श्रीगणेशाय नमः।
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 21–30
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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२० पातञ्जलयोगदर्शन तृष्णारहित चित्तकी; वशीकारसंज्ञा = जो वशीकार नामक अवस्था है वह; वैराग्यम् = वैराग्य है । व्याख्या — अन्त: करण और इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले इस लोकके समस्त भोगोंका समाहार यहाँ ' दृष्ट ' शब्दमें किया गया है और जो प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं हैं, जिनकी बड़ाई वेद, शास्त्र और भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषोंसे सुनी गयी है, ऐसे भोग्य विषयोंका समाहार ' आनुश्रविक ' शब्दमें किया गया है । उपर्युक्त दोनों प्रकारके भोगोंसे जब चित्त भलीभाँति तृष्णारहित हो जाता है, जब उसको प्राप्त करनेकी इच्छाका सर्वथा नाश हो जाता है, ऐसे कामनारहित चित्तकी जो वशीकार नामक अवस्थाविशेष है, वह ' अपर - वैराग्य ' है ॥ १५ ॥
सम्बन्ध — अब पर- वैराग्यके लक्षण बतलाते हैं-तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १६ ॥
पुरुषख्यातेः = पुरुषके ज्ञानसे; गुणवैतृष्ण्यम् = जो प्रकृतिके गुणोंमें तृष्णाका सर्वथा अभाव हो जाना है; तत् = वह; परम् = पर - वैराग्य है । व्याख्या - पहले बतलाये हुए चित्तकी वशीकार - संज्ञारूप वैराग्यसे जब साधककी विषयकामनाका अभाव हो जाता है और उसके चित्तका प्रवाह समानभावसे अपने ध्येयके अनुभवमें एकाग्र हो जाता है ( योग ० ३।१२ ), उसके बाद समाधि परिपक्व होनेपर प्रकृति और पुरुषविषयक विवेकज्ञान प्रकट होता है ( योग ० ३ | ३५ ), उसके होनेसे जब साधककी तीनों गुणोंमें और उनके कार्यमें किसी प्रकारकी किंचिन्मात्र भी तृष्णा नहीं रहती; ( योग ० ४। २६ ), जब वह सर्वथा आप्तकाम निष्काम हो जाता है ( योग ० २। २७ ), ऐसी सर्वथा रागरहित अवस्थाको ' पर - वैराग्य ' कहते हैं * ॥ १६ ॥
गीतामें भी योगारूढ़ - अवस्थाका वर्णन करते हुए कहा है—
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
‘ जब योगी न तो इन्द्रियोंके विषयोंमें और न कर्मोंमें ही आसक्त होता है तथा सब प्रकारके संकल्पोंका भलीभाँति त्याग कर देता है तब वह योगारूढ कहलाता है । '
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समाधिपाद – १ २१ सम्बन्ध — इस प्रकार चित्तवृत्ति - निरोधके उपायोंका वर्णन करके अब चित्तवृत्ति-निरोधरूप निर्बीज - योगका स्वरूप बतलानेके लिये पहले उसके पूर्वकी अवस्थाका सम्प्रज्ञातयोगके नामसे अवान्तर भेदोंके सहित वर्णन करते हैं-वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्सम्प्रज्ञातः ॥ १७ ॥
वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात् = वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता– इन चारोंके सम्बन्धसे युक्त ( चित्तवृत्तिका समाधान ); सम्प्रज्ञातः = । सम्प्रज्ञातयोग है । व्याख्या — सम्प्रज्ञातयोगके ध्येय पदार्थ तीन माने गये हैं - ( १ ) ग्राह्य ( इन्द्रियोंके स्थूल और सूक्ष्म विषय ), ( २ ) ग्रहण ( इन्द्रियाँ और अन्तःकरण ) तथा ( ३ ) ग्रहीता ( बुद्धिके साथ एकरूप हुआ पुरुष ) ( योग ० १। ४१ ) । जब ग्राह्य पदार्थोंके स्थूलरूपमें समाधि की जाती है, उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प वर्तमान रहता है, तबतक तो वह सवितर्क समाधि है और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्वितर्क कही जाती है । इसी प्रकार जब ग्राह्य और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें समाधि की जाती है उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प रहता है, तबतक वह सविचार और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्विचार कही जाती है । जब निर्विचार समाधिमें विचारका सम्बन्ध तो नहीं रहता, परंतु आनन्दका अनुभव और अहंकारका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह आनन्दानुगता समाधि है और जब उसमें आनन्दकी प्रतीति भी लुप्त हो जाती है, तब वही केवल अस्मितानुगत समझी जाती है । यही निर्विचार समाधिकी निर्मलता है, इनका विस्तृत विचार इसी पादके ४१ वें सूत्रसे ४ ९ वेंतक किया गया है ॥ १७ ॥
सम्बन्ध - अब उस अन्तिम योगका स्वरूप बतलाते हैं, जिसके सिद्ध होनेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है ( योग ० १ । ३ ); जो कि इस शास्त्रका मुख्य प्रतिपाद्य है जिसे कैवल्य - अवस्था भी कहते हैं-
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२२ पातञ्जलयोगदर्शन विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥ १८ ॥
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः- विराम - प्रत्ययका अभ्यास जिसकी पूर्व -अवस्था है और; संस्कारशेषः - जिसमें चित्तका स्वरूप ' संस्कार ' मात्र ही शेष रहता है, वह योग; अन्यः = अन्य है । व्याख्या — साधकको जब पर- वैराग्यकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभावसे ही चित्त संसारके पदार्थोंकी ओर नहीं जाता । वह उनसे अपने-आप उपरत जाता है । उस उपरत अवस्थाकी प्रतीतिका नाम ही यहाँ विराम प्रत्यय है । इस उपरतिकी प्रतीतिका अभ्यास - क्रम भी जब बंद हो जाता है, उस समय चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा अभाव हो जाता है ( योग ० १ । ५१ ); केवलमात्र अन्तिम उपरत - अवस्थाके संस्कारोंसे युक्त चित्त रहता है । ( योग ० ३ । ९ -१० ) । फिर निरोध - संस्कारोंके क्रमकी समाप्ति होनेसे वह चित्त भी अपने कारणमें लीन हो जाता है ( योग ० ४ । ३२ - ३४ ) अतः प्रकृतिके संयोगका अभाव हो जानेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है । इसीको असम्प्रज्ञातयोग, निर्बीजसमाधि ( योग ० १ । ५१ ) और कैवल्य - अवस्था
( योग ० २ । २५; ३ । ५५; ४ । ३४ ) आदि नामोंसे कहा गया है ॥ १८ ॥
सम्बन्ध — यहाँतक योग और उसके साधनोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया, अब किस प्रकारके साधकका उपर्युक्त योग शीघ्र - से- शीघ्र सिद्ध होता है, यह समझानेके लिय प्रकरण आरम्भ किया जाता है-भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १ ९ ॥ विदेहप्रकृतिलयानाम् = विदेह और प्रकृतिलय योगियोंका ( उपर्युक्त योग ); भवप्रत्ययः = भवप्रत्यय कहलाता है । व्याख्या — जो पूर्वजन्ममें योगका साधन करते - करते विदेह - अवस्थातक पहुँच चुके थे; अर्थात् शरीरके बन्धनसे छूटकर शरीरके बाहर स्थिर होनेका जिनका अभ्यास दृढ़ हो चुका था, जो ' महाविदेह ' स्थितिको प्राप्त कर चुके थे ( योग ० ३ । ४३ ), एवं जो साधन करते - करते ' प्रकृतिलय ' ( योग ० १ । ४५; ३ । ४८ ) तककी स्थिति प्राप्त कर चुके थे, किंतु कैवल्य - पदकी प्राप्ति होनेके पहले जिनकी मृत्यु हो गयी,
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समाधिपाद – १ २३ उन दोनों प्रकारके योगियोंका जब पुनर्जन्म होता है, जब वे योगभ्रष्ट साधक पुनः योगिकुलमें जन्म ग्रहण करते हैं; तब उनको पूर्वजन्मके योगाभ्यास - विषयक संस्कारोंके प्रभावसे अपनी स्थितिका तत्काल ज्ञान हो जाता है ( गीता ६ । ४२-४३ ) और वे साधनकी परम्पराके बिना ही निर्बीजसमाधि - अवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं । उनकी निर्बीजसमाधि उपायजन्य नहीं है, अतः उसका नाम ' भवप्रत्यय ' है अर्थात् वह ऐसी समाधि है कि जिसके सिद्ध होनेमें पुनः मनुष्यजन्म प्राप्त होना ही कारण है, साधनसमुदाय नहीं ॥ १ ९ ॥ सम्बन्ध - दूसरे साधकोंका योग कैसे सिद्ध होता है? सो बतलाते हैं— श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ २० ॥
इतरेषाम् - दूसरे साधकोंका ( निरोधरूप योग ); श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधि-प्रज्ञापूर्वकः - श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक ( क्रमसे ) सिद्ध होता है । व्याख्या - किसी भी साधनमें प्रवृत्त होनेका और अविचलभावसे उसमें लगे रहनेका मूल कारण श्रद्धा ( भक्तिपूर्वक विश्वास ) ही है । श्रद्धाकी कमीके कारण ही साधकके साधनकी उन्नतिमें विलम्ब होता है, अन्यथा कल्याणके साधनमें विलम्बका कोई कारण नहीं है । साधनके लिये किसी अप्राप्त योग्यता और परिस्थितिकी आवश्यकता नहीं है । इसीलिये सूत्रकारने श्रद्धाको पहला स्थान दिया है । श्रद्धाके साथ साधकमें वीर्य अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरका सामर्थ्य भी परम आवश्यक है; क्योंकि इसीसे साधकका उत्साह बढ़ता है । श्रद्धा और वीर्य — इन दोनोंका संयोग मिलनेपर साधककी स्मरणशक्ति बलवती हो जाती है तथा उसमें योगसाधनके संस्कारोंका ही बारम्बार प्राकट्य होता रहता है; अतः उसका मन विषयोंसे विरक्त होकर समाहित हो जाता है । इसीको समाधि कहते हैं ( योग ० १ । ४६; ३ । ३ ) । इससे अन्त: करण स्वच्छ हो जानेपर साधककी बुद्धि ' ऋतम्भरा ' - सत्यको धारण करनेवाली हो जाती है ( योग ० १ । ४८ ) । इस बुद्धिका ही नाम
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२४ पातञ्जलयोगदर्शन समाधिप्रज्ञा है । अतएव पर- वैराग्यकी प्राप्तिपूर्वक साधकका निर्बीजसमाधिरूप योग सिद्ध हो जाता है । गीतामें भी कहा है-' श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ' ( ४ । ३ ९ ) जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके-— तत्काल ही परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ २० ॥
सम्बन्ध — अब अभ्यास- वैराग्यकी अधिकताके कारण योगकी सिद्धि शीघ्र और अति शीघ्र होनेकी बात कहते हैं-तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥२१ ॥
तीव्रसंवेगानाम् = जिनके साधनकी गति तीव्र हैं, उनकी ( निर्बीज -समाधि ); आसन्नः = शीघ्र ( सिद्ध ) होती है । व्याख्या - जिन पुरुषोंका साधन ( अभ्यास और वैराग्य ) तेजीसे चलता है, जो सब प्रकारकी विघ्न - बाधाओंको ठुकराकर अपने साधनमें तत्परता से लगे रहते हैं, उनका योग शीघ्र सिद्ध होता है ॥ २१ ॥
सम्बन्ध - किंतु-मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ २२ ॥
मृदुमध्याधिमात्रत्वात् = साधनकी मात्रा हलकी, मध्यम और उच्च होनेके कारण; ततः = तीव्र संवेगवालोंमें; अपि = भी; विशेष: - ( कालका ) भेद हो जाता है । व्याख्या - किसका साधन किस दर्जेका है; इसपर भी योग - सिद्धिकी शीघ्रताका विभाग निर्भर करता है; क्योंकि क्रियात्मक अभ्यास और वैराग्य तीव्र होनेपर भी विवेक और भावकी न्यूनाधिकताके कारण समाधि सिद्ध होनेके कालमें भेद होना स्वाभाविक है । जिस साधकमें श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव कुछ उन्नत हैं, उसका साधन मध्यमात्रावाला है और जिस साधकमें श्रद्धा, विवेक और भाव अत्यन्त उन्नत हैं, उसका साधन अधिमात्रावाला है ।
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समाधिपाद – १ २५ साधनमें क्रियाकी अपेक्षा भावका अधिक महत्त्व है । अभ्यास और वैराग्यका जो क्रियात्मक बाह्य स्वरूप है, वह तो ऊपरवाले सूत्रमें ' वेग ' के नामसे कहा गया है और उनका जो भावात्मक आभ्यन्तर स्वरूप है, वह उनकी मात्रा यानी दर्जा है । व्यवहारमें भी देखा जाता है कि एक ही कामके लिये समानरूपसे परिश्रम किया जानेपर भी जो उसकी सिद्धिमें अधिक विश्वास रखता है, जिस मनुष्यको उस काम करनेकी युक्तिका अधिक ज्ञान है एवं जो उसे प्रेम और उत्साहपूर्वक बिना उकताये करता रहता है; वह दूसरोंकी अपेक्षा उसे शीघ्र पूरा कर लेता है । वही बात समाधिकी सिद्धिमें भी समझ लेनी चाहिये । समाधिकी प्राप्ति के लिये साधन करनेवालोंमें जिसका साधन श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव आदिकी अधिकताके कारण जितने ऊँचे दर्जेका है और जिसकी चालका क्रम जितना तेज है, उसीके अनुसार वह शीघ्र या अतिशीघ्र समाधिकी प्राप्ति कर सकेगा । यही बात समझानेके लिये सूत्रकारने उपर्युक्त दो सूत्रोंकी रचना की है - ऐसा मालूम होता है । अत: साधकको चाहिये कि अपने साधनको सर्वथा निर्दोष बनानेकी चेष्टा रखे, उसमें किसी प्रकारकी शिथिलता न आने दे ॥ २२ ॥
सम्बन्ध - अब पूर्वोक्त अभ्यास और वैराग्यकी अपेक्षा निर्बीज - समाधिका सुगम उपाय बतलाया जाता है-ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ २३ ॥
वा = इसके सिवा; ईश्वरप्रणिधानात् = ईश्वरप्रणिधानसे भी ( निर्बीज -समाधिकी सिद्धि शीघ्र हो सकती है ) । व्याख्या – ईश्वरकी भक्ति यानी शरणागतिका नाम ' ईश्वरप्रणिधान ' है ( देखिये योग ० २ । १ की व्याख्या ); इससे भी निर्बीजसमाधि शीघ्र सिद्ध हो सकती है ( योग ० २ । ४५ ), क्योंकि ईश्वर सर्वसमर्थ हैं, वे अपने शरणापन्न भक्तपर प्रसन्न होकर उसके भावानुसार सब कुछ प्रदान कर
सकते हैं ( गीता ४। ११ * ) ॥ २३ ॥
सम्बन्ध - अब उक्त ईश्वरके लक्षण बतलाते हैं-* ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । ‘ जो मेरेको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ । '
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२६ पातञ्जलयोगदर्शन क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥
क्लेशकर्मविपाकाशयैः = क्लेश, कर्म, विपाक और आशय – इन चारोंसे; अपरामृष्टः = जो सम्बन्धित नहीं है ( तथा ); पुरुषविशेषः = जो समस्त पुरुषोंसे उत्तम है, वह; ईश्वरः = ईश्वर है । व्याख्या - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश – ये पाँच ' क्लेश ' हैं; इनका विस्तृत वर्णन दूसरे पादके तीसरे सूत्रसे नवेंतक है । ' कर्म ' चार प्रकारके हैं - पुण्य, पाप, पुण्य और पापमिश्रित तथा पुण्य -पापसे रहित ( योग ० ४।७ ) । कर्मके फलका नाम ' विपाक ' है ( योग ० २।१३ ) और कर्मसंस्कारोंके समुदायका नाम ' आशय ' है ( योग ० २। १२ ) । समस्त जीवोंका इन चारोंसे अनादि सम्बन्ध है । यद्यपि मुक्त जीवोंका पीछे सम्बन्ध नहीं रहता तो भी पहले सम्बन्ध था ही; किंतु ईश्वरका तो कभी भी इनसे न सम्बन्ध था, न है और न होनेवाला है; इस कारण उन मुक्त पुरुषोंसे भी ईश्वर विशेष है, यह बात प्रकट करने के लिये ही सूत्रकारने ' पुरुषविशेषः ' पदका प्रयोग किया है ॥२४ ॥
सम्बन्ध - ईश्वरकी विशेषताका पुनः प्रतिपादन करते हैं-तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥ २५ ॥
तत्र = उस ( ईश्वर ) -में; सर्वज्ञबीजम् = सर्वज्ञताका बीज ( कारण ) अर्थात् ज्ञान; निरतिशयम् = निरतिशय है । व्याख्या – जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो, वह सातिशय है और जिससे बड़ा कोई न हो वह निरतिशय है । ईश्वर ज्ञानकी अवधि है, उसका ज्ञान सबसे बढ़कर है; उसके ज्ञानसे बढ़कर किसीका भी ज्ञान नहीं है; इसलिये उसे निरतिशय कहा गया है । जिस प्रकार ईश्वरमें ज्ञानकी पराकाष्ठा है, उसी प्रकार धर्म, वैराग्य, यश और ऐश्वर्य आदिकी पराकाष्ठाका आधार भी उसीको समझना चाहिये ॥ २५ ॥
सम्बन्ध - और भी उसकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं-
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समाधिपाद –१ २७ पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६ ॥
( वह ईश्वर सबके ) पूर्वेषाम् = पूर्वजोंका; अपि = भी; गुरु: = गुरु है; कालेन अनवच्छेदात् - क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है । व्याख्या — सर्गके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण सबका गुरु ब्रह्माको माना जाता है, परंतु उसका कालसे अवच्छेद है ( गीता ८ । १७ ) । ईश्वर स्वयं अनादि और अन्य सबका आदि है ( गीता १० । २ - ३ ); वह कालकी सीमासे सर्वथा अतीत है, वहाँतक कालकी पहुँच नहीं है; क्योंकि वह कालका भी महाकाल है । इसलिये वह सम्पूर्ण पूर्वजोंका भी गुरु यानी सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबको शिक्षा देनेवाला है ( श्वेता ० ३ | ४; ६। १८ ) ॥ २६ ॥
सम्बन्ध — ईश्वरकी शरणागतिका प्रकार बतलानेके लिये उसके नामका वर्णन करते हैं-तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७ ॥
तस्य = उस ईश्वरका; वाचकः = वाचक ( नाम ); प्रणवः - प्रणव ( ॐ कार ) है । व्याख्या — नाम और नामीका सम्बन्ध अनादि और बड़ा ही घनिष्ठ है । इसी कारण शास्त्रोंमें नाम - जपकी बड़ी महिमा है ( तुलसी ०, बाल ०
दोहा १८ से २७ ), गीतामें भी जपयज्ञको सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ बतलाया गया ।
है ( १० । २५ ), ‘ ॐ ' उस परमेश्वरका वेदोक्त नाम होनेसे मुख्य है ( गीता
१७। २३; कठ ० १।२ । १५ - १७ ); इस कारण यहाँ उसीका वर्णन किया गया है । इसी वर्णनसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि जितने भी ईश्वरके नाम हैं, उनके जपका भी माहात्म्य समझ लेना चाहिये ॥ २७ ॥
सम्बन्ध - ईश्वरका नाम बतलाकर अब उसके प्रयोगकी विधि बतलाते हैं— तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ २८ ॥
तज्जपः = उस ॐकारका जप ( और ); तदर्थभावनम् = उसके अर्थस्वरूप परमेश्वरका चिन्तन ( करना चाहिये ) ।
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२८ पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या – साधकको ईश्वरके नामका जप और उसके स्वरूपका स्मरण - चिन्तन करना चाहिये । * इसीको पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधान अर्थात ईश्वरकी भक्ति या शरणागति कहते हैं । ईश्वरकी भक्तिके और भी बहुत - से प्रकार हैं, परंतु जप और ध्यान सब साधनोंमें मुख्य होनेके कारण यहाँ सूत्रकारने केवल नाम और नामीके स्मरणरूप एक ही प्रकारका वर्णन किया है । गीतामें भी इसी तरह वर्णन आया है । ( ८।१३ ) । इसे उपलक्षण मानकर भगवद्भक्तिके सभी साधनोंको ईश्वरकी प्रसन्नताके नाते निर्बीजसमाधिकी सिद्धिमें हेतु समझना चाहिये अर्थात् ईश्वरकी भक्तिके सभी अंग - प्रत्यंगों का ईश्वरप्रणिधानमें अन्तर्भाव समझना चाहिये ॥ २८ ॥
सम्बन्ध - अब ईश्वरके नाम - जप और स्वरूपचिन्तनके फलका वर्णन करते हैं-ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमो ऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ २ ९ ॥ ततः = उक्त साधनसे; अन्तरायाभावः = विघ्नोंका अभाव; च = और; प्रत्यक्चेतनाधिगमः = अन्तरात्माके स्वरूपका ज्ञान; अपि = भी ( हो जाता है ) । व्याख्या - अगले दो सूत्रोंमें जिन विघ्नोंका वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है, ईश्वरके भजन - स्मरणसे उनका अपने - आप नाश हो जाता है और अन्तरात्माके ( द्रष्टाके ) स्वरूपका ज्ञान होकर कैवल्य - अवस्था भी उपलब्ध हो जाती है; अतः यह निर्बीजसमाधिकी प्राप्तिका बहुत ही सुगम उपाय है ॥ २ ९ ॥ सम्बन्ध- - पूर्वसूत्रमें जिन अन्तरायोंका अभाव होनेकी बात कही गयी है, उनके नाम बतलाये जाते हैं-व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्ध-भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ ३० ॥
* प्रश्नोपनिषद्के पाँचवें प्रश्नोत्तरमें और माण्डूक्योपनिषद् में ओंकारकी उपासनाका विषय विस्तार से समझाया गया है ।
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समाधिपाद –१ २ ९ व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वान-वस्थितत्वानि = व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व – ये नौ; ( जो कि ) चित्तविक्षेपा: = चित्तके विक्षेप हैं; ते = वे ही; अन्तरायाः = अन्तराय ( विघ्न ) हैं । व्याख्या — योगसाधनमें लगे हुए साधकके चित्तमें विक्षेप उत्पन्न करके उसको साधनसे विचलित करनेवाले ये नौ योगमार्गके विघ्न माने गये हैं । ( १ ) शरीर, इन्द्रियसमुदाय और चित्तमें किसी प्रकारका रोग उत्पन्न हो जाना ' व्याधि ' है । ( २ ) अकर्मण्यता अर्थात् साधनोंमें प्रवृत्ति न होनेका स्वभाव ' स्त्यान ' है । ( ३ ) अपनी शक्तिमें या योगके फलमें संदेह हो जानेका नाम ' संशय ' है । ( ४ ) योगसाधनोंके अनुष्ठानकी अवहेलना ( बे - परवाही ) करते रहना ' प्रमाद ' है । ( ५ ) तमोगुणकी अधिकतासे चित्त और शरीरमें भारीपन हो जाना और उसके कारण साधनमें प्रवृत्तिका न होना ' आलस्य ' है । ( ६ ) विषयोंके साथ इन्द्रियों का संयोग होनेसे उनमें आसक्ति हो जानेके कारण जो चित्तमें वैराग्यका अभाव हो जाता है, उसे ' अविरति ' कहते हैं । ( ७ ) योगके साधनोंको किसी कारणसे विपरीत समझना अर्थात् यह साधन ठीक नहीं, ऐसा मिथ्या ज्ञान हो जाना ' भ्रान्तिदर्शन ' है । ( ८ ) साधन करनेपर भी योगकी भूमिकाओंका अर्थात् साधनकी स्थितिका प्राप्त न होना - यह ' अलब्धभूमिकत्व ' है; इससे साधकका उत्साह कम हो जाता है । ( ९ ) योगसाधनसे किसी भूमिमें चित्तकी स्थिति होनेपर भी उसका न ठहरना ' अनवस्थितत्व ' है । इन नौ प्रकारके चित्तविक्षेपोंको ही अन्तराय, विघ्न और योगके प्रतिपक्षी आदि नामोंसे कहा जाता है ॥ ३० ॥