श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 641–650
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 641–650
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अध्याय: ५ ] कल्पस्थानम् ४७ सरक्तं चर्म मांसं वा निक्षिपेचास्य मूर्धनि ॥ ४ ॥
चर्मवृक्षकषायं वा कल्कं वा कुशलो भिषक् ।
वादयेच्चा गदैर्लिप्त्वा दुन्दुभिस्तस्य पार्श्वयोः ॥ ४६ ॥
लब्धसंज्ञं पुनश्चैनमध्वं चाधश्च शोधयेत् ।
निःशेषं निर्हरेचैवं विषं परमदुर्जयम् ॥ ४७ ॥
अल्पमध्यवशिष्टं हि भूयो वेगाय कल्पते ।
सादवैवर्ण्यज्वरकासशिरोरुजः. ॥ १५ ॥
शोफशोषप्रतिश्यायतिमिरारुचिपीनसान् तेषु चापि यथादोषं प्रतिकर्म प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥
विषार्तोपद्रवांश्चापि यथास्वं समुपाचरेत् । सज्ञाहीन पडे हुये विषातुर की चिकित्सा - संज्ञा नष्ट होने के कारण आखें बाहर ( या खुली ) आ गई हों, ग्रीवा लटक गई हो उस विष वाले रोगी को तीग प्रधमन चूर्णो से शिरोविरेचन देवे । शाखा तथा ललाट में जाने वाली सिराओं पर तुरन्त ताडन करे | उनसे यदि रक्त न आवे तो शास्त्र को समझने वाला वैद्य तुरन्त शस्त्र से शिर पर काकपद का चिह्न बनाये । इस प्रकार व्रण करने से उनमें से रक्त बहने लगता है । काकपद व्रण में रक्त वाला चर्म या मांस शिर पर रख देवे अथवा चर्म वृक्ष ( चामेर ) के कपाय या कल्क को वहाँ रख देवे । रोगी के पास में दुन्दुभि ( नगाडे ) को अगदों से लेप कर बजावे । चेतना आने पर इसे पुनः वमन विरेचनादि दे | अतिशय दुर्जेय विष को पूर्णरूपेण निकाल दे क्यों कि थोडा भी वचा विष फिर वेग उत्पन्न कर सकता है अथवा शिथिलता, विवर्णता, ज्वर, कास, शिरोरोग उत्पन्न करता है । शोफ, शोष, प्रतिश्याय, तिमिर, भरुचि व पीनस आदि ' रोगों को उत्पन्न करता है अतः इनमें भी दोषों के अनुसार चिकित्सा करे । विष से पीड़ित व्यक्ति के उपद्रवों
की भी चिकित्सा अपने अपने दोषों के अनुसार करनी चाहिए ।
अथारिष्टां विमुच्याशु प्रच्छयित्वाऽङ्कितं तया ॥ ५० ॥
दात्तत्र विषं स्कन्न भूयो वेगाय कल्पते । अरिष्टा- बन्धन से दूषित शोणित चिकित्स - अरिष्टा को खोल कर देश स्थान पर पाछुकर वहाँ तुरन्त जला दे । क्योंकि वहाँ पर जमा हुवा विष पुनः विष वेग उत्पन्न कर देता है ॥ ५१ ॥
एवमोषधिभिर्मन्त्रः क्रियायोगैश्च यत्नतः ॥५१ ॥
विपे हृतगुणे देहाद्यदा दोपः प्रकुप्यति ।
तदा पवनमुद्वृत्तं स्नेहाद्यैः समुपाचरेत् ॥ ५२ ॥
तैलमत्स्यकुलत्थाम्नुवज्यैर्विषहरायुतैः पित्तज्वरहरैः पित्तं कषाय स्नेहवस्तिभिः ॥ ५३ ॥
कफमारग्वधाद्येन सक्षाद्रेण गणेन तु ।
श्लेष्मन्नैरगदैश्चैव तिक्कै रूक्षैश्च भोजनैः ॥५४ ॥
विष निकाले जाने के बाद कुपित दोषों की चिकित्सा- इस प्रकार औषधियों से, मन्त्रों से, चिकित्सा के उपचार से शरीर विप के निकाल देने पर यदि दोष प्रकुपित होता है तब कुपित ( दूसरे स्थान पर गई हुई ) वायु की स्नेहन, वमन आदि से चिकित्सा कर्म करे । इसमें तैल मछली, कुलथी, । अम्ल ( खटाई ) को छोड़कर विषनाशक वस्तुओं के साथ स्नेहन तथा वमन कर्म करावे । पित्त को पित्तज्वर नाशक स्नेह, वस्ति आदि से शान्त करे । कफ के शमनार्थ आरग्व-धादिगण में मधु मिलाकर, कफनाशक अगदों, रूक्ष और तिक्त भोज्य पदार्थों का प्रयोग करे ॥ ५२-५४ ॥ वृक्षप्रपातविषम पतितं उद्वद्धं च मृतं सद्यश्चिकित्सेन्नष्टसंज्ञवत् ॥ ५५ ॥
नष्टसंज्ञ चिकित्सा के योग्य अन्य अवस्थाओं का निर्देश- वृक्ष से, प्रपात ( झरने ) से, विषम ( ऊँचे - नीचे ) स्थान से गिरे हुए, जल में डूबकर मरने वाले, तथा पाशबद्ध होकर ( फाँसी लगाकर ) मरे हुए मनुष्य की चिकित्सा तुरन्त नष्ट-संज्ञ की भाँति करे ॥ ५५ ॥
विमर्श. - आधुनिक चिकित्साशास्त्र के अनुसार उपर्युक्त अवस्थाओं में निम्नलिखित चिकित्सा प्रणाली अपनाई जाती है - ( १ ) रोगी को तुरन्त नीचे लिटाकर शरीर पर | के वस्त्र ढीले कर देने चाहिए तथा ग्रीवा आदि में पडे हुए | बन्धनों को खोल देना चाहिए | ( ) कृत्रिम श्वासक्रिया ) ( Artificial re piration ) करनी चाहिये । ( ३ ) विशुद्ध | एवं स्वच्छ वायु अथवा अमोनिया ( Ammonia ) की व्यवस्था । करनी चाहिए । ( ४ ) मुख तथा शिर पर शीतल क्रिया करनी चाहिए । ( ५ ) यदि रोगी का शरीर शीतल हो तो उष्ण उपनाह, अभ्यङ्ग अथवा उष्ण जल की बोतलों ( Hot | water Bottles ) द्वारा शरीर के ताप ( Body temperature ) । की रक्षा करनी चाहिए । ( ६ ) उत्तेजना के लिए कोरामीन, | एड्रीनेलिन, क्लोराइड आदि के सूचीवेधों का प्रयोग करना चाहिये । ( ७ ) मुखद्वारा अथवा मलद्वार द्वारा ब्राण्डी ( Brandy ) का प्रयोग कराना चाहिए । ( ८ ) चक्षु, उदर | एवं पिण्डलियों पर राई के प्लास्टर का प्रयोग भी किया जा सकता है । ( ९ ) यदि हृदयवृद्धि के चिह्न प्रकट होते हों तो सिराव्यध ( Venesection ) द्वारा रक्तमोक्षण ( Blood letting ) कराना चाहिए । इत्यादि, इत्यादि । गाढं बद्धेऽरिष्टया प्रच्छिते वा तीक्ष्णैर्ले पैस्तद्विधैर्वाऽवशिष्टैः । शूने गात्रे क्लिन्नमत्यर्थपूति ज्ञेयं मांसं तद्विषात् पूर्ति कष्टम् ॥५६ ॥
सद्यो विद्धं निस्रवेत् कृष्णरक्तं पार्क यायाद्दह्यते चाप्यभीक्ष्णम् । कृष्णीभूतं किन्नमत्यर्थपूर्ति शीर्ण मांस यात्यजखं क्षताच्च ॥५७ ॥
तृष्णा मूर्च्छा भ्रान्तिदाहौ ज्वरश्च यस्य स्युस्त दिग्धविद्धं व्यवस्येत् । विष से मांस के गलने पर सहाँध आ बाने की चिकित्सा--अरिष्टा अत्यधिक कसकर बांधने से, पाछुने से, तीक्ष्ण लेप के प्रयोग से तथा इसी प्रकार अन्य कई कारणों से, अथवा विष के अवशिष्ट रह जाने से शरीर में शोथ उत्पन्न हो जाने के कारण उस स्थान का मांस गल जाता है और इसमें बहुत अधिक पूतिमयता ( सडांध व दुर्गन्धि ) हो
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85 सुश्रुतसंहिता जाती है । यह पूर्तिमयता विप के कारण होती है तथा कष्ट । साध्य होती है । विपाक्त वाणों के वेधन से शरीर से तुरन्त काले रङ्ग का रक्त निकलता है, व्रण शीघ्र पक जाता है तथा इसमें रह रहकर जलन होती है तथा उस व्रण में चार बार । पाक भी होता रहता है ( क्षत से निरन्तर काले रङ्ग का सड़ा हुआ, दुर्गन्धि पूर्ण, मांस निरन्तर गिरता रहता है । रोगी को प्यास, मूर्च्छा, भ्रान्ति, दाह तथा ज्वर आदि लक्षण होते हैं । अतः जिस रोगी में इस प्रकार के लक्षण दृष्टिगोचर होते हों उसे विषाक्त वस्तु वाण आदि से विद्ध हुआा जाने ॥ पूर्वोद्दिष्टं लक्षणं सर्वमेत- १ जुष्टं विषेण णाः स्यु ' ॥ १८ ॥
लूतादष्टा दिग्धविद्धा विधैर्वा जुष्टाः प्रायस्ते व्रणाः पूतिमांसाः । तेषां युक्तया पूतिमांसान्यपोह्य वार्योकोभिः शोणितं चापहृत्य ॥५३ ॥
हत्वा दोपान क्षिप्रध्वं त्वच सम्यक सिञ्चेत क्षीरिणां त्वयैः । अन्तर्वखं दापयेच प्रदेहान्, शीतैर्द्रव्यैराज्ययुक्तैर्विषन्नैः भिन्ने त्वस्थ्ना दुष्टजातेन कार्यः पूर्वी मार्गः पैत्तिके यो विषे च । " जिस मनुष्य में शत्रु द्वारा अवधारित विष के कारण उक्त व्रण आदि विशेष रूप से होते हैं उनमें उपर्युक्त । सभी लक्षण मिलते हैं । क्योंकि जो व्रण मकड़ी के काटने से, विषैले वाण भादि शस्त्र से या विष से होते हैं वे ही प्राथ. स मांस वाले होते हैं । इन व्रणों से युक्तिपूर्वक सढे हुए मांस को निकाल कर फिर उसमें से जलौका लगाकर दूषित रक्त को निकाले । वमन, विरेचन आदि से दोपों को तुरन्त निकालकर वट ( बरगद ) आदि चीरि वृक्षों की छाल ( त्वचा ) के काढ़े से सेचन करे । पित्तजन्य विसर्पोक्त शीत वीर्य एवं शीत स्पर्श वाले द्रव्यों की तथा चिपनाशक द्रव्यों को घी में मिलाकर इनसे वख को भिंगो कर ( पिचु बनाकर ) तथा लपेट कर व्रण के अन्दर रखे तथा इनसे ( उपर्युक्त पित्त विसर्पोक्त द्रव्यों के काथादिक से ) बने प्रदेह लगावे । अस्थिविप के कारण उत्पन्न व्रण में भी पूर्वोक्त चिकित्सा करे, पैत्तिकविष की भी इसी प्रकार चिकित्सा करे ॥ ५८-६० ॥ ' त्रिवृद्विशल्ये मधुकं हरिद्रे कटुत्रिकं एपो sa ढो Relat मीन रक्ता नरेन्द्रो लवणश्च वर्गः ॥ ६ ॥
चैव सुचृणितानि निदध्यान्मधुसंयुतानि । हन्ति विपं प्रयुक्तः पानाञ्जनाभ्यञ्जननस्ययोगः ॥ ६२ ॥
महागदो नाम महाप्रभावः । में महागद - त्रिवृत् ( निशोथ ), कलिहारी, मी ( मुली ), हरिद्रा, दारहल्दी, मजिष्टा ( मजीर ) अमलतास, पांचोनमक, त्रिकटु ( सोंठ, मरिच, पीपल ) इन सबका वारीक चूर्ण बनाकर मधु में मिलाकर शृङ्गनिर्मित ( सींग से बने ) पात्र में रखे । यह अगद अभ्यंग, अञ्जन और नस्य में प्रयुक्त होने पर करता है । इसकी शक्ति अपराजित होती है वेगों को नष्ट करने में यह अगर्द अद्वितीय है, शाली इस अगद का नाम महागढ़ ॥ ६१-६२ ॥ ' विडग पाठात्रिफलाजमोदा हिम्गूनि वक्रं त्रिकटूनि सर्वश्व वर्गों लवणः सुसूक्ष्मः पीने के हेतु विष को नष्ट तथा fa महान् प्रभाव 4 चैव ॥ ६३ || / सचित्रकः क्षौद्रयुतो निधेयः 1 1 शृङ्गे गवां शृङ्गमयेन चैव प्रच्छादितः पक्षमुपेक्षितश्च ॥ ६४ ॥
एषोऽगदः स्थावरजङ्गमानां जेता विषाणामजितो हि नाम्ना । अजित अगद - विडङ्ग, पाठा, त्रिफला, अजमोदा ( अजवायन ), हींग, तगर, त्रिकटु ( सोंठ, मरिच, पीपल ), सभी ' नमक तथा चित्रक इन सब द्रव्यों को कूट पीसकर सूक्ष्म चूर्ण बना ले । इस चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर गाय के सींग में रखकर सींग के ढक्कन से ही ढक ( बन्द ) कर रख दे । फिर पन्द्रह दिनों । बाद यह अजित नामक अगद स्थावर तथा जगम विषों का नाश करने वाला हो जाता है ॥ ६३-६५ ॥ ' प्रपौण्डरीकं सुरदारु मुस्ता 1 " कालानुसार्या कटुरोहिणी च ॥ ६ ॥
स्थौणेयकध्यामकगुग्गुलुनि पुन्नागतालीशसुवर्चिकाच 1 ' कुटन्नटैलासित सिन्धुवाराः शैलेयकुष्ठे तगरं प्रियङ्गुः ॥ ६६ ॥
रोध जलं काञ्चनगैरिकं च 1 समागधं चन्दनसैन्धवं च । सूक्ष्माणि चूर्णानि समानि कृत्वा - निदध्यान्मधुसंयुतानि ॥६७ ॥
एपोऽगदस्तादर्य ' इति प्रदिष्टो विपं विन्यादपि तक्षकस्य । ता अगर- प्रपोण्डरीक, देवदारु, मुस्तक ( मोथा ), कालानुसारी, कुटकी, स्थौलेयक, कन्तॄण, गुग्गुल, नागकेशर, इलायची, श्वेत निर्गुण्डी, तालीसपत्र, सुवचिका ( हुलहुल ), श्योनाक, शिलारस, कुछ, तगर, प्रियगु, लोध्र, चालक, स्वर्ण गैरिक, पिप्पली, चन्दन और सेन्धा नमक, इनका वारीक । चूर्ण बनाकर मधु में मिलाकर सींग में रख दें । यह अगद तक्षक सर्प के विष को भी क्षण मात्र में नष्ट कर देता है इस प्रभावशाली अगद का नाम तार्क्ष्य भगद है ॥ ६६-६८ ॥
मांसी हरेणुत्रिफलामुरङ्गी-। रक्कालतायष्टिक पद्मकानि ॥ ६८ ॥
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श्रध्यायः ५ ] कल्पस्थानम् ४६ fas ङ्गवाली सुगन्धिकैला-स्वकुष्ठपत्राणि सचन्दनानि । भार्गी पटोलं किणिही सपाठा मृगादनी कर्केटिका पुरश्च ॥ ६६ ॥
पालिन्यशोकौ क्रमुक सुरस्याः प्रसूनमारुष्करजं च पुष्पम् । सूक्ष्माणि चूर्णानि समानि शृङ्गे न्यसेत् सपित्तानि समाक्षिकाणि ॥७० ॥
वराहगोधाशिखिशङ्खकीनां मार्जारजं पार्पतनाकुले च । यस्यागदोऽयं सुकृतो गृहे स्या नानर्षभो नाम नरर्षभस्य ॥ ७१ ॥
न तत्र सर्पाः कुत एव कीटा-स्त्यजन्ति वीर्याणि विपाणि चैव । एतेन भेर्यः पटहाश्च दिग्धा नानद्यमाना विमाशु हन्युः ॥ ७२ ॥
दिग्धाः पताकाश्च निरीक्ष्य सद्यो विपाभिभूता विपा भवन्ति । ऋषभ अगद -- जटामांसी, हरेणु, त्रिफला, शोभाञ्जन, मञ्जीठ, लता ( प्रियंगु ), मधुयष्टी ( मुलहठी ), पद्माख, विडङ्ग, तालीसपत्र, सर्पगन्धा, इलायची, दालचीनी, कुष्ठ ( कूठ ), तेजपत्र, चन्दन, भारती, परवल, चिरचिटा, पाठा, इन्द्रायण, कर्कटी, गुग्गुल, निशोथ, अशोक, क्रमुक ( सुपारी ), तुलसीपुप्प, आदि द्रव्यों का सूक्ष्म चूर्ण बनाकर पित्त एवं मधु से मिश्रित कर सींग के बर्तन में रख दे । शूकर, गोधा ( गोह ), मोर, शल्लकी ( सेह ), बिल्ली, चित्तलहरिण, तथा नेवले का ही पित्त ग्रहण करना चाहिये । जिस भाग्य-शाली नृपत्ति के महल में यह ऋषभ नामक क्षगद रहता है वहाँ पर न तो सर्प और न कोट ही वीर्य अथवा विप का त्यागकरते । इस भगद से लिप्त भेरी तथा नगाडे बजाए जाने पर, उनकी ध्वनि विष को शीघ्र नष्ट कर देती है । इस भगद से लिप्त पताकाओं को देखकर विष से पीडित मनुष्य तुरन्त नीरोग हो जाते हैं अर्थात् वे विष प्रभाव से शीघ्र मुक्ति पा जाते है ॥ ६८-७३ ॥ लाक्षा हरेणुर्नलदं प्रियङ्गुः शिद्वयं यष्टिकपृथ्विकाञ्च ॥७३ ॥
चूर्णीकृतोऽयं रजनीविमिश्रो
सर्पिर्मधुभ्यां सहितो निधेयः ।
शृङ्गे गवां पूर्ववदापिधान-स्ततः प्रयोज्योऽञ्जननस्यपानैः ॥ ७ ॥
संजीवनो नाम गतासुकल्पा-नेषोऽगदो जीवयतीह मर्त्यान् । संजीवन अगद -- लाता, हरेणु, जटामासी, प्रियंगु, मीठा, सहजन, कटु सहजन, मधुयष्टी, बडी इलायची, हल्दी आदि । द्वयों को चूर्ण बनाकर घी तथा मधु मिलाकर गाय के । ७ सु ० क ० सींग के ही ढक्कन से बन्द करके रख दे । पन्द्रह दिनों के बाद इस भगद का अञ्जन, नस्य तथा पीने के लिए प्रयोग करना चाहिये । इस युक्ति से सेवन किया गया यह संजीवन नाम का अगद मृत तुल्य मनुष्यों को भी जीवनदान देता है ॥ श्लेष्मात की कट्फलमातुलुङ्ग चः श्वेता गिरिहा किणिही सिता च ॥७५ ॥ ।
सतण्डुलीयोऽगद एष मुख्यो विषेषु दर्वीकर जिलानाम् । दवींकर और राजिल के विष में अगद - लसोडा, कट्फल, विजौरा नीबू, श्वेत अपराजिता, चिरचिटा ( किणही ), शर्करा ( अथवा सिता या श्वेत वचा भी ) को चौलाई में मिला कर बनाया गया यह अगद दर्बीकर और राजिमान सर्पों के विपों में मुख्य है ॥ ७६ ॥
द्राक्षा सुगन्धा नगवृत्तिका च श्वेता समझा समभागयुक्ता ॥७६ ॥
देयो द्विभागः सुरसाच्छदस्य
कपित्थबिल्वादपि दाडिमाच्च ।
तथाऽर्धभागः सितसिन्धुवारा-कोठमूलादपि गैरिकाच्च ॥७७ ॥
एषोऽगदः क्षौद्रयुतो निहन्ति विशेषतो मण्डलिनां विषाणि । मण्डली विप में अगद - द्राक्षा, सर्पगन्धा, नगवृत्तिका, श्वेत कोयल, मञ्जिष्ठा ये प्रत्येक समान भाग, तुलसीपत्र, | कपित्थ ( कैथ ), बिल्व ( बेल ), अनार के पत्र ये प्रत्येक दो दो भाग, श्वेत निर्गुण्डी, अकोठमूल और गैरिक आदि को आधा आधा भाग मात्रा में मिलावे । इसमें मधु मिलाकर | बनाया गया भगद मण्डली सांपों के विष नष्ट करता है || ७७ ॥ वंशत्वगार्द्राऽऽमलकं कपित्थं कटुत्रिकं हैमवती करञ्जबीजं तगरं शिरीष पुष्पं च गोपित्तयुतं विषाणि लुतोन्दुर पन्नगानां को विशेष रूप से सकुष्ठा || ७८६ ||
निहन्ति ।
कैच लेपाञ्जननस्यपानैः ॥७६ ॥
पुरीषमूत्रानिलगर्भसङ्गा-न्निहन्ति वर्त्यञ्जननाभिलेपैः । काचार्मकोथान् पटलांश्च घोरान् पुष्पं च हत्यञ्जनस्ययोगैः ॥ ८० ॥
लतादि विष में वशत्वगादि अगद - गीले वाँस की छाल, आँवला, कैथ, त्रिकटु ( सोंठ, मरिच, पीपल ) वच, कूठ, करक्ष के बीज, तगर, शिरीष के फूल आदि द्रव्यों को गाय के पित्त में मिलाये । इसका लेप, अंजन और नस्य करने पर मकडी, चूहे, साँप तथा अन्य कीटों का विष नष्ट हो जाता है । वर्त्ति, अंजन तथा नाभिलेपन से यह अगद मल, मूत्र, वायु तथा गर्भ के अवरोध को नष्ट करता है । आँखों के काच ( मोतिया बिन्द ), अर्म, अतिकोथ तथा पटल
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५२ सुश्रुतसंहिता पद्माक्ष, दाडिमी, चमेलीपुष्प, हल्दी, दारुहरिद्रा, सारिवा, कृष्णसारिवा, शालपर्णी, पृश्निवर्णी, प्रियद्भु, तगर, कुष्ठ ( कूठ ), वडी कटेरी, छोटी कटेरी, एलवालुक, चन्दन, इन्द्रायण इनसे सिद्ध किया गया कल्याणक नाम का घृत विपनाशक, ग्रहनिवारक एव अपस्मार - नाशक है । पाण्डुरोग गर विप, श्वासरोग, मन्दाग्नि, ज्वर, कास आदि का नाशक है । शोप रोगी, अल्पवीर्यवाले मनुष्यों तथा वन्ध्याओं लिए भी बडा उपयोगी एव उत्तम है ॥ ८-११ ॥
अपामार्गस्य वीजानि शिरीपस्य च मापकान् ।
श्वेते द्वे काकमाचीं ' च गवां मृत्रेण पेपयेत् ॥ १२ ॥
सपिरेतैस्तु संसिद्धं विपसंशमन परम् ।
अमृतं नाम विख्यातमपि संजीवयेन्मृतम् ॥ १३ ॥
सर्वविष में अमृत सर्पि- अपामार्ग के बीज, शिरीष चीन, श्वेत तथा नीली अपराजिता ( कोयल ), मकोय इनको गोमूत्र में पीसे और इनसे सिद्ध किया घृत विपनाशक के रूप में सर्वश्रेष्ठ है । इस घृत का नाम अमृत घृत है तथा यह घृत मृत मनुष्य को भी जीवित कर देने की अपूर्व क्षमता रखता है ॥ १२-१३ ॥
चन्दनागुरुणी कुष्टं तगरं तिलपर्णिकम् ।
प्रपौण्डरीकं नलदं सरलं देवदारु च ॥१४ ॥
भद्रश्रियं यवफल भाग नीलीं सुगन्धिकाम् ।
कालेयकं पद्मक च मधुकं नागरं जटाम् ॥ १५ ॥
पुन्नागैलैलवालूनि गैरिकं ध्यामक वलाम् ।
तोयं सर्जरस मांसीं शतपुष्पां हरेणुकाम् ॥ १६ ॥
तालीशपत्रं क्षुद्रेलां प्रियङ्गु सकुटन्नटाम् ।
शिलापुष्पं सशैलेय पत्रं कालानुसारिवाम् ॥ १७ ॥
कटुत्रिकं शीतशिवं काश्मयं कटुरोहिणीम् ।
सोमराजीमतिविषां पृथ्वीका मिन्द्रवारुणीम् ॥ १८ ॥
उशीरं वरुणं मुस्तं कुस्तुम्बुरु नखं तथा ।
वे हरिद्रे स्थोयं लाक्षां च लवणानि च ॥१६ ॥
कुमुदोत्पलपद्मानि पुष्पं चापि तथाऽर्कजम् ।
चम्पकाशोकसुमनस्तिल्वकप्रसवानि च ॥ २० ॥
पाटलीशाल्मली शैलुशिरपाणां तथैव च ।
कुसुमं तृणमूल्याश्च सुरभीसिन्धुवारजम् ॥ २१ ॥
धवाश्वकर्णपार्थानां पुष्पाणि तिनिशस्य च ।
गुग्गुलुं कुङ्कुमं विम्बी सर्पाक्षी गन्धनाकुलीम् ॥ २२ ॥
एतत् संभृत्य संभार सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ।
गोपित्तमधुसर्पिर्भिर्युक्तं शृङ्गे निघापयेत् ॥२३ ॥
भग्नस्कन्धं विवृत्तां मृत्योर्दृष्ट्रान्तरं गतम् ।
अनेनागढ़मुख्येन मनुष्यं पुनराहरेत् ॥ २४ ॥
एपोऽग्निकल्पं दुर्वारं क्रुद्धस्यामिततेजसः ।
विपं नागपतेर्हन्यात् प्रसभं वासुकेरपि ॥ २५ ॥
महासुगन्धिनामाऽयं पञ्चाशीत्यङ्गसंयुतः ।
राजाऽगदाना सर्वेषां रानो हस्ते भवेत् सदा ॥ २६ ॥
स्नातानुलिप्तस्तु नृपो भवेत् सर्वजनप्रियः ।
भ्राजिष्णुतां च लभते शत्रुमध्यगतोऽपि सन् ॥ २७ ॥
सर्वविप में महासुगन्धि नामक अगदराज - चन्दन, अगुरु, कुष्ठ, तगर, हुलहुल, प्रपौण्डरीक, उशीरभेद ( नलट ), चीड ( सरल ), देवदारु, श्वेत चन्दन, यवफला, भाङ्ग, नीली, सर्वगन्धा, कालेयक ( पीत चन्दन ), पद्मान, मधुयष्टी, सोंठ, जटामांसी, नागकेशर, इलायची, एलवालुक, गेरु, कत्तॄण, वला, बालक, राल, छैच्छरीला, सौफ, हरेणु, तालीश पत्र, छोटी इलायची, प्रियसु, केवटीमोथा, मोथा, शिला ( मैनमिल ), पुप्प ( कासीस पुष्प ), शिलारम, तेजपत्र, कालानुसाय, त्रिकटु, कर्पूर ( शीतशिव ), गम्भारी, कुटकी, बावची, अतीस, मोटा जीरा, इन्द्रायण, बस, वरुण, मुस्तक, धान्यक ( धनियाँ ), नख, श्वेत और नीली अपराजिता, हल्दी, दारूहल्दी, स्थीर्णय, लाक्षा ( लाख ), पाँचोनमक, कुमुद, उत्पल, नीलकमल, अर्कपुष्प, चम्पक तथा अशोकपुष्प, तिलकपुष्प, पाटली, शाल्मली ( सेमर ), । लसोड़ा, शिरीष आदि के भी पुष्प, केवडा, सुरभी ( राना अथवा शल्लकी ) तथा निर्गुण्डी के फल, धन, अश्वकर्ण, अर्जुन तथा तिनिश के पत्र, गुग्गुल, केशर, कुन्दुरु, सर्पाक्षी, गन्धनाकुली, इन सब को एकत्रित कर तथा कूट पीस कर सूक्ष्म चूर्ण बनावे | इस चूर्ण को गाय के पित्त, मधु तथा घृत में मिश्रित कर गाय के सींग में रस देवे । कन्धे गिर जाने पर ( स्कन्धभग्न होने पर ), नेत्रों के खुले रह | जाने पर तथा मृत्यु के पाश में जकडे हुए मनुष्य को भी यह अगद जीवनदान देकर इस लोक में पुन. लौटा लाता है | यह अगढ अनि के समान अप्रतिहत शक्तिवाला, क्रोध के समान महानू तेजस्वी, सपा के राजा वासुकि के विष को भी नष्ट करने की शक्ति रखता है । इस अगद का नाम महासुगन्धि अगद है । इसमें सब मिलाकर पच्चासी औषधियाँ ढाली जाती है । यह सब भगढ़ों का राजा है । अतः इस महान् अगढ को राजा को सदैव अपने हाथ में ही धारण किए रहना चाहिए । स्नानोपरान्त इसका लेप करने से वह नृपति सभी प्रजा तथा परिजनों का प्रिय रहता है तथा शत्रुओं के बीच घिरा रहने पर भी तेजस्वी रहता है ॥१४- २७ ॥
उष्णव विधिः कार्यो विषार्ताना विजानता ।
मुक्त्वा कीटविपं तद्धि शीतेनाभिप्रवर्धते ॥ ८ ॥
विधातुरों को स्वेदन का निषेध - विप से पीडित व्यक्तियों में उष्ण को छोड़कर सभी उपक्रमों का । प्रयोग करना चाहिए । कीट विष की अवस्था में उष्ण उपचार भी करे क्योंकि शीत के कारण कीट चिप का प्रभाव भी बढता जाता है ॥ २८ ॥
अन्नपानविधावुक्तमुपधार्य शुभाशुभम् I शुभं देयं विपार्तेभ्यो विरुद्धेभ्यश्च वारयेत् ॥ २६ ॥
फाणितं शिग्रुसौवीरमजीर्णाध्यशनं तथा ।
वर्जयैच्च समासेन नवधान्यादिकं गणम् ॥ ३० ॥
दिवास्वप्नं व्यवायं च व्यायाम क्रोधमातपम् ।
सुरातिलकुलत्थांश्च वर्जयेद्धि विषातुरः ॥ ३१ ॥
विषातुरों के लिए पथ्यापथ्य – अन्नपान विधि में कहा
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श्रध्यायः ६ ] कल्पस्थानम् हुआ हित - अहित विचार करके विषजुष्ट प्राणी को हितकारी अन्न दे तथा विरोधी हानिकारक वस्तुओं के प्रयोग का त्याग करे | राव ( फाणित ), सहजन, कांजी, अजीर्ण, अध्यशन एवं सक्षेप में नवधान्यादि गण से विषजुष्ट प्राणी की रक्षा करे । दिन में सोना, मैथुन, व्यायाम, क्रोध, धूर ।
सेवन, सुरापान, तिल, कुलत्थ आदि को भी चिप से पीडित ।
व्यक्ति व्याग देवे ॥ २ ९ -३१ ॥
विमर्श - विपों के उपशमनार्थ वेदों और पुराणों में भी कई योग प्राप्त होते है यथा - गरुडपुराण ( १११ ९ १ ) में एक ऐसे लेप का विधान है जिसे वाद्य यन्त्र तथा ध्वजा पर लगा देने से उनके श्रवण एवं दर्शन मात्र से विप नष्ट हो जाता है, यथा - ' हरेणुमासीमक्षिष्ठा रजनीमधुकामधु । अक्षत्वक् सरसा लाक्षा पित्तं पूर्ववद्भुवि । वादित्राणि पताकाश्च पिटेरेते. प्रलेपिता । युवा पृष्ठा, ममात्राय सद्यो भवति निर्विष. ॥ इसी प्रकार गरुड पुराण के ( ११२१२१३, १६ ) में एक ऐसे धूप का वर्णन है जो सभी तरह के चिपों का अपहरण करता है । ऋग्वेद में ( १० / ९ ७१७ ) में यक्ष्मा के त्रिप को नष्ट करने के लिये अश्वावती, सोमवती, अर्जयन्त तथा उदोजस नामक चार औषधियों का वर्णन मिलता है, यथा - प्रश्वावती सोमवती
अर्जयन्ती उदोजसम् । आविति सर्वा ओषधीरस्या अरिष्टतातये ॥
अथर्ववेद के पांचवें काण्ड के तेरहवें सूक्त में चिप के स्तम्भन, निस्सरण, के लिए समन्यक योग लिखे हैं, इसी प्रकार अथर्व वेद के दसवें काण्ड के चौथे सूक्त में ' पैद्द ' नामक औषधि को बहुत शक्तिशाली माना गया है, इस पैटू का उपयोग भी कई प्रकार से वर्णित किया गया है । ( १ ) उसके चूर्ण के अभिमन्त्रित कर दाहिने अनुष्ट से रोगी के दाहिने नथुने ( Right_nostril ) में ढाला जाता है । ( २ ) सांप वाले स्थान में इसे अभिमन्त्रित कर डाल देने से सांप भाग जाते हैं । पैद्य के प्रभाव को वर्णित करते हुए वेदों ने स्वयं कहा है-पेढो हन्ति कसनील पेत्रमुतासितम् । पैो रयः शिर सविभेद पृथक्ता ॥ पैढ प्रेहि प्रथमो नुत्वा तमतुमेमसि । अहोन् वयस्पतात् अयो मेनस्यावयमेमसि ॥ इट पैां भजायेते दमस्य परायणम् ॥ पह्रस्य मन्महे वय स्थिरस्य स्थिर धाम्नः । इमे पश्चा वृंदाकव • ढीध्यत अभ्यते ॥ इति । प्रसन्नदोषं प्रकृतिस्थधातुमन्नाभिकाङ्क्ष सममूत्रजिह्वम् । प्रसन्नवर्णेन्द्रियचित्त चेष्टं वैद्यो ऽवगच्छेदविपं मनुष्यम् ३२ इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने दुन्दुभिस्वनीयकल्पो नाम पटो s ध्यायः ॥ ६ ॥
-600400-विषमुक्त के लक्षण – स्वभाव में स्थित वातादि दोप होने पर, रसादि धातु और मल अपने स्वभाव में आने पर, अन्न, रुचि होने पर, मन के साथ उचित रूप में रस को ग्रहण करने वाली जिह्वा के होने पर, वर्ण, इन्द्रिय और चेष्टा से प्रसन्न ( स्वाभाविक ) हो जाने पर चिकित्सक मनुष्य ( विष जुष्टरोगी ) को विपरहित समझे ॥ ३२ ॥
विमर्शः -- चरककार विपसेवी के पथ्यापथ्य का वर्णन करते हुए लिखते है कि - शालय पष्टिकाश्चैव कोरदूपा प्रियद्गव भोजनार्थं प्रशस्यन्ते लवणार्थे च सैन्धवम् । तण्डुलीयकजीवन्ती
वार्ताकुसुनिषण्णका । चुञ्चर्मण्डुकपर्णी च शाक च कुलक हितम् ॥
धात्री दाडिममम्लायें यूपा मुद्द्रहरेणुभि. । रसाचैणाश्च शिखिना लावतेत्तिरपाता. ॥ विषघ्नोपधसयुक्ता रसा यूपाश्च संस्कृताः । | अविदाहीनि चान्नानि विपार्तानाम् भिषग्जितम् ॥ विरुद्धाध्यशन-क्रोमक्षुद्धयायासमैथुनम् । बर्जयेद्विपमुक्तोऽपि दिवास्वप्न विशेषत. ॥ ( च ० चि ० भ ० २३ २२३ - २२७ ) माधवकार महोदय ने माधवनिदान में विपमुक्त अथवा विपरहित पुरुष के लक्षण बताते हुए कहा है कि प्रशान्तदोष प्रकृतिस्थधातुमन्नाभिकाम सममूत्रविटकम् । प्रसन्नवर्णेन्द्रियचितचेष्ट वैद्योऽवगच्छेदविष मनुष्यम् ॥ ( माधवनिदान विपरोगनिदानम् ६५ ) ॥ इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने दुन्दुभिस्वनीयकल्पो नाम पष्ठोऽयायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः अथातो भूपिककल्पं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥
वाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
मूषिक कल्प का उपक्रम - अब इसके आगे मूषिक कल्प का । व्याख्यान करेंगे, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥
पूर्व शुक्रविपा उक्ता मूपिका ये समासतः ।
नामलक्षण भैषज्यैरष्टादश निबोध मे ॥ ३ ॥
लालनः पुत्रकः कृष्णो हसिरश्चिक्कि ( क्वि ) रस्तथा ।
छुच्छुन्दरोऽलसचैव कपायदशनोऽपि च ॥ ४ ॥
कुलिङ्गश्चाजितश्चैव चपलः कपिलस्तथा ।
कोकिलोऽरुणसंज्ञश्च महाकृष्णस्तथोन्दुरः ॥ ५ ॥
श्वेतेन महता सार्धं कपिलेनाखुना तथा ॥ मूपिकञ्च कपोतामस्तथैवाष्टादश स्मृताः ॥ ६ ॥
शुक्रं पतति यत्रपां शुक्र पृष्टैः स्पृशन्ति वा ।
नखदन्तादिभिस्तस्मिन् गात्रे रक्तं प्रदुष्यति ॥ ७ ॥
जायन्ते ग्रन्थयः शोफाः कर्णिका मण्डलानि च ।
पिडकोपचयचो विसर्पाः किटिभानि च ॥ ८ ॥
पर्वभेदो रुजस्तीत्रा मूर्च्छाऽङ्गसदन ब्वरः ।
दौर्बल्यमरुचिः श्वासो मथुर्लोमहर्पणम् ॥६ ॥
दष्टरूपं समासोक्तमेत व्यासमतः शृणु । अट्ठारह प्रकार के मूपकों के नाम - शुक्र विपवाले भूपकादि जो पहले सक्षेप में कहे गये हैं, वे संख्या में अठारह हैं । उनके नाम, लक्षण और औषध का विवरण मुझसे सुनो । लालन, पुत्रक, कृष्ण, हंसिर, चिकिर, छछुन्दर, अलस, कपाय, दशन, कुलिङ्ग, अजित, चपल, कपिल, कोकिल, अरुण, महाकृष्ण, उन्दुर, महाश्वेत, कपिल और कपोताभ ये अठारह चूहे है ॥ मूकदष्ट के सामान्य लक्षण - इन चूहों का शुक्र जहाँ पर गिर जाता है, तथा शुक्रयुक्त वस्तु का जहाँ स्पर्श होता है | उससे तथा इनके नख, दन्त आदि से उस भङ्ग का रक्त दूपित हो जाता है I । इनके काटने से, गांठें, शोथ, कर्णिका ) ( उभार ), मण्डल, पिढिकाएँ ( फुंसी ), उत्पन्न होना तथा उग्र विसर्प, किटिभ, पर्वभेद, तीव्र वेदना, मूच्र्छा, अङ्गों की शिथिलता, उवर, दुर्बलता, अरुचि, श्वास, वमन, लोमहर्ष,
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५४ सुश्रुतसंहिता
आदि लक्षण ( सक्षेप में ) जानो । अतः अब विस्तारपूर्वक ।
इन सबके लक्षण आदि सुनो ॥ ७ - ९ ॥
विमर्श: -- प्राचीन आचार्यों ने भूपक को शुक विप वाला माना है क्योंकि जङ्गम विपों के सम्बन्ध में लिखा है कि जगम विषैले प्राणियों में प्रायः दृष्टि, निःश्वास, दात, नख, मूत्र, पुरीप, लाला, शुक्र, आर्तव, मुखसदेश आदि भागों में विपों का अधिष्ठान होता है और वहीं पर आचार्यों ने भी वर्णन किया ' मपका. शुक्रविपाः । मनुष्य के जिस अङ्ग पर चूहों का शुक्र गिर जाता है अथवा चूहे के शुक्र से स्पर्शप्राप्त नख, दन्त आदि के कारण किसी भट्ट पर खरोंच आदि हो । जाती है व उसके शुक्रकीटों का रक्त से सम्पर्क हो जाता है उस अंग में चूहे के विष का प्रभाव होने लगता है । कहने का अभिप्राय यह है कि किसी प्रकार चूहे का शुक्र रक्त में प्रविष्ट होकर चिप के लक्षणों को उत्पन्न करता है 1 इस विष का प्रभाव मन्द स्त्ररूप का होने के कारण दूपीचिप के समान होता है । सुश्रुतसंहिता के ख्यातनामा टीकाकार ढल्हणाचार्य ने अपनी टीका में कई आचार्यों के मतों का सग्रह भी किया है, उन उक्तियों के आधार पर भी हम यह नही कह सकते कि केवल चूहे के शुक्र में ही विप होता है । यथा भालम्वायन महोदय का मत है कि -- शुक्रेणाथ पुरीपेण मूत्रेणापि नस्तथा । दष्ट्रा मिर्वा क्षिपन्तीह मूपिका पञ्चधा विषम् ॥ चूहे पांच प्रकार से अपने विर्षो को मनुष्य शरीर में प्रविष्ट करते है, शुक्र, मूत्र, पुरीप, नस एवं दन्त के द्वारा | इस कथन के आधार पर तो उपर्युक्त पांचों भङ्ग भी चिपके अधिष्ठान माने जा सकते है । इसका समाधान इस प्रकार किया जाता है कि उनका शुक्र यदि मनुष्य - शरीर पर गिर जाय एव फिर वहाँ पर उनके दांत या नस आदि लग जावें तो उसके शुक्र का सम्पर्क रक्त के साथ हो जाता है और विप का प्रभाव होने लगता है । आज का पाश्चात्य विज्ञान चूहों को दृष्टा विप वाला मानता है, इनके काटने पर विपक सम्पर्क रक्त में होकर दो प्रकार स्थानिक एवं सार्वदेहिक लक्षण उत्पन्न करता है । कई बार तो ऐसा भी देखा जाता है । किसी व्यक्ति के पैरों के तलुवे अथवा एढी का मांस चूहे खा ये किन्तु उस पर कोई भी प्रभाव नहीं हुआ । सम्भवतः इसके दो ही कारण हो सकते है या तो ( १ ) निर्विष चूहों द्वारा काटा गया हो अथवा ( २ ) रक्त के साथ उनके विप का सम्पर्क ही न हुआ हो । अस्तु आधुनिक ग्रन्थों के आधार पर हम विष का कारण स्पाइरोकीटा मार्सस म्यूरिस नाम का कुन्तलाणु माना जाता है । इन जीवाणुओं से चूहे तथा मूषक उपसृष्ट होते है और इन्हीं उपसृष्ट चूहों के दश के कारण यह सूपकटंश ज्वर ( Ratbite fever ) या विष प्रभाव मनुष्यों में होता है | चूहे के काटने से मनुष्य में रोग का सक्रमण किस प्रकार होता है, उसके विषय में कतिपय वैज्ञानिकों की धारणा है कि काटने समय चूहे के मुग से कुछ लाला ( Bala ) शम्बान में गिरता है जिसके जीवाणु मनुष्य शरीर में पहुंचने तथा विष प्रभाव उत्पन्न करते हैं । भूप सेसचा में प्रविष्ट हुआ विष या जीवाणु लम वाहिनियों द्वारा समग्रन्थियों में तत्पश्चात् रक्त मे प्रष्ट छोर रोग के लक्षण उत्पन्न करता है । आचार्य सुश्रुत ने चूहों के लालन, पुत्रक आदि अठारह भेदों का उल्लेख किया है, छछूदर भी इन्हीं में गिना गया है । परन्तु इन जातियों में किसी को सविप अथवा निर्वि करके भेद नहीं किया है, अतः इनके मतानुसार चूहों की सभी जातियाँ चिपैली होती है निर्विप कोई भी नहीं । चूहों के दाँत वहुत तीचण होते है अतः उनके दश से विपसंचार अवश्यम्भावी मानकर ही आचार्यों उक्त मत प्रतिपादित किया है जो युक्तियुक्त भी है कि चूहे के शुक्र में ही विप होता है, जब यह शुक्र मनुष्य के किसी अग पर गिर जाता है और अकस्मात् चूहा वहाँ पुनः नख | मार दे या दांत से काट ही ले तो उस शुक्र का रक्त के साथ सम्पर्क होता है और मनुष्य पर विष का प्रभाव होने लगता है । यही नहीं आचार्य सुश्रुत ने विस्तारपूर्वक पृथक पृथक् जाति के चूहों की जातियों के देश से होने वाले लक्षणों की भी विवेचना की है । आचार्यं डल्हण ने तो एक स्थान पर पुनः कहा है कि गर्भिण्या मूषिकया दष्टे अम्लादिदोहदः-ऋतुमत्या दष्टे रक्तमेहन आध्मान रतिशीलता च ॥ ' इत्यादि ॥ गर्भवती चुहिया के दंशन से अम्लादि द्रव्यों के सेवन की इच्छा एव ऋतुमती या रजस्वला चुहिया के दंश से मूत्र में रक्त जाना, आध्मान तथा मैथुन की इच्छा होना आदि
लक्षण होते हैं । अस्तु ।
लालास्रावो लालनेन हिक्का छर्दिश्च जायते ॥१० ॥
तण्डुलीयककल्कं तु लिह्यात्तत्र समाक्षिकम् । लानन दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - अव दंश से होने वाले लक्षणों को विस्तार से सुनो । लालन चूहे के कारण लालास्राव, हिचकी, वमन होता है । इसमें चौलाई के करक को मधु मिलाकर चाटे ॥ १० ॥
पुत्रकेणाङ्गसादश्च पाण्डुवर्णश्च जायते ॥११ ॥
चीयते ग्रन्थिभिश्चाङ्गमाखुशावकसन्निभैः ।
शिरीपेडुदकल्कं तु लिह्यात्तत्र समाक्षिकम् ॥१२ ॥
पुत्रक दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - पुत्रक चूहे के दश से अह्नों में शिथिलता, पीलापन, चूहे के बच्चे के समान गाठ से शरीर भर जाता है । इसमें शिरीप तथा इङ्खदी ( हिंगोट ) का कल्क मधु के साथ सेवन करवाये ॥ ११-१२ ॥
कृष्णेन दशे शोफोऽसृकुछर्दिः प्रायश्च दुर्दिने ।
शिरीषफलकुष्टं तु पिवेत् किशुकभस्मना ॥ १३ ॥
कृष्णदष्ट के लक्षण और चिकित्सा - कृष्ण चूहे के काटने से शोफ तथा दुर्दिन ( मेघाच्छन्न दिन ) में रक्त का चमन होता है । इसमें शिरीप फल, कुष्ठ को पलाशपुष्प - भस्म में मिला कर पानी में घोल कर सेवन कराये ॥ १३ ॥
हसिरेणान्नविद्वेपो जृम्भा रोम्णां च हर्पणम् ।
पिवेदारग्वधादि तु सुवान्तस्तत्र मानवः ॥१४ ॥
सिर दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - हंसिर चूहे के दंश से अन् विद्वेष, जृम्भा ( जम्हाई आना ) तथा रोमाञ्च होता है । इसमें वमन ( यथोचित रूप में ) करा कर आरग्बधादि गण के काथ का सेवन कराए ॥ १४ ॥
चिक्कि ( फि ) रेण शिरोदुःखं शोफो हिक्का वमिस्तथा ।
जालिनीमदनाकोठकपायैर्वामयेत्तु तम् ॥१५ ॥
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श्रध्यायः ६ ] कल्पस्थानम् ५५ यवनालर्प भीक्षारं वृहत्योश्चात्र दापयेत् चिक्किर दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - चिक्किर मूपक के दंश से शिर में चेदना, शोफ, हिक्का तथा वमन होता है । इसमें तुम्मी ( कडची तुरई ), मैनफल, अंकोट, इनके कपाय से वमन करावे तथा इसमें जौ के क्षार ( यवक्षार ), dai च तथा वढी कटेरी का चार भी मिला दे ॥ १५ ॥
छुच्छुन्दरेण तृट् छर्दिर्व्वरो दौर्बल्यमेव च ॥१६ ॥
श्रीवास्तम्भः पृष्ठशोफो गन्धाज्ञानं विसूचिका ।
चव्यं हरीतकी शुण्ठी विडङ्गं पिप्पली मधु ॥१७ ॥
अकोठबीजं च तथा पिवेदत्र विषापहम् । छछुन्दर दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - छुछुन्दर के दंश से प्यास, वन, ज्वर, दौर्बल्य, ग्रीवास्तम्भ, पीट में सूजन, गन्धज्ञान का न होना तथा विसूचिका होती है । इसमें धन्य, हरड, सोंठ, वायविडङ्ग, पिप्पली, अंकोठ के बीज तथा
मधु का सेवन करे । यह योग विपन्न है ॥ १६-१७ ॥
ग्रीवास्तम्भोऽलसेनोर्ध्ववायुर्दशे रुजा ज्वरः ॥ १८ ॥
महागदं ससर्पिष्कं लिह्यात्तत्र समाक्षिकम् । अलस - दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - अलस नाम भूपक के ढंश स्वरूप ग्रीवास्तम्भ, ऊर्ध्ववायु, दंश में वेदना तथा ज्वर होता है । इसमें घी तथा मधु के साथ महानगद को चाटे ॥ १८ ॥
निद्रा कपायदन्तेन हृच्छोपः कार्यमेव च ॥१६ ॥
क्षौद्रोपेताः शिरीपस्य लिह्यात् सारफलत्वचः । कषायटन्त - दष्ट के लक्षण और चिकित्सा कपायदन्त चूहे से नींद आना, हृदय शोष एवं कृशता होती है । इसमें शिरीप के सार, फल एवं छाल के चूर्ण को मधु के साथ चारे ॥ १ ९ ॥ कुलिन रुजः शोफो राज्यश्च दंशमण्डले ॥ २० ॥
सहे ससिन्धुवारे च लिह्यात्तत्र समाक्षिके । कुलिङ्ग - दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - कुलिङ्ग चूहे से वेदना सृजन एवं दंश स्थान पर रेखाए ऐसी खिंच जाती हैं । इसमें मुद्रपर्णी, मापपर्णी व सिन्धुवार ( निर्गुण्डी ) को मधु के साथ चाटे ॥ २० ॥
अजितेनाङ्गकृष्णत्वं छर्दिर्मूर्च्छा च हृदग्रहः ॥ २१ ॥
स्नुकक्षीरपिष्टां पालिन्दीं मञ्जिष्ठां मधुना लिहेत् । अजित - दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - अजित के दश से । अङ्गों का कृष्ण वर्ण हो जाना, वमन, मूर्च्छा, हृदय का जकडन होता है । इसमें निशोथ तथा मजीठ को थूहर के दुग्ध के साथ पीस कर मधु के साथ चाटे ॥ २१ ॥
चपलेन भवेच्छर्दिर्मूर्च्छा च सह तृष्णया ॥ २२ ॥
क्षौद्रेण त्रिफलां लिह्याद्भद्रकाष्ठजटान्विताम् ।
चपल - दंश से मन, मूर्च्छा और प्यास होती है ।
इसमें त्रिफला, देवदारु तथा जटामांसी को चाटे ॥ २२ ॥
कपिलेन ब्रणे कोथो ज्वरो ग्रन्थ्युद्गमः सतृट् ॥ २३ ॥
amragyaisi तां चापि पुनर्नवाम् । कपिल - दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - कपिल नाम के भूपक से व्रण में सदन, ज्वर, गाठों का उत्पन्न होना तथा प्यास होती है । इसमें श्वेत अपराजिता ( कोयल ) और श्वेत पुनर्नवा के रस को चाटे ॥ २३ ॥
ग्रन्थयः कोकिलेनोग्रा ज्वरो दाहश्च दारुणः ॥ २४ ॥
वर्षाभूनीलिनीकाथ कल्कसिद्धं घृतं पिवेत् । कोकिल - दष्ट के लक्षण तथा चिकित्सा -- कोकिल से गांठे, तीव्र ज्वर एवं भयानक दाह होता है । इसमें पुनर्नवा, नीलिनी के क्वाथ तथा एक से सिद्ध घृत का पान करे ॥ २४ ॥
अरुणेनानिलः क्रुद्धो वातजान् कुरुते गदान् ॥ २५ ॥
महाकृष्णेन पित्तं च श्वेतेन कफ एव च ।
महता कपिलेनासृक् कपोतेन चतुष्टयम् ॥ २६ ॥
भवन्ति चैषां दंशेषु ग्रन्थिमण्डलकर्णिकाः ।
पिडकोपचयश्वोः शोफश्च भृशदारुणः ॥ २७ ॥
दधिक्षीरघृतप्रस्थात्रयः प्रत्येकशो मताः ।
करञ्जारग्वधव्योपवृहत्यंशुमती स्थिराः ॥ २८ ॥
निष्काध्य चैषां काथस्य चतुर्थोऽशः पुनर्भवेत् ।
त्रिवृगोन्यमृतावसर्पगन्धाः समृत्तिका. ॥ २६ ॥
कपित्थदाडिमत्वक् च श्लक्ष्णपिष्टाः प्रदापयेत् ।
तत् सर्वमेकतः कृत्वा शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ३० ॥
पञ्चानामरुणादीनां विषमेतव्यपोहति 1 काकादनीकाकमाच्योः स्वरसेध्वथवा कृतम् ॥ ३१ ॥
सिराश्च स्रावयेत् प्राप्ताः कुर्यात् संशोधनानि च । अरुणादि पाचों से दूध के लक्षण और चिकित्सा - अरुण नामक मूषक से कुपित वायु वातज रोगों को उत्पन्न करती है । महाकृष्ण से पित्त एवं महाश्वेत के विप से कफ प्रकुपित होता है । महाकपिल के विष से रक्त तथा कपोत नामक पक के विष से चारो दोष प्रकुपित होते हैं । इसके दंश स्थान । मैं ग्रन्थियां, चकत्ते, तथा कर्णिकायें होती हैं । उम्र वेग वाली फुन्सियों की उत्पत्ति तथा भयानक शोथ होता है । इसके लिए दही, दूध और घी प्रत्येक का एक - एक प्रस्थ, करञ्ज, अमलतास, सोंठ, मरिच, पिप्पली, कण्टकारी, पृश्निपर्णी, | शालपर्णी का क्वाथ बनावे और इस क्वाथ में क्वाथ का चतुर्थांश निशोथ, गावजवाँ, गुडूची, तगर, सर्पगन्धा, काली मृत्तिका ( मिट्टी ), कपित्थ ( कैथ ) की छाल तथा अनार की छाल को बारीक पीसकर मिलाये । फिर इन सबको मृदु अग्नि से पाक करे । यह योग अरुण भादि पांचों चूहों के विष को नष्ट करता है । अथवा काकादनी ( सफेद गुआ ) तथा मकोय के स्वरस में घृत को सिद्ध करे । मर्म स्थान की सिराओं को छोडकर उचित स्थानों पर सिरामोक्षण कर्म करे तथा वमन, विरेचन आदि सशोधन कर्मों की व्यवस्था करे । विमर्श: - मूपिक - दशज विपों में दो प्रकार के लक्षण होते हैं - स्थानिक तथा सार्वदेहिक | स्थानिक लक्षण - इसमें देश - स्थान में प्रकोप होकर, सचणता, पीड़ा, शोथ, कोथ ( Gangrene ) तथा पिडिकोत्पत्ति होती है । उस स्थान से सम्बन्धित लसिकावाहिनियाँ दोपग्रस्त होती है तथा सग्रंथिकायें फूल जाती हैं, धीरे धीरे दश स्थान का शोथ बढ़ता जाता है और उस पर कुपित धातु का आवरण यन जाता है | सार्वदेहिक लक्षण - इसमें स्थानिक लक्षणों के वदने के साथ ही ज्वर का सहसा आक्रमण होता है । ज्वर के समय जाड़ा, मिचली, वमन, अतिसार, शरीर में पीड़ा,
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५६ सुश्रुतसंहिता बेचैनी, शिरशूल आदि लक्षण होते है । कभी कभी पूरे शरीर पर रक्तवर्ण के स्फोट निकलते है । विसर्प तथा शीतपित्त जैसे मण्डल शरीर पर निकलते हैं । तीसरे दिन ज्वर प्रायः १०३ -१०४ ° डिग्री तके पहुँच जाता है और प्रायः छठे दिन एकाएक उतर जाता है । पुन. ५-६ दिनों के बाद ज्वर का दूसरा दौरा आता है जो पांच छ ' दिनों के बाद स्वय कम हो । जाता है । इस प्रकार सज्वर तथा निज्र्ज्वर अवस्था के दौरे महीनों तक अथवा कभी कभी तो कई वर्षों तक चलते रहते हैं । ज्वर के समय सभी लक्षण तीव्र होते हैं तथा ज्वरमुक्त होने पर मन्द हो जाते है अथवा विलकुल मिट जाते हैं । प्रत्येक दौरे के समय रोगी दुर्बल हो जाता है तथा अधिक दौरे आने पर वह अत्यन्त कृश तथा मृतप्राय हो जाता है । आचार्य सुश्रुत द्वारा कथित क्षण सामान्यतया मूषिक विप में ही मिलते हैं । भूपिक दंशज ज्वर ( Ratbite fever ) का वर्णन आधुनिक चिकित्साशास्त्र में निम्न रूप में मिलता है । उपसृष्ट ( Infeted ) चूहे के काटने से मनुष्य के शरीर में क्षुद्र चक्राणु ( Sprillum Minus ) प्रवेश कर ज्वर, स्थानिक लसग्रंथियों ( Lymphglands ) की पीडाकर वृद्धि, विस्फोट ( Rsah ) तथा श्वेत कायानृत्कर्ष ( Leuco cytosis ) आदि लक्षण उत्पन्न करते हैं । चूहे के काटने का का इतिहास, ज्वर का अनेक बार पुनरावर्तन, विस्फोट, स्थानिक लसग्रन्थियों की पीढाकर वृद्धि तथा श्वेतकायाणू-कर्प इस रोग के प्रधान लक्षण है । शरीर में चक्राणु ( Spirochaeta ) के प्रवेश करने से दस दिन के अन्दर दंशित स्थान में शोथ होता है । स्थानिक ( Local ) लस ग्रंथियों की पीढाकर वृद्धि होती है और कम्प ( Rigor ) के साथ ज्वर प्रारम्भ होता है । प्रथम तीन दिन ज्वर रहता है पश्चात् ज्वर की तीव्रता में कमी होने लगती है और सप्ताह के अन्त में प्रायः छठे दिन पसीना ( Siwetang ) के साथ सहसा तापक्रम ( Temperature ) प्राकृत ( Normal ) हो जाता है । ज्वर के प्रारम्भ में वक्ष तथा बाहु पर उत्कर्णिक विक्षोभ ( Papular rash ) निकलते हैं तथा रक्त में चक्राणु मिल सकते हैं । एक सप्ताह पर्यन्त तापक्रम रहकर पुनः उवर प्रारम्भ हो जाता है और फिर यह क्रम चलता रहता है । रक्त में श्वेतकायाणूरकर्ष ( Leurocytosis ) मिलता है । रोग का निदान करने में - मूपिक दंश का इतिहास, ज्वर पुनरावर्तन, श्वेत कायाणूकर्प, रक्त तथा दशित स्थान के स्नाव में चक्राणु के मिलने से रोग विनिश्चिति सम्भव है । यह रोग घातक नहीं है परन्तु चिरकालानुबन्धी है । उचित चिकित्सा के अभाव में महीन या वर्षों तक चार - चार आक्रमण करता रहता है धीरे धीरे उसकी तीव्रता घट कर वह अपने आप भी अच्छा हो जाता है । इस प्रकार पुनरा वर्तक उबर के बार बार दौरे होते रहने से रोगी अधिकाधिक क्षीण हो जाता है एवं इस क्षीणता के फलस्वरूप उसकी मृत्यु भी हो सकती है । जापान में यह रोग काफी प्रचलित है, वहाँ इससे १० प्रतिशत मृत्यु होती है । भारतवर्ष में भी
दग्ध्वा विस्रावयेद्दशं प्रच्छितं च प्रलेपयेत् ।
शिरीपरजनीकुष्ठकुङ्कुमैरमृतायुतैः ॥ ३३ ॥
मूषिक विष में दाह, विस्रावण और प्रलेप - सब मूपिका दंश में यह विधि ( सिरावेधन, संशोधन ) करनी चाहिए | अग्नि में तप्त किए घी से दश स्थान को दग्ध करे फिर पाछ कर दश में से रक्त निकाले । दंशस्थान पर शिरीप, हल्दी, कुछ, केशर और गिलोय का लेप करे ॥ ३३ ॥
छर्दनं जालिनीकाथैः शुकाख्याङ्कोठयोरपि । मूपिक विष में शुकादि योग-- जालिनी ( कडुई तुरई ), शुकाख्य ( श्योनाक या शिरीप ) और अंकोठ इनके काथ से वमन करावे ॥ ३३ ॥
शुकाख्याकोषवत्योश्च मूलं मदन एव च ॥३४ ॥
देवदालीफलं चैव दध्ना पीत्वा विषं वमेत् ।
सर्व मूषिकदष्टानामेव योगः सुखावहः ॥ ३५ ॥
शिरीप, कटु तुम्बी इनकी जड, मैनफल तथा कुकडलता का फल इनको दही के साथ पीसकर वमन करावे । सब चूहों के दंश में यह योग लाभदायक है ॥ ३४-३५ ॥
फलं वचा देवदाली कुष्ठं गोमूत्रपेपितम् ।
पूर्वकल्पेन योज्याः स्युः सर्वोन्दुरुविषच्छिदः ॥ ३६ ॥
मूषक विप में फलादि योग - मैनफल, वच, देवदाली, कूठ इनको गोमूत्र में पीसकर दही के साथ पीना चाहिए । यह योग सभी चूहों के विष को नष्ट करता है ॥ ३६ ॥
विरेचने त्रिवृद्दन्तीत्रिफला कल्क इयते ।
शिरोविरेचने सारः शिरीपस्य फलानि च ॥ ३७ ॥
मूपिक विप में विरेचन तथा शिरोविरेचन योग - विरेचन के लिए निशोथ, दम्ती ( जमालगोटा ) तथा त्रिफला के कल्क का प्रयोग करे । शिरोविरेचन के लिए शिरीप का सार भाग ( मध्यभाग ) तथा फल का प्रयोग करावे ॥ ३७ ॥
हितत्रिकटु काढ्यश्च गोमयस्वरसोऽञ्जने ।
कपित्थगोमयर सौ लिह्यान्माक्षिकसंयुतौ ॥ ३८ ॥
रसाञ्जनहरिद्रेन्द्रयवकट्वीषु वा कृतम् ।
प्रातः सातिविषं कल्कं लिह्यान्माक्षिकसंयुतम् ॥ ३६ ॥
तण्डुलीयकमूलेपु सर्पिः सिद्धं पिवेन्नरः ।
आस्फोतामूलसिद्धं वा पञ्चकापित्थमेव वा ॥ ४० ॥
मूषिक विष में सशमन योग - त्रिकटु ( सौंठ, मरिच, पीपल ) मिलाकर गोवर के रस का अञ्जन करे । कैथ का स्वरस या गोवर के रसको मधु के साथ चाटे । रसौत, हल्दी, इन्द्रयच, । कटुरोहिणी आदि के कल्क को मधु के साथ सेवन करावे । अतीस के कल्क को मधु के साथ प्रातः काल खाये । चौलाई की मूल से सिद्ध किया हुआ घृत देवे । सारिवा के मूल में | अथवा कैथ के पत्ते, फल, मूल, पुष्प व छाल इनके कंपाय और काय में सिद्ध घृत का पान करे ॥ ३८-४० ॥ विमर्श ' -- पाश्चात्य वैद्यक में आखुचिपचिकित्सा में | ( Pen201llin इम रोग से मृत्यु तो होती है किन्तु प्रतिशत मृत्यु का प्रमाण ), सखिया ( Arsenic ) तथा विस्मथ ( Bismuthi ) ठीक ठीक - मालूम नहीं किया जा सका है । का सूचिकाभरण करना चाहिए । सखिया के यौगिकों में सर्वेषां च विधिः कार्यो मूषिकाणां सालवर्सन, नियोसलवार्सन के प्रयोग से तुरन्त लाभ पहुँचता विषेष्वयम् ॥ ३२ ॥ । है । ज्वरावेग में प्रारम्भ सुई देने से लाभ होता है ।
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अध्यायः ७ ] कल्पस्थानम् ५७ ४५-७५ ग्राम प्रति सप्ताह एक बार सिरा द्वारा ( Intra venously ) सुई दी जाती है इससे रक्तगत विष या जीवाणु नष्ट हो जाते हैं । इस रोग में प्रायः चार या पाँच सूचिका-भरण की आवश्यकता पड़ती है । द्यण की स्थानिक चिकित्सा से कोई विशेष लाभ तो नहीं होता तथापि एकीपलेविन, यूसोल ( Easol ) तथा अन्य जीवाणुनाशक घोल ( Antiseptic lotions ) से उसको साफ रखना बहुत जरुरी है । इससे व्रण का रोपण शीघ्र होता है । चरककार ने भी भूपिक के लक्षण तथा चिकित्सा का निम्न प्रकार से वर्णन किया है यथा — आदंशाच्दोणित पाण्डुमण्डलानि ज्वरोऽरचि । लोमहर्षश्च दाद्दश्चाप्याखुदृषोविषार्दिते ॥ मूर्द्धाङ्गशो यवैवर्ण्य क्लेदशन्दा श्रुतिज्वराः शिगैगुरुत्वं लालाऽनुकवर्दिश्चामाध्यमूषिकैः ॥ ( च ० चि ० भ ० २३ | ११६ - १४७ ) अर्थात् दूपी विष चूहे के दंशवण से स्थान की पाण्डुता के साथ रक्त का स्त्राव होता है । मण्डल ( चकत्ते ) उत्पन्न होते हैं । ज्वर, अरुचि, लोमाच तथा दाह आदि लक्षण होते हैं । मूर्च्छा, देह में शोथ, देह की विवर्णता, देह की क्लिन्नता व गलना, शब्द का सुनाई न पडना, ज्वर, शिर का भारीपन, लालास्राव तथा रक्त का वमन ये असाध्य मूपिकदष्ट के लक्षण है । तथा चिकित्सा का उल्लेख करते हुए चरककार कहते हैं कि - त्वचं च नागर चैत्र समाशं शृणपेषितम् । पेयमुष्णाम्बुना सर्वमूषिकाणा विषापहम् ॥ च ० चि ० भ ० २३ २०४ ) दालचीनी, सॉठ इनके वारीक पिसे चूणों को सम परिमाण में मिलाकर गरम जल से पिलाना चाहिये । यह सब भूपिकों के विप को नष्ट करता है । अष्टाद्गसंग्रहकार ने भी मूपिक के लक्षणों का प्रतिपादन करते हुए लिखा है, यथा -- यस्मिन्न पतत्यॆषा शुक्रभङ्गैः स्पृशन्ति वा । यच्छुक्लदिग्धैस्तत्रा टूपिते पाण्डुता गते । ग्रन्थयः श्वनधु. कोठो मण्डलानि भ्रमोऽरुचिः । शीत-स्वरोऽतिरक् सादॊ वेपथु. पर्वभेदनम् ॥ रोमहर्षं स्रुतिर्मूर्च्छा दीर्घ-कालानुबन्धनम् । श्लेष्मानुविद्धवहा खुपोतरुच्छर्दन सकृत् ॥ इति ॥
मूषिकाणां विपं प्रायः कुप्यत्यश्रेष्वनिर्हृतम् ।
तत्राप्येष विधिः कार्यो यश्च दूषीविषापहः ॥ ११ ॥
मूषिक विष के शान्त होन पर मी शोधन कार्य -- न निकला हुआ चूहे का विष प्रायः मेघों से आकाश के घिर जाने पर कुपित होता है । अतः यहाँ पर भी यही वमन, विरेचन तथा शिरोविरेचन आदि विधि तथा अन्य दूषीचिप - नाशक उपचार वरतना चाहिए ॥ ४१ ॥
स्थिराणां रुजतां वाऽपि व्रणानां कर्णिकां भिषक् ।
पाटयित्वा यथादोषं व्रणवञ्चापि शोधयेत् ॥४२ ॥
आखुविष - कर्णिका की चिकित्सा - स्थिर अर्थात् न भरने वाले अथवा भरते हुए व्रणों को कर्णिका को चिकित्सक चीरकर तथा दोष के अनुसार एवं त्रग की अवस्थानुसार चिकित्सा करे ॥ ४२ ॥
श्वशृगालतरच्वृक्षव्याघ्रादीनां यदाऽनिलः ।
श्लेष्मप्रदुष्टो मुष्णाति संज्ञां संज्ञावहाश्रितः ॥ ४३ ॥
तदा प्रस्रस्तलाङ्गूलहनुस्कन्धोऽतिलालवान् ।
' अत्यर्थवधिरोऽन्धश्च सोऽन्योन्यमभिधावति ॥ १४ ॥
तेनोन्मत्तेन दृष्टस्य दंष्ट्रिणा सविपेण तु । सु ० क ० सुप्तता जायते दंशे कृष्णं चातिस्रवत्यसृक् ॥४५ ॥
दिग्धविद्धस्य लिङ्गेन प्रायशश्चोपलक्षितः । उन्मत्त कुत्ता, शृगाल आदि से दष्ट के लक्षण - कुत्ता, गीदड ( सियार ), तरक्षु ( लकडबग्घा ), रोछ, व्याघ्र आदि के चिप के कारण, कफ से दूपित हुई वायु जब सज्ञावह स्रोतों का आश्रय लेकर संज्ञा विनाश कर देती है है तब पशु की पूछ, हनु और स्कन्ध ( कन्धे ) बहुत ढीले हो जाते हैं ( उनका | इन अह्नों की स्थिति पर कोई वश अथवा नियन्त्रण नहीं रहता ), मुख से बहुत सा लालास्राव होता है वह पशु बहुत बहरा हो जाता है तथा वह एक दूसरे की ओर भागता है । उस पागल, विष वाले दंष्ट्री पशु के काटने से दंशस्थान में सुषुप्ति हो जाती है तथा उसमें से काले रङ्ग का बहुत सा रक्त बहता है और प्रायः विषाक्त शस्त्र से विह्नण के से लक्षण उत्पन्न होते हैं ॥ ४३-४५ ॥ विमर्श: -- चरककार ने भी पागल कुत्ते के अभिज्ञानार्थं निम्न लिखित लक्षणों का उल्लेख किया है, यथा - श्व त्रिदोष-प्रकोपात्तु तथा धातुविपर्ययात् । शिरोभितापी लालास्राव्यधो । वक्त्रदेव च ॥ अन्ये ये विविधा व्यालाः कफवातप्रकोपणा ' । हृच्छिरो रुग्ज्वर स्तम्भतृपामूर्च्छाकरा मता ॥ ( च ० चि ० अ ० २३।१७४ - १७५ ) अर्थात् कुत्ते में तीनों दोपों का प्रकोप हो जाने से तथा धातुओं में विपरीतता अथवा विकृति होने से शिर में अभिताप ( पीडा ) होता है । उसके मुख से लार टपकती रहती है तथा वह मुख नीचे किये हुए चलता है । अन्य भी इसी प्रकार के हिंस्र पशु है जो कफ वात को प्रकुपित करते हैं । इन सबसे दृष्ट व्यक्तियों में हृदय तथा शिर में वेदना उवर, स्तम्भ, प्यास तथा मूर्च्छा ये लक्षण होते है । अष्टाङ्ग-संग्रहकार ने भी इसका अत्यन्त सुन्दर तथा वैज्ञानिक वर्णन दिया है, यथा - शुन श्लेष्मोल्वणा दोपा सज्ञा सज्ञावहाश्रिता । मुष्णन्तः कुर्वते क्षोभ धातूनामति दारुणम् || लालावानन्भ बधिर
सर्वतः सोऽभिधावति । स्रस्तपुच्छहनुस्कन्धशिरोदु खी नतानन ॥
| दशस्तेन विदष्टस्य सथ. कृष्ण क्षरत्यस्क् । हृच्छिरोरुक् ज्वरस्तम्भ-| तृष्णामूच्छद्भवोऽनु च ॥ अनेनान्येऽपि बोद्धव्या व्यालादष्ट्रा-| प्रहारिणः । मृगालाश्वनराश्वश्च द्वीपिन्यानवृकादयः ॥ ( अ ० हृ ० उ ० ० अ ० ४६ ) इस प्रकार प्राचीन चिकित्सा प्रथों में । अलकविष की वडी साङ्गोपांग विवेचना प्राप्त होती है । वस्तुतः यह रोग कुत्ता, वन्दर, गीदड, भेडिया, लोमड़ी, विल्ली, सुभर, रीछ आदि प्राणियों के काटने से फैलता है परन्तु प्राय. कुत्ते और सियारों से ही मनुष्यों में फैलते हुए देखा गया है । इन प्राणियों के दर्शन से सदैव विप प्रभाव नहीं होता । बल्कि एक विशेष अवस्था में जब ये प्राणी विष के प्रभाव से मत्त हो जाते हैं तभी अपने दश से दूसरे प्राणियों को भी उपसृष्ट करते है । अलर्कविप एक प्रकार का तीव्र far होता है । कुत्ते या उसके समान जाति के प्राणी उससे पीड़ित होते हैं । उनके काटने से उनके लार | ( लाला ) द्वारा मनुष्य के घाव में इसका सूक्ष्मदर्शकातीत ( Ultramieroscopic ) स्यन्दनशील विषाणु ( Filterable virus ) संक्रमित होता है । यह विषाणु रुग्ण प्राणी की लाला तथा नेगरी पिण्ड ( Negra Bodies ) में पाया जाता है तथा लालन्थियों में अधिष्टान बनाकर पडा रहता है इसीलिए
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६० श्रुसुतसहिता हो जाती हैं जिनमें कभी कभी कण्डू, पीडा व दाह भी होता है अतः उस स्थान को सेंकना चाहिए तथा कैल्सियम चूर्ण मुख मार्ग से प्रयोग कराना चाहिए । शिर में पीडा होने पर वेदनाहर यथा एस्पिरीन, सिबाल्जिन, सेरीडोन आदि देना चाहिए । यदि ज्वर हो जावे तो लक्षणानुसार उसकी चिकित्सा करे । रोगी को चिकित्सा कराते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए । मादक द्रव्यों शराव आदि का प्रयोग करते रहने से रोग-क्षमता उत्पन्न होने में कठिनाई होती है । पहाड, पहाडी, सीढ़ी आदि ऊँचे स्थानों पर नहीं चढ़ना चाहिए, खेल कूद आदि में भी भाग नहीं लेना चाहिए । रोगी को ठण्डक से बचना चाहिए तथा उसे मल की सम्यक् प्रवृत्ति होती रहे इस बात का भी पूरा पूरा ध्यान रखना चाहिए तथा गुड, तेल, मिर्च व खट्टी वस्तुओं का प्रयोग यथासम्भव नहीं करना चाहिये । जलसंत्रास रोग उत्पन्न होने के पहले यदि प्रतिपेधक चिकित्सा करा ली जावे तो रोगी को निश्चित रूप से बचाया जा सकता है, उस समय उसे गुदा द्वारा पोपण देना चाहिए तथा अवसादक औषधों यथा अहिफेन ( Morphia ) का प्रयोग करें व रोगी को गरम तथा अंधेरे स्थान पर रखें । इस रोग की चिकित्सा के विशेष केन्द्र प्राय ' हर बडे नगर में सरकार के द्वारा खोले गये हैं अतः चिकित्सक को तुरन्त ही ऐसे रोगी को वहाँ चिकित्सा के
लिए भेज देना चाहिए ।
श्वादयोऽभिहिता व्याला येऽत्र दृष्ट्राविषा मया ॥६३ ॥ ।
अत ' करोति दष्टस्तु तेपां चेष्टां रुतं नरः ।
बहुश ' प्रतिकुर्वाणो न चिरान्त्रियते च सः ॥ ६४ ॥
उन्मत्त व्याल से दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - यहाँ पर कुत्ते आदि दंष्ट्रा विपवाले जो हिंसक पशु मैंने कहे हैं उनसे काटा हुआ मनुष्य उनके समान ही चेष्टा तथा शब्द करता है । जो चार बार इनका अनुकरण ( नकल ) करता है वह शीघ्र ही मृत्यु का ग्रास बनता है ॥ ६३-६४ ॥
नखदन्तश्वत व्यालैर्यत्कृतं तद्विमर्दयेत् ।
सिञ्चेत्तैलेन कोप्णेन ते हि वातप्रकोपकाः ॥६५ ॥ ।
इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने मृपिककल्पो नाम सप्तमोऽव्ययः ॥ ७ ॥
से जो चत बना हो
उसको मल देवे तथा उसे गरम सुहाते तेल से मेक करे ।
क्योंकि ये नय तथा ढाँत वायु को प्रकुपित करते हैं ॥ ६५ ॥
विमर्श - चरककार ने नस दन्त क्षत के लक्षण तथा चिकित्सा का उले निम्न प्रकार से किया है कि - चतुष्पा-द्विहिपाहियां नमन्नक्षन तु यर । शूयने पच्यने वापि स्रवति अग्यत्यपि ॥ सोमनको वकर्णश्च गोजिहा हमपद्यपि । रजन्यौ गरिश यो नगदन्नविषापह ॥ ( च. चि. अ. २३३२१८ - २१ ९ ) चौपाये दो पैर वाले प्राणियों के नस और दाँत के शोध, पक जाना और स्राव होता है । तथा ज्वर भी हो मना है । सोमवल्क, अश्वकर्ण, गोजिला, दसपदी, दारूहल्दी, गेरु इन्हें एकत्र मिश्रित कर लेप करने से नख और दाँतों का विप नष्ट हो जाता है | सिंह, बन्दर आदि के । नख एवं दन्त के क्षत में विसर्प हो जाता है । सींग का क्षत भी नख क्षत के समान ही समझना चाहिए । इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने मूपिककल्पो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
pee अष्टमोऽध्यायः अथातः कीटकल्प व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
कीटकल्प का उपक्रम - अब इसके आगे कीटकल्प का व्याख्यान किया जायगा जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १-२ ॥
सर्पाणां शुक्रविण्मूत्रशवपूत्यण्डसंभवाः ।
वाग्न्यम्बु प्रकृतयः कीटास्तु विविधाः स्मृताः ॥ ३ ॥
सर्वदोषप्रकृतिभिर्युक्तास्ते परिणामतः ।
कीटत्वेऽपि सुघोराः स्युः सर्व एव चतुर्विधाः ॥ ४ ॥
कीटों की उत्पत्ति — साँपों के शुक्र, मल, मूत्र, शव के सहने तथा उनसे अण्डों के उत्पन्न होने से पैदा होनेवाले वायु, अग्नि ( पित्त ) तथा कफ की प्रकृतिवाले कीट विविध प्रकार के कहे गये हैं । परिणामतः ये सब कोट सब दोषों की प्रकृति से युक्त होते है । कीट छोटे अथवा तुच्छ होने पर भी अति भयानक होते हैं । ये चार प्रकार के होते है । विमर्शः – सर्पों के ही विष्ठा, मूत्र आदि के सड़ने से चार प्रकार के कीटों की उत्पत्ति मानी गई है, दोप भेद से भी वातोल्वण, पित्तोदवण, श्लेप्मोल्वण तथा सान्निपातिक इन चारों वर्गों में ६७ प्रकार के कीटों की गणना की गई है, जिनमें १८ वातज, २४ पित्तज, तथा १३ श्लेप्मा प्रकोपक हैं शेप १२ सन्निपातज हैं जो दारुण, प्राणघातक तथा सर्पदश के समान ही वेगों को उत्पन्न करने वाले होते है । आजकल तो इन कीटों के नाम तथा रूप का ज्ञान भी प्राय ' नहीं के बरावर ही है । चरककार ने भी कीटों की उत्पत्ति के विषय में निम्नमत प्रतिपादित किया है, यथा-सर्पाणामेव विण्मूत्रात्कीटा. स्युः कीटसम्मता । दूपविपा. प्राणहरा इति सङ्क्षेपतो मताः ॥ ( च. चि. अ २३ / १३ ९ ) अर्थात् साँपों के ही पुरीप, मूत्र आदि से जो कीट उत्पन्न होते है उन्हें ही यहाँ कीट कहा गया है, वे सक्षेपतः दो प्रकार के होते हैं ( १ ) दूषीविप कोट, ( २ ) प्राणहर कीट | आचार्य ढल्हण ने भी व्याख्या करते हुए लिखा है कि- ' सर्पाणा दवकरमण्टलिराजिमता शुक्रादिपञ्चसम्भवा, यथासख्य वान्त्र-ग्न्यम्बुप्रकृतय. कीटा । शवो मृतसर्पशरीर तस्य पूति. शटनम् । श्रीन् कीटान् ढर्वीकरमण्डलिराजिलसम्वन्धेन वाय्यादिप्रकृतिक्रमा-निर्दिश्य चतुर्थं स्वभावेन कर्मणा च निर्द्दिशन्नाद | सुघोराः त्रिदोपाटिको पना, वैकरसर्पना निशुक्रादिसम्भवत्वेनइति ॥ '
कुम्भीनसस्तुण्डिकेरी शृङ्गी शतकुलीरकः ।
उच्च टिङ्गोऽग्निनामा च चिञ्चिटिङ्गो मयूरिका ॥ ५ ॥।