श्रीगणेशाय नमः।
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 41–50
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50
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४० पातञ्जलयोगदर्शन उस समय योगीकी बुद्धि अत्यन्त स्वच्छ - निर्मल हो जाती है
( योग ० ३ । ५ ) ॥ ४७ ॥
सम्बन्ध - अतः -ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥ ४८ ॥
तत्र = उस समय ( योगीकी ); प्रज्ञा = बुद्धि; ऋतम्भरा = ऋतम्भरा होती है । व्याख्या — उस अवस्थामें योगीकी बुद्धि वस्तुके सत्य ( असली ) स्वरूपको ग्रहण करनेवाली होती है; उसमें संशय और भ्रमका लेश भी नहीं रहता ॥ ४८ ॥
सम्बन्ध — उक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाकी विशेषताका वर्णन करते हैं— श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ ४ ९ ॥ श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्याम् = श्रवण और अनुमानसे होनेवाली बुद्धिकी अपेक्षा; अन्यविषया = इस बुद्धिका विषय भिन्न है; विशेषार्थत्वात् = क्योंकि यह विशेष अर्थवाली है । व्याख्या — वेद, शास्त्र और आप्त पुरुषके वचनोंसे वस्तुका सामान्य ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं होता । इसी प्रकार अनुमानसे भी साधारण ज्ञान ही होता है । बहुत - से सूक्ष्म पदार्थोंमें तो अनुमानकी पहुँच ही नहीं है । अतः वेद - शास्त्रोंमें किसी वस्तुके स्वरूपका वर्णन सुननेसे जो तद्विषयक निश्चय होता है, वह श्रुतबुद्धि है; इसी प्रकार अनुमान ( युक्ति ) प्रमाणसे जो वस्तुके स्वरूपका निश्चय होता है, वह अनुमानबुद्धि है । ये दोनों प्रकारकी बुद्धि - वृत्तियाँ वस्तुके स्वरूपको सामान्यरूपसे ही विषय करती हैं, उसके अंग - प्रत्यंगोंसहित उसका पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता; किंतु ऋतम्भरा प्रज्ञासे वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण ( अंग - प्रत्यंगों सहित ) ज्ञान हो जाता है । अतः यह उन दोनों प्रकारकी बुद्धियोंसे भिन्न और अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥४ ९ ॥
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समाधिपाद – १ ४१ सम्बन्ध - इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका और भी महत्त्व बतलाते हैं-तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥ ५० ॥
तज्जः = उससे उत्पन्न होनेवाला; संस्कारः - संस्कार; अन्यसंस्कार -प्रतिबन्धी = दूसरे संस्कारोंका बाध करनेवाला होता है । व्याख्या— मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका अनुभव करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके संस्कार अन्तःकरणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको योगशास्त्रमें कर्माशय ( योग ० २ । १२ ) के नामसे कहा है । ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य कारण हैं ( योग ० २ । १३ ); इनके नाशसे ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है । अतः उक्त बुद्धिका महत्त्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि इस बुद्धिके प्रकट होनेपर जब मनुष्यको प्रकृतिके यथार्थ रूपका भान हो जाता है; तब उसका प्रकृतिमें और उसके कार्योंमें स्वभावसे ही वैराग्य हो जाता है । उस वैराग्यके संस्कार पूर्व इकट्ठे हुए सब प्रकारके राग - द्वेषमय संस्कारोंका नाश कर डालते हैं ( योग ० २।२६; ३।४ ९ -५० ), इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है ॥५० ॥
सम्बन्ध - अब निर्बीज - समाधिरूप कैवल्य - अवस्थाका वर्णन करते हुए इस पादकी समाप्ति करते हैं-तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥ ५१ ॥
तस्य = उसका; अपि = भी; निरोधे = निरोध हो जानेपर; सर्वनिरोधात् = सबका निरोध हो जानेके कारण; निर्बीज: - निर्बीज; समाधिः = समाधि ( हो जाती है ) । व्याख्या - जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित संस्कारके प्रभावसे अन्य सब प्रकारके संस्कारोंका अभाव हो जाता है, उसके बाद उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारोंमें भी आसक्ति न रहनेके कारण उनका भी निरोध हो जाता है । उनका निरोध होते ही समस्त संस्कारोंका
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पातञ्जलयोगदर्शन अपने - आप हो जाता है । अतः संस्कारके बीजका
हो जानेसे इस अवस्थाका नाम निर्बीजसमाधि है ।
- अवस्था भी कहते हैं ( योग ० ३ । ५० ) ॥ ५१ ॥
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ साधनपाद –२ सम्बन्ध— पहले पादमें योगका स्वरूप, उसके भेद और उसके फलका संक्षेपम वर्णन किया गया । साथ ही उसके उपायभूत अभ्यास और वैराग्यका तथा ईश्वरप्रणिधान आदि दूसरे साधनोंका भी वर्णन किया गया, किंतु उसमें बतलायी हुई रीतिसे निर्बीज -समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है, जिसका अन्तःकरण स्वभावसे ही शुद्ध है एव जो योगसाधनामें तत्पर है । अत: अब साधारण साधकोंके लिये क्रमशः अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक निर्बीजसमाधि प्राप्त करनेका उपाय बतलानेके लिये साधनपाद नामक दूसरे पादका आरम्भ किया जाता है-तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ १ ॥
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि = तप - स्वाध्याय और ईश्वर - शरणागति-ये तीनों; क्रियायोगः -क्रियायोग हैं । व्याख्या – ( १ ) तप- अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यताके अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक - से - अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना – इसका नाम ' तप ' है । व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं । निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है, यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अंग है । ( २ ) स्वाध्याय - जिनसे अपने कर्तव्य - अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषोंके लेख आदिका पठन - पाठन और भगवान्के ॐ कार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना ' स्वाध्याय ' है । इसके सिवा अपने जीवनके अध्ययनका नाम भी स्वाध्याय है । अतः साधकको प्राप्त विवेकके द्वारा अपने दोषोंको खोजकर निकालते रहना चाहिये ।
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४४ पातञ्जलयोगदर्शन ( ३ ) ईश्वर - प्रणिधान – ईश्वरके शरणापन्न हो जानेका नाम ' ईश्वर -प्रणिधान ' है । उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मोंको भगवान् के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना - ये सभी ईश्वर - प्रणिधानके अंग हैं । यद्यपि तप, स्वाध्याय और ईश्वर - प्रणिधान - ये तीनों ही यम, नियम आदि योगके अंगोंमें नियमोंके अन्तर्गत आ जाते हैं तथापि इन तीनों साधनोंका विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग वर्णन किया गया है ॥ १ ॥
सम्बन्ध - उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं-समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ २ ॥
समाधिभावनार्थः- ( यह क्रियायोग ) समाधिकी सिद्धि करनेवाला; च = और; क्लेशतनूकरणार्थ: - अविद्यादि क्लेशोंको क्षीण करनेवाला है । व्याख्या - उपर्युक्त क्रियायोग अविद्यादि दोषोंको क्षीण करनेवाला और समाधिकी सिद्धि करनेवाला है अर्थात् इसके साधनसे साधकके अविद्यादि क्लेशोंका क्षय होकर उसको कैवल्य - अवस्थातक समाधिकी प्राप्ति हो सकती है ॥२ ॥
सम्बन्ध - दूसरे सूत्रमें क्रियायोगका फल समाधिसिद्धि और क्लेशोंका क्षय बतलाया गया, उनमेंसे समाधिके लक्षण और फलका वर्णन तो पहले पादमें हो चुका है, परंतु क्लेश कितने हैं, उनके नाम क्या हैं, वे किस - किस अवस्थामें रहते हैं, उनका क्षय कैसे होता है और उनका नाश क्यों करना चाहिये - इन सब बातोंका वर्णन नही हुआ । अतः प्रसंगानुसार इस प्रकरणका आरम्भ करते हैं— अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३ ॥
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: = अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ( ये पाँचों ); क्लेशाः = क्लेश हैं ।
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साधनपाद - २ ४५ व्याख्या - ये अविद्यादि पाँचों ही जीवमात्रको संसारचक्रमें घुमानेवाले महादुःखदायक हैं । इस कारण सूत्रकारने इनका नाम ' क्लेश ' रखा है । कितने ही टीकाकारोंका तो कहना है कि ये पाँचों क्लेश ही पाँच प्रकारका विपर्ययज्ञान है । कुछ इनमेंसे केवल अविद्या और विपर्ययवृत्तिकी ही एकता करते हैं; किंतु ये दोनों ही बातें युक्तिसंगत नहीं मालूम होतीं; क्योंकि प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्तिका अभाव है, पर अविद्यादि पाँचों क्लेश वहाँ भी विद्यमान रहते हैं । ऋतम्भरा प्रज्ञामें विपर्ययका लेश भी नहीं स्वीकार किया जा सकता, परंतु जिस अविद्यारूप क्लेशको द्रष्टा और दृश्यके संयोगका हेतु माना गया है, वह तो वहाँ भी रहता ही है, अन्यथा संयोगके अभावसे हेयका नाश होकर साधकको उसी क्षण कैवल्य - अवस्थाकी प्राप्ति हो जानी चाहिये थी । इसके सिवा एक बात और भी है । इस ग्रन्थमें कैवल्य - स्थितिको प्राप्त सिद्ध योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण अर्थात् पुण्य - पापके संस्कारोंसे रहित माने गये हैं । ( योग ० ४।७ ), इससे यह सिद्ध होता है कि जीवन्मुक्त योगीद्वारा भी कर्म अवश्य किये जाते हैं । तब यह भी मानना पड़ेगा कि व्युत्थान- अवस्थामें जब वह कर्म करता है तो विपर्ययवृत्तिका प्रादुर्भाव भी स्वाभाविक होता है; क्योंकि पाँचों ही वृत्तियाँ चित्तका धर्म हैं और व्युत्थान- अवस्थामें चित्त विद्यमान रहता है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा । किंतु जीवन्मुक्त योगीमें अविद्या भी रहती है, यह नहीं माना जा सकता, क्योंकि यदि अविद्या वर्तमान है तो वह जीवन्मुक्त ही कैसा; इसी तरह और भी बहुत - से कारण हैं ( देखिये योग ० १।८ की टीका ), जिनसे विपर्यय और अविद्याकी एकता माननेमें सिद्धान्तकी हानि होती है । अतः विद्वान् सज्जनोंको इसपर विचार करना चाहिये ॥ ३ ॥
सम्बन्ध - अब क्लेशोंकी अवस्थाके भेद बतलाते हुए यह बात कहते हैं कि इन सबका मूल कारण अविद्यारूप क्लेश है-
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४६ पातञ्जलयोगदर्शन अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥ ४ ॥
प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् = जो प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार - ( इस प्रकार चार ) अवस्थाओंमें ( वर्तमान ) रहनेवाले हैं । एवं; उत्तरेषाम् = जिनका वर्णन ( तीसरे सूत्रमें ) अविद्याके बाद किया गया है, उन ( अस्मितादि चारों क्लेशों ) - का; क्षेत्रम् = कारण; अविद्या = अविद्या है । व्याख्या- - ( १ ) प्रसुप्त - चित्तमें विद्यमान रहते हुए भी जिस समय जो क्लेश अपना कार्य नहीं करता, उस समय उसे प्रसुप्त कहा जाता है । प्रलयकाल और सुषुप्तिमें चारों ही क्लेशोंकी प्रसुप्त अवस्था रहती है । ( २ ) तनु – क्लेशोंमें जो कार्य करनेकी शक्ति है, उसका जब योगके साधनोंद्वारा ह्रास कर दिया जाता है; तब वे हीन शक्तिवाले क्लेश ' तनु ' कहलाते हैं । देखनेमें भी आता है कि ये राग - द्वेषादि क्लेश साधारण मनुष्योंकी भाँति साधकोंपर अपना आधिपत्य नहीं जमा सकते अर्थात् साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा साधकोंपर उनका प्रभाव बहुत कम पड़ता है । ( ३ ) विच्छिन्न- जब कोई क्लेश उदार होता है, उस समय दूसरा क्लेश दब जाता है, वह उसकी ' विच्छिन्नावस्था ' है, जैसे रागकी उदार -अवस्थाके क्षणमें द्वेष दब जाता है और द्वेषकी उदार - अवस्थाके क्षणमें राग दबा रहता है । ( ४ ) उदार — जिस समय जो क्लेश अपना कार्य पूर्णतया कर रहा हो उस समय वही ' उदार ' कहलाता है । उपर्युक्त पाँच क्लेशोंमेंसे अस्मितादि चार क्लेशोंके ही प्रसुप्तादि चार अवस्थाभेद बतलाये गये हैं, अविद्याके नहीं; क्योंकि वह अन्य चारोंका कारण है, उसके नाशसे सबका सदाके लिये समूल नाश हो जाता है ॥४ ॥
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साधनपाद - २ ४७ सम्बन्ध - अब अविद्याका स्वरूप बतलाते हैं-अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥ ५ ॥
अनित्याशुचिदुःखानात्मसु = अनित्य, अपवित्र, दुःख और अनात्मामें; नित्यशुचिसुखात्मख्यातिः = नित्य, पवित्र, सुख और आत्मभावकी अनुभूति; अविद्या = ' अविद्या ' है । व्याख्या - इस लोक और परलोकके समस्त भोग और भोगोंका आयतन यह मनुष्यशरीर भी अनित्य है, इस बातको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा समझकर भी जिसके प्रभावसे मनुष्य उनमें नित्यत्वबुद्धि करके राग-द्वेषादि कर लेता है, यह अनित्यमें नित्यकी अनुभूतिरूप अविद्या है । इसी प्रकार हाड़, मांस, मज्जा आदि अपवित्र धातुओंके समुदायरूप अपने और स्त्री आदिके शरीरोंको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा अपवित्र समझते हुए भी जिसके कारण मनुष्य अपने शरीरमें पवित्रताका अभिमान करता है और स्त्री- पुत्र आदिके शरीरोंसे प्यार करता है, यह अपवित्रमें पवित्रकी अनुभूतिरूप अविद्या है । वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा विचार करनेपर सभी भोग दुःखरूप हैं— यह बात विचारशील साधककी समझमें आ जाती है ( योग ० २ । १५ ) । इसपर भी मनुष्य उन भोगोंको सुखदायक समझकर उनके भोगनेमें प्रवृत्त हुआ रहता है, यही दुःखमें सुखकी अनुभूतिरूप अविद्या है । यद्यपि यह बात थोड़ा - सा विचार करते ही समझमें आ जाती है कि जड शरीर आत्मा नहीं है तथापि मनुष्य इसीको अपना स्वरूप माने रहता है, आत्मा इससे सर्वथा असंग और चेतन है - इस बातका अनुभव नहीं कर सकता, इसका नाम अनात्मामें आत्मभावका अनुभूतिरूप अविद्या है । प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम - प्रमाणसे वस्तुस्थितिका सामान्य ज्ञान हो जानेपर विपर्ययवृत्ति नहीं रहती, तो भी अविद्याका नाश नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि चित्तकी विपर्ययवृत्तिका नाम अविद्या नहीं है ॥५ ॥
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४८ पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध - अब अस्मिताका स्वरूप बतलाते हैं-दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥ ६ ॥
दृग्दर्शनशक्त्योः = दृक् - शक्ति और दर्शन - शक्ति इन दोनोंका; एकात्मता इव = एकरूप - सा हो जाना; अस्मिता = ' अस्मिता ' है । व्याख्या — दृक् - शक्ति अर्थात् द्रष्टा - पुरुष और दर्शन - शक्ति अर्थात् -बुद्धि – ये दोनों सर्वथा भिन्न और विलक्षण हैं । द्रष्टा चेतन है और बुद्धि जड है । इनकी एकता हो ही नहीं सकती । तथापि अविद्याके कारण दोनोंकी एकता - सी हो रही है ( योग ० २ । २४ ) । इसीको द्रष्टा और दृश्यका संयोग कहते हैं । यही प्रकृति और पुरुषके स्वरूपकी उपलब्धिका हेतु माना गया है ( योग ० २ । २३ ) । इस संयोगके रहते हुए भी पुरुष और बुद्धिका भिन्न - भिन्न स्वरूप विचारके द्वारा और सम्प्रज्ञात - समाधिके द्वारा समझमें तो आता है; परंतु जबतक निर्बीज-समाधिद्वारा अविद्याका सर्वथा नाश नहीं कर दिया जाता, तबतक संयोगका अभाव नहीं होता है । इस कारण इनके शुद्ध स्वरूपका अनुभव नहीं होता ( योग ० ३ । ३५ ) । अतः साधकको चाहिये कि तत्परतासे उत्साहपूर्वक योगसाधनमें लगकर शीघ्र ही अविद्याके नाशद्वारा संयोगरूप अस्मिता नामक क्लेशका नाश कर दे स्थितिको प्राप्त कर ले ॥६ ॥
सम्बन्ध - अब राग नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं-सुखानुशयी रागः ॥ ७ ॥
सुखानुशयी = सुखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश; व्याख्या – प्रकृतिस्थ जीवको जब कभी जिस -और कैवल्य-रागः = ' राग ' है । किसी अनुकूल पदार्थमें सुखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसकी आसक्ति ( प्रीति ) हो जाती है, उसीको ' राग ' कहते हैं । अतः इस राग नामक क्लेशको सुखकी प्रतीतिके साथ - साथ रहनेवाला कहा गया है ॥७ ॥
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साधनपाद - २ ४ ९ सम्बन्ध - अब द्वेष नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं-दुःखानुशयी द्वेषः ॥ ८ ॥
दुःखानुशयी - दुःखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश; द्वेषः = ' द्वेष ' है । व्याख्या – मनुष्यको जब कभी जिस किसी प्रतिकूल पदार्थमें दुःखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसका द्वेष हो जाता है; अतः यह द्वेषरूप क्लेश दुःखकी प्रतीतिके पीछे यानी साथ - साथ रहनेवाला है ॥ ८ ॥
सम्बन्ध — अब अभिनिवेश नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं-स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९ ॥
स्वरसवाही = जो परम्परागत स्वभावसे चला आ रहा है एवं; विदुषः अपि तथारूढः = जो मूढ़ोंकी भाँति विवेकशील पुरुषोंमें भी विद्यमान देखा जाता है, वह ( मरणभयरूप क्लेश ), अभिनिवेशः = ' अभिनिवेश ' है । व्याख्या - यह मरणभयरूप क्लेश सभी प्राणियोंमें अनादि कालसे स्वाभाविक है; अतः कोई भी जीव यह नहीं चाहता कि मैं न रहूँ, सभी अपनी विद्यमानता चाहते हैं । एक छोटे - से - छोटा कीट भी मरणसे डरकर अपनी रक्षाका उपाय करता है । ( इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है; क्योंकि यदि मरण - दुःख पहले अनुभव किया हुआ नहीं होता तो उसका भय कैसे होता? ) यह मरणभय जीवोंके अन्तःकरणमें इतना गहरा बैठा हुआ है कि मूर्खके जैसा ही विवेकशीलपर भी इसका प्रभाव पड़ता है, इसीलिये इसका नाम ' अभिनिवेश ' अर्थात् ' अत्यन्त गहराईमें प्रविष्ट ' रखा गया है ॥९ ॥
सम्बन्ध— इन पाँच प्रकारके क्लेशोंको तनु अर्थात् सूक्ष्म बना देनेका उपाय— ‘ क्रियायोग ' पहले बतला चुके । ' क्रियायोग ' के द्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश किस उपायसे करना चाहिये, यह बात अगले सूत्रमें बतलाते हैं ।