श्रीगणेशाय नमः।

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 81–90

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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८० पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध — समाधिका स्वरूप बतलाते हैं-तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥ ३ ॥

अर्थमात्रनिर्भासम् = जब ( ध्यानमें ) केवल ध्येयमात्रकी ही प्रतीति होती है और; स्वरूपशून्यमिव = चित्तका निज स्वरूप शून्य - सा हो जाता है, तब; तदेव = वही ( ध्यान ही ); समाधिः = समाधि हो जाता है । व्याख्या - ध्यान करते - करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव - सा हो जाता है, उसको ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम ' समाधि ' हो जाता

है । यह लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है ।

( योग ० १ । ४३ ) ॥ ३ ॥

सम्बन्ध — उक्त तीनों साधनोंका सांकेतिक नाम बतलाते हैं-त्रयमेकत्र संयमः ॥४ ॥

एकत्र = किसी एक ध्येय - विषयमें; त्रयम् = तीनोंका होना; संयमः = संयम है । व्याख्या- किसी एक ध्येय पदार्थमें धारणा, ध्यान और समाधि -ये तीनों होनेसे ' संयम ' कहलाता है । अतः इस ग्रन्थमें जहाँ - तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥ ४ ॥

सम्बन्ध - संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं-तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥ ५ ॥

तज्जयात् - उसको जीत लेनेसे; प्रज्ञालोकः = बुद्धिका प्रकाश होता है । व्याख्या— साधन करते - करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है, अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगी बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक

पृष्ठ 82

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विभूतिपाद —३ ८१ ज्ञानशक्ति आ जाती है । इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके और ऋतम्भरा प्रज्ञाके नामसे कहा है ( योग ० १ । ४७-४८ ) ॥ ५ ॥

सम्बन्ध - संयम प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं-तस्य भूमिषु विनियोगः ॥ ६ ॥

तस्य = उस ( संयम ) -का ( क्रमसे ); भूमिषु = भूमियोंमें; विनियोगः = विनियोग ( करना चाहिये ) । व्याख्या — संयमका प्रयोग क्रमसे करना चाहिये अर्थात् पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये । वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये । इसी प्रकार जिस - जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस - उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६ ॥

सम्बन्ध — उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं-त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७ ॥

पूर्वेभ्यः = पहले कहे हुओंकी अपेक्षा; त्रयम् = ये तीनों ( साधन ); अन्तरङ्गम् = अन्तरंग हैं । व्याख्या — इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार - ये पाँच अंग बतलाये गये हैं, उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि – ये तीनों साधन अन्तरंग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग - सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥ ७ ॥

सम्बन्ध - निर्बीज - समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं-तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥ ८ ॥

तदपि = वे ( ऊपर कहे हुए धारणा आदि तीनों ) भी; निर्बीजस्य = निर्बीज-समाधिके; बहिरङ्गम् = बहिरंग ( साधन ) हैं । व्याख्या – पर - वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज - समाधि सिद्ध होती है ( योग ० १।५१ ) । अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरंग

पृष्ठ 83

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८२ पातञ्जलयोगदर्शन साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है ( योग ० १ । १८ ); किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८ ॥

सम्बन्ध— गुणोंका स्वभाव चंचल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है । चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता । अतः निरोध-समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं-व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोध-क्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥ ९ ॥

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोः अभिभवप्रादुर्भावौ = व्युत्थान - अवस्थाके संस्कारोंका दब जाना और निरोध - अवस्थाके संस्कारोंका प्रकट हो जाना – यह; निरोधक्षणचित्तान्वयः - निरोधकालमें चित्तका निरोध- संस्कारानुगत होना; निरोधपरिणामः - निरोध - परिणाम है । व्याख्या – निरोध - समाधिमें चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अभाव हो जानेपर भी उनके संस्कारोंका नाश नहीं होता । उस कालमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, यह बात पहले पादमें कही है ( योग ० १ । १८ ) । अतः निरोधकालमें चित्त व्युत्थान और निरोध दोनों ही प्रकारके संस्कारमें व्याप्त रहता है, क्योंकि चित्त धर्मी है और संस्कार उसके धर्म हैं; धर्मी अपने धर्ममें सदैव व्याप्त रहता है यह नियम है ( योग ० ३ । १४ ) । उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके संस्कारोंका दब जाना और निरोध - संस्कारोंका प्रकट हो जाना है तथा चित्तका निरोध- संस्कारोंसे सम्बन्धित हो जाना है, यह व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें परिणत होनारूप निरोध - परिणाम है । * निरोध- समाधिकी * यहाँ समाधि - परिणाम और एकाग्रता - परिणामके लक्षण पहले न करके पहले निरोध- परिणामका स्वरूप बतलाया है । इसका यह कारण मालूम होता है कि आठवें सूत्रमें निरोध- समाधिका वर्णन आ गया । इसलिये पहले निरोध - परिणामका लक्षण बतलाना आवश्यक हो गया; क्योंकि पहले ( योग ० १।५१ में ) निरोध- समाधिका लक्षण करते हुए सब वृत्तियोंके निरोधसे निर्बीज - समाधिका होना बतलाया है । अतः उसमें परिणाम न होनेकी धारणा स्वाभाविक हो जाती है; परन्तु जबतक चित्तकी

पृष्ठ 84

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विभूतिपाद –३ ८३ अपेक्षा सम्प्रज्ञात - समाधि भी व्युत्थान- अवस्था ही है ( योग ० ३ । ८ ) । अतः उसके संस्कारोंको यहाँ व्युत्थान- संस्कारोंके ही अन्तर्गत समझना चाहिये॥९ ॥

सम्बन्ध - इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं-तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ १० ॥

संस्कारात् = संस्कारबलसे; तस्य = उस ( चित्त ) - की; प्रशान्तवाहिता = प्रशान्तवाहिता ( स्थिति ) होती है । व्याख्या - ' पहले सूत्रके कथनानुसार जब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और निरोधके संस्कार बढ़कर भरपूर हो जाते हैं, उस समय उस संस्कारमात्र शेष चित्तमें निरोध - संस्कारोंकी अधिकतासे केवल निर्मल निरोध- संस्कारधारा चलती रहती है अर्थात् केवल निरोध-संस्कारोंका ही प्रवाह चलता रहता है । यह निरुद्ध चित्तका अवस्था | परिणाम है ॥१० ॥

सम्बन्ध — अब सम्प्रज्ञात -समाधिमें चित्तका जैसा परिणाम होता है, उसका वर्णन करते हैं-सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ११ ॥

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ = सब प्रकारके विषयोंका चिन्तन करनेकी वृत्तिका क्षय हो जाना और किसी एक ही ध्येय विषयको चिन्तन करनेवाली एकाग्रता - अवस्थाका उदय हो जाना - यह; चित्तस्य = चित्तका; समाधिपरिणामः = समाधि - परिणाम है । व्याख्या — निरोध- समाधिके पहले जब योगीका सम्प्रज्ञात योग सिद्ध होता उस समय चित्तकी विक्षिप्तावस्थाका क्षय होकर एकाग्र -अवस्थाका उदय हो जाता है । निर्वितर्क और निर्विचार सम्प्रज्ञात -समाधिमें गुणोंसे भिन्न सत्ता रहती है, वह अपने कारणमें विलीन नहीं हो जाता, तबतक उसमें परिणामी होना अनिवार्य है । इसलिये निरोध परिणाम किस प्रकार होता है, यह जाननेकी इच्छा स्वाभाविक हो जाती है ।

पृष्ठ 85

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८४ पातञ्जलयोगदर्शन केवल ध्येयमात्रका ही ज्ञान रहता है, चित्तके निज स्वरूपतकका भान नहीं रहता ( योग ० १ । ४३ ); वह चित्तका विक्षिप्तावस्थासे एकाग्र अवस्थामें परिणत हो जानारूप समाधि - परिणाम है ॥ ११ ॥

सम्बन्ध — उसके बादकी स्थितिका वर्णन करते हैं ।

ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रता-परिणामः ॥ १२ ॥

ततः = उसके बाद; पुनः = फिर जब; शान्तोदितौ = शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली; तुल्यप्रत्ययौ = दोनों ही वृत्तियाँ एक - सी हो जाती हैं, तब वह; चित्तस्य - चित्तका; एकाग्रतापरिणामः = एकाग्रता - परिणाम है । व्याख्या - जब चित्त विक्षिप्त अवस्थासे एकाग्र अवस्थामें प्रवेश करता है, उस समय चित्तका जो परिणाम होता है उसका नाम समाधि -परिणाम है । जब चित्त भलीभाँति समाहित हो चुकता है, उसके बाद जो चित्तमें परिणाम होता रहता है, उसे एकाग्रता - परिणाम कहते हैं । उसमें शान्त होनेवाली वृत्ति और उदय होनेवाली वृत्ति एक - सी ही होती है । पहले कहे हुए समाधि - परिणाममें तो शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद होता है, किन्तु इसमें शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद नहीं होता, यही समाधि - परिणाममें और एकाग्रता -परिणाममें अन्तर है । सम्प्रज्ञात -समाधिकी प्रथम अवस्थामें समाधि-परिणाम होता है और उसकी परिपक्व अवस्थामें एकाग्रता - परिणाम होता है । इस एकाग्रता - परिणामके समय होनेवाली स्थितिको ही पहले पादमें निर्विचार - समाधिकी निर्मलताके नामसे कहा है ( योग ० १ । ४७ ) ॥ १२ ॥

सम्बन्ध— उपर्युक्त परिणामोंके नाम बतलाते हुए उनके उदाहरणसे अन्य समस्त वस्तुओंमें होनेवाले परिणामोंकी व्याख्या करते हैं— एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥ १३ ॥

एतेन = ( ऊपर जो चित्तके परिणाम बतला चुके हैं ) इसीसे; भूतेन्द्रियेषु = पाँचों

पृष्ठ 86

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विभूतिपाद —३ ८५ भूतोंमें और सब इन्द्रियोंमें होनेवाले; धर्मलक्षणावस्थापरिणामा: -धर्म-परिणाम, लक्षण - परिणाम और अवस्था - परिणाम - ( ये तीनों परिणाम ); व्याख्याता: = कहे जा चुके । व्याख्या — पहले नवें और दसवें सूत्रमें तो निरोध- समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म - परिणाम, लक्षण - परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है तथा ग्यारहवें और बारहवें सूत्रमें सम्प्रज्ञात -समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म - परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था - परिणामका वर्णन किया गया है । इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें ये परिणाम बराबर होते रहते हैं; क्योंकि तीनों ही गुण परिणामी हैं, अतः उनके कार्योंमें परिवर्तन होते रहना अनिवार्य है । इसलिये इस सूत्रमें यह बात कही गयी है कि ऊपरके वर्णनसे ही पाँचों भूतोंमें और समस्त इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म, लक्षण और अवस्था - परिणामोंको समझ लेना चाहिये । इनका भेद उदाहरणसहित समझाया जाता है । यह ध्यान में रखना चाहिये कि सांख्य और योगके सिद्धान्तमें कोई भी पदार्थ बिना हुए उत्पन्न नहीं होता । जो कुछ वस्तु उत्पन्न होती है, वह उत्पन्न होनेसे पहले भी अपने कारणमें विद्यमान थी और लुप्त होनेके बाद भी विद्यमान है ( योग ० ४। १२ ) । ( १ ) धर्म - परिणाम — जब किसी धर्मीमें एक धर्मका लय होकर दूसरे धर्मका उदय होता है, उसे ' धर्म - परिणाम ' कहते हैं । जैसे नवें सूत्रमें चित्तरूप धर्मीके व्युत्थान- संस्काररूप धर्मका दब जाना और निरोध - संस्काररूप धर्मका प्रकट होना बतलाया गया है । यही धर्मोंमें विद्यमान रहनेवाले चित्तरूप धर्मीका धर्म - परिणाम है । इसी प्रकार ग्यारहवें सूत्रमें जो सर्वार्थतारूप धर्मका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप धर्मका क्षय और घटरूप धर्मका उदय होना, फिर घटरूप धर्मका क्षय और ठीकरी ( फूटे हुए घटके टुकड़े ) - रूप धर्मका उदय होना - सब प्रकारके धर्मोमें

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८६ पातञ्जलयोगदर्शन विद्यमान रहनेवाले मिट्टीरूप धर्मीका धर्म - परिणाम है । इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये । ( २ ) लक्षण - परिणाम - यह परिणाम भी धर्म - परिणामके साथ-साथ हो जाता है । यह लक्षण - परिणाम धर्ममें होता है ( योग ० ४ । १२ ) । वर्तमान धर्मका लुप्त हो जाना उसका अतीत लक्षण - परिणाम है, अनागत धर्मका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण - परिणाम है और प्रकट होनेसे पहले वह अनागत लक्षणवाला रहता है । इन तीनोंको धर्मका ' लक्षण - परिणाम ' कहते हैं । ग्यारहवें सूत्रमें जो चित्तके सर्वार्थता - धर्मका क्षय होना बतलाया गया है, वह उसका अतीत लक्षण - परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्मका उदय होना बतलाया है, वह उसका वर्तमान लक्षण - परिणाम है । उदय होनेसे पहले वह अनागत लक्षण - परिणाममें था । इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके परिणामोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये । ( ३ ) अवस्था - परिणाम - जो वर्तमान लक्षणयुक्त धर्ममें नयापन से पुरानापन आता - जाता है, वह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है और वर्तमान लक्षणको छोड़कर अतीत लक्षणमें चला जाता है, यह लक्षणका ‘ अवस्था - परिणाम ' है । एकादश सूत्रके वर्णनानुसार जब चित्तरूप धर्मीका वर्तमान लक्षणवाला सर्वार्थतारूप धर्म दबकर अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, उस वर्तमान कालमें जो उसके दबनेका क्रम है वह उसका अवस्था - परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्म अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आता है तब उसका जो उदय होनेका क्रम है, वह भी अवस्था - परिणाम है । दसवें सूत्रमें निरुद्ध चित्तके अवस्था - परिणामका और बारहवेंमें एकाग्रचित्तके अवस्था - । परिणामका वर्णन है । इस प्रकार यह एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें परिवर्तन होते जाना ही अवस्था - परिणाम है । यह अवस्था-परिणाम प्रतिक्षण होता रहता है । कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक अवस्थामें नहीं रहती । यही बात दसवें और बारहवें सूत्रोंमें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके वर्तमान लक्षण - परिणाममें एक

पृष्ठ 88

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विभूतिपाद – ३ ८७ प्रकारके संस्कार और वृत्तियोंका क्षय और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है । हम बालकसे जवान और जवानसे बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह अवस्था - परिणाम अर्थात् अवस्थाका परिवर्तन प्रतिक्षणमें होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है । इसीको अवस्था - परिणाम कहते हैं । यह परिणाम विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता । आगे कहेंगे भी कि क्रमका ज्ञान परिणामके अवसानमें होता है ( योग ० ४ । ३३ ) । धर्म - परिणाममें तो धर्मीके धर्मका परिवर्तन होता है, लक्षण-परिणाममें पहले धर्मका अतीत हो जाना और नये धर्मका वर्तमान हो जाना – इस प्रकार धर्मका लक्षण बदलता है और अवस्था - परिणाममें धर्मके वर्तमान लक्षणसे युक्त रहते हुए ही उसकी अवस्था बदलती रहती है । पहले परिणामकी अपेक्षा दूसरा सूक्ष्म है और दूसरेकी अपेक्षा तीसरा सूक्ष्म है ॥१३ ॥

सम्बन्ध— धर्म और धर्मीका विवेचन करनेके लिये धर्मीका स्वरूप बतलाते हैं-शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥ १४ ॥

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती = अतीत, वर्तमान और आनेवाले धर्मो में जो अनुगत ( व्याप्त ) रहता ( आधाररूपमें विद्यमान रहता है ) वह; धर्मी = । धर्मी है । व्याख्या - द्रव्यमें सदा विद्यमान रहनेवाली अनेकों शक्तियोंका नाम धर्म है और उसके आधारभूत द्रव्यका नाम धर्मी है । भाव यह है कि जिस कारणरूप पदार्थसे जो कुछ बन चुका है, जो बना हुआ है और जो बन सकता है; वे सब उसके धर्म हैं, वे एक धर्मीमें अनेक रहते हैं तथा अपने - अपने निमित्तोंके मिलनेपर प्रकट और शान्त होते रहते हैं । उनके तीन भेद इस प्रकार हैं-( १ ) अव्यपदेश्य – जो धर्म धर्मीमें शक्तिरूपसे विद्यमान रहते हैं, व्यवहारमें आने लायक न होनेके कारण जिनका निर्देश नहीं किया जा सकता, वे ' अव्यपदेश्य ' कहलाते हैं । इन्हींको अनागत या आनेवाले भी

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८८ पातञ्जलयोगदर्शन कहते हैं । जैसे जलमें बर्फ और मिट्टीमें बर्तन अपना व्यापार करनेके लिये प्रकट होनेसे पहले शक्तिरूपमें छिपे रहते हैं । ( २ ) उदित — जो धर्म पहले शक्तिरूपसे धर्मीमें छिपे हुए थे, वे जब अपना कार्य करनेके लिये प्रकट हो जाते हैं, तब ' उदित ' कहलाते हैं । इन्हींको ' वर्तमान ' भी कहते हैं । जैसे जलमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्फका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना, मिट्टीमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्तनोंका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना । ( ३ ) जो धर्म अपना व्यापार पूरा करके धर्मीमें विलीन हो जाते हैं, वे ' शान्त ' कहलाते हैं, इन्हींको ' अतीत ' भी कहते हैं । जैसे बर्फका गलकर जलमें विलीन हो जाना और घड़ेका फूटकर मिट्टीमें विलीन हो जाना । धर्मोकी शान्त, उदित और अव्यपदेश्य – इन तीनों स्थितियोंमें ही धर्मी सदा ही अनुगत रहता है । किसी कालमें धर्मीके बिना धर्म नहीं रहते ॥ १४ ॥

सम्बन्ध - एक ही धर्मीके भिन्न - भिन्न अनेक धर्म- परिणाम कैसे होते हैं, यह बतलाते हैं-क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ १५ ॥

परिणामान्यत्वे = परिणामकी भिन्नतामें; क्रमान्यत्वम् = क्रमकी भिन्नता; हेतुः: = = कारण है । व्याख्या - एक ही द्रव्यका किसी एक क्रमसे जो परिणाम होता है, दूसरे क्रमसे उससे भिन्न दूसरा ही परिणाम होता है । अन्य प्रकारके क्रमसे तीसरा ही परिणाम होता है । जैसे हमें रूईसे वस्त्र बनाना है तो पहले रूईको धुनकर उसकी पूनी बनाकर चरखेपर कातकर उसका सूत बनाना पड़ेगा, फिर उस सूतका लम्बा ताना करेंगे, फिर उसे तानेमेंसे पार करके रोलपर चढ़ायेंगे, फिर ' वै ' मेंसे पार करके उसके आधे तन्तुओंको ऊपर उठायेंगे, आधोंको नीचे ले जायँगे और बीचमें भरनीका सूत फेंककर उस धागेको

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विभूतिपाद – ३ ८ ९ यथास्थान बैठायेंगे, फिर ऊपरवाले धागोंको नीचे लायेंगे और नीचेवालोंको ऊपर ले जायँगे, इस तरह क्रमसे करते रहनेपर अन्तमें वस्त्ररूपमें रूईका परिणाम होगा । पर यदि हमें उसी रूईसे दीपककी बत्ती बनानी है तो उसे कुछ फैलाकर थोड़ा बट दे देनेसे तुरंत बन जायगी और यदि कुएँमेंसे जल निकालनेकी रस्सी बनानी है तो पहले सूत बनाकर उन धागोंको तीन या चार भागोंमें लम्बा करके बट लगानेसे रस्सी बन जायगी । इनमें भी जैसा वस्त्र या जैसी बत्ती या जिस प्रकारकी रस्सी बनानी है वैसे ही उनमें क्रमका भेद करना पड़ेगा । इसी तरह दूसरी वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये । इससे यह सिद्ध हो गया कि क्रममें परिवर्तन करनेसे एक ही धर्मी भिन्न - भिन्न नाम - रूपवाले धर्मीसे युक्त हो जाता है, उसके परिणामकी भिन्नताका कारण क्रमकी भिन्नता ही है, दूसरा कुछ नहीं । क्रमकी भिन्नता सहकारी कारणोंके सम्बन्धसे होती है । जैसे ठंडके सम्बन्धसे जलमें बर्फरूप धर्मके प्रकट होनेका क्रम चलता और गर्मीके संयोगसे स्टीम ( भाप ) बननेका क्रम आरम्भ हो जाता है ॥ १५ ॥

सम्बन्ध — उक्त संयम किस ध्येय - वस्तुमें सिद्ध कर लेनेपर उससे क्या फल मिलता है; इसका वर्णन यहाँसे इस पादकी समाप्तिपर्यन्त किया गया है । इनको ही योगकी ' विभूति ' अर्थात् भिन्न - भिन्न प्रकारका महत्त्व कहते हैं । ( इन सबको समझकर योगीको चाहिये कि अपने लिये जो सबसे बढ़कर फल मालूम पड़े, उसे चुन ले । ) ऊपर तीन प्रकारके परिणामोंका वर्णन किया गया, अतः पहले इनमें संयम करनेका फल बतलाते हैं-परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥ १६ ॥

परिणामत्रयसंयमात् = ( उक्त ) तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे; अतीतानागतज्ञानम् = अतीत ( भूत ) और अनागत ( भविष्य - होनहार ) -का ज्ञान ( हो जाता है ) ।