व्याख्या · ब्रह्मसूत्र
ब्रह्मसूत्र — प्रथम अध्याय, प्रथम पाद (५–३१)
25 मूल पद्य 25 संस्करणसे मिलाये गये
इन सूत्रों में ब्रह्म के स्वरूप की सूक्ष्म विवेचना की गई है, जहाँ वेदांत के आधारभूत सिद्धांतों को तार्किक क्रम में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ शास्त्र द्वारा बताए गए ब्रह्म के लक्षणों, उसकी उपासना पद्धति और अन्य दृश्य जगत से उसके भेद को स्पष्ट करते हुए ज्ञान मार्ग की सुदृढ़ता स्थापित की जाती है।
ईक्षत्यधिकरणम्
1.1.5 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ५
ईक्षतेर् नाशब्दम् ॥ १.१.५ ॥
पदच्छेद — ईक्षतेः , न , अशब्दम्
सूत्रार्थ — ( अशब्दम् ) श्रुति अप्रतिपादित होनेके कारण प्रधान जगत्का कारण ( न ) नहीं है, ( ईक्षतेः ) क्योंकि ' तदक्षत ' श्रुतिमें जगत्का कारण ईक्षण कर्ता कहा गया है, जड़ प्रधानमें ईक्षणकर्तृत्व नहीं है।
शाङ्करभाष्य
न सांख्यपरिकल्पितमचेतनं प्रधानं जगतः कारणं शक्यं वेदान्तेष्वाश्रयितुम्। अशब्दं हि तत्। कथमशब्दत्वम् ईक्षतेः ईक्षितृत्वश्रवणात्कारणस्य। कथम् एवं हि श्रूयते सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् इत्युपक्रम्य तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत इति। तत्र इदंशब्दवाच्यं नामरूपव्याकृतं जगत् प्रागुत्पत्तेः सदात्मनावधार्य तस्यैव प्रकृतस्य सच्छब्दवाच्यस्येक्षणपूर्वकं तेजःप्रभृतेः स्रष्टृत्वं दर्शयति। तथान्यत्र आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किंचन मिषत्।
स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति। स इमा्लोकानसृजत इतीक्षापूर्विकामेव सृष्टिमाचष्टे। क्वचिच्च षोडशकलं पुरुषं प्रस्तुत्याह स ईक्षांचक्रे स प्राणमसृजत इति। ईक्षतेरिति च धात्वर्थनिर्देशोऽभिप्रेतः यजतेरितिवत् न धातुनिर्देशः। तेन यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते इत्येवमादीन्यपि सर्वज्ञेश्वरकारणपराणि वाक्यान्युदाहर्तव्यानि।। यत्तूक्तं सत्त्वधर्मेण ज्ञानेन सर्वज्ञं प्रधानं भविष्यतीति तन्नोपपद्यते।
न हि प्रधानावस्थायां गुणसाम्यात्सत्त्वधर्मो ज्ञानं संभवति। ननूक्तं सर्वज्ञानशक्तिमत्त्वेन सर्वज्ञं भविष्यतीति तदपि नोपपद्यते। यदि गुणसाम्ये सति सत्त्वव्यपाश्रयां ज्ञानशक्तिमाश्रित्य सर्वज्ञं प्रधानमुच्येत कामं रजस्तमोव्यपाश्रयामपि ज्ञानप्रतिबन्धकशक्तिमाश्रित्य किंचिज्ज्ञमुच्येत। अपि च नासाक्षिका सत्त्ववृत्तिर्जानातिना अभिधीयते। न चाचेतनस्य प्रधानस्य साक्षित्वमस्ति। तस्मादनुपपन्नं प्रधानस्य सर्वज्ञत्वम्।
योगिनां तु चेतनत्वात्सत्त्वोत्कर्षनिमित्तं सर्वज्ञत्वमुपपन्नमित्यनुदाहरणम्। अथ पुनः साक्षिनिमित्तमीक्षितृत्वं प्रधानस्यापि कल्प्येत यथाग्निनिमित्तमयःपिण्डादेर्दग्धृत्वम् तथा सति यन्निमित्तमीक्षितृत्वं प्रधानस्य तदेव सर्वज्ञं ब्रह्म मुख्यं जगतः कारणमिति युक्तम्। यत्पुनरुक्तं ब्रह्मणोऽपि न मुख्यं सर्वज्ञत्वमुपपद्यते नित्यज्ञानक्रियत्वे ज्ञानक्रियां प्रति स्वातन्त्र्यासंभवादिति अत्रोच्यते इदं तावद्भवान्प्रष्टव्यः कथं नित्यज्ञानक्रियत्वे सर्वज्ञत्वहानिरिति।
यस्य हि सर्वविषयावभासनक्षमं ज्ञानं नित्यमस्ति सोऽसर्वज्ञ इति विप्रतिषिद्धम्। अनित्यत्वे हि ज्ञानस्य कदाचिज्जानाति कदाचिन्न जानातीत्यसर्वज्ञत्वमपि स्यात्। नासौ ज्ञाननित्यत्वे दोषोऽस्ति। ज्ञाननित्यत्वे ज्ञानविषयः स्वातन्त्र्यव्यपदेशो नोपपद्यते इति चेत् न प्रततौष्ण्यप्रकाशेऽपि सवितरि दहति प्रकाशयति इति स्वातन्त्र्यव्यपदेशदर्शनात्। ननु सवितुर्दाह्यप्रकाश्यसंयोगे सति दहति प्रकाशयति इति व्यपदेशः स्यात् न तु ब्रह्मणः प्रागुत्पत्तेर्ज्ञानकर्मसंयोगोऽस्तीति विषमो दृष्टान्तः।
न असत्यपि कर्मणि सविता प्रकाशते इति कर्तृत्वव्यपदेशदर्शनात् एवमसत्यपि ज्ञानकर्मणि ब्रह्मणः तदैक्षत इति कर्तृत्वव्यपदेशोपपत्तेर्न वैषम्यम्। कर्मापेक्षायां तु ब्रह्मणि ईक्षितृत्वश्रुतयः सुतरामुपपन्नाः। किं पुनस्तत्कर्म यत्प्रागुत्पत्तेरीश्वरज्ञानस्य विषयो भवतीति तत्त्वान्यत्वाभ्यामनिर्वचनीये नामरूपे अव्याकृते व्याचिकीर्षिते इति ब्रूमः।
यत्प्रसादाद्धि योगिनामप्यतीतानागतविषयं प्रत्यक्षं ज्ञानमिच्छन्ति योगशास्त्रविदः किमु वक्तव्यं तस्य नित्यसिद्धस्येश्वरस्य सृष्टिस्थितिसंहृतिविषयं नित्यज्ञानं भवतीति। यदप्युक्तं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मणः शरीरादिसंबन्धमन्तरेणेक्षितृत्वमनुपपन्नमिति न तच्चोद्यमवतरति सवितृप्रकाशवद्ब्रह्मणो ज्ञानस्वरूपनित्यत्वे ज्ञानसाधनापेक्षानुपपत्तेः। अपि चाविद्यादिमतः संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिः स्यात् न ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितस्येश्वरस्य।
मन्त्रौ चेमावीश्वरस्य शरीराद्यनपेक्षतामनावरणज्ञानतां च दर्शयतः न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च इति। अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् इति च।
ननु नास्ति तव ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितेश्वरादन्यः संसारी नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता इत्यादिश्रुतेः तत्र किमिदमुच्यते संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिः नेश्वरस्येति अत्रोच्यते सत्यं नेश्वरादन्यः संसारी तथापि देहादिसंघातोपाधिसंबन्ध इष्यत एव घटकरकगिरिगुहाद्युपाधिसंबन्ध इव व्योम्नः तत्कृतश्च शब्दप्रत्ययव्यवहारो लोकस्य दृष्टः घटच्छिद्रम् करकच्छिद्रम् इत्यादिः आकाशाव्यतिरेकेऽपि तत्कृता चाकाशे घटाकाशादिभेदमिथ्याबुद्धिर्दृष्टा तथेहापि देहादिसंघातोपाधिसंबन्धाविवेककृतेश्वरसंसारिभेदमिथ्याबुद्धिः।
दृश्यते चात्मन एव सतो देहादिसंघातेऽनात्मन्यात्मत्वाभिनिवेशो मिथ्याबुद्धिमात्रेण पूर्वपूर्वेण। सति चैवं संसारित्वे देहाद्यपेक्षमीक्षितृत्वमुपपन्नं संसारिणः। यदप्युक्तं प्रधानस्यानेकात्मकत्वान्मृदादिवत्कारणत्वोपपत्तिर्नासंहतस्य ब्रह्मण इति तत्प्रधानस्याशब्दत्वेनैव प्रत्युक्तम्। यथा तु तर्केणापि ब्रह्मण एव कारणत्वं निर्वोढुं शक्यते न प्रधानादीनाम् तथा प्रपञ्चयिष्यति न विलक्षणत्वादस्य इत्येवमादिना।।
अत्राह यदुक्तं नाचेतनं प्रधानं जगत्कारणमीक्षितृत्वश्रवणादिति तदन्यथाप्युपपद्यते अचेतनेऽपि चेतनवदुपचारदर्शनात्। यथा प्रत्यासन्नपतनतां नद्याः कूलस्यालक्ष्य कूलं पिपतिषति इत्यचेतनेऽपि कूले चेतनवदुपचारो दृष्टः तद्वदचेतनेऽपि प्रधाने प्रत्यासन्नसर्गे चेतनवदुपचारो भविष्यति तदैक्षत इति। यथा लोके कश्चिच्चेतनः स्नात्वा भुक्त्वा चापराह्णे ग्रामं रथेन गमिष्यामि इतीक्षित्वा अनन्तरं तथैव नियमेन प्रवर्तते तथा प्रधानमपि महदाद्याकारेण नियमेन प्रवर्तते तस्माच्चेतनवदुपचर्यते।
कस्मात्पुनः कारणात् विहाय मुख्यमीक्षितृत्वम् औपचारिकं कल्प्यते तत्तेज ऐक्षत ता आप ऐक्षन्त इति चाचेतनयोरप्यप्तेजसोश्चेतनवदुपचारदर्शनात् तस्मात्सत्कर्तृकमपीक्षणमौपचारिकमिति गम्यते उपचारप्राये वचनात् इत्येवं प्राप्ते इदं सूत्रमारभ्यते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — चतुःसूत्री समाप्ता।
इस प्रकार यह कहा गया कि वेदान्त वाक्योंका कार्यके साथ सम्बन्ध के विना भी एक अद्वितीय ब्रह्ममें पर्यवसान होता है, इन वाक्योंका प्रयोजन " यह आत्मा ब्रह्म है " ऐसा अपरोक्ष ज्ञान कराना है और वे ब्रह्मात्मामें तात्पर्यसे समन्वित हैं। और श्रुतिमें यह भी कहा गया है कि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ब्रह्म ही जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और नाशका कारण है। परन्तु सांख्य आदि तो ऐसा मानते हैं कि सिद्ध वस्तु अन्य प्रमाणसे ही अवगत होती है।
और प्रधान आदि अन्य कारणोंका अनुमान करके तत्परत्व ( प्रधानादि परत्व ) से ही वेदान्त वाक्योंकी योजना करते हैं। सृष्टि विषयक सम्पूर्ण वेदान्त वाक्यों में अनुमान द्वारा ही कार्यसे कारणके लक्षण बतानेकी चेष्टा की गई है। और सांख्य ऐसा मानते हैं कि प्रधान, पुरुष और उनका संयोग नित्य अनुमेय हैं। कणादके अनुयायी तो उन्हीं वाक्योंसे ऐसा अनुमान करते हैं कि ईश्वर सृष्टिका निमित्त कारण है और अणु समवायिकारण हैं।
इसी प्रकार अन्य तार्किक भी वाक्याभास और युक्त्याभासका अवलम्बन लेते हुए पूर्वपक्षी बनकर उपस्थित होते हैं। उक्त विवाद उपस्थित होनेपर वेदान्त बाक्योंका प्रयोजन ब्रह्मका अपरोक्षज्ञान कराना है, यह दिखलानेके लिए वाक्याभास और युक्त्याभासके आधारपर उपस्थित विरोधोंको पुर्वपक्ष बनाकर पद, वाक्य और प्रमाणके ज्ञाता आचार्य ( व्यास ) उनका निराकरण करते हैं।
उनमें त्रिगुणात्मक अचेतन प्रधान जगत्का कारण है, यह माननेवाले सांख्यमतावलम्बी कहते हैंतुमने कहा है कि जो वेदान्त वाक्य सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ब्रह्ममें जगत् की कारणताको दिखलाते हैं, वे प्रधान कारण पक्ष में भी लगाए जा सकते हैं। स्वकार्यकी अपेक्षा प्रधानमें भी सर्वशक्तित्व उपपन्न है, एवं सर्वज्ञत्व भी उपपन्न है। प्रधान सर्वज्ञ कैसे हो सकता है? जिसे तुम ज्ञान मानते हो वह सत्त्वगुणका धर्म है, क्योंकि ' सत्त्वात्संजायते ज्ञानम् ' ( सत्त्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता है ) यह स्मृति है।
उस सत्त्वगुणके धर्मरूप ज्ञानसे कार्य ( देह ) करण ( इन्द्रिय ) वाले पुरुष योगी सर्वज्ञ प्रसिद्ध हैं। सत्त्वका निरतिशय उत्कर्ष होनेपर सर्वज्ञत्वं प्रसिद्ध है। देह और इन्द्रिय रहित केवल ज्ञानस्वरूप पुरुषमें सर्वज्ञत्व अथवा अल्पज्ञत्वकी कल्पना नहीं की जा सकती। प्रधान त्रिगुणात्मक है, इसलिए तो सब ज्ञानोंका कारणभूत सत्त्वगुण प्रधान - अवस्थामें विद्यमान है। इस कारण अचेतन होनेपर भी प्रधानका ही वेदान्त वाक्यों में सर्वज्ञत्व उपचरित है अर्थात् गौणवृत्तिसे प्रतिपादित है।
सर्वज्ञ ब्रह्म है, ऐसा स्वीकार करनेवाले तुमको भी अवश्य सर्वज्ञानशक्तिमत् होनेसे ही ब्रह्म में सर्वज्ञत्व मानना चाहिए, क्योंकि ब्रह्म सदा ही सर्व विषयक ज्ञान करता हुआ नहीं रहता। यदि ज्ञान नित्य है तो ज्ञान क्रियाके प्रति ब्रह्मकी स्वतन्त्रता नष्ट हो जायगी, यदि वह अनित्य है तो ज्ञानक्रिया के न रहनेपर कदाचित् ब्रह्म उससे उपरत भी हो जायगा। इससे तो यह सिद्ध होता है कि सर्वज्ञान शक्तिमत्त्वसे ही ब्रह्म में भी सर्वज्ञत्व प्राप्त होगा।
किञ्च उत्पत्तिके पूर्व तुम ब्रह्मको सर्वकारकोंसे रहित मानते हो, तो ज्ञानके साधन शरीर, इन्द्रियादिके अभाव में ज्ञानकी उत्पत्ति किसीके मतमें भी युक्त नहीं है। सत्त्व, रज और तम इस भेदसे अनेकात्मक प्रधानका परिणाम सम्भव है, अतः वह मृत्तिकादिके समान कारण हो सकता है। परन्तु सङ्घात रहित असङ्ग अद्वितीय ब्रह्म नहीं। इसप्रकार पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर इस सूत्रका आरम्भ किया जाता है--
सांख्य परिकल्पित अचेतन प्रधान जगत्का कारण वेदान्तोंमें नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह श्रुति सिद्ध नहीं है। यदि कहो कि श्रुति सिद्ध क्यों नही है? इससे कि कारणमें ईक्षणकर्तृत्व सुना जाता है। कैसे? ' सदेव सोम्य ० ' ( हे प्रियदर्शन!
आरम्भ में यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ऐसा आरम्भ कर आगे कहा है- ' तदेक्षत ० ' ( उसने ईक्षण किया कि मैं अनेक हो जाऊँ अर्थात् अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ, इसप्रकार ईक्षणकर उसने तेज उत्पन्न किया ) यह श्रुति ' इदम् ' शब्द वाच्य नाम - रूपसे अभिव्यक्त जगत् का उत्पत्तिके पूर्व सद्रूपसे निश्चयकर उसी प्रकृत सत् शब्द वाच्य ( ब्रह्म ) में ईक्षण पूर्वक तेज आदिका स्रष्टृत्व दिखलाती है।
इसीप्रकार अन्य स्थलपर ' आत्मा वा ० ' ( आरम्भमें एकमात्र आत्मा ही था, उसके सिवा अन्य कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं थी, उसने ईक्षण किया कि लोकों की रचना करूँ, उसने अम्भ, मरीचि, मर और आप इन लोकोंकी रचना की ) इसप्रकार यह श्रुति ईक्षण पूर्वक सृष्टिको कहती है। कहीं पर षोडशकल पुरुषको प्रस्तुत कर ' स . ईक्षांचक्रे ० ' ( उसने ईक्षण किया अर्थात् नाम रूपात्मक जगत्की उत्पत्तिका सङ्कल्प किया, उसने प्राणको उत्पन्न किया ) ऐसा कहा है।
' यजति ' के समान यहाँ ' ईक्षति ' से धातुके अर्थका निर्देश अभिप्रेत है, धातु मात्रका निर्देश नहीं। इससे ' यः सर्वज्ञः ० ' ( जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है जिसका ज्ञानमय ही तप है, उससे यह हिरण्यगर्भ, नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होता है ) इत्यादि सर्वज्ञ ईश्वर कारण परक वाक्य भी उदाहरणरूपसे देने चाहिएँ। जो यह कहा गया है कि सत्त्वगुणके धर्मरूप ज्ञानसे प्रधान सर्वज्ञ होगा, यह कथन युक्त नही है, क्योंकि प्रधानावस्था में गुणोंका साम्य होनेसे सत्त्वगुणका धर्मरूप ज्ञान हो ही नहीं सकता।
परन्तु जो यह कहा गया कि सर्वज्ञानके शक्तिमत्त्वसे प्रधान सर्वज्ञ होगा? वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि गुणोंके साम्य होनेपर भी यदि सत्त्वगुणके व्यपाश्रय ज्ञानशक्तिका आश्रयणकर प्रधानको सर्वज्ञ कहो तो रजो और तमोगुण व्यपाश्रय ज्ञान प्रतिबन्धक शक्तिका आश्रयणकर ( प्रधानको ) अल्पज्ञ भी कहना होगा। और साक्षी रहित सत्त्वगुणकी वृत्तिका ' ज्ञा ' धातुसे विधान नहीं किया जा सकता। अचेतन प्रधान साक्षी नहीं है, इस कारण प्रधानमें सर्वज्ञत्व अनुपपन्न है।
योगी तो चेतन हैं, अतः उनमें सत्त्वगुणके उत्कर्षके कारण सर्वज्ञत्व युक्त है, इसलिए इस स्थल में यह उदाहरण ठीक नहीं है। जैसे अयःपिण्डादिमें दग्धृत्व अग्निनिमित्तक है, वैसे ही प्रधानमें ईक्षितृत्व साक्षी निमित्तक है ऐसी यदि कल्पना करो तो प्रधानमें ईक्षितृत्वका जो निमित्त है वही सर्वज्ञ मुख्य ब्रह्म जगत्का कारण है, यह युक्त है।
और यह जो कहा गया है कि ब्रह्ममें भी मुख्य सर्वज्ञत्व उपपन्न नहीं है, क्योंकि ब्रह्मकी नित्य ज्ञानक्रिया होनेके कारण ज्ञानक्रिया के प्रति उसकी स्वतन्त्रता असम्भव है। इस विषय में कहते हैं - परन्तु पहले तो आप यह बताइए कि नित्य ज्ञानक्रिया के होनेपर सर्वज्ञ ताकी हानि किसप्रकार होगी? सब पदार्थोंके प्रकाश करनेकी सामर्थ्य रखने वाला जिसका ज्ञान नित्य है और वह स्वयं असर्वज्ञ है, यह कथन विरुद्ध है!
यदि ज्ञानको ही अनित्य मानें तो कभी जानता है और कभी नहीं जानता है इसप्रकार ब्रह्म असर्वज्ञ भी होगा? परन्तु ज्ञानके नित्यत्व पक्ष में यह दोष नहीं है।
यदि कहो कि ज्ञानको नित्य माननेपर ज्ञानविषयक ( ब्रह्म में ) स्वातन्त्र्य व्यपदेश अनुपपन्न है, तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि निरन्तर स्थायी उष्णता और प्रकाश से युक्त सूर्यमें भी जलाता है प्रकाश करता है इसप्रकार स्वतन्त्र शब्द व्यवहार देखा जाता है | यदि कहो कि सूर्यका दाह्य तथा प्रकाश्य पदार्थोंके साथ संयोग होनेपर जलाता है प्रकाश करता है ऐसा व्यपदेश होता है, तो यहां जगत्की उत्पत्तिके पहले ब्रह्मके ज्ञानका कर्मके साथ संयोग ( सम्बन्ध ) ही नहीं है, इससे यह दृष्टान्त विषम है।
यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि कर्मके न होनेपर अर्थात् कर्मके अविवक्षित होनेपर भी ' सूर्य प्रकाश करता है ' जैसे सूर्यमें कर्तृत्व व्यपदेश हो सकता है, वैसे ही ज्ञानका कर्म न होनेपर भी ' तदैक्षत ' इसप्रकार ब्रह्ममें कर्तृत्व व्यपदेश हो सकता है। इसलिए सूर्यके दृष्टान्तसे कोई वैषम्य नहीं है। कर्मकी अपेक्षामें तो ब्रह्म में ईक्षणकर्तृत्व प्रतिपादक श्रुतियाँ सुतरां उपपन्न हैं। यदि पूछो कि वह कर्म क्या है जो कि उत्पातके पहले ईश्वरके ज्ञानका विषय होता है?
हम कहते हैं - जो सत् और असत्से विलक्षण अनिर्वचनीय है, और है तो अव्याकृत ( अव्यक्त ) परन्तु व्याकृत ( अभिव्यक्त ) करने के लिए इष्ट है वह नाम, रुप ही तो कर्म है। योग शास्त्रवेत्ता भी यही कहते हैं कि जिस ईश्वरके प्रसादसे ही योगी पुरुषोंको भी जब भूत और भविष्यत् विषयक प्रत्यक्ष ज्ञान होता है तो उस नित्य स्वयं सिद्ध ईश्वरका जगत्की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार विषयक ज्ञान नित्य हो, इस विषय में तो फिर कहना ही क्या है।
जो यह कहा गया है कि उत्पत्तिके पहले शरीरादिके साथ सम्बन्धके विना ब्रह्म में ईक्षणकर्तृत्व अनुपपन्न हैं। इस आक्षेपका अवकाश नहीं है, क्योंकि ब्रह्मका ज्ञानस्वरूप सूर्यप्रकाशके समान नित्य है, अत : उसे ज्ञानके लिए साधनोंकी अपेक्षा नहीं हो सकती, और अविद्यादि युक्त संसारी जीवको ज्ञानोत्पत्ति में भले ही शरीरादिकी अपेक्षा हो, परन्तु ज्ञान प्रतिबन्धक कारणोंसे रहित ईश्वरको ज्ञान होनेमें शरीरादि की अपेक्षा नहीं है।
क्योंकि ' न तस्य ० ' ( उस परमात्मा के कार्य ( शरीर ), करण ( नेत्रादि इन्द्रिय ) नहीं हैं, उसके समान और उससे अधिक कोई देखने में नहीं आता।
उस ईश्वरकी मायारूप पराशक्ति स्वभावसे ही ज्ञान, बल तथा क्रिया भेदसे विविधरूपसे श्रुतियोंमें प्रतिपादित है ) तथा ' अपाणिपादो ० ' ( वह हाथ, पैसे रहित होकर भी अतिवेगवान् और ग्रहण करनेवाला है, नेत्र रहित होकर भी देखता है और श्रोत्र रहित होकर भी सुनता है, वह सम्पूर्ण वेद्यवर्गको जानता है, किन्तु उसे जाननेवाला कोई नहीं उसको प्रथम पुरुष - पूर्णं और महान् कहते हैं ) ये दो मन्त्र ईश्वरको शरीरादिकी अनपेक्षता और अनावरणज्ञानता दिखलाते हैं।
परन्तु तुम्हारे मतमें तो ईश्वरसे भिन्न ज्ञान प्रतिबन्धक कारणवाला कोई संसारी है ही नहीं, क्योंकि ' नान्यो ० ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है उससे अन्य विज्ञाता नहीं है ) ऐसी श्रुति है। तो यह कैसे कहते हो कि जीवको ज्ञानोत्पत्तिमें शरीरादिकी अपेक्षा है और ईश्वरको नहीं?
इसपर कहा जाता है - यद्यपि यह सत्य है कि ईश्वरसे अन्य संसारी नहीं है, तो भी जैसे घट, करक ( कमण्डलु ), गिरि गुफा आदि उपाधियोंके साथ आकाशका सम्बन्ध है, वैसे ही देहादि सङ्घातरूप उपाधिके साथ ( ईश्वरका ) सम्बन्ध इष्ट ही है।
जैसे आकाशसे अभिन्न होनेपर भी उपाधि सम्बन्ध कृत घदाकाश, करकाकाश आदि शब्द व्यवहार और ज्ञान व्यवहार लोकमें देखे गये हैं और उपाधि सम्बन्ध कृत घटाकाशादि भेदरूप मिथ्याबुद्धि आकाशमें देखी गई है, वैसे यहाँ भी देहादि . सङ्घातरूप उपाधिके साथ सम्बन्धके अविवेकसे उत्पन्न हुई ईश्वर और संसारीकी भेदरूप मिथ्याबुद्धि है। सङ्घातसे अतिरिक्त आत्माका देहादि सङ्घातरूप अनात्मपदार्थोंमें आत्मत्वका अभिनिवेश पूर्वं पूर्व मिथ्याबुद्धिसे ही देखा जाता है।
और इस प्रकार संसारित्वके सिद्ध होने पर संसारीमें देहादिकी अपेक्षा करनेवाला ईक्षितृत्व युक्त है। यह जो कहा गया है कि मृत्तिकादिके समान अनेकात्मक होनेसे प्रधान जगत्का कारण हो सकता है, परन्तु अकेला ब्रह्म नहीं, वह तो ' प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है ' ६ ससे ही निराकृत हो गया। जिस प्रकार युक्तिसे ब्रह्म ही जगत्का कारण हो सकता है प्रधानादि नहीं, यह सब ' न विलक्षणत्वादस्य ' इत्यादि सूत्रोंद्वारा विस्तारपूर्वक कहेंगे॥ ५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — चतुः सूत्री समाप्ता।
* किञ्च सूत्रकारने " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा " इस मूत्रसे जो ब्रह्मविषयक जिज्ञासाकी प्रतिज्ञा की है, वह ब्रह्म क्या वस्तु है? इस शंकाके समाधानमें सूत्रकारने “ जन्माद्यस्य यतः " इस द्वितीय सूत्रसे लेकर “ तत्तु समन्वयात् ” इस चतुर्थ सूत्र तक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् तथा जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और नाशका जो कारण है वही ब्रह्म है, यद्यपि ऐसा सूचित किया है, तथापि सूत्रकारने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया कि ब्रह्म चेतन ही इस जगत् का उपादान कारण है अथवा अचेतन?
इसलिए तो यहाँ सन्देह होता है कि क्या जगत्का उपादानकारण चेतन है अथवा अचेतन? इस विषयमें सांख्य कहते हैं - ब्रह्म, कूटस्थ और विकाररहित है, उसका परिणाम होना तो असम्भव है, क्योंकि यह अनुभव सिद्ध भी है कि कार्य कारणमें विकार लाए बिना उत्पन्न ही नहीं होता अर्थात् अपने अस्तित्वको सिद्ध नहीं कर पाता। इसलिए " सर्गाद्यं कार्यं जड़ प्रकृतिकं कार्यत्वात् घटवत् " ( सृष्टि आदि कार्य कार्य ( जन्य ) होनेके कारण जड़ प्रकृतिवाला है, जैसे घट।
) इस अनुमानसे प्रधान आदि जड़ कारणोंकी सिद्धि होती है ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि जगत् के उत्पत्ति आदिके प्रतिपादक वेदान्तवाक्य भी अनुमानद्वारा कार्यसे कारणका ज्ञान कराते हुए प्रधान आदि जड़ कारणोंका प्रतिपादन करते हैं। प्रलयकाल में सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणकी साम्यावस्थाको वे प्रधान कहते हैं। वही प्रधान, पुरुष और इनका संयोग नित्य अनुमेय हैं।
यथा “ यज्जडं तच्चेतनसंयुक्तं यथा रथादि ” ) जो जड़ होता है वह चेतनसे युक्त होता है, जैसे रथ सारथिसे युक्त होता है, वैसे ही जड़ प्रधान भी चेतन पुरुषसे युक्त होना चाहिए )। इस प्रकार पुरुष, प्रधान और इनका संयोग नित्य अनुमेय ही हैं।
* वेदान्तमतमें सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ब्रह्म जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान करण है और सांख्य मतमें प्रधान कर्तृकारण है। अब भगवान् माष्यकार इस उक्त मतके विरोधी अन्य मतका ' काणादास्तु ' इत्यादिसे उल्लेख करते हैं। कणाद के अनुयायी ऐसा मानते हैं कि " यत्कार्यं तत्बुद्धिसकर्तृकम् ” ( जो कार्य है वह बुद्धिमान् कर्तासे जन्य है, जैसे घट। ) क्योंकि चेतन कर्ता में कार्यानुकूल ज्ञान, इच्छा तथा प्रयत्न होते हैं, किन्तु जड़ प्रधान आदिमें कार्यानुकूल ज्ञान आदि नहीं होते, अतः जड़ प्रधानको जगत्का कर्तृकारण मानना अयुक्त है, किन्तु चेतनको ही इस जड़ जगत्का कर्तृकारण मानना चाहिए। यद्यपि बुद्धि आदि गुणोंसे युक्त जीव चेतन है और घट आदि कार्यका कर्ता भी है, फिर भी अल्पज्ञ और अल्प शक्ति आदि युक्त होने से इस विचित्र, विशाल संसार के निर्माण आदि करनेमें वह सर्वथा असमर्थ है। अतः ‘ यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंके आधारपर जगत्के उत्पत्ति आदिका निमित्तकारण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर है। वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के परमाणु इस कार्य जगत् के प्रति उपादान कारण हैं।
शून्यवादी बौद्ध - " असदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् " ( छा ० ६।२।१ ) ( आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय असत् ही था ) इत्यादि श्रुति वाक्योंके आधारपर इस जगत्का उपादान कारण शून्यको मानते हैं। और " यत् वस्तु तत् शून्यावसानं यथा दीपः " जो वस्तु है वह अन्त में शून्यमें लीन होती है, जैसे दीपक।
इस प्रकार वाक्याभास और युक्त्याभासोंका अवलम्बनकर वादी भिन्न - भिन्न मतोंके द्वारा विरोध प्रदर्शित करते हैं। तब पद ( व्याकरण ) वाक्य ( मीमांसा ) प्रमाण ( न्याय ) आदि शास्त्रों में पारंगत भगवान् विष्णुके ज्ञानशक्ति अवतार + आचार्य भगवान् व्यास वेदान्त वाक्य ब्रह्म परक हैं, यह दिखलाने के लिए उन विरोधों का उल्लेख करते हैं। अब भगवान् भाष्यकार उनमें से प्रथम ' तत्र ' आदिसे सांख्यमतका उल्लेख करते हैं। * ' मूलप्रकृतिरविकृतिमहदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः॥ ' ( सां ० का ० ३ ) ( मूल प्रकृति - प्रधान सबका मूलकारण है वह किसीका कार्य नहीं है अर्थात् इसका कोई कारण नहीं है। सृष्टिकालमें सर्वप्रथम प्रकृतिसे महद् उत्पन्न होता है, महदसे अहंकार, अहंकारसे मन, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं।
महद्, अहंकार और पाँच तन्मात्राएँ ये सात कार्यं और कारण उभयात्मक हैं, अर्थात् महद् प्रधानका कार्य है और अहंकारका कारण भी है, अहंकार महदका कार्य है और एकादश इन्द्रियों और पाँच तन्मात्राओं ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ) का कारण भी है। शब्द आदि पाँच तन्मात्राओंसे आकाश आदि पाँच भूत उत्पन्न होते हैं, इसलिए ये उक्त तन्मात्राएँ आकाश आदि पाँच भूतोंके कारण हैं।
एकादश इन्द्रियाँ और आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये पाँच स्थूलभूत, ये सोलह केवल कार्यं हैं अर्थात् ये तत्त्वान्तरको उत्पन्न नहीं करते, अतः कारण नहीं हैं और चेतन पुरुष तो न कार्य है और न कारण ) इस प्रकार सांख्यमतमें पच्चीस तत्त्व हैं। प्रधान चेतन पुरुषके संयोगसे महदसे लेकर इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको उत्पन्न करता है, इससे स्वकार्यकी अपेक्षा प्रधान में सर्वशक्तिमत्त्व है इसी प्रकार सर्वज्ञत्व भी, अतः वेदान्तवाक्योंकी ' प्रधान जगत्का कारण है ' इस पक्षमें योजना हो सकती है।
* जितना जितना सत्त्वगुणका उत्कर्ष होता है अर्थात् रज़ो और तमोगुणसे जितना जितना अनभिभूत - शुद्ध सत्त्व होता है उतना उतना ज्ञानका भी उत्कर्ष होता है। इस आधारपर योगदर्शन में भी कहा गया है कि ' तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ' ( योग ० १।२५ ) ( उसमें सत्त्वगुणकी निरतिशयताअत्यन्तशुद्धता - रजो और तमोगुणसे अनभिभूतता ही सर्वज्ञताका कारण है ) ' सत्त्वं लघुप्रकाशकम् ' ( सां ० का ० १३ ) ( सत्त्व गुण लाघव युक्त और प्रकाशक है ) और यह लोकप्रसिद्ध भी है कि सत्त्व-
टि ० : - + आचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यपि। स्वयमाचरते यस्मादाचार्यः स उदाहृतः॥ गुणके अत्यन्त उत्कर्षं होनेपर देह और इन्द्रिययुक्त पुरुष योगी सर्वज्ञ होते हैं। उस सत्त्वगुणका अत्यन्त उत्कर्ष प्रधानमें तो है, अतः उसमें सर्वज्ञता मानना युक्त है।
* सि ० - अब यहाँ शंका होती है कि जब सांख्यमत से प्रलयकालमें तीनों गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रधान है तो उस अवस्थामें रज और तम दोनों गुणोंकी समानरूपसे विद्यमानता होनेपर सत्त्वगुणका अत्यन्त उत्कर्ष कैसे हो सकता है और तदाश्रित प्रधानमें सर्वज्ञता किस प्रकार हो सकती है? पू ० — उस अवस्थामें प्रधान त्रिगुणात्मक है इस कारण उसमें सम्पूर्ण ज्ञानका कारणभूत सत्त्वगुण भी है, अतः अचेतन प्रधानमें वेदान्तवाक्योंद्वारा गौणवृत्तिसे सर्वज्ञता कही जा सकती है I। किञ्च वेदान्त प्रतिपाद्य सर्वज्ञब्रह्मको अङ्गीकार करनेवाले तुमको भी ब्रह्मको सर्वज्ञ इसकारण स्वीकार करना होगा कि उसमें सर्वविषयक ज्ञान करनेकी शक्ति है। क्योंकि ब्रह्म सदा ही सब विषयोंका ज्ञान करता हुआ नहीं रहता। प्रलयकालमें अनित्य ज्ञानका तो नाश हो जाता है। किन्तु सत्त्वगुण में सर्वज्ञताकी स्वरूप योग्यता रहती है, अतः उसका उत्कर्ष होनेपर ईश्वर सर्वज्ञता प्राप्त कर लेगा। इसलिए सत्त्व-
सर्वज्ञताकी शक्ति अवश्य माननी चाहिए।
* सांख्यमतमें जड़ प्रधान ही जगत्का कर्तृकारण है और पुरुष पुष्करपलाशवत् निर्लेप है। पुरुषके भोग तथा अपवर्ग ( मोक्ष ) के लिए प्रधान सृष्टि करनेमें प्रवृत्त होता है। प्रधान जड़ है, अतः एकाकी कुछ करनेमें समर्थ नहीं है और पुरुष असंग है, वह भी एकाकी कारण नहीं हो सकता। इसलिए प्रधान पुरुषके संयोगसे सृष्टि करनेमें प्रवृत्त होता है। जैसे सभा में नर्तकी अपना नृत्य दिखाकर हट जाती है, वैसे प्रधान भी पुरुषको अपना प्रपञ्च दिखाकर अर्थात् भोग और अपवर्ग संपादन कर निवृत्त हो जाता है।
' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' वस्तुतः पुरुष असंग होनेसे बन्ध और मोक्षसे रहित है। धर्म, अधर्म, ज्ञान, अज्ञान, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य और अनैश्वर्य इन स्वभाव सिद्ध भावोंसे युक्त प्रधानका ही बन्ध और मोक्ष है, केवल पुरुषमें उनका व्यवहार मात्र होता है। जैसे सेवकके जय, पराजयका स्वामीमें गौण व्यवहार होता है, वैसे ही प्रधानके बन्ध और मोक्षका पुरुषमें केवल गौण व्यवहार होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जगत्का कारण प्रधान है।
गत अधिकरणमें सर्ववेदान्त प्रतिपाद्य ब्रह्मको ही जगत्का कारण कहा गया है, परन्तु वह कूटस्थ होने के कारण जगत्का कारण नहीं हो सकता, अपितु ज्ञान क्रिया शक्ति युक्त त्रिगुणात्मक प्रधान ही जगत् का कारण है, इसप्रकार आक्षेपसङ्गतिसे पूर्वपक्ष होनेपर इस अधिकरणका आरम्भ किया जाता है।
* कलाओंसे रहित वह निष्फल पुरुष मायारूप उपाधिसे कलावान्की तरह प्रतीत होता है।
' ईक्षांचक्रे ' ( उपाधियुक्त उस षोडशकल पुरुषने ईक्षण किया कि किस कर्ता विशेषके देहसे उत्क्रमण करनेपर मैं भी देहसे उत्क्रमण कर जाऊँगा और जिसके देहमें स्थित रहनेपर मैं भी देह में स्थित रहूँगा ) इसप्रकार पुरुषने ईक्षणकर ' सं प्रणमसृजत प्राणाच्छ्राद्धां खं वायुर्ज्येतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ' ( प्रश्न ० ६।८ ) ( उस पुरुषने प्राण ( हिरण्यगर्भ ) की सृष्टिकी, फिर प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन और अन्नको तथा अन्नसे वीर्य, तप, मन्त्र ( ऋग्वेदादि ), कर्म ( अग्निहोत्रादि ) और लोकोंको एवं लोकोंमें ( देवदत्तादि ), नामको उत्पन्न किया ) यह षोडशकला विषयक श्रुति है।
यद्यपि ' इक्तिपौ धातुनिर्देशे ' ( इक् और तिप् प्रत्यय धातुके निर्देशमें होते है ) इस कात्यायन वचनके अनुसार ' तिप् ' प्रत्ययान्त ' ईक्षति ' शब्द ' ईक्ष ' धातुका वाचक है, तथापि ' इतिकर्तव्यताविधेः यजतेः पूर्ववत्त्वम् ' ( ' ७ | ४ | १ ) जैमिनिसूत्र में जैसे ' यजति ' पद ' यज ' धातुको न कहकर लक्षणा से धात्वर्थं यागका बोध है, वैसे यहाँ भी ' ईक्षति ' पद ' ईक्ष ' धातु को न कहकर धात्वर्थ ईक्षणका बोधक है।
* प्रधानमें सत्त्वगुणका उत्कर्षं तब होता जब उसके प्रतिबन्धक रजो और तमोगुण समान रूपसे विद्यमान न होते। इतना होनेपर भीं यदि अभिनिवेश से प्रधानको सर्वज्ञ कहो तो अवश्य अल्पज्ञ भी कहना होगा, क्योंकि प्रलय में प्रवर्तक रजोगुण और आवरक तमोगुणका भी तो समान उत्कर्ष है। ऐसी परिस्थिति में अल्पज्ञता और सर्वज्ञता परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मं युगपत् प्रधानमें कैसे रहेंगे? यदि कहो कि प्रधानावस्था में केवल सत्त्वगुणका ही उत्कर्ष होता है अन्य गुणोंका नहीं, तो यह कथन केवल साहसमात्र है, क्योंकि इसमें कोई नियामक नहीं। साक्षोके विना केवल सत्त्वगुणकी वृत्ति भी ज्ञान नहीं होती, कारण कि वह जड़ है। साक्षी चेतनसे प्रतिबिम्बित चित्तवृत्तिको ज्ञान कहा जाता है और उसीसे वस्तुका ज्ञान होता है। अचेतन प्रधान भी साक्षी नहीं है, इस कारण प्रधान में सर्वज्ञत्त्व भी असंभव है। योगी पुरुष तो चेतन हैं, अतः उनमें सत्त्वगुणके उत्कर्ष और अन्य गुणोंके अपकर्षके कारण सर्वज्ञता हो सकती है। इसलिए प्रधानके विषय में सत्त्व उत्कर्ष युक्त योगी पुरुष सर्वज्ञ होते हैं, यह उदाहरण ठीक नहीं है, क्योंकि प्रधान अचेतन है और योगी पुरुष चेतन हैं।
* अब ईश्वरवादी पातञ्जलमतका ' अथ पुनः ' इत्यादिसे दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् भाष्यकार निराकरण करते हैं।
* सर्वज्ञत्वका अर्थं सर्वविषयक ज्ञान है ज्ञानकर्तृत्व नहीं अर्थात् सभी पदार्थोंको जानना ही सर्वज्ञता है, क्योंकि ईश्वर ज्ञानको किसी करण ( प्रयत्न ) द्वारा उत्पन्न नहीं करता प्रत्युत वह तो नित्य है। नित्यत्वके साथ व्यापकत्वका अविनाभाव सम्बन्ध है। ज्ञान नित्य होनेके कारण ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी हानि कदापि नहीं हो सकती। यदि ज्ञानको अनित्य मानें तो ब्रह्म में असर्वज्ञता आ सकती है जैसे संसारी जीवोंमें देखी जाती है। परन्तु ज्ञानके नित्य होनेसे ब्रह्ममें अल्पज्ञता दोष भी नहीं है।
* शंका – - यदि ज्ञानको नित्य मानें तो नित्य ज्ञानके प्रति ब्रह्म स्वतन्त्र नहीं होगा, इसके साथ ' सर्वं जानातीति सर्वज्ञः ' ( जो सभीको जानता है वह सर्वज्ञ है ) यह सर्वज्ञताकी सर्वमान्य
i व्युत्पत्ति है | यदि ब्रह्ममें ज्ञानकर्तृत्व मानें तो यह व्युत्पत्ति कैसे सिद्ध होगी? समाधान - यद्यपि शुद्ध प्रकाशस्वरूप ज्ञान नित्य है, तथापि जैसे नैयायिक आकाशको नित्य मानते हुए भी अनित्य घटादि उपाधि अनित्य मानते हैं, क्योंकि ' घटाकाशो जातः ' ऐसा व्यवहार होता है, वैसे तत्, तत् विषयरूप उपाधियोंसे युक्त होनेके कारण ब्रह्मस्वरूपसे उसमें भेदकी कल्पनाकर अनित्यत्वका गौण व्यवहार होता है। इसप्रकार अनित्यज्ञान के प्रति ब्रह्म में कर्तृत्व व्यवहार हो सकता है। जैसे सदा ही उष्ण और प्रकाशरूप होनेपर भी सूर्यमें दाह और प्रकाशरूप क्रियाके प्रति कर्तृत्व व्यवहार होता है, ठीक वैसे ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्ममें भी ' तदैक्षत ' यह ईक्षणरूप ज्ञानकर्तृत्व व्यवहार माना जाता है।
* इसप्रकार निरीश्वरवादी सांख्यके प्रति ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व सिद्धकर अब ईश्वरवादी पातञ्जल मतावलम्बियोंके प्रति ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व सिद्ध किया जाता है। पातञ्जल मतानुसार ' क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर : ' ( यो ० सू ० १।२४ ) ( अविद्या, अस्मिता ( अहंकार ) राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश हैं, ये क्लेश - दुःख देते हैं, अतः क्लेश कहे जाते हैं, शुभ, अशुभ और मिश्रित भेदसे कर्म तीन प्रकारके हैं, विपाक - कर्मफल ( जन्म, आयु और भोग ) | कर्म फलोंसे चित्त में उत्पन्न वासना - संस्कार - आशय हैं, इन सभीसे असम्बन्धित संसारी पुरुषोंसे विलक्षण ईश्वर है ) यह ईश्वरका लक्षण है। ' ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ' ( यो ० सू ० १।२ ९ ) ईश्वर के प्रणिधानसे व्याधि आदि विघ्न निवृत्त हो जाते हैं और योगीको अन्तरात्माका दर्शन होता है ) यह ईश्वर उपासनाका फल है। ‘ भक्तिविशेषादावर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति ज्ञानवैराग्यादिना ' ( उपासना विशेषसे प्रसन्न हुआ ईश्वर उस योगीपर ज्ञान और वैराग्य आदिसे अनुग्रह करता है ) इसप्रकार जब ईश्वर अनुग्रहसे योगीको इतना ज्ञान प्राप्त होता है तो ईश्वरके नित्यज्ञानमें शंकाका अवकाश ही कहाँ है?
* शङ्का — प्रकाशमें अन्धकारके समान अखण्ड चिद्रूप आत्मामें जब अविद्यारूप अविवेक ही सिद्ध नहीं हो सकता, तो फिर अविद्याके अधीन संसारित्वकी सिद्धि कैसे हो सकती है? समाधान - पूर्व पूर्व अनुभवजन्य संस्कारोंद्वारा भ्रान्तिरूप मिथ्याबुद्धिसे देहादि अनात्मपदार्थोंमें ' मैं मनुष्य हूँ ' • इत्यादि जो आत्मत्व अभिमान है वह अविद्यांसे कल्पित है। सामान्य चेतनात्मा अविद्याका विरोधी नहीं, अपितु उसका पोषक है। जैसे सामान्य अग्नि वृक्षादिका पोषक है 1
। विशेषरूप से अभिव्यक्त वही अग्नि वृक्षादिका दाहक है, वैसे ही ' तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे उत्पन्न चेतनप्रतिबिम्बित ब्रह्माकार अन्तःकरणकी वृत्ति ( विद्या ) अविद्याकी निवर्तिका है, इसलिए आत्मामें अविद्यारूप अविवेक सिद्ध है। इससे अविद्या में प्रतिबिम्बित चेतनरूप जीव भी सिद्ध है। इस प्रकार ईश्वर से अन्य संसारी सिद्ध होनेसे उसे ईक्षणके लिए देहादि साधनों की अपेक्षा है किन्तु ईश्वरको नहीं॥ ५
1.1.6 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ६
गौणश् चेन् नात्मशब्दात् ॥ १.१.६ ॥
पदच्छेद — गौणः , चेत् , न , आत्मशब्दात्
सूत्रार्थ — ( गौणः ) प्रधानमें ईक्षितृशब्द गौण है, ( चेन्न ) यदि ऐसा कहो तो यह युक्त नहीं है, ( आत्मशब्दात् ) क्योंकि ' एतदात्म्यम् ' श्रुतिसे जगत् कारणमें आत्मशब्दका प्रयोग किया गया है। इसलिए चेतन ही जगत्का कारण है।
शाङ्करभाष्य
यदुक्तं प्रधानमचेतनं सच्छब्दवाच्यं तस्मिन्नौपचारिकमीक्षितृत्वम् अप्तेजसोरिवेति तदसत्। कस्मात् आत्मशब्दात् सदेव सोम्येदमग्र आसीत् इत्युपक्रम्य तदैक्षत तत्तेजोऽसृजत इति च तेजोबन्नानां सृष्टिमुक्त्वा तदेव प्रकृतं सदीक्षितृ तानि च तेजोबन्नानि देवताशब्देन परामृश्याह सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि इति।
तत्र यदि प्रधानमचेतनं गुणवृत्त्येक्षितृ कल्प्येत तदेव प्रकृतत्वात् सेयं देवता इति परामृश्येत न तदा देवता जीवमात्मशब्देनाभिदध्यात्। जीवो हि नाम चेतनः शरीराध्यक्षः प्राणानां धारयिता तत्प्रसिद्धेर्निर्वचनाच्च। स कथमचेतनस्य प्रधानस्यात्मा भवेत्। आत्मा हि नाम स्वरूपम्। नाचेतनस्य प्रधानस्य चेतनो जीवः स्वरूपं भवितुमर्हति। अथ तु चेतनं ब्रह्म मुख्यमीक्षितृ परिगृह्येत तस्य जीवविषय आत्मशब्दप्रयोग उपपद्यते।
तथा स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद्र्वं तत्सत्य् आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इत्यत्र स आत्मा इति प्रकृतं सदणिमानमात्मानमात्मशब्देनोपदिश्य तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति चेतनस्य श्वेतकेतोरात्मत्वेनोपदिशति। अप्तेजसोस्तु विषयत्वादचेतनत्वम् नामरूपव्याकरणादौ च प्रयोज्यत्वेनैव निर्देशात् न चात्मशब्दवत्किंचिन्मुख्यत्वे कारणमस्तीति युक्तं कूलवद्गौणत्वमीक्षितृत्वस्य। तयोरपि सदधिष्ठितत्वापेक्षमेवेक्षितृत्वम्। सतस्त्वात्मशब्दान्न गौणमीक्षितृत्वमित्युक्तम्।।
अथोच्येत अचेतनेऽपि प्रधाने भवत्यात्मशब्दः आत्मनः सर्वार्थकारित्वात् यथा राज्ञः सर्वार्थकारिणि भृत्ये भवत्यात्मशब्दः ममात्मा भद्रसेनः इति। प्रधानं हि पुरुषस्यात्मनो भोगापवर्गौ कुर्वदुपकरोति राज्ञ इव भृत्यः संधिविग्रहादिषु वर्तमानः। अथवैक एवात्मशब्दश्चेतनाचेतनविषयो भविष्यति भूतात्मा इन्द्रियात्मा इति च प्रयोगदर्शनात् यथैक एव ज्योतिःशब्दः क्रतुज्वलनविषयः। तत्र कुत एतदात्मशब्दादीक्षतेरगौणत्वमित्यत उत्तरं पठति
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसपर पूर्वपक्षी कहता है— जो यह कहा गया है किं कारणमें ईक्षितृत्वका श्रवण होनेसे अचेतन प्रधान जगत्का कारण नहीं है, वह अन्य प्रकार से भी उपपन्न होता है, क्योंकि अचेतनमें भी गौणवृत्तिसे चेतनका - सा व्यवहार देखा जाता है।
जैसे नदीका तट नीचेसे [ मिट्टीके बह जानेके कारण ] टूटकर जल्दी गिरता देखकर [ कोई कहे ] तट गिरना चाहता है, तो यहाँ अचेतन तटमें जैसे चेतनकासा व्यवहार देखने में आता है, वैसे ही सृष्टि समीप होनेपर अचेतन प्रधानमें मी ' उसने ईक्षण किया ' . इसप्रकार चेतनका - सा व्यवहार हो जायगा। अथवा लोकमें जैसे कोई पुरुष स्नानानन्तर भोजनकर अपराह्न में रथसे ग्राम जाऊँगा, इस प्रकारका ईक्षणकर अनन्तर नियमसे वैसे ही प्रवृत्त होता है, वैसे ही प्रधान भी महद् आदिके आकारसे नियमतः प्रवृत्त ( परिणत ) होता है।
इसलिए उसमें चेतनकासा उपचार किया जाता है। परन्तु प्रधानमें मुख्य ईक्षितृत्व ( ईक्षण कर्तृत्व ) का त्यागकर गौणकी कल्पना क्यों की जाती है?
यदि कहो कि ' तत्तेजो ० ' ( उस तेजने ईक्षण किया ) ' ता आप ० ' ( उस जलने ईक्षण किया ) इस प्रकार जैसे अचेतन तेज और जलमें चेतनके समान उपचार देखने में आता है, अतः सत्कर्तृक ईक्षण भी औपचारिक है, ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि उपचार प्रचुर प्रकरणमें उसका कथन है अर्थात् जिस प्रकरणमें बहुत स्थलोंमें गौण अर्थ माना जाता है उसी प्रकरणमें पठित होनेसे इसमें भी गौण ईक्षण होना चाहिए। इसप्रकार पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर इस सूत्र का आरम्भ किया जाता है-
जो यह कहा गया है कि अचेतन प्रधान सत् शब्द वाच्य है, उसमें जल और तेजके समान ' ईक्ष ' धातुका प्रयोग औपचारिक है। वह ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुतिमें आत्मशब्द है। जैसे ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य!
आरम्भमें यह केवल सत् ही था ) ऐसा आरम्भ कर ' तदैक्षत ' ( उसने ईक्षण किया, उसने तेज उत्पन्न किया ) इसप्रकार तेज, जल और अन्नकी सृष्टि कहकर उस ईक्षिता प्रकृत सत्का तथा इन तेज, जल और अन्नका देवता शब्दसे परामर्श कर पुनः ' सेयं देवता ० ' ( उस सत् नामवाले देवताने ईक्षण किया कि अब मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेशकर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ ) ऐसा कहा है।
यदि इस ईक्षण वाक्यमें अचेतन प्रधानको गौणवृत्तिसे ईक्षणकर्ता माना जाय तो प्रकृत होनेसे ' सेयं देवता ' इस श्रुतिमें उसीका परामर्श होगा? ऐसा मानें तो ' सेयं देवता ' ' अनेन जीवेनात्मना ' वह देवता जीवका आत्मशब्द से अभिधान नहीं करेगा। क्योंकि जीव चेतन शरीरका स्वामी और प्राणोंका धारण करनेवाला है, यह अर्थ लोक प्रसिद्धि और व्युत्पत्ति के अनुसार है। वह चेतन जीव अचेतन प्रधानका आत्मा किस प्रकार होगा? आत्माका अर्थ स्वरूप है, अतः सुतरां चेतन जीव अचेतन प्रधानका स्वरूप नहीं हो सकता।
यदि चेतन ब्रह्म मुख्य ईक्षिता ग्रहण किया जाय तो वहाँ उस ( पर देवता ) का जीवविषयक आत्मशब्दका प्रयोग युक्त है। इसी प्रकार ' स य एषो ० ' ( जो यह सद्रूप है वह अतिसूक्ष्म है, एतद्रूप ही यह सब है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतु! वह तू है ) इस श्रुतिमें ' वह आत्मा है ' इस प्रकृत सत्संज्ञक अतिसूक्ष्म आत्माका आत्मशब्द से उपदेशकर ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ० ' ( हे श्वेतकेतु! वह तू है ) इसप्रकार श्रुति चेतन श्वेतकेतुको आत्मशब्द से उपदेश करती है।
जल और तेजमें विषयता होनेसे अचेतनत्व है। नाम रूपकी सृष्टि आदि करनेमें [ जल और तेजका ] प्रयोज्यरूपसे निर्देश है। आत्मशब्दके समान उन ( जल और तेज ) का मुख्य ईक्षितृत्व माननेमें कोई कारण नहीं है। जल और तेजका ईक्षितृत्व तो नदीतटके गिरने की इच्छा के समान गौण होना युक्त है। दोनोंका ईक्षितृत्व भी लक्षणावृत्तिसे सद्रूप अधिष्ठानकी अपेक्षासे ही है, और यह कहा गया है कि आत्मशब्दके प्रयोगके कारण सत्का ईक्षितृत्व गौण नहीं है॥ ६
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे अचेतन तेज और जलमें ईक्षण गौण है, वैसे ही अचेतन प्रधानमें भी ईक्षण गौण है। इस सांख्य मतका भगवान् सूत्रकार और भाष्यकार खण्डन करते हैं- सेयं देवतैक्षत ' इस श्रुतिमें ईक्षण कर्ताको ' अनेन जीवेनात्मना ' इसप्रकार आत्मशब्दसे निर्देश किया गया है। और इसी श्रुति में जगत् की उत्पत्तिका ईक्षण करनेवाले सद्रूप ब्रह्मका तथा तेज, जल और अन्न ( पृथिवी ) का देवता शब्दसे ग्रहण किया गया है। ' सेयं देवतैक्षत ० ' इस श्रुतिमें देवता पदका दो वार निर्देश पाया जाता है ' सेयं देवता ' और ' तिस्रो देवता ' इसका तात्पर्य यह है कि प्रथम देवता शब्दसे सद्रप चैतन्य ब्रह्मका और दूसरे देवता शब्दसे अपंचीकृत तेज, जल और अन्नका ग्रहण है। सृष्टिके पहले अव्याकृत होने के कारण ये तीनों अस्मदादिसे प्रत्यक्षके अयोग्य थे, अतः जगत् के कारणभूत सद्रूप चेतन देवताने संकल्प किया कि ' अनेन जीवेनात्मना ० ' पूर्व सृष्टिका अनुभव करनेवाला स्वरूपभूत जीवात्मरूपसे मैं अव्याकृत तेज, जल और अन्न तीनोंमें अनुप्रवेशकर इनको अभिव्यक्त करूँ। इन तीनोंमें जीवात्मरूपसे ब्रह्म देवताका वास होनेके कारण देवता शब्दका गौण प्रयोग किया गया है अथवा मोगके साधन होने से इनका देवताशब्दसे गौण निर्देश किया गया है।
* ' जीव प्राणधारणे ' ' जीवति प्राणान्धारयतीति जीवः ' ( जीता है और प्राणोंको धारण करता है वह जीव है ) इस व्युत्पत्ति और लोक प्रसिद्धिके अनुसार जीव चेतन सिद्ध होता है। आत्मा शब्दका अर्थ स्वरूप है, अतः यह स्पष्ट है कि चेतन जीव अचेतन प्रधानका
स्वरूप नहीं हो सकता।
वेदान्त सिद्धान्तमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद औपाधिक होनेसे
कल्पित है। जैसे दर्पण में
प्रतीति केवल दर्पणरूप मुखका प्रतिबिम्ब वस्तुतः बिम्बरूप मुखसे भिन्न नहीं है, क्योंकि उसकी पृथक उपाधिकी विद्यमानतासे है, अतः औपाधिक होनेसे दोनोंका भेद कल्पित है,
वैसे ही बिम्बरूप ब्रह्मका
। इसलिए जीव ब्रह्मका अविद्या उपाधिमें प्रतिबिम्ब जीव है और माया उपाधिमें प्रतिबिम्ब ईश्वर है भेद औपाधिक होने से कल्पित है वास्तविक नहीं, अतः जीव सद्रूप ब्रह्मका
आत्मा ( स्वरूप ) है यह कथन सर्वथा युक्त है। ' स आत्मा तत्त्वमसि ' इस श्रुतिमें ' स ' शब्दके द्वारा
उपक्रममें ' सदेव सोम्य ' इस श्रुति वाक्य में ईक्षण कर्ता सत्का परामर्श किया गया है और उसके
लिए यह आत्मशब्दका प्रयोग है, इस कारण सत् शब्दका अर्थ अचेतन प्रधान नहीं है प्रत्युत चेतन है। अत : ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' यह श्रुति चेतन श्वेतकेतुको सत् आत्मरूपसे उपदेश करती है। यदि यहाँ ' सत् ' शब्दसे प्रधानका ग्रहण किया जाय तो चेतन श्वेतकेतुको तू अचेतन प्रधानरूप है, ऐसा कहना होगा। परन्तु यह युक्त नहीं है।
* चेतन कर्तृक ईक्षण में मुख्यत्वका साधक जैसे आत्मशब्द है, वैसे तेज और जल कर्तृक ईक्षणमें नहीं है, अतः दोनोंका ईक्षितृत्व गौण है। अथवा दोनोंका भी ईक्षितृत्व लक्षणावृत्तिसे सद्रूप अधिष्ठानकी अपेक्षासे है। इस कारण ' तदैक्षत ' इत्यादि श्रुतियोंका मुख्य ईक्षणकर्तृ चेतन ब्रह्म में ही तात्पर्य है, अतः चेतन ब्रह्म हो जगत्का कारण है अचेतन प्रधान नहीं॥ ६
1.1.7 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ७
तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ १.१.७ ॥
पदच्छेद — तन्निष्ठस्य , मोक्षोपदेशात्
सूत्रार्थ — ( तनिष्ठस्य ) सत्में निष्ठा रखनेवाले चेतन पुरुषके लिए ही ' अथ संपत्स्ये ' श्रुतिने ( मोक्षोपदेशात् ) मोक्षका उपदेश किया है।
शाङ्करभाष्य
न प्रधानमचेतनमात्मशब्दालम्बनं भवितुमर्हति स आत्मा इति प्रकृतं सदणिमानमादाय तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति चेतनस्य श्वेतकेतोर्मोक्षयितव्यस्य तन्निष्ठामुपदिश्य आचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये इति मोक्षोपदेशात्। यदि ह्यचेतनं प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् तत् असि इति ग्राहयेत् मुमुक्षुं चेतनं सन्तमचेतनोऽसीति तदा विपरीतवादि शास्त्रं पुरुषस्यानर्थायेत्यप्रमाणं स्यात्। न तु निर्दोषमिदं शास्त्रमप्रमाणं कल्पयितुं युक्तम्।
यदि चाज्ञस्य सतो मुमुक्षोरचेतनमनात्मानमात्मेत्युपदिशेत्प्रमाणभूतं शास्त्रम् स श्रद्दधानतया अन्धगोलाङ्गूलन्यायेन तदात्मदृष्टिं न परित्यजेत् तद्व्यतिरिक्तं चात्मानं न प्रतिपद्येत तथा सति पुरुषार्थाद्विहन्येत अनर्थं वा ऋच्छेत्। तस्माद्यथा स्वर्गाद्यर्थिनोऽग्निहोत्रादिसाधनं यथाभूतमुपदिशति तथा मुमुक्षोरपि स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति यथाभूतमेवात्मानमुपदिशतीति युक्तम्। एवं च सति तप्तपरशुग्रहणमोक्षदृष्टान्तेन सत्याभिसंधस्य मोक्षोपदेश उपपद्यते।
अन्यथा ह्यमुख्ये सदात्मतत्त्वोपदेशे अहमुक्थमस्मीति विद्यात् इतिवत्संपन्मात्रमिदमनित्यफलं स्यात् तत्र मोक्षोपदेशो नोपपद्येत। तस्मान्न सदणिमन्यात्मशब्दस्य गौणत्वम्। भृत्ये तु स्वामिभृत्यभेदस्य प्रत्यक्षत्वादुपपन्नो गौण आत्मशब्दः ममात्मा भद्रसेनः इति। अपि च क्वचिद्गौणः शब्दो दृष्ट इति नैतावता शब्दप्रमाणकेऽर्थे गौणीकल्पना न्याय्या सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गात्। यत्तूक्तं चेतनाचेतनयोः साधारण आत्मशब्दः क्रतुज्वलनयोरिव ज्योतिःशब्द इति तन्न अनेकार्थत्वस्यान्याय्यत्वात्।
तस्माच्चेतनविषय एव मुख्य आत्मशब्दश्चेतनत्वोपचाराद्भूतादिषु प्रयुज्यते भूतात्मा इन्द्रियात्मा इति च। साधारणत्वेऽप्यात्मशब्दस्य न प्रकरणमुपपदं वा किंचिन्निश्चायकमन्तरेणान्यतरवृत्तिता निर्धारयितुं शक्यते। न चात्राचेतनस्य निश्चायकं किंचित्कारणमस्ति। प्रकृतं तु सदीक्षितृ संनिहितश्च चेतनः श्वेतकेतुः। न हि चेतनस्य श्वेतकेतोरचेतन आत्मा संभवतीत्यवोचाम। तस्माच्चेतनविषय इहात्मशब्द इति निश्चीयते।
ज्योतिःशब्दोऽपि लौकिकेन प्रयोगेण ज्वलन एव रूढः अर्थवादकल्पितेन तु ज्वलनसादृश्येन क्रतौ प्रवृत्त इत्यदृष्टान्तः। अथवा पूर्वसूत्र एवात्मशब्दं निरस्तसमस्तगौणत्वसाधारणत्वाशङ्कतया व्याख्याय ततः स्वतन्त्र एव प्रधानकारणनिराकरणहेतुर्व्याख्येयः तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् इति। तस्मान्नाचेतनं प्रधानं सच्छब्दवाच्यम्।। कुतश्च न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम्
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यदि कहो कि जैसे राजाके सब प्रयोजन सिद्ध करनेवाले सेवकमें ' भद्रसेन मेरा आत्मा है ' इसप्रकार आत्मशब्दका प्रयोग होता है, वैसें अचेतन प्रधानमें भी आत्मशब्दका प्रयोग होता है, क्योंकि वह आत्माके सब प्रयोजन सिद्ध करता है। जैसे सन्धि ( मेल ), विग्रह ( युद्ध ) आदि कार्यमें नियुक्त सेवक राजाका उपकार करता है, वैसे ही पुरुष - आत्माके लिए भोग और मोक्षका सम्पादन करता हुआ प्रधान मी आत्माका उपकार करता है। अथवा जैसे एक ही ' ज्योतिः ' शब्द यज्ञ और अग्निमें प्रयुक्त होता है, वैसे एक ही आत्मशब्द चेतन और अचेतनमें प्रयुक्त होगा, क्योंकि ' भूतात्मा, इन्द्रियात्मा ' ऐसे प्रयोग देखने में आते हैं। तो केवल आत्मशब्द के प्रयोगसे ईक्षति ( ईक्ष् धातु ) मुख्य है यह कैसे माना जाय? इसका उत्तर कहते हैं-
अचेतन प्रधान आत्मशब्दका आलम्बन नहीं हो सकता, क्योंकि ' स आत्मा ' ( वह आत्मा है ) इस प्रकार प्रकृत सूक्ष्म सत्को लेकर ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' मोक्ष प्राप्त कराने योग्य चेतन श्वेतकेतुको ' तू सत्स्वरूप है ' इस प्रकार उपदेशकर ' आचार्यवान् ० ' ( आचार्यवान् पुरुष ही सद्रूप ब्रह्मको जानता है, उस आत्मनिष्ठ पुरुषके मुक्त होनेमें उतना ही विलम्ब है जब तक वह देह ( सूक्ष्म देह ) बन्धन से मुक्त नहीं होता उसके अनन्तर तो वह सत्सम्पन्न ( ब्रह्मको प्राप्त ) हो जाता है ) ऐसा मोक्षका उपदेश किया है।
यदि अचेतन प्रधान ही सत् शब्द वाच्य हो तो शास्त्र चेतन मुमुक्षुको ' तदसि ' ( वह तू है ) अर्थात् ' तू अचेतन है ' यदि ऐसा ग्रहण करावे तो इस प्रकार विपरीतवादी शास्त्र पुरुष के अनर्थके लिए होगा, इससे शास्त्र अप्रमाण हो जायगा। परन्तु इस तरह इस निर्दोष शास्त्र में अप्रमाणत्वकी कल्पना युक्त नहीं है।
यदि प्रमाणभूत शास्त्र अज्ञ मुमुक्षुको ' अचेतन अनात्म पदार्थको आत्मा है, ऐसा उपदेश करे तो अन्धगोलाङ्गूलन्याय से [ शास्त्रों में ] श्रद्धा रखनेवाला वह पुरुष इस उपदेश से अनात्म पदार्थो में हुई आत्मदृष्टिका कभी त्याग नहीं करेगा और अनात्मपदार्थोंसे भिन्न! शास्त्र सिद्ध ] आत्माको मी प्राप्त नहीं करेगा, इस तरहसे वह पुरुष अपने परम पुरुषार्थसे भ्रष्ट हो आयगा और अनर्थको प्राप्त होगा।
इस कारण स्वर्ग आदिकी कामना करनेवाले पुरुषको जैसे अग्निहोत्र आदि उपयुक्त साधनोंका शास्त्र उपदेश करता है, वैसे मुमुक्षुके लिए भी ' स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इस प्रकार यथार्थ आत्माका ही शास्त्र उपदेश करता है यह युक्त है।
ऐसा होनेसे तपाये हुए फरसे के पकड़ने से [ चोरीसे ] मुक्त हुए पुरुषकी तरह सत्य में निष्ठा रखनेवाले मुमुक्षुके लिए शास्त्रका मोक्षोपदेश भी उपपन्न है अन्यथा - सदात्मतत्त्वोपदेशको गौण मानें तो ' अहमुक्थम ० ' ( मैं प्राण हूँ ऐसा जाने ) इसके समान यह केवल संपद्रूप और अनित्य फलवाला होगा। और उससे मोक्षोपदेश उपपन्न नहीं होगा। इसलिए परम सूक्ष्म सत् में आत्मशब्द गौण नहीं है।
' भद्रसेन मेरा आत्मा है ' यहाँ तो सेवकके लिए आत्मशब्द गौण है, यह युक्त है, क्योंकि यहाँ स्वामी और सेवकका भेद प्रत्यक्ष है। और यदि कहीं पर गौण शब्द देखा गया हो तो इतने मात्र से शब्दके प्रामाणिक अर्थ में भी गौणत्वकी कल्पना युक्त नहीं है, क्योंकि इस तरहसे तो सर्वत्र शब्दार्थ के सम्बन्ध में अविश्वास प्रसंग होगा।
जो यह कहा गया है कि जैसे ज्योतिः शब्द याग और अग्निमें साधारण है, वैसे ही आत्मशब्द भी चेतन . और अचेतनमें साधारण है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि एक शब्द के अनेक अर्थ मानना अनुचित है | इससे चेतन विषयक ही आत्मशब्द मुख्य है और जो भूतादिमें भूतात्मा, इन्द्रियात्मा इस प्रकार आत्मशब्दका प्रयोग होता है यह तो चेतनत्व के उपचार से होता है।
यदि आत्मशब्द चेतन और अचेतनमें साधारण मानें तो प्रकरण अथवा उपपद किसी एक निश्चायकके विना दोनों में से किस अर्थमें आत्मशब्द प्रयुक्त हैं, इसका निश्चय नहीं हो सकता। और यहाँ अचेतनका निश्चायक कोई हेतु नहीं है, प्रत्युत यहाँ प्रकृत ईक्षणकर्तृ संके सन्निकट चेतन श्वेतकेतु। पठित ] है। अचेतन पदार्थ चेतन श्वेतकेतुका आत्मा ( स्वरूप ) नहीं हो सकता, ऐसा हम कह चुके हैं। इसलिए ऐसा निश्चय किया जाता है कि यहाँ आत्मशब्द चेतन विषयक ही है।
ज्योतिः शब्द भी लौकिक प्रयोगसे प्रसिद्ध अग्नि हो मुख्य है, परन्तु अर्थवादसे कल्पित अग्निके सादृश्यसे यागमें प्रवृत्त होता है, अतः यह दृष्टान्त ठीक नहीं है | अथवा [ गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ] इस पूर्व सूत्रमें ही आत्मशब्दका गौणत्व, साधारणत्व विषयक सब शङ्काओं का निराकरण कर व्याख्यान किया गया है। इसलिए ' तन्निष्टस्य ’ यह सूत्र प्रधान कारणवादके निराकरणार्थ स्वतन्त्र हो हेतु है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए। इससे अचेतन प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है।। ७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपक्षीने राजा और सेवकका उदाहरण देकर प्रधानमें आत्मशब्द और तत्प्रयुक्त ईक्षण भी गौण सिद्ध किया है। परन्तु अब ' अथवा ' इत्यादिसे प्रधानमें आत्मशब्द और ईक्षितृत्व दोनों मुख्य सिद्ध करता है।
* पहले पूर्वपक्षीद्वारा अचेतन प्रधानमें गौण अथवा मुख्यरूपसे आत्मशब्दका प्रयोग सिद्ध करनेके लिए किया गया सारा प्रयास व्यर्थ है, इसे ' न ' आदि भाष्यसे कहते हैं।
* अब भगवान् भाष्यकर एक ऐसा स्पष्टीकरण उपस्थित करते हैं जिससे सुतरां यह निर्णय किया जा सकता है कि आत्मशब्दसे प्रधानका कभी ग्रहण सम्भव नहीं। यह तो मानी हुई बात है कि सांख्यमतमें प्रधान अचेतन है और आत्मशब्दका मुख्यार्थ चेतन हैं। फिर भी यदि सत् शब्दका वाच्यार्थ प्रधानको मानें तो ' तत्त्वमसि ' इसमें ' तत् पदसे अचेतन प्रधानका ही ग्रहण होगा, तब तो चेतन मुमुक्षुको ' त्वमचेतनोऽसि ' अर्थात् ' अचेतन प्रधान तू है ' इस प्रकार विपरीत उपदेश करनेवाला शास्त्र अप्रमाण हो जायगा। और इस प्रकारके उपदेश से अन्धगोलागूल न्यायके समान वह मुमुक्षु अनर्थको ही प्राप्त होगा। ' अन्धगोलाङ्गूलन्याय ' इस प्रकार है -बड़े जङ्गलमें मार्गके निकट अपने बन्धुके नगर में जानेकी कामना करनेवाले एक अन्धेसे किसी दुष्टात्माने पूछा कि तुम यहाँ क्यों पड़े हो? तब उसने नगरमें जानेकी असामर्थ्य प्रकट की। उसे अधिक कष्ट देनेकी भावनांसे उस दुष्टात्माने एक मस्त साँढ लाकर उसकी पूँछ हाथमें पकड़ाकर अन्धेको कहा कि यह बैल तुमको नगर में पहुँचा देगा परन्तु तुम इसकी पूँछ छोड़ना नहीं। अन्धेने मो वैसा ही किया और महान् कष्टका अनुभव किया।
* श्वेतकेतुको विशेष समझानेके लिए उद्दालकने ' स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै ततपेति ' ( छा ० ६। १६।१ ) ( इसने चोरीकी है, अतः इसके लिए फरसा तपाओ ) यह दृष्टान्त कहा है। इसका तात्पर्य यह है --- राजपुरुष किसी व्यक्तिको चोरी के सन्देहमें पकड़कर राजाके पास लायें। राजाने कहा कि इसके हाथमें तप्त फरसा पकड़ा दो। यदि अचोर होगा तो इसका हाथ न जलेगा और मुक्त कर दिया जायगा अन्यथा दण्डित किया जायगा। वह व्यक्ति चोर नहीं था, अतः हाथमें तप्त फरसा पकड़ने पर हाथके न जलनेसे वह मुक्त कर दिया गया। इस प्रकार हे वत्स! इस सद्रूप ब्रह्म में ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा जो सत्यवादी है वह संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है, अन्यथा नहीं। जीवका प्रधानके साथ यदि अभेद मानें तो वह संपद्रूप उपासना होनेसे निश्चित अनित्य फलवाला होगा ; तब तो ' तस्य तावदेव चिरं ' यह मोक्ष प्रतिपादक श्रुति बाधित होगी।
* ' सदेव सोम्य ' इस श्रुति वाक्यस्थ ' सत् ' पदका तथा ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इस श्रुतिस्थ ' तत् ' पदका अर्थ जगत् कारण ईक्षण कर्ता चेतन है। जैसे उसमें आत्मत्वका निश्चायक ' सदेव सोम्य ' यह प्रकरण और ' श्वेतकेतु ' यह संनिहित पद है, वैसे आत्मशब्द प्रधानका वाचक है इसका निश्चायक न प्रकरण है और न संनिहित पद ही, अतः अचेतन प्रधान चेतन श्वेतकेतुका स्वरूप कदापि नहीं हो सकता, इसलिए आत्मशब्द चेतन ब्रह्म विषयक है। आत्मशब्द प्रधानमें गौण है अथवा अनेकार्थक होनेसे ज्योतिः शब्दकी तरह चेतन और अचेतन दोनोंमें मुख्य है? इस शङ्काके समाधानमें इस सूत्रका आरम्भ ठीक नहीं है। क्योंकि ' गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ' इस पूर्व सूत्रमें ही आत्मशब्दमें गौणत्व तथा अनेकार्थकत्व विषयक सभी शङ्काओं का निराकरण करना उचित था। इस अरुचिसे भगवान् भाष्यकारने ' अथवा ' इत्यादिसे पक्षान्तरका उल्लेख किया है॥ ७
1.1.8 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ८
हेयत्वावचनाच् च ॥ १.१.८ ॥
पदच्छेद — हेयत्वा वचनात् च
सूत्रार्थ — प्रधानमें निष्ठा रखनेवाला न हो जाय, इससे निषेध वचन भी नहीं कहा गया है, अतः स्थूलारुन्धती न्यायसे भी प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है। ( च ) शब्द विरोध संग्रहार्थं है।
शाङ्करभाष्य
यद्यनात्मैव प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् स आत्मा तत्त्वमसि इतीहोपदिष्टं स्यात् स तदुपदेशश्रवणादनात्मज्ञतया तन्निष्ठो मा भूदिति मुख्यमात्मानमुपदिदिक्षु शास्त्रं तस्य हेयत्वं ब्रूयात्। यथारुन्धतीं दिदर्शयिषुस्तत्समीपस्थां स्थूलां ताराममुख्यां प्रथममरुन्धतीति ग्राहयित्वा तां प्रत्याख्याय पश्चादरुन्धतीमेव ग्राहयति तद्वन्नायमात्मेति ब्रूयात्। न चैवमवोचत्। सन्मात्रात्मावगतिनिष्ठैव हि षष्ठप्रपाठके परिसमाप्तिर्दृश्यते। चशब्दः प्रतिज्ञाविरोधाभ्युच्चयप्रदर्शनार्थः। सत्यपि हेयत्ववचने प्रतिज्ञाविरोधः प्रसज्येत। कारणविज्ञानाद्धि सर्वं विज्ञातमिति प्रतिज्ञातम् उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् एवं सोम्य स आदेशो भवति इति वाक्योपक्रमे श्रवणात्। न च सच्छब्दवाच्ये प्रधाने भोग्यवर्गकारणे हेयत्वेनाहेयत्वेन वा विज्ञाते भोक्तृवर्गो विज्ञातो भवति अप्रधानविकारत्वाद्भोक्तृवर्गस्य। तस्मान्न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम्।। कुतश्च न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम्
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रधान सत् शब्दका वाच्यार्थ क्यों नहीं है?
यदि अनात्मा प्रधान ही सत् शब्द वाच्य हो तो ' स आत्मा तत्त्वमसि ' इस श्रुति में भी वह उपदिष्ट होता, तब उस उपदेशको सुनकर अनात्मज्ञ होने से वह श्वेतकेतु कहीं अनात्मनिष्ठ न हो जाय, इसलिए मुख्य आत्मा के उपदेशको इच्छा करनेवाले आचार्यको अनात्माको हेयता कहनी चाहिए।
जैसे अरुन्धती ताराको दिखलानेकी इच्छा करनेवाला उसके समीपस्थ किसी एक अमुख्य स्थूल ताराको ' यह अरुन्धती है ' पहले ऐसा ग्रहण कराकर पश्चात् उसका निषेधकर मुख्य अरुन्धतीको ही दिखलाता है, वैसे ही यह ( प्रधान ) आत्मा नहीं है, ऐसा कहना चाहिए, परन्तु उसने ऐसा कहा नहीं, केवल सद्रूप आत्माकी ज्ञाननिष्ठा कराने में ही छान्दोग्यके छठे अध्यायकी समाप्ति देखी जाती है। च शब्द प्रतिज्ञामें विरोधका संग्रह दिखलाने के लिए है।
यदि प्रधानको हेय भी कहा होता तो भी प्रतिज्ञाका विरोध प्रसक्त होता, क्योंकि कारणके विज्ञानसे ही सबका ज्ञान होता है, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है। कारण कि ‘ उत तमादेशम ० ' ( उद्दालक - हे श्वेतकेतु! क्या तुमने आचार्यसे आदेश पूछा है? जिससे अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और अविज्ञात विशेषरूप से ज्ञात हो जाता है। यह सुनकर श्वेतकेतुने बीचमें पूछा ] ' कथं ० ' हे भगवन्! वह आदेश कैसा होता है? उद्दालकहे सोम्य!
जिस प्रकार घटादिके कारण भूत एक ही मृत्पिण्ड ( मृत्तिकाके स्वरूप ) के ज्ञानसे सारे मृन्मय पदार्थों का ज्ञान हो जाता है, विकार केवल वाणीके आश्रय भूत नाममात्र हैं सत्य तो केवल मृत्तिका ही है, ' एवं सोम्य ० ' - हे सोम्य!
इसका आदेश भी है ) इस प्रकार वाक्यके उपक्रममें श्रुति है | सम्पूर्ण भोग्य पदार्थोंके कारण भूत सत् शब्द वाच्य प्रधानका हेयत्व अथवा अहेयत्व से ज्ञान होनेपर भी मोक्तृवर्गका ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि भोक्तृवर्गं प्रधानका विकार नहीं है, इसलिए प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है॥ ८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — - * ' नामधेयं विकारोऽयं वाचा केवलमुच्यते। वस्तुतः कारणाद्भिन्नो नास्ति तस्मान्मृषैव सः।। " ( नाम मात्र विकार है, केवलं वाणीसे कहा जाता है, वस्तुतः कारणसे भिन्न नहीं है, इससे वह मिथ्या है ) कारणसे कार्यकी भिन्न सत्ता न होनेसे कारणके ज्ञानसे कार्यमात्रका ज्ञान होता है, अत : सबका अधिष्ठानत्वेन कारण होनेसे ब्रह्म ही सत्य है। मृत्तिकामें घटादिके समान यह दृश्यमान • आकाशादि सारा प्रपञ्च ब्रह्ममें कल्पित है। सर्वाधिष्ठान ब्रह्मके ज्ञानसे कार्यमात्रका ज्ञान हो जाता है प्रधानके ज्ञानसे भोक्तृवर्गका ज्ञान न होनेसे प्रतिज्ञा बाधित होती है। ब्रह्मके ज्ञानसे मोक्तृवर्गं तथा भोग्यवर्गं सबका ज्ञान हो जाता है, क्योंकि यह सम्पूर्णं भोक्तृवर्ग, भोग्यवर्गं सद्रूप ब्रह्मसे अभिन्न है। इस प्रकार वेदान्तमें उक्त प्रतिज्ञा सर्वथा निर्दोष है, अतः यह सिद्ध हुआ कि प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है॥ ८
1.1.9 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ९
स्वाप्ययात् ॥ १.१.९ ॥
सूत्रार्थ — श्रुति कहती है कि सुषुप्ति में जीव सत् शब्द वाच्य ब्रह्म में ही लीन होता है, अतः सत् शब्द वाच्य चेतन ब्रह्म है, अचेतन प्रधान नहीं।
शाङ्करभाष्य
तदेव सच्छब्दवाच्यं कारणं प्रकृत्य श्रूयते यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति इति। एषा श्रुतिः स्वपितीत्येतत्पुरुषस्य लोकप्रसिद्धं नाम निर्वक्ति। स्वशब्देनेहात्मोच्यते। यः प्रकृतः सच्छब्दवाच्यस्तमपीतो भवत्यपिगतो भवतीत्यर्थः। अपिपूर्वस्यैतेर्लयार्थत्वं प्रसिद्धम् प्रभवाप्ययावित्युत्पत्तिप्रलययोः प्रयोगदर्शनात्।
मनःप्रचारोपाधिविशेषसंबन्धादिन्द्रियार्थान्गृह्णंस्तद्विशेषापन्नो जीवो जागर्ति तद्वासनाविशिष्टः स्वप्नान्पश्यन्मनःशब्दवाच्यो भवति स उपाधिद्वयोपरमे सुषुप्तावस्थायामुपाधिकृतविशेषाभावात्स्वात्मनि प्रलीन इवेति स्वं ह्यपीतो भवति इत्युच्यते।
यथा हृदयशब्दनिर्वचनं श्रुत्या दर्शितम् स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तम् हृद्ययमिति तस्माद्धृदयमिति यथा वाशनायोदन्याशब्दप्रवृत्तिमूलं दर्शयति श्रुतिः आप एव तदशितं नयन्ते तेज एव तत्पीतं नयते इति च एवं स्वमात्मानं सच्छब्दवाच्यमपीतो भवति इतीममर्थं स्वपितिनामनिर्वचनेन दर्शयति। न च चेतन आत्मा अचेतनं प्रधानं स्वरूपत्वेन प्रतिपद्येत। यदि पुनः प्रधानमेवात्मीयत्वात्स्वशब्देनैवोच्येत एवमपि चेतनोऽचेतनमप्येतीति विरुद्धमापद्येत।
श्रुत्यन्तरं च प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् इति सुषुप्तावस्थायां चेतने अप्ययं दर्शयति। अतो यस्मिन्नप्ययः सर्वेषां चेतनानां तच्चेतनं सच्छब्दवाच्यं जगतः कारणं स्यात् नाचेतनं प्रधानम्।। कुतश्च न प्रधानं जगतः कारणम्
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रधान सत् शब्द वाच्य क्यों नहीं है?
उसी सत् शब्द वाच्य कारणको प्रस्तुतकर श्रुति कहती है- ' यत्रेतत्पुरुषः ० ' ( जिस सुषुप्ति अवस्थामें यह पुरुष स्वपिति - सोता है, ऐसा कहा जाता है उस समय हे सोम्य! वह सद्रूपके साथ एक रूप हुआ रहता है अर्थात् वह अपने स्वरूपको ही प्राप्त हो जाता है। इसीसे उसे उस अवस्थामें ' स्वपिति ' ऐसा कहते हैं, क्योंकि वह अपनेमें ही लीन होता है ) यह श्रुति भी पुरुष के स्वपिति ( सोता है ) इस लोक प्रसिद्ध नामका निर्वचन करती है | श्रुतिमें स्वशब्दसे आत्मा कहा जाता है, जो प्रकृत और सत् शब्द वाच्य है।
उसमें जीव अपीत होता है अर्थात् लीन होता है ऐसा अर्थ है। अपि पूर्वक ' इण् ' गत्यर्थक धातुका लय अर्थ [ व्याकरणमें ] प्रसिद्ध है, क्योंकि प्रभव और अप्य दोनों शब्द उत्पत्ति और प्रलय अर्थ में प्रयुक्त हुए देखने में आते हैं। मनके प्रचार इन्द्रियों द्वारा अन्तःकरणका परिणाम वृत्तिरूप उपाधिविशेषके सम्बन्धसे विषयोंको ग्रहण करता हुआ उनके साथ ऐक्यकी भ्रान्तिको प्राप्त हुआ [ विश्वसंज्ञक ] जीव जागता है।
जाग्रत् अवस्थामें अनुभूत विषयोंकी वासनासे युक्त होकर स्वप्नोंको देखता हुआ मन शब्दसे वाच्य होता है 1। दोनों उपाधियोंके लंय होनेपर सुषुप्ति अवस्था में उपाधि जन्य विशेषके अमावसे वह स्व स्वरूपमें विलीन - सा होता है, अतः अपने को ही प्राप्त हो जाता है, ऐसा कहा जाता है। ' स वा एष ० ' ( वह यह आत्मा हृदय में है ' हृदि अयम् - हृदयम् ' यह हृदय है। यही इसका निरुक्त ( व्युत्पत्ति ) है। इसीसे यह ( आत्मा ) हृदय कहलाता है ) इसप्रकार हृदय शब्दका निर्वचन जैसे श्रुतिसे दिखलाया गया है।
तथा ' आप एव ' ' तेज एव ० ' ( उस समय जल ही उस पुरुषके द्वारा भुक्त अन्नको द्रवीभूतकर ले जाता है अर्थात् रसादिरूपमें परिणत कर देता है, उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है अर्थात् तेज जलका शोषणकर उसे रक्त और प्राणरूपमें परिणत कर देता है ) इसप्रकार जैसे ' अशनाया और उदन्या ' . शब्दों की प्रवृत्तिका मूल श्रुति दिखलाती है। वैसे ही सत् शब्द वाच्य स्वरूपमें लीन होता है। इसी अर्थको श्रुति ' स्वपिति ' शब्द के निर्वचन से दिखलाती है।
और इसप्रकार चेतन आत्मा अचेतन प्रधानको अभेदरूपसे प्राप्त नहीं होगा। यदि आत्मीय होनेके कारण प्रधानको ही स्वशब्दसे कहा जाय तो भी चेतन अचेतनमें लीन होता है, यह कथन विरुद्ध ही होगा। ' प्राज्ञेनात्मना ० ' ( प्राज्ञ आत्मा के साथ ऐक्यको प्राप्त हुआ यह पुरुष न किसी बाह्य वस्तुकों और न किसी आन्तर वस्तुको ही जानता है ) यह दूसरी श्रुतिमी सुषुप्ति अवस्था में चेतनमें जीवका लय दिखलाती है। अतः जिसमें सभी चेतनोंका लय होता है वही चेतन सत् शब्द वाच्य और जगत्का कारण है प्रधान नहीं॥। ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि ' स्वं ह्यपितो भवति ' ( अपने में ही लीन होता है ) इस छन्दोग्य श्रुतिमें जीवका विलय कथन अयुक्त है, क्योंकि विलय तो उत्पत्तिमद्वस्तुका होता है नित्यका नहीं। जीव तो नित्य है। तो भी श्रुतिमें साक्षात् नित्य जीवका विलय नहीं कहा गया है, किन्तु अनित्य उपाधियोंका कारणमें विलय होनेसे तदुपहित जीवका भी गौणरूपसे विलय कहा गया है।
इसका स्पष्टीकरण करनेके लिए भगवान् भाष्यकार ' मनः प्रचार ' इत्यादिसे जाग्रत् और स्वप्नावस्थाओं का वर्णन करते हैं। नेत्रादि इन्द्रियोंद्वारा घट आदि आकारमें परिणत अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम ' मनः प्रचार ' है | उन वृत्तिरूप उपाधियोंद्वारा स्थूल घट आदि विशेष पदार्थोंका आत्माके साथ कल्पित सम्बन्ध होता है, इससे नेत्रादि इन्द्रियोंसे रूप आदि अर्थोंका अनुभव करता हुआ स्थूल देह रूप उपाधिके साथ ' मैं मनुष्य हूँ ' इसप्रकार ऐक्यरूप भ्रान्तिको प्राप्त हुआ आत्मा ' विश्व ' नामक होकर जागता है।
जाग्रत् अवस्थामें अनुभूत पदार्थोंके अनुरूप संस्कारों सहित मनसे युक्त होकर जीव अविद्या के परिणामात्मक स्वप्न पदार्थों को देखता हुआ ' सोम्य तन्मनः ० ' ( हे सोम्य! वह मन है ) इसप्रकार श्रुति प्रतिपादित मन शब्दसे वाच्य होता है अर्थात् ' अहं कर्ता, अहं भोक्ता ' इसप्रकार मनरूप उपाधि के साथ ऐक्यरूप भ्रान्तिको प्राप्त हुआ आत्मा स्वप्नावस्थामें ' तेजस ' नामवाला होता है।
सुषुप्ति अवस्थामें स्थूल और सूक्ष्म दोनों उपाधियोंका कारणमें विलय होनेसे ' मैं मनुष्य हूँ, कर्ता भोक्ता हूँ ' इत्यादि विशेष अभिमानके अभाव होनेके कारण केवल अविद्योपाधिक होकर जीव अपनेमें लीनकी तरह कहा जाता है। ' स्वं ह्यपितो भवति ' इसप्रकार लय गुणके योगसे प्राज्ञ आत्मा का नाम ' स्वपिति ' है।
* जैसे मे उक्त सारी व्युत्पत्तियाँ यथार्थ हैं, वैसे ही ' स्वमात्मानमपीतो भवतीति स्वपिति ' यह व्युत्पत्ति भी यथार्थं | यहाँ श्रुति स्व शब्दसे अचेतन प्रधानका ग्रहण नहीं करती अपितु आत्माका ही ग्रहण करती है।। ९
1.1.10 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १०
गतिसामान्यात् ॥ १.१.१० ॥
सूत्रार्थ — सभी वेदान्तोंमें कारण ज्ञान समान है। अतः चेतन ही जगत्का कारण है, प्रधान नहीं।
शाङ्करभाष्य
तदेव सच्छब्दवाच्यं कारणं प्रकृत्य श्रूयते यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति इति। एषा श्रुतिः स्वपितीत्येतत्पुरुषस्य लोकप्रसिद्धं नाम निर्वक्ति। स्वशब्देनेहात्मोच्यते। यः प्रकृतः सच्छब्दवाच्यस्तमपीतो भवत्यपिगतो भवतीत्यर्थः। अपिपूर्वस्यैतेर्लयार्थत्वं प्रसिद्धम् प्रभवाप्ययावित्युत्पत्तिप्रलययोः प्रयोगदर्शनात्।
मनःप्रचारोपाधिविशेषसंबन्धादिन्द्रियार्थान्गृह्णंस्तद्विशेषापन्नो जीवो जागर्ति तद्वासनाविशिष्टः स्वप्नान्पश्यन्मनःशब्दवाच्यो भवति स उपाधिद्वयोपरमे सुषुप्तावस्थायामुपाधिकृतविशेषाभावात्स्वात्मनि प्रलीन इवेति स्वं ह्यपीतो भवति इत्युच्यते।
यथा हृदयशब्दनिर्वचनं श्रुत्या दर्शितम् स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तम् हृद्ययमिति तस्माद्धृदयमिति यथा वाशनायोदन्याशब्दप्रवृत्तिमूलं दर्शयति श्रुतिः आप एव तदशितं नयन्ते तेज एव तत्पीतं नयते इति च एवं स्वमात्मानं सच्छब्दवाच्यमपीतो भवति इतीममर्थं स्वपितिनामनिर्वचनेन दर्शयति। न च चेतन आत्मा अचेतनं प्रधानं स्वरूपत्वेन प्रतिपद्येत। यदि पुनः प्रधानमेवात्मीयत्वात्स्वशब्देनैवोच्येत एवमपि चेतनोऽचेतनमप्येतीति विरुद्धमापद्येत।
श्रुत्यन्तरं च प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् इति सुषुप्तावस्थायां चेतने अप्ययं दर्शयति। अतो यस्मिन्नप्ययः सर्वेषां चेतनानां तच्चेतनं सच्छब्दवाच्यं जगतः कारणं स्यात् नाचेतनं प्रधानम्।। कुतश्च न प्रधानं जगतः कारणम्
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और किस कारण से प्रधान जगत्का कारण नहीं है?
तार्किक सिद्धान्त के समान यदि वेदान्तों में भी भिन्न - भिन्न कारण ज्ञान होता, कहीं चेतन ब्रह्म, कहीं अचेतन प्रधान और कहीं अन्य ( परमाणु आदि ) ही जगत्का कारण होता, तो कदाचित् प्रधान कारणवादके अनुरोधसे प्रधानके विषयमें ' ईक्षति ' आदि श्रुतियोंकी कल्पना की जा सकती, परन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि सभी वेदान्तोंमें कारण ज्ञान समान ही है।
' यथाऽग्नेर्ज्वलतः ० ' ( जैसे प्रज्वलित अग्निसे निकली हुई चिनगारियाँ सभी दिशाओंमें फैलती हैं, वैसे ही इस आत्मासे सभी प्राण ( इन्द्रियाँ ) यथा स्थान ( गोलक ) में प्रादुर्भूत होते हैं, प्राणोंसे तदुपकारक सूर्य आदि देवता प्रकट होते हैं, तदनन्तर देवोंसे लोक ( इन्द्रियोंके रूप आदि विषय ) उत्पन्न होते हैं और ' तस्माद्वा ० ( इस सद्रूप आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) ' आत्मन ० ' ( आत्मांसे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ ) ' आत्मन ० ' ( आत्मा से प्राण उत्पन्न होता है ) इस प्रकार सभी वेदान्त ' आत्मा कारण है ' यह दिखलाते हैं।
आत्मशब्द चेतन वाचक है यह हम कह चुके हैं। जैसे चक्षु आदि इन्द्रियोंमें रूप · आदि विषयक ज्ञान समान है, वैसे ही वेदान्त वाक्योंका चेतन कारणत्वमें जो समान ज्ञान है यही प्रामाण्य होनेमें महान् कारण है। इस कारण - वेदान्त वाक्योंसे चेतन कारणत्व अवग्रति समान होनेके कारण सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है।। १०
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.१.११ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
1.1.11 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ११
श्रुतत्वाच् च ॥ १.१.११ ॥
पदच्छेद — श्रुतत्वात् च
सूत्रार्थ — और ' स कारणम् ' इसप्रकार श्रुति में स्वशब्दसे सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत्का कारण कहा गया है। अतः सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत्का कारण है।
शाङ्करभाष्य
स्वशब्देनैव च सर्वज्ञ ईश्वरो जगतः कारणमिति श्रूयते श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषदि सर्वज्ञमीश्वरं प्रकृत्य स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः इति। तस्मात्सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणम् नाचेतनं प्रधानमन्यद्वेति सिद्धम्।। जन्माद्यस्य यतः इत्यारभ्य श्रुतत्वाच्च इत्येतदन्तैः सूत्रैर्यान्युदाहृतानि वेदान्तवाक्यानि तेषां सर्वज्ञः सर्वशक्तिरीश्वरो जगतो जन्मस्थितिप्रलयकारणमित्येतस्यार्थस्य प्रतिपादकत्वं न्यायपूर्वकं प्रतिपादितम्।
गतिसामान्योपन्यासेन च सर्वे वेदान्ताश्चेतनकारणवादिन इति व्याख्यातम्। अतः परस्य ग्रन्थस्य किमुत्थानमिति उच्यते द्विरूपं हि ब्रह्मावगम्यते नामरूपविकारभेदोपाधिविशिष्टम् तद्विपरीतं च सर्वोपाधिविवर्जितम्।
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम् यो वै भूमा तदमृतम् अथ यदल्पं तन्मर्त्यम् सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्।
अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् नेति नेति अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम् इति न्यूनमन्यत्स्थानं संपूर्णमन्यत् इति चैवं सहस्रशो विद्याविद्याविषयभेदेन ब्रह्मणो द्विरूपतां दर्शयन्ति वेदान्तवाक्यानि। तत्राविद्यावस्थायां ब्रह्मण उपास्योपासकादिलक्षणः सर्वो व्यवहारः। तत्र कानिचिद्ब्रह्मण उपासनान्यभ्युदयार्थानि कानिचित्क्रममुक्त्यर्थानि कानिचित्कर्मसमृद्ध्यर्थानि। तेषां गुणविशेषोपाधिभेदेन भेदः।
एक एव तु पर आत्मेश्वरस्तैस्तैर्गुणविशेषैर्विशिष्ट उपास्यो यद्यपि भवति तथापि यथागुणोपासनमेव फलानि भिद्यन्ते तं यथा यथोपासते तदेव भवति इति श्रुतेः यथाक्रतुरस्िम्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति इति च स्मृतेश्च यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेबरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः इति।
यद्यप्येक आत्मा सर्वभूतेषु स्थावरजङ्गमेषु गूढः तथापि चित्तोपाधिविशेषतारतम्यादात्मनः कूटस्थनित्यस्यैकरूपस्याप्युत्तरोत्तरमाविष्कृतस्य तारतम्यमैश्वर्यशक्तिविशेषैः श्रूयते तस्य य आत्मानमाविस्तरां वेद इत्यत्र स्मृतावपि यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् इति यत्र यत्र विभूत्याद्यतिशयः स स ईश्वर इत्युपास्यतया चोद्यते। एवमिहाप्यादित्यमण्डले हिरण्मयः पुरुषः सर्वपाप्मोदयलिङ्गात्पर एवेति वक्ष्यति। एवम् आकाशस्तल्लिङ्गात् इत्यादिषु द्रष्टव्यम्।
एवं सद्योमुक्तिकारणमप्यात्मज्ञानमुपाधिविशेषद्वारेणोपदिश्यमानमप्यविवक्षितोपाधिसंबन्धविशेषं परापरविषयत्वेन संदिह्यमानं वाक्यगतिपर्यालोचनया निर्णेतव्यं भवति यथेहैव तावत् आनन्दमयोऽभ्यासात् इति। एवमेकमपि ब्रह्मापेक्षितोपाधिसंबन्धं निरस्तोपाधिसंबन्धं चोपास्यत्वेन ज्ञेयत्वेन च वेदान्तेषूपदिश्यत इति प्रदर्शयितुं परो ग्रन्थ आरभ्यते। यच्च गतिसामान्यात् इत्यचेतनकारणनिराकरणमुक्तम् तदपि वाक्यान्तराणि ब्रह्मविषयाणि व्याचक्षाणेन ब्रह्मविपरीतकारणनिषेधेन प्रपञ्च्यते।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और किस कारण सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है?
सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है ऐसा स्वशब्द ( ईश्वर वाचक शब्द ) से ही श्रुति कहती है, क्योंकि श्वेताश्वेतरोंके मन्त्रोपनिषद् में सर्वज्ञ ईश्वरको प्रस्तुतकर ' स कारण ० ' ( वह सर्वज्ञ परमेश्वर समीका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता जीवका स्वामी है। उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न कोई स्वामी है ) ऐसा कहा गया है। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत्का कारण है अचेतन प्रधान अथवा अन्य कोई नहीं।। ११
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि ' तदैक्षत ' ( उसने ईक्षण किया ) इत्यादि श्रुतिसे कारण में केवल ईक्षण मात्र प्रतिपादित है। सर्वज्ञत्व नहीं, तो भी ईक्षण कर्ता में अपना चेतन वाचक ' सर्ववित् ' शब्द भी है। स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्शः कालकालो गुणी सर्वविद्यः। ( वह विश्वका कर्ता, आत्मयोनि ( स्वयंभु ) ज्ञाता, कालका प्रेरक, अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और सभी विद्याओंका आश्रय और जो सर्ववित् है ) ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' ' अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपा : ' ( मुण्ड ० २।१।९ ) ( उस परमेश्वरसे ही सभी समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं, इसीसे गङ्गा, सिन्धु आदि विविध नदियाँ बहती हैं ) इसप्रकार सभी उपनिषदोंमें यही सिद्ध होता है कि सर्वज्ञ, सर्वशक्ति ब्रह्म ही जगत्का कारण है, जड़ प्रधान अथवा परमाणु आदि नहीं। पूर्वपक्ष में जीवका प्रधानके साथ अभेद मानकर उपासना करना फल है और सिद्धान्तमें ब्रह्म तथा प्रत्यगात्माका अभेदरूपसे साक्षात्कार फल है॥। ११
आनन्दमयाधिकरणम्
1.1.12 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १२
आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १.१.१२ ॥
पदच्छेद — आनन्दमयः , अभ्यासात्
सूत्रार्थ — ( आनन्दमयः ) ' अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमय : ' इस श्रुतिमें आनन्दमय परमात्मा ही है जीव नहीं, ( अभ्यासात् ) क्योंकि आनन्द शब्दका ब्रह्मके लिए अनेक वार अभ्यास देखा गया है।
शाङ्करभाष्य
तैत्तिरीयके अन्नमयं प्राणमयं मनोमयं विज्ञानमयं चानुक्रम्याम्नायते तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः इति। तत्र संशयः किमिहानन्दमयशब्देन परमेव ब्रह्मोच्यते यत्प्रकृतम् सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इति किं वान्नमयादिवद्ब्रह्मणोऽर्थान्तरमिति। किं तावत्प्राप्तम् ब्रह्मणोऽर्थान्तरममुख्य आत्मानन्दमयः स्यात्। कस्मात् अन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वात्। अथापि स्यात्सर्वान्तरत्वादानन्दमयो मुख्य एवात्मेति न स्यात्प्रियाद्यवयवयोगाच्छारीरत्वश्रवणाच्च।
मुख्यश्चेदात्मा स्यान्न प्रियादिसंस्पर्शः स्यात्। इह तु तस्य प्रियमेव शिरः इत्यादि श्रूयते। शारीरत्वं च श्रूयते तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य इति। तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष एव शारीर आत्मा य एष आनन्दमय इत्यर्थः। न च सशरीरस्य सतः प्रियाप्रियसंस्पर्शो वारयितुं शक्यः। तस्मात्संसार्येवानन्दमय आत्मेत्येवं प्राप्ते इदमुच्यते आनन्दमयोऽभ्यासात्। पर एवात्मानन्दमयो भवितुमर्हति। कुतः अभ्यासात्। परस्मिन्नेव ह्यात्मन्यानन्दशब्दो बहुकृत्वोऽभ्यस्यते।
आनन्दमयं प्रस्तुत्य रसो वै सः इति तस्यैव रसत्वमुक्त्वा उच्यते रस््येवायं लब्ध्वानन्दीभवति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति सैषानन्दस्य मीमा्ा भवति एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन इति आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् इति च। श्रुत्यन्तरे च विज्ञानमानन्दं ब्रह्म इति ब्रह्मण्येवानन्दशब्दो दृष्टः। एवमानन्दशब्दस्य बहुकृत्वो ब्रह्मण्यभ्यासादानन्दमय आत्मा ब्रह्मेति गम्यते।
यत्तूक्तमन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वादानन्दमयस्याप्यमुख्यत्वमिति नासौ दोषः आनन्दमयस्य सर्वान्तरत्वात्। मुख्यमेव ह्यात्मानमुपदिदिक्षु शास्त्रं लोकबुद्धिमनुसरत् अन्नमयं शरीरमनात्मानमत्यन्तमूढानामात्मत्वेन प्रसिद्धमनूद्य मूषानिषिक्तद्रुतताम्रादिप्रतिमावत्ततोऽन्तरं ततोऽन्तरमित्येवं पूर्वेण पूर्वेण समानमुत्तरमुत्तरमनात्मानमात्मेति ग्राहयत् प्रतिपत्तिसौकर्यापेक्षया सर्वान्तरं मुख्यमानन्दमयमात्मानमुपदिदेशेति श्लिष्टतरम्।
यथारुन्धतीदर्शने बह्वीष्वपि तारास्वमुख्यास्वरुन्धतीषु दर्शितासु या अन्त्या प्रदर्श्यते सा मुख्यैवारुन्धती भवति एवमिहाप्यानन्दमयस्य सर्वान्तरत्वान्मुख्यमात्मत्वम्। यत्तु ब्रूषे प्रियादीनां शिरस्त्वादिकल्पनानुपपन्ना मुख्यस्यात्मन इति अतीतानन्तरोपाधिजनिता सा न स्वाभाविकीत्यदोषः। शारीरत्वमप्यानन्दमयस्यान्नमयादिशरीरपरम्परया प्रदर्श्यमानत्वात् न पुनः साक्षादेव शारीरत्वं संसारिवत्। तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — हैं वे सर्वज्ञ सर्वशक्ति ईश्वर जगत् के जन्म स्थिति और लयका कारण है इसी अर्थके प्रतिपादक हैं, यह बात युक्तिपूर्वक कही गई है। सभी वेदान्त वाक्योंमें कारण विषयक अवगति समान है, इस कथनसे सारे वेदान्त वाक्य चेतनवादी हैं, ऐसा व्याख्यान किया गया है, तो अग्रिम ग्रन्थका आरम्भ क्यों किया जाता है? इसपर कहते हैं - नाम रूपात्मक विकार विशेष उपाधिसे युक्त और उससे विपरीत सभी उपाधियोंसे रहित, इसप्रकार ब्रह्मके दो रूप अवगत होते हैं।
जैसे कि ' यत्र हि ० ' ( जहाँअविद्यावस्था में द्वैत - सा होता है वहीं अन्य अन्यको देखता है किन्तु जहाँ - विद्यावस्था में उस विद्वान् के लिए सब आत्मा ही हो गया तो उस समय किस करणसे किस विषयको कौन देखे ) ) और ' यत्र ० ' ( सनत्कुमार -- जहाँ व्यापक आनन्दस्वरूप आत्मामें स्थित हुआ विद्वान् अपने से भिन्न कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता, कुछ और नहीं जानता वह भूमा व्यापक ब्रह्म है और जहाँ अपने से भिन्न कुछ और देखता है कुछ और सुनता है, कुछ और जानता है वह अल्प - परिच्छिन्न है, जो भूमा है वही अमृत है और जो अल्प है वह मर्त्य - मरणशील है ) ' सर्वाणि ० ' ( जो परमेश्वर सब देव, मनुष्यादि शरीरोंको उत्पन्नकर यह देव है, यह मनुष्य है, इत्यादि नाम रखकर उन नामोंसे स्वयं व्यवहार करता है ) ' निष्कलं ० ' ( कला रहित अवयवरहित, निष्क्रिय, शान्त, रागादि दोष रहित, निर्लेप - पापादि रहित, अमृतत्वका उत्कृष्ट सेतु और जिसका ईन्धन जल चुका है उस धूम रहित अग्निके समान ( देदीप्यमान ) देवकी मैं शरण लेता हूँ )।
' नेति ० ' ( यह नहीं, यह नहीं, ऐसा ) ' अस्थूलम ० ' ( जो न स्थूल है और न सूक्ष्म है ) ' न्यून ० ' ( एक न्यून - अल्प स्थान है और दूसरा सम्पूर्ण स्थान है अर्थात् सोपाधिक सगुण ब्रह्म अल्प और उपाधिरहित निर्गुण ब्रह्म पूर्ण व्यापक है ) ऐसे सहस्र वाक्य विद्या और अविद्या के विषय भेदसे ब्रह्मके दो रूप दिखलाते हैं। उसमें अविद्या - वस्थामें उपास्य उपासक आदि लक्षण सभी व्यवहार ब्रह्म में होते हैं।
उपासनाओंमें ब्रह्मकी कई एक उपासनाएँ अभ्युदयके लिए हैं, कई एक ( दहरादि ) उपासनाएँ क्रममुक्तिके लिए हैं और कई एक कर्म समृद्धिके लिए हैं। गुणविशेषसे तथा उपाधिभेदसे उनका परस्पर भेद है। यद्यपि उन - उन गुणविशेषोंसे विशिष्ट एक ही ईश्वर परमात्मा उपास्य है, तथापि जिस गुणकी उपासना होती है।
तदनुसार भिन्न - भिन्न फल होते हैं, क्योंकि ' तं तथा ० ' ( उसकी जिस - जिस रूपसे उपासना करता है वैसे ही रूपको प्राप्त होता है ) और ' यथा ऋतु ० ' ( इसलोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसे ही यहाँ से मर कर जानेपर होता है ) इस प्रकारकी श्रुति और ' यं यं ० ' ( हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य जिसजिस भी भावका स्मरण करता हुआ अन्तकालमें शरीर छोड़ता है, उस भावकी भावनावाला वह पुरुष उस - उस भावको ही प्राप्त होता है ) ऐसी स्मृति है।
यद्यपि एक ही आत्मा जड़ और चेतन सभी भूतोंमें गूढ ( छिसा हुआ ) है, तथापि चित्तरूपी उपाधिविशेषके तारतम्यसे उत्तरोत्तर अभिव्यक्त, कूटस्थ नित्य एकरूप आत्माका ऐश्वर्य शक्तिविशेषसे तारतम्य ' तस्य ० ' ( उस उक्थरूप पुरुषके शरीरमें वर्तमान चिद्रूप आत्माको जो पुरुष अतिशय जानता है— उपासना करता है ) इस श्रुतिमें सुना जाता है। और ‘ यद्यद् ० ' ( इसलिए हे अर्जुन!
जो - जो ऐश्वर्यं शाली कान्तियुक्त एवं उत्कृष्ट वस्तु है उस - उसको तुम मेरे तेजके अंशसे ही उत्पन्न हुई जान ) इस प्रकार स्मृतिमें भी है। जहाँ - जहाँ विभूति आदिका अतिशय है वह वह ईश्वर है, इस प्रकार उसका उपास्यरूपसे विधान किया जाता है। इस प्रकार यहाँ ( सूत्र में ) भी आदित्यमण्डल में हिरण्यमय पुरुष है वह सब पापोंसे रहित होनेके कारण परमात्मा ही है, ऐसा ( ब्र ० सू ० १ | १ | २० ) सूत्र में कहेंगे। इस प्रकार ( ब्र ० सू ० १।१।२२ ) इत्यादि सूत्रोंमें भी समझना चाहिए।
इस प्रकार विदेह मुक्तिका कारण आत्मज्ञान भी उपाधि विशेष द्वारा उपदिश्यमान होनेपर भी और उपाधि सम्बन्ध विशेष विवक्षित न होनेसे पर विषयक है अथवा अपर विषयक है ऐसा सन्देह होता है, अतः तात्पर्यका पर्यालोचनकर उसका निर्णय करना चाहिए | जैसे कि यहीं ‘ आनन्दमयोऽभ्यासात् ' सूत्रमें किया है। इस प्रकार एक ही ब्रह्म उपाधि सम्बन्धकी अपेक्षा उपास्यरूपसे और उपाधि सम्बन्ध रहित ज्ञेयरूपसे वेदान्त वाक्योंमें उपदिष्ट है, यह दिखलानेके लिए अग्रिम ग्रन्थका आरम्भ किया जाता है।
' गतिसामान्यात् ' वेदान्त वाक्योंसे ब्रह्म कारणविषयक ज्ञान समान होनेसे अचेतन कारणका जो निराकरण कहा गया है, उसका भी ब्रह्म विषयक अन्य वाक्योंका व्याख्यान करनेकी इच्छावाले सूत्रकार ब्रह्मसे भिन्न कारणके निषेधसे विस्तार करेंगे—
तैत्तिरीयक उपनिषद् में क्रमशः अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, और विज्ञानमयका आत्मरूप से उपक्रमकर ‘ तस्माद्वा ० ' ( उस विज्ञानमयसे भिन्न उसके अन्तर आत्मा आनन्दमय है ) ऐसा श्रुति कहती है। इससे सन्देह होता है कि क्या यहाँ आनन्दमय शब्दसे परब्रह्म ही कहा जाता है, जो ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस प्रकार प्रकृत है अथवा अन्नमयादिके समान ब्रह्मसे भिन्न पदार्थ? तब क्या प्राप्त होता है?
पूर्वपक्षी - आनन्दमय ब्रह्मसे भिन्न पदार्थ अमुख्य आत्मा होना चाहिए, क्योंकि अन्नमयादि मुख्य आत्मा प्रवाह ( परम्परा ) में पठित है। परन्तु सर्वान्तर होने से आनन्दमय मुख्य आत्मा ही होना चाहिए? ऐसा नहीं हो सकता, कारण कि उसमें प्रिय आदि अवयवोंका योग तथा शारीरत्वका श्रवण है | आनन्दमय यदि मुख्य आत्मा होता तो उससे प्रियादिका सम्बन्ध न होता। परन्तु यहाँ तो ' तस्य ० ' ( उसका प्रिय ही शिर है ) इत्यादि श्रुति है।
और ' तस्यैष ० ' ( यह जो आनन्दमय है यही उस पूर्वका शारीर आत्मा है ) यह शारीरत्वकी श्रुति है। उस पूर्व विज्ञानमयका यही शारीर आत्मा है जो यह आनन्दमय है, ऐसा अर्थ है। सशरीर होनेपर प्रिय और अप्रियके सम्बन्धका निवारण नहीं किया जा सकता, इसलिए आनन्दमय संसारी जीवात्मा है। इस प्रकार प्राप्त होनेपर उसके निराकरणार्थ ' आनन्दमयो ० ' यह सूत्र कहा जाता है। परमात्मा ही आनन्दमय हो सकता है। क्योंकि उसमें उसका अभ्यास है। परमात्मामें ही आनन्द शब्दका वार - वार अभ्यास है।
आनन्दमयको प्रस्तुत कर ' रसो वै ० ' ( निश्चय वह आनन्द है ) इस प्रकार उसीका रसत्व कहकर ' रस " ह्येवायं ० ' ( यह पुरुष रसको प्राप्त कर ही आनन्द युक्त होता है ) ' को ह्येवान्यात्कः ० ' ( यदि आकाश - हृदयाकाशमें स्थित यह आनन्दरूप आत्मा न होता तो कौन व्यक्ति अपान व्यापार ( निःश्वास ) करता और कौन प्राण व्यापार ( उच्छ्वास ) करता, अतः यह आत्मा ही सबको आनन्दित करता है ) ' सैषा ० ' ( यह आनन्दका विचार होता है ) ' एतम ० ' ( विद्वान् उस आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है ) ' आनन्दं ब्रह्मणो ० ' ( ब्रह्म के आनन्दको जाननेवाला किसीसे भयभीत नहीं होता ) ' आनन्दो ० ' ( आनन्द ब्रह्म है, ऐसा भृगुने जाना ) ऐसा श्रुति कहती है।
' विज्ञानम ० ' ( विज्ञान आनन्द ब्रह्म है ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें भी ब्रह्ममें ही आनन्द शब्द देखा गया है। इस तरह आनन्द शब्दका ब्रह्ममें बहुत वार अभ्यास होनेसे आनन्दमय आत्मा ब्रह्म है। ऐसा ज्ञात होता है। जो यह कहा गया है कि अन्नमयादि अमुख्य आत्मा के प्रवाहमें पठित होनेसे - आनन्दमय भी अमुख्य आत्मा है। यह दोष नहीं है, क्योंकि आनन्दमय सबके आन्तर है।
मुख्य आत्माका ही उपदेश करने की इच्छावाले शास्त्रने लोकबुद्धिका अनुसरण कर अत्यन्त मूढ पुरुषोंमें आत्मरूप से प्रसिद्ध अनात्मा अन्नमय शरीरका अनुवादकर सांचेमें ढाले हुए द्रवीभूत ताम्बे आदिकी प्रतिमाके समान उसके अभ्यन्तर, उसके अभ्यन्तर इस प्रकार पूर्व- पूर्वके समान उत्तर, उत्तर अनात्माका आत्मरूप से ग्रहण कराके अनन्तर ज्ञान सौकर्यकी अपेक्षा सबके आन्तर मुख्य आनन्दमय आत्माका उपदेश किया है, यह सर्वथा युक्त है।
जैसे अरुन्धती दृष्टान्तमें बहुत अमुख्य ताराओं ( नक्षत्रों ) को अरुन्धती रूपसे दिखलाए जाने पर जो अन्तका तारा दिखलाया जाता है वह मुख्य अरुन्धती ही होता है, वैसे ही यहाँ आनन्दमय सबके आन्तर होने के कारण मुख्य आत्मा ही है। किन्तु यह जो कहते हो कि मुख्य आत्माके प्रियादिमें शिरस्त्वादिकी कल्पना अयुक्त है, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि आनन्दमय से पूर्व एवं मनोमय के पश्चात् विज्ञानमय उपाधि से वह कल्पना उत्पन्न हुई है स्वाभाविक नहीं है।
आनन्दमयका शारीरत्व भी अन्नमयादि शरीर परम्परासे दिखलाया गया है। संसारीके समान साक्षात् शारीरत्व नहीं है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है॥ १२
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * वेदान्त शास्त्रमें सगुण तथा निर्गुण ब्रह्मके प्रतिपादक अनेक वाक्य देखनेमें आते हैं, उनमें कौन - से सगुणकी उपासना द्वारा निर्गुण ब्रह्ममें समन्वित होते हैं और कौन - से साक्षात् निर्गुण ब्रह्ममें समन्वित होते हैं। इस प्रकारकी जिज्ञासा अग्रिम ग्रन्थके आरम्भमें हेतु है। भगवान् भाष्यकारने सगुण और निर्गुण ब्रह्मके प्रतिपादक ' यत्र हि द्वैतमिव ' ' यत्र नान्यत्पश्यति ' इत्यादि अनेक वाक्य उद्धृत किये हैं।
माया उपाधि विशिष्ट सगुण ब्रह्म और दूसरा माया उपाधिसे रहित निर्गुण ब्रह्म इस प्रकार ब्रह्मके दो रूप हैं। यद्यपि ब्रह्म एक ही है, फिर भी उपाधिके भाव और अभावके कारण ब्रह्मके दो रूप श्रुतियोंमें कहे गये हैं। इसलिए उपाधि सहित सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मसे भिन्न परिच्छिन्न तथा मिथ्या है, क्योंकि उसकी उपाधि परिच्छिन्न तथा मिथ्या है, इससे उसे भी ऐसा ही कहा जाता है। इस प्रकार ब्रह्मके दो रूप माननेमें कोई विरोध नहीं है।
' निष्कलं ' इस श्रुतिमें सेतु शब्द लौकिक सेतुके समान ' तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्त वाक्योंसे उत्पन्न ब्रह्माकार वृत्तिमें स्वयं स्थित या प्रतिबिम्बित ब्रह्म संसार सागरसे पार ले जाने ( मोक्ष प्राप्ति ) में एक मात्र साधन है।
** अब भगवान् माष्यकार ' तत्र ' इत्यादिसे अविद्या विषयक विचार करते हैं - निर्गुण ब्रह्मके ज्ञानके लिए कल्पित प्रपञ्चका आश्रयकर उसके बाध होनेसे पहले ' गुड़ जिह्वा न्याय ' से तत् तत् फलके लिए उपासनाओंका विधान किया गया है। उनका भी चित्तकी एकाग्रता द्वारा ब्रह्मज्ञान ही मुख्य फल है, इसलिए इनका भी महातात्पर्य ब्रह्ममें ही है।
उपासनाओंका अवान्तर फल इस प्रकार है- - ' स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते ' ( छा ० ७।१।५ ) ( जो कोई उपासक ' नाम ' ब्रह्म है, ऐसी उपासना करता है उसको जहाँ तक नामका विषय है वहाँ तक यथेष्ट कामाचार रूप फल प्राप्त होता है ) इस प्रकारकी प्रतीकोपासनाओं का फल अभ्युदय है। दहरादि उपासनाओंका फल क्रममुक्ति है अर्थात् दहर उपासना के बलसे ब्रह्मलोकमें पहुँचकर वहाँ ब्रह्माद्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्तकर मुक्त हो जाता है। इस उपासनाका विशेष विवरण ( ० सू ० १।३।१४ ) में द्रष्टव्य है।
' उद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १1१1१ ) ( उद्गीथके अवयव भूत वर्णात्मक ॐ ( ओंकार ) की उपासना करे ) इस प्रकार उद्गीथादि उपासनाओंका फल कर्म समृद्धि हैं। विधेय होनेसे इन उपासनाओंका विधान यद्यपि कर्मकाण्डमें ही उपयुक्त था, फिर भी उपासना ( ध्यान ) मानसिक है और ज्ञानका अन्तरङ्ग साधन है, इसलिए उनका ज्ञानकाण्ड में विधान किया गया है। यद्यपि परमेश्वर एक है तथापि सत्यकामादि गुण अनेक हैं, ध्यान करने योग्य हृदय, आदित्य आदि उपाधियाँ - स्थान अनेक हैं।
इस तरह उपाधियोंके भेदसे उपहित भी भिन्न - भिन्न होता है, अतः जिस - जिस गुण सहित परमेश्वरका जिस जिस उपाधिरूप स्थानमें ध्यान किया जाता है, उस उस गुण तथा उस उस उपाधिके भेदसे उपास्यका भेद, उपास्यभेदसे उपासनाका भेद, उपासना भेदसे फलका भेद होता है। इस विषय में श्रुति और स्मृति भी उद्धृत किये गये हैं। लोग राजाकी उपासनाकी तरह परमात्माकी जिस - जिस रूपसे उपासना करते हैं उस उस रूपको प्राप्त करना ही उनके लिए फल होता है।
* बुद्धि आदि उपाधिकी शुद्धिके तारतम्यसे ऐश्वर्य, ज्ञान आदिका तारतम्य विशेष होता है। इस भेदसे एक रूप आत्माका मनुष्य आदिसे लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त उत्तरोत्तर ऐश्वर्यादिके उत्कर्षका आविर्भाव सुना जाता है। उपास्य उपासक भावमें भी अल्प उपाधिवाला आत्मा उपासक और उत्कृष्ट उपाधिवाला आत्मा उपास्य है। इस तरह उपाधिको लेकर यह सारा तारतम्य है। ' आदित्यं ब्रह्मेत्युपासीत ' यहाँ आदित्य आदि भी जीवरूपसे उपास्य नहीं हैं किन्तु ईश्वररूपसे उपास्य हैं, इसमें भगवान् माष्यकार ‘ आकाशस्तलिङ्गात् ' इत्यादिसे भगवान् सूत्रकारकी सम्मति देते हैं कि इस सूत्रमें आकाश शब्द से भी परमेश्वरका ही ग्रहण किया गया है।
* ' तस्माद्वा ' यह तैत्तिरीयक वाक्य इस अधिकरणका विषय वाक्य है। इस उपनिषद् में प्रतिपादित विज्ञानमय से भिन्न उसके आन्तर आनन्दमय आत्मा है अर्थात् अज्ञानी पुरुषोंकी अन्नमयादि कोशोंमें जो आत्मबुद्धि है उसे पूर्व - पूर्व कोशोंसे हटाती हुई अन्तमें विज्ञानमय कोश में से आत्मबुद्धिका निराकरण करती हुई श्रुति आनन्दमय में आत्मबुद्धि कराती है। यहाँ अन्नका विकार प्रसिद्ध यह स्थूल शरीर अन्नमय है। समष्टि प्राण, मन और बुद्धि हिरण्यगर्भ रूप हैं व्यष्टि प्राण, मन तथा बुद्धि क्रमसे प्राणमय, मनोमय तथा विज्ञानमय कहे जाते हैं। जो बिम्ब चैतन्य आनन्दरूप ईश्वर है उसका प्रतिबिम्ब जीव आनन्दमय है। इस प्रकार क्रमसे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय पाँच कोश कहे जाते हैं। अब यहाँ ' किमिह ' से संशय उपस्थित करते हैं।
* यहाँ वृत्तिकारके मतानुसार आनन्दमय ही ब्रह्म है, पहले इसपर विचार किया जाता हैआनन्दशब्दसे ' मयट् ' प्रत्यय होकर आनन्दमय शब्द सिद्ध हुआ है। ' मयट् ' प्रत्ययका अर्थ विकार तथा प्राचुर्य ( बहुत ) है गत ' ईक्षिति ' अधिकरणमें गौण और मुख्य ईक्षण दोनोंके तुल्य न होनेसे संशय नहीं होता, क्योंकि गौण प्राय पाठ निश्चायक नहीं होता। परन्तु यहाँ ' आनन्दमय ' में तो मयट् प्रत्यय विकार और प्राचुर्यं दोनोंमें मुख्य होनेसे संशय होनेपर अन्नमयादि विकारोंके प्रवाह में आनन्द. मयका पाठ होनेसे यह निश्चय होता है कि आनन्दका विकार जीव आनन्दमय है। इस प्रकार प्रत्यु - दाहरण संगति से ' किं तावत् ' से पूर्वपक्ष करते हैं अब पूर्वपक्षी पर कोई शङ्का करते हैं – सर्वान्तर होनेसे आनन्दमय मुख्य आत्मा ही है। पूर्वपक्षी ' न स्यात् ' आदिसे कहता है।
* यहां आनन्दमय शब्दसे परमात्माका ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उसमें अनेक वार आनन्द शब्दका प्रयोग किया गया हैं। यद्यपि आनन्दशब्द वार वार ब्रह्ममें प्रयुक्त है तो इससे आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता है तो भी ' वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत ' जैसे यहां ज्योतिष्टोमके प्रकरण में पठित ' ज्योति ' शब्दका अर्थ ज्योतिष्टोम है, वैसे ही आनन्दमयके प्रकरण में पठित आनन्दपद भी आनन्दमयका वाचक है, इसलिए आनन्दशब्दका अभ्यास आनन्दमयमें ब्रह्मत्वका साधक है।
* ‘ आनन्दमयः मुख्यात्माभवितुमर्हति सर्वान्तरत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा अन्नमयादि ' ' आनन्दमय मुख्य आत्मा हो सकता है, क्योंकि वह सर्वान्तर है, जो सर्वान्तर नहीं है वह आत्मा नहीं हो सकता जैसे अन्नमयादि। ' इस अनुमान से भी आनन्दमय मुख्य आत्मा सिद्ध होता है॥ १२
1.1.13 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १३
विकारशब्दान् नेति चेन् न प्राचुर्यात् ॥ १.१.१३ ॥
पदच्छेद — विकारशब्दात् न , इति } चेत् , न , प्राचुर्यात्
सूत्रार्थ — ( विकारशब्दात् मयट् प्रत्यय विकारार्थका वाचक है, अत : ( न ) ब्रह्म आनन्दमय शब्दका अर्थ नहीं है। ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह ठीक नहीं है, ( प्राचुर्यात् ) कारण कि प्राचुर्यार्थमें मयट् प्रत्ययका विधान है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है।
शाङ्करभाष्य
तैत्तिरीयके अन्नमयं प्राणमयं मनोमयं विज्ञानमयं चानुक्रम्याम्नायते तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः इति। तत्र संशयः किमिहानन्दमयशब्देन परमेव ब्रह्मोच्यते यत्प्रकृतम् सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इति किं वान्नमयादिवद्ब्रह्मणोऽर्थान्तरमिति। किं तावत्प्राप्तम् ब्रह्मणोऽर्थान्तरममुख्य आत्मानन्दमयः स्यात्। कस्मात् अन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वात्। अथापि स्यात्सर्वान्तरत्वादानन्दमयो मुख्य एवात्मेति न स्यात्प्रियाद्यवयवयोगाच्छारीरत्वश्रवणाच्च।
मुख्यश्चेदात्मा स्यान्न प्रियादिसंस्पर्शः स्यात्। इह तु तस्य प्रियमेव शिरः इत्यादि श्रूयते। शारीरत्वं च श्रूयते तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य इति। तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष एव शारीर आत्मा य एष आनन्दमय इत्यर्थः। न च सशरीरस्य सतः प्रियाप्रियसंस्पर्शो वारयितुं शक्यः। तस्मात्संसार्येवानन्दमय आत्मेत्येवं प्राप्ते इदमुच्यते आनन्दमयोऽभ्यासात्। पर एवात्मानन्दमयो भवितुमर्हति। कुतः अभ्यासात्। परस्मिन्नेव ह्यात्मन्यानन्दशब्दो बहुकृत्वोऽभ्यस्यते।
आनन्दमयं प्रस्तुत्य रसो वै सः इति तस्यैव रसत्वमुक्त्वा उच्यते रस््येवायं लब्ध्वानन्दीभवति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति सैषानन्दस्य मीमा्ा भवति एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन इति आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् इति च। श्रुत्यन्तरे च विज्ञानमानन्दं ब्रह्म इति ब्रह्मण्येवानन्दशब्दो दृष्टः। एवमानन्दशब्दस्य बहुकृत्वो ब्रह्मण्यभ्यासादानन्दमय आत्मा ब्रह्मेति गम्यते।
यत्तूक्तमन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वादानन्दमयस्याप्यमुख्यत्वमिति नासौ दोषः आनन्दमयस्य सर्वान्तरत्वात्। मुख्यमेव ह्यात्मानमुपदिदिक्षु शास्त्रं लोकबुद्धिमनुसरत् अन्नमयं शरीरमनात्मानमत्यन्तमूढानामात्मत्वेन प्रसिद्धमनूद्य मूषानिषिक्तद्रुतताम्रादिप्रतिमावत्ततोऽन्तरं ततोऽन्तरमित्येवं पूर्वेण पूर्वेण समानमुत्तरमुत्तरमनात्मानमात्मेति ग्राहयत् प्रतिपत्तिसौकर्यापेक्षया सर्वान्तरं मुख्यमानन्दमयमात्मानमुपदिदेशेति श्लिष्टतरम्।
यथारुन्धतीदर्शने बह्वीष्वपि तारास्वमुख्यास्वरुन्धतीषु दर्शितासु या अन्त्या प्रदर्श्यते सा मुख्यैवारुन्धती भवति एवमिहाप्यानन्दमयस्य सर्वान्तरत्वान्मुख्यमात्मत्वम्। यत्तु ब्रूषे प्रियादीनां शिरस्त्वादिकल्पनानुपपन्ना मुख्यस्यात्मन इति अतीतानन्तरोपाधिजनिता सा न स्वाभाविकीत्यदोषः। शारीरत्वमप्यानन्दमयस्यान्नमयादिशरीरपरम्परया प्रदर्श्यमानत्वात् न पुनः साक्षादेव शारीरत्वं संसारिवत्। तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यहाँ पूर्वपक्षी कहता है कि आनन्दमय परमात्मा नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ विकार वाचक ' मयट् ' प्रत्ययका प्रयोग किया गया है, इसलिए प्रकृति वचन आनन्दसे भिन्न यह शब्द विकार वाचक जाना गया है, कारण कि ' आनन्दमय ' इसमें मयट् विकारार्थक है। अतः अन्नमयादि शब्द के समान आनन्दमय शब्द भी विकारार्थक ही है। ऐसा यदि कहो तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि प्राचुर्यार्थमें भी ' मयट् ' का प्रयोग होता है। ' तत्प्रकृत ० ' ( प्राचुर्य से प्रस्तुत जो प्रकृत तद्वाचक शब्दसे मयट् प्रत्यय यथा ‘ अब्रमयो यज्ञ ' इत्यन्नप्रचुर उच्यते, एवमानन्दप्रचुरं ब्रह्मानन्दमय उच्यते। आनन्दप्रचुरत्वं च ब्रह्मणो मनुष्यत्वादारभ्य तस्मिन्नुत्तरस्मिन्स्थाने शतगुण आनन्द इत्युक्त्वा होता है ) इस सूत्र से प्राचुर्यार्थमें भी मयट् प्रत्यय होता है। जैसे अन्न प्रचुर याग अन्नमय यज्ञ कहलाता है, वैसे ही आनन्द प्रचुर होनेसे ब्रह्म आनन्दमय कहा जाता है। मनुष्यसे लेकर उत्तरोत्तर स्थान में सौ - सौ गुना आनन्द है यह कहकर ब्रह्मानन्द निरतिशय है ऐसा निश्चय होनेसे ब्रह्म आनन्दप्रचुर है। इस कारण प्राचुर्यार्थमें मयट् प्रत्यय है।। १३
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' मयड्वैतयोर्भाषायामभक्षाऽऽच्छादनयो : ' ( पा ० ४।३।१४३ ) इस सूत्र से प्रकृति मात्रमें विकार और अवयवके अर्थ में मयट् प्रत्ययका विकल्पसे विधान किया गया है। अत : इस सूत्र के अभिप्रायसे पूर्वपक्षी ' आनन्दस्य विकार : ' ऐसा विग्रहकर कहता है कि यह मयट् प्रत्यय विकारार्थक है। इसलिए आनन्दके विकार जीवात्माका यहाँ ग्रहण करना चाहिए। परन्तु यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि ' तत्प्रकृत ' इस पाणिनीय सूत्रसे प्राचुर्य अर्थमें भी मयट्का विधान है। अतः आनन्द प्रचुर होनेसे ब्रह्म आनन्द प्रचुर कहा जाता है। परन्तु यहाँ दुःख लवको लेकर मानन्द प्राचुर्यं नहीं कहा गया है ; किन्तु सुख लवको लेकर, क्योंकि ' सैषानन्दस्य मीमांसा भवति ' ( तैत्ति ० २।८।१ ) ' ते ये शतं प्रजापतेरानन्दः ' ( तैत्ति ० २२८१४ ) ( पूर्वोक्त आनन्दसे प्रजापतिके जो सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्माका एक आनन्द है ) इसप्रकार तैत्तिरीय श्रुतिने मनुष्यसे लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त क्रमशः सौ सौगुना उत्तरोत्तरं आनन्दको कहकर ब्रह्म निरतिशय आनन्द है ऐसा कहा है, इसलिए यहाँ प्रचुर अर्थमें ही मयट् प्रत्ययका प्रयोग है।। १३
1.1.14 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १४
तद्धेतुव्यपदेशाच् च ॥ १.१.१४ ॥
पदच्छेद — तद्धेतुव्यपदेशात् , च
सूत्रार्थ — ' एष ह्येवानन्दयाति ' इस श्रुतिमें सब जीवोंके आनन्द के प्रति ब्रह्म ही कारण कहा गया है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है।
शाङ्करभाष्य
इतश्च प्राचुर्यार्थे मयट् यस्मादानन्दहेतुत्वं ब्रह्मणो व्यपदिशति श्रुतिः एष ह्येवानन्दयाति इति आनन्दयतीत्यर्थः। यो ह्यन्यानानन्दयति स प्रचुरानन्द इति प्रसिद्धं भवति यथा लोके योऽन्येषां धनिकत्वमापादयति स प्रचुरधन इति गम्यते तद्वत्। तस्मात्प्राचुर्यार्थेऽपि मयटः संभवादानन्दमयः पर एवात्मा।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इसकारण मी मयट् प्रचुर अर्थ में है, क्योंकि ' एष ह्येवानन्दयाति ' ( निश्चय यही आनन्द देता है ) यह श्रुति ब्रह्मको आनन्दका हेतु कहती है | आनन्दयाति अर्थात् आनन्दयति - आनन्द देता है ऐसा अर्थ है। जो अन्योंको आनन्द देता है वह प्रचुर आनन्द है यह प्रसिद्ध है। जैसे लोकमें जो अन्य निर्धन पुरुषोंको धनी बना देता है वह प्रचुरधन युक्त है, ऐसा ज्ञात होता है। इसकारण प्राचुर्यार्थमें भी मयट्का प्रयोग सम्भव है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है।। १४
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.१.१५ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
1.1.15 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १५
मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १.१.१५ ॥
पदच्छेद — मान्त्रवणिकम् , एव , च , गीयते
सूत्रार्थ — ( मान्त्रवणिकमेव च ) ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस मन्त्र में निर्धारित ब्रह्मका ही ( गीयते ) ' अन्योऽन्तर आत्मानन्दमय : ' इस ब्राह्मणवाक्यमें कथन है, क्योंकि वही प्रकृत है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है।
शाङ्करभाष्य
इतश्चानन्दमयः पर एवात्मा यस्मात् ब्रह्मविदाप्नोति परम् इत्युपक्रम्य सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्यस्मिन्मन्त्रे यत् ब्रह्म प्रकृतं सत्यज्ञानानन्तविशेषणैर्निर्धारितम् यस्मादाकाशादिक्रमेण स्थावरजङ्गमानि भूतान्यजायन्त यच्च भूतानि सृष्ट्वा तान्यनुप्रविश्य गुहायामवस्थितं सर्वान्तरम् यस्य विज्ञानाय अन्योऽन्तर आत्मा अन्योऽन्तर आत्मा इति प्रक्रान्तम् तन्मान्त्रवर्णिकमेव ब्रह्मेह गीयते अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः इति। मन्त्रब्राह्मणयोश्चैकार्थत्वं युक्तम् अविरोधात्। अन्यथा हि प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिये स्याताम्। न चान्नमयादिभ्य इवानन्दमयादन्योऽन्तर आत्माभिधीयते। एतन्निष्ठैव च भार्गवी वारुणी विद्या आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् इति। तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस कारण भी आनन्दमय परमात्मा ही है, क्योंकि ' ब्रह्मविदा ० ' [ ब्रह्मवित् परब्रह्मको प्राप्त होता है ऐसा आरम्भकर ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस मन्त्रमें सत्य, ज्ञान और अनन्त रूप विशेषणोंसे जो प्रकृत ब्रह्म निर्धारित है, जिससे आकाशादि क्रमसे स्थावर और जंगम भूत उत्पन्न हुए हैं तथा जो भूतोंको उत्पन्नकर उनमें प्रवेशकर बुद्धिरूप गुहामें अवस्थित और सबके अन्तर है और जिसके ज्ञानके लिए ' दूसरा अन्तर आत्मा है, दूसरा अन्तर आत्मा है ' ऐसा वर्णन किया है। पूर्व मन्त्रमें वर्णित वह ब्रह्म ही यहाँ ' अन्योऽन्तर आत्मानन्दमय : ' इस श्रुतिमें कहा गया है। मन्त्र और ब्राह्मणका एकार्थत्व होना युक्त है, क्योंकि उनमें विरोध नहीं है। अन्यथा - दोनों को एकार्थक न मानें तो प्रकृतहान और अप्रकृतप्रक्रियाकी कल्पना ( प्रकृत अर्थको छोड़कर अप्रकृत अर्थक कल्पना ) प्रसक्त होगी। जैसे अन्नमयादिसे अन्य आत्माका अभिधान है, वैसे आनन्दमय से अन्य आत्माका अभिधान नहीं किया गया है। ' सैषा ० ' ( यह जो भृगुको वरुणद्वारा प्राप्त विद्या है वह मी आनन्दमय में ही पर्यवसित है ) अतः आनन्दमय परमात्मा ही है।। १५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * प्रथम सूत्रोंसे लिङ्गरूप वेदान्त वाक्योंको लेकर आनन्दमय ब्रह्म कहा गया है। अब प्रकरणको लेकर कहा जाता है - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ' इत्यादि मन्त्रों में प्रतिपादित ब्रह्म ही ' अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः ' इस ब्राह्मण वाक्य में कहा गया है। इसप्रकार मन्त्र और ब्राह्मण वाक्य एकार्थक हैं, क्योंकि दोनोंमें विरोध नहीं है। इसलिए आनन्दमय परमात्मा ही है।। १५
1.1.16 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १६
नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १.१.१६ ॥
पदच्छेद — न , इतरः , अनुपपत्तेः
सूत्रार्थ — ( इतर : ) जीव ( न ) आनन्दमय नहीं है। ( अनुपपत्तेः ) क्योंकि ' सोऽकामयत ' इसप्रकार सृष्टिसे पहले श्रूयमाण कामयितृत्व आदि धर्मोकी उसमें उपपत्ति नहीं है। अतः आनन्दमय परमात्मा ही है।
शाङ्करभाष्य
इतश्चानन्दमयः पर एवात्मा नेतरः इतर ईश्वरादन्यः संसारी जीव इत्यर्थः। न जीव आनन्दमयशब्देनाभिधीयते कस्मात् अनुपपत्तेः। आनन्दमयं हि प्रकृत्य श्रूयते सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। इद्र्वमसृजत। यदिदं किंच इति। तत्र प्राक्शरीराद्युत्पत्तेरभिध्यानम् सृज्यमानानां च विकाराणां स्रष्टुरव्यतिरेकः सर्वविकारसृष्टिश्च न परस्मादात्मनोऽन्यत्रोपपद्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इसकारण भी आनन्दमय परमात्मा ही है इतर नहीं। इतर अर्थात् ईश्वरसे अन्य संसारी जीव, ऐसा अर्थ है | आनन्दमय शब्दसे जीवका अभिधान नहीं है, क्योंकि उसमें आनन्दमयत्वको उपपत्ति नहीं है। आनन्दमयको प्रस्तुतकर ' सोऽकामयत ० ' ( उसने कामना की कि मैं बहुत हो जाऊँ उत्पन्न होऊँ उसने तप किया, उसने तप कर यह जो कुछ है वह सब उत्पन्न किया ) ऐसी श्रुति है। इस श्रुतिमें प्रतिपादित शरीरादिकी उत्पत्ति के पहले कामना, सृज्यमान विकारोंका स्रष्टासे अभेद एवं सब विकारोंकी सृष्टि यह सब परमात्मासे अन्यमें उपपन्न नहीं होता॥ १६
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.१.१७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
1.1.17 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १७
भेदव्यपदेशाच् च ॥ १.१.१७ ॥
पदच्छेद — भेदव्यपदेशात् , च
सूत्रार्थ — और ' रसह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति ' यह श्रुति जीव और आनन्दभयका भेदसे व्यपदेश करती है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है।
शाङ्करभाष्य
इतश्च नानन्दमयः संसारी यस्मादानन्दमयाधिकारे रसो वै सः। रस््येवायं लब्ध्वानन्दी भवति इति जीवानन्दमयौ भेदेन व्यपदिशति। न हि लब्धैव लब्धव्यो भवति। कथं तर्हि आत्मान्वेष्टव्यः आत्मलाभान्न परं विद्यते इति श्रुतिस्मृती यावता न लब्धैव लब्धव्यो भवतीत्युक्तम् बाढम् तथाप्यात्मनोऽप्रच्युतात्मभावस्यैव सतस्तत्त्वानवबोधनिमित्तो मिथ्यैव देहादिष्वनात्मसु आत्मत्वनिश्चयो लौकिको दृष्टः। तेन देहादिभूतस्यात्मनोऽपि आत्मा अनन्विष्टः अन्वेष्टव्यः अलब्धः लब्धव्यः अश्रुतः श्रोतव्यः अमतः मन्तव्यः अविज्ञातः विज्ञातव्यः इत्यादिभेदव्यपदेश उपपद्यते। प्रतिषिध्यत एव तु परमार्थतः सर्वज्ञात्परमेश्वरादन्यो द्रष्टा श्रोता वा नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इत्यादिना। परमेश्वरस्तु अविद्याकल्पिताच्छारीरात्कर्तुर्भोक्तुः विज्ञानात्माख्यात् अन्यः यथा मायाविनश्चर्मखड्गधरात्सूत्रेणाकाशमधिरोहतः स एव मायावी परमार्थरूपो भूमिष्ठोऽन्यः यथा वा घटाकाशादुपाधिपरिच्छिन्नादनुपाधिपरिच्छिन्न आकाशोऽन्यः। ईदृशं च विज्ञानात्मपरमात्मभेदमाश्रित्य नेतरोऽनुपपत्तेः भेदव्यपदेशाच्च इत्युक्तम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इस कारण भी आनन्दमय संसारी नहीं है, क्योंकि आनन्दमयके प्रकरणमें ' रसो वै ० ' ( निश्चय, वह रस है, इसको पाकर ही यह जीव आनन्दी होता है ) यह श्रुति जीव और आनन्दमयका भेदसे व्यपदेश करती है। जब लब्धा हीं लब्धव्य नहीं होता, तब ' आत्मान्वेष्टव्यः ० ' ( आत्माकी खोज करनी चाहिए ) ' आत्मलाभाज ० ' ( आत्मला ससे बढ़कर कुछ नहीं है ) यह श्रुति और स्मृति कैसे उपपन्न होंगी? जब कि लब्धा ही लब्धव्य नहीं होता, ऐसा कहा गया है।
यद्यपि यह ठीक है, तथापि ( अभेद होनेपर भी ) जिस आत्माका आत्मभाव नष्ट नहीं हुआ है अर्थात् अखण्ड एकरस आत्माके यथार्थ स्वरूपके अज्ञानके कारण देहादि अनात्मपदार्थ में भ्रमरूप आत्मत्व निश्चय लोक में देखा गया है। उस ( मिथ्याज्ञान ) से देहादिरूप आत्माका भी आत्मा अनन्विष्ट होता हुआ अन्वेष्टव्य, अलब्धा होता हुआ लब्धव्य, अश्रुत होता हुआ श्रोतव्य, अमत होता हुआ मन्तव्य, अविज्ञात होता हुआ विज्ञातव्य है इत्यादि भेद व्यपदेश युक्त ही है।
परमार्थते तो सर्वज्ञ परमेश्वर से अन्य द्रष्टा, श्रोताका ' नान्योऽत ० ' ( उस परमेश्वरसे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतिसे प्रतिषेध किया जाता है। परमेश्वर तो अविद्यासे कल्पित शारीर कर्ता, भोक्ता विज्ञानात्मासे अन्य है। जैसे ढाल और खड्ग धारणकर सूत्रद्वारा आकाशमें आरुढ मायावी नटसे भूमिस्थ परमार्थरूप वही मायावी भिन्न है।
अथवा जैसे घटरूप उपाधिसे परिच्छिन्न आकाशसे उपाधि रहित महाकाश भिन्न है, वैसे ही विज्ञानात्मा और परमात्माके कल्पित भेदका आश्रयणकर ' नेतरोऽनुपपत्तेः ' ' भेदव्यपदेशाच्च ' ये सूत्र कहे गये हैं॥ १७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' रसो चै सः ' आदि श्रुतिमें प्रकृत आनन्दमयको ' सः ' ( वह ) शब्द से कहा गया है और इस रसरूप आनन्दमयको प्राप्त करने वाला जीव है। इसलिए लब्धा जीव लब्धव्य आनन्दमय परमात्मा कदापि नहीं हो सकता। यदि लब्धा और लब्धव्य में मेद मानें तो ' आत्मान्वेष्टव्यः ' ' आत्मलाभान्न परं विद्यते इत्यादि श्रुति, स्मृतिका बाध होगा अर्थात् लब्धा और लब्धव्य दोनोंके अभेदमें ही ये संगत होती हैं अन्यथा नहीं। यह ठीक है, परन्तु आत्मा ही आत्मासे लभ्य है यह कथन तो अभेद में ठीक नहीं है, अतः मानना होगा कि यह सब कथन कल्पित भेदको लेकर है। अखण्ड एक रस चिद्रूप आत्माका ' मैं आत्मा हूँ ' इसप्रकार यथार्थ ज्ञान न होनेके कारण अनात्मदेहादिमें ' मैं मनुष्य हूँ ' . ऐसा अज्ञानसे भ्रमरूप आत्मत्व निश्चय होनेपर अपनेको परमात्मासे भिन्न समझता है। इसप्रकार अभिन्न सद्रूप आत्मामें जीव और ईश्वरके कल्पित भेदको लेकर लब्धा और लब्धव्यादि श्रुति, स्मृति - में कहे गये हैं। अतः जीव और आनन्दमयका पारमार्थिक अभेद होनेपर भी कोई दोष नहीं है।
* शंका — ‘ नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतिके आधारपर यदि परमेश्वरसे जीव भिन्न नहीं है तो मिथ्या जीवके साथ अभेद होनेके कारण परमेश्वर भी मिथ्या हो जायगा? समाधान - जैसे शुक्तिमें आरोपित रजत शुक्तिसे भिन्न नहीं है तथा आरोपित रजत से अभिन्न होनेपर भी शुक्ति मिथ्या नहीं है, क्योंकि शुक्ति आरोपित रजतका अधिष्ठान होनेसे उससे भिन्न है, वैसे ही अविद्या में प्रतिबिम्बरूपसे कल्पित जीवसे परमेश्वर भिन्न है, इससे वह मिथ्या नहीं है। यद्यपि कल्पित वस्तु अधिष्ठानने भिन्न नहीं होती, फिर भी अधिष्ठानका उससे भेद है।। १७
1.1.18 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १८
कामाच् च नानुमानापेक्षा ॥ १.१.१८ ॥
पदच्छेद — कामात् च , न , अनुमानापेक्षा :
सूत्रार्थ — ( कामात् ) ' सोऽकामयत ' इसप्रकार कामयितृत्वका श्रवण है, अतः ( नानुमानापेक्षा ) अनुमानगम्य प्रधानकी आनन्दमय शब्द से अपेक्षा नहीं हो सकती।
शाङ्करभाष्य
आनन्दमयाधिकारे च सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति इति कामयितृत्वनिर्देशाच्च नानुमानिकमपि सांख्यपरिकल्पितमचेतनं प्रधानमानन्दमयत्वेन कारणत्वेन वा अपेक्षितव्यम्। ईक्षतेर्नाशब्दम् इति निराकृतमपि प्रधानं पूर्वसूत्रोदाहृतां कामयितृत्वश्रुतिमाश्रित्य प्रसङ्गात्पुनर्निराक्रियते गतिसामान्यप्रपञ्चनाय।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और आनन्दमयके प्रकरण में ' सोऽकामयत ० ' ( उसने कामना की बहुत होऊँ उत्पन्न होऊँ ) इसप्रकार कामयितृत्वका निर्देश होनेसे अनुमानगम्य सांख्य परिकल्पित अचेतन प्रधान भी आनन्दमयरूपसे अथवा कारणरूपसे अपेक्षितव्य ग्राह्य नहीं है। ' ईक्षतं ० ' इस सूत्रसे यद्यपि प्रधानका निराकरण किया गया है, तो भी सब वेदान्तवाक्यों से अवगति ( कारणज्ञान ) समान है ऐसा विस्तारसे दिखलानेके लिए पूर्वसूत्र ( ईक्षतेर्नाशब्दम् ) में उदाहृत कामयितृत्व श्रुतिको लेकर प्रसंगसे पुनः निराकरण किया जाता है॥ १८
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.१.१९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
1.1.19 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र १९
अस्मिन्न् अस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १.१.१९ ॥
पदच्छेद — अस्मिन् अस्य , च , तद्योगम् , शास्ति
सूत्रार्थ — ' यदा ह्येवैष ' इत्यादि श्रुति ( अस्मिन् ) इस प्रकृत आनन्दमय आत्मामें ( अस्य ) प्रतिबुद्ध जीवकी ( तद्योगम् ) तद्भावापत्ति- मुक्तिका ( शास्ति ) उपदेश करती है, इसलिए जीव अथवा प्रधान आनन्दमय नहीं है, किन्तु परमात्मा ही है।
शाङ्करभाष्य
शाङ्करभाष्यम्॥ इतश्च न प्रधाने जीवे वानन्दमयशब्दः यस्मादस्मिन्नानन्दमये प्रकृत आत्मनि प्रतिबुद्धस्यास्य जीवस्य तद्योगं शास्ति तदात्मना योगस्तद्योगः तद्भावापत्तिः मुक्तिरित्यर्थः तद्योगं शास्ति शास्त्रम् यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति इति।
एतदुक्तं भवति यदैतस्मिन्नानन्दमयेऽल्पमप्यन्तरमतादात्म्यरूपं पश्यति तदा संसारभयान्न निवर्तते यदा त्वेतस्मिन्नानन्दमये निरन्तरं तादात्म्येन प्रतितिष्ठति तदा संसारभयान्निवर्तत इति। तच्च परमात्मपरिग्रहे घटते न प्रधानपरिग्रहे जीवपरिग्रहे वा। तस्मादानन्दमयः परमात्मेति सिद्धम्।।
इदं त्विह वक्तव्यम् स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः तस्मात् अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः तस्मात् अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः इति च विकारार्थे मयट्प्रवाहे सति आनन्दमय एवाकस्मादर्धजरतीयन्यायेन कथमिव मयटः प्राचुर्यार्थत्वं ब्रह्मविषयत्वं चाश्रीयत इति। मान्त्रवर्णिकब्रह्माधिकारादिति चेत् न अन्नमयादीनामपि तर्हि ब्रह्मत्वप्रसङ्गः।
अत्राह युक्तमन्नमयादीनामब्रह्मत्वम् तस्मात्तस्मादान्तरस्यान्तरस्यान्यस्यान्यस्यात्मन उच्यमानत्वात् आनन्दमयात्तु न कश्चिदन्य आन्तर आत्मोच्यते तेनानन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् अन्यथा प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गादिति। अत्रोच्यते यद्यप्यन्नमयादिभ्य इवानन्दमयात् अन्योऽन्तर आत्मा इति न श्रूयते तथापि नानन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् यत आनन्दमयं प्रकृत्य श्रूयते तस्य प्रियमेव शिरः मोदो दक्षिणः पक्षः प्रमोद उत्तरः पक्षः आनन्द आत्मा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इति।
तत्र यद्ब्रह्मेह मन्त्रवर्णे प्रकृतम् सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इति तदिह ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इत्युच्यते। तद्विजिज्ञापयिषयैवान्नमयादय आनन्दमयपर्यन्ताः पञ्च कोशाः कल्प्यन्ते। तत्र कुतः प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गः। नन्वानन्दमयस्यावयवत्वेन ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इत्युच्यते अन्नमयादीनामिव इदं पुच्छं प्रतिष्ठा इत्यादि तत्र कथं ब्रह्मणः स्वप्रधानत्वं शक्यं विज्ञातुम् प्रकृतत्वादिति ब्रूमः।
नन्वानन्दमयावयवत्वेनापि ब्रह्मणि विज्ञायमाने न प्रकृतत्वं हीयते आनन्दमयस्य ब्रह्मत्वादिति अत्रोच्यते तथा सति तदेव ब्रह्म आनन्दमय आत्मा अवयवी तदेव च ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा अवयव इत्यसामञ्जस्यं स्यात्। अन्यतरपरिग्रहे तु युक्तम् ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इत्यत्रैव ब्रह्मनिर्देश आश्रयितुम् ब्रह्मशब्दसंयोगात् नानन्दमयवाक्ये ब्रह्मशब्दसंयोगाभावादिति। अपि च ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेत्युक्त्वेदमुच्यते तदप्येष श्लोको भवति। असन्नेव स भवति। असद्ब्रह्मेति वेद चेत्। अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद।
सन्तमेनं ततो विदुः इति। अस्मिंश्च श्लोकेऽननुकृष्यानन्दमयं ब्रह्मण एव भावाभाववेदनयोर्गुणदोषाभिधानाद्गम्यते ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इत्यत्र ब्रह्मण एव स्वप्रधानत्वमिति। न चानन्दमयस्यात्मनो भावाभावाशङ्का युक्ता प्रियमोदादिविशिष्टस्यानन्दमयस्य सर्वलोकप्रसिद्धत्वात्। कथं पुनः स्वप्रधानं सद्ब्रह्म आनन्दमयस्य पुच्छत्वेन निर्दिश्यते ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इति नैष दोषः।
पुच्छवत्पुच्छम् प्रतिष्ठा परायणमेकनीडं लौकिकस्यानन्दजातस्य ब्रह्मानन्दः इत्येतदनेन विवक्ष्यते नावयवत्वम् एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति श्रुत्यन्तरात्। अपि चानन्दमयस्य ब्रह्मत्वे प्रियाद्यवयवत्वेन सविशेषं ब्रह्माभ्युपगन्तव्यम् निर्विशेषं तु ब्रह्म वाक्यशेषे श्रूयते वाङ्मनसयोरगोचरत्वाभिधानात् यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति कुतश्चन इति।
अपि चानन्दप्रचुर इत्युक्ते दुःखाल्पीयस्त्वमपि गम्यते प्राचुर्यस्य लोके प्रतियोग्यल्पत्वापेक्षत्वात्। तथा च सति यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा इति भूम्नि ब्रह्मणि तद्व्यतिरिक्ताभावश्रुतिरुपरुध्येत। प्रतिशरीरं च प्रियादिभेदादानन्दमयस्य भिन्नत्वम् ब्रह्म तु न प्रतिशरीरं भिद्यते सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्यानन्त्यश्रुतेः एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा इति च श्रुत्यन्तरात्। न चानन्दमयाभ्यासः श्रूयते।
प्रातिपदिकार्थमात्रमेव हि सर्वत्राभ्यस्यते रसो वै सः। रस््येवायं लब्ध्वानन्दी भवति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् सैषानन्दस्य मीमा्ा भवति आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन इति आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् इति च।
यदि चानन्दमयशब्दस्य ब्रह्मविषयत्वं निश्चितं भवेत् तत उत्तरेष्वानन्दमात्रप्रयोगेष्वप्यानन्दमयाभ्यासः कल्प्येत न त्वानन्दमयस्य ब्रह्मत्वमस्ति प्रियशिरस्त्वादिभिर्हेतुभिरित्यवोचाम तस्माच्छ्रुत्यन्तरे विज्ञानमानन्दं ब्रह्म इत्यानन्दपदप्रातिपदिकस्य ब्रह्मणि प्रयोगदर्शनात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् इति ब्रह्मविषयः प्रयोगो न त्वानन्दमयाभ्यास इत्यवगन्तव्यम्।
यस्त्वयं मयडन्तस्यैवानन्दमयशब्दस्याभ्यासः एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति इति न तस्य ब्रह्मविषयत्वमस्ति विकारात्मनामेवान्नमयादीनामनात्मनामुपसंक्रमितव्यानां प्रवाहे पतितत्वात्। नन्वानन्दमयस्योपसंक्रमितव्यस्यान्नमयादिवदब्रह्मत्वे सति नैव विदुषो ब्रह्मप्राप्तिः फलं निर्दिष्टं भवेत्। नैष दोषः आनन्दमयोपसंक्रमणनिर्देशेनैव विदुषः पुच्छप्रतिष्ठाभूतब्रह्मप्राप्तेः फलस्य निर्दिष्टत्वात् तदप्येष श्लोको भवति यतो वाचो निवर्तन्ते इत्यादिना च प्रपञ्च्यमानत्वात्।
या त्वानन्दमयसंनिधाने सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति इतीयं श्रुतिरुदाहृता सा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इत्यनेन संनिहिततरेण ब्रह्मणा संबध्यमाना नानन्दमयस्य ब्रह्मतां प्रतिबोधयति। तदपेक्षत्वाच्चोत्तरस्य ग्रन्थस्य रसो वै सः इत्यादेर्नानन्दमयविषयता। ननु सोऽकामयत इति ब्रह्मणि पुंलिङ्गनिर्देशो नोपपद्यते। नायं दोषः तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः इत्यत्र पुंलिङ्गेनाप्यात्मशब्देन ब्रह्मणः प्रकृतत्वात्।
यत्तु भार्गवी वारुणी विद्या आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् इति तस्यां मयडश्रवणात्प्रियशिरस्त्वाद्यश्रवणाच्च युक्तमानन्दस्य ब्रह्मत्वम्। तस्मादणुमात्रमपि विशेषमनाश्रित्य न स्वत एव प्रियशिरस्त्वादि ब्रह्मण उपपद्यते। न चेह सविशेषं ब्रह्म प्रतिपिपादयिषितम् वाङ्मनसगोचरातिक्रमणश्रुतेः। तस्मादन्नमयादिष्विवानन्दमयेऽपि विकारार्थ एव मयट् विज्ञेयः न प्राचुर्यार्थः।। सूत्राणि त्वेवं व्याख्येयानि ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इत्यत्र किमानन्दमयावयवत्वेन ब्रह्म विवक्ष्यते उत स्वप्रधानत्वेनेति।
पुच्छशब्दादवयवत्वेनेति प्राप्ते उच्यते आनन्दमयोऽभ्यासात् आनन्दमय आत्मा इत्यत्र ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इति स्वप्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यते अभ्यासात् असन्नेव स भवति इत्यस्मिन्निगमनश्लोके ब्रह्मण एव केवलस्याभ्यस्यमानत्वात्।
विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् विकारशब्दोऽवयवशब्दोऽभिप्रेतः पुच्छमित्यवयवशब्दान्न स्वप्रधानत्वं ब्रह्मण इति यदुक्तम् तस्य परिहारो वक्तव्यः अत्रोच्यते नायं दोषः प्राचुर्यादप्यवयवशब्दोपपत्तेः प्राचुर्यं प्रायापत्तिः अवयवप्राये वचनमित्यर्थः अन्नमयादीनां हि शिरआदिषु पुच्छान्तेष्ववयवेषूक्तेष्वानन्दमयस्यापि शिरआदीन्यवयवान्तराण्
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इस कारण भी प्रधानमें अथवा जीवमें आनन्दमय प्रयोग नहीं हो सकता, क्योंकि शास्त्र इस प्रतिबुद्ध जीवका इस प्रकृत आनन्दमय आत्मामें तद्योग - अभेद बतलाता है। तद्रूपसे योग तद्योगतद्भावापत्ति अर्थात् मुक्ति ऐसा अर्थ है।
' यद्वा ह्येवैष ० ' ( जब यह साधक इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वाच्य और निराधार ब्रह्ममें अभयस्थिति प्राप्त करता है तब वह अभयको प्राप्त हो जाता है, जब यह उस ब्रह्ममें थोड़ी सी भी भेददृष्टि करता है तब इसे मय प्राप्त होता है ) यह शास्त्र तद्योग ( अभेद ) का उपदेश करता है।
इसका तात्पर्य यह है कि जब इस आनन्दमय परमात्मामें किञ्चित् . भी भेद अतादात्म्यरूप देखता है तब संसारभयसे निवृत्त ( मुक्त ) नहीं होता, जब इस आनन्दमयमें निरन्तर तादात्म्यरूपसे प्रतिष्ठित होता है तब संसारभयसे निवृत्त हो जाता है | श्रुतिका यह तात्पयं आनन्दमयशब्दसे परमात्माका ग्रहण करनेपर ही घटता है। प्रधानका परिग्रह अथवा जीवका परिग्रह करने में नहीं घटता। इससे यह सिद्ध होता है कि आनन्दमय परमात्मा है।
परन्तु यहाँ यह कहना चाहिए कि ' स वा एष ० ' ( वह पुरुष अन्न रसमय है ) ' तस्माद्वा ० ), ( उस अन्न रसमय स्थूल शरीरसे अन्य आन्तर आत्मा प्राणमय है ) ' तस्मादन्यो ० ' ( उससे अन्य आन्तर आत्मा मनोमय है ) ' तस्मादन्यो ० ', ( उससे अन्य आन्तर आत्मा विज्ञानमय है ) इस प्रकार विकारार्थक मयट् प्रवाह में विना किसी कारण अर्धजरतीय न्यायसे + आनन्दमय में मयट् प्रत्यय प्राचुर्यार्थक है और आनन्दमय ब्रह्म विषयक है यह कैसे आश्रय लेते हो?
यदि कहो कि मन्त्रमें वर्णित ब्रह्मके प्रकरण होनेसे ऐसा लिया गया है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर तो अन्नमयादिमें भी ब्रह्मत्व प्रसङ्ग होगा। वृत्तिकार इसपर कहते हैं - अन्नमयादि ब्रह्म नहीं है यह युक्त है, क्योंकि उससे आन्तर अन्य, उससे आन्तर अन्य, इस प्रकार आत्मा कहा गया है, किन्तु आनन्दमयके आन्तर अन्य कोई आत्मा नहीं कहा गया है, इससे आनन्दमय ब्रह्म है, अन्यथा प्रकृतकी हानि और अप्रकृत प्रक्रियाकी प्रसक्ति होगी।
सिद्धान्तीइसपर कहते हैं —–— यद्यपि अन्नमयादिके समान आनन्दमय से अन्य आन्तर आत्मा ऐसा श्रुति नहीं कहती, तो भी आनन्दमय ब्रह्म नहीं है, क्योंकि आनन्दमयको प्रस्तुतकर ' तस्य प्रियमेव शिरः ० ' ( प्रिय ही उसका शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, आनन्द आत्मा है ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा है ) ऐसा श्रुति कहतो है। जो ब्रह्म सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' उस मन्त्र में प्रकृत हैं, वही यहाँ ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ऐसा कहा जाता है।
उसे जानने की इच्छा से ही अन्नमयादि आनन्दमय पर्यन्त पाँच कोशोंकी कल्पना की गई है, तो ऐसी स्थिति में प्रकृतकी हानि और अप्रकृत प्रक्रियाका प्रसङ्ग कैसे होगा? परन्तु जैसे अन्नमयादिके अवयवरूपसे ' इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ' ( यह पुच्छ प्रतिष्ठा है ) कहा गया है, वैसे ही आनन्दमय के अवयवरूप से ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ( ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा हैं ) कहा जाता है, तो उसमें ब्रह्म स्वप्रधान है यह कैसे जाना जा सकता है? ब्रह्म प्रकृत हैं, अतः हम ऐसा कहते हैं।
परन्तु आनन्दमयके अवयवरूपसे ब्रह्मके जान लेनेपर भी उसका प्रकृतत्व नष्ट नहीं होता, क्योंकि आनन्दमय ब्रह्म ही है | सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं—– यदि ऐसा माना जाय तो वही ब्रह्म आनन्दमय आत्मा अवयवी और वही ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठारूप अवयव होगा, इससे यह कथन अयुक्त होगा। दोनों में एक्का ग्रहण करें तो ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इसमें ही ब्रह्मनिर्देश आश्रयण करना युक्त है, क्योंकि इस वाक्य में ब्रह्मशब्दका सम्वन्ध है।
आनन्दमय वाक्यमें ब्रह्म निर्देश ग्रहण करना युक्त नहीं है, कारण कि उसमें ब्रह्म शब्दका सम्बन्ध नहीं है। किञ्च ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ऐसा कहकर ' तदप्येष ० ' ( उसमें और यह श्लोक है, ब्रह्म असत् है ऐसा जो जानता है स्वयं भी वह असत् ही हो जाता है, यदि ऐसा जानता है कि ब्रह्म है तो ब्रह्मवे लोग उसे सत् समझते हैं ) यह कहा जाता है।
इस मन्त्रमें आनन्दमयकी अनुवृत्ति किये बिना ब्रह्म के ही भाव और अभावके ज्ञानसे गुण और दोषका अभिधान है, अत : ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस वाक्यमें ब्रह्मका ही स्वप्रधानत्व ज्ञात होता है | आनन्दमय आत्मा के भाव और अमाव विषयक शंका युक्त नहीं है, क्योंकि प्रिय मोद आदि विशेष युक्त आनन्दमय सर्वलोक प्रसिद्ध है। तो फिर स्वप्रधान होते हुए ब्रह्मका ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस प्रकार आनन्दमयके पुच्छरूपसे निर्देश कैसे किया गया है? यह दोष नहीं है।
पुच्छ - पुच्छसदृश, प्रतिष्ठा - वासस्थान अर्थात् लौकिक आनन्द समूहका ब्रह्मानन्द परस्थान- एक अधिष्ठान है इससे यह अर्थ विवक्षित है, किन्तु अवयवरूप अर्थ नहीं ; क्योंकि ' एतस्यैव ० ' ( इसी आनन्दके अंशको लेकर अन्य प्राणी जीवित रहते हैं अर्थात् अविद्याद्वारा प्रस्तुत इंद्रिय और विषय के सम्बन्धरो उत्पन्न आनन्दकी मात्राको लेकर अन्य प्राणी आनन्दित होते हैं ) यह दूसरी श्रुति है।
और यदि आनन्दमयको ब्रह्म मानें तो उसके प्रियादि अवयवोंके होने से सगुण ब्रह्मको स्वीकार करना होगा, परन्तु वाक्यशेषमें निर्गुण ब्रह्म सुना जाता है, क्योंकि ' यतो वाचो ० ' ( जहाँ से मनके साथ वाणी उसे प्राप्त न कर लौट आती है, ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला किसीसे मयमीत नहीं होता ) इस प्रकार वाणी और मनका अविषय कहा गया है।
और ' आनन्द प्रचुर ' ऐसा कहनेपर दुःखका अस्तित्व भी ज्ञात होता है, क्योंकि लोकमें प्राचुर्यको अपने प्रतियोगी अल्पत्वकी अपेक्षा रहती है, ऐसा होनेपर ' यत्र नान्यत्प ० ' ( सनत्कुमार - हे नारद! जहाँ अन्य कुछ नहीं देखता, अन्य कुछ नहीं सुनता, अन्य कुछ नहीं जानता वह भूमा ब्रह्म है ) इस प्रकार भूमा ब्रह्म में उससे अन्य वस्तुके अभावकी प्रतिपादक श्रुति बाधित होगी।
प्रत्येक शरीर में प्रियादिके भेदसे आनन्दमय भी भिन्न है, परन्तु ब्रह्म प्रतिशरीर में भिन्न नहीं है, क्योंकि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' यह आनन्त्य श्रुति है, और ' एको देवः ० ' ( सभी प्राणियोंमें गूढ सर्वव्यापक और सभी भूतोंका अन्तरात्मा एक देव है ) यह भूतान्तरात्मा ' ( श्वे ० ६।११ ) इति च श्रुत्यन्तरात्।
नचानन्दमयस्याभ्यासः श्रूयते, प्रातिपदिकार्थमात्रमेव हि सर्वत्राभ्यस्यते – ' रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति को ह्येवामयसंनिधाने ' सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति ' इयं श्रुतिरुदाहृता, सा ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' दूसरी श्रुति भी है।
और आनन्दमयके अभ्यासकी श्रुति नहीं है, क्योंकि सर्वत्र प्रातिपदिकार्थं मात्रका अभ्यास है, जैसे कि ‘ रसो बै सः ० ' ( निश्चय वह रस - सार है रसको पाकर ही यह आनन्दी होता है, यदि हृदयाकाशमें स्थित आनन्द रूप आत्मा न होता तो कौन व्यक्ति अपान क्रिया करता और कौन प्राणन क्रिया करता यही तो उन्हें आनन्द देता है, अब इस ब्रह्मके आनन्दकी मीमांसा है, ब्रह्मके आनन्दका अनुभव करनेवाला विद्वान् किसीसे भयभीत नहीं होता ) ' आनन्द ब्रह्म है ऐसा जाने ' इत्यादि श्रुतियोंमें स्पष्ट है।
यदि आनन्दमय शब्द ब्रह्म विषयक निश्चित हो तो आगे आनन्दमात्र प्रयोगवाले वाक्योंमें मी लक्षणांसे आनन्दमयके अभ्यासकी कल्पना होती। परन्तु प्रिय शिरस्त्वादि हेतुओंसे आनन्दमय ब्रह्म नहीं है ऐसा हमे कह चुके हैं।
इसलिए ' विज्ञानं ० ' ( ब्रह्म विज्ञान स्वरूप और आनन्द स्वरूप है | ) इस दूसरी श्रुतिमें प्रातिपदिक आनन्दशब्दका ब्रह्ममें प्रयोग देखा जाता है, इससे ' यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रुतिमें ब्रह्म विषयक आनन्दशब्दका प्रयोग है किन्तु आनन्दमयका अभ्यास नहीं है, ऐसा समझना चाहिए।
' एतमानन्दमय ० ' ( इस आनन्दमय आत्माका बाध करता है ) इसमें यह जो मयट् प्रत्ययान्त आनन्द शब्दका अभ्यास है वह ब्रह्म विषयक नहीं है, क्योंकि बाध के योग्य विकारात्मक - अन्नमयादि अनात्मवस्तुओंकी परम्परा में पठित है। परन्तु अन्नमयादिके समान यदि प्राप्तव्य आनन्दमयको ब्रह्म न मानें तो ब्रह्मवित् विद्वान्को ब्रह्मप्राप्ति रूप निर्दिष्ट फल न होगा? सि ० --- यह दोष नहीं है, क्योंकि आनन्दमयके बाधके निर्देशसे ही पुच्छ एवं प्रतिष्ठा भूत ब्रह्मकी प्राप्ति रूप फलका निर्देश है।
‘ तदप्येष ' ( उसमें यह भी मन्त्र है ) ' यतो वाचो निवर्तन्ते ' इत्यादिसे उनका विस्तार किया गया है | आनन्दमयके संनिधान में ' सोऽकामत ' यह जो श्रुति उदाहृत है, वह ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस अत्यन्त संनिहित ब्रह्मके साथ सम्बद्ध होती हुई आनन्दमयमें ब्रह्मत्वका बोध नहीं कराती, और ' रसो वै सः ' इत्यादि उत्तरग्रन्थको उसको अपेक्षा है, इससे यह आनन्दमय विषयक नहीं है। परन्तु - ' सोऽकामयत ' ( उसने कामनाकी ) इस प्रकार ब्रह्ममें पुंलिङ्ग ( स ) शब्दका निर्देश युक्त नहीं है?
सिद्धान्ती – यह दोष नहीं है, क्योंकि ' तस्माद्वा ० ' ( उस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इस श्रुतिमें पुंलिङ्ग आत्मशब्द से भी ब्रह्म प्रकृत है। ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' यह जो मार्गवी वारुणी विद्या है उसमें मयट् प्रत्ययका श्रवण नहीं है और प्रियशिरस्त्वादि अवयवोंका भी श्रवण नहीं है, इसलिए आनन्द ब्रह्म है यह कथन युक्त है, अतः अणुमात्र भी विशेषका आश्रय किये विना अपने आप ही प्रियशिरस्त्वादि ब्रह्ममें युक्त नहीं है।
यहाँ सगुण ब्रह्मका प्रतिपादन इष्ट नहीं है, क्योंकि इसी प्रकरण में ब्रह्म वाणी और मनका अविषय है ऐसी श्रुति है, इसलिए अन्नमयादिके समान आनन्दमयमें भी मयट् प्रत्यय विकारार्थक ही समझना चाहिए प्राचुर्यार्थक नहीं। सूत्रोंका व्याख्यान तो इस प्रकार करना चाहिए कि ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इसमें क्या आनन्दमयके अवयवरूपसे ब्रह्म विवक्षित है अथवा स्वप्रधानरूपसे?
पुच्छशब्द के प्रयोगके कारण ब्रह्म अवयव रूपसे विवक्षित है, ऐसा प्राप्त होनेपर सूत्रकार कहते हैं - ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' आनन्दमय आत्मा है, इसमें ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस तरह स्वप्रधानरूपसे ही ब्रह्म उपदिष्ट है, क्योंकि उसका अभ्यास है। कारण कि ' असन्नेव स भवति ' ( वह असत् ही होता है ) इस उपसंहार श्लोकमें केवल ब्रह्म ही अभ्यष्यमान है। ' विकारशब्दान्नेति ० ' ( सू ० १३ ) इसमें विकारशब्दसे अवयव शब्द अभिप्रेत है।
' पुच्छं ' इस अवयवशब्दसे ब्रह्म स्वप्रधान नहीं है, ऐसा जो कहा गया है, उसका परिहार करना चाहिए। इसपर कहते हैं - यह दोष नहीं है, क्योंकि प्राचुर्यसे भी [ ब्रह्ममें ] अवयव शब्दकी उपपत्ति हो सकती है।
प्राचुर्य - प्राय : आपत्ति - अवयव क्रमी बुद्धि प्राप्ति, अवयव प्रायमें वचन अधिकतासे अवयवोंके प्रतिपादक प्रकरण में कहा हुआ वचन, ऐसा अर्थ है, क्योंकि अन्नमयादिके शिर आदिसे लेकर पुच्छ पर्यन्त अवयव कथन के अनन्तर आनन्दमयके भी शिरादि अन्य अवयव कहकर अवयव क्रमकी प्राप्ति होनेसे ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ऐसा कहा है। अवयवकी विवक्षासे नहीं, इस कारण ' अभ्यासात् ' अभ्याससे ब्रह्म में स्वप्रधानत्वका समर्थन किया है।
' तद्धेतुव्यपदेशाच्च ' आनन्दमय सहित सब कार्य समुदायके कारणरूपसे ' इदं सर्वम ० ' ( उसने यह सब उत्पन्न किया जो यह कुछ है ) इस प्रकार ब्रह्मका कथन किया है। कारण होकर ब्रह्म मुख्यवृत्ति अपने कार्य आनन्दमयका अवयव हो यह युक्त नहीं है। + दूसरे सूत्र भी यथासम्भव पुच्छ वाक्यमें निर्दिष्ट ब्रह्मके ही उपपादक समझने चाहिएँ॥ १ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अब भगवान् भाष्यकार ' इदं त्विह वक्तव्यम् ' आदि भाष्यसे वृत्तिकारके मतका खण्डन करते हैं।
+ टि ० - जैसे एक ही स्त्रीका कुछ भाग युवती और कुछ भाग वृद्धा होना अयुक्त है, वैसे ही प्रकारणमें भी एक ही मयट् प्रत्ययका कहीं विकार और कहीं प्रचुर अर्थ मानना अयुक्त है I
* वृत्तिकार मतमें आनन्दमयोऽभ्यासात् ' इस सूत्र का यथाश्रुत अर्थ किया गया है, इसलिए आनन्दमयमें मयट् प्रत्ययको प्राचुर्यार्थिक मानकर आनन्दमयको ब्रह्म सिद्ध किया गया है। यद्यपि आनन्दमयका अभ्यास किसी श्रुतिमें नहीं है, किन्तु ' आनन्दं ब्रह्मणो ' ( तै ० २।९ ) ' आनन्द ब्रह्मेति व्यजानात् ' ( तै ० ३।६ ) आदि श्रुतियों में आनन्दका ही अभ्यास है, तो भी सूत्र के अनुसार आनन्दको आनन्दमय परक मानकर आनन्दमय ब्रह्म है ऐसा कहा गया है। भगवान् माष्यकारने इस सूत्रका यथाश्रुत अर्थं न कर लाक्षणिक किया है, अतः आनन्दमयको ब्रह्म न मानकर आनन्दमयकी ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' में लक्षणा की है कि आनन्दमयकें पुच्छ प्रतिष्ठारूपसे जो प्रकृत है वही ब्रह्म है, किन्तु आनन्दमय ब्रह्म नहीं है। इस आशयका स्पष्टीकरण करनेके लिए भगवान् भाष्यकार ' अत्रोच्यते ' इत्यादिसे इस सूत्र की व्याख्या करते हैं।
* वृत्तिकारके मतमें इस अधिकरणका विषय वाक्य ' अन्योऽत्तर आत्मानन्दमयः ' है, पहले उसके अनुसार इस अधिकरणकी व्याख्या की गई है। भगवान् भाष्यकारके मत में इस अधिकरणका विषयवाक्य ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' है। इसपर पूर्वपक्षी ' ननु ' आदिसे शंका करते हैं।
' विप्रमयो ग्रामः ' ( यह ग्राम विप्रप्रचुर है ) जैसे यहाँ ब्राह्मणोंका बाहुल्य अन्यकी अल्पता प्रयुक्त है, वैसे आनन्द प्रचुर ब्रह्म है, इस कथन से ब्रह्ममें आनन्द बहुत और दुःख अल्प सिद्ध होगा। इस तरह यदि ब्रह्ममें अल्प दुःख मानें तो ' यत्र नान्यत्पश्यति ' यह श्रुति बाधित होगी, क्योंकि यह श्रुति आनन्दस्वरूप ब्रह्म दुःखादि द्वैतका निषेध करती है, अतः आनन्दमयका अर्थ आनन्द प्रचुर नहीं, किन्तु अन्नमयादिके समान यहाँ भी मयट्का अर्थ विकार है। अतः आनन्दमय ब्रह्म नहीं है अपितु जीव है। इसलिए प्रियादि वृत्तिभेदसे प्रतिशरीर में आनन्दमय भिन्न - भिन्न है।
* ' आनन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति ' यहाँ संक्रमणका अर्थ बाध है प्राप्ति नहीं, क्योंकि ' एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति ' इस तरह अन्नमयादिमें भी संक्रमणका अर्थ बाध किया गया है। इससे ' रसो वै सः ' इत्यादि श्रुति वाक्य आनन्दमयको विषय नहीं करते, किन्तु ' ब्रह्म पुच्छं . प्रतिष्ठा ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित ब्रह्मको विषय करते हैं, क्योंकि वह संनिहित है, अतः आनन्दमय ब्रह्म नहीं है।
* यद्यपि ' सोऽकायमत ' इस श्रुतिमें ब्रह्मवाची ' सः ' शब्द पुंलिङ्ग है, जब कि ब्रह्म वाचक ' ब्रह्मन् ' शब्द नपुंसक है, अत : उसमें पुलिङ्ग ' सः ' शब्दका प्रयोग युक्त नहीं है, तथापि ' तस्मा एतस्मादात्मन ' इत्यादि श्रुतिमें प्रकृत ब्रह्मका ही पुंलिङ्ग आत्मशब्दसे निर्देश किया गया है, वैसे ही ' सोऽकायमत ' में भी समझना चाहिए। ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' यहाँ भी पुलिङ्ग आनन्दशब्दसे ब्रह्मका निर्देश है, अतः आनन्द ब्रह्म है, ' वेदसून्नयोर्विरोधे गुणेत्वन्यायकल्पनेति ' ( वेद और सूत्रमें विरोध हो तो गुणे - जहाँ प्रधान और अप्रधान दो विषयोंमें विरोध हो, यदि अप्रधान विषयके अनुसार प्रधान विषयका समन्वय करें तो वहाँ इस न्यायकी प्रवृत्ति होती है ) इस न्यायसे सूत्रों का अर्थं वेदार्थानुसार करना चाहिए न कि सूत्रार्थके अनुसार वेदार्थकी कल्पना करनी चाहिए, इस आशय को लेकर भगवान् माष्यकार अब वेदार्थं अनुसार ' सूत्राणि ' इससे सूत्रोंकी व्याख्या करते हैं।
* ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस प्रकृत ब्रह्मकें ज्ञानके लिए यहाँ अन्नमयादि पाँच कोशोंकी पक्षीरूपसे कल्पना की गई है। परन्तु उनके पक्षीरूपमें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है। ' तस्य प्रियमेव शिरः ' ० ( तै ० २१५ ) ( प्रिय ही उसका शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है ) इस प्रकार जब आनन्दमयके अन्य अवयव कहे गए हैं तो अवशिष्ट पुच्छ स्थानीय अवयवकी जिज्ञासाको पूर्ण करते हुए प्रकृत ब्रह्मको ही पुच्छरूपसे कहा गया है, क्योंकि जैसे पक्षीका आधार पुच्छ है, वैसे ही आनन्दमयका अधिष्ठान ब्रह्म है इसलिए ब्रह्मका प्रधानरूपसे प्रतिपादन है। किश्व ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' इत्यादि श्रुतियोंमें भी केवल आनन्दका ही अभ्यास उपलब्ध होता है आनन्दमयका नहीं। इसलिए ' सोऽकामयत ' इत्यादि श्रुतियाँ और ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' इत्यादि सूत्र ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस श्रुति वाक्यसे निर्दिष्ट ब्रह्मके ही उपपादक हैं। अतएव ' आन ' दमयोऽ' भ्यासात् ' इस सूत्रस्थ आनन्दमय शब्दसे लक्षणा द्वारा निर्गुण ब्रह्मका ही बोध कराया गया है। पूर्वपक्ष में सगुण ब्रह्मकी उपासना है और सिद्धान्तमें निर्गुण ब्रह्मका ज्ञान है॥ १ ९
अन्तरधिकरणम् । २०-२१
1.1.20 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २०
अन्तस् तद्धर्मोपदेशात् ॥ १.१.२० ॥
पदच्छेद — अन्तः , तद्धर्मोपदेशात्
सूत्रार्थ — ( अन्तः ) ' य एषोऽन्तरादित्ये ' ' य एषोऽन्तरक्षिणि ' इस श्रुतिमें आदित्यमण्डलादिके अन्तर श्रूयमाण पुरुष संसारी नहीं है किन्तु परमेश्वर है, ( तद्धर्मोपदेशात् ) क्योंकि पापशून्यत्वादि उसके धर्मो का उपदेश है।
शाङ्करभाष्य
इदमाम्नायते अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आ प्रणखात्सर्वएव सुवर्णः तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद इत्यधिदैवतम्। अथाध्यात्ममपि अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते इत्यादि। तत्र संशयः किं विद्याकर्मातिशयवशात्प्राप्तोत्कर्षः कश्चित्संसारी सूर्यमण्डले चक्षुषि चोपास्यत्वेन श्रूयते किं वा नित्यसिद्धः परमेश्वरः इति। किं तावत्प्राप्तम् संसारीति।
कुतः रूपवत्त्वश्रवणात्। आदित्यपुरुषे तावत् हिरण्यश्मश्रुः इत्यादि रूपमुदाहृतम् अक्षिपुरुषेऽपि तदेवातिदेशेन प्राप्यते तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपम् इति। न च परमेश्वरस्य रूपवत्त्वं युक्तम् अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् इति श्रुतेः आधारश्रवणाच्च य एषोऽन्तरादित्ये य एषोऽन्तरक्षिणि इति। न ह्यनाधारस्य स्वमहिमप्रतिष्ठितस्य सर्वव्यापिनः परमेश्वरस्याधार उपदिश्येत। स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि इति आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः इति च श्रुती भवतः।
ऐश्वर्यमर्यादाश्रुतेश्च स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च इत्यादित्यपुरुषस्य ऐश्वर्यमर्यादा स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां च इत्यक्षिपुरुषस्य। न च परमेश्वरस्य मर्यादावदैश्वर्यं युक्तम् एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय इत्यविशेषश्रुतेः। तस्मान्नाक्ष्यादित्ययोरन्तः परमेश्वर इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् इति।
य एषोऽन्तरादित्ये य एषोऽन्तरक्षिणि इति च श्रूयमाणः पुरुषः परमेश्वर एव न संसारी। कुतः तद्धर्मोपदेशात्। तस्य हि परमेश्वरस्य धर्मा इहोपदिष्टाः। तद्यथा तस्योदिति नाम इति श्रावयित्वा तस्यादित्यपुरुषस्य नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः इति सर्वपाप्मापगमेन निर्वक्ति। तदेव च कृतनिर्वचनं नामाक्षिपुरुषस्याप्यतिदिशति यन्नाम तन्नाम इति। सर्वपाप्मापगमश्च परमात्मन एव श्रूयते य आत्मापहतपाप्मा इत्यादौ।
तथा चाक्षुषे पुरुषे सैव ऋक् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म इति ऋक्सामाद्यात्मकतां निर्धारयति। सा च परमेश्वरस्योपपद्यते सर्वकारणत्वात्सर्वात्मकत्वोपपत्तेः। पृथिव्यग्न्याद्यात्मके चाधिदैवतमृक्सामे वाक्प्राणाद्यात्मके चाध्यात्ममनुक्रम्याह तस्यर्क्च साम च गेष्णौ इत्यधिदैवतम्। तथाध्यात्ममपि यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ इति। तच्च सर्वात्मकत्वे सत्येवोपपद्यते। तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं त्वेव ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः इति च लौकिकेष्वपि गानेष्वस्यैव गीयमानत्वं दर्शयति।
तच्च परमेश्वरपरिग्रह एव घटते यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसंभवम् इति भगवद्गीतादर्शनात्। लोककामेशितृत्वमपि निरङ्कुशं श्रूयमाणं परमेश्वरं गमयति। यत्तूक्तं हिरण्यश्मश्रुत्वादिरूपवत्त्वश्रवणं परमेश्वरे नोपपद्यत इति अत्र ब्रूमः स्यात्परमेश्वरस्यापीच्छावशान्मायामयं रूपं साधकानुग्रहार्थम् माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं मैवं मां ज्ञातुमर्हसि इति स्मरणात्।
अपि च यत्र तु निरस्तसर्वविशेषं पारमेश्वरं रूपमुपदिश्यते भवति तत्र शास्त्रम् अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् इत्यादि। सर्वकारणत्वात्तु विकारधर्मैरपि कैश्चिद्विशिष्टः परमेश्वर उपास्यत्वेन निर्दिश्यते सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः इत्यादिना। तथा हिरण्यश्मश्रुत्वादिनिर्देशोऽपि भविष्यति। यदप्याधारश्रवणान्न परमेश्वर इति अत्रोच्यते स्वमहिमप्रतिष्ठस्याप्याधारविशेषोपदेश उपासनार्थो भविष्यति सर्वगतत्वाद्ब्रह्मणो व्योमवत्सर्वान्तरत्वोपपत्तेः।
ऐश्वर्यमर्यादाश्रवणमप्यध्यात्माधिदैवतविभागापेक्षमुपासनार्थमेव। तस्मात्परमेश्वर एवाक्ष्यादित्ययोरन्तरुपदिश्यते।। इदमाम्नायते अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आ प्रणखात्सर्वएव सुवर्णः तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद इत्यधिदैवतम्। अथाध्यात्ममपि अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते इत्यादि।
तत्र संशयः किं विद्याकर्मातिशयवशात्प्राप्तोत्कर्षः कश्चित्संसारी सूर्यमण्डले चक्षुषि चोपास्यत्वेन श्रूयते किं वा नित्यसिद्धः परमेश्वरः इति। किं तावत्प्राप्तम् संसारीति। कुतः रूपवत्त्वश्रवणात्। आदित्यपुरुषे तावत् हिरण्यश्मश्रुः इत्यादि रूपमुदाहृतम् अक्षिपुरुषेऽपि तदेवातिदेशेन प्राप्यते तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपम् इति। न च परमेश्वरस्य रूपवत्त्वं युक्तम् अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् इति श्रुतेः आधारश्रवणाच्च य एषोऽन्तरादित्ये य एषोऽन्तरक्षिणि इति।
न ह्यनाधारस्य स्वमहिमप्रतिष्ठितस्य सर्वव्यापिनः परमेश्वरस्याधार उपदिश्येत। स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि इति आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः इति च श्रुती भवतः। ऐश्वर्यमर्यादाश्रुतेश्च स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च इत्यादित्यपुरुषस्य ऐश्वर्यमर्यादा स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां च इत्यक्षिपुरुषस्य।
न च परमेश्वरस्य मर्यादावदैश्वर्यं युक्तम् एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय इत्यविशेषश्रुतेः। तस्मान्नाक्ष्यादित्ययोरन्तः परमेश्वर इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् इति। य एषोऽन्तरादित्ये य एषोऽन्तरक्षिणि इति च श्रूयमाणः पुरुषः परमेश्वर एव न संसारी। कुतः तद्धर्मोपदेशात्। तस्य हि परमेश्वरस्य धर्मा इहोपदिष्टाः। तद्यथा तस्योदिति नाम इति श्रावयित्वा तस्यादित्यपुरुषस्य नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः इति सर्वपाप्मापगमेन निर्वक्ति।
तदेव च कृतनिर्वचनं नामाक्षिपुरुषस्याप्यतिदिशति यन्नाम तन्नाम इति। सर्वपाप्मापगमश्च परमात्मन एव श्रूयते य आत्मापहतपाप्मा इत्यादौ। तथा चाक्षुषे पुरुषे सैव ऋक् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म इति ऋक्सामाद्यात्मकतां निर्धारयति। सा च परमेश्वरस्योपपद्यते सर्वकारणत्वात्सर्वात्मकत्वोपपत्तेः। पृथिव्यग्न्याद्यात्मके चाधिदैवतमृक्सामे वाक्प्राणाद्यात्मके चाध्यात्ममनुक्रम्याह तस्यर्क्च साम च गेष्णौ इत्यधिदैवतम्। तथाध्यात्ममपि यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ इति।
तच्च सर्वात्मकत्वे सत्येवोपपद्यते। तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं त्वेव ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः इति च लौकिकेष्वपि गानेष्वस्यैव गीयमानत्वं दर्शयति। तच्च परमेश्वरपरिग्रह एव घटते यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसंभवम् इति भगवद्गीतादर्शनात्। लोककामेशितृत्वमपि निरङ्कुशं श्रूयमाणं परमेश्वरं गमयति।
यत्तूक्तं हिरण्यश्मश्रुत्वादिरूपवत्त्वश्रवणं परमेश्वरे नोपपद्यत इति अत्र ब्रूमः स्यात्परमेश्वरस्यापीच्छावशान्मायामयं रूपं साधकानुग्रहार्थम् माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं मैवं मां ज्ञातुमर्हसि इति स्मरणात्। अपि च यत्र तु निरस्तसर्वविशेषं पारमेश्वरं रूपमुपदिश्यते भवति तत्र शास्त्रम् अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् इत्यादि। सर्वकारणत्वात्तु विकारधर्मैरपि कैश्चिद्विशिष्टः परमेश्वर उपास्यत्वेन निर्दिश्यते सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः इत्यादि
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — श्रुति यह कहती है- ' अथ य एषो ० ' ( आदित्यमण्डल के अन्तर्गत सुवर्ण - सा ज्योतिर्मय सा जो यह पुरुष दिखाई देता है जो सुवर्णके समान डाढी, मूछोंवाला और सुवर्णके सदृश केशोंवाला तथा जो नख पर्यन्त साराका सारा सुवर्ण - सा ही है ) ' तस्य यथा ० ' ( वानरके बैठनेके स्थानके सदृश विकसित अरुण वर्णवाले पुण्डरीक कमलके समान उस पुरुषके दोनों नेत्र हैं, उसका ' उत् ' ऐसा नाम है, क्योंकि वह सब पापोंसे ऊपर गया हुआ है अर्थात् सब पापोंसे मुक्त है जो ऐसे गुणों से सम्पन्न ' उत् ' नामक देवकी यथोक्त प्रकारसे उपासना करता है वह निश्चय ही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ) यह अधिदैवत है।
अब ' अथ य ० ' ( जो यह नेत्रके मीतर पुरुष दिखाई देता है ) इत्यादि श्रुति से अध्यात्म कहा जाता है। यहाँ संशय होता है कि क्या अतिशय विद्या और कर्मके प्रभावसे उत्कर्ष प्राप्त करनेवाला कोई संसारी सूर्य मण्डलमें तथा चक्षुमें उपास्यरूपसे श्रुत है अथवा नित्य सिद्ध परमेश्वर? तब क्या प्राप्त होता है? पू ० - यहाँ संसारी उपास्यरूपसे निर्दिष्ट है, क्योंकि रूपवत्त्वका श्रवण है। आदित्यपुरुष में ' हिरण्य ( सुवर्ण ) सो मुछे हैं ' इत्यादि रूपका उदाहरण है।
और ' तस्यैतस्य ० ' ( इस अक्षिपुरुपका वही रूप है जो कि आदित्यपुरुषका रूप है ) इस श्रुति से अक्षिपुरुष में भी अतिदेशसे वही रूप प्राप्त होता है। परन्तु परमेश्वरका रूपवत्त्व होना युक्तं नहीं है, क्योंकि ' अशब्दम ० ' ( वह शब्द रहित, स्पर्श रहित, रूपरहित और अविनाशी है ) ऐसी श्रुति है। क्योंकि ' य एषोऽन्तरादिव्ये ' ' य एषोऽन्तरक्षिणि ' ( जो यह आदित्य मण्डलमें है, जो यह अक्षिके अन्तर है ) इस प्रकार आधारका श्रवण है।
किन्तु आधार रहित स्वमहिमा में प्रतिष्ठित सर्वव्यापी परमेश्वरका आधार उपदेश नहीं किया जाता, कारण कि ' स भगवः ० ' ( नारद - हे भगवन्! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है? सनत्कुमार — वह अपनी महिमा में प्रतिष्ठित है ) और ' आकाशवत् ० ' ( आकाशके समान सर्वव्यापक और नित्य है ) ऐसी श्रुतियाँ हैं। क्योंकि आदित्यपुरुष और अक्षिपुरुषकी ऐश्वर्यं - मर्यादाकी श्रुति हैं। ' स एष ० ' ( वह यह उत् नामक देव, जो इस आदित्यलोकसे ऊपरके लोक हैं कत्वोपपत्तेः।
पृथिव्यग्न्याद्यात्मके चाधिदैवतं ऋक्सामे, वाक्प्राणाद्यात्मके चाध्यात्ममनुऔर जो देवताओंके भोग हैं उनपर शासन करता है ) इस प्रकार आदित्यपुरुषकी मर्यादाकी श्रुति है और ' स एष ० ' ( अक्षिस्य वह यह उत्- अक्षिपुरुष नामक देव जो इस अध्यात्म आत्मासे नीचे के लोक हैं उनका तथा मानवीय कामनाओंका शासन करता है ) इस प्रकार अक्षिपुरुषकी मर्यादाकी श्रुति है।
परन्तु परमेश्वरका ऐश्वर्यं सीमित होना युक्त नहीं है, क्योंकि ' एष सर्वेश्वर ० ' ( यह सर्वेश्वर है, यह सब भूतोंका अधिपति है, यह भूतोंका पालक है, लोकोंकी मर्यादा छिन्न - भिन्न न हो इसलिए यह " सारी व्यवस्था करनेवाला सेतु है अर्थात् सेतुके समान नियामक है ) ऐसी अविशेष श्रुति है। इससे सिद्ध होता है कि नेत्र और आदित्य के अन्तर पुरुष परमेश्वर नहीं है।
सिद्धान्ती —- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ' ' य एषो ० ' ( यह जो आदित्यके भीतर है ) य एषो ० ' ( जो यह चक्षु आन्तर है ) इस प्रकार श्रूयमाण परमेश्वर ही है संसारी नहीं, क्यों? ' तद्धर्मो ० ' उस परमेश्वर के धर्मोका ही यहाँ उपदेश किया गया है। जैसे कि ' तस्यो ० ' ( उसका ' उद् ' यह नाम है ) इस प्रकार इस आदित्य पुरुष नामका श्रवण कराके ' स एष ० ' ( वह यह सब पापोंसे मुक्त है ) इस तरह सभी पापोंके अपगमसे ' उत् ' नामका श्रुति निर्वचन करती है।
और निर्वचन किये हुए उसी नामका अक्षिपुरुष में ' यन्नाम तन्नाम ' ( जो आदित्य पुरुषका नाम है वही अक्षिपुरुषका नाम है ) यह श्रुति अतिदेश करती है! ' य आत्मा ० ' ( जो आत्मा पाप रहित है ) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें परमात्मा ही सर्वपापरहित सुना जाता है। इसीप्रकार ' सैव ऋक् ० ' ( वही अक्षिपुरुष ऋक्, वही साम, वही उक्थ, वही यजु और वही ब्रह्म है ) यह श्रुति अक्षिपुरुष में ऋक् सामादिकी आत्मकताका निर्धारण करती है।
वह सर्वात्मकता परमेश्वरमें ही उपपन्न है, क्योंकि वह सबका कारण होनेसे सर्वात्मक हो सकता है। ऋक् पृथिवी और साम अग्नि है यह अधिदेवत और वाक् प्राणादि आत्मक ऋक्, साम है अर्थात् वाक् ऋक् और प्राण साम है इस तरह अध्यात्मका आरम्भकर श्रुति कहती है- ' तस्य ऋक् च ० ' ( उस आदित्यपुरुष के ऋक् और साम पर्व - अङ्गों की संधियाँ हैं ) यह अधिदैवत है। इसीप्रकार ' यावमुप्य ० ( जो आदित्यपुरुषके पादपर्व हैं दे अक्षिपुरुषके पादपर्व हैं ) यह अध्यात्म भी है। यह सब सर्वात्मक परमेश्वरमें घट सकता है।
' तद्ये इमे ० ' ( अतः जो ये लोग वीणामें गायन ( स्तुति ) करते हैं वे उस परमेश्वरका ही गायन करते हैं, इसीसे वे धन लाभ करते हैं ) इसप्रकार श्रुति लौकिक गानोंमें भी उसका गान दिखलाती है। यह सब परमेश्वरके परिग्रहसे घट सकता है, क्योंकि ' यद्यद्विभूति ० ' ( हे कौन्तेय! जो जो मी ऐश्वर्यशाली, श्रीयुक्त- कान्तियुक्त, शक्तियुक्त वस्तु है उस उसीको तूं मेरे तेजके अंशसे उत्पन्न हुई जान ) ऐसा भगवद्गीता में देखा जाता है।
तथा लोक और भोगपर स्वतन्त्ररूपसे श्रूयमाण स्वामित्व भी परमेश्वरका ही ज्ञान कराता है। जो यह कहा गया है कि हिरण्यश्मश्रुत्वादि रूपका श्रवण परमेश्वरमें उपपन्न नहीं है। इस विषय में हम कहते हैं - साधकोंपर अनुग्रह करनेके लिए इच्छावश परमेश्वर का मायामय रूप हो सकता है, क्योंकि ' माया ह्येषा ० ' ( हे नारद! सब भूतोंके गुणोंसे युक्त जो मुझे देखता है यह मायाका कार्य होनेसे विचित्र मूर्तिरूप माया मेरी उत्पन्न की हुई है, अतः इस प्रकार मुझे जानने के लिए तूं योग्य नहीं है ) ऐसी स्मृति है।
और जहाँ सभी उपाधियोंसे रहित निर्विशेष परमेश्वर के स्वरूपका उपदेश किया जाता है, वहाँ ' अशब्दम ० ' ( वह शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित और अविनाशी है ) इत्यादि शास्त्र है। सबका कारण होने से कुछ विकारोंके धर्मोसे युक्त परमेश्वरका भी उपास्यरूपसे ' सर्व कर्मा ० ' ( सम्पूर्ण रचनात्मक कर्मवाला, सर्वकामना वाला, सर्व गन्ध युक्त और सर्व रसयुक्त है ) इत्यादि श्रुतिसे निर्देश किया जाता है। इसी प्रकार हिरण्यश्मश्रुत्वादिका निर्देश भी हो जायगा।
आधारका श्रवण होनेसे आदित्यपुरुष तथा अक्षिपुरुष परमेश्वर नहीं है, ऐसा जो कहा गया है। उसपर कहते हैं - स्वमहिमा में प्रतिष्ठित परमेश्वर-
* इदमामनन्ति — ' अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि का भी आधार विशेष उपदेश उपासना के लिए हो जायगा, क्योंकि आकाशके समान सर्वव्यापक होनेसे ब्रह्म सर्वान्तर हो सकता है। ऐश्वर्यमर्यादाका श्रवण भी अध्यात्म और अधिदेवत विभागकी अपेक्षा रखता हुआ केवल उपासनाके लिए है। इसलिए अक्षि और आदित्य के भीतर परमेश्वरका ही उपदेश है || २० |
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — + टि ० अन्य सूत्र भी यथा सम्भव ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस श्रुति वाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्मके उपपादक हैं। यथा ‘ तद्धेतुव्यपदेशाच्च ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | १४ ) ' इदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च ' ( तै ० २।६ ) इस श्रुति वाक्यसे जब यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्म कार्यमात्रका हेतु है तब वह प्रिय शिरस्त्वादि विशिष्ट आनन्दमय कार्यका मुख्यवृत्तिसे अवयव कदापि नहीं हो सकता। ' मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ' ( ब्र ० सू ० १।१।१५ ), ब्रह्मविदामीति परम् ' जिस ब्रह्मके ज्ञानसे कैवल्य मुक्ति कही गई है और जो ब्रह्म ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस मन्त्र में निर्दिष्ट है, वही ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस श्रुति वाक्य में प्रतिपादित है, क्योंकि ब्रह्मपद संनिहित है। ' नेतरोऽनुपपत्ते : ' ( ब ० सू ० १।१।१६ )
* पहले अधिकरणमें ‘ अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः ' ( तै ० २१५ ) ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' ( तै ० ३।६ ) ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ( तै ० २।५ ) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें आनन्दमय, आनन्द और ब्रह्म शब्दों से जो निर्गुण ब्रह्म निर्दिष्ट है, वही उपाधि विशिष्ट होकर उपास्य है। अब इस अधिकरण में अधिकारीके भेद से उपासना तथा उसके अनुरूप देवताका निरूपण किया जाता है।
यद्यपि ब्रह्म व्यापक है, तो भी उपासना के लिए स्थान विशेषकी अपेक्षा होती है, इसलिए उपासना द्वारा फल इतर - आनन्दमय जीव यहाँ प्रतिपाद्य नहीं है, क्योकि उसमें सर्वसृष्टिकर्तृत्व अनुपपन्न है। ' भेदव्यपदेशाच्च ' ( ब्र ० सू ० १।१।१७ ) ' रसो वै सः रस ह्येवायं लब्ध्वानन्दो भवति ' इसप्रकार ब्रह्म और आनन्दमय में भेद है।
' आनन्दमयो ब्रह्म तैत्तिरीयकपञ्चमस्थानस्थत्वात् भृगुवल्लीस्थानन्दवत् ' ( आन दमय ब्रह्म है, क्योकि ब्रह्मवल्लीके पाँचवें स्थानमें है, भृगुवल्लीमें स्थित आनन्दके समान ) ऐसी अनुमानकी शंकाकर कहते हैं- ' कामाच्च नानुमानापेक्षा ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | १८ ) ( काम्यत इति काम आनन्दः ' सबके द्वारा आनन्दकी ही कामना की जाती है, अतः काम आनन्द है।
इसलिए जैसे भृगुवल्लीमें आनन्द ब्रह्म है वैसे ब्रह्मवल्लीमें स्थित आनन्दमय भी ब्रह्म है, ऐसी अनुमानकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यहाँ आनन्दय के साथ विकारार्थक मयट् होनेसे विरोध है। विकाररूप आनन्दमय में निरतिशय आनन्दकी प्राप्ति नहीं हो सकती, अतः आनन्दमय ब्रह्म नहीं है। यहाँ यदि भेदका उपदेश है तो सगुण ब्रह्म ही भेदरूपसे प्रतिपादित हुआ?
यह शंका युक्त नहीं है, क्योंकि ' अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | १ ९ ) गुहानिहित है, अतः प्रत्यक् और पुच्छ वाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्म वह एक ही है, ऐसा उपसंहार होनेपर ' मैं ही पर ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार प्रबोध विशिष्ट आनन्दमय जीवका ' यदा ह्येवैष ' ( तै ० २१७ ) इस श्रुतिमें ब्रह्मभावरूपसे उपदेश किया गया है। इसकारण निर्गुण ब्रह्मैक्य ज्ञानके लिए जीवभेदका अनुवाद मात्र है, अतः आनन्द ब्रह्म है | सिद्धयर्थं शास्त्रों में आदित्यमण्डलादिका विधान किया गया है।
देवोंका आश्रय कर किया गया विधान अधिदैवत है और देहादिका आश्रय कर किया गया विधान अध्यात्म है। आदित्यमण्डलमें जो उपास्य है वही देहसे सम्बन्धित होकर अध्यात्मरूपसे भी कहा गया है।
पूर्वं अधिकरणमें ब्रह्मपद, आनन्दमय पद और आनन्दका अभ्यास इन तीनों प्रमाणों तथा अन्य प्रमाणोंसे जैसे निर्गुण ब्रह्मका निर्णय किया गया है, वैसे रूपवत्त्वादि अनेक प्रमाणोंसे जीव हिरण्यमय है, इस प्रकार पूर्वं अधिकरण सिद्धान्त से दृष्टान्तसंगतिद्वारा पहले सामान्यतः सिद्ध निर्गुण ब्रह्मसमन्वयके अपवादार्थं ‘ संसारी ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं। ' हिरण्यश्मश्रुः ' इस श्रुतिसे आदित्यपुरुषमें तथा ' तदेव रूपं ' इस + अतिदेश श्रुतिसे अक्षिपुरुषमें रूपका श्रवण होता है। इससे आदित्यमण्डलस्थ एवं अक्षिस्य संसारी पुरुष उपास्य सिद्ध होता है रूपादि रहित परमेश्वर नहीं।
+ टि ० - एकत्र श्रुतस्यान्यत्र सम्बन्धोऽतिदेशः ' ( एकत्र श्रुतका अन्य स्थल में श्रवण या सम्बन्ध अतिदेश है, जैसे यहाँ आदित्य पुरुषके रूपका अक्षिपुरुषमें श्रवण है। अथवा ' तद्वदिदं कर्तव्यमतिदेशः ' ' उसके समान यह करना चाहिए वह अतिदेश है। '
* यद्यपि ' न ह वै देवान्पापं गच्छति ' ( बृह ० ११५/२० ) ( देवोंको कोई पाप नहीं लगता ) इस श्रुतिके आधार पर आदित्य पुरुष आदि भी पाप रहित होनेसे उपास्य हो सकते हैं, तो भी इस श्रुतिका तात्पर्य यह है कि देवत्वकालमें कर्मके अनधिकारी देवोंका क्रियमाण पाप अथवा उसके फलके साथ सम्बन्ध नहीं होता। परन्तु उनके पूर्व जन्म संचित पापोंके होनेसे वे सर्वपाप रहित नहीं हो सकते। यदि वे बिल्कुल पाप रहित हों तो ' तस्मिन्यावत्संपात मुषित्वाथैत मे वाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते ' ( छा ० ५/१०१५ ) ( वहाँ कर्मोके क्षय होने तक रहकर वे पुनः इसी मार्ग से जिस प्रकार गये थे उसीप्रकार लौटते हैं ) इत्यादि श्रुति और ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' ( गीता ० ९। २१ ) ( पुण्य कर्म क्षीण होनेपर वे पुनः लौटकर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं ) स्मृति वचन बाधित हो जाएँगे। अतः ' आमापहतपाप्मा ' यह ठीक ही कहा गया है कि परमात्मा सर्वपाप रहित है और वही उपास्य है।
* पूर्वपक्षीने पहले ' रूपवत्त्व श्रवणात् ' इस हेतुसे आदित्यपुरुषका और अक्षिपुरुषका ग्रहण किया है, अब उसका ' स्यात्परमेश्वरस्यापि ० ' इत्यादि भाष्यसे खण्डन करते हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिए मायोपाधिसे परमेश्वर अनेक रूप धारण करते हैं, जैसे कि ' इन्द्रो मायाभिः पुरूरूप ईयते ' ( परमेश्वर ज्ञान, बल और क्रिया रूप मायासे अनेक रूपोंको प्राप्त होता है ) यह श्रुति है॥२०
1.1.21 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २१
भेदव्यपदेशाच् चान्यः ॥ १.१.२१ ॥
पदच्छेद — भेदव्यपदेशात् , च , अन्यः
सूत्रार्थ — ( अन्यः ) अक्षि और आदित्यके अन्तर श्रूयमाण अन्तर्यामी पुरुष आदित्य आदि शरीराभिमानी जीवोंसे अन्य है, ( भेदव्यपदेशात् ) क्योंकि ' य आदित्ये तिष्ठन ' इस श्रुतिमें जोव नियम्य और परमेश्वर नियामक इस प्रकार दोनोंके भेदका व्यपदेश है।
शाङ्करभाष्य
अस्ति चादित्यादिशरीराभिमानिभ्यो जीवेभ्योऽन्य ईश्वरोऽन्तर्यामी य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः इति श्रुत्यन्तरे भेदव्यपदेशात्। तत्र हि आदित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद इति वेदितुरादित्याद्विज्ञानात्मनोऽन्योऽन्तर्यामी स्पष्टं निर्दिश्यते। स एवेहाप्यन्तरादित्ये पुरुषो भवितुमर्हति श्रुतिसामान्यात्। तस्मात्परमेश्वर एवेहोपदिश्यत इति सिद्धम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और आदित्यादि शरीरोंके अभिमानी जीवोंसे अन्य ईश्वर अन्तर्यामी है, क्योंकि ' य आदित्ये ० ' ( जो आदित्य में रहता हुआ आदित्यके भीतर है, जिसे आदित्य नहीं जानता, जिसका आदित्य शरीर है, जो आदित्य के अन्तर रहकर आदित्यका नियमन करता है वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ) इस प्रकार अन्य श्रुतिमें भेदका व्यपदेश है। वहीं ' आदित्य के भीतर है जिसे आदित्य नहीं जानता ' इस प्रकार वेदिता ( प्रमाता ) आदित्य जीवात्मासे अन्य अन्तर्यामी है ऐसा स्पष्ट निर्देश किया जाता है। यहाँ भी वही आदित्य के अन्तर पुरुष होना युक्त है, क्योंकि दोनों स्थलों में श्रुतियाँ समान ( एक प्रकारकी ) हैं। इससे सिद्ध हुआ कि परमेश्वरका ही यहाँ उपदेश है।। २१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषों दृश्यते ' ( छा ० १२६/६ ) और ' य आदित्ये तिष्टन् ' ( बृह ० ३७१ ९ ) ' यश्चक्षुषि तिष्ठन् ' ( बृह ० ३।७।१८ ) ( जो नेत्रमें रहता हुआ ) इस प्रकार दोनों श्रुतियां एक प्रकारकी हैं और दोनोंका अर्थ एक ही है कि आदित्य और अक्षिस्य उपास्य पुरुष परमेश्वर ही है। पूर्वपक्षमें जीव उपास्य है और सिद्धान्तमें परमेश्वर उपास्य है।। २१।। •
आकाशाधिकरणम्
1.1.22 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २२
आकाशस् तल्लिङ्गात् ॥ १.१.२२ ॥
पदच्छेद — आकाश :, तल्लिङ्गात्
सूत्रार्थ — ( आकाशः ) ' आकाश इति होवाच ' यहाँ आकाश शब्दसे ब्रह्मका ही ग्रहण हैं, ( तल्लिङ्गात् ) क्योंकि ' सर्वाणि ह वा ' इस प्रकार सभी भूतोंके उत्पत्ति आदि परब्रह्मका ही लिङ्ग है।
शाङ्करभाष्य
इदमामनन्ति अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् इति। तत्र संशयः किमाकाशशब्देन परं ब्रह्माभिधीयते उत भूताकाशमिति। कुतः संशयः उभयत्र प्रयोगदर्शनात्। भूतविशेषे तावत्सुप्रसिद्धो लोकवेदयोराकाशशब्दः।
ब्रह्मण्यपि क्वचित्प्रयुज्यमानो दृश्यते यत्र वाक्यशेषवशादसाधारणगुणश्रवणाद्वा निर्धारितं ब्रह्म भवति यथा यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् इति आकाशो ह वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म इति चैवमादौ। अतः संशयः। किं पुनरत्र युक्तम् भूताकाशमिति। कुतः तद्धि प्रसिद्धतरेण प्रयोगेण शीघ्रं बुद्धिमारोहति। न चायमाकाशशब्द उभयोः साधारणः शक्यो विज्ञातुम् अनेकार्थत्वप्रसङ्गात्। तस्माद्ब्रह्मणि गौण एव आकाशशब्दो भवितुमर्हति। विभुत्वादिभिर्हि बहुभिर्धर्मैः सदृशमाकाशेन ब्रह्म भवति।
न च मुख्यसंभवे गौणोऽर्थो ग्रहणमर्हति। संभवति चेह मुख्यस्यैवाकाशस्य ग्रहणम्। ननु भूताकाशपरिग्रहे वाक्यशेषो नोपपद्यते सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते इत्यादिः नैष दोषः भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वोपपत्तेः। विज्ञायते हि तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निः इत्यादि। ज्यायस्त्वपरायणत्वे अपि भूतान्तरापेक्षयोपपद्येते भूताकाशस्यापि। तस्मादाकाशशब्देन भूताकाशस्य ग्रहणमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः आकाशस्तल्लिङ्गात्।
आकाशशब्देनेह ब्रह्मणो ग्रहणं युक्तम्। कुतः तल्लिङ्गात्। परस्य हि ब्रह्मण इदं लिङ्गम् सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते इति। परस्माद्धि ब्रह्मणो भूतानामुत्पत्तिरिति वेदान्तेषु मर्यादा। ननु भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वं दर्शितम्। सत्यं दर्शितम्। तथापि मूलकारणस्य ब्रह्मणोऽपरिग्रहात् आकाशादेवेत्यवधारणं सर्वाणीति च भूतविशेषणं नानुकूलं स्यात्। तथा आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति इति ब्रह्मलिङ्गम् आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् इति च ज्यायस्त्वपरायणत्वे।
ज्यायस्त्वं ह्यनापेक्षिकं परमात्मन्येवैकस्मिन्नाम्नातम् ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः इति। तथा परायणत्वमपि परमकारणत्वात्परमात्मन्येव उपपन्नतरं भवति। श्रुतिश्च विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् इति। अपि चान्तवत्त्वदोषेण शालावत्यस्य पक्षं निन्दित्वा अनन्तं किंचिद्वक्तुकामेन जैवलिनाकाशः परिगृहीतः तं चाकाशमुद्गीथे संपाद्योपसंहरति स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः इति। तच्चानन्त्यं ब्रह्मलिङ्गम्।
यत्पुनरुक्तं भूताकाशं प्रसिद्धिबलेन प्रथमतरं प्रतीयत इति अत्र ब्रूमः प्रथमतरं प्रतीतमपि तद्वाक्यशेषगतान्ब्रह्मगुणान्दृष्ट्वा न परिगृह्यते। दर्शितश्च ब्रह्मण्यप्याकाशशब्दः आकाशो ह वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता इत्यादौ। तथाकाशपर्यायवाचिनामपि ब्रह्मणि प्रयोगो दृश्यते ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता ॐ कं ब्रह्म खं ब्रह्म खं पुराणम् इति चैवमादौ।
वाक्योपक्रमेऽपि वर्तमानस्याकाशशब्दस्य वाक्यशेषवशाद्युक्ता ब्रह्मविषयत्वावधारणा। अग्निरधीतेऽनुवाकम् इति हि वाक्योपक्रमगतोऽप्यग्निशब्दो माणवकविषयो दृश्यते। तस्मादाकाशशब्दं ब्रह्मेति सिद्धम्।। इदमामनन्ति अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् इति। तत्र संशयः किमाकाशशब्देन परं ब्रह्माभिधीयते उत भूताकाशमिति। कुतः संशयः उभयत्र प्रयोगदर्शनात्।
भूतविशेषे तावत्सुप्रसिद्धो लोकवेदयोराकाशशब्दः। ब्रह्मण्यपि क्वचित्प्रयुज्यमानो दृश्यते यत्र वाक्यशेषवशादसाधारणगुणश्रवणाद्वा निर्धारितं ब्रह्म भवति यथा यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् इति आकाशो ह वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म इति चैवमादौ। अतः संशयः। किं पुनरत्र युक्तम् भूताकाशमिति। कुतः तद्धि प्रसिद्धतरेण प्रयोगेण शीघ्रं बुद्धिमारोहति। न चायमाकाशशब्द उभयोः साधारणः शक्यो विज्ञातुम् अनेकार्थत्वप्रसङ्गात्। तस्माद्ब्रह्मणि गौण एव आकाशशब्दो भवितुमर्हति।
विभुत्वादिभिर्हि बहुभिर्धर्मैः सदृशमाकाशेन ब्रह्म भवति। न च मुख्यसंभवे गौणोऽर्थो ग्रहणमर्हति। संभवति चेह मुख्यस्यैवाकाशस्य ग्रहणम्। ननु भूताकाशपरिग्रहे वाक्यशेषो नोपपद्यते सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते इत्यादिः नैष दोषः भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वोपपत्तेः। विज्ञायते हि तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निः इत्यादि। ज्यायस्त्वपरायणत्वे अपि भूतान्तरापेक्षयोपपद्येते भूताकाशस्यापि।
तस्मादाकाशशब्देन भूताकाशस्य ग्रहणमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः आकाशस्तल्लिङ्गात्। आकाशशब्देनेह ब्रह्मणो ग्रहणं युक्तम्। कुतः तल्लिङ्गात्। परस्य हि ब्रह्मण इदं लिङ्गम् सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते इति। परस्माद्धि ब्रह्मणो भूतानामुत्पत्तिरिति वेदान्तेषु मर्यादा। ननु भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वं दर्शितम्। सत्यं दर्शितम्। तथापि मूलकारणस्य ब्रह्मणोऽपरिग्रहात् आकाशादेवेत्यवधारणं सर्वाणीति च भूतविशेषणं नानुकूलं स्यात्।
तथा आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति इति ब्रह्मलिङ्गम् आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् इति च ज्यायस्त्वपरायणत्वे। ज्यायस्त्वं ह्यनापेक्षिकं परमात्मन्येवैकस्मिन्नाम्नातम् ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः इति। तथा परायणत्वमपि परमकारणत्वात्परमात्मन्येव उपपन्नतरं भवति। श्रुतिश्च विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् इति।
अपि चान्तवत्त्वदोषेण शालावत्यस्य पक्षं निन्दित्वा अनन्तं किंचिद्वक्तुकामेन जैवलिनाकाशः परिगृहीतः तं चाकाशमुद्गीथे संपाद्योपसंहरति स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः इति। तच्चानन्त्यं ब्रह्मलिङ्गम्। यत्पुनरुक्तं भूताकाशं प्रसिद्धिबलेन प्रथमतरं प्रतीयत इति अत्र ब्रूमः प्रथमतरं प्रतीतमपि तद्वाक्यशेषगतान्ब्रह्मगुणान्दृष्ट्वा न परिगृह्यते। दर्शितश्च ब्रह्मण्यप्याकाशशब्दः आकाशो ह वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता इत्यादौ।
तथाकाशपर्यायवाचिनामपि ब्रह्मणि प्रयोगो दृश्यते ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता ॐ कं ब्रह्म खं ब्रह्म खं पुराणम् इति चैवमादौ। वाक्योपक्रमेऽपि वर्तमानस्याकाशशब्दस्य वाक्यशेषवशाद्युक्ता ब्रह्मविषयत्वावधारणा। अग्निरधीतेऽनुवाकम् इति हि वाक्योपक्रमगतोऽप्यग्निशब्दो माणवकविषयो दृश्यते। तस्मादाकाशशब्दं ब्रह्मेति सिद्धम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — छान्दोग कहते हैं - [ शालवत्य - हे जैवलि! ] ' अस्य लोकस्य ० ' ( इस पृथिवी लोकका आधार क्या है? राजा प्रवाहण - आकाश, क्योंकि ये सारे भूत आकाशंसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाशको ही लय होते हुए प्राप्त होते हैं ; आकाश ही इन सभीसे महान् और आकाश ही आश्रय है ) यहाँ संशय होता है कि क्या आकाश शब्दसे परब्रह्मका अभिधान किया जाता है अथवा भूताकाशका? संशय क्यों होता है? इससे कि दोनोंमें आकाश शब्दका प्रयोग दिखाई देता है।
लोक और वेदमें आकाश शब्द भूताकाशमें तो सुप्रसिद्ध है। कहीं ब्रह्ममें भी प्रयुक्त हुआ देखा जाता है। जहाँ वाक्यशेषके बलसे अथवा असाधारण गुणके श्रवणसे ब्रह्म निर्धारित होता है, जैसे कि ' यदेष आकाश - ' ( यदि यह आनन्दरूप आकाश न हो ) और ' आकाशो वै ० ' ( आकाश ही इस प्रसिद्ध नाम और रूपको प्रकट करने वाला है, वे जिसके आन्तर हैं वह ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियोंमें है। अतः संशय होता है, तो यहाँ युक्त क्या है?
पूर्वपक्षी - यहाँ आकाशशब्दसे भूताकाशका ग्रहण है, क्यों, भूताकाश ही अतिप्रसिद्ध प्रयोग होनेसे बुद्धिमें शीघ्र आरुढ होता है। और यह आकाश शब्द दोनोमें साधारण है ऐसा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे एक शब्दके अनेक अर्थ होने का प्रसङ्ग हो जायगा। इससे ब्रह्ममें आकाश शब्द गौण होना युक्त है, कारण कि विभुत्वादि अनेक धर्मोसे युक्त होनेके कारण ब्रह्म आकाश के सदृश है। मुख्य अर्थका संभव हो तो गौण अर्थका ग्रहण युक्त नहीं है, अतः यहाँ मुख्य भूताकाशका ही ग्रहण संभव है।
भूताकाशका ग्रहण करें तो ' सर्वाणि ह वा ० ' ( निश्चय ये सारे भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि वाक्यशेष उपपन्न नहीं होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि भूताकाश भी वायु आदि क्रमसे कारण हो सकता है, और ' तस्माद्वा ० ' ( शास्त्रप्रसिद्ध परोक्ष आत्मा यही माया विशिष्ट आत्मा है उससे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे आकाशकी कारणता ज्ञात होती है।
अन्य वायु आदि भूतोंकी अपेक्षा भूताकाशमे श्रेष्ठत्व और आश्रयत्व भी उपपन्न है, इसलिए आकाश शब्दसे भूताकाशका ग्रहण युक्त है। सिद्वान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' आकाशस्तलिङ्गात् ' आकाश शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण करना युक्त है, क्योंकि उसका लिङ्ग हैं | परब्रह्म के ग्रहण करने में ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' यह लिङ्ग प्रमाण है। वेदान्त वाक्योंमें यह मर्यादा है कि परब्रह्म से ही भूतोंकी उत्पत्ति होती है। परन्तु भूताकाश भी वायु आदि क्रमसे कारण दिखलाया गया है?
ठीक, दिखलाया गया है, तो भी मूल कारण ब्रह्मके अपरिग्रहसे ' आकाशादेव ' ( आकाश से ही ) ' एव ' अवधारण और ' सर्वाणि ' ( सब ) यह भूतों का विशेषण अनुकूल ( संगत ) न होगा। उसी प्रकार ' आकारां ० ' ( आकाशमें लीन होते हैं ) यह ब्रह्मका लिङ्ग है। ' आकाशो ० ( आकाश इनसे महान् है और आकाश परमाश्रय है ) इस प्रकार ज्यायस्त्व और परमाश्रयत्व भी ब्रह्म के लिङ्ग हैं।
' ज्यायान्पृथिव्या ० ' ( यह मेरा आत्मा पृथिवीसे बड़ा अन्तरिक्षसे बड़ा द्युलोकसे बड़ा इन सब लोकोंसे बड़ा है ) यह श्रुति केवल एक परमात्मा में ही अपेक्षा रहित ज्यायस्त्व कहती है। तथा परमाश्रयत्व भी परम कारण होनेसे परमात्मामें ही युक्त है। ' विज्ञानमानन्दं ० ' ( ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है, वह धन देने वाले ( कर्म करने
* पूर्वपक्षी - ' अस्य लोकस्य ' इस छान्दोग्य श्रुतिमें पठित आकाश शब्दसे भूताकाशका ग्रहण करना चाहिए ब्रह्मका नहीं, यदि ' यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रुतिके आधारपर आकाश शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण करें . तो एक आकाश शब्दके भूताकाश और ब्रह्म दो अर्थं मानने पड़ेंगे, ऐसा मानने से सर्वत्र एक शब्दके अनेक अर्थ माननेका प्रसंग उपस्थित होगा जो सर्वथा अयुक्त है। यदि ऐसा है तो ' यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्मके लिए आकाश शब्द प्रयोग क्यों किया गया है? इसलिए कि ' आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' ( ब्रह्म आकाशके समान सर्वगत और नित्य है ) इसप्रकार आकाशके समान विभूत्वादि अनेक धर्मं ब्रह्ममें श्रुति प्रतिपादित हैं, इस समानता के कारण ब्रह्ममें आकाश शब्दका गौण प्रयोग किया गया है।
* ` यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रुतियोंके आधारपर आकाश शब्दसे ब्रह्मका ही ग्रहण करना ठीक है, भूताकाशका नहीं, क्योंकि ' सर्वाणि ह वा इमानि ० ' इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म ही सब भूतों का कारण कहा गया है। यदि भूताकाशको कारण मानें तो तेज आदिकी उत्पत्तिमें वायु आदिको भी कारण मानना पड़ेगा। यदि आकाश शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण न करें तो ' आकाशादेव ' इस श्रुतिमें अवधारणार्थक ' एव ' का बाध होगा।
' सर्वाणि ह वा इमानि ० ' इस श्रुतिमें ' सर्व ' पद आकाश ( ब्रह्म ) से भिन्न सव भूतोंकी उत्पत्ति ब्रह्मसे ही कहता है। यदि ' सर्व ' पदसे आकाशको छोड़कर वायु आदि शेष भूतोंका ग्रहण करें तो सर्वपदमें अर्थका संकोच करना पड़ेगा जो सर्वथा अयुक्त है, अतः ' सर्व ' पदसे आकाशका भी ग्रहण है। वाले यजमानकी परमगति है अर्थात् कर्म फलका दाता है ) ऐसी श्रुति भी है।
और उसी प्रकार अन्तवात्त्वदोषसे शालावत्यके पक्षकी निन्दाकर किसी अविनाशी वस्तुको कहनेकी इच्छा करनेवाले राजा जैवलिने आकाशका ग्रहण किया है। उस आकाशका उद्गीथ में संपादनकर ' स एष ० ' ( वह यह उद्गीथ परसे पर परम उत्कृष्ट है और यह अनन्त है ) ऐसा उपसंहार किया है। वह आनन्त्य ब्रह्मका लिङ्ग है। और जो पुनः यह कहा गया है कि प्रसिद्धिके वलसे आकाश शब्दसे प्रथम भूताकाश प्रतीत होता है।
इस विषय में हम कहते हैं- आकाश पदसे प्रथम भूताकाश प्रतीत होता हुआ भी वाक्यशेषगत ब्रह्म गुणों को देखकर उसका ग्रहण नहीं किया जाता। और ' आकाशो ० ' ( आकाश ही नाम और रूपको प्रकट करनेवाला है ) इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्ममें भी आकाश शब्दका प्रयोग दिखलाया गया है।
तथा आकाशके पर्यायवाची शब्दोंका भी ब्रह्म में प्रयोग ' ऋचोऽक्षरे ० ' ( उत्कृष्ट, कूटस्थ इस आकाश ( ब्रह्म ) में सब वेद प्रमाण हैं और उसीमें देव अधिष्ठित हैं ) ' सैषा भार्गवी ० ' ( यह मार्गवी वारुणी विद्या परब्रह्ममें प्रतिष्ठित है ) ' ॐ कं ब्रह्म ० ' ( ॐ क- सुख ब्रह्म है, ख - आकाशव्यापक -ब्रह्म है ) और ' खं पुराणम् ० ' ( ख पुराण है ) इत्यादि श्रुतियोंमें देखा जाता है। वाक्यके आरम्भमें भी वर्तमान आकाश शब्दका वाक्यशेषके बलसे ब्रह्मविषयक निश्चय करना युक्त है।
[ इसमें उदाहरण देते हैं ] ' अग्निरधीते ' ( अग्नि अनुवाक - वेदभाग का अध्ययन करता है ) इस वाक्यके आरम्भमें प्राप्त अग्नि शब्द भी माणवक विषयक देखा जाता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आकाश शब्द ब्रह्मविषयक है।। २२
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत अधिकरणमें ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' इत्यादि श्रुतियोंके आधारपर पापरहितत्वादि अव्यभिचारी ब्रह्मके लिंगोंसे रूपवत्त्वादि दुर्बल लिङ्गोंकी व्यवस्था उपाधि द्वारा की गई है। परन्तु यहाँ ' अस्य लोकस्य का गतिः ' यह छान्दोग्य श्रुति लिंगसे बलवती है, अतः यहाँ श्रुतिस्थ आकाश शब्दकी अन्य व्यवस्था नहीं की जा सकती अर्थात् यह आकाश शब्द ब्रह्मपरक न होकर भूताकाश परक है। इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगति से पूर्वपक्ष उपस्थित होनेपर उसके उत्तरमें ' आकाशस्तल्लिङ्गात् ' इस सूत्रका आरम्भ है। ' अस्य लोकस्य ' यह छान्दोग्य श्रुति इस अधिकरणका विषयवाक्य है।
* छान्दोग्योपनिषद् अध्याय १ खण्ड ८ - दालभ्य, शालावत्य ब्राह्मण और राजा जैवलि ये तीनों उद्गीथविद्यामें कुशल थे, परस्पर विचार आरम्भ किया कि उद्गीथकी प्रतिष्ठा क्या है? दालभ्यओंकाररूप उद्गीथका कारण स्वर ( ध्वनि ) है, उसका कारण? प्राण ( बल ) है, उसका कारण? अन्न है, अन्नका कारण? जल- वर्षा है, उसका कारण? स्वर्ग ( अन्तरिक्ष ) है, उसका कारण?
कोई नहीं, स्वर्गस्थ देवगण प्रसन्न होकर यथासमय वृष्टि करते हैं, उससे अन्न, अन्नसे प्राण ( बल ), प्राणसे ध्वनि ( बोलने की शक्ति ) और ध्वनिसे ओंकार रूप उद्गीथ। इस प्रकार परम्परासे ओंकाररूप उद्गीथकी प्रतिष्ठा स्वर्ग है। यह सुनकर शालावत्यने कहा- हे दालभ्य! स्वर्गकी प्रतिष्ठा यह रथान्तर साम ( पृथ्वी ) है, क्योंकि यहाँ यज्ञादि कर्म होते हैं, जिससे स्वर्गस्थ देवगण जीवित रहते हैं अथवा सन्तुष्ट होते हैं। इसलिए उद्गीथकी प्रतिष्ठा रथान्तर साम है अर्थात् पृथ्वी लोक है, उसका कारण कोई नहीं।
राजा जैवलि - ' अन्तवद्वैकिल ते शालावत्य साम ' ( छा ० १२८८ ) ( हे शालावत्य! निश्चय, यह तेरा साम अन्तवाला है अर्थात् यह पृथ्वी लोक परिच्छिन्न और नाशवान् है ) तुमने यह मिथ्या कहा कि उद्गीथकी प्रतिष्ठा पृथ्वी लोक है, इस अपराधके कारण यदि कोई ऐसा कह देता कि तेरा मस्तक गिर जाय तो तेरा मस्तक गिर जाता। तब भयभीत होकर शालावत्य बोला - ' हे जैवलि! ‘ अस्य लोकस्य का गतिः ' ( इस पृथ्वी लोककी प्रतिष्ठा क्या है?
) जैवलि - ' आकाश इति सोवाच ' ( यह आकाश है ऐसा कहा ) इस प्रकार जैपलिने विनाशित्व और परिच्छिन्नत्व दोष देकर शालावत्य के पक्षकी निन्दाकी और उद्गीथकी प्रतिष्ठा आकाश कहा, अतः यहाँ अनन्त आकाश - ब्रह्मका ग्रहण है। ' उद्गीथ आकाश ही है ' इस प्रकार उद्गीथमें आकाशका संपादन करनेसे आकाशके अनन्त आदि गुणोंसे युक्त उद्गोथमें आकाशदृष्टिकर उपासना करनी चाहिए।
यद्यपि आकाश शब्दसे सहसा भूताकाश ही प्रतीत होता है, तो भी ' आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ' इस वाक्यशेषके बलसे आकाश शब्दसे ब्रह्मका ही ग्रहण करना युक्त है।
* छान्दोग्यादि उपनिषदोंमें ' कं ब्रह्म, खं ब्रह्म ' ' खं ब्रह्म, खं पुराणम् ' ' परमे व्योमन् ' इसप्रकार आकाशके पर्यायवाची ' ख व्योम ' आदि शब्दों का प्रयोग ब्रह्ममें देखा जाता है। और आनन्दके पर्यायवाची कं शब्दका प्रयोग ब्रह्म में किया गया है, किन्तु लोक प्रसिद्ध भूताकाशमें नहीं, क्योंकि वह जड़ है | और उत्पद्यमान होनेसे ' खं पुराणम् ' वह अनादि भी नहीं है, इसलिए ' आकाश इति होवाच ' इस श्रुतिमें आकाश शब्द ब्रह्मपरक ही है। पूर्वपक्ष में भूताकाश दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना है, सिद्धान्त में ब्रह्मदृष्टिसे॥ २२
प्राणाधिकरणम्
1.1.23 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २३
अत एव प्राणः ॥ १.१.२३ ॥
पदच्छेद — अतः , एव , प्राणः
सूत्रार्थ — ( अतएव ) पूर्व सूत्रोक्त उत्पत्ति आदि लिङ्गोंसे ( प्राणः ) ' प्राण इति होवाच ' इस श्रुतिस्थ प्राण परमात्मा ही है।
शाङ्करभाष्य
उद्गीथे प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता इत्युपक्रम्य श्रूयते कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता इति। तत्र संशयनिर्णयौ पूर्ववदेव द्रष्टव्यौ। प्राणबन्धन्ि सोम्य मनः प्राणस्य प्राणम् इति चैवमादौ ब्रह्मविषयः प्राणशब्दो दृश्यते वायुविकारे तु प्रसिद्धतरो लोकवेदयोः अत इह प्राणशब्देन कतरस्योपादानं युक्तमिति भवति संशयः। किं पुनरत्र युक्तम् वायुविकारस्य पञ्चवृत्तेः प्राणस्योपादानं युक्तम्।
तत्र हि प्रसिद्धतरः प्राणशब्द इत्यवोचाम। ननु पूर्ववदिहापि तल्लिङ्गाद्ब्रह्मण एव ग्रहणं युक्तम्। इहापि हि वाक्यशेषे भूतानां संवेशनोद्गमनं पारमेश्वरं कर्म प्रतीयते। न मुख्येऽपि प्राणे भूतसंवेशनोद्गमनस्य दर्शनात्। एवं ह्याम्नायते यदा वै पुरुषः स्वपिति प्राणं तर्हि वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः स यदा प्रबुध्यते प्राणादेवाधि पुनर्जायन्ते इति। प्रत्यक्षं चैतत् स्वापकाले प्राणवृत्तावपरिलुप्यमानायामिन्द्रियवृत्तयः परिलुप्यन्ते प्रबोधकाले च पुनः प्रादुर्भवन्तीति।
इन्द्रियसारत्वाच्च भूतानामविरुद्धो मुख्ये प्राणेऽपि भूतसंवेशनोद्गमनवादी वाक्यशेषः। अपि चादित्योऽन्नं चोद्गीथप्रतिहारयोर्देवते प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्यानन्तरं निर्दिश्येत न च तयोर्ब्रह्मत्वमस्ति तत्सामान्याच्च प्राणस्यापि न ब्रह्मत्वमित्येवं प्राप्ते सूत्रकार आह अत एव प्राणः इति। तल्लिङ्गादिति पूर्वसूत्रे निर्दिष्टम्। अत एव तल्लिङ्गात्प्राणशब्दमपि परं ब्रह्म भवितुमर्हति।
प्राणस्यापि हि ब्रह्मलिङ्गसंबन्धः श्रूयते सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते इति। प्राणनिमित्तौ सर्वेषां भूतानामुत्पत्तिप्रलयावुच्यमानौ प्राणस्य ब्रह्मतां गमयतः। ननूक्तं मुख्यप्राणपरिग्रहेऽपि संवेशनोद्गमनदर्शनमविरुद्धम् स्वापप्रबोधयोर्दर्शनादिति। अत्रोच्यते स्वापप्रबोधयोरिन्द्रियाणामेव केवलानां प्राणाश्रयं संवेशनोद्गमनं दृश्यते न सर्वेषां भूतानाम् इह तु सेन्द्रियाणां सशरीराणां च जीवाविष्टानां भूतानाम् सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि इति श्रुतेः।
यदापि भूतश्रुतिर्महाभूतविषया परिगृह्यते तदापि ब्रह्मलिङ्गत्वमविरुद्धम्। ननु सहापि विषयैरिन्द्रियाणां स्वापप्रबोधयोः प्राणेऽप्ययं प्राणाच्च प्रभवं श्रृणुमः यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति इति। तत्रापि तल्लिङ्गात्प्राणशब्दं ब्रह्मेव। यत्पुनरुक्तमन्नादित्यसंनिधानात्प्राणस्याब्रह्मत्वमिति तदयुक्तम् वाक्यशेषबलेन प्राणशब्दस्य ब्रह्मविषयतायां प्रतीयमानायां संनिधानस्याकिंचित्करत्वात्।
यत्पुनः प्राणशब्दस्य पञ्चवृत्तौ प्रसिद्धतरत्वम् तदाकाशशब्दस्येव प्रतिविधेयम्। तस्मात्सिद्धं प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्य ब्रह्मत्वम्।। अत्र केचिदुदाहरन्ति प्राणस्य प्राणम् प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः इति च। तदयुक्तम् शब्दभेदात्प्रकरणाच्च संशयानुपपत्तेः। यथा पितुः पितेति प्रयोगे अन्यः पिता षष्ठीनिर्दिष्टात् प्रथमानिर्दिष्टः पितुः पिता इति गम्यते तद्वत् प्राणस्य प्राणम् इति शब्दभेदात्प्रसिद्धात्प्राणात् अन्यः प्राणस्य प्राण इति निश्चीयते। न हि स एव तस्येति भेदनिर्देशार्हो भवति।
यस्य च प्रकरणे यो निर्दिश्यते नामान्तरेणापि स एव तत्र प्रकरणी निर्दिष्ट इति गम्यते यथा ज्योतिष्टोमाधिकारे वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत इत्यत्र ज्योतिःशब्दो ज्योतिष्टोमविषयो भवति तथा परस्य ब्रह्मणः प्रकरणे प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः इति श्रुतः प्राणशब्दो वायुविकारमात्रं कथमवगमयेत्। अतः संशयाविषयत्वान्नैतदुदाहरणं युक्तम्। प्रस्तावदेवतायां तु प्राणे संशयपूर्वपक्षनिर्णया उपपादिताः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सामवेदीय उद्गीथ प्रकरण में ' प्रस्तोतर्या देवता ० ' ( हे प्रस्तोता! जो देवता प्रस्ताव में अनुगत है ) ऐसा आरम्भकर ' कतमा सा ० ' ( वह प्रस्ताव अधिष्ठातृ देवता कौन है? चाक्राण - प्राण है, ऐसा कहा, क्योंकि ये सभी भूत प्राण में ही प्रवेश कर जाते हैं अर्थात् लीन हो जाते हैं, प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं, वह यह प्राण देवता ही प्रस्तावमें अनुगत है ) ऐसा श्रुति कहती है। उसमें संशय और निर्णय पहले के समान ही समझने चाहिएँ। ' प्राणबन्धनं ' ( हे प्रिय!
मन उपाधिसे उपलक्षित जीव प्राण बन्धन वाला है अर्थात् प्राणोपलक्षित ब्रह्म के साथ सुषुप्ति में एक होता है ) और ' प्राणस्य ० ' ( जो उसे प्राणका प्राण जानते हैं ) इत्यादि श्रुतिवाक्यों में प्राणशब्द ब्रह्मविषयक देखा जाता है। देहमें चलने वाले वायुके विकार प्राण में तो लोक और वेदमें प्राण शब्द अतिप्रसिद्ध है। इसलिए यहाँ प्राण शब्दसे किसका ग्रहण करना युक्त है, ऐसा संशय होता है। तो यहाँ किसका ग्रहण युक्त है?
वायुके विकार पाँच वृत्तिवाले प्राणका ग्रहण करना युक्त है, क्योंकि उसमें ही प्राणशब्द विशेषरूप से प्रसिद्ध है, ऐसा हम कह चुके हैं। यदि कहो कि पूर्व अधिकरण के समान इस अधिकरणमें भी ब्रह्म के लिङ्गोंसे ब्रह्मका ही ग्रहण युक्त है। क्योंकि यहाँ भी वाक्य शेष [ सर्वाणि ह वा इमानि ] में भूतोंका लय और उद्गम परमेश्वरका कर्म प्रतीत होता है। तो यह ठीक नहीं है, कारण कि मुख्यप्राण में भी भूतोंके लय और उद्गम देखे जाते हैं।
श्रुति ऐसा कहती है कि ' यदा वै ० ' ( निश्चय जब पुरुष सोता है तब वाणी प्राणमें ही लीन होती है, चक्षु प्राणमें, श्रोत्र प्राणमें और मन प्राण में लीन होता )। और यह प्रत्यक्ष है कि सुपुप्ति कालमें प्राणव्यापारके अलुप्त होनेपर भी इन्द्रियों के व्यापार लुप्त हो जाते हैं और जाग्रत् कालमें प्रकट होते हैं
। और इन्द्रियाँ भूतोंकी साररूप हैं, इसलिए भूतोंके लय और उद्गमका प्रतिपादक वाक्यशेष मुख्य
प्राण में भी विरुद्ध नहीं है। किञ्च प्रस्तावदेवता प्राणके कथनानन्तर उद्गीथ और प्रतिहारके देवता
आदित्य और अन्नका निर्देश है। जैसे ये दोनों ( आदित्य और अन्न ) ब्रह्म नहीं है, वैसे ही उनके
सादृश्यसे प्राण भी ब्रह्म नहीं है। सिद्धान्ती --- ऐसा प्राप्त होनेपर भगवान् सूत्रकार कहते हैं— ' अत एव प्राण : तल्लिङ्गात् ' ऐसा पूर्व सूत्रमें निर्देश किया गया है, इससे उसके लिङ्गोंसे प्राणशब्द वाच्य परब्रह्म होना चाहिए, क्योंकि ' सर्वाणि ह वा इमानि ' यह श्रुति प्राणका भी ब्रह्मलिङ्गके साथ सम्बन्ध कहती है। इसमें प्राण निमित्तक सभी भूतोंके कहे हुए उत्पत्ति और प्रलय प्राण में ब्रह्मत्वका बोध कराते हैं।
परन्तु जो यह कहा गया है कि मुख्य प्राणका परिग्रह होनेपर भी लय और उत्पत्तिका दर्शन विरुद्ध नहीं है, क्योंकि सुषुप्ति और जाग्रत् में ऐसा देखने में आता है।
इसपर कहते हैं- सुषुप्ति और प्रबोध कालमें केवल इन्द्रियों के ही प्राणाश्रय लय और उद्गम देखे जाते हैं सब भूतोंके नहीं, परन्तु यहाँ तो इन्द्रिय सहित, शरीर सहित और जीवसे सम्बद्ध भूतोंके प्राणाश्रय लय और उद्गम हैं, क्योंकि ' सर्वाणि ह वा इमानि ' ऐसी श्रुति है | यदि यह भूतश्रुति महाभूत विषयक गृहीत हो तो भी ब्रह्मलिङ्गत्वमें कोई विरोध नहीं हैं।
परन्तु इसप्रकार हम सुनते हैं कि सुषुप्ति और जाग्रत् कालमें विषयों सहित इन्द्रियोंका प्राण में लय और प्राणसे उद्भव होता है, क्योंकि ' यदा सुप्तः ० ' ( जब सोता हुआ पुरुष कुछ स्वप्न नहीं देखता तब यह प्राण में ही एक होता है और उसी समय उसमें सभी नामोंके साथ वाणी लीन होती है ) यह श्रुति है | इसमें भी ब्रह्मके लिंगोंसे प्राणशब्द वाच्य ब्रह्म ही है।
और जो यह कहा गया है कि अन और आदित्यकी संनिधिसे प्राण ब्रह्म नहीं है, वह अयुक्त है, क्योंकि वाक्यशेषके बलसे प्राण शब्द ब्रह्मविषयक प्रतीत होनेपर सन्निधान प्रयोजन रहित है। पुनः यह भी कहा गया है कि प्राणशब्द पाँच वृत्तिवाले मुख्य प्राणमें अतिप्रसिद्ध है, उस आक्षेपका परिहार आकाश शब्दके समान समझना चाहिए | इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रस्तावका देवता प्राण ब्रह्म है। यहाँ वृत्तिकार ' प्राणस्य प्राणम् ' ' प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः ' ( हे सोम्य!
मन उपहित जीव प्राण - ब्रह्मके साथ सुषुप्ति में एक होता है ) इसप्रकार श्रुतिका उदाहरण देते हैं। वह ठीक नहीं है, क्योंकि शब्द भेदसे और प्रकरणसे संशय नहीं हो सकता। यथा ' पितुः पिता ' ( पिताका पिता ) इस प्रयोग में षष्ठी विभक्तिसे निर्दिष्ट पिता अन्य है और प्रथम निर्दिष्ट पिता अन्य है, इससे ' पितुः पिता ' ऐसा अवगत होता है।
वैसे ही ' प्राणस्य प्राणम् ' ( प्राणका प्राण ) इसमें शब्दभेदसे प्रसिद्ध मुख्य प्राणसे भिन्न प्राणका प्राण है ऐसा निश्चित होता है, क्योंकि एक ही पदार्थ ' तत् से कहा हुआ ' तस्य ' ( उसका ) इसप्रकार भेद निर्देशके योग्य नहीं होता अर्थात् प्रथमासे कहे हुए पदार्थको भेदरूप षष्ठीसे कहना युक्त नहीं है। जिसके प्रकरण में जो निर्दिष्ट होता है उस प्रकरण में अन्य नामसे भी वही प्रकरणी ( प्रकृत ) निर्दिष्ट होता है, ऐसा ज्ञात होता है।
जैसे ज्योतिष्टोमके प्रकरण में ' वसन्ते वसन्ते ० ' ( प्रति वसन्त ऋतुमें ज्योति : याग करे )
सूत्रार्थ - ( ज्योतिः ) ' यदतः परो दिवो ' यहां ज्योतिः शब्दसे ब्रह्म ही ग्राह्य है, ( चरणाभिधानात् ) क्योंकि ' पादोऽस्य ' इस पूर्ववाक्यमें पदका अभिधान है। यहाँ ज्योतिः शब्द ज्योतिष्टोम विषयक है, वैसे ही परब्रह्म के प्रकरण में ' प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः ' इसमें श्रुत प्राणशब्द केवल वायुके विकारमात्रका कैसे बोध करायेगा? अतः संशयका विषय न होनेसे यह उदाहरण ठीक नहीं है। प्रस्तावके देवता प्राणमें तो संशय, पूर्वपक्ष और निर्णयका उपपादन किया गया है।। २३
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * भगवान् सूत्रकार आकाश वाक्यमें उक्त न्यायका ' प्राण इति होवाच ' इस वाक्यमें अतिदेश करते हैं अर्थात् ' आकाश इति होवाच ' जैसे यहां आकाश शब्द ब्रह्मपरक है, वैसे ही ' प्राण इति होवाच ' इस वाक्यगत प्राणशब्द भी ब्रह्मपरक है। इसप्रकार अतिदेश संगतिसे ' अत एव प्राणः ' इस सूत्रका उल्लेख करते हैं। एक समय दुर्भिक्ष से पीड़ित उषस्त्रि नाम चक्रका पुत्र चाक्रायण धनकामनासे राजाके यज्ञमें गया, वहां ऋत्विजों में से पहले प्रस्तोता से प्रश्न किया - ( हे प्रस्तोता! जो देवता प्रस्ताव - भक्ति में अनुगत है, यदि तू उसे विना जाने प्रस्तवन करेगा
तो तेरा मस्तक गिर जायगा ) इसीप्रकार उद्गाता और प्रतिहर्तासे भी कहा। यहाँ विशेष ज्ञातव्य
यह है कि ' पञ्च भक्तिकं साम सप्तभक्तिकं सामेति ' ' पाँच भक्ति साम और सात भक्ति साम इसप्रकार सामके दो भेद हैं। ' यहाँ भक्तिशब्द अवयव वाचक है अर्थात् सामवेदके भागको भक्ति कहते हैं। हिंकार, ओंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव और निधन। इनमेंसे प्रस्तावका गायन करनेवाला प्रस्तोता, उद्गीथका गायन करनेवाला उद्गाता और प्रतिहारका गायन करनेवाला प्रतिहर्ता कहलाता है। उपद्रव और निधन दोनोंको तीनों मिलकर गायन करते हैं। और ओंकारको यहाँ पृथक् नहीं कहा गया है। तब प्रस्तोताने चक्रायणसे कहा कि ' प्रस्ताव में अनुगत वह देवता कौन है? उषस्ति - ' प्राण इति होवाच ' ( वह प्राण है, ऐसा कहा )। इसमें प्राणको ही सभी भूतोंकी उत्पत्ति और लयका कारण कहां गया है। इस कारण प्राणशब्दसे ब्रह्मका ग्रहण हो सकता है वायुके विकार प्राण में भी लोक और वेदमें प्राण शब्द प्रसिद्ध है, तो इससे सन्देह होता है कि यहां प्राण शब्दसे किसका ग्रहण करना युक्त है?
* समाधान - ' इंद्रियसारत्वाच्च ' ' त्यस्य ह्येष रस : ' बृह ० ( २ | ३ | ५ ) ( इन्द्रियाँ त्यत् आका-
शादिका सार हैं ) इससे यह स्पष्ट होता है कि इन्द्रियाँ अपञ्चीकृत भूतोंकी साररूप हैं ) उनके लयादि के कथन से भूतोंके भी लयादि प्राण में सिद्ध होते हैं, इसप्रकार ' सर्वाणि हवा ' यह वाक्यशेष भी संगत है। उसी प्रसंगमें उद्गाताने चाक्रायणसे पूछा ' कतमा सा देवता ' ( छा || ११ | ६ ) ( उद्गीथमें कौन देवता अनुगत है? ) चाक्रायण - ' आदित्य इति होवाच ' ( छा ० १1११1७ ) ( आदित्य है, ऐसा कहा ) प्रतिहर्ता - ' कतमा सा देवता ' ( प्रतिहारमें कौन देवता अनुगत है? ) ' अन्नमिति होवाच ' ( छा ० १।११।९ ) ( वह देवता अन्न है, ऐसा कहा ) इसप्रकार प्रस्ताव देवताके कथनानन्तर उद्गीथके देवता आदित्य और प्रतिहारके देवता अन्नका कथन किया गया है। इस प्रश्नोत्तरमें जैसे आदित्य और अन्न ब्रह्म नहीं हैं, वैसे ही यहाँ आदित्य और अन्नके सन्निहित पठित होनेसे प्राण भी ब्रह्म नहीं है। इसलिए ' प्राण इति होवाच ' यहाँ प्राण शब्दसे वायुके विकार पाँच वृत्तिवाले प्राणका ग्रहण करना युक्त है।
* ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते ' ( छा ० १।९।१ ) ( ये सब भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ) इस श्रुतिमें जैसे भूतों का विशेषण ' सर्व ' पद आकाशमें ब्रह्मत्वका बोधक लिङ्ग है, वैसे ही ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' ( छा ० १1११।५ ) इस श्रुतिमें भी भूतोका विशेषण ' सर्व ' पद प्राण में ब्रह्मत्वका बोधक लिङ्ग है। इससे ' प्राण इति होवाच ' यहाँ प्राण शब्द ब्रह्मपरक है। किच ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' यह श्रुति सब भूतोंके साथ वायुकी भी उत्पत्ति कहती है, और ' आकाशाद्वायुः ' ( आकाशसे वायु उत्पन्न होता है ) इस अन्य श्रुतिमें भी वायुकी उत्पत्ति कही गई है। इससे जब प्राणका कारण भूतं वायु भी सब भूतोंके लय और उद्गमका कारण नहीं तो वायुका विकार प्राण सब भूतोंके लय और उद्गमका कारण हो यह कथन केवल साहस मात्र है।
** किञ्च अन्न और आदित्यकी संनिधिमें पठित होनेसे भी प्राण ब्रह्म नहीं है, क्योंकि वाक्यान्तरनिधिक अपेक्षा स्ववाक्यावगत लिंग बलवान् होता है ' हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिसंस्थितः। उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः। ' ( हृदयमें प्राण, गुदा में अपान, नाभिमें समान, कण्ठदेशमें उदान और व्यान सारे शरीर में है ) इसप्रकार पाँच वृत्तिवाला शरीरान्तः संचारी वायुका विकार प्राण यहाँ प्राणशब्दसे ग्राह्य नहीं है। आकाशशब्द लोकप्रसिद्ध भूतकाशमें अतिप्रसिद्ध होनेपर भी जैसे ' आकाश इति होवाच ' यहाँ ब्रह्मपरक है, वैसे ही प्राण शब्द अध्यात्म मुख्य प्राण में अतिप्रसिद्ध होनेपर भी ' प्राण इति होवाच ' यहाँ ब्रह्मपरक ही है। वृत्तिकार ' प्राणस्य प्राणम् ' को इस अधिकरणका विषय वाक्य मानते हैं, परन्तु भगवान् भाष्यकारने शब्दभेद और प्रकरण इन दो हेतुओंसे उसका खण्डन किया है। परन्तु ' पुरुषस्य चैतन्यम् ' ' राहोः शिरः ' जैसे यहां अभेदमें मी षष्ठी और प्रथमा विभक्तिका निर्देश है, वैसे ' प्राणस्य प्राणम् ' यहाँ भी होना चाहिए? परन्तु यहाँ तो दोनों शब्दोंसे निर्दिष्ट पदार्थों में भेद है।
8 यद्यपि ' प्राण इति होवाच ' यहाँ एक प्राणशब्द मुख्यप्राणका वाचक है अथवा परब्रह्मका ऐसा संशय हो सकता है, तथापि ' प्राणस्य प्राणम् ' इस श्रुति वाक्यमें भिन्न - भिन्न अर्थोके प्रतिपादक दो प्राण शब्द हैं। इनमें प्रथमाविभक्ति निर्दिष्ट द्वितीय प्राणशब्द ब्रह्मपरक है ; इसलिए इस वाक्यसे संशय के असंभव से पूर्वपक्षका भी अभाव है। इसकारण ' प्राणबन्धनं ' इत्यादि श्रुति वाक्योंका उदाहरणरूपसे उल्लेख करना वृत्तिकारको युक्त नहीं है। अतः यहाँ आकाशशब्द के समान प्राणशब्द भी ब्रह्मपरक है। पूर्वपक्ष में प्रस्तावमें लोक प्रसिद्ध मुख्यप्राणदृष्टिसे उपासना है और सिद्धान्त में ब्रह्मदृष्टिसे उपासना है।। २३
ज्योतिश्चरणाधिकरणम्
1.1.24 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २४
ज्योतिश् चरणाभिधानात् ॥ १.१.२४ ॥
शाङ्करभाष्य
उद्गीथे प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता इत्युपक्रम्य श्रूयते कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता इति। तत्र संशयनिर्णयौ पूर्ववदेव द्रष्टव्यौ। प्राणबन्धन्ि सोम्य मनः प्राणस्य प्राणम् इति चैवमादौ ब्रह्मविषयः प्राणशब्दो दृश्यते वायुविकारे तु प्रसिद्धतरो लोकवेदयोः अत इह प्राणशब्देन कतरस्योपादानं युक्तमिति भवति संशयः। किं पुनरत्र युक्तम् वायुविकारस्य पञ्चवृत्तेः प्राणस्योपादानं युक्तम्।
तत्र हि प्रसिद्धतरः प्राणशब्द इत्यवोचाम। ननु पूर्ववदिहापि तल्लिङ्गाद्ब्रह्मण एव ग्रहणं युक्तम्। इहापि हि वाक्यशेषे भूतानां संवेशनोद्गमनं पारमेश्वरं कर्म प्रतीयते। न मुख्येऽपि प्राणे भूतसंवेशनोद्गमनस्य दर्शनात्। एवं ह्याम्नायते यदा वै पुरुषः स्वपिति प्राणं तर्हि वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः स यदा प्रबुध्यते प्राणादेवाधि पुनर्जायन्ते इति। प्रत्यक्षं चैतत् स्वापकाले प्राणवृत्तावपरिलुप्यमानायामिन्द्रियवृत्तयः परिलुप्यन्ते प्रबोधकाले च पुनः प्रादुर्भवन्तीति।
इन्द्रियसारत्वाच्च भूतानामविरुद्धो मुख्ये प्राणेऽपि भूतसंवेशनोद्गमनवादी वाक्यशेषः। अपि चादित्योऽन्नं चोद्गीथप्रतिहारयोर्देवते प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्यानन्तरं निर्दिश्येत न च तयोर्ब्रह्मत्वमस्ति तत्सामान्याच्च प्राणस्यापि न ब्रह्मत्वमित्येवं प्राप्ते सूत्रकार आह अत एव प्राणः इति। तल्लिङ्गादिति पूर्वसूत्रे निर्दिष्टम्। अत एव तल्लिङ्गात्प्राणशब्दमपि परं ब्रह्म भवितुमर्हति।
प्राणस्यापि हि ब्रह्मलिङ्गसंबन्धः श्रूयते सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते इति। प्राणनिमित्तौ सर्वेषां भूतानामुत्पत्तिप्रलयावुच्यमानौ प्राणस्य ब्रह्मतां गमयतः। ननूक्तं मुख्यप्राणपरिग्रहेऽपि संवेशनोद्गमनदर्शनमविरुद्धम् स्वापप्रबोधयोर्दर्शनादिति। अत्रोच्यते स्वापप्रबोधयोरिन्द्रियाणामेव केवलानां प्राणाश्रयं संवेशनोद्गमनं दृश्यते न सर्वेषां भूतानाम् इह तु सेन्द्रियाणां सशरीराणां च जीवाविष्टानां भूतानाम् सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि इति श्रुतेः।
यदापि भूतश्रुतिर्महाभूतविषया परिगृह्यते तदापि ब्रह्मलिङ्गत्वमविरुद्धम्। ननु सहापि विषयैरिन्द्रियाणां स्वापप्रबोधयोः प्राणेऽप्ययं प्राणाच्च प्रभवं श्रृणुमः यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति इति। तत्रापि तल्लिङ्गात्प्राणशब्दं ब्रह्मेव। यत्पुनरुक्तमन्नादित्यसंनिधानात्प्राणस्याब्रह्मत्वमिति तदयुक्तम् वाक्यशेषबलेन प्राणशब्दस्य ब्रह्मविषयतायां प्रतीयमानायां संनिधानस्याकिंचित्करत्वात्।
यत्पुनः प्राणशब्दस्य पञ्चवृत्तौ प्रसिद्धतरत्वम् तदाकाशशब्दस्येव प्रतिविधेयम्। तस्मात्सिद्धं प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्य ब्रह्मत्वम्।। अत्र केचिदुदाहरन्ति प्राणस्य प्राणम् प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः इति च। तदयुक्तम् शब्दभेदात्प्रकरणाच्च संशयानुपपत्तेः। यथा पितुः पितेति प्रयोगे अन्यः पिता षष्ठीनिर्दिष्टात् प्रथमानिर्दिष्टः पितुः पिता इति गम्यते तद्वत् प्राणस्य प्राणम् इति शब्दभेदात्प्रसिद्धात्प्राणात् अन्यः प्राणस्य प्राण इति निश्चीयते। न हि स एव तस्येति भेदनिर्देशार्हो भवति।
यस्य च प्रकरणे यो निर्दिश्यते नामान्तरेणापि स एव तत्र प्रकरणी निर्दिष्ट इति गम्यते यथा ज्योतिष्टोमाधिकारे वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत इत्यत्र ज्योतिःशब्दो ज्योतिष्टोमविषयो भवति तथा परस्य ब्रह्मणः प्रकरणे प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः इति श्रुतः प्राणशब्दो वायुविकारमात्रं कथमवगमयेत्। अतः संशयाविषयत्वान्नैतदुदाहरणं युक्तम्। प्रस्तावदेवतायां तु प्राणे संशयपूर्वपक्षनिर्णया उपपादिताः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — छान्दोग कहते हैं— ' अथ यदतः ० ', ( तथा इस द्युलोक से परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठ पर अर्थात् सबके ऊपर जिससे उत्तम कोई दूसरा लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोंमें प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुष ( देह ) के भीतर ज्योति है ) यहाँ संशय होता है कि श्रुतिमें ज्योतिः शब्दसे आदित्यादि ज्योतिका अभिधान है अथवा परमात्मा का? अन्य अर्थ विषयक शब्द भी ब्रह्मलिङ्गसे ब्रह्मविषयक कहा गया है।
परन्तु यहाँ ब्रह्मका लिङ्ग है अथवा नहीं, ऐसा विचार किया जाता है, तो क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - ज्योतिः शब्दसे आदित्यादिका ही परिग्रह होता है, क्यों? क्योंकि उनमें ज्योतिः शब्दकी प्रसिद्धि है। अन्धकार और ज्योति ये दो शब्द परस्पर विरोधी अर्थों में प्रसिद्ध हैं। चक्षुवृत्तिका निरोधक रात्रि आदिका अन्धकार तम कहलाता है और उसी व्यापारका सहायक आदित्यादि ज्योति : कहलाता है।
उसी प्रकार ' दीप्यते ' ( प्रकाशित होता है ) यह श्रुति भी आदित्यादि विषयक प्रसिद्ध है, और रूपादि रहित ब्रह्ममें ' दीप्यते ' यह श्रुति मुख्यरूपसे नहीं घटती, क्योंकि द्युलोक ज्योतिकी सीमा है, ऐसी श्रुति है। चर और अचर सृष्टिके बीज भूत सर्वात्मक ब्रह्मकी द्युलोक मर्यादा युक्त नहीं है, परन्तु कार्यरूप परिच्छिन्न ज्योतिमें द्युलोक मर्यादा युक्त है ; कारण कि ' परो दिवो ज्योतिः ' इस प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थ भी है।
यदि कहो कि [ ब्रह्मके समान ] कार्यरूप ज्योति भी सर्वत्र गम्यमान ( विद्यमान ) है, अतः द्युलोक उसकी मर्यादा है यह कथन असंगत है, तो प्रथम उत्पन्न हुए केवल अत्रिवृत्कृत ( तीनों भागों में अविभक्त, अन्न, जलसे असम्बद्ध ) तेजको ज्योतिः मानो, ऐसा नहीं, क्योंकि अत्रिवृत्कृत तेजका प्रयोजन नहीं है। यदि कहो कि यही प्रयोजन है जो वह ( अत्रिवृत्कृत तेज ) उपास्य है, तो यह ठोक नहीं है ) कारण कि अन्य प्रयोजन में ( अन्धकारकी निवृत्ति में ) प्रयुक्त आदित्य आदि उपास्य देखनेमें आते हैं।
और ' तासां त्रिवृतं ० ' ( उनमें एक एकको त्रिवृत त्रिवृत करूँ ) यह अविशेष श्रुति है। अत्रिवृत्कृत तेजकी द्युमर्यादा प्रसिद्ध नहीं है, तब तो त्रिवृत्कृत वह तेज ही ज्योतिः शब्द वाच्य होगा।
परन्तु जो यह कहा गया है कि द्युलोकसे नीचे भी अग्नि आदि ज्योतिः अवगत होती है, यह दोष नहीं है, सर्वत्र गम्यमान ज्योतिका भी ' परो दिवः ' ( चुसेपर ) इस प्रकार उपासनाके लिए प्रदेश विशेषका ग्रहण विरुद्ध नहीं है परन्तु प्रदेशरहित ब्रह्म में प्रदेश विशेषकी कल्पना युक्त नहीं है | ‘ सर्वतः पृष्टेष्वनु ० ' ( भू आदि सभी लोकोंसे ऊपर जिससे ऊपर उत्तम कोई दूसरा लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोंमें ) इस तरह बहुतसे आधारोंकी प्रतिपादिक यह श्रुति कार्य ज्योतिमें अधिक संगत होगी।
' इदं वाव ० ' ( वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुष ( देह ) के भीतर ज्योति है ) इससे कुक्षिस्थ ज्योतिमें परज्योतिका आरोप किया हुआ देखा जाता है और सादृश्यनिमित्तक अध्यास होते हैं।
जैसे ' तस्य भूरिति शिर एकं ० ' ( उस पुरुषका भूः यह शिर है, क्योंकि शिर एक है और यह भूः अक्षर भी एक है ) परन्तु यह प्रसिद्ध है कि कुक्षिस्थ ज्योति : ( जठराग्नि ) ब्रह्म नहीं है, क्योंकि ' तस्यैषा दृष्टिः ० ’ ( यह उस हृदयस्थ पुरुषकी दृष्टि - दर्शनोपाय है और यह उसकी श्रुति श्रवणोपाय है अर्थात् देहको स्पर्श करनेसे उष्णताका ज्ञान जठराग्निका दर्शनोपाय है और श्रोत्रको बन्द करनेसे शब्द विशेषका श्रवण जठराग्निका श्रवणोपाय है ) इसप्रकार उष्णता और घोषविशिष्टत्वकी यह श्रुति है।
' तदेतद्द्दष्टं २० ' ( वह ज्योति दृष्ट और श्रुत है इसप्रकार उपासना करे ) इस श्रुतिसे और ' चक्षुप्य श्रुतो ० ' ( जो उपासक ऐसा जानता है, वह दर्शनीय और विख्यात होता है ) इस अल्पफलके श्रवण ( श्रुति ) से ज्योति ब्रह्म नहीं है। निश्चय ब्रह्मकी उपासना महान् फलके लिए अभीष्ट है। प्राण एवं आकाशके समान ज्योति ब्रह्म है, ऐसा दिखलाने वाले स्ववाक्यमें ब्रह्मका बोधक अन्य कोई भी लिङ्ग नहीं है।
पूर्ववाक्यमें भी चतुष्पाद् ब्रह्म निर्दिष्ट नहीं है, क्योंकि ' गायत्री वा इदं ० ' ( वह सब भूत गायत्री ही हैं ) इसप्रकार छन्दका निर्देश है। यदि पूर्वं वाक्यमें किसी प्रकार ब्रह्म निर्दिष्ट है ऐसा मान भी लें तो भी यहाँ उसका प्रत्यभिज्ञान नहीं होता, क्योंकि उसमें ' त्रिपादस्य ० ' ( इसके तीन पाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित हैं ) इसप्रकार द्युलोक आधाररूपसे श्रुत है। और यहाँ तो ' परो दिवो ० ' ( ज्योति द्युलोकसे परे है ) द्युलोक मर्यादारूपसे सुना जाता है।
इसलिए प्राकृत ( कार्य ) ज्योतिका यहाँ ग्रहण करना चाहिए। ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - इस श्रुतिमें ' ज्योतिः ' शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए, किससे?
इससे कि चरणका अभिधान है - पादका अभिधान है, ऐसा अर्थ है ‘ तावानस्य ' ' ( उतनी इस - गायत्र्याख्य ब्रह्मकी महिमा है अर्थात् सारा जगत् इसकी विभूति है, तथा निर्विकार पुरुष इससे भी उत्कृष्ट है, सभी भूत इसका एकपाद ( एक अंश ) हैं और इसका ( पुरुष संज्ञक ) त्रिपाद अमृत प्रकाशरूप स्वात्मामें स्थित हैं ) इस मन्त्रसे पूर्ववाक्य में ' चतुष्पाद् ब्रह्म निर्दिष्ट है। उसमें चतुष्पाद् ब्रह्मके जो त्रिपाद अमृत सम्बन्धिरूप निर्दिष्ट है लोक सम्बन्धसे यहाँ निर्दिष्ट है ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है।
उसका परित्यागकर प्राकृत ज्योतिकी कल्पना करनेवालेको प्रकृतकी हानि और अप्रकृत प्रक्रिया प्रसक्त होगी। ज्योति वाक्य में केवल पूर्ववाक्यसे ही ब्रह्मकी अनुवृत्ति हो यह बात नहीं है, किन्तु आगे कही जानेवाली शाण्डिल्यविद्या में भी ब्रह्मकी अनुवृत्ति है, इसकारण यहाँ ( मध्यमें ) भी ज्योति ब्रह्म ही है ऐसा समझना चाहिए।
जो यह कहा गया है कि ' ज्योतिः और दीप्यते ' ये शब्द कार्य ज्योतिमें प्रसिद्ध हैं, यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रकरण से ब्रह्मका ज्ञान होनेपर ये दोनों शब्द ब्रह्मके व्यावर्तक न होनेके कारण प्रकाश्यमान कार्य ज्योतिसे उपलक्षित ब्रह्ममें मी उन दोनों शब्दों का प्रयोग संभव है, कारण कि इसमें ' येन सूर्यस्तपति ० ' ( जिस तेजोमय चैतन्य आत्मासे दीप्त - प्राकशित सूर्य तपता - जगत्को प्रकाश करता है ) यह मन्त्र है | अथवा यह ज्योतिः शब्द चक्षु वृत्तिके अनुग्राहक तेजमें रूद्र नहीं है, क्योंकि ' वाचैवायं ० ' ( वाणीरूप ज्योतिसे ही यह पुरुष गाढ अन्धकारमें स्वव्यापार करता है ) ' मनो ज्योति ० ' ( ( घी सेवन करनेवालोंका प्रकाशक होता है ) इस प्रकार अन्य अर्थों में भी ज्योतिः शब्दका प्रयोग देखने में आता है।
इसलिए जो जो किसी वस्तुका प्रकाशक है उस उसका ज्योतिः शब्दसे अभिधान होता है। ऐसा होनेपर सम्पूर्ण जगत् के प्रकाशका हेतु होनेसे चैतन्यरूप ब्रह्म में भी ' तमेव भान्तम ० उस ब्रह्मके प्रकाशमान होनेपर ही सभी प्रकाशित होते हैं, उसके प्रकाशसे ये सब आदित्यादि प्रकाशित होते हैं ) और ' तद्देवा ० ( चन्द्रादि देवगण उस पूर्ण ब्रह्मकी ज्योतियों के ज्योतिरूपसे, आयुरूपसे एवं अमृतरूपसे उपासना करते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्योतिः शब्दका प्रयोग युक्त है।
जो यह कहा गया है कि सर्वगत ब्रह्मको द्युलोक तक सीमित करना युक्त नहीं है। इसपर कहते हैं - उपासनाके लिए सर्वगत ब्रह्ममें भी प्रदेश विशेषका परिग्रह विरुद्ध नहीं है। परन्तु जो यह कहा गया है कि प्रदेश रहित ब्रह्म में भी प्रदेश विशेषकी कल्पना युक्त नहीं है, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रदेश रहित ब्रह्म में भी उपाधि विशेषके सम्बन्धसे प्रदेश विशेषको कल्पना हो सकती है। जैसे कि ' आदित्यमें, नेत्रमें, हृदय में, इस प्रकार प्रदेश विशेष सम्बन्धी ब्रह्मकी उपासनाएँ मुनी जाती हैं।
इससे ' विश्वतः पृष्ठेषु ' ( विश्व प्राणिवर्गके ऊपर ) बहुत आधारोंका उपपादन हुआ समझना चाहिए। जो यह कहा गया है। कि उष्णता और घोष ( अन्तर्नाद ) से अनुमित कुक्षिस्य कार्य ज्योतिमें अध्यस्यमान होनेके कारण द्युलोकसे पर कार्य ज्योति ही है। वह भी अयुक्त है, क्योंकि नामादि प्रतीकोंके समान कुक्षिस्थ कार्यं ज्योति भी परब्रह्मका प्रतीक हो सकता है। ' दृष्टं च श्रुतं ' ( वह दृष्ट और श्रुत है ऐसी उपासना करे ) इस प्रकार प्रतीकद्वारा ब्रह्म दृष्ट और श्रुत हो - जायेगा!
जो यह कहा गया है कि अल्पफलके श्रवण ( श्रुति ) से ज्योति ब्रह्म नहीं है, वह मो युक्त नहीं है, क्योंकि इतने फलके लिए ब्रह्मका आश्रयण करना चाहिए इतने फलके लिए नहीं, इस नियममें कोई हेतु नहीं है। जहाँ सम्पूर्ण विशेषों के सम्बन्धसे रहित परब्रह्मका आत्मरूप से उपदेश किया जाता है, वहाँ एकरूप - तारतम्यसे रहित निरतिशय मोक्ष ही फल है, ऐसा अवगत होता है।
और जहां गुणविशेषके सम्बन्धसे अथवा प्रतीकविशेषके सम्बन्धसे ब्रह्मका उपदेश किया जाता है वहाँ नाना प्रकार के उत्तम, मध्यम और कनिष्ट संसार विषयक ' फल ' अन्नादो ० ' ( परमेश्वर जीवरूपसे अन्न खाता है अथवा देता है, अत : ' अन्नाद ' है, कर्म फल अथवा धन देता है, अत : ' वसुदान ' है। इन दोनों गुणोंसे जो परमेश्वरकी उपासना करता है वह पुरुष अन्न : खानेवाला और धनवान् होता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें देखे जाते हैं।
यद्यपि [ यदतः परो ] स्ववाक्यमें ज्योति विषयक कुछ भी ब्रह्मलिङ्ग नहीं है, तो भी पूर्ववाक्यमें दृश्यमान ब्रह्मलिङ्गका ग्रहण करना चाहिए। इसलिए सूत्रकारने ' ज्योतिश्चरणाभिधानात् ' ऐसा कहा है। परन्तु अन्य वाक्योंमें प्राप्त ब्रह्मके सान्निध्यसे ज्योति : श्रुति स्वविषय : ( अपने अर्थ ) से कैसे दूर की जा सकती है? यह दोष नहीं है।
‘ यदतः परो दिवो ज्योतिः ' इस श्रुति में सबसे पहले पठित सर्वनाम ' यत् ' शब्द अपनी सामर्थ्य से ब्रह्मका परामर्श करता है, इसीसे सम्बन्धसे पूर्ववाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्म के प्रत्यभिज्ञायमान होनेपर ज्योतिः शब्द मी अर्थतः ब्रह्म विषयक हो सकता है। इसलिए यहाँ ज्योति ब्रह्म है ऐसा समझना चाहिए॥ २४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' आकाश इति होवाच ' ' प्राण इति होवाच ' इन दोनों श्रुति वाक्योंमें जैसे आकाश शब्द और प्राणशब्द ब्रह्मवाचक हैं, वैसे ' यदतः परो दिवो ' इस श्रुतिमें पठित ज्योति : शब्द मी ब्रह्मवाचक है, इसे दिखलाने के लिए यह अधिकरण आरम्भ किया जाता है। यथा आकाशशब्द और प्राणशब्द ब्रह्मबोधक लिङ्गसे ब्रह्मविषयक हैं, वैसे इस ज्योतिः वाक्यमें ब्रह्म बोधक लिङ्ग दृष्टिगोचर नहीं होता, इससे यह ' ज्योति ' शब्द ब्रह्म परक नहीं है, इस प्रकार प्रत्युदाहरणसंगति से इस अधिकरणका आरम्भ है।
यदि कहो कि अज्ञान रूपी अन्धकारका विरोधी ज्ञान स्वरूप ब्रह्म भी ज्योतिः शब्द वाच्य हो सकता है, तो ऐसा नहीं, क्योंकि चक्षु वृत्तिका निरोधक नीला और पदार्थोंका आवर्तक अन्धकार ही तम है, उसका ब्रह्म विरोधी ( निवारक ) नहीं है, क्योंकि दोनोका परस्पर विरोध ही नहीं है। इसलिए ज्योतिः शब्दसे आदित्यादिका ग्रहण युक्त है।
* ' दासा तिवृतं ' तिवृत इसप्रकार है - तेज, जल और पृथिवी इन तीनोंमें से एक एकके दो दो भाग, एक आधा आधा भाग अलगकर दूसरे आधे आधे भागके फिर दो दो भाग। आधा भाग अपना और दो भाग दूसरेके अर्थात् तेजको आधा भाग अपना और चतुर्थांश चतुर्थांश जल और पृथ्वीके, इसीप्रकार तेज आदि त्रिवृत्कृत होते हैं, जिस प्रकार रस्सी तीनगुणवाली होती है, उसी प्रकार हिरण्यगर्भने त्रिवृत्कृत स्थूलसृष्टिका आरम्भ किया। इस त्रिवृत्करण के विना तेज और उसकी सीमा प्रसिद्ध नहीं है तो त्रिवृत्कृत तेजकी ही ज्योतिः शब्द वाच्य मानना चाहिए।
* उपासना प्रायः अध्यारोप मूलक होती है और अध्यारोपका हेतु सादृश्य है। जैसे भूः इस व्याहृति में प्रजापतिके शिरकी दृष्टिका विधान है, वैसे कुक्षिस्थ ज्योतिः ( जठराग्नि ) में आदित्यादि परज्योतिका अध्यारोप कर उसकी उपासनाका विधान है अर्थात् जठराग्नि आदित्यादि ज्योति है, ऐसा मानकर जठराग्निक आदित्यरूपसे उपासना करनी चाहिए, क्योंकि दोनोंमें जड़त्व, तेजस्त्व समान है। ब्रह्म तो शब्दादि रहित है, अतः जठराग्नि ब्रह्म नहीं है।
* पूर्वपक्षी - ' तदेतद्दृष्टं च ' आदिसे दूसरेका उल्लेख करते हैं। ' ब्रह्मविदाप्रोति परम् ' इस प्रकार ब्रह्मोपासनाका तो मोक्षरूप महान् फल कहा गया है। अल्प और महान् फलके भेदसे भी ज्योति ब्रह्म नहीं है। ' परो दिवो ज्योति : ' इस ज्योति वाक्य में ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ' ( छा ० ३।१२।६ ) ( सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद है और इसका त्रिपाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है ) इस पूर्व वाक्ममें भी चतुष्पाद् ब्रह्मका निर्देश नहीं है, किन्तु ' गायत्री वा ० ' ( छा ० ३।१२।१ ) इत्यादि श्रुतिवाक्यों में सर्वात्मकरूपसे गायत्री छन्दका निर्देश है। तथा ' सैषा चतुष्पदा षडूविधा गायत्री ' ( वह यह गायत्री चार पादवाली और छ : प्रकारकी है ) चतुष्पाद् मी गायत्री छन्द ही कहा गया है। यदि छन्दद्वारा ब्रह्मका ग्रहण करें तो भी ' त्रिपादस्यामृतं दिवि ' यहां अधिकरणर्थक सप्तमी है और ' परो दिवो ज्योति : ' इस अन्य श्रुतिमें अवधि अर्थ में पञ्चमी है। इसप्रकार विभक्ति भेदसे भी ब्रह्मकी प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, क्योंकि प्रत्यभिज्ञामें समान विभक्तिकी अपेक्षा होती है। जैसे ' तदेवेदम् ' ' सोऽयम् ' इत्यादि, वह यहाँ नहीं है, इसलिए ज्योतिः शब्दसे आदित्यादि कार्य ज्योतिका ग्रहण करना युक्त है।
* यहाँ ज्योतिःशब्दसे ब्रह्म ही ग्राह्य है, क्योंकि ब्रह्मको चतुष्पाद् कहा गया है। इस विषयमें ' विष्टभ्याहमिदं कृत्स्रमैकांशेन स्थितो जगत् ' ( म ० गी ० १०।४२ ) ( मैं इस सम्पूर्ण जगत्को एक अंशसे व्याप्तकर स्थित हूँ ) यह स्मृति प्रमाण भी है। इस बातको स्पष्ट करनेके लिए भगवान् भाष्य: कार ' न केवलम् ' इत्यादिसे संदंश न्यायका आश्रयण करते हैं। संदंश ( संडसी ) से किसी वस्तु के दो भाग गृहीत होते हैं, मध्यभाग उसके साथ सम्बधित न होनेपर भी अन्य भागोंके साथ गृहांत हो जाता। इसीप्रकार किसी पदार्थके पूर्वोत्तर भागका ग्रहण करनेसे मध्यभागके ग्रहणकी जहाँ विवक्षा हो वहां यह न्याय प्रवृत्त होता है। जब ' तावानस्य महिमा ' इस पूर्व वाक्य और शाण्डिल्य विद्या में पठित ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इस उत्तर वाक्य में ब्रह्मको अनुवृत्ति है तो ' यदतः परो दिवो ' इस मध्य वाक्यमें भी ज्योतिः शब्दसे अनुवृत्त ब्रह्मका ग्रहण ही युक्त है, अन्यथा उक्त दोषकी प्रसक्ति होगी। इसलिए यहां ज्योति ब्रह्म ही है।
* ज्योतिः शब्द ब्रह्म विषयक है, इसको ' प्रकरणाद् ' इत्यादिसे सिद्ध करते हैं कि ज्योतिः शब्दका मुख्य अर्थ आदित्यादि कार्यं ज्योति है, ब्रह्म तो लाक्षणिक अर्थ है। अब ' यद्वा ' इत्यादिसे मुख्यार्थं कहते हैं— ज्योति शब्दका मुख्यार्थं ब्रह्म ही है, क्योंकि ' तमेव भान्तम ' ' अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' ' ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ' ( म ० गी ० १३।१७ ) ( यह तो आदित्यादि ज्योतियों की मी ज्योति और तमसे - अज्ञानान्धकारसे परे है ऐसा कहा जाता है ) इत्यादि श्रुति और स्मृतिमें ज्योतिः शब्दसे ब्रह्म ही प्रतिपादित है। इसलिए ज्योतिः शब्दका मुख्यार्थं ब्रह्म ही है।
* ‘ तं यथा यथोपासते तथा तथा फलं भवति ' ( जिस - जिस गुण विशिष्ट उस परमेश्वरकी उपासना करता है उस उस रूपद्वारा ब्रह्म ही उपासना के अनुसार फल देता है ) यह श्रुति ब्रह्मको मी अल्पफलका हेतु कहती है। ज्ञेय और उपास्य भेदसे ब्रह्मके दो रूप शास्त्रों में कहे गये हैं, निरुपाधिक ब्रह्म ज्ञेय है और सोपाधिक ब्रह्म उपास्य। ज्ञेय ब्रह्म एक है, अतः उसके ज्ञान ( ब्रह्मात्मैक्यज्ञान ) का मोक्ष फल भी एक ही है, उसमें अन्य फलोंके समान तारतम्य नहीं है।
उपाधिके सम्बन्धसे वही निर्गुण ब्रह्म नानाकी तरह सगुण सर्वज्ञ - सा होता है। ' अन्नादः, वसुदानः, सत्यकामः, सत्य संकल्पः ' इत्यादि गुणों के सम्बन्धसे उसकी उपासना होती है। ' स यो वाचं ब्रह्मेत्युपासते ' ( छा ० ७ २ २ ) ( वह जो वाणीकी ' यह ब्रह्म है ' ऐसी उपासना करता है ) इत्यादि श्रुतियाँ प्रतीकोपासना के उदाहरण हैं, इन श्रुतियों में प्रतीकोपासनाओंके तारतम्यसे भिन्न - भिन्न फल कहे गये हैं। इसलिए उपाधिभेदसे ब्रह्ममें अल्पफलकी श्रुति सर्वथा युक्त है।
यद्यपि ' अथ यदतः परो ' इस स्ववाक्यमें ज्योति ब्रह्म है, ऐसा कोई लिङ्ग नहीं है, तथापि ' तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ' ( छा ० ३।१२।६ ) इस पूर्ववाक्यमें ' उसका एक पाद सम्पूर्ण भूत हैं और तीन पाद अमृतरूप द्युमें हैं ' इस प्रकार ब्रह्मका लिङ्ग उपलब्ध होता है, उसका ही यहाँ ग्रहण करना युक्त है। इसलिए सूत्रकारने ' ज्योतिश्चरणाभिधानात् ' इस सूत्रका उल्लेख किया है।
* प्रकरणसे ज्योतिः शब्द ब्रह्मपरक दिखलाकर अब सन्निधिसे भी दिखलाते हैं। परन्तु इससे पहले ' कथं पुनः ' से पूर्व पक्षका अनुवाद करते हैं। सन्निधिसे श्रुति बलवती होती है, अतः ' यदतः परो ' यहाँ ज्योतिः शब्दसे सूर्यादि कार्य ज्योतिका ग्रहण करना युक्त है। सि ० – सर्वनाममें यह सामर्थ्य होती है कि वह अपने पूर्वका परामर्श करे। इसलिए ' यदतः परो ' इसमें पठित सर्वनाम ' यत् ' पद अपनी सामर्थ्य से ज्योतिः शब्दसे ' तावानस्य महिमा ' इस पूर्व वाक्यमें निर्दिष्ट ब्रह्मका परामर्श करता है। इस प्रकार पूर्व निर्दिष्ट और सन्निहित ब्रह्मका ग्रहण होनेपर द्युलोकका सम्बन्ध तथा पूर्वं वाक्यमें ब्रह्मकी प्रत्यभिज्ञा आदि ब्रह्मके लिङ्ग सिद्ध होते हैं, इसलिए यहाँ ज्योतिः शब्दसे ब्रह्मका ही ग्रहण करना चाहिए। पूर्वपक्ष में जठराग्निको आदित्यादि कार्यं ज्योतिरूपसे उपासना है और सिद्धान्तमें ब्रह्मदृष्टि से, यह दोनोंमें अन्तर।। २४
1.1.25 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २५
छन्दोऽभिधानान् नेति चेन् न तथा चेतोऽर्पणनिगदात् तथा हि दर्शनम् ॥ १.१.२५ ॥
पदच्छेद — छन्दोऽभिधानात् न , इति , चेत् , न , तथा , चेतोर्पणनिगदात् , तथा , हि , दर्शनम्
सूत्रार्थ — ( छन्दोऽभिधानात् ) ' गायत्री वा इदं सर्वं भूतम् ' इस श्रुतिमें छन्द – गायत्रीका अभिधान है ; अतः गायत्री ही चतुष्पाद् है, ( न ) ब्रह्म नहीं, ( इति चेन्न ) तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ( तथा ) श्रुतिमें गायत्री छन्दद्वारा गायत्री में अनुगत ब्रह्ममें ( चेतोर्पणनिगदात् ) चित्तकी एकाग्रताका अभिधान है, अतः ब्रह्म ही चतुष्पाद कहा गया है। और ( तथा हि दर्शनम् ) उसी प्रकार ' एतं ह्येव ' दि स्थलों में भी विकारद्वारा ब्रह्मकी ही उपासना देखो गई है।
शाङ्करभाष्य
अथ यदुक्तं पूर्वस्मिन्नपि वाक्ये न ब्रह्माभिहितमस्ति गायत्री वा इद्र्वं भूतं यदिदं किंच इति गायत्र्याख्यस्य च्छन्दसोऽभिहितत्वादिति तत्परिहर्तव्यम्। कथं पुनश्छन्दोभिधानान्न ब्रह्माभिहितमिति शक्यते वक्तुम् यावता तावानस्य महिमा इत्येतस्यामृचि चतुष्पाद्ब्रह्म दर्शितम्। नैतदस्ति।
गायत्री वा इद्र्वम् इति गायत्रीमुपक्रम्य तामेव भूतपृथिवीशरीरहृदयवाक्प्राणप्रभेदैर्व्याख्याय सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तं तावानस्य महिमा इति तस्यामेव व्याख्यातरूपायां गायत्र्यामुदाहृतो मन्त्रः कथमकस्माद्ब्रह्म चतुष्पादभिदध्यात्। योऽपि तत्र यद्वै तद्ब्रह्म इति ब्रह्मशब्दः सोऽपि च्छन्दसः प्रकृतत्वाच्छन्दोविषय एव। य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद इत्यत्र हि वेदोपनिषदमिति व्याचक्षते। तस्माच्छन्दोभिधानान्न ब्रह्मणः प्रकृतत्वमिति चेत् नैष दोषः।
तथा चेतोर्पणनिगदात् तथा गायत्र्याख्यच्छन्दोद्वारेण तदनुगते ब्रह्मणि चेतसोऽर्पणं चित्तसमाधानम् अनेन ब्राह्मणवाक्येन निगद्यते गायत्री वा इद्र्वम् इति। न ह्यक्षरसंनिवेशमात्राया गायत्र्याः सर्वात्मकत्वं संभवति। तस्माद्यद्गायत्र्याख्यविकारेऽनुगतं जगत्कारणं ब्रह्म निर्दिष्टम् तदिह सर्वमित्युच्यते यथा सर्वं खल्विदं ब्रह्म इति। कार्यं च कारणादव्यतिरिक्तमिति वक्ष्यामः तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः इत्यत्र।
तथान्यत्रापि विकारद्वारेण ब्रह्मण उपासनं दृश्यते एतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्त एतमग्नावध्वर्यव एतं महाव्रते च्छन्दोगाः इति। तस्मादस्ति च्छन्दोभिधानेऽपि पूर्वस्मिन्वाक्ये चतुष्पाद्ब्रह्म निर्दिष्टम्। तदेव ज्योतिर्वाक्येऽपि परामृश्यत उपासनान्तरविधानाय। अपर आह। साक्षादेव गायत्रीशब्देन ब्रह्म प्रतिपाद्यते संख्यासामान्यात्। यथा गायत्री चतुष्पदा षडक्षरैः पादैः तथा ब्रह्म चतुष्पात्। तथान्यत्रापि च्छन्दोभिधायी शब्दोऽर्थान्तरे संख्यासामान्यात्प्रयुज्यमानो दृश्यते।
तद्यथा ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतम् इत्युपक्रम्याह सैषा विराडन्नादी इति। अस्मिन्पक्षे ब्रह्मैवाभिहितमिति न च्छन्दोभिधानम्। सर्वथाप्यस्ति पूर्वस्मिन्वाक्ये प्रकृतं ब्रह्म इति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु जो यह कहा गया है कि पूर्ववाक्य में मी ब्रह्मका अभिवान नहीं है, क्योंकि ' गात्री वा ० ' ( यह सब प्राणिवर्ग और यह जो कुछ भी है, वह सब गायत्री ही है ) इसमें गायत्री नामक छन्दका अभिधान है, तो इसका परिहार करना चाहिए। जबकि ' तावावस्य महिमा ' ( इतनी इसकी महिमा है ) इस ऋचामें चतुष्पाद् ब्रह्म दिखलाया गया है, तो छन्दके अभिधानसे ब्रह्म अभिहित नहीं है, यह कैसे कह सकते हो?
पू ० ~~~~ यह ठीक नहीं है, क्योंकि ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इस प्रकार गायत्रीका उपक्रम कर उसीका भूत, पृथ्वी, शरीर, हृदय, वाणी और प्राण के भेदोंसे व्याख्यानकर उसी व्याख्यातरूप गायत्रीके विषय में ' सैषा चतुष्पदा ० ' ( वह यह गायत्री छः छ : अक्षरोंसे चतुष्पाद् और भूत, पृथ्वी आदि भेदसे छः प्रकारकी है, वह यह ( गायत्र्याख्य ब्रह्म ) इस ऋचासे प्रकाशित किया गया है कि इसकी इतनी महिमा है ) उदाहरण रूपसे दिया गया यह मन्त्र दिना किसी कारण के चतुष्पाद् ब्रह्मका किन प्रकार अभिधान करेगा।
उसी प्रकरण में ' यद्वै तद्ब्रह्म ० ' इस श्रुतिमें जो ब्रह्म शब्द है, वह भी छन्दके प्रकरणमें पठित होनेसे छन्द विषयक ही है, क्योंकि ' य एतामेवं ० ' ( जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद् – वेदरहस्यमय मधु विद्याको जानता है ) इस श्रुतिमें ब्रह्मोपनिपदको वेदोपनिषद् कहते हैं।
इसलिए छन्द के अभिधानसे ब्रह्म प्रकृत नहीं है, सिद्धान्ती - ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि ' तथा चेतोर्पणनिगदात् ' गायत्री नामक छन्द द्वारा उसमें अनुगत ब्रह्म में चेतसोऽर्पणं - चित्तकी एकाग्रता ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इस ब्राह्मण वाक्यसे कही गई है। वस्तुतः अक्षर मिलनात्मक गायत्री सर्वात्मक नहीं हो सकती।
इसलिए गायत्री नामक विकारमें अनुगत जगत्का कारण जो ब्रह्म है वही यहाँ सर्वं शब्दसे कहा जाता है, जैसे कि ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( यह सब ब्रह्म ही है ) इस श्रुतिमें है। कार्य कारणसे अनन्य है, यह ' तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ' इस सूत्र में कहेंगे।
इसी प्रकार ' एतं ० ' ( ऋग्वेदी उस महान् उक्थ ( शस्त्र ) रूप उपाधिमें अनुगत उसी परमात्मा की उपासना करते हैं अर्थात् उक्थकी परमात्मदृष्टिसे उपासना करते हैं, यजुर्वेदी - अध्वर्युं अग्निरूप उपाधिमें उसीकी उपासना करते हैं, सामवेदी महाव्रतरूप यागमें उसीकी उपासना करते हैं ) इत्यादि अन्य स्थलों में भी कार्यद्वारा ब्रह्मकी उपासना देखो जाती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि पूर्ववाक्य ( पादोऽस्य ) में छन्दका अभिधान होनेपर भी उसके द्वारा चतुष्पाद् ब्रह्म ही निर्दिष्ट है।
अन्य उपासनाका विधान करने के लिए ज्योति वाक्यमें भी उसीका परामर्श है। दूसरे एकदेशी कहते हैं - गायत्री शब्दसे साक्षात् ही ब्रह्मप्रतिपादित है, क्योंकि संख्याकी समानता है। जैसे गायत्री छः अक्षरोंवाले पादोंसे चतुष्पदा है, वैसे ही ब्रह्म भी चतुष्पाद है।
इसी प्रकार अन्य स्थलोंमें मी छन्दका अभिधान करनेवाला शब्द संख्या की समानतासे अन्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है, जैसे कि ' ते वा एते पञ्चान्ये ० ' ( ये वे [ अग्नि आदि और वायु ] पाँच [ वागादिसे ] अन्य हैं, तथा इनसे [ वागादि और प्राण ] ये पांच अन्य हैं ; इस प्रकार ये सब दस होते हैं ये दश कृत - कृतात्मक पासेसे उपलक्षित द्यूत हैं ) ऐसा आरम्भ कर ' सैषा विराडन्नादी ० ' ( वह यह अन्न भक्षक विराड ही है ) इस तरह कहा है। इस पक्ष में ब्रह्मका ही अभिधान है छन्दका अभिधान नहीं है।
पूर्वं वाक्य में भी रर्वथा ब्रह्म ही प्रकृत है।। २५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अभी तक गायत्री शब्द अजहल्लक्षणा द्वारा ब्रह्मरूप अर्थका प्रतिपादक कहा गया है। अब भगवान् भाष्यकार ' अपर आह ' से वृत्तिकारकी व्याख्याका अनुसरणकर गौणरूपसे गायत्रीरूप वाच्यार्थके ग्रहण किए विना ही गायत्रीशब्द ब्रह्मका प्रतिपादक कहते हैं।
संख्याकी समानता में एक श्रौत उदाहरण है ' तौ वा एतौ द्वौ संवर्गों वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ' ( छान्दो ० ४।३।४ ) ( वे ये दो ही संवर्ग हैं— देवों में वायु और इन्द्रियों में प्राण ) ' संग्रहण अथवा संग्रसन करनेसे वायु और मुख्यप्राणको संवर्ग कहा गया है। देवताओं में अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और जल ये वायुमें लीन होते हैं, अत : यह अधिदेव संर्ग है और शरीर में वाणी, चक्षु, श्रोत्र और मन मुख्य प्राण में लीन होते हैं यह अध्यात्म संवर्ग है!
' ते वा एते पञ्चान्ये ' ( वे ये अन्य पाँच आधिदैवत और अन्य पाँच आध्यात्मिक ये सब मिलकर ' दश ' कृत कहलाते हैं )। वस्तुतः द्यूत क्रीड़ा में कृत, त्रेता, द्वापर और कलि नामके चार पासे होते हैं, वे क्रमशः चार, तीन, दो और एक अंकके होते हैं। कृत - ४, त्रेता - ३, द्वापर -२ और कलि -१। इस चार संख्या से युक्त कृत दश संख्याका होता है ; क्योंकि चारमें तीनका तीनमें दोका और दोमें एकका अन्तर्भाव होनेसे दस होते हैं। वायु आदि भी दस हैं। इस प्रकार संख्याकी समानतासे कृतत्वका उपचार है।
इसप्रकार वायु आदिके कृतत्वका उपक्रमकर कहते हैं ' सैषा ० ' इत्यादि। यह विराड् शब्द छन्दका वाचक है, क्योंकि ' दशाक्षरा विराड् ( दस अक्षरों वाला छन्द विराड़ होता है ) ऐसी श्रुति है। दशत्वकी समानतासे वायु आदि विराड् कहलाते हैं। इसप्रकार दशत्वद्वारा वायु आदिमें कृतत्व और विरात्वका ध्यान करना चाहिए | उनमें विराड्के ध्यानसे उपासकके लिए सब अन्न होते हैं, क्योंकि ' अन्नं विराड् ' यह श्रुति है | और वायु आदिमें कृतत्व के ध्यानसे अन्न भक्षक होता है, कारण कि कृत - द्यूत अन्नभक्षक है।
कृत अपने चार अङ्कोंमें शेष तीन अङ्कोंका अपने में अन्तर्भाव करता है, अतः अन्नभक्षक - सा ज्ञात होता है। इसी कारण श्रुतिमें कृतपासेकी जीतसे शेष अन्य पासे जीते जाते हैं इससे कृतद्यूतको भक्षक कहा गया है। इस तरह वायु आदि दशात्मक होकर कृतनामक विराडु अन्न है और कृतत्वके कारण अन्नभक्षक कहलाता है। इसी प्रकार इस पक्ष में मी . चतुष्पाद् संख्याको समानताको लेकर ब्रह्मका ही प्रतिपादन है छन्दका नहीं।
सर्वत्रकारसे लक्षक अथवा गौणरूप से ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ' इस पूर्ववाक्यमें ब्रह्म ही प्रकृत है, छन्द नहीं। वस्तुतः यह वृत्तिकारका मत ठीक नहीं है, क्योंकि ' चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री त्रिपदा भवति ' अर्थात् गायत्री २४ अक्षर और तीन पाद वाली होती है, अतः इसका चतुष्पाद् ब्रह्मके साथ साक्षात् संख्या के द्वारा सादृश्य नहीं है।। २५
1.1.26 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २६
भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश् चैवम् ॥ १.१.२६ ॥
पदच्छेद — भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः च एवम्
सूत्रार्थ — ( भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः ) ' गायत्री वा इदं सर्वम् इस श्रुतिमें भूत आदि पादोंका व्यपदेश ब्रह्ममें उपपन्न होता है, अतः गायत्रीशब्दसे गायत्री में अनुगत ब्रह्मका ही बोध होता है। ( च ) और ( एवम् ) ' विष्टभ्याऽहमिदम् ' यह स्मृति भो ब्रह्म में सर्वात्मता दिखलाती है।
शाङ्करभाष्य
इतश्चैवमभ्युपगन्तव्यमस्ति पूर्वस्मिन्वाक्ये प्रकृतं ब्रह्मेति यतो भूतादीन्पादान्व्यपदिशति श्रुतिः। भूतपृथिवीशरीरहृदयानि हि निर्दिश्याह सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री इति। न हि ब्रह्मानाश्रयणे केवलस्य च्छन्दसो भूतादयः पादा उपपद्यन्ते। अपि च ब्रह्मानाश्रयणे नेयमृक् संबध्येत तावानस्य महिमा इति। अनया हि ऋचा स्वरसेन ब्रह्मैवाभिधीयते पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि इति सर्वात्मत्वोपपत्तेः। पुरुषसूक्तेऽपीयमृक् ब्रह्मपरतयैव समाम्नायते। स्मृतिश्च ब्रह्मण एवंरूपतां दर्शयति विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति। यद्वै तद्ब्रह्म इति च निर्देशः। एवं सति मुख्यार्थ उपपद्यते। ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः इति च हृदयसुषिषु ब्रह्मपुरुषश्रुतिर्ब्रह्मसंबन्धितायां विवक्षितायां संभवति। तस्मादस्ति पूर्वस्मिन्वाक्ये ब्रह्म प्रकृतम्। तदेव ब्रह्म ज्योतिर्वाक्ये द्युसंबन्धात्प्रत्यभिज्ञायमानं परामृश्यत इति स्थितम्।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र १.१.२७ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इस वाक्यशेषमें सर्वात्मत्वका श्रवण अक्षरोंकी आनंपूर्वी मिलनात्मक गायत्री छन्दमें कथंचिदपि सम्भव नहीं है, इसलिए गायत्रीमें अनुगत ब्रह्ममें लक्षणा अवश्य माननी चाहिए, इसी अर्थको भगवान् सूत्रकार भी ' भूतादिपाद ' इस सूत्र से दिखलाते हैं।
ब्रह्मपद गायत्री छन्द वाची है यह जो पहले कहा गया है उसका ' यद्वैतद्ब्रह्म ' इससे निराकरण करते हैं। गायत्री उपाधिवाले ब्रह्मके हृदयरूपी नगरमें प्राण आदि देवताओंसे सुरक्षित पाँच छिद्र हैं। स्वर्गप्राप्तिके द्वार होनेसे इन्हें देवसुषि कहते हैं अर्थात् हृदयरूपी नगर में पूर्व ; दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और ऊर्ध्वं इन पांच छिद्ररूपी द्वारोंमें प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान अथवा चक्षु, श्रोत्र, वाक् मन और प्राण इन पाँच द्वारपालोंकी श्रुतिद्वारा कल्पना की गई है। किश्व हृदयरूपी नगरमें गात्री उपाधिवाले ब्रह्मकी उपासना के लिए ब्रह्मके द्वारपाल होनेसे प्राण आदि अथवा चक्षु आदि ब्रह्मपुरुष कहलाते हैं, इससे ‘ ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः ' यह् श्रुति भी संगत होती है। वर्णोंकी मिलनात्मक छन्दरूप गायत्रीमें हृदयस्थ प्राण आदि पाँच ब्रह्मपुरुषोंका सम्बन्ध नहीं घट सकता है। इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंकी उपासना तथा फल ( छा ० ३ | १३ | १, २, ३, ४, ५ ) में द्रष्टव्य है॥ २६
1.1.27 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २७
उपदेशभेदान् नेति चेन् नोभयस्मिन्न् अप्य् अविरोधात् ॥ १.१.२७ ॥
पदच्छेद — उपदेशभेदात् , न , इति चेत् , न , उभयस्मिन् , अपि , अविरोधात्
सूत्रार्थ — ' त्रिपादस्यामृतं दिवि ' और ' यदतः परोदिवो ज्योतिर्दीप्यते ' इसप्रकार ( उपदेशभेदात् ) उपदेशके भेदसे ( न ) प्रकृत ब्रह्मकी प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, ( इतिचेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ( उभयस्मिन्नपि ) दोनों वाक्यों में भी ( अविरोधात् ) प्रत्यभिज्ञाका विरोध नहीं है | ( वह यह गायत्री चार पादवाली और छः प्रकार की है ) ऐसा कहती है। यदि ब्रह्मका ग्रहण न करें, तो भूत आदि केवल छन्द पाद उपपन्न नहीं होते।
किञ्च ब्रह्मका ग्रहण न करें तो ' तावानस्यमहिमा ० ' ( उतनी हो इस [ गायत्र्याख्य ब्रह्म ] की महिमा है ) यह ऋचा समन्वित नहीं हो सकती। वस्तुतः इस ऋचाद्वारा मुख्यरूपसे ब्रह्मका ही अभिधान होता है, क्योंकि ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ' इस प्रकार सर्वात्मता उपपन्न होती है। पुरुष सूक्तमें भी यह ऋचा ब्रह्मारत्वसे ही अभिहित है। ' विष्टभ्याहमिदं ० ' ( एक अंशसे इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके मैं स्थित हूँ ) यह स्मृति भी ब्रह्ममें सर्वात्मता दिखलाती है।
पूर्ववाक्यमें ब्रह्मके स्वीकार करनेसे हो ' यद्वैतद्ब्रह्म ' ( जो भी वह [ त्रिपाद् अमृतरूप ] ब्रह्म है वह यही हैं ) यह श्रुतनिर्देश मुख्यार्थ में उपपन्न होता है। ' ते वा एते ० ' ( वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष [ स्वर्गलोकके द्वारपाल ] हैं ) और इसप्रकार हृदय के छिद्रोंमें ब्रह्मपुरुष प्रतिपादक यह श्रुति भी ब्रह्म के साथ सम्बन्धित है ऐसा विवक्षित होनेपर ही संगत होती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि पूर्ववाक्य में
शाङ्करभाष्य
यदप्येतदुक्तम् पूर्वत्र त्रिपादस्यामृतं दिवि इति सप्तम्या द्यौः आधारत्वेनोपदिष्टा इह पुनः अथ यदतः परो दिवः इति पञ्चम्या मर्यादात्वेन तस्मादुपदेशभेदान्न तस्येह प्रत्यभिज्ञानमस्तीति तत्परिहर्तव्यम्। अत्रोच्यते नायं दोषः उभयस्मिन्नप्यविरोधात्। उभयस्मिन्नपि सप्तम्यन्ते पञ्चम्यन्ते चोपदेशे न प्रत्यभिज्ञानं विरुध्यते। यथा लोके वृक्षाग्रेण संबद्धोऽपि श्येन उभयथोपदिश्यमानो दृश्यते वृक्षाग्रे श्येनो वृक्षाग्रात्परतः श्येन इति च एवं दिव्येव सद्ब्रह्म दिवः परमित्युपदिश्यते। अपर आह यथा लोके वृक्षाग्रेणासंबद्धोऽपि श्येन उभयथोपदिश्यमानो दृश्यते वृक्षाग्रे श्येनो वृक्षाग्रात्परतः श्येन इति च एवं दिवः परमपि सद्ब्रह्म दिवीत्युपदिश्यते। तस्मादस्ति पूर्वनिर्दिष्टस्य ब्रह्मण इह प्रत्यभिज्ञानम्। अतः परमेव ब्रह्म ज्योतिःशब्दमिति सिद्धम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इस कारण से भी पूर्ववाक्यमें ब्रह्म ही प्रकृत है यह स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि श्रुति भूत आदि पादोंका व्यपदेश करती है। भूत, पृथ्वी, शरीर और हृदयका निर्देशकर श्रुति ' सैषा चतुष्पदा ० ' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है।। २७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * विभक्तिके भेदसे कथित अर्थ भेद युक्त नहीं है, क्योंकि जो आधार होता है वह कथंचित् मर्यादा भी हो सकता है। जैसे वृक्षके अग्रभागमें श्येनके पाद आदि जितने अवयव संयुक्त रहते हैं उतने अवयवोंका वह आधार होता हुआ ही उससे पक्ष आदि से असंयुक्त अवयवोंको लेकर श्येनकी मर्यादा होता है। उसीप्रकार छु, सूर्य अथवा हृदयाकाशरूप मुख्य आधारमें ब्रह्म है, उस आधारसे भिन्न आकाशावच्छिन्न ब्रह्मका वह आधार ( मर्यादा ) होता है, इसप्रकारकी कल्पनाकर ' ब्रह्म घुसे परे है ' ऐसा कहा गया है। अब ' अपर आह ' इत्यादि भाष्यसे मर्यादाको मुख्य मानकर कहते हैं अर्थात् निरुपाधिक ब्रह्मको लेकर पंचमीका मुख्यार्थं कहें तो यहां ' दिवि ' में सप्तमीका अर्थं लक्षणासे सामीप्य होगा। ' गङ्गायां घोष : ' जैसे यहाँ गंगापदसे संयुक्त सप्तमीका अर्थं लक्षणासे सामीप्य होता है, उसी प्रकार ' दिवि ' यहां लक्षणासे सामीप्य अर्थको लेकर आधार कहना होगा और पंचमीका अर्थ i मर्यादा, इस तरहसे दोनों वाक्य ब्रह्मकां ही प्रतिपादन करते हैं, क्योंकि आधार और मर्यादा दोनों औपाधिक होनेसे ब्रह्ममें कल्पित हैं, अतः ज्योति वाक्यमें ज्योति। शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है || २७ ||
प्रतर्दनाधिकरणम्
1.1.28 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र २८
प्राणस् तथानुगमात् ॥ १.१.२८ ॥
पदच्छेद — प्राणः , तथा , अनुगमात्
सूत्रार्थ — ( प्राण : ) ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' इस श्रुतिमें पठित प्राण परमात्मा ही है, वायु नहीं, क्योंकि ( तथा ) पूर्वापर वाक्योंका पर्यालोचन करनेपर ( अनुगमात् ) उक्त श्रुतिवाक्यमें आनन्द आदि पदोंका समन्वय ब्रह्मपरक ही उपलब्ध होता है।
यह जो कहा गया है कि ' त्रिपादस्या ० ' इस श्रुति वाक्यमें सप्तमी विभक्ति द्वारा ' धु ' आधाररूप से उपदिष्ट है और ' अथ यदतः परो ० ' इस श्रुतिवाक्यमें पंचमी विभक्ति द्वारा ' द्यु ' मर्यादारूपसे उपदिष्ट है, अत : उपदेशके भेदसे उसका ( ब्रह्मका ) यहां प्रत्यभिज्ञान नहीं है, उसका परिहार करना चाहिए। इसपर कहते हैं - यह दोष नहीं है। क्योंकि दोनों वाक्योंमें विरोध नहीं है। दोनोंमें भी सप्तम्यन्त और पंचम्यन्त उपदेशों में भी प्रत्यभिज्ञानका विरोध नहीं है।
जैसे लोकमें वृक्षके अग्रभागसे सम्बद्ध श्येन ( बाजपक्षी ) ' वृक्ष के अग्रभागमें श्येन है ' ' वृक्षके अग्रभागसे परे श्येन है ' इस तरह दोनों प्रकारसे उपदेश किया हुआ देखा जाता है। वैसे ही ' द्यु में ही होता हुआ ब्रह्म से परे है ' ऐसा उपदेश किया जाता है। दूसरे कहते हैं- जैसे लोकमें वृक्षके अग्रभागसे श्येनका सम्बन्ध न होनेपर भी ' वृक्ष के अग्र भागपर श्येन है ' ' वृक्षके अग्रभागसे परे श्येन है ' इसतरह दोनों प्रकारसे उपदेश किया हुआ देखा जाता है।
इसीप्रकार से परे भी होता हुआ ब्रह्म ' द्युमें ' ऐसा उपदेशकिया जाता है। इसलिए पूर्वनिर्दिष्ट ब्रह्मका यहां प्रत्यभिज्ञान है। इससे यह सिद्ध हुआ कि ज्योतिः
शाङ्करभाष्य
अस्ति कौषीतकिब्राह्मणोपनिषदीन्द्रप्रतर्दनाख्यायिका प्रतर्दनो ह वै दैवोदासिरिन्द्रस्य प्रियं धामोपजगाम युद्धेन च पौरुषेण च इत्यारभ्याम्नाता। तस्यां श्रूयते स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व इति। तथोत्तरत्रापि अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति इति। तथा न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् इति। अन्ते च स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः इत्यादि।
तत्र संशयः किमिह प्राणशब्देन वायुमात्रमभिधीयते उत देवतात्मा उत जीवः अथवा परं ब्रह्मेति। ननु अत एव प्राणः इत्यत्र वर्णितं प्राणशब्दस्य ब्रह्मपरत्वम् इहापि च ब्रह्मलिङ्गमस्ति आनन्दोऽजरोऽमृतः इत्यादि कथमिह पुनः संशयः संभवति अनेकलिङ्गदर्शनादिति ब्रूमः। न केवलमिह ब्रह्मलिङ्गमेवोपलभ्यते। सन्ति हीतरलिङ्गान्यपि मामेव विजानीहि इतीन्द्रस्य वचनं देवतात्मलिङ्गम्। इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति इति प्राणलिङ्गम्। न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् इत्यादि जीवलिङ्गम। अत उपपन्नः संशयः।
तत्र प्रसिद्धेर्वायुः प्राण इति प्राप्ते इदमुच्यते प्राणशब्दं ब्रह्म विज्ञेयम्। कुतः तथानुगमात्। तथाहि पौर्वापर्येण पर्यालोच्यमाने वाक्ये पदानां समन्वयो ब्रह्मप्रतिपादनपर उपलभ्यते। उपक्रमे तावत् वरं वृणीष्व इतीन्द्रेणोक्तः प्रतर्दनः परमं पुरुषार्थं वरमुपचिक्षेप त्वमेव मे वरं वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यसे इति। तस्मै हिततमत्वेनोपदिश्यमानः प्राणः कथं परमात्मा न स्यात्।
न ह्यन्यत्र परमात्मविज्ञानाद्धिततमप्राप्तिरस्ति तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इत्यादिश्रुतिभ्यः। तथा स यो मां वेद न ह वै तस्य केनचन कर्मणा लोको मीयते न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया इत्यादि च ब्रह्मपरिग्रहे घटते। ब्रह्मविज्ञानेन हि सर्वकर्मक्षयः प्रसिद्धः क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इत्याद्यासु श्रुतिषु। प्रज्ञात्मत्वं च ब्रह्मपक्ष एवोपपद्यते। न ह्यचेतनस्य वायोः प्रज्ञात्मत्वं संभवति।
तथोपसंहारेऽपि आनन्दोऽजरोऽमृतः इत्यानन्दत्वादीनि च न ब्रह्मणोऽन्यत्र सम्यक् संभवन्ति। स न साधुना कर्मणा भूयान्भवति नो एवासाधुना कर्मणा कनीयानेष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते। एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्योऽधो निनीषते इति एष लोकाधिपतिरेष लोकपाल एष लोकेशः इति च। सर्वमेतत्परस्मिन्ब्रह्मण्याश्रीयमाणेऽनुगन्तुं शक्यते न मुख्ये प्राणे। तस्मात्प्राणो ब्रह्म।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — * अस्ति कौषीतकिब्राह्मणोपनिषदीन्द्रप्रतर्दनाख्यायिका -- प्रतर्दनो ह वै दैवोदासरि-
' प्रतर्दनो ह वै ० ' ( दिवोदासका पुत्र प्रतर्दन युद्ध और पराक्रमसे इन्द्रके प्रियधाम - स्वर्गको गया ) इसप्रकार आरम्भकर कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद् में इन्द्र और प्रतर्दनकी आख्यायिका कही गई है | उसमें ' स होवाच प्राणोऽस्मि ० ' ( उस इन्द्रने कहा— मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा हूँ, उस मेरी आयु तथा अमृतरूपसे उपासनाकर ) ऐसा श्रुति कहती है।
उसीप्रकार आगे भी ' अथ खलु प्राण एव ० ' ( वाग् आदि इन्द्रियोंकी शरीर धारण करनेमें सामर्थ्य नहीं है ऐसा निश्चय होनेके अनन्तर निश्चय प्रज्ञात्मा प्राण ही इस देहको अहंता - ममतासे स्वीकारकर शयन, आसन आदिसे उठाता है ) उसीप्रकार आगे भी ' न वाचं ० ' ( वाणीको जाननेकी इच्छा न करे वक्ताको जाने ) इत्यादि श्रुति है। और अन्तमें ' स एष प्राण एव ० ' ( वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्द, अजर और अमृत है ) इत्यादि श्रुति है।
यहाँ यह संशय होता है क्या यहाँ प्राणशब्दसे वायु मात्र अभिहित है अथवा देवतात्मा अथवा जीव अथवा परब्रह्म? परन्तु ' अत एव प्राण : ' इस सूत्र में तो प्राणशब्द ब्रह्मपरक है, ऐसा वर्णन किया जा चुका है और यहाँ भी ' आनन्द, अजर और अमृत हैं ' इत्यादि ब्रह्म के लिङ्ग हैं, तो फिर यहाँ संशय ही कैसा हो सकता है? अनेक लिङ्गों के दर्शनसे यहाँ संशय हो सकता है, ऐसा हम कहते हैं। यहाँ केवल ब्रह्मका लिङ्ग ही उपलब्ध नहीं होता, अपितु अन्यके लिङ्ग भी हैं।
जैसे कि ' मामेव विजानीहि ' ( मुझको ही जान ) यह इन्द्रका वचन देवतात्माका लिङ्ग है। ' इदं शरीरं ० ' ( इस शरीर - को पकड़कर उठाता है ) यह मुख्य प्राणका लिङ्ग है। ' नं वाचं ० ' ( वाणीके जाननेकी इच्छा न करे वक्ताको जाने ) इत्यादि जीवका लिङ्ग है। अतः संशय होना युक्त है।
संशय होनेपर प्राणशब्दकी वायु विकार रूप मुख्य प्राण में प्रसिद्धि होनेके कारण यहाँ प्राणशब्दसे मुख्य प्राणका ही ग्रहण करना चाहिए, ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर कहते हैं - प्राणशब्द ब्रह्मका वाचक समझना चाहिए | क्योंकि श्रुतिसे ऐसा ही अनुगम - अवगम होता है। जैसे कि पूर्वापर वाक्यका पर्यालोचन करनेपर पदार्थोंका समन्वय ब्रह्म प्रतिपादन विषयक उपलब्ध होता है।
आरम्भमें तो ' वरं वृणीष्व ० ' ( वर माँग ) इस प्रकार इन्द्रके कहनेपर प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा ' त्वमेव मे वृणीष्व ' ( आप स्वयं ही विचारकर मुझे वह वर दें, जिसे आप मनुष्य के लिए सबसे बढ़कर हितकर समझते हों ) उस ( प्रतर्दन ) के लिए सबसे बढ़कर हिततमरूपसे उपदिष्ट हुआ प्राण परमात्मा क्यों न हो!
परमात्माके ज्ञानके सिवा अन्य साधनोंसे हिततमकी प्राप्ति नहीं होती है, क्योंकि ' तमेव ० ' ( उस परमात्माको ही जानकर पुरुष जन्म मरणरूप संसारसे मुक्त हो जाता है, उसको प्राप्त करनेके लिए परमात्मा के ज्ञानसे भिन्न दूसरा और कोई उपाय नहीं है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं।
इसी प्रकार ' स यो मां वेद ० ' ( वह जो कोई विद्वान् मुझ ( ब्रह्म ) को साक्षात् अनुभव करता है उसका मोक्ष रूप लोक किसी भी कमसे, स्तेय ( चोरी ) अथवा भ्रूणहत्यासे नष्ट नहीं होता ) इत्यादि श्रुति वाक्य ब्रह्मका ग्रहण करनेसे ही संगत होते हैं। क्योंकि ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ० ' ( उस परात् पर ब्रह्मका ज्ञान होनेपर इस विद्वान् के सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्मविज्ञान से हीं सब कर्मोंका क्षय प्रसिद्ध है।
और प्रज्ञात्मत्व ( जीवत्व ) मी ब्रह्मपक्ष में ही उपपन्न होता है, अचेतन वायु प्रज्ञात्मा नहीं हो सकता है। उसी प्रकार उपसंहारमें भी ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' ऐसे आनन्दत्व आदि ब्रह्मसे मित्र अन्य में अच्छी तरह सम्भव नहीं हैं।
' स न साधुना ० ' ( वह पुण्य कर्मोंसे महान् नहीं होता और पाप कर्मोंसे घटता इससे अपने आत्माका उपदेश किया है, अतः ' प्राणोऽस्मि ' यहाँ प्राणशब्द परब्रह्मवाचक नहीं है, ( इति चेत् ) ऐसा यदि कहो तो ( अस्मिन् ) इस अध्यायमें ( अध्यात्मसम्बन्धभूमा ) ' प्राण एव प्रज्ञात्मा ' इस प्रकार प्रत्यगात्मसम्बन्धका बाहुल्य उपलब्ध होता है ( हि ) इसलिए यह ब्रह्मका ही उपदेश है, देवताविशेषका नहीं।
नहीं, यही जिसको इन लोकोंसे ऊँचा ले जाना चाहता है उस पुरुषसे पुण्य कर्म कराता है और यही जिसको इन लोकोंसे नीचे ले जाना चाहता है उस पुरुषसे पापकर्म कराता है ) और ' एष लोकाधिपति ० ' ( यह लोकाधिपति है यह लोकपाल, यह लोकेश है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं। ये सब [ धर्म - अधर्मका कराना, सर्वेश्वरत्व आदि धर्म ] पर ब्रह्मका आश्रयण करनेसे ही ठीक - ठीक अनुगत हो सकते हैं, वायुके विकार मुख्य प्राणका आश्रयण करनेसे नहीं।
इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ब्रह्म है अर्थात् प्राणशब्दसे ब्रह्मा ही ग्रहण सर्वथा युक्त है॥ २८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * राजा प्रतर्दन बुद्धिकौशल आदिसे स्वर्ग में पहुँचा। प्रतर्दनका युद्धकौशल और बुद्धिकौशल देखकर इन्द्रने कहा, हे प्रतर्दन! मैं तुमपर अतिप्रसन्न हूँ तुम मुझसे अभीष्ट वर माँगो | प्रतर्दन बोला- हे देवराज इन्द्र! मनुष्यके लिए सबसे अधिक हितकारक जो वर हो वही दीजिए। इसपर इन्द्र ने ' प्राणोऽस्मि ' ' मैं प्राण हूँ ' इत्यादि कहा। इन्द्र के इस कथनपर अब विचारणीय यह है कि इस श्रुतिवाक्यमें पठित प्राणशब्दसे कहीं मुख्य प्राणका ग्रहण न हो, अतः यहाँ ' प्रज्ञात्मा ' कहा गया है। सर्व विशेष रहित चेतन ब्रह्मका ग्रहण न हो इसलिए ' तं मां ' पद कहे गए हैं। इन पदोंसे यहाँ प्राणशब्दसे इन्द्र देवताका ही ग्रहण होता है। परन्तु आगे ' अथ खलु प्राण एव ' इसप्रकार मुख्यप्राणका लिङ्ग भी है। इसीप्रकार ' न वाचं ' इस वाक्यमें प्राणशब्दसे जीवका ग्रहण होता : है, क्योंकि उसमें वक्तृत्वलिङ्ग विद्यमान है। और आगे ' स एष प्राण एवं ' इस श्रुतिवाक्य से प्राण में आनन्द आदि ब्रह्म बोधक लिङ्ग उपलब्ध होते हैं, इससे प्राणशब्दसे ब्रह्मका भी ग्रहण हो सकता है। इसप्रकार मुख्यप्राण, जीव, देवता और ब्रह्म बोधक लिङ्गोंके विद्यमान होनेपर निश्चय करनेके लिए सूत्रकारने इस अधिकरणका आरम्भ किया है।
* ' प्राणोऽस्मि ' इससे लेकर ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' यहाँ तक वाक्य समुदाय इस अधिकरण सूत्रके विषय हैं अर्थात् इन वाक्योंको लेकर ही यहाँ विचार किया गया है। गत अधिकरणमें प्रकृत ब्रह्मवाचक ‘ यत् ' शब्दके बलसे ज्योति : श्रुति ब्रह्मपरक कही गई, परन्तु यहाँ प्राण श्रुति के मङ्ग में कोई बल नहीं है, क्योंकि परस्पर विरुद्ध अनेक लिङ्ग कुछ निश्चय करनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः प्रत्युदाहरणसंगति से ' तत्र ' आदिसे पूर्वपक्षका उत्थान करते हैं।
पूर्वं पक्षमें प्राण, देवता अथवा जीवकी उपासना है और सिद्धान्तमें ब्रह्मकी उपासना है। इतना दोनों पक्षों में अन्तर हैं॥ २८
1.1.30 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ३०
शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ १.१.३० ॥
पदच्छेद — शास्त्रदृष्ट्या , तु , उपदेशः , वामदेववत्
सूत्रार्थ — ( वामदेववत् ) वामदेवके समान ( शास्त्रदृष्ट्या ) मैं परब्रह्म हूँ, इस शास्त्रदृष्टिसे ( उपदेश : ) ' मामेव विजानीहि ' वक्ता इन्द्रका यह उपदेश प्रतर्दन के प्रति युक्त है, इसलिए ' प्राणोऽस्मि ' यह प्राणशब्द ब्रह्मपरक है। लोग कहते हैं। अप्रतिहत ( अकुण्ठित ) ज्ञानवाला होनेसे देवतात्मा भी प्रज्ञात्मा हो सकता है। देवता अप्रतिहत ज्ञानवाले होते हैं ऐसा [ वेद और लोकमें ] कहते हैं।
इस प्रकार देवतात्माका उपदेश निश्चत होनेपर हिततमत्व आदि वचनोंकी यथासंभव उसीमें ही योजना करनी चाहिए | अतः वक्ता इन्द्रका आत्मोपदेश होनेसे प्राण ब्रह्म नहीं है, ऐसा आक्षेप कर ' अध्यात्मसम्बन्धभूमाह्यस्मिन् ' इस सूत्र भागसे उसका समाधान करते हैं। अध्यात्मसंम्बन्ध अर्थात् प्रत्यगात्मसम्बन्ध उसका बाहुल्य ( अधिकता ) इस अध्यायमें उपलब्ध होता है।
' यावद्ध्यस्मिन् ० ' ( जब तक इस शरीरमें प्राण रहता है तब तक आयु है ) यह श्रुति वाक्य प्रज्ञात्मा प्रत्यग्भूत प्राणमें ही आयु देने और हरनेकी स्वतन्त्रता दिखलाता है, बाह्यदेवताविशेष में नहीं। उसी प्रकार ' अस्तित्वे ० ' ( प्राणका अस्तित्व होनेसे ही इन्द्रियोंका निःश्रेयस है अर्थात् इस शरीरमें प्राणके विद्यमान होनेपर इन्द्रियों की स्थिति होती है ) यह श्रुति वाक्य इन्दियोंका आश्रय अध्यात्म - प्रज्ञात्मा प्राणको ही दिखलाता है।
तथा ' प्राण एव ० ' ( प्राण ही प्रज्ञात्मा इस शरीरको ग्रहणकर उठाता है ), इसप्रकार और ' न वाचं ० ' ( वाणीको जाननेकी इच्छा न करे, वक्ताको जाने ) ऐसा आरम्भकर ' तद्यथा ० ' ( जैसे रथके अरोंमें नेमि लगी रहती है और नाभिमें अर लगे रहते हैं, उसीप्रकार ये भूत और विषय ज्ञान और इन्द्रियोंसे जुड़े हुए हैं, ज्ञान और इन्द्रियाँ प्राणसे जुड़ी हुई हैं वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्द, अजर और अमृत है ) इसप्रकार [ यह श्रुति ] विषय और इन्द्रियोंके व्यवहाररूप अरेके नाभिभूत प्रत्यगात्माका ही उपसंहार करती है।
और ' स म आत्मेति ० ' ( वह मेरा आत्मा - स्वरूप है ऐसा जाने ) यह उपसंहार प्रत्यगात्माका ग्रहण करनेपर ही संगत होता है, बाह्य देवता के ग्रहण करनेपर नहीं, ' अयमात्मा ० ' ( यह आत्मा ही सबका अनुभव करने वाला ब्रह्म है ) इसप्रकार यह दूसरी श्रुति है। इससे यहाँ प्रत्यगात्माके सम्बन्धका बाहुल्य होने के
शाङ्करभाष्य
जीवमुख्यप्राणलिङ्गान् नेति चेन् नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वाद् इह तद्योगात् । ( ब्रसू-१,१.३२ । ) यद्यप्यध्यात्मसंबन्धभूमदर्शनान्न पराचीनस्य देवतात्मन उपदेशः तथापि न ब्रह्मवाक्यं भवितुमर्हति। कुतः जीवलिङ्गात् मुख्यप्राणलिङ्गाच्च। जीवस्य तावदस्मिन्वाक्ये विस्पष्टं लिङ्गमुपलभ्यते न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् इत्यादि। अत्र हि वागादिभिः करणैर्व्यापृतस्य कार्यकरणाध्यक्षस्य जीवस्य विज्ञेयत्वमभिधीयते।
तथा मुख्यप्राणलिङ्गमपि अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति इति। शरीरधारणं च मुख्यप्राणस्य धर्मः प्राणसंवादे वागादीन्प्राणान्प्रकृत्य तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामि इति श्रवणात्। ये तु इमं शरीरं परिगृह्य इति पठन्ति तेषाम् इमं जीवमिन्द्रियग्रामं वा परिगृह्य शरीरमुत्थापयतीति व्याख्येयम्। प्रज्ञात्मत्वमपि जीवे तावच्चेतनत्वादुपपन्नम्। मुख्येऽपि प्राणे प्रज्ञासाधनप्राणान्तराश्रयत्वादुपपन्नमेव।
एवं जीवमुख्यप्राणपरिग्रहे च प्राणप्रज्ञात्मनोः सहवृत्तित्वेनाभेदनिर्देशः स्वरूपेण च भेदर्निदेशः इत्युभयथापि निर्देश उपपद्यते यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राणः सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः इति। ब्रह्मपरिग्रहे तु किं कस्माद्भिद्येत तस्मादिह जीवमुख्यप्राणयोरन्यतर उभौ वा प्रतीयेयातां न ब्रह्मेति चेत् नैतदेवम् उपासात्रैविध्यात्। एवं सति त्रिविधमुपासनं प्रसज्येत जीवोपासनं मुख्यप्राणोपासनं ब्रह्मोपासनं चेति। न चैतदेकस्मिन्वाक्येऽभ्युपगन्तुं युक्तम्।
उपक्रमोपसंहाराभ्यां हि वाक्यैकवाक्यत्वमवगम्यते। मामेव विजानीहि इत्युपक्रम्य प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व इत्युक्त्वा अन्ते स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः इत्येकरूपावुपक्रमोपसंहारौ दृश्येते। तत्रार्थैकत्वं युक्तमाश्रयितुम्। न च ब्रह्मलिङ्गमन्यपरत्वेन परिणेतुं शक्यम् दशानां भूतमात्राणां प्रज्ञामात्राणां च ब्रह्मणोऽन्यत्र अर्पणानुपपत्तेः।
आश्रितत्वाच्च अन्यत्रापि ब्रह्मलिङ्गवशात्प्राणशब्दस्य ब्रह्मणि प्रवृत्तेः इहापि च हिततमोपन्यासादिब्रह्मलिङ्गयोगात् ब्रह्मोपदेश एवायमिति गम्यते। यत्तु मुख्यप्राणलिङ्गं दर्शितम् इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति इति तदसत् प्राणव्यापारस्यापि परमात्मायत्तत्वात्परमात्मन्युपचरितुं शक्यत्वात् न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ इति श्रुतेः। यदपि न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् इत्यादि जीवलिङ्गं दर्शितम् तदपि न ब्रह्मपक्षं निवारयति।
न हि जीवो नामात्यन्तभिन्नो ब्रह्मणः तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि इत्यादिश्रुतिभ्यः। बुद्ध्याद्युपाधिकृतं तु विशेषमाश्रित्य ब्रह्मैव सन् जीवः कर्ता भोक्ता चेत्युच्यते। तस्योपाधिकृतविशेषपरित्यागेन स्वरूपं ब्रह्म दर्शयितुम् न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् इत्यादिना प्रत्यगात्माभिमुखीकरणार्थ उपदेशो न विरुध्यते। यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते इत्यादि च श्रुत्यन्तरं वचनादिक्रियाव्यापृतस्यैवात्मनो ब्रह्मत्वं दर्शयति।
यत्पुनरेतदुक्तम् सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः इति प्राणप्रज्ञात्मनोर्भेददर्शनं ब्रह्मवादिनो नोपपद्यत इति नैष दोषः ज्ञानक्रियाशक्तिद्वयाश्रययोर्बुद्धिप्राणयोः प्रत्यगात्मोपाधिभूतयोर्भेदनिर्देशोपपत्तेः। उपाधिद्वयोपहितस्य तु प्रत्यगात्मनः स्वरूपेणाभेद इत्यतः प्राण एव प्रज्ञात्मा इत्येकीकरणमविरुद्धम्।। अथवा नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् इत्यस्यायमन्योऽर्थः न ब्रह्मवाक्येऽपि जीवमुख्यप्राणलिङ्गं विरुध्यते कथम् उपासात्रैविध्यात्।
त्रिविधमिह ब्रह्मण उपासनं विवक्षितम् प्राणधर्मेण प्रज्ञाधर्मेण स्वधर्मेण च। तत्र आयुरमृतमित्युपास्स्वायुः प्राणः इति इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति इति तस्मादेतदेवोक्थमुपासीत इति च प्राणधर्मः। अथ यथास्यै प्रज्ञायै सर्वाणि भूतान्येकीभवन्ति तद्व्याख्यास्यामः इत्युपक्रम्य वागेवास्या एकमङ्गमदूदुहत्तस्यै नाम परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति इत्यादिः प्रज्ञाधर्मः। ता वा एता दशैव भूतमात्रा अधिप्रज्ञं दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतम्।
यदि भूतमात्रा न स्युर्न प्रज्ञामात्राः स्युः। यदि प्रज्ञामात्रा न स्युर्न भूतमात्राः स्युः। न ह्यन्यतरतो रूपं किंचन सिध्येत्। नो एतन्नाना। तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मा इत्यादिर्ब्रह्मधर्मः। तस्माद्ब्रह्मण एवैतदुपाधिद्वयधर्मेण स्वधर्मेण चैकमुपासनं त्रिविधं विवक्षितम्।
अन्यत्रापि मनोमयः प्राणशरीरः इत्यादावुपाधिधर्मेण ब्रह्मण उपासनमाश्रितम् इहापि तद्युज्यते वाक्यस्योपक्रमोपसंहाराभ्यामेकार्थत्वावगमात् प्राणप्रज्ञात्मब्रह्मलिङ्गावगमाच्च। तस्माद्ब्रह्मवाक्यमेवैतदिति सिद्धम्।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्राण ब्रह्म है, ऐसा जो कहा गया है, उसपर पूर्वपक्षी आक्षेप करते हैं। प्राणशब्द परब्रह्मका वाचक नहीं है, क्योंकि वक्ता अपने आत्माका उपदेश करता है। और यहाँ वक्ता इन्द्र नामका कोई - देहधारी एक देवताविशेष है, उसने ' मामेव ० ' ( मुझको हो जानो ) ऐसा आरम्भ कर ' प्राणोऽस्मि, ' ( मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा हूँ ) इस प्रकार अपने आत्माका ही अहङ्कार पूर्वक शब्दों में प्रतर्दनके लिए उपदेश किया है।
वक्ताद्वारा आत्मरूपसे उपदेश किया हुआ वही प्राण ब्रह्म किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि ' अवागमनाः ' ( बह वाणी और मनसे रहित है ) इत्यादि श्रुतियों से भी यह दिखलाया गया है कि ब्रह्म में वक्तृत्वका सम्भव ही नहीं है। इसी प्रकार ब्रह्म में सम्भव न होनेवाले शरीर सम्बन्धी धर्मोद्वारा इन्द्रने ' त्रिशीर्षाणं ० ' ( त्वष्टाके तीन शिरवाले विश्वनामक पुत्रको मैंने मारा, वेदान्तसे विमुख यतियोंको जंगलके कुत्तोंको खिला दिया ) इत्यादि वचनोंसे अपनी स्तुति की है।
बलवान् होनेसे इन्द्रमें प्राणत्व ं उपपन्न होता है, क्योंकि ' प्राणो वै बलम् ' ( प्राण ही बल है ) ऐसा ज्ञात होता है और इन्द्र बलका प्रसिद्ध देवता है। ( जो कोई भी बलका काम है वह इन्द्रका ही कर्म है ) ऐसा कारण ब्रह्मका ही यह उपदेश है न कि देवतात्माका उपदेश है।। २ ९॥
तब वक्ताने अपने आत्माका उपदेश किस प्रकार किया है?
इन्द्र नाम देवताने आर्षदर्शनसे अपने आत्माको परमात्मारूपसे ' मैं ही परब्रह्म हूँ ' इस तरह से यथाशास्त्र जानकर, तदनुसार उसने ' मामेव विजानीहि ' ( मुझको ही जान ) ऐसा उपदेश किया है।
जैसे ' तद्वैतत् ० ' ( उसे ( ब्रह्मको ) आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना - मैं मनु हुआ और सूर्य भी ) क्योंकि ' तद्यो यो ० ' ( उसे देवोंमेंसे जिस - जिसने जाना वही तद्रूप हो गया ) ऐसी श्रुति है | और ' मामेव ० ' ( मुझको ही जान ) ऐसा कहकर इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके हनन आदि देहधर्मो से अपनी स्तुति की ऐसा जो कहा गया है, उसका परिहार ( समाधान ) करना चाहिए।
इस विषय कहते हैं कि त्वष्टा के पुत्रके बध आदिका उपन्यास ' मैं ऐसा पराक्रमी हूँ, अतः मेरा ज्ञान प्राप्त करो ' यह विज्ञेय देहवारी इन्द्रकी स्तुति के लिए नहीं है, तो किसके लिए है? विज्ञानकी स्तुति के लिए है। क्योंकि त्वष्टापुत्रके बघ आदिके साहसका उल्लेख कर विज्ञानकी स्तुतिका ‘ तस्य मे तत्र ० ' ( वहाँ मुझ पराक्रमशालीका बाल भी बांका नहीं होता, जो मुझे जानता है उसका मोक्ष किसी भी कर्मसे नष्ट नहीं होता ) इत्यादि उत्तरवाक्यसे अनुसन्धान करता है।
तात्पर्य यह है कि इस प्रकार हिंसात्मक क्रूर कर्म करनेपर भी ब्रह्मरूप होनेसे मेरा एक बाल भी नष्ट नहीं हुआ अर्थात् मेरी ब्रह्मरूपतामें बाल भर भी हानि नहीं हुई। वह जो कोई दूसरा भी इसी प्रकार मुझे ब्रह्मरूपसे जानता है अर्थात् अपनेको ' मैं ब्रह्म ही हूँ ' ऐसा अनुभव करता है उसका मोक्षरूप लोक किसी भी कर्मद्वारा नष्ट नहीं होता। अतः ' प्राणोऽस्मि ० ( मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा हूँ ) इस प्रकार से वर्णित विज्ञेय तो वक्ष्यमाण ब्रह्म है। इस कारण यह वाक्य ब्रह्मविषयक है।। ३०
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.१.३१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
1.1.31 · प्रथम अध्याय प्रथम पाद सूत्र ३१
(इस सूत्रका मूल पाठ स्कैनमें स्पष्ट नहीं पढ़ा जा सका)
पदच्छेद — जीवमुख्यप्रणलिङ्गात् , न इति चेत् , न , उपासात्रैविध्यात् , आश्रितत्वात् , इह , तद्योगात्
सूत्रार्थ — ( जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् ) ( वक्तारं विद्यात् ' इस श्रुतिमें जीवलिङ्ग और ' इदं शरीरं ' इसमें मुख्यप्राणलिङ्गके होनेसे ( न ) ' प्राणोऽस्मि ' इस वाक्यमें प्राणशब्दसे केवल ब्रह्मका ही बोध नहीं होता, अपितु जीव और मुख्यप्राणका भी बोध होता है। ( इति चेत्, न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( उपासात्रैविध्यात् ) क्योंकि ऐसा होनेसे तीन उपासनाएँ माननी पड़ेंगी। उपक्रम और उपसंहारसे एकवाक्यता अवगत होती है, ( आश्रितत्वात् ) और ' प्राण इति होवाच ' इत्यादि स्थलोंमें ब्रह्मलिंग होनेके कारण प्राणशब्दका अर्थं ब्रह्म ही स्वीकार किया गया है | ( इह ) इस श्रतिमें भी ( तद्योगात् ) हिततमत्व आदि ब्रह्मलिंगका योग है। इनसे भी प्राणशब्द से यहाँ ब्रह्मका ही उपदेश ज्ञात होता है।
शाङ्करभाष्य
* यद्यप्यध्यात्मसंबन्धभूमदर्शनान्न पराचीनस्य देवतात्मन उपदेशः, तथापि न ब्रह्मवाक्यं भवितुमर्हति। कुतः? जीवलिङ्गान्मुख्य प्राणलिङ्गाच्च। जीवस्य तावदस्मिन्वाक्ये विस्पष्टुं लिङ्गमुपलभ्यते ' न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इत्यादि। अत्र हि वागादिभिः करणैर्व्यापृतस्य कार्यकरणाध्यक्षस्य जीवस्य विज्ञेयत्वमभिधीयते। तथा मुख्यप्राणलिङ्गमपि' अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ' इति।
शरीरधारणं च मुख्यप्राणस्य धर्मः, प्राणसंवादे वागादीन्प्राणान्प्रकृत्य - तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चवात्मानं प्रविभज्यैतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामि ' ( प्र ० २।३ ) इति श्रवणात्। ते तु ' इमं शरीरं परिगृह्य ' इति पठन्ति, ‘ तेषामिमं जीवमिन्द्रियग्रामं वा परिगृह्य ' शरीरमुत्थापयतीति व्याख्येयम्। प्रज्ञात्मत्वमपि जीवे तावच्चेतनत्वादुपपन्नम्। मुख्येऽपि प्राणे प्रज्ञासाधनप्राणान्तराश्रयत्वादुपपन्नमेव।
जीवमुख्यप्राणपरिग्रहे च प्राणप्रज्ञात्मनोः सहवृत्तित्वेनाभेदनिर्देशः, स्वरूपेण चभेदनिर्देश इत्युभयथापि निर्देश उपपद्यते - ' यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राणः सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः ' इति। ब्रह्मपरिग्रहे तु किं कस्माद्भिद्येत? तस्मादिह जीवमुख्य प्राणयोरन्यतर उभौ वा प्रतीयेयातां न ब्रह्मेति चेत् — नैतदेवम् ; उपासात्रैविध्यात्। एवं सति त्रिविधमुपासनं प्रसज्येत - जीवोपासनं, मुख्यप्राणोपासनं, ब्रह्मोपासनं चेति।
न चैतदेकस्मिन्वाक्येऽभ्युपगन्तुं युक्तम्। उपक्रमोपसंहाराभ्यां हि वाक्यैकत्वमवगम्यते। ' मामेव विजानीहि ' इत्युपक्रम्य ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरम्मृतमित्युपास्स्व ' इत्युक्त्वा, अन्ते स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः ' इत्येक रूपावुपक्रमोपसंसारौ दृश्येते। तत्रार्थैकत्वं युक्तमाश्रयितुम्। नच ब्रह्मलिङ्गमन्यपरत्वेन परिणेतुं शक्यम्। दशानां भूतमात्राणां च ब्रह्मणोऽन्यत्रार्पणानुपपत्तेः आश्रितत्वाच्चान्यत्रापि ब्रह्मलिङ्गवशात्प्राणशब्दस्य ब्रह्मणि प्रवृत्तेः।
इहापि च हिततमोपन्यासादिब्रह्मलिङ्गयोगाद्ब्रह्मोपदेश एवायमिति गम्यते। यत्तु मुख्यप्राणलिङ्गं दर्शितम् - ' इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ' इति – तदसत् प्राणव्यापारस्यापि परमात्मायत्तत्वात्परमात्मन्युपचरितुं शक्यत्वात्, ' न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ॥ ' ( काठ ० २२५/५ ) इति श्रुतेः। यदपि न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इत्यादि जीवलिङ्गं दर्शितं तदपि न ब्रह्मपक्षं निवारयति।
नहि जीवो नामात्यन्तभिन्नो ब्रह्मणः ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादिश्रुतिभ्यः। बुद्धवाद्युपाधिकृतं तु विशेषमाश्रित्य ब्रह्मैव सञ्जीवः कर्ता भोक्ता चेत्युच्यते। तस्योपाधिकृतविशेषपरित्यागेन स्वरूपं ब्रह्म दर्शयितुं न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इत्यादिना प्रत्यगात्माभिमुखीकरणार्थ उपदेशो न विरुध्यते। ' यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्मत्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥
' ( के ० १1४ ) इत्यादि च श्रुत्यन्तरं वचनादिक्रियाव्यापृतस्यैवात्मनो ब्रह्मत्वं दर्शयति। * यत्पुनरेतदुक्तम् - ' सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः ' इति प्राणप्रज्ञात्मनोर्भेददर्शनं ब्रह्मवादे नोपपद्यत इति - नैष दोषः : ज्ञानक्रियाशक्तिद्वयाश्रययोर्बुद्धिप्राणयोः प्रत्यगात्मोपाधिभूतयोर्भेदनिर्देशोपपत्तेः उपाधिद्वयोपहितस्य तु प्रत्यगात्मनः स्वरूपेणाभेद १४६ . ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ इत्यतः प्राण एव प्रज्ञात्मेत्येकीकरणमविरुद्धम्।
8 अथवा - ' नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ' इत्यस्यायमन्योऽर्थः - न ब्रह्मवाक्येऽपि जीवमुख्यप्राणलिङ्गं विरुध्यते। कथम्? उपासात्रैविध्यात्। त्रिविधमिह ब्रह्मोपासनं विवक्षितम्- प्राणधर्मेण, प्रज्ञाधर्मेण, स्वधर्मेण च। तत्र आयुरमृतमुपास्स्वायुः प्राणः ' इति, ' इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ' इति, ' तस्मादेतदेवो - क्थमुपासीत ' इति च प्राणधर्मः।
' अथ यथास्यै प्रज्ञायै सर्वाणि भूतान्येकीभवन्ति तद्व्याख्यास्यामः ' इत्युपक्रम्य ‘ वागेवास्या एकमङ्गमदूदुहत्तस्यै नाम परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति ' इत्यादि प्रज्ञाधर्मः। ता वा एता दशैव भूतमात्रा अधिप्रज्ञं दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतम्। यद्धि भूतमात्रा न स्युर्न प्रज्ञामात्राः स्युः। यद्धि प्रज्ञामात्रा न स्युर्न भूतमात्राः स्युः। नह्यन्यतरतो रूपं किंचन सिद्ध्येत्। नो एतन्नाना।
' तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नामावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्रा : प्रज्ञामाश्रा स्वर्पिताः प्रज्ञामात्रा प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मा ' इत्यादिर्ब्रह्मधर्मः। तस्माद्ब्रह्मण एवैतदुपाधिद्वयधर्मेण स्वधर्मेण चैकमुपासनं त्रिविधं विवक्षितम्। अन्यत्रापि ' मनोमयः प्राणशरीर : ' ( छा ० ३।१४ / २ ) इत्यादावु - पाधिधर्मेण ब्रह्मण उपासनमाश्रितम्। इहापि तद्युज्यते ; वाक्यस्योपक्रमोपसंहाराभ्यामेकार्थत्वावगमात् प्राणप्रज्ञा ब्रह्मलिङ्गावगमाच्च।
तस्माद्ब्रह्म वाक्यमेतदिति सिद्धम्॥ ३१
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यद्यपि अध्यात्मसम्बन्धकी अधिकता दिखाई देनेसे बाह्य देवतात्माका उपदेश नहीं है, तो भी यह प्राणवाक्य केवल ब्रह्मविषयक नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ जीवलिङ्ग और मुख्यप्राणके लिङ्ग उपलब्ध होते हैं। ' न वाचं ० ' ( वाणीको जाननेकी इच्छा न करे वक्ताको जाने ) इत्यादि वाक्यमें जीवका लिंग तो स्पष्ट उपलब्ध होता है ; क्योंकि यहाँ वाणी आदि इन्द्रियोंसे व्यापार करने वाला, शरीर और इन्द्रियोंका अध्यक्ष- स्वामी जीव विज्ञेयरूपसे अभिहित है।
इसीप्रकार ' अथ खलु प्राण एव ' ( निश्चय प्राण ही प्रज्ञात्मा इस शरीरको ग्रहणकर उठाता है ) इस वाक्यमें मुख्य प्राणका भी लिंग ( ज्ञापन ) है | क्योंकि शरीर धारण करना मुख्य प्राणका धर्म है, प्राणसंवादमें वाणी आदि प्राणों- इन्द्रियोंको प्रस्तुतकर ' तान्वरिष्ठ प्राणः उवाच ० ' ( उनमेंसे अत्यन्त श्रेष्ठ प्राणने उन इन्द्रियोंसे कहा तुम मोह - अभिमानको मत प्राप्त हो, क्योंकि मैं ही अपनेको पाँच प्रकारसे विभक्तकर इस शरीर - को आलम्बन देकर धारण करता हूँ ) ऐसी श्रुति है।
और जो कोई ' इदं शरीरं ' इस ' इदं ' के स्थानमें ' इमं शरीरं ' ऐसा पाठ स्वीकार करते हैं, उनके मतमें इस जीव, अथवा इन्द्रिय समूहका ग्रहणकर शरीरको उठाता है, ऐसी व्याख्या करनी चाहिए। चेतन होनेके कारण जीवमें प्रज्ञात्मत्व भी युक्त है। प्रज्ञा ( ज्ञान ) के साधनभूत अन्य इन्द्रियोंका आश्रय होनेसे मुख्यप्राण में भी प्रज्ञात्मत्व उपपन्न ही है।
यदि प्राणशब्दका अर्थ जीव और मुख्यप्राण दोनों मानें तो प्राण और प्रज्ञात्माका एक ही शरीरमें साथ रहनेसे अभेद निर्देश और स्वरूपसे भेद निर्देश इस तरह दोनों प्रकारसे निर्देश उपपन्न होता है, क्योंकि ' यो वै प्राणः सा प्रज्ञा ० ' ( जो प्राण है वह प्रज्ञा है जो प्रज्ञा है वह प्राण है, निश्चय ही ये दोनों इस शरीरमें साथ ही साथ रहते हैं और साथ ही साथ उत्क्रमण करते हैं ) ऐसी श्रुति है। यदि प्राणशब्दका अर्थं ब्रह्म स्वीकार करें, तो यह प्रश्न उपस्थित होगा कि कौन किससे मिन्न होगा?
अतः यहाँ जीव और मुख्यप्राण इन दोनोंमें से कोई एक अथवा दोनों ही प्राणशब्दसे प्रतीत होते हैं, ब्रह्म नहीं। यह पूर्वपक्षका अभिप्राय है। यह ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उपासना तीन प्रकार की होगी। यदि ऐसा माना जाय तो जीवोपासना, मुख्यप्राणोपासना और ब्रह्मोपासना इस तरहसे तीन प्रकारकी उपासनाएँ प्रसक्त होंगी। किन्तु एक वाक्यमें यह सब स्वीकार करना . युक्त नहीं है, कारण कि उपक्रम और उपसंहारसे एकवाक्यता अवगत होती है।
' मामेव विजानीहि ' ऐसा आरम्भ करके ' प्राणोऽरिम प्रज्ञात्मा ' ( मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा हूँ उस मेरी आयु और अमृरूपये उपासना करे ) ऐसा कहकर अन्तमें ' स एष प्राण एव ० ' ( वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्द, अजर और अमृत है ) तो इसप्रकार उपक्रम और उपसंहार एकरूप दृष्ट होते हैं। अतः यहाँ ( ब्रह्मरूप ) एक अर्थका आश्रय करना ही युक्त है।
और ब्रह्मलिंगको अन्यमें ( जीव तथा मुख्यप्राणमें ) परिणतसमन्वित नहीं कर सकता, क्योंकि दस भूतमात्राओं और दस प्रज्ञामात्राओं का ब्रह्मसे भिन्न अन्यमें अपंण ( अधिष्ठानरूप लिङ्गका समन्वय करना युक्त नहीं है, कारण कि ये [ ब्रह्मके ] आश्रित हैं। दूसरे स्थलोंमें मी ब्रह्मलिङ्गके बलसे प्राण शब्दकी ब्रह्ममें प्रवृत्ति है अर्थात् प्राणशब्द ब्रह्मके आश्रित है 1। और यहाँ भी हिततमत्वका उपन्यास आदि ब्रह्मलिङ्गके योग से यह ब्रह्मका ही उपदेश है, ऐसा ज्ञात होता है।
' इदं शरीरं ० ' ( इस शरीरको ग्रहण कर उठाता है ) यह जो मुख्य प्राणका लिङ्ग दिखलाया गया है, वह ठीक नहीं है। क्योंकि प्राणका व्यापार भी परमात्मा के अधीन है। अतः परमात्मामें उसक : उपचार ( गौण प्रयोग ) हो सकता है, कारण कि ' न प्राणेन ० ' ( कोई भी प्राणी न तो प्राणसे ही जीवित रहता है और न अपानसे ही, किन्तु वे तो जिसमें ये दोनों आश्रित ( अध्यस्त ) हैं, ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ) ऐसी श्रुति है।
और ' न वाचं ० ' ( वाणीके जाननेकी इच्छा न करे किन्तु वक्ताको जाने ) इत्यादिसे जो जीवके लिंग दिखलाए गए हैं वे भी ब्रह्मपक्षका निवारण नहीं करते, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि श्रुतियोंसे यह स्पष्ट होता है कि जीव ब्रह्मसे अत्यन्त भिन्न नहीं है। ब्रह्म ही बुद्धि आदि उपाधिकृत विशेष ( परिच्छिन्नत्वादि ) का आश्रय कर जीव होता हुआ कर्ता और भोक्ता है, ऐसा कहा जाता है।
उपाधिकृत विशेषके त्यागसे उसके यथार्थ स्वरूप ब्रह्मेका ज्ञान करानेके लिए, ' न वाचं ० ' इत्यादि श्रुतियों द्वारा उसको प्रत्यगात्माकी ओर अभिमुख करनेके लिए [ यह वक्तृत्व ] उपदेश विरुद्ध नहीं है। ' यद्वाचा ० ' ( जो वाणीसे प्रकाशित नहीं होता किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती है अर्थात् जिसकी सत्तासे वाणी अपना वदनशब्द व्यापार करती है, उसको ही तुम ब्रह्म जानो।
जिस इस [ देश - कालावच्छिन्न वस्तु ] की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ) इत्यादि दूसरी श्रुति वचन आदि क्रियाओंमें व्यापृत आत्मा ब्रह्म है ऐसा दिखलाती है।
' सह ह्येतावस्मिन् ० ' ( निश्चय ये दोनों -- प्राण और प्रज्ञात्मा इस शरीर में साथ ही साथ रहते हैं और साथ ही साथ निकलते हैं ) इस प्रकार प्राण और प्रज्ञात्माका भेद दर्शन • ब्रह्मवाद में उपपन्न नहीं होता, ऐसा जो कहा गया है, यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्माके उपाधिरूप ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिके आश्रय बुद्धि और प्राणका तो भिन्नरूपसे निर्देश युक्त है | परन्तु दोनों उपाधियोंसे उपहित प्रत्यगात्माका तो स्वरूपसे अभेद है।
इसलिए ' प्राण एव प्रज्ञात्मा ' ( प्राण ही प्रज्ञात्मा है ) ऐसा एकीकरण अविरुद्ध है। अथवा ' नोपासावैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ' इस सूत्र भागका यह दूसरा अर्थ है - ब्रह्मवाक्यमें मी जीव लिङ्ग तथा मुख्यप्राण लिङ्गका विरोध नहीं है, क्यों? इसलिए कि उपासनाएँ तीन प्रकार की हैं। यहाँ प्राणधर्म, प्रज्ञाधर्म और स्वधर्मंसे ब्रह्मोपासनाएँ तीन प्रकारकी विवक्षित हैं।
उनमें ' आयुस्मृतमुषास्स्वायुः प्राणः ' ( आयुरूपसे, अमृतरूपसे मेरी उपासना करो आयु प्राण है ) ' इदं शरीरं ० ' ( इस ' शरीरको ग्रहणकर उठाता है ) और ' तस्मादेत ० ' ( इसलिए उसकी उक्थरूपसे उपासना करे ) यह प्राणधर्म है।
' अथ यथास्यै प्रज्ञायै ० ' ( अब जिस प्रकार इस प्रज्ञा- जीव में सब भूत एक होते हैं उसका व्याख्यान करेंगे ) ऐसा उपक्रमकर ' वागेवास्या ० ( वाणीने ही इस प्रज्ञाके एक अंगको देहार्धं मागको पूर्ण किया, उसकी [ चक्षु आदिसे ] ज्ञापित भूतमात्रा दूसरे देहार्धं भागका कारण होती है, बुद्धिद्वारा चिदात्मा वाणीपर आरूढ़ होकर अर्थात् वाणीका प्रेरक होकर सब नामोंको प्राप्त करता है ) इत्यादि प्रशा- जीव धर्म हैं।
' ता वा एता ' वे ये दस ही भूतमात्राएँ मधिप्रज्ञ - प्रज्ञाके अधीन हैं, और दस प्रज्ञमात्राएं अधिभूत - भूतके अधीन। यदि भूतमात्राएँ न हों, तो प्रज्ञामात्राएँ भी न हों और यदि प्रज्ञामात्राएँ न हों, तो भूतमात्राएँ मी न हों, क्योंकि दोनों में से किसी एकके न होनेपर केवल एकसे कोई भी रूप सिद्ध न होगा। यह नाना नहीं हैं।
' जैसे रथके अरोंमें नेमि लगी रहती है और नेमिमें अर जुड़े रहते हैं, इसीप्रकार ये भूतमात्राएँ प्रज्ञामात्राओंमें अर्पित हैं और प्रज्ञामात्राएँ प्राणमें अर्पित हैं वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा हैं ', इत्यादि ( स्व ) ब्रह्मधर्म हैं। इस कारण ब्रह्मकी ही एक उपासना दोनों [ प्राण तथा प्रज्ञा ] उपाधियों के धर्मसे तथा स्व - धर्मसे तीन प्रकारकी विवक्षित है।
अन्य स्थलों में भी ' मनोमयः प्राणशरीरः ' ( प्राण जिसका शरीर है ऐसा मनोमय है ) इत्यादिमें उपाधिके धर्मसे ब्रह्मको उपासनाका आश्रय किया गया है। यहाँ भी अन्यके धर्मसे अन्यकी उपासना युक्त है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहारसे वाक्यकी एकार्थता प्रतीत होती है तथा प्राण, प्रज्ञा और ब्रह्मलिङ्गों को अवगति होती है। इस तरहसे यह सिद्ध हुआ कि यह ब्रह्मवाक्य ही है॥ ३१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गर्भस्थ ऋषि वामदेवने ज्ञान प्राप्त किया कि ' मैं ही मनु और सूर्य हुआ ' यह आर्षज्ञान कहलाता है। पूर्व जन्ममें श्रुत वेदान्त महावाक्यार्थकी इस जन्ममें स्वतः सिद्ध आत्मज्ञानरूपसे अभिव्यक्ति ही आर्षदर्शन है।
** ' तस्य मे तन्त्र ' इत्यादि स्तुति परक सब वाक्य ब्रह्मका ही प्रतिपादन करते हैं। साथ - साथ उनमें ब्रह्मज्ञानकी महिमा भी बताई गई है कि ब्रह्मज्ञान पाकर वह विद्वान् किसी भी पुण्य - पाप से लिप्त नहीं होता। ' आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ' ( गीता ० ४।४१ ) ( हे धनंजय! आत्मज्ञानीको शुभाशुभ कर्म नहीं बाँधते अर्थात् शुभाशुभ फल नहीं देते ) क्योंकि ' ज्ञानाग्निः सर्व - कर्माणि मस्मसात्कुरुते तथा ' ( गी ० ४१३७ ) ( उसी प्रकार ज्ञान अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देता है ) ' ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति ' ( ब्रह्मवित् ब्रह्म ही है ) अत : उसका नाश कर्म आदिसे नहीं हो सकता। इसलिए ' प्राणोऽस्मि ' इत्यादि वाक्योंद्वारा ब्रह्म ही विज्ञेय है इन्द्र आदि देवता नहीं॥ ६०॥
-
* प्रश्नोपनिषद् में मुख्य प्राण और चक्षु आदि इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवताओंका संवाद है- -
→ एक समय वे सब अपनी - अपनी महिमाको प्रकट करते हुए कहने लगे कि हम ही इस शरीरको आश्रय देकर धारण करते हैं, तब उनसे सर्वश्रेष्ठ मुख्यप्राणने कहा – अविवेकके कारण तुम मिथ्या अभिमान मत करो, क्योंकि अपने प्राण, अपान आदि पाँचवृत्ति भेदकर मैं ही इस शरीरको आश्रय देकर धारण करता हूँ। प्राणके इस कथनपर उन सबने विश्वास नहीं किया। तब प्राण उनके अभिमान निवृत्त्यर्थं ऊपरको निकलने लगा, उसके ऊपर उठनेके साथ शेष सभी खिंचने लगे, तथा उसके स्थित होने पर सब स्थित होने लगे। तब सभी वे मिध्या अभिमानको छोड़कर मुख्यप्राणकी स्तुति की। इसप्रकार यह संवाद मुख्यप्राणका स्पष्ट लिङ्ग है।
* किञ्च दस भूतमात्राओं ( आकाश आदि पाँच महाभूत और शब्द आदि पाँच विषय ) और दस प्रज्ञामात्राओं ( शब्द आदि विषयक पाँच ज्ञान और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ) का ब्रह्म से भिन्न अन्य कोई अधिष्ठान नहीं हो सकता | ' अतएव प्राण : ' ' प्राण इति होवाच ' इत्यादि स्थलोंमें भी ब्रह्मके बहुत लिङ्ग हैं। और निरतिशय आनन्द ही सबके लिए हिततम है, ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' ( तै ० ३१६ ) ( आनन्द ब्रह्म है ऐसा भृगुने जाना ) ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( विज्ञान आनन्द ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मको ही आनन्द स्वरूप कहती हैं। इसलिए प्राण आदि शब्दसे यहाँ ब्रह्मका ही उपदेश है। जीव तथा मुख्य प्राणका नहीं है।
* औपाधिक भेद और स्वरूपतः अभेदको लेकर उक्तदोषका निराकरण किया जाता है। प्रत्यगात्माकी उपाधिरूप जो ज्ञानशक्तिवाली बुद्धि और क्रियाशक्तिवाला प्राण, इन दोनोंका परस्पर भेद है। इससे तो ‘ सह ं
ह्येतावस्मिन् ' इस मन्त्रमें उनका औपाधिक भेद कहा गया है। परन्तु दोनों उपाधियों से उपहित प्रत्यगात्माका तो स्वरूपसे अभेद है। इससे ' प्राण एव प्रज्ञात्मा ' यह श्रुतिवाक्य प्राण और प्रज्ञात्माका अभेद निर्देश करता है। सुतरां सिद्धान्त में किसी प्रकारका विरोध नहीं है।
* भगवान् माष्यकार ‘ नोपासा त्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ' सूत्रके इस उत्तरभागका स्वाभिमत व्याख्यानकर अब वृत्तिकारके मतानुसार व्याख्यान करते हैं। ' उत्थापयति इति उक्थम् ' ' शरीरको ग्रहणकर उठाता है इससे प्राण उक्थ है ' तो ये सब प्राणके धर्म हैं। प्रज्ञा पदसे यहाँ अमास सहित बुद्धिरूप जीवका ग्रहण है। जिसमें यह निवास करता है इस शरीरके दो भाग हैं, एक नाम और दूसरा रूप, चिदात्मा बुद्धिद्वारा वागिन्द्रियपर आरूढ होकर अर्थात् उसका प्रेरक होकर वागिन्द्रियद्वारा सम्पूर्ण नाम प्रपञ्चको वक्तव्यरूपसे प्राप्त करता है अर्थात् वक्ता होता है। और नेत्रसे सभी रूपोंको देखता है, इसप्रकार द्रष्टा होता है, इसीप्रकार सभी पदार्थोंका द्रष्टृत्व और चिदात्मा में द्रष्टुत्वके अध्यासका कारण होना यह सब बुद्धिका धर्म है।
* भूतमात्राएँ ग्राह्य विषय कहलाती हैं और प्रज्ञामात्राएँ ग्राहक। ग्राह्य भूतमात्राएँ प्रज्ञामात्राओं- ज्ञानेन्द्रियोंसे सिद्ध होती हैं, इसलिए प्रज्ञामात्राओंके अधीन हैं, और प्रज्ञामात्राएँ ( ज्ञाने - न्द्रियां और चाक्षुष आदि ज्ञान ) ग्राह्य भूतमात्राओंके अधीन हैं। इसप्रकार ग्राह्य और ग्राहक अपनी अपनी सिद्धिमें एक दूसरेकी अपेक्षा करते हैं। ग्राह्य और ग्राहक परस्पर सापेक्ष होनेसे वस्तुतः मिन्न नहीं हैं, किन्तु चिदात्मामें आरोपित हैं। इस तरह सबका अधिष्ठान और ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' इत्यादि ये सब ब्रह्म धर्म प्रतीत होते हैं। इसलिए ' मनोमयः प्राणशरीरः ' इत्यादि स्थलोंमें प्राण और प्रज्ञाके धर्मोसे भी ब्रह्मकी उपासना हो सकती है। ऐसा माननेसे वाक्यभेद + भी नहीं होगा। यदि वाक्यभेद नहीं है तो फिर उपासनाका भेद क्यों वह इसलिए कि यहाँ प्राण, प्रज्ञा तथा ब्रह्मके मिन्न - भिन्न लिङ्गोंका दर्शन होता है। इससे ब्रह्मविषयक उपासना तीन प्रकारकी हो सकती है,
परन्तु वृत्तिकारद्वारा इसप्रकार की गई सूत्रकी व्याख्याको टीकाकारोंने स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि ऐसा माननेपर भिन्न - भिन्न रूपसे तीन उपासनाएँ माननी पड़ेंगी। एकवाक्यमें ऐसा मानने से वाक्यभेद प्रसक्त होगा अर्थात् ' स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' ' तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व ' ( कौ ० ३।२ ) इस एक वाक्य में ' माम् ' अर्थात् प्रज्ञात्मा जीवरूपसे ' आयुः ' अर्थात् प्राणरूप से और ' अमृतम् ' अर्थात् ब्रह्मरूपसे अपने - अपने धर्मसे युक्त तीन उपासनाओंका प्रसंग उपस्थित होगा, एकार्थं प्रतिपादक वाक्यको अनेकार्थ प्रदिपादक मानना ही तो वाक्यभेद रूप दोष है, इससे ' प्राणोऽस्मि ' इस उपक्रम वाक्य और ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' इस उपसंहार वाक्यसे जो एक अर्थकी सिद्धि होती है उसका मङ्ग होगा। यदि मगवान् माष्यकारका अनुसरण करें तो उपक्रम और उपसंहारसे एक ब्रह्मरूप अर्थकी ही सिद्धि होती है प्राण और प्रज्ञात्माकी नहीं। अतः ' प्राणोऽस्मि ' ' मामेव विजानीहि ' ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' इत्यादि पूर्वोक्त श्रुतिवाक्य ब्रह्म के ही प्रतिपादक सिद्ध होते हैं। पूर्वपक्ष में तीन उपासनाएँ मानी गई हैं, सिद्धान्त में एक ब्रह्मको ही उपासना है, यह दोनोंमें अन्तर है॥ ३१
उपसंहार
इन सूत्रों का सार यह है कि ब्रह्म केवल शब्द मात्र नहीं, बल्कि मोक्ष का साक्षात् आधार है जिसे तार्किक और शास्त्रीय प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया जाता है। यह क्रम जीव के सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर उस परम तत्व के वास्तविक स्वरूप को समझने की प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करता है।
In English
Brahma Sutra 1.1.5 Commentary
This text explains Brahma Sutra 1.1.5, focusing on why the Saṅkhya concept of 'Pradhāna' (unconscious matter) cannot be the cause of the universe in Vedānta. The commentator argues that the scriptures describe Brahman as an intentional creator through the term 'īkṣata' (he looked/intended), which implies consciousness and agency that unconscious matter lacks.
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