श्रीगणेशाय नमः।

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 61–70

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

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६० पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध — अब उक्त संयोगका कारण बतलाते हैं-तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥

तस्य = उस संयोगका; हेतुः = कारण; अविद्या अविद्या है । व्याख्या - सर्वथा निर्विकार असंग चेतन पुरुषका जो यह जड़ प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है यह अनादिसिद्ध अविद्यासे ही है, वास्तवमें नहीं है । यहाँ अविद्या विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है, किंतु अपने स्वरूपके अनादिसिद्ध अज्ञानका नाम अविद्या है । इसीलिये अपने स्वरूपके ज्ञानसे इसका नाश हो जाता है और उसके बाद प्रयोजन न रहनेपर वह ज्ञान

भी शान्त हो जाता है । यही पुरुषका ' कैवल्य ' है ॥२४ ॥

सम्बन्ध— अब कारणसहित संयोगके अभावसे सिद्ध होनेवाले सर्वथा दुःखनाशरूप ' हान ' का वर्णन करते हैं-तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥ २५ ॥

तदभावात् - उस ( अविद्या ) - के अभावसे; संयोगाभावः = संयोगका अभाव ( हो जाता है, यही ); हानम् = ' हान ' ( पुनर्जन्मादि भावी दुःखोंका अत्यन्त अभाव ) है ( और ); तत् = वही; दृशेः = चेतन आत्माका; कैवल्यम् = ‘ कैवल्य ' है । व्याख्या — जब आत्मदर्शनरूप ज्ञानसे अविद्याका यानी अज्ञानका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अज्ञानजनित संयोगका भी अपने - आप अभाव हो जाता है, फिर पुरुषका प्रकृतिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता और उसके जन्म - मरण आदि सम्पूर्ण दुःखोंका सदाके लिये अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा पुरुष अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है - यही उसका कैवल्य अर्थात् सर्वथा अकेलापन है ॥ २५ ॥

सम्बन्ध — अब उक्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप ' हान ' का उपाय बतलाते हैं-विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥ २६ ॥

अविप्लवा = निश्चल और निर्दोष; विवेकख्यातिः = विवेकज्ञान; हानोपायः = ( उक्त ) ' हान ' का उपाय है ।

पृष्ठ 62

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साधनपाद - २ ६१ व्याख्या — प्रकृति तथा उसके कार्य - बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ और शरीर - इन सबके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेसे तथा आत्मा इनसे सर्वथा भिन्न और असंग है, आत्माका इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार पुरुषके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे जो प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका अलग - अलग यथार्थ ज्ञान होता है, इसीका नाम ' विवेकज्ञान ' है ( योग ० ३ । ५४ ) । उस समय चित्त विवेकज्ञानमें निमग्न और कैवल्यके अभिमुख रहता है । यह ज्ञान जब समाधिकी निर्मलता -स्वच्छता होनेपर पूर्ण और निश्चल हो जाता है, उसमें किसी प्रकारका भी मल नहीं रहता ( योग ० ४ । ३१ ), तब वह अविप्लव विवेकज्ञान कहलाता है । ऐसा विवेकज्ञान ही समस्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप मुक्तिका उपाय है । इससे संसारके बीज अविद्यादि क्लेशोंका और समस्त कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है ( योग ० ४ । ३० ) । उसके बाद चित्त अपने आश्रयरूप - महत्तत्त्व आदिके सहित अपने कारणमें विलीन हो जाता है तथा प्रकृतिका जो स्वाभाविक परिणाम - क्रम है, वह उसके लिये

बंद हो जाता है ( योग ० ४ । ३२ ) ॥ २६ ॥

सम्बन्ध— उक्त विवेकज्ञानके समय साधककी बुद्धि किस प्रकारकी होती है, यह बतलाते हैं-तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७ ॥

तस्य = उस ( विवेकज्ञानप्राप्त ) पुरुषकी; सप्तधा = सात प्रकारकी; प्रान्तभूमिः = अन्तिम स्थितिवाली; प्रज्ञा = बुद्धि ( होती है ) । व्याख्या - जब निर्मल और अचल विवेकख्यातिके द्वारा योगीके चित्तका आवरण और मल सर्वथा नष्ट हो जाता है ( योग ० ४ । ३१ ) उस समय उस चित्तमें दूसरे सांसारिक ज्ञानोंका उदय नहीं होता । अतः सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली प्रज्ञा ( बुद्धि ) उत्पन्न होती है । उनमें पहली चार प्रकारकी तो कार्यविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण वे ' कार्यविमुक्तिप्रज्ञा ' कहलाती हैं और अन्तकी तीन चित्तविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण उनका नाम ' चित्तविमुक्तिप्रज्ञा ' है ।

पृष्ठ 63

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६२ पातञ्जलयोगदर्शन कार्यविमुक्तिप्रज्ञा यानी कर्तव्यशून्य अवस्थाके चार भेद इस प्रकार हैं-( १ ) ज्ञेयशून्य अवस्था - जो कुछ जानना था जान लिया; अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है ( योग ० २। १८, १ ९ ), वह सब अनित्य और परिणामी है यह पूर्णतया जान लिया । ( २ ) हेयशून्य अवस्था — जिसका अभाव करना था, उसका अभाव कर दिया; अर्थात् द्रष्टा और दृश्यके संयोगका, जो कि हेयका हेतु है, अभाव कर दिया, अब कुछ भी अभाव करनेयोग्य शेष नहीं रहा । ( ३ ) प्राप्यप्राप्त अवस्था - जो कुछ प्राप्त करना था, प्राप्त कर लिया अर्थात् समाधिद्वारा केवल अवस्थाकी प्राप्ति हो चुकी; अतः अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहा । ( ४ ) चिकीर्षाशून्य अवस्था - जो कुछ करना था, कर लिया अर्थात हानका उपाय जो निर्मल और अचल विवेकज्ञान है, उसे सिद्ध कर लिया, अब और कुछ करना शेष नहीं रहा । चित्तविमुक्तिप्रज्ञाके तीन भेद इस प्रकार हैं— ( १ ) चित्तकी कृतार्थता - चित्तने अपना अधिकार ' भोग और अपवर्ग ' देना पूरा कर दिया, अब उसका कोई प्रयोजन शेष नहीं रहा । ( २ ) गुणलीनता - चित्त अपने कारणरूप गुणोंमें लीन हो रहा है, क्योंकि अब उसका कोई कार्य शेष नहीं रहा । ( ३ ) आत्मस्थिति - पुरुष सर्वथा गुणोंसे अतीत होकर अपने स्वरूपमें अचल भावसे स्थित हो गया । इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमिप्रज्ञाको अनुभव करनेवाला योगी कुशल ( जीवन्मुक्त ) कहलाता है और चित्त जब अपने कारणमें लीन हो जाता है, तब भी कुशल ( विदेहमुक्त ) कहलाता है ॥२७ ॥

सम्बन्ध— अब उक्त निर्मल विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—-योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ २८ ॥

योगाङ्गानुष्ठानात् = योगके अंगका अनुष्ठान करनेसे; अशुद्धिक्षये = ।

पृष्ठ 64

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साधनपाद - २ ६३ अशुद्धिका नाश होनेपर; ज्ञानदीप्ति: - ज्ञानका प्रकाश; आविवेकख्यातेः = विवेकख्यातिपर्यन्त हो जाता है । व्याख्या– आगे बतलाये जानेवाले योगके आठ अंगोंका अनुष्ठान करनेसे अर्थात् उनको आचरणमें लानेसे चित्तके मलका अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है, उस समय योगीके ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातितक हो जाता है अर्थात् उसे आत्माका स्वरूप, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियोंसे सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखलायी देता है ॥ २८ ॥

सम्बन्ध — उक्त योगांगोंके नाम और उनकी संख्या बतलाते हैं-यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो-ऽष्टावङ्गानि ॥ २ ९ ॥ यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयः = यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि; अष्टौ = ये आठ अङ्गानि = ( योगके ) अंग हैं । व्याख्या - इन आठोंके लक्षण और फलोंका वर्णन अगले सूत्रों में स्वयं सूत्रकारने ही किया है, अतः यहाँ विस्तारकी आवश्यकता नहीं है ॥२ ९ ॥ सम्बन्ध - पहले यमोंका वर्णन करते हैं— अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ ३० ॥

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः = अहिंसा, सत्य, अस्तेय ( चोरीका अभाव ), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( संग्रहका अभाव ) - ये पाँच; यमाः = यम हैं । व्याख्या- - ( १ ) अहिंसा - मन, वाणी और शरीरसे किसी प्राणीको कभी किसी प्रकार किंचिन्मात्र भी दुःख न देना ' अहिंसा ' है, परदोष - । दर्शनका सर्वथा त्याग भी इसीके अन्तर्गत है । ( २ ) सत्य - इन्द्रिय और मनसे प्रत्यक्ष देखकर, सुनकर या अनुमान करके जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा - का वैसा ही भाव प्रकट

पृष्ठ 65

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६४ पातञ्जलयोगदर्शन करनेके लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरेको उद्वेग उत्पन्न न करनेवाले जो वचन बोले जाते हैं, उनका नाम ' सत्य ' है । इसी प्रकार कपट और छलरहित व्यवहारका नाम सत्यव्यवहार समझना चाहिये । ( ३ ) अस्तेय – दूसरेके स्वत्वका अपहरण करना, छलसे या अन्य किसी उपायसे अन्यायपूर्वक अपना बना लेना ' स्तेय ' ( चोरी ) है, इसमें सरकारकी टैक्सकी चोरी और घूसखोरी भी सम्मिलित है; इन सब प्रकारकी चोरियोंके अभावका नाम ' अस्तेय ' है । ( ४ ) ब्रह्मचर्य — मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब प्रकारके मैथुनोंका सब अवस्थाओंमें सदा त्याग करके सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना ' ब्रह्मचर्य ' है । * अतः साधकको चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करे, न ऐसे दृश्योंको देखे, न ऐसी बातोंको सुने, न ऐसे साहित्यको पढ़े और न ऐसे विचारोंको ही मनमें लावे तथा स्त्रियोंका और स्त्री - आसक्त पुरुषोंका संग भी ब्रह्मचर्यमें बाधक है, अतः ऐसे संगसे सदा सावधानीके साथ अलग रहे । ( ५ ) अपरिग्रह - अपने स्वार्थके लिये ममतापूर्वक धन, सम्पत्ति और भोग - सामग्रीका संचय करना ' परिग्रह ' है, इसके अभावका नाम ' अपरिग्रह ' है ॥ ३० ॥

सम्बन्ध — उक्त यमोंकी सबसे ऊँची अवस्था बतलाते हैं-जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥ ३१ ॥

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः = ( उक्त यम ) जाति, देश, काल और निमित्तकी सीमासे रहित; सार्वभौमाः = सार्वभौम होनेपर; महाव्रतम् = महाव्रत हो जाते हैं । व्याख्या— उक्त अहिंसादिका अनुष्ठान जब सार्वभौम अर्थात् सबके

* कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।

सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ॥

( गरुड ०, पूर्व ०, आचार ० २३८ । ६ )

पृष्ठ 66

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साधनपाद - २ ६५ साथ, सब जगह और सब समय समानभावसे किया जाता है, तब ये महाव्रत हो जाते हैं । जैसे किसीने नियम लिया कि मछलीके सिवा अन्य जीवोंकी हिंसा नहीं करूँगा तो यह जाति - अवच्छिन्न अहिंसा है, इसी तरह कोई नियम ले कि मैं तीर्थोंमें हिंसा नहीं करूँगा तो यह देश - अवच्छिन्न अहिंसा है । कोई यह नियम करे कि मैं एकादशी, अमावास्या और पूर्णिमाको हिंसा नहीं करूँगा तो यह कालावच्छिन्न अहिंसा है । कोई नियम करे कि मैं विवाहके अवसरके सिवा अन्य किसी निमित्तसे हिंसा नहीं करूँगा तो यह समयावच्छिन्न ( निमित्तसे सम्बन्धित ) अहिंसा है । इसी प्रकार सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहके भी भेद समझ लेने चाहिये । ऐसे यम व्रत तो हैं, परंतु सार्वभौम न होनेके कारण महाव्रत नहीं हैं । उपर्युक्त प्रकारका प्रतिबन्ध न लगाकर जब सभी प्राणियोंके साथ सब देशोंमें सदा - सर्वदा इनका पालन किया जाय, किसी भी निमित्तसे इनमें शिथिलता आनेका अवकाश न दिया जाय, तब ये सार्वभौम होनेपर 4 महाव्रत ' कहलाते हैं ॥ ३१ ॥

सम्बन्ध - यमोंका वर्णन करके अब नियमोंका वर्णन करते हैं-शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२ ॥

शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर - शरणागति – ( ये पाँच ); नियमा: -नियम हैं । व्याख्या– ( १ ) शौच- जल, मृत्तिकादिके द्वारा शरीर, वस्त्र और मकान आदिके मलको दूर करना बाहरकी शुद्धि है, इसके सिवा अपने वर्णाश्रम और योग्यताके अनुसार न्यायपूर्वक धनको और शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न आदि पवित्र वस्तुओंको प्राप्त करके उनके द्वारा शास्त्रानुकूल शुद्ध भोजनादि करना तथा सबके साथ यथायोग्य पवित्र बर्ताव करना – यह भी बाहरी शुद्धिके ही अन्तर्गत है । जप, तप और शुद्ध विचारोंके द्वारा एवं मैत्री आदिकी भावनासे अन्तःकरणके राग - द्वेषादि मलोंका नाश करना भीतरकी पवित्रता है ।

पृष्ठ 67

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६६ पातञ्जलयोगदर्शन ( २ ) संतोष - कर्तव्यकर्मका पालन करते हुए उसका जो कुछ परिणाम हो तथा प्रारब्धके अनुसार अपने - आप जो कुछ भी प्राप्त हो एवं जिस अवस्था और परिस्थितिमें रहनेका संयोग प्राप्त हो जाय, उसीमें संतुष्ट रहना और किसी प्रकारकी भी कामना या तृष्णा न करना ' संतोष ' है । ( ३ ) तप, ( ४ ) स्वाध्याय और ( ५ ) ईश्वर - प्रणिधान – इन तीनोंकी व्याख्या क्रियायोगके वर्णनमें कर चुके हैं ( देखिये योग ० २ । १ की व्याख्या ), उसी प्रकार यहाँ भी समझ लेना चाहिये ॥३२ ॥

सम्बन्ध— यम - नियमोंके अनुष्ठानमें विघ्न उपस्थित होनेपर उन विघ्नोंको हटाने का उपाय बतलाते हैं-वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३३ ॥

वितर्कबाधने = जब वितर्क ( यम और नियमोंके विरोधी हिंसादिके भाव ) यम - नियमके पालनमें बाधा पहुँचावें तब; प्रतिपक्ष भावनम् = उनके प्रतिपक्षी विचारोंका बारम्बार चिन्तन करना ( चाहिये ) । व्याख्या — जब कभी संगदोषसे या अन्यायपूर्वक किसीके द्वारा सताये जानेपर बदला लेनेके लिये या अन्य किसी भी कारणसे मनमें अहिंसादिके विरोधी भाव बाधा पहुँचावें अर्थात् हिंसा, झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम - नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी विचारोंका नाश करनेके लिये उन विचारोंमें दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी भावना करनी चाहिये ॥ ३३ ॥

सम्बन्ध - इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले सूत्रोंमें वर्णन करते हैं-वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध-मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३४ ॥

हिंसादयः- ( यम और नियमोंके विरोधी ) हिंसा आदि भाव; वितर्का: -

पृष्ठ 68

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साधनपाद - २ ६७ वितर्क कहलाते हैं; ( वे तीन प्रकारके होते हैं - ) कृतकारितानुमोदिता: = स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए और अनुमोदन किये हुए; लोभक्रोधमोह-पूर्वकाः = इनके कारण लोभ, क्रोध और मोह हैं; मृदुमध्याधिमात्राः = इनमें | भी कोई छोटा, कोई मध्यम और कोई बहुत बड़ा होता है; दुःखाज्ञानानन्तफलाः = ये दुःख और अज्ञानरूप अनन्त फल देनेवाले हैं; इति = इस प्रकार ( विचार करना ही ); प्रतिपक्षभावनम् = प्रतिपक्षकी भावना है । व्याख्या - स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए, दूसरोंको करते देखकर अनुमोदन किये हुए - इस तरह तीन प्रकारसे होनेवाले हिंसा, झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम - नियमोंके विरोधी हैं, उनका नाम ' वितर्क ' है । ये दोष कभी लोभसे, कभी क्रोधसे और कभी मोहसे एवं कभी छोटे रूपमें, कभी मध्यम और कभी भयंकररूपमें साधकके सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं । उस समय साधकको सावधान होकर विचार करना चाहिये कि हिंसादि दोष महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका परिणाम अनन्तकालतक बारम्बार दुःख भोगना और अज्ञानके वशमें होकर शूकर- कूकर आदि मूढ़ योनियोंमें पड़ना है, अतः इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम-नियमोंका पालन करते रहना चाहिये । इस प्रकारके विचारोंको बारम्बार करते रहना ही ' प्रतिपक्षकी भावना ' है ॥ ३४ ॥

सम्बन्ध - इस प्रकार यम - नियमोंके विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उसमें दोष देखना बतलाकर अब यम - नियमोंमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं-अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ ३५ ॥

अहिंसाप्रतिष्ठायाम् = अहिंसाकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर; तत्सन्निधौ = उस योगीके निकट; वैरत्यागः: = - र सब प्राणी वैरका त्याग कर देते हैं । व्याख्या — जब योगीका अहिंसाभाव पूर्णतया दृढ़ स्थिर हो जाता है तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं ।

पृष्ठ 69

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६८ पातञ्जलयोगदर्शन इतिहास - ग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका वर्णन आता है, वहाँ वनचर जीवोंमें स्वाभाविक वैरका अभाव दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है * ॥ ३५ ॥

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ ३६ ॥

सत्यप्रतिष्ठायाम् = सत्यकी दृढ़स्थिति हो जानेपर ( योगीमें ); क्रिया-फलाश्रयत्वम् - क्रियाफलके आश्रयका भाव ( आ जाता है ) । व्याख्या – जब योगी सत्यका पालन करनेमें पूर्णतया परिपक्व हो जाता है, उसमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती, उस समय वह योग कर्तव्यपालनरूप क्रियाओंके फलका आश्रय बन जाता है । जो कर्म किसीने नहीं किया है, उसका भी फल उसे प्रदान कर देनेकी शक्ति उस योगीमें आ जाती है, अर्थात् जिसको जो वरदान, शाप या आशीर्वाद देता है, वह सत्य हो जाता है ॥ ३६ ॥

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥ ३७ ॥

अस्तेयप्रतिष्ठायाम् = चोरीके अभावकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर ( उस * वाल्मीकीय रामायणवनकाण्डमें अगस्त्याश्रमके वर्णनमें आता है—

यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा ।

तदाप्रभृति निर्वैराः प्रशान्ता रजनीचराः ॥

अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः ।

अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः ॥

नात्र जीवन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः ।

नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः ॥

( सर्ग ११ । ८३, ८६, ९ ० ) तुलसीकृत रामायणके अयोध्याकाण्डमें भी आया है—

खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥

( वाल्मीकि आश्रमवर्णन ) तथा—

बरु बिहाइ चरहिं एक संगा । जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥

( चित्रकूटवर्णन )

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साधनपाद - २ ६ ९ योगीके सामने ); सर्वरत्नोपस्थानम् = सब प्रकारके रत्न प्रकट हो जाते हैं । व्याख्या — जब साधकमें चोरीका अभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाता है, तब पृथ्वीमें जहाँ कहीं भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं ॥ ३७ ॥

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥ ३८ ॥

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायाम् = ब्रह्मचर्यकी दृढ़ स्थिति वीर्यलाभः = सामर्थ्यका लाभ होता है । व्याख्या — जब साधकमें ब्रह्मचर्यकी पूर्णतया दृढ़ है, तब उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरमें अपूर्व हो जाता है, साधारण मनुष्य किसी काममें भी उसकी सकते ॥ ३८ ॥

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥ हो जानेपर; स्थिति हो जाती शक्तिका प्रादुर्भाव बराबरी नहीं कर ३ ९ ॥ अपरिग्रहस्थैर्ये = अपरिग्रहकी स्थिति हो जानेपर; जन्मकथन्तासंबोध: = । पूर्वजन्म कैसे हुए थे? इस बातका भलीभाँति ज्ञान हो जाता है । व्याख्या — जब योगीमें अपरिग्रहका भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और वर्तमान जन्मकी सब बातें मालूम हो जाती हैं अर्थात् मैं पहले किस योनिमें हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा- ये सब स्मरण हो जाते हैं और इस जन्मकी भी बीती हुई सब बातें स्मरण हो जाती हैं । यह ज्ञान भी संसारमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म - मरणसे छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करनेवाला है । यहाँतक यमोंकी सिद्धिका जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे कैवल्यकी प्राप्तिमें भी सहायता मिलती है ॥३ ९ ॥ सम्बन्ध — अब नियमोंके पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन सूत्रोंमें पूर्णप्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रखी गयी है । इससे यह मालूम होता है कि साधक इनका जितना पालन करता