श्रीगणेशाय नमः।
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 121–130
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
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१२० पातञ्जलयोगदर्शन फलभोगानुकूल; वासनानाम् = वासनाओंकी; एव = ही; अभिव्यक्ति: = अभिव्यक्ति ( उत्पत्ति ) होती है । व्याख्या — योग - साधनोंके द्वारा जिनका चित्त शुद्ध नहीं हुआ है, उन साधारण मनुष्योंके कर्म संस्काररूपसे अन्तःकरणमें संगृहीत ( इकट्ठे हुए ) रहते हैं, अत: उन कर्मोंमेंसे जो कर्म जिस समय फलभोग करानेके लिये तैयार होता है, उस समय उस कर्मका जैसा फल होनेवाला है, वैसी ही वासना उत्पन्न होती है, अन्य कर्मोंके फलभोगकी नहीं ॥८ ॥
सम्बन्ध - कर्मसंस्कार तो अनेक जन्मोंके अनन्त होते हैं, उनमें देश, काल और जन्म - जन्मान्तरका अन्तर पड़ जाता है, इस स्थितिमें वर्तमान जन्मके अनुरूप फलभोगकी वासनाएँ कैसे उत्पन्न होती हैं, इसपर कहते हैं-जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयो-रेकरूपत्वात्॥९ ॥
जातिदेशकालव्यवहितानाम् = जाति, देश और काल - इन तीनोंका व्यवधान रहनेपर; अपि = भी; आनन्तर्यम् = कर्मके संस्कारोंमें व्यवधान नहीं होता है; स्मृतिसंस्कारयोः = क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनोंका; एकरूपत्वात् = एक ही स्वरूप होता है । व्याख्या – कोई कर्म किसी एक जन्ममें किया गया है और कोई कर्म किसी दूसरे जन्ममें किया गया है, यह उन कर्मोंमें जन्मका व्यवधान है । इसी तरह भिन्न - भिन्न कर्मोंमें देश और कालका भी व्यवधान होता है । इस प्रकार जन्म, देश और कालका व्यवधान होते हुए भी जिस कर्मका फल प्राप्त होनेवाला है; उसके अनुसार भोगवासना उत्पन्न होनेमें कोई अड़चन नहीं पड़ती, क्योंकि स्मृति और संस्कार- ये दोनों एक ही हैं । जिस कर्मफलका उत्पादक निमित्त कारण आ जाता है, वैसी ही वासना प्रकट हो जाती है । यदि किसीको उसके पूर्वजन्मके कर्मका फल भोगनेके लिये गौकी योनि मिलनेवाली है, तो उसने गौकी योनि जब कभी पायी है, उसकी वासना प्रकट हो जायगी । भाव यह कि चाहे उस जन्मके बाद दूसरे कितने ही जन्म बीत चुके हों, कितना
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कवल्यपाद –४ १२१ ही समय बीत चुका हो और वह किसी भी देशमें हुआ हो, उसकी वासना स्फुरित हो जायगी । स्मृति और संस्कारोंकी एकता होनेके कारण जो फल मिलता है, उसके अनुकूल भोगवासना यानी स्मृति पैदा हो जाती है॥९॥
सम्बन्ध— यहाँतक शंका होती है कि जब वासनाओंके अनुसार ही जन्म होता ह और कर्मोंके अनुसार वासना होती है, तब सबसे पहले जन्म देनेवाली वासना कहाँस आयी? इसपर कहते हैं— तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥ १० ॥
तासाम् = उन वासनाओंकी; अनादित्वम् = अनादिता है; आशिषः नित्यत्वात् = क्योंकि प्राणीमें ( अपने ) बने रहनेकी इच्छा नित्य अर्थात् अनादिकालसे; च - ही है व्याख्या - प्रत्येक प्राणीको जीवनकी इच्छा नित्य बनी रहती है, मृत्युका भय तुरंत जन्मे हुए क्षुद्र - से - क्षुद्र जीवोंमें भी देखा जाता है, इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है । उस जन्ममें भी मरणभयकी व्याप्ति होनेसे जन्म - जन्मान्तरकी परम्परा अनादि सिद्ध हो जाती है । अतएव वासनाओंका अनादित्व भी अपने - आप सिद्ध हो जाता है ॥ १० ॥
सम्बन्ध — इस प्रकार यदि वासनाएँ अनादि हैं, तब तो इनका अभाव भी नहीं होता होगा, फिर पुरुषकी सूक्ति कैसे होगी? इसपर कहते हैं— हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥ ११ ॥
हेतुफलाश्रयालम्बनै: -हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन, इनसे; संगृहीतत्वात् - वासनाओंका संग्रह होता है, इसलिये; एषाम् = इन ( चारों ) -का; अभावे = अभाव होनेसे; तदभावः = उन ( वासनाओं ) - का भी ( सर्वथा ) अभाव हो जाता है । व्याख्या – वासनाओंका हेतु अविद्यादि क्लेश और उनके रहते हुए होनेवाले कर्म हैं । इनका फल पुनर्जन्म, आयु और भोग है । आश्रय चित्त है और शब्दादि विषय आलम्बन हैं । वासनाएँ इनके सम्बन्धसे ही संगृहीत
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१२२ पातञ्जलयोगदर्शन हो रही हैं । जब योगसाधनोंसे इनका अभाव हो जाता है अर्थात् जब विवेकज्ञानसे अविद्याका नाश हो जाता है ( योग ० ४ । ३० ) तब कर्मोंमें फल देनेकी सामर्थ्य नहीं रहती, चित्त अपने कारणमें विलीन हो जाता है ( योग ० ४। ३४ ) । उपर्युक्त साधनोंके न रहनेसे विषयोंके साथ पुरुषका सम्बन्ध नहीं होता । इस प्रकार हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन - इन चारोंका अभाव होनेसे वासनाओंका अभाव अपने - आप हो जाता है, अतः योगीका पुनर्जन्म नहीं होता ॥११ ॥
सम्बन्ध - यदि सत् वस्तुका कभी अभाव होता ही नहीं तब वासनाओंका और उनके हेतु आदिका नाश होना कैसे सम्भव है । इसपर कहते हैं— अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥ १२ ॥
धर्माणाम् = धर्मोंमें, अध्वभेदात् = कालका भेद होता है, इस कारण; अतीतानागतम् = जो धर्म ( अविद्या, वासना, चित्त और चित्त की वृत्तियाँ आदि ) अतीत हो गये हैं और जो अनागत हैं - अभी प्रकट नहीं हुए हैं, वे भी; स्वरूपतोऽस्ति = स्वरूपसे विद्यमान रहते हैं । व्याख्या- - वस्तुका वास्तवमें अभाव कभी नहीं होता, वस्तुके धर्म चित्त और वासना आदि कुछ अनागत स्थितिमें रहते हैं, कुछ वर्तमान स्थितिमें और कुछ अतीत स्थितिमें । इससे यह नहीं समझना चाहिये कि जो वर्तमान हैं, उन्हींकी सत्ता है दूसरोंकी नहीं, क्योंकि उनका स्वरूपसे अभाव नहीं होता है । अतीत और अनागत- अवस्थामें वे अपने कारणों में रहते हैं, व्यक्त नहीं रहते । यह अपने कारणमें विलीन हो जाना ही उनका नाश या अभाव है ( योग ० ३ । १३ ) । योगीका उन वासनादिके साथ सम्बन्ध - विच्छेद हो जाता है, अतः वे योगीके पुनर्जन्ममें हेतु नहीं बन सकते ॥ १२ ॥
सम्बन्ध - धर्मोका असली स्वरूप क्या है? सो बतलाते हैं— ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥ १३ ॥
ते = वे ( समस्त धर्म ); व्यक्तसूक्ष्मा: = व्यक्त स्थितिमें और सूक्ष्म स्थितिमें ( सदैव ); गुणात्मानः = गुणस्वरूप ही हैं ।
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कवल्यपाद –४ १२३ व्याख्या - वे धर्म जिस समय वर्तमान हैं, उस समय भी अपने कारणरूप गुणोंसे भिन्न नहीं हैं तथा जिस समय अनागत और अतीत — । इन दोनों प्रकारकी सूक्ष्म स्थितिमें हैं, तब भी गुणस्वरूप ही हैं; क्योंकि गुण उन धर्मरूप समस्त भिन्न - भिन्न वस्तुओंमें धर्मी ( कारण ) - रूपसे सदैव अनुगत रहते हैं, उनका कभी अभाव नहीं होता, अतः वास्तवमें किसी भी वस्तुकी सत्ताका अभाव नहीं है । गुणस्वरूपसे वह सदैव विद्यमान है, परन्तु परिणामशील होनेके कारण उसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है ॥ १३ ॥
सम्बन्ध - यदि गुणोंका कार्य होनेसे वास्तवमें सब कुछ गुणस्वरूप ही है तो फिर भिन्न - भिन्न स्वभाववाले तीनों गुणोंसे एक - एक वस्तुकी उत्पत्ति कैसे हो जाती है, हरेकसे अलग - अलग वस्तुएँ होनी चाहिये थीं? इसपर कहते हैं— परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥ १४ ॥
परिणामैकत्वात् = परिणामकी एकतासे; वस्तुतत्त्वम् = वस्तुका वैसा होना सम्भव है । व्याख्या - परन्तु भिन्न स्वभाववाले गुणोंका जब एक परिणाम होता है, सब मिल - जुलकर जब किसी एक वस्तुके रूपमें परिणत होते हैं, तब वैसा होनेमें कोई विरोध नहीं है । भिन्न - भिन्न वस्तुओंके एक परिणामसे एक वस्तुका प्रकट होना प्रत्यक्ष देखनेमें भी आता है । जैसे पृथ्वी और जल मिलकर सूर्य और चन्द्रमाकी रश्मियोंके सम्बन्धसे वृक्षके रूपमें परिणत हो जाते हैं और उसमें फिर नाना जाति, नाना आकार और नाना व्यक्तित्वका भेद हो जाता है परन्तु वस्तुतः वे अपने धर्मियोंसे सर्वथा अभिन्न हैं, उसी प्रकार सब वस्तुएँ गुणस्वरूप ही हैं, उनसे भिन्न नहीं हैं ॥१४ ॥
सम्बन्ध— जो लोग यह मानते हैं कि दृश्य कोई वस्तु नहीं है वासनाके बलसे चित्त ही दृश्यरूपमें प्रतीत होने लग जाता है, उनकी मान्यता गलत है; क्योंकि— वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥ १५ ॥
वस्तुसाम्ये = वस्तुकी एकतामें ( भी ), चित्तभेदात्- चित्तका भेद प्रत्यक्ष
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१२४ पातञ्जलयोगदर्शन है, इसलिये; तयोः = ( चित्त और उसके द्वारा देखी जानेवाली वस्तु ) इन दोनोंका; पन्थाः = मार्ग; विभक्त: - अलग - अलग 1 व्याख्या - एक ही वस्तुमें मनुष्योंके चित्तोंकी वृत्तियाँ अलग - अलग होती हैं अर्थात् अनेक चित्तोंका विषय वह एक ही वस्तु विभिन्न प्रकारसे बनती है, यह प्रत्यक्ष है । इस परिस्थितिमें यदि वस्तु किसी एक चित्तकी कल्पनामात्र मानी जाय तो वह अनेक चित्तोंका विषय नहीं बन सकती । अतः सबको उसका स्वरूप नहीं दीखना चाहिये था, परंतु ऐसा नहीं होता, वह सबको ही दीखती है । इसके सिवा यदि उसको अनेक चित्तोंकी कल्पना मानी जाय, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह वस्तु भिन्न - भिन्न कालमें अनेक चित्तोंका विषय बनती हुई देखी जाती है । इस परिस्थितिमें वह कौन - से अनेक चित्तोंकी कल्पना मानी जायगी? अतएव वस्तुकी एकता और उसे विषय करनेवाले चित्तोंकी अनेकता होनेके कारण दोनों अलग - अलग पदार्थ हैं - यह मान्यता ही समीचीन है ॥१५ ॥
सम्बन्ध - पुनः पूर्वपक्षका खण्डन करनेके लिये दूसरा सूत्र कहते हैं-न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥ १६ ॥
च = इसके सिवा; वस्तु = दृश्य वस्तु; एकचित्ततन्त्रम् - किसी एक चित्तके अधीन; न = नहीं है ( क्योंकि ); तदप्रमाणकम् = जब वह चित्तका विषय नहीं रहेगी; तदा उस समय; किं स्यात् = वस्तुका क्या होगा? व्याख्या — इसके सिवा विद्यमान दृश्य वस्तु किसी एक चित्तके अधीन नहीं है, इसलिये भी कल्पनामात्र नहीं है, क्योंकि यदि कल्पनामात्र मानी जाय तो जब वह चित्त उसको विषय करना ( देखना ) छोड़ दे, उस समय वह नहीं रहनी चाहिये । परंतु ऐसा नहीं होता, वस्तु वैसी की वैसी ही विद्यमान रहती है । इससे यह सिद्ध होता है कि दीखनेवाली वस्तु किसी एक चित्तके अधीन नहीं है तथा दृश्य वस्तु चित्तसे भिन्न है और वह सच्ची है ॥ १६ ॥
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कवल्यपाद –४ १२५ सम्बन्ध - यदि बाहरकी दृश्य वस्तु अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखती है तो वह कभी दीखती है और कभी नहीं दीखती, इसमें क्या कारण है इसपर कहते हैं-तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ॥ १७ ॥
चित्तस्य - चित्त; तदुपरागापेक्षित्वात् = वस्तुके उपराग ( अपनेमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ने ) - की अपेक्षावाला है, इस कारण ( उसके द्वारा ); वस्तु = वस्तु; ज्ञाताज्ञातम् = कभी ज्ञात और कभी अज्ञात होती है यह सर्वथा उचित है । व्याख्या – इन्द्रियोंकी समीपतासे जिस पदार्थकी चित्तमें परछाईं पड़ती है, उसी वस्तुको चित्त जान सकता है, अन्य वस्तुको नहीं । उसे वस्तुका ज्ञान प्राप्त करनेमें उसके उपराग ( परछाईं - प्रतिबिम्ब ) - की अपेक्षा है । अतः जब जिस वस्तुका उसमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, यानी इन्द्रियोंके द्वारा चित्तसे जब जिस वस्तुका सम्बन्ध होता है, उस समय वह वस्तु उसके ज्ञात है और जिस समय वह उसकी वृत्तिका विषय नहीं बनती अर्थात् चित्तमें उपरंजित नहीं होती, उस समय अज्ञात है ॥ १७ ॥
सम्बन्ध — इस प्रकार दृश्य वस्तुओंसे चित्तकी भिन्न सत्ता सिद्ध करके अब द्रष्टा पुरुषसे भी चित्तकी भिन्न सत्ता सिद्ध करते हैं-सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् ॥ १८ ॥
तत्प्रभोः - उस ( चित्त ) -का स्वामी; पुरुषस्य - पुरुष; अपरिणामित्वात् = । परिणामी नहीं है, इसलिये; चित्तवृत्तयः - चित्तकी वृत्तियाँ ( उसे ); सदा ज्ञाता: -सदा ज्ञात रहती हैं । व्याख्या – चित्त तो परिणामी है, इस कारण वह बाहरकी वस्तुओंको सदा नहीं देख सकता । जब जिस वस्तुका उसके साथ सम्बन्ध होता है, तभी उसे देखता है । किंतु उस चित्तका स्वामी जो पुरुष है वह अपरिणामी है । इस कारण वह चित्तकी वृत्तियोंको सदैव देखता रहता है । जिस समय जो वृत्ति चित्तमें उत्पन्न होती है और जो शान्त होती है, वे सभी उसे विदित रहती हैं ॥ १८ ॥
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१२६ पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध— चित्त जिस प्रकार वस्तुका प्रकाशक है, उसी प्रकार अपना भी है । फिर चित्तसे भिन्न दूसरेको द्रष्टा माननेकी क्या आवश्यकता है । इसपर कहते हैं— न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥ १ ९ ॥ तत् = वह ( चित्त ); स्वाभासम् = स्वप्रकाश ( प्रकाशस्वरूप ) न = नहीं है; दृश्यत्वात् = क्योंकि वह दृश्य है । व्याख्या – चित्त दृश्य है, इसलिये जड है । वह स्वप्रकाश यानी अपने - आपको जाननेवाला - प्रकाशस्वरूप नहीं है, उसमें जो चेतनता दिखलायी देती है, जिसके कारण वह किसी अंशमें चेतन कहा जाता है, वह चेतना उसमें चेतन पुरुषका प्रतिबिम्ब पड़नेसे है । जब चित्तमें बाह्य वस्तुएँ और चेतन पुरुष - इन दोनोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उस समय पुरुष चित्तकी वृत्तियोंके रूपमें तद्रूप - सा हुआ रहता है ( योग ० १ । ४ ) । और चित्त चेतन - सा प्रतीत होने लगता है; परंतु वास्तवमें जैसे इन्द्रियाँ और शब्द आदि विषय दृश्य होनेके कारण स्वप्रकाश नहीं हैं, उसी प्रकार चित्त भी दृश्य होनेके कारण स्वप्रकाश नहीं है ॥ १ ९ ॥ सम्बन्ध — चित्तको स्वप्रकाश माननेमें दूसरा दोष दिखाते हैं— एकसमये चोभयानवधारणम् ॥ २० ॥
च = तथा; एकसमये = एक कालमें; उभयानवधारणम् = ( चित्त और उसका विषय ) – इन दोनोंके स्वरूपको जानना भी नहीं हो सकता । व्याख्या — बाहरके पदार्थका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, तब द्रष्टा पुरुषको उस प्रतिबिम्बसहित चित्तका ज्ञान होना युक्तियुक्त है; क्योंकि वह अपरिणामी है । परंतु चित्त अपने स्वरूपको और दृश्य पदार्थके स्वरूपको एक साथ ही नहीं जान सकता; क्योंकि परिणामशील होनेके कारण उसे एक ही कालमें दो ज्ञान नहीं हो सकते । अतः यही समझना चाहिये कि चित्त स्वप्रकाश नहीं है । चित्तका काम केवल बाह्य पदार्थके स्वरूपको अपने स्वामी द्रष्टा पुरुषके सामने रख देना है; फिर उसे जाननेका काम तो पुरुषका है ॥२० ॥
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कवल्यपाद –४ १२७ सम्बन्ध — चित्तसे विषयका साक्षात्कार होता है और वह चित्त उस विषयसहित दूसरे चित्तसे देखा जाता है । इस प्रकार चित्तका और विषयका एक साथ ज्ञान हो जाता है । यह मान लिया जाय तो क्या हानि है । इसपर कहते हैं— चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च ॥ २१ ॥
चित्तान्तरदृश्ये = एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य मान लेनेपर; बुद्धिबुद्धेः अतिप्रसङ्गः = वह चित्त फिर दूसरे चित्तका दृश्य होगा - इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होगी, च = और; स्मृतिसंकरः = स्मृतिका भी मिश्रण हो जायगा । व्याख्या - इस प्रकार एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य मान लेनेसे एक तो अनवस्था दोष आता है, दूसरे स्मृतिके संकर हो जानेका दोष आता है; क्योंकि एक चित्तने तो किसी विषयको जाना, दूसरेने उस विषयसहित चित्तको जाना, इसी प्रकार दूसरेको तीसरेने, तीसरेको चौथेने इस तरह चलते रहनेपर तो एक वस्तुका ज्ञान भी कभी समाप्त नहीं होगा, यह अनवस्था दोष आयेगा और उन अनेक ज्ञानोंकी एक साथ स्मृति होनेपर यह निर्णय नहीं हो सकेगा कि कौन-से ज्ञानका क्या स्वरूप है, स्मृतिका मिश्रण हो जायगा, सो यह किसीके अनुभवकी बात नहीं है, सब कोई ऐसा ही स्मरण करते हैं कि अमुक पदार्थको मैंने जाना था । ऐसा कोई नहीं कहता कि अमुक पदार्थको, उसके ज्ञानको, फिर उसके ज्ञानसहित ज्ञानको, फिर उसके भी ज्ञानसहित ज्ञानको मैंने जाना था - इत्यादि । अतः चित्तसे भिन्न द्रष्टाको मानना ही युक्तिसंगत है ॥ २१ ॥
सम्बन्ध - चित्त स्वप्रकाश भी नहीं है और दूसरे चित्तका विषय भी नहीं है तो फिर यह बतलाना चाहिये कि चित्तका द्रष्टा कौन है, क्योंकि पुरुष तो असंग और निर्विकार है, वह किसीका द्रष्टा और भोक्ता कैसे हो सकता है । इसपर कहते हैं— चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥ २२ ॥
चिते: अप्रतिसंक्रमाया: - यद्यपि चेतन - शक्ति ( पुरुष ) क्रियासे
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१२८ पातञ्जलयोगदर्शन रहित और असंग है, तो भी; तदाकारापत्तौ तदाकार हो जानेपर; स्वबुद्धिसंवेदनम् = ( उसे ) अपनी बुद्धिका ( चित्तका ) ज्ञान होता है । व्याख्या — चेतन पुरुष निर्विकार, अपरिणामी, क्रियाशून्य और असंग है, इसमें कोई संदेह नहीं; परंतु विकारशील नाना प्रकारके दृश्य पदार्थोंके प्रतिबिम्बसे तदाकार हुए चित्तके सम्बन्धमें जब वह चित्तके आकारवाला-सा हो जाता है ( योग ० १ । ४ ), उस समय उसे वृत्तियोंसहित बुद्धिका ज्ञान होता है । अतः उसे अपनी बुद्धि और बुद्धिकी वृत्तियोंका ज्ञाता और भोक्ता कहा जाता है । वास्तवमें तो पुरुष न ज्ञाता ही है और न भोक्ता ही, वह तो सर्वथा निर्विकार, असंग और स्वप्रकाश चेतनमात्र है ( योग ० २ । २० ) । भाव यह है कि चेतनके उपरागसे उपरंजित हुई बुद्धिका केवल अनुकरण करनेवाला - सा होनेके कारण ही चेतनको ज्ञाता कहा जाता है ॥ २२ ॥
सम्बन्ध - ऐसा किस कारणसे होता है? यह बतलाते हैं-द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥ २३ ॥
द्रष्टृदृश्योपरक्तम् = द्रष्टा और दृश्य – इन दोनोंसे रँगा हुआ; चित्तम् = चित्त; सर्वार्थम् = सब अर्थवाला हो जाता है । व्याख्या - यह चित्त जब दृश्य पदार्थसे रँगा हुआ; अपने स्वरूपके सहित द्रष्टाका विषय ( दृश्य ) बनकर उससे सम्बन्धित होता है, तब द्रष्टा और दृश्य – इन दोनोंके रंगमें रँग जाता है अर्थात् उन दोनोंका प्रतिबिम्ब इसमें पड़नेके कारण यह दोनोंका आकार धारण कर लेता है और इसका निजी रूप भी वर्तमान रहता ही है, इस कारण यह चित्त ही सब अर्थवाला हो जाता है यानी दृश्य पदार्थके रूपवाला, द्रष्टा पुरुषके रूपवाला और अपने रूपवाला - इस प्रकार सर्वरूपवाला हो जाता है । इसे इस प्रकार समझना चाहिये— ( १ ) चित्ततत्त्व या बुद्धितत्त्व जो कुछ कहिये - यह तीनों गुणोंका पहला और सात्त्विक परिणाम है । यह क्रियाशील, परिणामी और जड है किंतु सात्त्विक होनेके कारण स्फटिकमणिकी भाँति उज्ज्वल है; यह चित्तका अपना रूप है ।
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कवल्यपाद –४ १२ ९ ( २ ) इसके सामने जिस समय जैसा बाह्य पदार्थ आता है अर्थात् जिस पदार्थका सम्बन्ध होता है, उसके रंगमें रँगा हुआ यह तदाकार हो जाता है, इसलिये पदार्थके रूपमें प्रतीत होता है । ( ३ ) पुरुषके साथ सम्बन्ध होनेके कारण वह द्रष्टा चेतन पुरुषके रंगमें रँगा हुआ रहता है, इसलिये यह तदाकार हुआ चेतनके रूपमें प्रतीत होने लगता है । वास्तवमें चित्त उसमें प्रतिबिम्बित होनेवाले विषयोंसे और चेतन पुरुषसे सर्वथा भिन्न है तो भी भ्रान्तिसे उनके रूपमें प्रतीत होने लग जाता है । अतएव कई दर्शनकार तो चित्तको ही चेतन-द्रष्टा मानकर कहने लगते हैं कि चित्तसे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है और दूसरे यह कहते हैं कि चित्तसे अतिरिक्त ये दीखनेवाले गौ, घट आदि और उसके कारणरूप पंचभूत आदि पदार्थ भी कुछ नहीं हैं, चित्त ही सब रूप होकर दिखलायी देता है । परंतु यह भ्रम समाधिके द्वारा पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जानेपर नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥
सम्बन्ध— अब चित्तसे भिन्न द्रष्टा पुरुषकी सत्ताको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु बतलाते हैं-तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥ २४ ॥
तत् = वह ( चित्त ); असंख्येयवासनाभिः = असंख्येय वासनाओंसे; चित्रम् अपि - चित्रित होनेपर भी; परार्थम् = दूसरेके लिये है; संहत्यकारित्वात्-क्योंकि यह संहत्यकारी ( मिल - जुलकर कार्य करनेवाला ) है । व्याख्या - जो वस्तु बहुत पदार्थोंसे मिल - जुलकर कार्यमें समर्थ होती है; वह संहत्यकारी कहलाती है— जैसे मकान, भोजन आदि । ऐसी वस्तु अपनेसे भिन्न किसी दूसरेके लिये ही हुआ करती है, अपने लिये नहीं; अतः यह परार्थ कहलाती है । यह चित्त भी सत्त्व, रज और तम—– इन तीनों गुणोंके मिश्रणसे उत्पन्न है तथा बाह्य पदार्थ और इन्द्रियोंके संयोगसे उनसे मिल - जुलकर कार्य करनेमें समर्थ होता है;