श्रीगणेशाय नमः।

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 111–120

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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११० पातञ्जलयोगदर्शन विवेकज्ञान भी कहते हैं ( योग ० ३ । ५४, ४ । २५ ) । इसीको पहले स्वार्थमें संयम करनेसे होनेवाले पुरुषज्ञानके नामसे कहा है ( योग ० ३ । ३५ ) । ग्रहीतृविषयक समाधिके द्वारा जब यह स्थिति प्राप्त हो जाती है, उस समय योगीको समस्त भावोंपर स्वामिभाव प्राप्त हो जाता है, अर्थात् सम्पूर्ण गुण – जो कि कार्यका आरम्भ करनेमें लगे हुए हैं और जो अनारम्भ - अवस्थामें हैं वे सब दासकी भाँति आज्ञापालन करनेके लिये सर्वभावसे उपस्थित हो जाते हैं तथा उसे भूत, वर्तमान और भविष्य - अवस्थाओंमें स्थित समस्त गुणोंका एक साथ भलीभाँति ज्ञान हो जाता है । इसीसे वह योगी सर्वज्ञ कहलाता है, इसके बादकी अवस्था धर्ममेघसमाधि

है ( योग ० ४ । २ ९ ) ॥ ४ ९ ॥

सम्बन्ध— पहले पादके सैंतालीसवें सूत्रमें कही हुई ऊँची - से - ऊँची सबीज -समाधिको और अड़तालीसवें सूत्रमें कही हुई ऋतम्भरा प्रज्ञाको भी निर्बीज - समाधिका बहिरंग साधन बतलाया है; अतः उपर्युक्त सिद्धिसे भी विरक्त होनेपर निर्बीज - समाधिरूप कैवल्यकी प्राप्ति बतलाते हैं-तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५० ॥

तद्वैराग्यात् अपि = उस ( उपर्युक्त सिद्धि ) - में भी वैराग्य होनेसे; दोषबीजक्षये = दोषके बीजका नाश हो जानेपर; कैवल्यम् - कैवल्यकी प्राप्ति होती है । व्याख्या - — ग्रहीतृविषयक समाधिमें जब यह ज्ञान हो जाता है कि बुद्धि और पुरुष – दोनों अत्यन्त भिन्न हैं, इनका संयोग अविद्याकृत है वास्तविक नहीं है, उस समय उसके सामने पूर्व सूत्रमें बतायी हुई सिद्धियोंका प्रादुर्भाव होता है । उनमें न अटककर जो योगी पुरुषको सर्वथा असंग, निर्विकार, कूटस्थ, आनन्दमय और चेतन तथा समस्त गुणों और उनके कार्योंको जड, दुःखप्रद और प्रतिक्षण बदलनेवाले समझकर सम्पूर्ण गुणोंसे और उनके कार्योंसे अत्यन्त विरक्त हो जाता है ( योग ० १ । १६ ), उक्त परवैराग्यसे

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विभूतिपाद – ३ १११ जब दोषोंके बीजरूप अन्तिम वृत्तिका भी सर्वथा निरोध हो जाता है, तब निर्बीजसमाधि हो जाती है । इस अवस्थामें अपनी वृत्तियोंके संस्कारोंसहित चित्त अपने कारणमें विलीन हो जाता है और पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है ( योग ० ४ । ३४ ) । यह पुरुषका गुणोंके साथ आत्यन्तिक वियोग है; इसीको कैवल्य कहते हैं ॥५० ॥

सम्बन्ध — जब साधक कुछ उन्नत अवस्थामें जाने लगता है, तब उसके जीवन म नाना प्रकारके विघ्न आया करते हैं, अतः उनसे बचनेके लिये सावधान करते हैं— स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ॥ ५१ ॥

स्थान्युपनिमन्त्रणे = लोकपाल देवताओंके बुलानेपर; सङ्गस्मयाकरणम्- । न तो ( उनके भोगोंमें ) संग ( राग ) करना चाहिये और न अभिमान करना चाहिये; पुनरनिष्टप्रसङ्गात् = क्योंकि ऐसा करनेसे पुनः अनिष्ट होना सम्भव है । व्याख्या– जब योगीकी अच्छी स्थिति हो जाती है, उस समय बड़े - बड़े लोकपाल अधिकारी देवता और सिद्धोंके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं, उस समय देवतालोग उसे अपने लोकोंमें भोगोंका सुख दिखाकर नाना प्रकारसे उन भोगोंकी बड़ाई करके अपने पास बुलाया करते हैं । उस समय साधकको खूब सावधान रहना चाहिये, उनके प्रलोभनमें नहीं पड़ना चाहिये । अपने मनमें बार - बार यह भाव लाना चाहिये कि जन्म - जन्मान्तरमें कर्मोंका भोग करते - करते इस मनुष्य - शरीरमें बड़े सौभाग्यसे महापुरुषोंकी और ईश्वरकी परम दयासे यह स्थिति प्राप्त हुई है, इसके सामने ये नाना प्रकारके क्षणभंगुर भोग अत्यन्त तुच्छ हैं । इनके प्रलोभनमें पड़कर मैं अपने-आपको कैसे संसार - समुद्रमें डुबा सकता हूँ! मैंने तो इन सबका तत्त्व भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लिया है; इनमें सुखकी गन्ध भी नहीं है । इस प्रकारकी भावना करके उनसे विरक्त हो जाना चाहिये, उनमें जरा - सा भी अपने चित्तका रागयुक्त सम्बन्ध यानी आसक्ति

पृष्ठ 113

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११२ पातञ्जलयोगदर्शन नहीं होने देनी चाहिये तथा इस बातका अभिमान भी अपने मनमें नहीं आने देना चाहिये कि मैं कैसी उच्च स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ, जिसके कारण बड़े - बड़े देवतालोग भी मेरा सत्कार करते हैं और मुझे अपने लोकोंमें बुलाते हैं; क्योंकि संग और अभिमान करनेसे साधकके पुनः संसारचक्रमें फँसनेका प्रसंग ( मौका ) आ जाता है । अतः साधकको हर समय हरेक प्रकारके विघ्नसे खूब सावधान रहना चाहिये; यह भाव है ॥ ५१ ॥

सम्बन्ध — विवेकज्ञानकी उत्पत्तिका दूसरा उपाय बतलाते हैं— क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥ ५२ ॥

क्षणतत्क्रमयोः = क्षण और उसके क्रममें; संयमात् = संयम करनेसे; विवेकजम् = विवेकजनित; ज्ञानम् - ज्ञान उत्पन्न होता है । व्याख्या - कालका जो छोटे - से - छोटा हिस्सा है, जिससे छोटा विभाग ही नहीं सकता, उसे ' क्षण ' कहते हैं; उसका जो एक क्षणके बाद दूसरे क्षणके प्रकट होनेका लगातार सिलसिला है, उसका नाम क्रम है । भाव यह है कि दो क्षण एक साथ नहीं रह सकते और दोनोंके बीचमें किसी औरका व्यवधान भी नहीं है, एकके पीछे दूसरे क्षणका सिलसिला चालू रहता है, इसीको ' क्रम ' कहते हैं । अतः क्षण और उसके क्रममें संयम कर लेनेसे विवेकजन्य ज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥५२ ॥

सम्बन्ध - उस विवेकज्ञानका लक्षण कहते हैं-जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ ५३ ॥

जातिलक्षणदेशैः = ( जिन वस्तुओंका ) जाति, लक्षण और देशभेदसे; अन्यतानवच्छेदात् - भेद नहीं किया जा सकता, इस कारण; तुल्ययोः = जो दो वस्तुएँ तुल्य ( एकके सदृश ) प्रतीत होती हैं, उनके भेदकी; प्रतिपत्तिः = उपलब्धि; ततः = उस ( विवेकज्ञान ) - से होती है । व्याख्या - वस्तुओंका विवेचन करके उनका भेद समझानेके तीन

पृष्ठ 114

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विभूतिपाद —३ ११३ कारण हैं - ( १ ) वस्तुकी जाति, ( २ ) वस्तुका लक्षण अर्थात् वर्ण, आकृति आदि, ( ३ ) उसका देश अर्थात् स्थान - इन तीनोंके भेदसे वस्तुओंकी भिन्नताका विवेचन होता है, परंतु जिन दो वस्तुओंमें इनसे भेदकी उपलब्धि नहीं हो सके, उन एक जैसी प्रतीत होनेवाली वस्तुओंके भेदको भी जो प्रत्यक्ष करा देनेवाला है, उनका नाम विवेकज्ञान है ॥५३ ॥

सम्बन्ध - उस विवेकज्ञानकी विशेषताका वर्णन करते हैं— तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥५४ ॥

तारकम् = जो संसार - समुद्रसे तारनेवाला है; सर्वविषयम् = सबको जाननेवाला है; सर्वथाविषयम् = सब प्रकारसे जाननेवाला है; च = और; अक्रमम् = बिना क्रमके ( पूर्वापरके ) जाननेवाला है; इति = इस प्रकार वह; विवेकजम् - विवेकजनित; ज्ञानम् = ज्ञान है । व्याख्या - यह ज्ञान परवैराग्यको उत्पन्न करके योगीकी कैवल्य-अवस्थाका सम्पादन करनेमें हेतु है, इसलिये इसको तारक अर्थात् संसार - | समुद्रसे उद्धार करनेवाला कहा है । इसके द्वारा योगी समस्त वस्तुओंको सब प्रकारसे जान सकता है, इस कारण यह ' सर्वविषयम् ' और ' सर्वथाविषयम् ' कहलाता । इसके द्वारा योगी हरेक वस्तुको बिना क्रमके एक साथ जान सकता है, इस कारण इसको ' अक्रमम् ' भी कहते हैं । यह ज्ञानकी अन्तिम अवस्था है, इससे ऊँची कोई स्थिति नहीं है । ' अक्रमम् ' का यह भी भाव समझना चाहिये कि यह क्रमसे रहित है, अर्थात् दूसरे ज्ञानोंकी भाँति परिवर्तनशील नहीं है । इसी ज्ञानको पहले पादके सोलहवें सूत्रमें ' पुरुष - ख्याति ' के नामसे परवैराग्यका हेतु बतलाया है ॥५४ ॥

सम्बन्ध - ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे विवेकज्ञान होनेपर ही कैवल्य हो, ऐसा नियम नहीं है । इसके सिवा दूसरे प्रकारसे भी विवेकज्ञान होकर कैवल्य प्राप्त हो सकता है । अत: उसके लिये जो बात अवश्य होनी चाहिये उसका वर्णन करते हैं-

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११४ पातञ्जलयोगदर्शन सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम् ॥५५ ॥

सत्त्वपुरुषयोः - बुद्धि और पुरुष – इन दोनोंकी; शुद्धिसाम्ये = = जब समानभावसे शुद्धि हो जाती है, तब; कैवल्यम् - कैवल्य होता है । व्याख्या - इधर बुद्धि अत्यन्त निर्मल होकर अपने कारणमें विलीन होने लग जाती है और उधर पुरुषका जो बुद्धिके साथ अज्ञानकृत सम्बन्ध है, उसका और तज्जनित मल - विक्षेप - आवरणका अभाव होनेसे पुरुष भी निर्मल हो जाता है । इस प्रकार जब दोनोंकी समभावसे शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य होता है; वह चाहे किसी भी निमित्तसे किसी भी प्रकारसे क्यों न हो जाय ॥ ५५ ॥

पृष्ठ 116

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कैवल्यपाद –४ पहले पादमें प्रधानतासे समाधिके स्वरूपका वर्णन है, इस कारण उसे ' समाधिपाद ' कहते हैं । दूसरेमें प्रधानतासे समाधिके साधनोंका वर्णन है, इस कारण उसे ' साधनपाद ' कहते हैं । तीसरेमें प्रधानतासे समाधिद्वारा प्राप्त होनेवाली नाना प्रकारकी सिद्धियोंका वर्णन है, अतः उसे ' विभूतिपाद ' कहते हैं । इन तीनों पादोंमें समाधिके वास्तविक फल ( कैवल्य ) - का वर्णन प्रसंगानुसार हुआ है, किंतु विवेचनपूर्वक नहीं हुआ; अतः उसका अच्छी तरह वर्णन करनेके लिये यह चौथा पाद आरम्भ किया गया है, इसीलिये इसका नाम ' कैवल्यपाद ' रखा गया है । सम्बन्ध- तीसरे पादमें जो नाना प्रकारकी सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं, वे केवल समाधिसे ही होती हैं, ऐसी बात नहीं है, उनमें दूसरे भी निमित्त हो सकते हैं । अत: उनका वर्णन करते हैं-जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ॥ १ ॥

जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः = जन्मसे होनेवाली, ओषधिसे होनेवाली, मन्त्रसे होनेवाली, तपसे होनेवाली और समाधिसे होनेवाली ( ऐसे पाँच प्रकारकी ); सिद्धयः - सिद्धियाँ होती हैं । व्याख्या - शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें परिवर्तन होनेपर जो पहलेकी अपेक्षा विलक्षण ( अलौकिक ) शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, उसको सिद्धि कहते हैं । ये सिद्धियाँ पाँच कारणोंसे होती हैं । उनके भेद इस प्रकार हैं-( १ ) जन्मसे होनेवाली सिद्धि - जब प्राणी मरकर एक योनिसे दूसरी योनिमें जाता है, तब उसके प्रारब्धानुसार शरीर, इन्द्रियों और चित्तका परिवर्तन होकर, उनमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है ( योग ० १। १ ९ ) । जैसे — मनुष्ययोनिसे देवादि योनियोंकी प्राप्ति होनेसे शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें अपूर्व शक्ति आ जाती है, इसे ' जन्मजा ' सिद्धि कहते हैं । कपिल, वेदव्यास, शुकदेव आदि महर्षियोंमें कई प्रकारकी

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११६ पातञ्जलयोगदर्शन जन्मसे होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन इतिहास और पुराणोंमें देखा जाता है । इसी तरह जन्मसे होनेवाली दूसरे प्रकारकी सिद्धियोंको भी समझ लेना चाहिये । ( २ ) ओषधिसे होनेवाली सिद्धि - मनुष्य जब किसी ओषधिके सेवनसे अपने शरीरका कल्प कर लेता है शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है । इसे ' ओषधि ( भौतिक पदार्थों ) - द्वारा किसी शक्तिका प्रादुर्भाव भी इसीमें आ जाता है । शरीर आदिका परिवर्तन होता हो, ऐसी बात पक्षी आदिमें भी अपूर्व शक्ति आ सकती है हो सकता है । तब उससे भी शरीरमें अपूर्व ओषधिजा ' सिद्धि कहते हैं । नेत्र आदि इन्द्रियोंमें अद्भुत ओषधिसे केवल मनुष्यके ही नहीं है; वृक्ष, लता और पशु-तथा विभिन्न भौतिक विकास ( ३ ) मन्त्रसे होनेवाली सिद्धि - जब मनुष्य विलक्षण सामर्थ्य प्राप्त करनेके लिये किसी मन्त्रका विधिवत् अनुष्ठान करता है, तब उससे भी शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें विलक्षण शक्तिका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसे ' मन्त्रजा ' सिद्धि कहते हैं ( योग ० २ । ४४ ) । इनका वर्णन वेदोंमें और तन्त्रशास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक है । ( ४ ) तपसे होनेवाली सिद्धि - जब मनुष्य शास्त्रोक्त तपका विधिवत अनुष्ठान करता है, अथवा अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये भारी-से- भारी कष्ट सहर्ष सहन करता है, परंतु धर्मका त्याग नहीं करता, तब उस तपश्चर्यासे उसके शरीर, इन्द्रियों और चित्तके समस्त मल भस्म हो जाते हैं और उनमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसे ' तपजा ' सिद्धि कहते हैं ( योग ० २ । ४३ ) । इतिहासग्रन्थोंमें इसका बहुत जगह वर्णन है । भरद्वाज और विश्वामित्र आदि अनेक ऋषियोंने तपसे प्राप्त सिद्धियोंका प्रयोग करके भी दिखाया है । ( ५ ) समाधिसे होनेवाली सिद्धि - धारणा, ध्यान और समाधिके अभ्याससे जो शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव होता है इसे ' समाधिजा ' सिद्धि कहते हैं । इसका वर्णन तीसरे पादमें विस्तारपूर्वक स्वयं सूत्रकारने किया ही है ।

पृष्ठ 118

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कवल्यपाद – ४ ११७ उपर्युक्त सिद्धियोंकी प्राप्तिमें जो शरीर, इन्द्रियों और चित्तका एक प्रकारसे दूसरे प्रकारमें बदल जाना है, यही परिणामान्तर है, अतः इसीको ' जाति - अन्तर - परिणाम ' कहते हैं ॥ १ ॥

सम्बन्ध — उक्त ' जात्यन्तरपरिणाम ' किस प्रकार कैसे होता है, यह बतलाते हैं-जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२ ॥

जात्यन्तरपरिणामः = ( यह ) एक जातिसे दूसरी जातिमें बदल जानारूप जात्यन्तरपरिणाम; प्रकृत्यापूरात् = प्रकृतिके पूर्ण होनेसे होता है । व्याख्या– उक्त जाति - अन्तर - परिणामरूप परिवर्तनके लिये अर्थात् उन - उन विलक्षण शक्तियोंके प्रकट होनेके लिये जिन - जिन प्रकृतियोंकी अर्थात जिन - जिन उपादान कारणरूप तत्त्वोंकी आवश्यकता है, उनकी पूर्तिसे शरीर, इन्द्रियों और चित्तका एक जातिसे दूसरी जातिमें परिवर्तन होता है ॥२ ॥

सम्बन्ध— यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जन्म, ओषधि आदि निमित्त कारण-प्रकृतियोंकी पूर्णता कैसे कर देते हैं; क्या वे प्रकृतियोंके प्रयोजक ( चलानेवाले ) हैं? इसपर कहते हैं-निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥ ३ ॥

निमित्तम् = निमित्त; प्रकृतीनाम् = प्रकृतियोंको; अप्रयोजकम् = चलानेवाला नहीं है; ततः = उससे; तु = तो ( केवल ); क्षेत्रिकवत् = किसानकी भाँति; वरणभेदः = रुकावटका छेदन किया जाता है । व्याख्या — पहले बतलाये हुए जो जन्म, ओषधि आदि निमित्त कारण हैं, वे प्रकृतियोंको एक स्थानसे दूसरे स्थानमें ले जानेवाले नहीं हैं, उनका काम तो केवल रुकावटको दूर कर देनामात्र है, उसके बाद प्रकृतियोंकी पूर्ति तो अपने - आप हो जाती है । जैसे किसान एक खेतसे दूसरे खेतमें जल ले जाता है तो केवल उसकी रुकावटको ही दूर करता है, उस जलको चलानेका काम वह नहीं करता, रुकावट दूर होनेसे जल अपने-आप एक खेतसे दूसरे खेतमें चला जाता है, उसी प्रकार पहले बतलाये हुए जन्म आदि निमित्तोंद्वारा जब रुकावट दूर हो जाती है, तब शरीर,

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११८ पातञ्जलयोगदर्शन इन्द्रियाँ और चित्त – इन सबमें परिवर्तनके लिये जिन - जिन वस्तुओंकी आवश्यकता होती है, उन - उनकी पूर्ति अपने - आप हो जाती है । रुकावट दूर होनेपर कमीको पूर्ण कर देना प्रकृतिका स्वभाव है ॥३ ॥

निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४ ॥

निर्माणचित्तानि = बनाये हुए चित्त; अस्मितामात्रात् - केवल अस्मितासे होते हैं । व्याख्या - चित्तका उपादान कारण स्मिता है, अतः निमित्त यानी बनाये हुए सब चित्त केवल अस्मितासे ही उत्पन्न होते हैं ॥४ ॥

प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥ ५ ॥

अनेकेषाम् = अनेक चितोंको; प्रवृत्तिभेदे दे = = नाना प्रकारकी प्रवृत्तियोंमें; प्रयोजकम् = नियुक्त करनेवाला; एकम् = एक; चित्तम् - चित्त ( होता ) है । व्याख्या - जैसे अपने शरीरमें भिन्न - भिन्न इन्द्रियोंको भिन्न - भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला एक चित्त रहता है, उसी प्रकार उन बनाये । हुए चित्तोंको भिन्न - भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला संचालक एक ही चित्त होता है, जो कि योगीका स्वाभाविक चित्त है * ॥ ५ ॥

सम्बन्ध - पहले सूत्रमें बतलाये हुए पाँच प्रकारके सिद्ध चित्तोंमेंसे समाधिद्वारा सिद्ध हुए चित्तकी विशेषताका वर्णन करते हैं— तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥ ६ ॥

तत्र = उनमेंसे; ध्यानजम् = जो ध्यानजनित चित्त होता है, वह; अनाशयम् = कर्म - संस्कारोंसे रहित होता है । * यहाँ चौथे और पाँचवें सूत्रका जो अर्थ भाष्यकार और टीकाकारोंने बतलाया है, उसके अनुसार छठे सूत्रकी संगति ठीक नहीं बैठती, इस कारण टीकाकारोंने अगले सूत्रका सम्बन्ध प्रथम सूत्रसे जोड़ा है तथा चौथे और पाँचवें सूत्रसे जिस प्रकारसे अनेक निर्माणचित्तोंकी बात कही है, वह भी यहाँके प्रसंगानुकूल नहीं प्रतीत होती; अतः वास्तवमें सूत्रकारका यहाँ क्या कहना है, यह विचारणीय विषय है । मैंने तो इन सूत्रोंका केवल शब्दानुवादमात्र कर दिया है

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कवल्यपाद –४ ११ ९ व्याख्या – जन्म, ओषधि, मन्त्र, तप और समाधि – इन पाँच कारणोंसे शरीर, इन्द्रिय और चित्तका विलक्षण परिणाम होता है- यह बात पहले कही गयी । उन पाँच प्रकारसे उत्कर्षताको प्राप्त हुए चित्तोंमेंसे जो चित्त ध्यानसे उत्पन्न होता है अर्थात् समाधिद्वारा होता है, वह कर्मसंस्कारोंसे रहित होता है, अतः हो सकता है, दूसरे जन्म, औषध आदिके द्वारा चित्तोंमें कर्मोंके संस्कार रहते हैं, इस कारण वे हो सकते ॥६ ॥

सम्बन्ध - अब कर्माशयशून्य सिद्ध योगीके कर्मोंकी करते हैं-विलक्षण शक्तिवाला वही कैवल्यका हेतु विलक्षण शक्तियुक्त कैवल्यके हेतु नहीं विलक्षणताका प्रतिपादन कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥ ७ ॥

योगिनः = योगीके; कर्म = कर्म; अशुक्लाकृष्णम् = अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं ( तथा ); इतरेषाम् = दूसरोंके; त्रिविधम् - तीन प्रकारके होते हैं । व्याख्या - शुक्लकर्म उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका फल सुखभोग होता है और कृष्णकर्म उनको कहते हैं, जो नरक आदि दुःखोंके कारण हैं अर्थात् पुण्यकर्मोंका नाम शुक्लकर्म है और पापकर्मोंका नाम कृष्णकर्म है, सिद्ध योगीके कर्म किसी प्रकारका भी भोग देनेवाले नहीं होते, क्योंकि उसका चित्त कर्मसंस्कारोंसे शून्य होता है यह बात पहले कह चुके हैं, इसलिये उन कर्मोंको अशुक्ल और अकृष्ण कहते हैं । योगीके सिवा साधारण मनुष्योंके कर्म तीन प्रकारके होते हैं - ( १ ) शुक्ल अर्थात पुण्यकर्म, ( २ ) कृष्ण अर्थात् पापकर्म और ( ३ ) शुक्लकृष्ण अर्थात् पुण्य और पाप मिले हुए ॥ ७ ॥

सम्बन्ध - अब साधारण मनुष्योंके उन तीन प्रकारके कर्मोंका भोग किस प्रकार होता है, यह बतलाते हैं-ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥ ८ ॥

ततः = उन ( तीन प्रकारके कर्मों ) - से; तद्विपाकानुगुणानाम् = उनके