श्रीगणेशाय नमः।
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 101–110
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
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१०० पातञ्जलयोगदर्शन भविष्य और वर्तमान एवं सूक्ष्म, ढकी हुई और दूर - देशमें स्थित वस्तुएँ प्रत्यक्ष हो जाती हैं । ( २ ) श्रावण – इससे दिव्य शब्द सुननेकी शक्ति आ जाती है । ( ३ ) वेदन — इससे दिव्य स्पर्शका अनुभव करनेकी शक्ति आ जाती है । ( ४ ) आदर्श – इससे दिव्य रूपका दर्शन करनेकी शक्ति आ जाती है । ( ५ ) आस्वाद – इससे दिव्य रसका अनुभव करनेकी शक्ति आ जाती है । ( ६ ) वार्ता — इससे दिव्य गन्धका अनुभव करनेकी शक्ति आ जाती है ॥ ३६ ॥
सम्बन्ध - इन सिद्धियोंमें वैराग्य करनेके लिये कहते हैं—-ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥३७ ॥
ते = वे ( उक्त छ: प्रकारकी सिद्धियाँ ); समाधौ = समाधिकी सिद्धिमें ( पुरुषको ज्ञान प्राप्त करनेमें ); उपसर्गा: -विघ्न हैं ( और ); व्युत्थाने = । व्युत्थानमें; सिद्धयः - सिद्धियाँ हैं । व्याख्या— उक्त छः प्रकारकी सिद्धियाँ साधकके सामने आयें तो इनका त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि ये उसके साधनमें विघ्नस्वरूप हैं । हाँ, जिसका चित्त चंचल है, जो साधक नहीं है, जो समाधिकी या आत्मोद्धारकी आवश्यकता नहीं समझता है, ऐसे मनुष्यको किसी कारणसे प्राप्त हो जायँ तो उसके लिये अवश्य ही ये सिद्धियाँ हैं ॥ ३७ ॥
सम्बन्ध— यहाँतक नाना प्रकारके संयमोंसे जो भिन्न - भिन्न ज्ञान होते हैं, उनका वर्णन पुरुषके ज्ञानपर्यन्त किया गया, अब भिन्न - भिन्न संयमोंसे जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी क्रियाशक्तियाँ उपलब्ध होती हैं, उनका वर्णन अगले सूत्रोंमें किया जाता है— बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥ ३८ ॥
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विभूतिपाद –३ १०१ बन्धकारणशैथिल्यात् - बन्धनके कारण ( कर्म ) - की शिथिलतासे; च = और; प्रचारसंवेदनात् = चित्तकी गतिका भलीभाँति ज्ञान होनेसे; चित्तस्य = चित्तका; परशरीरावेश: - दूसरेके शरीरमें प्रवेश ( किया जा सकता है ) । व्याख्या – चित्तके बन्धनका कारण कर्म - संस्कार है; कर्मोंका फल भुगतानेके लिये ही यह चित्त किसी एक शरीरमें बँधे रहनेके लिये बाध्य हो जाता है । उक्त बन्धनके कारणरूप कर्म - संस्कारोंको जब मनुष्य समाधिके अभ्यासद्वारा शिथिल करके चित्तको स्वच्छ बना लेता है और साथ ही जिन - जिन मार्गोंद्वारा चित्त शरीरमें विचरता है ( जाता - आता है ), उन मार्गोंको और चित्तकी गतिको भी भलीभाँति जान लेता है; तब उसमें यह सामर्थ्य आ जाती है कि वह अपने चित्तको शरीरसे बाहर करके दूसरेके ( मृत या जीवित ) किसी भी शरीर में प्रविष्ट कर सकता है । चित्तके साथ - साथ इन्द्रियाँ भी जहाँ चित्त जाता है, वहाँ अपने - आप चली जाती हैं ॥३८ ॥
उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥३ ९ ॥ उदानजयात् = उदान वायुको जीत लेनेसे; जलपङ्ककण्टकादिषु [ = = जल, कीचड़, कण्टकादिसे; असङ्गः - उसके शरीरका संयोग नहीं होता; च = और; उत्क्रान्तिः ऊर्ध्वगति भी होती है । व्याख्या – शरीरके जीवनका आधार प्राण है, क्रियाभेदसे उसके प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान - ये पाँच नाम हैं । उनके लक्षण इस प्रकार हैं— ( १ ) प्राण – यह इन पाँचोंमें प्रधान है, इसकी गति मुख और नासिकाद्वारा होती है । नासिकाके अग्रभागसे लेकर हृदयतक शरीरमें इसका देश है । ( २ ) अपान - यह नीचेकी ओर गमन करनेवाला है, नाभिसे लेकर पादतलतक इसका देश है । मूत्र, विष्ठा और गर्भ आदि इसीके वेगसे नीचे उतरते हैं ।
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१०२ पातञ्जलयोगदर्शन समान - हृदयसे लेकर नाभितक इसका देश है, खान - पानके रसको समस्त शरीरमें यथायोग्य पहुँचा देना इसका काम है, इसकी गति सम है । ( ४ ) व्यान – यह समस्त शरीरमें व्याप्त रहता हुआ ही समस्त नाड़ियोंमें विचरता है । ( ५ ) उदान - यह ऊपरकी ओर गमन करनेवाला है; कण्ठमें रहनेवाला और सिरतक गमन करनेवाला है । मृत्युके समय इसीके सहारे सूक्ष्म शरीरका गमन होता है । यह विषय प्रश्नोपनिषद् ( ३ । ५ से ७ ) -में देखना चाहिये । जब योगी उक्त उदानवायुपर विजय प्राप्त कर लेता है, तब उसका शरीर धुनी हुई रूईकी भाँति अत्यन्त हलका हो जाता है, अतः पानी और कीचड़ पर चलते हुए भी उसके पैर अन्दर नहीं जाते, काँटे आदि भी उसके शरीरमें प्रविष्ट नहीं हो सकते । इसके सिवा मरण - कालमें उसके प्राण ब्रह्मरन्ध्र ( मूर्धाके छिद्र ) द्वारा निकलते हैं; इस कारण ऐसे योगीकी शुक्लमार्ग से गति होती है । उपनिषदोंमें भी उक्त ऊर्ध्वगतिका वर्णन आया
है ( देखिये कठ ०२ । ३ । १६ ) ॥ ३ ९ ॥
समानजयाज्ज्वलनम् ॥ ४० ॥
समानजयात् = ( संयमद्वारा ) समानवायुको जीत लेनेसे; ज्वलनम् = ( योगीका शरीर ) दीप्तिमान् हो जाता है । व्याख्या — जब योगी संयमके द्वारा उपर्युक्त समानवायुको जीत लेता है, तब उसका शरीर अग्निके सदृश प्रज्वलित यानी अत्यन्त देदीप्यमान ( प्रकाशयुक्त ) हो जाता है; क्योंकि जठराग्नि और समानवायुका घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतः समानवायुको जीत लेनेपर योगी अपने शरीरमें रहनेवाले जठराग्निके आवरणको हटाकर अग्निके सदृश प्रकाशमान हो सकता है ॥४० ॥
सम्बन्ध— पहले छत्तीसवें सूत्रमें जो छः सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं, उनमेंसे श्रावण नामकी सिद्धिका साधन बतलाते हैं-
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विभूतिपाद –३ १०३ श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ॥ ४१ ॥
श्रोत्राकाशयोः - श्रोत्र ( कान ) और आकाशके; सम्बन्धसंयमात् = सम्बन्धमें संयम कर लेनेसे ( योगीके ); श्रोत्रम् = श्रोत्र; दिव्यम् = दिव्य हो जाते हैं । व्याख्या - शब्दको ग्रहण करनेवाली श्रोत्र - इन्द्रिय अहंकारसे उत्पन्न हुई है और आकाशकी उत्पत्ति अहंकारजनित शब्दतन्मात्रासे हुई है, अतः आकाश, शब्द है । इस श्रोत्र और आकाशके कर लेता है तब उसकी है । फिर वह सूक्ष्म - से- सूक्ष्म वस्तुसे ढके हुए शब्दको भी दूर- देशमें बोला जाय, उसे विभु अर्थात् सर्वव्यापी है, और श्रोत्र - इन्द्रिय – इन तीनोंकी एकता सम्बन्धको जब योगी संयमद्वारा प्रत्यक्ष श्रोत्र - इन्द्रियमें दिव्य शक्ति आ जाती शब्दको सुन सकता है तथा किसी सुन सकता है और जो शब्द कहीं भी सुन सकता है, क्योंकि आकाश इस कारण उसके अन्दर कहीं भी होनेवाला शब्द तत्काल ही सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । अतः जिसकी श्रोत्र - इन्द्रिय दिव्य यानी अलौकिक हो जाती है, वह चाहे जिस शब्दको, जहाँपर वह हो वहीं सुन सकता है ॥४१ ॥
कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्ते-श्चाकाशगमनम् ॥ ४२ ॥
कायाकाशयोः = शरीर और आकाशके; सम्बन्धसंयमात् - सम्बन्धमें संयम करनेसे; च = और; लघुतूलसमापत्तेः = हलकी वस्तु ( रूई आदि ) -में संयम करनेसे; आकाशगमनम् = आकाशमें चलनेकी शक्ति आ जाती है । व्याख्या - शरीर और आकाशका जो सम्बन्ध है; उसे संयमद्वारा पूर्णतया प्रत्यक्ष कर लेनेपर योगी इस तत्त्वको भलीभाँति समझ लेता है कि शरीरके अंग किस प्रकार सूक्ष्म अवस्थासे स्थूल-अवस्थामें परिणत होते हैं और किस प्रकार पुनः स्थूलसे सूक्ष्म किये जा सकते हैं । अतः वह अपने शरीरको अत्यन्त हलका
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१०४ पातञ्जलयोगदर्शन बनाकर आकाशमें गमन कर सकता है । इसी तरह योगी जब किसी भी सूक्ष्म ( धुनी हुई रूई या बादल आदि ) वस्तुमें संयम करके तद्रूप हो जाता है, तब उससे भी उसको आकाशगमनकी योग्यता मिल जाती है ॥ ४२ ॥
सम्बन्ध — अब ज्ञानके आवरणका नाश जिस उपायसे किया जा सकता है; वह बतलाते हैं-बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥ ४३ ॥
बहिरकल्पिता = शरीरके बाहर अकल्पित; वृत्तिः = स्थितिका नाम; महाविदेहा = महाविदेहा है; ततः उस; प्रकाशावरणक्षयः = - बुद्धिकी ज्ञानशक्तिके आवरणका क्षय हो जाता है । व्याख्या – शरीरके बाहर जो मनकी स्थिति है, उसको विदेह - धारणा कहते हैं, वह जब मनके शरीरमें रहते हुए ही केवल भावनामात्रसे होती है, तब तो कल्पित है और जब शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर बाहर निकले हुए मनकी बाहर स्थिति हो जाती है, तब अकल्पित होती है । कल्पित धारणाके अभ्याससे ही अकल्पित धारणा सिद्ध होती है । इसीको महाविदेहा कहते हैं, इससे योगीके ज्ञानका आवरण नष्ट हो जाता है । यह धारणा इन्द्रिय और मनकी स्वरूपावस्थामें संयम करनेसे
होती है ( योग ० ३ । ४८ ) ॥ ४३ ॥
सम्बन्ध— यहाँतक नाना प्रकारके संयमोंका फलसहित वर्णन किया, अब जो पहले पादके इकतालीसवें सूत्रमें ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीतामें की जानेवाली सबीज-समाधिके लक्षण बतलाये गये थे, उनका फल बतलानेके लिये पहले पाँच भूतोंमें और तज्जनित पदार्थोंमें की जानेवाली ग्राह्यविषयक समाधिका फल बतलाते हैं-स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः ॥४४ ॥
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमात् = ( भूतोंकी ) स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय, अर्थवत्त्व - इन पाँच प्रकारकी अवस्थाओंमें संयम करनेसे ( योगीको ); भूतजयः = पाँचों भूतोंपर विजय प्राप्त हो जाती है ।
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विभूतिपाद –३ १०५ व्याख्या – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - ये पाँच भूत हैं । इनमेंसे हरेककी पाँच अवस्थाएँ होती हैं । जैसे— ( १ ) स्थूलावस्था - जिस रूपमें हम इनको अपनी इन्द्रियोंद्वारा अनुभव कर रहे हैं, जिनको गीतामें इन्द्रियगोचर नाम दिया है । ( १३।५ ), वे इन्द्रियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामवाले पाँचों विषय इनकी स्थूल - अवस्था है । ( २ ) स्वरूपावस्था – इनके जो लक्षण हैं, वह इनकी स्वरूपावस्था है । जैसे पृथ्वीकी मूर्ति, जलका गीलापन, अग्निकी उष्णता और प्रकाश, वायुकी गति और कम्पन, आकाशका अवकाश - यह इनकी स्वरूपावस्था है, क्योंकि इन्हींसे इनके भिन्न - भिन्न सत्ताका अनुभव होता है । ( ३ ) सूक्ष्मावस्था - इनकी जो कारण - अवस्था है, जिनको तन्मात्रा और सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं, वे इनकी सूक्ष्म - अवस्था हैं । जैसे पृथ्वीकी गन्धतन्मात्रा, जलकी रसतन्मात्रा, अग्निकी रूपतन्मात्रा, वायुकी स्पर्शतन्मात्रा और आकाशकी शब्दतन्मात्रा । ( ४ ) अन्वय - अवस्था– पाँचों भूतोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय-अवस्था है । ( ५ ) अर्थवत्त्व - अवस्था - ये पाँचों भूत पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं । यही इनकी अर्थवत्त्व ( प्रयोजनता ) -अवस्था है । इन पाँचों भूतोंको प्रत्येक अवस्थाके क्रमसे सम्पूर्ण अवस्थाओंमें भलीभाँति संयम करके जब योगी इनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब योगीका इन भूतोंपर पूरा अधिकार हो जाता है ॥४४ ॥
सम्बन्ध — इस प्रकार जब योगी भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है, तब क्या होता है? सो बतलाते हैं-ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ॥ ४५ ॥
ततः = उस ( भूतजय ) - से; अणिमादिप्रादुर्भावः = अणिमादि आठ
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१०६ पातञ्जलयोगदर्शन सिद्धियोंका प्रकट हो जाना; कायसम्पत् = कायसम्पत्की प्राप्ति; च = और; तद्धर्मानभिघातः = उन भूतोंके धर्मोंसे बाधा न होना - ( ये तीनों होते हैं ) । व्याख्या – ( क ) ऊपर बतलायी हुई अणिमादि आठ सिद्धियोंके नाम और लक्षण इस प्रकार हैं-( १ ) अणिमा - अणुके समान सूक्ष्म रूप हनुमान्जीने सुरसाके मुखमें एवं लंकामें प्रवेश ( वा ० रामायण, सुन्दर ० १ । १५६, २ । ४७ ) । ( २ ) लघिमा – शरीरको हलका कर देना । कण्टकादिसे बाधा नहीं होती ( योग ० ३ | ३ ९ ) करनेकी शक्ति आ जाती है ( योग ० ३ । ४२ ) । धारण कर लेना, जैसे करते समय किया था इससे जल, पंक और और आकाशमें गमन ( ३ ) महिमा — शरीरको बड़ा कर लेना । जैसे हनुमान्जीने सुरसाके सामने किया था ( वा ० रामायण, सुन्दर ० १ । १५४ ) । ( ४ ) गरिमा – शरीरको भारी कर लेना । जैसे हनुमानजीने भीमसेनके मार्गमें रुकावट डालते समय किया था ( महा ०, वन ० १४६-१४७ वाँ अध्याय ) । ( ५ ) प्राप्ति - जिस किसी इच्छित भौतिक पदार्थको संकल्पमात्रसे ही प्राप्त कर लेना । ( ६ ) प्राकाम्य - बिना रुकावट भौतिक पदार्थ - सम्बन्धी इच्छाकी पूर्ति अनायास हो जाना । ( ७ ) वशित्व – पाँचों भूतोंका और तज्जन्य पदार्थोंका वशमें हो जाना । ( ८ ) ईशित्व- - उन भूत और भौतिक पदार्थोंका नानारूपोंमें उत्पन्न करनेकी और उनपर शासन करनेकी सामर्थ्य । ( ख ) कायसम्पत्का विवरण अगले सूत्रमें आयेगा । ( ग ) भूतोंके धर्मोंसे बाधा न होना – इसका यह भाव है कि भूतोंके धर्म उस योगीके काममें बाधा नहीं डाल सकते । वह पृथ्वीके अंदर भी उसी प्रकार प्रवेश कर सकता है, जैसे हरेक मनुष्य जलमें प्रवेश
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विभूतिपाद —३ १०७ कर सकता है । पृथ्वीका धर्म स्थूलभाव ( कड़ापन ) उसे बाधा नहीं पहुँचा सकता । उसपर यदि पत्थरोंकी वर्षा की जाय तो वे उसके शरीरमें आघात नहीं पहुँचा सकते । इसी तरह जलका गीलापन उसके शरीरको गला नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकता अर्थात् सर्दी - गर्मी, वर्षा आदि कोई भी भूतोंके धर्म उसके शरीरमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं पहुँचा सकते । ये सब सिद्धियाँ योगीको चौवालीसवें सूत्रके कथनानुसार भूतोंकी सब अवस्थाओंपर विजय प्राप्त कर लेनेपर मिलती हैं, यह भाव है ॥ ४५ ॥
सम्बन्ध— उक्त कायसम्पत्की व्याख्या सूत्रकार स्वयं करते हैं— रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् ॥ ४६ ॥
रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि = रूप, लावण्य, बल और वज्रके समान संगठन – ये; कायसम्पत् = शरीरकी सम्पदाएँ हैं । व्याख्या – अत्यन्त सुन्दर आकृति, समस्त अंगोंमें चमक, बलकी बहुलता तथा शरीरके समस्त अंगोंका वज्रकी भाँति दृढ़ और परिपूर्ण हो जाना - ये चारों शरीरसम्बन्धी सम्पदा हैं ॥ ४६ ॥
सम्बन्ध— अब मनसहित इन्द्रियोंमें की जानेवाली ग्रहणविषयक समाधिके फलका वर्णन करते हैं-ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ॥ ४७ ॥
ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमात् = ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व - इन पाँचों अवस्थाओंमें संयम करनेसे; इन्द्रियजयः = मनसहित समस्त इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त हो जाती है । व्याख्या - मनसहित इन्द्रियोंकी पाँच अवस्थाएँ हैं । उनमें क्रमसे संयम करनेसे योगीका इन्द्रियोंपर पूर्ण अधिकार हो जाता है । उनकी अवस्थाओंके पाँच भेद इस प्रकार हैं-( १ ) ग्रहण - विषयोंको ग्रहण करते समय जो वृत्तिके आकारमें मनसहित इन्द्रियोंकी अवस्था है, यह उनकी ग्रहण - अवस्था है ।
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१०८ पातञ्जलयोगदर्शन ( २ ) स्वरूप – मन और इन्द्रियोंका स्वाभाविक स्वरूप, जो कि अपने - अपने स्थानमें विद्यमान रहता है और लक्षण ( संकेत ) - से जाननेमें आता है, यह उनकी स्वरूप - अवस्था है । ( ३ ) अस्मिता – यह मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्मरूप है । इसीसे मनसहित दसों इन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है । यह उनकी सूक्ष्मावस्था है । ( ४ ) अन्वय - मनसहित सब इन्द्रियोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय- अवस्था है । ( ५ ) अर्थवत्त्व — ये मनसहित सब इन्द्रियाँ पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं, यही इनकी अर्थवत्त्व - अवस्था ( सार्थकता ) है । इस प्रकार जब मन और दसों इन्द्रियोंकी पाँचों अवस्थाओंमें योगी क्रमसे संयम करके भलीभाँति उनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब इन सबपर उसका पूरा अधिकार हो जाता है । इन्द्रियाँ और मन – ये सभी अहंकारसे उत्पन्न हैं तथा मन और इन्द्रियोंके मेलसे पुरुष विषयोंको ग्रहण करता है या अकेले मनके द्वारा करता है । अतः यहाँ इन्द्रियजयसे मनसहित सब इन्द्रियोंपर विजय समझनी चाहिये तथा मनमें की जानेवाली और अस्मितामें की जानेवाली समाधिको भी ग्रहणमें की जानेवाली समाधिके अन्तर्गत समझना चाहिये ॥ ४७ ॥
सम्बन्ध - उक्त इन्द्रियजयका फल बतलाते हैं-ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥ ४८ ॥
ततः = उस ( इन्द्रियजय ) - से; मनोजवित्वम् = मनके सदृश गति; विकरणभावः = शरीरके बिना भी विषयोंका अनुभव करनेकी शक्ति; च = और; प्रधानजयः = प्रकृतिपर अधिकार – ये तीनों सिद्धियाँ मिलती हैं । व्याख्या - इन तीनों सिद्धियोंका अलग - अलग स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये— ( १ ) मनोजवित्व - स्थूल शरीर और इन्द्रियोंके सहित मनकी
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विभूतिपाद – ३ १० ९ तरह एक क्षणमें कहीं से कहीं दूर- देशमें जानेकी शक्तिको मनोजवित्व अर्थात् मनके सदृश गतिकी शक्ति कहते हैं । यह ग्रहण --अवस्थामें संयमका फल है । ( २ ) विकरणभाव — स्थूल शरीरके बिना ही दूर - देशमें स्थित वस्तुओंको प्रत्यक्ष कर लेनेकी शक्तिको विकरणभाव कहते हैं । जब योगीकी महाविदेहा धारणा ( योग ० ३ । ४३ ) सिद्ध हो जाती है, उस समय भी मन और इन्द्रियोंमें यही शक्ति काम करती है, उसीसे मनुष्य दूर- देशमें स्थित पर - शरीरको प्रत्यक्ष करके उसमें प्रविष्ट होता है ( योग ० ३ । ३८ ); यह स्वरूपावस्थामें संयमका फल है । ( ३ ) प्रधानजय — कार्य और कारणरूपमें स्थिर प्रकृतिके सम्पूर्ण भेदोंपर पूरा अधिकार हो जाना ' प्रधानजय ' है; यह अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व - अवस्थामें संयमका फल है । यह संयम ही प्रकृतिलय कहलाता है । ये तीनों प्रकारकी सिद्धियाँ ग्रहणविषयक समाधि सिद्ध हो जानेपर अपने - आप मिल जाती हैं ॥ ४८ ॥
सम्बन्ध — अब ग्रहीतामें होनेवाली ग्रहीतृविषयक समाधिका फलसहित वर्णन करते हैं-सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥ ४ ९ ॥ सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य = बुद्धि और पुरुष – इन दोनोंकी भिन्नतामात्रका ही जिसमें ज्ञान रहता है, ऐसी सबीज - समाधिको प्राप्त योगीका; सर्वभावाधिष्ठातृत्वम् = सब भावोंपर स्वामिभाव; च = और; सर्वज्ञातृत्वम् = सर्वज्ञ भाव हो जाता है । व्याख्या — ग्रहीतृविषयक समाधिसे जब बुद्धिके रजोगुण और तमोगुणसम्बन्धी संस्कार सर्वथा धुलकर उसमें शुद्ध सत्त्वगुणके ही संस्कार रह जाते हैं, उस समय केवलमात्र पुरुष और प्रकृतिकी भिन्नताका अनुभव करनेवाली वृत्ति रहती है, इसीको