श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — प्रथम अध्याय, प्रथम पाद (१–४ · चतुःसूत्री)

4 मूल पद्य 4 संस्करणसे मिलाये गये

इन सूत्रों के माध्यम से ब्रह्मवेत्ता बनने की जिज्ञासा उत्पन्न करने और उस परम सत्य को जानने की प्रक्रिया का आरंभ होता है। यहाँ क्रमबद्ध रूप से जिज्ञासु की पात्रता, ब्रह्म के स्वरूप और ज्ञान प्राप्ति के साधनों पर विचार किया गया है। इस अध्ययन से पाठक को आत्म-साक्षात्कार के मार्ग की सुदृढ़ आधारशिला प्राप्त होगी।

1.1.1 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १

सूत्र १.१.१

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १.१.१ ॥

प्रथम अध्याय प्रथम पाद · सूत्र १.१.१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 53

पदच्छेद — अथ , अतः , ब्रह्मजिज्ञासा |

सूत्रार्थ — विवेक आदि साधन चतुष्टयरूप सम्पत्ति सिद्धिके अनन्तर कर्मफलके अनित्य और ज्ञानफल मोक्षके नित्य होने से मुमुक्षुको ब्रह्म जिज्ञासा करनी चाहिए।

शाङ्करभाष्य

अत्र अथशब्दः आनन्तर्यार्थः परिगृह्यते नाधिकारार्थः ब्रह्मजिज्ञासाया अनधिकार्यत्वात् मङ्गलस्य च वाक्यार्थे समन्वयाभावात् अर्थान्तरप्रयुक्त एव ह्यथशब्दः श्रुत्या मङ्गलप्रयोजनो भवति पूर्वप्रकृतापेक्षायाश्च फलत आनन्तर्याव्यतिरेकात्। सति च आनन्तर्यार्थत्वे यथा धर्मजिज्ञासा पूर्ववृत्तं वेदाध्ययनं नियमेनापेक्षते एवं ब्रह्मजिज्ञासापि यत्पूर्ववृत्तं नियमेनापेक्षते तद्वक्तव्यम्। स्वाध्यायाध्ययनानन्तर्यं तु समानम्।

नन्विह कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषः न धर्मजिज्ञासायाः प्रागपि अधीतवेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः। यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः क्रमस्य विवक्षितत्वात् न तथेह क्रमो विवक्षितः शेषशेषित्वे अधिकृताधिकारे वा प्रमाणाभावात् धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः। फलजिज्ञास्यभेदाच्च।

अभ्युदयफलं धर्मज्ञानम् तच्चानुष्ठानापेक्षम् निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानम् न चानुष्ठानान्तरापेक्षम् भव्यश्च धर्मो जिज्ञास्यो न ज्ञानकालेऽस्ति पुरुषव्यापारतन्त्रत्वात् इह तु भूतं ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यवृत्तत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम्। चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च। या हि चोदना धर्मस्य लक्षणम् सा स्वविषये नियुञ्जानैव पुरुषमवबोधयति ब्रह्मचोदना तु पुरुषमवबोधयत्येव केवलम् अवबोधस्य चोदनाजन्यत्वान्न पुरुषोऽवबोधे नियुज्यते यथा अक्षार्थसंनिकर्षेणार्थावबोधे तद्वत्।

तस्मात्किमपि वक्तव्यम् यदनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासोपदिश्यत इति। उच्यते नित्यानित्यवस्तुविवेकः इहामुत्रार्थभोगविरागः शमदमादिसाधनसंपत् मुमुक्षुत्वं च। तेषु हि सत्सु प्रागपि धर्मजिज्ञासाया ऊर्ध्वं च शक्यते ब्रह्म जिज्ञासितुं ज्ञातुं च न विपर्यये। तस्मात् अथशब्देन यथोक्तसाधनसंपत्त्यानन्तर्यमुपदिश्यते।। अतःशब्दः हेत्वर्थः।

यस्माद्वेद एव अग्निहोत्रादीनां श्रेयःसाधनानामनित्यफलतां दर्शयति तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते इत्यादिः तथा ब्रह्मज्ञानादपि परं पुरुषार्थं दर्शयति ब्रह्मविदाप्नोति परम् इत्यादिः तस्मात् यथोक्तसाधनसंपत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्या।। ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा। ब्रह्म च वक्ष्यमाणलक्षणम् जन्माद्यस्य यतः इति। अत एव न ब्रह्मशब्दस्य जात्याद्यर्थान्तरमाशङ्कितव्यम्।

ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी न शेषे जिज्ञास्यापेक्षत्वाज्जिज्ञासायाः जिज्ञास्यान्तरानिर्देशाच्च। ननु शेषषष्ठीपरिग्रहेऽपि ब्रह्मणो जिज्ञासाकर्मत्वं न विरुध्यते संबन्धसामान्यस्य विशेषनिष्ठत्वात् एवमपि प्रत्यक्षं ब्रह्मणः कर्मत्वमुत्सृज्य सामान्यद्वारेण परोक्षं कर्मत्वं कल्पयतो व्यर्थः प्रयासः स्यात्। न व्यर्थः ब्रह्माश्रिताशेषविचारप्रतिज्ञानार्थत्वादिति चेत् न प्रधानपरिग्रहे तदपेक्षितानामप्यर्थाक्षिप्तत्वात्। ब्रह्म हि ज्ञानेनाप्तुमिष्टतमत्वात्प्रधानम्।

तस्मिन्प्रधाने जिज्ञासाकर्मणि परिगृहीते यैर्जिज्ञासितैर्विना ब्रह्म जिज्ञासितं न भवति तान्यर्थाक्षिप्तान्येवेति न पृथक्सूत्रयितव्यानि। यथा राजासौ गच्छति इत्युक्ते सपरिवारस्य राज्ञो गमनमुक्तं भवति तद्वत्। श्रुत्यनुगमाच्च। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते इत्याद्याः श्रुतयः तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म इति प्रत्यक्षमेव ब्रह्मणो जिज्ञासाकर्मत्वं दर्शयन्ति। तच्च कर्मणिषष्ठीपरिग्रहे सूत्रेणानुगतं भवति। तस्माद्ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी।। ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा।

अवगतिपर्यन्तं ज्ञानं सन्वाच्याया इच्छायाः कर्म फलविषयत्वादिच्छायाः। ज्ञानेन हि प्रमाणेनावगन्तुमिष्टं ब्रह्म। ब्रह्मावगतिर्हि पुरुषार्थः निःशेषसंसारबीजाविद्याद्यनर्थनिबर्हणात्। तस्माद्ब्रह्म जिज्ञासितव्यम्।। तत्पुनर्ब्रह्म प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा स्यात् यदि प्रसिद्धं न जिज्ञासितव्यम्। अथाप्रसिद्धं नैव शक्यं जिज्ञासितुमिति। उच्यते अस्ति तावद्ब्रह्म नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमन्वितम्।

ब्रह्मशब्दस्य हि व्युत्पाद्यमानस्य नित्यशुद्धत्वादयोऽर्थाः प्रतीयन्ते बृंहतेर्धातोरर्थानुगमात्। सर्वस्यात्मत्वाच्च ब्रह्मास्तित्वप्रसिद्धिः। सर्वो ह्यात्मास्तित्वं प्रत्येति न नाहमस्मि इति। यदि हि नात्मास्तित्वप्रसिद्धिः स्यात् सर्वो लोकः नाहमस्मि इति प्रतीयात्। आत्मा च ब्रह्म। यदि तर्हि लोके ब्रह्म आत्मत्वेन प्रसिद्धमस्ति ततो ज्ञातमेवेत्यजिज्ञास्यत्वं पुनरापन्नम् न तद्विशेषं प्रति विप्रतिपत्तेः। देहमात्रं चैतन्यविशिष्टमात्मेति प्राकृता जना लौकायतिकाश्च प्रतिपन्नाः।

इन्द्रियाण्येव चेतनान्यात्मेत्यपरे। मन इत्यन्ये। विज्ञानमात्रं क्षणिकमित्येके। शून्यमित्यपरे। अस्ति देहादिव्यतिरिक्तः संसारी कर्ता भोक्तेत्यपरे। भोक्तैव केवलं न कर्तेत्येके। अस्ति तद्व्यतिरिक्त ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति केचित्। आत्मा स भोक्तुरित्यपरे। एवं बहवो विप्रतिपन्ना युक्तिवाक्यतदाभाससमाश्रयाः सन्तः। तत्राविचार्य यत्किंचित्प्रतिपद्यमानो निःश्रेयसात्प्रतिहन्येत अनर्थं चेयात्।

तस्माद्ब्रह्मजिज्ञासोपन्यासमुखेन वेदान्तवाक्यमीमांसा तदविरोधितर्कोपकरणा निःश्रेयसप्रयोजना प्रस्तूयते।। ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तम्। किंलक्षणं पुनस्तद्बह्मेत्यत आह भगवान्सूत्रकारः।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रस्थ ‘ अथ ’ शब्द आनन्तर्यार्थिक परिगृहीत है, आरम्भार्थक नहीं, क्योंकि ब्रह्मजिज्ञासाका आरम्भ नहीं किया जा सकता और मङ्गलका वाक्यार्थ में समन्वय नहीं होता, इसलिए अन्य अर्थमें ( आनन्तर्यार्थ में ) प्रयुक्त हुआ ही ' अथ ' शब्द श्रवणद्वारा मङ्गलरूप प्रयोजनवाला होता है। फल ( विचार ) की कारण भूत पूर्व प्रकृत ( पूर्ववर्तमान ) के साथ जो अपेक्षा है उसका आन तर्यसे भेद नहीं है। तो ' अथ ' शब्दके आनन्तर्यार्थक होनेपर जैसे धर्मजिज्ञासा पहले नियमसे होनेवाले कारण भूत वेदाध्ययनकी अपेक्षा रखती है, वैसे ही ब्रह्मजिज्ञासा भी पहले नियमसे रहनेवाली जिस वस्तुकी अपेक्षा रखती हो उसे कहना चाहिए। [ यदि स्वाध्याय- अध्ययनका आनन्तर्य माना जाय तो वह ठीक नहीं, क्योंकि ] स्वाध्याय अध्ययनका आनन्तर्य तो दोनों ( धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा ) में समान है। यदि कहो कि ब्रह्मजिज्ञासामें धर्मजिज्ञासांसे कर्मज्ञानका आनन्तर्य विशेष है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अधी वेदान्त पुरुषको भी धर्मजिज्ञासा से पहले ब्रह्मजिज्ञासा हो सकती है।

और जैसे हृदय आदि अवदानों ( छेदन ) में आनन्तर्य क्रमका नियम है, क्योंकि वहाँ क्रम विवक्षित है, वैसे यहाँ ( ब्रह्मजिज्ञासा में ) क्रम विवक्षित नहीं है। धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा में अङ्गाङ्गिभाव अथवा अधिकृताधिकार माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, एवं दोनोंके फल और जिज्ञास्यमें अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं तच्चानुष्ठानापेक्षम्। निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मविज्ञानं, न चानुष्ठानाभी भेद है। धर्म ज्ञान अभ्युदय फलवाला है तथा वह अनुष्ठानकी अपेक्षा रखता है। ब्रह्मज्ञान तो मोक्षरूप फलवाला है और वह अन्य अनुष्ठानोंकी अपेक्षा नहीं रखता।

धर्मजिज्ञासाका विषय धर्म भव्य साध्य ) है और ज्ञानकालमें नहीं है, क्योंकि वह पुरुष व्यापारके अधीन है | यहाँ - ब्रह्ममीमांसा में तो सिद्ध ब्रह्म जिज्ञास्य है, वह नित्य होनेसे पुरुषव्यापारके अधीन नहीं है। किञ्च बोधक प्रमाणकी प्रवृत्तिके भेदसे भी जिज्ञास्य - भेद है। जो विधि धर्मका लक्षण ( ज्ञापक ) है वह पुरुषको स्वविषयमें नियुक्त करती हुई बोध कराती है। ब्रह्मबोधक प्रमाण तो पुरुषको केवल बोध ही कराता है, अवबोध ब्रह्मप्रमाणसे जन्य है।

इसलिए ब्रह्मप्रमाण ( अयमात्मा ब्रह्म ) पुरुषको ज्ञानमें नियुक्त नहीं करता। जैसे इन्द्रिय विषयके सन्निकर्षसे उत्पन्न ज्ञानमें नियुक्ति नहीं होती। इसलिए जिसके अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासाका उपदेश किया जाता है ऐसा कोई असाधारण हेतु कहना चाहिए। कहते हैं - नित्य और अनित्य वस्तुका विवेक, इस लोक तथा परलोकस्थ विषय भोगों से विराग, शम - दम आदि साधन सम्पत्ति और मुमुक्षुता ( मोक्षकी इच्छा )।

उन साधनोंके होनेपर हो धर्मजिज्ञासासे पूर्व तथा पश्चात् भी ब्रह्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसलिये ' अथ ' शब्दसे पूर्वोक्त साधन सम्पत्तिके आनन्तर्यका उपदेश किया जाता है। अतः शब्द हेतु अर्थक है। ' तद्यथेह ० ' ( जैसे यहाँ कर्मोंसे उपार्जित अन्न आदि भोग्य पदार्थं क्षीण हो जाते हैं, वैसे ही परलोकमें पुण्य कर्मोंसे सम्पादित स्वर्ग आदि भोग भी नष्ट हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुति ही श्रेयके साधनभूत अग्निहोत्र आदिका अनित्य फल दिखलाती है।

इसी प्रकार ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( ब्रह्मज्ञानी मोक्षस्वरूप पर ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुति वाक्य ब्रह्मज्ञानसे ही परमपुरुषार्थं ( मोक्ष ) को दिखलाता है। इसलिए यथोक्त साधन सम्पत्ति के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए। ब्रह्मकी जिज्ञासा ब्रह्म जिज्ञासा है। ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्र में वक्ष्यमाण लक्षणवाला ब्रह्म है।

अतएव ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए कि ' ब्रह्म ' शब्दका जाति आदि अन्य अर्थ है | ' ब्रह्मणः ' यह कर्ममें षष्ठी है शेषमें नहीं, क्योंकि जिज्ञासाको जिज्ञास्यकी अपेक्षा होती है और यहाँ ( ब्रह्मके सिवा ) अन्य जिज्ञास्यका निर्देश नहीं है। यदि कहो कि शेष में षष्ठीके स्वीकार करनेपर भी ब्रह्म में जिज्ञासा - कर्मत्व विरुद्ध नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध सामान्य विशेषमें भी रहता है।

इसप्रकार भी ब्रह्म में प्रत्यक्ष कर्मत्वको छोड़कर सामान्य - सम्बन्ध द्वारा परोक्ष कर्मत्वकी कल्पना करनेवाले तुमको व्यर्थ ही प्रयास होगा। यदि ऐसा कहो कि यह प्रयास व्यर्थ नहीं है, क्योंकि ब्रह्मके आश्रित सब पदार्थों के विचारकी प्रतिज्ञाके लिए है? तो यह युक्त नहीं है, कारण कि प्रधानका परिग्रहण होनेपर तदपेक्षित सब पदार्थों का अर्थतः आक्षेप ( ग्रहण ) हो जाता है। ब्रह्म ही ज्ञानसे प्राप्त करनेके लिए इष्टतम होनेसे प्रधान है।

जिज्ञासाके कर्म उस प्रधानका परिग्रह होनेपर जिन जिज्ञासितोंके विना ब्रह्म जिज्ञासित नहीं होता वे तो अर्थतः आक्षिप्त ( ग्रहण ) किये जाते हैं, अतः उनको पृथक् सूत्रित नहीं करना चाहिए अर्थात् सूत्रमें उनके पृथक् ग्रहणकी अपेक्षा नहीं है। जैसे कि ' यह राजा जाता है ' ऐसा कहने से सपरिवार राजाके गमनका कथन हो जाता है, वैसे ही।

और श्रुतिके अनुगमसे भी कर्ममें षष्ठी है, ‘ यतो वा ० ' ( जिससे ये प्राणी उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि श्रुतियाँ ' तद्विजिज्ञासस्व ' ( उसकी जिज्ञासा कर वह ब्रह्म है ) इस वाक्यके द्वारा प्रत्यक्षरूप से ब्रह्मको ही जिज्ञासाका कर्म दिखलाती हैं। वह कम में षष्ठी मानने से हो सूत्र से अनुगत होता है अर्थात् सूत्रके साथ श्रुतिकी एकवाक्यता होती है, इसलिए ' ब्रह्मणः ' यह कर्ममें षष्ठी है। जानने की इच्छाका नाम जिज्ञासा है।

ब्रह्म साक्षात्कार पर्यन्त ज्ञान सन् प्रत्ययवाच्य इच्छाका कर्म है, क्योंकि इच्छा फल विषयक होती है। ब्रह्म ज्ञानरूप प्रमाणसे जानने योग्य है। ब्रह्मका साक्षात्कार ही पुरुषार्थ है, क्योंकि उससे निःशेष संसारके बीजभूत अविद्या आदि अनर्थोकी निवृत्ति होती है। अतः ब्रह्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए। वह ब्रह्म प्रसिद्ध है अथवा अप्रसिद्ध? यदि प्रसिद्ध है तो उसकी जिज्ञासा नहीं होनी चाहिए, यदि अप्रसिद्ध है तो उसकी जिज्ञासा ही नहीं हो सकती।

इसपर कहते हैं - नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिसम्पन्न ब्रह्म तो प्रसिद्ध है। ' बृह ' धातुके अर्थके अनुगमहोनेसे व्युत्पत्ति सिद्ध ब्रह्म शब्द से नित्यत्व शुद्धत्व आदि अर्थ प्रतीत होते हैं और सबका आत्मा होनेसे ब्रह्मका अस्तित्व प्रसिद्ध है। आत्मा अस्तित्वका अनुभव सबकों होता है। ' मैं नहीं हूँ ' ऐसा ज्ञान किसीको नहीं होता। यदि आत्माका अस्तित्व प्रसिद्ध न होता तो सब लोग ' मैं नहीं हूँ ' ऐसा अनुभव करते। आत्मा ही ब्रह्म है।

यदि लोक में ब्रह्म आत्मरूप से प्रसिद्ध है तो वह ज्ञात ही है, इस प्रकार पुनः ब्रह्ममें अजिज्ञास्यत्व प्राप्त हुआ? ऐसी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उसके विशेष ज्ञानमें विप्रतिपत्ति ( विवाद ) है। जैसे कि चैतन्यविशिष्ट देहमात्र आत्मा है, ऐसा प्राकृत जन तथा लोकायतिक ( चार्वाक ) मानते हैं। परन्तु दूसरे चेतन इन्द्रियोंको ही आत्मा कहते हैं। और कुछ मनको ही आत्मा मानते हैं। कोई क्षणिक विज्ञान मात्र ( बुद्धि ) को ही आत्मा कहते हैं। किन्हींके मत में शून्य आत्मा है। अन्य कहते हैं कि देह आदिसे भिन्न संसारी कर्ता भोक्ता आत्मा है। कोई ऐसा मानते हैं कि आत्मा केवल भोक्ता है कर्ता नहीं। कोई कहते हैं कि जीवसे भिन्न ईश्वर सर्वज्ञ, सर्व शक्ति सम्पन्न है। वह ईश्वर भोक्ता ( जीव ) का आत्मा ( स्वरूप ) है कोई ऐसा मानते हैं। इस प्रकार युक्ति, वाक्य तथा उनके आभासों का आश्रयकर अनेक मतभेद हैं। उन सबका वास्तविक विचार किए विना जिस किसी मतको प्राप्त करनेवाला मोक्षसे वञ्चित रहेगा और साथ ही अनर्थको प्राप्त होगा। इसलिए ब्रह्म जिज्ञासाके कथनद्वारा जिसमें अविरोधी तर्क साधनरूप हैं ऐसी मोक्ष प्रयोजनवाली वेदान्तवाक्योंकी मीमांसा प्रस्तुतकी जाती है॥ १

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' यद्यपि अध्यासकी सिद्धिके अनन्तर विषय और प्रयोजनकी सिद्धि होनेपर प्रस्तुत ग्रन्थका आरम्भ करना युक्त है, तथापि इस विचारका विषय वेदान्त पूर्वमीमांसा ( यज्ञ आदि कर्म समुदायका प्रतिपादक - वेदके पूर्व भागका विचारात्मक ) से गतार्थ है कि नहीं? इस प्रकार प्रश्नके उपस्थि होनेपर प्रस्तुत शास्त्रके आरम्भ में सन्देह हो जाता है कि क्या यह ग्रन्थ आरम्भणीय है कि नहीं? मीमांसक मतमें समस्त वेदका तात्पर्य विधिमें है।

" आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् ” ( वेद क्रियार्थक है अक्रियार्थक वेद अनर्थक है )। जैसे कि ' यजेत ' ( याग करे ) ' जुहुयात् ' ( अग्निहोत्र करे ) इत्यादि विधियाँ हैं। वेदमें यज्ञ आदि अनुष्ठानकी आज्ञा विधि कही जाती है। प्रवृत्ति निवृत्ति रहित सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेद वाक्य मन्त्र, नामधेय तथा अर्थवादकी विधिवाक्यके साथ एकवाक्यता कर धर्म में प्रामाण्य माना गया है।

" अथातो धर्मजिज्ञासा ” ( जै ० सू ० १1१1१ ) इत्यादि जैमिनि मुनि प्रणीत सूत्रोंद्वारा विधि आदिका विचार किया गया है। इस प्रकार विधिका विचार किए जानेपर वेदान्त गतार्थ है अर्थात् धर्म आदिसे पृथक् जीव ब्रह्मका ऐक्यरूप विषय वेदका अर्थ - प्रयोजन नहीं है, अतः जीव - ब्रह्मकी एकतारूप विषयके स्थिर न होनेसे इस शास्त्रका आरम्भ निष्फल है?

समाधान -- तात्पर्य यह है कि यदि ' यजेत ' इत्यादि विधियोंको ही वेदका अर्थ मानें तो ब्रह्म में वेदान्त प्रमाण सिद्ध न होगा, परन्तु सर्वज्ञकल्प भगवान् बादरायण ( वेदव्यास ) द्वारा ब्रह्मसूत्रकी रचना यह सिद्ध करती है कि वेदान्तसे अतिरिक्त अन्य शास्त्रसे ब्रह्म अवगत नहीं है। इसलिए अन्य शास्त्र से अप्रतिपाद्य ब्रह्म बोधक वेदान्त विचारात्मक प्रस्तुत शास्त्रका आरम्भ युक्त है। इस प्रकार विषय और प्रयोजन दोनों सिद्ध हुए। “ अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम्।

अस्तोममनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः " ( जो अल्प अक्षरोंवाला, असंदिग्ध अर्थवाला, सारयुक्त बहुमुखी, आकारमें छोटा और निर्दोष हो, उसे सूत्रवेत्ता सूत्ररूपसे जानते हैं ) यह सूत्रका लक्षण है।

शंका- ब्रह्म विषयक जिज्ञासा क्यों करनी चाहिए? समाधान -

" विषयों विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम्। प्रयोजनं संगतिश्च प्राञ्चोऽधिकरणं विदुः "

“ विषयः सन्देहः संगतिः पूर्वपक्ष : सिद्धान्त इत्येकैकमधिकरणं पञ्चावयवं ज्ञेयम् "

" विषय, सन्देह, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त, प्रयोजन और सङ्गति इस प्रकार विद्वान् लोग इसे अधिकरण रूपसे जानते हैं। कोई इसे पञ्चावयव भी मानते हैं। " दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ। दृष्टे साऽपार्था चैन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात्॥ ( सां ० का ० १ )

जिनसे प्रत्येक संसारी महान् दुःखका अनुभव करता रहता है, तथा जिनकी अत्यन्त निवृत्ति चाहता है वे अनुभूयमान दुःख आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक भेदसे शास्त्रोंमें तीन प्रकारके कहे गए हैं। उनमेंसे मनुष्य, पशु, पक्षी जल - थल अग्नि आदि भूतोंके निमित्तसे उत्पन्न दुःख आधिभौतिक, ग्रह, पिशाच, राक्षस आदिसे उत्पन्न दुःख आधिदैविक कहा जाता है। शारीरिक तथा मानसिक इस भेदसे आध्यात्मिक दुःख दो प्रकारका है। वात, पित्त तथा कफ इन तीनोंसे अथवा भुक्त अन्न, जल आदिसे परिणत रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि मज्जा तथा वीर्यं इन सात धातुओंसे इस स्थूल शरीरकी रचना होती है। इनके सम रहने से शरीर स्वस्थ रहता है और विषमतासे शरीर में कोई न कोई व्याधि उत्पन्न हो जाती है, जिससे दुःखका अनुभव होता है। विषय सम्बन्धी काम, क्रोध आदिसे उत्पन्न दुःख मानसिक कहा जाता है। इन दुःखोंसे आक्रान्त पुरुषको इनसे मुक्त होनेके लिए ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए।

शंका -- लौकिक उपाय बहुत हैं, जिनसे उक्त दुःख हटाए जा सकते हैं। जैसे औषधि आदिके सेवनसे शारीरिक रोग निवृत्त हो सकता है तथा सुन्दर स्त्री आदिकी प्राप्तिद्वारा काम आदि जन्य मानसिक दुःखोंकी निवृत्ति संभव है। मणि, मन्त्र आदिके अनुष्ठानसे आधिदैविक दुःखं निवृत्त हो सकते हैं। नीतिशास्त्र आदिकी कुशलतासे आधिभौतिक दुःखोंका भी जब प्रतिकार हो सकता है, तो फिर अतिपरिश्रम साध्य ब्रह्मकी जिज्ञासा क्यों करनी चाहिए?

समाधान - यद्यपि समुचित लौकिक उपायोंसे उक्त दुःखोंकी यत्किञ्चित् निवृत्ति हो सकती है, तो भी दुःख मात्रकी अत्यन्त निवृत्ति तो ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान के विना नहीं हो सकती, अतः ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्य है। शंका- यदि लौकिक उपायोंसे दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्ति नहीं हो सकती तो यज्ञ आदि वैदिक उपायोंसे हो जायेगी?

समाधान - ' दृष्टवदानुश्रविकः ' ( यज्ञ आदि वैदिक कर्म कलाप भी लौकिक उपायोंके समान ही हैं ) क्योंकि “ तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते " ( छा ० ८ | १ | ६ ) ( जैसे यहाँ लौकिक कर्मोंसे सम्पादित अन्नादि फल नष्ट हो जाता है, वैसे ही वैदिक पुण्य कर्मोंका स्वर्ग आदि फल भी क्षीण हो जाता है ) इत्यादि श्रुति प्रमाण है।

जैसे साधनोंके तारतम्यसे लौलिक फलोंमें सातिशय- तारतम्य होता है ; वैसे ही ज्योतिष्टोम वाजपेय आदि वैदिक साधनोंके तारतम्यसे स्वर्ग आदि फलों में भी तारतम्य होता है, सातिशय फल अनित्य

है। इसमें “ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति॥ " ( गी ० ९। २५

) ( वे पुण्यशाली उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर

) यह स्मृति प्रमाण है। इसलिए " मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं

L विद्यते। ” ( गी ० ८।१६ ) (

परन्तु हे कौन्तेय! मुझ आत्माको अभिन्नरूपसे प्राप्त होकर उसका पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं नित्य,

व्यापक, सबका अभिन्न अन्तरात्मा हूँ ) “ मिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते - सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य

कर्माणि तस्मिन्दृष्ठे परावरे॥ ” ( मु ० २।२।४ ) ( उस प्रत्यगभिन्न परब्रह्मके साक्षात्कार होनेसे हृदयग्रन्थि ( चित्- जड़ - ग्रन्थि ) टूट जाती है आत्मविषयक सब सन्देह नष्ट हो जाते हैं तथा सभी कर्म क्षीण हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुति, स्मृतिसे यह सिद्ध होता है कि वेदान्त शास्त्रसे भिन्न अन्य शास्त्रोंके श्रवण आदिसे संशय और विपर्यय निवृत्त नहीं होते, क्योंकि कोई इस स्थूल शरीर, कोई श्रोत्र आदि इन्द्रिय, कोई मन, बुद्धि आदिको आत्मा मानते हैं।

तथा कोई आत्मा का अणु परिमाण कोई मध्यम परिमाण मानते हैं। कोई आत्माको कर्ता, भोक्ता तथा व्यापक कहते हैं, कोई केवल भोक्ता मानते हैं। कोई आत्माको जड़, कोई चेतन, कोई जड़ चेतन उभयात्मक मानते हैं। इस प्रकार अनेक मतोंके श्रवणसे अव्युत्पन्न श्रोताको आत्मविषयक सन्देह आदि होना स्वाभाविक है। इनमें से किसी एक मतमें आस्थाको भ्रान्ति ही समझना चाहिए उससे अनर्थमय संसारकी निवृत्ति नहीं होगी। जहाँ सन्देह और प्रयोजन होते हैं वहाँ ही जिज्ञासा होती है।

उस सन्देह की निवृत्ति और प्रयोजनकी सिद्धि वेदान्तशास्त्र के विचारसे ही हो सकती है। अन्यथा नहीं, अतः सुतरां ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्य है। इस प्रकार प्रत्यगभिन्न ब्रह्मतत्त्वके जिज्ञासुको यहाँ अधिकारी ' समझना चाहिए। इसी आशयको सूत्रकारने सूत्रस्थ ' अथ ' शब्दसे सूचित किया है। ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस ‘ अथ ' शब्दका अर्थं यहाँ आनन्तर्य है। आनन्तर्य से अभिप्राय यहाँ उन्हीं साधनोंसे है जिनकी सिद्धि के अनन्तर सुमुक्षुको ब्रह्मजिज्ञासा स्वयंमेव होती है।

यद्यपि " मंगलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्यंदेवथोऽथ ” अमरकोशके इस वचनसे ' अथ ' शब्द के ' मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न, कस्यं ( पूर्ण ) इत्यादि अनेक अर्थं बताए गए हैं और इन्हीं अर्थोंमें आचार्योंने ' अथ ' शब्दका प्रयोग भी किया है। जैसे ' अथ योगानुशासनम् ' योगदर्शन के इस प्रथम सूत्रमें ' अथ ' शब्द ' आरम्भ ' अर्थ में प्रयुक्त है।

और “ अथातो धर्मजिज्ञासा " " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा " पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा के इन प्रथम सूत्रोंमें अथ शब्द ' आनन्तर्य ' अर्थ में प्रयुक्त किया गया हैं, क्योंकि आचार्योंको यहाँ आनन्तर्य अर्थ हो अभिप्रेत है।

' यहाँ ' अर्थ ' शब्दका अर्थं आनन्तर्य है आरम्भ नहीं, क्योंकि इस सूत्र में जिज्ञासा पद भी है।

१ टि ० – अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्ध ये चारों अनुबन्ध चतुष्टयनामसे शास्त्रोंमें प्रसिद्ध हैं। " ग्रन्थप्रवृत्तिप्रयोजकज्ञानविषयत्वमनुबन्धत्वम् " ( ग्रन्थ में प्रवृत्तिके प्रयोजक ज्ञान “ मदिष्टसाधनम् " का विषय अनुबन्ध है ) यहाँ साधन चतुष्टय सम्पन्नता ही अधिकारीका लक्षण है। विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षता ये साधन - चतुष्टय हैं। आत्मा सत् है और अनात्म- जगत् असत् ( मिथ्या ) है, इस भेदज्ञानका नाम विवेक है।

विवेक वैराग्यमें हेतु है, इस लोक तथा परलोकके भोगोंमें नितान्त अरुचि वैराग्य है। अनन्तर षट्सम्पत्तिकी उत्पत्ति होती है। शम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपरति और तितिक्षा, ये छ : षट्सम्पत्ति कहे जाते हैं। विषयोंसे मनका निग्रह राम और इन्द्रियोंका निग्रह दम है | वेद तथा गुरुवाक्यों में विश्वास श्रद्धा है। संयत्त मनको विषयोंकी ओर न जाने देनेका नाम समाधान है, त्यक्त पदार्थोंको पुनः इच्छा न हो वह उपरति है। भूख प्यास आदि द्वन्द्वोंका सहन तितिक्षा है।

प्रत्यगभिन्न ब्रह्मकी प्राप्ति तथा अनर्थकी अत्यन्त निवृत्ति मोक्षका स्वरूप है, उसकी प्राप्ति की इच्छाका नाम मुमुक्षता है। उक्त साधन - चतुष्टय सम्पन्न अधिकारी कहा जाता है। विषय और प्रयोजनका पहले वर्णन हो चुका है। विषय और ग्रन्थका प्रतिपाद्य - प्रतिपादकभाव, अधिकारी और विषयका प्राप्य प्रापकभाव सम्बन्ध है, इसप्रकार यह अनुबन्धं चतुष्टय है। क्या जिज्ञासा पदका अर्थ ज्ञानकी इच्छा है अथवा लक्षणासे विचार?

प्रथमपक्ष में ' अर्थ ' शब्दके आरम्भार्थक होने से ब्रह्मज्ञानकी इच्छा आरम्भ की जाती है, ऐसा सूत्रका अर्थ होगा, परन्तु यह अर्थ, असङ्गत है, क्योंकि इच्छा आरम्भ करने योग्य नहीं है। प्रत्येक अधिकरणमें इच्छाका आरम्भ नहीं होता, किन्तु उसके द्वारा विचार किया जाता है।

दूसरे पक्षमें कर्तव्य पदका अध्याहार किए विना यह अर्थं सिद्ध नहीं होता, सूत्रमें कर्तव्य पदके अध्याहार करनेपर उससे ही आरम्भ अर्थ हो जाता है तो इसका ब्रह्मविचार करना चाहिए अर्थात् ब्रह्मविचारका आरम्भ करना चाहिए यह अर्थ होता है। इस प्रकार ' कर्तव्य ' पदसे ' अथ ' शब्द के अर्थके निकल आनेसे ' अंथ ' शब्द व्यर्थ होगा, इसलिए दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है। अत : अधिकारीकी सिद्धिके लिए ' अथ ' शब्दका अर्थ आनन्तर्य ही संगत है।

अपि च जैसे ' अथ ' शब्दका अर्थ यहाँ आरम्भ अभिप्रेत नहीं है, वैसे मङ्गल भी अभिप्रेत नहीं, क्योंकि मङ्गल वाक्यार्थमें समन्वित नहीं होता, पदार्थ ही वाक्यार्थ में समन्वित होता है। वह पदार्थ चाहे वाच्य हो अथवा लक्ष्य। यहाँ मङ्गल न तो ' अर्थ ' शब्दका वाच्यार्थ है और न लक्ष्यार्थं ही। इसलिए सूत्रस्थ ' अथ ' शब्दका मङ्गल अर्थ भी नहीं है! ' ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुराः। कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ॥

( सृष्टिके आदि कालमें ' ओंकार और अथ ' ये दोनों शब्द ब्रह्माके कण्ठसे निकले हैं, इसलिए दोनों माङ्गलिक हैं ) यद्यपि स्मृति वाक्यसे ' अथ ' मङ्गलार्थक मात्र ही सिद्ध होता है, फिर भी भगवान् सूत्रकारने ' अथ ' शब्दको मुख्यतः मङ्गलार्थंक न कहकर आनन्तर्य वाची कहा है, क्योंकि आनन्तर्यार्थमें प्रयुक्त होनेपर भी यह ' अथ ' शब्द श्रवणमात्रसे मङ्गलरूप अर्थं तो सिद्ध कर ही देता है।

जलंपूर्ण कलश अथवा शंखध्वनि आदि अपने - अपने अर्थ में प्रयुक्त होनेपर भी जैसे दर्शक अथवा श्रोताको मङ्गलरूप सिद्ध होते हैं। ऐसे ही ' अथ ' शब्द भी श्रवणमात्रसे मङ्गल सिद्ध करता हुआ आचार्य के अभिप्रेत आनन्तर्य अर्थको भी स्पष्ट करता है।

इसलिए कार्यको अपनी उत्पत्ति में कारण सामग्री की अपेक्षा होती है, ' यत्सत्त्वे यत्सत्त्वं यदभावे यदभावः ' ( जिसके होनेपर जिसका अस्तित्व हो और जिसके न होनेपर अभाव हो ) वहीं कार्य कारणभाव होता है, अतः यहाँ जिस कारण होनेपर जिज्ञासारूप कार्य हो और जिस कारणके न होनेपर जिज्ञासारूप कार्यं न हो, वही जिज्ञासारूप कार्यके प्रति पूर्व वृत्त होता है अर्थात् असाधारण कारण होता है।

यदि यहाँ जिज्ञासा पदके द्वारा उक्त कर्तव्य विचारको फल मानें तो उनके हेतुरूपसे जो पूर्ववृत्त है उसकी अपेक्षा होगी। उसके बलसे प्रकृत हेतुका आक्षेपकर उससे अर्थान्तर कहें तो वह अर्थान्तर आनन्तर्यके ही अन्तर्भूत होता है, क्योंकि हेतु और फलभावके ज्ञानके लिए आनन्तर्य अवश्य मानना चाहिए। अतः यहाँ ' अथ ’ शब्दका अर्थ आनन्तर्य ही युक्ति - युक्त है।

' ' ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' जैसे यहाँ धर्मकी जिज्ञासा तभी हो सकती है जब वेदाध्ययन किया हो, इसलिए धर्मजिज्ञासा नियमसे अपने पूर्व विद्यमान कारण वेदाध्ययनकी अपेक्षा रखती है, वैसे ही ब्रह्मजिज्ञासा भी free त : अपनेसे पूर्व जिस कारणकी अपेक्षा रखती है उसे कहना चाहिए।

यदि स्वाध्यायाध्ययन ( पितृ आदि परम्परा से प्राप्त देद शाखाका अध्ययन ) के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा स्वीकार करें तो यह अर्थं ‘ अथातो धर्मजिज्ञासा ' इस सूत्र से ही सिद्ध हो जाएगा, फिर ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस नूतन सूत्रकी रचना व्यर्थ सिद्ध होगी। इसलिए वेदाध्ययन के आनन्तर्यसे भिन्न आनन्तर्य यहाँ अपेक्षित है। वादीका अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचारी आचार्यकुलमें विधिवत् वेदका अध्ययन करता है और जिज्ञास्य धर्मं ( यज्ञादि ) का केवल ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

परन्तु वह उनका अनुष्ठान नहीं करं सकता, क्योंकि अनुष्ठेय यज्ञ आदि कर्म गृहस्थ ( सपत्नीक ) होकर किए जाते हैं, इसलिए ब्रह्मजिज्ञासा वेदाध्ययनके अनन्तरं केवल कर्मका ज्ञान होनेपर होती है। जैसे ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति। ( बृ ० ४।४।२२ ) ( उस प्रत्यगभिन्न ब्रह्मको वेदाध्ययनसे ब्रह्मजिज्ञासु जाननेकी इच्छा करें ) यह श्रुति प्रमाण है। अतः धर्मजिज्ञासासे ब्रह्मजिज्ञासामें कर्मज्ञानका आनन्तर्य विशेष है |!

समाधान - कर्मके ज्ञानसे तथा अनुष्ठेय यज्ञादिरूप धर्मकी जिज्ञासासे पूर्व भी वेदान्त - उपनिषद् - का अध्ययन करनेवाले पुरुषको ब्रह्मजिज्ञासा हो सकती है। यह कोई नियम नहीं है कि जब कर्मज्ञान तथा धर्मजिज्ञासा हो तभी ब्रह्म जिज्ञासा हो अन्यथा नहीं, इन दोनोंका परस्पर कार्य कारणभाव भी नहीं है।

इसी आशयका ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ' अथवा ' ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् ' इसके विपरीत यदि वैराग्य हो तो ब्रह्मचर्याश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करे ) ' यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ' ( जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन संन्यास ग्रहण करे ) इत्यादि जाबाल श्रुति प्रतिपादन करती है। अत : यह स्पष्ट है कि कर्मज्ञानकी अथवा धर्मजिज्ञासाकी ब्रह्मजिज्ञासामें अपेक्षा नहीं है।

' जायमानो वै ' ब्राह्मणस्त्रिभिरृणवान् जायते ' ( जाबाल ) ( उत्पन्न हुआ द्विज तीन ऋणवाला होता है ) इससे जब तक अनुष्ठेय यज्ञ आदि कर्मकर देव ऋण, पितृ ऋण तथा ऋषि ऋण इन तीन ऋणोंसे मुक्त न हो तब तक ब्रह्मचर्यंसे संन्यास ग्रहण नहीं कर सकता।

यद्यपि इस श्रुतिवाक्य में ' जायमानः ' इस पदका यथाश्रुत अर्थ ऐसा ही प्रतीत होता है, तो भी टीकाकारोंने इस पदका अर्थ ऐसा किया है कि ' जायमानः ' गार्हस्थ्य संपद्यमान अर्थात् विधिवत् भार्याका पाणिग्रहणरूप गार्हस्थ्यको प्राप्त होनेवाला द्विज तीन ऋणवाला होता है। ऐसा अर्थ करनेसे ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ' इस श्रुतिवाक्यके साथ कोई विरोध नहीं है। इसलिए ब्रह्मजिज्ञासामें कर्मज्ञानके आनन्तर्यकी अपेक्षा नहीं है।

* वादी अब प्रकारान्तरसे आनन्तर्यका प्रतिपादन करता है कि सूत्रस्ध ' अर्थ ' शब्दका अर्थ क्रम हो। जैसे ‘ हृदयस्याग्रेऽवद्यति अथ जिह्वाया अथ वक्षसः ' ( तै ० सं ० ) ( ( प्रथम उस अग्नीषोमीय पशुके हृदयका, अनन्तर जिल्ह्वाका, अनन्तर वक्षःस्थलका छेदन करे ) ' यह वाक्य अग्नीषोमीय पशुयाग में श्रुत है। यहाँ ' अथ ' शब्दसे अवदानका क्रम अभिप्रेत है। अथवा " ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्, गृही भूत्वा वनी भवेत्, वनी भूत्वा प्रव्रजेत् ( जाबा ० ४ ) ( ब्रह्मचर्यं समाप्त कर गृहस्थ हो, गृहस्थ होकर पश्चात् वानप्रस्थाश्रम ग्रहण करे, वानप्रस्थाश्रमी होकर संन्यास ग्रहण करे ) जैसे यहाँपर क्रम विवक्षित है, वैसे धर्मजिज्ञासा के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए। इस प्रकार ' अर्थ ' शब्दका अर्थ क्रम हो सकता है, परन्तु यहाँ धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासामें क्रमका नियम नहीं है, क्योंकि हृदय आदिका अवदान तो युगपत् एक कर्तासे होना संभव नहीं है, इसलिए उनमें क्रमकी विवक्षा की गई है। ' गृही भूत्वा वनी भवेत् '। अथवा

‘ अधीत्य विधिवद्वेदान्पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः। इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत्॥ ( विधिवत ब्रह्मचर्य आदि नियमोंका पालन करता हुआ आचार्य कुलमें विधिवत् वेदोंका अध्ययन कर गार्हस्थ्य होकर धर्मानुसार पुत्रोंकी उत्पत्तिके अनन्तर यथाशक्ति यज्ञों द्वारा देवोंकी प्रसन्नता संपादित कर मन मोक्षमें लगाना चाहिए ) ' अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथात्मजान्। अनिष्ट्वा चैत्र यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन्व्रजत्यधः॥ यह स्मृति निन्दा करती है। इस प्रकार श्रुति और स्मृतिमें क्रम और अधिकृत अधिकारका विशद वर्णन उपलब्ध होता है। जिसका धर्ममें अधिकार हो उसीका मोक्ष में अधिकार है इसे अधिकृत अधिकार कहा जाता हैं। परन्तु क्रम अथवा अधिकृत अधिकार तो उस व्यक्ति के लिए है जिसका अन्तःकरण संसारी भोग वासनाओंसे मलिन है। जिसका अन्तःकरण इस जन्म अथवा जन्मान्तर कृंत निष्काम यज्ञ आदि कर्म तथा देवोपासना आदिसे शुद्ध है तथा जो विवेक आदि साधन चतुष्टय सम्पन्न है, ' उसके लिए तो क्रमका ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा ' ' यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत् ' ( जाबा ० ४ ) इत्यादि श्रुति स्वयं खण्डन करती है।

जैसे ‘ दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेत ' ( स्वर्गकी कामनावाला पुरुष दर्श, पूर्ण मास याग कर सोम याग करे ) यहाँ दर्श, पूर्णमास याग अङ्गी है और जिन प्रयाज़ आदि क्रियाओं द्वारा वह निष्पन्न होता है वे क्रियाएँ यागके अङ्ग हैं | इसलिए दर्श, पूर्णमास याग अङ्गी - प्रधान हैं और प्रयाज आदि क्रियाएँ उनके अङ्ग - अप्रधान हैं। इस प्रकार दोनोंका अङ्गाङ्गिभाव है। वैसे इन जिज्ञासाओंमें अङ्गाङ्गिभाव भी नहीं है, क्योंकि दोनोंमें प्रधान और अप्रधानभाव नहीं है।

अधिकृताधिकार से अभिप्राय यह है कि एक विषयमें अधिकार पानेवाला व्यक्ति अन्य विषयों में भी अधिकार सम्पन्न होता है। ( क ) जैसे ' दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेत ' जो दर्श, पूर्णमास यागमें अधिकृत है उसका ही सोमयागमें अधिकार है अर्थात् जो प्रधान यागमें नियत अधिकृत होता है वही अङ्गों अथवा भिन्न यागमें अधिकारी होता है।

( ख ) दर्श पूर्णमास याग में चमससे जल आनयका विधान है, परन्तु यदि पशु कामनावाला हो तो ' गोदोहनेन पशुकामस्य ' ( पशुकी कामनावाला गोदोहन नामक पात्रसे जल लावे ) यहाँ जो पुरुष दर्श पूर्णमास यागमें अधिकृत है उसका गोदोहन पात्र से जल ले आनेमें अधिकार है। परन्तु प्रकरणमें ऐसा नहीं है। जो धर्मजिज्ञासामें अधिकृत हो यदि वही ब्रह्मजिज्ञासामें भी अधिकारी हो तो अधिकृताधिकार हो सकता है। परन्तु ऐसा यहाँ नहीं है, क्योंकि दोनोंके अधिकारी आदि भिन्न - भिन्न हैं।

जैसे अधिकारीके भेदसे अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्रका क्रम नहीं है, वैसे यहाँ भी है। किश्व दोनों जिज्ञासाओंके फल और विषयमें भी भेद है, यथा- धर्मज्ञानका फल अभ्युदय है और ब्रह्मज्ञानका फल मोक्ष है, . इससे दोनों प्रकारके क्रम नहीं हैं, अतः ' अथ ' शब्द आनन्तर्यार्थक है।

* यदि धर्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मजिज्ञासा में क्रमरूप आनन्तर्य नहीं है, तो कर्म और ज्ञान दोनोंसे ही मोक्ष मानना चाहिए, क्योंकि हमारे ( समुच्चय वादियोंके ) मतमें ज्ञान कर्म समुच्चयसे मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। परन्तु यह समुच्चयवाद भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि धर्म और ब्रह्म· ज्ञानका स्वरूप, फल और हेतु भिन्न - भिन्न हैं।

धर्मजिज्ञासाका विषय धर्मं है, वह जन्य होनेसे अनित्य है और ज्ञांनकालमें नहीं है अर्थात् स्वोत्पत्तिके पूर्व प्रत्येक कर्मका पहले ज्ञान होता है, पश्चात् उसके सम्पादन करनेकी इच्छा, अनन्तर पुरुष प्रयत्नसे उसकी निष्पत्ति होती है, इससे धर्म साध्य है। परन्तु ब्रह्म तो नित्य सिद्ध वस्तु है, अतः वह पुरुषकी किसी भी क्रियासे उत्पन्न नहीं होता।

इस प्रकार ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है ) ' ब्रह्मैवेदमग्र आसीत् ' ( सृष्टिके पहले यह सब एक अद्वितीय ब्रह्म ही था ) ' एष महानज आत्मा ' ( यह आत्मा महान् अज है ) ‘ अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराण : ' ( भ ० गी ० २।२० ) यह आत्मा अज, नित्य, शाश्वत और पुराण है ) इत्यादि श्रुति स्मृति मी ब्रह्मको नित्य सिद्ध कहती हैं, तो इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्म नित्य सिद्ध और धर्मं नित्य साध्य हैं।

इस प्रकार अत्यन्त वैलक्षण्य होनेसे दोनोंका स्वरूप भिन्न भिन्न है | अब . ' चोदना ' आदि भाष्यसे धर्म और ब्रह्ममें प्रमाणसे भी भेद दिखलाया जाता हैं - ' अज्ञातज्ञापकं वाक्यमत्र चोदना ' ' अज्ञात वस्तुका ज्ञापक ( लोट, लेट, लिङ् आदि युक्त ) वेदवाक्य अथवा शब्द यहाँ चोदना कहा जाता है ' ' इन चोदनाओंके भेदसे भी जिज्ञास्य धर्म और ब्रह्ममें भेद है।

जैसे— ' स्वर्गकामो यजेत ' यह विधिवाक्य अपने विषय धर्मके साधन भूत याग आदिमें प्रवृत्त करता हुआ ज्ञान कराता है और ' अयमात्मा ब्रह्म ' ( बृह ० २ | ५ | १ ९ ) ( यह प्रयगात्मा ब्रह्म है ) इत्यादि ब्रह्मचोदना ' मैं ब्रह्म स्वरूप हूँ ' इस प्रकार उत्पन्न ज्ञानमें नियुक्त नहीं करती केवल स्वरूपभूत ब्रह्मका अभेद ज्ञान कराती है जो संसारके बीजभूत अनादि अविद्यासे आवृत्त - सा है।

धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासामें जब ' अय ' शब्दका अर्थ क्रम नहीं है, तो अन्ततोगत्वा ' अर्थ ' शब्दका अर्थ आनन्तर्य ही सिद्ध होता है। अब यह प्रश्न उठता है कि ब्रह्मजिज्ञासा किसके अनन्तर कर्तव्य है? क्योंकि अनन्तर शब्द अपनेसे पूर्वकी निश्चित अपेक्षा करता है।

* ‘ तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति ' ( बृह ० ४।४।२३ ) ( अतः इसप्रकार जाननेवाला शान्त, दान्तं, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें ( विशुद्ध अन्तःकरणमें ) ही आत्माको देखता है, सभीको आत्मा देखता है ) इत्यादि श्रुति भी ब्रह्मजिज्ञासाके लिए साधन चतुष्टयसम्पन्न अधिकारीका प्रतिपादन करती है | ‘ तद्विजिज्ञासस्व ' ' उसके जानने की इच्छा कर ' क्योंकि ' ज्ञानादेव तु कैवल्यम् ' ( मोक्ष केवल ज्ञानसे ही होता है ) अतः ब्रह्मजिज्ञासा धर्मजिज्ञासासे पूर्व तथा पश्चात् भी संभव है। इसलिए साधन चतुष्टयके होनेपर ही ब्रह्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं। इस अन्वय - व्यतिरेक से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मज्ञान दोनोंके प्रति साधन चतुष्टय असाधारण कारण है। साधन चतुष्टय सम्पन्न व्यक्ति ब्रह्मजिज्ञासा तथा ब्रह्मज्ञानमें अधिकारी है। परन्तु सर्वप्रथम तो साधन चतुष्टय सम्पन्न अधिकारीका ही अभाव है? क्योंकि उन साधनोंमें से वैराग्यका संभव नहीं है। यद्यपि क्षणिक ऐहिक विषय सुखसे वैराग्यका संभव है, तो भी ' अपाम सोमममृता अभूम ' ( यागमें सोम पानकर हम अमर होते हैं )।

स्वर्गलोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया विभेति।

उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके॥ ( कठ ० १।१२ ) ( हे मृत्यु देव! स्वर्ग लोकमें रोग आदि जन्य किञ्चिद् भी भय नहीं है, वहाँ आपका भी वश नहीं चलता, वहाँ कोई वृद्धावस्थासे भयभीत नहीं होता अर्थात् वहाँ वृद्धावस्था नहीं होती, स्वर्गलोक में पुरुष भूख और प्यासका अतिक्रमणकर शोक रहित होकर आनन्दित होता है ) इत्यादि श्रुति स्वर्ग में दुःखाभावका प्रतिपादन करती है। अतएव निरन्तर सुख होने तथा दुःखका अभाव होनेसे स्वर्गस्थ व्यक्तिको कदापि वैराग्य नहीं हो सकता। वैराग्यका अभाव होनेसे शेष साधनोंका अभाव तो स्वभावसिद्ध है, अतः इस ग्रन्थका आरम्भ व्यर्थ है। इसप्रकारको शङ्काकी निवृत्तिके लिए भगवान् सूत्रकारने सूत्र में ' अतः ' शब्दका प्रयोग किया है।

* वादीने पहले जो यह कहा था कि अग्निहोत्र आदि कर्मोंसे सम्पादित स्वर्ग आदि फल नित्यं है, अतः उसे प्राप्तकर साधक कदापि वैराग्यशील नहीं हो सकता, वह युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि ' तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते ' तथा ' आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। ( भ ० गी ०८।१६ )

“ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति॥ " ( गो ० ९।२१ ) ( हे अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यन्त सब लोक पुनरावर्ति स्वभाववाले हैं। वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं ) इत्यादि श्रुति, स्मृति वाक्य पुण्य कर्मोंसे संपादित स्वर्गं आदि फलको अनित्य कहते हैं। और ' यत्कृतकं तदनित्यम् ' ( जो जन्य है वह अनित्य है ) यह व्याप्ति भी है। ' अपाम सोमममृता अभूम ' इत्यादि श्रुतिमें जो स्वर्ग आदि लोकोंका अमृतत्व प्रतिपादित है, उसका अभिप्राय यह है कि पृथिवी आदि लोकोंकी अपेक्षा स्वर्ग आदि लोक अधिक काल स्थायी हैं, अतः उनमें अपेक्षाकृत अमृतत्व है स्वरूपसे नहीं। किञ्च ' आभूतसम्पलवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते ' ( विष्णुपुराण ) ( प्रलयपर्यन्त स्थायी ये स्वर्ग आदि लोक अमृत शब्दसे कहे जाते हैं ) परन्तु वास्तव में ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( ब्रह्मसे भिन्न सब दुःखरूप मिथ्या है ) इससे स्वर्गं आदि लोकस्थ भोग्य पदार्थोंसे भी विवेकीको अवश्य वैराग्य होता है। इस प्रकार साधन संपत्ति सिद्ध होनेपर अधिकारी भी सिद्ध है, उसके सिद्ध होनेसे उसके द्वारा ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए यह सिद्ध हुआ। इस तरह इस ग्रन्थके आरम्भ करनेमें विप्रतिपत्तिको कोई स्थान नहीं है।

* शंका – “ धर्माय जिज्ञासा ' धर्मजिज्ञासा अर्थात् धर्मके लिए जिज्ञासा, क्या इसके समान ' ब्रह्मजिज्ञासा ' इस समस्त पदमें भी ' ब्रह्मणे जिज्ञासा ' ब्रह्मजिज्ञासा अर्थात् ब्रह्मके लिए जिज्ञासा इस प्रकार चतुर्थी तत्पुरुष समास है? समाधान - ' जिज्ञासा ' पद ' ज्ञा ' धातुसे इच्छा अर्थमें ' सन् ' प्रत्ययसे निष्पन्न हुआ है, इच्छाकी उत्पत्ति ज्ञानसे होती है। ज्ञान ज्ञेयके विना नहीं होता, एवं जिज्ञासा भी ज्ञानके विना नहीं होती।

इसलिए इच्छा पहले अपने ज्ञानरूप कर्मकी अपेक्षा करती है पश्चात् फलकी। ज्ञानका कर्म ज्ञेय ब्रह्म है। इससे प्रथम इच्छाके कर्मरूप ज्ञानके लिए ' ब्रह्मणोजिज्ञासा - ब्रह्मजिज्ञासा - ब्रह्मकी जिज्ञासा ' यहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास ही युक्त है। यह षष्ठी विभक्ति कर्म अर्थमें है अन्य अर्थमें नहीं, क्योंकि कर्मका ग्रहण होनेपर फल भी अपने आप अर्थतः सिद्ध हो जाता है | इच्छाका जो कर्म है वही फल है।

धर्मजिज्ञासामें स्वर्गं आदि फलको मुख्य रखकर चतुर्थी तत्पुरुष समास किया गया है, परन्तु प्रकृतमें ऐसा नहीं है।

यद्यपि ' ब्राह्मणो न हन्तव्य ' ( ब्राह्मणकी हिंसा नहीं करनी चाहिए ) ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम् ' ( जो ब्रह्माको प्रथम उत्पन्न करता अथवा धारण करता है ) ' कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ' ( कर्म ब्रह्म वेदसे उत्पन्न हुआ जानो ) ' ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति ' ( ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही होता है ) इस प्रकार ब्रह्म शब्द ब्राह्मणत्व जाति, ब्रह्मा, वेद, परमात्मा आदि अनेक अर्थोंमें प्रयुक्त होता देख सन्देह होता है, तथापि प्रकृत ब्रह्म शब्द परमात्माका ही बोधक है अन्यका नहीं।

जिस ब्रह्मविषयक जिज्ञासाका उल्लेख किया गया है उस ब्रह्मका लक्षण अग्रिम सूत्र २ में कहा जायगा। यहाँ जिज्ञासाका जिज्ञास्य ( विषय ) केवल ब्रह्म ही है।

* यद्यपि यह हो सकता है कि वेदान्तवाक्य जिज्ञासा के कर्म हों, ब्रह्म और जिज्ञासाका शेषशेषिभाव सम्बन्ध हो, तथापि इच्छा के कर्मरूपसे श्रुत ब्रह्मको छोड़कर अश्रुतकी कल्पना करना ' करस्थं पायसं त्यक्त्वा कूर्पर लेढि मूढधीः ( मूर्खका हाथपर रखी खीरको छोड़कर कुहुनीके चाटने के समान होगा ) निष्कर्ष यह है कि कर्ममें षष्ठी स्वीकार करनेपर सूत्रद्वारा जिज्ञासाका ब्रह्म ही श्रुत कर्म है। शंका‘ षष्ठी शेषे ' ( पा ० सू ० २।३।५० ) इस व्याकरण सूत्रके अनुसार सम्बन्ध सामान्य प्रतीत होता है। सामान्य सम्बन्धके ज्ञात होनेपर विशेष सम्बन्धकी आकांक्षा होती है? समाधान - इस प्रकार से कर्मका लाभ होनेपर भी प्रत्यक्षतः ' कर्तृकर्मणोः कृति ' ( पा ० सू ० २।३५ ) ( कृदन्तके योगमें कर्तृवाचक और कर्मवाचक पदसे षष्ठी विभक्ति होती है ) इस सूत्र के अनुसार ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा, इस पदसे कृदन्त ' तुमुन् ' प्रत्यय प्रथम प्रत्यक्ष कर्मका ज्ञान कराता है। इसलिए ब्रह्म में प्रत्यक्ष कर्मको छोड़कर ' षष्ठी शेषे ' इस सूत्र अश्रुत कर्मकी कल्पना करना व्यर्थ प्रयास मात्र ही तो है। शेषमें षष्ठी माननेवाले पूर्व - पक्षीके अभिप्रायको ' न व्यर्थ : ' इत्यादिसे अभिव्यक्त करते हैं।

* पूर्वपक्षी - ' षष्ठी शेषे ' इस व्याकरण सूत्रके अनुसार शेषमें षष्ठी मानने से ' ब्रह्मणो जिज्ञासा ' इसका ' ब्रह्मसम्बन्धी जिज्ञासा ' ऐसा अर्थ सिद्ध होगा, इससे ब्रह्म और ब्रह्म सम्बन्धी लक्षण, प्रमाण, 1 युक्ति, ज्ञान, साधन और फल इन सबके विचारकी भी प्रतिज्ञा हो जाएगी, क्योंकि इनकी जिज्ञासा से ही ब्रह्मज्ञान होता है। कर्ममें षष्ठी मानने से जिज्ञासाके कर्मभूत ब्रह्मका ही केवल विचार होता है, ब्रह्मसम्बन्धी लक्षण आदिका नहीं, इस आशयसे यहाँ ' शेषमें षष्ठी ' का ग्रहण किया गया है, अतः तत्सम्बन्धी प्रयास व्यर्थं नहीं है। सिद्धान्ती ' न ' इत्यादिसे इसका समाधान करते हैं, ' तद्विजिज्ञासस्व ' ( उस ब्रह्मकी जिज्ञासा कर ) यह श्रुति वाक्य भी ब्रह्मजिज्ञासाका ही प्रतिपादन करता है 1। सारांश यह है कि ' कर्ममें षष्ठी ' माननेसे श्रुति और सूत्रकी एकवाक्यता भी होती है।

* ' श्रुत्यनुगमाच्च ' यह संग्रह वाक्य है। ' विस्तरेणोपदिष्टानामर्थानां सूत्रभाष्ययोः। निबन्धो यः समासेन संग्रहं तं विदुर्बुधाः॥ ' ( सूत्र तथा माध्यमें विस्तारसे उपदिष्ट अर्थोंका जो संक्षेपसे निबन्ध उसे विद्वान् लोग संग्रहरूपसे जानते हैं अर्थात् उसे संग्रहवाक्य कहते हैं ) यह संग्रहवाक्यका लक्षण है। भगवान् भाष्यकार इसकी स्वयं व्याख्या करते हैं। ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस सूत्र के साथ ' तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म ' इस श्रुति वाक्यको एकवाक्यता - एकार्थप्रतिपादकता है अर्थात् ब्रह्म ही जिज्ञासाका कर्म है। इसप्रकार दोनोंका एक ही अर्थ है। परन्तु श्रुति और सूत्रका यह अर्थं तभी सिद्ध हो सकता है जब कर्ममें षष्ठी स्वीकार की जाय, अतः उक्तार्थकी सिद्धिके लिए ' ब्रह्मणः जिज्ञासा ' यह कर्ममें षष्ठी है।

* यद्यपि अन्तःकरणका वृत्त्यात्मक ज्ञान इच्छाका कारण है, क्योंकि ' जानाति इच्छति ततो यतते ' पहले किसी वस्तुका ज्ञान होता है, अनन्तर उसके पानेकी इच्छा, तदनन्तर उस वस्तु की प्राप्ति के लिए यत्न, इसप्रकार ज्ञान इच्छाका कारण है, तथापि ' मैं प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूप हूं ' ऐसी अखण्ड ब्रह्माकार अन्तःकरणकी वृत्ति अनावृत प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूपके साक्षात्कारमें हेतु है, अतः ब्रह्मसाक्षात्कार पर्यन्त वृत्त्यात्मक ज्ञान इच्छाका कर्म है।

क्योंकि जिज्ञासा के विना वेदान्त - वाक्योंके श्रवण आदिसे यह ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, इसलिए उक्त ज्ञान इच्छाका कर्म है और आवरण रहित ब्रह्मस्वरूपकी अभिव्यक्ति ही फल है, वही मोक्ष है। इस तरह आत्मसाक्षात्कार पर्यंन्त ज्ञान सन् · प्रत्यय वाच्य इच्छाका कर्म है। इसी ज्ञानको विद्या शब्दसे कहा जाता है।

उससे ' मैं प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूप नहीं हूँ ' इस अज्ञान तथा उसके कार्यं भूत अनर्थमय संसारकी भी निवृत्ति हो जाती है, परन्तु रज्जु में कल्पित सर्प आदिकी रज्जुके ज्ञानसे जैसे अत्यन्त निवृत्ति होती है, वैसे यहाँ संसारकी अत्यन्त निवृत्ति नहीं होती, अपितु बाधितानुवृत्तिरूप निवृत्ति होती है अर्थात् जैसे अज्ञानावस्था में यह जगत् सत्य प्रतीत होता हैं, वैसे ज्ञानावस्था में प्रतीत नहीं होता प्रत्युत मिथ्या प्रतीत होता है, अतः अनर्थमय जगत्की निवृत्तिके लिए ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए।

इस प्रकार ' अथ ' तथा ' अतः ' शब्दसे साधन चतुष्टय सम्पन्न अधिकारी सिद्ध होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि अधिकारीके लिए ब्रह्म जिज्ञासितव्य है। इति तृतीय वर्णक |

* ब्रह्मज्ञानके प्रति साधनरूपसे इस ग्रन्थका आरम्भ युक्त नहीं है, क्योंकि जो ब्रह्म जिज्ञास्य कहा जाता है, क्या वह वेदान्त विचारसे पूर्व ज्ञात है अथवा अज्ञात? यदि ज्ञात है तो शास्त्रसे अप्रतिपाद्य होनेके कारण इस ग्रन्थका विषय नहीं हो सकेगा। किञ्च ब्रह्मके अज्ञानका अभाव होनेसे अज्ञानकी निवृत्तिरूप फल भी नहीं हो सकेगा, तब शास्त्रका विचार करना अयुक्त है। यदि अज्ञात है, तो उसके विषय में कोई भी विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि अज्ञात पदार्थ विचारका विषय नहीं होता। बुद्धि - विचारके क्षेत्रमें न आ सकनेवाले पदार्थका विचारात्मक शास्त्रसे अथवा वेदान्तसे प्रतिपादन नहीं हो सकता। विषय और शास्त्रका प्रतिपाद्य - प्रतिपादकभाव न होनेसे ज्ञान भी उत्पन्न नहीं हो सकता, ज्ञानके न होनेसे अज्ञानकी निवृत्तिरूप फल भी नहीं हो सकेगा। इस प्रकार प्रयोजन आदिका अभाव होनेके कारण यह शास्त्र आरम्भणीय नहीं है अथवा ब्रह्म जिज्ञासितव्य नहीं है, ऐसा पूर्वपक्षीका आशय है। इस शंकाका ' उच्यते ' इत्यादिसे समाधान करते हैं।

* भाष्यमें नित्य शुद्ध आदि शब्दोंसे उपाधि रहित निर्गुण ब्रह्मका तथा सर्वज्ञ आदि शब्दोंसे सोपाधिक सगुण ब्रह्मका प्रतिपादन है। ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको व्यापक कहती हैं।

तथा ' बृहि वृद्धौ ' इसप्रकार व्याकरणके अनुसार निरतिशय महत्त्व अर्थमें ' बृहि ' धातुसे ब्रह्म शब्द निष्पन्न हुआ है और ' बृहत्त्वाद्बृंहणत्वाद्वात्मैव ब्रह्मेति गीयते ' ( भामती ) ( वृद्धिका कारण और बृहत् होनेसे आत्मा ही ब्रह्म कहा जाता है ) इस व्युत्पत्ति से भी ब्रह्म शब्दका अर्थ व्यापक है। इससे देश, काल तथा वस्तु परिच्छेद - इयता से रहित ब्रह्म नित्य सिद्ध है।

इस तरह ' तत्वमसि ' इस वाक्यस्थ ' तत् ' पदसे ब्रह्मका सामान्यरूप ज्ञात होनेपर भी उसके विशेषरूपकी जिज्ञासा होती है, प्रत्येक वस्तुका सामान्य ज्ञान ही उसके विशेष ज्ञानके प्रति हेतु माना गया है। किञ्च ' त्वम् ' पदार्थ - आत्मासे भी ब्रह्म प्रसिद्ध है। जैसे ‘ अयमात्मा ब्रह्म ', अतः ब्रह्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए। यह सब ' सर्वस्य ' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं।

' सर्व शून्यं शून्यम् ' ( सब शून्य ही है ) शून्यवादी बौद्ध के अनुसार शून्यके अतिरिक्त आत्माका अस्तित्व अप्रसिद्ध है, शून्य ही आत्मा है। शून्यका अर्थ है अस्तित्व रहित अर्थात् कुछ नहीं। यदि आत्मा शून्य है तो ' मैं नहीं हूँ ' ऐसा ही सब लोगोंको ज्ञान हो, परन्तु इसके विपरीत नव जात शिशुसे लेकर वृद्ध पर्यन्त सबको ' मैं हूँ ' ऐसा निर्वाध ज्ञान होता है। इसलिए आत्माका अस्तित्व सर्वलोक प्रसिद्ध है। ' यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह। यश्वास्य संततो भावस्तस्मादात्मेति भाष्यते ”॥

( लिङ्ग ० पु ० १।७०।९ ६ ) ' आप्लु व्याप्तौ ' ( इस धातु अर्थके अनुसार यह सबको व्याप्त करता है। सबका अपनेमें संहार करता है, स्वचैतन्यावभास से सब विषयोंका उपलब्धा है, कल्पित पदार्थोंका अधिष्ठान होकर निरन्तर सत्ता, स्फूर्ति प्रदान करता है, इसलिए इसे आत्मा कहते हैं )। इत्यादि श्रुति, स्मृति वाक्योंसे यह सिद्ध होता है कि आत्मा ही ब्रह्म है।

' शंका- ' मैं हूँ ' इस प्रकार जब आत्मरूप से ब्रह्म सर्वलोक प्रसिद्ध है, तो आत्माके ज्ञात होनेपर ब्रह्म भी स्वभावत : ज्ञात हुआ। इस तरह ब्रह्म ज्ञात होनेपर जिज्ञासाका विषय नहीं हो सकता। अज्ञात वस्तु ही जिज्ञासाका विषय होती है। अज्ञात ब्रह्म ग्रन्थका विषय है, वेदान्त - वाक्योंके विचारसे ज्ञात होनेपर वह प्रयोजन है।

यह ठीक है, परन्तु प्रसङ्गमें तो इसके विपरीत आत्मरूपसे ब्रह्म सदा सबको ज्ञात है, अत : वह जिज्ञास्य न होनेके कारण ग्रन्थ से प्रतिपाद्य भी नहीं होगा, इससे उसका ज्ञान भी नहीं होगा, उसके न होनेसे ज्ञान निवर्त्य अज्ञानको निवृत्तिरूप प्रयोजन भी सिद्ध न होगा। इस प्रकार विषय और प्रयोजनका अभाव होनेपर यह ग्रन्थ आरभणीय नहीं है।

सि ० - समाधान - ' मैं हूँ ' आत्मा इस सत् चैतन्यरूप सामान्य धर्मसे यद्यपि ब्रह्म ज्ञात है, तो भी ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि विशेष धर्मो ब्रह्म ज्ञात नहीं है। यदि ब्रह्म विशेषरूपसे ज्ञात होता तो वादियोंका आत्मविषयक परस्पर मतभेद नहीं होता? उनकी विप्रतिपत्तिसे यह सिद्ध होता है कि आत्माके सामान्यरूप से ब्रह्म ज्ञात होनेपर भी विशेषरूपसे अज्ञात है। यद्यपि ब्रह्म में सामान्य और विशेष दोनों रूप कल्पित हैं, तथापि यह सब जिज्ञासुओं को समझानेके लिए कहा गया है।

ब्रह्म विशेषरूपसे अज्ञात होनेपर ' देहमात्रम् ' इत्यादि माष्य से स्थूल और सूक्ष्म क्रमसे वादियोंका मतभेद दिखलाया जाता है। शास्त्र विचार रहित जन प्राकृत कहे जाते हैं। इनके मतमें स्वतन्त्र अथवा अस्वतन्त्ररूपसे चैतन्य नहीं है, किन्तु पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार भूतोंकी देहाकारमें परिणिति ही चैतन्य है। इस विषय में इन्हीं लोगोंकी यह “ अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्य्यनलानिलाः। चतुर्भ्यः खलु भूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ”॥ उक्ति भी है।

' मैं मनुष्य हूँ ' तथा ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्त ' ( कठ ० ३।४ ) स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ' ( तै ० आ ० २।१।१ ) ( यह पुरुष अन्नरसमय है ) इस प्रकार देहके आत्मत्वमें लोक प्रतीति और श्रुति प्रमाण भी है, यह देहात्मवादियोंका मत है। वे केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही मानते हैं, क्योंकि इनके मतमें अतीन्द्रिय कोई पदार्थ नहीं है, इसलिए इन्हें अनुमान आदि प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है। मरणको ही वे अपवर्ग कहते हैं।

' इन्द्रियाण्येव ' इत्यादि भाष्यसे इन्द्रिय आत्मवादी मतका उल्लेख है - जाग्रत् अवस्थामें रूप - आदिका ज्ञान नेत्र आदि इन्द्रियोंसे होता है, अन्धादिको रूपादिका ज्ञान नहीं होता, इस अन्वयव्यतिरेक से यह सिद्ध होता है कि ज्ञानका आश्रय इन्द्रियाँ हैं देह नहीं, देह तो केवल नेत्र आदि इन्द्रियोंका आधारभूत व जड़ है चैतन्य नहीं। सुषुप्ति में सर्वलोक प्रसिद्ध इस स्थूल शरीरके विद्यमान और इन्द्रियोंके अविद्यमान होनेसे ज्ञान नहीं होता, इस अन्वयव्यतिरेकसे भी ज्ञानका आश्रय इन्द्रियाँ ही हैं।

' पश्यामि शृणोमि, जिघ्रामि ' ( देखता हूँ, सुनता हूँ, सूँघता हूँ ) इत्यादि प्रत्यक्ष लौकिक प्रतीतिसे तथा इन्द्रिय संवादमें ' ते ह वाचमुचुः ' ( बृह ० १।३।२ ) ( उन चक्षु आदिने वाणीसे कहा ) इत्यादिश्रुति सिद्ध होता कि इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं।

' मन इत्यन्ये ' इस भाष्यसे मनको आत्मा माननेवालों का मत दिखाया गया है। यदि इन्द्रियाँ आत्मा हों तो स्वप्नमें नेत्र आदि इन्द्रियोंके न होनेसे किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होना चाहिए, किन्तु ' जानामि ' इत्यादि ज्ञान तो वहाँ भी सर्वानुभव सिद्ध है, वह ज्ञान मनसे होता है। जाग्रत् में भी ज्ञान मनसे होता है, इन्द्रियाँ तो केवल साधन मात्र हैं। यदि इन्द्रियोंको आत्मा मानें तो सब इन्द्रियों के आत्मा होनेसे कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि उन सबका ऐकमत्य होना सम्भव नहीं है। यदि उनका कोई एक नियामक मानें तो वही आत्मा होगा तब उनमें आत्मत्व प्रतिज्ञा बाधित हो जायगी। इसलिए ' मैं जानता हूँ ' इस प्रतीति तथा ' अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः ' ( तै ० ६।३ ) ( प्राणमयके भीतर और उससे भिन्न आत्मा मनोमय है ) इत्यदि श्रुति प्रमाणसे भी मन ही आत्मा सिद्ध होता है।

' विज्ञानमात्रं क्षणिकम् ' इस भाष्यसे क्षणिक विज्ञानवादी योगाचार मतका उल्लेख है। विज्ञानवादी - बुद्धि मनको जानती है, अतः बुद्धि ही आत्मा है मन नहीं। बुद्धिसे भिन्न बाह्य कोई भी पदार्थं नहीं है, मन भी बुद्धिका ही आकार ( परिणाम ) विशेष है। बुद्धि ( विज्ञान ) अपने उत्पत्ति क्षणसे द्वितीय क्षणमें नष्ट हो जाती है, अतः क्षणिक कही जाती है। इस विषयमें ' अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः ' ( तै ० २।४ ) ( मनसे आन्तर और भिन्न आत्मा विज्ञानमय है ) इत्यादि श्रुति प्रमाण मी है।

' शून्यमित्यपरे ' इस भाष्यसे शून्यवादी माध्यमिक मतका उल्लेख है - क्षणिक विज्ञान आत्मा नहीं हो सकता, क्योंकि सुषुप्ति में वस्तुतः विज्ञानका भी अभाव है अर्थात् आन्तर बाह्य शून्य है, अकस्मात् ‘ अहं प्रत्यय ' उदय होता है और वह असत्को विषय करता है। इस प्रत्यक्ष प्रतीतिसे तथा ‘ असदेवेमदग्र आसीत् असतः सज्जायत ' ( छा ० ६। २।१ ) ( आरम्भमें यह एक मात्र अद्वितीय असत् ही था, ` असत्से सत्की उत्पत्ति हुई ) इत्यादि श्रुतिसे यह सिद्ध होता है कि शून्य ही आत्मा है।

' अस्ति ' इत्यादि भाष्यसे नैयायिक आदिका मत दिखाया गया है। जब ' अस्यात्मा ' ( आत्मा है ) ' अहमस्मि ' ( मैं हूँ ) ' अहं जानामि ' ( मैं जानता हूँ ) इत्यादि प्रत्यक्ष प्रतीतिसे तथा ' मन्ता बोद्धा कर्ता ' ( प्रश्न ४।९ ) इत्यादि श्रुतिसे कर्ता, भोक्ता आत्मा उपलब्ध होता है तो ' शून्य आत्मा है ' यह शून्यवादीका कथन केवल उपहास मात्र है। ' मोकैव केवलम् ' इस भाष्यसे सांख्य मतका उल्लेख है।

सांख्य — ' मैं कर्ता हूँ ' इस प्रतीतिसे आत्मामें कर्तृत्व मानना युक्त नहीं है, क्योंकि यह प्रतीत अहंकारमें कर्तृत्वको विषय करती है, कारण कि ' असङ्गो नहि सज्जते ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। किञ्च ' मै सुखी, मैं दुःखी ' इस प्रत्यक्ष प्रतीतिसे तथा ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्य ' ( श्वेता ० ४।६ ) ( ईश्वर और जीव इन दोनोंमेंसे अन्य ( जीव ) कर्मफल भोक्ता है ) आदि श्रुतिसे भी सिद्ध होता है कि आत्मा केवल भोक्ता है।

इस प्रकार देह, इन्द्रिय, मन, क्षणिकविज्ञान, शून्य, कर्ता भोक्ता, केवल भोक्ता आदि ' त्वम् ' पद वाच्य आत्मामें वादियोंका संक्षेपसे मतभेद दिखलाया गया है। अब ' तत् ' पद वाच्य ईश्वर में मी ' अस्ति तद्व्यतिरिक्तः ' इत्यादि भाष्यसे मतभेद दिखलाते हैं। वेद प्रामाण्यको माननेवाले मीमांसक आदि कई लोग ' तत् ' पद वाच्य ईश्वरको नहीं मानते, अतः उनके मतमें ईश्वर विषयक चर्चाका अवकाश ही नहीं है। परन्तु ईश्वरवादी मतको लेकर यह विप्रतिपत्ति दिखाई जाती है।

उपर्युक्त विवेचनसे जो देह आदिसे भिन्न कर्ता, भोक्ता आदि रूप जीव सिद्ध हुआ है, वह ईश्वरसे भिन्न है अथवा अभिन्न? इस विषयमें योग मतवाले ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुति और ' क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर : ' ( यो ० सू ० १४ ) ( अविद्या आदि क्लेश, शुभाशुभ आदि कर्म, जन्म, आयु और मोगरूप फल और उनसे उत्पन्न वासनाओंसे असम्बन्धित पुरुष विशेष ईश्वर है ) इस सूत्र के आधारपर सर्वज्ञ, सर्ववित्, शर्वशक्ति सम्पन्न ईश्वर ' तत् ' पद वाच्य है और वह जीवसे भिन्न है।

परन्तु लक्षणावृत्तिसे वेदान्तमतावलम्बी तो अविद्या उपाधि विशिष्ट ' त्वम् ' पदवाच्य कर्ता, भोक्ता जीवात्माको ' तत् ' पदवाच्य ईश्वर स्वरूप सिद्ध करते हैं, क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतिवाक्य जीव ईश्वरसे भिन्न नहीं है अपितु तत्स्वरूप ही है ऐसा कहते हैं। इसमें ' जीवो ब्रह्मैव आत्मत्वात् ब्रह्मवत् ' आत्मा होनेसे जीव ब्रह्म ही है जैसे ब्रह्म, इत्यादि युक्ति भी है। शेष मत तो युक्त्याभास और वाक्याभासोंका अवलम्बन कर केवल विवाद करते हैं।

जो युक्ति न होकर युक्ति के संदृश तथा प्रमाण न होकर प्रमाणके सदृश प्रतीत हों वे युवत्याभास तथा प्रमाणाभास कहे जाते हैं। ' देहोऽनात्मा भवितुमर्हति ज्ञेयत्वात् जड़त्वात्, परिच्छिन्नत्वात् घटादिवत् ' देह अनात्मा होने योग्य है, क्योंकि ज्ञेय, जड़ और परिच्छिन्न है जैसे घट आदि इत्यादि युक्तियों तथा ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' ( ब्र ० सू ० १।१।१२ ) इत्यादि सूत्रोंसे अन्योंके मत किस प्रकार युक्त्याभास और प्रमाणाभासरूप हैं यह सब आगे दिखलाया जायगा।

शंका - वादियों द्वारा एकवस्तु विषयक मतभेद दिखलाए जानेपर तो सन्देह होगा अथवा जिसकी जिस मतमें श्रद्धा होगी उसका अवलम्बनकर वह अपना प्रयोजन सिद्ध कर लेगा, तो पुनः ब्रह्मविषयक विचार करनेका क्या प्रयोजन? समाधान - ' ज्ञानादेव तु कैवल्यम् ' ' तत्त्वज्ञानादेव निःश्रेयसमधिगमः ' ( जीव ब्रह्मैक्य ज्ञानसे ही मोक्ष होता है ) यह वेदोंका सारभूत सिद्धान्त है।

यदि इस श्रुति सम्मत सिद्धान्तको छोड़कर मुमुक्षु अन्य मतको अपनाएगा तो वह कदापि मोक्षको प्राप्त नहीं होगा, अपितु अनर्थमय संसारको प्राप्त होगा, क्योंकि “ असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः। ताँस्ते प्रत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनोजनाः॥ ” . ( ईश ० ३ ) ( सत्, चित् आनन्द स्वरूप ब्रह्म मैं हूँ ) जो ऐसा ज्ञान न प्राप्तकर आत्माको कर्ता, भोक्ता, संसारी आदि समझते हैं, वे आत्मघाती अज्ञानसे आवृत असुर योनियोंको प्राप्त होते हैं ) '

" योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते। किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा॥ " ( जो पुरुष आत्माका जैसा सत्, चित् आनन्दस्वरूप है वैसा न समझकर उसे कर्ता भोक्ता आदि समझता है, उस आत्मापहारी चौरने कौन - सा पाप नहीं किया ) इत्यादि श्रुति, स्मृति प्रमाण हैं। सारांश यह है कि बन्ध अध्यासमूलक है और उसकी निवृत्ति ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे होती है, एतावता इस ग्रन्थके विषय और प्रयोजन सिद्ध ही हैं। वेदान्त विचार पूर्वमीमांसा आदि शास्त्रोंसे सिद्ध नहीं है, इसलिए वेदान्त विचारार्थं इस ग्रन्थका आरम्भ आवश्यक है। विषय और ग्रन्थका प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव और अधिकारीका प्राप्य प्रापकभाव आदि सम्बन्ध हैं, इस प्रकार विषय, प्रयोजन, सम्बन्ध और अधिकारीके सिद्ध होनेपर परम निःश्रेयसकी साधन भूत एवं तत्त्वज्ञान ( जीवब्रह्मैक्य ज्ञान ) की प्रयोजक यह ब्रह्ममीमांसा आरम्भ की जाती है॥ १

जन्माद्यधिकरणम्

1.1.2 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २

सूत्र १.१.२

जन्माद्यस्य यतः ॥ १.१.२ ॥

प्रथम अध्याय प्रथम पाद · सूत्र १.१.२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 68

पदच्छेद — जन्मादि , अस्य , यतः

सूत्रार्थ — ( अस्य ) इस जगत् की ( जन्मादि ) उत्पत्ति, स्थिति तथा लय ( यतः ) जिससे होते हैं, वह ब्रह्म है।

शाङ्करभाष्य

शाङ्करभाष्यम्॥ जन्म उत्पत्तिः आदिः अस्य इति तद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः। जन्मस्थितिभङ्गं समासार्थः। जन्मनश्चादित्वं श्रुतिनिर्देशापेक्षं वस्तुवृत्तापेक्षं च। श्रुतिनिर्देशस्तावत् यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते इति अस्मिन्वाक्ये जन्मस्थितिप्रलयानां क्रमदर्शनात्। वस्तुवृत्तमपि जन्मना लब्धसत्ताकस्य धर्मिणः स्थितिप्रलयसंभवात्। अस्येति प्रत्यक्षादिसंनिधापितस्य धर्मिण इदमा निर्देशः। षष्ठी जन्मादिधर्मसंबन्धार्था। यत इति कारणनिर्देशः।

अस्य जगतो नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियतदेशकालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसाप्यचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभङ्गं यतः सर्वज्ञात्सर्वशक्तेः कारणाद्भवति तद्ब्रह्मेति वाक्यशेषः। अन्येषामपि भावविकाराणां त्रिष्वेवान्तर्भाव इति जन्मस्थितिनाशानामिह ग्रहणम्।

यास्कपरिपठितानां तु जायतेऽस्ति इत्यादीनां ग्रहणे तेषां जगतः स्थितिकाले संभाव्यमानत्वान्मूलकारणादुत्पत्तिस्थितिनाशा जगतो न गृहीताः स्युरित्याशङ्क्येत तन्मा शङ्कि इति या उत्पत्तिर्ब्रह्मणः कारणात् तत्रैव स्थितिः प्रलयश्च ते गृह्यन्ते। न च यथोक्तविशेषणस्य जगतो यथोक्तविशेषणमीश्वरं मुक्त्वा अन्यतः प्रधानादचेतनात् अणुभ्यो वा अभावाद्वा संसारिणो वा उत्पत्त्यादि संभावयितुं शक्यम्। न च स्वभावतः विशिष्टदेशकालनिमित्तानामिहोपादानात्।

एतदेवानुमानं संसारिव्यतिरिक्तेश्वरास्तित्वादिसाधनं मन्यन्ते ईश्वरकारणवादिनः।। नन्विहापि तदेवोपन्यस्तं जन्मादिसूत्रे न वेदान्तवाक्यकुसुमग्रथनार्थत्वात्सूत्राणाम्। वेदान्तवाक्यानि हि सूत्रैरुदाहृत्य विचार्यन्ते। वाक्यार्थविचारणाध्यवसाननिर्वृत्ता हि ब्रह्मावगतिः नानुमानादिप्रमाणान्तरनिर्वृत्ता। सत्सु तु वेदान्तवाक्येषु जगतो जन्मादिकारणवादिषु तदर्थग्रहणदार्ढ्याय अनुमानमपि वेदान्तवाक्याविरोधि प्रमाणं भवत् न निवार्यते श्रुत्यैव च सहायत्वेन तर्कस्याप्यभ्युपेतत्वात्।

तथा हि श्रोतव्यो मन्तव्यः इति श्रुतिः पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसंपद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद इति च पुरुषबुद्धिसाहाय्यमात्मनो दर्शयति। न धर्मजिज्ञसायामिव श्रुत्यादय एव प्रमाणं ब्रह्मजिज्ञासायाम्। किंतु श्रुत्यादयोऽनुभवादयश्च यथासंभवमिह प्रमाणम् अनुभवावसानत्वाद्भूतवस्तुविषयत्वाच्च ब्रह्मज्ञानस्य। कर्तव्ये हि विषये नानुभवापेक्षास्तीति श्रुत्यादीनामेव प्रामाण्यं स्यात् पुरुषाधीनात्मलाभत्वाच्च कर्तव्यस्य।

कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्यं लौकिकं वैदिकं च कर्म यथा अश्वेन गच्छति पद्भ्याम् अन्यथा वा न वा गच्छतीति। तथा अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति उदिते जुहोति अनुदिते जुहोति इति। विधिप्रतिषेधाश्च अत्र अर्थवन्तः स्युः विकल्पोत्सर्गापवादाश्च। न तु वस्तु एवम् नैवम् अस्ति नास्ति इति वा विकल्प्यते। विकल्पनास्तु पुरुषबुद्ध्यपेक्षाः। न वस्तुयाथात्म्यज्ञानं पुरुषबुद्ध्यपेक्षम्। किं तर्हि वस्तुतन्त्रमेव तत्।

न हि स्थाणावेकस्मिन् स्थाणुर्वा पुरुषोऽन्यो वा इति तत्त्वज्ञानं भवति। तत्र पुरुषोऽन्यो वा इति मिथ्याज्ञानम्। स्थाणुरेव इति तत्त्वज्ञानम् वस्तुतन्त्रत्वात्। एवं भूतवस्तुविषयाणां प्रामाण्यं वस्तुतन्त्रम्। तत्रैवं सति ब्रह्मज्ञानमपि वस्तुतन्त्रमेव भूतवस्तुविषयत्वात्। ननु भूतवस्तुविषयत्वे ब्रह्मणः प्रमाणान्तरविषयत्वमेवेति वेदान्तवाक्यविचारणा अनर्थिकैव प्राप्ता न इन्द्रियाविषयत्वेन संबन्धाग्रहणात्। स्वभावतो विषयविषयाणीन्द्रियाणि न ब्रह्मविषयाणि।

सति हीन्द्रियविषयत्वे ब्रह्मणः इदं ब्रह्मणा संबद्धं कार्यमिति गृह्येत। कार्यमात्रमेव तु गृह्यमाणम् किं ब्रह्मणा संबद्धम् किमन्येन केनचिद्वा संबद्धम् इति न शक्यं निश्चेतुम्। तस्माज्जन्मादिसूत्रं नानुमानोपन्यासार्थम् किं तर्हि वेदान्तवाक्यप्रदर्शनार्थम्। किं पुनस्तद्वेदान्तवाक्यं यत् सूत्रेणेह लिलक्षयिषितम्। भृगुर्वै वारुणिः। वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति इत्युपक्रम्याह यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व।

तद्ब्रह्मेति। तस्य च निर्णयवाक्यम् आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति इति। अन्यान्यप्येवंजातीयकानि वाक्यानि नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावसर्वज्ञस्वरूपकारणविषयाणि उदाहर्तव्यानि।। जगत्कारणत्वप्रदर्शनेन सर्वज्ञं ब्रह्मेत्युपक्षिप्तम् तदेव द्रढयन्नाह।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — * ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तम्। किंलक्षणं पुनस्तद्ब्रह्मेत्यत आह भगवान्सूत्रकारः-

प्रथम अधिकरणमें कहा गया है कि ब्रह्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए। अब यहाँ यह प्रश्न उठता है कि उस ब्रह्मका लक्षण ( स्वरूप ) क्या है? इसपर भगवान् सूत्रकार कहते हैं-

* जन्मोत्पत्तिरादिरस्येति तद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः। जन्मस्थितिभिङ्गं समाजन्म - उत्पत्ति है आदि में जिनके वे जन्मादि, यह तद्गुणसंविज्ञान बहुब्रीहि समास है। उत्पत्ति, स्थिति और नाश यह समासका अर्थ है | श्रुति निर्देशसे तथा वस्तुस्थितिकी अपेक्षा जन्म आदि है | श्रुति निर्देश है ' यतो वा इमानि ० ' ( जिससे ये आकाश आदि सारे भूत उत्पन्न होते हैं ) इस वाक्य में उत्पत्ति, स्थिति और नाशका क्रम दिखाई देता है।

वस्तु स्थिति भी ऐसी है कि जन्मसे सत्ताको प्राप्त धर्मीकी ही स्थिति और लयका संभव है। ' अस्य ' प्रत्यक्ष आदिसे सिद्ध धर्मीका ' इदम् ' शब्दसे निर्देश है | और ' अस्य ' इसमें षष्ठी विभक्ति जन्म आदि धर्मोका धर्मी ( जगत् ) के साथ सम्बन्ध द्योतनके लिए है। ' यतः ' यह शब्द कारणका निर्देशक है।

जो नाम रूपसे अभिव्यक्त हुआ है तथा अनेक कर्ता और भोक्ताओंसे संयुक्त है, जो प्रतिनियत देश, काल और निमित्तसे क्रिया और फलका आश्रय है एवं मनसे भी अचिन्त्य रचनारूपवाले इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय जिस सर्वज्ञ, शक्तिमान् कारणसे होते हैं ' वह ब्रह्म है ' यह वाक्यशेष है। अन्य भावविकारोंका भी इन तीनोंमें ही अन्तर्भाव है, इसलिए उत्पत्ति, स्थिति और नाशका यहाँ ( सूत्र में ) ग्रहण है।

यास्कमुनि से पठित ' जायते ' ( उत्पन्न होता है ) ' अस्ति ' ( है ) इत्यादि छ भावविकारोंका ग्रहण किए जानेपर जगत्को स्थिति कालमें उनकी संभावना होनेसे मूल कारणसे जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और नाश गृहीत नहीं होंगे, संभव है कोई यह आशङ्का करे ऐसी शंका न करे, इसलिए ब्रह्मसे इस जगत् की जो उत्पत्ति, उसीमें जो स्थिति और लय श्रुति में प्रतिपादित हैं वे ही जन्म स्थिति और लय यहाँ गृहीत होते हैं।

पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त जगत्की यथोक्त विशेषण विशिष्ट ईश्वरको छोड़कर अन्यसे - अचेतन प्रधानसे, परमाणुओंसे, अभाव - शून्यसे अथवा संसारी ( हिरण्यगर्भ ) से उत्पत्ति आदिकी सम्भावना नहीं की जा सकती और इसी प्रकार स्वभावसे भी उत्पत्ति आदिकी सम्भावना नहीं हो सकती, क्योंकि यहाँ कर्यार्थीद्वारा विशिष्ट देश, काल और निमित्तका ग्रहण है। ईश्वरको जगत्का कारण माननेवाले ( नैयायिक ) इसी अनुमानको संसारी ( जीव ) से व्यतिरिक्त ईश्वरके अस्तित्व आदिमें साधन मानते हैं।

तो इस जन्मादि सूत्र में भी उसी अनुमानका उपन्यास किया गया है? नहीं, क्योंकि सूत्र वेदान्त वाक्यरूपी पुष्पोंको गूंथनेके लिए हैं। सूत्रोंद्वारा वेदान्त वाक्योंका उदाहरण देकर विचार किया जाता है। वाक्यार्थं विचारद्वारा निश्चित तात्पर्य से ब्रह्मावगति ( ब्रह्मज्ञान ) निष्पन्न होती है अनुमान आदि अन्य प्रमाणोंसे निष्पन्न नहीं होती।

जगत् के जन्मआदिके कारणका प्रतिपादन करनेवाले वेदान्त वाक्यों [ यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ] के विद्यमान होनेपर उनके अर्थ ग्रहणकी दृढ़ता के लिए वेदान्तं वाक्योंका अविरोधी अनुमान भी यदि प्रमाण होता हो तो उसका निवारण नहीं किया जाता, क्योंकि श्रुतिने ही सहायकरूपसे तर्क- अनुमानको स्वीकार किया है। जैसे ' श्रोतव्यः ' ( आत्मा श्रोतव्य व मन्तव्य है ) यह श्रुति है।

और ‘ पण्डितो ० ' ( जैसे पण्डित और मेधावी ( बुद्धिमान् ) गन्धार ( कन्धार ) देशको ही प्राप्त करता है, - वैसे ही यहां आचार्यवान् पुरुष सत्को जानता है ) यह श्रुति . भी अपने प्रति पुरुष बुद्धिको सहायक दिखलाती है। धर्मजिज्ञासाके समान ब्रह्मजिज्ञासामें केवल श्रुति आदि ही प्रमाण नहीं हैं, किन्तु श्रुति आदि तथा अनुभव आदि यथासंभव उसमें प्रमाण हैं, क्योंकि ब्रह्मज्ञान सिद्ध वस्तु विषयक और ब्रह्म साक्षात्कार पर्यन्त अवधिवाला है।

कर्तव्य धर्मके विषयमें अनुभवकी अपेक्षा नहीं है, किन्तु उसमें तो श्रुति आदि ही प्रमाण हैं। इससे अतिरिक्त धर्मकी उत्पत्ति पुरुषके अधीन है। इसलिए लौकिक तथा वैदिक कर्म करने, न करने अथवा अन्यथा करने में पुरुष समर्थ - स्वतन्त्र है। जैसे कि अश्वसे जाता है, पैदल जाता है अथवा अन्य प्रकारसे जाता है अथवा नहीं हो जाता।

वैसे ही ' अतिरात्रमें षोडशीका ग्रहण करे ' ' अतिरात्र में षोडशीका ग्रहण न करे ' ऋग्वेदी ' सूर्य उदय होनेपर अग्निहोत्र करे ' यजुर्वेदी ' सूर्योदयसे पहले अग्निहोत्र करे ' इसप्रकार विधि, प्रतिषेध, विकल्प, उत्सर्गं तथा अपवाद यहां धर्ममें सार्थक होते हैं। परन्तु सिद्ध वस्तु इसप्रकार है अथवा इसप्रकार नहीं है, अथवा नहीं है, ऐसे विकल्प नहीं किये जा सकते हैं, विकल्प तो पुरुष बुद्धिकी अपेक्षासे होते हैं।

सिद्ध वस्तुका यथार्थ ज्ञान पुरुष बुद्धिकी अपेक्षा नहीं करता, किन्तु वह तो सिद्ध वस्तुके अधीन है। एक स्थाणुमें स्थाणु है, पुरुष है अथवा अन्य है, ऐसा ज्ञान यथार्थ ज्ञान नहीं होता। उसमें पुरुष है अथवा अन्य कुछ है, यह मिथ्या ज्ञान है। स्थाणु ही है यह यथार्थ ज्ञान है, क्योंकि वह वस्तु अधीन है ; उसीप्रकार सिद्ध वस्तु विषयक ज्ञानोंका प्रामाण्य वस्तुके अधीन है। ऐसा होनेपर ब्रह्मज्ञान भी वस्तु के अधीन है, क्योंकि वह भी सिद्ध वस्तु विषयक है।

यदि यह शंका हो कि सिद्ध वस्तु होने से ब्रह्म अन्य प्रमाणका विषय ही है, इससे तो वेदान्तवाक्योंके विचारकी निष्फलता प्राप्त होती है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्म इन्द्रियोंका विषय नहीं है, अतः अन्य प्रमाणोंसे उसका जगद्रूप कार्यके साथ सम्बन्धका ग्रहण नहीं होता। इन्द्रियाँ स्वभावसे विषयविषयक हैं, ब्रह्मविषयक नहीं हैं। ब्रह्म इन्द्रियों का विषय होता तो यह जगद्रूप कार्य ब्रह्मके साथ सम्बद्ध है, ऐसा गृहीत होता।

परन्तु कार्यमात्र अर्थात् यह जगद्रूप कार्य ही इन्द्रियोंसे गृहीत होता है, तो क्या वह ब्रह्मके साथ सम्बद्ध है अथवा किसी अन्यके साथ सम्बद्ध है, ऐसा निश्चय नहीं किया जा सकता। इसलिए ' जन्मादि ' सूत्र अनुमान उपन्यासके लिए नहीं है, किन्तु वेदान्तवाक्योंके प्रदर्शनके लिए है। वे कौनसे वेदान्तवाक्य हैं, जिनका सूत्रद्वारा ब्रह्म के लक्षणरूपसे यहाँ विचार करना इष्ट है? " भृगुर्वै वारुणिः ' ( वारुणि भृगु अपने पिता वरुणके पास गया और कहा हे भगवन्!

ब्रह्मका उपदेश कीजिए ) ऐसा उपक्रमकर कहते हैं— ' यतो वा इमानि ० ', ( जिससे ये समस्त भूत- भौतिक उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिससे जीवित रहते हैं, लय होते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसकी जिज्ञासा कर वह ब्रह्म है ) इस सामान्य कारण विषयक श्रुतिवाक्यका निर्णय वाक्य यह है- ' आनन्दाद्धयेव ० ' ( निस्सन्देह आनन्दसे ही ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर आनन्दसे ही जीवित रहते हैं और लय होते हुए आनन्दमें ही प्रविष्ट होते हैं )।

नित्य, शुद्ध, बुद्ध तथा मुक्तस्वभाव सर्वज्ञ स्वरूप कारण ( ब्रह्म ) विषयक इसप्रकारके [ स्वरूप तथा तटस्थ लक्षणके निर्देशक ] अन्य उपनिषद् - वाक्य भी उदाहरणरूपसे देने चाहिएँ॥ २

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * प्रथम सूत्रसे शास्त्रक्के आरम्भकी उपपत्ति दिखलाकर शास्त्रका आरम्भ करते हुए भगवान् भाष्यकार पूर्व और उत्तर अधिकरणकी संगति सूचित करनेके लिए उक्तका पुनः ' ब्रह्म ' इत्यादिसे उल्लेख करते हैं। पहले यह कहा जा चुका है कि मुमुक्षुको ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति के लिए वेदान्त वाक्योंका विचार करना चाहिए।

इस कथनसे यद्यपि प्रधानरूपसे ब्रह्म प्रतिज्ञात होनेपर तदङ्गभूत प्रमाण आदि भी प्रतिज्ञात हो जाते हैं, तो भी ब्रह्म विषयक प्रमाण तथा युक्ति ( साधक, बाधक प्रमाणोंके सहकारी तर्क ) आदिका विचार ब्रह्म के विशेषज्ञानके विना नहीं हो सकता, अतः ब्रह्मके यथार्थ ज्ञानके लिए प्रथम ब्रह्मका लक्षण कहना चाहिए। शंका - परन्तु अनुभूत वस्तु निश्चय ही परिमित, जड़, मलिन तथा विनाशी होती हैं। इस अनुभूयमान दृश्यरूपसे तथा तदतिरिक्त नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव ब्रह्मका स्वरूप ज्ञात नहीं हो सकता।

प्रसिद्धका ही लक्षण होता है अत्यन्त अप्रसिद्धका नहीं? सि०समाधान - प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध के विषयमें यह बात है कि जो इतर प्रमाणसे अप्रसिद्ध है वह शब्द प्रमाणसे प्रसिद्ध ही है। परन्तु यहाँ तो शब्दसे भी प्रसिद्ध नहीं है, क्योंकि लक्षणीय ब्रह्म अत्यन्त अप्रसिद्ध है इस आशयसे ' किं लक्षणं ब्रह्म ' ऐसा कहा है अर्थात् ब्रह्मका लक्षण नहीं हो सकता, अतः उसकी जिज्ञासा भी नहीं हो सकती।

पूर्वपक्षी के इसप्रकार के आक्षेपसे इस अधिकारणका आरम्भ है, इसलिए पूर्व अधिकरणकी इस अधिकरण के साथ आक्षेपसंगति है।

जो पहले आक्षेप किया गया है कि अत्यन्त अप्रसिद्ध ब्रह्मका लक्षण नहीं हो सकता। अब इसका सूत्र और भाष्यद्वारा ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुतिवाक्यकी पृष्ठभूमि में समाधान किया जाता है। इस नाम रूपात्मक प्रपञ्च की उत्पत्ति, स्थिति और लय जिससे होते हैं वह ब्रह्म है। इसप्रकार ब्रह्मका लक्षण उपपन्न होता है। इससे सिद्ध होता है कि कल्पित जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान - उभयात्मक कारण ब्रह्म है।

उत्पत्ति आदिमें है जिनके ऐसे स्थिति और प्रलय जन्मादि कहे जाते हैं, यहाँ बहुब्रीहि समास है। वह दो प्रकारका है, एक तद्गुणसंविज्ञान और दूसरा अतद्गुणसंविज्ञान। जहाँ विशेषण पदार्थोंका क्रियामें अन्वय हो वहाँ तद्गुणसंविज्ञान समझना चाहिए | अथवा सत्र पदार्थ विशेषण तथा गौण हों और अन्य पदार्थ विशेष्य तथा प्रधान हों तो वह तद्गुणसंविज्ञान बहुब्रीहि समास है। यथा ' लम्बकर्णकमानय ' ' लम्बे कानवाले ( गर्दभ ) को ले आओ ' यहाँ ' लम्बे कान ' यह विशेषण है और ' आनय ' कियामें अन्वित होता है।

अथवा ' पीताम्बरो हरिः ' ' पीतानि अम्बराणि यस्य सः पीताम्बरो हरिः ' यहाँ ' पीतवस्त्र ' विशेषण है और ' हरि ' विशेष्य है। यहाँ विशेषण गौण है और विशेष्य प्रधान है अर्थात् जहाँ समासके घटकी भूत विशेषण पदार्थ गौणरूपसे ज्ञात हों वह तद्गुणसंविज्ञान बहुब्रीहि समास है। जहाँ समासके घटकी भूत विशेषण पदार्थोंका क्रियामें अन्वय न हो वह अतद्गुणसंविज्ञान कहा जाता है।

यथा ' दृष्टसागरमानय ' ' दृष्टसागरको ले आओ ' अर्थात् जिसने सागर देखा है उसे ले आओ ' यहाँ व्यक्तिके साथ सागरका क्रियामें अन्वय नहीं है, अतः यह अतद्गुणसंविधान बहुब्रीहि समास है। प्रकृतमें तो तद्गुणसंविज्ञान बहुब्रीहि सहैं, क्योंकि यहाँ ' जन्मादि ' सूत्रमें स्थिति और लय विशेष्यों के साथ उत्पत्ति रूप विशेषणका भी ग्रहण है।

किञ्च ' अस्य ' इस ' इदद् ' पदसे कार्य मात्रका ग्रहण किया गयाँ है अर्थात् सूत्रमें प्रत्यक्ष - श्रुति ( इदं सर्वमसृजत ), अनुमान - स्मृति आदिसे सिद्ध कार्यमात्रका निर्देश किया गया है। और ' अस्य ' इस इदम् पदमें षष्ठी विभक्ति आकाश आदि सम्पूर्ण प्रपञ्चका जन्म आदि धर्मोके साथ सम्बन्ध सूचित करती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि सम्पूर्ण जगत् के जन्म आदि ब्रह्म होते हैं।

* जैसे कुम्हार ' घट ' नामकी वस्तुके नाम और रूपका पहले अपने अन्तःकरणमें विचारकर अनन्तर उसे बाहर बनाता है, वैसे ही परम कारण ब्रह्म भी अपने प्रत्यक्ष किए हुए जगत्को नाम - रूपसे अभिव्यक्त करता है। इसमें ' विवादास्पदं जगत् चेतनकर्तृकं कार्यत्वात् नामरूपात्मकत्वाच्च घटवत् ’ ‘ जैसे नामरूपात्मक तथा कार्य होनेसे घट चेतनकर्तृक है, वैसे ही विवादका विषयभूत यह जगत् भी नामरूपात्मक तथा कार्यं होनेसे चेतनकर्तृक है ' यह अनुमान भी है।

इससे सांख्यसम्मत जड़ प्रधान कर्तृत्व तथा बौद्ध सम्मत स्वरूप रहित शून्य कर्तृत्वका निषेध होता है। यह जगत् अनेकविध कर्ता तथा भोक्ताओंसे युक्त है। यहाँ कोई केवल कर्ता है और कोई केवल भोक्ता। ऋत्विज् यज्ञ आदिका केवल कर्ता है और यजमान कर्मफल भोक्ता है। श्राद्ध आदिमें पितृगण केवल मोक्ता और पुत्र आदि केवल कर्ता हैं। वैश्वानरेष्टिमें पिता कर्ता और पुत्र फल भोक्ता है। हाँ, क्वचिद् भोजनादिमें कर्ता भी भोक्ता है, इससे यहाँ कर्ता और भोक्ताका पृथक् पृथक् ग्रहण किया गया है।

व्याकरणानुसार परस्मैपदसे भी यही सिद्ध होता है कि याज्ञिकोंसे फल भोक्ता यजमान पृथक् है, अन्यथा परस्मैपदका प्रतिपादन व्यर्थ हो जायगा अथवा उसका सर्वथा लोप हो जायगा। किञ्च सम्पूर्ण क्रियाके फलका आश्रयभूत इस जगत् में देश काल और निमित्त आदिकी पूर्णरूप से व्यवस्था है। कोई प्रतिनियत देश में उत्पन्न होते हैं, जैसे कृष्णमृग, केसर आदि। कोई प्रतिनियत कालमें होते हैं, यथा कोकिलका आलाप आदि वसन्त ऋतु में होते हैं।

इसप्रकार कोई प्रतिनियत निमित्तसे होते हैं, जैसे बलाकाके गर्भ धारणका नियमित निमित्त नवघन ध्वनि है। कोई नियत क्रियावाले होते हैं, यथा ब्राह्मण ही याजक होते हैं अन्य नहीं। कोई नियत फलवाले होते हैं, जैसे कोई सुखी, कोई दुःखी और कोई दोनों। इसप्रकार इस विचित्र जगत् की रचना परमेश्वरसे ही होती है।

* शंका— “ जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्द्धतेऽपक्षीयते विनश्यति " ( निरुक्त १1१1३ ) ( शरीर उत्पन्न होता है, उत्पन्न होकर अस्तित्वको प्राप्त होता है ; परिणामको प्राप्त होता है, बढ़ता है अर्थात् बाल, युवा आदि अवस्थाओंको प्राप्त होता है, क्षीण होता है, नाशको प्राप्त होता है ) यह यास्कमुनिका वचन है। इसके अनुसार जब प्रत्येक भाव पदार्थं छः विकारोंवाला है, तो जन्मादि सूत्रमें वृद्धि आदिका ग्रहण क्यों नहीं किया गया है?

समाधान - वृद्धि अवयवोंका बढ़ना, यथा महान् पटो जायते ' ( महान् पट उत्पन्न होता है ) यह उत्पत्तिरूप है। धर्म, लक्षण और अवस्था भेदसे परिणाम तीन प्रकारका है, वह उत्पत्तिरूप है। जैसे मृत्तिका, सुवर्ण आदि धर्मीका घट, कटक आदि धर्मं परिणाम उत्पत्ति रूप है, एवं घट आदि उत्पन्न होते हैं यह लक्षणरूप परिणाम उत्पत्तिरूप है। घट आदिमें नवीनत्व व पुरानत्व भेद अवस्थापरिणाम है वह भी उत्पत्तिरूप है। अपक्षय - अवयवोंका ह्रास नाश है।

इसप्रकार इन छः भाव विकारोंका जन्म, स्थिति तथा लय इन तीनोंमें अन्तर्भाव हो जाता है | परन्तु इसको सूत्रका मूल माननेसे जगत्की कारणता ब्रह्ममें सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि उत्पन्न हुए महाभूतोंके स्थितिकालमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे भौतिक पदार्थोंमें जन्म आदि छः विकारोंको देखकर यास्कमुनिने उपर्युक्त निरुक्त वाक्यकी रचना की है। इससे केवल छ : भावविकारोंवाले भूतोंकी सिद्धि हो सकती है।

इसलिए ' जन्मादि ' सूत्र ब्रह्मका लक्षणरूप है और ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ’ श्रुति मूलक है | अतः जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण ब्रह्म है।

* ' अनेककर्तृमोक्तृसंयुक्त ' इत्यादि पूर्वोक्त चार विशेषणोंसे युक्त इस जगत् के उत्पत्ति आदि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिसम्पन्न ईश्वरसे होते हैं अन्यसे नहीं। इसपर भगवान् भाष्यकार ' प्रधानादचेतनात् ' इत्यादिसे कुछ मतोंका संक्षेपसे उल्लेख करते हैं - सांख्यमत में जगत् के उत्पत्ति आदिका कारण प्रधान है। परन्तु प्रधान जड़ है, अतः उससे इस विचित्र जगत् के उत्पत्ति आदि अभम्भव हैं। शून्यवादी इस जगत् के उत्पत्ति आदिका कारण शून्य मानते हैं।

परन्तु शून्य अभावरूप है और यह विचित्र रचनात्मक जगत् भावरूप है, अतः अभावसे भावके उत्पत्ति आदि कदापि नहीं हो सकते। यदि मानें तो अतिप्रसङ्ग हो जायगा अर्थात् बालूसे भी तेलकी उत्पत्ति हो जायगी, और ' नासतो विद्यते भाव : ' ( म ० गी ० २।१६ ) ( असत् का अस्तित्व नहीं होता ) ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( छा ० ६।२।१ ) ( हे सोम्य!

आरम्भ में यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' कथमसतः सज्जायेतेति ' ( छा ० ६।२।२ ) ( भला असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ) इस प्रकार श्रुति आदि प्रमाणोंसे शून्यसे जगत् के उत्पत्ति आदि बाधित हैं। नैयायिक - इस विचित्र जगत् के उत्पत्ति आदिका कारण अनेक और विचित्र परमाणु हैं। परन्तु जड़ परमाणु इस विचित्र जगत्को रचनामें स्वयं प्रवृत्त नहीं हो सकते, अतः वे कारण नहीं हैं।

इसीप्रकार हिरण्यगर्भ भी इस विचित्र जगत् के उत्पत्ति आदि करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम् ' ( श्वेता ६।१२ ) इत्यादि श्रुति ब्रह्मा मी अन्य जीवोंके समान उत्पत्ति आदि कहती है।

चार्वाक अभिमत स्वभाव मी जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह जड़ है। फलार्थी पुरुष देश, काल ओर निमित्तकी अपेक्षा करता है, जैसे धान्यार्थी विशेष देश, वर्षा आदि काल और विशेष बीज आदिको अपेक्षा करता है, वैसे ही सर्वज्ञ ईश्वर भी जीवोंको तत् तत् कर्मका फल देने के लिए विशेष देश, काल ओर निमित्तको अपेक्षा करता है, परन्तु ऐसा जड़ समुदाय में सम्भव नहीं है। अतः इस विलक्षण जगत् के उत्पत्ति आदिका कारण परमेश्वर ही है। जनत् के उत्पत्ति आदिके कारणरूपसे श्रुति सिद्ध ईश्वरको नैयायिक अनुमान प्रमाणसे सिद्ध करते हैं - ' जगत् चेतनकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत् ' ' जैसे घट कार्य है और वह चेतन कुम्हार कर्तासे निर्मित है, वैसे ही यह जगत् भी कार्य है, अत वह भी चेतन कर्ता द्वारा निर्मित होना चाहिए, वह चेतन कर्ता जीव आदिसे भिन्न सर्वज्ञ, सर्वशक्तिसम्पन्न ईश्वर है। वैशेषिक मतमें प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण हैं, शब्द प्रमाण को वे अनुमानरूपसे अर्थका बोधक मानते हैं। इसी आशयको ' एतदेवानुमानं ' इत्यादिसे कहा गया है।

* परन्तु ‘ यतो व इमानि भूतानि जायन्ते ' इस श्रुतिका अनुमानमें अन्तर्भाव कर सूत्रकारने ' जन्मादि ' सूत्र में भी अनुमानका ही उपन्यास किया है, यथा ' जगज्जन्मादि सर्वज्ञ ईश्वरकर्तृकं कार्यत्वात् ' जगत् कार्य है, अतः उसके जन्मादिका कर्ता सर्वज्ञ ईश्वर है। परन्तु नैयायिकका यह अनुमान तभी सिद्ध हो सकता है जब हेतु और साध्यका व्याप्तिज्ञान प्रत्यक्षसे सिद्ध हो। प्रत्यक्ष आदि प्रमाण अतीन्द्रिय पदार्थके ज्ञानमें असमर्थ हैं, अतः अतीन्द्रिय पदार्थका ज्ञान श्रुतिसे ही होता है, इसलिए भगवान् सूत्रकारने ' तत्तु समन्वयात् ' ( ब्र ० सू ० १ १/४ ) इत्यादि सूत्रोंसे उनके तात्पर्यका विचार किया है, इसलिए यहाँ ' जन्मादि ' सूत्रमें भी ' यतो वा इमनि भूतानि ' इत्यादि श्रुतियोंका स्वतन्त्ररूपसे विचार किया गया है अनुमानका नहीं। ब्रह्मज्ञान भी ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' ( बृह ० ३।९।२६ ) ( उस उपनिषद् प्रतिपाद्य पुरुषको मैं पूछता हूँ ) इत्यादि वेदान्त वाक्योंसे गम्य है अनुमानादिसे नहीं, इसलिए ' अयमात्मा ब्रह्म, तत्त्वमसि,, अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्त वाक्यार्थके विचारसे तात्पर्यका निश्चय होनेपर ही ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है।

* ' यतो वा इमानि ' इत्यादि वेदान्त वाक्यार्थकी दृढ़ताके लिए सहायकरूपसे अनुमान प्रमाण भी स्वीकृत है, जैसे “ जगत् अभिननिमित्तोपादानकं कार्यात्वात् ऊर्णनाभ्यारब्धतन्त्वादिवत् अथवा ईश्वरघटसंयोगवत् " जैसे मकड़ीसे उत्पन्न तन्तु आदि कार्य है और उसके प्रति अभिन्ननिमित्तोपादान कारण मकड़ी है, वैसे जगत् भी कार्य होनेसे अभिन्ननिमित्तोपादान कारण वाला है, वह कारण ईश्वर है अथवा जैसे ईश्वर और घटका संयोग कार्य है उसके प्रति अभिन्ननिमित्तोपादन कारण ईश्वर है।

प्रथम दृष्टान्त वेदान्त में प्रसिद्ध है, दूसरा उदाहरण नैयायिकोंके लिए है, क्योंकि वे ईश्वरको केवल निमित्तकारण मानते हैं। जिससे वस्तु उत्पन्न हो उसमें ही लीन हो वह उपादान कारण। उपादानकारणसे भिन्न कारण निमित्त कहे जाते हैं। यथा मृत्तिकासे उत्पन्न हुआ घट उसीमें लीन होता है, अतः मृत्तिका घटके प्रति उपादानकारण है और कुम्हार आदि निमित्तकारण हैं। परन्तु जगद्रूरूप कार्यके प्रति उपादान और निमित्तकारण एक ही है।

इसमें ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' ' तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ' ( मुण्ड ० २।१।१ ) ( हे सोम्य! उसी प्रकार अक्षरसे विविध भाव उत्पन्न होते हैं तथा उसमें ही लीन होते हैं, वह सत्स्वरूप ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं। संसारके प्रति ईश्वरको केवल निमित्तकारण माननेवाले नैयायिकों का मत उक्त अनुमान तथा श्रुतिसे खण्डित हुआ समझना चाहिए।

' सः कर्ता सर्वज्ञः जगत्कारणत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा कुलाल : ' जगत्का कारण होनेसे वह कर्ता सर्वज्ञ है, जो जगत्का कारण नहीं है वह सर्वज्ञ भी नहीं, यथा कुलाल। यह अनुमान ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः ' इस श्रुत्यर्थ की दृढ़ता ( संशय तथा विपर्ययकी निवृत्ति ) के लिए है। श्रुतार्थमें यदि संशय अथवा विपर्यय उत्पन्न हो तो वे तर्कसे निवृत्त करने चाहिएँ, इस विषय में “ श्रोतव्यं श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः।

मत्वा च सततं ध्येय एते दर्शन हेतवः || ” ( श्रुति वाक्योंका श्रवण करना चाहिए और श्रुतार्थका तर्कोंसे मनन करना चाहिए मननकर उसका ध्यान करना चाहिए, क्योंकि ये ज्ञानोत्पत्ति हेतु हैं ) यह श्रुति प्रमाण है।

* जैसे डाकू किसी पुरुषको आँखोंपर पट्टी बाँधकर गन्धार देशसे दूर किसी अरण्यमें छोड़ दें, तब कोई कृपालु पुरुष उसके आर्तनादकों सुनकर वहाँ आ पहुँचे। उसकी पट्टो खोलकर उसे स्वदेश जानेका मार्ग बतादे, तो वह देश भ्रष्ट पण्डित - बताए मार्गके समझने में चतुर तथा मेधावी ( धारण शक्ति सम्पन्न तर्क कुशल ) पुरुष स्वदेशको ही पहुच जाता है, वैसे ही अविद्याने अपने विलासद्वारा जिस पुरुषको आनन्दस्वरूप स्वात्भासे दूर हटाकर इस संसाररूप भयावह वन में फेंक दिया है।

दुःखोंसे घबड़ाए उस आतंपुरुषको कोई दयालु ब्रह्मनिष्ठ आचार्य ' तू संसारी नहीं है ' अपितु ' तत्त्वमसि ' ( वह तू है ) अर्थात् ' तू ब्रह्म है ' इसप्रकार आत्माके यथार्थं स्वरूपका ज्ञानोपदेश करता है। यदि वह श्रोता उपदेश ग्रहण करनेमें समर्थ तथा तर्क कुशल है तो झटिति आत्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्राप्तकर संसारदुःखोंसे मुक्त हो जाता है। इसतरह ' आत्मा वा अरे श्रोतव्यो मन्तव्यः ' इत्यादि श्रुति अपने अर्थं समझानेके लिए पुरुष के बुद्धिरूप तर्ककी सहायकरूपसे अपेक्षा दिखलाती है।

शंका - वेद प्रतिपादित होनेसे जैसे धर्ममें मनन आदिकी अपेक्षा नहीं है, वैसे ब्रह्ममें भी नहीं होनी चाहिए, किन्तु युक्त तो यह है कि धर्मके समान ब्रह्मको भी श्रुति, लिङ्ग आदिकी अपेक्षा हो? इसका समाधान – ' न ' इत्यादि भाष्यसे किया जाता है।

* वेद प्रतिपादकता यद्यपि ब्रह्म और धर्म दोनोंमें समान है, तथापि जिज्ञास्य धर्म और जिज्ञास्य ब्रह्ममें महान् अन्तर है। ब्रह्ममें श्रुति प्रमाणसे अतिरिक्त ब्रह्मवेत्ताओंका ब्रह्म साक्षात्काररूप अनुभव भी प्रमाण है। किञ्च भाष्यस्थ आदि पदसे मनन निदिध्यासनका भी प्रमाणरूपसे ग्रहण है। मोक्ष लिए श्रुति प्रतिपादित ब्रह्मज्ञानका पर्यवसान ब्रह्म साक्षात्कार है। ब्रह्मज्ञानका प्रत्यगभिन्न सिद्ध ब्रह्म विषय है और ब्रह्म साक्षात्कार फल है।

' मन्तव्य : ' इसप्रकार श्रुति प्रतिपादित मनन ज्ञानकी दृढ़ता के लिए अत्यन्त अपेक्षित है। परन्तु धर्ममें श्रुति आदि प्रमाणसे अतिरिक्त मनन आदिकी अपेक्षा बिल्कुल नहीं है, क्योंकि धर्म अतीन्द्रिय होनेसे नित्य परोक्ष है। वेद आदि विहित शुभ क्रियाओंसे उत्पन्न अदृष्टविशेष पुण्य ( धर्मं ) है और निषिद्ध क्रियाओंसे उत्पन्न अदृष्ट विशेष पाप ( अधर्म ) है। भट्ट - प्रस्थान तथा प्रभाकर - प्रस्थान इस भेदसे पूर्वमीमांसादर्शनमें दो प्रस्थान ( मतं ) हैं।

कुमारिलभट्टके मत में याग, दान आदि क्रियाएँ धर्माधर्मं हैं और पुण्य, पापको लक्षणाद्वारा गांणरूपसे धर्माधर्मं कहा गया है। प्रभाकरमत में पुण्य, पापको ही धर्माधर्म कहा गया है, इनका साधन होनेसे याग, दान आदि क्रियाओंको भी गौणरूपसे धर्माधर्मं कहा गया है। ' व्यवहारे भट्टन्याय : ' ( व्यवहारमें भट्टन्याय मान्य है )। इस न्यायके अनुसार भगवान् भाष्यकारने याग आदिको धर्म मानकर ' कर्तुमकर्तुम् ' इत्यादि कहा है।

* अब धर्म विधि आदिको दिखाया जाता है- ' यजेत ' ( याग करे ) यह विधि है 1। ' न सुरां पिबेत् ( सुरा न पीवे ) यह प्रतिषेध है। ' ब्रीहिभिर्यवैर्वा यजेत ' ( धान्य से अथवा यवोंसे होम करे ) यह सम्भावित विकल्प है। ' अतिरात्र नामक यागमें षोडशी नामक पात्रका ग्रहण करे ' ' अतिरात्र में षोडशीपात्रका ग्रहण न करे ' यह इच्छा अधीन विकल्प है। ' मा हिंस्यात् ' ( हिंसा न करे ) यह उत्सर्ग है। सामान्य वाक्यको उत्सर्ग कहा जाता है, क्योंकि वह विशेष वाक्यसे बाधित होता है। ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' ( अग्नीषोमीय पशुका आलभन करे ) यह अपवाद है, क्योंकि यह विशेष वाक्य है। इसप्रकार विधि, प्रतिषेध, विकल्प, उत्सर्ग तथा अपवाद धर्ममें सार्थक होते हैं। शास्त्रके अनुसार पुरुष बुद्धिकी अपेक्षा न करनेवाले सब विकल प्रमारूप होते हैं। परन्तु लोकमें पुरुष बुद्धिकी अपेक्षा रखनेवाले सब विकल्प अप्रमारूप होते हैं।

* सिद्ध ब्रह्म केवल श्रुति प्रतिपाद्य है। इसपर पूर्व पक्षी आक्षेप करता है - ' ब्रह्म प्रत्यक्षादि - गोचरं धर्मविलक्षणत्वात् घटादिवत् ' " धर्मसे विलक्षण होनेके कारण ब्रह्म प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका विषय है जैसे घटादि। ” अतः ' जगज्जन्मादि ब्रह्मकारणकं कार्यत्वात् ' ' जगत्का जन्मादि ब्रह्मकारणक है, क्योंकि वह कार्य है ' यह अनुमान ' जन्मादि ' सूत्रमें विचार करने योग्य है।

श्रुति नहीं, इसलिए ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुति वाक्योंका विचार निष्फल है, क्योंकि सिद्ध वस्तु प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणसे ग्राह्य है। सिद्धान्ती - क्या ' यत्कार्यं तद्ब्रह्मजम् ' जो कार्य है वह ब्रह्मसे जन्य हैं ' यह अनुमान ब्रह्मका साधक है अथवा ' यत्कार्यं तत्सकारणकम् ' ' जो कार्य है वह सकारणक हैं ' यह ब्रह्मका साधक है? प्रथम अनुमान तो नहीं हो सकता, क्योंकि व्याप्ति असिद्ध है।

परन्तु ब्रह्म तो घट आदिके समान इन्द्रियोंका विषय नहीं है, इस विषय में ' पराचि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः ' ( कठ ० २।१।१ ) ‘ न चक्षुषा गृह्यते ' ( जो ब्रह्म चक्षुसे गृहीत नहीं होता ) ' यन्मनसा न मनुते ' ( केन ० १।५ ) ( जो मनसे मनन नहीं किया जाता ) इत्यादि श्रुति प्रमाण है, अतः उसका प्रत्यक्ष प्रमाणसे व्याप्ति ज्ञान भी नहीं हो सकता। शंका - ब्रह्म भले ही इन्द्रियोंका विषय न हो, परन्तु व्याप्तिज्ञान तो होगा ही?

समाधान --- यदि इन्द्रियोंसे ब्रह्मका ज्ञान होता तो जगद्रूप कार्यं ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ है, ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होता। जैसे मृत्तिकाका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है तो घट मृत्तिका जन्य है, यह भी सर्वानुभव सिद्ध है। किन्तु यहाँ केवल जगद्रूप कार्यं ही इन्द्रियोंसे उपलब्ध होता है ब्रह्म नहीं, क्योंकि वह अतीन्द्रिय है, अतः सुतरां उसमें व्याप्तिज्ञान असिद्ध है।

' यत्कार्यं तत्सकारणकम् ' इससे केवल सामान्यरूपसे कार्य कारणवाला है यह सिद्ध होता है, किन्तु यह जगद्रूप कार्य ब्रह्मसे जन्य है अथवा किसी अन्य कारणसे, यह निश्चय नहीं होता। वह कारण विषयक निश्चय तो केवल श्रुतिसे ही हो सकता है। इसलिए ' जन्मादि ' सूत्र अनुमान उपन्यासके लिए नहीं है, अपितु वेदान्त वाक्योंके दिखलाने के लिए है | अतः इस सूत्र में ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' यह श्रुतिवाक्य विचारका विषय है | श्रुत्यर्थकी दृढ़ता के लिए गौणरूपसे अनुमान भी विचारणीय है।

* यहाँ प्रथम सूत्रमें विशिष्ट अधिकारीके लिए ब्रह्म विचारकी प्रतिज्ञा की गई है, और द्वितीय सूत्रमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करनेवालोंके लिए ब्रह्मका लक्षण कहा गया है। परन्तु ' जन्मादि ' सूत्रमें तथा ' यतो वा इमानि ' इस श्रुतिवाक्य में केवल सामान्य कारणका ज्ञान होता है कि इस द्वैतप्रपञ्चका कोई कारण है, क्या वह प्रधान, परमाणु अथवा अन्य है? ऐसी कारण विषयक जिज्ञासा बनी रहती है, उसकी निवृत्ति के लिए विशेष कारण विषयक ' आनन्दाद्धयेव ' यह निर्णय वाक्य उद्धृत किया गया है।

इससे यह निर्णय हो जाता है कि सारे जगत्का कारण आनन्द है और वह ब्रह्मस्वरूप है, जड़ प्रधान आदि नहीं। इन श्रुतिवाक्योंसे ब्रह्मके दो लक्षण प्रतीत होते हैं - एक स्वरूप और दूसरा तटस्थ। ‘ स्वरूपं सत् व्यावर्तकं स्वरूपलक्षणम् ' " जो लक्षण स्वलक्ष्यका स्वरूप होता हुआ स्वलक्ष्यको अन्य अलक्ष्योंसे पृथक् ज्ञापित करे वह स्वरूपलक्षण है।

" जैसे- ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' सत्य, ज्ञान और अनन्त ' ये ब्रह्मके स्वरूप भूत होते हुए लक्ष्य ब्रह्मका अलक्ष्य - असत्, जड़ और दुःखरूप प्रपञ्चसे पृथक् ज्ञान कराते हैं, अतः सत्य आदि ब्रह्मके स्वरूप लक्षण हैं। * ' कादाचित्कत्वे सति व्यावर्तकं तटस्थ लक्षणम् ' " जो लक्षण स्वलक्ष्यमें कभी रहकर अपने लक्ष्यका अन्य अलक्ष्योंसे पृथक् बोध कराता है वह तटस्थ लक्षण है।

" जन्म, स्थिति और लयकी कारणता ब्रह्म में सदा नहीं रहती, केवल मायाकी अधिष्ठानता कालमें रहती है, अतः इनकी कारणता ब्रह्ममें कदाचित् है और सांख्य नैयायिक आदि मत में प्रधान, परमाणु आदि जो अलक्ष्य हैं उनसे भी ब्रह्मका पृथक् रूपसे ज्ञान कराता है। इसलिए कदाचित् ही व्यावर्तक होनेसे जन्म, स्थिति तथा लयकी कारणता ब्रह्मका तटस्थ लक्षण है। अतः ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुतिवाक्य तथा ' जन्मादि ' सूत्र ब्रह्मके तदस्थ लक्षण हैं।

' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्र में ' यतः ' शब्द ' आनन्दादयेव ' इस श्रुति अनुसार है। ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( बृह ० ३।९।२८ ) ( ब्रह्म विज्ञान तथा आनन्दस्वरूप है ) इत्यादि अन्य शाखाओं में स्थित वाक्य भी इस अधिकरणके विषय हैं। इसप्रकार सब शाखाओंमें तटस्थ लक्षण और स्वरूप लक्षण घटित वाक्य जिज्ञास्य ब्रह्म में समन्वित हैं।

' ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ' ( ज्ञानके विना मुक्ति नहीं होती ) ' ज्ञानादेव तु कैवल्यम् ' इत्यादि श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानसे हो मोक्ष होता है और वह वेदान्तवाक्योंके विचार करनेसे होता है, इसलिए ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके लिए वेदान्त - वाक्योंका विचार करना चाहिए। पूर्वपक्ष में ब्रह्मस्वरूपकी असिद्धिसे मुक्ति असिद्ध है, सिद्धान्त में उसकी सिद्धि हैं।। २

शास्त्रयोनित्वाधिकरणम्

1.1.3 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ३

सूत्र १.१.३

शास्त्रयोनित्वात् ॥ १.१.३ ॥

प्रथम अध्याय प्रथम पाद · सूत्र १.१.३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 77

सूत्रार्थ — ऋग्वेद आदि शास्त्रका कारण होनेसे ब्रह्म सर्वज्ञ है। अथवा ब्रह्म केवल ऋग्वेद आदि शास्त्र प्रमाणक है अर्थात् ब्रह्मके यथार्थ स्वरूपके ज्ञानमें ऋग्वेदादि शास्त्र ही प्रमाण है।

शाङ्करभाष्य

शाङ्करभाष्यम्॥ महत ऋग्वेदादेः शास्त्रस्य अनेकविद्यास्थानोपबृंहितस्य प्रदीपवत्सर्वार्थावद्योतिनः सर्वज्ञकल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म। न हीदृशस्य शास्त्रस्य ऋग्वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः संभवोऽस्ति। यद्यद्विस्तरार्थं शास्त्रं यस्मात्पुरुषविशेषात्संभवति यथा व्याकरणादि पाणिन्यादेः ज्ञेयैकदेशार्थमपि स ततोऽप्यधिकतरविज्ञान इति प्रसिद्धं लोके।

किमु वक्तव्यम् अनेकशाखाभेदभिन्नस्य देवतिर्यङ्मनुष्यवर्णाश्रमादिप्रविभागहेतोः ऋग्वेदाद्याख्यस्य सर्वज्ञानाकरस्य अप्रयत्नेनैव लीलान्यायेन पुरुषनिःश्वासवत् यस्मान्महतो भूतात् योनेः संभवः अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् यदृग्वेदः इत्यादिश्रुतेः तस्य महतो भूतस्य निरतिशयं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तिमत्त्वं चेति।। अथवा यथोक्तमृग्वेदादिशास्त्रं योनिः कारणं प्रमाणमस्य ब्रह्मणो यथावत्स्वरूपाधिगमे। शास्त्रादेव प्रमाणात् जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्माधिगम्यत इत्यभिप्रायः।

शास्त्रमुदाहृतं पूर्वसूत्रे यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते इत्यादि। किमर्थं तर्हीदं सूत्रम् यावता पूर्वसूत्रेणैव एवंजातीयकं शास्त्रमुदाहरता शास्त्रयोनित्वं ब्रह्मणो दर्शितम्। उच्यते तत्र सूत्राक्षरेण स्पष्टं शास्त्रस्यानुपादानाज्जन्मादिसूत्रेण केवलमनुमानमुपन्यस्तमित्याशङ्क्येत तामाशङ्कां निवर्तयितुमिदं सूत्रं प्रववृते शास्त्रयोनित्वात् इति।। कथं पुनर्ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वमुच्यते यावता आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् इति क्रियापरत्वं शास्त्रस्य प्रदर्शितम्।

अतो वेदान्तानामानर्थक्यम् अक्रियार्थत्वात् कर्तृदेवतादिप्रकाशनार्थत्वेन वा क्रियाविधिशेषत्वम् उपासनादिक्रियान्तरविधानार्थत्वं वा। न हि परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपप्रतिपादनं संभवति प्रत्यक्षादिविषयत्वात्परिनिष्ठितवस्तुनः तत्प्रतिपादने च हेयोपादेयरहिते पुरुषार्थाभावात्। अत एव सोऽरोदीत् इत्येवमादीनामानर्थक्यं मा भूदिति विधिना त्वेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः इति स्तावकत्वेनार्थवत्त्वमुक्तम्। मन्त्राणां च इषे त्वा इत्यादीनां क्रियातत्साधनाभिधायकत्वेन कर्मसमवायित्वमुक्तम्।

अतो न क्वचिदपि वेदवाक्यानां विधिसंस्पर्शमन्तरेणार्थवत्ता दृष्टा उपपन्ना वा। न च परिनिष्ठिते वस्तुस्वरूपे विधिः संभवति क्रियाविषयत्वाद्विधेः तस्मात्कर्मापेक्षितकर्तृदेवतादिस्वरूपप्रकाशनेन क्रियाविधिशेषत्वं वेदान्तानाम्। अथ प्रकरणान्तरभयान्नैतदभ्युपगम्यते तथापि स्ववाक्यगतोपासनादिकर्मपरत्वम्। तस्मान्न ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वमिति प्राप्ते उच्यते।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र १.१.४ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ‡ ' जन्माद्यस्य यत : ' इस सूत्र में भगवान् सूत्रकारने तटस्थ लक्षणका निर्देश किया है। ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुतिवाक्य भी तटस्थ लक्षणके प्रतिपादक ही हैं। इसी अर्थाभिप्रायको रामानुजादि अर्वाचीन भाष्यकारोंने मी स्वीकार किया है। परन्तु भगवान् भाष्यकार शङ्कराचार्य तटस्थ लक्षणको बतलाते हुए तटस्थ लक्षण प्रतिपादक सूत्रका मी स्वरूप लक्षणमें तात्पर्य बतला रहे हैं और ‘ यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुति - वाक्योंका स्वरूपलक्षणमें पर्यवसान करते हैं, इसका तात्पर्य यह है कि तटस्थ लक्षणसे लक्ष्यका सामान्य परिचय होता है, परन्तु उसका इदम् इत्थंरूपसे ज्ञान स्वरूप लक्षणके अधीन है, इसलिए जहाँ तक इदम्, इत्थंरूपसे निश्चय नहीं होता वहाँ तक वाक्यका तात्पर्य होना चाहिए। इस अभिप्राय से भगवान् भाष्यकारने तटस्थ लक्षण वाक्योंका उपलक्षणरूपसे स्वरूप लक्षण परक तात्पर्य वर्णन किया है। इससे वैदेशिक विद्वानों तथा तदनुयायी भारतीय विद्वानोंने भाष्यकारपर जो कुछ आक्षेप किया है, वह संप्रदाय तथा मायका भली - भाँति परिशीलन न होनेके कारण है।

* जिसप्रकार अध्येता वेदोंके पूर्वक्रम ( आनुपूर्वी आदि ) का स्मरणकर मन्त्रोंका उच्चारण करते हैं। इसीप्रकार मायाकी सहायता से आवरण रहित अनन्त, सर्वज्ञ परमेश्वर पूर्वकल्पके क्रमानुसार वेदों तथा उनके अर्थोंका एक साथ ही ज्ञानकर उनकी अभिव्यक्ति करता है, इसलिए वेद पौरुषेय ( पुरुष प्रणीत ) नहीं है। जहाँ अर्थज्ञान पूर्वक वाक्यज्ञान वाक्य रचनामें कारण हो वहाँ पौरुषेयत्व माना जाता है, जैसे महाभारत आदि ग्रन्थ पौरुषेय ( पुरुष प्रणीत ) माने जाते हैं।

ईश्वरको युगयुत् अर्थज्ञान और वाक्यज्ञान होता है, इसलिए वेद पौरुषेय नहीं हैं। वेद अपौरुषेय हैं और उनका तथा सबका कर्ता ब्रह्म सर्वज्ञ है। यह प्रतिपादन करना पूर्वसूत्र तथा इस सूत्र ( अधिकरण ) का ' विषथ है। वेदोंका कारण ब्रह्म सर्वज्ञ है, यह सिद्ध करनेके लिए वेदोंमें ' महान् ' आदि विशेषण दिये गए हैं 1।

जिन वेदोंमें चारों वर्णों, चारों आश्रमोंकी यथायोग्य गर्भाधान से लेकर श्मशान पर्यन्त समस्त क्रियाओंका ब्रह्ममुहूर्त से लेकर प्रदोष पर्यन्त कर्तव्य क्रियाओंका नित्य, नैमित्तक, काम्य तथा प्रायश्चित्त कर्मोंका प्रतिपादन है और जिन वेदोंके अन्तिम भाग ( उपनिषदों ) में निःश्रेयसरूप ब्रह्मतत्त्वकी प्राप्ति के लिए शिष्यों के कल्याणका शासन ( उपदेश ) है, इसलिए ऋग्वेद आदि मुख्यवृत्ति से शास्त्र कहे गए हैं।

वेद मूलक होने के कारण न्याय, मीमांसा आदि दर्शन ग्रंथोंमें भी गौणवृत्तिसे शास्त्र शब्दका प्रयोग होता है। वेद चार, + पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, शिक्षा, कल्प,

+ पुराण - वेदों में संक्षेपसे सृष्टि आदिका जो वर्णन है, उसका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए वेदार्थ निर्णय में पुराण उपकारक होते हैं। ' सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशोमन्वन्तराणि च। वंशानुचरितश्चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ ' " सृष्टि, प्रलय, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित ये पाँच जिसमें वर्णित हों वह पुराण कहलाता है। न्याय -- -प्रमाण, प्रमेय आदिके परिज्ञानार्थ न्यायशास्त्रको अपेक्षा रहती है। प्रमाण, प्रमेयादिका निरूपण करते हुए न्याय वेदार्थ निर्णय में सहायक है 1

। मीमांसा - स्वतः प्रमाण होते हुए भी जहाँ जहाँ वेदार्थ में सन्देह होता है, उसका निर्णय करते हुए यह शास्त्र वेदार्थका उपकारक हैं। इसके समर्थन में वार्तिककारकी उक्ति भी है- “ धर्मे प्रतीयमाने वेदेन करणात्मना। इतिकर्तव्यताभागं मीमांसा पूरयिष्यतीति॥ " धर्मशास्त्र - वेदमें संक्षेपसे धर्म और ब्रह्मतत्वका जो विवेचन है, उसका विस्तृत वर्णन करते हुए धर्मशास्त्र उपकारक है I

शिक्षा – इसके द्वारा वर्ण, स्वर, मात्रा, साम सन्तानका संस्कार होता है, अतः संस्कारद्वारा शिक्षा वेदार्थ में सहायक है। कल्पसूत्र - इसे श्रौतसूत्र भी कहा जाता है। इसमें संक्षेपसे वेदमें आधान आदिसे लेकर अश्वमेध पर्यन्त कर्मोंका वर्णन है। उनका क्रम वेदान्तरों तथा शाखान्तरोंमें अपेक्षा रहती है। व्याकरण - -- पाणिनीय

प तथा अत्रिव्याकरण प्रकृति, प्रत्यय विभागको कहते हुए कहा गया है। इसमें अङ्गका क्रमबद्ध निरूपण किया गया है, इसलिए क्रमानुष्ठानों में श्रौतसूत्र की साधु, असाधु विवेचनद्वारा पदका संस्कारक होकर व्याकरण वेदार्थमें उपकारक है। निरुक्तजैसे लौकिक शब्दोंका अर्थज्ञान करानेके लिए अर्णव, नानार्थरत्नमाला, अमरकोश आदि प्रसिद्ध हैं, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये चौहह विद्यास्थान कहे जाते हैं। पुराण आदिसे वेदोंकी व्याख्या होती है और उनका गम्भीर अर्थ स्पष्ट होता है, अतः ये वेदार्थ ज्ञान कराने में सहायक कारण माने जाते हैं। ' नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' ( वेदार्थको न जाननेवाला वेद प्रतिपादित उस महान् तत्त्वको नहीं जानता )। इससे यह सिद्ध होता है कि मनु आदिने वेदोंकी स्वतः प्रमाणता स्वीकार की है। जैसे प्रदीप अपनी प्रकाशात्मक शक्तिसे बाह्य पदार्थों का प्रकाशक है, वैसे ही वेद भी गुप्त तथा प्रकट सब पदार्थोंका बोध करानेमें समर्थ है, इसलिए वेद स्वत : प्रमाण है अर्थात् वेद अपनी प्रमाणतामें अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रखता है, जैसे सूर्य अपनी सिद्धिमें अन्य प्रकाशकी अपेक्षा नहीं रखता। वेद अचेतन होनेपर भी सर्वार्थं प्रकाशक होनेसे सर्वज्ञकल्प है। सर्वज्ञकल्प वेदोंका कारण ब्रह्म है।

* वेद काण्व, आश्वलायन, माध्यंदिन, कौथुम, पिप्पलाद, शौनक, ऐतरेय, तैत्तिरेय आदि अनेक शाखाओंमें विभक्त हैं। देव, मनुष्य, पशु तथा वर्ण आश्रम आदिको व्यवस्था एवं कर्म आदिके यथावत् स्वरूपका प्रतिपादन, इन सबका बिशद् वर्णन वेदोंमें है, क्योंकि वेद ज्ञानकी राशि हैं।

' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः ' ( बृह ० २ | ४ | १० ) ( ' ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इस महान् सद्रूप ब्रह्मके निःश्वास हैं ) इस श्रुतिसे सिद्ध होता है कि जैसे निःश्वास पुरुषकी स्वाभाविक क्रिया है, वैसे ही वेदोंकी रचना मी ईश्वरकी निःश्वासकी भाँति स्वाभाविक क्रिया है अर्थात् ईश्वरको वेदोंकी अभिव्यक्तिमें किञ्चदपि प्रयास नहीं होता।

सर्वज्ञ परमेश्वर अपने सत्य- संकल्पसे सृष्टि के आरम्भ में पहले ब्रह्मा आदिके अन्तःकरणमें वेदोंका आविर्भाव ( अभिव्यक्ति ) करता है। अनन्तर वे ही वेद हमें आचार्य परम्परासे उपलब्ध होते हैं। इससे सुतरां वेदोंका कर्ता ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्ति सम्पन्न सिद्ध होता है। तात्पर्य यह है कि ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् ' सर्वज्ञ ईश्वर द्वारा पूर्व कल्पके अनुसार वेदोंका स्मरण करना ही वेदोंकी मानो नई रचना है, यह प्रथम वर्णक है। वैसे ही वैदिक पदार्थोंका कोश निघन्टु है।

उसमें तीन काण्ड हैं, नैघन्दुक ३ अध्याय, नैगमिक १ अध्याय और देवता काण्ड १ अध्याय। उसपर यास्कमुनिका भाष्य है, जो निरुक्त नामसे प्रसिद्ध है। इसमें १२ अध्याय हैं। इसके आगे परिशिष्ट दो और अध्याय हैं। छन्द – चारों वेदोंमें गायत्री आदि छन्दोबद्ध मन्त्र होते हैं। वे पिङ्गलनाग विरचित छन्दोविधि शास्त्रद्वारा जाने जाते हैं। ज्योतिष -- याग आदि कममें समयका निर्धारण करते हुए ज्योतिष शास्त्र वेदका उपकारक है।

* भगवान् भाष्यकारने ' शास्त्रयोनित्वात् ' इस सूत्र की दो व्याख्याएँ की हैं। प्रथम वर्णक ( प्रथम व्याख्या ) से ब्रह्मका लक्षण कहा गया है कि जगत् तथा ऋग्वेद आदि वेदोंका कारण ब्रह्म है और वह सर्वज्ञ है | इसमें क्या प्रमाण है? क्योंकि ' लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिर्न तु प्रतिज्ञामात्रेण ' ( वस्तुकी सिद्धि लक्षण और प्रमाणसे होती है केवल प्रतिज्ञासे नहीं ) इसलिए दूसरी व्याख्यासे ब्रह्म में ‘ यतो वा इमानि ' ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' इत्यादि श्रुति प्रमाण दिखलाकर जिज्ञासाको पूर्ण किया है। शङ्का – जब ( जन्मादि ) इस पूर्वसूत्र में ' यतो वा इमानि ' इत्यादि श्रुति वाक्योंका उदाहरण देकर ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक कहा गया है, तो फिर ' शास्त्रयोनित्वात् ' इस नवीन सूत्रकी रचना क्यों की गई? इसका समाधान ' उच्यते ' इत्यादिसे कहते हैं।

* ' जन्माद्यस्य यत। ' इस पूर्वसूत्र में शास्त्र पदका ग्रहण न होनेसे ऐसी शंका हो सकती है कि ' जन्मादि ' सूत्रमें जगत् के जन्मादि ' जगत् सकर्तृकं कार्यत्वात् घटादिवत् ' इस अनुमानसे सकर्तृक सिद्ध होते हैं। परन्तु उसका कर्ता कौन है? ऐसा प्रश्न पुनः उठता है, तो इसके समाधानमें ' जगत् सर्वज्ञईश्वरकर्तृकं कार्यत्वात् भूम्यादिवत् ' ' जैसे भूमि आदि कार्य हैं, अतः वह सर्वज्ञ ईश्वर कर्तृक हैं, वैसे ही जगद्रूप कार्य मी सर्वज्ञ ईश्वर कर्तृक है " यह दूसरा अनुमान ही स्वतन्त्ररूपसे विचार करने योग्य है वेदान्त - वाक्य नहीं। इसप्रकारकी शंका निवृत्त्यर्थं भगवान् सूत्रकारने शास्त्रयोनित्वात् ' इस नवीन सूत्रकी रचना को है अर्थात् यहाँ वेदान्त - वाक्य ही विचारके विषय हैं अनुमान नहीं। पूर्वपक्ष में ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व अनिश्चित है, सिद्धान्तमें वह निश्चित है॥ ३

समन्वयाधिकरणम्

1.1.4 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ४

सूत्र १.१.४

तत् तु समन्वयात् ॥ १.१.४ ॥

प्रथम अध्याय प्रथम पाद · सूत्र १.१.४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 83

पदच्छेद — तत् , तु , समन्वयात्

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पूर्व पक्षकी व्यावृत्तिके लिए है। ( तत् ) वह ब्रह्म स्वतन्त्र रूपसे वेदान्त वाक्योंद्वारा ही अवगत होता है, ( समन्वयात् ) क्योंकि सम्पूर्ण वेदान्त वाक्य उसके प्रतिपादनमें तात्पर्य से समन्वित हैं।

शाङ्करभाष्य

शाङ्करभाष्यम्॥ तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः। तद्ब्रह्म सर्वज्ञं सर्वशक्ति जगदुत्पत्तिस्थितिलयकारणं वेदान्तशास्त्रादवगम्यते। कथम् समन्वयात्। सर्वेषु हि वेदान्तेषु वाक्यानि तात्पर्येणैतस्यार्थस्य प्रतिपादकत्वेन समनुगतानि। सदेव सोम्येदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयम् आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम् अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् इत्यादीनि।

न च तद्गतानां पदानां ब्रह्मस्वरूपविषये निश्चिते समन्वयेऽवगम्यमाने अर्थान्तरकल्पना युक्ता श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात्। न च तेषां कर्तृदेवतादिस्वरूपप्रतिपादनपरता अवसीयते तत्केन कं पश्येत् इत्यादिक्रियाकारकफलनिराकरणश्रुतेः। न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षादिविषयत्वं ब्रह्मणः तत्त्वमसि इति ब्रह्मात्मभावस्य शास्त्रमन्तरेणानवगम्यमानत्वात्। यत्तु हेयोपादेयरहितत्वादुपदेशानर्थक्यमिति नैष दोषः हेयोपादेयशून्यब्रह्मात्मतावगमादेव सर्वक्लेशप्रहाणात्पुरुषार्थसिद्धेः।

देवतादिप्रतिपादनपरस्य तु स्ववाक्यगतोपासनार्थत्वेऽपि न कश्चिद्विरोधः। न तु तथा ब्रह्मण उपासनाविधिशेषत्वं संभवति एकत्वे हेयोपादेयशून्यतया क्रियाकारकादिद्वैतविज्ञानोपमर्दोपपत्तेः। न हि ब्रह्मैकत्वविज्ञानेनोन्मथितस्य द्वैतविज्ञानस्य पुनः संभवोऽस्ति येनोपासनाविधिशेषत्वं ब्रह्मणः प्रतिपाद्येत। यद्यप्यन्यत्र वेदवाक्यानां विधिसंस्पर्शमन्तरेण प्रमाणत्वं न दृष्टम् तथाप्यात्मविज्ञानस्य फलपर्यन्तत्वान्न तद्विषयस्य शास्त्रस्य प्रामाण्यं शक्यं प्रत्याख्यातुम्।

न चानुमानगम्यं शास्त्रप्रामाण्यम् येनान्यत्र दृष्टं निदर्शनमपेक्ष्येत। तस्मात्सिद्धं ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वम्।।अत्रापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म तथापि प्रतिपत्तिविधिविषयतयैव शास्त्रेण ब्रह्म समर्प्यते यथा यूपाहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते तद्वत्। कुत एतत् प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनपरत्वाच्छास्त्रस्य।

तथा हि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम् दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनं नाम इति चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनम् तस्य ज्ञानमुपदेशः तद्भूतानां क्रियार्थेन समाम्नायः आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् इति च। अतः पुरुषं क्वचिद्विषयविशेषे प्रवर्तयत्कुतश्चिद्विषयविशेषान्निवर्तयच्चार्थवच्छास्त्रम्। तच्छेषतया चान्यदुपयुक्तम्। तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात्।

सति च विधिपरत्वे यथा स्वर्गादिकामस्याग्निहोत्रादिसाधनं विधीयते एवममृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयत इति युक्तम्। नन्विह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम् कर्मकाण्डे भव्यो धर्मो जिज्ञास्यः इह तु भूतं नित्यनिर्वृत्तं ब्रह्म जिज्ञास्यमिति तत्र धर्मज्ञानफलादनुष्ठानसापेक्षाद्विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति। नार्हत्येवं भवितुम् कार्यविधिप्रयुक्तस्यैव ब्रह्मणः प्रतिपाद्यमानत्वात्। आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः य आत्मापहतपाप्मा।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जगत्कारणत्वप्रदर्शनेन सर्वज्ञं ब्रह्मेत्युपक्षिप्तं, तदेव द्रढयन्नाह -

जगत्की कारणता दिखलाने से ब्रह्म सर्वज्ञ है अर्थतः प्राप्त हुआ है, अब उसे दृढ़ करते हुए कहते हैं-

अनेक विद्या स्थानोंसे उपकृत दीपकके समान सब अर्थोंका प्रकाशन करनेमें समर्थ और सर्वज्ञके समान महान् ऋग्वेदादि शास्त्रका योनि ( कारण ) ब्रह्म है। ऐसे ऋग्वेदादि रूप सर्वगुणशम्पन्न शास्त्रकी उत्पत्ति सर्वज्ञको छोड़कर किसी अन्यसे नहीं है।

जो जो विस्तारार्थ शास्त्र जिस पुरुष - विशेष से विरचित है, जैसे पाणिनि आदिके ज्ञेयका एक अंशरूप अर्थसे युक्त व्याकरण आदि शास्त्र है, वह ( पुरुषविशेष ) उस स्वविरचित शास्त्र से अधिकतर ज्ञानवान होता है, यह लोकमें प्रसिद्ध है, तो अनेक शाखा भेदसे भिन्न देव, मनुष्य, पशु, वर्ण, आश्रम आदि विभागका जो हेतु हैं और सर्वज्ञान के भण्डार हैं ऐसे ऋग्वेद आदि नामक वेदोंकी अनायास ही लीलान्यायसे पुरुष निःश्वासकी तरह जिस महान् ( अपरिच्छिन्न ) सद्रूप कारणसे उत्पत्ति होती है, क्योंकि ' अस्य महतो ० ( इस अपरिच्छिन्न सद्रूप ब्रह्मका जो निःश्वास है वह ऋग्वेद है ) इत्यादि श्रुति है।

उस महान् सद्रूप ब्रह्म के निरतिशय सर्वज्ञत्व तथा सर्वशक्तिमत्त्वके विषय में तो कहना ही क्या है। अथवा पूर्वोक्त ऋग्वेद आदि शास्त्र इस ब्रह्मके यथार्थस्वरूपके ज्ञानमें योनि - कारण - प्रमाण हैं। शास्त्र प्रमाणसे ही यह अधिगत होता है कि जगत् के जन्मादिका कारण ब्रह्म है, यह अभिप्राय है। पूर्वसूत्र में ' थतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि शास्त्र उदाहृत है।

जब पूर्वसूत्र ( जन्मादि ही ( यतो वा ) इसप्रकार शास्त्रका उदाहरण देते हुए सूत्रकारने ब्रह्म शास्त्र - योनि ( प्रमाणक ) है, ऐसा दिखलाया है, तो फिर इस सूत्रका प्रयोजन ही क्या है? कहते हैं - वहाँ पूर्वसूत्रके अक्षरों ( अर्थों ) से शास्त्रका स्पष्ट ग्रहण नहीं किया गया है, इसलिए जगत्के जन्मादिका केवल अनुमानरूपसे उपन्यास किया है, कोई ऐसी शङ्का करे तो उस शङ्काकी निवृत्तिके लिए ' शास्त्रयोनित्वात् ' यह सूत्र प्रवृत्त हुआ है || ||

ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक है, पुनः यह कैसे कहते हो? क्योंकि ' आम्नायस्य ० ( वेद क्रियार्थक हैं, क्रियासे भिन्न सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेद वाक्य अनर्थक हैं अर्थात् प्रयोजन रहित हैं ) इसप्रकार शास्त्र क्रियापरक दिखलाया गया है, इससे अक्रियार्थक होनेके कारण वेदान्त वाक्य प्रयोजन रहित हैं। अथवा कर्ता तथा देवता आदिका प्रकाशनरूप प्रयोजनवाले होनेसे वेदान्त - वाक्य क्रिया विधि अङ्ग हैं, अथवा उपासना आदि अन्य क्रियाओंके विधान के लिए हैं।

किन्तु सिद्ध वस्तुका प्रतिपादन तो वेदान्तोंका प्रयोजन ] सम्भव नहीं है, क्योंकि सिद्ध वस्तु प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका विषय है और हेयोपादेयसे रहित उसके प्रतिपादन करनेमें पुरुषार्थ भी नहीं है। इसी कारण से ' सोऽरोदीत् ' ( वह रोया ) इत्यादि वाक्य अनर्थक न हों, इसलिए ' विधिना ० ( विधि वाक्योंके साथ अर्थवाद आदि वाक्योंकी एक वाक्यता है, क्योंकि अर्थवाद वाक्य विधेयकी स्तुतिके लिए होते हैं ) इसप्रकार स्तुति परक होनेसे सार्थक कहे गए हैं और ' इषे त्वा ' ( हे इषे!

शाखाओ ) तुझे अन्नके लिए काटता हूँ ) इत्यादि मन्त्र क्रिया तथा उसके साधनोंका अभिधायी होनेसे कर्म सम्बन्धी कहे गए हैं। किसी भी प्रकरण में विधि वाक्योंके साथ सम्बन्ध प्राप्त किए विना वेद - वाक्योंकी अर्थवत्ता न देखी गई है और न उपपन्न ही है।

सिद्ध वस्तुके स्वरूपमें विधि नहीं हो सकती, क्योंकि विधि क्रिया विषयक होती है, इसलिए कर्म में अपेक्षित कर्ता तथा देवता आदिके स्वरूपका प्रकाशन करने से वेदान्त क्रिया विधिके अङ्ग हैं | यदि अन्य प्रकरणके भय से यह स्वीकार न किया जाय तो भी स्व ( वेदान्त ) वाक्योंमें उपलब्ध उपासना आदि कर्म परक हैं। इसलिए ब्रह्ममें शास्त्र प्रमाण नहीं है। ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं-

तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः। तद् ब्रह्म सर्वज्ञं सर्वशक्ति जगदुत्पत्तिस्थितिलयकारणं

' तु ' शब्द पूर्व पक्षके निराकरणके लिए है। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, तथा जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लयका कारण भूत, वह ब्रह्म वेदान्त वाक्योंसे ही अवगत होता है। कैसे? समन्वयसे। क्योंकि ' सदेव सोम्य ० ( हे प्रियदर्शन!

यह सब उत्पत्ति के पहले एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' आत्मा वा ० ( यह सब उत्पत्तिके पहले एकमात्र आत्मा ही था ) ' तदेतद् ' ( तत् - वह मायारूप उपाधिसे बहुत रूपोंको प्राप्त हुआ जो ब्रह्म है, एतद् - यह अपूर्व, ( कारण रहित ), अनपर ( कार्य रहित ), अनन्तर ( विजातीय द्रव्यसे रहित ), अबाह्य ( अद्वितीय ) है | यह आत्मा ही सबका अनुभव करने वाला ब्रह्म है ) ' ब्रह्मैवेदम् ' ( यह अमृत ( अविनाशी ) ब्रह्म ही आगे है ) इत्यादि वाक्य सब वेदान्तोंमें तात्पर्य से इसी अर्थ में प्रतिपादक रूपसे समनुगत अर्थात् समन्वित हैं।

वेदान्त - वाक्योंमें प्राप्त पदोंका ब्रह्मस्वरूपके विषय में निश्चित समन्वय जान लेनेपर अन्यार्थ ( कार्यरूप अर्थ ) की कल्पना युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा करनेसे श्रुत ( श्रुति प्रतिपादितब्रह्म अर्थ की हानि और अश्रुत - श्रुति अप्रतिपादित यागादि क्रिया ) अर्थकी कल्पना करनी पड़ेगी। और इन वाक्योंका कर्ताके स्वरूप प्रतिपादन में तात्पर्यं निश्चित नहीं हो सकता।

क्योंकि ' तत्केन ० ' ( ब्रह्म विद्या कालमें कौन कर्ता, किस करणसे किस विषयको देखे ) इत्यादि श्रुति क्रिया, कारक और फलका निषेध करती है। सिद्ध वस्तु स्वरूप होनेपर भी ब्रह्म प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषय नहीं है, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' इस वेदान्त शास्त्रके विना ब्रह्मात्ममाव अवगत नहीं होता। हेयोपादेय रहित होनेसे ब्रह्मका उपदेश निष्फल है, यह जो कहा गया है, वह दोष नहीं है, क्योंकि हेयोपादेय रहित ब्रह्मात्मभावके अवगत होनेसे ही सब क्लेशोंकी निवृत्ति और परमपुरुषार्थको सिद्धि होती है।

यदि देवतादिके प्रतिपादक ( प्राण, पञ्चाग्नि आदि ) वाक्य वेदान्त वाक्यगत उपासना परक हों तो भी कोई विरोध नहीं है। परन्तु उसी प्रकार ब्रह्म उपासना विधिका अङ्ग नहीं हो सकता। एकत्व ज्ञान हो जानेपर ब्रह्म हेयोपादेय न होनेसे क्रिया, कारक आदि द्वैतकविज्ञानका बाध हो सकता है। एकत्व विज्ञानसे निवृत्त हुआ मिथ्या द्वैतज्ञानका फिर सम्भव नहीं है, जिससे कि ब्रह्म उपासना विधिका अंग प्राप्त हो।

यद्यपि वेदान्त से भिन्न स्थलोंमें अर्थवाद आदि वेदवाक्योंकी विधिके साथ सम्बन्धके विना प्रमाणता देखनेमें नहीं आती, तो भी आत्मज्ञानको आत्मसाक्षात्कार फल पर्यन्त होनेसे ब्रह्म विषयक शास्त्रकी प्रमाणताका खण्डन नहीं किया जा सकता। शास्त्र प्रामाण्य अनुमानगम्य नहीं है जिससे कि वह अन्य स्थलोंमें देखे हुए दृष्टान्तोंकी अपेक्षा करे। इससे सिद्ध हुआ कि ब्रह्मशास्त्र प्रमाणक है। इस विषयमें दूसरे ( वृत्तिकार ) पूर्व पक्ष करते हैं।

यद्यपि ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक ही है, तथापि प्रतिपत्ति ( उपासना ) विधिके विषयरूपसे ही शास्त्र ब्रह्मका बोध कराता है। जैसे कि यूप, आहवनीय आदि अलौकिक पदार्थों का भी विधिके अङ्ग रूपसे शास्त्र बोध कराता है। ऐसा क्यों? शास्त्र प्रवृत्ति तथा निवृत्ति प्रयोजनवाला है।

इस अर्थमें शास्त्रके तात्पर्यको जाननेवाले कहते हैं - ' दृष्टो हि ० ' ( कर्मोंका ज्ञान कराना ही शास्त्रका दृष्ट फल है ) और ' चोदनेति ० ' ( क्रियाका प्रवर्तक वचन चोदना है ) ' तस्य ० ' ( धर्मका ज्ञापक अपौरुषेय विधि - वाक्य - स्वर्गकामो यजेत आदि उपदेश है ) ' तद्भूतानां ० ( वेदमें सिद्ध अर्थके वाचक पदोंका क्रिया वाचक पदोंके साथ उच्चारण करना चाहिए ) ' आम्नायस्य ० ' ( वेद क्रियार्थक है, अत क्रियांसे भिन्न सिद्ध अर्थ प्रतिपादक वेद वाक्य निष्फल हैं ) इसलिए पुरुषको किसी एक विषय में प्रवृत्त करता हुआ और किसी एक विषय विशेषसे निवृत्त करता हुआ शास्त्र सार्थक होता है और दूसरे वाक्य इसके अंगभूत होकर उपयुक्त होते हैं।

उनके साथ समानता होनेसे वेदान्त वाक्य भी उसी प्रकार सार्थक होते हैं। यदि [ वेदान्त - वाक्य ] विधिपरक हों तो जैसे स्वर्ग आदि कामना वाले पुरुषके लिए अग्निहोत्र आदि साधनों का विधान है, वैसे ही अमृतत्वकी कामना करनेवाले के लिए भी ब्रह्मज्ञानका विधान किया जाता है, ऐसा मानना युक्त है। यदि कहो कि यहाँ जिज्ञास्यका वैलक्षण्य ( भेद ) कहा गया है, कर्मकाण्डमें साध्य धर्म जिज्ञास्य है और ज्ञानकाण्डमें तो नित्य निवृत्त, सिद्ध ब्रह्म जिशास्य है।

उनमें अनुष्ठानकी अपेक्षा रखनेवाले धर्मज्ञानके फलसे ब्रह्मज्ञानका फल विलक्षण होना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि कर्मविधिसे प्रयुक्त होकर ही ब्रह्म प्रतिपाद्यमान है | ' आत्मा ० ' ( याज्ञवल्क्य -- हे मैत्रेयी!

आत्माका साक्षात्कार करना चाहिए ) ' य आत्मा ० ' ( आत्मा पापरहित है . वह खोज करने योग्य है उसकी जिज्ञासा करनी चाहिए ) ' आत्मव्ये ० ' ( आत्मा है ऐसी उपासना करे ) ' आत्मानमेव ० ' ( ज्ञानस्वरूप आत्माकी उपासना करे ) ' ब्रह्मवेद ० ' ( ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही होता है ) इत्यादि विधानोंके होनेपर ' वह आत्मा कौन है? वह ब्रह्म क्या है?

' ऐसी आकांक्षा होनेपर ब्रह्मके स्वरूपका बोध करानेके लिए ' नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतः ० ' ( नित्य सर्वज्ञ और सर्वगत नित्यतृप्त है ) ' नित्यशुद्ध ० ' ( ब्रह्म नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव है ) ' विज्ञानं ० ' ( ब्रह्म विज्ञान और आनन्द स्वरूप ) इत्यादि वेदान्त वाक्य उपयुक्त होते हैं। उस ब्रह्मकी उपासनासे शास्त्र अवगत अदृष्ट मोक्षरूप फल . होगा।

यदि वेदान्त - वाक्य कर्तव्य विधिके साथ असम्बद्ध होकर वस्तुमात्रका कथन करनेवाले हों तो हानोपादानका असंभव होनेसे ' सप्तद्वीपा वसुमती ' ( सात द्वीपावली पृथ्वी है ) ' यह राजा जाता है ' इत्यादि वाक्योंके समान वेदान्त - वाक्य प्रयोजन रहित हो जायंगे। परन्तु ' यह रज्जु है सर्प नहीं है ' इत्यादि वस्तु मात्रके कथनमें भी भ्रान्तिसे जनित भयकी निवृत्ति द्वारा अर्थवत्ता ( सार्थकता ) देखी गई है।

उसी प्रकार यहाँ प्रसंगमें भी असंसारी आत्मवस्तु के कथनसे संसारित्व भ्रान्तिकी निवृत्ति द्वारा सार्थकता होगी। ऐसा तभी हो सकता है जब कि रज्जु - रूप वस्तुके श्रवणसे जैसे सर्प - भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है, वैसे ही ब्रह्मस्वरूपके श्रवणमात्रसे श्रोताकी संसारित्व भ्रान्ति निवृत्त हो। परन्तु वह निवृत्त नहीं होती, क्योंकि ब्रह्मका श्रवण करनेवाले व्यक्ति में भी पूर्वके समान सुख - दुःखादि संसारिधर्मं देखने में आते हैं।

अतएव ' श्रोतव्यो ० ' ( आत्मा श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य है ) इस प्रकार श्रवणके उत्तरकालके मनन और निदिध्यासनकी विधि देखने में आती है। इसलिए यह स्वीकार करना चाहिए कि उपासना विधिका विषय होनेसे ही ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक है। इसके उत्तर में सिद्धान्ती कहते हैं ऐसा नहीं है, क्योंकि कर्म और ब्रह्मविद्या के फलमें वैलक्षण्य है। कायिक, वाचिक और मानसिक कर्म श्रुति और स्मृति धर्म नाम से प्रसिद्ध हैं।

जिस विषयक जिज्ञासा ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' ( वेदाध्ययनके अनन्तर धर्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए। इस सूत्र में प्रतिपादित है। इसके साथ ही परिहारके उद्देश्यसे वर्णित प्रतिषेध चोदनात्मक होने से हिंसा आदि रूप अधर्म भी जिज्ञास्य है। और इस चोदनात्मक अर्थ और अनर्थरूप धर्माधर्मका शरीर, वाणी और मन द्वारा उपभुज्यमान तथा विषयेन्द्रिय संयोगसे जन्य प्रत्यक्ष सुख - दुःखरूप फल ब्रह्मादिसे लेकर स्थावर पर्यन्त सबमें प्रसिद्ध ही है।

मनुष्यसे लेकर ब्रह्मा पर्यन्त सभी शरीर धारियोंमें सुखका तारतम्य श्रुति कहती है। उससे सुखके साधनभूत धर्मका तारतम्य ज्ञात होता है। धर्मके तारतम्यसे अधिकारीका तारतम्य अवगत होता है। किञ्च फल कामना एवं द्रव्यरूप सामर्थ्यं आदि कारणोंसे तो अधिकारीका तारतम्य प्रसिद्ध है। और इस प्रकार यागादि अनुष्ठान करनेवाले लोग ही उपासना रूप समाधि विशेषके बलसे उत्तर मार्गसे जाते हैं, तथा केवल इष्ट, पूर्त और दत्त रूप साधनोंसे सम्पन्न पुरुष धूमादि क्रमसे दक्षिण मार्गके द्वारा जाते हैं।

वहाँ भी सुखका तारतम्य और इसके साधनोंका तारतम्य यह सब ' यावत्संपात मुषित्वा ० ( वहाँ कर्मोंका क्षय होने तक रहकर वे फिर इसी मार्ग से जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं ) इस शास्त्रसे स्पष्ट अवगत होता है। इस प्रकार मनुष्य आदिसे लेकर नारकीय एवं स्थावर पर्यन्त जीवोंमें तारतम्यसे वर्तमान सुख लव चोदनात्मक धर्मसे ही जन्य ज्ञात होता है।

इसी प्रकार ऊर्ध्वगत तथा अधोगत देहधारी जीवोंमें दु : खका तारतम्य देखनेसे उसके हेतु भूत प्रतिषेध चोदनात्मक ( प्रतिषेध प्रवर्तक वाक्योंसे बोधित ) अधर्मका और उसके अनुष्ठान करनेवालोंका तारतम्य ज्ञात होता है। एवं अविद्या आदि दोष विशिष्ट जीवोंके धर्म और अधर्मके तारतम्यसे शरीर ग्रहण पूर्वक सुख दुःखका तारतम्य अनित्य संसाररूप है, ऐसा श्रुति, स्मृति और न्यायमें प्रसिद्ध है।

इसी प्रकार ' न ह वै सशरीरस्य ० ' ( निस्सन्देह उस सशरीर आत्माके सुख दुःखका विनाश नहीं होता ) यह श्रुति यथावर्णित संसाररूपका अनुवाद करती है। ' अशरीरं वाव ० ' ( देहादि अभिमान रहित आत्माको मिथ्या देह सम्बन्धी सुख - दुःखं स्पर्श नहीं करते ) इस श्रुतिसे प्रिय और अप्रिय सम्बन्ध के प्रतिषेधसे मोक्ष नामक शरीर रहित अवस्था चोदनात्मक धर्मका कार्य है इसका प्रतिषेध किया गया है, ऐसा अवगत होता है। मोक्षको धर्मका कार्य मानें तो उसमें प्रियाप्रिय स्पर्शका प्रतिषेध अनुपपन्न है।

यदि कहो कि अशरीरत्व ही धर्मका कार्य हो तो यह युक्त नहीं हैं ' क्योंकि ' अशरीरं ० ' ( जो देवादि शरीरोंमें शरीर रहित तथा अनित्योंमें नित्य स्वरूप है, उस महान् और सर्वं व्यापक आत्माको [ मैं ब्रह्म हूँ ] जानकर विद्वान् शोक नहीं करता ) ' अप्राणो ० ' ( प्राण रहित, मन रहित, शुद्ध है ) ' असङ्गो ० ' ( यह पुरुष असङ्ग है ) इत्यादि श्रुतियों से ज्ञात होता है कि अशरीरत्व उसका स्वभाव है। अतएव अनुष्ठेय कर्मफलसे विलक्षण मोक्ष नामक अशरीरत्व नित्य है, यह सिद्ध हुआ।

[ नित्य भी दो प्रकारका होता है परिणामी नित्य तथा पारमार्थिक नित्य ] इन दोनोंमें परिणामी नित्य वह है जिसके विकृत होनेपर भी ' वही यह है ' ऐसी प्रतिज्ञारूप बुद्धिका नाश नहीं होता। जगत् को नित्य माननेवालोंके मतमें जैसे पृथ्वी आदि परिणामी नित्य हैं। और सांख्योंके मतमें जैसे गुण परिणामी नित्य हैं। परन्तु यह ( ब्रह्म ) तो पारमार्थिक, कूटस्थ, नित्य, आकाशके समान सर्वव्यापक, सभी विक्रियाओंसे रहित, नित्य तृप्त, निरवयव और स्वयं प्रकाश स्वरूप है।

जिस परमात्मामें धर्माधर्मं, सुख दुःखं रूप कार्यके साथ तीनों कालोंमें भी सम्बन्ध नहीं रख सकते। ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( जो धर्माधर्म, कार्यं कारण, भूत भविष्यत् से भिन्न है ) इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध मोक्ष नामक अशरीरत्व है। इसलिए कर्मफलसे विलक्षण होने के कारण वह अशरीर मोक्ष ब्रह्म है जिसकी यह जिज्ञासा प्रस्तुत है। यदि वह ( ब्रह्म ) कार्य के अङ्गरूपसे उपदिष्ट हो और उस कार्य से मोक्ष साध्य स्वीकृत किया जाय तो वह अनित्य ही होगा।

मोक्ष अनित्य सिद्ध होनेपर तारतम्य ( न्यूनाधिक ) से वर्तमान यथोक्त अनित्य कर्मफलोंमें से कोई अतिशय मोक्ष है ऐसा मानना पड़ेगा। परन्तु सब मोक्षवादी यह स्वीकार करते हैं कि मोक्ष नित्य है। इस कारण कार्यके अङ्गरूपसे ब्रह्मका उपदेश युक्त नहीं है।

और ' ब्रह्म वेद ० ' ( ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही होता है ) क्षीयन्ते चास्य ० ' ( उस परावर ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेनेपर इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ) ' आनन्दं ० ' ( ब्रह्मके आनंदको जाननेवाला विद्वान् किसीसे भयभीत नहीं होता ) ' अभयं ० ' ( याज्ञवल्क्य - हे जनक!

तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है ) ' तदात्मन ० ' ( अज्ञानके निवृत्त होने के कारण जीव संज्ञक ब्रह्मने गुरुके उपदेशसे अपनेको ही ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा जाना, अत : वह सर्व हो गया ) ' तत्र को मोहः ० ' ( उस समय एकत्वका अनुभव करनेवाले उस विद्वान्को क्या शोक और क्या मोह हो सकता है ) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मज्ञानके अनन्तर मोक्ष दिखलाती हुई ब्रह्मज्ञान और मोक्षके मध्यमें कार्यान्तरका निषेध करती हैं।

इसी प्रकार ' तद्वैतत् ० ' ( वह ब्रह्म मैं - प्रत्यगात्मा हूँ, ऐसा ज्ञान प्राप्तकर मुनीन्द्र वामदेव शुद्ध ब्रह्मस्वरूप हुए अर्थात् उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषिवामदेवने जाना - मैं मनु हुआ और सूर्य मी ) इस श्रुतिको ब्रह्मदर्शन तथा सर्वात्मभाव के मध्य में अन्य कर्तव्यका निषेध करनेके लिए उदाहरणरूपसे समझना चाहिए। जैसे ' खड़ा होकर गायन करता है ' इसमें खड़े होने और गायन क्रियाके मध्य में तत्कर्तृक अन्य कार्य नहीं है, ऐसा ज्ञात होता है।

[ सुकेश भारद्वाज आदि छः ऋषियोंने पिप्पलाद गुरुसे कहा - ] ' त्वं हि ० ' ( तुम ही तो हमारे पिता हो जो हमें अविद्या के परपार पहुँचा दिया है ) ' श्रुतं ह्येव ० ' ( मैंने भगवत् तुल्य आप जैसोंसे सुना है कि आत्मवित् शोकको पार कर लेता है अर्थात् शोकसे मुक्त हो जाता है, और हे भगवन्!

मैं शोक करता हूँ, ऐसे मुझको आप शोकसे पार- मुक्त कर दीजिए ऐसा नारदने कहा ) ' तस्मै ० ' ( भगवान् सनत्कुमारने उस दग्ध पाप नारदको अज्ञानरूपी अन्धकारसे पार ( ब्रह्म ) दिखलाया ) इत्यादि श्रुतियाँ दिखलाती हैं कि मोक्ष के प्रतिबन्ध ( अज्ञान ) की निवृत्तिमात्र आत्मज्ञानका फल है।

उसी प्रकार ( दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, धर्म, अधर्म, दोष एवं मिथ्याज्ञान इनमें कारणरूप उत्तर - उत्तरका नाश होनेसे उसके पूर्व - पूर्व कार्यका नाश होकर मोक्ष प्राप्त होता है ) इस प्रकार युक्तियोंसे पुष्ट आचार्य गौतम प्रणीत यह सूत्र है। मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे होती है।

यह ब्रह्मात्मैकत्व विज्ञान सद्रूप नहीं है, जैसे अनन्तं वै ० ' ( मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं ) इसलिए मनमें अनन्त विश्वे - देवोंकी दृष्टि करने के कारण वह अनन्तलोकको जीतता - प्राप्त करता है ), यह ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञान अध्यासरूप भी नहीं है, जैसे ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( मन ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे ) ' आदित्यो ब्रह्म ० ' ( आदित्य ब्रह्म है, ऐसा आदेश है ) इस प्रकार मन और आदित्यादिमें ब्रह्मदृष्टि अव्यासरूप है। ' वायुर्वाव ० ' ( वायु ही ( छान्दो ० ४ | ३ | ३ ) इतिवत्।

नाप्याज्यावेक्षणादिकर्मवत्कर्माङ्गसंस्काररूपम् | संपदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने ' तत्त्वमसि ' ( छान्दो ० ६।८।७ ) ' अहं ब्रह्मास्मि ’ संवर्ग है ) ' प्राणो बम ' ( प्राण ही सवर्ग है ) इसके समान विशिष्ट क्रिया सम्बन्ध निमित्तक भी नहीं है, और आज्यावेक्षण आदि कर्मके समान कर्माङ्गका संस्काररूप भी नहीं है, क्योंकि ब्रह्मात्मैकत्व विज्ञानको सम्पदादिरूप माननेपर ' तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि ' ' अयगात्मा ब्रह्म ' इत्यादि वाक्योंका ब्रह्मात्मैकत्व वस्तु प्रतिपादन परक पद समन्वय बाधित हो जायगा।

' भिद्यते ० ' ( ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेनेपर इसकी हृदय ग्रन्थि टूट जाती है और सब संशय नष्ट हो जाते हैं ) इत्यादि अज्ञान निवृत्तिरूप फलके बोधक श्रुतिवाक्य बाधित हो जायँगे। और ' ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' इत्यादि ब्रह्मभाव प्राप्ति प्रतिपादक श्रुतिवाक्य संपदादि पक्षमें मुख्यरूपसे उपपन्न नहीं होंगे। इसलिए ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान संपदादिरूप नहीं है। अत : ( ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान विधेय न होने के कारण ) ब्रह्मविद्या पुरुष व्यापारके अधीन नहीं है।

किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके विषय वस्तु ज्ञानके समान वस्तुके ही अधीन है। ऐसे ब्रह्म और उनके ज्ञानको किसी भी युक्तिसे कार्यके साथ सम्बन्धकी कल्पना नहीं की जा सकती। विदि ( जानना ) क्रियाके कर्मरूपसे भी कार्यके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ' अन्यदेव ० ' ( यह विदित ( कार्य ) से अन्य और अविदित ( कारण ) से भी अन्य है ) और ' येनेदं ० ' ( जिसके द्वारा इस सबको जानता है उसे किससे जाने ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्ममें विदिक्रिया कर्मत्वका निषेध किया गया है।

उसी प्रकार ' यद्वाचा ० ' ( जो वाणी ( शब्द ) से प्रकाशित नहीं होता किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती हैं ) इसप्रकार ब्रह्मको इन्द्रियोंका अविषय कहकर ‘ तदेव ० ' ( उसीको तुं ब्रह्म जान, जिसकी लोक उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है ) इस श्रुतिसे उपास्ति ( उपासना ) क्रिया के कर्मत्वका भी ब्रह्ममें प्रतिषेध है। यदि कहो कि इन्द्रियादिका अविषय होनेसे ब्रह्ममें शास्त्र प्रमाणकत्व अनुपपन्न होगा? तो ऐसा नहीं, क्योंकि शास्त्र तो अविद्यासे - कल्पित भेदकी निवृत्ति के लिए है।

शास्त्र इदं रूपसे विषयभूत ब्रह्मका प्रतिपादन करना नहीं चाहता, किन्तु ब्रह्म प्रत्यगात्मरूपसे अविषय है ऐसा प्रतिपादन करता हुआ शास्त्र अविद्या से कल्पित वेद्य ( ज्ञेय ) वेदितृ ( ज्ञाता ), वेदना ( ज्ञान ) आदि भेदको निवृत्त करता है।

जैसे ' यस्यामतं ० ' ( जिसको ऐसा निश्चय है कि ब्रह्म ज्ञात नहीं है उसे ब्रह्म ज्ञात है अर्थात् उसने ब्रह्मस्वरूपको जाना है और जो ऐसा समझता है कि ' मुझे ब्रह्म ज्ञात है ' उसने ब्रह्मको जाना ही नहीं, क्योंकि जिसे ब्रह्मज्ञान हो गया है, उसके लिए ब्रह्म अविज्ञात - विषय से अज्ञात है, कारण कि ब्रह्म ज्ञानका विषय नहीं है और जो अज्ञानी हैं, उनके लिए ब्रह्म विषयरूपसे ज्ञात है, क्योंकि ब्रह्मको ज्ञानका विषय समझकर मैंने ब्रह्मको जाना है, ऐसा कहते हैं अर्थात् अज्ञानियोंके मत में ब्रह्म विषय है ) और ' न दृष्टे : ० ' ( दृष्टिइन्द्रिय वृत्तिके साक्षीभूत आत्माको तुम चक्षु आदि इन्द्रियोंसे देख नहीं सकते और बुद्धि वृत्तिके साक्षीको तुम बुद्धिवृत्ति से नहीं जान सकते ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं।

अतः शास्त्र तत्त्वज्ञानसे अविद्यासे कल्पित संसारित्वका निवर्तनकर नित्य मुक्त आत्माका यथार्थ स्वरूप समर्पण होने के कारण मोक्ष में अनित्यत्व दोष नहीं है। जिसके मतमें मोक्ष उत्पाद्य है, उसके मतमें मोक्ष मानसिक या वाचिक अथवा कायिक क्रियाओंकी अपेक्षा रखता है, यह ठीक है। इसी प्रकार विकार्यत्व पक्ष में भी, इन दोनों पक्षों में मोक्षका अनित्यत्व निश्चित है। लोकमें विकार्यं दधि आदि एवं उत्पाद्य घटादिमें नित्यत्व नहीं देखा गया है।

ब्रह्मज्ञान से प्राप्य होनेपर भी उसको कार्यकी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि वह स्व आत्मस्वरूप होनेके कारण प्राप्य ही नहीं है। यदि ब्रह्मको स्वरूप ( आत्मा ) से भिन्न मानें तो भी वह प्राप्य नहीं है। कारण- आकाशके समान सर्व व्यापक होनेके कारण ब्रह्म सबको नित्य प्राप्त स्वरूप ही है। और मोक्ष संस्कार्य भी नहीं है, जिससे वह व्यापारकी अपेक्षा करे। संस्कार्य पदार्थ में विशेष गुण लाने अथवा दोष हटाने से संस्कार होता है।

मोक्ष में गुणाधान ( विशेष गुणका लाना ) से संस्कारका संभव नहीं है, क्योंकि मोक्ष तो आधेयातिशय ( अतिशयको लाना ) से रहित ब्रह्म स्वरूप है। दोषापनयनसे भी उसका संस्कृत होना संभव नहीं है, क्योंकि मोक्ष नित्य शुद्ध ब्रह्मस्वरूप है।

यदि ऐसा कहो कि जैसे घर्षण क्रियासे दर्पण संस्कृत होनेपर अपने भास्वरत्व धर्मंसे अभिव्यक्त होता है, वैसे उपासनादि क्रिया से आत्माके संस्कृत होनेपर उसका अविद्यादि मलसे तिरोहित हुआ अपना मोक्षरूप धर्मं अभिव्यक्त होता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मामें क्रियाका आश्रयत्व अनुपपन्न है। जिस आश्रयमें क्रिया रहती है उसको विकृत किये विना वह अपने स्वरूपको प्राप्त नहीं कर सकती। यदि आत्मा स्वाश्रित क्रियासे विकृत हो तो आत्मामें अनित्यत्व प्रसक्त होगा।

' अविकार्योऽयमुच्यते ' ( यह आत्मा कार्य कहा जाता है ) इत्यादि वाक्य बाधित होंगे, वह युक्त नहीं है। इसलिए आत्मा में स्वाश्रय क्रियाका संभव नहीं है। अन्य पदार्थ आश्रय क्रियाका आत्मा विषय - सम्बन्धी नहीं है, अतः उससे आत्मा संस्कृत नहीं हो सकता। परन्तु देहाश्रय स्नान, आचमन, यज्ञोपवीत धारण आदि क्रियाओंसे जीवात्मा संस्कृत होता देखा गया है? ऐसा नहीं, क्योंकि देहादि संघात युक्त अविद्यामें प्रतिबिम्बित आत्माका संस्कार होता है।

स्नान, आचमन आदि क्रियाओंका सम्बन्ध देहके साथ तो प्रत्यक्ष ही है। जो कोई अविद्यासे देहादि संघातको आत्मरूप से गृहीत करता है, उसका उस देहाश्रित क्रियासे संस्कृत होना युक्त है।

जैसे देहके आश्रित चिकित्सा निमित्तक धातुओंकी समताद्वारा जिस देहाभिमानी आत्मामें ' मैं अरोग हूँ ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न होती है, देहादिके साथ सम्बन्ध और उसमें ' मैं, मेरा ' अभिमान रखनेवाला आरोग्य फल पाता है, वैसे ही स्नान, आचमन, यज्ञोपवीतादिसे ' मैं शुद्ध हूँ, संस्कृत हूँ, ऐसी बुद्धि जिसमें उत्पन्न हो वही संस्कृत होता है। वह तो देहके साथ सम्बद्ध ही है।

‘ तयोरन्यः ० ’ ( उसमें एक तो स्वादिष्ट कर्म फलको भोगता है और दूसरा न भोगता हुआ साक्षी - रूपसे रहता है अर्थात् प्रकाशित करता है ) ' आत्मेन्द्रिय ० ' ( शरीर, इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको विद्वान् भोक्ता कहते हैं ) इत्यादि श्रुति वाक्योंसे यह स्पष्ट होता है कि ' अहं ' प्रतीति के विषयभूत प्रत्ययी अहंकर्तासे ही सम्पूर्ण क्रियाएँ सिद्ध होती हैं और उनका फल वही भोगता है।

इसीप्रकार ' एको देवः ' ( सब भूतोंमें एक, स्वप्रकाश, गूढ, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियोंमें बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनता प्रदान करनेवाला निर्गुण और शुद्ध आत्मा है ) ‘ स पर्यंगात् ० ' ( वह आत्मा सर्वगत, शुद्ध, अशरीरी, अक्षत, स्नायु रहित - स्थूल शरीर रहित और अपापहत है ) ये दोनों मन्त्र ब्रह्म में अनाधेयातिशयता और नित्यशुद्धता दिखलाते हैं। ब्रह्मभाव ही तो मोक्ष है। इसलिए मोक्ष संस्कार्य भी नहीं है।

इस कारण • मोक्षके प्रति उत्पत्ति, विकृति, आप्ति और संस्कृतिसे भिन्न क्रिया सम्बन्धका द्वार कोई नहीं दिखा सकता। इसलिए मोक्षमें केवल ज्ञानके सिवा क्रियाके लेशमात्रका भी सम्बन्ध उपपन्न नहीं है। परन्तु ज्ञान तो मानसी क्रियाका नाम है? ऐसा नहीं, क्योंकि ज्ञान उससे विलक्षण है।

वस्तु स्वरूपकी अपेक्षा के विना जहाँ जिसका विधान किया जाता है वह क्रिया है और वह पुरुष संकल्पके अधीन है, जैसे ' यस्यै देवतायै ० ' ( जिस देवताके लिए अध्वर्युने हविका ग्रहण किया हो उस समय होता ' वषट् ' शब्दका उच्चारण करता हुआ उसका मनसे ध्यान करे ) और ' सन्ध्यां ० ' ( सन्ध्याका मनसे ध्यान करे ) इत्यादि श्रुतिमें ध्यान चिन्तन यद्यपि मानसी क्रिया है, तो भी पुरुषके अधीन होनेके कारण वह पुरुष द्वारा करने न करने अथवा अन्य प्रकारसे करने के योग्य है।

ज्ञान तो प्रमाण जन्य है और प्रभाण यथार्थ वस्तु विषयक होता है, इसलिए ज्ञान करने न करने अथवा अन्य प्रकारसे करनेके योग्य नहीं हो सकता, क्योंकि वह केवल वस्तुके ही अधीन है, विधिके अधीन नहीं है और पुरुषके अधीन भी नहीं है। अतः मानसिक होनेपर भी ज्ञानका ध्यानसे महान् अन्तर है। जैसे ' पुरुषो ० ' ( हे गौतम! पुरुष अग्नि है ) ' योषा ० ' ( हे गौतम! स्त्री अग्नि है ) यहां स्त्री और पुरुष में अग्नि बुद्धि मानसिक है और वह केवल विधि जन्य होनेके कारण क्रिया ही है और पुरुषके अधीन है।

लोक प्रसिद्ध अग्नि में जो अग्नि बुद्धि है वह न . विधिके अधीन है और न पुरुषके ही अधीन, किन्तु प्रत्यक्ष विषय वस्तु ( अग्नि ) के अधीन है, अतः वह ज्ञान ही है क्रिया नहीं। इसीप्रकार समस्त प्रमाण विषयक वस्तुमें भी समझना चाहिए। लोकमें ज्ञानके अविधेय होनेपर ब्रह्मात्मविषयक ज्ञान भी विधिके अधीन नहीं है।

यद्यपि ज्ञानके विषयमें लिङ्, लोट् आदि विधि प्रत्यय श्रूयमाण हैं, तो भी अनियोज्य विषयक होनेके कारण पत्थरादिमें प्रयुक्त उस्तरेको तीक्ष्णधारके समान कुण्ठित हो जाते हैं अर्थात् उक्त विधि प्रत्यय भी अनियोज्य विषयक होनेसे पुरुषको प्रवृत्त करनेमें समर्थं नहीं है, क्योंकि अहेयानुपादेय ( हेयोपादेय रहित ) वस्तु विषयक हैं। तब ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः ' इत्यादि विधि तुल्य वाक्य किसलिए हैं अर्थात् इनका क्या प्रयोजन है?

हम कहते हैं ि विषयमें पुरुषकी जो स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है इससे उसको वे पराङ्मुख करनेके लिए हैं। जो पुरुष बाह्य विषयोंमें ' इष्ट वस्तु मुझे प्राप्त हो अनिष्ट प्राप्त न हो ' इस प्रकार बहिर्मुख होकर प्रवृत्त होता है, वह उन विषयोंसे आत्यन्तिक पुरुषार्थं प्राप्त नहीं कर सकता।

उस आत्यन्तिक पुरुषार्थके अभिलाषीको ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि वाक्य कार्य ( शरीर ) करण ( इन्द्रिय ) समुदायकी स्वाभाविक प्रवृत्तिके विषय शब्दादिसे हटाकर उसकी चित्तवृत्तिको अन्तरात्मा की ओर प्रवाहरूपसें प्रवृत्त करते हैं।

आत्मस्वरूपकी खोज में प्रवृत्त हुए उस पुरुषको ' इदं सर्व ० ' ( यह जो कुछ भी है : सब आत्मा है ) ' यत्र त्वस्य ० ' ( किन्तु जिस तत्त्वज्ञानावस्था में इसके लिए सब आत्मा ही हो गया वहाँ किससे किसे देखे, किससे किसे जाने, अरे उस विज्ञाताको किससे जाने ) ' अयमात्मा ० ' ( यह आत्मा ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियोंसे हेय तथा उपादेयसे रहित आत्मतत्त्व का उपदेश किया जाता है। यद्यपि अकर्तव्य प्रधान आत्मज्ञान किसीके त्याग अथवा ग्रहणके लिए नहीं होता, तथापि हम उसको उसी प्रकार स्वीकार करते हैं।

हम वेदान्तियोंके लिए यह अलङ्कार है कि जो प्रत्यगभिन्न ब्रह्मका ऐक्यज्ञान होने पर सर्व कर्तव्यताकी हानि और कृतकृत्यता होती है। इस विषय में ' आत्मानं ० ' ( ( यदि पुरुष स्वयं प्रकाश आत्माको ' यह मैं हूँ ' इसप्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर किस फलकी इच्छा करता हुआ किस कामनासे शरीर के पीछे स्वयं संतप्त हो ) यह श्रुति और ' एतबुद्धवा ० ' ( हे अर्जुन! इस गुह्यतम तत्त्वको जानकर पुरुष ज्ञानी और कृतकृत्य हो जाता है ) यह स्मृति है।

इस कारण वेदान्तवाक्य उपासना विधिके विषयरूपसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं कराते। कोई कहते हैं कि प्रवृत्ति विधि, निवृत्ति विधि और उनके अङ्गोंसे भिन्न केवल सिद्ध वस्तुका प्रतिपादक वेद भाग नहीं है। यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि उपनिषद् प्रतिपाद्य पुरुष अन्यका शेष ( अङ्ग ) नहीं है।

जो केवल उपनिषदोंसे ही अधिगत असंसारी पुरुष ब्रह्म है, वह तो उत्पाद्य आदि चार प्रकारकें द्रव्योंसे विलक्षण, स्वप्रकरण में स्थित, अनन्यशेष है, यह नहीं है अथवा नहीं जाना जाता ऐसा नहीं कहा जा सकता ; क्योंकि ' स एष ० ( यह नहीं, यह नहीं, इसप्रकार जो आत्मा उपादिष्ट है वह यह है ) इस श्रुतिमें ' आत्मशब्द ' है, अतः आत्माका निषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि जो निषेध कर्ता है उसका वही तो आत्मा ( स्वरूप ) है।

यदि कहो कि आत्मा ' मैं ' इस प्रसिद्ध लोक प्रतीतिका विषय होनेसे केवल उपनिषदोंसे ही जाना

प्रसिद्ध प्रतीतिका साक्षी है जाता है, यह कथन अयुक्त है, ऐसा नहीं, क्योंकि आत्मा तो ' मैं ' इस लोक

लोक प्रसिद्ध कर्ता मिन्न विषय नहीं, ऐसा कहा जा चुका है। ' मैं ' इस लोक प्रतीतिका विषय उसका साक्षी, सब भूतोंमें स्थित, सम, एक कूटस्थ, नित्य सबका आत्मा

पुरुष है। वह विधिकाण्ड अथवा तर्कशास्त्र में किसीसे भी अधिगत नहीं है। इसलिए उसका न

कोई निषेध कर सकता है और न कोई उसे किसी विधिके अङ्गरूपसे ग्रहणकर सकता है।

वह सबका आत्मा है, इसलिए न हेय है और न उपादेय ही। नष्ट होता हुआ सब विकार नित्यं भूतं नोपदिशतीति को हेतुः? नहि भूतमुपदिश्यमानं क्रिया भवति। अक्रियात्वेऽपि होता है। ' विनाश हेतु अभावसे पुरुष अविनाशी है। विक्रिया हेतुके अमावसे कूटस्थनित्य है, अतएव नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव है।

इस कारण ' पुरुषान्न ० ' ( पुरुषसे पर और कुछ नहीं है वह सूक्ष्मत्वकी पराकाष्ठा ( अवधि ) है और वही परा गति है ) ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' इस श्रुतिमें पुरुषका ' औपनिषदं ' यह विशेषण उपनिषदोंमें मुख्यरूपसे ज्ञान गम्य होनेपर उपपन्न होता है। इसलिए सिद्ध वस्तु विषयक वेद भाग नहीं है यह वादीका कथन साहस मात्र है। यदपि शास्त्रका तात्पर्यं जाननेवालोंका ' दृष्टो हि ० ' ( कर्मका ज्ञान करना ही उनका दृष्ट ( प्रत्यक्ष ) प्रयोजन है ) इत्यादि कथन है।

उन्हें धर्मं जिज्ञासाका विषय होनेसे विधि प्रतिषेध शास्त्र के प्रकरण में सिद्ध अर्थके प्रतिपादक वाक्योंके अभिप्रायके लिए समझना चाहिए। और ' आम्नायस्य ० ' ( वेद क्रियार्थक है, अक्रियार्थक वेद वाक्य निष्फल हैं ) इस अव्यभिचारी नियमको माननेवाले मीमांसकोंके मत में सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेद वाक्य भी निष्फल होंगे।

यदि कहो कि शास्त्र प्रवृत्ति विधि, निवृत्ति विधि और उनके अङ्गोंसे अतिरिक्त सिद्ध वस्तुका उपदेश धर्मके लिए करता है, कुटस्थ नित्य सिद्ध वस्तुका उपदेश नहीं करता इसमें क्या कारण है? उपदिश्यमान सिद्ध वस्तु केवल उपदेशसे ही क्रिया नहीं हो जाती।

यदि कहो कि सिद्ध वस्तु भले ही क्रिया न हो किन्तु क्रियाकी निष्पत्तिका साधन होनेके कारण सिद्ध वस्तुका उपदेश क्रिया के लिए ही होता है, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि सिद्ध वस्तु क्रियाके लिए होनेपर भी क्रियोत्पादन शक्ति विशिष्ट वस्तु उपदिष्ट है, क्रियार्थत्व ही उसका प्रयोजन है अर्थात् क्रियाको निष्पन्न करना ही सिद्ध वस्तुका प्रयोजन है। क्रियार्थक होनेपर भी सिद्ध वस्तु अनुपदिष्ट नहीं होती। पूर्वपक्षी - यदि सिद्ध वस्तुका उपदेश होता भी तो उससे तुमको क्या लाभ होगा?

सि०कहते हैं - दधि आदि पदार्थोंके समान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे अज्ञात ब्रह्मात्म वस्तुका भी शास्त्र से उपदेश होना ही युक्त है। उसके ज्ञानसे संसारके हेतु भूत मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति प्रयोजन होता है। इसकारण क्रियाके साधन भूत सिद्ध वस्तुके उपदेशके समान आत्माका उपदेश भी सार्थक है। और ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' ( ' ब्राह्मणकी हिंसा नहीं करनी चाहिए ) इत्यादि श्रुतियाँ निवृत्तिका उपदेश करती हैं। वह निवृत्ति न तो क्रिया है और न क्रियाका साधन ही।

यदि क्रियाको न कहने वाले वाक्य अनर्थक हैं तो ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि निवृत्ति परक उपदेश व्यर्थ होंगे। परन्तु वह इष्ट नहीं है। नंंका रागतः प्राप्त हनन क्रियाके साथ सम्बन्ध होनेसे हनन क्रियासे निवृत्त होकर औदासीन्यके अतिरिक्त अप्राप्त क्रियाकी कल्पना नहीं की जा सकती। नञ्का यह स्वभाव है कि जो अपने सम्बन्धी पदार्थ के अभावका ज्ञान कराता है। अभावज्ञान उदासीनताका कारण है। वह दग्धेन्धन अग्नि समान स्वयं ही शान्त हो जाता है।

इस कारण प्रजापति व्रतादिके अतिरिक्त ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि स्थलोंमें रागसे प्राप्त हनन क्रियासे निवृत्त होकर औदासीन्य ही ' नन् ' प्रतिषेधका अर्थं हम मानते हैं। इस कारण पुरुषार्थके अनुपयोगी उपाख्यानादि भूतार्थवाद विषयक आनर्थक्य अभिधान है, ऐसा समझना चाहिए। जो पहले कहा गया है कि कर्तव्य विधिके साथ सम्बन्धके विना कही हुई वस्तुमात्र ' सात द्वीप वाली पृथ्वी है ' इत्यादिके समान अनर्थक है।

' यह रज्जु है सर्प नहीं है ' इस प्रकार वस्तु मात्रके कथनसे भी भयादिकी निवृत्ति रूप प्रयोजन देखा गया है, इस तरहसे कहकर उसका परिहार किया गया है। परन्तु श्रुत ब्रह्म पुरुष में भी पूर्वके समान संसारित्व देखने में आता है, अतः रज्जुस्वरूप ( यह रज्जु है ) कथन के समान ब्रह्मस्वरूपको कथन सार्थक नहीं हो सकता, ऐसा पहले कहा गया है।

सि ० - इसपर कहते हैं— ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार अवगत ब्रह्मात्मभाववाले विद्वान्में पूर्वके समान संसारित्व नहीं दिखलाया जा सकता, क्योंकि वेद प्रमाणसे जनित ब्रह्मात्मभावके साथ उसका विरोध है।

[ इस अर्थको स्पष्ट करने के लिए भगवान् भाष्यकार तीन उदाहरण देते हैं, उनमें से प्रथम ] अनात्म शरीरादिमें आत्मबुद्धि रखनेवाले पुरुषमें दुःख भयादि देखे गये हैं, परन्तु वेदसे जनित ब्रह्मात्मभावावगम ( ज्ञान ) होनेपर देहात्मबुद्धिके निवृत्त हो जानेपर मिथ्याज्ञान निमित्त वही दुःख मयादि पहले के समान उस ( आत्मवित् ) में होते हैं, ऐसो कल्पना नहीं की जा सकती। [ द्वितीय उदाहरण ] धनाभिमानी धनी गृहस्थको धनापहारसे दुःख होता देखा गया है।

संन्यास ग्रहण किए हुए धनाभिमान रहित उसी पुरुषको धनापहार निमित्तक वहीं दुःख नहीं होता। [ तृतीय उदाहरण ] कुण्डल पहनने वालेको कुण्डलित्वाभिमान निमित्तक सुख होता देखा गया है, कुण्डलवियुक्त कुण्डलित्वाभिमान रहित उसी पुरुषको कुण्डलित्वाभिमान निमित्तक वही सुख नहीं होता। यही बात ' अशरीरं ० ' ( शरीर रहित हुए आत्माको सुख और दुःख स्पर्श नहीं करते ) इस श्रुति से भी कही गई है। यदि कहो कि शरीरपात होनेपर अशरीरत्व हो जायगा जीवित होनेपर नहीं?

तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि सशरीरत्व मिथ्याज्ञान निमित्तक है। ' शरीर ही आत्मा है ' इस अभिमानरूप मिथ्याज्ञानको छोड़कर अन्य किसी कारण से आत्मामें सशरीरत्वकी कल्पना नहीं की जा सकती। कर्मसे उत्पन्न न होने के कारण अशरीरत्व नित्य है, ऐसा हम पहले कह चुके हैं। यदि कहो कि आत्मकृत धर्माधर्म निमित्तक उसमें सशरीरत्व है, तो ऐसा नहीं, क्योंकि आत्माका शरीरके साथ सम्बन्ध हो असिद्ध है, इससे धर्माधर्ममें आत्मकृतत्व भी असिद्ध है।

आत्माका शरीर के साथ सम्बन्ध हो तो धर्माधर्मकी उत्पत्ति हो, आत्मकृत धर्माधर्म हों तो आत्माका शरीर के साथ सम्बन्ध हो, ऐसा अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होगा। इन दोनोंका कार्यकारणभाव अनादि है, यह अनादित्व कल्पना भी अन्धपरम्परा है। क्रिया सम्बन्धके अभाव होनेसे आत्मा कर्ता भी नहीं हो सकता। यदि कहो कि सेवकोंके साथ सान्निध्यमात्रसे राजादिमें कर्तृत्व देखा गया है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि धन दानादि उपायोंसे सम्पादित सेवकोंके साथ सम्बन्ध होनेके कारण उनमें कर्तृत्वकी उपपत्ति होती है।

परन्तु आत्मामें शरीरादिके साथ धनदानादिके समान स्वस्वामिभाव सम्बन्धके कारणकी किञ्चिदपि कल्पना नहीं की जा सकती। किन्तु मिथ्याभिमान तो सम्बन्धका हेतु प्रत्यक्ष है। इस कथन से आत्मामें यजमानत्वादिका प्रतिपादन हो गया अर्थात् जब तक मिथ्याभिमान है तभी तक आत्मामें यजमानत्वादि भी हैं।

इस विषय में प्रभाकर कहते हैं - देहादिसे मन आत्माका अपने देहादिमें ' मैं, मेरा ' अभिमान गौण है मिथ्या नहीं, यदि ऐसा कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि जिसको वस्तुका भेद ज्ञात है उसीको गौण मुख्य ज्ञान होता है यह प्रसिद्ध है। जिसको दो वस्तुओंका भेव ज्ञात है, जैसे अन्वयव्यतिरेकसे सिंह शब्द सिंह ज्ञानका विषय केसर आदिसे युक्त, विशेष आकृति वाला, पुरुष से भिन्न सिंह प्रसिद्ध है और उससे भिन्न प्रायः क्रूरता एवं शूरता आदि सिंहके गुणोंसे सम्पन्न पुरुष भी ज्ञात है।

उसको सिंह गुण सम्पन्न पुरुष में सिंह शब्द प्रयोग और सिंह ज्ञान गौण होते हैं | परन्तु जिसको वस्तुका भेद ज्ञात नहीं है उसको नहीं होते। उसको तो दूसरे अर्थ में अन्य शब्द और ज्ञान भ्रान्ति से ही होते हैं गौण नहीं।

जैसे मन्द अन्धकारमें ' यह स्थाणु है ' ऐसे विशेष ज्ञानके गृहीत न होनेपर ' पुरुष ' यह शब्द और ज्ञान स्थाणुमें होते हैं, जैसे शुक्तिमें अकस्मात् ' यह रजत है ' यह शब्द और ज्ञान निश्चित होते हैं, वैसे देहादि संघातमें मुख्यरूपसे होनेवाले ' मैं ' ऐसा शब्द और ज्ञान आत्मा अनात्मा विवेक न होनेके कारण उत्पन्न होते हैं, वे गौण कैसे कहे जा सकते हैं?

आत्मा, अनात्माका भेद जाननेवाले पण्डितोंको भी भेड़ बकरी पालनेवाले प्राकृत पुरुषोंके समान देहादिमें अपृथक् ग्रूप से शब्द प्रयोग और ज्ञान भ्रान्तिसे उत्पन्न होते हैं। इस कारण आत्माको देहादिसे भिन्न माननेवालोंका

अहं प्रत्यय ( मैं ) मिथ्या ही है गौण नहीं | इससे यह सिद्ध हुआ कि सशरीरत्व मिथ्याज्ञानसे होता है और ज्ञान होनेपर जीवितावस्था में आत्मवित्को ही अशरीरत्व प्राप्त होता है। और उसी प्रकार ‘ तद्यथा ० ' ( जिस प्रकार सर्प की काँचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्प द्वारा परित्यक्त हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार विद्वान्, जिसने अभिमान त्याग दिया है उसका शरीर पड़ा रहता है और शरीर में स्थित यह आत्मा अशरीर है, अमृत, प्राण, ब्रह्म है स्वयं प्रकाश ही है ) और ' सचक्षुरचक्षु ० ' ( वस्तुतः वह नेत्र रहित भी सनेत्रके समान, श्रोत्र रहित भी श्रोत्र सहित -सा, वाणी रहित मी इवसवागवागिव समना अमना इव सप्राणोऽप्राण इव ' इति च। स्मृतिरपि च- ' स्थितप्रज्ञस्यका

सहित - सा मन रहित भी मन सहित सा, प्राण रहित भी प्राण सहित -सा है ) यह श्रुति ब्रह्मवित्के सम्बन्धमें है। ' स्थितप्रज्ञस्य ० ' ( जिसको प्रज्ञा स्थित है उसकी भाषा ( लक्षण ) क्या है ) इत्यादि स्मृति भी स्थितप्रज्ञका लक्षण कहती हुई यह दिखलाती है कि विद्वान्का सर्व प्रवृत्तिके साथ सम्बन्ध नहीं रहता है। इसलिए ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार ब्रह्मात्मभाव साक्षात्कार करनेवाला विद्वान् पूर्वके समान संसारी नहीं रहता।

जो पूर्वके समान संसारी है मानो उसने ब्रह्मात्मभावका साक्षात्कार ही नहीं किया है। इस कारण वेदान्तशास्त्र निर्दोष है। पहिले जो यह कहा गया है कि श्रवणान्तर मनन और निदिध्यासन देखनेमें आते हैं, इसलिए ब्रह्म विधिका अङ्ग है स्वरूप पर्यवसायी नहीं, यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि श्रवणके समान मनन, निदिध्यासन भी ब्रह्मके साक्षात् ज्ञानके लिए हैं। यदि ज्ञात ब्रह्मा कहीं कर्मादिमें विनियोग होता तो विधिका अङ्ग भी होता, परन्तु ऐसा नहीं है अर्थात् वेदान्त श्रवण विना ब्रह्म अज्ञात है।

श्रवणके समान मनन निदिध्यासन भी ज्ञानके लिए हैं। इसलिए उपासना विधिक विषयतारूपसे ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक है यह संभव नहीं है। अतः वेदान्त वाक्योंके समन्वयसे ब्रह्म स्वतन्त्र शास्त्र प्रमाणक है, यह सिद्ध हुआ। ऐसा होनेसे ही ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इसप्रकार ब्रह्म विषयक पृथक् शास्त्रका आरम्भ युक्त है। वेदान्त यदि उपासना विधि परक होते तो ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' इसीसे आरब्ध हो जानेके कारण ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस पृथक् शास्त्रका आरम्भ न होता।

यदि कदाचित् आरम्भ भी किया जाता तो ' अथातः क्रत्वर्थ : ० ' ( अब अवशिष्ट धर्मकी जिज्ञासा ) इस प्रकार प्रारम्भ होता। ब्रह्म आत्मा के एकत्व ज्ञानकी प्रतिज्ञा पूर्व मीमांसा में नहीं है, इस कारण उसके लिए ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस अपूर्व शास्त्रका आरम्भ युक्त है। इससे ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार के ज्ञान पर्यन्त सबं विधियाँ और अन्य सव प्रमाण हैं, क्योंकि हेयोपादेयसे

अद्वैत आत्मावगति होनेपर निर्विषयक प्रमाता रहित प्रमाण नहीं हो सकते। ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं— ' गौणमिथ्यात्मनो ० ' ( अबाधित सत्, चित् आनन्दस्वरूप ब्रह्म मैं हूँ, ऐसा ज्ञान होनेपर पुत्र देहादिका बाध होता है अर्थात् यह सब मायामात्र है वास्तविक नहीं, ऐसा निश्चय हो जाता है | उसमें गौणमिथ्यात्मा - पुत्र, दार, देहादिमें आत्माभिमान निवृत्त हो जानेपर विधि निषेधादि सब व्यवहार कैसे हो सकता है? गौण और मिथ्याभेदसे आत्माभिमान दो प्रकारका है। पुत्र दारां आदिमें ' मैं पुत्र हूँ, यह मेरा है ' इत्यादि आत्माभिमान गौण है, क्योंकि दोनोंका भेद ज्ञात है। उनके सुख दुःखसे अपनेको सुखी दुःखी अनुभव करता है। अपने देहादिमें ' मैं मनुष्य हूँ, कर्ता भोक्ता हूँ ' यह मिथ्याभिमान है। ये दोनों प्रकारके अभिमान बाधित हो जानेपर विधि निषेध आदि सब व्यवहार कैसे हो सकता? अर्थात् नहीं हो सकता॥

‘ अन्वेष्टव्यः ० ’ ( जो आत्मा सर्वपापरहित, जरा, मृत्यु, शोक आदिसे रहित है उसकी खोज करनी चाहिए ) इस आत्मज्ञानसे पूर्व ही चिद्रूप आत्मामें प्रमातृत्व रहता है। प्रमाताके यथार्थं स्वरूपका ज्ञान होनेपर पाप पुण्य रागद्वेष, जन्मादिसे रहित परमात्मस्वरूप हो जाता है। यहाँ शंका होती है कि यदि प्रमाता कल्पित है तो प्रमाताके आश्रित प्रमाणमें प्रमाणता कैसे सिद्ध होगी? समाधान - ' देहात्म ० ' ( जिसप्रकार ' मैं देह हूँ ' यह ज्ञान कल्पित होनेपर भी प्रमाण माना जाता है, उसीप्रकार प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाण भी आत्मसाक्षात्कार पर्यन्त प्रमाण हैं ) वेदान्त तीनों कालमें बाधरहित ब्रह्मात्मैकत्वका बोध करता है, अत : इसको तत्त्वका बोध करानेवाला प्रमाण कहा जाता है। पूर्वं पक्षमें मुमुक्षुकी वेदान्तोंमें प्रवृत्तिकी अनुपपत्ति है, सिद्धान्तमें प्रवृप्तिकी सिद्धि है, इसप्रकार दोनोंमें अन्तर है॥ ४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' आम्नायस्य ' इस पूर्वपक्ष सूत्र से यह अभिव्यक्त किया जाता है कि विधि, निषेध, अर्थवाद, मन्त्र और नामधेयात्मक समस्त वेद साक्षात् या परम्परासे यज्ञ आदि क्रियाओं तथा उनके उपकरण अङ्गों का प्रतिपादक है, जैसे- ' स्वर्गकामो यजेत ' ' दध्ना जुहोति ' इत्यादि। ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ’ ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' इत्यादि वेदभाग- वेदान्त वाक्य याग आदि क्रियापरक नहीं हैं, किन्तु सिद्ध वस्तु ब्रह्मपरक हैं, अतः वे निष्फल हैं अर्थात् अप्रमाणरूप हैं, ऐसी स्थिति में ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक कैसे हो सकता है?

* ‘ स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' ( अङ्गों सहित स्ववेदका अध्ययन करना चाहिए ) इस अध्ययन विधिसे गृहीत वेदान्त - वाक्योंको निष्फल मानना युक्त नहीं है। पू ० - यदि वेदान्त - वाक्य साक्षात् क्रिया परक नहीं हैं तो क्रियाके अङ्गभूत कर्ता तथा देवताका ज्ञान कराते हुए क्रियाके अङ्ग हो सकते हैं। जैसे ' तत्त्वमसि ' इस वाक्यमें ईश्वर वाचक ' तत् ' पद क्रियाके अङ्ग भूत देवताका और जीव वाचक ' त्वम् ' पद याग कर्ताका बोधक है।

इसप्रकार ' तत् ' और ' त्वम् ' पद देवता और कर्ताकी स्तुतिके लिए हैं और ' विविदिषन्ति ' ( जाननेकी इच्छा करें ) आदि श्रुतिवाक्य फलकी स्तुति करते हैं। इसतरह वेदान्तवाक्य कर्ता, देवता तथा फल आदिकी स्तुतिद्वारा क्रियाके अङ्ग होकर सफल होते हैं। सि ० – परन्तु कर्मके प्रकरणमें अपठित वेदान्तवाक्य कर्मके अङ्ग कैसे होंगे? पू ० – वे उपासना विधि अङ्ग होंगे।

यद्यपि ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' श्रुति प्रतिपादित यह अभेद असत् है, तो भी असत् अभेदका अपनेमें आरोपकर अभेदरूपसे उपासना करनी चाहिए। सि ० – वेदान्त वाक्योंको श्रुति प्रतिपादित सिद्ध वस्तु ब्रह्म परकं न मानकर क्रियापरक माननेमें क्या प्रयोजन है? पू ० – प्रयोजन ग्रह है कि सिद्ध वस्तु वेदद्वारा जानने योग्य नहीं है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका विषय है। वेद तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके अविषय स्वर्ग आदि फल और उनके साधन भूत यज्ञ आदि कर्मोंका प्रतिपादक है।

' अज्ञातज्ञापकत्वं ( हि ) वेदानां प्रामाण्यम् ' ( प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे अज्ञात वस्तुका ज्ञापकत्व ही वेदोंका वेदत्व - प्रामाण्य है ) यदि वेद ज्ञात ( सिद्ध ) वस्तुका वर्णन करे तो वह अनुवादक मात्र होगा, इससे वेदोंमें प्रामाण्य सिद्ध नहीं होगा। इसलिए वेदान्त वाक्योंको सिद्ध वस्तु परक न मानकर कर्म अथवा उपासना के लिए मानना युक्त है।

तात्पर्य यह है कि हेय तथा उपादेयसे रहित सिद्ध वस्तु का प्रतिपादन अथवा उसका ज्ञान निष्फल है, क्योंकि लोकमें ऐसा देखा जाता है कि दुःख हेय है, अत : उसकी निवृत्तिके लिए प्रवृत्ति होती है और सुख उपादेय है तो उसकी प्राप्ति के लिए प्रवृत्ति होती है। परन्तु सिद्ध वस्तु होनेसे ब्रह्म न हेय है और न उपादेय ही, अतः उसका प्रतिपादन निष्फल है। किन्तु याग और उपासना दुःखकी निवृत्ति तथा सुखकी प्राप्ति के साधन हैं, अत : उनका प्रतिपादन सफल है, इसलिए वेदान्तोंको भी उनका ही अङ्ग मानना युक्त है।

** यज्ञ आदि अनुष्ठानों में अनुपयोगी वेदान्त वाक्य निष्फल तथा अप्रमाणरूप हैं, इसलिए अप्रमाणरूप वेदान्तवाक्योंसे प्रतिपादित सिद्ध वस्तुका ज्ञान भी निष्फल है। मीमांसा दर्शनमें पूर्वपक्ष सूत्रका यदि यही अभिप्राय है तो ' सोऽरोदीत् ' ( वह रोया ) यह वेद वाक्य भी कर्म न होनेसे निष्फल होगा?

मीमांसा दर्शन में सिद्धान्ती - जैसे + ' ' देवैर्निरुद्धः सोऽग्निर रोदीत् ' ( देवोंसे निरुद्ध हुआ अग्नि रोया ) यह वाक्य असे उत्पन्न रजतकी निन्दा द्वारा ' बर्हिषि रजतं न देयम् ' ( पुनराधान प्रकरण में पठित बहियागमें यजमानद्वारा ऋत्विजोंके लिए दक्षिणारूपसे रजत नहीं देना चाहिए ) इस सफल निषेध वाक्यका अङ्ग है। वेदोंमें याग आदि क्रियाके अप्रतिपादक तथा सिद्ध वस्तु के प्रतिपादक वाक्य अर्थवाद कहे जाते हैं।

वे वेद विहित विधेयार्थकी स्तुतिद्वारा अथवा निषिद्धार्थ - की निन्दाद्वारा विधि तथा निषिद्ध क्रियाके अङ्ग होकर सफल होते हैं। अर्थवादके अनन्तर मन्त्रोंका विचार है— ' इषे त्वा ' इस मन्त्रमें क्रिया पदके अश्रुत होनेसे ' छिनद्मि क्रिया पदका अध्याहार किया गया है जिससे शाखाके छेदनकी प्रतीति होती है और ' इषे त्वा छिनद्मि ' ऐसा मंत्रका स्वरूप सिद्ध होता है। ' अग्निर्मूर्धा ' इत्यादि मन्त्रोंमें क्रियाके साधन भूत देवताकी प्रतीति होती है।

इस प्रकार श्रुति द्वारा मन्त्रोंका क्रतुमें विनियोग होता है। अब यहाँ सन्देह उत्पन्न होता है कि क्या वे मन्त्र उच्चारण मात्रसे अदृष्ट फलको उत्पन्नकर यागके उपकारक होते हैं अथवा दृष्टार्थके स्मरणसे उपकारक होते हैं? यदि मन्त्र दृष्ट अर्थके स्मरण मात्रसे उपकारक हों तो अध्ययन कालमें अवगत भन्त्रके

+ किसी समय देवासुर संग्राम होनेपर देवोंने बहुमूल्य वस्तुएँ अग्निको सौंपकर कहा — हे अग्ने! युद्ध में यदि हम लोगोंका विजय हुआ तो ठीक, नहीं तो ये सब वस्तुएँ उपयोगी सिद्ध होंगी, ऐसा कहकर सब देव युद्धार्थ चले गये। दूसरी ओर अग्नि लोभवश सब वस्तुएँ लेकर चम्पत हो गया, दैववश देवगण विजय पाकर उस स्थानमें अग्निको न देख उसकी खोज की उससे सब वस्तुएं छीन लीं, तो अग्नि रोया तब उसकी अश्रुधारासे रजत उत्पन्न हुआ।

स्मृति तो चिन्तन आदि से भी सम्भव है। इसलिए मन्त्रोंका उच्चारण अदृष्ट फलको उत्पन्नकर उपकारक होता है, यह पूर्वं पक्ष है। मीमांसासिद्धान्तमें - ' अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः ' ( जै ० सू ० १।२।४० ) ( लौकिक तथा वैदिक वाक्यार्थं समान है अर्थात् जैसे लोकमें वाक्य दृष्ट फलरूप अर्थवाला होता है वैसे ही वेदमें भी वाक्यत्व समान होनेसे मन्त्रोंका दृष्टार्थं रूप फल होना चाहिए, इसलिये मन्त्र दृष्टार्थक हैं अर्थात् उच्चारणसे प्रत्यक्ष फलवाले अर्थोंका ज्ञान कराकर यज्ञके उपकारक होते हैं ) क्योंकि जब दृष्ट फलका सम्भव हो तो अदृष्टार्थकी कल्पना गौरव मात्र ही है। इसलिए फल विशिष्ट यज्ञ आदि अनुष्ठानोंको जिन क्रियाओं और उनके साधनोंकी अपेक्षा होती है उनका स्मरण मन्त्रोंसे होता है। इस प्रकार मन्त्र कर्मके अङ्ग होते हैं। ' मन्त्रैरेवार्थः स्मर्तव्यः ' ( मन्त्रोंसे ही अर्थं ( देवता आदि ) का स्मरण करना चाहिए ) इस नियम के अनुसार मन्त्रोंका अदृष्ट फल भी होता है।

अब प्रसङ्ग वश पर्दैकवाक्यता तथा वाक्यैकवाक्यताका विचार किया जाता है— अर्थवाद वाक्यमें अनेक पद होनेपर भी उन सबका स्तुति अथवा निन्दा एक ही अर्थ है, इससे अर्थवादवाक्यों को एक पद कहा गया है, इसलिए स्तुति आदि द्वारा अर्थवादकी विधिके साथ पदैकवाक्यता है। मन्त्र और अङ्गवाक्य स्वार्थंका बोध कराके विधि वाक्यमें अन्वित होते हैं, इसलिए विधि वाक्योंके साथ वाक्यार्थ ज्ञानद्वारा मन्त्र और अङ्गवाक्योंकी वाक्यैकवाक्यता है। सारांश यह है कि जैसे अर्थवाद वाक्य सिद्ध अर्थका ज्ञान कराते हुए विधेयकी स्तुतिद्वारा विधि वाक्योंके अङ्ग होकर सार्थक होते हैं, वैसे ही वेदान्त वाक्य भी सिद्ध ब्रह्म रूप अर्थका बोध कराते हुए विधिके अङ्ग होकर ही सार्थक हो सकते हैं अन्यथा नहीं, इसलिए वेदान्त वाक्योंको भी विधिका अङ्ग मानना चाहिए।

* सि ० - वेदान्त वाक्योंको . अन्य विधिका अङ्ग माननेकी अपेक्षा ब्रह्ममें ही विधि क्यों न मानी जाय? पू ० - ' न च ' इत्यादिसे कहते हैं - सिद्ध वस्तु में विधि नहीं हो सकती, क्योंकि विधि क्रियाविषयक होती है। सि ० - ' दना जुहोति ' ( दधिसे होन करे ) यहाँ सिद्ध वस्तु दधिमें विधि क्यों मानी गई है? पू ० यह विधि यागरूप क्रियाके लिए है, क्योंकि यागरूप क्रिया द्रव्य और देवताके विना सिद्ध नहीं हो सकती, इसलिए दधि द्रव्य यागरूप क्रिया सिद्धयर्थं होनेसे क्रिया ही है। किन्तु ब्रह्म तो निष्क्रिय होनेसे साध्य नहीं है, अतः वेदान्त - वाक्य कर्ममें अपेक्षित कर्ता, देवता आदिके स्वरूपका स्मरण कराते हुए विधिके अङ्ग हो सकते हैं, यह भट्टमत है। अब ' अथ ' इत्यादिसे दूसरे पक्षका उल्लेख करते हैं। इसलिए ' शास्त्रयोनित्वात् ' इस तृतीय सूत्र से ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक सिद्ध नहीं हो सकता। इस प्रकार आक्षेप संगतिसे पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर भगवान् भाष्यकार ' उच्यते ' से सिद्धान्त पक्ष उपस्थित करते हैं।

* इस चतुर्थ सूत्रकी विशेषता यह है कि इसमें एक ऐसा हेतु दिया गया है जो कि वेदान्तवाक्योंकी सार्थकताको स्पष्ट करता हैं। वह हेतु है ' समन्वय '। सम्पूर्णं वेदान्त वाक्यं समन्वित तात्पर्य से सिद्ध वस्तु ब्रह्मका ज्ञान कराते हैं। अतः वे न तो कर्मके अङ्ग हैं और न उपासनाके ही, वेदान्तवाक्योंका मुख्य तात्पर्यं ब्रह्म में है 1। जैसे ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' सत्य, ज्ञान तथा अनन्त इन पदोंसे एक अखण्ड ब्रह्म ही अवगत होता है।

किश्व उपक्रमादि लिङ्गों से भी वेदान्त - वाक्योंका तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्ममें ही सिद्ध होता है। यथा - - ' ' उपक्रमोपसंहारवभ्यासोऽपूर्वताफलम् | अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं - तात्पर्यनिर्णये॥ ” उपक्रम ( आरम्भ ), उपसंहार ( समाप्ति ) इन दोनोंकी एक वाक्यता, अभ्यास ( पुन : पुन : कथन ), अपूर्वता ( अन्य प्रमाणकी अविषयता ), फल ( मोक्ष ), अर्थवाद ( अद्वैत की स्तुति या द्वैतकी निन्दा द्योतक वाक्य ), उपपत्ति ( युक्ति ) ये तात्पर्यके निर्णायक लिङ्ग हैं।

' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( छान्दो ० ६। २।१ ) ( उद्दालक - हे सोम्य! यह सारा जगत् सृष्टिके पूर्वं सत् ही था ) इस श्रुति - वाक्य में ' एव ' शब्द नियमका वाचक है, यह ब्रह्मसे जगत् की भिन्न सत्ताका निषेध करता है अर्थात् ब्रह्मसे जगत् की भिन्न सत्ता नहीं है। ' एकमेवाद्वितीयम् ' इस वाक्य में ' एकम्, एव, अद्वितीयम् ' ये तीन पद क्रमशः, सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदका ब्रह्ममें निषेध करते हैं।

इस प्रकार अद्वितीय ब्रह्मका उपक्रमकर ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( छान्दो ० ६ ८७ ) ( यह सब आत्मस्वरूप ही है ) इस तरह उपसंहार किया है अर्थात् प्रकरणके आरम्भमें तथा अन्तमें एक अद्वितीय ब्रह्मका ही प्रतिपादन है! अभ्यास – ' तत्त्वमसि ' ( छान्दो ० ६६८७ ) ( वह तू ही है ) इस वाक्यका उपदेश उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतु के प्रति नौ वार किया है। यह पुनरुक्ति भी तात्पर्यं निर्णय में सहायक है। ' अपूर्वता - ' अत्र वाव किल सत् सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ' ( छन्दो ० ६।१३।२ ) हे सोम्य!

जैसे नमक जलमें रहता हुआ भी तुमको नहीं दिखाई देता, निश्चित इसी जलमें है, वैसे ही इस शरीर में विद्यमान सद्ब्रह्मका प्रत्यक्षादि प्रमाणसे अनुभव नहीं होता, किन्तु वेदान्त वाक्योंसे इसी शरीरमें उसका अपरोक्ष हो सकेगा ) ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' ( बृह ० ३।९।२६ ) " नावेदविन्मनोते तं बृहन्तम् " इत्यादि वाक्यों द्वारा ब्रह्ममें अपूर्वता कही गई है अर्थात् ब्रह्म वेदान्तातिरिक्त प्रमाणका विषय नहीं है।

फल – ' आचार्यवान् पुरुषो वेद ' तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्यें ' ( छान्दो ० ६।१४।२ ) ( आचार्यवान् पुरुष ही उस प्रत्यगभिन्न ब्रह्मतत्त्वको जानता है, उसके लिए मोक्ष होने में उतना ही विलम्ब है जबतक उसका शरीर - लिङ्गशरीर पात नहीं होता ) इसमें ब्रह्मज्ञानका फल कहा गया है।

अर्थवाद - श्वेतकेतुके अभिमान निवृत्तिके लिए पिता उद्दालकने पूछा क्या तुम उसे जानते हो ‘ येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति ' ( छान्दो ० ६ | १ | ३ ) ( जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत, अमत मत, अविज्ञात विशेष रूपसे ज्ञात हो जाता है ) इत्मादि श्रुति वचन प्रशंसा रूप अर्थवाद है।

' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानैव पश्यति ' ( कठ ० २।१० ) ( जो मनुष्य इस अद्वैत ब्रह्ममें नानात्व ( भेद - सा ) देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुति वचन निन्दारूप अर्थवाद है। उपपत्ति - ' यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं स्यात् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ( छा ० ६ ११४, ७ ) ( हे सोम्य!

जिस प्रकार मृत्तिकाके पिण्ड द्वारा सम्पूर्णं मृण्मय घटादि पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है, विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, क्योंकि मृत्तिकामें घटादि नाम और घटादि आकार कल्पित है, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ) जैसे घटादिकी अपने कारण भूत मृत्तिकासे भिन्न सत्ता नहीं है, वैसे ही आकाश आदि प्रपञ्च भी कारण ब्रह्मसे भिन्न नहीं है अर्थात् ब्रह्म ही है, यह उपपत्ति है। इस प्रकार प्रत्येक वेदान्तमें कहीं तात्पर्यके बोधक सब लिङ्ग और कहीं अलग - अलग देखनेमें आते हैं।

माष्यस्थ ' आदि ' पदसे ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्योंका ग्रहण करना चाहिए। वेदान्त - वाक्योंके तात्पर्यका विषय मले ही ब्रह्म हो, परन्तु उनका अर्थ यागादि रूप कार्य क्यों न हो? इस शङ्काका ' न च ' इत्यादि भाष्यसे समाधान करते हैं।

* यहाँ अर्थवाद न्याय भी ठीक नहीं है, क्योंकि अर्थवाद वाक्योंका स्वार्थमें तात्पर्य नहीं होता। इसलिए वे यागादि क्रियाके अङ्गभूत द्रव्य देवता आदिके स्तुत्यर्थक होते हैं। परन्तु ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थः ' ( जो शब्द जिस अर्थका प्रतिपादक होता है या जिस अर्थमें उसका तात्पर्य होता है, वही उस शब्दका अर्थ होता है ) इस न्यायसे भी विरोध होता है। इसलिए ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इन पदोंका तात्पर्यं ब्रह्ममें है और उनका अर्थ ब्रह्म ही है। मीमांसकने जो पहले कहा था कि ' जैसे घटादि सिद्ध पदार्थं प्रत्यक्षादि प्रमाणके विषय होनेसे वेदार्थ नहीं हैं, वैसे सिद्ध ब्रह्म मी प्रत्यक्षादि प्रमाणका विषय होने से वेदका अर्थ नहीं हो सकता अर्थात् ब्रह्ममें वेदप्रमाण नहीं है। इसपर ' न च ' इत्यादिसे कहते हैं।

* जो यह कहा गया है कि वेदान्त उपासना परक हैं, क्या उनमें देवता आदिके प्रतिपादक प्राण, पञ्चाग्नि आदि वाक्य उपासना परक हैं अथवा सब वेदान्त? प्रथम पक्ष तो ' देवतादि ' से अंगीकार करते हैं। परन्तु दूसरा पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि विधि शून्य ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' आदि वेदान्तवाक्य अपने अर्थ प्रतिपादन करने में सफल हैं, अतः वे उपासना परक नहीं हो सकते। किंश्च उन वेदान्तवाक्योंके अर्थरूप ब्रह्मको उपासनाका अंग ज्ञानसे पूर्व मानते हो अथवा पश्चात्? ज्ञानके पहले अध्यस्त गुणयुक्त ब्रह्म उपासनाका अंग भले हो, परन्तु तत्त्वज्ञानके अनन्तर नहीं, इसीको ' न तु तथा ' इत्यादिसे कहते हैं। ' तथा ' अर्थात् प्राणादि देवताके समान।

' ' वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवता ' ( वायु शीघ्रगामी देवता है ) ' सोऽरोदीत् ' ( वह अग्नि रोया ) इत्यादि अर्थवाद वाक्य स्तुति या निन्दा द्वारा ही कर्मकाण्ड में विधिसे सम्बद्ध होकर प्रमाणताको प्राप्त होते हैं, अन्यथा नहीं। परन्तु ब्रह्म के यथार्थ स्वरूपके प्रतिपादक ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंका प्रामाण्य तो किसी प्रकार भी हटाया नहीं जा सकता। ' वेदान्तः स्वतः प्रमाणं वेदत्वात् स्वर्गकामो यजेत इतिवत् ' वेदान्त वेद होनेसे स्वतः प्रमाण है, जैसे ' स्वर्यकामो यजेत ' इत्यादि वेदवाक्य होनेसे स्वतः प्रमाण हैं। इसलिए वेदान्तवाक्योंका प्रामाण्य अनुमानके अधीन नहीं है। अतएव उनको अपने प्रामाण्यमें किसी दृष्टान्तकी मी अपेक्षा नहीं है। जैसे ' यजेत ' इत्यादि विधिवाक्य फलवाले अज्ञात याग और स्वर्गादि प्रयोजनके ज्ञापक होनेसे प्रमाणरूप हैं, वैसे ही वेदान्तवाक्य भी पूर्व किसी अन्य प्रमाणसे अज्ञात जीव ब्रह्मैक्य अर्थका ज्ञान करानेसे प्रमाणरूप हैं इसप्रकार सम्पूर्ण वेदान्तवाक्य एक अद्वितीय ब्रह्ममें समन्वित हैं, अतः ब्रह्म में वेदान्त शास्त्र ही प्रमाण है। इसका विशेष विवेचन ' गतिसामान्यात् ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | १० ) इस सूत्र में किया जायगा।

* ब्रह्म केवल वेदान्त शास्त्र वेद्य है। यह जानकर वृत्तिकार ( उपवर्षाचार्य ) शंका करते हैं पूर्वपक्षमें उपासनासे मुक्तिरूप फल होता है, वेदान्त सिद्धान्त में तत्त्वज्ञान से ही मुक्ति होती है | यद्यपि ब्रह्ममें शास्त्र प्रमाण है, तथापि ' आत्मेत्येवोपासीत् ' यह उपासना विधि है। इस उपासना विधिका विषय ब्रह्म है। उपास्य विना उपासना नहीं हो सकती, इसलिए उपासनाका विधिके विषयभूत ब्रह्ममें भी अवान्तर तात्पर्य है।

' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्य उस उपास्य ब्रह्म स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं। इसका दृष्टान्तसे स्पष्टीकरण करते हैं-- जैसे ' यूपे पशुं बध्नाति ' ( यज्ञ स्तम्भमें पशुको बाँधे ) ' आहवनीये जुहोति ' ( + आहवनीय अग्निमें हवन करे ) ' इन्द्रं यजेत ' ( इन्द्रका यजन करे ) इन विधियोंमें यूप आदि क्या है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर ' यूपं तक्षति ' ( लकड़ीको तक्षण करता है ) अर्थात् लकड़ीको छीलकर आठ कोणवाली बनाता है इस प्रकार संस्कृत लकड़ी यूप कही जाती है।

' अग्निमादधीत ' ( अग्निका आधान करे ) इस प्रकार आधानसे संस्कृत अग्नि आहवनीय है। ' वज्रहस्तः पुरन्दरः ' ( जिसके हाथमें वज्र है वह इन्द्र है, इत्यादि वाक्य विधिके शेष भूत अलोकिक यूप आहवनीय, इन्द्र आदिका प्रतिपादनकर प्रमाणरूप होते हैं अन्यथा नहीं। इसी प्रकार ' आत्मेत्येवोपासीत ' आदि विधि शेष आत्माके ' अयमात्मा ब्रह्म ' इत्यादि वाक्य प्रतिपादक हैं, वे भी अलौकिक ब्रह्मात्माका विधि अङ्ग रूपसे वर्णनकर प्रमाणभूत होते हैं।

परन्तु उपक्रम - उपसंहारादि लिङ्गों से वेदान्त शास्त्रका तात्पर्य ब्रह्म ही है तो फिर ब्रह्मको उपासना विधिका अङ्ग क्यों माना जाय? पू ० - शास्त्रके तात्पर्यका निश्चय आप्त वक्ताओंके परम्परा व्यवहारसे होता है। वृद्ध व्यवहारसे यह प्रतीत होता है कि आप्त पुरुष श्रोताकी प्रवृत्ति और निवृत्तिके उद्देश्यसे शब्दका व्यवहार करते हैं। इसी प्रकार शास्त्रके भी प्रवृत्ति और निवृत्ति रूप प्रयोजन हैं।

वह भी विधिज्ञान ( कार्य ज्ञान ) से उत्पन्न होता है, अतः वेदान्त शास्त्रका भी विधिमें ही तात्पर्य है, ब्रह्म में नहीं, इसलिए ब्रह्मको भी विधिका अङ्ग मानना चाहिए। इस विषय में वृद्धोंकी भी सम्मति है।

* ‘ दृष्टो हि तस्यार्थः ' यह शबर स्वामीकी सम्मति है। ' यजेत, जुहोति इत्यादि वाक्य चोदना

+ ' पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताऽग्निर्दक्षिणःस्मृतः। गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ' ( मनु ० २।२३१ ) ( पिता गार्हपत्य अग्नि है, माता दक्षिण अग्नि है, गुरु आहवनीय अग्नि है | ये तीन अग्नि सर्वश्रेष्ठ हैं )। गृहस्थके घरमें जो हवन आदिके लिए नित्य अग्नि रहता है वह गार्हपत्य है। इससे अन्य अग्नि ग्रहण किये जाते हैं। ' गार्हपत्यादाहवनीयं ज्वलन्तमुद्धरेत् ' ( आश्व ० श्री ० २।२ ) गार्हपत्य से आहवनीयको जलता हुआ लावे | ) कहलाते हैं।

क्रिया, कार्य, कर्म, नियोग, विधि, धर्म और अपूर्व इन सबका एक ही अर्थ है। कहीं तो शास्त्र पुरुषको सुखके साधनमें प्रवृत्त करता हुआ सफल होता है, जैसे ' ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत ' और कहीं दुःखके साधन सुरापान, हिंसा आदिसे पुरुषको निवृत्त करता हुआ सार्थक होता है, जैसे ' सुरां न पिबेत् ' इसलिए विधि, निषेधात्मक वाक्य ही शास्त्र है। उससे भिन्न अर्थवाद आदि वाक्य विधि तथा निषेध वाक्योंके अङ्ग होकर सार्थक होते हैं।

अतः कर्मशास्त्र के समान वेदान्तशास्त्र भी शास्त्र है, इस कारण वेदान्त भी क्रियार्थक होकर सार्थक हो सकता है। परन्तु यज्ञादि क्रियाओंके समान वेदान्तमें अधिकारी और विधेय देखने में नहीं आते तो वेदान्तसे कार्यका ज्ञान कैसे होगा? ' सति च ' आदि से समाधान करते हैं।

* पूर्वपक्षी - ' सति विधिपरत्वे ' इस भाष्यसे अधिकारी और विधेय सिद्ध करता है, जैसे ' स्वर्गकामो यजेत ' यहाँ स्वर्गकी कामनावाला पुरुष अधिकारी है और उनके लिए अग्निहोत्रादि विधेय हैं। इसी प्रकार ' ब्रह्मभावकामो ब्रह्मवदनं कुर्यात् ' ( भावकी कामनावाला ब्रह्मज्ञान प्राप्त करे ) ' मोक्षकाम आत्मानमुपासीत् ' ( प्रभाकर - मोक्षकी कामनावाला आत्माकी उपासना करे ) अर्थात् ' आत्मोपासनेन मोक्षजनकं अदृष्टं सम्पादयेत् ' अथवा ' आत्मोपासनजन्यादृष्टेन मोक्षं भावयेत् ' ( आत्मोपासना से मोक्ष जनक अदृष्ट संपादन करे अथवा आत्मोपासनजन्य अदृष्टसे मोक्षकी भावना करे ) अर्थात् यहाँ अमृतत्वकी कामना करनेवाला पुरुष अधिकारी है और उस फलको प्राप्तिका साधन ब्रह्मज्ञान विधेय है। परन्तु ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' तथा ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इन दोनों सूत्रों की आचार्यों द्वारा पृथक् रचनासे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मज्ञान नित्य फलवाला होनेसे कर्मकी तरह विधेय नहीं है।

* यदि ज्ञानसे मुक्ति होती तो श्रवणसे उत्पन्न ज्ञानके अनन्तर मनन और निदिध्यासनका विधान न होता। प्रत्यक्ष अनुभव और मननादिके विधान से यह सिद्ध होता है कि वेदान्तोंके श्रवण मात्रसे मोक्ष नहीं होता, किन्तु ब्रह्मकी उपासनासे होता है। प्रवृत्ति तथा निवृत्तिरूप फलके प्रतिपादक वाक्य ही शास्त्र कहलाते हैं। परन्तु सिद्ध अर्थं ब्रह्मके प्रतिपादक वेदान्त वाक्य प्रवृत्ति निवृत्ति रहित होनेसे तथा श्रवणानन्तर मननादिकी विधि होनेसे उपासना विधिके अङ्ग हैं। उपासना भी एक प्रकार से कर्म है, अतः कर्म रूपसे ही शास्त्र ब्रह्ममें प्रमाण है। यह पूर्वपक्षीका अभिप्राय है।

* ‘ मोक्षकामो ब्रह्मवेदनं कुर्यात् ' इस प्रकार जो मुमुक्षु अधिकारीके लिए ब्रह्मज्ञान विधेय कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्मस्वरूप नित्य मोक्ष उपासना आदि किसी विधिसे जन्य नहीं है। कर्मोपासनादिका फल जन्य होने से अनित्य है। इस प्रकार दोनोंमें वैलक्षण्य है। किश्व ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि विधि वाक्योंसे जैसे धर्म जिज्ञास्य है, वैसे ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' इत्यादि निषेधात्मक वाक्योंसे अधर्म भी जिज्ञास्य है। इस प्रकार विधि तथा निषिद्ध वाक्योंसे धर्म और अधर्म का समानरूपसे ज्ञान होता है। धर्मका फल सुख और अधर्मका फल दुःख ब्रह्मांसे लेकर स्थावर पर्यन्त सब प्राणियों में प्रसिद्ध है।

* धर्म तथा उपासना जन्य सुखका तारतम्य इस प्रकार है। सर्व प्रथम मानवीय स्तरके पूर्ण आनंदको श्रुति दिखलाती है— ' सैषानन्दस्य मीमांसा भवति। युवास्यात्साधु युवाध्यायक आशिष्टो टो बलिष्टस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्।

स एको मानुष आनन्द : ' ( तै ० २८1१ ) अब यह [ ब्रह्मके ] आनन्दकी मीमांसा है - साधु स्वभाव वाला नवयुवक, वेद पढ़ा हुआ, अत्यन्त आशावान्, अत्यन्त दृढ और बलिष्ठ हो, एवं उसकी यह धन धान्यसे पूर्ण पृथिवी भी हो अर्थात् वह सम्पूर्ण पृथ्वी मण्डलका एकमात्र छत्रपति हो उसका जो आनंद है वह एक मानुष आनन्द है वह आनन्द मनुष्यलोकमें मानवीय स्तरका पूर्ण आनन्द कहा जाता है।

मनुष्य, मनुष्य गन्धर्व, देव गन्धर्व, अग्निस्वात् आदि पितर, आजानदेव, कर्मदेव, देव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति पर्यंन्त पूर्वं पूर्व से उत्तरोत्तर सौ गुना आनन्द प्राप्त होता है। ' ते ये शतं प्रजापतेरानन्दः। स एको ब्रह्मण आनन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ' ( तै ० २।८।४ ) ( प्रजापतिके जो सौ आनन्द हैं वही ब्रह्मोका एक आनन्द है और वह अकामहत ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रियको भी प्राप्त है ) इस प्रकार मनुष्यसे लेकर ब्रह्मा पर्यन्त आनन्दका तारतम्य श्रुतिमें कहा गया है।

मोक्ष फल तो नित्य निरतिशय आनन्द स्वरूप एक है और मोक्षका साधन तत्त्वज्ञान भी एक ही है। इस प्रकार कर्म और विद्याके फलोंमें महान् अन्तर है। मोक्षका साधन चतुष्टय सम्पन्न अधिकारी भी एक ही प्रकारका है। किन्तु कर्म अनेक, उनके फल अनेक तो स्वभावतः उसके अधिकारी भी अनेक हैं। किञ्च याग तथा पञ्चाग्नि विद्याके उपासक अर्चि मार्गद्वारा ब्रह्मलोकको जाते हैं। कल्पपर्यंन्त फिर इस मानव लोकको प्राप्त नहीं होते।

वापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च। अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते॥ २॥

‘ अग्निहोत्रं तपस्सत्यं वेदानां चानुपालनम्। आतिथ्यं वैश्वदेवं च इष्टमित्यभिधीयते॥१॥

शरणागतसंत्राणं भूतानां चाप्यहिंसनम्। बहिर्वेदि च यद्दानं दत्तमित्यभिधीयते॥३॥

( अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदोंका संरक्षण, अतिथि सत्कार और वैश्वदेव ' इष्ट ' कहलाता है। बावड़ी, कुआँ, तालाब, देवालय और बाग बनवाना तथा अन्नदान करना ' पूर्त ' कहलाता है। शरणागतकी रक्षा करना, प्राणियोंको पीड़ा न पहुँचाना और वेदीके बाहर दान देना ' दत्त ' कहलाता है ) इत्यादि कर्मोंका कर्ता देह त्यागके अनन्तर " धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते " ( गी ० ८।२५ ) ( धूम आदि मार्ग द्वारा धूमसे रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षणायन, षण्मास, पितृलोक, आकाशसे चन्द्रलोकको प्राप्त होता है ) इस प्रकार मनुष्य लोकसे ऊपर - ऊपर लोकोंमें गये जीवोंमें सुखका उत्तरोत्तर उत्कर्ष दिखलाकर अब इससे निम्नतर लोकोंमें गये जीवों में सुखका तारतम्य ' तथा ' इत्यादिसे कहते हैं।

* जैसे मनुष्य से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त तारतम्यसे वर्तमान सुख धर्मके तारतम्यसे है, वैसे मनुष्यसे लेकर नरक पर्यन्त तारतम्यसे वर्तमान सुख भी धर्मसे ही है। विषयेन्द्रिय जन्य सुख तो नारकीय जीवोंको भी उपलब्ध है। अब ' तथोर्ध्वम् ' इत्यादि भाष्यसे दुःख, उसका हेतु और उसके अनुष्ठान करनेवालोंका भेद कहते हैं।

अब द्विविध कर्म फलोंका उपसंहार करते हैं- अविद्या, अस्मिता ( अहंकार ), राग, द्वेष और अभिनिवेश ( मृत्युभय ) आदि दोष युक्त जीव धर्म और अधर्मके तारतम्यसे शरीर ग्रहण द्वारा अनित्य संसारको प्राप्त कर सुख दुःखका अनुभव करता है।

' तस्मि - न्यावत्संपात ' इत्यादि श्रुति, " क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति " इत्यादि स्मृति और कारणके नाशसे कार्यका नाश होता है, जैसे वृक्षके नाशसे फल, छायादिका नाश होता है, वैसे धर्माधर्मके नाश होने से तज्जन्य शरीर और शरीरद्वारा भोग्य सुख दुःख आदिका भी नाश हो जाता है, इत्यादि न्यायमें प्रसिद्ध है। किन्तु मोक्ष नित्य, निरतिशय, अतीन्द्रिय और शोकादिसे रहित है, अतः वह कर्मका फल नहीं है।

* ' यत्सत्त्वे यत्सत्त्वं यदभावे यदभावः ' यह अन्वयव्यतिरेक है अर्थात् शरीर आदि अनात्मामिमान हो तो सुख - दुःखादि हों, शरीर आदि अनात्माभिमान न हो तो सुख दुःखादि भी न हों, यह अभिप्राय श्रुति में प्रतिपादित है। आत्मरूप मोक्ष नित्य होनेपर भी . परिणामी होनेके कारण धर्मका कार्यं हो सकता है, ऐसी शङ्काके होनेपर ' तत्र ' इत्यादिसे नित्यका भेद दिखलाते हैं।

* जो परिणामी और नित्य हो वह परिणामी नित्य कहलाता है। पूर्वं रूपका परित्याग कर दूसरे रूपको प्राप्त करनेका नाम परिणाम है। जैसे पृथ्वी किसी समय घास, वृक्षादि अवस्थाको प्राप्त होकर पुनः उनके विनाश होनेपर मृत्तिका आदिकी अवस्था प्राप्त करती है। उत्पत्ति और विनाश दोनों अवस्थाओंमें ' पृथ्वी है ' ऐसी बुद्धि बनी रहती है, इसलिए पृथ्वी परिणामी नित्य है। इसी प्रकार प्रायः सब द्रव्य पदार्थं परिणामी नित्य समझने चाहिए | क्या उस वस्तुका सर्वात्मना परिणाम है अथवा एक देशका?

यदि सर्वात्मना परिणाम मानें तो मूल वस्तुका ही नाश हो जायगा। यदि एक देश रूपसे मानें तो वह मूल वस्तुसे भिन्न है कि अभिन्न? यदि भिन्न है तो उसका परिणाम कैसे होगा? क्योंकि अन्यके परिणामसे अन्यका परिणाम नहीं होता। यदि मानें तो अतिप्रसङ्ग होगा। यदि अभिन्न है तो मूल वस्तुका ही नाश हो जायगा, इसलिए परिणामी नित्यता वास्तविक नहीं है।

सांख्यमतमें सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रलयमें साम्यावस्थामें रहकर प्रधान कहलाते हैं, सृष्टिकालमें गुणोंकी विषमता तथा स्वप्रधानताके अनुसार सुख - दुःख मोहादि प्रपञ्चरूपसे परिणामभावको प्राप्त होते हैं, इसलिए दोनों अवस्थाओं में गुण अनुस्यूत हैं अर्थात् सत्त्व गुण स्वप्रधानतासे सुखाकार, रजोगुण स्वप्रधानतासे दुःखाकर और तमोगुण स्वप्रधानतासे मोहाकार परिणामको प्राप्त होते हैं।

* आत्माको कूटस्थ, नित्य, व्यापक आदि कहकर उत्पत्ति आदि सब विक्रियाओं ( विकारों ) का निषेध किया गया है। उत्पाद्य, प्राप्य विकार्य तथा संस्कार्य ये क्रियाके फल हैं। कूटस्थ शब्दसे उत्पाद्यका सर्वव्यापी शब्दसे आप्यका, सर्व विक्रिया रहित शब्दसे विकार्यका तथा निरवयव शब्दसे संस्काका क्रमशः निषेध किया गया है। क्योंकि यह सब परिच्छिन्न सावयवमें होते हैं। ' व्योमवत् ० ' यह दृष्टान्त परमत ( न्यायमत ) को लेकर कहा गया है, वेदान्त सिद्धान्तमें तो आकाश मी कार्य होनेसे अनित्य है I

। मोक्षावस्थामें आत्माको जड़ माननेवालेके मतका ' स्वयं ज्योतिः ' शब्दसे खण्डन किया गया है। क्योंकि ' अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको स्वप्रकाश स्वरूप कहती है। इस प्रकार कर्मके अनित्य फलसे भिन्न मोक्षरूप फल नित्य ब्रह्मस्वरूप है जिसको जिज्ञासा करनी चाहिए।

ब्रह्मज्ञान और कर्मज्ञानमें अन्तर यह है कि केवल कर्मज्ञानसे स्वर्ग आदि फलकी प्राप्ति नहीं होती, किन्तु कर्मज्ञान और उसके फलके मध्य में अनुष्ठेय याग आदि कर्म करने पड़ते हैं। उनका फल कालान्तर वा जन्मान्तरमें होता है। परन्तु यहाँ तो इसके विपरीत है, जैसे प्रदीपसे अन्धकारकी निवृत्तिरूप दृष्ट फल में अन्य कर्तव्य अवशेष नहीं है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान और मोक्षरूपी दृष्ट फलके मध्यमें भी कुछ अन्य कर्त्तव्य नहीं है। ब्रह्मज्ञानका फल मोक्ष यदि कालान्तरमें माना जाय तो ' ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति ', ' अत्र ब्रह्म समश्नुते ' इत्यादि श्रुतियोंका बाध होगा, जो सर्वथा असङ्गत है। ' एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विकिरती सोम्य ० ' ( मुण्ड २ | १ | १० ) ( जो इस गुहा में स्थित गुप्त ब्रह्मको जानता है, हे सोम्य! वह अविद्याकी गाँठ ( चिद् - जड़ ग्रन्थि ) को तोड़ता है ) | • मोक्षका प्रतिबन्धक अज्ञान है, वह तत्त्वज्ञानसे ही निवृत्त होता है। अतः मोक्ष के प्रतिबन्धक अज्ञानकी निवृत्ति करना ही आत्मज्ञानका प्रयोजन है अन्य नहीं, क्योंकि आत्मा तो स्वयं प्रकाशरूप है। इस ' विषयमें मुनि गौतमके सूत्रको उद्धृत करते हैं।

* इस गौतम सूत्रमें जन्म ही साक्षात् दुःखका कारण कहा गया है, क्योंकि जन्म होनेसे ही सुखदुःखका अनुभव होता है। विषय जन्य सुख भी परिणाममें दुःखका कारण है। [ ' ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ' ( गी ० ५।२२ ) ( जो इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोग से उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं वे दुःख ही हेतु हैं ) अतः सुखको भी दुःख शब्दसे वर्णित किया है। जन्मका कारण धर्माधर्मरूप प्रवृत्ति है | धर्माधर्मकी प्रवृत्ति राग द्वेषादि दोषोंसे होती है, दोष मिथ्याज्ञानसे होते हैं। मिथ्याज्ञान ही राग द्वेषादि दोषोंद्वारा संसारका मूल कारण है। मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति तत्त्वज्ञानसे होती है। ‘ तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ' ( गौ ० सू ० १।१।२ ) ( तत्त्व ज्ञानसे ही मोक्ष होता है अर्थात् पुनर्जन्म नहीं होता ) इतने अंशमें ही सूत्रकी सम्मति दी गई है। गौतम अभिमत तत्त्वज्ञान और मोक्ष वेदान्तसिद्धान्त में स्वीकृत नहीं है, क्योंकि वे प्रमाण, प्रमेय आदि षोडश पदार्थोंके ज्ञानको तत्त्वज्ञान मानते हैं।

* पूर्ववक्षी—- जैसे ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानैव पश्यति ' इस श्रुतिमें भेदज्ञान मृत्युका कारण प्रतिपादित होने से प्रमा नहीं है, वैसे ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान प्रमा न होकर सम्पदादि ( उपासना ) रूप है, अत : वह भ्रान्ति रूप है। ' आरोप्य प्रधाना संपत् ' ( आलम्बनको अविद्यमान - सा मानकर आरोप्य प्रधान सम्पत् उपासना कहलाती है ) जैसे कि काम, सङ्कल्प आदि अनन्त वृत्तिवाला होनेसे मन अनन्त कहा जाता है, वैसे विश्वेदेवता भी अनन्त हैं। इस प्रकार दोनोंमें आनन्त्य समान है।

इससे विश्वेदेवता ही मन है। मनकी विश्वेदेवतारूपसे उपासना करनेसे उपासकको अनन्त लोककी प्राप्ति होती है। वैसे चैतन्य धर्म जीव और ब्रह्म में समान है, इसलिए अल्प जीवको महान् ब्रह्मरूप सम्पादनकर जीवरूप आलम्बनको अविद्यमानकर प्रधानरूपसे ब्रह्मका ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार अनुचिन्तन करने से अमृतत्व फल प्राप्त होता है, अतः जीव ब्रह्मका एकत्वं ज्ञान भी सम्पद्रूप है। सम्पत् उपासनामें आरोप्य प्रधान और आलम्बन ( आधार ) गौण होता है।

' आलम्बनप्रधानः प्रतीकः ' ( जहाँ आलम्बन प्रधान और आरोप्य गौण हो वह प्रतीकोपासना कहलाती है ) उसको अध्यास भी कहते हैं। यथा ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( ब्रह्म भावनासे मनकी और आदित्यकी उपासना करे ) यह प्रतीकोपासना है। जैसे शालिग्रामको विष्णुरूपसे, शिवलिङ्गकी शङ्कररूपसे, ॐ की ब्रह्मरूपसे उपासना प्रतीकोपासना के उदाहरण हैं। जैसे विष्णुके अभाववाले शालिग्राल शिला आदिमें विष्णु बुद्धि अध्यास ही है।

' अतस्मिन् तद्बुद्धिरध्यासः ' ( अत में तबुद्धिको ही अध्यास कहा जाता है ) यह अध्यासका लक्षण इन सब स्थलोंमें घटता है, अतः वे अध्यासरूप ही है। परन्तु ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान सम्पद्रूप तथा अध्यास रूप नहीं है।

* जैसे ' वायुर्वाव संवर्गः ' प्रलयकाल में अग्नि, सूर्य चन्द्रमा और जल ये सब वायुमें विलीन होते हैं, इन सबका वायु ही ग्रसन करता है। यह अधिदैवत संवर्ग है।

' अध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गो यदा वै पुरुषः स्वपिति ' ( शरीरान्तर संचारी अध्यात्म प्राण संवर्ग है, जब पुरुष सोता है तब वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन आदि सब इन्द्रियाँ प्राणमें लीन होती हैं ) ' तौ वा एतौ द्वौ संवर्गों वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ' ( छा ० ४।३।४ ) ( ये दो संवर्ग हैं, अग्नि आदि देवोंमें वायु और वागादि इन्द्रियोंमें प्राण ) इसलिए वायु और प्राणमें संहरणरूप क्रियाका योग समान होनेपर दोनों में संवर्गत्व समान है।

इस प्रकार वायु और प्राणकी संवर्गरूपसे अभेद उपासना करनी चाहिए। वैसे ही वृद्धिरूप क्रियाके योगसे ' जीव ब्रह्म है ' यह अभेदज्ञान अमृतत्व फलके लिए है। वास्तव में जीव और ब्रह्मका भेद ही है अभेद नहीं। जो अभेद मानते हैं वे भ्रान्त है। अब अन्य मतका उल्लेख करते हैं, जैसे ' पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति ' दर्शपूर्णमास यागके प्रकरणमें उपांशु यागके अङ्गभूत घृतको यजमानकी पत्नी देखे। यहाँ यजमानकी पत्नीद्वारा घृत देखनेका विधान है, क्योंकि उसके देखनेसे घृतका संस्कार हुआ माना जाता है।

इससे घृतमें विशेष गुणका आधान होता है अर्थात् अदृष्ट विशेष उत्पन्न होता है। यह वैदिक उदाहरण है। लौकिक उदाहरण भी है— बीज पूरकुसुम ( अन्नारका फूल ) लाख के रससे अविसिक्त होनेसे लाखके समान रक्तवर्णं विशिष्ट फलको उत्पन्न करता है। यहाँ बीजपूर कुसुममें गुणाधानरूप संस्कार माना जाता है। वैसे ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि मन्त्र यागके अङ्गरूप कर्ता में ब्रह्मात्मैकत्व विज्ञानरूप संस्कारका विधान करते हैं अर्थात् आत्माके संस्कारके लिए ब्रह्मज्ञानका विधान है।

परन्तु पूर्वपक्षका यह कथन युक्त नहीं है, यदि अभेदज्ञानको संस्काररूप गुण, सम्पद्रूप तथा अध्यास ( प्रतीकोपासना ) विशिष्ट क्रिया योग निमित्त मानें तो ' तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि श्रुति वाक्योंका ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानमें जो निश्चित तात्पर्य है वह बाधित हो जायगा।

संपदादि भेद घटित होनेसे भ्रान्तिरूप हैं। इसलिए उनसे अज्ञानकी निवृत्ति कदापि नहीं होगी। अज्ञानकी निवृत्ति तो यथार्थ ज्ञान - ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे होती है। इसलिए एकत्व ज्ञान संपदादि - रूप नहीं है। शंका – ज्ञानार्थक सकर्मक ' विद् ' धातुसे विद्या शब्द निष्पन्न हुआ है, तब तो ब्रह्म कर्म होगा? समाधान – क्या ब्रह्म विदि क्रियांका कर्म है अथवा उपासनाका? प्रथम पक्ष तो ' अन्यदेव ' ' येनेदं ' इत्यादि श्रुतिसे बाधित है। द्वितीय पक्ष भी ' तदेव ' आदि श्रुतिसे बाधित है |

* शंका - यदि ब्रह्मको इन्द्रियोंका विषय नहीं मानें तो तृतीय सूत्रद्वारा ब्रह्ममें शास्त्र प्रामाण्यकी प्रतिज्ञा बाधित हो जायगी? समाधान -- जीव ब्रह्म एक है, परन्तु उनका अविद्यासे कल्पित भेद प्रतीत होता है। ' तत्त्वमसि ', ' अहं ब्रह्मास्मि ' इसप्रकार वेदान्त और आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न हुई ब्रह्माकारवृत्ति, जिसे विद्या कहा जाता है उसीसे अविद्याकी निवृत्ति होती है। अविद्या निवृत्त्यात्मक फलवाली होने से ब्रह्ममें शास्त्र - प्रामाणिकता निर्विवाद है।

वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यकी विषयताका नाम इदन्ता है, इदन्ता माने यह ब्रह्म है। इसप्रकार " इक्षुक्षीरगुडादीनां माधुर्यस्यान्तरं महत्। तथापि न तदाख्यातुं सर्वशक्त्याऽपि शक्यते ” ( काव्यादर्श - दण्डी ) ( साधारण ईख, दूध, गुड़ आदि पदार्थों के माधुर्य आदि रसोंमें महान् अन्तर है।

उनका भी इदन्तारूपसे वर्णन करनेकी सामर्थ्यं शब्दमें नहीं है ) ' यतो वाचो निवर्तन्तेऽप्राप्य मनसा सह ' ( तै ० : | ४ | १ ) ( मनके साथ वाणी भी जिसे न प्राप्तकर लौट आती है ) ' अतद्व्यावृत्त्यायं चकितममिधत्ते श्रुतिरपि ' ( शिव ० म ० ) ( अतद्की व्यावृत्तिकर यह श्रुति जिसका चकित होकर अभिधान करती है ) ' नेति नेति ' इत्यादि शास्त्र भी जो ब्रह्म नहीं है, जैसे जड़त्व दुःखत्व, अनित्यत्वादि, उसका ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि कहकर वारण करते हैं।

शंका - यद्यपि अविद्याकी निवृत्ति करनेसे शास्त्र में प्रामाणिकता सिद्ध होती है तो भी अविद्याकी निवृत्तिसे जन्य होनेके कारण मोक्ष अनित्य हो जायगा? समाधान -- तत्त्वज्ञानसे जो अविद्याका ध्वंस ( नाश ) होता है वह नित्य है, नैयायिक ध्वंसका ध्वंस नहीं मानते, क्योंकि उनके मतमें ध्वंसका ध्वंस भावरूप है। वेदान्त सिद्धान्तमें कल्पितकी निवृत्ति अधिष्ठानस्वरूप मानी जाती है, इसलिए अविद्याका ध्वंस नित्य आत्मस्वरूप है।

जैसे- रज्जुके ज्ञानसे मिथ्याज्ञानसे कल्पित सर्पको निवृत्ति रज्जुसे अतिरिक्त नहीं है I | शास्त्रसे उत्पन्न तत्त्वज्ञानसे अविद्या तथा अविद्यासे कल्पित संसारित्वादिकी निवृत्तिरूप नित्यमुक्त आत्मस्वरूपका आविर्भाव ही तो मोक्ष है, अतः मोक्ष में अनित्यत्व दोष असम्भव है।

* उत्पत्ति, आप्ति, विकृति तथा संस्कृति इस भेदसे क्रिया चार प्रकारको है, इसके अनुसार क्रिया जन्य उत्पाद्य, आप्य, विकार्य तथा संस्कार्यं इन चतुर्विध प्रकारोंसे भिन्न होनेके कारण मोक्ष उपासना साध्य नहीं है, इसलिए वह अनित्य भी नहीं है। बौद्ध मतमें क्षणिक विज्ञान आत्मा है। उसकी विशुद्ध विज्ञानरूपसे उत्पत्तिको वे मोक्ष मानते हैं, इससे उसके मतमें मोक्ष उत्पाद्य है। जैन मतावलम्बी संसाररूप अवस्थाका त्यागकर कैवल्य अवस्थाकी प्राप्तिको मोक्ष मानते हैं, अतः वह विकाररूप है | वटादिके समान क्रियाद्वारा उत्पन्न होनेसे दोनों प्रकारके मोक्ष अनित्य हैं। मोक्ष प्राप्य भी नहीं है, क्योंकि वह स्व आत्मस्वरूप होनेसे नित्य प्राप्त है। इसके अतिरिक्त मोक्षको उत्पाद्य आदि माननेवालोंसे हम पूछते हैं कि ब्रह्म जीवसे अभिन्न है कि भिन्न? इसको ' स्वात्मस्वरूपत्वे ' आदिसे कहते हैं।

* जिनके मतमें मोक्ष संस्कार्य है। उनके लिए कहते हैं - संस्कार दो प्रकारसे होता है। एक गुणाधान और दूसरा दोषापनयनसे, जैसे यागमें ' ब्रीहीन् प्रोक्षति ' ( धानका प्रोक्षण करे अर्थात् जलका छींटा दे ) प्रोक्षण करने से ब्रीहिमें गुणाधानरूप संस्कार होता है और मलिन वस्त्र, दर्पणादिका जलादिसे मलकी निवृत्तिरूप संस्कार होता है। इन दोनोंका ' न तावत् ' इत्यादिसे निषेध करते हैं।

यदि कहो कि ब्रह्मात्मस्वरूप मोक्ष अनादि अविद्यामलसे आवृत है उपासना से निवृत्त होनेपर ब्रह्मस्वरूप मोक्ष अपने स्वरूप से अभिव्यक्त होता है किन्तु उत्पन्न नहीं होता। तो आत्मामें मल सत्य है अथवा कल्पित? यदि कल्पित है तो उसकी निवृत्ति अधिष्ठान के ज्ञानसे होती है, जैसे कल्पित सर्पकी निवृत्ति अधिष्ठान रज्जुके ज्ञानसे होती है, किसी अन्य क्रियासे नहीं, इसी प्रकार कल्पित अविद्याकी निवृत्ति भी अधिष्ठान ब्रह्मात्मज्ञानसे होगी उपासनादि क्रियासे नहीं।

यदि अविद्यामल सत्य है तो वह तत्त्वज्ञानसे निवृत्त नहीं होगा अपितु उपासनारूप क्रियासे, तो वह उपासनारूप क्रिया आत्मामें रहती है अथवा आत्मासे भिन्न अन्य वस्तुमें? पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि निष्क्रिय आत्मामें क्रियाका संभव नहीं। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थके आश्रित क्रियासे आत्माका सम्बन्ध न होनेसे उसका संस्कार संभव नहीं है।

' असङ्गो न हि सज्जते ' ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' इत्यादि श्रुति वाक्य आत्मामें क्रियादि सम्बन्धका निषेध करते हैं, अतः मोक्ष संस्कार्यं नहीं है।

शंका -- अन्याश्रित क्रियासे भी अन्यका संस्कार देखने में आता है। जैसे देहाश्रित स्नानादि क्रियाओंसे आत्मामें ‘ मैं शुद्ध हुआ हूँ ' ऐसा संस्कार देखा गया है। समाधान —— देहादिसघातमें तादात्म्याध्याससे आत्मबुद्धि करनेसे ऐसा व्यवहार होता है वस्तुतः यह भ्रान्ति है। किञ्च अविद्यामलको जो सत्य माना गया है वह तो उपासनादि क्रियाओंसे कदापि निवृत्त नहीं होगा, उसकी निवृत्ति के विना मोक्ष भी सिद्ध नहीं होगा। यदि उसकी उपासनादिसे निवृत्ति मानें तो वह सत्य नहीं होगा, यह अन्य दोष भी है। ' एको देवः सर्वभूतेषु ' और ' स पर्यंगात् ' इन मन्त्रों में निर्गुणपदसे ब्रह्ममें गुणाधानरूप संस्कारका और शुद्ध पदसे दोषापनयनरूप संस्कारका निषेध किया गया है। इसलिए उत्पत्ति, विकृति, आप्ति और संस्कृति इन चारों क्रियाओंके क्रमशः उत्पाद्य विकार्य, आप्य और संस्कार्य ये चार फल हैं। इनसे भिन्न पाँचवां कोई क्रियाका फल नहीं है जो मोक्षको क्रिया साध्य सिद्ध करनेमें सहायक हो। अतः मोक्ष क्रियाका फल नहीं है। परन्तु मोक्ष असाध्य होनेसे शास्त्रका आरम्भ व्यर्थ हो जायगा? नहीं, क्योंकि शास्त्रका अवान्तर प्रयोजन तत्त्वज्ञान कराना है। वह अधिकारी पुरुषोंकी प्रवृत्ति साध्य है, अत : शास्त्रका बारम्भ व्यर्थ नहीं है।

* शंका - जो यह कहा गया है कि मोक्ष में ज्ञानके विना अन्य क्रियाका सम्बन्ध नहीं है, यह कथन असंगत है अर्थात् व्याघात दोष ग्रस्त हैं, क्योंकि जब मोक्षमें ज्ञानका प्रवेश है तो ज्ञान मानसिक क्रिया होनेसे मोक्षमें उसका प्रवेश हो चुका। इसप्रकार जब मानसी क्रियारूप ज्ञानसे मोक्ष साध्य है तो क्रिया साध्य - उत्पाद्य आदि चार फलोंमें से किसी एकको मोक्ष फल मानना पड़ेगा? सिद्धान्ती इसका समाधान ' न ' आदि भाष्यसे करते हैं। ' स्वाहा देव हविर्दाने श्रौषट्, वौषट् वषट्, स्वधा ' देवताको आहुति देते समय ' स्वाहा, श्रौषट्, वौषट्, वषट्, स्वधा ' इनमें से किसी एक शब्दका मन्त्र के साथ प्रयोग किया जाता है।

* अब भगवान् भाष्यकार ज्ञान और ध्यानके भेदको ' पुरुषो वाव गौतमाग्निः ' आदि उदाहरणोंसे स्पष्ट करते हैं। परन्तु ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' ' आत्मानं पश्येत् ' ( आत्माको देखे ) ' तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि ० ' ( उसीको तू ब्रह्म जान ) इत्यादि स्थलोंमें लिङ्, लोट्, तव्य आदि विधिप्रत्यय श्रूयमाण हैं, अतः ब्रह्मज्ञान विधेय प्रतीत होता है। जैसे ' यजेत ' इस विधिसे विधेय याग क्रियारूप है, वैसे ' द्रष्टव्यः ' पश्येत् ' इत्यादि विधियोंसे विधेय ब्रह्मज्ञान भी क्रियारूप है?

* विधि हेय तथा उपादेय विषयक है। पुरुष जिसके करने आदिमें स्वतन्त्र है वह हेय तथा उपादेय है, वहींपर पुरुष नियोज्य होता है। किन्तु ब्रह्म तो अनियोज्य है। सुरापान हेय हैं और यांगदि उपादेय हैं। ब्रह्म तो अपना स्वरूप है और नित्य प्राप्त हैं, अतः वह हेयोपादेय भी नहीं है। कि ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि विधियाँ परम पुरुषार्थके साधन ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानकी प्रतिबन्धक जो स्वभावसे मनुष्योंकी सुखके लिए विषयोंकी ओर प्रवृत्ति है उस क्षणिक विषय सुखमें प्रवृत्त मनुष्य को आत्मज्ञानकी स्तुति श्रवण कराकर वहाँसे हटाती हुई प्रयोजनवाली होती हैं।

* ‘ निरुपममनादितत्त्वं त्वमहमिदमद इति कल्पनादूरम्। नित्यानन्दैकरसं सत्यं ब्रह्माद्वितीयमेवाहम्। ' ( ' वि ० चू ० ४१ ९ ४ ) ( जो उपमा रहित अनादितत्त्व ' तू, मैं, यह, वह आदि कल्पना से अत्यन्त दूर है, वह नित्यानन्दैकरस स्वरूप, सत्य और अद्वितीय ब्रह्म ही मैं हूँ ) इसप्रकार जीव ब्रह्मका ऐक्यज्ञान होनेपर आत्मवित् के लिए न कुछ हेय है और न कुछ उपादेय, न कुछ कर्तव्य है और न कुछ अकर्तव्य | जब वेदान्तशास्त्रद्वारा स्वतन्त्ररूपसे ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे अनर्थकी अत्यन्त निवृत्ति परमानन्दस्वरूप ब्रह्मका आविर्भावात्मक मोक्ष और कृतकृत्यता अनुभव सिद्ध है, तब क्रियारूप उपासना से अविद्याको निवृत्तिरूप संस्कार सहित प्रत्यगाभिन्नब्रह्मका आविर्भावात्मक मोक्ष होता है तथा ' उपासीत ' इस उपासनारूप क्रियाका अङ्ग होकर सम्पूर्ण वेदान्तवाक्य ब्रह्मका उपदेश करते हैं, इसप्रकार वृत्तिकारके मतका उपर्युक्त रीतिसे खण्डन समझना चाहिए | अब ' यदपि ' आदिसे प्रभाकरके मतका उल्लेख करते हैं।

* प्रवृत्ति ( यागादि ), निवृत्ति ( सुरापानादिका निषेध ) रूप कार्य तथा उनके अङ्गों का ही वेद प्रतिपादन करता है। इससे भिन्न केवल सिद्ध वस्तु ( ब्रह्म ) का प्रतिपादन नहीं करता, अतः वेदान्तवाक्य मी क्रियाके अङ्ग होकर ही ब्रह्मका ज्ञान कराते हैं, क्योंकि ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् ' ( वेद क्रियार्थक है, क्रिया से भिन्न अक्रियार्थक निष्फल है ) इसका समाधान ' तन्न ' आदिसे करते हैं।

* ' मैं ' इस प्रतीतिका विषय लोक प्रसिद्ध कर्ता भोक्ता संसारी है। उसीको प्रायः सब लोग आत्मा मानते हैं। परन्तु आत्मा तो अहंकारादिका साक्षी मात्र है। स्वयं साक्षी आत्मा अहंकारादिका विषय भला कैसे हो सकता है? किश्व आत्मा भ्रमात्मक द्वैतका अधिष्ठान है उसका विषेध करनेपर जगत् में अस्ति, भाति, प्रियता कदापि सिद्ध नहीं होगी। इसलिए वेदान्तवेद्य आत्माका कोई निषेध नहीं कर सकता और न वह किसीका अङ्ग ही हो सकता है।

* यदि कहो कि आत्मा अनित्य होनेके कारण हेय है, तो इसका समाधान ' सर्वं हि ' आदिसे कहते हैं | आत्मा तो सब भूतों में पूर्ण होने से पुरुष कहा गया है। ' अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ' ( गी ० २।२० ) ( क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीरके नाश होनेपर भी इसका नाश नहीं होता ) यह स्मृति प्रमाण है। परन्तु आत्मा परिणामी होने से अनित्य होगा? यह भी ठीक नहीं है ; क्योंकि धर्म, लक्षण, अवस्था भेदसे परिणाम तीन प्रकारका होता है। उससे रहित होनेके कारण आत्मा कूटस्थ नित्य है। आत्मासे उत्कृष्ट वस्तु प्राप्य होने के कारण आत्मा य है? ऐसा भी नहीं, क्योंकि आत्मा ही सबकी पराकाष्ठा, परागति है। याज्ञवल्क्य - हे शाकल्य! ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' इत्यादि वेदान्त वाक्य अबाध्य, नित्य सिद्ध, अनन्यशेष ब्रह्मात्मतत्त्वका प्रतिपादन करते हैं। अतः वेद भाग सिद्ध वस्तु ब्रह्मका प्रतिपादन नहीं करता यह कथन केवल साहस मात्र है।

** यदि अक्रियार्थक वेद वाक्य निष्फल है तो मीमांसकके मतमें ' सोमेन यजेत ' ( सोम नामक याग करे ) ‘ दध्ना जुहोति ' ( दधिसे हवन करे ) इस प्रकार सोम, दधि आदि सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेद अनर्थक ही होगा। जो शब्द क्रियार्थक नहीं है उनकी अनर्थकता क्या है? क्या उनका कुछ अर्थ नहीं है अथवा वे फल रहित हैं? ' आम्नायस्य ' इस नियमसे यदि अक्रियार्थक शब्द अनर्थक हैं तो सोम, दधि आदि अर्थं शून्य होंगे। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि उनका याग आदिकी सिद्धिके लिए वर्णन मिलता है। यदि कहो कि वे ' स्वर्गकामो यजेत ' ' सुरां न पिबेत् ' इस प्रकार प्रवृत्ति, निवृत्ति विधिसे भिन्न प्रतिपादित सोम दधि आदि सिद्ध पदार्थ धर्मके लिए कथित होनेके कारण सार्थक हैं, तो प्रश्न होता है कि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वाक्य सार्थक क्यों नहीं हैं? इसमें यह कारण है कि सोम आदि क्रिया सम्बन्धी होनेसे कार्य हैं, अतः उनका उपदेश युक्त है, किन्तु सिद्ध ब्रह्म किसी क्रियाका सम्बन्धी न होनेसे कार्य नहीं है, इसलिए उसके प्रतिपादक वाक्य अनर्थक हैं।

* यद्यपि ' सोमेन यजेत ' ' दध्ना जुहोति ' आदि उपदेशोंसे दधि, सोमादि यागादि क्रिया नहीं हो जाते, फिर भी सोमादि सिद्ध वस्तु यागादि क्रियाकी निष्पत्तिमें साधन हैं, अतः वे सार्थक हैं। सि ० - सिद्ध पदार्थ क्रियाके अङ्ग भले हों फिर भी यह नहीं हो सकता कि सोमादि पदार्थ नहीं रहते या उन पदोंका कुछ अर्थ नहीं है।

* वादीका यह मत ठीक नहीं है कि सिद्ध वस्तुकी सफलता में क्रिया ही द्वार है, क्योंकि जैसे ' रज्जु ज्ञानसे सर्पादि भ्रान्ति और उससे उत्पन्न भयादिकी निवृत्ति होती है, उसी प्रकार आत्मसाक्षात्कारसे प्रपञ्चके कारणभूत मिथ्याज्ञान और उससे उत्पन्न प्रप में सत्यत्व बुद्धिकी निवृत्ति हो जाती है। दधि, सोमादि यागादि क्रिया द्वारा सफल होते हैं, किन्तु ब्रह्म तो स्वयं फलस्वरूप है। यद्यपि दोनोंमें इतना अन्तर है, तथापि दधि सोमादि शब्द जैसे सफल सिद्ध दधि आदि वस्तुका बोध कराते हैं, उसीप्रकार ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वेदान्त वाक्य भी सफल सिद्ध वस्तु ब्रह्मका बोध कराते हैं। जैसे विधि वाक्य सिद्ध पदार्थ परक हैं, वैसे ही वेदान्त वाक्य मी सिद्ध वस्तु परक हैं।

* विधि वाक्यगत सिद्ध पदार्थोंका विचारकर अब निषिद्ध वाक्यगत सिद्ध पदार्थोंका विचार करते हैं — जैसे ' ब्राह्मणो न हन्तव्य : ' इस वाक्यके मध्य में जो ' न ' है, वह निवृत्तिका उपदेश करता है। निवृत्ति अभावरूप है, अतः वह न क्रिया है और न क्रियाका साधन हो, क्योंकि क्रिया और क्रियाके साधन भावरूप होते हैं। अक्रियार्थंक वेदवाक्य यदि अनर्थक हों तो ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि निवृत्ति परक वेद वाक्य व्यर्थ हो जाएँगे। और ' स्वाध्यायोऽध्येतव्य : ' इस स्वाध्याय विधि प्राप्त होनेके कारण उनमें व्यर्थत्वकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, इसलिए स्वाभाविक रागसे प्राप्त हनन क्रियासे ' नञ् ' हनन कर्ताको निवृत्तकर उदासीनभावमें लाता है। इस अर्थ से भिन्न लक्षणाद्वारा हनन विरोधी संकल्पादि क्रिया, ' अहननं कुर्यात् ' ( हनन न करे ) इस प्रकार ' नजा ' के अर्थकी कल्पना करना ठीक नहीं है। किन्तु अपने सम्बन्धी अभावका ज्ञान करना ही ' नञ् ' का स्वभाव है।

“ तत्सादृश्यममावश्चतदन्यत्वं तदल्पता। अप्राशस्त्यं विरोधश्व नञर्थाः षट् प्रकीर्तिताः॥ " अल्प, अप्राशस्त्य ( अयोग्य ) तथा विरोध यदि विधिके समान निषेधका अर्थ भी कार्य किया गया

“ नत्र के छः अर्थं कहे गये हैं - + तत्सादृश्य ( उसके समान ), अभाव, उससे भिन्न, उससे तो फिर विधि और निषेध में अन्तर न रहेगा।

+ टि ० -- तत्सादृश्यम् - अनिक्षु अर्थात् ईखसे भिन्न ईखके सदृश शर, अभावः यथा नास्ति अर्थात् अस्तित्वका अभाव, तदन्यत्व - अब्राह्मण - ब्राह्मणसे भिन्न क्षत्रियादि, तदल्पता अनुदरा कन्याकृशोदरी, अप्राशस्त्य - अपशवः - अन्ये गोऽश्वेभ्यः, अर्थात् गौ, अश्वसे भिन्न पशु हैं, विरोधः - अमित्रः, अविद्या आदि अर्थात् मित्रसे विरुद्ध शत्रु, विद्यासे भिन्न अविद्या आदि।

( क ) ' अप्राधान्यं विधेर्यत्र प्रतिषेधे प्रधानता। प्रसज्यप्रतिषेधोऽसौ क्रियया सह यत्र नञ्॥ ' ( जिस वाक्य में विधि अप्रधान और प्रतिषेध प्रधान हो और जहाँ नञ्का क्रियाके साथ सम्बन्ध हो, वहाँ नज्का प्रसज्यप्रतिषेध अर्थ है ) यथा ' न कलअं मक्षयेत् ' ( कलञ्जका मक्षण न करे ) इसमें बलवत् अनिष्टके असाधनत्वसे विशिष्ट इष्ट साधनरूप विधि वाचक प्रत्यय के अर्थके अभावका मक्षणक्रियामें बोधन कराता है, इसलिए विधि अप्रधान है और नञ्का अर्थ अभाव प्रधान है, अतः क्रियापदके साथ जिसका अन्वय है, ऐसा नज् प्रसज्यप्रतिषेध कहलाता है, प्रसज्य - प्रसक्त, प्रतिषेध - निषेध अर्थात् प्रसक्का निषेध |

( ख ) ' प्राधान्यं हि विधेर्यत्र प्रतिषेधेऽप्रधानता। पर्युदासः स विज्ञेयो यत्रोत्तरपदेन नज्॥ ' ' जिसमें विधि प्रधान और प्रतिषेध अप्रधान हो तथा जिसमें उत्तरपदके साथ नज्का अन्वय हो वहाँ नका पर्युदास अर्थ है। '

* ' नव् ' से प्राप्त जो निवृत्त्यात्मक अभाव ज्ञान है वह ब्राह्मण हिंसा के प्रवर्तक रागका नाश करता हुआ हनन कर्ताको हनन क्रियासे हटाकर उदासीन भावमें लाता हुआ स्वयं भी शान्त हो जाता है | ' तस्य बटोर्व्रतम् ' ( उस ब्रह्मचारीका यह व्रत है ) इस वाक्य में अनुष्ठेय क्रियाका वाचक व्रत शब्द है, उससे उपक्रमकर . ' नेक्षेतोद्यन्तमादीत्यम् ' ( उदय होते हुए सूर्यको ब्रह्मचारी न देखे अर्थात् दर्शन विरोधी संकल्परूप क्रिया करे ) यह उपसंहार वाक्य है। इससे ब्रह्मचारीके लिए प्रजापति व्रतका विधान किया गया है। जैसे यहाँ लक्षणासे प्रजापति व्रतमें सूर्यदर्शन विरोधी संकल्परूप क्रिया मानी गई है, वैसे ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' में नहीं है। किन्तु यहाँ तो रागसे प्राप्त हनन क्रियाका अभाद ' नञ् ' पदका अर्थं है। हनन विरुद्ध संकल्परूप क्रिया नहीं। जैमिनि मुनिके ' आम्नायस्यं क्रियार्थत्वात् ' इस पूर्वपक्ष सूत्रसे क्रिया से भिन्न सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेदवाक्य अनर्थक कहे गये हैं उनका भी तात्पर्य यह है कि जिन वाक्योंका श्रवणादि करनेसे भी कुछ फल सिद्ध नहीं होता ऐसे पुरुषार्थंके अनुपयोगी उपाख्यान। यथा ' वज्रहस्तः पुरन्दरः ' इत्यादि † भूतार्थवाद ( कथामात्र ) व्यर्थं हैं। शेष वेदान्तवाक्य तो सफल होनेसे सर्वथा सार्थक हैं।

* सि ० ० . – क्या केवल श्रुतब्रह्म तत्त्वज्ञानके अनन्तर श्रोतामें पूर्वकी भाँति संसारित्व है अथवा ब्रह्म साक्षात्कारके अनन्तर? प्रथमपक्ष तो हमें इष्ट ही है, क्योंकि केवल परोक्ष ज्ञानमात्रसे अपरोक्ष संसारित्व भ्रान्ति निवृत्त नहीं होती। द्वितीय पक्ष तो युक्त नहीं है, कारण कि मिथ्याज्ञानसे ही कर्तृत्व भोक्तृत्व संसारित्व अपनेमें माना हुआ है। वह ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्त वाक्योंके श्रवणसे उत्पन्न तत्त्वज्ञानद्वारा निवृत्त हो जाता है।

‡ टि ० -- ' विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते। भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादास्त्रिधा मताः ' ( जहाँ प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरोध उपस्थित हो वहाँ गुणवाद, जहाँ वाक्यसे प्रतिपादित अर्थ प्रत्यक्षादिसे अवधारित हो वहाँ अनुवाद और जहाँ वाक्यसे प्रतिपादित अर्थका प्रमाणान्तरसे बाध न हो और अनुवाद मी न हो वह भूतार्थवाद कहा जाता है ) इसका विस्तृत वर्णन देवताधिकरण ( ब्र ० सू ० १।३।२६ ) में द्रष्टव्य है।

** जैसे साँप अपनी काँचुली में अपनापन छोड़कर जहाँ चाहे उसे उत्तार फैंक देता है उसमें फिर अहंता ममता नहीं करता, वैसे ही आत्मवित् अपने स्थूल शरीरादिमें अहंता, ममता त्यागकर उसमें रहता हुआ भी न रहेके समान होता है अर्थात् देहादिमें मिथ्याज्ञान मूलक आत्माभिमान ब्रह्म ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादित करती है। ब्रह्म मशरीर है, अतः ब्रह्मवित् भी अशरीर है। परन्तु निवृत्त होनेपर विद्वान् शरीरमें रहते भी अशरोर है, क्योंकि ' ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति ' इत्यादि श्रुति - व्यवहारमें वह ' सचक्षुरचक्षुरिव ' ( चक्षु आदि इन्द्रियोंसे रहित होता हुआ भी चक्षु आदि इन्द्रियों सहित - सा प्रतीत होता है ) जिसने आत्मसाक्षात्कार कर लिया है उसके लिए ही शास्त्र आरोपित संसारित्वका निषेध करता है ; अन्यके लिए नहीं, इसलिए शास्त्र सर्वथा दोष रहित है।

* ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोनव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य : ' ( बृह ० २ | ४ | ५ ) इस श्रुति में श्रवणके अनन्तर मनन और निदिध्यासनकी विधि देखने में आती है। इसलिए ब्रह्म विधिका अङ्ग है, क्योंकि श्रवणमात्रसे अपने स्वरूप में निश्चित तात्पर्यवाला नहीं होता। परन्तु यह ठीक नहीं है, कारण कि श्रवणके समान मनन निदिध्यासन भी ब्रह्मज्ञानके लिए हैं। इनका श्रवणसे पृथक् प्रयोजन नहीं है। ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति ही सबका एकमात्र प्रयोजन है। ब्रह्मज्ञानका ब्रह्मसाक्षात्कार ही फल है। जब वह सोम यागादिके समान विधेय ही नहीं तो विधिका अङ्ग कैसे? विधिका अङ्ग वह होता है जो प्रथम ज्ञात हो और स्वयं फल न हो। परन्तु ब्रह्म तो वेदान्त श्रवणके पूर्व अज्ञात है और ब्रह्मात्मज्ञान होनेपर स्वयं फलरूप है। इसलिए ब्रह्म किसी भी विधिका अङ्ग नहीं हैं, तो उपासना विधिका विषयरूपसे शास्त्र प्रमाणक हो यह कथन भी असंगत है। अतः ब्रह्ममें स्वतन्त्र रूपसे शास्त्र प्रमाण है, क्योंकि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वेदन्त वाक्योंका तात्पर्य ब्रह्ममें ही है।

* यदि वेदान्त भी उपासना विधिका अङ्ग होता तो ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' इस शास्त्र के प्रथम आरब्ध हो जानेके कारण इससे पृथक् शास्त्रका आरम्भ न होता, क्योंकि दोनोंका विषय एक ही होता। यदि पूर्व आरब्ध विषयका आरम्भ करते हो ऐसा वर्णन करते कि जो धर्म पूर्व मीमांसा में प्रतिपादित है उस शेष धर्मके लिए जिज्ञासा करनी चाहिए तब तो इस शास्त्रके आरम्भमें ही भगवान् सूत्रकार भी ऐसी प्रतिज्ञा करते।

किन्तु ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस सूत्र से पूर्वोक्त मीमांसा सूत्रसे विलक्षण ब्रह्मजिज्ञासाकी प्रतिज्ञा की है। इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्म और वेदान्त किसी भी विधिके अङ्ग नहीं हैं, अपितु स्वतन्त्र ही हैं। जैमिनि आचार्यने अपने पूर्वमीमांसा शास्त्र में कर्म, कर्मका फल, इतिकर्तव्यता का वर्णन किया है। उनके सिद्धान्तमें ब्रह्मको नहीं माना गया है इससे वहाँ जीव ब्रह्मकी एकताके विचारका अवकाश ही नहीं है।

' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार ब्रह्मसाक्षात्कार जब तक नहीं होता तब तक ' यजेत, जुहोति दद्यात्, उपासीत ' इत्यादि विधियाँ तथा प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय इत्यादि सब उपपन्न होते हैं अर्थात् व्यावहारिक सत्यरूपसे उपयुक्त होते हैं। ' तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म, सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंके श्रवणादिसे जब ब्रह्मरूपसे आत्माका साक्षात्कार हो जाता है तब प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयरूप सब द्वैत बाधित हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न पदार्थों का बाध हो जाता है॥ ४

उपसंहार

ये चार सूत्र मिलकर ब्रह्मज्ञान की यात्रा का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इनमें पहले जिज्ञासा की आवश्यकता बताई गई है, फिर ब्रह्म के सृजनकर्ता स्वरूप का परिचय दिया गया है, और अंत में शास्त्र को ज्ञान का एकमात्र प्रामाणिक साधन सिद्ध किया गया है। इस प्रकार ये सूत्र तर्क और श्रुति के समन्वय से सत्य की खोज का आधार निर्मित करते हैं।

In English

Brahma Sutra 1.1.1 Commentary

This text explains the first verse of the Brahma Sutras, 'ataḥ brahma jijñāsā'. The commentary clarifies that after acquiring spiritual disciplines like detachment and self-control, one should begin the inquiry into Brahman, the ultimate reality.

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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