श्रीगणेशाय नमः।
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 71–80
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
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७० पातञ्जलयोगदर्शन है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है । सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं— शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥ ४० ॥
शौचात् - शौचके पालनसे; स्वाङ्गजुगुप्सा = अपने अंगोंमें वैराग्य ( और ); परैः असंसर्ग: -दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा ( उत्पन्न होती है ) । व्याख्या - बाह्य शुद्धिके पालनसे साधककी अपने शरीरमें अपवित्र बुद्धि होकर उसमें वैराग्य हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे सांसारिक मनुष्योंके साथ संसर्ग करनेकी इच्छा नहीं रहती अर्थात् उनके संगमें भी प्रवृत्ति या आसक्ति नहीं रहती ॥४० ॥
सम्बन्ध - भीतरकी शुद्धिका फल बतलाते हैं-सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्रचेन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१ ॥
च = इसके; सिवा सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि = । अन्तःकरणकी शुद्धि, मनमें प्रसन्नता, चित्तकी एकाग्रता, इन्द्रियोंका वशमें होना और आत्मसाक्षात्कारकी योग्यता - ये पाँचों भी होते हैं । व्याख्या - मैत्री आदिकी भावनाके द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये अभ्यास करनेसे राग - द्वेष, ईर्ष्या आदि मलोंका अभाव होकर मनुष्यका अन्तःकरण निर्मल और स्वच्छ हो जाता है । मनकी व्याकुलताका नाश होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है; विक्षेप - दोषका नाश होकर एकाग्रता आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अतः उसमें आत्मदर्शनकी योग्यता आ जाती है । इस प्रकार इसके ऊपरवाले सूत्रमें तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी शुद्धिका फल बतलाया गया है ॥ ४१ ॥
संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥ ४२ ॥
संतोषात् - संतोषसे; अनुत्तमसुखलाभः = जिससे उत्तम दूसरा कोई सुख नहीं है - ऐसे सर्वोत्तम सुखका लाभ होता है ।
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साधनपाद - २ ७१ व्याख्या– संतोषसे अर्थात् चाहरहित होनेपर जो अनन्त सुख मिलता है, उसकी बराबरी दूसरा कोई सांसारिक सुख नहीं कर सकता । वह ही सर्वोत्तम सुख है ॥४२ ॥
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥ ४३ ॥
तपसः = तपके प्रभावसे; अशुद्धिक्षयात् = जब अशुद्धिका नाश हो जाता है, तब; कायेन्द्रियसिद्धिः = शरीर और इन्द्रियोंकी सिद्धि हो जाती है । व्याख्या — स्वधर्म - पालनके लिये व्रत - उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम ' तप ' है ( योग ० २ ।१ की टीका ) । इसके अभ्याससे शरीर और इन्द्रियोंके मलका नाश हो जाता है, तब योगीका शरीर स्वस्थ, स्वच्छ और हलका हो जाता है तथा तीसरे पादके पैंतालीसवें और छियालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई काय - सम्पद्रूप शरीर - सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं एवं सूक्ष्म, दूर देशमें और व्यवधानयुक्त स्थानमें स्थित विषयोंको देखना, सुनना आदि इन्द्रिय-सम्बन्धी सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है ॥ ४३ ॥
स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥ ४४ ॥
स्वाध्यायात् = स्वाध्यायसे; इष्टदेवतासम्प्रयोगः - = इष्टदेवताकी भलीभाँति प्राप्ति ( साक्षात्कार ) हो जाती है । व्याख्या - शास्त्राभ्यास, मन्त्रजप और अपने जीवनका अध्ययनरूप स्वाध्यायके प्रभावसे योगी जिस इष्टदेवका दर्शन करना चाहता है, उसीका दर्शन हो जाता है ॥ ४४ ॥
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥
ईश्वरप्रणिधानात् = ईश्वर - प्रणिधानसे; समाधिसिद्धिः = समाधिकी सिद्धि हो जाती है । व्याख्या - ईश्वरकी शरणागतिसे योगसाधनमें आनेवाले विघ्नोंका नाश होकर शीघ्र ही समाधि निष्पन्न हो जाती है ( योग ० १ । २३ ), क्योंकि
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७२ पातञ्जलयोगदर्शन ईश्वरपर निर्भर रहनेवाला साधक तो केवल तत्परतासे साधन करता रहता है, उसे साधनके परिणामकी चिन्ता नहीं रहती । उसके साधनमें आनेवाले विघ्नोंको दूर करनेका और साधनकी सिद्धिका भार ईश्वरके जिम्मे पड़ जाता है, अतः साधनका अनायास और शीघ्र पूर्ण होना स्वाभाविक ही है ॥ ४५ ॥
सम्बन्ध — यहाँतक यम और नियमोंका फलसहित वर्णन किया गया; अब आसनके लक्षण, उपाय और उसका फल क्रमसे बतलाते हैं— स्थिरसुखमासनम् ॥ ४६ ॥
स्थिरसुखम् = निश्चल ( हिलन चलनसे रहित ) सुखपूर्वक बैठनेका नाम; आसनम् = ' आसन ' है । व्याख्या – हठयोगमें आसनोंके बहुत भेद बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ सूत्रकारने उनका वर्णन नहीं करके बैठनेका तरीका साधककी इच्छापर ही छोड़ दिया है । भाव यह है कि जो साधक अपनी योग्यताके अनुसार जिस रीति से बिना हिले - डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके वही आसन उसके लिये उपयुक्त है । इसके सिवा, जिसपर बैठकर साधन किया जाता है, उसका नाम भी आसन है; अतः वह भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये * ॥ ४६ ॥
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥ ४७ ॥
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् = ( उक्त आसन ) प्रयत्नकी शिथिलतासे और अनन्त ( परमात्मा ) - में मन लगानेसे ( सिद्ध होता है ) । श्रीमद्भगवद्गीतामें जिस आसनपर बैठकर योगाभ्यास करनेके लिये कहा है, उसे स्थिर और अचल स्थापन करनेके लिये कहा है और उसपर बैठनेका तरीका इस प्रकार बतलाया है कि शरीर, गला और सिर- ये तीनों सीधे और स्थिर रहें, वहाँ भी किसी विशेष आसनका नाम नहीं दिया है ( देखिये गीता अध्याय ६,
श्लोक ११ से १३ तक तथा श्वेता ० उ ० २।८, १० ) ।
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साधनपाद - २ ७३ व्याख्या – शरीरको सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद शरीर - सम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता है, इससे और परमात्मामें मन लगानेसे – इन दो उपायोंसे आसनकी सिद्धि होती है । यहाँ बहुत - से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ समाधि किया है । भोजराजने अनन्तका अर्थ आकाशादि किया है । और समापत्तिका अर्थ चित्तका तद्रूप हो जाना किया है; किंतु योगके अंगोंमें समाधि अन्तिम अंग है, उसीके लिये आसन आदि अंगोंका अनुष्ठान है । आसनको समाधिका बहिरंग साधन भी बतलाया गया है । अतः किसी प्रकारकी भी समाधिको आसनकी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसंगत नहीं होता । सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर विचार करें ॥ ४७ ॥
ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥ ४८ ॥
ततः = उस ( आसनकी सिद्धि ) - से; द्वन्द्वानभिघातः- ( शीत - उष्ण आदि ) द्वन्द्वोंका आघात नहीं लगता । व्याख्या - आसन - सिद्धि हो जानेसे शरीरपर सर्दी, गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, शरीरमें उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी शक्ति आ जाती है । अतः वे द्वन्द्व चित्तको चंचल बनाकर साधनमें विघ्न नहीं डाल सकते ॥ ४८ ॥
सम्बन्ध - अब प्राणायामका सामान्य लक्षण बतलाते हैं-तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥ ४ ९ ॥ तस्मिन् सति = उस सिद्धि बाद; श्वासप्रश्वासयोः - श्वास और प्रश्वासकी; गतिविच्छेद: - गतिका रुक जाना; प्राणायामः = ' प्राणायाम ' है । व्याख्या - प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है । इन दोनोंकी गतिका रुक जाना अर्थात्
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७४ पातञ्जलयोगदर्शन प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका सामान्य लक्षण है । यहाँ आसनकी सिद्धिके बाद प्राणायामका सम्पन्न होना बतलाया है । इसमें यह प्रतीत होता है कि आसनकी स्थिरताका अभ्यास किये बिना ही जो प्राणायाम करते हैं, वे गलत रास्तेपर हैं । प्राणायामका अभ्यास करते समय आसनकी स्थिरता परम आवश्यक है ॥ ४ ९ ॥ सम्बन्ध — उक्त प्राणायामके भेदोंको समझानेके लिये तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन करते हैं-बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५० ॥
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः = ( उक्त प्राणायाम ) बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति ( ऐसे तीन प्रकारका ) होता है, ( तथा वह ); देशकाल -संख्याभिः = देश, काल और संख्याद्वारा; परिदृष्ट: - भलीभाँति देखा जाता हुआ; दीर्घसूक्ष्मः = लम्बा और हलका ( होता जाता है ) । व्याख्या - अगले सूत्रमें जिस प्राणायामके लक्षण किये गये हैं उसे चौथा प्राणायाम बतलाया है । इससे यह सिद्ध होता है कि इस सूत्र में तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन है और उन तीनों प्रकारके ही प्राणायामोंको साधक देश, काल और संख्याद्वारा देखता रहता है कि वे किस अवस्थातक पहुँच चुके हैं । इस प्रकार परीक्षा करते - करते वे प्राणायाम जैसे - जैसे उन्नत होते जाते हैं वैसे -ही - वैसे उनमें लम्बाई और हलकापन बढ़ता चला जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि स्तम्भवृत्तिरूप तृतीय प्राणायाममें भी देशका सम्बन्ध रहता है, अन्यथा वह देश, काल और संख्याद्वारा परिदृष्ट कैसे होगा? प्राणायामके तीन भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये । ( १ ) बाह्यवृत्ति — प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ - ही - साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने
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साधनपाद - २ ७५ समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है । यह ' बाह्यवृत्ति ' प्राणायाम है, इसे ' रेचक ' भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है । अभ्यास करते - करते यह दीर्घ ( लम्बा ) अर्थात् बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म अर्थात हलका अनायास साध्य हो जाता है । ( २ ) आभ्यन्तरवृत्ति – प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ - ही - साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है; वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है । यह ' आभ्यन्तर ' प्राणायाम है; इसे ' पूरक ' प्राणायाम भी कहते हैं; क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है । अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है । ( ३ ) स्तम्भवृत्ति – शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर निकलने या ले जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो, जहाँ हो, वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना ( रोक देना ) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समय में स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है, यह ' स्तम्भवृत्ति ' प्राणायाम है; इसे ' कुम्भक ' प्राणायाम भी कहते हैं । अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है । कोई - कोई टीकाकार इसे केवल ' कुम्भक ' कहते हैं और कोई - कोई चौथे प्राणायामको केवल कुम्भक कहते हैं । इस तीसरे और अगले सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके भेदका निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है । साधक किसी भी प्राणायामका अभ्यास करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये ॥ ५० ॥
सम्बन्ध— चौथे प्राणायामका वर्णन करते हैं-
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७६ पातञ्जलयोगदर्शन बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ ५१ ॥
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी = - बाहर और भीतरके विषयोंका त्याग कर देनेसे अपने - आप होनेवाला; चतुर्थः = चौथा प्राणायाम है । व्याख्या - बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात् इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके ज्ञानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस किसी देशमें रुक जाती है; वह चौथा प्राणायाम है । यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके प्राणायामोंसे सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये सूत्रमें ' चतुर्थः ' पदका प्रयोग किया गया है । यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है । इसमें मनकी चंचलता शान्त होनेके कारण अपने - आप प्राणोंकी गति रुकती है और पहले बतलाये हुए प्राणायामोंमें प्रयत्नद्वारा प्राणोंकी गतिको रोकनेका अभ्यास करते - करते प्राणोंकी गतिका निरोध होता है, यही इसकी विशेषता है ॥५१ ॥
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२ ॥
ततः = उस ( प्राणायामके अभ्यास ) - से; प्रकाशावरणम् = प्रकाश ( ज्ञान ) -का आवरण; क्षीयते = क्षीण हो जाता है । व्याख्या — जैसे - जैसे मनुष्य प्राणायामका अभ्यास करता है, वैसे -ही - वैसे उसके संचित कर्म - संस्कार और अविद्यादि क्लेश दुर्बल होते चले जाते हैं । ये कर्म, संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञानका आवरण ( परदा ) है । इस परदेके कारण ही मनुष्यका ज्ञान ढका रहता है, अत: वह मोहित हुआ रहता है । जब यह परदा दुर्बल होते - होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब साधकका ज्ञान सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है ( गीता ५ । १६ ) । इसलिये साधकको प्राणायामका अभ्यास अवश्य करना चाहिये ॥ ५२ ॥
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साधनपाद - २ ७७ सम्बन्ध — प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं-धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३ ॥
च = तथा; धारणासु = धारणाओंमें; मनसः = मनकी; योग्यता = योग्यता ( भी हो जाती है ) । व्याख्या– प्राणायामके अभ्याससे मनमें धारणाकी योग्यता भी आ जाती है, यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है ॥ ५३ ॥
सम्बन्ध — अब प्रत्याहारके लक्षण बतलाते हैं-स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥ ५४ ॥
स्वविषयासम्प्रयोगे - अपने विषयोंके सम्बन्धसे रहित होनेपर; इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंका; चित्तस्वरूपानुकारः इव = जो चित्तके स्वरूपमें तदाकार - सा हो जाना है, वह; प्रत्याहारः = प्रत्याहार है । व्याख्या— उक्त प्रकारसे प्राणायामका अभ्यास करते - करते मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें विलीन करनेके अभ्यासका नाम ' प्रत्याहार ' है । जब साधनकालमें साधक इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके चित्तको अपने ध्येयमें लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर चित्तमें विलीन - सा हो जाना है, यह प्रत्याहार सिद्ध होनेकी पहचान है । यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके अभ्याससे इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि प्रत्याहार नहीं हुआ । उपनिषदोंमें भी ' वाक् ' शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही भाव दिखलाया है * ॥५४ ॥
* यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः । ( कठ ० १ । ३ । १३ ) ' बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह वाक् आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो— मनमें विषयोंकी स्फुरणा न रहे । '
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७८ पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध — अब प्रत्याहारका फल बतलाकर इस द्वितीय पादकी समाप्ति करते हैं-ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥
ततः - उस ( प्रत्याहार ) - से; इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंकी; परमा = परम; वश्यता = वश्यता ( हो जाती है ) । व्याख्या - प्रत्याहार सिद्ध हो जानेपर योगीकी इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा अभाव हो जाता है । प्रत्याहारकी सिद्धि हो जानेके बाद इन्द्रिय - विजयके लिये अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ ५५ ॥
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ विभूतिपाद - ३ सम्बन्ध — दूसरे पादमें योगांगोंके वर्णनका आरम्भ करके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार - इन पाँच बहिरंग - साधनोंका फलसहित वर्णन किया गया; शेष धारणा, ध्यान और समाधि - इन तीन अन्तरंग - साधनोंका वर्णन इस पादमें किया जाता है; क्योंकि ये तीनों जब किसी एक ध्येयमें पूर्णतया किये जाते हैं, तब इनका नाम संयम हो जाता है । योगकी विभूतियाँ प्राप्त करनेके लिये संयमकी आवश्यकता है, अतः इन अन्तरंग - साधनोंका वर्णन साधनपादमें न करके इस विभूतिपादमें करते हुए पहले धारणाका स्वरूप बतलाते हैं-देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१ ॥
चित्तस्य देशबन्ध: - ( बाहर या शरीर के भीतर कहीं भी ) किसी एक देशमें चित्तको ठहराना; धारणा = धारणा है । व्याख्या - नाभिचक्र, हृदय - कमल आदि शरीरके भीतरी देश हैं और आकाश या सूर्य - चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी पदार्थ बाहरके देश हैं, उनमेंसे किसी एक देशमें चित्तकी वृत्तिको लगानेका नाम ' धारणा ' है ॥ १ ॥
सम्बन्ध - ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं-तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२ ॥
तत्र = ( जहाँ चित्तको लगाया जाय ) उसीमें; प्रत्ययैकतानता = वृत्तिका एकतार चलना, ध्यानम् = ध्यान है । व्याख्या - जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना ' ध्यान ' है ॥२ ॥