श्रीगणेशाय नमः।
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 31–40
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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३० पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध - इनके साथ - साथ होनेवाले दूसरे विघ्नोंका वर्णन करते हैं— दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥३१ ॥
दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासाः दुःख, दौर्मनस्य, अंगमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास – ये पाँच विघ्न, विक्षेपसहभुवः - विक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले हैं । व्याख्या — उपर्युक्त चित्तविक्षेपोंके साथ - साथ होनेवाले दूसरे पाँच विघ्न इस प्रकार हैं-( १ ) दुःख - आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक - इस तरह दुःखके प्रधानतया तीन भेद माने गये हैं । काम - क्रोधादिके कारण व्याधि आदिके कारण या इन्द्रियोंमें किसी प्रकारकी विकलता होनेके कारण जो मन, इन्द्रिय या शरीरमें ताप या पीड़ा होती है, उसको ' आध्यात्मिक दुःख ' कहते हैं । मनुष्य, पशु, पक्षी, सिंह, व्याघ्र, मच्छर और अन्यान्य जीवोंके कारण होनेवाली पीड़ाका नाम ' आधिभौतिक दुःख ' है तथा सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूकम्प आदि दैवी घटनासे होनेवाली पीड़ाका नाम ' आधिदैविक दुःख ' है । ( २ ) दौर्मनस्य – इच्छाकी पूर्ति न होनेपर जो मनमें क्षोभ होता है, उसे ' दौर्मनस्य ' कहते हैं । ( ३ ) अङ्गमेजयत्व – शरीरके अंगोंमें कम्प होना, ' अंग - मेजयत्व ' है । ( ४ ) श्वास — बिना इच्छाके बाहरकी वायुका भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात् बाहरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना ' श्वास ' है । ( ५ ) प्रश्वास - बिना इच्छाके ही भीतरकी वायुका बाहर निकल जाना अर्थात् भीतरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना ‘ प्रश्वास ' है । ये पाँचों विक्षिप्त चित्तमें ही होते हैं, समाहित चित्तमें नहीं; इसलिये इनको ' विक्षेपसहभू ' कहते हैं ॥ ३१ ॥
सम्बन्ध - उक्त विघ्नोंको दूर करनेका दूसरा उपाय बतलाते हैं-
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समाधिपाद –१ ३१ तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ ३२ ॥
तत्प्रतिषेधार्थम् = उनको दूर करनेके लिये; एकतत्त्वाभ्यासः = एकतत्त्वका अभ्यास ( करना चाहिये ) । व्याख्या - उपर्युक्त दोनों प्रकारके विघ्नोंका नाश ईश्वर - प्रणिधानसे तो होता ही है, उसके सिवा यह दूसरा उपाय बतलाया गया है । भाव यह कि किसी एक वस्तुमें चित्तको स्थित करनेका बार - बार प्रयत्न करनेसे भी एकाग्रता उत्पन्न होकर विघ्नोंका नाश हो जाता है; अतः यह साधन भी किया जा सकता है ॥ ३२ ॥
सम्बन्धचित्तके अन्तरालमें राग - द्वेषादि मल रहनेके कारण मलिन चित्त स्थिर नहीं होता, अतः चित्तको निर्मल बनानेका सुगम उपाय बतलाते हैं— मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ ३३ ॥
सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणाम् = सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्मा— ये चारों जिनके क्रमसे विषय हैं, ऐसी; मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणाम् - मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षाकी; भावनातः = भावनासे; चित्तप्रसादनम् - चित्त स्वच्छ हो जाता है । व्याख्या - सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना करनेसे, दुःखी मनुष्यों में दयाकी भावना करनेसे, पुण्यात्मा पुरुषोंमें प्रसन्नताकी भावना करनेसे और पापियोंमें उपेक्षाकी भावना करनेसे चित्तके राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलोंका नाश होकर चित्त शुद्ध - निर्मल हो जाता है । अतः साधकको इसका अभ्यास करना चाहिये ॥ ३३ ॥
सम्बन्ध - - 7 चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं— प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ ३४ ॥
वा = अथवा; प्राणस्य = प्राणवायुको; प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम् = बारम्बार बाहर निकालने और रोकनेके अभ्याससे भी ( चित्त निर्मल होता है ) ।
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३२ पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या — बारम्बार प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालनेका तथा यथाशक्ति बाहर रोके रखनेका अभ्यास करनेसे मनमें निर्मलता आती है, इससे शरीरकी नाड़ियोंका भी मल नष्ट होता है ॥ ३४ ॥
सम्बन्ध — प्रसंगवश चित्तकी निर्मलताके उपाय बतलाकर, अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य साधन बतलाते हैं— विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ ३५ ॥
विषयवती = विषयवाली; प्रवृत्तिः = प्रवृत्ति; उत्पन्ना = उत्पन्न होकर वह; वा = भी; मनसः = मनकी; स्थितिनिबन्धनी- स्थितिको बाँधनेवाली हो जाती है । व्याख्या - अभ्यास करते - करते साधकको दिव्य विषयोंका साक्षात् हो जाता है, उन दिव्य विषयोंका अनुभव करनेवाली वृत्तिका नाम विषयवती प्रवृत्ति है ( योग ० ३ । ३६ ) । ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न होनेसे साधकका योगमार्गमें विश्वास और उत्साह बढ़ जाता है, इस कारण यह आत्मचिन्तनके अभ्यासमें भी मनको स्थिर करनेमें हेतु बन जाती है ॥ ३५ ॥
सम्बन्ध - इसी प्रकारका और भी उपाय बतलाते हैं-विशोका वा ज्योतिष्मती ॥ ३६ ॥
वा = इसके सिवा [ यदि ]; विशोका = शोकरहित; ज्योतिष्मती = । ज्योतिष्मती प्रवृत्ति [ उत्पन्न हो जाय तो वह ] भी मनकी स्थिति करनेवाली होती है । व्याख्या - अभ्यास करते - करते साधकको यदि शोकरहित प्रकाशमय प्रवृत्तिका अनुभव हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है ॥३६ ॥
सम्बन्ध - अब चित्तकी स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं-
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समाधिपाद –१ ३३ वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७ ॥
वीतरागविषयम् = वीतरागको विषय करनेवाला; चित्तम् - चित्त; वा = भी [ स्थिर हो जाता है ] । व्याख्या — जिस पुरुषके राग - द्वेष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विरक्त पुरुषको ध्येय बनाकर अभ्यास करनेवाला अर्थात् उसके विरक्त भावका मनन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो जाता है ॥ ३७ ॥
सम्बन्ध - और भी अन्य उपाय बतलाते हैं-स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥ ३८ ॥
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनम् = स्वप्न और निद्राके ज्ञानका अवलम्बन करनेवाला चित्त; वा = भी [ स्थिर हो सकता है ] । व्याख्या – स्वप्नमें कोई अलौकिक अनुभव हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका दर्शन आदि, तो उसको स्मरण करके वैसा ही चिन्तन करनेसे मन स्थिर हो जाता है तथा गाढ़ निद्रामें केवल चित्तकी वृत्तियोंके अभावका ही ज्ञान रहता है, किसी भी पदार्थकी प्रतीति नहीं होती, उसी प्रकार समस्त वृत्तियोंका बाध करके वृत्तियोंके अभावके ज्ञानका अवलम्बन करनेसे अर्थात् उसीको लक्ष्य बनाकर अभ्यास करनेसे भी अनायास ही चित्त स्थिर हो सकता है । जिस कालमें तमोगुणका आविर्भाव होता है; उस समय ' यह अभ्यास नहीं करना चाहिये । ' जिस समय चित्त और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस समय यह साधन अधिक लाभप्रद हो सकता है ॥ ३८ ॥
सम्बन्ध - मनुष्योंकी रुचि भिन्न - भिन्न होती है; अतः अब सर्वसाधारणके उपयोगी साधनका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ ३ ९ ॥ यथाभिमतध्यानात् - जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यानसे; वा = भी [ मन स्थिर हो जाता है ] ।
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३४ पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या — उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई साधन किसी साधकके अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करना चाहिये । अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करनेसे मन स्थिर हो जाता है ॥३ ९ ॥ सम्बन्ध - चित्तकी स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि चित्तम जब स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जाती है, तब उसकी कैसी स्थिति होती है-परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥
( उस समय ) अस्य = इसका; परमाणुपरममहत्त्वान्तः = परमाणुसे लेकर परम महत्त्वतक; वशीकारः = वशीकार ( हो जाता है ) । व्याख्या - अभ्यास करते - करते जब साधकका चित्त भलीभाँति स्थितिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है; उस समय साधक अपने चित्तको सूक्ष्म- - से- सूक्ष्म पदार्थोंसे लेकर बड़े - से - बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है । उसका अपने चित्तपर पूर्ण अधिकार हो जाता है । चित्तमें स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जानेकी
पहचान भी यही है ( गीता ६ । १ ९ ) ॥ ४० ॥
सम्बन्ध — पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब साधकका अपने चित्तपर अधिकार हो जाता है और चित्त अत्यन्त निर्मल होकर उसमें समाधिकी योग्यता आ जाती है, इसके बाद किस प्रकार क्रमसे सम्प्रज्ञात निर्बीजसमाधि सिद्ध होती है, उसका वर्णन आरम्भ करते हैं-क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥ ४१ ॥
क्षीणवृत्तेः - जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे; मणेः इव अभिजातस्य = स्फटिकमणिकी भाँति निर्मल चित्तका; ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु = जो ग्रहीता ( पुरुष ), ग्रहण ( अन्तःकरण और इन्द्रियाँ ) तथा ग्राह्य ( पंचभूत और विषयों ) - में; तत्स्थतदञ्जनता = स्थित हो जाना और तदाकार हो जाना है, यही; समापत्तिः = सम्प्रज्ञात समाधि है ।
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समाधिपाद – १ ३५ व्याख्या - – पूर्वोक्त अभ्यास करते - करते जब साधकका चित्त स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति निर्मल हो जाता है, जब उसकी ध्येयसे अतिरिक्त बाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय साधक इन्द्रियोंके स्थूल या सूक्ष्म विषयोंको ( योग ० ३ । ४४ ), या अन्त: करण और इन्द्रियोंको ( योग ० ३ । ४७ ) अथवा बुद्धिस्थ पुरुषको ( योग ० ३ । ४ ९ ) — जिस किसी भी ध्येयको लक्ष्य बनाकर उसमें अपने चित्तको लगाता है । तो वह चित्त उस ध्येय वस्तुमें स्थित होकर तदाकार हो जाता है । इसीको सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं, क्योंकि इस समाधिमें साधकको ध्येय वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है, उसके विषयमें किसी प्रकारका संशय या भ्रम नहीं रहता है । सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें न तो आनन्दानुगत समाधिकी चर्चा की है, न ग्रहण या इन्द्रियानुगतकी और न अस्मिता या पुरुषानुगतकी, इस कारण यद्यपि यह विषय स्पष्ट नहीं होता, परंतु सूक्ष्म विषयकी हद अलिंगपर्यन्त बतला दी, इससे मन, इन्द्रियाँ और अस्मिताका उसीमें अन्तर्भाव माना जा सकता है । सम्भव है, इसीसे उन्होंने इन्द्रियानुगत और अस्मितानुगत समाधिके भेदोंका अलग वर्णन न किया हो; क्योंकि तीसरे पादके ४४ वें, ४७ वें और ४ ९ वें सूत्रमें जहाँ ग्राह्यविषयक, ग्रहणविषयक और ग्रहीतृविषयक संयमका फल बताया है, वहाँ ग्राह्यके सूक्ष्मरूपमें तन्मात्राओंको और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें अस्मिताको ले लिया है । आनन्द भी मनका ग्राह्य विषय होनेके कारण इसको भी सूक्ष्म ग्राह्यविषयक समाधिके ही अन्तर्गत माना जा सकता है ।२ १ - इसी समाधिका वर्णन पहले सत्रहवें सूत्रमें भी आया है, वहाँ वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता - इन चारोंके सम्बन्धसे होनेवाले योगको सम्प्रज्ञात बतलाया है । २ - कुछ टीकाकारोंका कहना है कि वितर्क और विचारके स्थानपर तो यहाँ ' ग्राह्य ' शब्द है, आनन्दकी जगह ' ग्रहण ' शब्द है और अस्मिताकी जगह ' ग्रहीता ' शब्द है । दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता करनेके लिये उन लोगोंने उस सूत्रकी टीकामें आनन्दका अर्थ इन्द्रियाँ किया है और इस सूत्रमें ' ग्रहीता ' का अर्थ अस्मिता किया है, किन्तु व्यासभाष्यमें ऐसा नहीं किया गया है । उन्होंने वहाँ आनन्दका अर्थ आह्लाद और यहाँ ' ग्रहीता ' का अर्थ साधारण पुरुष और मुक्त पुरुष - इस प्रकार किया है ।
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३६ पातञ्जलयोगदर्शन अतः यहाँ यह मानना उचित मालूम होता है कि आकाशादि पंच महाभूत और उनका कार्य तो स्थूल ग्राह्य विषय है तथा तन्मात्रा और उनका सूक्ष्म कार्य सूक्ष्म ग्राह्य विषय है । इन्द्रियाँ और अन्त: - करण ग्रहणविषयक समाधिके अन्तर्गत हैं, वे ग्राह्यविषयक समाधिमें तो नहीं आते; परन्तु सूक्ष्म विषयकी हद अलिंगपर्यन्त बतला देनेसे ग्रहणविषयक समाधिका भी विचारानुगत समाधिमें ही अन्तर्भाव हो जाता है । इसी प्रकार आनन्द नाम आह्लादका है । यह प्रकृति और पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला और मनके द्वारा ग्राह्य है । अत: वह सूक्ष्म विषयके अन्तर्गत आ जानेके कारण उसका ग्राह्य - समाधिमें अन्तर्भाव है एवं यहाँ जो ग्रहीतृविषयक समाधि बतायी गयी है, वह भी तीसरे पादके पैंतीसवें सूत्रके अनुसार प्रकृति - पुरुषके संयोग- कालमें ही पुरुषके स्वरूपमें की जाती है । अतः वह अस्मितानुगत समाधि है, यह समझना चाहिये; क्योंकि उसका फल उसी सूत्रमें पुरुषका ज्ञान बतलाया गया है ॥ ४१ ॥
सम्बन्ध— सामान्यरूपसे सम्प्रज्ञातसमाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका वर्णन करते हैं— तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥ ४२ ॥
तत्र = उनमें; शब्दार्थज्ञानविकल्पैः = शब्द, अर्थ, ज्ञान – इन तीनोंके विकल्पोंसे; संकीर्णा = संकीर्ण - मिली हुई; समापत्तिः = समाधि; सवितर्का = सवितर्क है । व्याख्या - ग्राह्य यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेमें आनेवाले पदार्थ दो प्रकारके होते हैं – ( १ ) स्थूल, ( २ ) सूक्ष्म । इनमें से किसी एक स्थूल पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब योगी अपने चित्तको उसमें लगाता है, तब पहले - - पहल होनेवाले अनुभवमें उस वस्तुके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंका मिश्रण रहता है । अर्थात् उसके स्वरूपके साथ - साथ उसके नाम और प्रतीतिकी भी
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समाधिपाद –१ ३७ चित्तमें स्फुरणा रहती है । अतः इस समाधिको सवितर्क समाधि कहते हैं । इसीका दूसरा नाम सविकल्प योग भी है ॥ ४२ ॥
सम्बन्ध - इसके बाद-स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥ ४३ ॥
स्मृतिपरिशुद्धौ = ( शब्द और प्रतीतिकी ) स्मृतिके भलीभाँति लुप्त हो जानेपर; स्वरूपशून्या = अपने रूपसे शून्य हुईके; इव = सदृश; अर्थमात्रनिर्भासा = केवल ध्येयमात्रके स्वरूपको प्रत्यक्ष करानेवाली ( चित्तकी स्थिति ही ); निर्वितर्का - निर्वितर्क समाधि है । व्याख्या - पहले बतलायी हुई स्थितिके बाद जब साधकके चित्तमें ध्येय वस्तुके नामकी स्मृति लुप्त हो जाती है और उसको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका भी स्मरण नहीं रहता, तब अपने ( चित्तके ) स्वरूपका भी भान न रहनेके कारण उसके स्वरूपके अभावकी - सी स्थिति हो जाती है, उस समय सब प्रकारके विकल्पोंका अभाव हो जानेके कारण केवल ध्येय पदार्थके साथ तदाकार हुआ चित्त ध्येयको प्रकाशित करता है, उस अवस्थाका नाम ' निर्वितर्क ' समाधि है । इसमें शब्द और प्रतीतिका कोई विकल्प नहीं रहता, अतः इसे ' निर्विकल्प ' समाधि भी कहते हैं ॥४३ ॥
सम्बन्ध - इस प्रकार स्थूल- ध्येय पदार्थों में होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिका भेद बतलाकर अब सूक्ष्म ध्येयमें होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिके भेद बतलाते हैं— एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥ ४४ ॥
एतया एव = इसीसे ( पूर्वोक्त सवितर्क और निर्वितर्कके वर्णनसे ही ); सूक्ष्मविषया = सूक्ष्म पदार्थोंमें की जानेवाली; सविचारा - सविचार ( और ); निर्विचारा = निर्विचार समाधिका; च = भी; व्याख्याता = वर्णन किया गया ।
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३८ पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या - जिस प्रकार स्थूल - ध्येय पदार्थोंमें की जानेवाली समाधिके दो भेद हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म - ध्येय पदार्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाली समाधिके भी दो भेद समझ लेने चाहिये अर्थात् जब किसी सूक्ष्म ध्येय पदार्थके स्वरूपका यथार्थ स्वरूप जाननेके लिये उसमें चित्तको स्थिर किया जाता है, तब पहले उसके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंसे मिला हुआ अनुभव होता है, वह स्थिति सविचार समाधि है और उसके बाद जब नामका और ज्ञानका अर्थात् चित्तके निज स्वरूपका भी विस्मरण होकर केवल ध्येय पदार्थका ही अनुभव होता है, वह स्थिति निर्विचार समाधि है ॥४४ ॥
सम्बन्ध— अब सूक्ष्म पदार्थोंमें किन - किनकी गणना है, यह स्पष्ट करते हैं-सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ ४५ ॥
च = तथा; सूक्ष्मविषयत्वम् = सूक्ष्मविषयता; अलिङ्गपर्यवसानम् = प्रकृतिपर्यन्त है । व्याख्या - पृथ्वीका सूक्ष्म विषय गन्धतन्मात्रा, जलका रसतन्मात्रा, तेजका रूपतन्मात्रा, वायुका स्पर्शतन्मात्रा और आकाशका शब्दतन्मात्रा है एवं उन सबका और मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्म विषय अहंकार, अहंकारका महत्तत्त्व और महत्तत्त्वका सूक्ष्म विषय यानी कारण प्रकृति है । उससे आगे कोई सूक्ष्म पदार्थ नहीं है; वही सूक्ष्मताकी अवधि है । अतः प्रकृतिपर्यन्त किसी भी सूक्ष्म पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसमें की हुई समाधिको सविचार और निर्विचार समाधिके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये । यद्यपि पुरुष प्रकृतिसे भी सूक्ष्म है, पर वह दृश्य पदार्थोंमें नहीं है, अतः तद्विषयक समाधि इसमें नहीं आनी चाहिये; तथापि ग्रहीतृविषयक समाधि बुद्धिमें प्रतिबिम्बित पुरुषमें की जाती है ( योग ० ३।३५ ) । अतः उसको निर्विचार समाधिके अन्तर्गत मान लेनेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती; क्योंकि कठोपनिषद् ( १ । ३ । १० ) में जीवात्मासे प्रकृतिको ‘ पर ' कहा गया है । इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म विषयकी सीमा प्रकृतिपर्यन्त बतला
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समाधिपाद – १ ३ ९ देनेके कारण मन, इन्द्रियाँ तथा आनन्द और अस्मिताका उसमें अन्तर्भाव प्रतीत होता है; फिर सत्रहवें सूत्रमें कहे हुए आनन्द और अस्मिताको और इकतालीसवें सूत्रमें ग्रहण नामसे कहे हुए मन और इन्द्रियोंको और ग्रहीता नामसे कहे हुए प्रकृतिस्थ पुरुषको टीकाकारोंने ' विचार ' शब्दवाच्य सूक्ष्म विषयसे अलग कैसे कहा — और सूत्रकारोंने तद्विषयक समाधिके भेदोंका वर्णन क्यों नहीं किया, यह विचारणीय है ॥ ४५ ॥
सम्बन्ध — इकतालीसवें सूत्रसे पैंतालीसवेंतक सम्प्रज्ञातसमाधिका भेद बतलाकर अब उन सब प्रकारकी समाधियोंका सहेतुक दूसरा नाम बतलाते हैं— ता एव सबीजः समाधिः ॥ ४६ ॥
ता एव = वे सब - की - सब ही; सबीज: - सबीज; समाधिः = समाधि हैं । व्याख्या - निर्वितर्क और निर्विचार समाधियाँ निर्विकल्प होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं, ये सब - की - सब सबीज समाधि ही हैं; क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी - न - किसी ध्येय पदार्थको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका अस्तित्व - सा रहता है । अतः सम्पूर्ण वृत्तियोंका पूर्णतया निरोध न होनेके कारण इन समाधियोंमें पुरुषको कैवल्य - अवस्थाका लाभ नहीं होता ॥ ४६ ॥
सम्बन्ध— उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे निर्विचार समाधि ही सबसे श्रेष्ठ है, यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष अवस्थाका फलसहित वर्णन करते हैं-निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥ ४७ ॥
निर्विचारवैशारद्ये = निर्विचार समाधि अत्यन्त निर्मल होनेपर ( योगीको ); अध्यात्मप्रसादः = अध्यात्मप्रसाद प्राप्त होता है । व्याख्या - निर्विचार समाधिके अभ्याससे जब योगीके चित्तकी स्थिति सर्वथा परिपक्व हो जाती है, उसकी समाधि - स्थितिमें किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी दोष नहीं रहता ( योग ० १ । ४० ) ।