श्रीगणेशाय नमः।

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 51–60

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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५० पातञ्जलयोगदर्शन ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥ १० ॥

ते = वे; सूक्ष्माः = सूक्ष्मावस्थाको प्राप्त ( क्लेश ); प्रतिप्रसवहेयाः = चित्तको अपने कारणमें विलीन करनेके साधनद्वारा नष्ट करनेयोग्य हैं । व्याख्या– क्रियायोग या ध्यानयोगद्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश निर्बीज - समाधिके द्वारा चित्तको उसके कारणमें विलीन करके करना चाहिये; क्योंकि क्रियायोग या ध्यानद्वारा क्षीण कर दिये जानेपर भी जो लेशमात्र क्लेश शेष रह जाते हैं, उनका नाश द्रष्टा और दृश्यके संयोगका अभाव होनेपर ही होता है, उसके पहले क्लेशोंका सर्वथा नाश नहीं होता, यह भाव है ॥१० ॥

सम्बन्ध - अब क्लेशोंको क्षीण करनेका क्रियायोगसे अतिरिक्त दूसरा साधन बतलाते हैं-ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥ ११ ॥

तद्वृत्तयः = उन क्लेशोंकी ( स्थूल ) वृत्तियाँ; ध्यानहेयाः = ध्यानके द्वारा नाश करनेयोग्य हैं । व्याख्या — उन क्लेशोंकी जो स्थूल वृत्तियाँ हैं, उनका यदि पूर्वोक्त क्रियायोगके द्वारा नाश करके उन क्लेशोंको सूक्ष्म नहीं बना दिया गया हो तो पहले ध्यानके द्वारा उनकी स्थूल वृत्तियोंका नाश करके उनको सूक्ष्म बना लेना चाहिये, तभी निर्बीज - समाधिकी सिद्धि सुगमतासे हो सकेगी । उसके बाद निर्बीज - समाधिसे क्लेशोंका सर्वथा अभाव अपने-आप हो जायगा ॥ ११ ॥

सम्बन्ध — उपर्युक्त क्लेश किस प्रकार जीवके महान् दुःखोंके कारण हैं; इस बातको स्पष्ट करनेके लिये अलग प्रकरण आरम्भ किया जाता है— क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥ १२ ॥

क्लेशमूलः = क्लेशमूलक; कर्माशयः = कर्मसंस्कारोंका समुदाय; दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः- दृष्ट ( वर्तमान ) और अदृष्ट ( भविष्य में होनेवाले ) दोनों प्रकारके ही जन्मोंमें भोगा जानेवाला है ।

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साधनपाद - २ ५१ व्याख्या – कर्मोंके संस्कारोंकी जड़ उपर्युक्त पाँचों क्लेश ही हैं । अविद्यादि क्लेशोंके न रहनेपर किये हुए कर्मोंसे कर्माशय नहीं बनता, बल्कि वैसे राग - द्वेषरहित निष्काम कर्म तो पूर्वसंचित कर्माशयका भी नाश करनेवाले होते हैं ( गीता ४ । २३ ) । यही क्लेशमूलक कर्माशय जिस प्रकार इस जन्ममें दुःख देता है, उस प्रकार भविष्यमें होनेवाले जन्मोंमें भी दुःखदायक है । अतः साधकको इसकी जड़ काट डालनी चाहिये अर्थात् पूर्वोक्त क्लेशोंका सर्वथा नाश कर देना चाहिये ॥१२ ॥

सम्बन्ध — उस कर्माशयका फल कबतक मिलता रहता है और वह क्या है, इसको स्पष्ट करते हैं— सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥ १३ ॥

मूले सति = मूलके विद्यमान रहनेतक; तद्विपाकः = उस ( कर्माशय ) -का परिणाम; जात्यायुर्भोगाः = पुनर्जन्म, आयु और भोग होता रहता है । व्याख्या— जबतक क्लेशरूप जड़ विद्यमान रहती है, तबतक इस कर्मोंके संस्कार - समुदायरूप कर्माशयका विपाक यानी परिणाम - बार- बार अच्छी - बुरी योनियोंमें जन्म होना, वहाँपर निश्चित आयुतक जीते रहकर फिर मरण - दुःखको भोगना और जीवनावस्थामें जो विवेकदृष्टिसे सभी दुःखरूप हैं, ऐसे भोगोंका सम्बन्ध होना - ऐसे तीन प्रकारका होता रहता है ॥१३ ॥

सम्बन्ध - वे जाति, आयु और भोगरूप परिणाम किस प्रकारके होते हैं, यह बतलाते हैं-ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ १४ ॥

ते = वे ( जन्म, आयु और भोग ); ह्लादपरितापफलाः - हर्ष और शोकरूप फलको देनेवाले होते हैं; पुण्यापुण्यहेतुत्वात् = क्योंकि उनके पुण्यकर्म और पापकर्म – दोनों ही कारण हैं । व्याख्या - जो जन्म पुण्यकर्मका परिणाम है, वह सुखदायक होता है और जो पापकर्मका परिणाम है, वह दुःखदायक होता है । इसी प्रकार

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५२ पातञ्जलयोगदर्शन आयुका जितना समय शुभकर्मका परिणाम है, उतना समय सुखदायक होता है और जितना पापकर्मका परिणाम है, उतना दुःखदायक होता है । वैसे ही जो - जो भोग अर्थात् सांसारिक मनुष्योंके, अन्य प्राणियोंके पदार्थोंके और क्रिया एवं परिस्थिति आदिके संयोग - वियोग पुण्यकर्मके परिणाम होते हैं, वे हर्षप्रद होते हैं और जो पापकर्मके परिणाम होते हैं, वे शोकप्रद होते हैं ॥१४ ॥

सम्बन्ध — यहाँ यह शंका हो सकती है कि यदि यही बात है तब तो जिसका परिणाम केवल दुःखप्रद फल ( जन्म, आयु और भोग ) हैं ऐसे कर्माशयका ही उसके मूलसहित नाश करना उचित है । उसके साथ सुखप्रद कर्माशयका नाश करनेकी बात क्यों कही? इसपर कहते हैं-परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥ १५ ॥

परिणामतापसंस्कारदुःखैः = परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कार -दुःख - ऐसे तीन प्रकारके दुःख सबमें विद्यमान रहनेके कारण; च = और; गुणवृत्तिविरोधात् - तीनों गुणोंकी वृत्तियोंमें परस्पर विरोध होनेके कारण; विवेकिनः - विवेकीके लिये; सर्वम् = सब - के - सब ( कर्मफल ); दुःखम एव = दुःखरूप ही हैं । व्याख्या– ( १ ) परिणामदुःख - जो ' कर्मविपाक ' भोगकालमें स्थूल दृष्टिसे सुखप्रद प्रतीत होता है, उसका भी परिणाम ( नतीजा ) दुःख ही है । जैसे स्त्रीप्रसंगके समय मनुष्यको सुख भासता है; परंतु उसका परिणाम बल, वीर्य, तेज, स्मृति आदिका ह्रास प्रत्यक्ष देखनेमें आता है, ऐसे ही दूसरे भोगों में भी समझ लेना चाहिये । * * गीतामें भी कहा है— विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ( १८।३८ ) ' जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह यद्यपि भोगकालमें अमृतके सदृश भासता है; परंतु परिणाममें विषके सदृश है, इसलिये वह सुख राजस कहा गया है । '

पृष्ठ 54

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साधनपाद - २ ५३ भोगोंको भोगते - भोगते मनुष्य थक जाता है, उन्हें भोगनेकी शक्ति उसमें नहीं रहती, परंतु तृष्णा बनी रहती है, इससे वह भोगरूप सुख भी दुःख ही है । यह भोगके अन्तमें अनुभव होनेवाला दुःख भी परिणाम -दुःखकी ही गणनामें है । इन्द्रियों और पदार्थोंके सम्बन्धसे जब मनुष्यको किसी भी प्रकारके भोगमें सुखकी प्रतीति होती है, तब उसमें राग - आसक्ति अवश्य हो जाती है । इसलिये वह सुख रागरूप क्लेशसे मिला हुआ है । आसक्तिवश मनुष्य उस भोगकी प्राप्तिके साधनरूप अच्छे - बुरे कर्मोंका आरम्भ भी करेगा ही । भोग्यवस्तुओंकी प्राप्तिमें असमर्थ होनेसे या विघ्न आनेपर द्वेष होना भी अवश्यम्भावी है । इसके सिवा, प्राणियोंकी हिंसाके बिना भोगकी सिद्धि भी नहीं होती । अतः राग, द्वेष और हिंसादिका परिणाम अवश्य ही दुःख है । यह भी परिणाम - दुःखता है । ( २ ) तापदुःख - सभी प्रकारके भोगरूप सुख विनाशशील हैं; उनसे वियोग होना निश्चित है, अतः भोगकालमें उनके विनाशकी सम्भावनासे भयके कारण तापदुःख बना रहता है । इसी तरह मनुष्यको जो सुखकारक भोग प्राप्त होते हैं वे सातिशय ही होते हैं, अर्थात् उसे जो कुछ प्राप्त है, उससे बढ़कर दूसरोंको भी प्राप्त है यह देखकर वह ईर्ष्यासे जलता रहता है । यह भी तापदुःख है तथा भोगकी अपूर्णतासे भी भोगकालमें संताप बना रहता है, यह तापदुःख है । ( ३ ) संस्कारदुःख - जिन - जिन भोगोंमें मनुष्यको सुखका अनुभव होता है, उस अनुभवके संस्कार उसके हृदयमें जम जाते हैं । जब उन भोग - सामग्रियोंसे उसका वियोग हो जाता है, तब वे संस्कार पहलेके सुखभोगकी स्मृतिद्वारा महान् दुःखके हेतु हो जाते हैं । देखनेमें भी आता है कि जब किसी मनुष्यकी स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि भोगसामग्री नष्ट हो जाती है, तब वह उनको याद कर - करके रोता रहता है कि मेरी स्त्री मुझे अमुक - अमुक प्रकारसे सुख देती थी, मेरे पास इतना धन था, मैं अपने धनसे स्वयं सुख भोगता था और लोगोंको सुख पहुँचाता था, आज मेरी यह दशा है कि मैं भिखारी होकर लोगोंसे सहायता माँगता फिरता

पृष्ठ 55

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५४ पातञ्जलयोगदर्शन हूँ — इत्यादि । इसके सिवा, वे भोग - संस्कार, भोगासक्तिकी वृद्धिमें कारण होनेसे जन्मान्तरमें भी दुःखके हेतु हैं । ( ४ ) गुणवृत्तिविरोध – गुणोंके कार्यका नाम गुणवृत्ति है, गुणोंके कार्यमें परस्पर अत्यन्त विरोध है । जैसे सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, ज्ञान और सुख है, तो तमोगुणका कार्य अन्धकार, अज्ञान और दुःख है । इस प्रकार इनके कार्योंमें विरोध होनेके कारण दुविधा बनी रहती है; सुख - भोगकालमें भी शान्ति नहीं मिलती; क्योंकि तीनों गुण एक साथ रहनेवाले हैं । सुखके अनुभवकालमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रहते हुए भी रजोगुण और तमोगुणका अभाव नहीं हो जाता, अतः उस समय भी दुःख और शोक विद्यमान रहते हैं; इसलिये भी वह दुःख ही है । जैसे ध्यानकालमें और सत्संग करते समय सत्त्वगुणकी प्रधानता रहती है, अतः सात्त्विक सुख होता है, परंतु वहाँ भी सांसारिक स्फुरणा और तन्द्रा उस सुखमें विघ्न कर देते हैं ऐसे ही अन्य कामोंमें भी समझ लेना चाहिये । उपर्युक्त परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कारदुःख तथा गुणवृत्तियोंके विरोधसे होनेवाले दुःखको विचारद्वारा विवेकी पुरुष समझता है । इस कारण उसकी दृष्टिमें सभी ' कर्मविपाक ' दुःखरूप ही हैं अर्थात् साधारण मनुष्यसमुदाय जिन भोगोंको सुखरूप समझता है, विवेकीके लिये वे भी दुःख ही हैं * ॥ १५ ॥

सम्बन्ध - उपर्युक्त वर्णनसे यह सिद्ध हो गया है कि जन्म, आयु और भोगरूप सभी कर्मविपाक दुःखरूप हैं; इसलिये उनका मूलसहित उच्छेद करना मनुष्यका कर्तव्य है अतः अब उनको त्याज्य ( नाश करनेयोग्य ) बतलाकर उनसे मुक्ति पानेका उपाय बतलाते हुए अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— * यह बात गीताके पाँचवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें इस प्रकार कही गयी है-ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ अर्थात् इन्द्रिय और विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जितने भी भोग हैं, वे सब-के - सब दुःखोंके ही कारण हैं तथा सभी आदि और अन्तवाले हैं, अतः विवेकी मनुष्य उनमें नहीं रमता ।

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साधनपाद - २ ५५ हेयं दुःखमनागतम् ॥ १६ ॥

अनागतम् = जो आया नहीं है - आनेवाला है वह; दुःखम् - दुःख; हेयम् = हेय ( नष्ट करनेयोग्य ) है । व्याख्या – वर्तमान जन्मके पहले जो अनेक योनियोंमें दुःख भोगे जा चुके, वे तो अपने - आप समाप्त हो गये, उनके विषयमें कोई विचार नहीं करना है तथा जो वर्तमान हैं वे भी भोग देकर दूसरे क्षणमें अपने-आप लुप्त हो जायँगे, उनके लिये भी उपायकी आवश्यकता नहीं है । परन्तु जो दुःख अभीतक प्राप्त नहीं हुए हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं, उनका नाश उपायद्वारा अवश्य कर्तव्य है; इसलिये उन्हींको ' हेय ' बतलाया गया है ॥ १६ ॥

सम्बन्ध — जिसका नाश करना हो, उसके मूल कारणको जाननेकी आवश्यकता है; क्योंकि मूल कारणके नाशसे ही उसका पूर्णतया नाश हो सकता है; नहीं तो वह

पुन: उत्पन्न हो सकता है । अतः उक्त ' हेय ' का हेतु ( कारण ) बतलाते हैं ।

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥

द्रष्टृदृश्ययोः - द्रष्टा और दृश्यका; संयोग: = संयोग; हेयहेतुः = ( उक्त ) हेयका कारण है । व्याख्या - ऊपर जो नाश करनेयोग्य आनेवाले दुःख बतलाये गये हैं, उनका मूल कारण द्रष्टा और दृश्यका अर्थात् पुरुष और प्रकृतिका संयोग यानी जड - चेतनकी ग्रन्थि है । अतः इस संयोगका नाश कर देनेसे मनुष्य सर्वथा दुःखोंसे निवृत्त हो सकता है ॥१७ ॥

सम्बन्ध- - पूर्व सूत्रमें द्रष्टा, दृश्य और उनका संयोग - इन तीनके नाम आये हैं, उनमेंसे पहले दृश्यका स्वभाव, स्वरूप और प्रयोजन बतलाते हैं— प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥ १८ ॥

प्रकाशक्रियास्थितिशीलम् = प्रकाश, क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है; भूतेन्द्रियात्मकम् = भूत और इन्द्रियाँ जिसका ( प्रकट ) स्वरूप

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५६ पातञ्जलयोगदर्शन है; भोगापवर्गार्थम् = ( पुरुषके लिये ) भोग और मुक्तिका सम्पादन करना ही जिसका प्रयोजन है, ऐसा; दृश्यम् = दृश्य है । व्याख्या — सत्त्व, रज और तम – ये तीनों गुण और इनका कार्य जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब - का - सब दृश्यके अन्तर्गत है । सत्त्वगुणका मुख्य धर्म प्रकाश है, रजोगुणका मुख्य धर्म क्रिया ( हलचल ) है और तमोगुणका मुख्य धर्म स्थिति अर्थात् जडता और सुषुप्ति आदि है । इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको ही प्रधान या प्रकृति कहते हैं । यह सांख्यका मत है । अतः सब अवस्थाओंमें अनुगत तीनों गुणोंका जो प्रकाश, क्रिया और स्थितिरूप स्वभाव है, वही दृश्यका स्वभाव है । पाँच स्थूल भूत, पाँच तन्मात्रा, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि और अहंकार – ये सब ( तेईस तत्त्व ) प्रकृतिके कार्य होनेसे उसके स्वरूप हैं । भोगासक्त पुरुषको अपना स्वरूप दिखलाकर भोग प्रदान करना और मुक्ति चाहनेवाले योगीको द्रष्टाका स्वरूप दिखलाकर मुक्ति प्रदान करना दृश्यका प्रयोजन है । द्रष्टाको उसका निज स्वरूप दिखा देनेके बाद इसका कोई प्रयोजन नहीं रहता, उस पुरुषके लिये यह अस्त ( लुप्त )

हो जाता है ( २।२२ ) ॥ १८ ॥

सम्बन्ध - उक्त दृश्यके भेदोंका वर्णन अपने ग्रन्थकी परिभाषामें करते हैं-विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥१ ९ ॥ विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि = विशेष, अविशेष, लिंगमात्र और अलिंग – ये चार; गुणपर्वाणि = ( उपर्युक्त ) सत्त्वादि गुणोंके भेद ( अवस्थाएँ ) हैं । व्याख्या– ( १ ) विशेष - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश -ये पाँच स्थूल भूत तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन — इस प्रकार सब मिलकर सोलहोंका नाम ' विशेष ' है । गुणोंके विशेष धर्मोकी अभिव्यक्ति ( प्रकटता ) इन्हींसे होती है, इसलिये इनको विशेष कहते हैं । सांख्यकारिकामें इनका नाम विकार रखा है ( सां ० का ० ३ ) ।

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साधनपाद - २ ५७ ( २ ) अविशेष - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये पाँच तन्मात्राएँ हैं, इन्हींको सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं; क्योंकि ये स्थूल पाँच महाभूतोंके कारण हैं तथा छठा अहंकार जो कि मन और इन्द्रियोंका कारण है, इन छहोंका नाम ' अविशेष ' है । इनका स्वरूप इन्द्रियगोचर नहीं है, इसलिये इनको ' अविशेष ' कहते हैं । ( ३ ) लिंगमात्र — उपर्युक्त बाईस तत्त्वोंका कारणभूत जो महत्तत्त्व है, जिसका वर्णन उपनिषदोंमें और गीतामें बुद्धिके नामसे किया गया है, ( कठ ० १ । ३ । १०; गीता १३ । ५ ) उसका नाम ' लिंगमात्र ' है । इसकी उपलब्धि केवल सत्तामात्रसे ही होती है, इस कारण इसको ' लिंगमात्र ' कहते हैं । ( ४ ) अलिंग – मूल प्रकृति, ( सां ० का ० ) जो कि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था मानी गयी है, महत्तत्त्व जिसका पहला परिणाम ( कार्य ) है, उपनिषद् और गीतामें जिसका वर्णन अव्यक्त नामसे किया गया है ( कठ ० १ । ३ । ११; गीता १३ । ५ ) उसका नाम ' अलिंग ' है । साम्यावस्थाको प्राप्त गुणोंके स्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीं होती, इसलिये प्रकृतिको चिह्नरहित ( अव्यक्त ) कहते हैं । इस प्रकार चार अवस्थाओं में विद्यमान रहनेवाले ये सत्त्वादि गुण ही दृश्य नामसे कहे गये हैं ॥१ ९ ॥ सम्बन्ध — अब द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करते हैं-द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥ २० ॥

दृशिमात्रः = चेतनमात्र ( ज्ञानस्वरूप आत्मा ); द्रष्टा = द्रष्टा; शुद्धः अपि = । यद्यपि स्वभावसे सर्वथा शुद्ध ( निर्विकार ) है, तो भी; प्रत्ययानुपश्य: = । ( बुद्धिके सम्बन्धसे ) बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला है । व्याख्या— केवल चेतनमात्र ही जिसका स्वरूप है, ऐसा आत्मतत्त्व स्वरूपसे सर्वथा शुद्ध, निर्विकार है तो भी बुद्धिके सम्बन्धसे बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला होनेसे ' द्रष्टा ' कहलाता है । वास्तवमें द्रष्टा पुरुष ( आत्मतत्त्व ) सर्वथा शुद्ध, निर्विकार,

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५८ पातञ्जलयोगदर्शन कूटस्थ, असंग है तथापि इसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ अनादिसिद्ध अविद्यासे माना जाता प्रकृति से अलग होकर जाता तबतक बुद्धिके वृत्तियों को देखता रहता इसकी ' द्रष्टा ' संज्ञा है । फिर तो यह केवल है ही ॥२० ॥

सम्बन्ध— दृश्य और है । जबतक उस अविद्याके नाशद्वारा यह अपने असली स्वरूपमें स्थित नहीं हो साथ एकताको प्राप्त हुआ - सा बुद्धिकी है और जबतक उनको देखता है, तभीतक दृश्यका सम्बन्ध न रहनेपर द्रष्टा किसका? चेतनमात्र, सर्वथा शुद्ध और निर्विकार द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब दृश्यके स्वरूपकी सार्थकताका प्रतिपादन करते हैं-तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥२१ ॥

दृश्यस्य = ( उक्त ) दृश्यका; आत्मा = स्वरूप; तदर्थः एव - उस ( द्रष्टा ) के लिये ही है । व्याख्या— उक्त द्रष्टाको अपने दर्शनद्वारा भोग प्रदान करनेके लिये और द्रष्टा निज स्वरूपका दर्शन कराकर अपवर्ग ( मुक्ति ) प्रदान करनेके लिये - इस प्रकार पुरुषका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये ही दृश्य है । इसीमें उसके होनेकी सार्थकता है । अठारहवें सूत्रमें दृश्यके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी यही बात कही गयी है ॥ २१ ॥

सम्बन्ध— पुरुषको अपवर्ग प्रदान कर देनेके बाद प्रकृतिका कोई कार्य शेष नही रहता, फिर उसका बना रहना निरर्थक है; अतः उसका अभाव हो जाना चाहिये; इसपर कहते हैं-कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २२ ॥

कृतार्थम् प्रति = जिसका भोग और अपवर्गरूप कार्य पूर्ण कर दिया, उस पुरुषके लिये; नष्टम् = नाशको प्राप्त हुई; अपि = भी ( वह प्रकृति ); अनष्टम् = नष्ट नहीं होती; तत् अन्यसाधारणत्वात् = क्योंकि दूसरोंके लिये भी वह समान है ।

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साधनपाद - २ ५ ९ व्याख्या– प्रकृतिका प्रयोजन किसी एक ही पुरुषके लिये भोग और अपवर्ग प्रदान करना नहीं है, वह तो सभी पुरुषोंके लिये समान है । अतः जिसका कार्य वह कर चुकी, उस कृतार्थ - मुक्त पुरुषके लिये उसकी आवश्यकता न रहनेके कारण यद्यपि वह उसके लिये नष्ट हो जाती है, तो भी दूसरे सब जीवोंको भोग और अपवर्ग प्रदान करना तो शेष है ही नाश नहीं होता, वह विद्यमान रहती है होती है कि प्रकृति परिणामी होनेपर भी यहाँ जो मुक्त पुरुषके लिये उसका नष्ट वह भी अदृश्य होना ही बतलाया गया है; किसी भी वस्तुका सर्वथा अभाव नहीं सम्बन्ध - अब संयोगके स्वरूपका वर्णन करते । इसलिये उसका सर्वथा । इससे यह बात सिद्ध अनादि और नित्य है । होना बतलाया गया है, क्योंकि योगके सिद्धान्तमें माना गया है ॥२२ ॥

हैं-स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥ २३ ॥

स्वस्वामिशक्त्योः = स्वशक्ति ( प्रकृति ) और स्वामिशक्ति ( पुरुष ) — इन दोनोंके; स्वरूपोपलब्धिहेतुः = स्वरूपकी प्राप्तिका जो कारण है, वह; संयोगः = ' संयोग ' है । व्याख्या - दृश्यका स्वरूप द्रष्टाके ही लिये है, यह बात पहले कह आये हैं, इसी भावको लेकर इस सूत्रमें पुरुषको प्रकृतिका स्वामी बतलाया है और प्रकृतिको पुरुषका ' स्व ' अर्थात् अपना यानी अधिकृत पदार्थ कहा है । उस प्रकृतिके साथ पुरुषका सम्बन्ध उन दोनोंके स्वरूपको जाननेके लिये ही है, अतः उस दर्शन ( ज्ञान ) शक्तिसे जबतक मनुष्य इस प्रकृतिके नाना रूपोंको देखता रहता है, तबतक तो भोगोंको भोगता रहता है । जब इनके दर्शनसे विरक्त होकर अपने स्वरूप - दर्शनकी ओर झाँकता है, तब स्वरूपका दर्शन हो जाता है ( योग ० ३ । ३५ ) । फिर संयोगकी कोई आवश्यकता न रहनेसे उसका अभाव हो जाता है । यही पुरुषकी ' कैवल्य '

अवस्था है ( योग ० ३ । ३४ ) ॥ २३ ॥