श्रीगणेशाय नमः।

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 131–140

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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१३० पातञ्जलयोगदर्शन अतः यह अपने लिये नहीं है, द्रष्टा पुरुषके लिये है तथा उसीके भोग और अपवर्गका सम्पादन करनेके लिये यह नाना वासनाओंसे चित्रित है । भाव यह है कि यद्यपि चित्तमें ही सब बाह्य पदार्थोंके चित्र पड़ते हैं और वह अगणित वासनाओंसे रँगा हुआ है तो भी वह स्वयं - प्रकाश और द्रष्टा नहीं है; क्योंकि वह बाह्य पदार्थ और इन्द्रिय आदिसे मिल -जुलकर काम करनेवाला है, अतः दूसरेके लिये है ॥२४ ॥

सम्बन्ध — यहाँतक चित्त और आत्मा – इन दोनोंकी भिन्नताका युक्तियोंद्वारा प्रतिपादन किया; किन्तु युक्तियोंसे तो आत्माका स्वरूप सामान्यभावसे ही समझमें आता है, उसके स्वरूपका विशेष ज्ञान तो समाधिद्वारा ही हो सकता है । अतः समाधिम होनेवाले विवेकज्ञानद्वारा जब योगी आत्मस्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है, तब उसकी क्या पहचान है? यह बतलाते हैं-विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ २५ ॥

विशेषदर्शिनः = ( समाधिजनित विवेकज्ञानके द्वारा ) चित्त और आत्माके भेदको प्रत्यक्ष कर लेनेवाले ( योगी ) - की; आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः = आत्मभावविषयक भावना सर्वथा निवृत्त हो जाती है । व्याख्या - अपने स्वरूपको जाननेके लिये जो इस प्रकारके संकल्प होते हैं कि मैं कौन हूँ, कैसा हूँ — इत्यादि, इसका नाम आत्मभावभावना अर्थात् आत्मज्ञानके विषयका चिन्तन है । यह जबतक मनुष्यको आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता, तबतक ऊँचे से - ऊँचे साधकमें भी विद्यमान रहती है । परंतु जिसने विवेकज्ञानद्वारा इस भेदको भलीभाँति समझ लिया है कि शरीर और चित्त आदिसे आत्मा भिन्न है, जिसे अपने स्वरूपका संशयरहित प्रत्यक्ष अनुभव हो गया है, उसकी उपर्युक्त आत्मभावभावना सर्वथा मिट जाती है । यही उसकी पहचान है ॥ २५ ॥

सम्बन्ध — उस समय उस योगीके चित्तकी कैसी स्थिति रहती है? यह बतलाते हैं-

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कवल्यपाद –४ १३१ तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥ २६ ॥

तदा = उस समय ( योगीका ); चित्तम् = चित्त; विवेकनिम्नम् = विवेकमें झुका हुआ; कैवल्यप्राग्भारम् - कैवल्यके अभिमुख हो जाता है । व्याख्या – अज्ञान – अवस्थामें साधारण मनुष्योंका चित्त अज्ञानमें निमग्न और विषय - परायण अर्थात् विषयोंके अभिमुख रहता है । परंतु जब विवेकज्ञानका उदय हो जाता है, उस समय योगीका चित्त निःसार संसारके विषयोंकी ओर नहीं जाता, उनसे सर्वथा विरक्त हो जाता है और उस विवेकज्ञानमें निरन्तर बहता है तथा कैवल्य अभिमुख हो जाता है यानी अपने कारणमें विलीन होना आरम्भ कर देता है; क्योंकि चित्तका अपने कारणमें विलीन हो जाना और द्रष्टा - स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना - यही

कैवल्य है ( योग ० ४ । ३४ ) ॥ २६ ॥

सम्बन्ध— यदि योगीका चित्त विवेकज्ञानमें झुका हुआ रहता है तथा अपने कारणमें विलीन होने लगता है तो फिर व्युत्थान- अवस्थामें उसकी दूसरी वृत्तियाँ कैसी होती होंगी? इसपर कहते हैं-तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥

तच्छिद्रेषु = उस ( समाधि ) - के अन्तरालमें; प्रत्ययान्तराणि = दूसरे पदार्थोंका ज्ञान; संस्कारेभ्यः = पूर्वसंस्कारोंसे होता है । व्याख्या — विवेकज्ञानमें निमग्न हुए चित्तमें व्युत्थान- अवस्थाओंके समय जो अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका व्यवहार देखनेमें आता है, वह दग्ध - बीजके सदृश विद्यमान पूर्वसंस्कारोंसे देखनेमें आता है ॥२७ ॥

सम्बन्ध— उन संस्कारोंका सर्वथा नाश कब और कैसे होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं-हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥ २८ ॥

एषाम् = इन संस्कारोंका; हानम् - विनाश; क्लेशवत् = क्लेशोंकी भाँति; उक्तम् = कहा गया है । व्याख्या — दग्ध हुए बीजके सदृश जो सूक्ष्म क्लेश हैं, उनका

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१३२ पातञ्जलयोगदर्शन अभाव जैसे प्रतिप्रसवसे अर्थात् कारणमें कार्यके लयसे बतलाया है ( योग ० २। १० ), उसी प्रकार इनका भी समझ लेना चाहिये । जबतक किसी भी परिस्थितिमें चित्त वर्तमान है, तबतक संस्कारोंका सर्वथा नाश नहीं होता; उनका नाश तो चित्तके अपने कारण गुणोंमें विलीन होनेपर उसके साथ ही होता है, परंतु भूने हुए बीजके सदृश ज्ञानरूप अग्निसे जलाये हुए संस्कार विद्यमान रहकर भी पुनर्जन्मके हेतु नहीं बन सकते । अतः उनके कारण होनेवाला पदार्थोंका ज्ञान नये संस्कारोंका उत्पादक नहीं है ( योग ० ४ । ६ ) ॥ २८ ॥

सम्बन्ध— विवेकज्ञान प्राप्त होनेके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— प्रसंख्याने ऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः ॥ २ ९ ॥ प्रसंख्याने अपि अकुसीदस्य = जिस योगीका विवेकज्ञानकी महिमामें भी वैराग्य हो जाता है, उसका; सर्वथा विवेकख्याते: - विवेकज्ञान सर्वथा प्रकाशमान रहनेके कारण उसको; धर्ममेघः समाधिः = धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है । व्याख्या - जब विवेकज्ञान उदय होता है, तब योगीके चित्तमें अत्यन्त स्वच्छता आ जाती है, अतः उसमें विलक्षण शक्ति आ जाती है, उस समय योगी सर्वज्ञ हो जाता है ( योग ० ३ । ४ ९ ) । ऐसी सामर्थ्य प्राप्त होनेपर भी जो योगी उस सामर्थ्यका उपभोग नहीं करता, सर्वज्ञतारूप ऐश्वर्यमें आसक्त नहीं होता, उससे सर्वथा विरक्त हो जाता है, तब उसके विवेकज्ञानमें किसी प्रकारका अन्तराय ( विघ्न ) नहीं पड़ सकता, वह निरन्तर उदित ( प्रकाशमान ) रहता है, इसलिये, तत्काल ही उस योगीको धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है ॥ २ ९ ॥ सम्बन्ध— उस धर्ममेघ समाधिसे क्या होता है, इसपर कहते हैं— ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ३० ॥

ततः = उस ( धर्ममेघ समाधि ) - से; क्लेशकर्मनिवृत्तिः = क्लेश और कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है ।

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कवल्यपाद – ४ १३३ व्याख्या— उक्त प्रकारसे जब योगीकी धर्ममेघ समाधि सिद्ध हो जाती है, तब उस योगीके अविद्यादि पाँचों क्लेश तथा शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित – ऐसे तीनों प्रकारके कर्मसंस्कार समूल नष्ट हो जाते हैं । अतः वह योगी जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ ३० ॥

सम्बन्ध - उस समय योगीके ज्ञानका क्या स्वरूप होता है? यह बतलाते हैं-तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् ॥ ३१ ॥

तदा = उस समय; सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्य = जिसके सब प्रकारके परदे और मल हट चुके हैं, ऐसा ज्ञान; आनन्त्यात् = अनन्त ( सीमारहित ) हो जाता है, इस कारण; ज्ञेयम् अल्पम् = ज्ञेय पदार्थ अल्प हो जाते हैं । व्याख्या - विवेकज्ञानकी प्राप्तिके पहले ज्ञानको सीमाबद्ध करनेवाले जितने भी अविद्या आदि परदे रहते हैं एवं उसमें जितना भी कर्म - संस्काररूपमें संग्रह किया हुआ मल रहता है, वे सब - के-सब उपर्युक्त धर्ममेघ समाधिमें नष्ट हो जाते हैं । इस कारण योगीका ज्ञान अनन्त – सीमारहित हो जाता है, तब दुनियाके जितने भी ज्ञेय पदार्थ हैं, वे ऐसे अल्प हो आते हैं, जिस प्रकार आकाशमें जुगनू ( खद्योत ), उस समय उस सिद्ध और मुक्त योगीसे कोई भी तत्त्व अज्ञात नहीं रह सकता ॥३१ ॥

सम्बन्ध— यहाँ यह प्रश्न उठता है कि तीनों गुण परिणामशील हैं; अतः उनका परिणाम अवश्यम्भावी है, फिर वे योगीके लिये पुनर्जन्म देनेवाले क्यों नहीं होते, इसपर कहते हैं-ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥ ३२ ॥

ततः = उसके बाद; कृतार्थानाम् = अपने कामको पूरा कर चुकनेवाले; गुणानाम् = गुणोंके; परिणामक्रमसमाप्तिः = परिणामक्रम ( परिणामसम्बन्धी सिलसिलेकी ) समाप्ति हो जाती है । व्याख्या - जब योगीको धर्ममेघ समाधिकी प्राप्ति हो जाती है,

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१३४ पातञ्जलयोगदर्शन तब उसके लिये गुणोंका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता, उनका काम जो पुरुषको भोग और अपवर्ग देना है; पूरा हो जाता है, इस कारण उनका जो निरन्तर परिवर्तन होते रहनारूप परिणामक्रम है वह उस योगीके लिये समाप्त हो जाता है । अतः वे भावी शरीरका निर्माण नहीं कर सकते ॥ ३२ ॥

सम्बन्ध - प्रसंगवश क्रमका स्वरूप बतलाते हैं-क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥ ३३ ॥

क्षणप्रतियोगी = जो क्षणोंका प्रतियोगी है, ( और ); परिणामापरान्त - । निर्ग्राह्य: - जिसका स्वरूप परिणामके अन्तमें समझमें आता है, वह; क्रमः = क्रम है । व्याख्या — कोई भी वस्तु जब किसी एक रूपसे दूसरे रूपमें बदलती है या एक रूपमें रहती हुई भी पुरानी होती चली जाती है, तब वह उसका परिणाम किसी एक दिनमें, एक घड़ीमें या एक पलमें नहीं हो जाता; उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है, परंतु जाननेमें नहीं आता । उस वस्तुका दूसरा परिणाम पूर्ण होनेसे यह अनुमानद्वारा जाना जाता है कि यह एक साथ नहीं बदली है, क्रमसे बदलती रही है ( योग ० ३ । १५ और ५२ की टीकामें भी क्रमका वर्णन आया है ) । इस प्रकार क्रमका ज्ञान परिणामके अन्तमें होनेसे उसे यहाँ ' परिणामापरान्तनिर्ग्राह्य ' कहा है और प्रत्येक क्षणसे इसका सम्बन्ध है । एक क्षणके बाद दूसरा क्षण, उसके बाद तीसरा क्षण - इस तरह क्षणोंके प्रवाहमें जो पूर्वापरका ज्ञापक ( जाननेमें निमित्त ) है, उसीको ' क्रम ' कहते हैं । अतः इसको क्षणप्रतियोगी कहा गया है । क्षणप्रतियोगीका शब्दार्थ यह भी कहा जा सकता है कि जो क्षणोंका प्रतियोगी यानी विभाजक ( विभाग करनेवाला ) है, वह क्रम है ॥ ३३ ॥

सम्बन्ध— पहले बत्तीसवें सूत्रमें गुणोंके परिणामक्रमकी समाप्तिको कैवल्य नाम दिया गया है । उक्त कैवल्यके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस शास्त्रकी समाप्ति करते हैं-

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कवल्यपाद –४ १३५ पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ॥ ३४ ॥

पुरुषार्थशून्यानाम् = जिनका पुरुषके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहा, ऐसे; गुणानाम् = गुणोंका; प्रतिप्रसवः = अपने कारणमें विलीन हो जाना; कैवल्यम् = कैवल्य है; वा = अथवा; इति = यों कहिये कि; चितिशक्तेः = द्रष्टाका; स्वरूपप्रतिष्ठा = अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना ( कैवल्य ) है । व्याख्या - गुणोंकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गका सम्पादन करनेके लिये है । इसी कामको पूरा करनेके लिये वे बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा, मन, इन्द्रियों और शब्दादि विषयोंके आकारमें परिणत होते हैं । जिस पुरुषके लिये ये गुण भोग भुगताकर अपवर्ग ( मुक्ति ) सम्पादन कर देते हैं, उसके लिये उनका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता, तब वे अपने प्रयोजनको पूरा कर चुकनेवाले कार्य और कारणरूपमें विभक्त हुए गुण प्रतिलोमपरिणामको प्राप्त होकर अपने कारणमें विलीन हो जाते हैं, यही गुणोंका कैवल्य अर्थात् पुरुषसे अलग हो जाना और उन गुणोंके साथ पुरुषका जो अनादिसिद्ध अविद्याकृत संयोग था, उसका अभाव हो जानेपर अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना, यह पुरुषका कैवल्य अर्थात् प्रकृतिसे सर्वथा

अलग हो जाना है ( योग ० २ । २५ ) ॥ ३४ ॥

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पातञ्जलयोगदर्शनकी वर्णानुक्रमणिका पाद सूत्र पृष्ठ [ अ ] अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् अथ योगानुशासनम् अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्म-ख्यातिरविद्या अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः [ ई ] ईश्वरप्रणिधानाद्वा [ उ ] उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग [ ऋ ] ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा [ ए ] एकसमये चोभयानवधारणम् उत्क्रान्तिश्च एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ४ १२ १२२ १ १ ११ २ ५ ४७ १ ११ १७ २ ३ ९ ६ ९ १ १० १६ १ १२ १८ २ ३ ४४ २ ४ ४६ २ ३७ ६८ २ ३५ ६७ २ ३० ६३ १ २३ २५ ३ ३ ९ १०१ १ ४८ ४० ४ २० १२६ १ ४४ ३७ ३ १३ ८४

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( १३७ ) [ क ] कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुः-प्रकाशासम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमा-पत्तेश्चाकाशगमनम् कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः [ T ] ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः [ च ] चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसंगः स्मृतिसंकरश्च चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धि-संवेदनम् [ ज ] जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानान्तर्यं स्मृति-संस्कारयोरेकरूपत्वात् पाद ३ ४ ३ ३ ३ २ ३ २ २ ३ ४ ३ ३ ४ ४ ४

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( १३८ ) पाद जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् २ जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् [ त ] तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः तज्जपस्तदर्थभावनम् तज्जयात्प्रज्ञालोकः तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्त-स्यैकाग्रतापरिणामः ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मा-नभिघातश्च ततो द्वन्द्वानभिघातः ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः तत्र प्रत्ययैकतानताध्यानम् तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः तत्र ध्यानजमनाशयम् तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ३ ४ ४ १ ३ १ ४ ४ २ ३ १ ३ ४ २ ३ २ ३ १ १ ... ३ ... १ ४ १ १

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( १३ ९ ) तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्य-कारित्वात् तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेय -मल्पम् तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः पाद २ ३ २ ४ १ ४ ४ ४ ३ ३ २ तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः २ तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् तस्य भूमिषु विनियोगः तस्य वाचकः प्रणवः तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा तस्य हेतुरविद्या तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ता एव सबीजः समाधिः तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् तीव्रसंवेगानामासन्नः ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ३ ३ १ २ २ १ १ ३ ४ १ २ २ ४ ... ३