श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — प्रथम अध्याय, तृतीय पाद

42 मूल पद्य 41 संस्करणसे मिलाये गये

ये सूत्र ब्रह्म के स्वरूप की प्रमाणिकता और उसकी सत्ता को सिद्ध करने वाले विभिन्न तर्कों पर केंद्रित हैं। इनमें श्रुति के माध्यम से ब्रह्म के ज्ञान की प्रामाणिकता, शब्द की शक्ति और अन्य ज्ञान-प्रणालियों से उसके अंतर को क्रमानुसार स्पष्ट किया गया है। पाठक को यहाँ यह बोध होगा कि ब्रह्म का ज्ञान केवल अनुमान पर आधारित नहीं है, बल्कि वह वेदों द्वारा प्रमाणित एक परम सत्य है।

द्युभ्वाद्यधिकरणम्

1.3.1 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १

सूत्र १.३.१

द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १.३.१ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 232

पदच्छेद — द्युभ्वाद्यायतनम् , स्वशब्दात्

सूत्रार्थ — ( द्युभ्वाद्यायतनम् ) ' यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम् ' इत्यादि श्रुतिमें कहा गया है कि द्युलोक, भूलोक, अन्तरिक्ष आदि लोक जिसमें कल्पित हैं, वह प्रतीयमान आश्रय ब्रह्म ही है, ( स्वशब्दात् ) क्योंकि ब्रह्मका वाचक आत्मशब्द श्रुतिमें है।

शाङ्करभाष्य

इदं श्रूयते यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः। तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः इति। अत्र यदेतद्द्युप्रभृतीनामोतत्ववचनादायतनं किंचिदवगम्यते तत्किं परं ब्रह्म स्यात् आहोस्विदर्थान्तरमिति संदिह्यते। तत्रार्थान्तरं किमप्यायतनं स्यादिति प्राप्तम्। कस्मात् अमृतस्यैष सेतुः इति श्रवणात्। पारवान्हि लोके सेतुः प्रख्यातः। न च परस्य ब्रह्मणः पारवत्त्वं शक्यमभ्युपगन्तुम् अनन्तमपारम् इति श्रवणात्।

अर्थान्तरे चायतने परिगृह्यमाणे स्मृतिप्रसिद्धं प्रधानं परिग्रहीतव्यम् तस्य कारणत्वादायतनत्वोपपत्तेः। श्रुतिप्रसिद्धो वा वायुः स्यात् वायुर्वाव गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति इति वायोरपि विधारणत्वश्रवणात्। शारीरो वा स्यात् तस्यापि भोक्तृत्वात् भोग्यं प्रपञ्चं प्रत्यायतनत्वोपपत्तेः इत्येवं प्राप्ते इदमाह द्युभ्वाद्यायतनमिति। द्यौश्च भूश्च द्युभुवौ द्युभुवौ आदी यस्य तदिदं द्युभ्वादि।

यदेतदस्मिन्वाक्ये द्यौः पृथिव्यन्तरिक्षं मनः प्राणा इत्येवमात्मकं जगत् ओतत्वेन निर्दिष्टम् तस्यायतनं परं ब्रह्म भवितुमर्हति। कुतः स्वशब्दात् आत्मशब्दादित्यर्थः। आत्मशब्दो हीह भवति तमेवैकं जानथ आत्मानम् इति। आत्मशब्दश्च परमात्मपरिग्रहे सम्यगवकल्पते नार्थान्तरपरिग्रहे। क्वचिच्च स्वशब्देनैव ब्रह्मण आयतनत्व श्रूयते सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः इति।

स्वशब्देनैव चेह पुरस्तादुपरिष्टाच्च ब्रह्म संकीर्त्यते पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् इति ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण इति च। तत्र त्वायतनायतनवद्भावश्रवणात्। सर्वं ब्रह्मेति च सामानाधिकरण्यात् यथा ह्यनेकात्मको वृक्षः शाखा स्कन्धो मूलं चेति एवं नानारसो विचित्र आत्मेत्याशङ्का संभवति तां निवर्तयितुं सावधारणमाह तमेवैकं जानथ आत्मानम् इति।

एतदुक्तं भवति न कार्यप्रपञ्चविशिष्टो विचित्र आत्मा विज्ञेयः किं तर्हि अविद्याकृतं कार्यप्रपञ्चं विद्यया प्रविलापयन्तः तमेवैकमायतनभूतमात्मानं जानथ एकरसमिति। यथा यस्मिन्नास्ते देवदत्तस्तदानय इत्युक्ते आसनमेवानयति न देवदत्तम् तद्वदायतनभूतस्यैवैकरसस्यात्मनो विज्ञेयत्वमुपदिश्यते। विकारानृताभिसंधस्य चापवादः श्रूयते मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति इति।

सर्वं ब्रह्म इति तु सामानाधिकरण्यं प्रपञ्चविलापनार्थम् न अनेकरसताप्रतिपादनार्थम् स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव इत्येकरसताश्रवणात्। तस्माद्द्युभ्वाद्यायतनं परं ब्रह्म। यत्तूक्तम् सेतुश्रुतेः सेतोश्च पारवत्त्वोपपत्तेः ब्रह्मणोऽर्थान्तरेण द्युभ्वाद्यायतनेन भवितव्यमिति अत्रोच्यते विधारणत्वमात्रमेव सेतुश्रुत्या विवक्ष्यते न पारवत्त्वादि।

न हि मृद्दारुमयो लोके सेतुर्दृष्ट इत्यत्रापि मृद्दारुमय एव सेतुरभ्युपगम्यते। सेतुशब्दार्थोऽपि विधारणत्वमात्रमेव न पारवत्त्वादि षिञो बन्धनकर्मणः सेतुशब्दव्युत्पत्तेः। अपर आह तमेवैकं जानथ आत्मानम् इति यदेतत्संकीर्तितमात्मज्ञानम् यच्चैतत् अन्या वाचो विमुञ्चथ इति वाग्विमोचनम् तत् अत्र अमृतत्वसाधनत्वात् अमृतस्यैष सेतुः इति सेतुश्रुत्या संकीर्त्यते न तु द्युभ्वाद्यायतनम्। तत्र यदुक्तम् सेतुश्रुतेर्ब्रह्मणोऽर्थान्तरेण द्युभ्वाद्यायतनेन भवितव्यमिति एतदयुक्तम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' यस्मिन् द्यौः पृथिवी ० ' ( जिसमें द्युलोक, पृथिवी और अन्तरिक्ष, और सम्पूर्ण प्राणों ( इन्द्रियों ) सहित मन गुंथा हुआ है, उस एक आत्माको ही जानो, और सब बातोंको छोड़ दो, यही अमृत - मोक्ष प्राप्तिका सेतु -साधन है ) ऐसी श्रुति है। इस श्रुतिमें द्युलोक आदिका ' ओतप्रोत ' इस वचनसे जो यह कोई एक आश्रय प्रतीत होता है। क्या वह परब्रह्म है अथवा कोई अन्य पदार्थ, इसप्रकार सन्देह होता है। पूर्वपक्षी - यहाँ कोई अन्य पदार्थ ही आश्रय है, ऐसा प्राप्त होता है, किससे?

इससे कि ‘ अमृतस्यैष सेतुः ' ( यह अमृतका सेतु है ) ऐसी श्रुति है। यह लोकमें प्रसिद्ध है कि सेतु परतीरसे सम्बद्ध होता है। किन्तु परब्रह्ममें पारवत्त्व स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ' अनन्तमपारम् ' ( वह अनन्त और अपार है ) ऐसी श्रुति है। अन्य पदार्थको आश्रय मानना स्वीकृत हो तो [ सांख्य ] स्मृति प्रसिद्ध प्रधानका ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वह कारण होनेसे सबका आश्रय हो सकता है। अथवा श्रुति प्रसिद्ध वायु आश्रय हो सकता है, कारण कि ' वायुर्वै गोतम ० ' ( ह्वे गौतम!

वायु ही वह सूत्र है ; वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक परलोक और समस्त भूत समुदाय गुँथे हुए हैं ) इसप्रकार श्रुति वायुको विधारक कहती है। अथवा जीवात्मा आश्रय हो सकता है, क्योंकि भोक्ता होनेसे वह भी मोग्य प्रपञ्चके प्रति आश्रय हो सकता है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं— ' द्युभ्वाद्यायतनम् ' इत्यादि। द्यौश्च भूरच द्यु और भू - द्युभुवो हैं, वे द्यु और भू हैं आदि जिसके वह यह द्युभ्वादि है।

इस वाक्यमें [ अस्मिन्द्यौ श्रुतिवाक्यमें ] द्यु, पृथिवी, अन्तरिक्ष, मन, प्राण आदि स्वरूप जो यह जगत् ओत - प्रोत भावसे ( गुँथा ) निर्दिष्ट है, उसका आश्रय परब्रह्म ही हो सकता है, क्योंकि स्वशब्द है अर्थात् आत्मशब्द है, ऐसा अर्थ है। यहाँ ' तमेवैकं जानथ ० ' ( उस एक आत्माको ही जानो ) इस श्रुतिमें आत्मशब्दका प्रयोग है और आत्मशब्द परमात्माके ग्रहण करनेमें ही ठीक - ठीक उपपन्न होता है। अन्य पदार्थं ( जीव प्रधानादि ) के ग्रहण करनेमें नहीं।

और कहीं - कहीं ' सन्मूलाः सोम्येमाः ० ' ( हे सोम्य! इसप्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है अर्थात् सत् ही प्रजाकी उत्पत्ति में कारण है, स्थितिमें आश्रय है और लयमें प्रतिष्ठा है ) इसप्रकार श्रुति स्वशब्दसे ही ब्रह्मको आयतन कहती है।

' पुरुष एवेदं ० ' ( पुरुष ही यह सत्र कर्म और तप है, पर और अमृतरूप ब्रह्म है ) ' ब्रह्मैवेदम ० ' ( यह अमृतरूप ब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है, दक्षिण और उत्तर- दायीं, बाँयी ब्रह्म है ) इन श्रुतियोंमें आगे और पीछे स्वशब्दसे ही ब्रह्मा संकीर्तन है। और इन श्रुतियोंमें आधार याधेयभावसे ब्रह्मका श्रवण होता है, किञ्च सर्व ब्रह्म ' ( सब ब्रह्म है ) ऐसा सामाधिकरण्य है, इसलिए जैसे शाखा, स्कन्ध और मूलके भेदसे वृक्ष अनेकात्मक है, वैसे नानारस ( भिन्न भिन्न स्वरूप ) वाला विचित्र

1 आत्मा है, ऐसी आशङ्का हो सकती है, उसका निवारण करनेके लिए ' तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' इसप्रकार सावधारण श्रुति कहती है। तात्पर्य यह है कि कार्यं प्रपञ्च विशिष्ट विचित्र आत्मा विज्ञेय नहीं है, किन्तु अविद्या कृत कार्य प्रपञ्चका विद्यासे बांध करते हुए आयतनभूत एकरस उसी एक आत्माको जानो। जैसे ‘ जिसपर देवदत्त बैठा है उसे ले आओ ' ऐसा कहनेपर [ श्रोता ] आसनको ही से आता है देवदत्तकों नहीं, वैसे ही आश्रयभूत एकरस आत्मा ही विज्ञेयरूपसे उपदिष्ट है।

मिथ्या शरीरादि विकारोंमें आत्माभिमान करनेवालेकी ' मृत्योः स मृत्युमा ० ' ( जो अद्वितोय ब्रह्म में भेद - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्यु- जन्म मरण परम्पराको प्राप्त होता है ) इस प्रकार निन्दा सुनी जाती है। ' सर्व ब्रह्म ' ( सब ब्रह्म है ) यह सामानाधिकरण्य तो प्रपञ्चके बाधके लिए है, ब्रह्मकी अनेकरसता प्रतिपादन करने के लिए नहीं है, क्योंकि ' स यथा सैन्धवघनो ' ( जिस प्रकार नमकका डला अन्तर और बाह्य से रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयी!

उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर बाह्य भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ज्ञानैकरस ही है ) इस प्रकार आत्मा एकरस ( एकरूप ) सुना जाता है। अव द्युलोक, भूलोक आदिका आयतन परब्रह्म है। और जो यह कहा गया है कि श्रुतिमें सेतु शब्द है और सेतु पारवान् होता है, अतः द्यु भू लोकका आश्रय ब्रह्मसे अन्य पदार्थ होना चाहिए। उसके उत्तरमें कहते हैं —— यहाँ सेतुश्रुति से उसमें केवल विधारणत्व ही विवक्षित है पारवत्त्व आदि नहीं।।

लोकमें मृत्तिका और लकड़ीका बना हुआ सेतु ( बांध - पुल ) देखने में आता है, परन्तु यहाँ ( प्रकरणमें ) मृत्तिका और दारुमय ही सेतुं स्वीकृत नहीं है, इसलिए सेतुशब्दका अर्थ भी विधारणत्व ही है पारवत्त्व आदि नहीं, कारण कि बन्धनार्थंक ' षिन् ' धातुसे सेतु शब्द निष्पन्न होता है। दूसरा कहता है - ' तमेवैकं ० ' ( उसी एक आत्माको जानो ) इसप्रकार जो आत्मज्ञानका संकीर्तन किया गया है।

किञ्च ' अन्या वाचो विमुञ्चथ ' आत्मज्ञानातिरिक्त अनात्मपदार्थ प्रतिपादक जो अन्य वाणियोंके त्यागका वर्णन किया है, वह यहाँ अमृतरूपमोक्षका साधन होनेसे ' अमृतस्यैष सेतुः ' इसप्रकार सेतु श्रुतिसे स्पष्ट कहा जाता है, द्यु भू आदिके आश्रयका कथन नहीं होता है। इसके अतिरिक्त जो यह कहा गया है कि सेतु श्रुति - भू आदिका आयतनरूपसे ब्रह्मसे अन्य पदार्थ होना चाहिए, यह भी ठीक नहीं है॥ १

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * द्वितीयपादमें ' तस्य ह वा एतस्यात्मनो ० ' ( उन वैश्वानर आत्माका सुदीप्त मूर्धा है और विश्वरूप सूर्य चक्षु है ) इत्यादि सविशेष वस्तुके प्रतिपादक वाक्योंका ब्रह्म में समन्वय दिखलाया गया है। अब निर्विशेष वस्तुके प्रतिपादक वाक्योंका ब्रह्ममें समन्वय दिखलाने के लिए तृतीय पाद आरम्भ होता है। पूर्व वैश्वानर अधिकरणमें ' तीन लोक - स्वरूप ' वैश्वानर ब्रह्मस्वरूप है, ऐसा वर्णन किया गया है।

अब तीनों लोकोंका आयतन ब्रह्मसे भिन्न प्रधान आदिको कहनेके लिए पूर्वपक्षी दृष्टान्तसंगतिसे अपने पक्षका स्थापन करते हैं। ब्रह्म ' अनन्त - अपार ' है इससे वह किसीका आश्रय नहीं हो सकता, आश्रय तो मर्यादित होता है। इसलिए प्रधान ही को आश्रय मानना चाहिए। प्रधान, वायु और जीवात्मा इन तीनोंमें से प्रधान आयतनरूपसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह श्रुति प्रतिपाद्य नहीं है, इसलिए यहाँ वायुको ग्रहण किया गया है, क्योंकि ' वायुर्वै गौतम ' इत्यादि श्रुतिसे प्रसिद्ध हैं।

किन्तु प्रधान और वायु इन दोनोंमें श्रुति प्रतिपादित आत्मशब्दको उपपत्ति न होने से जीवात्माका ग्रहण किया गया है, क्योंकि वह भोक्ता होनेसे भोग्य प्रपञ्चके प्रति आश्रय हो सकता है और उसमें श्रुतिप्रतिपाद्य आत्मशब्दका प्रयोग भी होता है, इसलिए जीवका आश्रयरूपसे ग्रहण करना ही युक्त है।

* ' द्यौश्च भूश्च द्युभुवौ ' द्युलोक और भूलोक ये ' द्यु भू ' कहे जाते हैं, यह द्वन्द्व समास है, इसके अनन्तर ' द्यु और भू आदि जिसके हैं वह द्युभ्वादि है ' यह बहुब्रीहि समास है। चु, भ आदिमें हैं जिसके ऐसे अन्तरिक्ष, मन, प्राण आदिरूप जगत्का आश्रय पर ब्रह्म ही हो सकता है, क्योंकि ' तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' इत्यादि श्रुतियों में आयतन के लिए आत्मशब्दका प्रयोग किया गया है। यद्यपि आत्मशब्दसे जीव प्रसिद्ध है, तथापि उपाधिसे परिच्छिन्न जीव कार्य - कारणात्मक सम्पूर्ण जगत्का आयतन नहीं हो सकता है, इसलिए आत्मशब्द ठीक - ठीक ब्रह्ममें ही उपपन्न होता है।

* ‘ यस्मिन्द्यौ पृथिवी ' इस विषयवाक्यसे पूर्व ' पुरुष एवेदं विश्वं कर्म ' इस पूर्व और ' ब्रह्मवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म ' इस उत्तरवाक्यमें पुरुषशब्द अथवा ब्रह्मशब्द भी ब्रह्मका ही स्पष्ट वर्णन करता है, अतः ये दोनों मन्त्र ब्रह्मपरक हैं, ' यस्मिन्द्यौ पृथिवी ' यह मध्यवर्ती मन्त्र भी अवश्य ब्रह्मका ही प्रतिपापक है। इस प्रकार ब्रह्म ही स्वर्गादि प्रपञ्चका आयतन सिद्ध होता है। ' तमेवैकं ० ' इस श्रुतिवाक्यमें ' एव ' अवधारणार्थक ( निश्चयार्थक ) है। और श्रुति

6 ' एक ' शब्दसे अनेककी व्यावृत्ति कर आत्माको ही ज्ञेयरूपसे निर्देश करती है। इस प्रकार निर्विशेष ( निर्गुण ) ब्रह्म ही ज्ञेय है, सविशेष ( सगुण ) नहीं।

' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति ' यह श्रुति भेदकी निन्दा करती है, और ' सर्वं ब्रह्म ' ( यह सब ब्रह्म है ) यह सामानाधिकरण्य श्रुतिवाक्य ब्रह्म में एकरूपता - एकत्वका प्रतिपादन करता है। जैसे स्थाणुमें अविद्यासे आरोपित चौर स्थाणुरूप है उससे भिन्न नहीं, वैसे अविद्यासे आरोपित यह सारा प्रपञ्च परमार्थतः ब्रह्म है, यह प्रपञ्चके बाधके लिए है, ' जो ब्रह्म है वह प्रपञ्च है ' इस प्रकार ब्रह्मके भिन्न - भिन्न स्वरूपके प्रतिपादन के लिए नहीं है। इसमें स यथा सैन्धवघनो ' यह नियामक श्रुति है, इसलिए सम्पूर्ण प्रपञ्चका आश्रय - अधिष्ठान ब्रह्म ही है। यद्यपि स्वयं ब्रह्म ही अमृत स्वरूप है, तथापि भेदकी कल्पना कर ' अमृतस्यैष सेतुः ' ऐसा कहा गया है। ' सेतु ' शब्दका अर्थ पारवत्त्व इसलिए भी नहीं हो सकता कि बन्धनार्थक षिञ् ' धातुसे ' तुमुन् ' प्रत्यय होकर सेतु शब्द निष्पन्न हुआ है ' सिनोति बध्नाति इति सेतु : ' इस व्युत्पत्तिसे भी यहाँ सेतु शब्दका अर्थ विधारण है।

* द्यु - भू आदिका आश्रयरूप ब्रह्म सेतु शब्दका अर्थ कहकर सेतु श्रुतिकी सार्थकता दिखलायी गयी, अब ' अपर आह ' इत्यादिसे अन्य प्रकार से सेतु श्रुतिका अर्थ करते हैं। इससे पारवत्त्वकी शङ्का और आयतनरूपसे प्रधानादिकी कल्पना नहीं हो सकती। ' अमृतस्यैष सेतुः ' श्रुतिस्थ इस सेतु शब्दका अर्थं ब्रह्म नहीं किन्तु ब्रह्मज्ञान है, क्योंकि वह अमृतरूप मोक्षका हेतु है। यदि द्यु, भू आदिके आश्रयरूपसे प्रधानको स्वीकार भी किया जाय, तो भी ब्रह्मज्ञानसे उपदिष्ट अमृतरूप फल जड़ प्रधानके ज्ञानसे असम्भव है, इसलिए यहाँ प्रधान आदिके ग्रहणका प्रसंग ही नहीं है॥ १

1.3.2 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २

सूत्र १.३.२

मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच् च ॥ १.३.२ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 236

सूत्रार्थ — ' तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्त : ' इत्यादि श्रुतियोंसे ' मुक्त पुरुषोंसे ब्रह्म प्राप्य है। ' ऐसा वर्णन किया गया है, अतः द्यु भू आदिका अधिष्ठान ब्रह्म ही है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च परमेव ब्रह्म द्युभ्वाद्यायतनम् यस्मान्मुक्तोपसृप्यतास्य व्यपदिश्यमाना दृश्यते। मुक्तैरुपसृप्यं मुक्तोपसृप्यम्। देहादिष्वनात्मसु अहमस्मीत्यात्मबुद्धिरविद्या ततस्तत्पूजनादौ रागः तत्परिभवादौ च द्वेषः तदुच्छेददर्शनाद्भयं मोहश्च इत्येवमयमनन्तभेदोऽनर्थव्रातः संततः सर्वेषां नः प्रत्यक्षः। तद्विपर्ययेणाविद्यारागद्वेषादिदोषमुक्तैरुपसृप्यमुपगम्यमेतदिति द्युभ्वाद्यायतनं प्रकृत्य व्यपदेशो भवति कथम् भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इत्युक्त्वा ब्रवीति तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् इति। ब्रह्मणश्च मुक्तोपसृप्यत्वं प्रसिद्धं शास्त्रे यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते इत्येवमादौ। प्रधानादीनां तु न क्वचिन्मुक्तोपसृप्यत्वमस्ति प्रसिद्धम्। अपि च तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः इति वाग्विमोकपूर्वकं विज्ञेयत्वमिह द्युभ्वाद्यायतनस्योच्यते। तच्च श्रुत्यन्तरे ब्रह्मणो दृष्टम् तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः। नानुध्यायाद्बहूञ्शब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् इति। तस्मादपि द्युभ्वाद्यायतनं परं ब्रह्म।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इससे द्यु, आदिका आयतन परब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें मुक्तोंसे प्राप्यताका व्यपदेश दृष्ट है अर्थात् वह मुक्तपुरुषोंसे प्राप्य कहा गया है। मुक्तोंसे प्राप्यको मुक्तोपसृप्य कहते हैं। देहादि अनात्मपदाथोंमें ' मैं हूं ' ऐसी आत्मबुद्धि अविद्या है। उससे उन देहादिमें पूजन- सम्मान आदिमें राग, उनके अपमान आदिसे द्वेष, उनके नाशदर्शनसे मय और मोह इस प्रकार यह अनेक प्रकारका निरन्तर वर्तमान सर्वत्र फैला हुआ अनर्थ समुदाय हम सबको प्रत्यक्ष है।

परन्तु इसके विपरीत अविद्या, राग, द्वेष आदि दोषोंसे मुक्त हुए पुरुषोंसे यह ब्रह्म उपसृप्य प्राप्य है। द्यु भु आदिके आयतन ( ब्रह्म ) को प्रकृतकर व्यपदेश है। कैसे?

' भिद्यते हृदयग्रन्थि ० ' ( उस परावर ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेनेपर इस जीवकी हृदय ग्रंथि टूट जाती है ; सारे संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ) इसप्रकार कहकर श्रुति पुन : कहती है ' तथा विद्वान् ० ' ( उसी प्रकार विद्वान् नाम - रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ) और ' यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते ० ' ( जिस समय इसके हृदयमें आश्रित ऐहिक एवं पारलौकिक भोगकी सम्पूर्ण वासनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं उस समय मरणधर्मा यह मनुष्य अमृत हो जाता है, इसी शरीरमें उसे ब्रह्मप्राप्ति हो जाती है ) इत्यादि शास्त्रमें ब्रह्म मुक्तपुरुषोंसे प्राप्य है यह प्रसिद्ध ही है।

प्रधानादि तो कहीं भी मुक्तपुरुषोंसे वाप्य प्रसिद्ध नहीं हैं। इसके अतिरिक्त ' तमेवैकं जानथ ० ' ( उस एक आत्माको ही जानो और सब बातोंको छोड़ दो। यही अमृत [ मोक्ष प्राप्ति ] का सेतु [ साधन ] है ) इस प्रकार वाणीके त्याग पूर्वक भू आदिका आश्रय ( ब्रह्म ) ही यहाँ विज्ञेयरूप से कहा गया है।

' तमेव धीरो विज्ञाय ० ' ( उसे ही जानकर बुद्धिमान् ब्राह्मण उसमें प्रज्ञा करे अर्थात् वाक्यार्थं ज्ञानका सम्पादन करे – बहुत शब्दोंका चिन्तन न करे | वह तो वाणीके लिए श्रम है ) इस अन्य श्रुतिमें भी विज्ञेय ब्रह्म है, यह देखा गया है। इससे भी द्यु, भू आदिका आयतन परब्रह्म ही है॥ २

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि ब्रह्म सबका अपना स्वरूप होनेसे नित्य प्राप्त है, तो भी अविद्यासे स्वभिन्न- सा प्रतीत होता है। जब ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि . महावाक्यों द्वारा इसे ' मैं ब्रह्म ही हूँ ' ऐसा आत्मज्ञान हो जाता है, तब जैसे गङ्गा आदि नदियाँ नाम और रूपको छोड़कर समुद्ररूप हो जाती हैं, वैसे यह विद्वान् नाम - रूपसे मुक्त होकर ज्योतिःस्वरूप आत्माको प्रत्यग्र रूप से प्राप्त होता है। कण्ठभूषण के समान अविद्याकी निवृत्तिसे ब्रह्म प्राप्त - सा प्रतीत होता है, बस इसे ही मुक्त पुरुषोंद्वारा प्राप्य कहा गया है।

* ‘ अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा। जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च॥ ' ( पा ० शि ० १३ ) ( हृदय, कण्ठ, शिर, जिह्वामूल, दांत, नासिका, ओठ, तालु ये आठ वागिन्द्रियके स्थान हैं इनसे वर्ण आदिका उच्चारण होता है, अतः इन्हें वाक् शब्दसे कहा जाता है, इसलिए आत्मस्वरूपके प्रतिपादक वेदान्त वाक्योंका चिन्तन और कथन करो ऐसा श्रुतिका तात्पर्य है। सुतरां यह सिद्ध होता है कि भू आदिका आयतन परब्रह्म है प्रधान आदि नहीं॥ २

1.3.3 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३

सूत्र १.३.३

नानुमानम् अतच्छब्दात् प्राणभृच् च ॥ १.३.३ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 237

पदच्छेद — न , अनुमानम् , अतच्छब्दात्

सूत्रार्थ — ( अनुमानम् ) सांख्प शास्त्रमें कल्पित प्रधान ( न ) द्यु, भू आदिका आश्रय नहीं हो सकता, ( अतच्छब्दात् ) क्योंकि श्रुतिमें प्रधान प्रतिपादक कोई शब्द नहीं है।

शाङ्करभाष्य

यथा ब्रह्मणः प्रतिपादको वैशेषिको हेतुरुक्तः नैवमर्थान्तरस्य वैशेषिको हेतुः प्रतिपादकोऽस्तीत्याह। नानुमानं सांख्यस्मृतिपरिकल्पितं प्रधानम् इह द्युभ्वाद्यायतनत्वेन प्रतिपत्तव्यम्। कस्मात् अतच्छब्दात्। तस्याचेतनस्य प्रधानस्य प्रतिपादकः शब्दः तच्छब्दः न तच्छब्दः अतच्छब्दः। न ह्यत्राचेतनस्य प्रधानस्य प्रतिपादकः कश्चिच्छब्दोऽस्ति येनाचेतनं प्रधानं कारणत्वेनायतनत्वेन वावगम्येत। तद्विपरीतस्य चेतनस्य प्रतिपादकशब्दोऽत्रास्ति यः सर्वज्ञः सर्ववित् इत्यादिः। अत एव न वायुरपीह द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रीयते।। प्राणभृच्च।(ब्रसू १,३.३(१)। ) यद्यपि प्राणभृतो विज्ञानात्मन आत्मत्वं चेतनत्वं च संभवति तथाप्युपाधिपरिच्छिन्नज्ञानस्य सर्वज्ञत्वाद्यसंभवे सति अस्मादेवातच्छब्दात् प्राणभृदपि न द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः। न चोपाधिपरिच्छिन्नस्याविभोः प्राणभृतो द्युभ्वाद्यायतनत्वमपि सम्यक्संभवति। पृथग्योगकरणमुत्तरार्थम्।। कुतश्च न प्राणभृत् द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उक्त प्रसंग में जैसे ब्रह्मका प्रतिपादक विशेष असाधारण हेतु ( आत्मशब्द आदि ) कहा गया है, वैसे अन्य पदार्थका प्रतिपादक कोई विशेष हेतु नहीं है, इसलिए कहते हैं कि ' नानुमानिकम् ' सांख्य स्मृतिमें कल्पित प्रधानको यहाँ द्यु, भू आदिके आश्रयरूपसे स्वीकार करना युक्त नहीं है, क्योंकि वह अतत् शब्द है। उस अचेतन प्रधानका प्रतिपादक शब्द ' तत् शब्द ' और ' तत् शब्द ' से भिन्न ' अतत् शब्द ' हुआ। यहाँ अचेतन प्रधानका प्रतिपादक ऐसा कोई शब्द नहीं है कि जिससे अचेतन प्रधान कारणरूपसे अथवा आश्रयरूपसे अवगत होता हो, किन्तु यहाँ तो इसके विपरीत चेतनके ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि प्रतिपादक शब्द हैं। इन्हीं कारणोंसे वायुको भी यहाँ छु, भू ' fast आश्रयरूपसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।। ३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ‘ तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' ' अत्र ब्रह्म समश्नुते ' इत्यादि श्रुतियोंमें जैसे ब्रह्म के प्रतिपादक आत्मा और चेतन आदि अनेक असाधारण शब्द हैं, वैसे प्रधान वाचक कोई असाधारण शब्द नहीं द्यु, भू आदिका आश्रय नहीं हो सकते, किन्तु ब्रह्म ही आश्रय है || ३ || 1

1.3.4 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४

सूत्र १.३.४

नानुमानम् अतच्छब्दात् प्राणभृच् च ॥ १.३.४ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 237

पदच्छेद — प्राणभृत् , ' च

सूत्रार्थ — प्राणभृत् - जीव भी द्यु - भू आदिका आश्रय नहीं है, क्योंकि उसका प्रतिपादक शब्द नहीं है।

शाङ्करभाष्य

यथा ब्रह्मणः प्रतिपादको वैशेषिको हेतुरुक्तः नैवमर्थान्तरस्य वैशेषिको हेतुः प्रतिपादकोऽस्तीत्याह। नानुमानं सांख्यस्मृतिपरिकल्पितं प्रधानम् इह द्युभ्वाद्यायतनत्वेन प्रतिपत्तव्यम्। कस्मात् अतच्छब्दात्। तस्याचेतनस्य प्रधानस्य प्रतिपादकः शब्दः तच्छब्दः न तच्छब्दः अतच्छब्दः। न ह्यत्राचेतनस्य प्रधानस्य प्रतिपादकः कश्चिच्छब्दोऽस्ति येनाचेतनं प्रधानं कारणत्वेनायतनत्वेन वावगम्येत। तद्विपरीतस्य चेतनस्य प्रतिपादकशब्दोऽत्रास्ति यः सर्वज्ञः सर्ववित् इत्यादिः। अत एव न वायुरपीह द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रीयते।। प्राणभृच्च।(ब्रसू १,३.३(१)। ) यद्यपि प्राणभृतो विज्ञानात्मन आत्मत्वं चेतनत्वं च संभवति तथाप्युपाधिपरिच्छिन्नज्ञानस्य सर्वज्ञत्वाद्यसंभवे सति अस्मादेवातच्छब्दात् प्राणभृदपि न द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः। न चोपाधिपरिच्छिन्नस्याविभोः प्राणभृतो द्युभ्वाद्यायतनत्वमपि सम्यक्संभवति। पृथग्योगकरणमुत्तरार्थम्।। कुतश्च न प्राणभृत् द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यद्यपि प्राणधारी जीवमें आत्मत्व और चेतनत्व सम्भव हैं, तो भी उपाधि से परिच्छिन्न . ज्ञानवाले जीवमें सर्वज्ञत्व आदिका संभव न होनेके कारण इस ' अतत् शब्दसे ' ही जीवात्माका भी भू आदिके आयतनरूपसे ग्रहण नहीं किया जा सकता है। किच उपाधि परिच्छिन्न अविभू - अव्यापक जीवात्मा -भू आदिका आश्रय भी तो मली - भांति नहीं हो सकता। अग्रिम सूत्र में केवल जीवका ही ग्रहण हो, इस आवृत्तिके लिए ही इस सूत्र की पृथक् रचना की गई है॥ ४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — है, जिसके बलसे वह द्यु, भू आदिका आश्रय हो, अत : श्रुति प्रतिपादित न होनेसे प्रधान और वायु

** शङ्का – ' नानुमानप्राणभृतावतच्छब्दात् ' ( प्रधान और जीव द्यु, भू आदिके आश्रय नहीं हैं, क्योंकि श्रुतिमें इसके विपरीत ब्रह्म प्रतिपादक शब्द हैं और दोनोंका प्रतिपादक शब्द श्रुतिमें नहीं है, इसलिए दोनों अंतत् शब्द हैं ) इन दोनोंके निराकरण करनेके लिए ऐसे एक ही सुत्रकी रचना क्यों नहीं की गयी है? समाधान - भेदव्यपदेशात् ' इस अगले सूत्रसे जीव और प्रधान दोनोंके ग्रहणका सम्भव है, परन्तु इस सूत्र से प्रधानका भी ग्रहण हो यह सूत्रकारको अभीष्ट नहीं है, सूत्रकारको तो केवल जीवका ग्रहण अभीष्ट है, इसलिए सूत्रकारने ' प्राणभृच्च ' इस सूत्रकी पृथक् रचना की है॥ ४

1.3.5 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५

सूत्र १.३.५

भेदव्यपदेशात् ॥ १.३.५ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 238

सूत्रार्थ — ' तमेकं विजानथ ' ( उसी एक आत्माको जानो ) इस प्रकार श्रुतिमें ज्ञाता और ज्ञेयरूपसे जीव और परमात्मा के भेदका कथन है, अतः जीव द्यु भू आदिका आश्रय नहीं है।

शाङ्करभाष्य

भेदव्यपदेशश्चेह भवति तमेवैकं जानथ आत्मानम् इति ज्ञेयज्ञातृभावेन। तत्र प्राणभृत् तावन्मुमुक्षुत्वाज्ज्ञाता परिशेषादात्मशब्दवाच्यं ब्रह्म ज्ञेयं द्युभ्वाद्यायतनमिति गम्यते न प्राणभृत्।। कुतश्च न प्राणभृत् द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और किस कारण से जीवका द्यु भू आदिके आश्रयरूपसे ग्रहण नहीं करना चाहिए?

‘ तमेवैकं जानथ ं ० ( उसी एक आत्माको जानो ) इस प्रकार यहाँ ज्ञेय और ज्ञातृभावसे भेदका कथन है। उसमें जीव मुमुक्षु होनेसे ज्ञाता है, और परिशेषसे - अवशिष्ट होनेसे आत्मशब्दवाच्य ज्ञेय ब्रह्म द्यु, भू आदिका आश्रय है, ऐसा ज्ञात होता है, जीव आश्रय नहीं है॥ ५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.३.७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

1.3.6 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६

सूत्र १.३.६

प्रकरणात् ॥ १.३.६ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 238

सूत्रार्थ — ' कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते ० ' इस प्रकार ब्रह्मका प्रकरण होनेसे जीव द्यु भू - आदिका आश्रय नहीं है।

शाङ्करभाष्य

प्रकरणं चेदं परमात्मनः कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानापेक्षणात्। परमात्मनि हि सर्वात्मके विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं स्यात् न केवले प्राणभृति।। कुतश्च न प्राणभृत् द्युभ्वाद्यायतनत्वेनाश्रयितव्यः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और किस कारणसे जीवका द्यु भू आदिके माश्रयरूपसे नहीं ग्रहण करना चाहिए?

और यह प्रकरण भी परमात्माका है, क्योंकि ' कस्मन्नु भगवो ० ' ( हे भगवन्! किसके विज्ञात होनेपर यह सब ज्ञात हो जाता है ) इस प्रकार एकके ज्ञानसे सबके विज्ञानकी अपेक्षा ( जिज्ञासा ) की गयी है। निश्चय ही सर्वात्मक परमात्मा के विज्ञात होनेपर यह सब विज्ञात हो जाता है, केवल जीवके विज्ञात होनेपर यह सब विकार मात्र ज्ञात नहीं हो सकता॥ ६

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.३.७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

1.3.7 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ७

सूत्र १.३.७

स्थित्यदनाभ्यां च ॥ १.३.७ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 239

पदच्छेद — स्थित्यदनाभ्याम् च

सूत्रार्थ — ' द्वा सुपर्णा ' इस मन्त्रमें परमेश्वरकी उदासीनमावसे स्थिति और दूसरे - जीवको कर्मफलके भक्षणका निर्देश है, इस तरह स्थिति और मक्षणरूप हेतुओंसे मी द्यु भू . आदिका आश्रय जीव नहीं है, किन्तु ब्रह्म है।

शाङ्करभाष्य

द्युभ्वाद्यायतनं च प्रकृत्य द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया इत्यत्र स्थित्यदने निर्दिश्येते तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति कर्मफलाशनम् अनश्चन्नन्योऽभिचाकशीति इत्यौदासीन्येनावस्थानम्। ताभ्यां च स्थित्यदनाभ्यामीश्वरक्षेत्रज्ञौ तत्र गृह्येते। यदि च ईश्वरो द्युभ्वाद्यायतनत्वेन विवक्षितः ततस्तस्य प्रकृतस्येश्वरस्य क्षेत्रज्ञात्पृथग्वचनमवकल्पते। अन्यथा ह्यप्रकृतवचनमाकस्मिकमसंबद्धं स्यात्। ननु तवापि क्षेत्रज्ञस्येश्वरात्पृथग्वचनमाकस्मिकमेव प्रसज्येत न तस्याविवक्षितत्वात्।

क्षेत्रज्ञो हि कर्तृत्वेन भोक्तृत्वेन च प्रतिशरीरं बुद्ध्याद्युपाधिसंबद्धः लोकत एव प्रसिद्धः नासौ श्रुत्या तात्पर्येण विवक्ष्यते ईश्वरस्तु लोकतोऽप्रसिद्धत्वाच्छ्रुत्या तात्पर्येण विवक्ष्यत इति न तस्याकस्मिकं वचनं युक्तम्। गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि इत्यत्राप्येतद्दर्शितम् द्वा सुपर्णा इत्यस्यामृचि ईश्वरक्षेत्रज्ञावुच्येते इति। यदापि पैङ्ग्युपनिषत्कृतेन व्याख्यानेनास्यामृचि सत्त्वक्षेत्रज्ञावुच्येते तदापि न विरोधः कश्चित्।

कथम् प्राणभृद्धीह घटादिच्छिद्रवत् सत्त्वाद्युपाध्यभिमानित्वेन प्रतिशरीरं गृह्यमाणो द्युभ्वाद्यायतनं न भवतीति प्रतिषिध्यते। यस्तु सर्वशरीरेषूपाधिभिर्विनोपलक्ष्यते परएव स भवति यथा घटादिच्छिद्राणि घटादिभिरुपाधिभिर्विनोपलक्ष्यमाणानि महाकाश एव भवन्ति तद्वत् प्राणभृतः परस्मादन्यत्वानुपपत्तेः प्रतिषेधो नोपपद्यते। तस्मात्सत्त्वाद्युपाध्यभिमानिन एव द्युभ्वाद्यायतनत्वप्रतिषेधः। तस्मात्परमेव ब्रह्म द्युभ्वाद्यायतनम्। तदेतत् अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः इत्यनेनैव सिद्धम्।

तस्यैव हि भूतयोनिवाक्यस्य मध्ये इदं पठितम् यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षम् इति। प्रपञ्चार्थं तु पुनरुपन्यस्तम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और भू आदिके आश्रयरूपसे जीवका ग्रहण क्यों नहीं करना चाहिए?

और द्यु भू आदिके आश्रयको प्रस्तुतकर ' द्वा सुपर्णा ० ' ( साथ - साथ रहनेवाले तथा समान आख्यानवाले दो पक्षी शरीररूपी एक वृक्षका आश्रय कर रहते हैं ) इस मन्त्र में स्थिति और भक्षणका निर्देश किया गया है। ' तयोरन्य : ० ' ( उनमें से एक [ जीव ] तो स्वादिष्ट - मधुर कर्मफलका भोग करता है ) इस मन्त्रांश वाक्यमें कर्मफलका उपभोग और ' अनश्नन्नन्यो ० ' ( दूसरा - ईश्वर भोग न करता हुआ केवल देखता रहता है ) इसमें उदासीनतापूर्वक स्थिति निर्दिष्ट है।

इस स्थिति और भक्षणसे इस मन्त्रमें ईश्वर और जीवका ग्रहण किया जाता है। और यदि ईश्वर द्यु भू आदिके आश्रयरूपसे विवक्षित हो तो उस प्रकृत ईश्वरका क्षेत्रज्ञसे पृथक् वचन [ ' अनम्नन्नन्यो ० ' ] उपपन्न होता है, अन्यथा यह अप्रकृत वचन, आकस्मिक और असम्बद्ध हो जायगा। परन्तु तुम्हारा भी क्षेत्रज्ञ - जीवका ईश्वरसे पृथक् कथन आकस्मिक ही प्रसक्त होगा। नहीं, क्योंकि जीव अविवक्षित है।

क्षेत्रज्ञ तो कर्ता और भोक्तारूपसे प्रतिशरीरमें बुद्धि आदि उपाधियोंसे युक्त है और लोकमें प्रसिद्ध है, इसलिए वह श्रुति तात्पर्यसे विवक्षित नहीं है अर्थात् उसकी विवक्षामें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है। ईश्वर तो लोकमें अप्रसिद्ध होनेसे श्रुतिके तात्पर्यसे विवक्षित है अर्थात् उसके प्रतिपादनमें श्रुतिका तात्पर्य है, इसलिए उसे आकस्मिक कहना युक्त नहीं है।

' गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि ' ( ब्र ० सू ० १ २०११ ) इस सूत्र में भी यह ( जीव और परमात्मा ) दिखलाया गया है कि यहाँ ' द्वा सुपर्णा ० ' इस ऋचामें भी ईश्वर और क्षेत्रज्ञ कहे जाते हैं। यद्यपि पैङ्गी उपनिषद् कृत व्याख्यानके अनुसार इस ऋचामें बुद्धि और क्षेत्रज्ञ कहे गये हैं तो भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि यहाँ घटादिच्छिद्र के समान सत्त्व आदि उपाधियोंके अभिमानिरूपसे प्रतिशरीरमें गृह्यमाण जीवात्मा द्यु, भू आदिका आश्रय नहीं है, इसप्रकार निषेध किया गया है।

परन्तु जो सब शरीरोंमें उपाधियोंके विना उपलक्षित होता है, वह परमात्मा ही है। जैसे घटादि उपाधिके विना उपलक्षित होनेवाले घटादि छिद्र ( आकाश ) वस्तुतः महाकाश ही हैं, वैसे परमात्मासे अन्यत्व अनुपपत्ति होनेसे जीवात्माका द्यु, भू आदिके आश्रयरूपसे प्रतिषेध करना युक्त नहीं है। प्रत्युत बुद्धि आदिके अभिमानीका हो द्यु, भू आदिके आश्रयरूपसे प्रतिषेध है। इससे परब्रह्म ही द्यु, भू आदिका आयतन है। यही बात ' अदृश्यत्वादि ० ' ( ब्र ० सू ० १।२।२१ ) इस सूत्र से ही सिद्ध हो चुकी है।

उसी भूतयोनि वाक्यके मध्य में ' यस्मिन्द्यौः ० ' यह मन्त्र भी पठित है। यहाँ तो विस्तार के लिए पुनः इसका उपन्यास किया गया है॥ ७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' द्वा सुपर्णा ० ' इस मन्त्रमें स्थिति ( रहना ) से ईश्वर और मक्षणसे जीवका निर्देश है। यहाँ ईश्वर पदसे उपाधि रहित शुद्ध ब्रह्मका ग्रहण युक्त है सर्वज्ञत्व आदि गुण विशिष्टका नहीं ; क्योंकि वह यहाँ प्रतिपाद्य नहीं है। प्रतिपाद्य इसलिए नहीं है कि ईश्वरकी उदासीनतापूर्वक स्थिति सम्भव नहीं है। किच अप्रतिपाद्य अर्थका अकस्मात् मध्यमें कथन अप्रकृत, आकस्मिक असम्बद्ध होता है। इससे उसका प्रतिपादक होने से ' अनश्नन्नन्यो ' यह श्रुतिवाक्य भी अप्रकृत, आकस्मिक और असम्बद्ध हो जायगा। जब ईश्वरपदसे शुद्ध ब्रह्मका ग्रहण करते हैं तो ब्रह्मका जीवसे ' अनश्नन्नन्यो ' यह पृथक् वचन संगत होता है। इसलिए ' अनश्नन्नन्यो ० ' यह श्रुति वाक्य शुद्ध ब्रह्मका ही प्रतिपादक है। इस प्रकार इस मन्त्र में स्थिति और भक्षण पदके निर्देशसे जीव और ब्रह्मका भेदपूर्वक वर्णन है। इसलिए जीव नियम्य है और ईश्वर नियामक | ग्रंथकारके आशयको न समझकर पूर्वपक्षी ' ननु ' से शङ्का करते हैं।

यदि भायतनरूपसे जीवको विवक्षित न मानें तो तुम्हारे सिद्धान्त में भी ईश्वरके बोधक वचनोंसे भिन्न जीव बोधक ' तयोरन्यः ' इत्यादि वचन आकस्मिक ही होंगे। सिद्धान्ती इस शङ्काका ' न ' आदिसे समाधान करते हैं कि यहाँ आयतनरूपसे जीव विवक्षित नहीं है, इसलिए उसके प्रतिपादनमें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है।

* पैङ्गी उपनिषद्के व्याख्यानमें जीव और ईश्वरके स्थानमें बुद्धि और क्षेत्रज्ञका ग्रहण किया गया है, ऐसा मानने पर भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि यहाँ बुद्धि शब्दसे बुद्धि उपाधि युक्त जीवको समझना चाहिए और क्षेत्रज्ञ शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए। दुर्विज्ञेय ब्रह्मके सम्यग्ज्ञानके लिए सूत्रकारने ' द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ' इस सूत्र की रचना की है। इससे यह सिद्ध हुआ कि परब्रह्म ही, भू आदिका आश्रय - अधिष्ठान है उपाधि युक्त परिच्छिन्न जीव नहीं है॥ ७

भूमाधिकरणम्

1.3.8 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ८

सूत्र १.३.८

भूमा संप्रसादाद् अध्युपदेशात् ॥ १.३.८ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 240

पदच्छेद — भूमा , सम्प्रसादाद् , अधि , उपदेशात्

सूत्रार्थ — ( भूमा ) ' भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्यः ' यह श्रुत्युक्त भूमा परमात्मा ही है। ( संप्रसादादधि ) क्योंकि संप्रसाद संज्ञक प्राणके उपदेशके अनन्तर ( उपदेशात् ) उसका उपदेश है।

शाङ्करभाष्य

इदं समामनन्ति भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति। यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा। अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम् इत्यादि। तत्र संशयः किं प्राणो भूमा स्यात् आहोस्वित्परमात्मेति। कुतः संशयः भूमेति तावद्बहुत्वमभिधीयते बहोर्लोपो भू च बहोः इति भूमशब्दस्य भावप्रत्ययान्ततास्मरणात्। किमात्मकं पुनस्तद्बहुत्वमिति विशेषाकाङ्क्षायाम् प्राणो वा आशाया भूयान् इति संनिधानात् प्राणो भूमेति प्रतिभाति।

तथा श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति। सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्शोकस्य पारं तारयतु इति प्रकरणोत्थानात्परमात्मा भूमेत्यपि प्रतिभाति। तत्र कस्योपादानं न्याय्यम् कस्य वा हानमिति भवति संशयः। किं तावत्प्राप्तम् प्राणो भूमेति। कस्मात् भूयःप्रश्नप्रतिवचनपरंपरादर्शनात्। यथा हि अस्ति भगवो नाम्नो भूयः इति वाग्वाव नाम्नो भूयसी इति तथा अस्ति भगवो वाचो भूयः इति मनो वाव वाचो भूयः इति च नामादिभ्यो हि आ प्राणात् भूयःप्रश्नप्रतिवचनप्रवाहः प्रवृत्तः।

नैवं प्राणात्परं भूयःप्रश्नप्रतिवचनं दृश्यते अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः इति अदो वाव प्राणाद्भूयः इति। प्राणमेव तु नामादिभ्य आशान्तेभ्यो भूयांसम् प्राणो वा आशाया भूयान् इत्यादिना सप्रपञ्चमुक्त्वा प्राणदर्शिनश्चातिवादित्वम् अतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत इत्यभ्यनुज्ञाय एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति इति प्राणव्रतमतिवादित्वमनुकृष्य अपरित्यज्यैव प्राणं सत्यादिपरंपरया भूमानमवतारयन् प्राणमेव भूमानं मन्यत इति गम्यते।

कथं पुनः प्राणे भूमनि व्याख्यायमाने यत्र नान्यत्पश्यति इत्येतद्भूम्नो लक्षणपरं वचनं व्याख्यायेतेति उच्यते सुषुप्तावस्थायां प्राणग्रस्तेषु करणेषु दर्शनादिव्यवहारनिवृत्तिदर्शनात्संभवति प्राणस्यापि यत्र नान्यत्पश्यतीति एतल्लक्षणम्। तथा च श्रुतिः न श्रृणोति न पश्यति इत्यादिना सर्वकरणव्यापारप्रत्यस्तमयरूपां सुषुप्त्यवस्थामुक्त्वा प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति इति तस्यामेवावस्थायां पञ्चवृत्तेः प्राणस्य जागरणं ब्रुवती प्राणप्रधानां सुषुप्त्यवस्थां दर्शयति।

यच्चैतद्भूम्नः सुखत्वं श्रुतम् यो वै भूमा तत्सुखम् इति तदप्यविरुद्धम् अत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ यदेतस्मिञ्शरीरे सुखं भवति इति सुषुप्त्यवस्थायामेव सुखश्रवणात्। यच्च यो वै भूमा तदमृतम् इति तदपि प्राणस्याविरुद्धम् प्राणो वा अमृतम् इति श्रुतेः। कथं पुनः प्राणं भूमानं मन्यमानस्य तरति शोकमात्मवित् इत्यात्मविविदिषया प्रकरणस्योत्थानमुपपद्यते प्राण एवेहात्मा विवक्षित इति ब्रूमः।

तथाहि प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः इति प्राणमेव सर्वात्मानं करोति यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वं समर्पितम् इति च सर्वात्मत्वारनाभिनिदर्शनाभ्यां च संभवति वैपुल्यात्मिका भूमरूपता प्राणस्य। तस्मात्प्राणो भूमेत्येवं प्राप्तम्।। तत इदमुच्यते परमात्मैवेह भूमा भवितुमर्हति न प्राणः। कस्मात् संप्रसादादध्युपदेशात्।

संप्रसाद इति सुषुप्तं स्थानमुच्यते सम्यक्प्रसीदत्यस्मिन्निति निर्वचनात् बृहदारण्यके च स्वप्नजागरितस्थानाभ्यां सह पाठात्। तस्यां च संप्रसादावस्थायां प्राणो जागर्तीति प्राणोऽत्र संप्रसादोऽभिप्रेयते। प्राणादूर्ध्वं भूम्न उपदिश्यमानत्वादित्यर्थः। प्राण एव चेद्भूमा स्यात् स एव तस्मादूर्ध्वमुपदिश्येतेत्याश्लिष्टमेतत्स्यात्। न हि नामैव नाम्नो भूयः इति नाम्न ऊर्ध्वमुपदिष्टम् किं तर्हि नाम्नोऽन्यदर्थान्तरमुपदिष्टं वागाख्यम् वाग्वाव नाम्नो भूयसी इति।

तथा वागादिभ्योऽपि आ प्राणादर्थान्तरमेव तत्र तत्रोर्ध्वमुपदिष्टम्। तद्वत्प्राणादूर्ध्वमुपदिश्यमानो भूमा प्राणादर्थान्तरभूतो भवितुमर्हति।

नन्विह नास्ति प्रश्नः अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः इति नापि प्रतिवचनमस्ति प्राणाद्वाव भूयोऽस्ति इति कथं प्राणादधि भूमोपदिश्यत इत्युच्यते प्राणविषयमेव चातिवादित्वमुत्तरत्रानुकृष्यमाणं पश्यामः एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति इति तस्मान्नास्ति प्राणादध्युपदेश इति अत्रोच्यते न तावत्प्राणविषयस्यैवातिवादित्वस्यैतदनुकर्षणमिति शक्यं वक्तुम् विशेषवादात् यः सत्येनातिवदति इति।

ननु विशेषवादोऽप्ययं प्राणविषय एव भविष्यति कथम् यथा एषोऽग्निहोत्री यः सत्यं वदति इत्युक्ते न सत्यवदनेनाग्निहोत्रित्वम् केन तर्हि अग्निहोत्रेणैव तत्सत्यवदनं त्वग्निहोत्रिणो विशेष उच्यते तथा एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति इत्युक्ते न सत्यवदनेनातिवादित्वम् केन तर्हि प्रकृतेन प्राणविज्ञानेनैव सत्यवदनं तु प्राणविदो विशेषो विवक्ष्यत इति नेति ब्रूमः श्रुत्यर्थपरित्यागप्रसङ्गात्।

श्रुत्या ह्यत्र सत्यवदनेनातिवादित्वं प्रतीयते यः सत्येनातिवदति सोऽतिवदति इति नात्र प्राणविज्ञानस्य संकीर्तनमस्ति प्रकरणात्तु प्राणविज्ञानं संबध्येत तत्र प्रकरणानुरोधेन श्रुतिः परित्यक्ता स्यात् प्रकृतव्यावृत्त्यर्थश्च तुशब्दो न संगच्छेत एष तु वा अतिवदति इति। सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यम् इति च प्रयत्नान्तरकरणमर्थान्तरविवक्षां सूचयति। तस्माद्यथैकवेदप्रशंसायां प्रकृतायाम् एष तु महाब्राह्मणः यश्चतुरो वेदानधीते इत्येकवेदेभ्योऽर्थान्तरभूतश्चतुर्वेदः प्रशस्यते तादृगेतद्द्रष्टव्यम्।

न च प्रश्नप्रतिवचनरूपयैवार्थान्तरविवक्षया भवितव्यमिति नियमोऽस्ति प्रकृतसंबन्धासंभवकारितत्वादर्थान्तरविवक्षायाः। तत्र प्राणान्तमनुशासनं श्रुत्वा तूष्णींभूतं नारदं स्वयमेव सनत्कुमारो व्युत्पादयति यत्प्राणविज्ञानेन विकारानृतविषयेणातिवादित्वमनतिवादित्वमेव तत् एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति इति। तत्र सत्यमिति परं ब्रह्मोच्यते परमार्थरूपत्वात् सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इति च श्रुत्यन्तरात्।

तथा व्युत्पातिताय नारदाय सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानि इत्येवं प्रवृत्ताय विज्ञानादिसाधनपरंपरया भूमानमुपदिशति। तत्र यत्प्राणादधि सत्यं वक्तव्यं प्रतिज्ञातम् तदेवेह भूमेत्युच्यत इति गम्यते। तस्मादस्ति प्राणादधि भूम्न उपदेश इति अतः प्राणादन्यः परमात्मा भूमा भवितुमर्हतीति। एवं चेहात्मविविदिषया प्रकरणस्योत्थानमुपपन्नं भविष्यति। प्राण एवेहात्मा विवक्षित इत्येतदपि नोपपद्यते। न हि प्राणस्य मुख्यया वृत्त्यात्मत्वमस्ति।

न चान्यत्र परमात्मज्ञानाच्छोकविनिवृत्तिरस्ति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इति श्रुत्यन्तरात्। तं मा भगवाञ्शोकस्य पारं तारयतु इति चोपक्रम्योपसंहरति तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारः इति। तम इति शोकादिकारणमविद्योच्येत। प्राणान्ते चानुशासने न प्राणस्यान्यायत्ततोच्यते। आत्मतः प्राणः इति च ब्राह्मणम्। प्रकरणान्ते परमात्मविवक्षा भविष्यति भूमात्र प्राण एवेति चेत् न स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि इत्यादिना भूम्न एव आ प्रकरणसमाप्तेरनुकर्षणात्।

वैपुल्यात्मिका च भूमरूपता सर्वकारणत्वात्परमात्मनः सुतरामुपपद्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — छान्दोग्य उपनिषद् में ' भूमा त्वेव ० ' ( सनत्कुमार - हे नारद! भूमाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिए | नारद — हे भगवन्! मैं भूमाको विशेषरूप से जिज्ञासा करता हूँ ) [ तत्र सनत्कुमार ने भूमाके स्वरूपका वर्णन करते हुए कहा ] ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' ( जिसमें स्थित पुरुष दूसरेको नहीं देखता, दूसरेको नहीं सुनता, दूसरेको नहीं जानता वह भूमा है, किन्तु जहाँ कुछ अन्य देखता है, कुछ अन्य सुनता है एवं कुछ अन्य जानता है वह अल्प है ) इत्यादि कहते हैं।

यहाँ संशय होता है कि प्राण भूमा है अथवा परमात्मा? संशय क्यों होता है अर्थात् संशयका कारण क्या है? क्योंकि भूमा तो बहुतको कहते हैं। ' बहोलोंपो ० ' इस पाणिनीय सूत्रसे ' भूमा ' शब्दको भावप्रत्ययान्त कहा गया है। तो उसका बहुत्व किमात्मक है? इसप्रकार आशासे अधिककी विशेष आकांक्षाके क्रम में ' प्राणो वाव, ( प्राण ही आशासे अधिक है ) इस तरह सान्निध्यसे प्राण ही भूमा है ऐसा प्रतीत होता है।

परन्तु प्रकरणानुसार तो ' श्रुतं ह्येवं ० ' ( नारद - मैंने आप जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पारकर लेता हैं अर्थात् शोकसे मुक्त हो जाता है, और हे भगवन्! मैं शोकयुक्त हूँ, मुझको शोकसे पार कर दीजिए— शोकसे मुक्तकर दीजिए ) परमात्मा ही भूमा है, ऐसा भी प्रतीत होता है। अब इन दोनोंमें किसका ग्रहण और किसका त्याग करना युक्त है। ऐसा संशय प्राप्त होता है। तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - प्राण भूमा है किससे?

इससे कि इसके आगे - भूय आधिक्य विषयक प्रश्न और उत्तरकी परंपराका दर्शन नहीं होता है। जैसे कि ' अस्ति भगव ० ' ( नारद --- हे भगवन्! क्या नामसे भी कुछ अधिक है? ) ' वावाव ० ' ( सनत्कुमार- वाणी ही नामसे अधिक है ) और ' अस्ति भगवो ० ' ( नारद - हे भगवन्! वाणीसे कोई अधिक है? ) ' मनो वाव ० ' ( सनत्कुमार- —-मन ही वाणीसे अधिक ( बढ़कर ) है | इस प्रकार नाम आदिसे लेकर प्राणतक क्रमशः अधिकता विषयक प्रश्न और उत्तरका प्रवाह प्रवृत्त है, किन्तु प्राणके आगे ' हे भगवन्! प्राणसे अधिक कुछ है?

' निश्चय, यह प्राणसे अधिक है ; इस प्रकार और आगे अधिकका प्रश्न और प्रतिवचन क्रम नहीं दिखाई देता। परन्तु ' प्राणो वा ० ' ( प्राण हो आशासे अधिक है ) इत्यादिसे विस्तारपूर्वक प्राणको ही नाम आदिसे लेकर आशा पर्यन्त समस्त पदार्थोंसे अधिक कहकर ' अतिवाद्यसी ० ' ( तुम अतिवादी हो?

किसीके ऐसा प्रश्न करनेपर ' मैं श्रेष्ठवादी हूँ ' ऐसा कहे, अपने अतिवादी होनेका निषेध न करे ) इस प्रकार प्राणदर्शीमें अतिवादिता स्वीकार कर ' एष तु वा ० ' ( निश्चय यह अतिवादी होता है जो सत्यसे अतिवादी होता है ) इस प्रकार अतिवादित्व प्राणव्रतकी अनुवृत्ति करके प्राणका परित्याग किये विना ही सत्य आदि परम्परासे भूमाका अवतरण करते हुए सनत्कुमार प्राणको ही भूमा मानते हैं, ऐसा ज्ञात होता है।

यदि प्राणका ही भूमारूप से व्याख्यान करें तो ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' भूमाके लक्षण परक इस वाक्यका किस प्रकार व्याख्यान करोगे? तो इसके उत्तर में पूर्वपक्षी कहता है कि सुषुप्ति अवस्था में प्राणमें लीन हुए इन्द्रियोंका दर्शनादि व्यवहार निवृत्त हुआ देखा जाता है। इसलिए ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' ( जहाँ अन्यको नहीं देखता ) इस प्रकार भूमाका स्वरूप प्रतिपादक यह लक्षण प्राणमें मी सम्भव है।

क्योंकि ' न शृणेति न पश्यति ' ( सुषुप्त पुरुष देखता नहीं सुनता नहीं ) इत्यादिसे श्रुति जिसमें सब इन्द्रियों के व्यापार अस्त हो जाते हैं उस अस्तमय रूप सुषुप्ति अवस्थाको कहकर ' प्राणाग्नय ' ( प्राणरूप अग्नियाँ ही इस शरीर में जागती हैं- स्व व्यापार करती हैं ) इस प्रकार उसी अवस्थामें पाँच वृत्तिवाले प्राणका जागरण - कहती हुई प्राण प्रधान सुषुप्ति अवस्थाको दिखलाती है।

और ' यो वै भूमा ० " ' ( निश्चय जो भूमा है वह सुख है ) इस प्रकार श्रुति भूमाको सुखरूप कहती है वह भी विरुद्ध नहीं . है, क्योंकि ' अत्रैष देवः ० ' ( उस समय यह देव - जीव स्वप्न नहीं देखता, उस समय शरीर में यह सुख सम्पन्न होता है ) इस प्रकार सुषुप्ति अवस्थामें सुखका श्रवण होता है। और ' यो वै भूमा ० ' ( निश्चय जो भूमा है वह अमृत है ) वह अमृतत्व भी प्राण में विरुद्ध नहीं है, क्योंकि ' प्राणो वा ० ' ( प्राण ही अमृत है ) ऐसी श्रुति है।

सि ० परन्तु प्राणको भूमा माननेवालेके पक्ष में ' तरति शोक ० ' ( आत्मवेत्ता शोकसे मुक्त हो जाता है ) इस आत्मविज्ञानकी इच्छासे प्रकरणका आरम्भ कैसे उपपन्न होगा? पू ० - ऐसा हम कहते हैं कि यहाँ प्राण ही आत्मरूप से विवक्षित है, क्योंकि ' प्राणो ह पिता ० ' ( प्राण ही पता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है ) यह श्रुति प्राणको ही सर्वस्वरूप ( सबका आत्मा ) कहती है।

और ' यथा वा अरा ० ' ( जैसे नाभि अरा अर्पित हैं, वैसे प्राण में सब समर्पित है ) इस प्रकार सर्वात्मकता और अर नाभिके दृष्टान्तसे प्राणमें विपुलस्वरूपता - भूमरूपता सम्भव है। इसलिए प्राण भूमा है ऐसा प्राप्त होता है। सिद्धान्ती — इसपर यह कहते हैं - परमात्मा ही यहाँ भूमा होना युक्त है प्राण नहीं, क्योंकि संप्रसादके अनन्तर भूमाका उपदेश है। जिसमें अच्छी तरहसे प्रसन्न होता है वह संप्रसाद है, इस व्युत्पत्ति संप्रसाद सुषुप्ति स्थानको कहा जाता है।

वृहदारण्यकमें स्वप्न और जाग्रत्स्थानोंके साथ इसका भी पाठ है। और उस संप्रसाद अवस्था में प्राण जागता - स्वव्यापार करता है, इसलिए यहाँ संप्रसादशब्दसे [ लक्षणावृत्तिसे ] प्राण अभिप्रेत है। प्राणके अनन्तर भूमाका उपदेश किये जानेसे भूमा परमात्मा है, ऐसा अर्थ है।

यदि प्राण ही भूमा हो तो वही प्राणके अनन्तर उपदिष्ट हो यह असंगत हो जायगा, क्योंकि नाम ही नामसे अधिक है इस प्रकार नामके अनन्तर नामका उपदेश नहीं है, किन्तु ' वाग्वाव ' ( वाणी ही नामसे अधिक है ) इस प्रकार नामसे भिन्न वाग्नामक अर्थान्तर उपदिष्ट है। तथा वाणी आदिसे लेकर प्राण पर्यन्त तत् तत् स्थलपर आगे - आगे अन्यान्य पदार्थका ही उपदेश किया गया है। उसीके समान प्राणके अनन्तर उपदिश्यमान भूमा प्राणसे अन्य पदार्थ होना युक्त है। पू ० – परन्तु यहाँ ' हे भगवन्! प्राणसे अधिक क्या है?

' ऐसा प्रश्न नहीं है और ' प्राणसे यह अधिक है ' इस प्रकारका कोई उत्तर भी नहीं है, तो प्राणके अनन्तर भूमाका उपदेश है यह कैसे कहते हो? और ' एष तु वा ० ' ( जो सत्यसे अतिवादी है वही अतिवादी है ) इस प्रकार प्राणविषयक अतिवादित्वकी ही आगे अनुवृत्ति हम देखते हैं, इसलिए प्राणके अनन्तर किसी अन्य पदार्थका उपदेश नहीं है। सि ० – इस विषय में कहते हैं - प्राण विषयक अतिवादित्वका ही यह अनुकर्षण है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ' यः सत्येन ० ' ( जो सत्यसे अतिवादी है ) इस तरहका विशेषवाद है।

पू ० – परन्तु यह विशेषवाद भी प्राण विषयक ही होगा। कैसे? जैसे कि ' यह afrat है जो सत्य बोलता है ' ऐसा कहनेसे सत्यवदनसे अग्निहोत्रत्व नहीं होता, किन्तु अग्निहोत्रसे . ही होता है, सत्यवाद तो अग्निहोत्रीकी विशेषता कही जाती है। उसी प्रकार ' एष तु वा ० ' ( जो सत्यवादी है वह निश्चित अतिवादी है ) ऐसा कहने से सत्यभाषणसे कोई अतिवादी नहीं होता किन्तु प्रकृत प्राणविज्ञानसे ही अतिवादी होता है। सत्यवाद तो प्राणवेत्ताका विशेषरूप विवक्षित है।

सिद्धान्ती - हम कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे तो श्रुतिके अर्थके परित्यागका प्रसंग उपस्थित होगा। ' यः सत्येन ० ' ( जो सत्यसे अतिवादी है वह अतिवादी है ) इसप्रकार यहाँ श्रुति द्वारा सत्यवादसे ही अतिवादित्व प्रतीत होता है। यहाँ प्राणविज्ञानका संकीर्तन भी नहीं है। यदि प्रकरण से प्राणविज्ञानका सम्बन्ध करें तो प्रकरणके बलसे श्रुतिका परित्याग हो जायगा। और ' एष तु वा अतिवदति ' ( यह तो अतिवादी है ) इसमें प्रकृतकी व्यावृनिके लिए ' तु ' शब्द संगत नहीं होगा।

' सत्यं त्वेव ० ' ( सनत्कुमार - सत्यकी ही तो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिए ) इस तरहसे अन्य प्रयत्न ( विचार ) का विधान अन्य अर्थकी विवक्षाको सूचित करता है, जैसे एक वेदकी प्रशंसा प्रस्तुत होनेपर जो चार वेदोंका अध्ययन करता है ' यह तो महाब्राह्मण है ' इसमें एक वेद अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणोंसे अर्थान्तर चतुर्वेदवेत्ताकी प्रशंसा होती है। उसीप्रकार प्रकरण में सत्यकी जिज्ञासा भी प्राणसे भिन्न भूमाको हो समझनी चाहिए।

प्रश्न और उत्तरके रूपमें अन्य अर्थ विवक्षा होनी चाहिए यह नियम नहीं है, क्योंकि अन्य अर्थको विवक्षा तो प्रकृत पदार्थका सम्बन्ध न होने से होती है। अर्थान्तरकी विवक्षा रहनेपर भी नामादिसे लेकर प्राणपर्यन्त उपदेश सुनकर तूष्णींभूत नारदको स्वयं हो सनत्कुमार समझाते हैं कि ' एष तु वा ० ' ( जो सत्यसे अतिवादी है वही अतिवादी

अतिवादित्व है वह अतिवादित्व नहीं है, इस श्रुतिमें है ) जो विकार और अनृत विषयक प्राणविज्ञानसे

परमार्थरूप है। कारण कि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' सत्यम् ' इससे परब्रह्म कहा जाता है, क्योंकि वह

दूसरी श्रुति भी है। [ सत्य ब्रह्म है ] यह जानकर ( ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है ) इसप्रकार यह

मैं सत्यसे अतिवादी होऊँ ) इसप्रकार प्रवृत्त हुए सावधान हुए और ' सो s हं भगवः ० ' ( हे भगवन्! व्युत्पादित ( समझाये गये ) नारदके प्रति विज्ञानादि

( निदिध्यासनादि ) साधन परम्परासे [ सनत्कुमार ] भूमाका उपदेश करते हैं। भूमाका उपदेश प्रस्तुत

होनेपर प्राणके अनन्तर जिस सत्य वक्तव्य [ सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यम् ] की प्रतिज्ञा की गई है

वही यहाँ विषयवाक्यमें भूमा कहा गया है ऐसा

उपदेश है। इसलिए प्राणसे भिन्न परमात्मा ही ज्ञात होता है, अत : प्राणके अनन्तर भूमाका भूमा होना युक्त है। इसप्रकार यहाँ आत्माका विज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकरणका आरम्भ भी संगत हो होगा। प्राण ही यहाँ आत्मरूपसे विवक्षित है यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि मुख्यवृत्ति प्राण आत्मा नहीं है। परमात्मा के ज्ञानके विना अन्य किसी प्रकारसे शोककी निवृत्ति नहीं होती, कारण कि ' नान्य : ० ' ( इससे भिन्न मोक्ष प्राप्तिके लिए कोई अन्य मार्ग - साधन नहीं है ) ऐसी दूसरी श्रुति है।

तं मा भगवान् ० ' ( ऐसे शोक युक्त मुझे आप शोकसे पार कर दीजिए ) ऐसा आरम्मकर ' तस्मै मृदितकषायाय ० ' ( राग, द्वेष आदि दोषोंसे रहित नारदको भगवान् सनत्कुमारने अविद्यारूप तमसे पार परमार्थतत्त्वको दिखलाया ) इसप्रकार उपसंहार करते हैं। ‘ तमः ’ इस शब्दसे शोकादिक कारणभूत अविद्या कही जाती है। यदि प्राण पर्यन्त ही उपदेश होता तो प्राण में अन्यकी अधीनता न कही होती, और ' आत्मतः प्राणः ' ( आत्मासे प्राण उत्पन्न हुआ ) यह ब्राह्मणवाक्य है। प्रकरण के अन्त में परमात्माकी विवक्षा होगी।

भूमा तो प्राण ही है, यदि ऐसा कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ' स भगवः ० ' ( नारद - हे भगवन्! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है? सनत्कुमार — अपनी महिमा में ) इत्यादि प्रकरणको समाप्ति पर्यन्त भूमाकी ही अनुवृत्ति है। विपुलात्मकतारूप भूमरूपता भी सबका कारण होने से परमात्मामें ही सुतरां उपपन्न होती है॥ ८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वमें आत्मशब्दके बलसे द्यु, भू आदिका अधिष्ठान ब्रह्म कहा गया है। वह युक्त नहीं है, क्योंकि ' तरति शोकमात्मवित् ' यहाँपर अब्रह्म प्राण में आत्मशब्दका प्रयोग है। इस आक्षेप संगति से इस अधिकरणका आरम्भ है। यहाँ भूमा शब्दका मुख्य अर्थं तो बहुत है, क्योंकि ' बहोर्लोपो भू च बहोः इस पाणिनीय सूत्रसे ' बहु ' के स्थानमें ' भू ' आदेश हुआ है, और ' भू ' शब्दके उत्तर ' पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा ' इस सूत्र से मात्र अर्थमें ' इमनिच् ' प्रत्यय होकर ' भूमन् ' ( भूमा ) शब्द निष्पन्न हुआ है। ' भूमन् ' शब्दका अर्थ बहुत है। यहाँ श्रुतिमें प्राण और परमात्मा दोनो में भूमा शब्दका प्रयोग देखनेमें आता है, अतएव सन्देह होता है कि भूमा शब्दसे किसका ग्रहण करना चाहिए।

* नारद --हे भगवन्! नामसे अधिक क्या है? सनत्कुमार - वाणी ही नामसे अधिक है। वाणी से अधिकं? मन, मनसे अधिक? चित्त, चित्तसे अधिक? ध्यान, ध्यानसे अधिक? विज्ञान - शास्त्रीय ज्ञान, विज्ञानसे अधिक? बल - शास्त्र के अर्थका प्रतिभास, बलसे अन्न, अन्नसे जल, जलसे तेज, तेजसे आकाश, आकाशसे स्मृति, क्योंकि स्मृति होनेपर ही ईश्वरसे आकाश आदिकी उत्पत्ति होती है। स्मृतिसे अधिक आशा है ; आशाके होनेपर ही स्मृति बनी रहती है। ' प्राणो वा आशाया भूयान् ' ( प्राण ही आशासे महान् है ) प्राणके होनेपर ही आशा रहती है। इस प्रकार नारद और सनत्कुमारका आधिक्य विषयक प्रश्नोत्तर प्राण पर्यंन्त ही हुआ है आगे नहीं। प्रणवेत्ताको ही श्रेष्ठवादी कहा गया है। इसलिए सबसे महान् होनेसे प्राण भूमा है।

* ' गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचन आहवनीयः प्राणः ' ( यह अपान गार्हपत्य, व्यान अन्वाहार्यपचन और प्राण आहवनीय है ) इस श्रुतिमें प्राण आदिका अग्निरूपसे प्रतिपादन किया गया है, इसलिए सुषुप्ति अवस्था में मन आदि सब इन्द्रियों का दर्शन आदि व्यापार न रहनेपर भी प्राणरूप अग्नियाँ शरीर में अपना व्यापार करती रहती हैं। इस प्रकार ' यत्र नान्यत्पश्यति ' इस श्रुति प्रतिपादित भूमा लक्षणका प्राणमें समन्वय होता है। और जो ' यो वै भूमा तदमृत, प्राणो वा अमृतम् ' इत्यादि श्रुतियाँ प्राणको अमृतरूप कहती हैं, इसलिए प्राण में भूमा शब्द विरुद्ध नहीं है।

* ‘ ब्रह्म भूमा मवितुमर्हति संप्रसादादध्युपदेशात् ' यन्नैवं तन्नैतं यथा घटः ' ' ब्रह्म भूमा होना युक्त है, क्योंकि संप्रसाद - प्राणके अनन्तर उसका उपदेश है, जहाँ हेतु नहीं है वहाँ साध्य भी नहीं है, जैसे घट ' यह व्यतिरेक दृष्टान्त है। इस प्रकार इस अनुमानसे भी ब्रह्म भूमा सिद्ध होता है।

* ' सत्येन अतिवदति ' यहाँ सत्यशब्द से सत्यब्रह्मको लेकर ही अतिवादित्व कहा गया है। किञ्च सत्यके जिज्ञासारूप लिङ्गसे भी प्राणके प्रकरणका बाध होता है। जो यह कहा गया है कि

के भेद अर्थका भेद होता है यह नियम नहीं हैं, क्योंकि एक ही आत्मा के विषय में मैत्रयीने बहुत वार प्रश्न किये हैं। इसके अतिरिक्त भगवान् माष्यकार द्वारा उदाहृत चतुर्वेदवित् प्रकृत एक वेदवित्से मिन है यह प्रश्न के विना भी सिद्ध होता है।

* ' आत्मतः प्राणः ' इत्यादि श्रुतिमें प्राणको उत्पत्ति कही गई है, इसलिए वह मुख्यवृत्तिसे आत्मा नहीं है। इसप्रकार श्रुति और लिङ्गके वलसे अर्थात् महाप्रकरणसे

प्राणका अवान्तर प्रकरण बाधित है | अतः प्राण भूमा नहीं है किन्तु वस्तुतः परमात्मा ही भूमा है।

पूर्वपक्ष में प्राणकी उपासना फल है और सिद्धान्तमें ब्रह्मज्ञान फल है॥ ८

1.3.9 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ९

सूत्र १.३.९

धर्मोपपत्तेश् च ॥ १.३.९ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 246

पदच्छेद — धर्मोपपत्तेः च

सूत्रार्थ — ' यत्र नान्यत्पश्यति ' इत्यादि श्रुति प्रतिपादित दर्शन आदि व्यवहारका अभावरूप भूमाके धर्मोकी परमात्मामें उपपत्ति होनेसे भूमा परमात्मा ही है।

शाङ्करभाष्य

अपि च ये भूम्नि श्रूयन्ते धर्माः ते परमात्मन्युपपद्यन्ते। यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा इति दर्शनादिव्यवहाराभावं भूमनि अवगमयति। परमात्मनि चायं दर्शनादिव्यवहाराभावोऽवगतः यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् इत्यादिश्रुत्यन्तरात्। योऽप्यसौ सुषुप्त्यवस्थायां दर्शनादिव्यवहाराभाव उक्तः सोऽप्यात्मन एवासङ्गत्वविवक्षयोक्तः न प्राणस्वभावविवक्षया परमात्मप्रकरणात्। यदपि तस्यामवस्थायां सुखमुक्तम् तदप्यात्मन एव सुखरूपत्वविवक्षयोक्तम् यत आह एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति। इहापि यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखम् इति सामयसुखनिराकरणेन ब्रह्मैव सुखं भूमानं दर्शयति। यो वै भूमा तदमृतम् इत्यमृतत्वमपीह श्रूयमाणं परमकारणं गमयति विकाराणाममृतत्वस्यापेक्षिकत्वात् अतोऽन्यदार्तम् इति च श्रुत्यन्तरात्। तथा च सत्यत्वं स्वमहिमप्रतिष्ठितत्वं सर्वगतत्वं सर्वात्मत्वमिति चैते धर्माः श्रूयमाणाः परमात्मन्येवोपपद्यन्ते नान्यत्र। तस्माद्भूमा परमात्मेति सिद्धम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और दूसरी बात यह है कि भूमाके जो धर्मं श्रुतिमें प्रतिपादित हैं वे परमात्मामें उपपन्न होते हैं। ' यत्र नान्यत्पश्यति ० ' ( जहाँ दूसरेको नहीं देखता, दूसरेको नहीं सुनता और दूसरेको नहीं जानता वह भूमा है ) यह श्रुति भूमामें दर्शन आदि व्यवहारके अभावको अवगत कराती है। ' यत्र त्वस्य ० ' ( जहाँ इस विद्वान् के लिए सब आत्मा ही हो गया वहाँ किस करण से किस विषयको देखे ) इस दूसरी श्रुतिसे परमात्मामें दर्शन आदि व्यवहारका अभाव प्रतीत होता है।

सुषुप्त अवस्था में जो वह दर्शनादि व्यवहारका अभाव कहा गया है वह भी आत्माकी असंगताकी विवक्षासे कहा गया है, न कि प्राण स्वभावकी विवक्षासे, क्योंकि परमात्माका प्रकरण है। उस अवस्था में जो भी सुख कहा गया है वह भी आत्मा सुख स्वरूप है इस विवक्षा से ही कहा गया है।

क्योंकि कहते हैं - ' एषोऽस्य ० ' ( यह इसका परम आनन्द है, इस आनन्दके अंशके आश्रित अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ) यहाँ भी ' यो वै भूमा ० ' ( निश्चय जो भूमा है वह सुख है, अल्पमें सुख नहीं है, भूमा ही सुखरूप है ) इसप्रकार सामयसुख ( नाश आदि दोषयुक्त - सामयसुख ) के निराकरणसे सुखरूप भूमा ब्रह्मको ही दिखलाती है। ' यो वै भूमा ० ' ( निश्चय जो भूमा है वह अमृत है ) इस श्रुति में श्रूयमाण अमृतत्व भी परमकारणका ज्ञान कराता है, क्योंकि [ प्राण आदि ] विकारोंका अमृतत्व आपेक्षिक है।

जैसे ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( इस आत्मासे भिन्न सब विनाशी - मिथ्या है ) यह दूसरी श्रुति है। इसप्रकार सत्यत्व, अपनी महिमामें प्रतिष्ठा, सर्वगतत्व और सर्वात्मत्व ये श्रूयमाण धर्म परमात्मा में ही उपपन्न होते हैं, दूसरे में नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि भूमा परमात्मा हो है॥। ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * वादीने सुषुप्त अवस्थाको लेकर सुख आदि प्राणके धर्म माने हैं,

वह भी अयुक्त है, क्योंकि बुद्धि आदि उपाधि रहनेपर आत्मामें द्रष्टृत्व आदि व्यवहार होता है।

सुषुप्ति में उपाधिके विलय होनेपर आत्मामें द्रष्टृत्व आदि व्यवहार नहीं होता। इसप्रकार आत्माको

असंग सिद्ध करनेके लिए

गया है एवं आत्माको ही प्रश्नोपनिषद् में परमात्माको लक्ष्यकर ' न शृणोति ' इत्यादि वर्णन किया सुखरूप कहा गया है प्राणको नहीं। इस बातको स्पष्ट करनेके लिए भगवान् भाष्यकार ' यत आह ' आदि अन्य श्रुतियोंको भी उद्धृत करते हैं।

' सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यम् ' इस श्रुतिमें सत्यत्व, ' स भगवः कस्मिन्प्रतिष्टित इति स्वमहिम्नि ' इस मन्त्रमें श्रूयमाण स्वमहिमामें प्रतिष्ठितत्व, ' स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् ' ( छा ० ७।२५।१ ) ( वही नीचे और वही ऊपर है ) इत्यादि में सर्वगतत्त्र, ' स एवेदं सर्वम् ' ( छा ० ७।५।१ ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इत्यादि मन्त्रमें श्रूयमाण सर्वात्मत्व, ये सब धर्मं मुख्यवृत्तिसे परमात्मामें युक्त हैं, प्राणादिमें नहीं। इससे यह सिद्ध हुआ कि भूमा परमात्मा ही है॥ ९

अक्षराधिकरणम्

1.3.10 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १०

सूत्र १.३.१०

अक्षरम् अम्बरान्तधृतेः ॥ १.३.१० ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 247

पदच्छेद — अक्षरम् , अम्बरान्तधृतेः

सूत्रार्थ — ( अक्षरम् ) ' एतद्वै तदक्षरं गार्गि ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित अक्षर ब्रह्म ही है, ( अम्बरान्तधृतेः ) क्योंकि पृथिवी से लेकर आकाश पर्यन्त सब विकारोंको वही धारण करता है।

शाङ्करभाष्य

कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च पोतश्चेति स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनणु इत्यादि श्रूयते। तत्र संशयः किमक्षरशब्देन वर्ण उच्यते किं वा परमेश्वर इति। तत्राक्षरसमाम्नाय इत्यादावक्षरशब्दस्य वर्णे प्रसिद्धत्वात् प्रसिद्ध्यतिक्रम्य चायुक्तत्वात् ओंकार एवेदं सर्वम् इत्यादौ च श्रुत्यन्तरे वर्णस्याप्युपास्यत्वेन सर्वात्मकत्वावधारणात् वर्ण एवाक्षरशब्द इत्येवं प्राप्ते उच्यते पर एवात्माक्षरशब्दवाच्यः। कस्मात् अम्बरान्तधृतेः पृथिव्यादेराकाशान्तस्य विकारजातस्य धारणात्। तत्र हि पृथिव्यादेः समस्तविकारजातस्य कालत्रयविभक्तस्य आकाश एव तदोतं च प्रोतं च इत्याकाशे प्रतिष्ठितत्वमुक्त्वा कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च इत्यनेन प्रश्नेनेदमक्षरमवतारितम् तथा चोपसंहृतम् एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च इति। न चेयमम्बरान्तधृतिर्ब्रह्मणोऽन्यत्र संभवति। यदपि ओंकार एवेदं सर्वम् इति तदपि ब्रह्मप्रतिपत्तिसाधनत्वात्स्तुत्यर्थं द्रष्टव्यम्। तस्मिन्न क्षरति अश्नुते चेति नित्यत्वव्यापित्वाभ्यामक्षरं परमेव ब्रह्म।। स्यादेतत् कार्यस्य चेत्कारणाधीनत्वमम्बरान्तधृतिरभ्युपगम्यते प्रधानकारणवादिनोऽपीयमुपपद्यते कथमम्बरान्तधृतेर्ब्रह्मत्वप्रतिपत्तिरिति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — * ' कस्मिन्नु खल्वाकाश • ( गार्गी - किन्तु आकाश किसमें ओत प्रोत है? उस याज्ञवल्क्यने कहा— हे गार्गि! जिसे तुम पूछती हो, उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता अक्षर कहते हैं, वह न स्थूल है न सूक्ष्म ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं। यहाँ पर संशय होता है कि अक्षर शब्दसे वर्णका कथन है अथवा परमेश्वरका? पूर्वपक्षी— ' तत्राक्षरसमाम्नाय ' इत्यादिमें अक्षर शब्द वर्ण में प्रसद्धि है ; प्रसिद्धिका अतिक्रमण करना युक्त नहीं है, और ' ॐकार एवेदं ० ' ( यह सब ओंकार ही है ) इत्यादि अन्य श्रुतियोंमें उपास्यरूपसे वर्णंमें भी सर्वात्मकत्वका अवधारण है। इसलिए अक्षरशब्द वर्णवाचक ही है।

सिद्धान्ती --- ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - परमात्मा ही अक्षर शब्द वाच्य है, किससे? इससे कि वह आकाशपर्यंन्तको धारण करता है अर्थात् पृथिवी आदिसे लेकर आकाशपर्यंन्त विकार समूहको धारण करता है। भूत, भविष्यत्, वर्तमान इन तीन कालोंमें विभक्त हुए पृथिवी आदि समस्त विकार समूहको ' आकाश एव ' ( आकाश में ही वह ओत प्रोत है ) इस प्रकार आकाश में प्रतिष्ठितत्वको कहकर ‘ कस्मिन्न खल्वाकाशः ० ' ( आकाश किसमें ओत प्रोत है? ) इस प्रश्नसे इस अक्षरका उपनिषद् में अवतरण कियाँ गया है। और ' एतस्मिन्नु ० ' ( हे गागि! इस अक्षरमें आकाश ओत प्रोत है ) इस प्रकार उपसंहार किया है। इस आकाश पर्यन्तको धारण करना ब्रह्मको छोड़कर अन्यमें सम्भव नहीं। ॐकार एवेदं ० ' ( ओंकार यह सब है ) वह कथन भी ब्रह्मज्ञानका साधन होनेसे स्तुति के लिए समझना चाहिए। इसलिए ' न क्षरत्यश्नुते ० ' ( नष्ट नहीं होता और सर्वव्यापक है ) इस व्युत्पत्ति से सिद्ध होता है कि नित्य और व्यापक होनेके कारण अक्षर पर ब्रह्म ही है॥ १०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * लोक प्रसिद्धिके अनुसार वर्ण, और ' न क्षरतीति अक्षरः ' अर्थात् अविनाशी, इस विग्रहके अनुसार परमात्मा इन दो अर्थों में अक्षर शब्दका प्रयोग किया जाता है। अतः अक्षरशब्दसे वर्णका ग्रहण करना चाहिए अथवा परमात्माका पूर्वपक्षी - अक्षरशब्द से वर्णका ही ग्रहण करना चाहिए। यद्यपि ' नक्षरतीति अक्षर : ' इस विग्रहके अनुसार नित्य पदार्थका भी ग्रहण किया जा सकता है,

तो मी योगसे रूढ़ि बलवती होनेसे वर्णका हो ग्रहण करना ठीक है। ' ओंकार एव इदं सर्वम् ' इस श्रुति के आधार पर अक्षर सर्वात्मक सिद्ध होता है। दूसरी बात यह भी है कि लोक में वर्णोंमें ही अक्षर शब्द प्रसिद्ध है। संशयका कारण यह है कि अक्षरशब्द वेदोंमें ब्रह्म और ओंकार में प्रसिद्ध है और लोकमें वर्णोंमें। अतः इस आधार पर भगवान् भाष्यकारने ओंकारका अक्षरशब्दसे ग्रहणकर आगे निराकरण भी किया है। पूर्वं अधिकरण में सत्य शब्द ब्रह्ममें रूढ़ होनेसे भूमा ब्रह्म है, यह कहा गया है, उसी प्रकार यहाँ अक्षरशब्द वर्ण में रूढ होनेसे वर्ण ही अक्षर होना चाहिए, इस प्रकार दृष्टान्तसंगति से पूर्वपक्ष करते हैं। पूर्वपक्ष में ओंकारकी उपासना फल है, सिद्धान्तमें निर्गुण ब्रह्मका ज्ञानफल है।

* सिद्धान्ती - गार्गी और याज्ञवल्क्य इन दोनोंके प्रश्न और प्रतिवचनके विचार करनेसे यह निश्चय होता है कि रूढ़िको बाधकर यौगिक अक्षरशब्दसे परमात्मा ही सिद्ध होता है, क्योंकि परमात्मा ही आकाश आदि सर्व प्रपञ्चको धारण कर सकता है, अन्य सामान्य अक्षर शब्द वाच्य वर्ण नहीं। ' ॐकार एवेदं सर्वम् ' इस मन्त्रमें जो ॐकारको सर्वात्मक कहा गया है वह भी परमात्माका वाचक होनेके कारण नाम और नामीमें अभेद मानकर कहा गया है। समस्त मिथ्याप्रपञ्चान्तर्वर्ती वर्णात्मक स्वयं ॐकार मी ब्रह्म में अध्यस्त है, अतः अक्षरशब्दसे परब्रह्मका ही ग्रहण करना चाहिए वर्णात्मक ओंकारका नहीं।। १०

1.3.11 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ११

सूत्र १.३.११

सा च प्रशासनात् ॥ १.३.११ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.११ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 249

पदच्छेद — सा , च , प्रशासनात्

सूत्रार्थ — - ( सा च ) और वह अम्बरान्तधृति परमेश्वरका ही कर्म है, ( प्रशासनात् ) क्योंकि ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ० ' इस श्रुतिमें प्रशासनका कथन है।

शाङ्करभाष्य

सा च अम्बरान्तधृतिः परमेश्वरस्यैव कर्म। कस्मात् प्रशासनात्। प्रशासनं हीह श्रूयते एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः इत्यादि। प्रशासनं च पारमेश्वरं कर्म न अचेतनस्य प्रशासनं भवति। न ह्यचेतनानां घटादिकारणानां मृदादीनां घटादिविषयं प्रशासनमस्ति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह शङ्का होती है कि आकाश पर्यन्त कार्यको कारणके अधीन रहना ही यदि अम्बरान्तधृतिका अर्थं है यह स्वीकार किया जाय तो प्रधान कारणवादीके प्रधानमें भी अम्बरान्तधृति उपपन्न हो सकती है। आकाश पर्यन्त धारण करनेसे अक्षर ब्रह्म ही है यह प्रतिपत्ति कैसे होती है? इस शङ्काके समाधानमें कहते हैं-

और यह आकाश पर्यंन्तका धारण करना परमेश्वरका ही कर्म है, क्योंकि श्रुति में प्रशासनका कथन है। ‘ एतस्य वा अक्षरस्य ० ' ( हे गार्गि! इस अक्षर के अनुशासनमें सूर्य, चन्द्रमा विशेषरूपसे धारित हुए स्थित रहते हैं ) इत्यादि यहाँ प्रशासनकी ही श्रुति है। प्रशासन परमेश्वरका कर्म है। अचेतन प्रधानमें प्रशासनका सम्भव नहीं है, क्योंकि घटादिके कारणभूत अचेतन मृदादिमें घटादि विषयक अनुशासन नहीं है।। ११

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गार्गीके प्रथम प्रश्नके उत्तर में सम्पूर्ण कार्य प्रपञ्च का आश्रय आकाश बतलाया गया है। परन्तु आकाश तो स्वयं भी कार्य होनेसे यावत्कार्यका आश्रय नहीं हो सकता और आत्माश्रय दोष भी होता है, अतः यहाँ आकाशशब्दसे जगत् के मूल कारण अज्ञानका ग्रहण करना चाहिए, उस अज्ञानको एक प्रकारसे सांख्य लोग प्रधान कहते हैं। अतः इस प्रकरण में अक्षरको प्रधानका भी आश्रय कहा गया है, इसलिए परमात्मा ही उसका अधिष्ठान है॥ ११

1.3.12 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १२

सूत्र १.३.१२

अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १.३.१२ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 249

पदच्छेद — अन्यभावव्यावृत्तेः , च

सूत्रार्थ — प्रधानादिके धर्म - अचेतनत्वादि रहित होनेसे मी अक्षर परब्रह्म ही है प्रधान नहीं।

शाङ्करभाष्य

अन्यभावव्यावृत्तेश्च कारणाद्ब्रह्मैवाक्षरशब्दवाच्यम् तस्यैवाम्बरान्तधृतिः कर्म नान्यस्य कस्यचित्। किमिदम् अन्यभावव्यावृत्तेरिति अन्यस्य भावोऽन्यभावः तस्माद्व्यावृत्तिः अन्यभावव्यावृत्तिरिति तस्याः। एतदुक्तं भवति यदन्यद्ब्रह्मणोऽक्षरशब्दवाच्यमिहाशङ्क्यते तद्भावात् इदमम्बरान्तविधारणमक्षरं व्यावर्तयति श्रुतिः तद्वा एतदक्षरं गार्गि अदृष्टं द्रष्टृ अश्रुतं श्रोतृ अमतं मन्तृ अविज्ञातं विज्ञातृ इति। तत्रादृष्टत्वादिव्यपदेशः प्रधानस्यापि संभवति द्रष्टृत्वादिव्यपदेशस्तु न तस्य संभवति अचेतनत्वात्। तथा नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ इत्यात्मभेदप्रतिषेधात् न शारीरस्याप्युपाधिमतोऽक्षरशब्दवाच्यत्वम् अचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनः इति चोपाधिमत्ताप्रतिषेधात्। न हि निरुपाधिकः शारीरो नाम भवति। तस्मात्परमेव ब्रह्माक्षरमिति निश्चयः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अन्यभाव व्यावृत्तिरूप कारणसे भी ब्रह्म ही अक्षर शब्द वाच्य है। आकाश पर्यन्त धारण करना उसका ही कर्म है किसी अन्यका नहीं। यह अन्यभावव्यावृत्ति क्या है? अन्यका भाव अन्यभाव अर्थात् दूसरेका धर्मं, उससे जो भेद, उसे अन्यभावव्यावृत्ति कहते हैं। तात्पर्य यह है कि ब्रह्मसे भिन्न दूसरा अर्थं अक्षर शब्द वाच्य है ऐसी जो यहाँ आयका की जाती है, परन्तु ' तद्वा एतदक्षरं ० ' ( हे गार्गि!

वह यह अक्षर स्वयं दृष्टिका विषय नहीं है किन्तु द्रष्टा है, श्रवणका विषय नहीं किन्तु श्रोता है, मननका विषय नहीं किन्तु मन्ता है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है ) यह श्रुति अन्यके स्वरूपसे उस आकाश पर्यन्त धारण करनेवाले अक्षरकी व्यावृत्ति करती है। इसमें अदृष्टत्वादि व्यपदेश प्रधानमें भी सम्भव है। परन्तु द्रष्टृत्वादि व्यपदेश इसमें सम्भव नहीं है, क्योंकि वह अचेतन है।

इसी प्रकार ' नान्यदतोऽस्ति ० ' ( इस प्रकृत अक्षरसे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं ) यह श्रुति आत्मासे मिन वस्तुका प्रतिषेध करती है। इसलिए उपाधियुक्त जीव भी अक्षर शब्द वाच्य नहीं है। क्योंकि ' अचक्षुष्क ० ' ( वह चक्षु रहित, श्रोत्र रहित, वाणी रहित तथा मन रहित है ) इस प्रकार श्रुति अक्षरमें उपाधिमत्त्वका प्रतिषेध किया है। उपाधिके विना जीवभाव सम्भव नहीं।

इससे निश्चित होता है कि अक्षर शब्द वाच्य परब्रह्म ही है || १२ |

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.३.१३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

ईक्षतिकर्मव्यपदेशाधिकरणम्

1.3.13 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १३

सूत्र १.३.१३

ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॥ १.३.१३ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 250

पदच्छेद — ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः

सूत्रार्थ — ( स ) ' यः पुनरेतं ' इस श्रुतिमें वह ध्यातव्य परब्रह्म ही है, ( ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् ) क्योंकि ' परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ' इस वाक्यशेष में ध्येयका दर्शन विषयरूपसे उपदेश है।

शाङ्करभाष्य

एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारस्तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति इति प्रकृत्य श्रूयते यः0 0पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत इति। किमस्मिन्वाक्ये परं ब्रह्माभिध्यातव्यमुपदिश्यते आहोस्विदपरमिति। एतेनैवायतनेन परमपरं वैकतरमन्वेतीति प्रकृतत्वात्संशयः। तत्रापरमिदं ब्रह्मेति प्राप्तम्। कस्मात् स तेजसि सूर्ये संपन्नः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् इति च तद्विदो देशपरिच्छिन्नस्य फलस्योच्यमानत्वात्।

न हि परब्रह्मविद्देशपरिच्छिन्नं फलमश्नुवीतेति युक्तम् सर्वगतत्वात्परस्य ब्रह्मणः। नन्वपरब्रह्मपरिग्रहे परं पुरुषम् इति विशेषणं नोपपद्यते। नैष दोषः पिण्डापेक्षया प्राणस्य परत्वोपपत्तेः इत्येवं प्राप्ते अभिधीयते।। परमेव ब्रह्म इह अभिध्यातव्यमुपदिश्यते। कस्मात् ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् ईक्षतिर्दर्शनम् दर्शनव्याप्यमीक्षतिकर्म ईक्षतिकर्मत्वेनास्याभिध्यातव्यस्य पुरुषस्य वाक्यशेषे व्यपदेशो भवति स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते इति।

तत्र अभिध्यायतेरतथाभूतमपि वस्तु कर्म भवति मनोरथकल्पितस्याप्यभिध्यायतिकर्मत्वात् ईक्षतेस्तु तथाभूतमेव वस्तु लोके कर्म दृष्टम् इत्यतः परमात्मैवायं सम्यग्दर्शनविषयभूत ईक्षतिकर्मत्वेन व्यपदिष्ट इति गम्यते। स एव चेह परपुरुषशब्दाभ्यामभिध्यातव्यः प्रत्यभिज्ञायते। नन्वभिध्याने परः पुरुष उक्तः ईक्षणे तु परात्परः कथमितर इतरत्र प्रत्यभिज्ञायत इति अत्रोच्यते परपुरुषशब्दौ तावदुभयत्र साधारणौ।

न चात्र जीवघनशब्देन प्रकृतोऽभिध्यातव्यः परः पुरुषः परामृश्यते येन तस्मात् परात्परोऽयमीक्षितव्यः पुरुषोऽन्यः स्यात्। कस्तर्हि जीवघन इति उच्यते घनो मूर्तिः जीवलक्षणो घनः जीवघनः। सैन्धवखिल्यवत् यः परमात्मनो जीवरूपः खिल्यभाव उपाधिकृतः परश्च विषयेन्द्रियेभ्यः सोऽत्र जीवघन इति। अपर आह स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् इत्यतीतानन्तरवाक्यनिर्दिष्टो यो ब्रह्मलोकः परश्च लोकान्तरेभ्यः सोऽत्र जीवघन इत्युच्यते।

जीवानां हि सर्वेषां करणपरिवृतानां सर्वकरणात्मनि हिरण्यगर्भे ब्रह्मलोकनिवासिनि संघातोपपत्तेर्भवति ब्रह्मलोको जीवघनः। तस्मात्परो यः पुरुषः परमात्मा ईक्षणकर्मभूतः स एवाभिध्यानेऽपि कर्मभूत इति गम्यते। परं पुरुषम् इति च विशेषणं परमात्मपरिग्रह एवावकल्पते। परो हि पुरुषः परमात्मैव भवति यस्मात्परं किंचिदन्यन्नास्ति पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः इति च श्रुत्यन्तरात्।

परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः इति च विभज्य अनन्तरमोंकारेण परं पुरुषमभिध्यातव्यं ब्रुवन् परमेव ब्रह्म परं पुरुषं गमयति। यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुच्यते इति पाप्मविनिर्मोकफलवचनं परमात्मानमिहाभिध्यातव्यं सूचयति। अथ यदुक्तं परमात्माभिध्यायिनो न देशपरिच्छिन्नं फलं युज्यत इति अत्रोच्यते त्रिमात्रेणोंकारेणालम्बनेन परमात्मानमभिध्यायतः फलं ब्रह्मलोकप्राप्तिः क्रमेण च सम्यग्दर्शनोत्पत्तिः इति क्रममुक्त्यभिप्रायमेतद्भविष्यतीत्यदोषः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' एतद्वै सत्यकाम ० ' ( पिप्पलाद - हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है, अतः विद्वान् इसी ओंकार ध्यानरूप प्राप्ति साधनसे उनमेंसे एकको प्राप्त हो जाता है ) . इसप्रकार प्रस्तुतकर ' यः पुनरेतं ० ' ( किन्तु जो उपासक त्रिमात्राविशिष्ट ' ॐ ' इस अक्षर द्वारा इस परमपुरुषका ध्यान करता है ) ऐसा श्रुति कहती है। क्या इस वाक्यमें ध्यातव्यरूपसे परब्रह्मका उपदेश है अथवा अपर ब्रह्मका?

इसी ॐ रूप प्राप्तिके साधनसे पर और अपर दोनों में से एक ब्रह्मको प्राप्त होता है, इसप्रकार प्रकृत होनेसे संशय होता है।

पूर्वपक्षी -- ऐसा संशय होनेपर ऐसा प्राप्त होता है कि यह ओंकार अपर ब्रह्म है, क्योंकि ' स तेजसि ० ' ( वह तेजोमय सूर्य लोकको प्राप्त होता है ) ' स साममि ० ' ( वहाँ से वह सामश्रुतियों द्वारा ब्रह्मलोक में ले जाया जाता है ) इसप्रकार ॐकारको जानने वालेके लिए देशपरिच्छिन्न ( सूर्यलोक और ब्रह्मलोक गमनरूप सीमित ) फल कहा जाता है, परब्रह्मवेत्ता देशपरिच्छिन्न फलका भोग करे यह युक्त नहीं है, क्योंकि परब्रह्म सर्वगत है।

परन्तु अपर ब्रह्मका ग्रहण करनेपर तो ' परं पुरुषम् ' यह विशेषण संगत नहीं होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि पिण्ड ( विराट ) की अपेक्षा प्राणमें भी परत्व हो सकता है | सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - [ यः पुनरेतं ] इस वाक्यमें परब्रह्मका ही अभिध्यातव्य ( ध्यान करने योग्य ) रूपसे उपदेश है, क्योंकि ईक्षतिका कर्म कहा गया है।

ईक्षति अर्थात् दर्शन, ईक्षतिकर्म अर्थात् दर्शनविषय | इस अभिध्यातव्यपुरुषका वाक्यशेषमें दर्शनविषयरूपसे व्यपदेश है - ‘ स एतस्माज्जीवघानात् ० ' ( ओंकारका उपासक जीवधन - हिरण्यगर्भरूप परसे पर शरीरमें प्रविष्ट हुए पुरुष - परमात्माको ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार देखता है ) यहाँपर अतथाभूत - मिथ्यावस्तु भी अभियानका विषय होता है, क्योंकि मनोरथसे कल्पित वस्तु भी अभिध्यानका विषय होती है।

परन्तु ईक्षतिका कर्म तो सत्य वस्तु ही लोकमें देखी गई हैं, इसलिए यथार्थ ज्ञानका विषयरूप यह परमात्मा ही ईक्षति कर्मरूपसे उपदिष्ट है ऐसा ज्ञात होता है। और यहाँ वही पर और पुरुष शब्दोंसे अभिध्यातव्य - रूपसे प्रत्यभिज्ञात होता है। परन्तु अभिध्यानमें परपुरुष कहां गया है और दर्शनमें परसे पर, ऐसी परिस्थितिमें एककी इतरत्र ( दूसरेमें ) प्रत्यभिज्ञा कैसे होगी?

इसपर कहते हैं — पर और पुरुष शब्द तो | ' अक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत ' ' स एतस्माज्जीवधनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ' ] इन दोनों वाक्योंमें समान है। यहाँ जीवधन शब्दसे प्रकृत, अभिध्यातव्य पर पुरुषका परामर्श नहीं होता, जिससे कि उस परसे पर यह दर्शनीय पुरुष भिन्न हो। तो जीवधन कौन है? कहते हैं — घन माने मूर्ति। जीवरूप घन वह जीवधन। लवणपिण्डके समान परमात्माका उपाधिकृत जीवरूप अल्पभाव जो विषय और इन्द्रियोंसे पर है वही यहाँ जीवधन कहलाता है।

दूसरा इस विषयपर कहता है- ' स सामभिः ' ० ( वह उपासक साम अभिमानी देवता द्वारा ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है ) इस अव्यवहित पूर्ववाक्यसे निर्दिष्ट ब्रह्मलोक जो अन्य लोकोंसे पर है वही यहाँ जीवघन कहा जाता है। ब्रह्मलोक निवासी सर्वेन्द्रियात्मक हिरण्यगर्भ इन्द्रियोंसे घिरे हुए सभी जीवोंका समष्टिरूप है, इसलिए ब्रह्मलोक जीवधन है, इससे ऐसा ज्ञात होता है कि पर पुरुष जो परमात्मा दर्शनका • विषयभूत है वही अभिध्यानमें मी कर्मभूत है।

और ' परं पुरुषं ' यह विशेषण परमात्माका ग्रहण करनेसे ही संगत होता है, क्योंकि परपुरुष परमात्मा ही है जिससे पर और कुछ नहीं है, ' पुरुषानं परं ० ' ( पुरुषसे पर कुछ नहीं है वह परम अवधि और परम गति है ) यह दूसरी श्रुति है। ' परं चापरं ० ' ( जो ओंकार है वह पर और अपर ब्रह्म ) ऐसा विभाग करके अनन्तर ओंकार द्वारा परपुरुषको अभिध्यातव्य कहती हुई परब्रह्मको ही परपुरुषरूपसे ज्ञान कराती है।

' यथा पादोदरस्त्वचा ० ' ( जैसे सर्प काँचुलीसे विनिर्मुक्त होता है वैसे वह उपासक पापसे मुक्त हो जाता है ) इसप्रकार पापसे विनिर्मुक्तिरूपी फलका कथन यहाँ परमात्माको अभिध्यातव्यरूपसे सूचित करता है। जो यह कहा गया है कि परमात्माका अभिध्यान करनेवाले के लिए देश परिच्छिन्न फल युक्त नहीं है, तो इसपर कहते हैं - तीन मात्रावाले ओंकाररूप आलम्बनसे परमात्माका अभिध्यान करनेवाले उपासकको ब्रह्म लोककी प्राप्ति और क्रमसे तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिरूप फल प्राप्त होता है।

यहाँ क्रम मुक्तिके अभिप्रायसे यह हो जायगा। इसलिए [ देशपरिच्छिन्न फल प्राप्ति ] कोई दोष नहीं है॥ १३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत अधिकरणमें वर्णमें रूढ अक्षर शब्दको जगत्‌को धारण करना इस लिङ्गसे ' न क्षरति ' इस योग वृत्तिका आश्रयण कर ब्रह्मविषयक स्वीकार किया गया है। इसप्रकार यहाँ भी देशपरिच्छिन्न फल श्रुति लिङ्गसे परशब्दकी किसीकी अपेक्षा परत्व विशिष्ट हिरण्यगर्भ में वृत्ति हो, इस दृष्टान्तसंगतिसे पूर्वपक्ष है | यहाँ अक्षरात्मक ओंकार विषयक विचार है कि ओंकारसे किसकी उपासना करनी चाहिए।

* ' यः पुनरेतं ' इस वाक्य में ओंकाररूपसे अमिध्यानका विषय परमात्मा ही है, हिरण्यगर्भरूप अपर ब्रह्म नहीं, क्योंकि ' स एतस्माज्जीवधनात् ' इस वाक्यशेषमें जीवघन अर्थात् जीव समूहरूप हिरण्यगर्भसे भिन्न पर पुरुष ही साक्षात् करने योग्य है। इस श्रुतिमें ' स ' शब्दसे पूर्वं श्रुतिमें कथित परब्रह्मकी ही प्रत्यभिज्ञा होती है। इसलिए परमात्मा ही यहाँ अभिध्यातव्य है।

* यद्यपि ब्रह्मलोक जीवधन नहीं है, तो भी जीव समुदायका समष्टिरूप हिरण्यगर्भं ब्रह्मलोकका स्वामी है, इसलिए परम्परा सम्बन्धरूप लक्षणावृत्ति से ब्रह्मलोकको भी जीवधन कहा जाता है।

* ओङ्काररूपसे परमात्माका अभिध्यान करनेवाले उपासक स्वर्गलोकसे होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं, वहाँ ब्रह्माकी अवस्थिति पर्यन्त ऐश्वयं सुखका अनुभव करते हैं। साथ - साथ ब्रह्मजिज्ञासुओंको ब्रह्माद्वारा ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे आत्मैकत्वरूप उपदेश प्राप्त होता है। जिससे आत्मसाक्षात्कारकर महाप्रलयमें ब्रह्मा के साथ कैवल्य मुक्तिको प्राप्त करते हैं। इस विषय में ' ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ' ( मुण्ड ० ३।२१६ ) ' ज्ञानादेव तु कैवल्यम् ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। इसप्रकार ओङ्काररूपसे परमात्माका अभिध्यान करनेवाले उपासकोंके लिए क्रम मुक्तिके अभिप्रायसे ब्रह्मलोककी प्राप्तिरूप परिच्छिन्न फल श्रुतियों में कहा गया है। इसलिए ओङ्कारसे परमेश्वरका ही अभिध्यान करना चाहिए हिरण्यगर्भका नहीं। पूर्वपक्ष में मोङ्कारसे अपर ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) की उपासना फल है, सिद्धान्त में परब्रह्म ( ईश्वर ) की उपासना फल है।। १३

दहराधिकरणम्

1.3.14 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १४

सूत्र १.३.१४

दहर उत्तरेभ्यः ॥ १.३.१४ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 253

पदच्छेद — दहरः , उत्तरेभ्यः

सूत्रार्थ — ( दहर : ) ' अथ यदिदमस्मिन् ' इत्यादि श्रुतिमें पठित दहराकाश परमात्मा ही है, ( उत्तरेभ्यः ) क्योंकि ' यावान्वा अयमाकाशस्तावानोषोऽन्तर्हृदय ' इत्यादि वाक्यशेषगत आकाशोपमानत्वादिहेतुओंका प्रतिपादन है।

शाङ्करभाष्य

अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्यादि वाक्यं समाम्नायते। तत्र योऽयं दहरे हृदयपुण्डरीके दहर आकाशः श्रुतः स किं भूताकाशः अथ विज्ञानात्मा अथवा परमात्मेति संशय्यते। कुतः संशयः आकाशब्रह्मपुरशब्दाभ्याम्। आकाशशब्दो ह्ययं भूताकाशे परस्मिंश्च ब्रह्मणि प्रयुज्यमानो दृश्यते। तत्र किं भूताकाश एव दहरः स्यात् किं वा पर इति संशयः।

तथा ब्रह्मपुरमिति किं जीवोऽत्र ब्रह्मनामा तस्येदं पुरं शरीरं ब्रह्मपुरम् अथवा परस्यैव ब्रह्मणः पुरं ब्रह्मपुरमिति। तत्र जीवस्य परस्य वान्यतरस्य पुरस्वामिनो दहराकाशत्वे संशयः। तत्राकाशशब्दस्य भूताकाशे रूढत्वाद्भूताकाश एव दहरशब्द इति प्राप्तम् तस्य च दहरायतनापेक्षया दहरत्वम् यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः इति च बाह्याभ्यन्तरभावकृतभेदस्योपमानोपमेयभावः द्यावापृथिव्यादि च तस्मिन्नन्तः समाहितम् अवकाशात्मनाकाशस्यैकत्वात्।

अथवा जीवो दहर इति प्राप्तम् ब्रह्मपुरशब्दात् जीवस्य हीदं पुरं सत् शरीरं ब्रह्मपुरमित्युच्यते तस्य स्वकर्मणोपार्जितत्वात् भक्त्या च तस्य ब्रह्मशब्दवाच्यत्वम् न हि परस्य ब्रह्मणः शरीरेण स्वस्वामिभावः संबन्धोऽस्ति तत्र पुरस्वामिनः पुरैकदेशेऽवस्थानं दृष्टम् यथा राज्ञः मनउपाधिकश्च जीवः मनश्च प्रायेण हृदये प्रतिष्ठितम् इत्यतो जीवस्यैवेदं हृदयान्तरवस्थानं स्यात् दहरत्वमपि तस्यैव आराग्रोपमितत्वात् अवकल्पते आकाशोपमितत्वादि च ब्रह्माभेदविवक्षया भविष्यति न चात्र दहरस्याकाशस्यान्वेष्टव्यत्वं विजिज्ञासितव्यत्वं च श्रूयते तस्मिन्यदन्तः इति परविशेषणत्वेनोपादानादिति।।

अत उत्तरं ब्रूमः परमेश्वर एवात्र दहराकाशो भवितुमर्हति न भूताकाशो जीवो वा। कस्मात् उत्तरेभ्यः वाक्यशेषगतेभ्यो हेतुभ्यः। तथाहि अन्वेष्टव्यतयाभिहितस्य दहराकाशस्य तं चेद्ब्रूयुः इत्युपक्रम्य किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्येवमाक्षेपपूर्वकं प्रतिसमाधानवचनं भवति स ब्रूयाद्यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते इत्यादि।

तत्र पुण्डरीकदहरत्वेन प्राप्तदहरत्वस्याकाशस्य प्रसिद्धाकाशौपम्येन दहरत्वं निवर्तयन् भूताकाशत्वं दहरस्याकाशस्य निवर्तयतीति गम्यते। यद्यप्याकाशशब्दो भूताकाशे रूढः तथापि तेनैव तस्योपमा नोपपद्यत इति भूताकाशशङ्का निवर्तिता भवति। नन्वेकस्याप्याकाशस्य बाह्याभ्यन्तरत्वकल्पितेन भेदेनोपमानोपमेयभावः संभवतीत्युक्तम् नैवं संभवति अगतिका हीयं गतिः यत्काल्पनिकभेदाश्रयणम्। अपि च कल्पयित्वा भेदमुपमानोपमेयभावं वर्णयतः परिच्छिन्नत्वादभ्यन्तराकाशस्य न बाह्याकाशपरिमाणत्वमुपपद्येत।

ननु परमेश्वरस्यापि ज्यायानाकाशात् इति श्रुत्यन्तरात् नैवाकाशपरिमाणत्वमुपपद्यते नैष दोषः पुण्डरीकवेष्टनप्राप्तदहरत्वनिवृत्तिपरत्वाद्वाक्यस्य न तावत्त्वप्रतिपादनपरत्वम् उभयप्रतिपादने हि वाक्यं भिद्येत। न च कल्पितभेदे पुण्डरीकवेष्टित आकाशैकदेशे द्यावापृथिव्यादीनामन्तः समाधानमुपपद्यते। एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः इति चात्मत्वापहतपाप्मत्वादयश्च गुणा न भूताकाशे संभवन्ति।

यद्यप्यात्मशब्दो जीवे संभवति तथापीतरेभ्यः कारणेभ्यो जीवाशङ्कापि निवर्तिता भवति। न ह्युपाधिपरिच्छिन्नस्याराग्रोपमितस्य जीवस्य पुण्डरीकवेष्टनकृतं दहरत्वं शक्यं निवर्तयितुम्। ब्रह्माभेदविवक्षया जीवस्य सर्वगतत्वादि विवक्ष्येतेति चेत् यदात्मतया जीवस्य सर्वगतत्वादि विवक्ष्येत तस्यैवब्रह्मणः साक्षात्सर्वगतत्वादि विवक्ष्यतामिति युक्तम्।

यदप्युक्तम् ब्रह्मपुरम् इति जीवेन पुरस्योपलक्षितत्वाद्राज्ञ इव जीवस्यैवेदं पुरस्वामिनः पुरैकदेशवर्तित्वमस्त्विति अत्र ब्रूमः परस्यैवेदं ब्रह्मणः पुरं सत् शरीरं ब्रह्मपुरमित्युच्यते ब्रह्मशब्दस्य तस्मिन्मुख्यत्वात्। तस्याप्यस्ति पुरेणानेन संबन्धः उपलब्ध्यधिष्ठानत्वात् स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयः इत्यादिश्रुतिभ्यः। अथवा जीवपुर एवास्मिन् ब्रह्म संनिहितमुपलक्ष्यते यथा सालग्रामे विष्णुः संनिहित इति तद्वत्।

तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते इति च कर्मणामन्तवत्फलत्वमुक्त्वा अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति इति प्रकृतदहराकाशविज्ञानस्यानन्तफलत्वं वदन् परमात्मत्वमस्य सूचयति।

यदप्येतदुक्तम् न दहरस्याकाशस्यान्वेष्टव्यत्वं विजिज्ञासितव्यत्वं च श्रुतं परविशेषणत्वेनोपादानादिति अत्र ब्रूमः यद्याकाशो नान्वेष्टव्यत्वेनोक्तः स्यात् यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः इत्याद्याकाशस्वरूपप्रदर्शनं नोपपद्येत।

नन्वेतदप्यन्तर्वर्तिवस्तुसद्भावदर्शनायैव प्रदर्श्यते तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्याक्षिप्य परिहारावसरे आकाशौपम्योपक्रमेण द्यावापृथिव्यादीनामन्तःसमाहितत्वप्रदर्शनात् नैतदेवम् एवं हि सति यदन्तः समाहितं द्यावापृथिव्यादितदन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं चोक्तं स्यात् तत्र वाक्यशेषो नोपपद्येत अस्मिन्कामाः समाहिताः एष आत्मापहतपाप्मा इति हि प्रकृतं द्यावापृथिव्यादिसमाधानाधारमाकाशमाकृष्य अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामान् इति समुच्चयार्थेन चशब्देनात्मानं कामाधारम् आश्रितांश्च कामान् विज्ञेयान् वाक्यशेषो दर्शयति।

तस्माद्वाक्योपक्रमेऽपि दहर एवाकाशो हृदयपुण्डरीकाधिष्ठानः सहान्तःस्थैः समाहितैः पृथिव्यादिभिः सत्यैश्च कामैर्विज्ञेय उक्त इति गम्यते। स चोक्तेभ्यो हेतुभ्यः परमेश्वर इति स्थितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ‘ अथ यदिदमस्मिन् ० ' ( अब इस ब्रह्मपुर - शरीरमें जो यह सूक्ष्म कमलाकार गृह है उसमें जो सूक्ष्म आकाश है उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना चाहिए उसकी विशेष जिज्ञासा करनी चाहिए ) इत्यादि श्रुति वाक्य हैं। यहाँ सूक्ष्म हृदय कमलमें जो यह दहर - अल्प आकाश सुना जाता है। क्या वह भूताकाश है वा विज्ञानात्मा है अथवा परमात्मा है, ऐसा संशय होता है। संशय क्यों होता है? इससे कि श्रुतिमें आकाश और ब्रह्मपुर शब्द हैं।

यह आकाश शब्द ही भूताकाश और परब्रह्ममें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है। इससे संशय होता है कि क्या यहाँ दहर भूताकाश ही है अथवा परब्रह्म? उसीप्रकार ' ब्रह्मपुरम् ' क्या यहाँ जीवका ही नाम ब्रह्म है, उसका पुर होनेसे यह शरीर ब्रह्मपुर है, अथवा परब्रह्मका ही पुर होने से ब्रह्मपुर है? यहाँ संशय होता है कि जीव और परब्रह्म इन दोनोंमें से कौन पुरस्वामी दहराकाश है? पूर्वपक्षी - यहाँ आकाश शब्द भूताकाशमें रूढ़ है, इससे दहर शब्द भूताकाशका वाचक है ऐसा प्राप्त होता है।

अल्प आयतनकी अपेक्षा उसमें दहरत्व- अल्पत्व है। ' यावान्वा ० ' ( जितना यह भूताकाश है उतना ही हृदयके भीतर यह दहराकाश है ) इस प्रकार बाह्य और आभ्यन्तरभाव कृत भेदको लेकर अर्थात् कल्पित भेदको लेकर उपमानोपमेयभाव है और द्यु, पृथिवी आदि उसके भीतर स्थित हैं, क्योंकि अवकाशरूपसे आकाश एक है। अथवा जीव दहर शब्द वाच्य है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि ब्रह्मपुर शब्द है। जीवका ही पुर होता हुआ यह शरीर ब्रह्मपुर है, ऐसा कहा जाता है, कारण कि जीव उसे अपने कर्मोंसे उपार्जित करता है।

और गौणवृत्तिसे जीव ब्रह्म शब्द वाच्य है | परब्रह्मका तो शरीर के साथ स्वस्वामिभाव सम्बन्ध भी नहीं है। लोकमें भी देखा जाता है कि नगरका स्वामी नगरके एक भाग में रहता है, जैसे राजा राजधानोके एक भाग राजगृहमें रहता है। मन उपाधिक जीव है, मन प्रायः हृदयमें रहता है, इससे जीवका ही हृदयके भीतर अवस्थान हो सकता है। आराग्र भागसे उपमित होनेसे उसमें ही दहरत्व भी उपपन्न होता है। आकाश के साथ उसकी उपमा आदि तो ब्रह्म के साथ अभेद विवक्षासे होगी।

और ' तस्मिन्यदन्तः ' यहाँ दहर आकाश में अन्वेष्टव्यत्व तथा विजिज्ञासितव्यत्व भी नहीं सुना जाता। किन्तु परके विशेषणरूपसे उसका ग्रहण है अर्थात् आभ्यन्तर वस्तुके आधाररूपसे दहराकाशका ग्रहण किया गया है। सिद्धान्ती -- इसके उत्तरमें हम कहते हैं — यहाँ परमेश्वर ही दहराकाश होने योग्य है, भूताकाश अथवा जीव नहीं, किससे? इससे कि वाक्यशेष गत इस प्रकारके हेतु हैं।

जैसे कि अन्वेष्टव्यरूपसे अभिहित दराकाशका ' तं चेद्ब्रूयुः ' ( उस आचार्यसे यदि शिष्य गण कहें ) ऐसा उपक्रमकर ' किं तदत्र विद्यते ० ' ( यहाँ वह क्या है जो अन्वेष्टव्य और विशेषरूपसे जिज्ञासितव्य है ) इस प्रकार आक्षेपपूर्वक उसका ( वह कहे कि हे शिष्य! जितना यह बाह्य आकाश है उतना ही हृदयके आभ्यन्तर यह आकाश है द्युलोक और पृथिवी दोनों उसके अन्तर स्थित हैं ) इत्यादि प्रतिसमाधान वचन है।

इस वाक्यसे यह ज्ञात होता है कि हृदय कमलके अल्पत्वसे जिसको अल्पत्व प्राप्त हुआ है उस आकाश में प्रसिद्ध आकाशके सादृश्यसे अल्पत्वकी निवृत्ति करते हुए आचार्यं दहराकाशमें भूताकाशत्वकी भी निवृत्ति करते हैं। यद्यपि आकाश शब्द भूताकाशमें रूढ है, तो भी उसीके साथ उसकी उपमा उपपन्न नहीं होती अर्थात् किसी भी वस्तुकी अपने ही साथ उपमा नहीं हो सकती। दहर आकाश भूताकाश है यह शङ्का भी निवृत्त होती है।

पूर्वपक्षाने यह . कहा है कि एक आकाशमें भी बाह्य और आभ्यन्तर कल्पित भेदसे उपमान- उपमेयभाव हो सकता है, परन्तु ऐसा सम्भव नहीं हैं, क्योंकि जो काल्पनिक भेदका आश्रय है यह तो अगतिका गति है | और दूसरी बात यह भी है कि भेदकी कल्पना करके उपमान- उपमेयभावका वर्णन करनेवाले मतमें आभ्यन्तर आकाश परिच्छिन्न होनेसे बाह्याकाशके समान परिमाणवाला नहीं हो सकता। परन्तु ' ज्यायानाकाशात् ० ' ( आकाशसे भी अधिक ) इस दूसरी श्रुतिसे परमेश्वरमें भी आकाशके समान परिमाणत्व युक्त नहीं है।

सि ० -- यह दोष नहीं है, क्योंकि यह वाक्य पुण्डरोकके वेष्टनसे प्राप्त अल्पत्वकी निवृत्तिके लिए है भूताकाशमें समान परिमाणका प्रतिपादन करनेके लिए नहीं है। दोनोंके प्रतिपादन में वाक्यभेद हो जाएगा।

और पुण्डरीकसे वेष्टित कल्पित भेदवाले आकाश के एक देशमें द्युलोक और पृथिवी आदिका अन्तरवस्थान उपपन्न नहीं होगा ' एष आत्मापहतपाप्मा ० ' ( यह आत्मा पापसे रहित है, जरा, मरण और शोकसे रहित, भूख और प्याससे मुक्त, सत्यकाम, सत्यसंकल्प है ) इस प्रकार आत्मत्व, पापरहितल आदि गुण भूताकाशमें सम्भव नहीं हैं। यद्यपि आत्मशब्दका जीव में प्रयोग सम्भव है, तो भी अन्य कारणोंसे जीव विषयक आशङ्का निवृत्त हो जाती है।

उपाधिसे परिच्छिन्न और आरके अग्रभागसे उपमित जीवमें कमलवेष्टनकृत अल्पत्वका निवारण नहीं किया जा सकता। यदि ब्रह्मके साथ अभेदकों विवक्षासे जीव में सर्वगतत्वादिकी विवक्षा करो तो आत्मरूपसे अर्थात् ब्रह्मके साथ अभेद मानकर जीव में सर्वगतत्वादि धर्मोकी विवक्षा करनेकी अपेक्षासे यही अधिक युक्त है कि उस ब्रह्मके ही साक्षात् सर्वगत्वादि धर्मोकी विवक्षा करो।

जो यह कहा गया है कि ' ब्रह्मपुरम् ' में जीवसे शरीर रूपी पुरका सम्बन्ध होनेसे राजाके समान पुरके स्वामी जीवका ही पुरके एक भागमें रहना सम्भव है। इस विषय पर हम कहते हैं - परब्रह्मका ही पुर होता हुआ यह शरीर ब्रह्मपुर है, ऐसा कहा जाता है, क्योंकि परब्रह्ममें ब्रह्म शब्द मुख्य है। उसका भी इस पुरके साथ ( कल्पित ) सम्बन्ध है, कारण कि वह उसके उपलब्धिका स्थान है।

' स एतस्माज्जीवघनात् ० ' ( वह उपासक इस पर जीवधन [ हिरण्यगर्भ ] से भी पर - उत्कृष्ट और शरीर में प्रविष्ट परमात्माका दर्शन करता है ) और ' स वा अयं पुरुषः ० ' ( वह पुरुष सब शरीरोंमें वर्तमान हृदयमें रहनेके कारण पुरिशय कहलाता है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं। अथवा जैसे शालग्राम में विष्णु संनिहित है, वैसे इस जीवपुरमें ही ब्रह्म संनिहित उपलक्षित होता है।

' तद्यथेह ० ' ( जिस प्रकार यहाँ कर्म से सम्पादित फल क्षीण हो जाता है उसी प्रकार परलोकमें अग्निहोत्र आदि पुण्यसे उपार्जित स्वर्गलोक आदि फल क्षीण हो जाता है ) इसप्रकार कर्मोंका फल नश्वर कहकर ' अथ य इह ० ' ( जो यहाँ आत्मा - दहरका तथा उसके आश्रित सत्यकाम, सत्यसंकल्प आदि गुणका शास्त्र और आचार्यके उपदेशके अनुसार ध्यानसे अनुभवकर परलोकमें जाते हैं वे सार्वभौम राजाके समान सब लोकोंमें यथेच्छ विहार करनेवाले और अभीष्ट वस्तुको प्राप्त करनेवाले . होते हैं ) इसप्रकार प्रकृत दहराकाशके विज्ञानका फल अनन्त कहकर श्रुति दहाराकश परमात्मा है, सूचित करती है।

दहराकाशका अन्वेष्टव्य तथा विजिज्ञासितव्यरूपसे श्रवण नहीं है, क्योंकि परके विशेषणरूपसे उसका ग्रहण है। ऐसा जो पूर्वपक्षीने कहा है, उसपर हम कहते हैं - यदि दहराकाश अन्वेष्टव्यरूपसे न कहा गया होता, तो ' यावान्वा ० ' ( जितना यह बाह्य आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत वह आकाश है ) इत्यादि आकाश स्वरूपका प्रदर्शन उपयुक्त नहीं होता।

परन्तु यह भी अन्तर्वतीं वस्तुके सद्भाव प्रदर्शनके लिए दिखलाया जाता है, क्योंकि ‘ तं चेद् ब्रूयुर्थदिदमस्मिन् ० ' ( उस आचार्यसे यदि शिष्यगण पूछें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है, उसमें जो अल्प अन्तराकाश है उसके भीतर वह क्या वस्तु है जो अन्वेषण करने योग्य और विशेषरूपसे जिज्ञासा करने योग्य है ) ऐसा आक्षेपकर परिहार करते समय [ ' यावान्वा ' इस मन्त्रसे ] आकाश सादृश्यके उपक्रमसे द्युलोक, पृथिवी आदिका अन्तरवस्थान दिखलाया है।

सिद्धान्तीऐसा नहीं है, क्योंकि ऐसा होनेपर तो उसके अन्तरवस्थित जो द्युलोक पृथिवी आदि हैं वे अन्वेष्टव्य तथा विजिज्ञासितव्यरूपसे उक्त होंगे, ऐसी स्थितिमें वाक्यशेष उपपन्न नहीं होगा।

' अस्मिन्कामाः ० ' ( उसमें अभिलाषाएँ - कामनाएँ अवस्थित हैं ) ' एष आत्मा ० ' ( यह आत्मा पाप मुक्त है ) इसप्रकार प्रकृत द्युलोक, पृथिवी आदि जिसमें स्थित हैं उस आकाशकी अनुवृत्ति करके ' अथ य इह ० ' ( यहाँ जो आत्माका और इन सत्यकामोंका आचार्यके उपदेशानुसार ध्यान पूर्वक अनुभव कर परलोकमें जाते हैं ) इस तरहसे यह वाक्यशेष समुच्चयवाचक ' च ' शब्दसे कामोंके आधार आत्मको और उसके आश्रित कामोंको विज्ञेयरूपसे दिखलाता है।

इससे ऐसा ज्ञात होता है कि वाक्यके उपकममें भी हृदयकमल जिसका आधार है वह दहराकाश ही अन्तः स्थित हुए पृथिवी आदिके साथ तथा सत्यकामोंके साथ विज्ञेय कहा गया है। अतः इन उक्त हेतुओंसे सिद्ध होता है वह दहराकाश परमेश्वर ही है॥१४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' अथ यदिदमस्मिन् ' ' इस श्रुतिस्थ ' अथ ' शब्द भूमा विद्याके अनन्तर दहरविद्याको सूचित करता है। ब्रह्मकी अभिव्यक्तिका स्थान होनेसे इस शरीरको ब्रह्मपुर कहा जाता है। जैसे पूर्वाधिकरणमें ' पर पुरुष ' शब्द ब्रह्म में रूढ़ होने से परब्रह्म उपास्य कहा गया है, वैसे ' अथ यदिदमस्मिन् ' यहाँ आकाशशब्द भूताकाशमें रूढ़ होनेसे भूताकाश उपास्य होना चाहिए इसप्रकार दृष्टान्तसंगतिसे पूर्वपक्ष करते हैं।

* भूताकाश दहराकाश है, ऐसा पूर्वपक्षीके द्वारा मानमेपर शङ्का होती है -भूताकाश अल्प कैसे हो सकता है? एक होनेसे उसमें उपमान- उपमेयभाव कैसे? और ' उभे अस्मिम् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च ' ( छा ० ८ | १ | ३ ) ( इसमें द्यु और पृथिवी दोनों अन्तर रहते ही हैं एवं अग्नि और वायु दोनों आभ्यन्तर रहते हैं ) इस प्रकार आकाश सबका आश्रय किस प्रकार है? इन तीन शङ्काओं का समाधान ' तस्य ' इत्यादि भाष्यसे पूर्वपक्षीने किया है। जैसे हृदय रूप अल्प आश्रयकी अपेक्षा भूताकाशमें दहरत्व अल्पत्व है, ध्यानके लिए कल्पित भेदको लेकर उपमानउपमेयभाव है, और स्वयं एक होनेसे सबका आश्रय भी है। परन्तु ' एष आत्मा ' ( यह आत्मा है ) आत्मशब्द भूताकाशमें नहीं है, इस अरुचिसे ' अथवा ' से पूर्वपक्षीने जीव पक्षका ग्रहण किया हैं।

* दहराकाशके अल्पत्वकी निवृत्ति और भूताकाशके समान परिमाण, इस प्रकार एक वाक्य दो अर्थं माननेसे वाक्यभेद रूपी दोष होता है। यह दोष यहाँपर नहीं है, क्योंकि ' ज्यायानाकाशात् ० ' यह वाक्य कमलवेष्टनसे प्राप्त अल्पत्वकी निवृत्ति परक है, आकाशके समान परिमाण प्रतिपादन परक नहीं है, इमलिए दहराकाश परमेश्वर ही है भूताकाश नहीं।

* अब सिद्धान्ती जीव विषयक शङ्काको निवृत्त करते हैं - यद्यपि आत्मत्व धर्मं जीव में है, तो मी सत्यकामत्व पापरहितत्व आदि धर्मं उसमें नहीं हैं। इसलिए दहर शब्दसे जीवका ग्रहण सम्भव नहीं है अपितु ब्रह्मा ग्रहण ही सम्भव है। यद्यपि जीवमें हृदयरूप उपाधिसे दहरत्व है तो मी ' ज्यायाना-काशात् ' यह वाक्यार्थं उसमें संगत नहीं हो सकता, क्योंकि जीव परिच्छिन्न है।

* यहाँ दहर आकाश शब्दसे परमेश्वरका ही ग्रहण करना चाहिए। पूर्वपक्ष में भूताकाश आदिकी उपासना फल है और सिद्धान्त में संगुण ब्रह्मकी उपासनाद्वारा निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार फल है || १४ ||

1.3.15 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १५

सूत्र १.३.१५

गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च ॥ १.३.१५ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 257

पदच्छेद — गतिशब्दाभ्याम् , तथाहि दृष्टम् , लिङ्गम् , च

सूत्रार्थ — ( गतिशब्दाभ्याम् ) ' इमाः सर्वाः प्रजा ' इस श्रुतिमें गमन और ब्रह्मलोक शब्दोंसे ज्ञात होता है कि दहर ब्रह्म ही है। ( तथाहि दृष्टम् ) इसीप्रकार ' सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ' इस अन्य श्रुतिसे मी जीवगम्य ब्रह्म प्रतिपादित होता है। ( लिङ्गं च ) एवं श्रुति प्रतिपादित जीवोंका प्रतिदिन ब्रह्मलोक गमन असम्भव है, इसलिए ' ब्रह्मैव लोकः ब्रह्मलोक ' इस कर्मधारय समाससे सामानाधिकरण्य ग्रहण में प्रतिदिन गमन ही लिङ्ग है, अर्थात् ब्रह्मका ज्ञापक हेतु है। और सूत्रस्थ ' च ' शब्दसे निषादस्थस्पतिन्याय भी सामानाधिकरण्यके ग्रहणमें सूचित होता है।

शाङ्करभाष्य

दहरः परमेश्वर उत्तरेभ्यो हेतुभ्य इत्युक्तम् त एवोत्तरे हेतव इदानीं प्रपञ्च्यन्ते। इतश्च परमेश्वर एव दहरः यस्माद्दहरवाक्यशेषे परमेश्वरस्यैव प्रतिपादकौ गतिशब्दौ भवतः इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति इति। तत्र प्रकृतं दहरं ब्रह्मलोकशब्देनाभिधाय तद्विषया गतिः प्रजाशब्दवाच्यानां जीवानामभिधीयमाना दहरस्य ब्रह्मतां गमयति। तथा ह्यहरहर्जीवानां सुषुप्तावस्थायां ब्रह्मविषयं गमनं दृष्टं श्रुत्यन्तरे सता सोम्य तदा संपन्नो भवति इत्येवमादौ। लोकेऽपि किल गाढं सुषुप्तमाचक्षते ब्रह्मीभूतो ब्रह्मतां गतः इति। तथा ब्रह्मलोकशब्दोऽपि प्रकृते दहरे प्रयुज्यमानो जीवभूताकाशाशङ्कां निवर्तयन्ब्रह्मतामस्य गमयति। ननु कमलासनलोकमपि ब्रह्मलोकशब्दो गमयेत् गमयेद्यदि ब्रह्मणो लोक इति षष्ठीसमासवृत्त्या व्युत्पाद्येत सामानाधिकरण्यवृत्त्या तु व्युत्पाद्यमानो ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक इति परमेव ब्रह्म गमयिष्यति। एतदेव चाहरहर्ब्रह्मलोकगमनं दृष्टं ब्रह्मलोकशब्दस्य सामानाधिकरण्यवृत्तिपरिग्रहे लिङ्गम्। न ह्यहरहरिमाः प्रजाः कार्यब्रह्मलोकं सत्यलोकाख्यं गच्छन्तीति शक्यं कल्पयितुम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वाक्यशेष गत हेतुओंसे दहर परमेश्वर ही है, ऐसा पूर्व कहा गया है। अब उन्हीं आगे आनेवाले हेतुओं का विस्तार से वर्णन किया जाता है। इससे भी परमेश्वर ही दहर हैं, क्योंकि ' इमाः सर्वाः प्रजा ० ' ( ये सब जीव हृदयान्तर्गत दहराकाश नामक ब्रह्मलोकको सुषप्तिमें प्रतिदिन प्राप्त होते हैं किन्तु अनादि अज्ञानसे आवृत्त उसको नहीं जानते ) इसप्रकार दहर वाक्यशेषमें गति और शब्द परमेश्वर के प्रतिपादक हैं।

इसमें प्रकृत दहरका ब्रह्मलोक शब्दसे अभिधान कर उसमें प्रजा शब्द वाच्य जीवोंकी कही हुई गति दहरमें ब्रह्मत्वका ज्ञान कराती है अर्थात् यह अवगत होता है कि दहराकाश ब्रह्म है। इसी प्रकार ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य! जब जीव सोता है तब सत् के साथ सम्पन्न होता है ) इत्यादि अन्य श्रुतियोंमें सुषुप्ति अवस्थामें प्रतिदिन जीवोंका ब्रह्म विषयक गमन देखा जाता है। लोकमें भी गाढ़ सुषुप्त पुरुषको ' ब्रह्मीभूत ' ब्रह्मत्वको प्राप्त हुआ कहा जाता है।

इसीप्रकार प्रकृत दहरमें प्रयुक्त हुआ ब्रह्मलोक शब्द भी दहरमें जीव और भूताकाशकी आशङ्काको निवृत्त करता हुआ दहराकाश ब्रह्म है बोध ( ज्ञान ) कराता है। परन्तु ब्रह्मलोक शब्द तो हिरण्यगर्भं --- ब्रह्माके लोकका मी ज्ञान कराता है? हाँ, अवश्य ज्ञान कराए यदि ब्रह्मका लोक ( ब्रह्मलोक ) इस षष्ठी समास वृत्तिसे ब्रह्मलोक शब्द की व्युत्पत्ति की जाय।

किन्तु यहाँ तो ( कर्मधारय समास ) से ' ब्रह्मैव लोक : ' ' ब्रह्म ही लोक ब्रह्मलोक है ' इस सामानाधिकण्यवृत्तिसे व्युत्पन्न हुआ ब्रह्मलोक शब्द परब्रह्मका ही ज्ञान करायेगा। परन्तु प्रतिदिन देखा गया यह ब्रह्मलोक गमन ही ब्रह्मलोक शब्दकी सामानाधिकरण्यवृत्ति के ग्रहण करने में लिङ्ग हेतु है। प्रतिदिन ये जीव सत्यलोक नामक कार्य -ब्रह्मलोक में जाते हैं ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती॥ १५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.३.१६ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

1.3.16 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १६

सूत्र १.३.१६

धृतेश् च महिम्नोऽस्यास्मिन्न् उपलब्धेः ॥ १.३.१६ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 258

पदच्छेद — धृतेः , च ; महिम्नः अस्य , अस्मिन् , उपलब्धेः

सूत्रार्थ — ( धृतेः ), ' अथ य आत्मा ० ' इस श्रुतिमें उक्त धृति, ( च ) और ' एष भूतपाल : '

शाङ्करभाष्य

धृतेश्च हेतोः परमेश्वर एवायं दहरः। कथम् दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः इति हि प्रकृत्य आकाशौपम्यपूर्वकं तस्मिन्सर्वसमाधानमुक्त्वा तस्मिन्नेव चात्मशब्दं प्रयुज्यापहतपाप्मत्वादिगुणयोगं चोपदिश्य तमेवानतिवृत्तप्रकरणं निर्दिशति अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय इति। तत्र विधृतिरित्यात्मशब्दसामानाधिकरण्याद्विधारयितोच्यते क्तिचः कर्तरि स्मरणात्। यथोदकसंतानस्य विधारयिता लोके सेतुः क्षेत्रसंपदामसंभेदाय एवमयमात्मा एषामध्यात्मादिभेदभिन्नानां लोकानां वर्णाश्रमादीनां च विधारयिता सेतुः असंभेदाय असंकरायेति। एवमिह प्रकृते दहरे विधरणलक्षणं महिमानं दर्शयति। अयं च महिमा परमेश्वर एव श्रुत्यन्तरादुपलभ्यते एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः इत्यादेः। तथान्यत्रापि निश्चिते परमेश्वरवाक्ये श्रूयते एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय इति। एवं धृतेश्च हेतोः परमेश्वर एवायं दहरः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और धृतिरूप हेतुसे भी यह दहर परमेश्वर ही है। क्योंकि ' दहरोऽस्मिन् ० ' ( इसमें दहर अन्तराकाश है ) इस प्रकार प्रस्तुतकर आकाशके साथ सादृश्यपूर्वक उसमें सब वस्तुओं की स्थिति कहकर, उसमें आत्मशब्दका प्रयोग कर और अपहतपाप्मत्वादिगुणोंके सम्बन्धका उपदेशकर असमाप्त हुए उस प्रकरणका ' अथ य आत्मा ० ' ( जो आत्मा है वह सेतु है इन लोकोंकी मर्यादाका साङ्कर्यं न हो इसलिए सबका विधारक है ) यह श्रुति निर्देश करती है।

इसमें विधृति शब्दका आत्मशब्दके साथ सामानाधिकरण्य होनेसे विधारयिता कहा जाता है, क्योंकि ' क्तिच ' प्रत्ययका कर्ता अर्थ में विधान है I। जैसे जलके अविच्छिन्न प्रवाहका विधारक सेतु लोकमें क्षेत्र सम्पत्तिका मिश्रण न होनेके लिए है, वैसे यह आत्मा अध्यात्म आदि भेदसे भिन्न इन लोकोंका और वर्णाश्रमादिका असंभेदके लिये - संकर न होनेके लिये विधारक सेतु है। इस प्रकार यहाँ प्रकृत दहराकाशमें विधारणरूप महिमा को श्रुति दिखलाती है। और यह महिमा ' एतस्य वा अक्षरस्य ० ' ( हे गार्गी!

इसी अक्षरकी आज्ञामें सूर्य . और चन्द्रमा विधारित हुए रहते हैं ) इत्यादि दूसरी श्रुतिसे परमेश्वरमें उपलब्ध होती है और इस प्रकार दूसरे स्थलमें भी ‘ एष सर्वेश्वरः ० ' ( यही सर्वेश्वर है, भूतोंका पालक है, इन लोकोंकी मर्यादाका संकर न हो इसलिए विधारक सेतु है ) इस प्रकार निश्चित परमेश्वरवाक्य में सुना जाता है। इस प्रकार धृतिरूप हेतुसे यह दहर परमेश्वर ही है॥ १६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' अथ य आत्मा ' इस श्रुतिमें जो ' अथ ' शब्द है वह पूर्वं दहराकाशरूप प्रकरणकी अनुवृत्ति तथा दहराकाशमें धृति आदि गुणोंका प्रारम्भ वाचक है। यहाँ धृति शब्दका अर्थ धारण करनेवाला है। और उस दहररूप विधारकको श्रुतिमें आत्मा कहा गया है। अतः धृति आदि हेतुओंसे दहराकाश परमेश्वर ही है।। १६

1.3.17 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १७

सूत्र १.३.१७

प्रसिद्धेश् च ॥ १.३.१७ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 259

पदच्छेद — प्रसिद्धः च

सूत्रार्थ — ' आकाशो वै नाम ' इत्यादि श्रुतिमें आकाश शब्द परमात्मामें ही प्रसिद्ध है, इससे भी दहराकाश परमेश्वर ही है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च परमेश्वर एव दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः इत्युच्यते यत्कारणमाकाशशब्दः परमेश्वरे प्रसिद्धः आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते इत्यादिप्रयोगदर्शनात्। जीवे तु न क्वचिदाकाशशब्दः प्रयुज्यमानो दृश्यते। भूताकाशस्तु सत्यामप्याकाशशब्दप्रसिद्धौ उपमानोपमेयभावाद्यसंभवान्न ग्रहीतव्य इत्युक्तम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इस हेतु से भी ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश : ' इस वाक्यमें परमेश्वर ही कहा जाता है। क्योंकि ' आकाशो वै नाम ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम रूपात्मक प्रपञ्चका निर्वाहक है ) ' सर्वाणि ह वा ० ' ( ये सब भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि प्रयोगोंके देखनेसे आकाशशब्द परमेश्वर में प्रसिद्ध है। और जीवके लिए तो प्रयुक्त किया हुआ आकाशशब्द कहीं पर भी देखनेंमें नहीं आता। यद्यपि भूताकाशमें आकाशशब्दको प्रसिद्धि है तो भी उपमान उपमेयभावादिके असम्भव होनेसे उसका ग्रहण करना ठीक नहीं है, ऐसा ( ब्र ० सू ० १।३।१४ ) में कहा गया है॥ १७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' आ समन्तात् काशते दीप्यते इति आकाश : ' इससे चारों ओर प्रकाशित तथा विभुत्वादि गुण युक्त स्वयं ज्योति ब्रह्म में आकाशशब्द प्रसिद्ध है। इस प्रकार आकाशशब्दके व्युत्पत्ति लभ्य अर्थसे मी परमात्मा ही सिद्ध होता है। यद्यपि आकाशशब्द भूताकाशमें रूढ़ है, तथापि यहाँ उसका ग्रहण करना युक्त नंहीं है, क्योंकि ' यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश : ' इस श्रुतिसे उपमानउपमेयभावका निर्देश है। वह एक आकाशमें सम्भव नहीं है, इसलिए दहराकाश परमेश्वर ही है॥ १७

1.3.18 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १८

सूत्र १.३.१८

इतरपरामर्शात् स इति चेन् नासंभवात् ॥ १.३.१८ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 260

पदच्छेद — इतरपरामर्शात् , सः , इति " चेत् , न असम्भवात्

सूत्रार्थ — ' एष सम्प्रसाद : ' इस प्रकार इस प्रकरणमें सम्प्रसाद शब्दसे ( इतरपरामर्शात् ) जीवका परामर्श होता है। इसलिए ( स ) जीव दहराकाश है, ( इति चेन्न ) यह कथन युक्त नहीं है, ( असम्भवात् ) क्योंकि आकाशके उपमेयत्व, पापरहितत्वादि धर्म जीव में सम्भव नहीं हैं।

शाङ्करभाष्य

यदि वाक्यशेषबलेन दहर इति परमेश्वरः परिगृह्येत अस्ति हीतरस्थापि जीवस्य वाक्यशेषे परामर्शः अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच इति अत्र हि संप्रसादशब्दः श्रुत्यन्तरे सुषुप्तावस्थायां दृष्टत्वादवस्थावन्तं जीवं शक्नोत्युपस्थापयितुम् नार्थान्तरम् तथा शरीरव्यपाश्रयस्यैव जीवस्य शरीरात्समुत्थानं संभवति यथाकाशव्यपाश्रयाणां वाय्वादीनामाकाशात्समुत्थानम् तद्वत् यथा चादृष्टोऽपि लोके परमेश्वरविषय आकाशशब्दः परमेश्वरधर्मसमभिव्याहारात् आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता इत्येवमादौ परमेश्वरविषयोऽभ्युपगतः एवं जीवविषयोऽपि भविष्यति तस्मादितरपरामर्शात् दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः इत्यत्र स एव जीव उच्यत इति चेत् नैतदेवं स्यात् कस्मात् असंभवात्। न हि जीवो बुद्ध्याद्युपाधिपरिच्छेदाभिमानी सन् आकाशेनोपमीयेत। न चोपाधिधर्मानभिमन्यमानस्यापहतपाप्मत्वादयो धर्माः संभवन्ति। प्रपञ्चितं चैतत्प्रथमे सूत्रे। अतिरेकाशङ्कापरिहाराय अत्र तु पुनरुपन्यस्तम्। पठिष्यति चोपरिष्टात् अन्यार्थश्च परामर्शः इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वाक्यशेष बलसे यदि यह स्वीकृत हो कि दहर परमेश्वर है, तो ' अथ य एष सम्प्रसादो ० ' ( प्रजापतिने कहा कि जो यह सम्प्रसाद - जीव इस देहेन्द्रिय समूहमें आत्मबुद्धिका त्यागकर आत्मज्ञानद्वारा प्रत्यगभिन्न ब्रह्मका साक्षात्कारकर पर ज्योति स्वरूपको प्राप्त करता है और अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है वह आत्मा है ) इस वाक्यशेषमें इतरका - जीवका भी परामर्श होता है।

यहाँ पर ही अन्य श्रुतिमें सम्प्रसाद शब्द सुषुप्ति अवस्थामें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है, इसलिए यह संप्रसाद शब्द उस अवस्थावाले जीवका उपस्थापन कर सकता है अन्यका नहीं।

जैसे आकाश व्यपाश्रय वायु आदिका आकाशसे समुत्थान होता है, वैसे शरीर व्यपाश्रय जीवका शरीरसे समुत्थान सम्भव है | जैसे लोकव्यवहारमें परमेश्वर विषयक आकाशशब्द अदृष्ट - अप्रसिद्ध होनेपर भी ' आकाशो वै नाम ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्माण करनेवाला है ) इत्यादि श्रुतिमें परमेश्वर धर्मके समभिव्यहार - समीप निर्देश होनेसे परमेश्वर विषयक स्वीकृत किया गया है, वैसे जीव विषयक भी हो जायगा।

इसलिए इतर - जीवके परामर्श होने से ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश : ' इस वाक्यमें वही जीव कहा जाता है। सिद्धान्ती – ऐसा कहो तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि असम्भव है। बुद्धि आदि उपाधियोंसे परिच्छिन्नत्वाभिमानी हुआ जीव [ यावान्वा अयमाकाशः ] आकाशंसे उपमित नहीं हो सकता, और उपाधिके धर्मोका अभिमान करनेवाले जीवमें पापरहितत्व आदि धर्म भी सम्भव नहीं हैं। इस अधिकरणके प्रथम ( १४ वें ) सूत्रमें इसका विस्तारसे वर्णन किया जा चुका है।

यहाँ तो वक्ष्यमाण अधिक आशङ्काके परिहार के लिए इसका पुनः उपन्यास किया गया है। और आगे ' अन्यार्थश्च परामर्श : ' इस सूत्र में जीवपरामर्शका प्रयोजन कहेंगे॥ १८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे ' आकाश परमेश्वर है ' ऐसा लोकव्यवहार में परमेश्वरके लिए आकाशशब्दका प्रयोग अप्रसिद्ध है, तो भी ' एष आत्मापहतपाप्मा ' इस वाक्यशेषमें परमेश्वरके अपहतपाप्मत्वादि धर्मोका आकाश श्रुतिके समीप निर्देश होनेसे ' आकाशो वै नाम ' इत्यादि स्थलोंमें परमेश्वरके लिए आकाश शब्दका प्रयोग स्वीकार किया गया है, वैसे ' अथ य एष सम्प्रसादो ' इत्यादि वाक्यशेष गत लिङ्गोंसे आकाश शब्दका जीवके लिए प्रयोग हो सकता है, अतः सम्प्रसाद और उत्थानरूप लिङ्गोंसे ब्रह्मसे भिन्न जीवका भी परामर्श होता है। इससे ' दहरोऽस्मिन् ' यहाँ जिसका शरीर से समुत्थान हो सकता है, उसका ही दहराकाश शब्दसे ग्रहण करना युक्त है, ब्रह्मका नहीं, इसलिए दहराकाश जीव है इसका ' नैतदेवं स्यात् ' से समाधान किया जाता है || १८ ||

1.3.19 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र १९

सूत्र १.३.१९

उत्तराच् चेद् आविर्भूतस्वरूपस् तु ॥ १.३.१९ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.१९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 261

पदच्छेद — उत्तराद् , चेत् , आविर्भूतस्वरूपः , तु

सूत्रार्थ — ( उत्तराद् ) ' य एषोऽक्षिणि ' इत्यादि प्रजापति वाक्यसे जाग्रत् आदि अवस्थापन जीव में पापरहितत्व आदि धर्मो का संभव होनेसे जीव दहराकाश है, ( चेत् ) यदि ऐसा कहो तो ( आविर्भूतस्वरूपः ) परमार्थरूपसे जीव विवक्षित है जीवरूपसे नहीं, इसलिए जोव दहराकाश नहीं है, अपितु, ब्रह्म है। ( तु ) शब्द पूर्वपक्ष व्यावृत्त्यर्थक है।

शाङ्करभाष्य

इतरपरामर्शाद्या जीवाशङ्का जाता सा असंभवान्निराकृता। अथेदानीं मृतस्येवामृतसेकात् पुनः समुत्थानं जीवाशङ्कायाः क्रियते उत्तरस्मात्प्राजापत्याद्वाक्यात्। तत्र हि य आत्मापहतपाप्मा इत्यपहतपाप्मत्वादिगुणकमात्मानमन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं च प्रतिज्ञाय य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा इति ब्रुवन् अक्षिस्थं द्रष्टारं जीवमात्मानं निर्दिशति।

एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि इति च तमेव पुनः पुनः परामृश्य य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा इति तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मा इति च जीवमेवावस्थान्तरगतं व्याचष्टे। तस्यैव चापहतपाप्मत्वादि दर्शयति एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म इति।

नाह खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि इति च सुषुप्तावस्थायां दोषमुपलभ्य एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मात् इति चोपक्रम्य शरीरसंबन्धनिन्दापूर्वकम् एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः इति जीवमेव शरीरात्समुत्थितमुत्तमं पुरुषं दर्शयति। तस्मादस्ति संभवो जीवे पारमेश्वराणां धर्माणाम्।

अतः दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः इति जीव एवोक्त इति चेत्कश्चिद्ब्रूयात् तं प्रति ब्रूयात् आविर्भूतस्वरूपस्तु इति। तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः नोत्तरस्मादपि वाक्यादिह जीवस्याशङ्का संभवतीत्यर्थः। कस्मात् यतस्तत्राप्याविर्भूतस्वरूपो जीवो विवक्ष्यते। आविर्भूतं स्वरूपमस्येत्याविर्भूतस्वरूपः भूतपूर्वगत्या जीववचनम्।

एतदुक्तं भवति य एषोऽक्षिणि इत्यक्षिलक्षितं द्रष्टारं निर्दिश्य उदशरावब्राह्मणेन एनं शरीरात्मतया व्युत्थाप्य एतं त्वेव ते इति पुनः पुनस्तमेव व्याख्येयत्वेनाकृष्य स्वप्नसुषुप्तोपन्यासक्रमेण परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते इति यदस्य पारमार्थिकं स्वरूपं परं ब्रह्म तद्रूपतयैनं जीवं व्याचष्टे न जैवेन रूपेण। यत्तत् परं ज्योतिरुपसंपत्तव्यं श्रुतम् तत्परं ब्रह्म तच्चापहतपाप्मत्वादिधर्मकम् तदेव च जीवस्य पारमार्थिकं स्वरूपम् तत्त्वमसि इत्यादिशास्त्रेभ्यः नेतरदुपाधिकल्पितम्।

यावदेव हि स्थाणाविव पुरुषबुद्धिं द्वैतलक्षणामविद्यां निवर्तयन्कूटस्थनित्यदृक्स्वरूपमात्मानम् अहं ब्रह्मस्मि इति न प्रतिपद्यते तावज्जीवस्य जीवत्वम्।

यदा तु देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघाताद्व्युत्थाप्य श्रुत्या प्रतिबोध्यते नासि त्वं देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघातः नापि संसारी किं तर्हि तद्यत्सत्यं स आत्मा चैतन्यमात्रस्वरूपस्तत्त्वमसीति तदा कूटस्थनित्यदृक्स्वरूपमात्मानं प्रतिबुध्य अस्माच्छरीराद्यभिमानात्समुत्तिष्ठन् स एव कूटस्थनित्यदृक्स्वरूप आत्मा भवति स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इत्यादिश्रुतिभ्यः। तदेव चास्य पारमार्थिकं स्वरूपम् येन शरीरात्समुत्थाय स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।

कथं पुनः स्वं च रूपं स्वेनैव च निष्पद्यत इति संभवति कूटस्थनित्यस्य सुवर्णादीनां तु द्रव्यान्तरसंपर्कादभिभूतस्वरूपाणामनभिव्यक्तासाधारणविशेषाणां क्षारप्रक्षेपादिभिः शोध्यमानानां स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः स्यात् तथा नक्षत्रादीनामहन्यभिभूतप्रकाशानामभिभावकवियोगे रात्रौ स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः स्यात् न तु तथात्मचैतन्यज्योतिषो नित्यस्य केनचिदभिभवः संभवति असंसर्गित्वात् व्योम्न इव दृष्टविरोधाच्च दृष्टिश्रुतिमतिविज्ञातयो हि जीवस्य स्वरूपम् तच्च शरीरादसमुत्थितस्यापि जीवस्य सदा निष्पन्नमेव दृश्यते सर्वो हि जीवः पश्यन् श्रृण्वन् मन्वानो विजानन्व्यवहरति अन्यथा व्यवहारानुपपत्तेः तच्चेत् शरीरात्समुत्थितस्य निष्पद्येत प्राक्समुत्थानाद्दृष्टो व्यवहारो विरुध्येत अतः किमात्मकमिदं शरीरात्समुत्थानम् किमात्मिका वा स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिरिति अत्रोच्यते प्राग्विवेकविज्ञानोत्पत्तेः शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनोपाधिभिरविविक्तमिव जीवस्य दृष्ट्यादिज्योतिःस्वरूपं भवति यथा शुद्धस्य स्फटिकस्य स्वाच्छ्यं शौक्ल्यं च स्वरूपं प्राग्विवेकग्रहणाद्रक्तनीलाद्युपाधिभिरविविक्तमिव भवति प्रमाणजनितविवेकग्रहणात्तु पराचीनः स्फटिकः स्वाच्छ्येन शौक्ल्येन च स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत इत्युच्यते प्रागपि तथैव सन् तथा देहाद्युपाध्यविविक्तस्यैव सतो जीवस्य श्रुतिकृतं विवेकविज्ञानं शरीरात्समुत्थानम् विवेकविज्ञानफलं स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः केवलात्मस्वरूपावगतिः।

तथा विवेकाविवेकमात्रेणैवात्मनोऽशरीरत्वं सशरीरत्वं च मन्त्रवर्णात् अशरीरं शरीरेषु इति शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते इति च सशरीरत्वाशरीरत्वविशेषाभावस्मरणात्। तस्माद्विवेकविज्ञानाभावादनाविर्भूतस्वरूपः सन् विवेकविज्ञानादाविर्भूतस्वरूप इत्युच्यते। न त्वन्यादृशौ आविर्भावानाविर्भावौ स्वरूपस्य संभवतः स्वरूपत्वादेव। एवं मिथ्याज्ञानकृत एव जीवपरमेश्वरयोर्भेदः न वस्तुकृतः व्योमवदसङ्गत्वाविशेषात्।

कुतश्चैतदेवं प्रतिपत्तव्यम् यतः य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते इत्युपदिश्य एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म इत्युपदिशति । योऽक्षिणि प्रसिद्धो द्रष्टा द्रष्टृत्वेन विभाव्यते सोऽमृताभयलक्षणाद्ब्रह्मणोऽन्यश्चेत्स्यात् ततोऽमृताभयब्रह्मसामानाधिकरण्यं न स्यात्। नापि प्रतिच्छायात्मायमक्षिलक्षितो निर्दिश्यते प्रजापतेर्मृषावादित्वप्रसङ्गात्।

तथा द्वितीयेऽपि पर्याये य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति इति न प्रथमपर्यायनिर्दिष्टादक्षिपुरुषाद्द्रष्टुरन्यो निर्दिष्टः एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि इत्युपक्रमात्। किंच अहमद्य स्वप्ने हस्तिनमद्राक्षम् नेदानीं तं पश्यामि इति दृष्टमेव प्रतिबुद्धः प्रत्याचष्टे। द्रष्टारं तु तमेव प्रत्यभिजानाति य एवाहं स्वप्नमद्राक्षम् स एवाहं जागरितं पश्यामि इति।

तथा तृतीयेऽपि पर्याये नाह खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि इति सुषुप्तावस्थायां विशेषविज्ञानाभावमेव दर्शयति न विज्ञातारं प्रतिषेधति। यत्तु तत्र विनाशमेवापीतो भवति इति तदपि विशेषविज्ञानविनाशाभिप्रायमेव न विज्ञातृविनाशाभिप्रायम् न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् इति श्रुत्यन्तरात्।

तथा चतुर्थेऽपि पर्याये एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मात् इत्युपक्रम्य मघवन् मर्त्यं वा इदं शरीरम् इत्यादिना प्रपञ्चेन शरीराद्युपाधिसंबन्धप्रत्याख्यानेन संप्रसादशब्दोदितं जीवम् स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते इति ब्रह्मस्वरूपापन्नं दर्शयन् न परस्माद्ब्रह्मणोऽमृताभयस्वरूपादन्यं जीवं दर्शयति। केचित्तु परमात्मविवक्षायाम् एतं त्वेव ते इति जीवाकर्षणमन्याय्यं मन्यमाना एतमेव वाक्योपक्रमसूचितमपहतपाप्मत्वादिगुणकमात्मानं ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामीति कल्पयन्ति।

तेषाम् एतम् इति संनिहितावलम्बिनी सर्वनामश्रुतिर्विप्रकृष्येत भूयःश्रुतिश्चोपरुध्येत पर्यायान्तराभिहितस्य पर्यायान्तरेणानभिधीयमानत्वात्। एतं त्वेव ते इति च प्रतिज्ञाय प्राक्चतुर्थात्पर्यायादन्यमन्यं व्याचक्षाणस्य प्रजापतेः प्रतारकत्वं प्रसज्येत। तस्मात् यदविद्याप्रत्युपस्थापितमपारमार्थिकं जैवं रूपं कर्तृत्वभोक्तृत्वरागद्वेषादिदोषकलुषितमनेकानर्थयोगि तद्विलयनेन तद्विपरीतमपहतपाप्मत्वादिगुणकं पारमेश्वरं स्वरूपं विद्यया प्रतिपद्यते सर्पादिविलयनेनेव रज्ज्वादीन्।

अपरे तु वादिनः पारमार्थिकमेव जैवं रूपमिति मन्यन्तेऽस्मदीयाश्च केचित्। तेषां सर्वेषामात्मैकत्वसम्यग्

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अन्यके परामर्शसे जो जीव विषयक आशङ्का उत्पन्न हुई थी, उसका परिहार जोवमें पापरहितत्व आदि धर्मोके असम्भव होनेसे किया जा चुका है।

अब अमृतसेक ( छिड़कने ) से जैसे मृतक पुन : जी उठता है, वैसे हो अनन्तरोक्त प्रजापतिवाक्यसे जीव विषयक आशङ्काका पुनः उत्थान करते हैं, क्योंकि वहाँ ' य आत्मापहतपाप्मा ० ' ( जो आत्मा है वह पापरहित है ) इस श्रुतिवाक्यसे पानरहितत्व आदि धर्मोवाले आत्माका अन्वेषण करना चाहिए, विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिए, इस प्रकारकी प्रतिज्ञा कर ' य एषोऽक्षिणि ० ' ( जो यह अक्षिमें पुरुष दिखाई देता है वह आत्मा है ) इस प्रकार कहते हुए प्रजापति अक्षिस्य द्रष्टा जीवका आत्मरूपसे निर्देश करते हैं।

' एतं त्वेव ० ' ( इस आत्माको ही मैं तुमसे पुनः कहता हूँ ) उसका ही पुनः पुनः परामर्श कर ' य एष स्वप्ने ० ' ( जो यह स्वप्न में महीयमान स्त्री आदिसे पूजित हुआ विचरता है अर्थात् भोगोंका! अनुभव करता है वह आत्मा है ) ' तद्यत्रैतत्सुतः ० ' ( जिस सुषुप्ति अवस्था में यह सोया हुआ दर्शन आदि वृत्तिसे रहित और सम्यक्रूपसे आनन्दित हो स्नप्नका अनुभव नहीं करता वह आत्मा है ) इस प्रकार अवस्थान्तरगत जीवका ही व्याख्यान करते हैं।

' एतदमृतम् ० ', ( यह अमृत, अभय और ब्रह्म है ) इसप्रकार उसीको पापरहितत्वादिरूपसे दिखलाते हैं।

' नाह खल्वयमेव ' ( निश्चय यह सुषुप्ति अवस्था में यह मैं हूँ इसप्रकार न आत्मा अपनेको जानता है और न यह इन अन्य प्राणियोंको ही जानता हैं ) इसप्रकार सुषुप्ति अवस्थामें दोष देखकर ' एतं त्वेव ते ० ' ( इसीको ही मैं तुमसे पुन : कहता हूँ, इससे अन्यको नहीं ) ऐसा उपक्रम कर शरीर सम्बन्धकी निन्दा पूर्वक ' एष सम्प्रसादो ० ' ( यह सम्प्रसाद - जीव इस शरीरसे उठकर [ अभिमानका त्यागकर ] पर ज्योतिको प्राप्तकर पुनः अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है ) इसप्रकार शरीरसे समुत्थित जीवको ही उत्तम पुरुषरूपसे दिखलाता है।

इसलिए परमेश्वरके धर्मोका जीवमें सम्भव है। अतः ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश : ' इस वाक्यसे दहराकाश जीव ही कहा गया है। यदि कोई ऐसा कहे, तो उसके प्रति सिद्धान्ती कहे कि ' आविर्भूतस्वरूपस्तु ' इस सूत्र में ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है। उत्तरवाक्यसे भी यहाँ जीवको आशङ्का सम्भव नहीं है, ऐसा अर्थ है, क्यों? क्योंकि उसमें भी आविर्भूतस्वरूप जीव विवक्षित है। जाग्रतादि अवस्थाओंसे शोधनकर अभिव्यक्त हुआ है निज प्रत्यगमिन्न ब्रह्मस्वरूप जिसको वह आविर्भूतस्वरूप है।

भूत पूर्व अज्ञान अवस्थाकी अपेक्षा यह जीववचन | अभिप्राय यह है कि ' य एषोऽक्षिणि ' इसप्रकार नेत्रसे उपलक्षित [ विश्वरूप ] द्रष्टाका निर्देश कर उदशरावब्राह्मण द्वारा शरीरमें आत्मत्वसे इस जीवको अलगकर ' एतं वेव ते ० ' ( इसीको ही मैं तुमसे फिर कहता हूँ ) इसप्रकार पुनः पुनः उसीका व्याख्येयरूपसे ग्रहणकर स्वप्न और सुषुप्तिके उपन्यासके क्रमसे ‘ परं ज्योतिरूपसम्पद्य ० ' ( परं ज्योतिः स्वरूपको प्राप्तकर अपनेरूपसे अभिनिष्पन्न होता है ) इस प्रकारसे इस जीवका यथार्थ- पारमार्थिकरूप परब्रह्म है उस रूपसे इस जीवका व्याख्यान करते हैं जीवके रूपसे नहीं।

प्राप्तव्य जो परज्योतिः श्रुति प्रतिपादित है वह परब्रह्म है और वह पापरहितत्व आदि धर्मवाला है। वही जीवका ' तत्त्वमसि ' इत्यादि शास्त्रोंसे ज्ञातव्य पारमार्थिक स्वरूप है, इससे भिन्न उपाधि कल्पित स्वरूप पारमार्थिक नहीं है। जब तक स्थाणु में पुरुषबुद्धि के समान देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप संघात नहीं, तू संसारी भी नहीं है, किन्तु जो सत्य है वह चैतन्यस्वरूप आत्मा है ' तत्त्वमसि ' ( वह तू है ) इसप्रकार श्रुति द्वारा प्रतिबोधित होता है।

तब कूटस्थ, नित्य, ज्ञानस्वरूप आत्माको जानकर इस शरीर आदि अभिमानका परित्यागकर वही कूटस्थ, निला, ज्ञानस्वरूप आत्मा होता है, क्योंकि ' स यो ह वै ० ' ( जो उस परम ब्रह्मको जानता है निस्सन्देह वह ब्रह्म होता है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं। शरीरसे आत्माभिमानको त्यागकर जो परम ज्योतिस्वरूपको प्राप्त करता है वही उसका पारमार्थिक स्वरूप है। परन्तु अपने हो रूपको आप ही निष्पन्न होता है यह नित्य कूटस्थमें किस प्रकार सम्भव है?

अन्य द्रव्यके संसर्गसे जिनका स्वरूप अभिभूत हो गया है, तथा असाधारण विशेषगुण अभिव्यक्त नहीं है, क्षारप्रक्षेपादिसे शोधन किए हुए उन सुवर्णादिकी तो स्वरूपसे अभिव्यक्ति होती है। तथा दिनमें जिनके प्रकाशका अभिभव हो जाता है, उन नक्षत्र आदिकी रात्रि में अभिभव करने वालेके अभाव में स्वरूपसे अभिव्यक्ति होती है, यह सम्भव है | परन्तु आत्मा चैतन्यरूप नित्य ज्योतिका इसप्रकार किसीसे • अभिभव सम्भव नहीं है, क्योंकि आकाशके समान वह संसर्ग रहित है और प्रत्यक्ष विरोध भी है।

कारण कि दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान ही जीवका स्वरूप है। वह शरीरसे अभिमानका न त्याग करनेवाले जीव में भी सदा रहते हैं। सभी जीव देखते 1 सुनते, विचार करते और समझते हुए व्यवहार करते हैं, अन्यथा व्यवहारको उपपत्ति नहीं होगी। वह स्वरूप यदि शरीरसे अभिमान त्याग करनेसे निष्पन्न होता हो तो समुत्थानसे पूर्व देखा गया व्यवहार बाधित हो जायगा, अतः शरीरसे समुत्थानका स्वरूप क्या है और स्वरूपसे अभिव्यक्तिका स्वरूप क्या है?

सिद्धान्ती - इसके उत्तरमें कहते हैं -- जैसे शुद्ध स्फटिककी स्वच्छता और शुक्लरूप . विवेक ज्ञान होनेसे पूर्व रक्त, नील आदि उपाधियोंसे अविविक्त - सा होता है, वैसे विवेक ज्ञानकी उत्पत्ति होनेसे पूर्वं शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय, वेदनारूप उपाधियोंसे जीवकी दृष्टि आदि ज्योति : स्वरूप अविवक्त - सा होता है। यद्यपि विवेक ज्ञानके पूर्व में भी स्फटिक वैसा शुक्ल और स्वच्छ था, तो भी प्रमाण जनित विवेक ज्ञानके अनन्तर तो स्फटिक अपने स्वच्छ और शुक्लरूपसे अभिव्यक्त हुआ कहा जाता है।

उसी प्रकार देह आदि उपाधियोंसे अविविक्त हुए जीवका श्रुतियोंसे उत्पन्न हुआ विवेक - विज्ञान ही मानो शरीरसे समुत्थान है और इस विवेक विज्ञानका फल केवल आत्मस्वरूपका साक्षात्कार ही स्वरूपाभिव्यक्ति है। इसी प्रकार ' अशरीरं शरीरेषु ' ( जो शरीरोंमें अशरीर है ) इस मन्त्र से विवेक और अविवेकमात्र से ही आत्मा अशरीर और सशरीर है। और ' शरीरस्थोऽपि ० ' ( हे कौन्तेय!

वह शरीरमें स्थित हुआ भी वास्तव में न करता है और न किसी कर्मसे लिप्त होता है ) इस प्रकार सशरीरत्व और अशरीरत्व विषयक विशेषाभाव - मावाभावकी स्मृति है। इसलिए विवेकज्ञानके अभाव से अनभिव्यक्त स्वरूप होता हुआ भी जीव विवेकविज्ञानसे अभिव्यक्त स्वरूप होता है ऐसा कहा जाता है। अन्य प्रकारसे अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्ति स्वरूपमें संभव नहीं हैं, क्योंकि वह स्वरूप है। उसी प्रकार जीव और ईश्वरका भेद मिथ्याज्ञानसे जन्य है वास्तविक नहीं है, क्योंकि आत्मामें आकाशके समान असंगत्व अविशेष है।

परन्तु यह कैसे जाना जाय? इससे कि ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ० ' ( नेत्रमें जो यह पुरुष दिखाई देता है ) ऐसा उपदेश कर ' एतदमृतम ० ' ( यह अमृत और अभय है यह ब्रह्म है ) ऐसा उपदेश किया है। नेत्रमें जो प्रसिद्ध विश्वरूप द्रष्टारूपसे ज्ञात होता है यदि वह अमृत और अमय स्वरूप ब्रह्मसे अन्य हो तो अमृत और अभयरूप ब्रह्म के साथ उस [ अक्षिस्थ पुरुष ] का सामानाधिकरण्य नहीं होगा। अक्षि लक्षित यह प्रतिबिम्बात्मा भी निर्दिष्ट नहीं है, क्योंकि प्रजापति मिथ्यावादी हो जायगा।

इसी प्रकार ' य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति ० ' ( स्वप्न में जो यह भोगोंको भोगता हुआ विचारता है वही आत्मा है ) दूसरी वार भी प्रथम वार निर्दिष्ट अक्षि पुरुषरूप द्रष्टासे भिन्न द्रष्टाका निर्देश नहीं है। क्योंकि ' एतं त्वेत ते ० ' ( इसीको मैं तुमसे पुनः कहता हूँ ) ऐसा उपक्रम है। किञ्च आज मैंने स्वप्न में हाथी देखा था, किन्तु अब उसको नहीं देख रहा हूँ, इस प्रकार द्रष्टका ही जागकर निषेध करता है।

' य एवाऽहं स्वममद्राक्षं ० ' ( जिस मैंने स्वप्न अवस्थाका अनुभव किया था वही मैं अब जाग्रत अवस्थाका अनुभव कर रहा हूँ ) इस प्रकार उसी द्रष्टाकी प्रत्यभिज्ञा करता है। इसी प्रकार तृतीयवार में ' नाह खल्व ० ' ( इस अवस्थामें तो निश्चय ही ' यह मैं हूँ ' इस प्रकार न यह आत्मा अपनेको जानता है और न इन प्राणियोंको ही जानता है ) इस प्रकार श्रुति सुषुप्ति अवस्था में विशेष विज्ञानका अभाव ही दिखलाती है विज्ञाताका प्रतिषेध नहीं करती।

उसमें ' विनाशमेवा ० ' ( वह विनाशको ही प्राप्त होता है ) यह भी विशेष विज्ञानके विनाशके अभिप्रायसे कहा गया है विज्ञाताके विनाशके अभिप्रायसे नहीं, क्योंकि ' नहि विज्ञातुर्विज्ञाते . ' ( विज्ञाताकी विज्ञप्ति - विज्ञानशक्तिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है ) यह दूसरी श्रुति है। इस प्रकार चौथी वार में भी ' एतं त्वेव ते ० ' ( इसीको मैं तुमसे फिर कहता हूँ इससे अन्यको नहीं ) ऐसा उपक्रम कर ' मघवन्मर्त्य वा ० ' ( हे इन्द्र!

निस्सन्देह यह शरीर मरणशील है ) इत्यादिसे विस्तार पूर्वक शरीर आदि उपाधियोंके सम्बन्धका निषेध कर ' सम्प्रसाद ' शब्द से कथित rtant ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता हैं ) इससे ब्रह्मस्वरूप प्राप्ति दिखलाकर प्रजापति अमृत, अभयस्वरूप परब्रह्म से जीवको अन्य नहीं दिखलाते।

कुछ एक आचार्य तो परमात्माकी विवक्षा में ' एतं त्वेव ते ' इससे जीवकी अनुवृत्ति अनुचित समझाने वाले [ य आत्मापहतपाप्मा ] इस वाक्योपक्रममें सूचित पापरहितत्व आदि गुण विशिष्ट इसी आत्माको तुम्हारे प्रति पुनः पुनः कहूँगा ऐसे अर्थकी कल्पना करते हैं। उनके मतमें संनिहित ज्ञान करानेवाली ' एतम् ' यह सर्वनाम श्रुति दूरान्वित हो जायगी अर्थात् जीवका प्रतिपादन न कर अब परमात्माका प्रतिपादन करने लगेगी।

और ' भूय : ' इस श्रुतिका बाध भी हो जायगा, क्योंकि [ ' य एषोऽक्षिणि ' ] एक पर्याय में अभिहितका द्वितीय पर्यायमें अभिधान नहीं है 1। किञ्च ' एतं त्वेव ते ' इसप्रकारकी प्रतिज्ञाकर चतुर्थ पर्यायके पूर्व तक अन्यान्य पदार्थोंका व्याख्यान करनेवाले प्रजापतिको प्रतारकत्व - मिथ्यावादित्व दोष प्रसक्त हो जायगा।

अतः जैसे सर्पादिके बाध होनेसे रज्जु आदिके यथार्थं स्वरूपका प्रतिपादन होता है, वैसे अविद्यासे उपस्थापित कर्तृत्व भोक्तृत्व, राग द्वेष आदि दोषोंसे दूषित अनेक अनर्थोंसे युक्त जीवके अपारमार्थिक स्वरूपका बाधकर विद्या उसके विपरीत पापरहितत्व आदि गुण विशिष्ट परमेश्वरके स्वरूपका प्रतिपादन करती है। परन्तु दूसरे वादी और कुछ हमारे सिद्धान्त पक्ष आचार्य भी जीवका रूप पारमार्थिक है, ऐसा मानते हैं।

आत्मैकत्व सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षीभूत उन सभी वादियोंके निराकरण के लिए यह शारीरकशास्त्र आरम्भ किया गया है। एक हो परमेश्वर कूटस्थ, नित्य, विज्ञानस्वरूप अविद्यारूपी मायासे मायावीके समान अनेक हुआ जैसा प्रतीत होता है, उससे अन्य विज्ञानस्वरूप कोई वस्तु नहीं है। [ य आत्माऽपहतपाप्मा ] इस परमेश्वर वाक्य में जीवकी आशङ्काकर ‘ नासम्मवात् ' इत्यादिसे सूत्रकार उसका प्रतिषेध करते हैं।

उसका अभिप्राय यह है कि नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव कूटस्थ नित्य एक असंग परमात्मा में उससे विपरीत, जीवरूप, आकाशमें मलिनतादिके समान परिकल्पित है। न्यायसे युक्त द्वैतवाद के प्रतिषेधक एवं आत्मैकत्व प्रतिपादनपरक वाक्योंसे उसका अपनयन करूँगा, इस आशयसे परमात्माका जीवात्मासे भेद दृढ़ करते हैं। जीवका परमात्मासे भेद प्रतिपादन करना नहीं चाहते किन्तु अविद्यासे कल्पित लोकप्रसिद्ध जीवभेदका केवल अनुवाद करते हैं।

इसप्रकार स्वाभाविक - आविद्यक कर्तृत्व भोक्तृत्वका अनुवाद करनेसे प्रवृत्त हुई कर्मविधियाँ विरुद्ध ( बाधित ) नहीं होतीं, ऐसा मानते हैं। ' शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ' इत्यादिसे सूत्रकार यह दिखलाते हैं कि वेदान्तशास्त्रका प्रतिपाद्य विषय तो आत्मैकत्व ही है। हमने तो विद्वान् और अविद्वान्के भेदसे कर्मविधिके विरोध के परिहारका वर्णन किया है॥ १ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' य आत्मापहतपाप्मा ० ' ( छा ० ३।७।१ ) ( प्रजापतिने कहा कि जो [ धर्माधर्मादि रूप ] पापशून्य, जरारहित, मृत्युरहित, विशोक, क्षुधा रहित, पिपासा रहित, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है, उसे खोजना चाहिए, उसकी विशेषरूपसे जानने की इच्छा करनी चाहिए।

जो उस आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर प्रत्यगभिन्नरूपसे अनुभव कर लेता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामों- मोगों को प्राप्त कर लेता है ) इस प्रकार प्रजापतिको समामें आत्माकी महिमा सुनकर देवों और असुरोंने विचार किया कि हम उस आत्माको जानना चाहते हैं, जिसके जाननेसे सम्पूर्ण लोक और समस्त भोग उपलब्ध हो जाते हैं। तब देवोंकी ओरसे देवराज इन्द्र और असुरों की ओर असुरराट् विरोचन ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथोंमें समिधाएं लेकर प्रजापतिके पास आये।

' तौ हं द्वात्रिं शतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच ' ( उन्होंने बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्यवास किया, तब उनसे प्रजापतिने कहा -- तुम यहाँ किस इच्छासे ठहरे हो? ) उन्होंने कहा कि आत्माको जाननेके लिए हम यहाँ ठहरे हुए हैं।

' तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मा ० ' ( तब उनसे प्रजापतिने कहा- यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखाई देता है यह आत्मा है, यह अमृत, अभय और ब्रह्म है ) इत्यादि प्रजापति वाक्योंके आधार पर इस जीव विषयक शङ्काका पुनः उत्थान हुआ है कि पापरहितत्व आदि घर्मो का जीवमें असम्भव नहीं है, इसलिए जीव दहराकाश हो सकता है | परमेश्वरके अन्य धर्मोका भी जीवमें ' तस्यैव ' आदि भाष्यसे उल्लेख करते हैं।

* इसप्रकार इन्द्र और प्रजापतिके उपाख्यानसे यह प्रतीत होता है कि दहरवाक्यके कथनानन्तर इन्द्रके प्रश्नके उत्तर में प्रजापतिने ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मा ' यह प्रथम वार और य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा ' यह द्वितीय वार और ' तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मा ' यह तृतीय वार और ' अथ य एष सम्प्रसादो अस्माच्छरीरात्समुत्थाय ' यह चतुर्थं वार पापरहितत्व आदि स्वरूप जीवका उपदेश किया है, क्योंकि सर्वगत ब्रह्म में परिच्छिन्न नेत्रस्थान, स्वप्न अवस्थाका सम्बन्ध और शरीरसे उत्थान आदि सम्भव नहीं हैं।

इसलिए नेत्रमें स्थिति, स्वप्न अवस्थाका सम्बन्ध, सुषुप्ति अवस्था में शरीरसे समुत्थान इत्यादि लिङ्ग जिसमें सम्भव हैं उसीका प्रजापतिने पापरहितत्व आदि रूपसे वर्णन किया है। नेत्रमें स्थिति आदि सबका जीवमें सम्भव है। इसप्रकार पूर्वोक्तरीतिसे ब्रह्माने जीवका ही वर्णन किया है, और ' एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म ० ' ( यह अमृत, अभय और ब्रह्म है ) इस प्रजापति वाक्यसे परमेश्वरके पापरहितत्व, अमृतत्व, अमयत्व आदि धर्मं जीवमें सम्भव हैं।

अतः ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश : ' इस वाक्य घटित पापरहितत्वादि धर्म जीव में सम्भव होनेसे दहराकाश शब्दसे जीवका ग्रहण किया जा सकता है ब्रह्मका नहीं। द्वैतलक्षण अविद्याकी निवृत्तिकर कूटस्थ, नित्य, ज्ञानस्वरूप आत्माको ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार नहीं जान लेता तब तक जीव में जीवत्व है। परन्तु जब देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिके संघातसे पृथक् कर तू

* एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा ' इसप्रकार प्रजापतिने इन्द्र और विरोचनको उपदेश देकर कहा कि जलसे पूर्ण शराव [ सिकोरा ] में अपनेको देखो, विरोचन छायाको शरीरके अधीन देखकर अन्वय - व्यतिरेकसे शरीर आत्मा है ऐसा निश्चयकर लौट गया। किन्तु इन्द्र शरीरको विनाशी निश्चितकर प्रजापति के पास आया।

इसप्रकार ब्रह्माने इन्द्रकी शरीरादिमें आत्मबुद्धिको हटा - कर जीवका यथार्थस्वरूप [ ब्रह्म ] बतलाने के लिए कहा कि ' एतं वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो ` एवान्यत्रैतस्मात् ० ' ( इसीको ही मैं तुमसे फिर कहता हूँ, इससे अन्यको नहीं ) इत्यादि वाक्योंसे यहाँ प्रजापति औपाधिक जीवरूपसे जीवका व्याख्यान नहीं करते, क्योंकि वह तो लोक प्रसिद्ध है | अपितु उसका अनुवाद कर जाग्रत, स्वप्न सुयुप्ति इन परस्पर विलक्षण अवस्थाओं से विवेचन कर ब्रह्मस्वरूपका ज्ञान कराते हैं।

उपाधि रहित जीवका स्वरूप ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, किन्तु ब्रह्म ही है। ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ० ' ( इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतियाँ अभेदका प्रतिपादन करती हैं। इस आधारपर परमेश्वरके पापरहितत्वादि धर्मोंका जीवमें निर्देश किया है। इसप्रकार जातादि अवस्थाओं का कथन भी ब्रह्म स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए है, जीवके प्रतिपादनके लिए नहीं।

' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि श्रुति वाक्य मी जीवके पारमार्थिकस्वरूप ( ब्रह्म ) का ही प्रतिपादन करते हैं अविद्यादि उपाधिक जीवका नहीं।

पूर्वपक्षी - ' शरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( शरीरसे आत्माभिमानका त्यागकर परं ज्योतिको प्राप्तकर स्वरूपसे - आत्मरूप से अभिव्यक्त होता है ) यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा तो नित्य ज्ञानस्वरूप है और वह आकाशके समान असंग है ' तो उसके स्वरूपका किसीसे भी अभिभव सम्भव नहीं है और जीवके प्रत्यक्ष दर्शन आदि व्यवहारसे भी यह प्रतीत होता है, अज्ञपुरुषका चैतन्यस्वरूप भी वृत्ति में अभिव्यक्त होता है, अन्यथा केवल वृत्तिके जड़ होने से कोई भी व्यवहार नहीं होगा। अस्तु, परन्तु शरीर से समुत्थान और अपने से अपनी अभिव्यक्तिका स्वरूप क्या है?

* जिस आत्मा के ज्ञानसे कृतकृत्यता और समस्त भोगोंकी उपलब्धि होती है, उस आत्माको जानने के लिए इन्द्र और विरोचन दोनों प्रजापति के पास आये थे। ब्रह्मा उनके प्रति य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा ' इससे अपहतपाप्मत्व आदि विशिष्ट आत्माके उपदेशकी उपेक्षाकर अनात्मरूप छायाका यदि उपदेश करें तो निश्चित मिथ्यावादी सिद्ध होंगे। परन्तु ब्रह्माने ' य एषोऽक्षिण ' इस श्रुतिवाक्यसे छायात्माका उपदेश नहीं किया है, अपितु पापरहितत्वादि विशिष्ट आत्माका ही नेत्रस्थ विश्वरूप द्रष्टाका द्रष्टारूपसे उपदेश किया है। उसीको ही दूसरी बार स्वप्न अवस्थाको लेकर उपदेश किया है। क्योंकि ' एतं वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि ' इस प्रकारकी ब्रह्माने प्रतिज्ञाकी है।

* सिद्धान्ती अपने अभिमतको अधिक स्पष्ट करनेके लिए किसी अन्य आचार्य मतका उल्लेख करते हैं -

—— इस मतमें जीव और ईश्वर भिन्न - भिन्न हैं और अपहतपाप्मत्व आदि धर्म जीवमें सम्भव नहीं है, इसलिए ' एतं त्वेव ते ' इस श्रुतिस्थ ' एतम् ' पंदसे जीवकी अनुवृत्ति करना उचित नहीं है, किन्तु पापरहितत्व आदि गुणविशिष्ट परमात्माका ग्रहण करना चाहिए | परन्तु यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि प्रजापतिने ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ऐसा आरम्भ किया है।

इन्द्र और विरोचन के आनेपर उनके प्रति प्रथम वार प्रजापतिने जाग्रत् अवस्थाके अभिमानी नेत्रस्थ विश्वपुरुषका ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा ' इस प्रकार उपदेश किया। दूसरी वार इन्द्र के प्रति स्वप्न अवस्थाके अभिमानी तैजस पुरुषका ' य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति एष आत्मा ' इसप्रकार उपदेश किया है।

तृतीय वार सुषुप्ति अवस्थाके अभिमानी प्राज्ञका ' तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नःस्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाच ' ( छा ० ८।११।१ ) ( जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनादि वृत्तिसे रहित और सम्यक् - रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता वह आत्मा है ऐसा प्रजापतिने कहा, यह अमृत, अमय है और यह ब्रह्म है ) ऐसा उपदेश किया है। परन्तु इन्द्रने प्रत्येक अवस्थाका दोष वर्णन किया।

किन्तु ' एतं त्वेव ते ० ' ( जिसको तुमसे पहले कहा है उसीको मैं अब फिर कहूँगा ) ऐसा प्रजापतिकी प्रतिज्ञा रही है। जिस पापरहितत्वादि विशिष्ट आत्माको प्रजापतिने इन्द्रके प्रति पहले कहा है उसको अन्त तक कहते रहे हैं। चतुर्थं वारमें ' एवमेव एष सम्प्रसादो ० ' ( छा ० ८।१२।३ ) ( उसीप्रकार यह सम्प्रसाद इसी शरीर से समुत्थानकर परमज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है, वह उत्तम पुरुष है ) यहाँपर उसी आत्माका सम्प्रसादरूपसे उपदेश किया है।

इसलिए अवस्थाके भेदसे आत्माका भेद नहीं है। उसी जीवका ' एतम् ' पदसे प्रजापतिने उपदेश किया है। यदि ' एतम् ' पदसे परमात्माका ग्रहण होता तो चतुर्थवारमें इसका ग्रहण होता, परन्तु ब्रह्माने ‘ एतं त्वेव ते ' इसका वार - वार उपदेश किया है, वह युक्त न होता। क्योंकि जब पूर्वोक्तिका पुनः कथन होता है तभी ' भूय : ' पदका प्रयोग किया जाता है। परमेश्वरका स्वरूप तो चतुर्थवारमें कहा है। इससे ' भूयः ' पदका भी बांध होगा। इसलिए ' एतम् ' पदसे सन्निहित जीवका ग्रहण करना युक्त है ईश्वरका नहीं।

* जो लोग संसार तथा जीव और ईश्वरके भेदको सत्य मानते हैं अर्थात् जीवका कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिरूप और परमेश्वरका पापरहितत्व, अकर्तृत्व, सत्यकामत्व आदिरूप सत्य मानकर जीवब्रह्मकी एकताका प्रतिषेध करते हैं उनके मतका परिहार करने और यथार्थ आत्मैकत्वका ज्ञान कराने के लिए इस शारीरकशास्त्रका आरम्भ किया गया है। ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' ' तत्त्वमसि ' ' अहं ' ब्रह्मास्मि ' इत्यादि अद्वैतपरक वाक्य और ' नेति नेत्यात्मा ' इत्यादि द्वैतनिषेध परक वाक्योंद्वारा लोक .. प्रसिद्ध अविद्या कल्पित भेदका इस ग्रन्थमें निराकरण किया जाता है। ब्रह्म ही अविद्यासे संसारी जीव है, अतः वह उससे अन्य कोई वस्तु नहीं, क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ऐसी श्रुति है। यह शारीरकशास्त्रका प्रतिपाद्य विषय है। कल्पित वस्तुकी अधिष्ठानज्ञानसे निवृत्ति होती है। जीव तथा ब्रह्मका अविद्यासे कल्पित भेद भी ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे निवृत्त हो जाता है।। १ ९

1.3.20 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २०

सूत्र १.३.२०

अन्यार्थश् च परामर्शः ॥ १.३.२० ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 268

पदच्छेद — अन्यार्थः , च , परामर्शः

सूत्रार्थ — ( परामर्शश्च ) ' अथ य एष सम्प्रसाद : ' इस श्रुतिमें सम्प्रसाद शब्दसे जो जीवका परामर्श किया गया है, वह ( अन्यार्थ : ) अन्यके लिए ( परमात्माका प्रतिपादन करने के लिए ) है |

शाङ्करभाष्य

अथ योऽयं दहरवाक्यशेषे जीवपरामर्शो दर्शितः अथ य एष संप्रसादः इत्यादिः स दहरे परमेश्वरे व्याख्यायमाने न जीवोपासनोपदेशः नापि प्रकृतविशेषोपदेशः इत्यनर्थकत्वं प्राप्नोतीत्यत आह अन्यार्थोऽयं जीवपरामर्शो न जीवस्वरूपपर्यवसायी किं तर्हि परमेश्वरस्वरूपपर्यवसायी। कथम् संप्रसादशब्दोदितो जीवो जागरितव्यवहारे देहेन्द्रियपञ्जराध्यक्षो भूत्वा तद्वासनानिर्मितांश्च स्वप्नान्नाडीचरोऽनुभूय श्रान्तः शरणं प्रेप्सुरुभयरूपादपि शरीराभिमानात्समुत्थाय सुषुप्तावस्थायां परं ज्योतिराकाशशब्दितं परं ब्रह्मोपसंपद्य विशेषविज्ञानवत्त्वं च परित्यज्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते यदस्योपसंपत्तव्यं परं ज्योतिः येन स्वेन रूपेणायमभिनिष्पद्यते स एष आत्मापहतपाप्मत्वादिगुण उपास्यः इत्येवमर्थोऽयं जीवपरामर्शः परमेश्वरवादिनोऽप्युपपद्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अब जो दहर वाक्यशेषमें ' अथ य एष सम्प्रसादः ' इत्यादिसे जीवका परामर्श दिखलाया गया है। यदि ऐसा व्याख्यान करें कि वह दहर परमेश्वर है तो जीवकी उपासनाका उपदेश न करने और प्रकृत दहराकाशके विशेषके उपदेश न करनेके कारण अनर्थक हो जायगा। इसलिए कहते हैं - यह जीवका परामर्श अन्यार्थक है -- जीवके स्वरूप में पर्यवसायी नहीं है, किन्तु परमेश्वरके स्वरूपमें पर्यवसायी है। कैसे? सम्प्रसाद शब्द से उक्त जीव जाग्रत् अवस्थामें देह, इन्द्रियके पञ्जरका अध्यक्ष होकर नाड़ीमें जाकर जाग्रत् अवस्था अनुभव जन्य वासनाओंसे उत्पन्न हुए स्वप्न पदार्थोंका अनुभवकर जब श्रांत हो जाता है तब विश्राम स्थान प्राप्त करनेको इच्छासे दोनों प्रकारके शरीर अभिमानोंसे उठकर सुषुप्ति अवस्थामें आकाश शब्दसे प्रतिपाद्य पर ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मको प्राप्तकर विशेष विज्ञानवत्त्वका परित्यागकर अपने स्वरूप से अभिव्यक्त होता है। जो इसके प्राप्त करने योग्य परम ज्योति है वह जिस अपने परमार्थं स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है वह यह आत्मा पापरहितत्वादिगुण विशिष्ट उपास्य है, इस अभिप्राय से किया हुआ यह जीवका परामर्श परमेश्वरवादीके मत में भी उपपन्न होता है।। २०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * प्रजापति वाक्यमें जीवके अनुवादसे ब्रह्मके ही धर्म कहे गये हैं वे कर्मभोगी जीवमें सम्भव नहीं हैं, इसलिए जीव दहराकाश नहीं है। दहर वाक्य में जोवका परामर्श इसलिए किया गया है कि उसके परामर्शविना ब्रह्मभावका उपदेश सम्भव नहीं है, अत : इन तीनों अवस्थाओं में जीवका ग्रहण किया गया है। वस्तुतः नित्य आनन्द स्वरूप संप्रसाद तो परमेश्वर ही है, उस स्वरूपको सुषुप्ति अवस्थामें प्राप्त करनेसे जीवका भी सम्प्रसाद शब्दसे श्रुतियोंमें प्रतिपादन है॥ २०

1.3.21 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २१

सूत्र १.३.२१

अल्पश्रुतेर् इति चेत् तद् उक्तम् ॥ १.३.२१ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 269

पदच्छेद — अल्पश्रुतेः , इति चेत् , तत् , उक्तम्

सूत्रार्थ — ( अल्पश्रुतेः ) ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश : ' इससे आकाश में अल्पत्वका श्रवण है, अतः दहराकाश परमेश्वर नहीं है, किन्तु जीव है, ( इति चेत् ) यदि ऐसा कहो तो ( तदुक्तम् ) इसका ' अभंकौकस्त्वात् ' ( ब्र ० सू ० १/२/७ ) इस सूत्र में समाधान कहा गया है, इसलिए दहराकाश परमेश्वर ही है।

शाङ्करभाष्य

यदप्युक्तम् दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः इत्याकाशस्याल्पत्वं श्रूयमाणं परमेश्वरे नोपपद्यते जीवस्य तु आराग्रोपमितस्याल्पत्वमवकल्पत इति तस्य परिहारो वक्तव्यः। उक्तो ह्यस्य परिहारः परमेश्वरेऽप्यापेक्षिकमल्पत्वमवकल्पत इति अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च इत्यत्र स एवेह परिहारोऽनुसंधातव्य इति सूचयति। श्रुत्यैव च इदमल्पत्वं प्रत्युक्तं प्रसिद्धेनाकाशेनोपमिमानया यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' दहरोऽस्मिन्नन्त

अन्तराकाश : ' इस प्रकार आकाशमें श्रूयमाण अल्पत्व परमेश्वरमें उपपन्न नहीं होता, किन्तु आरके अग्रभाग के सदृश जीव में अल्पत्व उपपन्न होता है, ऐसा जो कहा गया है, उसका परिहार करना चाहिए | इसका परिहार तो ' अर्भकौकस्त्वात् ' इस सूत्र में कहा गया है कि परमेश्वरका अल्पत्व आपेक्षिक हो सकता है। उसी परिहारका अनुसन्धान यहाँ भी करना चाहिए। इस प्रकार सूत्रकार सूचित करते हैं। और ' यावान्वा ० ' ( जितना यह बाह्याकाश है उतना हृदयान्तर्गत यह आकाश है ) प्रसिद्ध आकाशके साथ उपमा देनेवाली इस श्रुतिसे दहराकाशमें इस अल्पत्वका निरास किया गया है॥ २१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस उक्त हेतुसे भी दहराकाश जीव नहीं है, किन्तु परमेश्वर ही है। ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ’ इस दहरवाक्य और ' आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म ' इस प्रजापति वाक्यका क्रमशः सगुण और निर्गुण ब्रह्म में समन्वय सिद्ध होता है। नाभिसे एक वितस्ती ऊपर और कण्ठसे चार अङ्गुल नीचे वाम भाग में स्थित हृदय सर्वलोक प्रसिद्ध है। उसके अन्तर स्थित आकाशको दहर आकाश कहा जाता है।। २१

अनुकृत्यधिकरणम्

1.3.22 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २२

सूत्र १.३.२२

अनुकृतेस् तस्य च ॥ १.३.२२ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 270

पदच्छेद — अनुकृतेः , तस्य च

सूत्रार्थ — ( अनुकृतेः ) ' न तन्त्र सूर्यो भाति ' इत्यादि श्रुतिमें प्रतिपादित वस्तु कोई तेज विशेष नहीं है किन्तु निर्विशेष ब्रह्म ही है, क्योंकि ' अनुमाति ' उसके प्रकाशका ही सब अनुकरण करते हैं, ( च ) और ( तस्य ) उसके प्रकाशसे ही यह समस्त जगत् प्रकाशित होता है।

शाङ्करभाष्य

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति समामनन्ति। तत्र यं भान्तमनुभाति सर्वं यस्य च भासा सर्वमिदं विभाति स किं तेजोधातुः कश्चित् उत प्राज्ञ आत्मेति विचिकित्सायां तेजोधातुरिति तावत्प्राप्तम्। कुतः तेजोधातूनामेव सूर्यादीनां भानप्रतिषेधात्। तेजःस्वभावकं हि चन्द्रतारकादि तेजःस्वभावक एव सूर्ये भासमाने अहनि न भासत इति प्रसिद्धम्।

तथा सह सूर्येण सर्वमिदं चन्द्रतारकादि यस्मिन्न भासते सोऽपि तेजःस्वभाव एव कश्चिदित्यवगम्यते। अनुभानमपि तेजःस्वभावक एवोपपद्यते समानस्वभावकेष्वनुकारदर्शनात् गच्छन्तमनुगच्छति इतिवत्। तस्मात्तेजोधातुः कश्चिदित्येवं प्राप्ते ब्रूमः प्राज्ञ एवायमात्मा भवितुमर्हति।

कस्मात् अनुकृतेः अनुकरणमनुकृतिः यदेतत् तमेव भान्तमनुभाति सर्वम् इत्यनुभानम् तत्प्राज्ञपरिग्रहेऽवकल्पते भारूपः सत्यसंकल्पः इति हि प्राज्ञमात्मानमामनन्ति न तु तेजोधातुं कंचित्सूर्यादयोऽनुभान्तीति प्रसिद्धम् समत्वाच्च तेजोधातूनां सूर्यादीनां न तेजोधातुमन्यं प्रत्यपेक्षास्ति यं भान्तमनुभायुः न हि प्रदीपः प्रदीपान्तरमनुभाति।

यदप्युक्तं समानस्वभावकेष्वनुकारो दृश्यत इति नायमेकान्तो नियमः भिन्नस्वभावकेष्वपि ह्यनुकारो दृश्यते यथा सुतप्तोऽयःपिण्डोऽग्न्यनुकृतिरग्निं दहन्तमनुदहति भौमं वा रजो वायुं वहन्तमनुवहतीति। अनुकृतेः इत्यनुभानमसुसूचत् तस्य च इति चतुर्थं पादमस्य श्लोकस्य सूचयति। तस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति च तद्धेतुकं भानं सूर्यादेरुच्यमानं प्राज्ञमात्मानं गमयति। तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् इति हि प्राज्ञमात्मानमामनन्ति।

तेजोन्तरेण तु सूर्यादितेजो विभातीत्यप्रसिद्धम् विरुद्धं च तेजोन्तरेण तेजोन्तरस्य प्रतिघातात्। अथवा न सूर्यादीनामेव श्लोकपरिपठितानामिदं तद्धेतुकं विभानमुच्यते किं तर्हि सर्वमिदम् इत्यविशेषश्रुतेः सर्वस्यैवास्य नामरूपक्रियाकारकफलजातस्य या अभिव्यक्तिः सा ब्रह्मज्योतिःसत्तानिमित्ता यथा सूर्यज्योतिःसत्तानिमित्ता सर्वस्य रूपजातस्याभिव्यक्तिः तद्वत्।

न तत्र सूर्यो भाति इति च तत्रशब्दमाहरन्प्रकृतग्रहणं दर्शयति प्रकृतं च ब्रह्म यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम् इत्यादिना अनन्तरं च हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्। तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः इति कथं तज्ज्योतिषां ज्योतिरित्यत इदमुत्थितम् न तत्र सूर्यो भाति इति। यदप्युक्तम् सूर्यादीनां तेजसां भानप्रतिषेधस्तेजोधातावेवान्यस्मिन्नवकल्पते सूर्य इवेतरेषामिति तत्र तु स एव तेजोधातुरन्यो न संभवतीत्युपपादितम्।

ब्रह्मण्यपि चैषां भानप्रतिषेधोऽवकल्पते यतः यदुपलभ्यते तत्सर्वं ब्रह्मणैव ज्योतिषोपलभ्यते ब्रह्म तु नान्येन ज्योतिषोपलभ्यते स्वयं ज्योतिःस्वरूपत्वात् येन सूर्यादयस्तस्मिन्भायुः ब्रह्म हि अन्यद्व्यनक्ति न तु ब्रह्मान्येन व्यज्यते आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते अगृह्यो न हि गृह्यते इत्यादिश्रुतिभ्यः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' न तत्र सूर्यो भाति ' ( वहाँ उस आत्मस्वरूप ब्रह्ममें न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा तथा तारे। वहाँ यह बिजली भी प्रकाशित नहीं होती फिर यह निरन्तर दृष्टिमें आनेवाली अग्नि किस गिनती में है? उसके प्रकाशित होनेसे ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसीके प्रकाशसे प्रकाशमान है ) ऐसी श्रुति है। इस श्रुति वाक्यमें जिसके प्रकाशित होनेसे ये सब सूर्य, चन्द्रमा आदि प्रकाशित होते हैं और जिसके प्रकाश से यह समस्त जगत् प्रकाशित होता है।

इस विषयमें सन्देह होता है कि क्या यह कोई तेजस्वी पदार्थ है अथवा परमात्मा? पूर्वपक्षी - यह तेजस्वी पदार्थ है ऐसा प्राप्त होता है, किससे? इससे कि सूर्य आदि तेजस्वी पदार्थोंके ही भानका प्रतिषेध किया। यह प्रसिद्ध है कि दिनमें स्वाभाविक तेजस्वी सूर्यके प्रकाशित होनेपर तेज स्वभाव चन्द्रमा तारा आदि प्रकाशित नहीं होते। तथा ऐसा ज्ञात होता है कि सूर्यके साथ यह सब चन्द्र, तारा आदि जिसमें प्रकाशित नहीं होते वह भी कोई तेजः स्वभाव पदार्थ है।

' अनुमान ' मी तेज : स्वभाव पदार्थके होनेसे ही उपपन्न होता है, क्योंकि समान स्वभाववालोंमें ही अनुकार- अनुकरण देखा जाता है। जैसे जाते हुए पीछे जाता है। इससे ज्ञात होता है कि यह कोई एक तेजस्वी पदार्थ है। सिद्धान्ती —- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह प्रकाशक परमात्मा ही होना युक्त है। किससे? इससे कि अनुकृतिका श्रवण है। अनुकृति अर्थात् अनुकरण | ' तमेव भान्तमनुभाति सर्वम् ' इसप्रकार यह जो अनुमान है, वह परमात्मा ग्रहण करनेसे ही संगत हो सकता है।

' मारूपः सत्यसङ्कल्पः ' ( वह प्रकाशरूप और सत्यसङ्कल्प है ) यह श्रुति स्वयं प्रकाशरूप परमात्माको ही कहती है और किसी तेजस्वी पदार्थके अनन्तर सूर्यादि प्रकाशित होते हैं ऐसा प्रसिद्ध नहीं है। सूर्यादि तेजस्वी पदार्थोंको दूसरेके प्रकाशसे प्रकाशित होनेके लिए दूसरे तेजस्वी पदार्थों की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि दोनों समान तेजस्वी हैं। प्रदीप किसी दूसरे प्रदीप के अनन्तर प्रकाशित नहीं होता।

जो यह कहा गया है कि समान स्वभाव वालोंमें ही अनुकरण देखा जाता है, तो यह कोई अव्यभिचरित नियम नहीं है, क्योंकि भिन्न स्वभाववालोंमें भी अनुकरण देखा जाता है। जैसे अच्छी तरह तपा हुआ लोहेका गोला अग्निका अनुकरण करता है जलती हुई अग्निके पीछे जलता है अथवा पार्थिव रज अपने से विलक्षण बहती हुई वायुके पीछे चलती है। ' अनुकृतेः ' यह सूत्रभाग अनुमानको सूचित करता है। ' तस्य च ' यह सूत्रभाग उक्तं श्रुति ' तस्य मासा सर्वमिदं विभाति ' के चौथे पादको सूचित करता है।

' तस्य भासा ' ( उसके प्रकाश से यह सब प्रकाशित होता है ) इस प्रकार सूर्यादिमें कहा हुआ तद्हेतुक प्रकाश परमात्माका ज्ञान कराता है। ' तद्देवा ज्योतिषां ज्योति ' ( उस आदित्यादि ज्योतियोंके ज्योतिःस्वरूप अमृतकी देवगण आयुरूपसे उपासना करते हैं ) इस प्रकार श्रुति परमात्माको कहती है। सूर्यादि तेज अन्य

प्रकाशित होते हैं यह अप्रसिद्ध और विरुद्ध भी है, क्योंकि एक तेजका दूसरे तेजसे प्रतिघात . होता है। अथवा श्रुतिमें परिपठित सूर्यादिमें ही तदहेतुक ( ब्रह्महेतुक ) प्रकाश नहीं कहा जाता, किन्तु जैसे सूर्यादि ज्योतिकी सत्तासे समस्त रूप - समुदायकी अभिव्यक्ति होती हैं, वैसे ही ' सर्वमिदम् '

और फल समुदायकी जो अभिव्यक्ति है वह इस सामान्य श्रुति से इस समस्त

नाम, रूप, क्रिया, कारक ब्रह्म ज्योतिकी सत्तासे ही होती

है। ' न तत्र सूर्यो भाति ०

' इसमें ' तत्र ' शब्दका कथन करती हुई श्रुति प्रकृतका ग्रहण दिखलाती है।

और ' यस्मिन् द्यौः ० '

( जिसमें द्युलोक, पृथिवी और अन्तरिक्ष ओत प्रोत हैं ) इत्यादिसे ब्रह्म ही प्रकृत है I

। और अनन्तर ' हिरण्मये परे कोशे ० ' ( वह निर्मल और कला - होन ब्रह्म हिरण्यमय - ज्योतिर्मय परमकोश में विद्यमान है। वह शुद्ध और सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थोंकी ज्योति है, और वह है जिसे आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं ) यह श्रुति प्रकृत ब्रह्मको ही कहती है | वह ज्योतियोंका ज्योति किस प्रकार है। इस शङ्काके उत्तरमें ' नं तत्र सूर्यो भाति ' यह मन्त्र उपस्थित हुआ।

सूर्यमें दूसरे तेजों के प्रतिषेधके समान सूर्य आदि तेजोंके प्रकाशका प्रतिषेध तभी संगत हो सकता है जब कि कोई दूसरा तेजस्वी पदार्थ हो, ऐसा जो कहा गया है, उसके उत्तर में - वह ब्रह्म ही तेजोमय पदार्थं है, उससे अन्य तेजका संभव नहीं है, ऐसा उपपादन किया जा चुका है। ब्रह्ममें मी इन सूर्यादि तेजोंके प्रकाशका प्रतिषेध हो सकता है, क्योंकि जो उपलब्ध होता है वह सब ब्रह्मरूप ज्योतिसे ही उपलब्ध होता है।

[ यदि ब्रह्म किसी दूसरे प्रकाशसे प्रकाशित होता तो सूर्य आदि उसके प्रकाशक होते ] किन्तु ब्रह्म तो अन्य ज्योतिसे उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि वह स्वयं ज्योतिः स्वरूप है। जिससे सूर्य आदि उसमें प्रकाशमान हों। ' आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते ० ' ( आत्मरूप ज्योतिसे ही यह प्रकाशित है ) ' अगृह्यो नहि गृह्यते ० ' ( वह अगृह्य है, उसका ग्रहण नहीं किया जा सकता ) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि ब्रह्म अन्य पदार्थको व्यक्त करता है, परन्तु ब्रह्म अन्यसे व्यक्त नहीं होता॥२२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ' न तत्र सूर्यो माति ' यह मुण्डक श्रुति इस अधिकरणका विषयवाक्य है, इस श्रुतिमें ' अनुमाति ’ ( अनु - अनन्तर, माति- प्रकाश करना ) यह पद तभी संगत होगा जब तेज : स्वभाववाला कोई एक विशेष पदार्थ माना जाय, अन्यथा नहीं ; समान स्वभाववालोंमें ही ' अनुकरण ' देखनेमें आता है ' जैसे गौ गौके पीछे दौड़ते हैं ' पक्षी समान जातीय पशीके पीछे उड़ता है। परन्तु अतुल्य स्वभाववालोंमें ' अनुकरण ' नहीं देखा जाता, अतः सूर्य आदिके समान वह भी तेज : स्वभाव पदार्थ होना चाहिए। यद्यपि ' यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम् ' ( जिसमें द्यु, पृथिवी और अन्तरिक्ष ओतव्याप्त हैं ) यहाँ ब्रह्म प्रकृत है, तो भी अभिभव और अनुकारात्मक लिङ्गसे प्रकरणका वाध होकर कोई तेजो विशेष पदार्थ प्रतीत होता है, ब्रह्म नहीं। पूर्वं परं ज्योतिरुपसंपद्य ' इस श्रुति वाक्यार्थविचारके प्रसंगसे ' न तत्र सूर्यो भाति ' इत्यादि वाक्यार्थका विचार करते हैं। इस प्रकार प्रसंगसंग तिसे इस अधिकरणका आरम्भ है।

* जैसे घटादि पदार्थं सूर्यादि प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, अतः वह प्रकाश घटादिका प्रकाशक है। घटादि स्वयं अप्रकाशित होनेसे अपनी उपलब्धिमें दूसरे प्रकाशकी अपेक्षा रखते हैं। किन्तु ब्रह्म तो स्वयं ज्योतिःस्वरूप है। किसी बाह्य प्रकाशकी अपनी सिद्धिमें अपेक्षा नहीं रखता, क्योंकि ' अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' यह श्रुति ब्रह्मको स्वयं ज्योतिरूपसे प्रतिपादित करती है। तेजोमय सूर्यादि पदार्थोंकी अभिव्यक्ति भी ब्रह्मसे ही होती है, क्योंकि वे जड़ हैं। स्वप्नावस्था में सूर्यादि प्रकाशके अभाव होनेपर भी उस आत्मज्योति से सबकी प्रतीति होती है, अतः आत्मा स्वयं ज्योति स्वरूप है।। २२

प्रमिताधिकरणाम्

1.3.24 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २४

सूत्र १.३.२४

शब्दाद् एव प्रमितः ॥ १.३.२४ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 273

शाङ्करभाष्य

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति इति श्रूयते तथा अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः। ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व एतद्वै तत् इति च। तत्र योऽयमङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः श्रूयते स किं विज्ञानात्मा किं वा परमात्मेति संशयः। तत्र परिमाणोपदेशाद्विज्ञानात्मेति तावत्प्राप्तम्। न ह्यनन्तायामविस्तारस्य परमात्मनोऽङ्गुष्ठपरिमाणत्वमुपपद्यते विज्ञानात्मनस्तूपाधिमत्त्वात्संभवति कयाचित्कल्पनयाङ्गुष्ठमात्रत्वम्। स्मृतेश्च अथ सत्यवतः कायात्पाशबद्धं वशं गतम्। अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात् इति न हि परमेश्वरो बलात् यमेन निष्क्रष्टुं शक्यः तेन तत्र संसारी अङ्गुष्ठमात्रो निश्चितः स एवेहापीत्येवं प्राप्ते ब्रूमः परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमितः पुरुषो भवितुमर्हति। कस्मात् शब्दात् ईशानो भूतभव्यस्य इति। न ह्यन्यः परमेश्वराद्भूतभव्यस्य निरङ्कुशमीशिता। एतद्वै तत् इति च प्रकृतं पृष्टमिहानुसंदधाति एतद्वै तत् यत्पृष्टं ब्रह्मेत्यर्थः पृष्टं चेह ब्रह्म अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद्व इति। शब्दादेवेति अभिधानश्रुतेरेव ईशान इति परमेश्वरोऽवगम्यत इत्यर्थः।। कथं पुनः सर्वगतस्य परमात्मनः परिमाणोपदेश इत्यत्र ब्रूमः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रार्थ - ( स्मर्यते ) . ' न तद्भासयते सूर्यो ' ' यदादित्यगतं तेजो ' इसप्रकार यह स्मृति ( अपि ) भी प्रकृत ब्रह्मा ज्योतिरूपसे प्रतिपादन करती है।

सूत्रार्थ - ( प्रमितः ) ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ' इस प्रमितवाक्य में प्रतिपाद्य पुरुष परमात्मा ही है, ( शब्दादेव ) क्योंकि ' ईशानो भूतभव्यस्य ' इस श्रुतिमें ईशानशब्द है।

* ‘ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ' इति श्रूयते। तथा ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः। ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व एतद्वै तत् ' ( का ० २।१।१३ ) इति च।

और भगवद्गीतामें भी ' न तद् भासयते ० ' ( उस परं ज्योतिस्वरूपको न सूर्यं प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है, वही मेरा परम धाम है जिसको प्राप्त होकर मनुष्य फिर संसार में नहीं आता ) और ' यदादित्यागतं ० ' ( जो तेज सूर्यमें स्थित हुआ सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमामें स्थित है और जो तेज अग्निमें स्थित है उसे ' तू मेरा ही तेज समझ ) ऐसा स्वरूप परमात्माका ही कहा गया है || २३ ||

' अङ्गुष्ठमात्रः ० ' ( जो अङ्गुष्ठ परिमाण पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है ) और ' अङ्गुष्ठमात्रः ० ’ ( यह अङ्गुष्ठामात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है। यह भूत भविष्यत्‌का शासक है। यही आज ( वर्तमानकाल में ) है और यही कल ( भविष्यत् में ) मी रहेगा। और निश्चम यही वही ( ब्रह्मतत्त्व ) है ) ऐसी श्रुतियाँ हैं। इनमें जो यह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष सुना जाता है वह क्या जीवात्मा है अथवा क्या वह परमात्मा है? ऐसा संशय होता है।

पूर्वपक्षी - इन श्रुतियोंमें परिमाणके उपदेशसे ऐसा प्राप्त होता है कि वह जीवात्मा है, क्योंकि अनन्त आयाम और विस्तारवाला परमात्मा अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला हो यह युक्त नहीं है। किन्तु विज्ञानात्मा तो उपाधि युक्त होनेसे किसी कल्पनासे अङ्गुष्ठपरिमाणवाला हो सकता है। और ' अथ सत्यवतः ० ' ( इसके अनन्तर यमने सत्यवान्के शरीरसे अपने पाशोंसे बँधे हुए और कर्मवशीभूत अङ्गष्ठमात्र पुरुषको बलपूर्वक खींच लिया ) यह स्मृति भी है।

परमेश्वर यमसे बलपूर्वक कदापि नहीं खींचा जा सकता, इससे स्मृतिमें जीव ही अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला निश्चित होता है वही यहाँ मी निश्चित होता है। सिद्धान्ती - इसप्रकार प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यहाँ यह अङ्गष्ठमात्र परिमित पुरुष परमात्मा ही हो सकता है, किससे? इससे कि ' ईशानो भूतभव्यस्य ' इस श्रुतिमें ईशानशब्द है। भूत और भविष्यत्का निरङ्कुश ईशिता परमेश्वरसे अन्य नहीं है। ' एतद्वै तत् ० ( यह वही है ) इसप्रकार यहाँ ' एतद् ' शब्दसे प्रकृत पृष्टका यमराज अनुसन्धान करते हैं।

नचिकेताने जिस ब्रह्मके विषयमें पूछा था यह वही है, ऐसा अर्थ है। ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( धर्म से अन्य, अधर्मसे अन्य तथा इस कार्य - कारणसे अन्य एवं भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान से भिन्न जिसको आप देखते हैं - अनुभव करते हैं उसे कहिये ) इसप्रकार यहाँ ब्रह्मविषयक प्रश्न है। शब्दसे ही अर्थात् [ ईशानो भूतभव्यस्य ] इस अभिधान श्रुतिसे ही यह परमेश्वर ज्ञात होता है, यह अर्थ है॥ २४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व अधिकरणमें परमात्मा ज्योतिः स्वरूप प्रतिपादित किया गया है और इस अधिकरणमें ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ' इस विषयवाक्यमें ज्योतिः द्वारा उपमीयमान जो पुरुष प्रतीत होता है, वह परमात्मासे भिन्न है। ऐसी आशङ्का की उपस्थितिमें सूत्रकारने इस अधिकरणका आरम्भ किया है। अङ्गुष्ठमात्र हृदयके साथ विज्ञानशब्द वाच्य बुद्धिके साथ तादात्म्याध्यासकी कल्पनासे किसी प्रकार बुद्धिरूप उपाधि युक्त जीवात्मा अंगुष्ठमात्र हो सकता है, किन्तु सर्वगत परमेश्वर नहीं। यह पूर्वपक्षीका अभिप्राय है।

* उद्धृत श्रुतियोंमें अंगुष्ठमात्र पुरुषको जगत्का नियामक कहा गया है। सबका कारण होनेसे परमेश्वर ही सभीका नियामक हो सकता है, इसलिए अंगुष्ठमात्र पुरुष परमेश्वर ही है। पूर्वपक्षमें ब्रह्मदृष्टि से जीवकी उपासना फल है, सिद्धान्तमें जीव ब्रह्मका अभेदज्ञान है॥ २४

1.3.25 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २५

सूत्र १.३.२५

हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ १.३.२५ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 274

पदच्छेद — हृदि , अपेक्षया , तु , मनुष्याधिकारत्वात्

सूत्रार्थ — ( मनुष्याधिकारत्वात् ) शास्त्रमें मनुष्य अधिकृत है, मनुष्योंका हृदय स्व स्व अङ्गुष्टमात्र होता है। ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थ है। ( हृद्यपेक्षया ) उस हृदयकी अपेक्षा परमेश्वर भी अंगुष्ठमात्र कहा गया हैं।

शाङ्करभाष्य

सर्वगतस्यापि परमात्मनो हृदयेऽवस्थानमपेक्ष्याङ्गुष्ठमात्रत्वमिदमुच्यते आकाशस्येव वंशपर्वापेक्षमरत्निमात्रत्वम्। न ह्यञ्जसा अतिमात्रस्य परमात्मनोऽङ्गुष्ठमात्रत्वमुपपद्यते। न चान्यः परमात्मन इह ग्रहणमर्हति ईशानशब्दादिभ्य इत्युक्तम्।

ननु प्रतिप्राणिभेदं हृदयानामनवस्थितत्वात्तदपेक्षमप्यङ्गुष्ठमात्रत्वं नोपपद्यत इत्यत उत्तरमुच्यते मनुष्याधिकारत्वादिति शास्त्रं ह्यविशेषप्रवृत्तमपि मनुष्यानेवाधिकरोति शक्तत्वात् अर्थित्वात् अपर्युदस्तत्वात् उपनयनादिशास्त्राच्च इति वर्णितमेतदधिकारलक्षणे। मनुष्याणां च नियतपरिमाणः कायः औचित्येन नियतपरिमाणमेव चैषामङ्गुष्ठमात्रं हृदयम् अतो मनुष्याधिकारत्वाच्छास्त्रस्य मनुष्यहृदयावस्थानापेक्षमङ्गुष्ठमात्रत्वमुपपन्नं परमात्मनः।

यदप्युक्तम् परिमाणोपदेशात् स्मृतेश्च संसार्येवायमङ्गुष्ठमात्रः प्रत्येतव्य इति तत्प्रत्युच्यते स आत्मा तत्त्वमसि इत्यादिवत् संसारिण एव सतोऽङ्गुष्ठमात्रस्य ब्रह्मत्वमिदमुपदिश्यत इति। द्विरूपा हि वेदान्तवाक्यानां प्रवृत्तिः क्वचित्परमात्मस्वरूपनिरूपणपरा क्वचिद्विज्ञानात्मनः परमात्मैकत्वोपदेशपरा। तदत्र विज्ञानात्मनः परमात्मनैकत्वमुपदिश्यते नाङ्गुष्ठमात्रत्वं कस्यचित्। एतमेवार्थं परेण स्फुटीकरिष्यति अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः।

तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण तं विद्याच्छुक्रममृतम् इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — फिर सर्वत्र व्यापक परमात्मामें अङ्गुष्ठमात्र - परिमाणका उपदेश कैसे है? इस विषय में हम कहते हैं-

जैसे बांसके पर्वमें अवस्थित होनेके कारण आकाश अरत्नि हाथ भर कहलाता है, वैसे हृदयमें अवस्थित होनेकी अपेक्षा सर्वगत परमात्मा भी अंगुष्ठमात्र कहा जाता है, क्योंकि परिमाणातीत परमेश्वरका मुख्यरूपसे अंगुष्ठमात्र होना युक्त नहीं है, और ऐसा कहा जा चुका है कि ईशानशब्द आदि हेतुओंके होनेसे परमेश्वरसे अन्यका यहाँ ग्रहण भी नहीं किया जा सकता। परन्तु प्रत्येक प्राणीका हृदय भिन्न - भिन्न परिमाणवाला होता है एक - सा नहीं होता, अत : उसकी अपेक्षासे भी परमात्माका अंगुष्ठ परिमाण होना युक्त नहीं है?

इसके उत्तर में कहते हैं - ' मनुष्याधिकारत्वात् '। शास्त्र सामान्य रीतिसे प्रवृत्त हुआ मी ( त्रैवर्णिक ) मनुष्यों को ही अधिकृत करता है, क्योंकि वे समर्थ हैं, कामना विशेषसे युक्त हैं, श्रुत्युक्त कर्मानुष्ठानमें अनिराकृत हैं और शास्त्र उनके उपनयन आदिका विधान करता है, ऐसा अधिकारलक्षणमें जैनिमि मुनिने वर्णन किया है। मनुष्योंका शरीर निश्चित परिमाण ( अपना - अपना सात वितस्ति परिमाण ) वाला होता है, इसलिए उनके हृदयका परिमाण भी उचितरूपसे नियत अङ्गुष्ठमात्र होना चाहिए।

इससे यह सिद्ध होता है कि शास्त्रमें मनुष्योंका अधिकार होनेसे मनुष्यके हृदयमें अवस्थित होने के कारण परमात्माका अङ्गुष्ठपरिमाण होना युक्त है | जो यह कहा गया है कि परिमाणके उपदेश से और [ सत्यवतः कायात् ] इस वक्त स्मृतिसे संसारी पुरुषको ही अङ्गुष्ठमात्र पुरुष समझना चाहिए, उसके उत्तरमें कहते हैं— ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ( वह आत्मा है वह तू है ) इत्यादिके समान इस अंगुष्ठमात्र संसारीको ही ब्रह्मरूपसे यह उपदेश किया जाता है, क्योंकि वेदान्तवाक्योंकी दो प्रकारकी प्रवृत्ति है।

कहीं परमात्मस्वरूप निरूपण परक है और कहीं पर जीवात्मामें परमात्मैकत्वपरक उपदेश है। यहाँ पर जीवात्माका परमात्मा के साथ एकत्वका उपदेश है, किसीका भी अंगुष्ठपरिमाणके उपदेशमें तात्पर्य नहीं है। इसी अर्थको ' अङ्गुष्ठमात्रः ० ' ( अंगुष्ठमात्र पुरुष जो अन्तरात्मा है सर्वदा जीवके हृदय देशमें स्थित है मुञ्जसे सकके समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीरसे बाहर निकाले [ अर्थात् शरीरसे पृथक्कर अनुभव करे ] उसे शुक्र ( शुद्ध ) और अमृतरूप समझे ) इस उत्तरवाक्यसे यमराज स्पष्ट करेंगे।। २५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि परमात्मा व्यापक है तो भी उसकी उपासना में मनुष्यको अधिकारी मानकर और उसके हृदयको उपासनाका स्थान मानकर अंगुष्ठमात्र हृदयके परिमाणको परमात्माका परिमाण स्वीकार किया गया है। मनुष्यों में भी केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनोंका वैदिक कर्म करनेमें अधिकार है, ये तीनों ही समर्थ, अर्थी, अनिराकृत और उपनयन आदि शास्त्रवाले हैं। ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि सामर्थ्यका प्रतिपादन है।

इससे यह सूचित होता है कि कर्मानुष्ठानमें पशु, देव ऋषि आदिका अधिकार निषिद्ध है। कारण कि शास्त्रज्ञान रहित होनेसे पशु अधिकारी नहीं हो सकता। देव आदि के उद्देश्यसे होम आदि किये जाते हैं, इन्द्र आदि देव अपनेको उद्देश्यकर होम आदि नहीं कर सकते, इससे वे वैदिक यज्ञादि कर्म करनेमें असमर्थ हैं। इसप्रकार आर्षेयवरण ऋषियोंके वरणमें अन्य ऋषिके अमावसे ऋषि भी असमर्थ होते हैं। अथित्व कहने से यह सूचित होता है कि कामना रहित मुमुक्षु और पशु, स्थावर आदिका कर्मानुष्ठानमें अधिकार निराकृत है।

मुमुक्षु चित्तशुद्धिके लिए निष्कामभावसे नित्य और नैमित्तक कर्म कर सकता है किन्तु काम्यकर्म नहीं। जिसका चित्त शुद्ध है ' उसका कर्म करनेमें अधिकार नहीं है किन्तु मोक्षके साधन वेदान्तश्रवण आदिमें अधिकार है। अपर्युदस्तत्व शब्दसे शूद्रका वैदिक कर्मानुष्ठानमें निषेध सूचित किया गया है, ' शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः ' ( तै ० सं ० ७ | १ | १ | ६ ) ( शूद्र यज्ञके योग्य नहीं है ) क्योंकि वह द्विज नहीं है, इसलिए वेदाध्ययनके आरम्भ में उपनयन - यज्ञोपवीत आदि संस्कार उसके नहीं होते।

' उपनयीत ' ' तमध्यापयीत ' ( द्विज उपनयन करे, वेदाध्यापन करे ) ' वसन्ते वसन्ते ब्राह्मणो अग्निनादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्यः ' ( प्रत्येक वसन्त ऋतुमें ब्राह्मण अग्निका अधान करे, ग्रीष्ममें क्षत्रिय और शरदमें वैश्य ) इसप्रकार तीनों वर्णोंका वैदिक कर्ममें अधिकार है। यहाँ ' पर्युदस्त ' शब्द शूद्रका निराकरण करता है, अतः उससे भिन्न शेष तीन वर्णं अपर्युदस्त कहलाते हैं, इसलिए इन तीनोंका वैदिक कर्म में अधिकार है।

* इस पूर्वोक्त रीतिसे ' अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः ' इत्यादि मन्त्र जीव और ब्रह्ममें अभेद कहकर अंगुष्ठमात्र शब्द सर्वव्यापक परमेश्वरका ही ग्रहण करते हैं सांसारिक जीवका नहीं। पूर्वपक्षमें ब्रह्मदृष्टिसे जीवकी उपासना फल है, सिद्धान्तमें अन्तरात्मा और ब्रह्मका अभेदज्ञान फल है।। २५

देवताधिकरणम्

1.3.26 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २६

सूत्र १.३.२६

तदुपर्य् अपि बादरायणः संभवात् ॥ १.३.२६ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 276

पदच्छेद — तदुपरि , अपि , बादरायणः , सम्भवात्

सूत्रार्थ — ( तदुपपि ) मनुष्यसे श्रेष्ठ देवादिमें ( सम्भवात् ) अर्थित्व आदि . अधिकार के कारणका सम्भव होनेसे वे भी ब्रह्मविद्या में अधिकारी हैं, ( बादरायणः ) ऐसा बादरायण आचार्य मानते हैं।

शाङ्करभाष्य

अङ्गुष्ठमात्रश्रुतिर्मनुष्यहृदयापेक्षा मनुष्याधिकारत्वाच्छास्त्रस्येत्युक्तम् तत्प्रसङ्गेनेदमुच्यते। बाढम् मनुष्यानधिकरोति शास्त्रम् न तु मनुष्यानेवेति इह ब्रह्मज्ञाने नियमोऽस्ति। तेषां मनुष्याणाम् उपरिष्टाद्ये देवादयः तानप्यधिकरोति शास्त्रमिति बादरायण आचार्यो मन्यते कस्मात् संभवात्।

संभवति हि तेषामप्यर्थित्वाद्यधिकारकारणम् तत्रार्थित्वं तावन्मोक्षविषयं देवादीनामपि संभवति विकारविषयविभूत्यनित्यत्वालोचनादिनिमित्तम् तथा सामर्थ्यमपि तेषां संभवति मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यो विग्रहवत्त्वाद्यवगमात् न च तेषां कश्चित्प्रतिषेधोऽस्ति न चोपनयनशास्त्रेणैषामधिकारो निवर्त्येत उपनयनस्य वेदाध्ययनार्थत्वात् तेषां च स्वयंप्रतिभातवेदत्वात् अपि चैषां विद्याग्रहणार्थं ब्रह्मचर्यादि दर्शयति एकशतं ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास भृगुर्वै वारुणिः।

वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्म इत्यादि। यदपि कर्मस्वनधिकारकारणमुक्तम् न देवानां देवतान्तराभावात् इति न ऋषीणाम् आर्षेयान्तराभावात् इति न तद्विद्यासु अस्ति। न हीन्द्रादीनां विद्यास्वधिक्रियमाणानामिन्द्राद्युद्देशेन किंचित्कृत्यमस्ति न च भृग्वादीनां भृग्वादिसगोत्रतया। तस्माद्देवादीनामपि विद्यास्वधिकारः केन वार्यते देवाद्यधिकारेऽप्यङ्गुष्ठमात्रश्रुतिः स्वाङ्गुष्ठापेक्षया न विरुध्येत।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह कहा गया है कि अंगुष्ठमात्र श्रुति मनुष्यके हृदयकी अपेक्षा रखती है, क्योंकि शास्त्र में मनुष्यका अधिकार है उस प्रसङ्गसे यह कहा जाता है। यह ठीक है कि शास्त्र मनुष्योंको अधिकृत करता है, परन्तु वह केवल मनुष्योंको ही अधिकृत करता है ऐसा यहाँ ब्रह्मज्ञानमें नियम नहीं है। किन्तु बादरायण आचार्यका मत है कि उन मनुष्योंसे श्रेष्ठ जो देवादि हैं उनको भी शास्त्र अधिकृत करता है। किससे? इससे कि ऐसा सम्भव है। कारण कि उनमें भी अर्थित्वादि अधिकारका कारण सम्भव है।

क्योंकि विकार विषय विभूति ( ऐश्वर्यसूख ) में अनित्यत्व आलोचन आदि निमित्तक मोक्ष विषयक अर्थित्व देवादिमें भी हो सकता है। उसी प्रकार उनमें सामर्थ्य भी सम्भव है। क्योंकि मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण और लोक अनुभवसे यह अवगत होता है कि वे शरीरधारी हैं। उनके लिए कोई प्रतिषेध नहीं है | और उपनयन आदि शास्त्रसे उनका ( ब्रह्मविद्या में ) अधिकार निवृत्त नहीं होता, कारण कि उपनयन वेद अध्ययनके लिए होता है, उनको वेदका प्रकाश स्वयं ही होता है।

और ‘ एकशर्त ह वै ० ' ( इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एकसौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया ) ' भृगुर्वै वारुणिः ' - ( वरुणका सुप्रसिद्ध पुत्र भृगु अपने पिता वरुणके पास गया, और बोला- भगवन् मुझे ब्रह्मज्ञानका उपदेश कीजिए ) इत्यादि श्रुति उन देवादिमें विद्या ग्रहणके लिए ब्रह्मचर्य आदि दिखलाती है।

' न देवानां ० ' ( देवताओंको कर्ममें अधिकार नहीं है, क्योंकि अन्य देवताओंका अभाव है अर्थात् इन्द्र से पृथक् अन्य इन्द्रका अभाव है ) और ' न ऋषीणाम् ० ' ( ऋषियोंका कर्ममें अधिकार नहीं है, क्योंकि दूसरे ऋषिका अभाव है अर्थात् तद्नाम और तद्रूपवाला अन्य ऋषि नहीं है जिसके उद्देश्यसे कर्म करे ) इसप्रकार जो उनका कर्ममें अनधिकारका कारण कहा गया है वह विद्याओंमें नहीं है। क्योंकि विद्याओं में अधिकारी हुए इन्द्रादिका इन्द्रादिके उद्देश्यसे कोई भी कृत्य नहीं है।

और भृगु आदि ऋषियोंका मी भृगु आदिके सगोत्रके उद्देश्यसे कोई भी कृत्य नहीं है। इससे देवादिका भी विद्याओंमें अधिकार कौन निवारण कर सकता है। देवादिके अधिकारमें भी अंगुष्ठमात्र श्रुति अपने अङ्गुष्ठकी अपेक्षासे विरुद्ध नहीं है।। २६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत अधिकरण के अनुसार शास्त्रमें यदि मनुष्योंका ही अधिकार है तो देवादिका ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं होगा। इस आक्षेप संगति से इस अधिकरणका आरम्भ है। वैदिक कर्मानुष्ठानमें मनुष्यका अधिकार है यह युक्त है। परन्तु ब्रह्मज्ञानमें भी केवल मनुष्योंका ही अधिकार है अन्यका नहीं, यह नियम नहीं है। क्योंकि शास्त्र में अधिकारके कारण सामर्थ्य, अथित्वादि तो देवादिमें भी सम्भव हैं। यद्यपि ऐश्वर्यं सुखमें आसक्त होनेके कारण उनमें वैराग्यादिका होना कठिन है, तो भी भोगोंको परिणामी, नश्वर समझनेवाले और निरतिशयसुखको चाहनेवाले विवेकी देव मोक्षार्थी हो सकते हैं। इसप्रकार के अनेक उदाहरण शास्त्र आदिमें उपलब्ध होते हैं।

* ' तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणाम् ' ( देव, ऋषि और मनुष्यों में से जिस जिसने यह जान लिया कि ' मैं ब्रह्म हूँ ' वह ब्रह्म ही हो गया ) इससे देवोंके ब्रह्मविद्या में अधिकारका कोई प्रतिषेध नहीं कर सकता। यहाँ पूर्वपक्ष में क्रममुक्तिको इच्छावाले पुरुषोंकी दहर आदि उपासनाओं में अप्रवृत्ति फल है, क्योंकि पूर्वपक्ष में जब देवोंका ज्ञानमें अधिकार नहीं है तब हर आदि उपासनासे देवभावको प्राप्त होनेपर भी वे उपासक क्रम मुक्तिको प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि कैवल्यमुक्ति ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे ही होती है, उनको इस प्रकारका ज्ञान नहीं होता ; और सिद्धान्त में क्रम मुक्तिकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंकी दहरादि उपासनाओंमें प्रवृत्ति फल है। क्योंकि देवादिको ज्ञानमें अधिकार है। इस कारण दहरादि उपासना द्वारा क्रमसे मोक्षार्थी पुरुष देवभाव प्राप्तकर ब्रह्मादि लोकोंमें ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान प्राप्तकर मोक्षको प्राप्त हो सकते हैं || २६

1.3.27 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २७

सूत्र १.३.२७

विरोधः कर्मणीति चेन् नानेकप्रतिपत्तेर् दर्शनात् ॥ १.३.२७ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 277

पदच्छेद — विरोध , कर्मणि , इति चेत् , न , अनेकप्रतिपत्तेः , दर्शनात्

सूत्रार्थ — इन्द्र आदि देवोंका यदि शरीर माना जाय तो ( कर्मणि विरोधः ) कर्म में विरोध हो जायगा। ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं, ( अनेकप्रतिपत्तेः ) क्योंकि युगपत् एकको ही अनेक शरीरों की प्राप्ति होती है, ऐसा ( दर्शनात् ) ' स एकधा भवति ' ( वह एक प्रकारका होता है तीन प्रकारका होता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें देखा जाता है। अथवा अनेक कर्मोंमें एकका ही अङ्ग होना लोकमें देखा जाता है, अतः इन्द्र आदिका भी अनेक स्थलोंमें हवि ग्रहण करना युक्त है।

शाङ्करभाष्य

स्यादेतत् यदि विग्रहवत्त्वाद्यभ्युपगमेन देवादीनां विद्यास्वधिकारो वर्ण्येत विग्रहवत्त्वात् ऋत्विगादिवदिन्द्रादीनामपि स्वरूपसंनिधानेन कर्माङ्गभावोऽभ्युपगम्येत तदा च विरोधः कर्मणि स्यात् न हीन्द्रादीनां स्वरूपसंनिधानेन यागाङ्गभावो दृश्यते न च संभवति बहुषु यागेषु युगपदेकस्येन्द्रस्य स्वरूपसंनिधानानुपपत्तेरिति चेत् नायमस्ति विरोधः कस्मात् अनेकप्रतिपत्तेः। एकस्यापि देवतात्मनो युगपदनेकस्वरूपप्रतिपत्तिः संभवति। कथमेतदवगम्यते दर्शनात्।

तथाहि कति देवाः इत्युपक्रम्य त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री चसहस्रा इति निरुच्य कतमे ते इत्यस्यां पृच्छायाम् महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवाः इति ब्रुवती श्रुतिः एकैकस्य देवतात्मनो युगपदनेकरूपतां दर्शयति। तथा त्रयस्त्रिंशतोऽपि षडाद्यन्तर्भावक्रमेण कतम एको देव इति प्राणः इति प्राणैकरूपतां देवानां दर्शयन्ती तस्यैव एकस्य प्राणस्य युगपदनेकरूपतां दर्शयति। तथा स्मृतिरपि आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ। योगी कुर्याद्बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत्।।

प्राप्नुयाद्विषयान्कैश्चित्कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत्। संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव इत्येवंजातीयका प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्याणां योगिनामपि युगपदनेकशरीरयोगं दर्शयति किमु वक्तव्यमाजानसिद्धानां देवानाम् अनेकरूपप्रतिपत्तिसंभवाच्च एकैका देवता बहुभी रूपैरात्मानं प्रविभज्य बहुषु यागेषु युगपदङ्गभावं गच्छतीति। परैश्च न दृश्यते अन्तर्धानादिशक्तियोगात् इत्युपपद्यते।

अनेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् इत्यस्यापरा व्याख्या विग्रहवतामपि कर्माङ्गभावचोदनासु अनेका प्रतिपत्तिर्दृश्यते क्वचिदेकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपदङ्गभावं न गच्छति यथा बहुभिर्भोजयद्भिर्नैको ब्राह्मणो युगपद्भोज्यते क्वचिच्चैकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपदङ्गभावं गच्छति यथा बहुभिर्नमस्कुर्वाणैरेको ब्राह्मणो युगपन्नमस्क्रियते तद्वदिहोद्देशपरित्यागात्मकत्वात् यागस्य विग्रहवतीमप्येकां देवतामुद्दिश्य बहवः स्वं स्वं द्रव्यं युगपत्परित्यक्ष्यन्तीति विग्रहवत्त्वेऽपि देवानां न किंचित्कर्मणि विरुध्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा हो, यदि शरीरधारी स्वीकारकर देव आदिका विद्याओंमें अधिकार कहा जाय तो शरीरवाला होनेसे ऋत्विक् आदिके समान इन्द्र आदिका भी स्वरूप संनिधानसे कर्म में अङ्गभाव स्वीकार करना पड़ेगा तब तो कर्म में विरोध होगा, क्योंकि यागमें स्वरूप सान्निध्यसे इन्द्र आदिका अङ्गमाव दर्शयति।

* तथा त्रयस्त्रिंशतोऽपि षडाद्यन्तर्भाविक्रमेण ' कतम एको देव इति प्राण : ' देखने में नहीं आता और सम्भव भी नहीं है, क्योंकि बहुत यागोंमें एक हो समय एक ही इन्द्रकी स्वरूपसे उपस्थिति अनुपपन्न है, ऐसा यदि कहो तो यह विरोध नहीं है, किससे? इससे कि अनेक प्रतिपत्ति है। एक ही समय में एक ही देवतात्मामें अनेक शरीरोंकी प्राप्ति सम्भव है। यह कैसे समझा जाय?

दर्शन होनेसे अर्थात् श्रुतिमें ऐसा देखा जाता है, क्योंकि ' कति देवाः ' ( देवता कितने हैं ) ऐसा उपक्रमकर ' त्रयश्च त्री च ० ' ( तीन सौ तीन और तीन हजार तीन अर्थात् तीन सहस्र तीन सौ छ : हैं ) ऐसा निर्वचनकर ‘ कतमे ते ' ( वे कौन हैं ) ऐसा प्रश्न उपस्थित होनेपर ' महिमान एवैष ( ० ' ( याज्ञवल्क्य - ये तो इनकी महिमा ही है।

देवता तो आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, इन्द्र और प्रजापति इस प्रकार तैंतीस ही हैं ) इस प्रकार कहती हुई श्रुति एक एक देवतात्माको एक ही समय में अनेक रूपता दिखलाती है। उसीप्रकार उन तैंतीस देवोंका भी क्रमशः छ :, तीन, दो और एकमें अन्तर्भाव दिखलाकर चोदनास्वनेका प्रतिपत्तिर्दृश्यते। क्वचिदेकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपदङ्गभावं न गच्छति, यथा बहुभिर्भोजयद्भिनैको ब्राह्मणो युगपद्भोज्यते।

क्वचिच्चैकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपदङ्गभावं गच्छति, यथा बहुभिर्नमस्कुर्वाणैरेको ब्राह्मणो युगपन्नमस्क्रियते। तद्वदिहोद्देश' कतम एको देवः ' ( वह एक देव कौन है? प्राण है ) इसप्रकार देवोंका प्राणरूप एक स्वरूप दिखलाती हुई श्रुति उसी एक प्राणकी युगपत् अनेक रूपता दिखलाती है। तथा ' आत्मनो बै ० ' ( हे भरतकुलमें श्रेष्ठ!

योगी योगमहिमासे अपने अनेक शरीर धारण करता है उन सब शरीरोंसे पृथिवीमें विचरण करता है, उनमें से कुछ शरीरोंसे विषयभोग प्राप्त करता है और कुछ शरीरोंसे उग्रतप करता है, और फिर जैसे सूर्य रश्मि समूहको अपनेमें समेट लेता है, वैसे योगी पुरुष उन शरीरोंको अपने में समेट लेता है ) इसप्रकार की स्मृति भी प्राप्त अणिमा आदि ऐश्वर्यवाले योगियोंका भी युगपत् अनेक शरीरोंसे सम्बन्ध दिखलाती है। जन्म सिद्ध देवोंके विषय में तो फिर कहना ही क्या है।

अनेकस्वरूप धारणकर सकने के कारण एक - एक देवता बहुत रूपों - शरीरोंसे अपनेको विभक्तकर युगपत् बहुत यागों में बङ्गमानको प्राप्त हो सकता है। अन्तर्धान आदि योग क्रियाको सामर्थ्यसे दूसरे पुरुष उन्हें देख नहीं सकते, इसप्रकार शरीरधारी सिद्ध होनेपर देवोंका ब्रह्मविद्या में अधिकार युक्त है। ' अनेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ' अब यह इसकी दूसरो व्याख्या है - देहधारियोंकी भो कर्मके अङ्गभावको विधान करनेवाले विधिवाक्योंमें अनेक प्रतिपत्ति देखी जाती है।

कहीं पर एक ही शरीरधारी अनेक स्थलोंमें युगपत् अङ्गभावको प्राप्त नहीं हो सकता, जैसे भोजन करानेवाले बहुत यजमानोंद्वारा युगपत् ( अनेक स्थलों में ) एक ही ब्राह्मणको भोजन नहीं कराया जा सकता। इसीप्रकार कहींपर युगपत् अनेक स्थलोंमें एक भी अङ्गभावको प्राप्त होता है, जैसे बहुत नमस्कार करनेवालोंसे युगपत् एक ब्राह्मण नमस्कृत : भी होता है।

तो इसी प्रकार यहाँ भी उद्देश्य द्रव्य परित्यागात्मक याग में एक शरीरी देवताके उद्देश्यसे बहुत याज्ञिक लोग अपने - अपने हविष्यरूप द्रव्यका युगपत् त्यागकर सकते हैं। इसलिए देवोंके शरीरधारी होनेपर भी कर्ममें कुछ विरोध नहीं है।। २७

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.३.२८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

1.3.28 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २८

सूत्र १.३.२८

शब्द इति चेन् नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ १.३.२८ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 280

पदच्छेद — शब्दे , इति चेत् , न , अतः , प्रभवात् , प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्

सूत्रार्थ — ( शब्दे ) वेदवाक्य में विरोध उपस्थित होगा, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि ( अतः ) वैदिक शब्दोंसे ( प्रभवात् ) देव आदि जगत्‌का प्रभव होता है | यह बात ( प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ) प्रत्यक्ष - श्रुति, अनुमान -स्मृतिसे सिद्ध होती है।

शाङ्करभाष्य

मा नाम विग्रहवत्त्वे देवादीनामभ्युपगम्यमाने कर्मणि कश्चिद्विरोधः प्रसञ्जि शब्दे तु विरोधः प्रसज्येत। कथम् औत्पत्तिकं हि शब्दस्यार्थेन संबन्धमाश्रित्य अनपेक्षत्वात् इति वेदस्य प्रामाण्यं स्थापितम्।

इदानीं तु विग्रहवती देवताभ्युपगम्यमाना यद्यप्यैश्वर्ययोगाद्युगपदनेककर्मसंबन्धीनि हवींषि भुञ्जीत तथापि विग्रहयोगादस्मदादिवज्जननमरणवती सेति नित्यस्य शब्दस्य नित्येनार्थेन नित्ये संबन्धे प्रतीयमाने यद्वैदिके शब्दे प्रामाण्यं स्थितम् तस्य विरोधः स्यादिति चेत् नायमप्यस्ति विरोधः कस्मात् अतः प्रभवात्। अत एव हि वैदिकाच्छब्दाद्देवादिकं जगत्प्रभवति।।

ननु जन्माद्यस्य यतः इत्यत्र ब्रह्मप्रभवत्वं जगतोऽवधारितम् कथमिह शब्दप्रभवत्वमुच्यते अपि च यदि नाम वैदिकाच्छब्दादस्य प्रभवोऽभ्युपगतः कथमेतावता विरोधः शब्दे परिहृतः यावता वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इत्येतेऽर्था अनित्या एव उत्पत्तिमत्त्वात् तदनित्यत्वे च तद्वाचिनां वैदिकानां वस्वादिशब्दानामनित्यत्वं केन निवार्यते प्रसिद्धं हि लोके देवदत्तस्य पुत्र उत्पन्ने यज्ञदत्त इति तस्य नाम क्रियत इति तस्माद्विरोध एव शब्द इति चेत् न गवादिशब्दार्थसंबन्धनित्यत्वदर्शनात्।

न हि गवादिव्यक्तीनामुत्पत्तिमत्त्वे तदाकृतीनामप्युत्पत्तिमत्त्वं स्यात्। द्रव्यगुणकर्मणां हि व्यक्तय एवोत्पद्यन्ते नाकृतयः। आकृतिभिश्च शब्दानां संबन्धः न व्यक्तिभिः व्यक्तीनामानन्त्यात्संबन्धग्रहणानुपपत्तेः। व्यक्तिषूत्पद्यमानास्वप्याकृतीनां नित्यत्वात् न गवादिशब्देषु कश्चिद्विरोधो दृश्यते। तथा देवादिव्यक्तिप्रभवाभ्युपगमेऽप्याकृतिनित्यत्वात् न कश्चिद्वस्वादिशब्देषु विरोध इति द्रष्टव्यम्। आकृतिविशेषस्तु देवादीनां मन्त्रार्थवादादिभ्यो विग्रहवत्त्वाद्यवगमादवगन्तव्यः।

स्थानविशेषसंबन्धनिमित्ता वा इन्द्रादिशब्दाः सेनापत्यादिशब्दवत्। ततश्च यो यस्तत्तत्स्थानमधितिष्ठति स स इन्द्रादिशब्दैरभिधीयत इति न दोषो भवति। न चेदं शब्दप्रभवत्वं ब्रह्मप्रभवत्ववदुपादानकारणत्वाभिप्रायेणोच्यते। कथं तर्हि स्थित वाचकात्मना नित्ये शब्दे नित्यार्थसंबन्धिनि शब्दव्यवहारयोग्यार्थव्यक्तिनिष्पत्तिः अतः प्रभवः इत्युच्यते।

कथं पुनरवगम्यते शब्दात्प्रभवति जगदिति प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् प्रत्यक्षं हि श्रुतिः प्रामाण्यं प्रत्यनपेक्षत्वात् अनुमानं स्मृतिः प्रामाण्यं प्रति सापेक्षत्वात् ते हि शब्दपूर्वां सृष्टिं दर्शयतः एत इति वै प्रजापतिर्देवानसृजतासृग्रमिति मनुष्यानिन्दव इति पितृ़ंस्तिरःपवित्रमिति ग्रहानाशव इति स्तोत्रं विश्वानीति शस्त्रमभिसौभगेत्यन्याः प्रजाः इति श्रुतिः तथान्यत्रापि स मनसा वाचं मिथुनं समभवत् इत्यादिना तत्र तत्र शब्दपूर्विका सृष्टिः श्राव्यते स्मृतिरपि अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा।

आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः इति उत्सर्गोऽप्ययं वाचः संप्रदायप्रवर्तनात्मको द्रष्टव्यः अनादिनिधनाया अन्यादृशस्योत्सर्गस्यासंभवात् तथा नाम रूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम्। वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः इति। सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।

वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे इति च अपि च चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठन् तस्य वाचकं शब्दं पूर्वं स्मृत्वा पश्चात्तमर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषां नः प्रत्यक्षमेतत् तथा प्रजापतेरपि स्रष्टुः सृष्टेः पूर्वं वैदिकाः शब्दा मनसि प्रादुर्बभूवुः पश्चात्तदनुगतानर्थान्ससर्जेति गम्यते तथा च श्रुतिः स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत इत्येवमादिका भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादिलोकान्सृष्टान्दर्शयति।। किमात्मकं पुनः0 0शब्दमभिप्रेत्येदं शब्दप्रभवत्वमुच्यते स्फोटम् इत्याह।

वर्णपक्षे हि तेषामुत्पन्नप्रध्वंसित्वान्नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यनुपपन्नं स्यात् उत्पन्नध्वंसिनश्च वर्णाः प्रत्युच्चारणमन्यथा चान्यथा च प्रतीयमानत्वात् तथा ह्यदृश्यमानोऽपि पुरुषविशेषोऽध्ययनध्वनिश्रवणादेव विशेषतो निर्धार्यते देवदत्तोऽयमधीते यज्ञदत्तोऽयमधीते इति न चायं वर्णविषयोऽन्यथात्वप्रत्ययो मिथ्याज्ञानम् बाधकप्रत्ययाभावात्।

न च वर्णेभ्योऽर्थावगतिर्युक्ताः न ह्येकैको वर्णेऽर्थं प्रत्याययेत् व्यभिचारात् न च वर्णसमुदायप्रत्ययोऽस्ति क्रमवर्तित्वाद्वर्णानाम् पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहितोऽन्त्यो वर्णोऽर्थं प्रत्याययिष्यतीति यद्युच्येत तन्न संबन्धग्रहणापेक्षो हि शब्दः स्वयं प्रतीयमानोऽर्थं प्रत्याययेत् धूमादिवत् न च पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहितस्यान्त्यवर्णस्य प्रतीतिरस्ति अप्रत्यक्षत्वात्संस्काराणाम् कार्यप्रत्यायितैः संस्कारैः सहितोऽन्त्यो वर्णोऽर्थं प्रत्याययिष्यतीति चेत् न संस्कारकार्यस्यापि स्मरणस्य क्रमवर्तित्वात् तस्मात्स्फोट एव शब्दः।

स चैकैकवर्णप्रत्ययाहितसंस्कारबीजेऽन्त्यवर्णप्रत्ययजनितपरिपाके प्रत्ययिन्येकप्रत्ययविषयतया झटिति प्रत्यवभासते न चायमेकप्रत्ययो वर्णविषया स्मृतिः वर्णानामनेकत्वादेकप्रत्ययविषयत्वानुपपत्तेः तस्य च प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वान्नित्यत्वम् भेदप्रत्ययस्य वर्णविषयत्वात्। तस्मान्नित्याच्छब्दात्स्फोटरूपादभिधायकात्क्रियाकारकफललक्षणं जगदभिधेयभूतं प्रभवतीति।। वर्णा एव तु शब्दः इति भगवानुपवर्षः।

ननूत्पन्नप्रध्वंसित्वं वर्णानामुक्तम् तन्न त एवेति प्रत्यभिज्ञानात् सादृश्यात्प्रत्यभिज्ञानं केशादिष्विवेति चेत् न प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणान्तरेण बाधानुपपत्तेः प्रत्यभिज्ञानमाकृतिनिमित्तमिति चेत् न व्यक्तिप्रत्यभिज्ञानात् यदि हि प्रत्युच्चारणं गवादिव्यक्तिवदन्या अन्या वर्णव्यक्तयः प्रतीयेरन् तत आकृतिनिमित्तं प्रत्यभिज्ञानं स्यात् न त्वेतदस्ति वर्णव्यक्तय एव हि प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायन्ते द्विर्गोशब्द उच्चारितः इति हि प्रतिपत्तिः न तु द्वौ गोशब्दाविति।

ननु वर्णाअप्युच्चारणभेदेन भिन्नाः प्रतीयन्ते देवदत्तयज्ञदत्तयोरध्ययनध्वनिश्रवणादेव भेदप्रतीतेरित्युक्तम् अत्राभिधीयते सति वर्णविषये निश्चिते प्रत्यभिज्ञाने संयोगविभागाभिव्यङ्ग्यत्वाद्वर्णानाम् अभिव्यञ्जकवैचित्र्यनिमित्तोऽयं वर्णविषयो विचित्रः प्रत्ययः न स्वरूपनिमित्तः अपि च वर्णव्यक्तिभेदवादिनापि प्रत्यभिज्ञानसिद्धये वर्णाकृतयः कल्पयितव्याः तासु च परोपाधिको भेदप्रत्यय इत्यभ्युपगन्तव्यम् तद्वरं वर्णव्यक्तिष्वेव परोपाधिको भेदप्रत्ययः स्वरूपनिमित्तं च प्रत्यभिज्ञानम् इति कल्पनालाघवम्।

एष एव च वर्णविषयस्य भेदप्रत्ययस्य बाधकः प्रत्ययः यत्प्रत्यभिज्ञानम्। कथं ह्येकस्मिन्काले बहूनामुच्चारयतामेक एव सन् गकारो युगपदनेकरूपः स्यात् उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च सानुनासिकश्च निरनुनासिकश्चेति अथवा ध्वनिकृतोऽयं भेदप्रत्ययो न वर्णकृत इत्यदोषः।

कः पुनरयं ध्वनिर्नाम यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति प्रत्यासीतदतश्च पटुमृदुत्वादिभेदं वर्णेष्वासञ्जयति तन्निबन्धनाश्चोदात्तादयो विशेषाः न वर्णस्वरूपनिबन्धनाः वर्णानां प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् एवं च सति सालम्बना एवैते उदात्तादिप्रत्यया भविष्यन्ति इतरथा हि वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां निर्भेदत्वात्संयोगविभागकृता उदात्तादिविशेषाः कल्प्येरन् संयोगविभागानां चाप्रत्यक्षत्वान्न तदाश्रया विशेषाः वर्णेष्वध्यवसातुं शक्यन्त इत्यतो निरालम्बना एव ए

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — देवादिको शरीरधारी स्वीकार करनेमें कर्ममें मले कुछ विरोध प्रसक्त न हो, परन्तु शब्दमें तो विरोध प्रसक्त होगा, क्योंकिं अर्थके साथ शब्दका औत्पत्तिक- स्वाभाविक - नित्य सम्बन्ध मानकर ' अनपेक्षत्वात् ' ( प्रमाणान्तरकी अपेक्षा न होनेसे ) इसप्रकार वेदमें प्रामाण्यका स्थापन किया है।

देवता शरीरधारी स्वीकार किए जानेपर यद्यपि ऐश्वर्यंके योगसे युगपत् अनेक कर्म सम्बन्धी हविष्योंको ग्रहणकर सकते हैं, तो भी शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे हम लोगों के समान वे जन्म - मरणवाले हो जायेंगे। इसलिए नित्य शब्दका नित्यअर्थके साथ नित्य सम्बन्ध प्रतीयमान होनेसे वैदिक शब्दों में प्रमाणान्तर अनपेक्ष्यत्वरूप प्रामाण्य स्थापन किया था उसका विरोध हो जाएगा। यदि ऐसा कहो तो यह विरोध भी नहीं है, क्योंकि उससे देवादिका प्रभव है। उससे ही अर्थात् वैदिक शब्दसे ही देवादि जगत् उत्पन्न होता है।

परन्तु ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्रमें यह निश्चय किया गया है कि जगत् की ब्रह्मसे उत्पत्ति होती है, तो यहाँ यह कैसे कहते हो कि शब्दसे जगत् उत्पन्न होता है? जब कि वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुद्गण ये अर्थं उत्पत्तिवाले होनेसे अनित्य ही हैं, यदि यह स्वीकार भी कर लिया जाय कि वैदिकशब्दसे जगत् की उत्पत्ति होती हैं, तो इतने ही से शब्द में विरोधका परिहार कैसे हुआ? वसु आदिके अनित्य होनेसे उनके वाचक वैदिक ' वसु ' आदि शब्दों का

सत्यानन्दी - T अनेक शरीर धारणकर सकता है, तो जन्म सिद्ध देवताओंका तो इस विषय में कहना ही क्या है। इसलिए देवता शरीरधारी होते हैं॥। २७॥

* पूर्वपक्षी - प्रश्न करते हैं कि शब्द और अर्थके सम्बन्धमें अनित्यता शब्दके अनित्य होने से होती है अथवा अर्थके अनित्य होनेसे? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि देवादि व्यक्ति शब्दसे उत्पन्न होते हैं, अतः सृष्टिके पहले उनकी स्थिति रहनेसे शब्द अनित्य नहीं हैं 1। द्वितीय विकल्पको ' न ' आदिसे कहते हैं। अनित्यत्व कौन निवारण कर सकता है। लोक में यह प्रसिद्ध ही है कि देवदत्तके पुत्र होनेपर ही उसका नाम यज्ञदत्त रखा जाता हैं। इसलिए शब्दमें विरोध ही है।

af ऐसा कहो तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि गो आदि शब्दों और अर्थोका सम्बन्ध नित्य दिखाई देता है। गो आदि व्यक्तियोंको उत्पत्ति होनेपर उनके आकृतियों ( जाति ) की उत्पत्ति नहीं होती। द्रव्य गुण और कर्म ये व्यक्तियाँ ही उत्पन्न होती हैं आकृतियाँ नहीं। शब्दोंका सम्बन्ध आकृतियों के साथ होता है व्यक्तियोंके साथ नहीं, क्योंकि व्यक्तियाँ अनन्त हैं, अतः उनके साथ शब्दों का सम्बन्ध ग्रहण नहीं हो सकता।

व्यक्तियोंके उत्पद्यमान होनेपर भी आकुतियोंके नित्य होने के कारण गो आदि शब्दों में कोई विरोध नहीं देखा जाता। उसी प्रकार देवादि व्यक्तियोंकी उत्पत्ति स्वीकार करनेपर भी आकृतिके नित्य होने से वसु आदि शब्दोंमें कोई विरोध नहीं है ऐसा समझना चाहिए। मन्त्र अर्थवाद आदिसे देवोंके शरीरधारण आदिकी अवगति होनेसे उनकी आकृति विशेष भी है। ऐसा समझना चाहिए। सेनापति आदि शब्दोंके समान स्थानविशेषके सम्बन्धसे इन्द्र आदि शब्द प्रवृत्त होते हैं।

इसलिए जो जो उस उस स्थान पर आरुढ़ होता है वह वह इन्द्र आदि शब्दोंसे कहा जाता है, अतः कोई दोष नहीं है। और यह शब्दप्रभवत्व ब्रह्मप्रभवत्व के समान उपादानकारणत्वके अभिप्रायसे नहीं कहा जाता। तब कैसे? नित्य अर्थ के साथ सम्बन्ध रखनेवाला जब नित्य शब्द वाचकरूपसे स्थित रहता है तभी शब्द व्यवहार योग्य अर्थ व्यक्तिकी निष्पत्ति होती है इस अभिप्रायसे शब्दसे प्रभव- उत्पत्ति होती है ऐसा कहा जाता है। परन्तु यह कैसे अवगत हो कि शब्दसे जगत् उत्पन्न होता है? प्रत्यक्ष और अनुमानसे।

प्रत्यक्ष -श्रुति, क्योंकि अपने प्रामाण्यके प्रति उसे किसी अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं होती। अनुमान -स्मृति, क्योंकि उसे अपनी प्रमाणता के लिए मूल भूत श्रुतिकी अपेक्षा होती है।

ये दोनों ही शब्दपूर्वक सृष्टिको दिखलाते हैं, ' एत इति वै प्रजापति ० ' ( ' एते ' इस पदसे देवोंका स्मरण कर प्रजापतिने देवोंकी, ' असृग्रम् ' इस पदसे मनुष्यों का स्मरण कर मनुष्योंकी, ' इन्दव ' से पितरोंका स्मरणकर पितरोंकी ' तिरः पवित्रम् ' से ग्रहोंका स्मरणकर ग्रहोंकी, ' आशव ' पदसे स्तोत्रका स्मरण कर स्तोत्रकी ' विश्वानि ' पदसे शस्त्रका स्मरणकर शस्त्रकी, ' अभिसौभगा ' इससे अन्य प्रजाओं का स्मरणकर अन्य प्रजाओंकी सृष्टिकी ) यह श्रुति है।

इस प्रकार अन्य स्थलमें भी ' स मनसा ० ' ( उस प्रजपतिने वेद त्रयीरूपा वाणीकी द्वन्द्वभावसे भावनाको अर्थात् मनके द्वारा वेद त्रयीकी आलोचनाकी ) इत्यादिसे स्थल - स्थलपर शब्द पूर्वक सृष्टिका श्रवण कराती है— प्रतिपादन करती है। ' अनादि निधना ० ' ( सृष्टि के आरम्भ में स्वयंभूने अनादि, अनन्त, नित्य और दिव्य वेदमयी वाणीको उत्सर्ग - अभिव्यक्त किया जिससे अन्य सम्पूर्ण प्रवृत्तियां हुईं ) यह स्मृति भी है।

वाणीका यह उत्सर्ग ( उत्पत्ति ) भी गुरुशिष्यपरम्परासे अध्ययनरूप संप्रदायका प्रवर्तनरूप ही समझना चाहिए | क्योंकि अनादि और अनन्त वाणीका अन्य प्रकारसे उत्सर्ग सम्भव नहीं है।

तथा ' नामरूपे ० ' ( उस महेश्वरने सृष्टि आरम्भ में वैदिक शब्दोंसे ही भूतोंके नाम, रूप और सत्कर्मों के अनुष्ठानकी प्रवृत्ति निर्माण - उत्पन्न की ) और ' सर्वेषां तु ० ' ( उसने आरम्भ में सम्पूर्ण भूतोंके पृथक् पृथक् नाम, रूप, कर्म एवं अवस्थाओं का वेदशब्दोंसे निर्माण किया ) ये स्मृतियाँ भी वेद शब्दसे ही सृष्टि दिखलाती हैं।

और हम सबका यह प्रत्यक्ष अनुभव है कि जब कोई पुरुष किसी अमीष्ट वस्तुको बनाना चाहता है तो प्रथम उस वस्तुके वाचक शब्दको स्मरण कर पश्चात् उस वस्तुका अनुष्ठान करता है अर्थात् उसे बनाता है। उसी प्रकार स्रष्टा प्रजापतिके मनमें भी सृष्टिसे पहले वैदिक शब्द प्रादुर्भूत हुए, अनन्तर शब्दके अनुगत अर्थोंकी उसने रचनाकी, ऐसा ज्ञात होता है। तथा ' स भूरिति ० ' ( उसने भू ऐसा उच्चारणकर पृथिवीको सृष्टिकी ) इत्यादि श्रुति मनमें प्रादुर्भूत हुए भू आदि शब्दों से उत्पन्न हुए भू आदि लोकोंको दिखलाती है।

पुनः किमात्मक शब्दोंको अभिप्रेत कर यह शब्द प्रभवत्व कहते हो? स्फोटात्मक, ऐसा कहा है अर्थात् शब्द वर्णात्मक है अथवा स्फोटात्मक? वैयाकरणमतमें स्फोटात्मक है, यदि वर्णात्मक शब्दसे सृष्टि मानें तो उनके उत्पन्न और नष्ट होनेके कारण नित्य शब्दोंसे देव आदि व्यक्ति उत्पन्न होते हैं यह कथन अनुपपन्न होगा। वर्णं उत्पन्न और विनष्ट होते हैं, क्योंकि प्रत्येक उच्चारणमें ये भिन्न - भिन्न प्रतीत होते हैं।

जैसे कि अध्ययन ध्वनिके श्रवणसे अदृश्यमान पुरुष विशेष भी विशेष - रूपसे निर्धारित हो जाता है कि यह देवदत्त अध्ययन करता है, यह यज्ञदत्त अध्ययन करता है। और वर्णं विषयक यह अन्यथात्व ( भिन्न ) प्रतीति मिथ्याज्ञान नहीं है, क्योंकि उसका कोई बाधक ज्ञान नहीं है। किञ्च वर्णो से अर्थज्ञान युक्त नहीं है, कारण कि एक - एक वर्ण अर्थका प्रत्यायक- बोधक नहीं होता, क्योंकि व्यभिचार है। तथा वर्णं समुदाय भी अर्थं प्रत्यायक नहीं होता, कारण कि वर्ण क्रमवाले हैं।

यदि ऐसा कहो कि पूर्व पूर्व वर्णोंके अनुभवसे जन्य संस्कार सहित अन्त्य वर्ण अर्थका बोध करायेगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि शब्द सम्बन्ध ग्रहणकी अपेक्षा रखता हुआ वह शब्द धूमादिके समान स्वयं प्रतीयमान होकर अर्थका बोध करा सकता है। पूर्वं पूर्व वर्णके अनुभव जन्य संस्कार सहित अन्तिम वर्णकी प्रतीति नहीं होती, क्योंकि संस्कार अप्रत्यक्ष हैं।

यदि कहो कि शाब्दबोधरूप कार्यसे ज्ञापित संस्कारोंसे युक्त अन्त्य वर्ण अर्थकी प्रतीति करायेगा, यह युक्त नहीं, क्योंकि संस्कारका कार्यरूप स्मरण भी क्रमवाला है। इस प्रकार वर्णों में अर्थप्रतीतिका अभाव होनेसे स्फोट ही शब्द है। एक - एक ajit प्रतीतिने जिसमें संस्काररूप बीज डाला है और अन्तिम वर्णकी प्रतीतिने जिसमें परिपाक - अन्तिम संस्कार उत्पन्न किया है, ऐसे चित्तमें एक प्रतीतिके विषयरूपसे यह स्फोट झट अवभासित- अभिव्यक्त होता है।

[ एकं पदम् ] यह एक प्रत्यय वर्णं विषयक स्मृति नहीं है, क्योंकि वर्णं अनेक होनेसे एक प्रत्यय के विषय नहीं हो सकते। उसका प्रत्येक उच्चारण प्रत्यभिज्ञाका विषय होनेसे नित्य है। भेदप्रत्यय तो वर्ण विषयक है, इसलिए स्फोटरूप नित्य वाचक शब्दसे क्रिया, कारक और फलरूप अभिधेय भूत जगत् उत्पन्न होता है। भगवान् उपवर्ष कहते हैं - वर्ण ही शब्द है। परन्तु यह जो कहा गया है। कि वर्ण उत्पत्ति और विनाशशील हैं, यह युक्त नहीं है, क्योंकि वे ही वर्ण हैं, ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है।

यदि ऐसा कहो कि जैसे काटे जानेके पश्चात् उत्पन्न हुए केशादिमें सादृश्यसे ' वे ही केश हैं ' ऐसी [ भ्रमात्मक ] प्रत्यभिज्ञा होती है, वैसे हीं वर्णोंमें भी प्रत्यभिज्ञा होती है, तो यह ठीक नहीं है, कारण कि यहाँ प्रत्यभिज्ञाका प्रमाणान्तरसे बाध अनुपपन्न है। यदि कहो कि यहाँ प्रत्यभिज्ञा आकृति - जाति निमित्त है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि व्यक्तिकी प्रत्यभिज्ञा होती है।

यदि प्रत्येक उच्चारणमें गो आदि व्यक्ति समान अन्य अन्य वर्ण व्यक्ति प्रतीत होते तो आकृति निमित्तक प्रत्यभिज्ञा होती, परन्तु यह ऐसा नहीं है, क्योकि प्रत्येक उच्चारण में वर्ण व्यक्ति ही प्रत्यभिज्ञात होते हैं। दोवार ' गो ' शब्दका उच्चारण किया ऐसी प्रतीति होती है न कि दो गो शब्दोंका उच्चारण। परन्तु जो कहा गया है कि उच्चारण के भेद से वर्ण भिन्न प्रतीत होते हैं, क्योंकि देवदत्त और यज्ञदत्तकी अ ययन ध्वनिके श्रवण से भेद प्रतीत होता है।

इसपर कहते हैं - वर्ण विषयक प्रत्याभिज्ञान निश्चित होनेपर यह प्रतीत होता कि [ कण्ठ तालू आदि स्थानोंके साथ कोष्ठस्थ वायुके ] संयोग और विभाग से अभिव्यङ्ग्य होनेके कारण वर्णोंमें अभिव्यञ्जक वैचित्र्य निमित्तक ही यह वर्णं विषयक विचित्र प्रत्यय है स्वरूपसे नहीं। और वर्ण व्यक्तियोंको भिन्न मानने वालोंको भी प्रत्यभिज्ञा सिद्धिके लिए वर्णो आकृति - जातिकी कल्पना करनी पड़ेगी और उनमें ( उदात्त आदि ) भेद प्रत्यय अन्य उपाधिसे हैं, ऐसो स्वीकार करना पड़ेगा।

इससे तो यही मानना अच्छा है कि वर्ण व्यक्तियों में भेद प्रतीति अन्य उपाधि से है और प्रत्यभिज्ञा स्वरूपसे है, इसमें कल्पना लाघव है। यह जो वर्ण विषयक प्रत्यभिज्ञा है वही वर्ण विषयक भेदप्रत्ययका बाधकप्रत्यय है। एक ही समय में बहुत लोगोंसे उच्चारित एक होता हुआ ही ' गकार- ' ग ' युगपत् उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, सानुनासिक और अननुनासिक भेदसे अनेकरूप किस प्रकार हो सकेगा? अथवा यह भेद प्रत्यय ध्वनिकृत है वर्णकृत नहीं। इसलिए कोई दोष नहीं है। तो यह ध्वनि नामकी वस्तु क्या है?

दूरसे सुनने वाले और अलग - अलग वर्णों को न जाननेवाले पुरुषके कानमें जो प्रवेश करती है और समीपसे सुनने वालेके लिए पटुत्व मृदुत्व आदि भेदों का वर्णों में आरोप करती है वह ध्वनि है। उदात्त आदि विशेष उससे होते हैं वर्णस्वरूपसे नहीं होते, क्योंकि प्रत्येक उच्चारणमें वर्ण प्रत्यभिज्ञाके विषय होते हैं। ऐसा होनेपर ये उदात आदि प्रत्यय अवलम्बन सहित होते हैं। अन्यथा प्रत्यभिज्ञाके विषयभूत वर्णोंमें भेदके न होनेसे उदात्त आदि विशेष संयोग विभागसे होते हैं ऐसी कल्पना करनी पड़ेगी।

संयोग विभाग अप्रत्यक्ष हैं, अतः तदाश्रय उदात्त आदि विशेष वर्णों में आरोपित नहीं किए जा सकते, इससे ये उदात्तादि प्रत्यय निराधार ही हो जायेंगे। किञ्च स्फोटवादीको ऐसा आग्रह भी नहीं करना चाहिए कि उदात्त आदि भेदसे प्रत्यभिज्ञायमान वर्णोंका भेद होगा, क्योंकि किसी एकके भेदसे अन्य अभिद्यमान पदार्थका भेद नहीं हो सकता। व्यक्तिके भेदसे जातिका भेद कोई भी नहीं मानते। और वर्णोंसे अर्थकी प्रतीतिका संभव होनेसे [ विवादग्रस्त ] स्फोटकी कल्पना व्यर्थ है।

पूर्वपक्षी - मैं केवल स्फोटकी कल्पना ही नहीं करता किन्तु उसका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है, क्योंकि एक - एक वर्णके ग्रहणसे अनुभव जन्य संस्कार सहित बुद्ध शीघ्र स्फोटका प्रत्यवभास होता है। ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है। क्योंकि यह बुद्धि मी वर्ण विषयक है। एक - एक वर्णका ग्रहण होनेके अनन्तर ' गो ' यह जो एक बुद्धि होती है वह समस्त ग्रहणोत्तरकाला हीयमेका बुद्धिगौरिति समस्तवर्णविषया, नार्थान्तरविषया। कथमेतदववर्ण विषयक है अर्थान्तर ( स्फोट ) विषयक नहीं है। भला यह कैसे ज्ञात हो?

तो ऐसे ज्ञात होगा कि इस बुद्धिमें मी गकारादि वर्णोंकी ही अनुवृत्ति होती है दकारादिको नहीं। यदि इस बुद्धिका गकारादिसे भिन्न स्फोटरूप अर्थ विषय होगा तो दकारादिके समान गकारादि मी उस बुद्धिसे व्यावृत्त हो जायेंगे अर्थात् जैसे पूर्व कार विषयक बुद्धिमें दकारादि विषयक अनुवृत्ति नहीं होती, वैसे स्फोट विषयक बुद्धि में गकारादिकी भी अनुवृत्ति नहीं होगी, किन्तु ऐसा होता नहीं है। इसलिए यह एक बुद्धि वर्ण विषयक ही स्मृति है।

किञ्च यह जो कहा गया है कि वर्णोंके अनेक होने से उनमें एक बुद्धिकी विषयता उपपन्न नहीं होती, तो इसके विषय में हम कहते हैं - अनेक भी एक बुद्धिके विषय हो सकते हैं, जैसे पंक्ति, वन, सेना, दश, शत, सहस्र इत्यादि स्थलों में एक बुद्धि विषयता देखी जाती है।

' गौ ' यह एक शब्द, ऐसी जो बुद्धि है वह वन, सेना आदि बुद्धि के समान बहुत वर्षों में एकार्थबोधक सम्बन्धसे औपचारिकरूपसे प्रयुक्त होती है | स्फोटवादी यहाँ कहते हैं - यदि वर्णं हीं सब मिलकर एक बुद्धिकी विषयताको प्राप्त होकर पद बनते हों तो जारा, राजा, कपि, पिक इत्यादिमें पद विशेषकी प्रतीति नहीं होगो, क्योंकि वे ही वर्णं इधर उधर प्रत्यवभासित होते हैं।

इसपर हम कहते हैं -- शब्दमें सब वर्णोंका प्रत्यवमर्श - स्मृति होनेपर भी जैसे क्रमके अनुसार ही पिपीलिकाओंमें ( चींटियोंमें ) पंक्ति बुद्धि होती है, वैसे ही क्रमके अनुसार वर्णं मी पदबुद्धि में आरूढ़ होते हैं। वर्णोंके अभिन्न होनेपर भी क्रम विशेष कृत पद विशेषकी प्रतीति विरुद्ध नहीं होती।

क्रम आदिके अनुसार गृहीत उन वर्णोंका वृद्धव्यवहारमें ( शक्तिग्रहदशा में ) भिन्न - भिन्न अर्थों के साथ सम्बन्ध अ ० पा ० ३ तार्थविशेषसंबन्धाः सन्तः स्वव्य वह ( रे ऽप्येकै कवर्णग्रहणानन्तरं समस्त प्रत्यवमर्शिन्यां बुद्धौ ग्रहण किया जाता है, अतः अपने मध्यम व्यवहारमें भी एक एक वर्णका ग्रहण होनेपर समस्त वर्णोंको विषय करनेवाली बुद्धि में वैसे ही अवभासित हुए उस उस अर्थको अव्यभिचाररूपसे ज्ञान कराते हैं, इसप्रकार वर्णवादीको कल्पनामें लाघव है।

स्फोटवादीको तो दृष्ट हानि और अदृष्टकल्पना होगी। क्रमसे ग्रहण किए हुए वे वर्ण स्फोटको व्यक्त करते हैं, वह स्फोट अर्थको व्यक्त करता है, इसप्रकार कल्पना गौरव है। यदि यह मान लें कि प्रत्येक उच्चारण में भिन्न - भिन्न वर्ण होते हैं तो भी प्रत्यभिज्ञाके आधाररूपसे वर्णगत जातियोंको अवश्य स्वीकार्य होनेसे वर्णोंमें जो अर्थ प्रतिपादन प्रक्रिया रची गई है, उसका वर्णगत जातियोंमें संचार करना चाहिए। इस कारण नित्य शब्दोंसे देव आदि व्यक्तियोंकी उत्पत्ति होती है, अतः कोई विरोध नहीं है॥ २८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि देवताको देहधारी मानें तो याग आदिमें ऋत्विक् के समान उसका भी वहाँ प्रत्यक्ष दर्शन होना चाहिए, परन्तु होता नहीं है, अतः अर्थं युक्त शब्दको ही देवता मानना युक्त है। शब्दात्मक देवता तो जड़ है, इसलिए उसकी विद्यामें अधिकारकी चर्चा हो असम्भव है | शब्दात्मक देवता मानने से कर्ममें विरोध भी नहीं होगा।

सिद्धान्ती - यह युक्त नहीं है, क्योंकि देवताओंके युगपद् अनेक शरीर धारण करनेमें श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण, लोक अनुभव आदि अनेक प्रबल प्रमाण हैं। जैसे योगी लोग योगबलसे एक ही समय में अनेक स्वरूपोंको धारण कर अनेक कार्य करते हैं, वैसे देवता भी ऐश्वर्यं आदि बलसे अनेक स्वरूप धारण करते हैं, इसमें कोई विरोधका अवकाश नहीं है। इस विषय में शाकल्य और याज्ञवल्क्यका प्रश्नोत्तर है - शाकल्य - ' कतमे ते ० ' ( वे कितने हैं?

) याज्ञवल्क्य - ' त्रयस्त्रिंशत्त्वेव ० ' ( वे तैंतीस हैं ) ' अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यो, ' चन्द्रमा और नक्षत्र ये आठ वसु हैं, क्योकि यही प्राणियोंके कर्मफलके आश्रय देहादि कार्यकरण संघातरूपसे परिणत होकर सर्व जगत्को बसाते हैं, इसलिए ये वसु कहे जाते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन ये एकादश रुद्र हैं, क्योंकि मृत्युके समयमें इनके देहसे निकल जानेपर कुटम्बियोंको रुलाने - रुदन करानेसे ये रुद्र कहलाते हैं।

वर्ष में द्वादश मास होनेसे द्वादश आदित्य हैं, ये पुनः पुनः परिभ्रमण करते हुए आयु और कर्मफल भोगको हरण करते हैं, अतः ये आदित्य कहे जाते हैं। इन्द्र और प्रजापति ये ही देवता अपनी - अपनी सामर्थ्य से अनेक रूप हो जाते हैं।

* वे तैंतीस देवता - अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक इन छ : की विभूतियाँ हैं, अतः इनका इन छः में ही अन्तर्भाव है। इनका पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यु इन तीनमें अन्तर्भाव है। ये तीन अन्न और प्राण इन दोमें अन्तर्भूत हैं, और ये दोनों एक प्राणरूप हिरण्यगर्भ में अन्तर्भूत हैं। इसप्रकार श्रुतिमें अनेकरूपता दिखाई गयी है। इसमें ' अणिमा महिमा चैव लघिमा प्राप्तिरीशिता। प्राकाम्यं च वशित्वं च यत्रकामावसायिता॥

' ( मार्कण्डेयपुराण ) ( अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, ईशित्व, प्राकाम्य, वशित्व और यत्रकामावसायिता ) ये आठ ऐश्वर्यं हैं। ' योगी योगबलसे क्षणभर में सूक्ष्म, महान्, भारी और हल्का हो जाता है। प्राप्ति अँगुलीसे चन्द्रमा आदिका स्पर्श करना, ईक्षिता - सृष्टि करनेकी सामर्थ्यं, प्राकाम्य इच्छा शक्तिका नाश न होना, वशित्वनियमन करनेकी शक्ति, यत्रकामावसायिता - संकल्पमात्र से इष्टकी प्राप्ति। ' ' जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजा सिद्धयः ' ( यो - यू ० ४।

१ ) ( जन्म, औषधसेवन, मन्त्रानुष्ठान, तप और समाधिसे सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं ) यह स्मृति प्रमाण भी है। साधनोंसे शरीर, इन्द्रिय और चित्तका मल नष्ट होकर विशेष परिवर्तन होनेसे उनमें अलौकिक शक्तियोंके प्रादुर्भावको सिद्धि कहते हैं। योगबलसे जब योगी एकसे

* मीमांसक लोग गो आदि शब्दोंकों गोत्व आदिका वाचक मानते हैं। नैयायिक लोग गो आदि शब्दोंको व्यक्ति वाचक मानते हैं। यहाँ दो निकल्प हैं - एक व्यक्तिमें एक शक्ति है अथवा अनन्त व्यक्तियोंमें अनन्त शक्तियाँ हैं? प्रथम पक्ष युक्त नहीं हैं, क्योंकि शुक्ल व्यक्तिका शक्तिग्रह ( शक्तिज्ञान ) होनेपर कृष्ण व्यक्तिका शक्तिग्रह न होगा, किन्तु होता है, अत : प्रथम पक्षमें व्यतिरेकव्यभिचार है।

दूसरा विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि अतीत, अनागत और वर्तमान भेदसे अनन्त व्यक्तियों में अनन्त शक्तियाँ माननेसे अनन्तशक्ति कल्पना गौरव है। और व्यक्तिकी उत्पत्ति और नाशसे शक्तियों की भी उत्पत्ति और विनाश मानना पड़ेगा, इत्यादि दोषोंकी प्रसक्ति है। इसलिए गो आदि पदोंको गोत्व आदि जातिमें शक्ति माननेसे लाघव है। इस शाब्दबोध प्रणालीके अनुसार जैसे गो आदि शब्दों का अर्थं गोत्व आदि जाति है, वैसे वसु आदि शब्दोंका अर्थं वसुत्व आदि जाति है व्यक्ति नहीं।

यद्यपि शुक्ल पीत नीलादि भेदसे व्यक्ति नाना और अनित्य हैं तो भी गोत्व अर्थं नित्य है, इसलिए शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य हो सिद्ध होता है। कहीं व्यक्ति में शब्दकी प्रवृत्तिका कारण जाति होती है, जैसे गो आदि व्यक्ति में गो आदि शब्दकी प्रवृत्तिका कारण गोत्व आदि जाति है।

कहीं प्रवृत्ति में उपाधि कारण होती है, जैसे स्थानविशेष सम्बन्धरूप उपाधिको लेकर सेनापति आदि शब्दकी प्रवृत्ति होती है, वैसे इन्द्रादि भी स्थानविशेष है जो उस पदपर आरूढ़ होते हैं, वे इन्द्रादि कहलाते हैं, अतः व्यक्तिके न रहने पर भी जाति रहती है, वह नित्य है, इसलिए शब्द अर्थका सम्बन्ध भी नित्य है। इसलिए शब्दप्रामाण्यमें कोई विरोध नहीं है।

* जैके ब्रह्म जगत् की उत्पत्तिमें उपादानकारण है, वैसे शब्द जगत्को उत्पत्ति में उपादानकारण नहीं है, किन्तु निमित्तकारण है इसप्रकार पूर्वापरका पर्यालोचन करनेसे कारण विषयक कोई विरोध नहीं है। ' नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वं जाति : ' ( नित्य और देह, मनुष्य, पशु आदि अनेक व्यक्तियोंमें समवाय सम्बन्धसे रहनेवाला धर्म जाति कहलाता है जैसे मनुष्यत्व ) मनुष्य आदि शब्दोंका सम्बन्ध मनुष्यत्व आदि जातिसे है हाथ पैर आदि संघातसे नहीं। इस प्रकार शब्द नित्य है, और उससे जगत् की उत्पत्ति होती है। इस विषयमें यह श्रुति प्रमाण भी है। ' ए इति वै प्रजापति ० ' इस श्रुतिस्थ ' एते ' पद देवताओंका स्मारक है। ' असृग्रम् ' पद ' असृग् रुधर, रम- रमण, अथांन्त् रुधर प्रधान देहमें रमण करनेवाले मनुष्योंका स्मारक है। चन्द्रमण्डल में स्थित पितरोंका स्मारक ' इन्दु ' शब्द है।

* जैसे महाभारत आदि वाक्य समुदाय किसी महापुरुषद्वारा निर्मित है, वैसे वैदिक शब्दों की उत्पत्ति नहीं है, किन्तु आचार्यं शिष्य परम्परासे प्रवृत्त हुआ अध्ययन है, यही सम्प्रदाय है। इस प्रकारकी वेद वाणीकी उत्पत्ति समझनी चाहिए। जैसे कुम्हार घट आदिके बनानेसे पहले उस वस्तुके नामका मनमें स्मरण कर तथा आकारको मनमें विचार कर पश्चात् उस अमीष्ट वस्तुको बनाता है, वैसे प्रजापति मी पूर्वकल्पोंके संस्कारोंसे उस वस्तुके नामका मनमें स्मरण कर उस वस्तुका उस शब्दसे निर्माण करता है। इस प्रकार वैदिकशब्दोंसे जगत् उत्पन्न होता है।

# यद्यपि पूर्वोक्तरीति से वर्णोंका समुदाय नहीं हो सकता, फिर भी जैसे ' आग्नेय ' आदि यागोंका अपूर्व ( पुण्य - पाप ) द्वारा समुदाय होता है, वैसे संस्काररूप अपूर्वं द्वारा वर्णोंका समुदाय संभव है। क्या वह संस्कार वर्णोंसे उत्पन्न अपूर्व संज्ञक संस्कार हैं अथवा वर्णानुमवसे जन्य भावना नामका संस्कार है? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है। क्या वह संस्कार अज्ञात होकर अर्थका ज्ञान कराता है अथवा ज्ञात होकर?

प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि संस्कार सहित शब्द ज्ञात होकर ही अर्थकी प्रतीति कराता है, कारण कि वह धूम आदिके समान सम्बन्ध ग्रहणकी अपेक्षा रखकर ही बोधक होता है। द्वितीय पक्ष ( ज्ञात होकर ) तो क्या वह प्रत्यक्षसे होता है अथवा कार्यरूप लिङ्गसे? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि संस्कार अप्रत्यक्ष हैं। यदि दूसरा पक्ष कहो तो अर्थज्ञान होनेपर संस्कारज्ञान होता है और संस्कारज्ञान होनेपर अर्थज्ञान होता है इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होता है, अतः यह भी युक्त नहीं है।

पदार्थ स्मरण पदज्ञानके अनन्तर होता है, अतः संस्कार सहित अन्त्य वर्णात्मक पदका ज्ञान स्मरणसे नहीं होता, इससे भावना नामक संस्कारका भी निवारण हो गया, क्योंकि उससे केवल वर्णस्मृति होती है। इसलिए वह अर्थ प्रतिपत्तिका हेतु नहीं हो सकता। इस प्रकार वर्ण अर्थके बोधक नहीं हैं किन्तु स्फोट है।

* ' राम ' यह एक पद है, यह एक प्रतीति वर्णोंको विषय नहीं करती, क्योंकि वर्ण अनेक हैं वे एक प्रत्ययके विषय नहीं हो सकते, इसलिए इस एक प्रत्ययका विषय स्फोट है वह नित्य है। ' स्फुटयते वर्णैव्यज्यते इति स्फोट : ' वर्णोंसे व्यक्त होनेवाला और अर्थ की अभिव्यक्ति करनेवाला जो गो आदि शब्द हैं वही स्फोट है वह एक और नित्य है। पद और वाक्यभेदसे स्फोट दो प्रकारका है। इनमें भी वाक्यस्फोट प्रधान है और पदस्फोट गौण। इस स्फोट वादका ' वर्णा एव तु शब्दः ' आदिसे खण्डन करते हैं।

* उच्चारण भेदसे वर्णोंको भिन्न - भिन्न माननेमें कल्पना गौरव है, एक तो ' ग ' वर्णं विषयक प्रत्यभिज्ञाको ' गोत्व ' जाति विषयक मानना, वर्णं भेद प्रतीतिके लिए उपाधिकी कल्पना करना, उत्पत्ति और विष्ट होने से अनन्त वर्णोंकी कल्पना करना, इत्यादि कल्पना गौरव है। उच्चारण भेदसे वर्णोंमें भेद स्वीकार करनेकी अपेक्षा उनमें भेद औपाधिक है और प्रत्यभिज्ञा स्वरूपसे है, ऐसा माननेमें कल्पना लाघव है।

# वायुके संयोग आदि अप्रत्यक्ष होनेसे उसमें रहनेवाली उदात्त आदि विचित्रताका वर्णों में प्रत्यक्ष आरोप असंभव है, इस अरुचिसे ' अथवा ' इत्यादि भाष्यसे स्वमतको उपस्थित करते हैं। वर्णोंमें ध्वनिका अभेदाध्यास होनेसे ध्वनिके उदात्त आदि धर्म वर्णोंमें प्रतीत होते हैं। श्रोताके कर्ण में दूरसे आनेवाला मृदु, कठिन शब्द ध्वनि है। वह वर्णोंसे भिन्न है। वर्णोंकी प्रत्येक उच्चारणमें अनुवृत्ति होती है किन्तु ध्वनिकी अनुवृत्ति नहीं होती। ध्वनिके उदात्त आदि धर्म वर्णोंमें आरोपित for जाते हैं।

# जैसे परस्पर भिन्न अनेक गो व्यक्तियोंमें गोत्व जाति अभिन्न है अर्थात् व्यक्ति के भेदसे जातिका भेद नहीं होता, वैसे ध्वनिके भेदसे वर्णं भी भिन्न नहीं होते। जिस ज्ञानमें जो अर्थ भासता है वह ज्ञान उसमें प्रमाण होता है। यह ' गो ' है, इस एक बुद्धिमें वर्ण ही प्रतीत होते हैं स्फोट नहीं। इसलिए स्फोट माननेमें कोई प्रमाण नहीं। अतः पद वर्णरूप है, स्फोटरूप नहीं।

* अनेक वर्ण एक बुद्धिके विषय होते हैं, अब इसको स्पष्ट करते हैं - जिसकी एक अर्थमें शक्ति हो वह एक पद कहा जाता है, जैसे राम। एक प्रधानार्थ में जिसका तात्पर्य हो वह एक वाक्य होता है, जैसे ' रामम् आनय ' ( रामको ले आओ )। इसप्रकार अनेक वर्णों तथा अनेक पदोंका एक अर्थके साथ सम्बन्ध होनेसे अनेक में एकत्का उपचार होता है अर्थात् यद्यपि वर्ण अनेक हैं तो मी एकार्थ वोधकत्वरूप उपाधिको लेकर उनमें एक पदत्व व्यवहार उनचारसे होता है। यथा गौ, वन, सेना आदि ऐसे लोकमें अनेक उदाहरण मिलतें हैं।

* क्रमशः संमिलित वर्णं इस प्रकार एकार्थकी प्रतीति कराते हैं - व्युत्पत्ति ' दशामें बालक ' गामानय ' ( गौ ले आओ ) इस वृद्ध व्यवहारको देखकर ' गाम् ' इस उच्चारण क्रमसे उपलब्ध क्रमका वर्णोंमें आरोप कर ये वर्ण जब इस क्रमले ' गा, म, आ, न, य ' इस प्रकार ही हों, तो इस अर्थंके वाचक हो सकते हैं। इस प्रकार अर्थ सम्बन्ध आदि रूपसे ज्ञात हुए वर्णं श्रोताके प्रवृत्तिकालमें और इस प्रकार स्मृतिमें आरूढ होकर अपने - अपने अर्थका बोध कराते हैं। इस प्रकार वर्णवादी के मतमें महान् लाघव है 1। और स्फोटवादीके मतमें दृष्टहानि - वर्ण अर्थके बोधक हैं, इसका त्याग और अदृष्ट - स्फोट अर्थका बोधक है यह अदृष्ट कल्पना है। अभी तक तो वर्णोंको नित्य स्वीकार कर स्फोटका खण्डन किया गया। अब वर्णोंको अनित्य स्वीकार कर तर्कसे स्फोटका खण्डन ' अथापि ' इत्यादि भाष्यसे करते हैं। नित्य तथा क्रम विशेषवाले तथा गृहीत संगतिवाले अर्थके बोधक जो निश्चित गोत्व आदि सामान्य हैं, उन सामान्यों में भी वर्णगत प्रक्रियाका संचार करना चाहिए। किन्तु अनिश्चित स्फोटकी कल्पना युक्त नहीं है। इस प्रकार वर्ण नित्य और वाचक सिद्ध होनेपर नित्य शब्दोंसे देवादि व्यक्तियोंकी उत्पत्ति सर्वथा अविरुद्ध है || २८

1.3.29 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र २९

सूत्र १.३.२९

अत एव च नित्यत्वम् ।

और इसी कारण (इनका) नित्यत्व (अविनाशीपन) है ॥ १.३.२९ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.२९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 288

पदच्छेद — अतः , एव , च , नित्यत्वम्

सूत्रार्थ — ( अतएव च ) और देव आदि समस्त जगत् वेद शब्दोंसे उत्पन्न होनेके कारण ( नित्यत्वम् ) वेदमें नित्यत्व है अर्थात् वेद नित्य है।

शाङ्करभाष्य

कर्तुरस्मरणादिति स्थिते वेदस्य नित्यत्वे देवादिव्यक्तिप्रभवाभ्युपगमेन तस्य विरोधमाशङ्क्य अतः प्रभवात् इति परिहृत्य इदानीं तदेव वेदनित्यत्वं स्थितं द्रढयति अत एव च नित्यत्वमिति। अत एव नियताकृतेर्देवादेर्जगतो वेदशब्दप्रभवत्वात् वेदशब्दनित्यत्वमपि प्रत्येतव्यम्। तथा च मन्त्रवर्णः यज्ञेन वाचः पदवीयमायंस्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम् इति स्थितामेव वाचमनुविन्नां दर्शयति। वेदव्यासश्चैवमेव स्मरति युगान्तेऽन्तर्हितान्वेदान्सेतिहासान्महर्षयः। लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयंभुवा इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — [ वेदापौरुषेयत्वाधिकरण में ] वेदके स्वतन्त्र कर्ताके स्मरण आदि न होनेसे वेदमें नित्यत्व सिद्ध होनेपर देव आदि व्यक्तियोंका प्रभव स्वीकार करनेसे [ देव आदिके वाचक इन्द्र आदि शब्दोंकी मी उत्पत्ति माननी पड़ेगी ] वेदमें नित्यत्व अयुक्त है, इस विरोधकी आशङ्काको ' अतः प्रभवात् ' इस सूत्रसे परिहारकर अब पूर्व सिद्ध उसी वेद नित्यत्वको ' अतएव च नित्यत्वम् ' इससे दृढ करते हैं। इसीसे नियत आकृति विशिष्ट देव आदि जगत्को वेदशब्दसे उत्पत्ति होनेके कारण वेदशब्द में नित्यत्व समझना चाहिए। तथा ‘ यज्ञेन वाच : ० ' ( पूर्व सुकृत पूण्य कर्म से वेदके लाभकी योग्यताको प्राप्त हुए याज्ञिक पुरुषोंने ऋषियोंमें स्थित उस वेदमयी वाणीको प्राप्त किया ) यह मन्त्र पूर्वकल्प सिद्ध वेदमयी वाणीकी उपलब्धि दिखलाता है। भगवान् वेदव्यास भी ऐसा ही कहते हैं - ' युगान्ते ' ( अवान्तर प्रलय के अनन्तर महर्षियोंने ब्रह्माकी अनुज्ञा पाकर युगके अन्तमें तिरोभूत इतिहास सहित वेदोंको तपसे प्राप्त किया ) यह स्मृति भी है।। २ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ‘ अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामगेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुरा विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राणि ' ( वृ ० २।४।१० ) ( याज्ञवल्क्य - हे मैत्रेयी! ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक - ब्राह्मणमन्त्र सब इसी परमात्मा के निःश्वास हैं ) इत्यादि श्रुतिके पर्यालोचनसे यह स्पष्ट होता है कि आकाश आदिके समान वेदको परमेश्वर सृष्ट मानने पर भी वेदके नित्यत्वमें कोई विरोध नहीं है।। २ ९

1.3.30 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३०

सूत्र १.३.३०

समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश् च ॥ १.३.३० ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 289

पदच्छेद — समाननामरूपवात् , च , आवृत्ती , अपि , अविरोधः , दर्शनात् , स्मृतेः , च

सूत्रार्थ — ( आवृत्तावपि ) सृष्टि और प्रलयकी आवृत्ति होनेपर भी ( अविरोधः ) शब्द और अर्थ सम्बन्ध में अनित्यतारूप विरोध नहीं है, ( समाननामरूपत्वाच्च ) क्योंकि उत्तर - कल्पप्रपञ्च पूर्वकल्प प्रपञ्चके समान नाम रूप वाला है। कैसे? ( दर्शनात् ) ' धाता यथापूर्व मकल्पयत् ' इत्यादि श्रुति और ( स्मृतेः ) ' यथातुंष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ' इत्यादि स्मृति हैं।

शाङ्करभाष्य

अथापि स्यात् यदि पश्वादिव्यक्तिवद्देवादिव्यक्तयोऽपि संतत्यैवोत्पद्येरन् निरुध्येरंश्च ततोऽभिधानाभिधेयाभिधातृव्यवहाराविच्छेदात्संबन्धनित्यत्वेन विरोधः शब्दे परिह्रियेत। यदा तु खलु सकलं त्रैलोक्यं परित्यक्तनामरूपं निर्लेपं प्रलीयते प्रभवति चाभिनवमिति श्रुतिस्मृतिवादा वदन्ति तदा कथमविरोध इति। तत्रेदमभिधीयते समाननामरूपत्वादिति। तदापि संसारस्यानादित्वं तावदभ्युपगन्तव्यम्। प्रतिपादयिष्यति चाचार्यः संसारस्यानादित्वम् उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च इति।

अनादौ च संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः प्रलयप्रभवश्रवणेऽपि पूर्वप्रबोधवदुत्तरप्रबोधेऽपि व्यवहारान्न कश्चिद्विरोधः एवं कल्पान्तरप्रभवप्रलययोरपीति द्रष्टव्यम्।

स्वापप्रबोधयोश्च प्रलयप्रभवौ श्रूयेते यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः इति।

स्यादेतत् स्वापे पुरुषान्तरव्यवहाराविच्छेदात्स्वयं च सुषुप्तप्रबुद्धस्य पूर्वप्रबोधव्यवहारानुसंधानसंभवादविरुद्धम् महाप्रलये तु सर्वव्यवहारोच्छेदाज्जन्मान्तरव्यवहारवच्च कल्पान्तरव्यवहारस्यानुसंधातुमशक्यत्वाद्वैषम्यमिति। नैष दोषः सत्यपि सर्वव्यवहारोच्छेदिनि महाप्रलये परमेश्वरानुग्रहादीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तेः। यद्यपि प्राकृताः प्राणिनो न जन्मान्तरव्यवहारमनुसंदधाना दृश्यन्त इति तथापि न तत्प्राकृतवदीश्वराणां भवितव्यम्।

यथा हि प्राणित्वाविशेषेऽपि मनुष्यादिस्तम्बपर्यन्तेषु ज्ञानैश्वर्यादिप्रतिबन्धः परेण परेण भूयान् भवन् दृश्यते तथा मनुष्यादिष्वेव हिरण्यगर्भपर्यन्तेषु ज्ञानैश्वर्याद्यभिव्यक्तिरपि परेण परेण भूयसी भवतीत्येतच्छ्रुतिस्मृतिवादेष्वसकृदेवानुकल्पादौ प्रादुर्भवतां पारमैश्वर्यं श्रूयमाणं न शक्यं नास्तीति वदितुम्। ततश्चातीतकल्पानुष्ठितप्रकृष्टज्ञानकर्मणामीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां वर्तमानकल्पादौ प्रादुर्भवतां परमेश्वरानुगृहीतानां सुप्तप्रतिबुद्धवत्कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तिः।

तथा च श्रुतिः यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वैदा्च प्रहिणोति तस्मै। त्ि देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये इति। स्मरन्ति च शौनकादयः मधुच्छन्दःप्रभृतिभिऋर््षिभिर्दाशतय्यो दृष्टाः इति। प्रतिवेदं चैवमेव काण्डर्ष्यादयः स्मर्यन्ते। श्रुतिरपि ऋषिज्ञानपूर्वकमेव मन्त्रेणानुष्ठानं दर्शयति यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गर्तं वा प्रतिपद्यते इत्युपक्रम्य तस्मादेतानि मन्त्रे मन्त्रे विद्यात् इति।

प्राणिनां च सुखप्राप्तये धर्मो विधीयते दुःखपरिहाराय चाधर्मः प्रतिषिध्यते दृष्टानुश्रविकसुखदुःखविषयौ च रागद्वेषौ भवतः न विलक्षणविषयौ इत्यतो धर्माधर्मफलभूतोत्तरोत्तरा सृष्टिर्निष्पद्यमाना पूर्वसृष्टिसदृश्येव निष्पद्यते। स्मृतिश्च भवति तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे। तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः।। हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते। तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते इति।

प्रलीयमानमपि चेदं जगच्छक्त्यवशेषमेव प्रलीयते शक्तिमूलमेव च प्रभवति इतरथा आकस्मिकत्वप्रसङ्गात्। न चानेकाकाराः शक्तयः शक्याः कल्पयितुम्। ततश्च विच्छिद्य विच्छिद्याप्युद्भवतां भूरादिलोकप्रवाहाणाम् देवतिर्यङ्मनुष्यलक्षणानां च प्राणिनिकायप्रवाहाणाम् वर्णाश्रमधर्मफलव्यवस्थानां चानादौ संसारे नियतत्वमिन्द्रियविषयसंबन्धनियतत्ववत्प्रत्येतव्यम् न हीन्द्रियविषयसंबन्धादेर्व्यवहारस्य प्रतिसर्गमन्यथात्वं षष्ठेन्द्रियविषयकल्पं शक्यमुत्प्रेक्षितुम्।

अतश्च सर्वकल्पानां तुल्यव्यवहारत्वात् कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानक्षमत्वाच्चेश्वराणां समाननामरूपा एव प्रतिसर्गं विशेषाः प्रादुर्भवन्ति। समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावपि महासर्गमहाप्रलयलक्षणायां जगतोऽभ्युपगम्यमानायां न कश्चिच्छब्दप्रामाण्यादिविरोधः। समाननामरूपतां च श्रुतिस्मृती दर्शयतः सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो सुवः इति यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सूर्याचन्द्रमःप्रभृति जगत् क्लृप्तम् तथास्मिन्नपि कल्पे परमेश्वरोऽकल्पयदित्यर्थः तथा अग्निर्वा अकामयत।

अन्नादो देवाना््यामिति। स एतमग्नये कृत्तिकाभ्यः पुरोडाशमष्टाकपालं निरवपत् इति नक्षत्रेष्टिविधौ योऽग्निर्निरवपत् यस्मै वाग्नये निरवपत् तयोः समाननामरूपतां दर्शयति इत्येवंजातीयका श्रुतिरिहोदाहर्तव्या स्मृतिरपि ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः। शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः।। यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये। दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु।। यथाभिमानिनोऽतीतास्तुल्यास्ते सांप्रतैरिह।

देवा देवैरतीतैर्हि रूपैर्नामभिरेव च इत्येवंजातीयका द्रष्टव्या।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — किञ्च ऐसा होता हुआ भी यदि पशु आदि व्यक्तियोंके समान देवादि व्यक्तियोंके मी सन्तत जन्म और विनाश होते तो नाम, विषय, वक्ता के व्यवहारका विच्छेद न होनेके कारण सम्बन्ध नित्य रहने से शब्द में विरोधका परिहार हो जाता, परन्तु जब श्रुतियाँ और स्मृतियाँ उद्घोषित करती हैं कि सम्पूर्ण त्रैलोक्य नाम रूपका परित्याग कर समूल नष्ट हो जाता है और फिर नवीन उत्पन्न होता है, तब अविरोध कैसे? इसके उत्तर में यह कहते हैं — तो भी संसारको अनादि मानना चाहिए, क्योंकि ' समाननामरूपत्वात् ' इत्यादि कहा है 1

। और आचार्य - ' उपपद्यते ' इस सूत्र से संसार में अनादित्वका प्रतिपादन करेंगे 1।

संसारको अनादि माननेपर सुषुप्ति और जाग्रत् में उत्पत्ति और प्रलयके श्रवण होनेपर भी जैसे पूर्व प्रबोधके समान उत्तर जाग्रत अवस्था में व्यवहार होने से कोई विरोध नहीं होता, वैसे पूर्व कल्पके लय और उत्तरकल्पके उत्पत्ति में भी वैदिक नित्यतामें कोई विरोध नहीं है, ऐसा समझना चाहिए ' यदा सुप्तः ० ' ( जब वह सुप्त पुरुष किसी मो स्वप्नको नहीं देखता तब वह उस प्राणरूप परमात्मामें एक हो जाता है अर्थात् अभिन्नरूपसे प्राप्त हो जाता है।

तब सब नामोंके साथ वाणी मी उसमें लीन हो जाती है, नेत्र सब रूपोंके साथ उसमें लीन हो जाता है, श्रोत्र सब शब्दों के साथ उसमें लीन हो जाता है, मन सब संकल्पोंके साथ उसमें लीन हो जाता है, जब वह जागता है तब जलती हुई अग्निसे जैसे चिनगारियाँ सब दिशाओंमें फैलती हैं, वैसे इस आत्मासे सब इन्द्रियरूप प्राण अपने - अपने गोलकरूप स्थानोंको प्राप्त होते हैं।

इन्द्रियोंके अनन्तर सूर्यादि देवता और देवताओंके अनन्तर विषयरूप लोक प्रकट होते हैं ) इसप्रकार श्रुतिमें सुषुप्ति और जाग्रत् अवस्थामें जगत्के प्रलय और उत्पत्ति कहे गए हैं। यह ठीक है, परन्तु सुषुप्तिमें अन्य पुरुषोंका व्यवहार विच्छिन्न न होनेके कारण सुषुप्ति से प्रबुद्ध पुरुषको स्वयं पूर्व जाग्रत् अवस्थाके व्यवहारका अनुसन्धान हो सकता है, इसलिए कोई विरोध नहीं है।

किन्तु महाप्रलय में तो सब व्यवहारोंका उच्छेद हो जानेसे जन्मान्तर व्यवहारके समान कल्पान्तर व्यवहारका अनुसन्धान नहीं हो सकता, इसलिए ( दृष्टान्त और दान्तिक में ) विषमता है। यह दोष नहीं है। सर्वव्यवहार के उच्छेद करनेवाले महाप्रलयके होनेपर भी परमेश्वरके अनुग्रहसे हिरण्यगर्भादि ईश्वरोंको कल्पान्तरके व्यवहारका अनुसन्धान ( स्मरण ) हो सकता है।

यद्यपि प्राकृत प्राणी जन्मान्तरके व्यवहारोंका अनुसन्धान करते हुए नहीं देखे जाते, तो भी ईश्वरोंको उन प्राकृत प्राणियोंके समान नहीं समझ लेना चाहिए। जैसे प्राणित्व समान होनेपर भी मनुष्यत्वादिसे लेकर स्तम्भ ( वृक्षादि ) पर्यन्त प्राणियोमें ज्ञान ऐश्वर्यादिका प्रतिबन्ध उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ देखा जाता है, वैसे मनुष्यादिसे लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त ज्ञान, ऐश्वर्य आदिकी अभिव्यक्ति उत्तरोत्तर अधिक होती है। ऐसा श्रुति और स्मृतिके वचनोंसे वार वार सुना हुआ है। वह नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते।

इसलिए अतीत कल्पमें जिन्होंने सर्वोत्तम ज्ञान और [ आधानसे लेकर अश्वमेध पर्यन्त ] कर्मोंका अनुष्ठान किया है और वर्तमान कल्पके प्रारम्भमें जो प्रादुर्भूत हुए हैं तथा परमेश्वरसे अनुगृहीत हुए हिरण्यगर्भादि ईश्वरोंको सुषुप्तिसे जागे पुरुषके समान पूर्वकल्पके व्यवहारोंका अनुसन्धान होना युक्त है।

क्योंकि ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व ० ' ( जो सृष्टिके आरम्भ में ब्रह्माको उत्पन्न करता है और जो उसकी बुद्धिमें वेदोंका आविर्भाव करता है अपनी बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले उस देवकी मैं मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ ) ऐसी श्रुति है। और ' मधुच्छन्दः प्रभृतिभि ० ' ( मधुच्छन्द आदि ऋषियोंने + दस मण्डलवाले ऋग्वेदकी ऋचाएँ देखीं ) इसप्रकार शौनकादि ऋषि भी कहते हैं। तथा बोधायन आदि ऋषियोंने भी प्रत्येक वेदमें काण्ड आदिके द्रष्टा ऋषियोंका स्मरण किया है।

' यो हवा अविदिता ० ' ( जिस मन्त्रके छन्द, ऋषि, देवता तथा विनियोगका ज्ञान नहीं है उससे जो यज्ञ कराता है या अध्यापन करता है वह स्थाणु हो जाता है अथवा नरकको प्राप्त होता है ) ऐसा उपक्रम कर ' तस्मादेतानि ० ' ( इसलिए प्रत्येक मन्त्रमें ऋषि आदिको जाने ) इस प्रकार श्रुति भी ऋषिज्ञानपूर्वक ही मन्त्रसे अनुष्ठान दिखलाती है। प्राणियोंके सुखकी प्राप्तिके लिए धर्मका विधान है और दुःख परिहार के लिए अधर्मका प्रतिषेध है।

ऐहिक और पारलौकिक सुख दुःख विषयक राग और द्वेष होते हैं, अन्य विषयोंमें नहीं होते। इसलिए धर्म और अधर्मके फलभूत उत्पन्न हुई उत्तरोत्तर सृष्टि पूर्वसृष्टि के सदृश ही निष्पन्न होती है।

' तेषां ये ० ' ( प्राणियों में से जिन प्राणियोंने जो जो कम प्रथम सृष्टिमे किये उन कर्मोंको वे पुनः पुनः उत्पन्न होकर प्राप्त करते हैं ) ' हिंस्राहिंखे ० ' ( हिंसा अहिंसा, मृदु क्रूर, धर्मं अधर्म, सत्य असत्य इत्यादि धर्मोसे भावित हुए उत्पन्न होकर उन्हीं को प्राप्त करते हैं और वे ही उनको रुचिकर होते हैं ) ऐसी स्मृति भी है। प्रलीयमान होता हुआ भी यह जगत् शक्ति अवशिष्ट प्रलीन होता है, फिर शक्ति से ही उत्पन्न होता है अन्यथा जगत् में अकारणत्व प्रसङ्ग उपस्थित होगा।

अविद्यारूप उपादान कारणमें लीन, कार्यरूप संस्कारसे भिन्न अनेक प्रकारकी शक्तियोंकी कल्पना नहीं कर सकते [ क्योंकि ऐसी कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं है ] इसलिए पृथक् - पृथक् उत्पन्न होनेवाले भू आदि लोकप्रवाह और देव, पशु, मनुष्यरूप प्राणी समूहका प्रवाह, वर्ण, आश्रम, धमं और फलकी व्यवस्थाओंका नियतत्व अनादि संसारमें विषयेन्द्रिय सम्बन्धके नियतत्व के समान समझना चाहिए। छठी इन्द्रिय ( मन ) के विषयके समान प्रत्येक सृष्टिमें इन्द्रिय विषय सम्बन्ध आदि व्यवहारके भेदकी कल्पना नहीं की जा सकती।

इस कारण सब कल्पों में तुल्य व्यवहार होनेसे और हिरण्यगर्भ जादि ईश्वरोंको अन्य कल्पके व्यवहारका अनुसन्धान करनेमें समर्थ होनें से प्रत्येक सृष्टिमें समान नाम रूपवाले भिन्न - भिन्न व्यक्ति प्रादुर्भूत होते हैं।

नाम और रूपके समान होनेसे जगत् की महासृष्टि और महाप्रलयरूप आवृत्ति स्वीकार करनेपर भी शब्द प्रामाण्यादिमें कोई विरोध नहीं है | श्रुति और स्मृति भी सब कल्पों में नामरूपकी समानता दिखलाती हैं - ' सूर्याचन्द्रमसौ ० ' ( ब्रह्माने पूर्वकल्प के समान ही सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्गकी रचना की ) पूर्वकल्प में सूर्य चन्द्रमा आदि जगत्‌को जैसो कल्पनाकी थी, वैसी इस कल्पमें भी परमेश्वरने उनकी कल्पना की। ऐसा अर्थ है।

इसप्रकार ' अग्निर्वा अकामयत ० ' ( यजमानने कामनाको कि मैं देवोंके मध्यमें अन्न भक्षक अग्निरूप होऊं। उसने कृत्तिका नक्षत्रोंके अभिमानी अग्निके लिए आठ कपालोंमें बनाया गया पुरोडाश ( हविष्य ) अर्पण किया ) यह श्रुति नक्षत्रेष्टि विधिमें जिस यजमानरूप अग्निने जिस अग्निके लिए हविष्य अर्पण किया उन दोनोंके नामरूपकी समानताको दिखलाती है और यहाँ इस प्रकारकी श्रुतियोंको उदाहरणरूपसे समझना चाहिए।

' ऋषीणां ० ' ( पूर्वकल्पमें जो - जो ऋषियोंके नाम थे और जो जो वेद बिषयक दृष्टि थी प्रलयके अन्तमें पुनः उनके उत्पन्न होनेपर ब्रह्माने उन्हीं नामों और शक्तियों को उन ऋषियोंको दिया। जैसे वसन्त आदि भिन्न - भिन्न ऋतुओं में भिन्न - भिन्न उनके नवपल्लवादि चिह्न होते हैं और वे उन ऋतुओंके आनेपर फिर दिखाई देते हैं, वैसे ही सृष्टिके आदिमें पदार्थं दिखाई देते हैं। चक्षु आदि इन्द्रियोंके अभिमानीजो अतीत कल्प में देवता थे उनके समान इसी कल्पमें भी वही सूर्य आदि देवता हैं।

और अतीत देवताओंके नामरूपके समान ही उनके नामरूप भी हैं ) इसप्रकारकी स्मृति भी नामरूपकी समानतामें प्रमाणरूपसे समझनी चाहिए॥ ३०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि महाप्रलयमें अन्तःकरणादि स्थूलरूपसं विद्यमान नहीं होते, तो भी सूक्ष्म वासनारूपसे अविद्या में तो विद्यमान रहते ही हैं, अतः पूर्व वासनाके बलसे ईश्वरेच्छासे सम्पूर्ण जगत् पूर्वं कल्पके सदृश नाम रूपात्मक ही उत्पन्न होता है, अतएव शब्दादिमें अनित्यत्व सम्भव नहीं। अभिव्यक्त पदार्थ पूर्वकल्प के समान नामरूपात्मक होते हैं। इसलिए किसी पुरुषके संकेतकी अपेक्षा नहीं। यद्यपि विषमसृष्टिमें संकेतकी आवश्यकता होती है, तो भी समान सृष्टिमें उसकी कोई अपेक्षा नहीं। महासर्ग तथा महाप्रलय स्वीकार करनेपर भी संसार प्रवाहरूपसे अनादि ही स्वीकार्य है। जैसे जाग्रत् के संस्कार सुषुप्ति के अनन्तर स्मरणको उत्पन्न करते हैं, वैसे पूर्व कल्पके संस्कार महाप्रलय के अनन्तर भी स्मरणको उत्पन्न करते हैं। तदनुसार सृष्टिका आरम्भ होता है। इसमें कोई विरोध नहीं है।

* पूर्वं कल्पमें उत्तमज्ञान और उत्तम कर्मों के अनुष्ठानके आधार पर जिस - जिस पर परमेश्वर का अनुग्रह होता है उस उसको उतना उतना अधिक ज्ञान और ऐश्वर्य आदि प्राप्त होते हैं इसमें किसी प्रकार के सन्देहका अवकाश नहीं है। इसमें उद्धृत श्रुति स्मृति भी प्रमाण हैं। सृष्टिके आदिमें हिरण्यगर्भ में पूर्वं कल्प के समस्त संस्कार जाग्रत् होते हैं जिससे वह उत्तर कल्पकी सृष्टि करनेमें समर्थ होता है।

+ ऋक् संहिता शाकल और शष्कल भेदसे दो प्रकार की है। उसमें दस मण्डल हैं। इसलिए उसको दशतय्य कहते हैं। इसमें पठित ऋचाओं को दाशतय्य कहा जाता है। ऋक् संहिताका दूसरा नाम अष्टक भी है, क्योंकि इसमें मण्डल दस हैं और अष्टक आठ हैं।

* यहाँ विलयका अर्थ नाश नहीं है, किन्तु कारणरूपसे विद्यमानता और कार्यरूपसे लीन होना है, इसलिए संस्कारके बलसे ही पुरुषको पुण्य पाप रुचिकर होते हैं। यदि संस्कारका मी नाश मानें तो जगत्में सुख दुःख आदिको जो विचित्रता प्रतीत होती है वह विना कारणके ही होगी। इससे कृतहान - अकृतभ्यागम दोष भी प्रसक्त होगा।

* ब्रह्माकी सुषुप्ति अवस्थाको अवान्तर प्रलय कहते हैं। ब्रह्माकी पूर्ण आयुकी समाप्ति होनेको महाप्रलय कहा जाता है। महाप्रलय के अनन्तर जो नवीन सृष्टि उत्पन्न होती है वह महासर्ग है। इसप्रकार जगत् की वारम्वार आवृत्ति होनेपर भी वेद निष्ठ स्वतः प्रमाण्यका विरोध नहीं है।

* इस पूर्वोक्त रीतिसे पूर्वसृष्टिके समान यह नवीनसृष्टि भी उत्पन्न होती है। इससे सिद्ध हुआ कि जन्म और मरणवाले शरीरके अङ्गीकार करनेपर भी देधादिका कर्म और शब्दमें विरोध नहीं है अर्थात् नित्य वेदसे अनित्य देवादि व्यक्तियों की उत्पत्ति माननेपर भी वेदमें नित्यत्वका विरोध नहीं है || ३० ||

1.3.31 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३१

सूत्र १.३.३१

मध्वादिष्व् असंभवाद् अनधिकारं जैमिनिः ॥ १.३.३१ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 293

पदच्छेद — मध्वादिषु , असंभवात् , अनधिकारम् , जैमिनिः

सूत्रार्थ — ( मध्वादिषु ) ' असो वा आदित्यो देवमधु ' इत्यादि मनुष्याधिकारक मध्वादि उपासनाओंमें ( असंभवात् ) देवादिके अधिकारका असंभव होनेसे ( अनधिकारम् ) ब्रह्मविद्या में भी देवादिका अधिकार नहीं है, ( जैमिनिः ) ऐसा जैमिनि आचार्य मानते हैं।

शाङ्करभाष्य

इह देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामस्त्यधिकार इति यत्प्रतिज्ञातं तत्पर्यावर्त्यते देवादीनामनधिकारं जैमिनिराचार्यो मन्यते कस्मात् मध्वादिष्वसंभवात्। ब्रह्मविद्यायामधिकाराभ्युपगमे हि विद्यात्वाविशेषात् मध्वादिविद्यास्वप्यधिकारोऽभ्युपगम्येत न चैवं संभवति कथम् असौ वा आदित्यो देवमधु इत्यत्र मनुष्या आदित्यं मध्वध्यासेनोपासीरन् देवादिषु ह्युपासकेष्वभ्युपगम्यमानेष्वादित्यः कथमन्यमादित्यमुपासीत पुनश्चादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्यमृतान्यनुक्रम्य वसवो रुद्रा आदित्या मरुतः साध्याश्च पञ्च देवगणाः क्रमेण तत्तदमृतमुपजीवन्तीत्युपदिश्य स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति इत्यादिना वस्वाद्युपजीव्यान्यमृतानि विजानतां वस्वादिमहिमप्राप्तिं दर्शयति वस्वादयस्तु कान् अन्यान् वस्वादीनमृतोपजीविनो विजानीयुः कं वान्यं वस्वादिमहिमानं प्रेप्सेयुः तथा अग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पादः वायुर्वा संवर्गः आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः इत्यादिषु देवतात्मोपासनेषु न तेषामेव देवतात्मनामधिकारः संभवति तथा इमामेव गौतमभरद्वाजावयं वै गौतमोऽयं भरद्वाजः इत्यादिष्वपि ऋषिसंबन्धेषूपासनेषु न तेषामेव ऋषीणामधिकारः संभवति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह जो प्रतिज्ञा की गई है कि यहाँ ब्रह्मविद्यामें देवादिका भी अधिकार है, उस पर आक्षेप करते हैं। जैमिनि आचार्यका मत है कि देव आदिका ब्रह्मविद्यां में अधिकार नहीं है, किससे? इससे कि मधु आदिमें उनके अधिकारका संभव नहीं है। ब्रह्मविद्यामें उनका अधिकार स्वीकार करनेपर विद्यात्व दोनों में समान होनेके कारण मधु आदि विद्याओं में भी उनका अधिकार मानना पड़ेगा। परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है, क्योंकि ' असौ वा आदित्यो ० ' ( निश्चय यह आदित्य देवोंका मधु है ) इसमें मधुके अध्याससे आदित्यको मनुष्य उपासना करें। परन्तु देव आदिको उपासकरूपसे स्वीकार किये जानेपर आदित्य किस अन्य आदित्यकी उपासना करे? और आदित्यके आश्रित रोहित आदि पाँच किरण सम्बन्धी उपासनाओं में उन्हीं ऋषियोंका अधिकार सम्भव नहीं है॥ ३१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सूर्यको मधुका रूपक बतलाते हैं - चारों वेदों में प्रतिपादित चार प्रकारके कर्म और प्रणव ये पाँच पुष्प हैं। इन पुष्पोंसे होममन्त्ररूप मधुमक्खियाँ हवन किये गये सोम, घृत आदि पदार्थं रूप लोहित, शुक्ल, कृष्ण, अतिकृष्ण, गोप्य नामके ये पाँच अमृतोंको होममन्त्रों द्वारा पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊर्ध्वं इन पाँचों दिशाओं में स्थित मधु मक्खियोंके छत्तेके छिद्ररूप सूर्यकी रश्मियोंद्वारा सूर्यमण्डलमें ले जाती हैं ; और वहाँ वे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्यं और अन्नरूपमें परिणत होकर पाँच दिशाओं में स्थित वसु आदि देवताओंसे उपजीव्य होते हैं। इस प्रकार सूर्यकी मधुरूपसे उपासना करनी चाहिए | इस प्रकार ध्यान करनेवाले मनुष्यके लिए वसु आदिकी प्राप्ति कहीं गई है।

* इस आकाशरूप ब्रह्मके अग्नि आदि चार पाद हैं। इसलिए वायु आदि उपासक नहीं हो सकते, क्योंकि ब्रह्मके पादरूपसे इनकी उपासनाका विधान किया गया है। दो श्रोत्र, दो नेन्न, दो नासिका, . एक वाणि रूप सात इन्द्रियोंमें सप्त ऋषियोंका ध्यान करे। यह दक्षिण श्रोत्र गोतम है और वाम श्रोत्र भरद्वाज है, दक्षिण नेत्र विश्वामित्र है, दक्षिण नासिका वसिष्ठ है, वाम नेत्र जमदग्नि है और वाम नासिका कश्यप है, वाणी अत्रि है, इस प्रकार अध्यात्मोपासनाओंमें ऋषियोंको ध्येय कहा गया है अर्थात् तत् तत् स्थानमें तत् तत् ऋषिकी उपासना करनेका विधान है। अतः इन उपास्य देवता और ऋषियोंका उक्त उपासनाओं में अधिकार नहीं है॥ ३१

1.3.32 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३२

सूत्र १.३.३२

ज्योतिषि भावाच् च ॥ १.३.३२ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 294

पदच्छेद — ज्योतिषि , भावात् " च

सूत्रार्थ — ( ज्योतिषि ) दृश्यमान ज्योतिमण्डलमें ( भावाच्च ) आदित्य शब्दका प्रयोग और आदित्य प्रत्यय होता है। वे मण्डल अचेतन हैं | उनसे भिन्न शरीरादि युक्त चेतन प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे अज्ञात है, इसलिए शरीर रहित होनेके कारण देवतादि ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं।

अमृत हैं ऐसा उपक्रम कर वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्य ये पाँच देवगण क्रमसे उस उस अमृतका उपभोग करते हैं ऐसा उपदेश कर ' स य एतदेवममृतं ० ' ( वह जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है अर्थात् उपासना करता है वह वसुओं में से ही कोई एक होकर अग्निरूप मुखसे इसी अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुति वसु आदिके उपजीव्य अमृतोंको जाननेवालेके लिए वसु आदिकी महिमाकी प्राप्ति दिखलाती है। यदि वसु आदिको उपासक मानें तो वसु आदि अमृतोपजीवी किन अन्य वसु आदिको जानेंगे?

अथवा किन अन्य वसु आदिकी महिमाको प्राप्त करना चाहेंगे? तथा ' अग्निः पादो ० ' ( अग्नि पाद है, वायु पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद है ) ' वायुर्वा संवर्ग : ० ' ( निश्चय वायु संवर्ग है ) ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ० ' ( आदित्य ब्रह्म है, ऐसा आदेश है ) इत्यादि देवतात्मक उपासनाओंमें उन्हीं देवताओंका अधिकार सम्भव नहीं है। इसी प्रकार ' इमावेव ' ( ये दोनों [ श्रोत्र ] ही गौतम और भरद्वाज हैं। यही गौतम है और यह दूसरा भरद्वाज है ) इत्वादि ऋषि

शाङ्करभाष्य

यदिदं ज्योतिर्मण्डलं द्युस्थानमहोरात्राभ्यां बम्भ्रमज्जगदवभासयति तस्मिन्नादित्यादयो देवतावचनाः शब्दाः प्रयुज्यन्ते लोकप्रसिद्धेर्वाक्यशेषप्रसिद्धेश्च। न च ज्योतिर्मण्डलस्य हृदयादिना विग्रहेण चेतनतया अर्थित्वादिना वा योगोऽवगन्तुं शक्यते मृदादिवदचेतनत्वावगमात्। एतेनाग्न्यादयो व्याख्याताः।। स्यादेतत् मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमादयमदोष इति चेत् नेत्युच्यते न तावल्लोको नाम किंचित्स्वतन्त्रं प्रमाणमस्ति प्रत्यक्षादिभ्य एव अव्यभिचरितविषयेभ्यः प्रमाणेभ्यः प्रसिद्ध एवार्थो लोकात्प्रसिद्ध इत्युच्यते न चात्र प्रत्यक्षादीनामन्यतमं प्रमाणमस्ति इतिहासपुराणानामपि पौरुषेयत्वात्प्रमाणान्तरमूलतामाकाङ्क्षति अर्थवादा अपि विधिनैकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थाः सन्तो न पार्थगर्थ्येन देवादीनां विग्रहादिसद्भावे कारणभावं प्रतिपद्यन्ते मन्त्रा अपि श्रुत्यादिविनियुक्ताः प्रयोगसमवायिनोऽभिधानार्था न कस्यचिदर्थस्य प्रमाणमित्याचक्षते तस्मादभावो देवादीनामधिकारस्य।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और किस हेतुसे देवतादिका अनधिकार है?

द्युलोक में स्थित यह जो ज्योतिर्मण्डल दिन रात पुनः पुनः भ्रमण करता हुआ जगत्को ' प्रकाशित करता है उसमें आदित्य आदि देवतावाचक शब्द प्रयुक्त होते हैं, क्योंकि यह लोक प्रसिद्धि और वाक्यशेष प्रसिद्धि है। ज्योतिर्मण्डलका हृदयादि शरीर के साथ अथवा चेतनता और अर्थित्वादिके साथ सम्बन्ध नहीं जाना जा सकता, क्योंकि मृद् आदिके समान वे अचेतन ज्ञात होते हैं। इसी प्रकार अग्नि आदि भी समझ लेने चाहिए।

ऐसा ही हो, परन्तु यदि ऐसा कहो कि मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण और लोक व्यवहारसे भी यह प्रतीत होता है कि देवादिमें विग्रहवत्त्वादिका ज्ञान होनेसे यह अनधिकाररूप दोष नहीं है, तो इस पर कहते हैं - यह युक्त नहीं है, क्योंकि लोक कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है। जिसके विशेष विषयमें विचार नहीं किया गया है ऐसे प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे प्रसिद्ध हुआ अर्थ ही लोकसे प्रसिद्ध होता है ऐसा कहा जाता है। देवताका शरीर होता है इस विषय में प्रत्यक्ष आदिमें से कोई भी प्रमाण नहीं है।

इतिहास, पुराण भी पुरुष प्रणीत होनेसे मूलभूत अन्य प्रमाणकी अपेक्षा रखते हैं | अर्थवाद वाक्य भी विधिके साथ एक वाक्यता [ एकार्थं प्रतिपादकता ] के कारण स्तुति अर्थक होकर विधिवाक्यके अर्थसे भिन्न स्वतन्त्ररूपसे देवतादिके शरीरके सद्भावमें कारणत्वको प्राप्त नहीं हो सकते। श्रुति आदि द्वारा विगियोगको प्राप्त हुए वे मन्त्र भी प्रयोगके साथ सम्बन्ध रखनेवाले अर्थका अभिधान करते हैं, स्वतन्त्ररूपसे किसी अर्थ में प्रमाण नहीं हैं, ऐसा मीमांसक कहते हैं।

इसलिए शरीर आदिके अभाव होनेसे ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है॥ ३२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * मोमांसक लोग देवताको मन्त्रात्मक मानते। इसलिए शरीर न होने से देवतादिका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है। ' आदित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता ' [ छा ० ३ | ४ | ६ ] ( आदित्य पूर्व दिशामें उदय होता है और पश्चिममें अस्त होता है ) इस मधुविद्या वाक्यशेषमें आदित्य शब्दका प्रयोग जड़ ज्योतिर्मण्डलमें प्रसिद्ध है। अतः शरीर रहित होनेसे शब्दात्मक देवताका विद्यामें अधिकार नहीं।

* ‘ वज्रहस्तः पुरन्दरः ' ( हाथमें वज्र लिया हुआ इन्द्र ) इत्यादि मन्त्र हैं। ' सोऽरोदीत ' ( वह अग्नि रोया ) इत्यादि अर्थवाद हैं। ' इष्टान् भोगान् हि वो देवाः दास्यन्ते यज्ञभाविताः। ते तृप्तास्तर्पयन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः॥ ' ( यज्ञसे प्रसन्न हुए देवता तुम्हें इष्ट भोग देंगे। तृप्त हुए देवता सब कामनाओंके शुभ फलोंते इसको तृप्त करेंगे ) इत्यादि इतिहास और पुराण वाक्य हैं। इससे देवताओंका शरीर सिद्ध होता है। परन्तु इन मन्त्र अर्थवाद आदिका स्वतन्त्र अर्थ नहीं है, क्योंकि यह सब अर्थवाद आदि वाक्य विधिवाक्योंके अङ्ग होकर प्रशंसा • आदि परक हैं, अतः शरीर न होनेसे देवतादिका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है।। ३२

1.3.33 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३३

सूत्र १.३.३३

भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ १.३.३३ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 296

पदच्छेद — भावम् , तु , बादरायणः , अस्ति , हि

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पूर्वं पक्षको व्यावृत्तिके लिए है, ( बादरायणः ) बादरायण आचार्यका मत है कि ( भावम् ) शरीरधारी होनेसे देवादिका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है, ( हि ) यतः - क्योंकि ( अस्ति ) उनमें अथित्व आदि अधिकारका कारण है।

शाङ्करभाष्य

तुशब्दः पूर्वपक्षं व्यावर्तयति। बादरायणस्त्वाचार्यो भावमधिकारस्य देवादीनामपि मन्यते। यद्यपि मध्वादिविद्यासु देवतादिव्यामिश्रास्वसंभवोऽधिकारस्य तथाप्यस्ति हि शुद्धायां ब्रह्मविद्यायां संभवः अर्थित्वसामर्थ्याप्रतिषेधाद्यपेक्षत्वादधिकारस्य। न च क्वचिदसंभव इत्येतावता यत्र संभवस्तत्राप्यधिकारोऽपोद्येत। मनुष्याणामपि न सर्वेषां ब्राह्मणादीनां सर्वेषु राजसूयादिष्वधिकारः संभवति। तत्र यो न्यायः सोऽत्रापि भविष्यति।

ब्रह्मविद्यां च प्रकृत्य भवति लिङ्गदर्शनं श्रौतं देवाद्यधिकारस्य सूचकम् तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम् इति ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् इति इन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणाम् इत्यादि च। स्मार्तमपि च गन्धर्वयाज्ञवल्क्यसंवादादि।।

यदप्युक्तम् ज्योतिषि भावाच्च इति अत्र ब्रूमः ज्योतिरादिविषया अपि आदित्यादयो देवतावचनाः शब्दाश्चेतनावन्तमैश्वर्याद्युपेतं तं तं देवतात्मानं समर्पयन्ति मन्त्रार्थवादादिषु तथा व्यवहारात्। अस्ति ह्यैश्वर्ययोगाद्देवतानां ज्योतिराद्यात्मभिश्चावस्थातुं यथेष्टं च तं तं विग्रहं ग्रहीतुं सामर्थ्यम्। तथा हि श्रूयते सुब्रह्मण्यार्थवादे मेधातिथेर्मेष इति मेधातिथिं ह काण्वायनमिन्द्रो मेषो भूत्वा जहार इति। स्मर्यते च आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम ह इति।

मृदादिष्वपि चेतना अधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्ते मृदब्रवीत् आपोऽब्रुवन् इत्यादिदर्शनात्। ज्योदिरादेस्तु भूतधातोरादित्यादिष्वप्यचेतनत्वमभ्युपगम्यते। चेतनास्त्वधिष्ठातारो देवतात्मानो मन्त्रार्थवादादिषु व्यवहारादित्युक्तम्।। यदप्युक्तम् मन्त्रार्थवादयोरन्यार्थत्वान्न देवताविग्रहादिप्रकाशनसामर्थ्यमिति अत्र ब्रूमः प्रत्ययाप्रत्ययौ हि सद्भावासद्भावयोः कारणम् नान्यार्थत्वमनन्यार्थत्वं वा तथा ह्यन्यार्थमपि प्रस्थितः पथि पतितं तृणपर्णाद्यस्तीत्येव प्रतिपद्यते।

अत्राह विषम उपन्यासः तत्र हि तृणपर्णादिविषयं प्रत्यक्षं प्रवृत्तमस्ति येन तदस्तित्वं प्रतिपद्यते अत्र पुनर्विध्युद्देशैकवाक्यभावेन स्तुत्यर्थेऽर्थवादे न पार्थगर्थ्येन वृत्तान्तविषया प्रवृत्तिः शक्याध्यवसातुम् न हि महावाक्येऽर्थप्रत्यायकेऽवान्तरवाक्यस्य पृथक्प्रत्यायकत्वमस्ति यथा न सुरां पिबेत् इति नञ्वति वाक्ये पदत्रयसंबन्धात्सुरापानप्रतिषेध एवैकोऽर्थोऽवगम्यते न पुनः सुरां पिबेदिति पदद्वयसंबन्धात्सुरापानविधिरपीति।

अत्रोच्यते विषम उपन्यासः युक्तं यत्सुरापानप्रतिषेधे पदान्वयस्यैकत्वादवान्तरवाक्यार्थस्याग्रहणम् विध्युद्देशार्थवादयोस्त्वर्थवादस्थानि पदानि पृथगन्वयं वृत्तान्तविषयं प्रतिपद्य अनन्तरं कैमर्थ्यवशेन कामं विधेः स्तावकत्वं प्रतिपद्यन्ते यथा हि वायव्य््वेतमालभेत भूतकामः इत्यत्र विध्युद्देशवर्तिनां वायव्यादिपदानां विधिना संबन्धः नैवम् वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेन भागधेयेनोपधावति स एवैनं भूतिं गमयति इत्येषामर्थवादगतानां पदानाम् न हि भवति वायुर्वा आलभेत इति क्षेपिष्ठा देवता वा आलभेत इत्यादि।

वायुस्वभावसंकीर्तनेन तु अवान्तरमन्वयं प्रतिपद्य एवं विशिष्टदैवत्यमिदं कर्मेति विधिं स्तुवन्ति। तद्यत्र योऽवान्तरवाक्यार्थः प्रमाणान्तरगोचरो भवति तत्र तदनुवादेनार्थवादः प्रवर्तते यत्र प्रमाणान्तरविरुद्धः तत्र गुणवादेन यत्र तु तदुभयं नास्ति तत्र किं प्रमाणान्तराभावाद्गुणवादः स्यात् आहोस्त्वित्प्रमाणान्तराविरोधाद्विद्यमानार्थवाद इति प्रतीतिशरणैर्विद्यमानार्थवाद आश्रयणीयः न गुणानुवादः एतेन मन्त्रो व्याख्यातः।

अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि हवींषि चोदयद्भिरपेक्षितमिन्द्रादीनां स्वरूपम् न हि स्वरूपरहिता इन्द्रादयश्चेतस्यारोपयितुं शक्यन्ते न च चेतस्यनारूढायै तस्यै तस्यै देवतायै हविः प्रदातुं शक्यते श्रावयति च यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां ध्यायेद्वषट् करिष्यन् इति न च शब्दमात्रमर्थस्वरूपं संभवति शब्दार्थयोर्भेदात् तत्र यादृशं मन्त्रार्थवादयोरिन्द्रादीनां स्वरूपमवगतं न तत्तादृशं शब्दप्रमाणकेन प्रत्याख्यातुं युक्तम्।

इतिहासपुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण संभवन्मन्त्रार्थवादमूलकत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि साधयितुम् प्रत्यक्षादिमूलमपि संभवति भवति ह्यस्माकमप्रत्यक्षमपि चिरंतनानां प्रत्यक्षम् तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति स्मर्यते यस्तु ब्रूयात् इदानींतनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवादिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्यमिति स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधेत् इदानीमिव च नान्यदापि सार्वभौमः क्षत्रियोऽस्तीति ब्रूयात् ततश्च राजसूयादिचोदना उपरुन्ध्यात् इदानीमिव च कालान्तरेऽप्यव्यवस्थितप्रायान्वर्णाश्रमधर्मान्प्रतिजानीत ततश्च व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं कुर्यात् तस्माद्धर्मोत्कर्षवशाच्चिरंतना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्नुरिति श्लिष्यते।

अपि च स्मरन्ति स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः इत्यादि योगोऽप्यणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिफलकः स्मर्यमाणो न शक्यते साहसमात्रेण प्रत्याख्यातुम् श्रुतिश्च योगमाहात्म्यं प्रख्यापयति पृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते। न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् इति। ऋषीणामपि मन्त्रब्राह्मणदर्शिनां सामर्थ्यं नास्मदीयेन सामर्थ्येनोपमातुं युक्तम्। तस्मात्समूलमितिहासपुराणम्। लोकप्रसिद्धिरपि न सति संभवे निरालम्बनाध्यवसातुं युक्ता।

तस्मादुपपन्नो मन्त्रादिभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमः। ततश्चार्थित्वादिसंभवादुपपन्नो देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामधिकारः। क्रममुक्तिदर्शनान्यप्येवमेवोपपद्यन्ते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रस्य ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है। बादरायणाचार्य तो ऐसा मानते हैं कि देवता आदिका भी ब्रह्मविद्या में अधिकार है। यद्यपि देवता आदिसे सम्बन्धित मध्वादि विद्याओंमें उनके अधिकारका असम्भव हैं, तो भी शुद्ध ब्रह्मविद्या में अथित्व, सामर्थ्य, अप्रतिषेध आदिकी अपेक्षासे अधिकारका सम्भव है। यदि कहीं ( मध्वादि विद्या में ) अधिकारका असंभव है तो इतने मात्र से जहाँ ( ब्रह्मविद्या ) सम्भव है वहाँ भी अधिकारका निषेध नहीं हो सकता।

मनुष्यों में भी सब ब्राह्मण आदिका सम्पूर्ण राजसूय आदिमें अधिकार सम्भव नहीं है, वहाँ जो न्याय है वह यहाँ भी लागू होगा। ब्रह्मविद्याको प्रस्तुतकर देवता आदिके अधिकारका सूचक ' तद्यो यो ० ' ( उसे देवोंमेंसे जिस जिसने ( आत्मरूप से ) जाना वही तद्रूप हो गया।

इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमेंसे मी जिस जिसने जाना वह तद्रूप ब्रह्मरूप हो गया ) और ' ते होचुर्हन्त ० ' ( वे कहने लगे- हम उस आत्मा को जानना चाहते हैं जिसके जानने पर जीव सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है, ऐसा निश्चय कर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंका राजा विरोचन ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथमें समिधाएँ लेकर प्रजापतिके पास आये ) इत्यादि श्रौत लिङ्गदर्शन भी है।

तथा गन्धर्व और याज्ञवल्क्यका संवाद आदि स्मृति लिङ्ग भी है | किश्च ' ज्योतिषि भावाच्च ' इस सूत्र में जो कहा गया है, अब उसपर हम कहते हैं— ज्योतिर्मण्डल आदि विषयक होनेपर भी देवता वाचक आदित्य आदि शब्द चेतनावाले ऐश्वर्य आदि युक्तं उस उस देवताका बोध कराते हैं, क्योंकि मन्त्र, अर्थवाद आदि में ऐसा व्यवहार है। ऐश्वयंके योग से देवताओं का ज्योति आदिरूपसे अवस्थान हो सकता है और यथेष्ट उस - उस विग्रहके धारण करनेकी भी उनमें सामर्थ्यं है।

उसी प्रकार सुब्रह्मण्यार्थवाद में ' मेधातिथि ० ' ( इन्द्रने भेड़ बनकर कण्वके पुत्र मेधातिथिका अपहरण किया ) इस श्रुतिमें इन्द्रके प्रति ' मेधातिथिका मेष ' ऐसा सम्बोधन है। ' आदित्य ० ' ( आदित्य पुरुष बनकर कुन्तिके पास गया ) ऐसा स्मृति भी है। मृत्तिका आदिमें भी चेतन अधिष्ठाता स्वीकार किए गए हैं, क्योंकि ' मृदब्रवीत् ० ' ( मृत्तिका बोली, जल बोला ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं | आदित्य आदिमें ज्योतिर्मण्डल आदि भौतिक वस्तुका अचेतन स्वीकार किया जाता है।

मन्त्र अर्थवाद आदिके व्यवहारसे - ज्योतिर्नण्डलादिके अधिष्ठाता देवता चेतन हैं ऐसा कहा गया है। जो यह कहा गया है कि मन्त्र और अर्थवादमें अन्यार्थकत्व होनेसे देवताके विग्रह प्रकाशनकी सामर्थ्य नहीं है। उसपर हम कहते हैं - वस्तुके सद्भाव और असद्भावमें उसका प्रत्यय एवं अत्यय ही कारण है, अन्यार्थकत्व अथवा अनन्यार्थकत्व कारण नहीं है। जैसे कि किसी अन्य प्रयोजनके लिए प्रस्थान किया हुआ पुरुष मार्ग में पड़े तृण पत्ते आदिके अस्तित्वको प्रतिपन्न होता है। इसपर कहते हैं — यह दृष्टान्त विषम है।

वहाँ तो तृण पर्णादि विषयक प्रत्यक्ष प्रवृत्त है, जिससे उनके अस्तित्वको प्रतिपन्न होता है। परन्तु यहाँ तो विधि वाक्यके साथ एकवाक्यता प्राप्त करनेसे स्तुति अर्थक अर्थंवादमें स्वतन्त्ररूपसे भूतार्थं विषयक प्रवृत्तिका निश्चय नहीं किया जा सकता। व्यर्थ बोधक महावाक्यों में अवान्तर वाक्यको पृथक् अर्थबोधकत्व नहीं है।

जैसे ' न सुरां पिबेत् ' ( सुरा न पिए ) इस नकार वाले वाक्य में तीन पदोंके सम्बन्धसे सुरापानका प्रतिषेधरूप एक ही अर्थ अवगत होता है, न कि ' सुरां पिबेत् ' इन दो पदोंके सम्बन्धसे पुनः सुरापान विधि मी। इस विषय में कहते हैं - हटा विषम है। सुरापानके प्रतिषेधमें पदान्वय एक होनेके कारण [ सुरां पिबेत् ] इस अवान्तर वाक्यार्थका ग्रहण करना युक्त नहीं है।

परन्तु विधिवाक्य और अर्थवादमेंसे अर्थवादस्थ पद भूतार्थं विषयक पृथक् अन्वित होकर अनन्तर कैमर्थ्य से [ इस अर्थवादका क्या प्रयोजन है, किसलिए है? ] यथेष्ट विधिवाक्यके स्तावक होते हैं। जैसे ' वायव्यं श्वेतमा ० ' ( ऐश्वर्यं चाहनेवाला वायव्य श्वेत पशुका आलभन करे ) इसमें विधिवाक्यगत वायु आदि पदों का विधिके साथ सम्बन्ध है, वैसे ' वायुवै क्षेपिष्ठा देवता ० ' ( निश्चित वायु शीघ्रगामी देवता है। जो यजमान हविको वायुके लिए देता है।

अर्थात् वायु के लिए हविका भाग करता है वह उसको ऐश्वर्य देता है ) इन अर्थवाद वाक्यगत पदोंका विधिके साथ सम्बन्ध नहीं है। ' वायुर्वा आलभेत ' अथवा ' क्षेपिष्ठा देवता वा आलभेत ' इत्यादि वाक्योंका विधिके साथ सम्बन्ध नहीं होता। किन्तु वायु स्वभावके कथनद्वारा अवान्तर अन्वय प्राप्तकर इसप्रकार विशिष्ट देवता सम्बन्धी यह कर्म है, इसप्रकार विधिको स्तुति करते हैं। यहाँ जो अवान्तर वाक्यार्थं प्रमाणान्तरका विषय होता है, वहाँ उसके अनुवाद से अर्थवाद प्रवृत्त होता है।

जहाँ प्रमाणान्तरसे विरोध है वहाँ गुणवादसे। जहाँ ये दोनों नहीं हैं वहाँ प्रमाणान्तरके अभावसे गुणवाद हो अथवा प्रमाणान्तर के अविरोधसे विद्यमान अर्थवाद हो ऐसा सन्देह उपस्थित होनेपर प्रतीतिशरण पुरुषोंसे विद्यमान अर्थवाद ] भूतार्थवाद ] आश्रयणीय है, गुणवाद नहीं। इसप्रकार मन्त्रों में भी समझना चाहिए अर्थात् मन्त्र भी प्रमाणान्तरके संवाद और विसंवादके अमावसे स्वार्थमें प्रमाणभूत हैं।

और इन्द्रादि देवता सम्बन्धी विष्य देनेकी प्रेरणा करनेवाली विधियां मी इन्द्रादिके स्वरूपकी अपेक्षा रखती हैं। वस्तुतः स्वरूप रहित इन्द्रादि देवताओंका चित्तमें आरोप- ध्यान नहीं किया जा सकता। चित्तमें अनारूढ उस उस देवताके लिए हविष्य देनेके लिए समर्थ नहीं हो सकता। ' यस्यै देवतायै ० ' ( जिस देवताके लिए हविका ग्रहण किया हुआ हो उस देवताका ' वषट् ' इस शब्दका उच्चारण कर पहले ध्यान करे ) ऐसा श्रुति कहती है। और केवल शब्द अर्थस्वरूप नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द और अर्थ में भेद है।

उन मन्त्र और अर्थवाद में इन्द्रादिका जैसा स्वरूप अवगत होता है बैसा स्वरूप शब्दप्रमाणकों द्वारा प्रत्याख्यान करना युक्त नहीं है। इतिहास और पुराण भी मन्त्र और अर्थवाद मूलक होने के कारण प्रमाण होकर उक्त रीतिसे देवतादिके विग्रह आदि सिद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। और देवताके शरीर आदिमें प्रत्यक्ष आदि मूलत्व भी संभव है। हम लोगों को अप्रत्यक्ष मी चिरन्तनों - प्राचीनोंको प्रत्यक्ष है 1

। जैसे व्यास आदि देवताओंके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते हैं, ऐसी स्मृति है। जो ऐसा कहे कि आजकलके समान प्राचीन लोगोंकी मी देवादिके साथ व्यवहार करनेकी सामर्थ्यं नहीं थी, वह जगत् की विचित्रताका प्रतिषेध करता है और इदानींके समान अन्य समयमें मी सार्वभौम क्षत्रिय नहीं थे ऐसा कहे, तो राजसूय आदि विधियाँ बाधित हो जायँगी।

किश्व आजकलके समान अन्य समयमें भी वर्णाश्रम धर्म अव्यवस्थितप्राय थे ऐसी प्रतिज्ञा करे तो ऐसी स्थिति में व्यवस्था विधायक शास्त्र अनर्थक हो जायगा, इससे सिद्ध होता है कि धर्मके उत्कर्षके कारण प्राचीन लोग देवादिके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे यह युक्त है। ' स्वाध्यायादिष्ट ० ' ( स्वाध्यायसे - मन्त्र जपसे इष्ट देवताका सान्निध्य और उसके साथ संभाषण होता है ) इत्यादि स्मृति भी है। अणिमा आदि ऐश्वर्यं प्राप्ति फलवाले और स्मृति सिद्ध योगका भो साहसमात्र से निषेध नहीं किया जा सकता।

' पृथ्व्यप्तेजो ० ' ( पृथिवी, अल, तेज, वायु, आकाश इन पांच भूतोंके अपने वश में होनेसे और अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति होनेसे अभिव्यक तेजोमय देहको प्राप्त हुए योगीको रोग, जरा और मृत्यु नहीं होती ) इत्यादि श्रुति भी योगकी महिमाका वर्णन करती है। मन्त्र तथा ब्राह्मणरूप वेदके द्रष्टा ऋषियोंकी सामर्थ्यंकी अपनी सामर्थ्यंसे तुलना करना युक्त नहीं है। इससे इतिहास, पुराण समूलप्रमाणभूत हैं। लोक प्रसिद्धि भी श्रुति, स्मृति आदि आलम्बनके होनेपर निराधार निश्चित करना युक्त नहीं है।

इस - लिए मन्त्रादिसे देवादिमें विग्रहवत्त्व आदि प्रतीति युक्त है। उनमें अथित्व आदिके सम्भव होने के कारण देवता आदिका भी ब्रह्मविद्या में अधिकार उपपन्न है। इसप्रकार क्रममुक्ति प्रतिपादक शास्त्र भी उपपन्न होते हैं || ३३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — पूर्वपक्षीने जो यह कहा है कि ' ब्रह्मविद्या, देवादीन् नाधिकरोति, विद्यात्वात्, मध्वादिविद्यावत् ' " ब्रह्मविद्या देवादिको अधिकृत नहीं करतो, विद्या होनेसे मध्वादि विद्याके समान " यह हेतु अप्रयोजक है अर्थात् यह कोई अव्यभिचरित नियम नहीं है कि जिसका कहीं पर अधिकारका असम्भव हो तो सर्वत्र उसका असंभव हो, जैसे कि राजसूय आदि यागोंमें सब ब्राह्मण आदिका अधिकार नहीं है।

' दर्शादिकं न ब्राह्मणमधिकरोति कर्मत्वात् राजसूयादिवत् ' ( दर्शादि कर्म ब्राह्मणको अधिकृत नहीं करते, कर्म होने से, राजसूय आदि कर्मके समान ) जैसे राजसूय आदि कर्म में ब्राह्मणका अधिकार नहीं है, वैसे दर्श आदि कर्ममें भी ब्राह्मणका अधिकार नहीं है, क्योंकि यह भी कर्म है। यहाँ मी अप्रयोजक हेतु है अर्थात् साध्यको सिद्ध करनेमें असमर्थ है।

' राजा राजसूयेन यजेत ' ' ब्राह्मणो बृहस्पतिसवेन यजेत ' ( राजा राजसूय नामक यागसे इष्टकी भावनाकरे, ब्राह्मण बृहस्पतिसव नामक यज्ञसे इष्टकी भावना करे ) यहाँ दोनों यागों में कर्मत्व समान होने पर भी जिसमें जिसका अधिकार है उसमें उसका ही अधिकार है अन्यमें नहीं। जैसे ब्राह्मणका राजसूय यागमें अधिकार न होनेपर भी बृहस्पतिसव में अधिकार है। क्षत्रिय राजाका राजसूयमें अधिकार होनेपर भी बृहस्पतिसव यागमें अधिकार नहीं है।

वैसे देवता आदिका मध्वादि विद्यामें अधिकार न होनेपर भी ब्रह्मविद्या में अधिकार है। यहाँ अधिकारका कारण अर्थीत्व, सामर्थ्य, अप्रतिषेध आदि हैं। वे उनमें हैं, क्योंकि उनमें कामना, सामर्थ्य है उनका कहीं निषेध भी नहीं है कि उनका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है। उद्धृत श्रुतियोंसे भी यही सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। विश्वासु गन्धर्वने याज्ञवल्क्यसे प्रश्न किया कि ' किमत्र ब्रह्मामृतम् '? याज्ञवल्क्यने उसका उत्तर दिया।

यह स्मार्तं संवाद of a इस बातको दृढ़ करता है कि देवादिका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है।

* मन्त्र, अर्थवाद, पुराण, इतिहास आदिसे आदित्य आदिके भी दो - दो अंश सिद्ध होते हैं। एक तो भूतोंका कार्य ज्योतिर्मण्डल आदिरूप अचेतन अंश और दूसरा दृश्यमान ज्योतिर्मंण्डल आदिके अधिष्ठाता देवतारूप चेतन अंश, जिसका ब्रह्मविद्या में अधिकार सिद्ध किया जाता है। इन दोनोंमें आदित्य शब्दका प्रयोग होता है। इस विषयको आगे ' अभिमानिव्यपदेशस्तु ० ' ( ब्र ० सू ० २1१14 ) इस सूत्र में स्पष्ट करेंगे।

* ' विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते। भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधा मतः॥ ' ( प्रत्यक्षादिसे विरोध होनेपर गुणवाद और प्रत्यक्षादि प्रमाणसे अर्थ अवगत होनेपर अनुवाद और जहाँ पर दोनों ही नहीं वहाँ भूतार्थवाद, इसप्रकार अर्थवाद तीन प्रकारका है ) जिंस वाक्यका अर्थ प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध हो वहाँ विरोध परिहारार्थं गौणीवृत्ति मानकर समाधान किया जाता है।

यथा ' आदित्यो यूपः ' इस स्थलमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे यूप और आदित्य दोनोंका भेद प्रतीत होता है, इससे दोनोंमें अभेद विरुद्ध है। यूपमें आदित्यका जो तेजसित्व गुण है, उस गुणसे यह अर्थवाद प्रवृत्त होता है, तो यहाँ ' आदित्यो यूपः ' का ' आदित्यसदृशो यूपः ' यह अर्थ है। ' वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता ' इत्यादि स्थलोंमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे वायुका शीघ्रगामित्व प्रसिद्ध है, उसका अनुवाद कर यह अर्थ - वाद प्रवृत्त होता है, अतः इस अर्थवादकां नाम अनुवाद है।

' वज्रहस्तः पुरन्दरः ' ( जिसके हाथमें वज्र है वह इन्द्र है ) श्रुति आदि प्रमाणसे ज्ञात होता है और प्रत्यक्षादि प्रमाणसे अज्ञात है, अतः यह अर्थं भूतार्थवाद कहलाता है। वाक्यके दो तात्पर्य होते हैं -- अवान्तर तात्पर्यं और महातात्पर्यं। गुणवाद और अनुवाद दोनोंका अवान्तर तात्पर्य विषयभूत अर्थ में प्रामाण्य नहीं होता केवल महातात्पर्य विषयभूतमें ही प्रामाण्य है। भूतार्थवादका दोनोंमें प्रामाण्य रहता हैं। प्रमालक्षणमें अनधिगतत्व और अबाधितत्व दो विशेषण दिए गए हैं।

गुणवादमें अबाधितत्व नहीं है, अनुवादमें अनधि - गतत्व नहीं है, इसलिए गुणवाद और अनुवाद दोनोंका अवान्तर तात्पर्य विषयमें प्रामाण्य नहीं है। भूतार्थवादका दोनों में प्रामाण्य रहता है, क्योंकि शब्दका तात्पर्यं विषयीभूत अर्थ में प्रामाण्य होता है। शब्दसे जो अर्थ प्रतीत हो उसमें नहीं। शब्दका आकार तो नहीं होता, तब उसका ध्यान भी कैसे होगा? इसलिए विधि आदिकी सिद्धिके लिए देवताका विग्रह मानना युक्त है।

* कलाकारों द्वारा निर्मित देवादि विग्रह भीतिचित्र आदि श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण, लोक अनुभव आदिके विद्यमान होनेसे निराधार नहीं कहे जा सकते।

विग्रहो हविषां मोग ऐश्वर्यं च प्रसन्नता। फलदातृत्वमित्येत्पञ्चकं विग्रहादिकम्॥

( शरीरधारी होना, हविष्यका ग्रहण, ऐश्वर्य, हविष्य आदिसे प्रसन्नता, प्रसन्न होकर यजमानको फल देना इस कार पाँच विग्रह होते हैं )।

‘ विग्रहो हविः स्वीकारः तद्द्मोजनं तृप्तिः। प्रसादश्चेत्येतच्चेतनस्योचितं पञ्चकम्॥ ' ( विग्रह, हविष्यका स्वीकार, उसको भोगमा, तृप्ति, प्रसन्न होकर यजमानको फल देना ये पाँच चेतनके लिए ही उचित हैं शब्दात्मक जड़ देवताकें लिए नहीं ) इत्यादिसे यह सिद्ध होता है कि देवताका विग्रह होता है, इससे उनका ब्रह्मविद्या में अधिकार भी सिद्ध होता है। इससे क्रम मुक्ति प्रतिपादक शास्त्र भी संगत होते हैं। अहंग्रह उपासना आदि से ब्रह्मलोक में जाकर दिव्य शरीरको पाकर दिव्य मोगोंका अनुभव करता है। संत्कारबलसे वहाँ ब्रह्माद्वारा ज्ञान प्राप्तकर आत्मसाक्षात्कार होनेसे मुक्त हो जाता है, इसप्रकार उसकी क्रममुक्ति होती है। इसलिए देवादिको शरीरधारी मानकर ब्रह्मविद्यामें अधिकार मानना श्रुति संगत है॥ ३३

अपशूद्राधिकरणम्

1.3.34 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३४

सूत्र १.३.३४

शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ १.३.३४ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 301

पदच्छेद — शुक् , अस्य , तदनादरश्रवणात् , तदाद्रवणात् , सूच्यते हि

सूत्रार्थ — ( अस्य ) जानश्रुतिको ( तदनादरश्रवणात् ) इससे अपना अनादर श्रवण करनेसे ( शुक् ) शोक उत्पन्न हुआ, वह ( सूच्यते हि ) शुद्र से सूचित किया गया है, ( तदाद्रवणात् ) शोकसे ही रैक्वके पास गमन किया, इससे शुद्र कहा गया है।

शाङ्करभाष्य

यथा मनुष्याधिकारनियममपोद्य देवादीनामपि विद्यास्वधिकार उक्तः तथैव द्विजात्यधिकारनियमापवादेन शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादित्येतामाशङ्कां निवर्तयितुमिदमधिकरणमारभ्यते। तत्र शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादिति तावत्प्राप्तम् अर्थित्वसामर्थ्ययोः संभवात् तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः इतिवत् शूद्रो विद्यायामनवक्लृप्त इति निषेधाश्रवणात्। यच्च कर्मस्वनधिकारकारणं शूद्रस्यानग्नित्वम् न तद्विद्यास्वधिकारस्यापवादकम् न ह्याहवनीयादिरहितेन विद्या वेदितुं न शक्यते।

भवति च श्रौतं लिङ्गं शूद्राधिकारस्योपोद्बलकम् संवर्गविद्यायां हि जानश्रुतिं पौत्रायणं शुश्रूषुं शूद्रशब्देन परामृशति अह हारे त्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्तु इति। विदुरप्रभृतयश्च शूद्रयोनिप्रभवा अपि विशिष्टविज्ञानसंपन्नाः स्मर्यन्ते। तस्मादधिक्रियते शूद्रो विद्यास्वित्येवं प्राप्ते ब्रूमः न शूद्रस्याधिकारः वेदाध्ययनाभावात्। अधीतवेदो हि विदितवेदार्थो वेदार्थेष्वधिक्रियते। न च शूद्रस्य वेदाध्ययनमस्ति उपनयनपूर्वकत्वाद्वेदाध्ययनस्य उपनयनस्य च वर्णत्रयविषयत्वात्।

यत्तु अर्थित्वम् न तदसति सामर्थ्येऽधिकारकारणं भवति। सामर्थ्यमपि न लौकिकं केवलमधिकारकारणं भवति शास्त्रीयेऽर्थे शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्यापेक्षितत्वात् शास्त्रीयस्य च सामर्थ्यस्याध्ययननिराकरणेन निराकृतत्वात्। यच्चेदम् शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः इति तत् न्यायपूर्वकत्वाद्विद्यायामप्यनवक्लृप्तत्वं द्योतयति न्यायस्य साधारणत्वात्। यत्पुनः संवर्गविद्यायां शूद्रशब्दश्रवणं लिङ्गं मन्यसे न तल्लिङ्गम् न्यायाभावात्। न्यायोक्ते हि लिङ्गदर्शनं द्योतकं भवति। न चात्र न्यायोऽस्ति।

कामं चायं शूद्रशब्दः संवर्गविद्यायामेवैकस्यां शूद्रमधिकुर्यात् तद्विषयत्वात् न सर्वासु विद्यासु। अर्थवादस्थत्वात्तु न क्वचिदप्ययं शूद्रमधिकर्तुमुत्सहते। शक्यते चायं शूद्रशब्दोऽधिकृतविषये योजयितुम् कथमित्युच्यते कम्वर एनमेतत्सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ इत्यस्माद्धंसवाक्यादात्मनोऽनादरं श्रुतवतो जानश्रुतेः पौत्रायणस्य शुक् उत्पेदे तामृषी रैक्वः शूद्रशब्देनानेन सूचयांबभूव आत्मनः परोक्षज्ञताख्यापनायेति गम्यते जातिशूद्रस्यानधिकारात्।

कथं पुनः शूद्रशब्देन शुगुत्पन्ना सूच्यत इति उच्यते तदाद्रवणात् शुचमभिदुद्राव शुचा वा अभिदुद्रुवे शुचा वा रैक्वमभिदुद्राव इति शूद्रः अवयवार्थसंभवात् रूढ्यर्थस्य चासंभवात्। दृश्यते चायमर्थोऽस्यामाख्यायिकायाम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — . केवल मनुष्यका ही ब्रह्मविद्या में अधिकार है, इस नियमका निषेधकर जैसे देवतादिका भी ब्रह्मविद्या में अधिकार कहा गया है, वैसे ही द्विजातिमात्र ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) का विद्यामें अधिकार है, इस नियमका अपवादकर कहीं शूद्रका मी विद्या में अधिकार हो, तो इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिए इस अधिकरणका आरम्भ किया जाता है। पूर्वपक्षी - ब्रह्मविद्या में शूद्रका भी अधिकार हो ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि अथित्व और सामथ्यं उसमें भी सम्भव हैं।

किञ्च ' तस्माच्छूद्रो ० ' ( अग्नि रहित होने से शूद्र यज्ञमें असमर्थ है ) इसके समान, शुद्रो विद्यायां ० ' ( शूद्र विद्या में असमर्थ है ) इस प्रकार निषेधका श्रवण नहीं अर्थात् निषेधक श्रुति नहीं है 1। कर्मों में अनधिकारका कारण जो अग्निरहितत्व है वह ब्रह्मविद्यामें अधिकारका अपवादक लिङ्ग नहीं है। आहवनीय आदि अग्नियोंसे रहित पुरुषसे विद्या संपादन नहीं की जा सकती, यह बात नहीं है। शूद्र के अधिकारका समर्थक श्रोत लिङ्ग - श्रुति है।

संवर्गविद्या में श्रवण करनेकी इच्छा रखनेवाले पौत्रायण जानश्रुतिका रैक्वने ' अह हारे व्वा ० ( हे शूद्र! गौ सहित यह हार युक्त रथ तेरे ही पास रहे ) इस प्रकार शूद्र शब्दसे परामर्श किया है। ऐसी स्मृति भी है कि विदुर आदि शूद्र योनिमें उत्पन्न हुए भी विज्ञान सम्पन्न थे। इसलिए शूद्र विद्याओंका अधिकारी है। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वेदाध्ययनके न होने कारण शूद्रका विद्या में अधिकार नहीं है। अधीत वेद और विदित वेदार्थं पुरुषका ही वेदार्थं विचारमें अधिकार है।

शूद्रके लिए तो वेदाध्ययन ही नहीं है, क्योंकि वेदाध्ययन तो उपनयनपूर्वक किया जाता है। और उपनयन वर्णत्रय ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) विषयक होता है। जो अर्थित्व है, वह सामर्थ्यंके न होनेपर अधिकारका कारण नहीं हो सकता। केवल लौकिक सामर्थ्य भी अधिकारका कारण नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय अर्थ में शास्त्रीय सामथ्यँकी अपेक्षा होती है, और अध्ययनके निरा-

. करणसे शास्त्रीय सामर्थ्यका मी निराकरण हुआ समझना चाहिए। किञ्च ' शूद्रो यज्ञ

ऽनवक्लृप्तः ' यह Satara न्यायपूर्वक होनेसे विद्या में मी असामर्थ्यको सूचित करता है, क्योंकि न्याय दोनोंमें समान है। और संवर्गविद्या में शूद्रशब्द श्रवणको तुम लिङ्ग मानते हो वस्तुतः वह लिङ्ग नहीं है। क्योंकि वेदार्थ ज्ञानात्मकसामर्थ्यं रूप अनुकूल न्याय नहीं है। लिङ्गदर्शन तो न्याय संगत विषयका ही सूचक होता है, परन्तु यहाँ तो उक्त न्याय नहीं है।

भले ही यह शूद्रशब्द केवल एक संवर्गविद्यामें शूद्रको अधिकार दे, क्योंकि यह शूद्र शब्द संवर्गविद्या में पठित है, सब विद्याओंमें उसका अधिकार नहीं है। और शूद्रशब्द अर्थबाद वाक्योंमें पठित होनेके कारण किसी भी विद्यामें शुद्रको अधिकार नहीं दिला सकता। और यह शूद्र शब्द अधिकृत विषयक ( द्विजाति ) पुरुषके लिए भी प्रयुक्त किया जा सकता है। किस प्रकार? कहते हैं - ' कम्वर एनमे ० ' ( अरे! तू किस महत्त्व - से युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है?

क्या तू उसे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतलाता है? ) इस हंस वाक्यसे अपने अनादरको सुननेवाले पौत्रायण जानश्रुतिको शोक उत्पन्न हुआ। यह प्रतीत होता है कि रैक्व ऋषिने अपनी परोक्षज्ञताको जतलानेके लिए इस शूद्रशब्दसे उस शोकको सूचित किया। क्योंकि यहाँ जातिगत शूद्रका अधिकार नहीं है। तो राजाको उत्पन्न हुआ शोक ही यहां शूद्रशब्द से कैसे सूचित किया गया है?

कहते हैं - उसके आद्रवणसे, वह शोककी ओर अग्रसर हुआ अर्थात् शोकसे व्याप्त हुआ अथवा शोकसे रैक्वके पास गया, इसलिए उसे शूद्र कहा गया, क्योंकि यहाँपर अवयव ( यौगिक ) अर्थका सम्भव है रूढि अर्थका सम्भव नहीं है। इस आख्यायिका में यही अर्थ देखा जाता है।। ३४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' तद्यो यो देवानाम् ' इस श्रुतिमें देवशब्दसे जैसे ब्रह्मविद्या में केवल मनुष्यके अधिकारको हटाकर देवादिका भी अधिकार कहा गया है, वैसे श्रुतिमें शूद्र शब्दसे द्विज जातिके अधिकार नियमको हटाकर शूद्र का भी अधिकार है। इसप्रकार दृष्टान्तसंगति से इस अधिकरणका आरम्भ है। देवतादिका जो ब्रह्मविद्या में अधिकार निश्चित किया है, उसीसे ब्रह्मविद्यामें शूद्रका भी अधिकार है कि नहीं? इस प्रश्नका निर्णय करते हैं।

पूर्वपक्षी - शूद्रका ब्रह्मविद्या में अधिकार है। इसमें एक उदाहरण कहते हैं --- राजा जानश्रुतिने ६०० गायें और रथ आदि गुरु रैक्वको देकर यह प्रार्थना की कि मुझे संवर्गविद्याका उपदेश कीजिए। तब कन्याके साथ विवाह करनेकी इच्छा रखनेवाले विधुर रैक्वने उससे कहा ' अह हारे त्वा शूद्र तवैव सह गोमिस्तु ' इस प्रकार जानश्रुतिके प्रति रैक्वने शूद्र शब्दका प्रयोग किया है। तदनन्तर राजाने बहुत धनादिके साथ अपनी कन्याको अर्पण किया। उससे प्रसन्न होकर रैक्वने राजाको संवर्गविद्याका उपदेश किया।

इससे सिद्ध होता है कि अथित्व और सामर्थ्य से युक्त शूद्रका मी विद्या अधिकार है। जैसे अग्नि रहित होनेसे कर्मोंमें शूद्र के अधिकारका निषेध है, वैसे ब्रह्मविद्या में अधिकारका निषेध नहीं। अतः ब्रह्मविद्या में शूद्रका अधिकार मानना चाहिए। पूर्वपक्ष में द्विज के समान शूद्रकी भी श्रौत ब्रह्मविद्या में प्रवृत्ति है, सिद्धान्तमें नहीं है।

* उपनयन संस्कारके अनन्तर ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' इस अध्ययनविधिके अनुसार आचार्य से जिसने अपात वेदार्थ जान लिया है। उसका वेदार्थ विचारमें अधिकार है अन्यका नहीं। अध्ययनविधिसे अधीत वेदार्थ ज्ञानरूप सामर्थ्य शूद्र में नहीं है, क्योकि उसके लिए उपनयनका विधान ही नहीं है। इससे उनका वेदाध्ययनमें अधिकार न होनेसे ब्रह्मविद्या में भी अधिकार नहीं है।

* ( छान्दो ० ४।१ ) – एक समय राजा जानश्रुति ग्रीष्म ऋतुमें रात्रि के समय महलकी छत पर सोया हुआ था। उसके अन्नदानादि अनेक गुणोंसे सन्तुष्ट हुए ऋषि गण उसके कल्याणके लिए हंसका रूप धारणकर पंक्तिरूपसे उसके ऊपर उड़ते हुए आये। उनमें से पिछले हंसने आगेवाले हंससे कहा ‘ हो होऽयि मलाक्ष भलाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति। ' ( ओ ओ भलाक्ष! ओ मलाक्ष!! देख पौत्रायण जानश्रुतिका तेज लोकके समान फैला हुआ है। तू उसका स्पर्श न कर। वह तुझे भस्म न कर डाले ) तब उस पिछले हंसको आगे के हंसने उत्तर दिया- अरे! यह विचारा विद्याहीन है। इसके लिए तुम उन वचनोंका प्रयोग कर रहे हो जिनका कि गाड़ी के साथ रहनेवाले रैक्वके लिए किया जाता है अर्थात् रैक्वका तेज दुर्लङ्घय है। इस आत्मज्ञान रहित जानश्रुतिका तेज वैसा नहीं है। इन वचनोंसे खिन्न होकर गाड़ीरूप चिह्न से युक्त रैक्वके पास जाकर राजा ब्रह्मज्ञानको प्राप्त करे ऐसा हंसोंका अभिप्राय था। उन हंसोंसे अनादर वाक्य सुनकर राजाको शोक उत्पन्न हुआ था।। ३४

1.3.35 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३५

सूत्र १.३.३५

क्षत्रियत्वगतेश्वोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ १.३.३५ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 303

पदच्छेद — क्षत्रियत्वगतेः , च , उत्तरत्र , चैत्ररथेन , लिङ्गात्

सूत्रार्थ — ( क्षत्रियत्वगतेश्च ) क्षत्रियत्व ज्ञान होने ले जानश्रुति मुख्य शूद्र नहीं है, क्योंकि

शाङ्करभाष्य

( उत्तरत्र ) संवर्गविद्या वाक्यशेषमें ( चैत्ररथेन ) प्रसिद्ध क्षत्रिय चैत्ररथ अभिप्रतारीके साथ ( लिङ्गात् ) समभिव्याहाररूप लिङ्गसे जानश्रुति क्षत्रिय ज्ञात होता है, इससे विद्या में शूद्रका अधिकार नहीं है।

इतश्च न जातिशूद्रो जानश्रुतिः। यत्कारणं प्रकरणनिरूपणेन क्षत्रियत्वमस्योत्तरत्र चैत्ररथेनाभिप्रतारिणा क्षत्रियेण समभिव्याहारालिङ्गाद्गम्यते। उत्तरत्र हि संवर्गविद्यावाक्यशेषे चैत्ररथिरभिप्रतारी क्षत्रियः संकीर्त्यते— ' अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं [ सूदेन ] परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी त्रिमिक्षे ' ( छा ० ४।३।५ ) इति। चैत्ररथित्वं चाभिप्रतारिणः कापेययोगादवगन्तव्यम्। कापेययोगो हि चित्ररथस्यावगतः ' एतेन वै चित्ररथं कापेया अयाजयन् ' ( ताण्ड्य ब्रा ० २०।१२।५ ) इति। समानान्वयानां च प्रायेण समानान्वया याजका भवन्ति। ' तस्माच्चैत्ररथिर्नामैकः क्षत्रपतिरजायत ' इति च क्षत्रपतित्वावगमात्क्षत्रियत्वमस्यावगन्तव्यम्। तेन क्षत्रियेणाभिप्रतारिणा सह समानायां संवर्ग विद्यायां संकीर्तनं जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वं सूचयति। समानानामेव हि प्रायेण समभिव्याहारा भवन्ति। क्षत्तृप्रेषणाद्यैश्वर्ययोगाश्च जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिः। अतो न शूद्रस्याधिकारः॥ ३५

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस हेतुसे भी जानश्रुति जातिसे शुद्र नहीं है, क्योंकि प्रकरणके निरूपणसे आगे चैत्ररथ अभिप्रतारी ही क्षत्रियके साथ सममिव्यवहाररूप लिङ्गसे ज्ञात होता है। उत्तरत्र - संवर्गविद्या के वाक्यशेषमें चैत्ररथि अभित्रतारी क्षत्रियका ' अथ ह शौनकं ० ' ( एक वार कपिगोत्रज शौनक और कक्ष सेनके पुत्र अमितासे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था, एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी ) इस प्रकार कथन है।

अभिप्रतारीमें चैत्ररथित्व कापेयके सम्बन्ध से समझना चाहिए | ' एतेन वै चित्ररथं ० ' ( इस द्विरात्रेष्टिसे कापेयोंने चित्ररथको यज्ञ कराया ) इससे चित्ररथका कापेयके साथ सम्बन्ध अवगत होता है। प्रायः समान वंशवाले समान वंशवालोंके याजक होते हैं अर्थात् राजवंशियोंके प्रायः पुरोहितवंश्य याजक होते हैं। ‘ तस्माच्चैतरथिर्नामैकः ० ' ( उससे चित्ररथसे चैत्ररथि नामका एक क्षत्रपति उत्पन्न हुआ ) इस प्रकार क्षत्रपतित्वकी अवगतिसे उस चैत्ररथमें क्षत्रियत्व समझना चाहिए।

उस क्षत्रिय अभिप्रतारीके साथ एक संवर्गविद्यामें संकीर्तन जानश्रुतिको भी क्षत्रियत्व सूचित करता है। समानोंके ही प्रायः समभिव्याहार होते हैं। सारथि प्रेषण ( भेजना ) आदि ऐश्वर्यंके योगसे जानश्रुतिमें क्षत्रियत्व अवगत होता है। इसलिए श्रीविद्यामें शूद्रका अधिकार नहीं है॥ ३५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.३.३६ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

1.3.36 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३६

सूत्र १.३.३६

संस्कारपरामर्शात् तदभावाभिलापाच् च ॥ १.३.३६ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 304

पदच्छेद — संस्कारपरामर्शात् , तदभावाभिलापात् च

सूत्रार्थ — ( संस्कारपरामर्शात् ) ब्रह्मविद्या में उपनयन आदि संस्कारोंका परामर्श है ( च ) और ( तदभावाभिलापात् ) शूद्रके लिए उपनयन आदि संस्कारोंके अभावका कथन है, इससे ब्रह्मविद्या शूद्रका अधिकार नहीं है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च न शूद्रस्याधिकारः यद्विद्याप्रदेशेषूपनयनादयः संस्काराः परामृश्यन्ते तं होपनिन्ये अधीहि भगव इति होपससाद ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः इति च। तान्हानुपनीयैव इत्यपि प्रदर्शितैवोपनयनप्राप्तिर्भवति। शूद्रस्य च संस्काराभावोऽभिलप्यते शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिः इत्येकजातित्वस्मरणात्। न शूद्रे पातकं किंचिन्न च संस्कारमर्हति इत्यादिभिश्च।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इससे भी शूद्रका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं हैं, क्योंकि ' तं होपनि ये ० ( उसका उपनयन किया ) ' अधीहि भगव ० ' ( हे भगवन्! मुझे उपदेश कीजिए, ऐसा कहते हुए नारद सनकुमार के पास गए ) ' ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठा : ० ' ( ये अपरब्रह्मकी उपासना करनेवाले और तदनुकूल अनुष्ठानमें तत्पर मारद्वाज़ आदि छ : ऋषिगण परब्रह्म के जिज्ञासु होकर भगवान् पिप्पलादके पास, यह सोचकर कि ये हमें उसके विषयमें सब कुछ बतला देंगे, हाथमें समिधा लेकर गये ) इस प्रकार विद्याके प्रकरणों में उपनयन आदि संस्कारोंका परामर्श है। ' तान्हानु ० ' ( उनका उपनयन किए विना शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन, अर्थज्ञान एवं अनुष्ठानका प्रतिषेध किया

गया है, इससे ( च ) भी शूद्रा विद्या अधिकार नहीं है।

दिखलाई गई है। परन्तु ही राजाने उस विद्याका उपदेश किया ) इसमें भी उपनयनकी प्राप्ति ' शूद्रश्चतुर्थो वर्ण ० ' ( शूद्र चतुर्थ वर्ण एवं उपनयन रहित है ) इसप्रकार स्मृति में वह एक जाति कहा गया है। ' न शूद्रे पातकं ० ' ( शूद्रको अमक्ष्य लशुनादि भक्षण से कुछ पाप नहीं है और वह उपनयन आदि संस्कार के योग्य नहीं है ) इत्यादि स्मृति से भी शूद्र में संस्कारोंके अभावका कथन है || ३६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * शङ्का - राजा अश्वपतिने प्राचीनशाल आदि छः ऋषिजनोंको उपनयन संस्कार किए विना ही विद्याका उपदेश किया है, इससे सिद्ध होता है कि उपनयन रहितका भी विद्यामें अधिकार है, तो संस्कार रहित शूद्रका भी विद्यामें अधिकार होना चाहिए? समाधान - वस्तुतः उपनयन दो प्रकारका होता है, एक वेदाध्ययन के लिए विधि पूर्वक यज्ञोपवीत आदिका धारणरूप, दूसरा ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके लिए उपसदनरूप।

उपसदन भी दो प्रकारका होता है- एक तो विद्यार्थीका आचार्यके पास सादर गमन और दूसरा आचार्य द्वारा उसे शिष्यरूपसे स्वीकार करना तथा बहुत कालतक अपने सान्निध्यमें रखकर अपनी सेवादिकी अनुमति देना आदि। वेद वेदाङ्गोंमें पारंगत ऋषिजनोंमें वेदाध्ययनसे पूर्वं ही यज्ञोपवीत संस्कार सिद्ध है, इसलिए ' तान्हानुपनीयैव ' इस श्रुतिसे उपनयनका निषेध करना अयुक्त है। उपनयन किए हुएके लिए पुनः उपनयन प्राप्त ही नहीं है। और दूसरा विद्यार्थीका आचार्यके पास सादर गमनरूप उपसदन वह उन ऋषियोंनें भी सिद्ध है।

तो फिर ' तान्हानुपनीयैव ' इस श्रुति से किए गए उपनयन निषेधका क्या तात्पर्य है? इसका तात्पर्य यह है कि आचार्य द्वारा शिष्यभावसे स्वीकार कर अपने सान्निध्य में रखकर सेवा आदिके अनुमतिरूप उपनयनका निषेध है, क्योंकि उत्तमवर्णवाले विद्यार्थीके प्रति निम्नवर्णवाले गुरुको सेवा लिए विना विद्या देनी चाहिए इस अभिप्रायसे श्रुतिमें ऐसा कहा गया है। अतः उपनयन आदि संस्कार रहित होनेसे शूद्रका विद्यामें अधिकार नहीं है।। ३६

1.3.37 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३७

सूत्र १.३.३७

तद्भावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ १.३.३७ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 305

पदच्छेद — तदभावनिर्धारणे , च , प्रवृत्तेः

सूत्रार्थ — ( तदभावनिर्धारणे ) सत्यकाममें सत्यकथनसे शूद्रत्वाभाव निर्धारित करने पर ( प्रवृत्तेः ) गौतम सत्यकाम के लिए उपदेश आदि करने में प्रवृत्त हुए। इससे ( च ) भी विद्यामें शूद्रका अनधिकार है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च न शूद्रस्याधिकारः यत्सत्यवचनेन शूद्रत्वाभावे निर्धारिते जाबालं गौतम उपनेतुमनुशासितुं च प्रववृते नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगाः इति श्रुतिलिङ्गात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस हेतुसे भी शूद्रका विद्यामें अधिकार नहीं है, क्योंकि सत्य बोलनेसे शूद्रत्व अभावका निर्धारण होनेपर गौतम सत्यकामका उपनयन करने और उसे विद्याका उपदेश करनेके लिए प्रवृत्त हुए ' नैतदब्राह्मणो ० ' ( उससे गौतमने कहा – ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नहीं कर सकता, अतः हे सोम्य! तू समिधा ले आ, मैं तुम्हारा उपनयन करूँगा, क्योंकि तुमने सत्यका त्याग नहीं किया ) यह श्रुतिलिङ्ग है।। ३७

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.३.३९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

1.3.38 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३८

सूत्र १.३.३८

श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् ॥ १.३.३८ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 305

पदच्छेद — श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेः च

सूत्रार्थ — ( स्मृतेः ) ' अथास्य वेदमुपशृण्वतः ' इत्यादि स्मृतिसे

शाङ्करभाष्य

स्मृतेश् च । ( ब्रसू-१,३.३९ । ) इतश्च न शूद्रस्याधिकारः यदस्य स्मृतेः श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधो भवति। वेदश्रवणप्रतिषेधः वेदाध्ययनप्रतिषेधः तदर्थज्ञानानुष्ठानयोश्च प्रतिषेधः शूद्रस्य स्मर्यते। श्रवणप्रतिषेधस्तावत् अथ हास्य वेदमुपश्रृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम् इति पद्यु ह वा एतच्छमशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम् इति च। अत एवाध्ययनप्रतिषेधः यस्य हि समीपेऽपि नाध्येतव्यं भवति स कथमश्रुतमधीयीत। भवति च वेदोच्चारणे जिह्वाच्छेदः धारणे शरीरभेद इति। अत एव चार्थादर्थज्ञानानुष्ठानयोः प्रतिषेधो भवति न शूद्राय मतिं दद्यात् इति द्विजातीनामध्ययनमिज्या दानम् इति च। येषां पुनः पूर्वकृतसंस्कारवशाद्विदुरधर्मव्याधप्रभृतीनां ज्ञानोत्पत्तिः तेषां न शक्यते फलप्राप्तिः प्रतिषेद्धुम् ज्ञानस्यैकान्तिकफलत्वात्। श्रावयेच्चतुरोवर्णान् इति चेतिहासपुराणाधिगमे चातुर्वर्ण्यस्याधिकारस्मरणात्। वेदपूर्वकस्तु नास्त्यधिकारः शूद्राणामिति स्थितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इससे मी शूद्रका विद्यामें अधिकार नहीं है, क्योंकि स्मृतिमें उसके लिए श्रवण, अध्ययन और अर्थज्ञानका प्रतिषेध है। स्मृतिमें शूद्रके लिये वेदके श्रवण, वेदके अध्ययन और वेदार्थज्ञान एवं अनुष्ठानका निषेध है।

' अथास्य ' ( समीपसे वेदोंका श्रवण करनेवाले शूद्रके दोनों कान रांगा और लाखसे भर दे ) और ' पशु ह वा ० ' ( शूद्र निस्सन्देह पादयुक्त ( जंगम ) श्मशान है, इसलिए शूद्रके समीप वेदका अध्ययन नहीं करना चाहिए ) इसप्रकार वेदके श्रवणका प्रतिषेध है | श्रवणके निषेधसे अध्ययनका निषेध भी सिद्ध होता है, क्योंकि जिसके समीपमें भी अ ययन करना युक्त नहीं है वह अश्रु वेदका अध्ययन कैसे करेगा? वेदके उच्चारण करनेपर शूद्रकी जिह्वाके उच्छेद और धारण करनेपर शरीर के भेदनका विधान है।

वेदाध्ययनके अभाव होनेसे शूद्रके लिए अर्थ ज्ञान और अनुष्ठानका निषेध अर्थसे सिद्ध होता है। ' न शूद्राय मतिं दद्यात् ' ( ब्राह्मणको चाहिये कि शूद्रको वेदार्थज्ञान न दे ) और ' द्विजातीनाम ० ' ( द्विजाति- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके लिये ही अध्ययन, यज्ञ तथा दानका विधान है )। परन्तु विदुर धर्मव्याध आदि जिनको पूर्वकर्मके संस्कारोंसे ज्ञान उत्पन्न हुआ है, उनके लिये फलप्राप्तिका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि ज्ञान अव्यभिचरित फल वाला होता हैं।

' श्रावयेच्चतुरो वर्णानू ' ( चारों वर्णोंको सुनावे ) इसप्रकार यह स्मृति इतिहास - पुराणके ज्ञान करनेमें चारों वर्णोंका अधिकार बतलाती है। इससे सिद्ध हुआ कि वेदाध्ययन पूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेका शूद्रको अधिकार नहीं है।। ३८

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.३.३९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

कम्पनाधिकरणम्

1.3.39 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३९

सूत्र १.३.३९

कम्पनात् ॥ १.३.३९ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.३९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 306

सूत्रार्थ — - ' यदिदं किञ्च ' ( यह सारा जगत् प्राणसे उत्पन्न हुआ चेष्टा करता है ) इस कम्पनसे प्रतीयमान प्राण परमात्मा ही है।

शाङ्करभाष्य

अवसितः प्रासङ्गिकोऽधिकारविचारः प्रकृतामेवेदानीं वाक्यार्थविचारणां प्रवर्तयिष्यामः। यदिदं किंच जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम्। महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति इति एतद्वाक्यम् एजृ कम्पने इति धात्वर्थानुगमाल्लक्षितम्। अस्मिन्वाक्ये सर्वमिदं जगत् प्राणाश्रयं स्पन्दते महच्च किंचिद्भयकारणं वज्रशब्दितमुद्यतम् तद्विज्ञानाच्चामृतत्वप्राप्तिरिति श्रूयते।

तत्र कोऽसौ प्राणः किं तद्भयानकं वज्रम् इत्यप्रतिपत्तेर्विचारे क्रियमाणे प्राप्तं तावत् प्रसिद्धेः पञ्चवृत्तिर्वायुः प्राण इति प्रसिद्धेरेव चाशनिर्वज्रं स्यात् वायोश्चेदं माहात्म्यं संकीर्त्यते कथम् सर्वमिदं जगत् पञ्चवृत्तौ वायौ प्राणशब्दिते प्रतिष्ठाय एजति वायुनिमित्तमेव च महद्भयानकं वज्रमुद्यम्यते वायौ हि पर्जन्यभावेन विवर्तमाने विद्युत्स्तनयित्नुवृष्ट्यशनयो विवर्तन्त इत्याचक्षते वायुविज्ञानादेव चेदममृतत्वम् तथा हि श्रुत्यन्तरम् वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद इति तस्माद्वायुरयमिह प्रतिपत्तव्यः इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः ब्रह्मैवेदमिह प्रतिपत्तव्यम् कुतः पूर्वोत्तरालोचनात् पूर्वोत्तरयोर्हि ग्रन्थभागयोर्ब्रह्मैव निर्दिश्यमानमुपलभामहे इहैव कथमकस्मादन्तराले वायुं निर्दिश्यमानं प्रतिपद्येमहि पूर्वत्र तावत् तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।

तस्िम्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन इति ब्रह्म निर्दिष्टम् तदेव इहापि संनिधानात् जगत्सर्वं प्राण एजति इति च लोकाश्रयत्वप्रत्यभिज्ञानात् निर्दिष्टमिति गम्यते प्राणशब्दोऽप्ययं परमात्मन्येव प्रयुक्तः प्राणस्य प्राणम् इति दर्शनात्। एजयितृत्वमपीदं परमात्मन एवोपपद्यते न वायुमात्रस्य तथा चोक्तम् न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ इति उत्तरत्रापि भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः।

भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः इति ब्रह्मैव निर्देक्ष्यते न वायुः सवायुकस्य जगतो भयहेतुत्वाभिधानात् तदेव इहापि संनिधानात् महद्भयं वज्रमुद्यतम् इति च भयहेतुत्वं प्रत्यभिज्ञानान्निर्दिष्टमिति गम्यते वज्रशब्दोऽप्ययं भयहेतुत्वसामान्यात्प्रयुक्तः यथा हि वज्रमुद्यतं ममैव शिरसि निपतेत् यद्यहमस्य शासनं न कुर्याम् इत्यनेन भयेन जनो नियमेन राजादिशासने प्रवर्तते एवमिदमग्निवायुसूर्यादिकं जगत् अस्मादेव ब्रह्मणो बिभ्यत् नियमेन स्वव्यापारे प्रवर्तत इति भयानकं वज्रोपमितं ब्रह्म।

तथा च ब्रह्मविषयं श्रुत्यन्तरम् भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चमः इति। अमृतत्वफलश्रवणादपि ब्रह्मैवेदमिति गम्यते ब्रह्मज्ञानाद्ध्यमृतत्वप्राप्तिः तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इति मन्त्रवर्णात्। यत्तु वायुविज्ञानात्क्वचिदमृतत्वमभिहितम् तदापेक्षिकम् तत्रैव प्रकरणान्तरकरणेन परमात्मानमभिधाय अतोऽन्यदार्तम् इति वाय्वादेरार्तत्वाभिधानात्।

प्रकरणादप्यत्र परमात्मनिश्चयः अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद इति परमात्मनः पृष्टत्वात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रासङ्गिक अधिकार विषयक विचार समाप्त हुआ। अब आगे प्रकृत वाक्यार्थं विचारको ही करेंगे। ' यदिदं किञ्च जगत्सर्व ० ' ( यह जो कुछ सारा जगत् है प्राण ब्रह्ममें, उदित होकर, उसीसे चेष्टा कर रहा है। वह ब्रह्म महान् भयरूप और हाथमें उठाए हुये वज्रके समान है। जो इसे जानते भवन्ति ' ( का ० २।६।२ ) इति। एतद्वाक्यं ' एज कम्पने इति धात्वर्थानुगमालक्षितम्।

तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ' ( का ० २।६।१ ) इति ब्रह्म निर्दिष्टम्, तदेवेहापि, हैं वे अमर हो जाते हैं ) ‘ एज़ कम्पने ' ( एज़ धातुका अर्थ कम्पन है ) यह वाक्य इस धातु अर्थके अनुगमसे लक्षित है। इस वाक्य में यह सम्पूर्ण जगत् प्राणके आश्रित चेष्टा करता है, वह उद्यत वज्रके समान भयानक कोई महान् है। उसके ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति होती है, ऐसी श्रुति है। उसमें यह प्राण कौन है? और वह भयानक वज्र क्या है?

इसके निश्चय न होने के कारण विचार करने पर लोक प्रसिद्धिसे ऐसा ज्ञात होता है कि पाँच वृत्तिवाला वायु प्राण है 1। और लोक प्रसिद्धि से वज्र अशनि ( वज्र ) ही है। यह वायुका ही महात्म्य कहा गया है। कैसे? यह सम्पूर्णं जगत् पाँच वृत्तिवाले प्राणनामक वायुमें रहकर व्यापार करता है। वायु से ही वह महान् भयानक वज्र उठाया जाता है। वायु पर्जन्यभावसे विवर्तमान होने पर विद्युत्, मेघ, वृष्टि और अशनिरूपमें भी विवर्तित होता है, ऐसा कहते हैं। वायु के ज्ञानसे भी यह अमृत्व है।

' वायुरेव व्यष्टिर्वायुः ० ' ( वायु ही व्यष्टि है, वायु ही समष्टि है जो ऐसा जानता है वह अपमृत्युको जीतता है ) ऐसी दूसरी श्रुति है। इसलिए यहाँ प्राणको वायु समझना चाहिए। सिद्धान्ती – ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर हम कहते हैंयहाँ प्राणशब्दसे ब्रह्म ही समझना युक्त है, किससे? इससे कि पूर्व और उत्तर वाक्योंकी पर्यालोचना करने से यही स्पष्ट होता है [ यदिदं किञ्च ] इस वाक्यके पूर्व तथा उत्तर ग्रन्थ भागों में हमें ब्रह्म ही निर्दिश्यमान उपलब्ध होता है।

तो हम यहीं पर मध्यमें अकस्मात् वायुको निर्दिश्यमान कैसे समझ लें। ' तदेव शुक्रं ० ' ( यही जो इस संसार वृक्षका मूल है, विशुद्ध ज्योति : स्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है | सम्पूर्ण लोक उसीमें आश्रित हैं, कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। यही निश्चय वह - ब्रह्म है ) इस पूर्वं वाक्यमें ब्रह्म निर्दिष्ट है। यहाँ भी ऐसा ज्ञात होता है कि संनिधानसे ' सम्पूर्ण मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ' ( का ० २।५।५ ) इति।

उत्तरत्रापि ' भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ' ( का ० २ | ६ | ३ ) जगत् प्राणमें चेष्टा करता है ' इस तरह लोकाश्रयरूप से प्रत्यभिज्ञान होने से वही निर्दिष्ट है। यह प्राण शब्द भी परमात्मामें ही प्रयुक्त है, क्योंकि ' प्राणस्य प्राणाम् ० ' ( प्राणका प्राण है ) ऐसा देखा जाता है।

और यह एजयितृत्व- कम्पनकर्तृत्व भी परमात्मामें ही उपपन्न होता है, वायुमात्रमें नहीं, क्योंकि ' न प्राणेन नापानेन ० ' ( कोई भी मनुष्य प्राणी न प्राणसे और न अपानसे जीवित रहता है, किन्तु वे तो, जिसमें ये दोनों आश्रित हैं ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ) ऐसा कहा गया है।

आगे मी ' भयादस्य ० ' ( इस - परमेश्वर के भयसे अग्नि तपता है, इसीके मयसे सूर्य तपता है तथा इसीके मयसे इन्द्र, वायु और पाँचवीं मृत्यु दौड़ती हैं अर्थात् नियमत : अपने अपने व्यापारमें प्रवृत्त होते हैं ) इस प्रकार ब्रह्मका ही निर्देश करेंगे वायुका नहीं, क्योंकि इसमें वायु सहित जगत् के भय हेतुत्वका अभिधान है। यहाँ भी ऐसा ज्ञात होता है कि संनिधान - प्रकरणसे और ' महद्भयं ० ' ( उद्यत वज्रके समान महान् भयका हेतु है ) इस प्रकार भय हेतुत्वरूप प्रत्यभिज्ञान होनेसे वही निर्दिष्ट है।

यह वज्र शब्द भी भय हेतुत्व सादृश्यसे उसमें प्रयुक्त है। यदि मैं इसकी आज्ञा का पालन नहीं करूंगा तो यह उठा हुआ वज्र मेरे ही शिरपर पड़ेगा, इस भयसे जैसे लोग राजा आदिके शासन में प्रवृत्त होते है, वैसे अग्नि, वायु, सूर्यादि यह जगत् इसी ब्रह्मसे डरता हुआ नियमसे अपने व्यापारमें प्रवृत्त होता है, इससे मयानक वज्ज्रके साथ ब्रह्म की उपमा- तुलना की गई है।

और ' भीषास्माद्वातः ० ' ( इसके भय से वायु चलता है, इसके मयसे सूर्य उदय होता है, तथा इसके मयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवीं मृत्यु दौड़ती हैं अर्थात् नियमतः अपना अपना व्यापार करते हैं ) इस प्रकार ब्रह्म विषयक यह दूसरी श्रुति है और अमृतत्व फलके श्रवणसे भी यही ज्ञात होता है कि प्राण ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानसे ही अमृतत्वकी प्राप्ति होती है, कारण कि ' तमेव विदित्वा ० ( उसोको जानकर मनुष्य मृत्युका अतिक्रमण कर जाता है, इससे भिन्न मोक्ष प्राप्तिका कोई अन्य मार्ग नहीं है ) यह मन्त्र है।

किसी स्थलपर वायु विज्ञानसे जो अमृतत्व अभिहित है वह सापेक्षिक है, क्योंकि वही दूसरे प्रकारणमें परमात्माका अभिधान कर ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( इससे भिन्न आर्त - विनाशी है ) इस प्रकार वायु आदिको नाशवान् अभिधान किया है।

प्रकरणसे भी यहाँ परमात्माका ही निश्चय होता है, क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( जो धर्मसे भिन्न, अधर्मसे भिन्न तथा इस कार्यकारणरूप प्रपञ्चसे भिन्न है और जो भूत एवं भविष्यत् से भिन्न है, ऐसा जिसे देखते अनुभव करते हैं उसका ही मुझे उपदेश कीजिए ) इस प्रकार नचिकेता द्वारा परमात्मा ही पूछा गया है।। ३ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' शब्दादेव प्रमितः ' इत्यादि तृतीय पादके सप्तम प्रमिताधिकरण में ' अंगुष्ठमात्रः पुरुषः ' इस श्रुतिका विचार करते हुए ' हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ' इस सूत्र से शास्त्र में मनुष्यका अधिकार है। इससे मनुष्यके हृदयकी अपेक्षांसे सर्वगत ब्रह्ममें भी अंगुष्ठमात्रत्वकी उपपत्ति कही गई है। इस अधिकरण के प्रसङ्गसे ' तदुपयपि बादरायणः ' इत्यादि आठ सूत्रोंसे अष्टम देवताधिकरणमें देवताओंका मी ब्रह्मविद्या में अधिकार कहा गया है।

पुनः प्रसङ्गसे ' शुगस्य तदनादर ० ' इत्यादि पाँच सूत्रोंसे नवम अधिकरणमें शूद्रका वेदविद्यामें अधिकारका निषेध किया गया है। इसप्रकार प्रासंगिक अधिकार विचार समाप्त हुआ। अब प्रकृत विचारको आरम्भ करतें हैं।

यद्यपि ' अत एव प्राण : ' इस अधिकरण सूत्रसे ही इस कम्पन अधिकरण सूत्रका विषय चरितार्थ हो जाता है, तो भी ' यदिदं किञ्च जगत् सर्व ० ' इस वाक्यमें ब्रह्मका स्पष्ट लिङ्ग नहीं है अथवा ' अत एव प्राण : ' इस अधिकरणका भी यह कम्पन अधिकरण विस्तार है, इसलिए इस अधिकरणकी पृथक् रचना करनेमें कोई दोष नहीं है। ' शब्दादेव प्रमित : ' इस ब्रह्मवाक्य में ब्रह्मज्ञानके लिए जीवका अनुवाद किया गया है।

उसी प्रकार यहाँ ' यदिदं ' इस वाक्यमे प्राणानुवाद युक्त नहीं है, क्योंकि वह काल्पत है, इसलिए उसमें ब्रह्मकत्व युक्त नहीं है। इस प्रत्युदाहरण संगातस ' प्रसिद्ध : ' आदि पूर्वपक्ष करते हैं। • पूर्वपक्षमें प्राणकी उपासना है, सिद्धान्तमे ब्रह्मका ज्ञान।। ३ ९

ज्योतिरधिकरणम्

1.3.40 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४०

सूत्र १.३.४०

विरोधः कर्मणीति चेन् नानेकप्रतिपत्तेर् दर्शनात् ॥ १.३.४० ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.४०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 309

पदच्छेद — ज्योतिः , दर्शनात् 1

सूत्रार्थ — ( ज्योतिः ) ' एष सम्प्रसादो ० ' इस श्रुतिमें ज्योतिः शब्दसे ब्रह्म ही प्रतिपाद्य है, ( दर्शनात् ) क्योंकि ' य आत्मा ' इस उपक्रम वाक्य के पर्यालोचनसे ब्रह्मकी ही प्रतिपाद्यरूपसे अनुवृत्ति देखी जाती है |

शाङ्करभाष्य

स्यादेतत् यदि विग्रहवत्त्वाद्यभ्युपगमेन देवादीनां विद्यास्वधिकारो वर्ण्येत विग्रहवत्त्वात् ऋत्विगादिवदिन्द्रादीनामपि स्वरूपसंनिधानेन कर्माङ्गभावोऽभ्युपगम्येत तदा च विरोधः कर्मणि स्यात् न हीन्द्रादीनां स्वरूपसंनिधानेन यागाङ्गभावो दृश्यते न च संभवति बहुषु यागेषु युगपदेकस्येन्द्रस्य स्वरूपसंनिधानानुपपत्तेरिति चेत् नायमस्ति विरोधः कस्मात् अनेकप्रतिपत्तेः। एकस्यापि देवतात्मनो युगपदनेकस्वरूपप्रतिपत्तिः संभवति। कथमेतदवगम्यते दर्शनात्।

तथाहि कति देवाः इत्युपक्रम्य त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री चसहस्रा इति निरुच्य कतमे ते इत्यस्यां पृच्छायाम् महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवाः इति ब्रुवती श्रुतिः एकैकस्य देवतात्मनो युगपदनेकरूपतां दर्शयति। तथा त्रयस्त्रिंशतोऽपि षडाद्यन्तर्भावक्रमेण कतम एको देव इति प्राणः इति प्राणैकरूपतां देवानां दर्शयन्ती तस्यैव एकस्य प्राणस्य युगपदनेकरूपतां दर्शयति। तथा स्मृतिरपि आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ। योगी कुर्याद्बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत्।।

प्राप्नुयाद्विषयान्कैश्चित्कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत्। संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव इत्येवंजातीयका प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्याणां योगिनामपि युगपदनेकशरीरयोगं दर्शयति किमु वक्तव्यमाजानसिद्धानां देवानाम् अनेकरूपप्रतिपत्तिसंभवाच्च एकैका देवता बहुभी रूपैरात्मानं प्रविभज्य बहुषु यागेषु युगपदङ्गभावं गच्छतीति। परैश्च न दृश्यते अन्तर्धानादिशक्तियोगात् इत्युपपद्यते।

अनेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् इत्यस्यापरा व्याख्या विग्रहवतामपि कर्माङ्गभावचोदनासु अनेका प्रतिपत्तिर्दृश्यते क्वचिदेकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपदङ्गभावं न गच्छति यथा बहुभिर्भोजयद्भिर्नैको ब्राह्मणो युगपद्भोज्यते क्वचिच्चैकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपदङ्गभावं गच्छति यथा बहुभिर्नमस्कुर्वाणैरेको ब्राह्मणो युगपन्नमस्क्रियते तद्वदिहोद्देशपरित्यागात्मकत्वात् यागस्य विग्रहवतीमप्येकां देवतामुद्दिश्य बहवः स्वं स्वं द्रव्यं युगपत्परित्यक्ष्यन्तीति विग्रहवत्त्वेऽपि देवानां न किंचित्कर्मणि विरुध्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' एष सम्प्रसादो ० ' ( यह सम्प्रसाद - जीव अविद्या दशामें देहात्मभावापन्न हुआ ब्रह्मनिष्ठ आचार्यके उपदेशसे देहमें आत्माभिमानको छोड़कर परम ज्योतिः को प्राप्तकर अपने स्वरूपसे अभिनिष्पन्न होता है ) ऐसी श्रुति है। यहाँ संशय होता है कि ज्योतिः शब्द वाच्य चक्षु विषय घट आदि पदार्थोके आवरक अन्धकारका नाशक सूर्यादि तेज है अथवा परब्रह्म है? तब यहाँ क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - प्रसिद्ध तेज ही ज्योतिः शब्द वाच्य है, किससे?

इससे कि उसमें ज्योतिः शब्द रूढ है। ' ज्योतिश्वरणाभिधानात् ' इस सूत्र में तो प्रकरणसे ज्योतिः शब्द अपने अर्थका परित्याग कर ब्रह्मपरक है, परन्तु यहाँ उसके समान अपने प्रसिद्ध तेजरूप अर्थके परित्याग करनेमें कोई कारण दिखाई नहीं देता। इसी प्रकार नाडीखण्डमें ' अथ यन्त्र ० ' ( फिर जिस समय यह इस शरीर से उत्क्रमण करता है उस समय नाड़ियों में फैली रश्मियोंसे ऊपरकी और चढ़ता है ) इस प्रकार मुमुक्षुके लिए आदित्य की प्राप्तिका अभिधान है। इससे प्रसिद्ध तेज ही ज्योतिः शब्द वाच्य है।

सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - परब्रह्म ही ज्योतिःशब्द वाच्य है, किससे? इससे कि उसका ही दर्शन ( अनुवृत्ति ) है | इस प्रकरण में वक्तव्यरूपसे उसकी ही अनुवृत्ति दिखाई देती है। क्योंकि ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( जो आत्मा पाप रहित है ) इस प्रकार पाप रहितत्व आदि गुण विशिष्ट आत्माकी प्रकरणसे अन्वेष्टव्यरूपसे और विजिज्ञासितव्यरूपसे प्रतिज्ञा की है। ' एतं त्वेव ते भूयो ० ' ( मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा ) इस प्रकार आत्माका अनुसन्धान है।

' अशरीरं वाच सन्तं ० ' ( अशरीर होनेपर प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते ) इस प्रकार शरीररहित स्वरूपके लिए इस जीवको ज्योतिः स्वरूपताका अभिधान है ; ब्रह्मभावके बिना अशरीरत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती। ' परं ज्योतिः ० ' ( जो पर ज्योति है वह उत्तम पुरुष है ) ऐसा विशेषण है। जो यह कहा गया है कि मुमुक्षुके लिए आदित्य प्राप्तिका अभिधान है वह आत्यन्तिक मोक्ष नहीं, क्योंकि उसमें गति और उत्क्रान्तिका सम्बन्ध है। ऐसा आगे कहेंगे कि आत्यन्तिक मोक्षमें गति और उत्क्रान्ति नहीं होतीं॥ ४०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व अधिकरणमें ब्रह्म प्रकरणके समर्थक सर्व जगत् व्यापार हेतुत्वरूप लिङ्गके सम्बन्धसे प्राणशब्द प्रसिद्ध वायु अर्थको छोड़कर ब्रह्मके लिए माना गया है। परन्तु उसीप्रकार ' य आत्मा ' इस प्रकारका अनुग्राहक कोई लिङ्ग नहीं है जिससे ज्योतिःशब्द प्रसिद्ध तेजको छोड़कर ब्रह्म परक हो। इस तरह प्रत्युदाहरण संगति से यह पूर्वपक्ष है। अतः यहां ज्योतिशब्दसे प्रसिद्ध सूर्यादि ज्योतिका ग्रहण करना चाहिए।

* प्रकरणका प्रधान प्रतिपाद्य अर्थ वही होता है जिसकी उपक्रममें प्रतिज्ञा, मध्यमें अनुसन्धान और अन्तमें उपसंहार हो, अतः मध्यगतवाक्य भी उस वस्तुका प्रतिपादन करता है, यह शास्त्रको मर्यादा है | छान्दोग्यके अष्टम अध्यायमें १५ खण्ड हैं - दो प्रकरण हैं। प्रथम प्रकरणमें प्रथम ६ खण्डों में दहरविद्याका प्रतिपादन है। द्वितीय प्रकरणमें ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' इस प्रकार सप्तम खण्डसे लेकर समाप्ति पर्यन्त निर्गुणब्रह्मका ही प्रतिपादन है।

द्वितीय प्रकरण में ' एष सम्प्रसादः ० ' यह मन्त्र भी निर्गुणब्रह्म परक है। ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' इस प्रकरणके आरम्भमें पापरहितत्व आदि गुणविशिष्ट आत्माके जाननेकी प्रतिज्ञा है। ' एतं त्वेव ते ' इस वचनसे प्रजापतिने इन्द्र के प्रति पापरहित आत्माका मध्यमें तीन वार परामर्शकर उपदेश किया है। ' स उत्तमः पुरुषः ' इस वचनसे निर्गुण ब्रह्मका ही उपसंहार किया। ' उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ' ( गी ० १५।१७ ) ( तथा उन दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है।

उसे अविनाशी परमेश्वर परमात्मा कहा गया है ) इत्यादि गीतावचनसे भी परमात्मा ही उत्तम पुरुष कहा गया है। इसलिए पूर्वोक्त प्रतिज्ञा, परमार्श, उपसंहार और फलरूप लिङ्गसे इस प्रकरण में ब्रह्मकी ही अनुवृत्ति देखी जाती है। ज्योतिःशल्द सूर्यादि तेजका अभिधान नहीं करता किन्तु ब्रह्मका ही करता है। और आदित्य प्राप्तिरूप जो मोक्ष कहा गया है वह भी वास्तव में मोक्ष नहीं है, क्योंकि कैवल्यमोक्ष में गमन आदि नहीं होते।

' न तस्य प्राणाः उत्क्रामन्ति अत्रैव समविलीयन्ते ' ( ब्रह्मवेत्ता के प्राण [ पुर्यष्टका ] उत्क्रमण नही करते किन्तु यहीं विलीन हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुतिमें ब्रह्मवेत्ताके गमनागमनका निषेधकर परज्योतिः स्वरूपमें लीन - सा होना ही मोक्ष कहा गया है। पूर्वपक्ष में सूर्य की उपासना से ब्रह्मलोकद्वारा क्रममुक्तिफल है। सिद्धान्तमें ब्रह्मज्ञानसे साक्षात् मुक्ति ही फल है॥ ४०

अर्थान्तरत्वव्यपदेशाधिकरणम्

1.3.41 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४१

सूत्र १.३.४१

आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॥ १.३.४१ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.४१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 311

पदच्छेद — आकाशः , अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात्

सूत्रार्थ — ( आकाशः ) ' आकाशो वै नाम - नाम रूपयोनिर्वहिता ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित आकाश ब्रह्म है, ( अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ) क्योंकि ' ते यदन्तरा ' इसमें आकाशका नामरूपसे अर्थान्तरत्व आदि रूपसे व्यपदेश है। ( आदि ) शब्द से ' तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा ' इस प्रकार ब्रह्मत्वका व्यपदेश है।

शाङ्करभाष्य

आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा इति श्रूयते। तत्किमाकाशशब्दं परं ब्रह्म किं वा प्रसिद्धमेव भूताकाशमिति विचारे भूतपरिग्रहो युक्तः आकाशशब्दस्य तस्मिन् रूढत्वात् नामरूपनिर्वहणस्य चावकाशदानद्वारेण तस्मिन्योजयितुं शक्यत्वात् स्रष्टृत्वादेश्च स्पष्टस्य ब्रह्मलिङ्गस्याश्रवणादित्येवं प्राप्ते इदमुच्यते परमेव ब्रह्म इहाकाशशब्दं भवितुमर्हति कस्मात् अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात्। ते यदन्तरा तद्ब्रह्म इति हि नामरूपाभ्यामर्थान्तरभूतमाकाशं व्यपदिशति न च ब्रह्मणोऽन्यन्नामरूपाभ्यामर्थान्तरं संभवति सर्वस्य विकारजातस्य नामरूपाभ्यामेव व्याकृतत्वात् नामरूपयोरपि निर्वहणं निरङ्कुशं न ब्रह्मणोऽन्यत्र संभवति अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि इति ब्रह्मकर्तृकत्वश्रवणात्। ननु जीवस्यापि प्रत्यक्षं नामरूपविषयं निर्वोढृत्वमस्ति बाढमस्ति अभेदस्त्विह विवक्षितः। नामरूपनिर्वहणाभिधानादेव च स्रष्टृत्वादि ब्रह्मलिङ्गमभिहितं भवति। तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा इति च ब्रह्मवादस्य लिङ्गानि। आकाशस्तल्लिङ्गात् इत्यस्यैवायं प्रपञ्चः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' आकाशो नै नाम ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है। वे ( नाम रूप ) जिसके अन्तर हैं वह ब्रह्म है, अमृत है, वही आत्मा है ) ऐसी श्रुति है। क्या वह आकाशशब्द परब्रह्म विषयक है? अथवा प्रसिद्ध भूत आकाश विषयक? ऐसा विचार उपस्थित होने पर पूर्वपक्ष में भूत आकाशका ग्रहण युक्त है, क्योंकि उसमें आकाश शब्द रूढ है। अवकाश देनेके कारण नाम रूपके निर्वाहकत्वकी उसमें योजना हो सकती है और श्रुतिमें स्रष्टृत्वादि स्पष्ट ब्रह्म लिङ्ग नहीं हैं।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होने पर यह कहते हैं- यहाँ परब्रह्म ही आकाशशब्द वाच्य होना चाहिए, किससे? इससे कि यहाँ अर्थान्तरत्वादिका व्यपदेश है। ' ते यदन्तरा तद्ब्रह्म ० ' ( वे जिसके अन्तर हैं वह ब्रह्म है ) इस प्रकार नाम रूपसे भिन्न अर्थभूत आकाशका व्यपदेश है। ब्रह्मसे अतिरिक्त नाम और रूपसे भिन्न अन्य पदार्थका संभव नहीं है, क्योंकि समस्त विकार समूह नाम रूपसे ही व्याकृत हैं।

उसी प्रकार नाम रूपका स्वतन्त्ररूपसे निर्वहण ब्रह्मसे अन्यत्र सम्भव नहीं है, क्योंकि ' अनेन जीवेनाऽऽत्मना ० ' ( मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम रूपकी अभिव्यक्ति करूँ ) इत्यादि ब्रह्मकर्तृत्व श्रुति है। परन्तु जीवमें भी नाम रूपं विषयक निर्वहणकर्तृत्व प्रत्यक्ष है। यह सत्य है, परन्तु यहाँ तो अभेद विवक्षित है। नाम रूपके निर्वाह अभिधानसे हीं स्रष्टृत्वादि ब्रह्मलिङ्गका अभिधान हैं।

' तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा ० ' ( वह ब्रह्म है, वह असूत है, वह आत्मा है ) ब्रह्मवाद लिङ्ग हैं | यह सूत्र ' आकाशस्तल्लिङ्गात् ' इस सूत्रका ही विस्तार है॥४१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे पूर्वंधिकरणमें ज्योतिः शब्दसे प्रसिद्ध सूर्यादि तेजका बाध कर ब्रह्मका प्रतिपादन किया . गया है, वैसे आकाशशब्दसे प्रसिद्ध भूताकाशका बाध कर भगवान् सूत्रकार ब्रह्मका प्रतिपादन करते हैं। इस प्रकार दृष्टान्तसंगति से इस अधिकरणका आरम्भ है। पूर्वपक्षी - ' आकाशस्तलिङ्गात् ' ( ब्र ० सू ० १।१।२२ ) इस सूत्र में ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्य ( का रा ( देव समुत्पद्यन्ते ' ( छा ० १।९।१ ) इस प्रकार सर्व जगत् स्रष्टृत्व आदि ब्रह्मके असाधारण लिङ्ग होनेके कारण आकाशब्दसे परमात्माका ग्रहण किया गया है, वैसे ' आकाशो वै नाम ' यहाँ पर जगत् स्रष्टृत्व आदि ब्रह्मके स्पष्ट लिङ्गका श्रवण नहीं है। अतः आकाशशब्दसे ब्रह्मका ग्रहण न कर भूताकाशका ग्रहण करना चाहिए। पूर्वपक्ष में अमृत आदि रूपसे आकाशकी उपासना है। सिद्धान्तमें निर्गुणब्रह्मका ज्ञान फल है॥४१

सुषुप्त्युत्कान्त्यधिकरणम्

1.3.42 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४२

सूत्र १.३.४२

सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर् भेदेन ॥ १.३.४२ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.४२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 312

पदच्छेद — सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः , भेदेन

सूत्रार्थ — ' योऽयं विज्ञानमयः ' इत्यादि श्रुतियों में प्रतिपाद्यमान पुरुष परमात्मा हैं, क्योंकि ( सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः ) ' प्राज्ञेनात्मना ' इस प्रकार सुषुप्ति और उत्क्रान्ति अवस्थाओं में ( भेदेन ) जोवसे भिन्नरूपसे परमात्माका प्राज्ञशब्दसे व्यपदेश है।

शाङ्करभाष्य

व्यपदेशादित्यनुवर्तते। बृहदारण्यके षष्ठे प्रपाठके कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः इत्युपक्रम्य भूयानात्मविषयः प्रपञ्चः कृतः। तत्किं संसारिस्वरूपमात्रान्वाख्यानपरं वाक्यम् उतासंसारिस्वरूपप्रतिपादनपरमिति विशयः।

किं तावत्प्राप्तम् संसारिस्वरूपमात्रविषयमेवेति कुतः उपक्रमोपसंहाराभ्याम् उपक्रमे योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु इति शारीरलिङ्गात् उपसंहारे च स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु इति तदपरित्यागात् मध्येऽपि बुद्धान्ताद्यवस्थोपन्यासेन तस्यैव प्रपञ्चनादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः परमेश्वरोपदेशपरमेवेदं वाक्यम् न शारीरमात्रान्वाख्यानपरम् कस्मात् सुषुप्तावुत्क्रान्तौ च शारीराद्भेदेन परमेश्वरस्य व्यपदेशात्।

सुषुप्तौ तावत् अयं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् इति शारीराद्भेदेन परमेश्वरं व्यपदिशति तत्र पुरुषः शारीरः स्यात् तस्य वेदितृत्वात् बाह्याभ्यन्तरवेदनप्रसङ्गे सति तत्प्रतिषेधसंभवात् प्राज्ञः परमेश्वरः सर्वज्ञत्वलक्षणया प्रज्ञया नित्यमवियोगात्। तथोत्क्रान्तावपि अयं शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ उत्सर्जन्याति इति जीवाद्भेदेन परमेश्वरं व्यपदिशति तत्रापि शारीरो जीवः स्यात् शरीरस्वामित्वात् प्राज्ञस्तु स एव परमेश्वरः।

तस्मात्सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन व्यपदेशात्परमेश्वर एवात्र विवक्षित इति गम्यते।

यदुक्तमाद्यन्तमध्येषु शारीरलिङ्गात् तत्परत्वमस्य वाक्यस्येति अत्र ब्रूमः उपक्रमे तावत् योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु इति न संसारिस्वरूपं विवक्षितम् किं तर्हि अनूद्य संसारिस्वरूपं परेण ब्रह्मणास्यैकतां विवक्षति यतः ध्यायतीव लेलायतीव इत्येवमाद्युत्तरग्रन्थप्रवृत्तिः संसारिधर्मनिराकरणपरा लक्ष्यते तथोपसंहारेऽपि यथोपक्रममेवोपसंहरति स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु इति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु संसारी लक्ष्यते स वा एष महानज आत्मा परमेश्वर एवास्माभिः प्रतिपादित इत्यर्थः यस्तु मध्ये बुद्धान्ताद्यवस्थोपन्यासात्संसारिस्वरूपविवक्षां मन्यते स प्राचीमपि दिशं प्रस्थापितः प्रतीचीमपि दिशं प्रतिष्ठेत यतो न बुद्धान्ताद्यवस्थोपन्यासेनावस्थावत्त्वं संसारित्वं वा विवक्षति किं तर्हि अवस्थारहितत्वमसंसारित्वं च कथमेतदवगम्यते यत् अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहि इति पदे पदे पृच्छति यच्च अनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः इति पदे पदे प्रतिवक्ति अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्शोकान्हृदयस्य भवति इति च।

तस्मादसंसारिस्वरूपप्रतिपादनपरमेवैतद्वाक्यमित्यवगन्तव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — * व्यपदेशादित्यनुवर्तते। बृहदारण्यके षष्ठे प्रपाठके ' कतम आत्मेति योऽयं विज्ञान-

' व्यपदेशात् ' इस पदकी पिछले सूत्रसे अनुवृत्ति होती है। बृहदारण्यक के षष्ठ प्रपाठक में ' कतम आत्मेति ० . ( जनक - अहं बुद्धिके विषय देह, इन्द्रिय, मन और प्राण आदिमें से आत्मा कौन है? ' याज्ञवल्क्य —— यह जो प्राणोंमें बुद्धिवृत्तियोंका साक्षिभूत हृदयके अन्तर्गत विज्ञानमय ज्योतिःस्वरूप पुरुष है वह आत्मा है ) ऐसा उपक्रम कर आत्मविषयक बहुत विस्तार किया गया है।

क्या वह वाक्य केवल संसारी जीवके स्वरूप अनुवाद परक है अथवा परमात्मा के स्वरूप प्रतिपादन परक है, ऐसा संशय होता है, तब क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्षी - [ कतम आत्मेति ] यह वाक्य केवल जीवस्वरूप विषयक है, किससे? इससे कि उपक्रम और उपसंहारसे ऐसा हो ज्ञात होता है।

उपक्रम में ' योऽयं विज्ञानमय : ०१ ( यह जो प्राणोंमें विज्ञानमय है ) ऐसा जीवका लिङ्ग है, और ' स वा एष ० ' ( वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणों में विज्ञानमय है ) इस उपसंहारमें भी उसका परित्याग नहीं है और मध्यमें भी जाग्रत् आदि अवस्थाओंके उपन्याससे उसका हो विस्तार है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं -- [ कतम आत्मा ] यह वाक्य परमेश्वर उपदेश परक ही है, केवल जीव स्वरूप अनुवाद परक नहीं है, किससे?

इससे कि सुषुप्ति और उत्क्रान्ति ( मरण ) में जीवसे भिन्नरूपसे परमेश्वरका व्यपदेश है। सुषुप्ति में तो ' अयं पुरुषः ० ' ( यह पुरुष प्राज्ञात्मासे संस्लिष्ट - एक होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और न भीतर का ) यह श्रुति जीवसे भिन्नरूपसे परमेश्वरका व्यपदेश करती हैं। उसमें पुरुषशब्द जीव वाचक है, कारण कि वह वेदिता होनेसे बाह्य और भीतरके पदार्थोंके जाननेके प्रसंगमें उसका प्रतिषेध संभव है। प्राज्ञ परमेश्वर है, क्योंकि सर्वज्ञत्व लक्षण प्रज्ञासे उसका नित्य सम्बन्ध है।

उसी प्रकार उत्क्रान्ति में भी ' अयं शारीर आत्मा ० ( उसी प्रकार यह देही आत्मा प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित हो शब्द करता हुआ जाता है ) इस प्रकार श्रुति परमेश्वरका जीवसे भिन्नरूपेण व्यपदेश करती है। उसमें भी शारीर जीव है, क्योंकि वह शरीरका स्वामी है। प्राज्ञ तो वही परमेश्वर है। इससे सुषुप्ति और उत्क्रान्तिमें [ जीव और परमेश्वरका ] भेदसे व्यपदेश होने से ऐसा ज्ञात होता है कि यहाँ परमेश्वर ही विवक्षित है।

और यह जो कहा गया है कि आदि, मध्य और अन्तमें शारीरके लिङ्गसे यह वाक्य जीव परक है, तो इसपर हम कहते हैं— उपक्रममें ' योऽयं विज्ञानमय : ० ' ( जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है ) संसारका स्वरूप विविक्षित नहीं है। किन्तु जीवके स्वरूपका अनुवाद कर उसकी परब्रह्म के साथ एकताकी श्रुति विवक्षा करती है, क्योंकि ' ध्यायतीव ० ' ( वह ध्यान करता - सा है, चलता - सा है ) इत्यादि उत्तर ग्रन्थकी प्रवृत्ति | आत्मामें ] संसारी धर्मोंके निराकरण करनेमें लक्षित होती है।

उसी प्रकार उपसंहार में भी उपक्रमके अनुसार ही ' स वा एष ० ' ( वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणोंमें विज्ञानमय है ) यह श्रुति उपसंहार करती है। जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय संसारी लक्षित होता है वह यह महान् अजन्मा आत्मा परमेश्वर ही है, ऐसा हमने प्रदिपादन किया है ऐसा अर्थ है। जो मध्य में जाग्रदादि अवस्थाके उपन्याससे संसारीके स्वरूपकी विवक्षाको मानता है, वह ऐसा है जैसे पूर्वदिशाको भेजा गया पर प्रस्थान पश्चिम दिशाको करता है।

[ इस प्रकार परमात्मा परक उपदेशको जीव परक समझे ] क्योंकि जाग्रत् आदि अवस्थाके उपन्याससे आत्मा अवस्थावान् अथवा संसारी है,

सूत्रार्य -- ' सर्वस्य वशी ० ' इत्यादि श्रुतिस्थ पति आदि शब्दोंसे यही सिद्ध होता है कि यहाँ असंसारी परमेश्वरके स्वरूपका ही निरूपण है। ऐसी विवक्षा नहीं करती, किन्तु वह अवस्था रहित और असंसारी है ऐसी विवक्षा करती है। परन्तु यह किस प्रकार जापान? इस प्रकार [ जनक और याज्ञवल्क्यका संवाद है ] ' अत ऊर्ध्वं ० ( जनक - अब आगे मुझे मोक्षके लिए उपदेश कीजिए ) इस प्रकार पद पदपर ( वारम्वार ) जनक प्रश्न करते हैं और ' अनन्वागतस्तेन . ' ( उस अवस्थासे वह असम्बद्ध रहता है, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है ) याज्ञवल्क्य ऐसा प : पटपर ( वारम्वार ) उत्तर देते हैं। ' अनन्वागतं पुण्येन ० ' ( उस समय यह पुरुष पुण्यसे असम्बद्ध तथा पाप से भी असम्बद्ध होता है हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पारकर लेता है ) ऐसी श्रुति है। इससे ऐसा निश्चय करना चाहिए कि यह वाक्य असंसरीके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिए है॥४२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वाधिकरणमें नाम और रूपसे भिन्न होनेके कारण आकाश ब्रह्म कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि ' प्राज्ञेनात्मना ' इत्यादिसे ब्रह्मके साथ जीवका अभेद सिद्ध होने पर भी जैसे भेद कहा जाता है, वैसे औपचारिक भेदका कथन हो सकता है, ऐसी आक्षेपसंगति है। पूर्वाधिकरणमें जगत् स्रष्टृत्व ब्रह्मलिङ्गसे भूताकाशका बाध किया गया है, अब भगवान् सूत्रकार इस अधिकरणमें ब्रह्मके लिङ्गसे जोव के लिङ्गका बाघ दिखाते हैं। पूर्वपक्ष में ' कतम आत्मेति ' इस प्रकार के उपक्रम आदि - वाक्योंसे जीव ही प्रतिपाद्य सिद्ध होता है, ब्रह्म नहीं।

इस प्रकार उपक्रम और उपसंहार आदि शारीरशब्दसे जीवके स्वरूपका अनुवाद कर प्राज्ञशब्दसे परमेश्वर के स्वरूपको प्रतिपादित करते हैं, जीवके स्वरूपको नहीं, क्योंकि जीव तो उपाधि विशिष्ट है, उसमें जन्म आदि रहितत्व मुख्यरूप से सम्भव नहीं है। अत : ' कतम आत्मेति ' यह श्रुति परमात्मा के स्वरूपका ही प्रतिपादन करती है।

* जाग्रदादि अवस्थाओंका उपन्यास जीवके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिए नहीं है। किन्तु ' त्वम् ' पदार्थके शोधन द्वारा जीव - ब्रह्मके अभेद प्रतिपादनके लिए है। इससे वह जीवके स्वरूपका बोधक लिङ्ग नहीं है। राजा जनक और याज्ञवल्क्य के प्रश्नोत्तरसे असंसारी परमेश्वरका ही ज्ञान होता है। अत : ' कतम आत्मेति ' इत्यादि श्रुतिवाक्य मी असंसारी परमेश्वरके स्वरूपका ही प्रतिपादन करते हैं जीवके स्वरूपका नहीं।। ४२

1.3.43 · प्रथम अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४३

सूत्र १.३.४३

पत्यादिशब्देभ्यः ॥ १.३.४३ ॥

प्रथम अध्याय तृतीय पाद · सूत्र १.३.४३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 314

शाङ्करभाष्य

इतश्चासंसारिस्वरूपप्रतिपादनपरमेवैतद्वाक्यमित्यवगन्तव्यम् यदस्मिन्वाक्ये पत्यादयः शब्दा असंसारिस्वरूपप्रतिपादनपराः संसारिस्वभावप्रतिषेधनाश्च भवन्ति सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः इत्येवंजातीयका असंसारिस्वभावप्रतिपादनपराः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयान् इत्येवंजातीयकाः संसारिस्वभावप्रतिषेधनाः। तस्मादसंसारी परमेश्वर इहोक्त इत्यवगम्यते।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इससे भी यही निश्चय करना चाहिए कि यह वाक्य असंसारीके स्वरूप प्रतिपादन परक हैं, क्योंकि इस वाक्यमें पति आदि शब्द असंसारीके स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं और संसारीके स्वभाव ( धर्मों ) का प्रतिषेध करते हैं ' सबको अपने वशमें रखनेवाला सबका शासन करनेवाला वह सबका अधिपति है ' इस प्रकारके शब्द असंसारीके स्वभाव प्रतिपादन परक हैं। ' स न साधुना ० ' ( वह पुण्य कर्मसे बढ़ता नहीं और न पाप कर्मसे कम ही होता है ) इस प्रकारके शब्द संसारी स्वभावका निषेध करते हैं। इससे ऐसा अवगत होता है कि असंसारी परमेश्वर ही यहाँ कहा गया है॥ ४३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इससे यह सिद्ध होता है कि शोधित ' तत् ' और ' त्वम् ' अर्थकी एकतामें ही बृहदारण्यकके षष्ठ अध्यायका समन्वय है। इस अधिकरणका पूर्वपक्षमें कर्म कर्ता जीवकी स्तुतिरूप फल है और सिद्धान्त में जीवका अनुवाद कर शोधित ' तत् ' और त्वम् ' [ वह तू है ] अर्थकी एकताका निश्चय फल है॥४३

उपसंहार

इन सूत्रों के माध्यम से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्म का ज्ञान प्रत्यक्ष या अनुमान की सीमाओं से परे, केवल श्रुति के अपरोक्ष प्रमाण द्वारा ही संभव है। यहाँ विभिन्न मतों के संभावित विरोधों का निराकरण करते हुए शब्द की सत्ता और ब्रह्म की नित्यता को स्थापित किया गया है। अंततः ये सूत्र साधक को स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म का स्वरूप जानने के लिए वेदान्त की विशिष्ट पद्धति ही एकमात्र मार्ग है।

In English

Brahma Sutra: The Locus of the Worlds

This commentary explains Brahma Sutra 1.3.1 from the first chapter, third section. It discusses whether the Supreme Brahman is the underlying support for the universe (the heavens, earth, and mind) or if another principle serves as that support.

This article answers

  • Brahma sutra 1.3.1 meaning?
  • Is brahman the locus of the worlds?
  • Brahma sutra dyubhvadyayatanam explanation?
  • Relationship between brahma and the three worlds?

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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