श्रीगणेशाय नमः।
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 91–100
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100
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९ ० पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या — धर्म - परिणाम, लक्षण - परिणाम और अवस्था - परिणाम -इस प्रकार जिन तीन परिणामोंका पहले वर्णन किया गया है, उन तीनों परिणामोंमें संयम अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि कर लेनेसे योगीको उनका साक्षात्कार होकर भूत और भविष्यका ज्ञान हो जाता है । अभिप्राय यह है कि जिस वर्तमान वस्तुके विषयमें योगी यह जानना चाहे कि इसका मूल कारण क्या है और यह किस ढंगसे बदलती हुई कितने कालमें वर्तमान रूपमें आयी है और भविष्यमें किस प्रकार बदलती हुई कितने कालमें किस प्रकार अपने कारणमें विलीन होगी? तो ये सब बातें उक्त तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे जान सकता है ॥१६ ॥
सम्बन्ध - इसी प्रकार अब दूसरी विभूतियोंका वर्णन करते हैं-शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभाग-संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ १७ ॥
शब्दार्थप्रत्ययानाम् = शब्द, अर्थ और ज्ञान - इन तीनोंका; इतरेतरा -ध्यासात् = जो एकमें दूसरेका अध्यास हो जानेके कारण; संकरः = मिश्रण हो रहा है; तत्प्रविभागसंयमात् = उसके विभागमें संयम करनेसे; सर्वभूतरुत-ज्ञानम् = सम्पूर्ण प्राणियोंकी वाणीका ज्ञान ( हो जाता है ) । व्याख्या– वस्तुके नाम, रूप और ज्ञान - यह तीनों यद्यपि परस्पर भिन्न हैं, जैसे ' घट ' यह शब्द मिट्टीसे बने हुए जिस पदार्थका संकेत करता है, उस पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है । इसी प्रकार उस घटरूप पदार्थकी जो प्रतीति होती है, वह चित्तकी वृत्तिविशेष है । अतः वह भी घटरूप पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है क्योंकि शब्द वाणीका धर्म है, घटरूप पदार्थ मिट्टीका धर्म है और वृत्ति चित्तका धर्म है तथापि तीनोंका परस्पर अभ्यासके कारण मिश्रण हुआ रहता है । अतः जब योगी विचारद्वारा इनके विभागको समझकर उस विभागमें संयम कर लेता है, तब उसको समस्त प्राणियोंकी वाणीके अर्थका ज्ञान हो जाता है * ॥१७ ॥
* सूत्रकारने जिस संयमका जो फल बतलाया है, उसका अनुवादमात्र मैंने कर दिया है । उस संयमका वह फल कैसे होता है और क्यों होता है - यह मेरी
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विभूतिपाद – ३ ९ १ संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥ १८ ॥
संस्कारसाक्षात्करणात् = ( संयमद्वारा ) संस्कारोंका साक्षात् कर लेनेसे; पूर्वजातिज्ञानम् = पूर्वजन्मका ज्ञान ( हो जाता है ) । व्याख्या - प्राणी जो कुछ कर्म करता है एवं अपने इन्द्रियों और मन - बुद्धिद्वारा जो कुछ अनुभव करता है, वे सब उसके अन्तःकरणमें संस्काररूपमें संचित रहते हैं । उक्त संस्कार दो प्रकारके होते हैं - एक वासनारूप, जो कि स्मृतिके कारण हैं, दूसरे धर्माधर्मरूप जो कि जाति, आयु और भोगके कारण हैं- ये दोनों ही प्रकारके संस्कार अनेक जन्म - जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं ( योग ० २ । १२, ४।८ से ११ ) । उन संस्कारोंमें संयम करके उनको प्रत्यक्ष कर लेनेसे योगीको पूर्वजन्मका ज्ञान हो जाता है । जैसे अपने पूर्व संस्कारोंके साक्षात्कारसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है, उसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंमें संयम करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी ज्ञान हो सकता है ॥ १८ ॥
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥ १ ९ ॥ प्रत्ययस्य = = दूसरेके चित्तका ( संयमद्वारा साक्षात्कार कर लेनेसे ); परचित्तज्ञानम् - दूसरेके चित्तका ज्ञान ( हो जाता है ) । व्याख्या – - श्रीविज्ञानभिक्षुका अर्थ है कि संयमद्वारा अपने चित्तकी वृत्तिका साक्षात्कार कर लेनेसे योगी संकल्पमात्र से ही दूसरेके चित्तको जान लेता है कि यह कुछ चिन्तन करनेमें लग रहा है या नहीं, इस समय यह प्रक्षिप्त है या मूढ़ है या प्रशान्त है इत्यादि । किंतु दूसरे टीकाकारोंने यह अर्थ स्वीकार नहीं किया है । इस ग्रन्थमें प्रायः चित्तकी वृत्तिविशेषको या ज्ञानको ही प्रत्यय नामसे समझके बाहरकी बात है; क्योंकि मैं योगी नहीं हूँ और मैंने कभी किसी संयमको सिद्ध करके उसका फल प्राप्त भी नहीं किया है । इस परिस्थितिमें उसके विषयमें कुछ भी लिखना मेरी समझमें उचित नहीं है ।
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९ २ पातञ्जलयोगदर्शन कहा गया है । किंतु यहाँ दूसरे टीकाकारोंने प्रत्ययका अर्थ चित्तवृत्ति न लेकर चित्त लिया है; क्योंकि इस सूत्रमें उसके साक्षात्कारका फल चित्तका ज्ञान कहा है और अगले सूत्रमें वृत्तिसहित ज्ञानका निषेध किया है तथा इस सूत्रमें यह स्पष्ट नहीं है कि किसके चित्तसाक्षात्कारका यह फल बतलाया गया है । किंतु फलमें ' पर ' शब्दका प्रयोग देखकर साक्षात्कार भी दूसरेके ही चित्तका माना है । वास्तवमें क्या बात है, ठीक समझमें नहीं आती ॥ १ ९ ॥ सम्बन्ध - उसीको स्पष्ट करते हैं-न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥ २० ॥
च = किंतु; तत् = वह ज्ञान; सालम्बनम् = आलम्बनसहित; न = नहीं होता; तस्य अविषयीभूतत्वात् = क्योंकि ( वैसा चित्त ) योगीके चित्तका विषय नहीं है । व्याख्या – चित्तके साक्षात्कारसे योगीको जो दूसरेके चित्तका ज्ञान होता है, वह केवल चित्तके स्वरूपमात्रका ही होता है, उस चित्तके सालम्बनका यानी उसका चित्त जिस वस्तुका चिन्तन कर रहा है, उसका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि योगीके चित्तका विषय दूसरेका चित्त है, उसका आलम्बन नहीं ॥ २० ॥
सम्बन्ध - अब दूसरी सिद्धिका वर्णन करते हैं— कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशा-सम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥ २१ ॥
कायरूपसंयमात् = शरीरके रूपमें संयम कर लेनेसे; तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे = = जब उसकी ग्राह्यशक्ति रोक ली जाती है, तब; चक्षुःप्रकाशासम्प्रयोगे = चक्षुके प्रकाशका उसके साथ सम्बन्ध न होनेके कारण; अन्तर्धानम् = योगी अन्तर्धान हो जाता है । व्याख्या - जब योगी अपने शरीरके रूपमें संयम कर लेता है; तब वह दूसरेके देखनेमें आनेवाली शरीरकी दृश्यताशक्तिका संकल्पमात्रसे
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विभूतिपाद – ३ ९ ३ अवरोध कर सकता है; उसका अवरोध कर लेनेपर दूसरोंके नेत्रोंकी प्रकाशनशक्तिसे उसका सम्बन्ध नहीं होता, इस कारण उसे कोई नहीं देख सकता । इसका नाम अन्तर्धान है । इसी तरह यदि योगी शब्दमें संयम कर लेता है तो उसके शब्दको कोई नहीं सुन सकता । यदि शरीरके स्पर्शमें संयम कर लेता है, तो उसे कोई छू नहीं सकता – इत्यादि सिद्धियाँ भी उपलक्षणसे समझ लेनी चाहिये ॥ २१ ॥
सम्बन्ध - अन्य सिद्धिका वर्णन करते हैं— सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञान-मरिष्टेभ्यो वा ॥ २२ ॥
सोपक्रमम् = उपक्रमसहित; च = और; निरुपक्रमम् = उपक्रमरहित— ऐसे दो प्रकारके; कर्म - कर्म होते हैं; तत्संयमात् = उनका संयम कर लेनेसे ( योगीको ); अपरान्तज्ञानम् - मृत्युका ज्ञान हो जाता है; वा = अथवा; अरिष्टेभ्यः = अरिष्टोंसे भी ( मृत्युका ज्ञान हो जाता है ) । व्याख्या- - जिन कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्यकी आयुका निर्माण होता है, वे दो प्रकारके होते हैं - ( १ ) सोपक्रम - जिनके फलका आरम्भ हो चुका है, जो कि अपना फल देनेमें लगे हुए हैं । ( २ ) निरुपक्रम - जिसके फलभोगका आरम्भ नहीं हुआ है । इन दोनों प्रकारके कर्मोंमें संयम करके जब मनुष्य इनको इस तरह प्रत्यक्ष कर लेता है कि कौन - कौन - से कर्म कितने अंशमें अपना फल दे चुके हैं और कौन - से कर्मोंका कितना फल- भोग बाकी है और इनकी गतिके हिसाब से कितने कालमें दोनों प्रकारके समस्त कर्मोंकी समाप्ति हो जायगी, तब उसे अपनी मृत्युका अर्थात शरीरनाशके समयका पूरा - पूरा ज्ञान हो जाता है । इसके सिवा, अरिष्टोंसे अर्थात् बुरे चिह्नोंसे भी मृत्युका ज्ञान हो जाता है, परंतु यह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है, अनुमान - ज्ञान है ॥२२ ॥
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९ ४ पातञ्जलयोगदर्शन मैत्र्यादिषु बलानि ॥ २३ ॥
मैत्री आदिषु = मैत्री आदि भावनाओंमें ( संयम करनेसे ) ( मैत्री आदि विषयक ); बलानि = बल मिलते हैं । व्याख्या — पहले ( योग ० १ । ३३ से ) मैत्री, करुणा और मुदिता -इन तीन प्रकारकी भावनाओंका वर्णन है । चौथी जो उपेक्षा है, वह भावना नहीं है, भावनाका त्याग है । उनमेंसे पहली जो सुखी मनुष्यों में मित्रताकी भावना है, उसमें संयम करनेसे योगीको मित्रताकी सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है अर्थात् वह सबका मित्र बनकर उनको सुख पहुँचानेमें समर्थ हो जाता है । दूसरी जो दु: खी मनुष्योंमें करुणाकी भावना है, उसमें संयम करनेसे योगीको करुणाबल प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसका स्वभाव परम दयालु हो जाता है और उसमें हरेक प्राणीके दुःखोंको दूर करनेकी सामर्थ्य आ जाती है । तीसरी जो पुण्यात्मा मनुष्योंमें मुदिताकी भावना है, उसमें संयम करनेसे मुदिताका बल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ईर्ष्याके दोषसे सर्वथा शून्य हो जाता है और सदैव प्रसन्न रहता है । कोई भी परिस्थिति उसके मनमें किंचिन्मात्र भी चिन्ता, शोक या भयकी वृत्ति उत्पन्न नहीं कर सकती तथा वह दूसरोंको भी अपनी ही भाँति प्रसन्न बनानेमें समर्थ हो जाता है ॥ २३ ॥
बलेषु हस्तिबलादीनि ॥ २४ ॥
बलेषु = ( भिन्न - भिन्न ) बलोंमें ( संयम करनेसे ); हस्तिबलादीनि = हाथी आदिके बलके सदृश ( संयमके अनुसार भिन्न - भिन्न प्रकारके ) बल प्राप्त होते हैं । व्याख्या - यदि वह हाथीके बलमें संयम करता है तो उसे हाथीके समान बल मिल जाता है । यदि गरुड़के बलमें संयम करता है तो गरुड़के समान बल मिल जाता है । यदि वायुके बलमें संयम करता है तो वायुके समान बल मिलता है । इसी तरह जिसके बलमें संयम करता है, वैसा ही बल उसे प्राप्त हो जाता है ॥ २४ ॥
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विभूतिपाद –३ ९ ५ प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥ २५ ॥
प्रवृत्त्यालोकन्यासात् = ज्योतिष्मती प्रवृत्तिका प्रकाश डालनेसे; सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् - सूक्ष्म व्यवधानयुक्त और दूर- देशमें स्थित वस्तुओंका ज्ञान ( हो जाता है ) । व्याख्या - तीन प्रकारकी वस्तुओंका प्रत्यक्ष साधारणतया इन्द्रियोंसे नहीं हो सकता । एक तो जो वस्तु अत्यन्त सूक्ष्म होती है, जैसे परमाणु, महत्तत्त्व प्रकृति आदि; दूसरी व्यवहित अर्थात् जो किसी परदेमें छिपी हो, जैसे समुद्रमें रत्न, खानमें सुवर्ण, मणि आदि; तीसरी विप्रकृष्ट अर्थात जो दूर- देशमें वर्तमान हो, जैसे हम आसाममें बैठे हैं और वस्तु मारवाड़ में पड़ी है अथवा यों समझिये हि हम हिन्दुस्तानमें हैं और वस्तु अमेरिकामें पड़ी है । इनमें किसी भी वस्तुको जाननेके लिये जब योगी पहले पादके छत्तीसवें और सैंतालीसवें सूत्रमें तथा इस पादके पाँचवें सूत्रमें वर्णित ज्योतिष्मती अर्थात् प्रकाशवती प्रवृत्तिके प्रकाशको उसपर छोड़ता है, तब उसी समय वह योगीके प्रत्यक्ष हो जाती है ॥ २५ ॥
भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥ २६ ॥
सूर्ये = सूर्यमें; संयमात् = संयम करनेसे; भुवनज्ञानम् - समस्त लोकोंका ज्ञान हो जाता है । व्याख्या – पुराणोंमें चौदहों भुवनोंका वर्णन आता है, उनमेंसे एक भूलोक है, उन चौदहों भुवनोंका ज्ञान सूर्यमें संयम करनेसे हो जाता है । व्यासभाष्यमें इन लोकोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, परंतु आध्यात्मिक साधनके लिये उपयोगी न समझकर मैंने यहाँ उनका वर्णन नहीं किया है । इनके सिवा यह बात भी है कि इनके विषयका वर्णन ठीक - ठीक समझमें भी नहीं आता ॥ २६ ॥
चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥ २७ ॥
चन्द्रे = चन्द्रमामें ( संयम करनेसे ); ताराव्यूहज्ञानम् = सब तारोंके व्यूह ( स्थिति - विशेष ) - का ज्ञान हो जाता है ।
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९ ६ पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या - चन्द्रमामें संयम करनेसे कौन तारा किस स्थानमें टिका है, इसका यथावत् ज्ञान हो जाता है ॥ २७ ॥
सम्बन्ध — उसके बाद-ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥ २८ ॥
ध्रुवे = ध्रुवतारोंमें ( संयम करनेसे ); तद्गतिज्ञानम् = उन ताराओंकी गतिका ज्ञान हो जाता है । व्याख्या - ध्रुवतारा निश्चल है और सब ताराओंकी गतिका उससे सम्बन्ध है, अतः उसमें संयम करनेसे समस्त ताराओंकी गतिका अर्थात कौन तारा कितने समयमें किस राशि और नक्षत्रपर जायगा – इसका पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है ॥ २८ ॥
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥ २ ९ ॥ नाभिचक्रे = नाभिचक्रमें ( संयम करनेसे ); कायव्यूहज्ञानम् = शरीरके व्यूह ( उसकी स्थिति ) - का पूरा - पूरा ज्ञान हो जाता है । व्याख्या – नाभिमें स्थित जो चक्र है, जिसमें शरीरकी समस्त नाड़ियाँ गुथी हुई हैं, उसमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका ज्ञान हो जाता है अर्थात् शरीरका संगठन किस प्रकार हुआ है, उसमें कौन - सी धातु किस प्रकार कहाँ स्थित है, इन सबका और समस्त नाड़ियोंका योगीको पूरा - पूरा ज्ञान हो जाता है ॥२ ९ ॥ कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥ ३० ॥
कण्ठकूपे = कण्ठकूपमें ( संयम करनेसे ); क्षुत्पिपासानिवृत्तिः = भूख और प्यासकी निवृत्ति हो जाती है । व्याख्या - जिह्वाके नीचे एक तन्तु है ( जिसे जिह्वामूल भी कहते हैं ), उसके नीचे कण्ठ है, उसके नीचे कूप ( गड्ढा ) है । उस कण्ठकूपमें संयम करनेसे भूख - प्यासकी बाधा मिट जाती है । इसमें यह कारण बतलाया जाता है कि उस कण्ठकूप से प्राणवायु टकराती
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विभूतिपाद – ३ ९ ७ है, उसीसे भूख - प्यासकी बाधा होती है, उसमें संयम करनेके बाद वह नहीं होते ॥ ३० ॥
कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥ ३१ ॥
कूर्मनाड्याम् = कूर्माकार ( नाड़ीमें संयम करनेसे ); स्थैर्यम् = स्थिरता होती है । व्याख्या— उक्त कूपके नीचे वक्षःस्थलमें एक कछुए के आकारवाली नाड़ी है, उसमें संयम करनेसे स्थिर स्थितिकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात चित्त और शरीर - दोनों स्थिर हो जाते हैं ॥३१ ॥
मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥ ३२ ॥
मूर्धज्योतिषि = मूर्धाकी ज्योतिमें ( संयम करनेसे ); सिद्धदर्शनम् - सिद्ध पुरुषोंके दर्शन होते हैं । व्याख्या– सिरके कपोलमें एक छिद्र है ( इसीको ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं ), वहाँ जो प्रकाशमयी ज्योति है, उसमें संयम करनेवालेको पृथ्वी और स्वर्गलोकके बीच में विचरनेवाले सिद्धोंके दर्शन होते हैं ॥ ३२ ॥
प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥ ३३ ॥
वा = अथवा; प्रातिभात् = प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होनेसे ( बिना किसी संयमके ही ); सर्वम् = ( योगीको पहले कही हुई ) सारी बातोंका ज्ञान हो जाता है । व्याख्या - जिसका वर्णन इसी पादके ३६ वें सूत्रमें है, उसका नाम प्रातिभ ज्ञान है, यह विवेकजनित ज्ञानका पूर्वरूप है । अतः जिस प्रकार सूर्यकी प्रभासे जो कि सूर्योदयसे कुछ पहले प्रकट होता है, मनुष्य सब वस्तुओंको देख सकता है, उसी प्रकार प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होनेसे योगी सब कुछ जान जाता है ॥ ३३ ॥
हृदये चित्तसंवित् ॥ ३४ ॥
हृदये = हृदयमें ( संयम करनेसे ); चित्तसंवित् = चित्तके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है ।
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९ ८ पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या — इस ब्रह्मपुर नामक हृदयदेशमें गर्त ( गड्ढे ) - के आकारवाला कमल है, वह चित्तका स्थान है, उसमें संयम करनेसे वृत्तियों सहित चित्तका ज्ञान हो जाता है ॥ ३४ ॥
सम्बन्ध— चित्तके स्वरूपका ज्ञान होनेसे विवेक होते ही पुरुषके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है । अतः अगले सूत्रमें कहते हैं-सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् ॥ ३५ ॥
सत्त्वपुरुषयोः अत्यन्तासंकीर्णयोः = सत्त्व ( बुद्धि ) और पुरुष जो कि दोनों परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं ( किसी प्रकार भी सम्मिलित होनेवाले नहीं हैं ) – इन दोनोंकी; प्रत्ययाविशेषः = जो प्रतीतिका अभेद है, वही; भोगः = भोग है, ( उसमेंसे ); परार्थात् स्वार्थसंयमात् = परार्थ - प्रतीतिसे भिन्न जो स्वार्थ - प्रतीति है, उसमें संयम करनेसे; पुरुषज्ञानम् = पुरुषका ज्ञान ( होता है ) । व्याख्या - बुद्धि और पुरुष - दोनों सर्वथा भिन्न हैं, उनका कोई मेल नहीं है, क्योंकि बुद्धि परिणामशील, जड, भोग्य और चंचल है एवं पुरुष अपरिणामी, चेतन, भोक्ता और असंग है । तथापि अविद्याके कारण उनकी एकता- सी हो रही है, इसीका नाम अस्मिता है ( योग ० २ । ६ ) । इस एकताके कारण दोनोंका अलग - अलग ज्ञान नहीं होता, एक साथ मिला हुआ ज्ञान होता है, उस दशामें इस - बुद्धिमें ( जो कि पुरुषकी चेतनासे चेतन - सी हो रही है ) जो सुख - दुःख और मोहरूप नाना प्रकारकी वृत्तियोंका उदय होता है, वह वृत्ति अविशेष ( अभिन्न - मिश्रित ) है, क्योंकि इससे चित्तके धर्म सुख - दुःख और मोह आदि चित्तमें प्रतिबिम्बित चैतन्य पुरुषमें अध्यारोपित होते हैं । यह अभेद - प्रतीति ही भोग है । यह अभेदरूप वृत्ति यद्यपि चित्तका धर्म है, परंतु पुरुषके लिये है, इस कारण परार्थ है और इसी दशामें जो इस भोगरूप वृत्तियोंसे भिन्न द्रष्टापुरुषके स्वरूपविषयक वृत्ति होती है, वह पौरुषेय वृत्ति स्वार्थ
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विभूतिपाद –३ ९९ है, क्योंकि उसका विषय पुरुष है और वह है भी उसके लिये, अतः वह परार्थ नहीं है । इस स्वार्थवृत्तिमें संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है? यद्यपि ज्ञान बुद्धिका धर्म है, अतः उस बुद्धिके धर्मरूप ज्ञानसे पुरुष नहीं जाना जाता है, किन्तु बुद्धिमें जो पुरुषका चेतनरूप प्रतिबिम्बित है, उसको दर्पणमें अपना मुख देखनेकी भाँति पुरुष देखता है । इस प्रकार उक्त संयमसे योगीको पुरुषका ज्ञान होता है । * यही प्रथम पादके इकतालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई ग्रहीतृविषयक समाधि है । इस समाधिका ध्येय ' पुरुष ' अस्मितासे सम्बन्धित होनेके कारण पहले पादके सत्रहवें सूत्रमें इसको अस्मितानुगत समाधिके नामसे भी कहा है, ऐसा अनुमान किया जाता है, क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्वापरका प्रसंग ठीक बैठ जाता है तथा ग्रहीतृविषयक समाधिका निर्विचारमें अन्तर्भाव मानना भी सुसंगत हो जाता है ॥ ३५ ॥
सम्बन्ध — उक्त संयमसे पुरुषका ज्ञान होनेके पूर्व जो सिद्धियाँ योगीके सामने आती हैं, उनका वर्णन करते हैं— ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥ ३६ ॥
ततः = उस ( स्वार्थ - संयम ) - से; प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता: = प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता - ये ( छः सिद्धियाँ ); जायन्ते = प्रकट होती हैं । व्याख्या – ये छहों सिद्धियाँ हुए साधकको पुरुषज्ञानके पहले प्रकार हैं-( १ ) प्रातिभ — इसका वर्णन * यह विषय मैंने भाष्य और दूसरे यह तर्कसे समझमें आनेवाला विषय नहीं है विचार करना चाहिये । ग्रहीतृविषयक समाधिके साधनमें लगे प्राप्त होती हैं । इनके लक्षण इस तैंतीसवें सूत्रमें आया है । इससे भूत, दूसरे टीकाकारोंका भाव लेकर लिखा है, परंतु । अतः अनुभवी सज्जनोंको इसपर गम्भीरतापूर्वक