्यम आयु में घातक विविध प्रकार के प्रभावकारी भेद से वर्गीकरण याह्मण क्षत्रिय शूद्र मुक्ता और चादी के समान fare वर्ण के तथा अत्यन्त कृष्णचर्म युक्त, काले तथा चित्रित धर्म वाले चमकने वाले, स्वर्णाभ एव क्रोधी | छत्र, कमल आदि लालिमायुक्त कबूतर के तथा भैंसे व हाथी सुगन्धित । चिह्नों से युक्त । समान वर्ण वाले । के वर्ण वाले । भौम सर्पों का लिङ्गभेद से वर्गीकरण पुरुष जिसका नेत्र, मुख, जिह्वा तथा जिसकी जिह्वा, नेत्र, शिर छोटी हो दोनों नपुसक के लक्षणों से युक्त मन्द शिर बढ़ा हो । विष चाला तथा कभी भी क्रुद्ध न होने वाला ।
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अध्यायः ४ ] कल्पस्थानम् ३६ तत्र सर्वेषां सर्पाणां सामान्यत एव दृष्टलक्षणं । वक्ष्यामः । किं कारणं? विमं हि निशितनिस्त्रिंशाशनि-हुत हृदेश्यमाशुकारि मुहूर्त मप्युपेश्चित मातुरमतिपात-यति, न चावकाशोऽस्ति वाक्ममहमुपसतु प्रत्येकमपि दुष्टलक्षणेऽभिहिते सर्वत्र त्रैविध्यं भवति, तस्मात् त्रैविध्यमेव वच्यामः एतद्ध्यातुरहितमसंमोहकरं च, अपि चात्रैव सर्वमव्यञ्जनावरोव ॥ ३६ ॥
सामान्य रूप से सर्पदृष्ट के लक्षण - सच मांपों के देश के ' लक्षण सामान्य रूप में कहे जायेंगे । क्योंकि विष तीचग । तलवार की भाति, बिजली, अग्नि के तुल्य शीघ्र ही व्यापक होने वाला है | मुहूर्त मात्र ( क्षण भर ) की उपेक्षा करने से रोगी को मार देता है । वाणी से भी कहने तक का! समय नहीं रहता । प्रत्येक सर्प के काटने पर भी तीन । प्रकार के लक्षण होते हैं । इसलिए उनको भी तीन प्रकार से ही कहेंगे । ये कहे गए लक्षण रोगी के लिये हित कर होते हैं । और वैद्य को किमी भी प्रकार का भ्रम नहीं होने देते । इन्ही लक्षणों के अन्तर्गत मव सपों के विष के लक्षण आ जाते हैं ॥ ३६ ॥
तत्र दर्वीकविपेण त्वनयननखदशनवदनसूत्र- । पुरीपदेशकृष्णत्वं रौदयं शिरसो गौरवं सन्धिवेदना! कटीपृष्ठश्रीवादौर्बल्यं जृम्भण वेपथु. स्त्ररावसादो घुघुरको जडता शुष्कोद्वारः कासश्वासो हिक्का वायोरूर्ध्वगमनं । शूलोद्वेष्टनं तृष्णा लालास्राव: फेनागमनं स्रोतोऽवरो! आना, कम्पन, स्वरभ्रंश ( गला या आवाज का बैठना ), गले से घरघराहट, जडता, सूखे टद्गार, कास, श्वास, हिक्का, वायु का ऊपर की ओर जाना, शुल, ऐठन, प्यास, लालास्राव, फेन ( झाग ) आना, स्रोतों का बन्द होना और वातजन्य नाना प्रकार की वेदनायें होती हैं । मण्डली सर्प के चिप के प्रभाव से त्वचा, नख, मल, मूत्र आदि का पीला पड़ जाना, शीत की इच्छा करना, परिधूपन ( सर्वाङ्ग सन्ताप ), दाह, प्यास, मद, मूर्च्छा, ज्वर, रक्त की ऊर्ध्व तथा अधोमार्ग से प्रवृत्ति, मांस का विदीर्ण होना, शोथ, दंशस्थान का सहना, पीले रूपों को देखना, विष का शीघ्र कुपित होना और पित्त-जन्य नाना प्रकार की वेदनायें ( ओप चोप आदि ) होती हैं । राजिमान् सर्प के विष के प्रभाव से त्वचा, नख आदि श्वेत हो जाते हैं, शीत लग कर ज्वर होता है, रोमहर्ष, अह्नों में जढता, दंश के चारों ओर सृजन, घट्ट कफ का मुख गिरना, बार बार वमन, नेत्रों में कण्डू, गले में शोथ होना, वर्धराहट, श्वासावरोध, आँखों के सामने अंधेरा छा जाना और कफजन्य विविध प्रकार की वेदनायें होती हैं ॥ ३७ ॥
विमर्श: -- चरककार ने भी तीनों प्रकार के विपर सर्पों के दंश अवस्था का वर्णन निम्नलिखित ढंग से किया है, यथा - दवकरकृतो दंशः सूक्ष्मदष्ट्रापदोऽसितः । निरुद्धरक्त ' कूर्मामो वातव्याधिकरो मतः ॥ पृवर्पित सशोपश्च दशो मण्ड लभि कृनः । पीतामः पीतरक्तश्च सर्वपित्तविकारकृत् ॥ कृतो राजिमता दंशः पिच्छिलस्थिर शोफकृत । लिग्धः पाण्डुश्च सान्द्रासक्श्लेष्म-व्याधिसमीरण । ( च. चि. अ. २३ / १२६-१२८ ) अर्थात् फणी सर्पों के दश में दाँतों के चिह्न सूक्ष्म तथा कृष्ण वर्णं धस्तास्ताश्च चातवेदना भवन्तिः मण्डलित्रिपेण त्वगाके होते है वहाँ से रक्त नहीं निकलता, देशस्थान कछुए दीनां पीतत्वं शीताभिलापः परिधूपनं दाहस्तृष्णा मदो मूर्च्छार: शोणितागमनमूर्ध्वमधश्च मांसानामवशा- । तनं श्वयथुर्दशकोथः पीतरूपदर्शनमाशुकोपस्तास्ताश्च पित्तवेद्ना भवन्तिः राजिमद्विपेण शुकुत्वं त्वगादीनां शीतज्वरो रोमहर्षः स्तब्धत्वं गात्राणामादंशशोफः ।
सान्द्रकफप्रसेकश्छर्दिरभीक्ष्णमच्णोः कण्डूः कण्ठे ।
श्वयथुर्युर्षुरक उच्छ्वास निरोधस्तम प्रवेशस्तास्ताश्च कफ-वेदना भवन्ति ॥ ३७ ॥
दरा सर्पविशेष से दृष्ट पुरुष के लक्षण - दर्बीकर के । विष से त्वचा, नख, नेत्र, दाँत, मुख, मूत्र, मल और दंश स्थान काले पड़ जाते हैं । रूक्षता, शिर में भारीपन, सन्धियों में वेदना, कटि, पृष्ठ ( पीठ ), ग्रीवा में दुर्बलता, जम्भाई आधुनिक मतानुसार की पीठ के समान उभरा हुआ होता है, इससे वातरोग उत्पन्न होते हैं । मण्डली सर्पों के द्वारा किया गया दंश विस्तृत स्थान पर अथवा गहरा होता है तथा वह शोथ-युक्त होता है । उसमें पीली आभा होती है । स्रवित होने वाले रक्त का वर्ण भी पीला होता है और यह सभी पित्त-विकारों को उत्पन्न करता है । राजिमान् सर्न का दंश पिच्छिल तथा स्थिर शोथकारक होता है । वह स्निग्ध एवं पाण्डुर होता है । ढंशस्थान से निकलने वाला रक्त गाढ़ा होता है और इससे कफज रोग उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार अष्टांगसंग्रहकार ने भी इस प्रसंग में अपना मत निम्नलिखित रूप में व्यक्त किया है यथा- तत्र दंशः फणावताम् । कूर्मपृष्ठोन्नतो रूक्ष सूक्ष्मदष्ट्रापदान्वितः । विकाराः व्यावना वनसमूत्र चिविट्त्वचाम् ॥ शीतज्वरः सन्धिरुत्वा निद्रा-सपों का वर्गीकरण सर्प सविष ( विषयुक्त ) निर्विप ( विरहित ) कोलवाइन ( Colubrine ) वाइराइन ( Viperine ) नागराज नाग राजीमान् ( करैत ) गोनस फुस्सा ( King cobra ) ( Cobra ) ( Krait ) ( Russeto viper ) ( Echis )
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४० सुश्रुतसंहिता नाशो विजृम्भिका । मन्यास्तम्भः मिराध्मान पृष्ठकट यस्त्रिवाग्ग्रहा ॥ शिरोगुरुत्वमरुचि. कासश्वासौ हनुग्रह । शूलमुद्वेष्टन कोष्ठे शोप रोधी मलायौ ॥ सन्दिग्धवाक्त्व नैश्चेष्टय मृतस्येव विसयता । फेनलालोइमौ हिध्मा कण्ठे घुरघुरायणम् ॥ शुष्कोद्वारो मुहुरते ते वातजाश्चापरे गढा ' । दशो मण्डलिनां मोम्मा सशोपः पीत-लोहित ॥ पृथुर्विसर्पदाद्दोपाक्लेटको ये विंशीयते । निकारा वक्त्र दन्तादिपीतता तृट् श्रमो श्रमः ॥ दाहो मूर्च्छा ज्वरस्तिक्तवक्त्रत्वं पीतदर्शनम्...॥ रक्तागमनमूर्ध्वाधः शीतेच्छा धूमको गदः । आशु मर्वाङ्गविनिर्गदास्ते ते च पित्तजा ॥ दशो राजिमतां स्निग्धः स्थिर. पिच्छिलशोफकृत् । सान्द्रास्त्र शिशिर पाण्डुस्तद्वि कारा शिरोव्यथा ॥ अरुचिश्छर्दिरालस्य हृलासो मधुरास्यता । कण्ठे घुर्पुरक पाको कण्ड्ररक्ष्णोहिमो ज्वरः ॥ कृच्छ्राट् दुःश्वसन । प्रकम्पते । स्त्रिया दष्टो विपर्यस्तैरेतैः पुसा नरो मतः ॥ व्यामिश्र लिङ्गैरेतैस्तु कोवदष्ट नर वदेत् । इत्येतदुक्तं सर्पाणां स्त्रीपुक्कीन निदर्शनम् ॥ पाण्डुवक्त्रस्तु गर्भिण्या शूनौष्ठोऽप्यसितेचणः । । जम्माक्रोधोपजिल्हार्त ' सूतया रक्तमूत्रवान् ॥ ( च. चि. अ. २३३१३० - १३२ ) अर्थात् सर्पिणी से दृष्ट पुरुष की दृष्टि । नीचे की ओर होती है । स्वर हीन व मन्द होता है तथा रोगी काँपता है । पुरुष सर्पदष्ट के लक्षण सर्पिणी - दष्ट के लक्षणों के विपरीत समझना चाहिए । और जब कहे गए सर्प और सर्पिणी के दृष्ट के लक्षण मिश्रित हों तो पुरुष को नपुंसक सर्प द्वारा दृष्ट जानना चाहिए । यदि गर्भिणी सर्पिणी काटे तो मुख पीला पड जाता है, ओष्ठ सूज जाते । हैं और नेन्नों का वर्णं काला पड जाता है । इसी प्रकार प्रसूता निद्रा कास श्वेतनसादिता । स्तम्भो गुरुत्वं चाङ्गानां नासिकाक्षिमुसर्पिणी द्वारा दृष्ट होने पर रोगी जम्भाई, क्रोध तथा ग्राति ॥ रोमहर्षम्नमा सो रोगाश्रान्ये कफोद्भवा ॥... ( अ. सं. उ. तं. अ. ४० ) पुरुषाभिदष्ट ऊर्ध्वं प्रेक्षते, अधस्तात् खिया, सिरा श्वोत्तिष्ठन्ति ललाटे, नपुंसकाभिदप्रस्तिर्यक्प्रेक्षी भवति, गर्भिण्या पाण्डुमुखो मातश्च, सूतिकया कुक्षिशूलार्तः मरुधिरं मेहत्युपजिह्निका चास्य भवति, प्रामाथिनाऽन्नं काङ्क्षति वृद्धेन चिरान्मन्दाश्च वेगाः, बालेनाशु मृदचश्र्च, निर्विषेणाविपलिङ्गम्, अन्धाहिकेनान्धत्वमित्येके; ग्रस-ना अजगर: शरीरप्राणहरो न विपात् । तत्र सद्य ' प्रा-हराहिष्टः पतति शस्त्राशनिहत इव भूमौ स्रस्ताङ्गः स्वपिति ॥ ३८ ॥
पुग्पादि जाति के सर्पों से दष्ट पुरुष के लक्षण - पुरुष साँप द्वारा काटा गया रोगी ऊपर को देखता है, स्त्री सर्प द्वारा दृष्ट रोगी नीचे की ओर देखता है तथा उसके माथे में सिराएँ उभर आती हैं और नपुंसक सर्प के द्वारा दंशित रोगी तिरछा अर्थात् पार्श्व में देखता है । गर्भवती सर्पिणी से काटे हुए मनुष्य का मु पाण्डुवर्ण एव शोधयुक्त होता है, प्रसूता सर्पिणी से काटे हुए मनुष्य को उदरशूल होता है, रक्तमिश्रित मूत्र की प्रवृत्ति होती है तथा उसे उपजि-हिका नामक रोग हो जाता है । ग्रासार्थी सर्प द्वारा दुष्ट मनुष्य अन्न की चाहना करता है । वृद्ध साँप से काटे जाने पर विष का वेग मन्द रहता है तथा देरी करके चढ़ता है । बालक सर्प के काटने से विष जल्दी तो चढ़ता है । परन्तु मन्द बेग का ही रहता है । निर्विष सर्प के काटने पर विष के लक्षण नहीं होते । अन्धे सर्प द्वारा दष्ट होने पर मनुष्य अन्धा हो जाता है ऐसी कुछ पुरुषों की धारणा है । अजगर साँप के द्वारा निगल लिए जाने पर प्राणों का विनाश होता हैन्तुि उसके नि के प्रभाव में नहीं होता । इनमें मे तुरन्त प्राणहर सर्प द्वारा दुष्ट पुरुष शस्त्र या वज्राहत ( बिजी से मारे हुए ) मनुष्य की भाँति तुरन्त भूमि पर गिर जाता है, उसके सभी अंग शिथिल हो जाते हैं तथा वह मो जाता है ॥ ३८ ॥
विमर्श - चरकर ने सर्प, सर्पिणी आदि मे दृष्ट पुरुष के निम्नलिखित पण कहे है, यथा- गोदृष्टिवीन उपजिह्निका नामक रोग से पीडित होता है, उसका मूत्र अत्यन्त लाल रंग का तथा रक्तयुक्त होता है । इसी प्रसंग में अष्टांगसंग्रहकार का भी मत है कि.... दष्ट पुंसो र्ध्वमीक्षते । प्रक्षिपेद्दक्षिण पाद पूर्वकायसमुद्यत • ॥ धीरोऽल्पवेग * गर्वय विपरीतस्तु योषिता । हीनस्वरोऽतिसारार्त कम्पते त्रस्यते । ज्वरी ॥ नपुंसकेन तिर्यग्दृग्धीरच प्रियमैथुनः । बहुवादी च ** ॥ | ( अ. सं. उ. तं. भ. ४० ) । तत्र सर्वेषां सर्पाणां विपस्य सप्त वेगा भवन्ति । तत्र दवकराणां प्रथमे वेगे विपं शोणितं दूपयति, तत् प्रदुष्ट कृष्णतामुपैति, तेन कार्यं पिपीलिका परिसर्पण-मित्र चाहे भवति द्वितीये मांसं दूपयति, तेनात्यर्थं कृष्णता शोफो ग्रन्थया भवन्ति; तृतीये मेदो दूपयति, तेन दंशक्लेदः शिरोगौरवं स्वेदश्चक्षुर्ग्रहणं च | चतुर्थ कोष्ठमनुप्रविश्य कफप्रधानान् दोषान् दूपयति, तेन तन्द्राप्रसेकसन्धिविश्लेपा भवन्ति, पञ्चमेऽस्थीन्य-नुप्रविशति प्राणमग्नि च दूपयति, तेन पर्व भेदो हिका दाहश्च भवति, पष्ठे मज्जानमनुप्रविशति ग्रहणीं चात्यर्थं दूपयति, तेन गात्राणां गौरवमतीसारो हृत्पीडा मूर्च्छा च भवति; सप्तमे शुक्रमनुप्रविशति व्यान चात्यर्थ कोपयति कफं च सूक्ष्मस्रोतोभ्यः प्रच्यावयति, तेन श्लेष्मवर्तिप्रादुर्भावः कटीपृष्टभङ्गः सर्वचेष्टाविघातो लाला स्वेदयोरति प्रवृत्तिरुच्छ्रासनिरोधश्च भवति । मण्डलिनां प्रथमे वेगे विपं शोणितं दूपयति, तत् | प्रदुष्टं पीततामुपैति, तत्र परिदाहः पीतावभासता चाङ्गानां भवति, द्वितीये मांसं दूपयति, तेनात्यर्थं पीतता परिदाहो दशे श्वयथुश्च भवति; तृतीये मेदो दूपयति, तेन पूर्ववचक्षुर्ग्रहणं तृष्णा दंशक्केदः स्वेदश्ध; चतुर्थ कोष्ठमनुप्रविश्य ज्यरमापादयति; पञ्चमे परिवाहं सर्वगात्रेषु करोति । पष्ठसप्तमयोः पूर्ववत् । राजिमतां प्रथमे वेगे विपं शोणितं दूपयति, तत् प्रदुष्टं पाण्डु. | तामुपैति, तेन रोमहर्षः शुकावभासश्च पुरुषो भवति; द्वितीये मांसं दूपयति, तेन पाण्डुताऽत्यर्थं जाड्य शिर-
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अध्याय- ४ ] कल्पस्थानम् ४१ शोफच भवति तृतीये मेदो दूषयति, तेन चक्षुर्ग्रहणं दशक्लेदः स्वेदो घ्राणाक्षिस्रावश्च भवतिः चतुर्थे कोष्ठमनु-प्रविश्य मन्यास्तम्भं शिरोगौरवं चापादयतिः पञ्चमे वाक्सनं शीतज्वरं च करोति; पूर्ववदिति ॥ ३६ ॥
सर्पविष के सात वेगों के लक्षण - सब प्रकार के साँपों के चिप के सात वेग होते हैं, यथा - दवकर साँपों के प्रथम वेग में विप रक्त को दूपित करता है तथा यह दूषित रक्त काला पड़ जाता है । इससे अह्नों में कालापन और चीटियों के रेंगने के समान प्रतीति होती है, विष के दूसरे वेग में मांस दूषित हो जाता है जिसके कारण क्षतिशय कृष्णता, सूजन और अंग में गांठें उत्पन्न हो जाती हैं । तीसरे वेग में विप मेद धातु को दूषित करता है इससे दंशस्थान मड़ने लगता है, शिर में भारीपन, पसीना आना तथा आँखों से दिखाई न पडना आदि होता है । चौथे वेग में विष कोष्ट में पहुँचकर कफ - प्रधान दोषों को दूषित करता है इसके फलस्वरूप तन्द्रा, कफ का मुख मे स्राव होना तथा मन्धियों की शिथिलता आदि लक्षण होते हैं । पाँचवें वेग में विप अस्थियों में प्रविष्ट हो जाता है तथा प्राण और अग्नि को दूषित करता है जिसके कारण पत्रों का टूटना, हिका और दाद आदि लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं । छठे वेग में त्रिप मजा में पहुँचता है और ग्रहणी ( पित्तधरा कला ) को अत्यधिक दूषित कर देता है जिसके कारण शरीर में भारीपन, अतिसार, हृदय प्रदेश मैं पीढा और मूर्च्छा होती है । सातवें वेग में विप शुक्र में । आना, नाक तथा नेत्रों से स्राव होता है । चौथे वेग में विप कोष्ठ में पहुॅचकर मन्यास्तम्भ और शिर में भारीपन उत्पन्न करता है । पाँचवें वेग में वाणी का अवरोध तथा शीतज्वर नामक लक्षण होते हैं, छठें और सातवें वेग के लक्षण दवकर सर्प के लक्षणों की भाँति ही हैं ॥ ३ ९ ॥ " विमर्श: - चरककार के द्वारा विप के आठ वेगों का, निर्देश हम स्थावर चिप के वेगों का वर्णन करते समय द्वितीय अध्याय के ३४-३९ श्लोक की व्याख्या के सम्बन्ध दिए गये विमर्श के अन्तर्गत कर चुके हैं अतः विस्तारभय तथा पुनरुक्ति दोष से बचने के लिए यहाँ वर्णन देना उचित, नहीं समझते । पाठकगण इस सम्बन्ध में उपर्युक्त स्थल । पर पहुँचकर जानकारी प्राप्त कर लें । अस्तु । आधुनिक मतानुसार सर्पदष्ट के लक्षण एवं चिह्न के विषय में निम्न | जानकारी पाठकों के हित में लाभदायक सिद्ध होगी ॥ सक्षेप में कोलुवाइन जाति के सर्प अपने विप से हृद्विस्तृति ( Dilatation of the heart ), श्वासकृच्छ्र, शोथ, रक्तवह | संस्थान को पूर्णतया बन्द कर देते हैं अतः रोगी की मृत्यु ' हो जाती है । वाद्दपेराइन ( Viperine ) जाति के सर्प का विष रक्तस्राव, रक्तवाहिनियों में स्राव, हृद्गतिमन्दता और हृदयावसाद से रोगी की मृत्यु कर देते हैं । इसके अतिरिक्त अन्यान्य लक्षण भी मिलते हैं । ' कोलुबाइन ' विष की अवस्था में शुभाशुभ परिणाम शीघ्रता से होता है एवं तीस मिनट के भीतर ही मृत्यु हो जा सकती है परन्तु ' वाइपेराइन ' विष की अवस्था में यह परिणाम रक्त की अवस्था पर निर्भर करता है । इसी प्रकार निम्नलिखित पहुँच कर व्यान - स्थान को अत्यधिक प्रकृपित कर देता है । कोष्ठक - तालिका साँप के सात वेर्गों को सरलता से समझने जिमसे वायु का प्रकोप हो जाता है, कफ को सूक्ष्म स्रोतों से बाहर निकालता है । इससे घट्ट कफ मुख से निकलता है, कटि, पीठ टूटती हुई सी प्रतीत होती है, सभी चेष्टाएँ प्रायः रुक सी जाती हैं । लालास्राव और स्वेदागमन ( पसीने का निकलना ) बहुत होता है तथा उच्छ्वास रुक जाता है । मण्डली सर्प के प्रथम वेग में far रक्त को दूपित करता है । यह दूषित हुआ रक्त पीला हो जाता है । इसके कारण जलन, अंगों में पीलापन हो जाता है । दूसरे वेग में विष मांस को दूषित करता है इसके परिणाम । स्वरूप अतिशय पीलापन, दाह और दंशस्थान पर सूजन होती है । ' तीसरे वेग में विप मेद को दूपित करता है । इसके कारण दवकर साँप के विष के प्रभाव समान ही नेत्रों से दिखाई न पड़ना, तृष्णा तथा दंशस्थान का सड़ना व स्वेदागम ( पसीना होना ) आदि लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं । चौथे वेग में विष कोष्ठ में पहुँचकर उधर उत्पन्न करता । है । पाँचवें वेग में विप मय अह्नों में दाह करता है और छठे तथा सातवें वेगों के लक्षण दर्जीकर के लक्षण के समान । ही होते हैं । राजिमान् सर्प के विष के प्रथम वेग में विष । रक्त को दूषित करता है, यह दूषित रक्त पाण्डुवर्णं का ( श्वेत ) हो जाता है । दूसरे वेग में विष मांस को दूषित करता है इसके फलस्वरूप अतिशय पाण्डुता, जडता तथा शिर में सूजन हो जाती है । तीसरे वेग में विप मेद को दूपित करता है इससे अन्धत्व, देश का सहना, पसीना । ६ सु ० क्रि ० के लिए दी जा रही है, यथा- " दर्वीकर ( वातप्रकोपक ) ( १ ) रक्तविकार, कृष्णवर्णव, शरीर पर चींटियों के रेगने की सी प्रतीति । ( २ ) मांस में प्रवेश, अतिशय कालापन, शोध व गांठों का निकलना । ( ३ ) मेद - दृष्टि से दंश से स्राव, शिरो -गौरव, स्वेदागम, आंखों का झपना । | ( ४ ) कोष्ठप्रवेश, कफप्रधान दोषों की दुष्टि, आलस्य, संधिविश्लेप । मण्डली राजिमान् ( पित्तप्रकोपक ) ( कफप्रकोपक ' ) शोणितविकृति, शोणितविकृति, पीलापन, शीतज्वर | पाण्डुवर्ण, रोमहर्ष ",, मांस में प्रविष्ट होने मांस में शिथिलता, से अतिशय पीला शिर में शोथ, पन, दाह तथा देश- जडता । स्थान में शोथ । " मेद में प्रवेश, आंखें मेदोदुष्टि, आंखों का झपना, दांतों झपना, तृष्णा, दश- से स्राव, स्वेदागम्, स्थान से स्त्राव, नाक तथा नेत्र से स्वेदागम । स्राव होना । कोष्ठप्रवेश, ज्वर- कोष्ठप्रवेश, सिर वृद्धि । का भारीपन, मन्या • स्वम्भ होना ।
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४२, सुश्रुतसंहिता दर मण्डली राजिमान् ( वातप्रकोपक ) ( पित्तप्रकोपक ) ( कफप्रकोपक ) ( ५ ) अस्थि में प्रवेश, | शरीर प्राण तथा अभि | प्रतीत का दूषित होना, हिचकी, दाह, तथा पर्वभेद होना । ( ६ ) मज्जा तथा | दर्जी ग्रहणी की दुष्टि, मूर्च्छा, शरीर का भारीपन, अतिसार व हृदयशूल । में ज्वाला वाग्लोप तथा शीत होना । ज्वर । की भांति ॥ दर्वीकर की भांति । ( ७ ) शुक्रधातु में दर्बीकर की भांति । दवकर की भांति । प्रवेश, व्यानवायु का प्रकोप, सूक्ष्म शिराओं से कफ का स्राव, कटि - पृष्ठ-भंग, चेष्टाओं का नाश, लालास्रावा धिक्य तथा स्वेदा-तिप्रवृत्ति एवं श्वास-निरोध । भवन्ति चात्र-' धात्वन्तरेषु याः सप्त ' तास्कामतिक्रम्य सर्पविष के सात वेर्गों के
कलाः संपरिकीर्तिताः ।
वेगं प्रकुरुते विपम् ॥४८ ॥
होने में कारण - धातुओं के बीच बीच में जो सात कलायें कही गई हैं, उनमें से एक - एक को अतिक्रमण करके विप - वेगों को उत्पन्न करता है ॥ ४० ॥
येनान्तरेण तु कलां कालकल्पं भिनत्ति हि ।
समीरणेनोद्यमानं तत्तु वेगान्तर स्मृतम् ॥ ११ ॥
वेगान्तर के लक्षण - वायु से प्रेरित हुआ विष जितने समय में एक कला को पार करता है उतने समय को वेगा-न्तर कहा जाता है ॥ ४१ ॥
शूनाङ्गः प्रथमे वेगे पशुर्ध्यायति दुःखितः ।
लालास्राव द्वितीये तु कृष्णाङ्गः पीड्यने हृदि ॥ १२ ॥
तृतीये च शिरोदुःखं कण्ठग्रीवं च भव्यते । चतुर्थ वेपते मूढः खादन् दन्तान् जहात्यमून् केचिद्वेगत्रयं ॥ ३३ ॥
प्राहुरन्तं चैतेषु तद्विट ' ।
ध्यायति प्रथमे वेगे पक्षी मुहात्यत. परम् ॥ ४४ ॥
द्वितीये विहलः प्रोक्तस्तृतीये मृत्युमृच्छति |
केचिदेकं विहङ्गेषु विपवेगमुशन्ति हि ।
मार्जारन कुलादीनां विपं नातिप्रवर्तते ॥ ४५ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने सर्पदष्टविपविद्यानीयं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पशु - पक्षियों में विप के वेगों के लक्षण - विष के प्रथम वेग में पशु दुःखी होकर शोक करता है, उसका दंश स्थान सूज जाता है । दूसरे वेग में शरीर काला पड़ जाता है मुख arottara होता है तथा हृदय में वेदना होती है । तीसरे वेग में शिर में दर्द, कण्ठ और ग्रीवा टूट जाती है, चोथे वेग में पशु कांपता है, मूढ हो जाता है । दांतों को किटकिटा हुआ प्राणों को छोड देता है । कोई कोई आचार्य पशुओं में केवल तीन वेग ही मानते हैं । विष के प्रथम वेग में पक्षी चिन्ता करता है । तथा मूच्छित हो जाता है । इसके उपरान्त द्वितीय वेग में वह बेचैन हो जाता है तथा तीसरे वेग में मृत्यु को प्राप्त होता है । कई आचार्य पक्षियों में विप का एक ही वेग मानते हैं । विल्ली, नेवले आदि प्राणियों मैं साप के विष का कोई प्रभाव नहीं होता अतः उनमें वेग भी नहीं होते हैं ॥ ४२-४५ ॥ विमर्श - चरककार ने भी पशुओं में चार तथा पक्षियों में तीन वेगों की गणना की है, यथा - चतुष्पदां स्याच्चतुर्विधः पक्षिणां त्रिविध । आधे श्रमति चतुष्पदोऽवसीदति ततः शून्यः ॥ मन्दाहारो म्रियते श्वासेन चतुर्थवेगे तु । ध्यायति विहगः प्रथमे वेगे
प्रभ्राम्यति द्वितीये तु । नस्ताङ्गश्च तृतीये वेगे याति पञ्चत्वम् ॥
( च.चि अ. २३ / २०-२२ ) अर्थात् चौपाए पशुओं में चार प्रकार का तथा पक्षियों में तीन प्रकार का चिप का वेग होता है, प्रथम वेग में चौपाए पशु को चक्कर आते हैं । दूसरे वेग में वह शिथिल हो जाता है, तीसरे वेग में वह शून्य के लहश होकर बहुत ही अल्प आहार करता है तथा चौथे वेग में श्वास से मृत्यु हो जाती है । पक्षी प्रथम वेग में चिन्ता-ग्रस्त सहदा होता है तथा उसे चक्कर आते हैं । दूसरे वेग में उसके भङ्ग शिथिल हो जाते है तथा तीसरे वेग में उसकी मृत्यु हो जाती है । इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने सर्पदष्टविपविज्ञानीय नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
-000400-पञ्चमोऽध्यायः अथातः सर्पदष्टविपचिकित्सितं कल्पं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२ ॥
मद्रष्ट विषचिकित्सा का उपक्रम - अब इसके पश्चात् सर्पदष्ट-विपचिकित्सित क्ल्प का व्याख्यान करेंगे -- जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १-२ ॥
सर्वेरेवादितः सर्वैः शाखादष्टस्य देहिनः ।
शस्योपरि बध्नीयादरिष्टाश्चतुरङ्गुले ॥३ ॥
प्लोतचर्मान्तवल्कानां मृदुनाऽन्यतमेन वै ।
न गच्छति विषं देहमरिष्टाभिर्निवारितम् ॥ ४ ॥
सर्पदश में अरिष्टा - बन्धन - सभी प्रकार के सर्पों द्वारा काटे गए शाखाओं ( हाथ तथा पैर आदि के दृष्ट ) में दश स्थान से चार अतुल ऊपर एक ' अरिष्टा ' बन्धन करना चाहिए । यह अरिष्टा कपड़े की चीर ( पट्टी ), चर्मप, वृक्ष की अन्तः छाल अथवा अन्य किसी कृमिल वस्तु ( रबड की नली या
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श्रध्यायः ५ ] कल्पस्थानम् ४३ विप पट्ट आदि ऊपर ) की से बांधनी चाहिए | अरिष्टा द्वारा रोका गया | निप्पीडन किया जाता है । इसमे विष बहुत ओर गमन न कर पाने के कारण नहीं चढ़ता ॥ जाता है | यदि यह पर्याप्त न हो तो दंश स्थान कुछ का निकल मांस लिखा विमर्श - चरककार ने भी अरिष्टा बन्धन के विषय में | काट कर निकाल देना चाहिए । यदि मर्म व सन्धि स्थान है, यया - मन्त्रारिष्टोत्कर्तननिष्पीडन ' ' •...। दशत्तु पर दंश हो तो काट कर न निकलना चाहिए क्यों कि उससे विषं दृष्टस्याविऌत वेणिकां मिषन् बद्ध्वा । निष्पीडयेद् भृश दशम् | मृत्यु व अग की विकलता हो जाती है । भष्टाद्ङ्गसंग्रहकार ने द्धरेन्मर्मवजं वा ॥ ( च. चि. अ. २३३३३ - ३७ ) इस प्रकार की भी उत्तर तंत्र के १० वें अध्याय में कहा है कि - निष्पट्य अरिष्टा भी दो प्रकार की मानी जाती है । एक तो सामान्य त्रोद्धरेद्दश मर्नसन्ध्यगत तथा । न जायते विषावेगों बीजनाशादि-रस्मी आदि का बांधना और दूसरा मन्त्र से अभिमन्त्रित वाङ्कुरः ॥ मर्मगे प्राप्नुयान्मृत्युं सन्धिस्ये विकलाङ्गताम् । फिर भी करके बांधना व चिप के संचार को आगे न बढ़ने देना । यदि समय पर बांधने को बन्धन न मिल सके व बांधना अरिष्टा वन्धन के विषय में वृद्धवाग्भट ने भी कहा है- योग्य न हो वा मर्म होने के कारण दश - स्थान को काट कर नेतिपीढित बन्त्रो देशानुसारेण नानिगादृश्ठथो हितः । दशपूनित्वशोकादीन कुरु निकाला न जा सकता हो तो प्रायः उस अंग ( शाखा ) को || अशक्तः शिथिलो रोद्धुं विषं देशान्तरं व्रजत् ॥ ही ऊपर मर्मरहित देश से काट दिया जाता है । इसी ( वृ. वा भट. अ. १० ) अर्थात् बहुत ही अधिक कसकर विषय पर चरककार भी अपना मत प्रतिपादित करते हुए अथवा ढीली रस्सी आदि भरिष्टा के रूप में न बांधनी चाहिए । इसके फलस्वरूप –‘जम्बुत्रत्सेतुबन्धेन बन्धने स्तन्यते विषन् । न वहन्ति सिराश्चास्य क्पिं बन्धादिपीडिताः ॥ मिराएं विष को देह में प्रसारित नहीं कर सकतीं । चरककार ने सर्पदंश के मद्य प्रतिकार के विषय में आदेश दिया है कि -दष्टमात्र
दशेदाशु त सर्प टोष्ट्रमेव वा । उपर्यंरिष्टा बनायाद्देशं हिन्वाद्दद्देत्तथा ॥
( च. चि. अ. २३।२४ ९ ) जब सांप ने डसा ही हो तो तरक्षण पुरुष को चाहिए कि उसी सर्प अथवा मिट्टी के ढेले को दांतों से काट ले । दंश के ऊपर अरिष्टा ( रस्पी आदि ) बाध दे । ढंश को चाकू आदि से काट कर पृथक कर दे और उस स्थान पर दाह कर दे । इस प्रकार सर्पदंश का निश्चय होते हो सबसे पहले अरिष्टा बन्धन ( Ligaturing ) करना चाहिए । जिस स्थान पर सर्प ने काटा हो । उससे ऊपर के भाग में क्रमशः १-८-१२ अगुल की दूरी पर तीन वन्धन इस ( Circulation प्रकार कस of कर blood बांधने चाहिए, जिसमे रक्तपरिभ्रमण । ) रुक जाये और विप रक्त के साथ मिलकर रक्तवाहिनी सिराओं के द्वारा ऊपर ओर विशेषतः हृदय तथा मस्तिष्क की ओर प्रवाहित न होने पावे । मन्त्र विदू लोग मन्त्रों मे अभिमन्त्रित करके भी इस अरिष्टा बन्ध को बांधते हैं । यद्यपि आज के वैज्ञानिक महत्व के युग में । मन्त्र के प्रभाव को लोग चाहे न मानें पर इसका कुछ न कुछ अज्ञात प्रभाव तो पडता ही है इसमें तनिक भी सन्देह । नहीं होना चाहिये । दहेहंशमथोत्कृत्य यत्र बन्धो न जायते । कहते है कि - त दश वा चूपेन्मुखेन यवचूणपाशुभूर्णेन । प्रच्छन-बेधजलीकट स्राव्य ततो रतम् ॥ ( च. चि. अ. २३/३८ ) मुख में जौ का आटा अथवा धूल भर कर वैद्य उस दंश को चूम ले । चूमने से वह त्रिप जौ के आटे अथवा मिट्टी में आ जायगा तत्पश्चात् उम मुख में आए हुए विष को थूक दे । इस समय हम बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए | कि चूपण करने वाले चिकित्सक या वैद्य के मुख में किसी प्रकार का क्षत वा प्रण ( Ulcer ) इत्यादि न ' क्योंकि कटी-| फटी क्षतिग्रस्त श्लेप्मल कला के द्वारा विप शीघ्र ही प्रचूपित हो जाता है अतः उस चूपक को भी सर्पदष्ट के समान हीं चिप का प्रभाव हो सकता है । सामान्यतः चिकित्सक को चाहिए कि वह आचूपण करने के लिए मुख में जौ का आटा भरने के पहले मुख को भीतर से घृताक कर या अन्य कोई विपनाशक औषधि भीतर मुख में आटे लगा ले आदि तथा विप का आचूपण करने के बाद भी जौ के औषधि को सुख से निकाल देने के बाद विपनाशक से गण्डूप ( कुल्ला, Gargle ) कर ले । यदि को मुग्व से न चूसना हो तो आचूपक यंत्र ( Suctionpump ) आदि से भी विष को चूमा जा सकता है । अष्टाङ्गसंग्रहकार ने भी चूपण क्रिया के पूर्व दश स्थान को पोंछ कर स्वच्छु कर लेने का आदेश दिया है और विशेषतः उस अवस्था में जब कि वह स्थान मांसल हो, यथा- आचूपेत् पूर्णवक्रो वा मृद्भ-स्मा गदगोमय. । प्रच्छायान्तररिष्टाया मासलं नु विशेषतः ॥ ( अ. स. ट. तं. अ. १० ) तत्काल सांप को काटे गए मनुष्य द्वारा काटना तो सर्व साधारण के लिए प्रायः असम्भव सा होता आचूपणच्छेददाहाः सर्वत्रैव तु पूजिताः ॥ ५ ॥ है तथा सांप के काट कर भाग जाने पर तो और भी दुष्कर
मर्प मे हँने जाने पर आचूषण, छेदन तथा दाह - जहाँ पर होता है परन्तु सपेरे ऐसा कर सकने में समर्थ हो सकते हैं अरिष्टा न बांधी जा सके वहाँ पर दंश स्थान को काट कर | साधारण मनुष्य नहीं क्यों कि वे तो सर्प को देखने अग्नि से दाह कर दे ( जला देवे ) । आचूपण ( चूसना ), मात्र से ही इतना डर जाते है कि उनकी मति ही ठिकाने छेदन एवं दाह यह सब में प्रयुक्त हो सकते हैं ॥ ५ ॥ नहीं रहती और फिर काटने पर तो साधारण मनुष्य स्वयं
प्रतिपूर्य मुखं वस्त्रैर्हितमाचूपणं भवेत् | ही मृत्यु के भय से अधमरा हो जाता है । अस्तु स दृष्टव्योऽथवा सर्पो लोष्टो वाऽपि हि तत्क्षणम् || ६ || अथ मण्डलिना दृष्ट न कथंचन दाहयेत् । आचूषण विधि - मुख को वस्त्रों से भर कर चूषण करना स पित्त बाहुल्यविपाशो दाहाद्विसर्पते ॥ ७ ॥
उत्तम है । अथवा उसी सांप को तुरन्त काट ले अथवा मिट्टी मण्डली ( सर्प ) द्वारा उसे जाने पर दाह का निषेध - मण्डली के ढेले को तुरन्त काट ले ॥ ६ ॥ सांप से काटे हुए व्यक्ति में भूल कर भी दाह न करें क्यों कि
विमर्श.अरिष्टा - बन्धन के बाद दंश को चारों ओर से i वह दश पित्त की अधिकता के कारण दाह से फैलता है ॥७ ॥
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४४ सुश्रुतसहिता
अरिष्टामपि मन्त्रैश्च वध्नीयान्मन्त्रकोविदः ।
सा तु रज्ज्वादिभिर्बद्धा विषप्रतिकरी मता ॥ ८ ॥
' सर्पदष्ट में मन्त्रों द्वारा अरिष्टाबन्धन - मन्त्र को जानने वाला वैद्य अरिष्टा को भी मन्त्रों से बांधे । इस प्रकार रज्जु ( रस्सी ) आदि से बांध अरिष्टा विष को रोकती है ( वैसे तो मंत्र के बिना भी बांधी गई अरिष्टा विष को रोकती है ) ॥
देवब्रह्मर्षिभिः प्रोक्ता मन्त्राः सत्यतपोमयाः ।
भवन्ति नान्यथा चित्र विषं हन्युः सुदुस्तरम् ॥ ६ ॥
' विपं तेजोमयैर्मन्त्रैः सत्यब्रह्मतपोमयैः ।
' यथा निवार्यते क्षिप्रं प्रयुक्तैर्न तथौषधै ॥ १० ॥
" मन्त्रशक्ति की प्रशसा - किसी सत्यवादी, तपस्वी, ब्रह्मर्षि, द्वारा कहे गए मंत्र व्यर्थ नहीं होते । ये मंत्र भयानक विष को भी नष्ट कर देते हैं । सत्यपरायण, ज्ञानी एवं तपस्वी तथा तेजस्वी ऋषियों के मन्त्रों से विप जितनी शीघ्रता से नष्ट होता है उतनी जल्दी ओषधि प्रयोग से दूर नहीं होता ॥ ९ १०॥ }
मन्त्राणा ग्रहणं कार्य स्त्रीमांममधुवर्जिना ।
मिताहारेण शुचिना कुशास्तरणशायिना ॥११ ॥
गन्धमाल्योपहारैश्च बलिभिश्चापि देवताः ।
पूजयेन्मन्त्रसिद्ध्यर्थं जपहोमैश्च यत्नतः ॥ १२ ॥
मन्त्र ग्रहण की विधि - स्त्री मांस और मधु ( मद्य ) का सेवन छोड कर मंत्रों को सीखना चाहिए । मंत्र सीखते समय आहार अल्प मात्रा में करना चाहिए, पवित्र रहना चाहिए, कुशा की शय्या पर सोना चाहिए । गन्ध, माला, उपहार तथा बलि से देवताओं का पूजन तथा जप एवं होम मन्त्रसिद्धि के लिए करना चाहिये ॥ ११-१२ ॥
मन्त्रास्त्वविधिना प्रोक्ता हीना वा स्वरवर्णत ।
यस्मान्न सिद्धिमायान्ति तस्माद्योज्योऽगदक्रमः ॥१३ ॥
स्वरादि वा मन्त्र को असिद्धि में अगद का क्रम -- बिना विधि के या स्वर अथवा वर्ण से हीन प्रयुक्त मंत्र सफल नहीं होते इस लिए अगद, उपचार आदि का भी प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥
विमर्शः - मन्त्रविद् लोग मन्त्रों से अभिमन्त्रित अरिष्टा-बन्धन का प्रयोग करते है । आज भी कुछ ऐसे मन्त्रविद् भारत के सभी प्रदेशों में मिलते हैं जो मन्त्रों के द्वारा सर्प far को दूर करते है और उन्हें पर्याप्त सफलता भी मिलती है । कई मन्त्रविद् तो ऐसे होते हैं, जब उनके पास कोई । व्यक्ति सर्पदंश का समाचार लेकर जाता है तो वे देश, काल, दूत की आकृति, प्रकृति को देख कर ही बता देते है कि वह सर्पदष्ट पुरुष बचेगा या नहीं । अरिटा ( पट्टी ) इतनी कस कर बांधनी चाहिए कि सिरा का स्वाभाविक रक्तप्रवाह रुक जावे तथा सर्पविष रक्त में मिलकर सम्पूर्ण शरीर में न फैलने अरिष्टा पावे बाधने । शरीर में विप फैलने या चढ़ने के पहले ही से लाभ होता है तथा दाह एवं आचूपण आदि क्रियाएं भी इसी अवस्था में लाभप्रद सिद्ध होती हैं तथा मन्त्रों क्रिया का प्रयोग तो रोगी के आरोग्य लाभ प्राप्त करने तक जाता है । आचूपण जहाँ तक हो सके मुख द्वारा नहीं ही करना चाहिए इसके लिए सिंगी अथवा तुम्बी आदि का प्रयोग अथवा नलिका का प्रयोग उचित रहता है । कविराज | हाराणचन्द्र जी ' मिताहारेण ' के स्थान पर ' जिताहारेण ' नामक पाठ के औचित्य को स्वीकार करते हैं ।
समन्ततः सिरा दंशाद्विध्येत्तु कुशलो भिषक् ।
) शाखाग्रे वा ललाटे वा व्यध्यास्ता विसृते विषे ॥ १४ ॥
र निर्ह्रियमाणे तु कृत्स्न निर्हियते विषम् ।
तस्माद्विस्रावयेद्रक्तं सा ह्यस्य परमा क्रिया ॥ १५ ॥
समन्ताद्गर्दर्दशं प्रच्छयित्वा प्रलेपयेत् ।
चन्दनोशीरयुक्तेन वारिणा परिपेचयेत् ॥१६ ॥
सर्पदेश में रक्त निकालने की विधि - कुशल चिकित्सक दंश के चारों ओर सिराओं का वेधन करे । विप के फैल जाने पर सिराओं को हाथ पैर के अग्र भाग में अथवा मस्तक में वेधन करे । रक्त के निकलने से सम्पूर्ण विप भी निकल जाता है । | इस लिए रक्त का विस्रावण करे क्यों कि यही प्रक्रिया सर्पदष्ट । पुरुष को श्रेष्ठ चिकित्सा मानी गई है । दंश के चारों ओर प्रच्छन क्रिया ( पांछ ) कर अगदों से लेप करे तथा चन्दन और खस ( उशीर ) मिश्रित जल से परिपेक ( सिचन ) करे ॥
पाययेता गदांस्तांस्तान् क्षीरक्षौद्रघृतादिभिः ।
तदलाभ हिता वा स्यात् कृष्णा वल्मीकमृत्तिका ॥१७ ॥
कोविदार शिरीषार्क कटभीर्वाऽपि भक्षयेत् । सर्पदश में वल्मीक ( विमवट ) की मिट्टी आदि का योग -भगदों को दूध, मधु और घी में मिलाकर पिलावे | अगद के अभाव में काली मिट्टी या वांवी की मिट्टी को दूध, घी, । मधु के साथ मिलाकर पिलावे । कचनार, शिरीप, आक, कोयल ( अपराजिता ) आदि का सेवन करे ॥ १७ ॥
न पिवेत्तैलकौ लत्थमद्यसौवीरकाणि च ॥ १८ ॥
सर्पदश में तैलादि द्रव का निषेध - तैल, कुलस्थ यूप ( कुलथी का रस ), मद्य तथा कांजी का सेवन न करे ॥ १८ ॥
द्रवमन्यन्तु यत्किञ्चित् पीत्वा पीत्वा तदुद्वमेत् ।
प्रायो हि वमनेनैव सुखं निर्ह्रियते विषम् ॥ १६ ॥
सर्पविष में वमन -इनके - अतिरिक्त कोई दूसरा द्रव पीकर चमन करे क्योंकि वमन होते रहने से विष सुखपूर्वक शरीर के बाहर निकल जाता है ॥ १ ९ ॥ विमर्श'- अरिष्टा बन्धन के साथ ही जिस स्थान पर सर्प ने काटा हो, उसी स्थान पर तीक्ष्ण धारवाले चाकू चौथाई इञ्च गहरा तथा आधा इञ्च लम्बा स्थान - भेद के अनुसार चीरा लगाकर उचित मात्रा में दें यदि यह निश्चित हो जाय कि सर्प प्रकृति अथवा कफवात प्रकृति का है तो लोह या अगारे से दाग करके जलाया ( Cautersation ) किन्तु यह दाह क्रिया मण्डली जाति के सर्प के काटने पर नहीं इस प्रकार दर्शन स्थान के रक्तमोक्षण की लाभप्रद तथा निरापद होती है । चरककार त दश वा चूपेन्मुखेन गवचूर्णपाशुपूर्णेन । रक्त को निकलवा वातप्रकृति, कफ दंशस्थान को गर्म भी जा सकता है पित्त प्रकृतिवाले करनी चाहिए । क्रिया ही सर्वथा ने कहा है कि प्रच्छनवेधजलौक में साम्य ततो रक्तम् ॥ उपर्युक्त आचूपण क्रिया के बाद प्रच्छान ( पंछना ), शिरावेध, जोंक व सिंगी आदि के प्रयोग
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अध्याय: ५ ] कल्पस्थानम ४५ से रक्तस्रावण कराना चाहिए । क्योंकि रक्त के विष से दूषित हो जाने पर प्रकृति भी दूषित हो जाती है इसलिए देह में परिभ्रमणशील दुष्ट रक को प्रधर्षणों द्वारा प्रवृत्त करना चाहिए । अर्थात् यदि पछने वा सिरामोक्षण से दंशस्थान से रक्त भली प्रकार प्रवृत्त न हो तो प्रधर्पण चूर्णादिकों से उस पछे हुए स्थान पर घर्षण करना चाहिए । यथा - रक्ते विपप्रदुष्टे दुष्येत्प्रकृतिस्ततस्त्यजेत्प्राणान् । तस्मात्प्र धर्षेणैरसृग्वर्तमान प्रवर्त्यं स्यात् ॥ ( घ. चि. अ. २३ १ ९ ) । क्योंकि रक्त ही विष का आश्रय होता है जैसे अग्नि का आश्रय वायु होता है । अतः वह रक्त शीतल प्रदेह तथा परिषेचनों से गाढ़ा हो जाता है तथा जम जाता है । उसके गाढ़ा हो जाने पर विष का वेग भी हट जाता है यथा - रक्त हि विपाधानं वायुरिवाग्नेः प्रदेहसे कैस्तत् । शीतैः स्कन्दति तस्मिन कन्ने व्यपयाति विषवेगः ॥ ( च, चि. अ. २३ । ४१ ) अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार वायु अग्नि को भड़काता है तथा इधर - उधर फैलाता है, वैसे ही विष को रक्त प्रवृद्ध भी करता है और उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर वहन करके भी ले जाता है । यदि इस रक्त की गति में हम बाधा डाल दें । तो विष के प्रसार में भी रुकावट हो जायगी । इस प्रकार दंशच्छेद आदि क्रियाओं का लाभ बताते हुए चरककार पुनः विपनाशक नस्य कर्म तथा अञ्जन का प्रयोग करे । चौथे विष वेग में रोगी को वमन कराकर स्थावर विप के प्रसंग में कही गई यवागृ पीने को दे । पाँचवें और छठे विप वेग में प्रथमतः शीतल उपचार करे फिर तीक्ष्ण विरेचन देकर पूर्वोक्त यवागू पिलावे । सातवें वेग में तीक्ष्ण अवपीडन नस्य से शिर का शोधन करे, तीचग अञ्जन देवे तथा तीक्ष्ण शस्त्र से शिर पर काकपद बनाकर उसमें रक्तमिश्रित मांस या ताजा चर्म रख देवे ( ताकि विप उसमें उत्तर आवे ) ॥२०-२३ ॥ पूर्वे मण्डलिनां वेगे दर्वीकरवदाचरेत् ॥ २४ ॥
अगदं मधुसपि द्वितीये पाययेत च ।
वामयित्वा यवागूं च पूर्वोक्तामथ दापयेत् ॥ २५ ॥
. तृतीये शोधितं तीक्ष्णैर्यवागूं पाययेद्धि ताम् ।
चतुर्थे पञ्चमे चापि दर्वी करवदाचरेत् ॥ २६ ॥
काकोल्यादिर्हितः पष्ठे पेयश्च मधुरोऽगदः ।
हितोऽत्रपीडे त्वगदः सप्तमे त्रिपनाशनः ॥ २७ ॥
मण्डली विष के ७ वेगों की चिकित्सा - मण्डली सर्प के प्रथम विष वेग में दकर साँपों के प्रसङ्ग में कही गई चिकित्सा करे । दूसरे वेग में अगद को घी, मधु के साथ पीने को दे तदुपरान्त पूर्वोक्त यवागू को पिलावे । तीसरे वेग कहते है कि -- नरिव मूलच्छेत्राशच्छेान वृद्धिमेति विषम् ।में तीक्ष्ण विरेधनों से शोधन करा देने के बाद यचागू सेवन आचूषणमानयन जलस्य सेतुर्यथा तथाऽरिष्टा ॥ त्वयांसगत दाही दस्रणं रक्तात् ॥ ( च. चि. अ. २३-४३, ४४ ) जिस प्रकार वृक्ष की जड़ को काट डालने से वृक्ष बढ़ता नही अपितु सूख जाता है उसी प्रकार दंशस्थान को काट डालने से विप वृद्धि को प्राप्त नहीं होता तथा चूसने से थोड़ा विसृत विष देशस्थान की ओर तथा दंशस्थान से बाहर बलपूर्वक खीच लिया जाता है । तथा जिस प्रकार नदी आदि के जल को रोकने के लिए बाँध बाँध दिया जाता है और जल उधर नहीं जा सकता उसी प्रकार अरिष्टा का बाँधना भी विप के प्रसार को नहीं होने देता । तथा सुवर्णपुण्ड वा शरलोह आदि से किया गया दाह त्वचा एवं मासगत त्रिप को जला डालता है । दाह प्रायः वहाँ किया जाता है जहाँ दंशच्छेद के पश्चात् बन्ध ( पट्टी ) न चाँधा जा सके तथा रक्तगत विप का नाश रक्तस्त्रावण क्रिया के द्वारा किया जाता है । "
फणिनां त्रिषवेगे तु प्रथमे शोणितं हरेत् ।
द्वितीये मधुसर्पिभ्यां पाययेतागढं भिषक् ॥२० ॥
नस्यकर्माञ्जने युज्यात्तृतीये विपनाशने ।
वान्तं चतुर्थे पूर्वोक्तां यवागूमथ दापयेत् ॥ २१ ॥
शीतोपचार कृत्वा ss दो भिपक् पञ्चमषष्ठयोः ।
पाययेच्छोधन तीच्णं यवागूं चापि कीर्तिताम् ॥ २२ ॥
सप्तमे ववपीडेन शिरस्तीक्ष्णेन शोधयेत् ।
दद्यात्, तीक्ष्णशस्त्रेण मूर्ध्नि च ॥ २३ ॥
तीच्णमेवाञ्जनं कृत्त्रा काकपद चर्म सासृग्वा पिशितं क्षिपेत् । कर विष के ७ वेगों की चिकित्सा - दवकर साँपों के प्रथम विप वेग में रक्तमोक्षण करावे । विष के दूसरे वेग में मधु और घी के साथ अगद का पान करावे । तीसरे वेग में करावे । चौथे तथा पाँचवें वेग में भी दर्जीकर सर्प के समान ही चिकित्सा करे । छठे वेग में काकोल्यादि मधुर गण या | अगद पान करावे | सातवें वेग में विपना अगद का । प्रयोग तथा अवपीडन नस्य का सेवन हितकारी होता है ॥
पूर्वे राजिमतां वेगेऽलावुभिः शोणितं हरेत् ।
अगदं मधुसर्पियों सयुक्तं पाययेत च ॥ २६ ॥
वान्तं द्वितीये त्वदं पाययेद्विपनाशनम् ।
तृतीयादिषु त्रिष्वेवं विधिदर्वीकरो हितः ॥ २६ ॥
पठेऽञ्जनं तीक्ष्णतममवपीडश्च सप्तमे । राजिल विष के ७ वेगों की चिकित्सा - राजिमान् साँपों के प्रथम वेग में तुम्बी प्रयोग द्वारा रक्तस्रावण करे । मधु तथा घी से मिश्रित अगद पीने के हेतु है । दूसरे वेग में वमन कराने के बाद विपनाशक अगद का सेवन करावे । तीसरे, चौथे, पाँचवें वेग में दकर साँपों के प्रसङ्ग में वर्णित उपचार करे छठे वेग में तीक्ष्ण अञ्जन तथा सातवें वेग भवपीडन नस्य का प्रयोग करे तथा नष्टसंज्ञा चाले को पुनः सज्ञावान् बनाने के हेतु उपचार करे ॥ २८-२९ ॥ विमर्श. -- विष कर्पण के लिए शिर पर चीरा लगाकर ( काकपद आदि क्रिया ) सरक्त मासखण्ड रखने के बदले मुर्गों के गुदा चारों ओर के पंख व रोम आदि हटाकर उसके ( मुर्गे के ) गुदा ( मलद्वार ) को दंश स्थान पर रख दिया अथवा चिपका दिया जाता है । इसके परिणाम-स्वरूप मुर्गा तुरन्त ही मर जाता है । इस तरह एक मुर्गे के मरने पर दूसरा उसी प्रकार दशस्थान पर रखा जाता है इस क्रम को तबतक जारी ( चालू ) रखते हैं जबतक कि मुर्गे का मरना न रुक जावे । मुर्गे का जीवित रह जाना | इस बात का द्योतक होता है कि रोगी के शरीर में अय
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४६ सुश्रुतसहिता चिप नहीं है । क्योंकि वह सब विप मुर्गों द्वारा गुदामार्ग विवर्णे कठिने शूने सरुजेऽङ्गे विषान्विते । से चूस चूस कर शरीर के बाहर निकाल दिया गया है । यह
भी एक चमत्कारी प्रयोग है ।
गर्भिणी चालवृद्धानां सिराव्यधनवर्जितम् ॥३० ॥
विपातनां यथोद्दिष्टं विधानं शस्यते मृदु । गर्मिणी आदि की विष चिकित्मा में विशेषना - चिप से पीडित गर्भवती स्त्री, बालक या वृद्ध पुरुष में शिरावेधन कर्म निषिद्ध है 1 । इनमें कहे हुए उपचारों की कोमल रूप में अर्थात् मृदुता से बरते ॥ ३० ॥
रक्तावसेकाञ्जनानि नरतुल्यान्यजाविके || ३१ ||
त्रिगुण महिपे सोष्ट्र् गवाश्वे द्विगुण तु तत् ।
चतुर्गुणं तु नागानां केवलं सर्वपक्षिणाम् ॥ ३२ ॥
परिपेकान् प्रदेहांश्च सुशीतानवचारयेत् । पशुओं की विप चिकित्सा में मात्रा की विशेषता तथा पक्षियों की विप चिकित्सा - बकरी और भेड में रक्तावसेचन व अंजन मनुष्य में प्रयोग के समान हैं । भैंस तथा ऊँट में तीन गुनी मात्रा में, गाय और घोड़े में दो गुनी मात्रा में हाथियों में चार गुनी मात्रा में प्रयुक्त करें । पक्षियों में सम्पूर्ण परिषेक और प्रदेह अतिशीतल द्रव्यों से करे ॥ ३१-३२ ॥
मापकं त्वञ्जनस्येष्टं द्विगुणं नस्यतो हितम् ।
पाने चतुर्गुणं पथ्यं वमनेऽष्टगुणं पुनः ॥ ३३ ॥
विष चिकित्मा में अञ्जनादि की मात्रा - अंजन में मात्रा एक माशा, नस्य में दुगुनी, पीने में चारगुनी तथा वमन में आठ गुनी मात्रा पथ्य मानी जाती है ॥ ३३ ॥
विमर्श ' -- कल्क, मोदक, चूर्ण की मात्रा अधिकतम एक पल होती है । वमन द्रव्य की श्रेष्ठ मात्रा तीन पल तथा कायादिकों की मात्रा चार पल आचायों ने मानी है । और विष में सदैव उत्तम मात्रा का प्रयोग किया जाता है, ऐमा सुश्रुतकार तथा वृद्ध वाग्भटकार आदि आचायों का मत है, यथा - अहोरात्रादसन्दुष्टा या मात्रा परिजीर्यति । सा च कुष्ठविपोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी ॥ गुल्मोदावर्तवीसर्प सर्पदशाभि पीटिने । उन्मते कृच्छम महती शीघ्रमेव मा ॥ इसी प्रकार तन्त्रान्तर में भी वमन आदि के लिए भी उत्तम मात्रा का निर्देश प्राप्त होता है यथा- विषजुष्टता ये च कामश्वासह-नाश्च ये । तशा ववन्तश्च वामयेदुत्तमेन नान ॥ इनि ॥ देशप्रकृति सात्म्यर्तुविपवेगबलाबलम् 1 प्रधार्य निपुणं बुद्धा तत ' कर्म समाचरेत् ॥ ३४ ॥
पि चिकित्मा में देशादि विचार की आवश्यकता - देश, प्रकृति, साम्य, ऋतु, वेग, वल, अवल आदि को उत्तम बुद्धि से विचार कर पीछे टपचार आदि कर्म करे ॥ ३४ ॥
विमर्श - आचार्य ढल्हण ने उपर्युक्त श्लोक की व्याख्या करते हुए लिया है कि -दशी भूमिरातुरश्च तत्र भूदशोऽश्वत्थ देवतायतननशानादिक कायिकी, आनुरशरीरे च मर्मदेश, प्रकृति दिना मानसीच, नत्र कायिकी वानाविना, मानमी च सत्वा । प्रायं आरोग्य या निपुण यथा भवत्येव कर्मममाचरेत् गानुपूर्या कर्मोमिढ़ ॥ कर्मावस्थाविशेषेण विपविनाशनम् । विषयोरुभयोः श्रृणु || ३ || तूर्णं विस्रवणं कार्यमुक्तेन विधिना ततः ॥ ३६ ॥
क्षुधार्तमनिलप्रायं तद्विषार्त समाहितः ।
पाययेत रसं सर्पिः शुक्तं क्षौद्रं तथा दधि ॥ ३७ ॥
तृद्दाहधर्मसंमोहे पैत्तं पैन्तविपातुरम् ॥
शीतैः संवाहनस्नानप्रदेहैः समुपाचरेत् ॥ ३८ ॥
अवस्थाविशेषानुसार विषचिकित्सा में विशेषता - वेगों के अनुक्रम से यह विषनाशक चिकित्सा कह दी गई है । अवस्था विशेष के अनुसार स्थावर तथा जंगम दोनों विप की चिकित्सा को कहता हूँ सो सुनो । विपान्वित अग में विवर्णता, काठिन्य, शोथ या पीडा होने पर तुरन्त ऊपर कही गई विधि से, रक्तमोक्षण कराना चाहिए । फिर भूख लगने पर वायु की अधिकता होने पर रोगी को सावधानी से मांसरस, दधि, मधु, घी या शुक्त ( सिरका ) पीने के लिए दे । पैत्तिक विष से पीड़ित, पित्तप्रकृति को प्यास, दाह तथा ग्रीष्मकाल होने पर या मूर्च्छा होने पर शीतल द्रव्यों से सवाहन ( मणि, रत्न या काँसे के वर्तन से स्पर्श ), स्नान एवं प्रलेप का प्रयोग करे ॥ ३५-३८ ॥
शीते शीतप्रसेकात श्लैष्मिकं कफकृद्विपम् ।
वामयेद्वमनैस्तीक्ष्णैस्तथा मूर्च्छामदान्वितम् ॥ ३६ ॥
कफ - विपातुर में वमन - तथा शीतकाल में, शीतप्रसेक से पीडित होने पर तथा कफप्रकृति में कफकारक चिप के होने की अवस्था में रोगी को तीक्ष्ण वमनों से वमन करावे इसी प्रकार मूर्च्छा मद वाले को भी वमन करावे ॥ ३ ९ ॥ कोष्ठदाहरुजाध्मानमूत्रसङ्ग रुगन्त्रितम् 1 विरेचयेच्छकृद्वायुसङ्गपित्तातुरं नरम् 118011 वातपित्त - विषातुर रोगों के लिए वस्ति तथा विरेचन - कोष्ट में दाह, पीदा, आध्मान, मूत्रावरोधजन्य पीडा से ग्रस्त, मल तथा वायु के भवरोध से पीड़ित एव पित्त प्रकृति के मनुष्य को विरेचन देना चाहिए ॥ ४० ॥
शुनाक्षिकूटं निद्रार्त विवर्णाविललोचनम् ।
विवर्णं चापि पश्यन्तमञ्जनैः समुपाचरेत् ॥४१ ॥
विपातुर में अअन के योग्य अवस्था का निर्देश - पलकों के नीचे जिसमें सूजन आ गई हो, नींद से पीड़ित आंखे विवर्ण और मलिन हो गई हों तथा नाना प्रकार के वर्ण जो देखता हो उसकी अञ्जनादिकों से चिकित्सा करे ॥ ४१ ॥
शिरोरुग्गौरवालस्यहनुस्तम्भगलप्रहे शिरोविरेचयेत् क्षिप्रं मन्यास्तम्भे च दारुणे ॥४२ ॥
विपातुर में शिरोविरेचन के योग्य अवस्था का निर्देश - शिर में वेदना, भारीपन, आलस्य, हनुस्तम्भ, गलग्रह या भयानक मन्यास्तम्भ होने पर तुरन्त शिरोविरेचन देवें ॥ ४२ ॥
नष्टसंज्ञ विवृत्ताक्ष भग्नमीवं विरेचनैः ।
चूर्ण ' प्रधमनैस्तीक्ष्णैर्विपातं समुपाचरेत् ॥ ४३ ॥
ताडयेश्च सिरा. क्षिप्र तस्य शाखाललाटजाः
।
तास्त्रप्रसिच्यमानासु मूर्ध्नि शस्त्रेण शस्त्रवित् ॥ ४४ ॥
कुर्यात् काकपदाकारं व्रणमेवं स्रवन्ति ता. ।