श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — प्रथम अध्याय, चतुर्थ पाद

27 मूल पद्य 25 संस्करणसे मिलाये गये

यहाँ इन सूत्रों का संक्षिप्त परिचय और सार दिया गया है:

इस पाद में ब्रह्म के स्वरूप को जानने के विभिन्न साधनों और प्रमाणों पर विचार किया गया है। इसमें अनुमान, शब्द और अन्य ज्ञान-प्रक्रियाओं के माध्यम से ब्रह्म की सत्ता को सिद्ध करने का क्रम है। पाठक को यहाँ यह समझ प्राप्त होगी कि कैसे इंद्रियगोचर जगत के परे स्थित उस परम तत्व को ज्ञान के विविध मार्गों से जाना जा सकता है।

आनुमानिकाधिकरणम्

1.4.1 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १

सूत्र १.४.१

आनुमानिकम् अप्य् एकेषाम् इति चेन् न शरीर-रूपक-विन्यस्त-गृहीतेर् दर्शयति च ॥ १.४.१ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 315

पदच्छेद — आनुमानिकम् , अपि , एकेषाम् इति चेत् , न , शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः , दर्शयति च

सूत्रार्थ — ( एकेषाम् ) कुछ शाखावाले ' महतः परमव्यक्तम ० ' इत्यादिमें ( आनुमानिकमपि ) अनुमानगम्य प्रधानको भी अव्यक्त शब्दसे स्वीकार करते हैं, इससे प्रधानमें अशब्दत्व सिद्ध नहीं होता, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( शरीररूपकविन्यस्तगृहिते : ) क्योंकि ' शरीरं रथमेव तु ' इस पूर्ववाक्यमें रथरूपकसे कल्पित शरीरका ग्रहण किया गया है, ( दर्शयति च ) पूर्वापर ग्रन्थका पर्यालोचन प्रकृत शरीरको अव्यक्तशब्द से ग्राह्य दिखलाता है।

' अथातो ' इस प्रथम सूत्रसे ब्रह्मजिज्ञासाकी प्रतिज्ञा कर ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्रसे उसका लक्षण कहा गया है। वह लक्षण प्रधानमें भी समान है, ऐसी आशङ्का कर श्रुति प्रतिपादित न होनेसे ' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' इससे उसका निराकरण किया गया है। सभी वेदान्त वाक्योंकी ब्रह्म कारणवादके प्रति समान गति ( ज्ञान ) है ; प्रधानकारणवादके प्रति नहीं है, ऐसा पिछले ग्रन्थ [ गतिसामान्यात् ] से विस्तार पूर्वक कहा गया है। अब अवशिष्ट विषयक आशङ्का की जाती है — यह जो कहा गया है।

कि प्रधान अशब्द है वह अयुक्त है, क्योंकि कुछ एक शाखाओं में ऐसे शब्द श्रूयमाण हैं जिनके तात्पर्यका आमासं प्रधान परक होता है। अतः ऐसी प्रसक्ति हो रही है कि प्रधानमें कारणत्व वेद सिद्ध है, उसोका कपिलादि महान् परम ऋषियोंने ग्रहण किया। तो जब तक उन शब्दोंका अन्यपरत्व प्रतिपादन न किया जाय तबतक सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्‌का कारण है ऐसा जो प्रतिपादन किया है वह बाधित हो जायगा। इसलिए उन शब्दोंका अन्यपरत्व दिखलानेके लिए अग्रिम ग्रन्थ प्रवृत्त होता है -

शाङ्करभाष्य

आनुमानिकमपि अनुमाननिरूपितमपि प्रधानम् एकेषां शाखिनां शब्दवदुपलभ्यते काठके हि पठ्यते महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः इति तत्र य एव यन्नामानो यत्क्रमाश्च महदव्यक्तपुरुषाः स्मृतिप्रसिद्धाः त एवेह प्रत्यभिज्ञायन्ते तत्राव्यक्तमिति स्मृतिप्रसिद्धेः शब्दादिहीनत्वाच्च न व्यक्तमव्यक्तमिति व्युत्पत्तिसंभवात् स्मृतिप्रसिद्धं प्रधानमभिधीयते अतस्तस्य शब्दवत्त्वादशब्दत्वमनुपपन्नम् तदेव च जगतः कारणं श्रुतिस्मृतिन्यायप्रसिद्धिभ्य इति चेत् नैतदेवम् न ह्येतत्काठकवाक्यं स्मृतिप्रसिद्धयोर्महदव्यक्तयोरस्तित्वपरम्।

न ह्यत्र यादृशं स्मृतिप्रसिद्धं स्वतन्त्रं कारणं त्रिगुणं प्रधानम् तादृशं प्रत्यभिज्ञायते शब्दमात्रं ह्यत्राव्यक्तमिति प्रत्यभिज्ञायते स च शब्दः न व्यक्तमव्यक्तमिति यौगिकत्वात् अन्यस्मिन्नपि सूक्ष्मे सुदुर्लक्ष्ये च प्रयुज्यते न चायं कस्मिंश्चिद्रूढः या तु प्रधानवादिनां रूढिः सा तेषामेव पारिभाषिकी सती न वेदार्थनिरूपणे कारणभावं प्रतिपद्यते न च क्रममात्रसामान्यात्समानार्थप्रतिपत्तिर्भवति असति तद्रूपप्रत्यभिज्ञाने न ह्यश्चस्थाने गां पश्यन्नश्वोऽयमित्यमूढोऽध्यवस्यति।

प्रकरणनिरूपणायां चात्र न परपरिकल्पितं प्रधानं प्रतीयते शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः शरीरं ह्यत्र रथरूपकविन्यस्तमव्यक्तशब्देन परिगृह्यते कुतः प्रकरणात् परिशेषाच्च। तथा ह्यनन्तरातीतो ग्रन्थ आत्मशरीरादीनां रथिरथादिरूपकक्लृप्तिं दर्शयति आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः इति तैश्चेन्द्रियादिभिरसंयतैः संसारमधिगच्छति संयतैस्त्वध्वनः पारं तद्विष्णोः परमं पदमाप्नोति इति दर्शयितत्वा किं तदध्वनः पारं विष्णोः परमं पदमित्यस्यामाकाङ्क्षायाम् तेभ्य एव प्रकृतेभ्यः इन्द्रियादिभ्यः परत्वेन परमात्मानमध्वनः पारं तद्विष्णोः परमं पदं दर्शयति इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।। महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।

पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः इति तत्र य एवेन्द्रियादयः पूर्वस्यां रथरूपककल्पनायामश्वादिभावेन प्रकृताः त एवेह परिगृह्यन्ते प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रियापरिहाराय।

तत्र इन्द्रियमनोबुद्धयस्तावत्पूर्वत्र इह च समानशब्दा एव अर्थास्तु ये शब्दादयो विषया इन्द्रियहयगोचरत्वेन निर्दिष्टाः तेषां चेन्द्रियेभ्यः परत्वम् इन्द्रियाणां च ग्रहत्वं विषयाणामतिग्रहत्वम् इति श्रुतिप्रसिद्धेः विषयेभ्यश्च मनसः परत्वम् मनोमूलत्वाद्विषयेन्द्रियव्यवहारस्य मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धिं ह्यारुह्य भोग्यजातं भोक्तारमुपसर्पति बुद्धेरात्मा महान्परः यः सः आत्मानं रथिनं विद्धि इति रथित्वेनोपक्षिप्तः।

कुतः आत्मशब्दात् भोक्तुश्च भोगोपकरणात्परत्वोपपत्तेः महत्त्वं चास्य स्वामित्वादुपपन्नम् अथवा मनो महान्मतिर्ब्रह्मा पूर्बुद्धिः ख्यातिरीश्वरः। प्रज्ञा संविच्चितिश्चैव स्मृतिश्च परिपठ्यते इति स्मृतेः यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै इति च श्रुतेः।

या प्रथमजस्य हिरण्यगर्भस्य बुद्धिः सा सर्वासां बुद्धीनां परमा प्रतिष्ठा सेह महानात्मेत्युच्यते सा च पूर्वत्र बुद्धिग्रहणेनैव गृहीता सती हिरुगिहोपदिश्यते तस्या अप्यस्मदीयाभ्यो बुद्धिभ्यः परत्वोपपत्तेः एतस्मिंस्तु पक्षे परमात्मविषयेणैव परेण पुरुषग्रहणेन रथिन आत्मनो ग्रहणं द्रष्टव्यम् परमार्थतस्तु परमात्मविज्ञानात्मनोर्भेदाभावात् तदेवं शरीरमेवैकं परिशिष्यते तेष्वितराणीन्द्रियादीनि प्रकृतान्येव परमपददिदर्शयिषया समनुक्रामन्परिशिष्यमाणेनेहान्त्येनाव्यक्तशब्देन परिशिष्यमाणं प्रकृतं शरीरं दर्शयतीति गम्यते।

शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनासंयुक्तस्य ह्यविद्यावतो भोक्तुः शरीरादीनां रथादिरूपककल्पनया संसारमोक्षगतिनिरूपणेन प्रत्यगात्मब्रह्मावगतिरिह विवक्षिता तथा च एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः इति वैष्णवस्य परमपदस्य दुरवगमत्वमुक्त्वा तदवगमार्थं योगं दर्शयति यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि।

ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि इति एतदुक्तं भवति वाचं मनसि संयच्छेत् वागादिबाह्येन्द्रियव्यापारमुत्सृज्य मनोमात्रेणावतिष्ठेत मनोऽपि विषयविकल्पाभिमुखं विकल्पदोषदर्शनेन ज्ञानशब्दोदितायां बुद्धावध्यवसायस्वभावायां धारयेत् तामपि बुद्धिं महत्यात्मनि भोक्तरि अग्र्यायां वा बुद्धौ सूक्ष्मतापादनेन नियच्छेत् महान्तं त्वात्मानं शान्त आत्मनि प्रकरणवति परस्मिन्पुरुषे परस्यां काष्ठायां प्रतिष्ठापयेदिति च। तदेवं पूर्वापरालोचनायां नास्त्यत्र परपरिकल्पितस्य प्रधानस्यावकाशः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आनुमानिक — अनुमानसे निरूपित प्रधान भी जगत् कारण कतिपय वैदिक शाखावालोंके मन्त्रोंसे प्रतिपादित उपलब्ध होता है। जैसे कि ' महतः परम ० ' ( महत्से अव्यक्त - मूल प्रकृति पर सूक्ष्मतर है और अव्यक्त से भी पुरुष पर अतिसूक्ष्म है ) काठकमें ही पठित है। वहाँ जो नाम और जो क्रम - महत्, अव्यक्त और पुरुष सांख्यशास्त्रमें प्रसिद्ध हैं वे ही यहाँ कठश्रुतिमें प्रत्यभिज्ञात होते हैं।

उनमेंसे अव्यक्त शब्द सांख्य शास्त्रमें प्रसिद्ध होने और शब्द आदि रहित होने तथा ' न व्यक्तं अव्यक्तम् ' ' जो व्यक्त न हो वह अव्यक्त है ' इस व्युत्पत्ति के सम्भव होनेसे सांख्यशास्त्र प्रसिद्ध प्रधानका अभिधान करता है। इसलिए श्रुति प्रतिपादित होने से उसे अशब्द कहना युक्त नहीं है। श्रुति, स्मृति और तर्क से यह सिद्ध है कि वही प्रधान जगत्‌का कारण है।

सिद्धान्ती - यदि ऐसा कहो तो ऐसा नहीं है, क्योंकि यह कठश्रुति सांख्य स्मृति प्रसिद्ध महत् और अव्यक्तके अस्तित्व विषयक नहीं है, कारण कि जैसा सांख्य शास्त्र प्रसिद्ध जगत्का स्वतन्त्र कारण त्रिगुणात्मक प्रधान है, वैसे यहाँ प्रत्यभिज्ञात नहीं होता, किन्तु यहाँ तो केवल अव्यक्त शब्दमात्रकी प्रत्यभिज्ञा होती है, और वह शब्द जो व्यक्त नहीं है वह अव्यक्त है, इस व्युत्पत्ति के अनुसार यौगिक होनेसे प्रधानसे भिन्न सूक्ष्म एवं अत्यन्त दुर्लक्ष्य पदार्थमें भी प्रयुक्त हो सकता है, यह अव्यक्त शब्द किसी अर्थ में रूढ नहीं है, जो प्रधान वादियोंको रूढि है अर्थात् प्रधान ही अव्यक्त शब्दवाच्य है वह उनकी पारिभाषिक होनेसे अपौरुषेय वेदार्थ निरूपण करने में कारणभाव को प्राप्त नहीं हो सकती।

वस्तुरूपके प्रत्यभिज्ञान न होनेपर केवल क्रमकी समानतासे समान अर्थका ज्ञान नहीं होता। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष अश्वके स्थान में वृषभको देखकर ' यह अश्व है ' ऐसा निश्चय नहीं करता, यहाँ प्रकरणका निरूपण करनेपर प्रतिपक्षीसे परिकल्पित प्रधानकी प्रतीति नहीं होती, क्योंकि यहाँ शरीररूपकके विन्यासका ग्रहण है। निस्सन्देह, यहाँ रथरूपकसे विन्यस्त शरीरका ही अव्यक्तशब्दसे ग्रहण किया जाता है, क्योंकि प्रकरण और परिशेष हैं।

कारण कि उसी प्रकार ‘ आत्मानं रथिनं विद्धि ० ( तू आत्माको रथी और शरीरको रथ जान, बुद्धिको सारथि एवं मनको लगाम समझ, विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको अश्व तथा उनके अश्वरूपसे कल्पित किए जानेपर विषयों को उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं ) यह अव्यवहित अतीत ग्रन्थ आत्मा शरीर आदिमें रथी रथ आदि रूपककी क्लृप्ति ( कल्पना ) दिखलाता है।

उन असंयत इन्द्रियादिसे वह जन्म - मरण रूप संसारको प्राप्त होता है और उन संयत इन्द्रिय आदिसे जन्म - मरण रहित उस विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है, ऐसा दिखलाकर जन्म मरण रहित वह विष्णुका परम पद क्या है? इस प्रकार नचिकेताकी यह आकांक्षा होनेपर [ यमराज कहते हैं ] ' इन्द्रियेभ्यः परा ० ( इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि पर है और बुद्धिसे भी महान् आत्मा ( महत् ) श्रेष्ठ है।

महत्से अव्यक्त ( सूक्ष्म प्रकृति ) श्रेष्ठ है और अव्यक्त से भी पुरुष पर है। पुरुषसे पर और कुछ नहीं है। वही ( सूक्ष्मत्वकी ) पराकाष्ठा - अवधि है, वही परा - उत्कृष्ट गति है ) यह श्रुति उन प्रकृत इन्द्रिय आदिसे पर परमात्माको ही जन्म - मरण रहित III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० ४ परा गतिः॥ ' ( का ० १।३ | १०, ११ ) इति। तत्र य एवेन्द्रियादयः पूर्वस्यां रथरूपककविष्णुका परम पद दिखलाती है।

उस श्रुति में पहले रथ रूपककी कल्पनामें अश्व आदि रूपसे जो इन्द्रिय आदि प्रकृत हैं इस प्रकृतकी हानि और अप्रकृत ( प्रधान ) के कल्पनारूप दोषके परिहारके लिए उनका ही इस श्रुति वाक्यमें ग्रहण किया जाता है। उनमेंसे इन्द्रिय, मन और बुद्धि तो पूर्वं वाक्य में और यहाँ ( इन्द्रियेभ्यः परा ) समान शब्दों से ही निर्दिष्ट हैं।

अर्थ अर्थात् शब्द आदि विषय जो इन्द्रियरूप अश्वोंके मार्गरूपसे निर्दिष्ट हैं, उनमें इन्द्रियोंसे परत्व है क्योंकि ' इन्द्रियाणां ग्रहत्वं ० ' ( घ्राण, रसना, वाक्, नेत्र, श्रोत्र, मन, हस्त, त्वक्, इन आठ इन्द्रियों को श्रुति ग्रह कहा है, क्योंकि पुरुष पशुको ये इन्द्रियाँ अपने वशमें करती हैं, परन्तु ये इन्द्रियाँ भी गन्ध, रस, नाम, रूप, शब्द, काम, कर्म और स्पर्श आदि विषय सम्बन्धके विना स्वतः इस पुरुष पशुको अपने वशमें नहीं कर सकतीं, अतः इन गन्ध आदि आठोंको अतिग्रह कहा है, इसलिए इन्द्रियाँ ग्रह हैं और विषय अतिग्रह हैं ) ऐसा श्रुतिमें प्रसिद्ध है।

विषयोंसे मन श्रेष्ठ है, क्योंकि विषय और इन्द्रियोंका सम्पूर्णं व्यवहार मनके अधीन है, बुद्धि मनसे श्रेष्ठ है, कारण कि भोग्य समुदाय बुद्धिपर आरूढ होकर मोक्ता के पास जाता है। जो ' आत्मानं रथिनं ० ' ( आत्माको रथी जान ) इस प्रकार रथीरूपसे निर्दिष्ट महान् आत्मा है वह बुद्धिसे श्रेष्ठ है, क्योंकि श्रुतिमें आत्मशब्द है। भोगकी सामग्री ( बुद्धि आदि ) से भोक्ता उत्कृष्ट हो सकता है। स्वामी होनेसे वह महान् भी हो सकता है।

अथवा ' मनो महान्मति ० ' ( समष्टि बुद्धि मनन शक्ति, माविनिश्चय, व्यापिनी, ब्रह्मा आत्मा, भोग्य वर्गका आश्रय, तात्कालिक निश्चय, कीर्ति - शक्ति, नियमन शक्ति, त्रैकालिक निश्चय, संवित् - अभिव्यञ्जिका, चित् एवं स्मृति कही जाती है ) इस स्मृति के अनुसार एवं ' यो ब्रह्माणं ० ' ( जो सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माको उत्पन्न करता है और च्छेच्छान्त आत्मनि॥ ' ( का ० १ | ३ | १३ ) इति।

एतदुक्तं भवति - वाचं मनसि संयच्छेत् जो उसकी बुद्धि में वेदोंका आविर्भाव करता है ) इस श्रुतिके अनुसार प्रथम उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भ की जो बुद्धि है, वह सम्पूर्ण बुद्धियोंकी परम प्रतिष्ठा है, वही यहाँ महान् आत्मा है, ऐसी कही जाती है। पहले मन्त्र ( आत्मानं रथिनं विद्धि ) में पठित बुद्धि शब्दके ग्रहणसे वह गृहीत होनेपर भी यहाँ पृथक् उपदिष्ट है, क्योंकि उसमें भी अस्मदादि बुद्धियोंकी अपेक्षासे परत्व उपपन्न है।

परन्तु इस पक्ष में अन्तिम आनेवाले परमात्मविषयक पुरुषशब्दके ग्रहणसे ही रथी आत्माका ग्रहण समझना चाहिए। कारण कि परमार्थसे परमात्मा और विज्ञानात्मामें कोई भेद नहीं हैं। इस प्रकार उनमें केवल एक शरीर ही शेष रह जाता है। यहाँ ऐसा ज्ञात होता है कि परम पदको दिखलानेकी इच्छासे पूर्व मन्त्रमें पठित अन्य इन्द्रिय आदिका अनुक्रमसे ग्रहण करती हुई कठ श्रुति यहाँ अवशिष्ट अन्तिम अव्यक्त शब्दसे परिशिष्ट प्रकृत शरीरको ही दिखलाती है।

अत : शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय और वेदनासे सम्बद्ध अविद्यावान् भोक्ताके शरीर आदिको रथ आदिके साथ सादृश्य कल्पनाके द्वारा संसार गमन और मोक्ष प्राप्तिका निरूपणकर प्रत्यगात्माका ब्रह्मरूपसे ज्ञान कराना ही यहाँ विवक्षित है।

और इसीप्रकार ' एष सर्वेषु ० ' ( सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता, यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषों द्वारा अपनी तीब्र एवं सूक्ष्म बुद्धिसे ही देखा जाता है अर्थात् वे ब्रह्माकार वृत्तिसे साक्षात्कार करते हैं ) इसप्रकार विष्णु के परम पदकी दुर्विज्ञेयता कहकर उसके ज्ञानके लिए ' यच्छेद्वाङ्मनसी ० ( विवेकी पुरुष वाक् इन्द्रियका मनमें लय करे, उसका प्रकाशस्वरूप बुद्धिमें लय करे, वुद्धिको महान् आत्मामें लीन करे और उसको शान्त आत्मामें नियुक्त करे ) इस प्रकार यह श्रुति योगको दिखलाती है।

इसका तात्पर्य यह है - वाणीका मनमें लय करे अर्थात् वाणी आदि बाह्य इन्द्रियों के व्यापारका त्यागकर केवल मनरूपसे अवस्थित रहे। विषयविकल्पाभिमुख मनका भी विकल्पसम्बन्धी दोष दर्शन से ज्ञानशब्द से कथित निश्चयात्मक बुद्धि में लय करे। उस बुद्धिका भी महान आत्मा भोक्तामें अथवा समाधिके परिपाकसे उत्पन्न बुद्धि में अधिक सूक्ष्मता संपादन द्वारा लय करे।

और उस महान् आत्माका प्रकरण प्राप्त अन्तिम काष्ठा - अवधि शान्त आत्मा पर ब्रह्ममें लय करे अर्थात् ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार अभेदरूपसे स्थितिका अनुभव करे। इसप्रकार पूर्वापर वाक्योंकी पर्यालोचना करने पर सिद्ध होता है कि पूर्वपक्षी द्वारा परिकल्पित प्रधानका यहाँ कोई अवकाश ( स्थान ) नहीं है | १ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यहाँ प्रधान विषय यह है कि ' अव्यक्त ' शब्दका अर्थविषयक सन्देह होने पर विचार करते हैं। पहले जैसे प्रसिद्ध जीव विषयक लिङ्गका अप्रसिद्ध ब्रह्मविषयक लिङ्गसे बाध कहा गया है, वैसे यहाँ प्रकरण प्राप्त श्रोत क्रमसे श्रौत क्रमके समान स्मार्तं क्रमका बाध भगवान् सूत्रकार शङ्का पूर्वक दिखाते हैं - ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' इत्यादि मन्त्रगत आत्मा, शरीर, बुद्धि आदि यह श्रौत क्रम है।

इसीके तुल्य महत्, अव्यक्त, पुरुष यह सांख्य स्मृतिग्रन्थका क्रम है। वहाँ श्रौतक्रमसे स्मार्तंक्रमका बाध— अव्यक्त शब्दसे प्रधानका ग्रहण न कर शरीरका ग्रहण करते हुए भगवान् सूत्रकार दिखाते हैं। ईक्षत्यधिकरणमें यह दिखलाया गया है कि सम्पूर्णं वेदान्त वाक्य जगत् कारणरूप से ब्रह्मका ही प्रतिपादन करते हैं। प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है। सम्पूर्ण वेदान्त वाक्योंका ब्रह्ममें समन्वय है, ऐसा विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है।

यहाँ जो यह कहा गया है कि प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है, वह युक्त नहीं है। इससे ईक्ष्त्यधिकरणकी इस अधिकरणके साथ आक्षेपसंगति है। कपिल आदि महर्षि जनोंने अव्यक्त शब्दसे प्रधानको कारणरूपसे स्वीकार किया है। कुछ एक शाखाओं में प्रधान परक शब्दाभास मिलते हैं, अतः कारणता विषयक सन्देह उत्पन्न होता है कि प्रपञ्चका कारण परमेश्वर है अथवा प्रधान? अब इस प्रधान कारण वादका निराकरण करनेके लिए यह अग्रिम ग्रन्थ आरम्भ होता है।

* ' कार्य तस्तदुपलब्धेः ' ' कार्यसे कारणकी उपलब्धि होती है ' इससे प्रधानको आनुमानिकअनुमान गम्य कहा गया है। जो पहले प्रधानको अशब्द - श्रुति अप्रतिपादित कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि ' महतः परमव्यक्तम ' इस कठ श्रुतिमें प्रधानका ही अव्यक्त शब्दसे ग्रहण है। ' अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः ' ( श्वेत ० ४।५ ) ( अपने अनुरूप बहुतसी प्रजा उत्पन्न करने वाली एक लोहित ( रज ) शुक्ल ( सत्त्व ) कृष्ण ( तम ) वर्णा अजा - बकरी - प्रकृति को एक अज ( बकरा - जीव ) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा अज उस भुक्तमोगाको त्याग देता है ) इस अन्य श्रुतिमें प्रधानका अजा ' न जायते इति अजा ' शब्दसें ग्रहण किया गया है। और ' हेतुः प्रकृतिरुच्यते ' ( गी ० १३।२० ) ( प्रकृति - प्रधानको हेतुरूपसे कहा जाता है ) इत्यादि स्मृति है। ' यदल्पं तत् जडप्रकृतिकम् ' ' जो परिच्छिन्न है वह जड़ प्रकृतिसे जन्य है ' यह तर्क है। इसप्रकार उक्त श्रुति, स्मृति और तर्कसे सिद्ध होता है कि प्रधान ही जगत्‌का कारण है ब्रह्म नहीं |

* ' महतः परमव्यक्तम् ' यह क्रम भी समान अर्थका बोधक नहीं हो सकता। किसी एक ज्ञात पदार्थके स्थान पर उससे भिन्न पदार्थको देखकर उस ज्ञात अर्थका ज्ञान नहीं होता, जैसे अश्वके स्थान पर गौको देखकर ' यह अश्व है, ऐसा ज्ञान किसी विवेकीको नहीं होता, वैसे श्रुतिस्थक्रममें ' अव्यक्त ' - शब्दको देखकर सांख्य स्मृति कल्पित प्रधानसे भिन्न शरीररूपी अर्थको जानता हुआ बुद्धिमान् पुरुष प्रधान विषयक ज्ञानको प्राप्त नहीं होता। इसलिए प्रकरण धोर परिशेषरूप नियामकके विद्यमान होनेसे शरीरका ही अव्यक्त शब्दरी ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि श्रुतिने शरीर आदिमें रथ आदिकी सादृश्य कल्पना दिखलाई हैं।

* ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' इस मन्त्रसे रथ रूपककी कल्पनामें अश्व आदि रूपसे जिन इन्द्रिय आदिका ग्रहण है, उनका ही ' इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था ' इत्यादि मन्त्रमें ग्रहण है, इससे वे ही प्रकृत हैं उनका ग्रहण न करनेसे प्रकृतकी हानि और अप्रकृत प्रधानका कल्पनारूप दोष प्रसक्त होता है। उसके परिहारके लिए अव्यक्त शब्दसे प्रकृत शरीरका ग्रहण करना युक्त है अप्रकृत प्रधानका नहीं। ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' इस पूर्व मन्त्रमें तथा ' इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था ' इस उत्तर मन्त्रमें इन्द्रिय, मन और बुद्धि ये शब्द समान हैं और पूर्व मन्त्रमें ' विषय ' शब्द है एवं उत्तर मन्त्र में ' अर्थ ' शब्द है, इससे शब्द भेदसे अर्थका भेद नहीं है, इसलिए उत्तर मन्त्र में अर्थ शब्दसे भी विषयका ही ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार इन दोनों मन्त्रोंकी एक वाक्यता सिद्ध होती है। श्रुतिस्थ परत्व शब्द मोक्ता विष-

I यक है, क्योंकि भोग्य समुदाय मोक्ताके लिये होता है, अतः भोक्ता भोग्य समुदायसे महान् और श्रेष्ठ है।

* ' मनो महान्मतिर्ब्रह्मा ० ' ( संकल्परूप शक्तिसे हिरण्यगर्भकी बुद्धिका नाम मन है, व्यष्टि मनोंमें व्याप्त होनेसे महान् है, सन्देह निवृत्तिका कारण होनेसे मति है, महत्त्ववाली होने से ब्रह्मा है, भोग्य समुदायका आश्रय होने के कारण नगरी है, निश्चायात्मक होनेसे बुद्धि है, कीर्ति शक्तिवाली होनेसे ख्याति है, नियमन शक्ति होनेसे ईश्वर है, लोकमें सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप होनेसे प्रज्ञा है, पदार्थों की अभिव्यञ्जिका होनेसे संवित् है, चैतन्य प्रधान होनेसे चिति है, ज्ञात सर्वार्थका अनुसंधान करनेसे स्मृति है, इसप्रकार विद्वानों द्वारा कही जाती है ) इस प्रकार श्रुति एवं स्मृति में प्रसिद्ध हिरण्यगर्भ की बुद्धको महान् आत्मा शब्दसे ग्रहण किया गया है। उसका ग्रहण करनेसे भी श्रुति समन्वित होती है। इसप्रकार प्रकरण और परिशेषसे अव्यक्त शब्दसे शरीरका ग्रहण करना चाहिए। सांख्य स्मृति कल्पित प्रधानका नहीं, क्योंकि प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है। श्रुतिका तात्पर्यं तो केवल जीवको ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादन करने में हैं॥ १

1.4.2 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २

सूत्र १.४.२

सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ १.४.२ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 320

पदच्छेद — सूक्ष्मम् , तु , तदर्हत्वात्

सूत्रार्थ — ( सूक्ष्मम् ) स्थूल शरीरके आरम्भक सूक्ष्मभूत ( सूक्ष्म शरीर ) का अव्यक्त शब्दसे ग्रहण है, ( तदर्हत्वात् ) क्योंकि वे अव्यक्त शब्दके योग्य हैं। ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है |

शाङ्करभाष्य

उक्तमेतत् प्रकरणपरिशेषाभ्यां शरीरमव्यक्तशब्दम् न प्रधानमिति इदमिदानीमाशङ्क्यते कथमव्यक्तशब्दार्हत्वं शरीरस्य यावता स्थूलत्वात्स्पष्टतरमिदं शरीरं व्यक्तशब्दार्हम् अस्पष्टवचनस्त्वव्यक्तशब्द इति अत उत्तरमुच्यते सूक्ष्मं तु इह कारणात्मना शरीरं विवक्ष्यते सूक्ष्मस्याव्यक्तशब्दार्हत्वात् यद्यपि स्थूलमिदं शरीरं न स्वयमव्यक्तशब्दमर्हति तथापि तस्य त्वारम्भकं भूतसूक्ष्ममव्यक्तशब्दमर्हति प्रकृतिशब्दश्च विकारे दृष्टः यथा गोभिः श्रीणीत मत्सरम् इति श्रुतिश्च तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् इतीदमेव व्याकृतनामरूपविभिन्नं जगत्प्रागवस्थायां परित्यक्तव्याकृतनामरूपं बीजशक्त्यवस्थमव्यक्तशब्दयोग्यं दर्शयति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रकरण और परिशेषसे यह कहा गया है कि शरीर अव्यक्त शब्द वाच्य है प्रधान नहीं। अब यह आशङ्का होती है कि जब स्थूल होनेके कारण यह शरीर अतिस्पष्टरूपसे व्यक्त शब्दके योग्य प्रतीत हो रहा है तो वह शरीर अव्यक्त शब्दके योग्य कैसे हो सकता है? अव्यक्त शब्द तो अस्पष्टका वाचक है | सिद्धान्ती — इसके उत्तरमें कहते हैं कि यहाँ अव्यक्त शब्द द्वारा कारणरूप होनेसे सूक्ष्म शरीर ही विवक्षित है, क्योंकि सूक्ष्म अव्यक्त शब्दके योग्य है। यद्यपि यह स्थूल शरीर स्वयं अव्यक्त शब्दके योग्य नहीं है, तो भी उसके आरम्भक [ आकाश आदि ] सूक्ष्मभूत अव्यक्त शब्दके योग्य हैं। प्रकृति शब्द विकार अर्थ में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है, जैसे ' गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ' ( गौके विकार दूधके साथ सोम रसका मिश्रण करे ) तो उसी प्रकार यहाँ श्रुति मी ' तद्धेदं ० ' ( तब - प्रागवस्थामें यह जगत् अव्याकृत- अव्यक्त था ) ऐसा यह परोक्षापरोक्षात्मक व्याकृत भिन्न - भिन्न नाम रूपवाला जगत् मी जो कि सृष्टिके पूर्व अपने व्याकृत नाम रूपको परित्याग किया हुआ बीजशक्ति रूपं ( संस्कार रूप ) से अवस्थित रहता है, उसको ही यहाँ श्रुति अव्यक्त शब्दके योग्य दिखलाती है || २ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जो वस्तु नेत्र आदि इन्द्रिय द्वारा स्पष्ट प्रतीत होती हो वह व्यक्त और जो स्पष्ट प्रतीत न हो वह अव्यक्त कहलाती है। यह स्थूल शरीर तो नेत्र आदि इन्द्रियोंसे सबको स्पष्टरूपसे प्रत्यक्ष है, मतः उसे अव्यक्त नहीं कहा जा सकता। यह पूर्वपक्षीका आशय है। सिद्धान्ती - यद्यपि यह ठीक है, तो भी कार्यं और कारणके अभिन्न होने से मूल प्रकृति वाचक अव्यक्त शब्दसे कार्य लक्ष्य होता है। जैसे ' गोमिः श्रीणीत मत्सरम् ' इस उद्धृत श्रुतिसे यह दिखलाया गया है कि प्रकृति वाचक गौ शब्द अपने विकार दूध में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है अन्यथा प्रकृति गौके साथ सोम रसका मिश्रण होना असंभव है। जैसे यहाँ प्रकृति गौ शब्द समानरूपसे गौ और स्व विकार दूधमें प्रयुक्त होता है, वैसे आकाश आदि सूक्ष्म भूतात्मक सूक्ष्म शरीर जो स्थूल शरीरका कारण है, उसमें अव्यक्त शब्दका प्रयोग होता है तो यहाँ भी प्रकृति वाचक अव्यक्तशब्द समानरूपसे सूक्ष्मशरीर और स्वविकार स्थूलशरीरमें प्रयुक्त होना युक्त है।। २

1.4.3 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३

सूत्र १.४.३

तदधीनत्वाद् अर्थवत् ॥ १.४.३ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 321

पदच्छेद — तदधीनत्वात् , अर्थवत्

सूत्रार्थ — ( तदधीनत्वात् ) अव्यक्त ईश्वर के अधीन होनेसे स्वतन्त्र नहीं है, ( अर्थवत् ) . जगत् की उत्पत्ति में ईश्वरका सहायक होनेसे सार्थक भी है।

शाङ्करभाष्य

अत्राह यदि जगदिदमनभिव्यक्तनामरूपं बीजात्मकं प्रागवस्थमव्यक्तशब्दार्हमभ्युपगम्येत तदात्मना च शरीरस्याप्यव्यक्तशब्दार्हत्वं प्रतिज्ञायेत स एव तर्हि प्रधानकारणवाद एवं सत्यापद्येत अस्यैव जगतः प्रागवस्थायाः प्रधानत्वेनाभ्युपगमादिति।

अत्रोच्यते यदि वयं स्वतन्त्रां कांचित्प्रागवस्थां जगतः कारणत्वेनाभ्युपगच्छेम प्रसञ्जयेम तदा प्रधानकारणवादम् परमेश्वराधीना त्वियमस्माभिः प्रागवस्था जगतोऽभ्युपगम्यते न स्वतन्त्रा सा चावश्याभ्युपगन्तव्या अर्थवती हि सा न हि तया विना परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वं सिध्यति शक्तिरहितस्य तस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः मुक्तानां च पुनरनुत्पत्तिः कुतः विद्यया तस्या बीजशक्तेर्दाहात् अविद्यात्मिका हि सा बीजशक्तिरव्यक्तशब्दनिर्देश्या परमेश्वराश्रया मायामयी महासुषुप्तिः यस्यां स्वरूपप्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवाः तदेतदव्यक्तं क्वचिदाकाशशब्दनिर्दिष्टम् एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च इति श्रुतेः क्वचिदक्षरशब्दोदितम् अक्षरात्परतः परः इति श्रुतेः क्वचिन्मायेति सूचितम् मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इति मन्त्रवर्णात् अव्यक्ता हि सा माया तत्त्वान्यत्वनिरूपणस्याशक्यत्वात् तदिदं महतः परमव्यक्तमित्युक्तम् अव्यक्तप्रभवत्वान्महतः यदा हैरण्यगर्भी बुद्धिर्महान् यदा तु जीवो महान् तदाप्यव्यक्ताधीनत्वाज्जीवभावस्य महतः परमव्यक्तमित्युक्तम् अविद्या ह्यव्यक्तम् अविद्यावत्त्वेनैव जीवस्य सर्वः संव्यवहारः संततो वर्तते तच्च अव्यक्तगतं महतः परत्वमभेदोपचारात्तद्विकारे शरीरे परिकल्प्यते सत्यपि शरीरवदिन्द्रियादीनां तद्विकारत्वाविशेषे शरीरस्यैवाभेदोपचारादव्यक्तशब्देन ग्रहणम् इन्द्रियादीनां स्वशब्दैरेव गृहीतत्वात् परिशिष्टत्वाच्च शरीरस्य।।

अन्ये तु वर्णयन्ति द्विविधं हि शरीरं स्थूलं सूक्ष्मं च स्थूलम् यदिदमुपलभ्यते सूक्ष्मम् यदुत्तरत्र वक्ष्यते तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् इति तच्चोभयमपि शरीरमविशेषात्पूर्वत्र रथत्वेन संकीर्तितम् इह तु सूक्ष्ममव्यक्तशब्देन परिगृह्यते सूक्ष्मस्याव्यक्तशब्दार्हत्वात् तदधीनत्वाच्च बन्धमोक्षव्यवहारस्य जीवात्तस्य परत्वम् यथार्थाधीनत्वादिन्द्रियव्यापारस्येन्द्रियेभ्यः परत्वमर्थानामिति।

तैस्त्वेतद्वक्तव्यम् अविशेषेण शरीरद्वयस्य पूर्वत्र रथत्वेन संकीर्तितत्वात् समानयोः प्रकृतत्वपरिशिष्टत्वयोः कथं सूक्ष्ममेव शरीरमिह गृह्यते न पुनः स्थूलमपीति।

आम्नातस्यार्थं प्रतिपत्तुं प्रभवामः नाम्नातं पर्यनुयोक्तुम् आम्नातं चाव्यक्तपदं सूक्ष्ममेव प्रतिपादयितुं शक्नोति नेतरत् व्यक्तत्वात्तस्येति चेत् न एकवाक्यताधीनत्वादर्थंप्रतिपत्तेः न हीमे पूर्वोत्तरे आम्नाते एकवाक्यतामनापद्य कंचिदर्थं प्रतिपादयतः प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गात् न चाकाङ्क्षामन्तरेणैकवाक्यताप्रतिपत्तिरस्ति तत्राविशिष्टायां शरीरद्वयस्य ग्राह्यत्वाकाङ्क्षायां यथाकाङ्क्षं संबन्धेऽनभ्युपगम्यमाने एकवाक्यतैव बाधिता भवति कुत आम्नातस्यार्थस्य प्रतिपत्तिः न चैवं मन्तव्यम् दुःशोधत्वात्सूक्ष्मस्यैव शरीरस्येह ग्रहणम् स्थूलस्य तु दृष्टबीभत्सतया सुशोधत्वादग्रहणमिति यतो नैवेह शोधनं कस्यचिद्विवक्ष्यते न ह्यत्र शोधनविधायि किंचिदाख्यातमस्ति अनन्तरनिर्दिष्टत्वात्तु किं तद्विष्णोः परमं पदमितीदमिह विवक्ष्यते तथाहीदमस्मात्परमिदमस्मात्परमित्युक्त्वा पुरुषान्न परं किंचित् इत्याह सर्वथापि त्वानुमानिकनिराकरणोपपत्तेः तथा नामास्तु न नः किंचिच्छिद्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यहाँ पूर्वपक्षी कहते हैं— अनभिव्यक्त नामरूप वाला, पूर्वावस्थामें स्थित बीजात्मक यह जगत् यदि अव्यक्त शब्दके योग्य माना जाय और उसरूपसे शरीरमें भी अव्यक्त शब्दकी प्रयुक्तिको प्रतिज्ञा की जाय तो ऐसा माननेसे उसी प्रधान कारणवादकी प्रसक्ति हो जायगी, क्योंकि सांख्यवादीने इस जगत् की प्रागवस्था ( कारणवस्था ) को ही प्रधानरूपसे स्वीकार किया है।

सिद्धान्ती - इस विषयमें कहते हैं- यदि हम जगत् के कारणरूपसे किसी एक स्वतन्त्र प्रागवस्थाको स्वीकार करें तो हम प्रधान कारणवादके अनुयायी हो सकते हैं, परन्तु हम तो जगत्की इस प्राणवस्था ( कारणावस्था ) को परमेश्वरके अधीन स्वीकार करते हैं, स्वतन्त्र नहीं, वह तो अवश्य स्वीकार करनी चाहिए, क्योंकि वह प्रयोजन वाली है | उसके विना निर्गुण निष्क्रिय परमेश्वर स्रष्टा सिद्ध नहीं हो सकता, कारण कि शक्ति रहित परमेश्वर में प्रवृत्ति उपपन्न नहीं हो सकती।

मुक्त पुरुषोंके बन्धकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि विद्यासे उस बीज शक्तिका नाश ( बाध ) हो जाता है। अविद्यात्मक यह बीजशक्ति अव्यक्तशब्द से निर्दिष्ट है, परमेश्वरके आश्रित मायामयी एवं महासुषुप्ति है, जिसमें स्वरूप ज्ञानसे रहित संसारी जीव सोते हैं। वह अव्यक्त कहीं पर ' एतस्मिन्नु ० ( हे गार्गि! इस अक्षरमें ही आकाश ओत - प्रोत है ) इस श्रुतिमें आकाश शब्दसे निर्दिष्ट है। और कहीं पर ' अक्षरात्परतः परः ० ( सर्वश्रेष्ठ अक्षरसे भी उत्कृष्ट है ) इस श्रुतिसे अक्षर शब्दसे वर्णित है।

कहीं पर ' मायां तु ० ( प्रकृतिको तो माया जाने और महेश्वरको मायावी ) इस मन्त्र में माया शब्दसे सूचित है। वह माया अव्यक्त ही है, क्योंकि वह सद्रूप है अथवा असद्रूप है, ब्रह्म से अभिन्न है अथवा भिन्न, इसप्रकार उसका निरूपण नहीं किया जा सकता। यदि महत्का अर्थ हिरण्यगर्भकी बुद्धि हो तो अव्यक्त से महत् उत्पन्न होता है . इसलिए ' महतः परमव्यक्तम् ' ( महत्से अव्यक्त उत्कृष्ट है ) यहाँ पर वही पूर्वास्था कही गई है।

यदि महत्का अर्थ जीव हो तो भी जीवभाव अव्यक्तके अधीन होनेसे ' महत्से अव्यक्त श्रेष्ठ है ' अर्थात् अव्यक्तमें जीवसे परत्व कथन युक्त है। निश्चय यह अविद्या अव्यक्त है, अविद्योपाधि युक्त होनेसे ही जीवके सब व्यवहार सदा होते रहते हैं। अव्यक्तमें जो महत्से परत्व है उसकी अभेदोपचारसे उसके विकार शरीरमें कल्पना की जाती है।

यद्यपि शरीरके समान इन्द्रिय आदिमें भी [ अव्यक्त ] विकारत्व समान है, तो मी अभेदोपचारसे अव्यक्त शब्दसे शरीरका ही ग्रहण होता है, क्योंकि इन्द्रिय आदिका [ इन्द्रियेभ्यः ] अपने वाचक शब्दसे ही ग्रहण किया गया है। केवल शरीर ही अवशिष्ट है [ अतः उसका अव्यक्त शब्दसे ग्रहण होता है ]। कुछ दूसरे आचार्य तो इस प्रकार वर्णन करते हैं कि शरीर दो प्रकारका है स्थूल और सूक्ष्म। [ नेत्र आदिसे ] जो यह उपलब्ध होता है वह स्थूल है और जो सूक्ष्म है उसे आगे ' तदन्तरप्रतिपत्तौ ० ' इस सूत्र में कहा जायगा।

ये दोनों शरीर समानरूर से पूर्व वाक्य ( आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ) में रथरूपसे कहे गये हैं। [ इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था ] इस उत्तर मन्त्रमें अव्यक्त शब्दसे केवल सूक्ष्म शरीरका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि सूक्ष्म अव्यक्त शब्दके योग्य है। जैसे इन्द्रियोंका व्यापार अर्थों - शब्दादि विषयोंके कधीन होनेसे अर्थों में इन्द्रियपरत्व है, वैसे बन्ध और मोक्ष व्यवहार सूक्ष्म शरीरके अधीन होने से उसमें जीवसे परत्व है।

सिद्धान्ती - वृत्तिकारके मतका निराकरण करते हैं - परन्तु उनसे यह कहना चाहिए कि पूर्ववाक्य [ आत्मनं रथिनं विद्धि ] में रथरूपसे दोनों शरीरोंका समानरूपसे कथन होनेके कारण दोनोंमें प्रकृतत्व परिशिष्टत्व समान है तो यहाँ मव्यक्तशब्दसे केवल सूक्ष्मशरीरका ही ग्रहण क्यों किया जाता है और स्थूलका क्यों नहीं?

हम वेदका अर्थ जानने- ग्रहण करने में समर्थ हैं परन्तु वेदपर ( ननु नच ) नहीं कर सकते, वेदोक्त अव्यक्त शब्द सूक्ष्मका ही प्रतिपादन कर सकता है स्थूलका नहीं, क्योंकि वह व्यक्त है, ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, कारण कि अर्थज्ञान एक वाक्यता के अधीन है।

ये दोनों पूर्व और उत्तर श्रुति वाक्य एक वाक्यता प्राप्त किये विना किसी भी अर्थका प्रतिपादन नहीं कर सकते, अन्यथा प्रकृतकी हानि और अपकृत प्रक्रियाका प्रसङ्ग होगा अर्थात् अव्यक्त शब्दसे प्रकृत स्थूलशरीरका ग्रहण न करना अप्रकृत सूक्ष्म भूतात्मक सूक्ष्म शरीरका ग्रहण करना, यह प्रकृत हानि अप्रकृत प्रक्रिया रूप दोष प्रसक्त होगा। और आकांक्षाके विना एक वाक्यताका बोध नहीं होता।

उन पूर्वोत्तर वाक्योंमें दोनों शरीरोंकी ग्राह्यत्वाकांक्षा समान होनेपर आकांक्षा के अनुसार सम्बन्ध स्वीकार न करें तो एक वाक्यता ही बाधित हो जायगी, तो श्रुत्यर्थंका बोध कैसे होगा?

इस प्रकार नहीं मानना चाहिए कि अनात्मत्व निश्चयरूप शोधन दुष्कर होनेसे सूक्ष्म शरीरका ही यहाँ ग्रहण है, नाना दोषों से दूषित प्रत्यक्ष घृणाका विषय होनेसे अनामत्व निश्चयरूप शोधन सुकर होनेके कारण स्थूल शरीरका ग्रहण नहीं है, क्योंकि यहाँ प्रकरणमें किसीका शोधन विवक्षित नहीं है, कारण कि यहाँ शोधनका विधान करनेवाला कोई क्रियापद नहीं है। विष्णुका परम पद क्या है? ( आत्मनं रथिनं विद्धि ) इस वाक्य के अनन्तर निर्दिष्ट होनेसे वही यहाँ विवक्षित है।

क्योंकि यह इससे पर है, यह इससे पर है अर्थात् इन्द्रियोंसे उसके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन श्रेष्ट है, इस प्रकार कहकर ' पुरुषान्न ० . ( पुरुषसे कुछ श्रेष्ठ नहीं है ) ऐसा श्रुति कहती है। सब प्रकार से अनुमान निरूपित प्रधानका निराकरण उपपन्न होता है। तो भले ऐसा हो, इससे हमारी कुछ भी हानि नहीं है॥३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यह जो सुख दुःख मोहात्मक जगत् है, वह सुखदुःखमोहात्मक कारणसे ही उत्पन्न होने योग्य है, क्योंकि कार्य कारणात्मक होता है। इसमें सुखात्मकता सत्त्वसे, दुःखात्मकता रजसे और मोहात्मकता तमसे है। सत्त्व, रज और तमोमय कारणावस्थाका नाम सांख्यमतमें प्रधान है। जगत्की कारणावस्था मायाके स्वीकार करनेसे प्रधान कारणवादकी प्रसक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वेदान्तसिद्धान्त में माया अनित्य, अनिर्वचनीय, मिथ्या और परतन्त्र है, जब कि सांख्यमतमें प्रधान नित्य निर्वचनीय, सत्य और स्वतन्त्र है। कारणावस्था अव्यक्त मायाको हम स्वतन्त्र कारण नहीं मानते तो प्रधान कारणवादकी प्रसक्ति कैसे हो सकती है? किन्तु अव्याकृत नामरूपात्मक कारणावस्था मायाको हम परमेश्वर के अधीन मानते हैं, बन्ध और मोक्षकी व्यवस्थाके लिए भी मायाको मानते हैं, अन्यथा असङ्ग एक आत्मामें बन्ध मोक्ष व्यवस्था अनुपपन्न है।

* वाक्योंकी परस्पर आकांक्षा होनेसे ही एक वाक्यता होती है, और उससे अर्थका ज्ञान होता है, अन्यथा अर्थबोध नहीं होगा। अतः ' शरीरं रथमेव तु ' इस प्रकृत शरीर द्वयका ग्रहण ' इन्द्रियेभ्यः परा ' इस मन्त्रमें किस पदसे है और अव्यक्तशब्दसे क्या ग्राह्य है? इस प्रकार दो आकांक्षाओंके होनेसे पूर्वोत्तर वाक्योंमें एक वाक्यता सम्भव है | शरीरशब्दसे प्रकृत दोनों ही शरीर ग्राह्यरूपसे आकांक्षाओंके समान विषय हैं। अव्यक्तशब्दसे दोनों शरीरोंका ग्रहण प्राप्त है। यदि आकांक्षाके अनुसार अन्वय स्वीकार न करें, तो अव्यक्तशब्दसे केवल सूक्ष्मशरीरका ग्रहण होगा स्थूलशरीरका नहीं, फिर तो एक वाक्यताका बाध हो जायगा। इसलिये अव्यक्तशब्दसे प्रकृत स्थूलशरीर ही ग्राह्य है।

* यदि वृत्तिकारके मतसे अव्यक्तशब्दसे सूक्ष्म शरीरका भी ग्रहण हो तो हमारी कोई हानि नहीं है, क्योंकि अव्यक्तशब्दसे सूक्ष्मशरीरका ग्रहण करनेपर भी अनुमान निरूपित प्रधानका तो अव्यक्तशब्दसे किसी प्रकार भी ग्रहण नहीं हो सकता है || ३ ||

1.4.4 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४

सूत्र १.४.४

ज्ञेयत्वावचनाच् च ॥ १.४.४ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 324

पदच्छेद — ज्ञेयत्वावचनात् च

सूत्रार्थ — इस प्रकरणमें अव्यक्तको ज्ञेय नहीं कहा गया है, . इससे भी इस श्रुतिमें अव्यक्तशब्दसे प्रधानका ग्रहण नहीं है।

शाङ्करभाष्य

ज्ञेयत्वेन च सांख्यैः प्रधानं स्मर्यते गुणपुरुषान्तरज्ञानात्कैवल्यमिति वदद्भिः न हि गुणस्वरूपमज्ञात्वा गुणेभ्यः पुरुषस्यान्तरं शक्यं ज्ञातुमिति क्वचिच्च विभूतिविशेषप्राप्तये प्रधानं ज्ञेयमिति स्मरन्ति न चेदमिहाव्यक्तं ज्ञेयत्वेनोच्यते पदमात्रं ह्यव्यक्तशब्दः नेहाव्यक्तं ज्ञातव्यमुपासितव्यं चेति वाक्यमस्ति न चानुपदिष्टं पदार्थज्ञानं पुरुषार्थमिति शक्यं प्रतिपत्तुम् तस्मादपि नाव्यक्तशब्देन प्रधानमभिधीयते अस्माकं तु रथरूपकक्लृप्तशरीराद्यनुसरणेन विष्णोरेव परमं पदं दर्शयितुमयमुपन्यास इत्यनवद्यम्।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र १.४.५ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # प्रधान श्रुति तात्पर्यका विषय न होनेसे ज्ञेय नहीं है और अव्यक्तशब्द वाच्य भी नहीं है। परन्तु शरीर भी तो ज्ञेयरूपसे पठित नहीं है तो उसका यहाँ ग्रहण क्यों किया जाता है? हमारे मतमें तो केवल विष्णुपद ज्ञेय है, उसके दर्शनके लिए अव्यक्तशब्द से स्थूलशरीरका ग्रहण करने में कोई दोष नहीं है || ४ ||

1.4.5 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ५

सूत्र १.४.५

वदतीति चेन् न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ १.४.५ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 324

पदच्छेद — वदति , इति चेत् , न प्राज्ञः , हि , प्रकरणात्

सूत्रार्थ — ( वदति ) ' महतः परं ध्रुवं निचाय्य ' यह उत्तर वाक्य प्रधानको ज्ञेय कहता है, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, ( प्रकरणात् ) क्योंकि ' पुरुषान्न परं ' इस आत्मप्रकरणसे ( प्राज्ञो हि ) परमात्मा ही यहाँ ज्ञेयरूपसे निर्दिष्ट है।

शाङ्करभाष्य

अत्राह सांख्यः ज्ञेयत्वावचनात् इत्यसिद्धम् कथम् श्रूयते ह्युत्तरत्राव्यक्तशब्दोदितस्य प्रधानस्य ज्ञेयत्ववचनम् अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते इति अत्र हि यादृशं शब्दादिहीनं प्रधानं महतः परं स्मृतौ निरूपितम् तादृशमेव निचाय्यत्वेन निर्दिष्टम् तस्मात्प्रधानमेवेदम् तदेव चाव्यक्तशब्दनिर्दिष्टमिति। अत्र ब्रूमः नेह प्रधानं निचाय्यत्वेन निर्दिष्टम् प्राज्ञो हीह परमात्मा निचाय्यत्वेन निर्दिष्ट इति गम्यते कुतः प्रकरणात् प्राज्ञस्य हि प्रकरणं विततं वर्तते पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः इत्यादिनिर्देशात् एष सर्वेषु भूतेषु गुढोऽत्मा न प्रकाशते इति च दुर्ज्ञानत्ववचनेन तस्यैव ज्ञेयत्वाकाङ्क्षणात् यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः इति च तज्ज्ञानायैव वागादिसंयमस्य विहितत्वात् मृत्युमुखप्रमोक्षणफलत्वाच्च न हि प्रधानमात्रं निचाय्य मृत्युमुखात्प्रमुच्यत इति सांख्यैरिष्यते चेतनात्मविज्ञानाद्धि मृत्युमुखात्प्रमुच्यत इति तेषामभ्युपगमः सर्वेषु वेदान्तेषु प्राज्ञस्यैवात्मनोऽशब्दादिधर्मत्वमभिलप्यते तस्मान्न प्रधानस्यात्र ज्ञेयत्वमव्यक्तशब्दनिर्दिष्टत्वं वा।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सत्त्व आदि गुण और पुरुष के भेदज्ञानसे मोक्ष होता है, ऐसा कथन करनेवाले सांख्यमतानुयायी विद्वान् प्रधानका ज्ञेयरूपसे स्मरण करते हैं, क्योंकि सत्त्वादि गुणोंके स्वरूप जाने विना केवल गुणोंसे पुरुषका भेद नहीं जाना जा सकता। अणिमा आदि ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए प्रधान ज्ञेय है, ऐसा भो कहीं कहीं स्मृति में कहते हैं। परन्तु [ महतः परमव्यक्तम् ] इस मन्त्र में अव्यक्तको ज्ञेयरूपसे नहीं कहा है, यहाँ अव्यक्तशब्द केवल एक पद है। अव्यक्त ज्ञातव्य है वा उपासितव्य है, यहाँ कोई ऐसा विधायक वाक्य नहीं है। और अनुपदिष्ट पदार्थज्ञान पुरुषार्थ है ऐसा नहीं जाना जा सकता। इससे भी श्रुति अव्यक्तशब्दसे प्रधानका अभिधान नहीं करती, हमारे मत में तो रथके सादृश्यसे कल्पित शरीर आदिका अनुसरणकर विष्णुका ही परम पद दिखलाने के लिए यह उपन्यास है, इस प्रकार कोई दोष नहीं है॥३॥

यहाँ सांख्य कहते हैं— ' ज्ञेयत्यावचनात् ' यह हेतु असिद्ध है, क्योंकि ' अशब्दमस्पर्शम ० ' ( जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, रसहीन, नित्य तथा गन्धरहित है। जो अनादि, अनन्त, महत्दितस्य प्रधानस्य ज्ञेयत्ववचनम् -- ' अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा s रसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥ ' ( का ० २ | ३ | १५ ) इति।

अत्र हि से पर, निश्चल है उस तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर पुरुष मृत्युमुखसे छूट जाता है ) इस उत्तरवाक्यमें अव्यक्तशब्दसे प्रतिपादित प्रधानका ज्ञेयरूपसे कथन है। सांख्यस्मृतिमें शब्द आदि रहित महत्से पर प्रधानका जैसा निरूपण है वैसा ही यहाँ ज्ञेयरूपसे निर्देश है। इसलिए यह प्रधान ही है और वही यहाँ [ महतः परमव्यक्तम् ] अव्यक्तशब्द से निर्दिष्ट है।

सिद्धान्ती -- यहाँ हम कहते हैं --- इस मन्त्र [ ' अशब्दमस्पर्शम ' ] में प्रधान ज्ञेयरूपसे निर्दिष्ट नहीं है, किन्तु प्राज्ञ परमात्मा ही यहाँ ज्ञेयरूपसे निर्दिष्ट है ऐसा ज्ञात होता है। किससे? इससे कि उसका प्रकरण है। प्राज्ञका ही विस्तृत प्रकरण चला हुआ है, ' पुरुषान्न ' ( पुरुष से कुछ श्रेष्ठ नहीं है, वह परम सीमा है वह परम गति है ) इत्यादि निर्देश है।

' एष सर्वेषु ० ' ( सम्मूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशित नहीं होता ) इस प्रकार दुर्ज्ञानत्व कथनसे उसकी ही ज्ञेयरूपसे आकांक्षा होती है, तथा ' यच्छेद्वाङ्मनसी ० ' ( विवेकी पुरुष वाणीका मनमें लय करे ) इस प्रकार उसके ज्ञानके लिये हो वाणी आदिके संयमका विधान किया है, मृत्युमुखसे छुटकारा पाना ही ज्ञानका फल है। परन्तु सांख्योंने यह स्वीकार नहीं किया कि केवल प्रधानके ज्ञानसे मृत्युमुखसे मुक्त होता है।

वे तो यह स्वीकार करते हैं कि चेतन आत्मा के ज्ञानसे ही मृत्युमुखसे मुक्त होता है। सम्पूर्णं वेदान्तोंमें प्राज्ञ परमात्मामें ही अशब्दत्व आदि धर्मोका कथन है। इसलिए यहाँ प्रधान न ज्ञेय है और न अव्यक्तशब्दसे निर्दिष्ट ही है॥ ५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.४.६ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

1.4.6 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ६

सूत्र १.४.६

त्रयाणाम् एव चैवम् उपन्यासः प्रश्नश् च ॥ १.४.६ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 325

पदच्छेद — त्रयाणाम् , एव , च , एवम् , उपन्यासः , प्रश्नः , च

सूत्रार्थ — ( एवम् ) पूर्व और उत्तर वाक्योंके पर्यालोचनसे ( त्रयाणामेव ) अग्नि, जीव और परमात्मा इन तीनोंका ही ( उपन्यास ) वक्तव्यरूप से उपन्यास है। ( प्रश्नश्च ) और प्रश्न भी उनके विषयमें है, इसलिए प्रधान अव्यक्तशब्द वाच्य नहीं है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च न प्रधानस्याव्यक्तशब्दवाच्यत्वं ज्ञेयत्वं वा यस्मात्त्रयाणामेव पदार्थानामग्निजीवपरमात्मनामस्मिन्ग्रन्थे कठवल्लीषु वरप्रदानसामर्थ्याद्वक्तव्यतयोपन्यासो दृश्यते तद्विषय एव च प्रश्नः नातोऽन्यस्य प्रश्न उपन्यासो वास्ति तत्र तावत् स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् इत्यग्निविषयः प्रश्नः येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।

एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः इति जीवविषयः प्रश्नः अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद इति परमात्मविषयः प्रतिवचनमपि लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा इत्यग्निविषयम् हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्। यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम। योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।

स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् इति व्यवहितं जीवविषयम् न जायते म्रियते वा विपश्चित् इत्यादिबहुप्रपञ्चं परमात्मविषयम्। नैवं प्रधानविषयः प्रश्नोऽस्ति। अपृष्टत्वाच्चानुपन्यसनीयत्वं तस्येति।। अत्राह योऽयमात्मविषयः प्रश्नः येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्ति इति किं स एवायम् अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात् इति पुनरनुकृष्यते किं वा ततोऽन्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्यत इति।

किं चातः स एवायं प्रश्नः पुनरनुकृष्यत इति यद्युच्येत तदा द्वयोरात्मविषययोः प्रश्नयोरेकतापत्तेरग्निविषय आत्मविषयश्च द्वावेव प्रश्नावित्यतो न वक्तव्यं त्रयाणां प्रश्नोपन्यासाविति अथान्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्यत इत्युच्येत ततो यथैव वरप्रदानव्यतिरेकेण प्रश्नकल्पनायामदोषः एवं प्रश्नव्यतिरेकेणापि प्रधानोपन्यासकल्पनायामदोषः स्यादिति।।

अत्रोच्यते नैवं वयमिह वरप्रदानव्यतिरेकेण प्रश्नं कंचित्कल्पयामः वाक्योपक्रमसामर्थ्यात् वरप्रदानोपक्रमा हि मृत्युनचिकेतःसंवादरूपा वाक्यप्रवृत्तिः आ समाप्तेः कठवल्लीनां लक्ष्यते मृत्युः किल नचिकेतसे पित्रा प्रहिताय त्रीन्वरान्प्रददौ नचिकेताः किल तेषां प्रथमेन वरेण पितुः सौमनस्यं वव्रे द्वितीयेनाग्निविद्याम् तृतीयेनात्मविद्याम् येयं प्रेते इति वराणामेष वरस्तृतीयः इति लिङ्गात्।

तत्र यदि अन्यत्र धर्मात् इत्यन्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्येत ततो वरप्रदानव्यतिरेकेणापि प्रश्नकल्पनाद्वाक्यं बाध्येत।

ननु प्रष्टव्यभेदादपूर्वोऽयं प्रश्नो भवितुमर्हति अपूर्वो हि प्रश्नो जीवविषयः येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्ति नास्तीति विचिकित्साभिधानात् जीवश्च धर्मादिगोचरत्वात् न अन्यत्र धर्मात् इति प्रश्नमर्हति प्राज्ञस्तु धर्माद्यतीतत्वात् अन्यत्र धर्मात् इति प्रश्नमर्हति प्रश्नच्छाया च न समाना लक्ष्यते पूर्वस्यास्तित्वनास्तित्वविषयत्वात् उत्तरस्य धर्माद्यतीतवस्तुविषयत्वाच्च तस्मात्प्रत्यभिज्ञानाभावात्प्रश्नभेदः न पूर्वस्यैवोत्तरत्रानुकर्षणमिति चेत् न जीवप्राज्ञयोरेकत्वाभ्युपगमात् भवेत्प्रष्टव्यभेदात्प्रश्नभेदो यद्यन्यो जीवः प्राज्ञात्स्यात् न त्वन्यत्वमस्ति तत्त्वमसि इत्यादिश्रुत्यन्तरेभ्यः इह च अन्यत्र धर्मात् इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनम् न जायते म्रियते वा विपश्चित् इति जन्ममरणप्रतिषेधेन प्रतिपाद्यमानं शारीरपरमेश्वरयोरभेदं दर्शयति सति हि प्रसङ्गे प्रतिषेधो भागी भवति प्रसङ्गश्च जन्ममरणयोः शरीरसंस्पर्शाच्छारीरस्य भवति न परमेश्वरस्य तथा स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति इति स्वप्नजागरितदृशो जीवस्यैव महत्त्वविभुत्वविशेषणस्य मननेन शोकविच्छेदं दर्शयन्न प्राज्ञादन्यो जीव इति दर्शयति प्राज्ञविज्ञानाद्धि शोकविच्छेद इति वेदान्तसिद्धान्तः तथाग्रे यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति इति जीवप्राज्ञभेददृष्टिमपवदति तथा जीवविषयस्यास्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्यानन्तरम् अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व इत्यारभ्य मृत्युना तैस्तैः कामैः प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता यदा न चचाल तदैनं मृत्युरभ्युदयनिःश्रेयसविभागप्रदर्शनेन विद्याविद्याविभागप्रदर्शनेन च विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त इति प्रशस्य प्रश्नमपि तदीयं प्रशंसन्यदुवाच तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्।

अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति इति तेनापि जीवप्राज्ञयोरभेद एवेह विवक्षित इति गम्यते यत्प्रश्ननिमित्तां च प्रशंसां महतीं मृत्योः प्रत्यपद्यत नचिकेताः यदि तं विहाय प्रशंसानन्तरमन्यमेव प्रश्नमुपक्षिपेत् अस्थान एव सा सर्वा प्रशंसा प्रसारिता स्यात् तस्मात् येयं प्रेते इत्यस्यैव प्रश्नस्यैतदनुकर्षणम् अन्यत्र धर्मात् इति।

यत्तु प्रश्नच्छायावैलक्षण्यमुक्तम् तददूषणम् तदीयस्यैव विशेषस्य पुनः पृच्छ्यमानत्वात् पूर्वत्र हि देहादिव्यतिरिक्तस्यात्मनोऽस्तित्वं पृष्टम् उत्तरत्र तु तस्यैवासंसारित्वं पृच्छयत इति यावद्ध्यविद्या न निवर्तते तावद्धर्मादिगोचरत्वं जीवस्य जीवत्वं च न निवर्तते तन्निवृत्तौ तु प्राज्ञ एव तत्त्वमसि इति श्रुत्या प्रत्याय्यते न चाविद्यावत्त्वे तदपगमे च वस्तुनः कश्चिद्विशेषोऽस्ति यथा कश्चित्संतमसे पतितां कांचिद्रज्जुमहिं मन्यमानो भीतो वेपमानः पलायते तं चापरो ब्रूयात् मा भैषीः नायमहिः रज्जुरेवेति स च तदुपश्रुत्याहिकृतं भयमुत्सृजेद्वेपथुं पलायनं च न त्वहिबुद्धिकाले तदपगमकाले च वस्तुनः कश्चिद्विशेषः स्यात् तथैवैतदपि द्रष्टव्यम् ततश्च न जायते म्रियते वा इत्येवमाद्यपि भवत्यस्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्य प्रतिवचनम्।

सूत्रं त्वविद्याकल्पितजीवप्राज्ञभेदापेक्षया योजयितव्यम् एकत्वेऽपि ह्यात्मविषयस्य प्रश्नस्य प्रायणावस्थायां देहव्यतिरिक्तास्तित्वमात्रविचिकित्सनात्कर्तृत्वादिसंसारस्वभावानपोहनाच्च पूर्वस्य पर्यायस्य जीवविषयत्वमुत्प्रेक्ष्यते उत्तरस्य तु धर्माद्यत्ययसंकीर्तनात्प्राज्ञविषयत्वमिति। ततश्च युक्ता अग्निजीवपरमात्मकल्पना प्रधानकल्पनायां तु न वरप्रदानं न प्रश्नो न प्रतिवचनमिति वैषम्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस कारण से भी प्रधान अव्यक्तशब्द वाच्य अथवा ज्ञेय नहीं है, क्योंकि वर प्रदान सामर्थ्य से इस कठवल्ली ग्रन्थमें वक्तव्यरूपसे अग्नि, जीव और परमात्मा इन तीन पदार्थोंका हो तद्विषय एव च प्रश्नः। नातोऽन्यस्य प्रश्न उपन्यासो वाऽस्ति। तत्र तावत् ' सत्वमग्निंस्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ' ( का ० १ | १ | १३ ) इत्यग्निविषयः प्रश्नः। ' येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।

एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः॥ ' ( का ० १ | १ | २० ) इति जीवविषयः प्रश्नः। ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यन्त्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥ ' ( का ० १ | २ | १४ ) इति परमात्मविषयः। प्रतिवचनमपि ' लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा। ' ( का ० १1१1१५ ) इत्यग्निविषयम्। ' हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्। यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।

स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ' ( का ० २।५।६, ७ ) इति। व्यवहितं जीवविषयम्। ' न जायते म्रियते वा विपश्चित् ' ( का ० १।२।१८ ) इत्यादिबहुउपन्यास देखा जाता है और तद्विषयक ही प्रश्न है, इससे अन्यका प्रश्न अथवा उपन्यास नहीं है। उनमेंसे ‘ स त्वमग्नि ० ' ( नचिकेता - हे मृत्यो! तुम स्वर्गके साधन भूत अग्निको जानते हो, सो मुझ श्रद्धालुके प्रति उसका वर्णन करो ) यह अग्निविषयक प्रश्न है।

' येयं प्रेते ० ' ( मृतक मनुष्य के विषयमें जो यह सन्देह है— कुछ लोग कहते हैं कि देह आदि संघातसे अतिरिक्त देहान्तर सम्बन्धी आत्मा है, कुछ एक कहते हैं कि इस प्रकारका आत्मा नहीं है, तुमसे उपदेशको प्राप्त हुआ मैं इसे जान सकूँ वशेंमें शेष यह तीसरा वर है ) यह जीवविषयक प्रश्न है। ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( जो धर्मसे भिन्न, अधर्मसे मिन्न, कार्य - कारणसे अन्य भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान से अन्य है ऐसा तुम जिसे देखते हो उसे मुझसे कहो ) यह परमात्मविषयक प्रश्न है।

प्रतिवचन भी ' लोकादिमनि ० ' ( तब यमराजने लोकोंके कारणभूत उस अग्निका तथा उसके चयन करनेमें जैसे बौर जितनी ईटें होती हैं और जिस प्रकार स्थण्डिलमें उसका चयन किया जाता है उन सबका नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया ) यह अग्नि विषयक उत्तर है। ' हन्त त इदं ० ' ( हे गौतम! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन करूँगा, तथा [ ब्रह्मको न जाननेसे ] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है [ वह भी बताऊँगा ]।

अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार कितने देही तो शरीर धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर - भावको प्राप्त हो जाते हैं ) यह व्यवधानसे [ अविद्यासे आच्छादित ] जीव विषयक उत्तर है। ' न जायते ० ' ( यह विद्वान् न उत्पन्न होता है न मरता है ) इत्यादि बहुत विस्तृत परमात्मा विषयक प्रतिवचन है। इस प्रकार प्रधान विषयक प्रश्न नहीं है। अपृष्ट होनेसे उपन्यासके योग्य भी नहीं है।

यहाँ पूर्वपक्षी कहते हैं - ' येयं प्रेते ० ' यह जो आत्मविषयक प्रश्न है, क्या उसकी ' अन्यत्र धर्माद ० ' यहाँ पुनः अनुवृत्ति है अथवा उससे अन्य यह अपूर्व - नवीन प्रश्न उठाया जाता है? इससे प्रकरण में क्या आया? [ येयं प्रेते ] उस प्रश्नको [ अन्यत्र धर्माद ] इसमें अनुवृत्ति है, ऐसा यदि कहो, तो आत्मविषयक दो प्रश्नोंमें अभेद होनेसे अग्नि विषयक और आत्मविषयक इस प्रकार दो ही प्रश्न होते हैं, अतः ऐसा नहीं कहना चाहिए कि तीन पदार्थं विषयक ही प्रश्न और उपन्यास है।

ऐसा यदि कहो कि यह अपूर्वं प्रश्न उठाया जाता है तो जैसे वर प्रदानसे अतिरिक्त प्रश्नकी कल्पना में [ तुमको ] दोष नहीं है, वैसे ही प्रश्नके विना भी प्रधानके उपन्यासकी कल्पनामें हमें दोष नहीं है। इस पर सिद्धान्ती कहते - यहाँ हम इस प्रकार वर प्रदान के अतिरिक्त किसी भी प्रश्नकी कल्पना नहीं करते, क्योंकि वाक्यके उपक्रमकी सामर्थ्यं ही ऐसी है। वर प्रदान से लेकर कठवल्लीकी समाप्ति पर्यन्त यमराज और नचिकेताकी संवादरूप वाक्यप्रवृत्ति ऐसी ही लक्षित होती है।

पिता द्वारा भेजे हुए नचिकेताको यमराज ने तीन वर दीये | उनमें से प्रथम वरसे नचिकेताने पिताकी प्रसन्नता माँगी, द्वितीयसे अग्निविद्या और तृतीयसे आत्मविद्या, क्योंकि ' येयं प्रेते ' और ' वराणामेष ' ऐसा श्रुति लिङ्ग है। उनमें ' अन्यत्र धर्मात् ' यदि यह नवीन प्रश्न उठाया जाय तो वर प्रदानसे अतिरिक्त प्रश्नकी कल्पना होनेसे उपक्रम वाक्यका वाघ हो जायगा। परन्तु [ जीव और ईश्वर रूप ] प्रष्टव्य पदार्थ के भेद होनेसे [ ' अन्यत्र धर्मात् ' ] यह प्रश्न नवीन हो सकता है।

पूर्वं प्रश्न जीव विषयक है, क्योंकि ' येयं प्रेते ' इस मन्त्रमें मृतक मनुष्यके विषय में देहादि संघातसे भिन्न आत्मा है अथवा नहीं है ' इस प्रकारकी शङ्काका अभिधान है। और जीव धर्म आदिका आश्रय होनेसे ' अन्यत्र धर्मात् ' इस प्रश्नके योग्य नहीं है। प्राज्ञ तो धर्मादिसे संतीत होनेके कारण ' अन्यत्र धर्मात् ' इस प्रश्नके योग्य है।

[ केवल प्रष्टव्य भेदसे प्रश्नका भेद नहीं है ] किन्तु दोनों मन्त्रों में प्रश्न सादृश्य भी समान लक्षित नहीं होता, क्योंकि ' येयं प्रेते ' यह पूर्व प्रश्न अस्ति तथा नास्ति ( है या नहीं है ) विषयक है और ' अन्यत्र धर्मात् ' यह उत्तर प्रश्न धर्मादि अतीत वस्तु विषयक है | अतः पूर्वमन्त्र में प्रतिपादित वस्तुके उत्तर मन्त्रमें प्रत्यभिज्ञान के अभाव होनेसे प्रश्नों में परस्पर भेद हैं, ऐसा यदि कहो कि पूर्व प्रश्नकी उत्तर वाक्यमें अनुवृत्ति नहीं है, तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि जीव और प्राज्ञमें एकत्व स्वीकार किया गया है, यदि जीव प्राज्ञसे अन्य होता तो प्रष्टव्यके भेदसे प्रश्नका भेद होता, परन्तु ' तत्त्वमसि ' इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता है कि दोनों भेद नहीं है, यहाँ भी ' अन्यत्र धर्मात् ' इस प्रश्नका ' न जायते म्रियते ० ', ( विद्वान् न जन्मता है न मरता है ) इस प्रकार जन्म - मरणके प्रतिषेधसे प्रतिपाद्यमान प्रतिवचन जीव और परमेश्वरका अभेद दिखलाता है।

जन्म - मरणका प्रसङ्ग होनेपर ही प्रतिषेध युक्त होता है। शरीर के साथ सम्बन्धके होनेसे जीवात्मामें जन्म - मरणका प्रसङ्ग होता है परमेश्वरमें नहीं होता।

उसी प्रकार ' स्वप्रान्त जागरितान्तं ० ' ( जिसके द्वारा स्वप्न में प्रतीत होनेवाले तथा जाग्रत्में दिखाई देनेवाले दोनों प्रकारके पदार्थों को देखता है उस महान् और विभु आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ) इस प्रकार स्वप्न और जाग्रत् पदार्थों को देखनेवाले महत्त्व एवं विभुत्व विशिष्ट जीवके चिन्तनसे ही शोककी अत्यन्त निवृत्ति दिखलाते हुए यमराज प्राज्ञ - परमात्मासे जीव भिन्न नहीं है ऐसा दिखलाते हैं। यह वेदान्त सिद्धान्त है कि प्राज्ञके विज्ञानसे ही शोकका नाश होता है।

उसी प्रकार आगे ' यदेवेह ० ' ( जो तत्त्व इस - देहेन्द्रिय संघात में भासता है वही अन्यत्र - देहादिसे परे भी है और जो अन्यत्र है वही इसमें है। जो मनुष्य इस तत्त्वमें नानात्व - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको - जन्म मरणको प्राप्त होता है ) इस प्रकार यह मन्त्र जीव और प्राज्ञमें भेददृष्टिका निषेध करता है। इस प्रकार नचिकेताके जीव विषयक अस्तित्व, नास्तित्व ( है, नहीं है ) प्रश्नके अनन्तर ' अभ्यं वरं ० ' ( हे नचिकेता!

आत्मविषयक वरको छोड़कर अन्य वर मांगो ) ऐसा आरम्भकर यमराजद्वारा पुत्र दारा आदि अनेक तत् तत् कामनाओंसे अत्यन्त प्रलोभित किया गया भी नचिकेता जब अपने वरसे विचलित न हुआ तब धर्मराजने अभ्युदय और मोक्ष के विभाग - भेद के प्रदर्शनसे तथा विद्या और अविद्याके विभागके प्रदर्शन से ' विद्याभीप्सिनं ० ' ( का ० १/२/४ ) इति प्रशस्य प्रश्नमपि तदीयं प्रशंसन्यदुवाच तं दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्।

अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति || ' ( का ० १/२/१२ ) ( मैं तुझ नचिकेताको विद्याभिलाषी मानता हूँ ; क्योंकि तुझे बहुतसे भोगोंने भी नहीं लुभाया ) इस प्रकार नचिकेताकी प्रशंसा कर उसके प्रश्नकी भी प्रशंसा करते हुए ' तं दुर्दर्श ० ' ( उस कठिनतासे दोख पड़नेवाले, गूढ़ स्थानमें अनुप्रविष्ट, गुहा - बुद्धि में स्थित, गह्वर अनेक अनर्थोंसे व्याप्त देहमें स्थित, पुरातन देवको अध्यात्मयोगकी प्राप्ति द्वारा जानकर धी- बुद्धिमान् पुरुष हर्ष - शोकको त्याग देता है ) ऐसा कहा है।

इससे भी ऐसा ज्ञात होता है कि जीव और प्राज्ञ- परमात्माका अभेद ही यहां विवक्षित है। जिस प्रश्नके कारण मृत्युने नचिकेताकी महती प्रशंसाको यदि नचिकेता उसको छोड़कर प्रशंसाके अनन्तर अन्य ही प्रश्नको उठाता तो वह सब प्रशंसा अनुपयुक्त स्थानमें ही प्रसारित होगी अर्थात् अनुपयुक्त स्थानमें की जानेके कारण व्यर्थ हो जायगी, इसलिए ' येयं प्रेते ' इस प्रश्नकी ही ' अन्यत्र धर्मात् ' इस मन्त्रमें अनुवृत्ति है।

जो यह कहा गया है कि दोनों प्रश्नों में सादृश्य न होनेके कारण वैलक्षण्य है, वह दोष नहीं है, क्योंकि उसीका विशेष पुनः पूछा गया है। पूर्ववाक्य ' येयं प्रेते, में देहादिसे अतिरिक्त आत्माका अस्तित्व ही पूछा गया है और उत्तर मन्त्र ( अन्यत्र धर्मात् ) में तो उसीका असंसारित्व पूछा जाता है, इसलिए जब तक अविद्या निवृत्त नहीं होती तब तक जीवमें धर्मादि आश्रयत्व और जीवत्व निवृत्त नहीं होते।

उसकी निवृत्ति होने पर तो वह प्राज्ञ ही है, ऐसी ' तत्त्वमसि ' इसप्रकारकी श्रुतिसे प्रतीति कराई जाती है। अविद्याके योगसे अथवा अविद्या के निवृत्त होनेसे वस्तुमें कुछ भी विशेष नहीं आता। जैसे अंधकार में पड़ी किसी रज्जुमें सर्प समझकर कोई पुरुष मयसे काँपता हुआ वहाँसे भागता है। उससे यदि कोई अन्य विज्ञपुरुष कहे कि मय मत करो यह सर्प नहीं है किन्तु रज्जु है, तब वह पुरुष उसका वचन सुनकर सर्पज्ञान जन्य मय, कँपन और पलायन त्याग देता है।

परन्तु सर्प बुद्धि कालमें अथवा उसकी निवृत्तिकाल में वस्तु ( रज्जुमें ) कोई विशेषता नहीं है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिए। इसके अतिरिक्त जीव ब्रह्मके अभेद होनेसे ' न जायते म्रियते वा ' इत्यादि भी अस्तित्व प्रश्नका प्रतिवचन है। [ जीव ब्रह्म एक होनेपर भी ] अविद्यासे कल्पित जीव ब्रह्म भेदकी अपेक्षा सूत्रकी योजना करनी चाहिए।

यद्यपि आत्मविययक प्रश्न एक ही है तो भी मरणावस्था में देहसे भिन्न आत्मा में अस्तित्वमात्रका संशय होने तथा कर्तृत्वादि संसार स्वभावका निषेध न होने से पूर्व पर्याय ( ( प्रश्न ) में जीव विषयक उत्प्रेक्षाकी जाती है। उत्तर पर्याय में तो धर्मादिके राहित्यका प्रतिपादन होनेसे वह प्राज्ञविषयक है। इसलिए अग्नि, जीव और परमात्माकी कल्पना युक्त है। प्रधानकी कल्पना में तो न वर प्रदान है, न प्रश्न है और न प्रतिवचन है, इस प्रकारकी यहाँ विषमता है || ६ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस कठवल्ली ग्रन्थमें प्रधानके विषयमें न प्रश्न है और न उत्तर ही, इससे भी प्रधान अव्यक्तशब्द वाच्य नहीं है। इसी बात को ' त्रयाणामेव ' इस सूत्र से भगवान् सूत्रकार दिखलाते हैं।

* यमराज और नचिकेताके संवादरूप वाक्योंकी प्रवृत्तिसे यही सिद्ध होता है कि ' येयं प्रेते ० ' ' अन्यत्र धर्माद ० ' इन दोनों मन्त्रों में आत्मविषयक एक ही प्रश्न है दो नहीं, जिसके आधारपर प्रधान विषयक नवीन प्रश्नकी कल्पनाकी जाय। अतः यहाँ प्रधानका अवकाश नहीं है।

* पूर्वपक्षी - जीव विषयक प्रश्नमें देहादि संघातसे भिन्न आत्मा है अथवा नहीं है, यह संशय और धर्म आदिका आश्रयत्व प्रतीत होता है और परमात्मा धर्मादि से अतीत है, इस प्रकार प्रष्टव्य के भेदसे प्रश्नोंका परस्पर भेद है। किश्व ' येयं प्रेते ० ' और ' अन्यत्र धर्माद ० ' इन दोनों मन्त्रों में प्रश्नोंके सादृश्यके अमावसे भी प्रश्नोंका भेद है। इससे पिताकी प्रसन्नता, अग्निविद्या, जीवविद्या और परमात्मविषयक विद्या इन चार प्रश्नोंकी कल्पना करनी पड़ेगी, तदनुसार उत्तर भी चार होंगे, ऐसा मानने से उपक्रम वाक्यका बाध होगा। जैसे यहाँ नवीन चतुर्थ प्रश्नकी कश्पनाकी गई है, वैसे हम भी प्रधानकी सिद्धि मानते हैं। सिद्धान्ती - ' जीवप्राज्ञयोः ' आदिसे समाधान करते हैं।

* यदि जीव परमेश्वरसे भिन्न होता तो ' येयं प्रेते ' इस प्रश्नका परमेश्वर विषयक ' तं दुर्दर्श गूढ़ ० ' यह उत्तर किस प्रकार संगत होता, अतः दोनों मन्त्र एक आत्मविषयक हैं और उनमें आत्मविषयक एक ही प्रश्न है। ' उदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति ' ( जो उस प्रत्यगभिन्न ब्रह्मतत्त्वमें अल्पसा भेद करता है उसे संसार भय प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुतियों में भेदकी निन्दा और भेददर्शीको जन्म - मरणमय संसारकी प्राप्ति कही गई है। इसलिए यहाँ जीव - ब्रह्मका अभेद ही विवक्षित है।

* जीव ब्रह्मका अभेद होने से ब्रह्मविषयक प्रश्नका तृतीय वरमें अन्तर्भाव है। प्रधानकी कल्पना में तो कोई भी वर प्रदानादि नहीं हैं, और प्रधान अनात्मा है, अतः उसका आत्मविषयक तृतीय वरमें अन्तर्भाव भी सम्भव नहीं है, यही प्रधानमें विषमता है। इससे प्रधान अव्यक्त शब्द वाच्य नहीं है || ६

1.4.7 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ७

सूत्र १.४.७

महद्वच् च ॥ १.४.७ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 330

पदच्छेद — महद्वत् च

सूत्रार्थ — ' बुद्धेरात्मा महान् पर : ' इसमें पठित " महत् " शब्द जैसे सांख्याभिमत तत्त्वका वाचक नहीं है, वैसे वैदिक अव्यक्तशब्द भी प्रधानका वाचक नहीं है।

शाङ्करभाष्य

यथा महच्छब्दः सांख्यैः सत्तामात्रेऽपि प्रथमजे प्रयुक्तः न तमेव वैदिकेऽपि प्रयोगेऽभिधत्ते बुद्धेरात्मा महान्परः महान्तं विभुमात्मानम् वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् इत्येवमादावात्मशब्दप्रयोगादिभ्यो हेतुभ्यः तथाव्यक्तशब्दोऽपि न वैदिके प्रयोगे प्रधानमभिधातुमर्हति। अतश्च नास्त्यानुमानिकस्य शब्दवत्त्वम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जैसे सांख्याचार्यों द्वारा सत्तामात्र, प्रथमोत्पन्न महत्तत्त्व अर्थ में प्रयुक्त महत् शब्द ' बुद्धेरात्मा ' ' ० ( बुद्धिसे महान आत्मा श्रेष्ठ है ) ' महान्तं ० ' ( महान् विभु आत्माको ) ' वेदाहमेतं ० ' ( मैं इस महान् पुरुषको जानता हूँ ) इत्यादिमें आत्मशब्द प्रयोग आदि हेतुओंसे वैदिक प्रयोगमें उसी अर्थ अभिधान नहीं करता, उसी प्रकार अव्यक्त शब्द मी वैदिक प्रयोगमें प्रधानका अभिधान नहीं कर सकता, इसलिए अनुमानगम्य प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है || ७ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' श्रौतः अव्यक्तशब्दो न सांख्या साधारणतत्त्वगोचरः वैदिकशब्दत्वात् महच्छब्दवत् '। ' श्रौत अव्यक्त शब्द सांख्यके असाधारण प्रधानतत्त्वका प्रतिपादन नहीं करता है, क्योंकि वैदिक शब्द है, जैसे महत् शब्द। ' इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है॥७

चमसाधिकरण

1.4.8 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ८

सूत्र १.४.८

चमसवदविशेषात् ॥ १.४.८ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 330

पदच्छेद — चमसवत् , अविशेषात्

सूत्रार्थ — ( चमसवत् ) ' अर्वाग्बिलश्चमसः ' चमस ( यज्ञपात्र ) के समान ( अविशेषात् ) अविशेष होने से श्रुतिपठित अजाशब्द भी प्रधानका वाचक नहीं है अर्थात् जैसे अर्वाग्बिलत्व सामान्य धर्मं हेनेसे चमसका वाचक नहीं है, वैसे अजात्व धर्म मी सामान्य होने से प्रधानका वाचक नहीं है।

शाङ्करभाष्य

पुनरपि प्रधानवादी अशब्दत्वं प्रधानस्यासिद्धमित्याह कस्मात् मन्त्रवर्णात् अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां वह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः।

अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः इति अत्र हि मन्त्रे लोहितशुक्लकृष्णशब्दैः रजःसत्त्वतमांस्यभिधीयन्ते लोहितं रजः रञ्जनात्मकत्वात् शुक्लं सत्त्वम् प्रकाशात्मकत्वात् कृष्णं तमः आवरणात्मकत्वात् तेषां साम्यावस्था अवयवधर्मैर्व्यपदिश्यते लोहितशुक्लकृष्णेति न जायत इति च अजा स्यात् मूलप्रकृतिरविकृतिः इत्यभ्युपगमात् नन्वजाशब्दश्छाग्यां रूढः बाढम् सा तु रूढिरिह नाश्रयितुं शक्या विद्याप्रकरणात् सा च बह्वीः प्रजास्त्रैगुण्यान्विता जनयति तां प्रकृतिमज एकः पुरुषो जुषमाणः प्रीयमाणः सेवमानो वा अनुशेतेतामेवाविद्यया आत्मत्वेनोपगम्य सुखी दुःखी मूढोऽहमित्यविवेकितया संसरति अन्यः पुनरजः पुरुष उत्पन्नविवेकज्ञानो विरक्तो जहात्येनां प्रकृतिं भुक्तभोगां कृतभोगापवर्गां परित्यजति मुच्यत इत्यर्थः तस्माच्छ्रुतिमूलैव प्रधानादिकल्पना कापिलानामित्येवं प्राप्ते ब्रूमः नानेन मन्त्रेण श्रुतिमत्त्वं सांख्यवादस्य शक्यमाश्रयितुम् न ह्ययं मन्त्रः स्वातन्त्र्येण कंचिदपि वादं समर्थयितुमुत्सहते सर्वत्रापि यया कयाचित्कल्पनया अजात्वादिसंपादनोपपत्तेः सांख्यवाद एवेहाभिप्रेत इति विशेषावधारणकारणाभावात्।

चमसवत् यथा हि अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः इत्यस्मिन्मन्त्रे स्वातन्त्र्येणायं नामासौ चमसोऽभिप्रेत इति न शक्यते नियन्तुम् सर्वत्रापि यथाकथंचिदर्वाग्बिलत्वादिकल्पनोपपत्तेः एवमिहाप्यविशेषः अजामेकाम् इत्यस्य मन्त्रस्य नास्मिन्मन्त्रे प्रधानमेवाजाभिप्रेतेति शक्यते नियन्तुम्।। तत्र तु इदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुद्ध्नः इति वाक्यशेषाच्चमसविशेषप्रतिपत्तिर्भवति इह पुनः केयमजा प्रतिपत्तव्येत्यत्र ब्रूमः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रधानवादी फिर भी कहता है कि प्रधानको शब्द - श्रुतिसे अप्रतिपादित कहना असिद्ध है, किससे? इससे कि ' अजामेकां ' ० ( अपने अनुरूप बहुत - सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली, लोहित, शुक्ल, कृष्ण वर्णा एक अजा ( बकरी - प्रकृति ) को एक अज ( बकरा - जीव ) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा अज उस भुक्त भोगाको त्याग देता है ) ऐसा मन्त्र है। इसी मन्त्रमें लोहित, शुक्ल, और कृष्णशब्दोंसे रज, सत्त्व और तमका अभिधान होता है।

लोहित, रागात्मक होनेसे रज, शुक्ल प्रकाशात्मक होनेसे सत्त्व और कृष्ण आवरकात्मक होनेसे तम है। उनके अवयव धर्मोसे लोहित, शुक्ल, कृष्णरूप साम्यावस्था कही जाती है। ' न जायते इति अजा ' ' जो उत्पन्न नहीं होती वह अजा है ' क्योंकि ' मूलप्रकृतिरविकृति : ' ( मूलप्रकृति किसीका कार्य नहीं होती ) ऐसा सांख्य लोग स्वीकार करते हैं। परन्तु अजाशब्द तो बकरीमें रूढ है? यह सत्य है, परन्तु यहाँ उस रूढिका आश्रय ग्रहण नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह विद्याका प्रकरण है।

वह अजा अपने अनुरूप त्रिगुणान्वित - सुख, दुःख मोहात्मक देव मनुष्य पशु आदि बहुत प्रजाओंको जन्म देती है। एक अज - पुरुष उस प्रकृति पर प्रेम रखता हुआ और उसका सेवन करता हुआ उसके पास शयन करता है अर्थात् अविद्यासे उसीको आत्मरूप से मानकर ' मैं सुखी ' दुःखी एवं मूढ हूँ ' इस प्रकार अविवेकसे जन्म मरणको प्राप्त होता है।

परन्तु उत्पन्न हुए विवेक ज्ञानवाला अन्य अज - विरक्त पुरुष जिसने भोग और अपवर्ग सम्पादनकर लिया है, ऐसी भुक्त मोगा प्रकृतिका परित्याग करता है उससे मुक्त हो जाता है, ऐसा अर्थ है। इसलिए कपिलमतानुयायियोंकी प्रधानादि कल्पना श्रुतिमूलक ही है। सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' अजामेकां ' इस मन्त्रसे सांख्यवाद श्रुति प्रतिपादित है ऐसा स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मन्त्र स्वतन्त्ररूप से किसी भी वादका समर्थन करने में उत्साह नहीं करता।

सभी वादोंमें जिस किसी कल्पनासे अजात्वादिका सम्पादनः उपपन्न होता है। सांख्यवाद ही यहाँ अभिप्रेत है ऐसा विशेषका निश्चायक कोई कारण प्रमाण नहीं है। चमसके समान।

' अर्वाग्बिलश्चमस ' ( जो नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है ) इस मन्त्र में स्वतन्त्ररूपसे यह चमस नामक यज्ञपात्र अभिप्रेत है ऐसा निरूपण नहीं किया जा सकता, क्योंकि सर्वत्र हि किसी न किसी प्रकार अर्वाग्विलत्वकी कल्पना हो सकती है ; वैसे यहाँ भी ' अजामेकां ' इस मन्त्रमें कोई विशेष अर्थं प्रतिपादित नहीं है, इसलिए इस मन्त्रमें अजाशब्दसे प्रधान ही अभिप्रेत है, ऐसा नियमन नहीं किया जा सकता॥ ८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सिद्धान्तमें पहले अव्यक्तशब्दसे स्थूलशरीरका ग्रहण किया गया है, अब लोहित आदि धर्मवाचक पदोंसे तेज, जल और अन्न ( पृथिवी ) रूप धर्मीको मगवान् सूत्रकार दिखलाते हैं। इस अधिकरणका ' अजा ' पद विषय है। विद्याके प्रकरण में रूढि अर्थका सम्भव न होनेसे यौगिक ' अजा ' पद प्रधान परक है अथवा मायापरक है? ऐसा संशय होनेपर पूर्वाधिकरण में केवल अव्यक्तः शब्दसे प्रधानकी प्रत्यभिज्ञा न होनेपर भी यहाँ तो त्रिगुणत्व आदि लिङ्गोंसे युक्त प्रधानकी प्रत्यभिज्ञा होनी चाहिए। इस प्रकार प्रत्युदाहरणसंगति से ' पुनरपि ' इत्यादिसे पूर्वपक्षको उपस्थित करते हैं॥ ८

1.4.9 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ९

सूत्र १.४.९

ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्य् अधीयत एके ॥ १.४.९ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 332

पदच्छेद — ज्योतिरुपक्रमा , तु , तथा , हि , अधीयते , एके

सूत्रार्थ — ( ज्योतिरुपक्रमा ) तेज जिसके उपक्रम - आरम्भ में है उसी तेज, जल और जन्नरूप प्रकृतिका ही अजाशब्दसे निश्चय करना चाहिए, प्रधानका नहीं, ( हि ) क्योंकि ( तथा ) वैसे ही ( एके ) छान्दोग तेज, जल और अन्नरूप प्रकृतिका रोहित आदि रूप ( अधीयते ) कहते हैं। ( तु ) शब्द अवधारणार्थक है।

शाङ्करभाष्य

परमेश्वरादुत्पन्ना ज्योतिःप्रमुखा तेजोबन्नलक्षणा चतुर्विधस्य भूतग्रामस्य प्रकृतिभूतेयमजा प्रतिपत्तव्या। तुशब्दोऽवधारणार्थः भूतत्रयलक्षणैवेयमजा विज्ञेया न गुणत्रयलक्षणा।

कस्मात् तथा ह्येके शाखिनस्तेजोबन्नानां परमेश्वरादुत्पत्तिमाम्नाय तेषामेव रोहितादिरूपतामामनन्ति यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्य इति तान्येवेह तेजोबन्नानि प्रत्यभिज्ञायन्ते रोहितादिशब्दसामान्यात् रोहितादीनां च शब्दानां रूपविशेषेषु मुख्यत्वाद्भाक्तत्वाच्च गुणविषयत्वस्य असंदिग्धेन च संदिग्धस्य निगमनं न्याय्यं मन्यन्ते। तथेहापि ब्रह्मवादिनो वदन्ति।

किंकारणं ब्रह्म इत्युपक्रम्य ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् इति पारमेश्वर्याः शक्तेः समस्तजगद्विधायिन्या वाक्योपक्रमेऽवगमात् वाक्यशेषेऽपि मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इति यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः इति च तस्या एवावगमान्न स्वतन्त्रा काचित्प्रकृतिः प्रधानं नामाजामन्त्रेणाम्नायत इति शक्यते वक्तुम्।

प्रकरणात्तु सैव दैवी शक्तिरव्याकृतनामरूपा नामरूपयोः प्रागवस्था अनेनापि मन्त्रेणाम्नायत इत्युच्यते तस्याश्च स्वविकारविषयेण त्रैरूप्येण त्रैरूप्यमुक्तम्।। कथं पुनस्तेजोबन्नात्मना त्रैरूप्येण त्रिरूपा अजा प्रतिपत्तुं शक्यते यावता न तावत्तेजोबन्नेष्वजाकृतिरस्ति न च तेजोबन्नानां जातिश्रवणादजातिनिमित्तोऽप्यजाशब्दः संभवतीति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु उसमें तो ' इदं तच्छिर ' ० ( वह यह सिर है जो कि अधोमुख और ऊपरकी ओर उठा हुआ गोलाकार है ) इस प्रकार वाक्यशेषसे चमस विशेषकी प्रतीति होती है, किन्तु यहाँ अजापदसे किसको समझना चाहिए, इसपर हम कहते हैं--

जो परमेश्वरसे उत्पन्न हुई है, तेज प्रमुख तेज, जल एवं अन्नरूप है, जरायुज, आण्डज, स्वेदज, उद्भिज्जरूप चार प्रकारके भूत समूहका कारणरूप है वह यहाँ अजापदसे समझना चाहिए। सूत्रस्थ ' तु ' शब्द अवधारण ( निश्चय ) अर्थमें प्रयुक्त है। यह अजा तेज, जल, अन्न भूत त्रयात्मक समझनी चाहिए न कि गुणत्रयात्मक - प्रधान, क्योंकि उसी प्रकार छन्दोग शाखावाले तेज, जल और अन्नकी परमेश्वरसे उत्पत्ति कहकर ' यदग्नेरोहितं रूपं ० ' ( जो अग्निमें रोहित रक्त रूप है वह तेजका है, जो शुक्लरूप है वह जलका है, जो कृष्णरूप है वह अन्न- पृथिवीका है ) इस प्रकार उन तीनोंके ही रोहित आदि रूप कहते हैं। इस अजामन्त्रमें उन तेज, जल, और अन्नकी ही लोहित, शुक्ल और कृष्णरूपसे प्रत्यभिज्ञा होती है, क्योंकि रोहित आदि शब्द दोनों मन्त्रोंमें समान हैं। रोहितादि शब्द रूपविशेषोंमें मुख्य हैं और गुणविषयमें गौण हैं अर्थात् रोहित आदि शब्दोंका मुख्य अर्थं तो तेज आदिका रूप जाती है, रूप्य स्वविकार विषय ( आश्रय ) से उसको भी त्रैरूप्य कहा गया है || ९ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे ‘ अजामेकां ० ' इस मन्त्रमें अजा सम्पूर्ण कार्यकी प्रकृति कही गई है, वैसे छान्दोग्य श्रुतिमें प्रतिपादित तेज, जल और अन्न भी सम्पूर्ण कार्यके कारण कहे गये हैं, क्योंकि दोनों मन्त्रों में रोहित आदि शब्द समानरूपसे पाये जाते हैं, रोहित एवं लोहितका एक ही अर्थ है। छान्दोग्य श्रुति असंदिग्ध ' है, अत : उससे ' अजामेकां ' इस संदिग्ध वाक्यार्थका निर्णय करना न्याय संगत है, इसलिए अजापदसे भूत त्रयात्मक तेज, जल एवं अन्नका ही ग्रहण करना चाहिए, सांख्य अभिमत प्रधानका नहीं।

* ब्रह्मवादियोंने विचार किया कि शुद्ध ब्रह्मसे इस विचित्र नामरूपात्मक जगत्को उत्पत्ति तो असम्भव है, क्योंकि वह निर्विकार है। किञ्च ब्रह्मसे भिन्न केवल जड़से भी जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जड़में कार्य विषयक ज्ञान आदि नहीं होते, अतः मायारूप सहायक कारण सहित ब्रह्म जगत्का कारण है | अनभिव्यक्त नाम - रूप होनेके कारण मायाको अव्याकृत कहा गया है। माया एक होनेपर भी उसकी अविद्यारूप शक्तियाँ अनन्त हैं, वही उपाधि है। इस अविद्यारूप उपाधिसे ब्रह्म ही जीव कहलाता है, वस्तुतः जीव ब्रह्मसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है। मायाके विकार तेज, जल और अन्न ( पृथिवी ) ये क्रमसे रक्त, शुक्ल और कृष्णरूप हैं, इस प्रकार कार्यकी अपेक्षा माया भी रक्त, शुक्ल एवं कृष्णरूप कही जाती है। इसलिए ' अजामेकां ' इस मन्त्र से अव्याकृत मायाका ग्रहण करना युक्त है, प्रधानका नहीं || ९ ||

1.4.10 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १०

सूत्र १.४.१०

कल्पनोपदेशाच् च मध्वादिवदविरोधः ॥ १.४.१० ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 333

पदच्छेद — कल्पनोपदेशात् , च , मध्वादिवत् , अविरोधः

सूत्रार्थ — ( कल्पनोपदेशाच्च ) तेज, जल और अन्नरूप प्रकृतिमें सादृश्य सूचित करनेके लिए कल्पनासे अजात्वका उपदेश किया गया है, ( मध्वादिवत् ) जैसे मधु भिन्न आदित्य में मधुत्वका उपदेश है, वैसे अजा भिन्न प्रकृतिमें अजात्नका उपदेश होनेसे ( अविरोधः ) विरोध नहीं है, अतः प्रधान श्रुतिप्रतिपादित नहीं है। विशेष है सत्त्व आदि गुण तो गौण अर्थ है, और असंदिग्धवाक्यसे संदिग्धवाक्यार्थका निगमन - निर्णय करना न्याय्य संगत मानते हैं।

उसी प्रकार यहाँ भी ' ब्रह्मवादिनो ० ' ( ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं-जगत्का कारणभूत ब्रह्म कैसा है? ) ऐसा उपक्रमकर ' ते ध्यानयोगानुगता ० ' ( उन ऋषियोंने ध्यान योगका अनुवर्तनकर अपने गुणोंसे अत्यन्त छिपी हुई देवात्मशक्तिका साक्षात्कार किया ) इस प्रकार वाक्यके उपक्रममें सम्पूर्ण जगत्‌को उत्पन्न करनेवाली परमेश्वरकी शक्ति अवगत होती है।

वाक्यशेषमें मी ' मायां तु ० ' ( प्रकृतिको माया जानो और महेश्वरको मायावी ) और ' यो योनिं ० ' ( जो परमात्मा अकेला ही प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता है ) इस प्रकार उसी शक्तिकी अवगति होनेसे प्रधान नामकी कोई स्वतन्त्र प्रकृति अजामन्त्रसे कही जाती है ऐसा नहीं कहा जा सकता। ऐसा कहा जाता है कि प्रकरण से तो वही दैवी शक्ति अव्याकृत नामरूपवाली, नाम और रूपकी पूर्वावस्था इस मन्त्र से भी कही

शाङ्करभाष्य

नायमजाकृतिनिमित्तोऽजाशब्दः नापि यौगिकः किं तर्हि कल्पनोपदेशोऽयम् अजारूपकक्लृप्तिस्तेजोबन्नलक्षणायाश्चराचरयोनेरुपदिश्यते यथा हि लोके यदृच्छया काचिदजा रोहितशुक्लकृष्णवर्णा स्याद्बहुबर्करा सरूपबर्करा च तां च कश्चिदजो जुषमाणोऽनुशयीत कश्चिच्चैनां भुक्तभोगां जह्यात् एवमियमपि तेजोबन्नलक्षणा भूतप्रकृतिस्त्रिवर्णा बहु सरूपं चराचरलक्षणं विकारजातं जनयति अविदुषा च क्षेत्रज्ञेनोपभुज्यते विदुषा च परित्यज्यत इति। न चेदमाशङ्कितव्यम् एकः क्षेत्रज्ञोऽनुशेते अन्यो जहातीत्यतः क्षेत्रज्ञभेदः पारमार्थिकः परेषामिष्टः प्राप्नोतीति न हीयं क्षेत्रज्ञभेदप्रतिपिपादयिषा किंतु बन्धमोक्षव्यवस्थाप्रतिपिपादयिषैवैषा प्रसिद्धं तु भेदमनूद्य बन्धमोक्षव्यवस्था प्रतिपाद्यते भेदस्तूपाधिनिमित्तो मिथ्याज्ञानकल्पितः न पारमार्थिकः एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा इत्यादिश्रुतिभ्यः। मध्वादिवत् यथा आदित्यस्यामधुनो मधुत्वम् वाचश्चाधेनोर्धेनुत्वम् द्युलोकादीनां चानग्नीनामग्नित्वम् इत्येवंजातीयकं कल्प्यते एवमिदमनजाया अजात्वं कल्प्यत इत्यर्थः। तस्मादविरोधस्तेजोबन्नेष्वजाशब्दप्रयोगस्य।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — [ रूढिको लेकर यहाँ शङ्का है ] जब तेज, जल और अन्नमें अजाकी जाति नहीं है तो तेज, जल एवं अन्न त्रैरूप्य होनेसे अजा त्रिरूप किस प्रकार समझी जा सकती है। [ ' न जायते इति अजा ' इस यौगिकको लेकर कहते हैं ] तेज, जल और अन्नकी उत्पत्तिके श्रवण होनेसे उनमें जन्माभाव निमित्तक अजाशब्दका प्रयोग संभव नहीं है। इसलिए उत्तर सूत्र कहते हैं-

नायमजाकृतिनिमित्तोऽजाशब्दः। नापि यौगिकः। किं तर्हि? कल्पनोपदेशोऽयम्। अजारूपक क्लप्तिस्तेजोबन्नलक्षणायाश्चराचरयोनेरुपदिश्यते। यथा हि लोके यदृच्छया

[ अजामेका ] यह अजाशब्द जातिनिमित्तक रूढि नहीं है और यौगिक मी नहीं है, किन्तु यह काल्पनिक उपदेश है। चराचर जगत्के कारण भूत तेज, जल और अन्नरूप प्रकृतिमें अजा सादृश्य कल्पनाका उपदेश है।

जैसे लोकमें दैववश रक्त, शुक्ल, कृष्ण वर्ण कोई एक ऐसी अजा - बकरी हो उसे समानरूपवाले बहुतसे बकरे हों, उसपर कोई एक अज - बकरा प्रेम करता हुआ उसके पीछे - पीछे फिरे और कोई एक अज भोग भोगके अनन्तर उसे त्याग दे, वैसे ही यह तेज, जल और अन्नरूप त्रिवर्णात्मक भूतप्रकृति भी समान रूपवाले चराचरात्मक विकार समूहको उत्पन्न करती है। अविद्वान् क्षेत्रज्ञ इसका उपभोग करता है और विद्वान् इसका परित्याग करता है।

यह आशङ्का यहाँ नहीं करनी चाहिए कि एक क्षेत्रज्ञ सेवन करता हुआ इसके पास शयन करता है और दूसरा इसका परित्याग करता है, इससे पारमार्थिक क्षेत्रज्ञ भेद जो पर - सांख्यको इष्ट है, वह प्राप्त होता है, क्योंकि यह क्षेत्रज्ञ के भेदका प्रतिपादन करनेकी इच्छा नहीं है, किन्तु बन्ध - मोक्ष व्यवस्थाका प्रतिपादन करनेकी इच्छा है। लोक प्रसिद्ध भेदका अनुवादकर बन्ध - मोक्ष व्यवस्थाका प्रतिपादन किया जाता है। भेद तो उपाधिनिमित्तक और मिथ्याज्ञानसे कल्पित है, पारमार्थिक नहीं है।

क्योंकि ' एको देवः ० ' ( एक देव सम्पूर्ण भूतोंमें गूढ, सबमें व्यापक और सब भूतोंका अन्तरात्मा है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं। मधु आदिके समान, अर्थात् जैसे मधुसे भिन्न आदित्यको मधु कहा गया है, धेनुसे भिन्न वाणीमें धेनुशब्दका प्रयोग किया गया है, और अनग्नि आदि लोकोमें अग्नि शब्दका प्रयोग किया गया है, इस प्रकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही यहाँ भी अनजा- अजासे भिन्न में यह अजात्वकी कल्पनाकी गई है, ऐसा अर्थ है | इसलिए तेज, जल और अन्नमें अजाशब्दके प्रयोगका विरोध नहीं है॥१०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपक्षी - ' न जायत इति अजा ' यह यौगिक अर्थं मुख्य है, अतः इससे प्रधानका ग्रहण करना युक्त है? सिद्धान्ती - रूढार्थकी अपेक्षा न करनेवाले यौगिक अर्थसे रूढार्थ में आश्रित गुणोंको लेकर की हुई लक्षणा अधिक बलवती होती है, यह नियम है, क्योंकि गुणों के आधारपर रूढि रहती है, इसलिए जैसे मधु आदि शब्दोंसे प्रसिद्ध मधु आदिके आश्रित गुणवृत्तिरूप लक्षणासे आदित्य आदिका ग्रहण होता है, वैसे रोहित आदि गुण वाचक शब्दोंके साथ अजाशब्द के सहोचारणसे समर्थित तथा रूढिमें आश्रित गुणवृत्तिरूप लक्षणासे यौगिक अर्थ प्रधानका बाधकर तेज, जल और अन्न रूप अवान्तर प्रकृतिका अजाशब्दसे ग्रहण करना चाहिए। अतः यह सिद्ध हुआ कि अजा भिन्न तेज, जल और अन्नमें अजा शब्द विरुद्ध नहीं है और प्रधान अजाशब्दसे गृहीत न होनेसे श्रुति प्रतिपादित नहीं है। वाक्योंके समन्वयकी असिद्धि पूर्वपक्षमें फल है और सिद्धान्तमें उसकी सिद्धि फल है।।१०

संख्योपसंग्रहाधिकरणम्

1.4.11 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ११

सूत्र १.४.११

न संख्योपसंग्रहादपि ज्ञानाभावाद् अतिरेकाच् च ॥ १.४.११ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.११ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 335

पदच्छेद — न संख्योपसंग्रहात् , अपि , नानाभावात् , अतिरेकात् , च

सूत्रार्थ — ( संख्योपसंग्रहादपि ) ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठित : ' इस मन्त्रमें श्रूयमाण संख्यावाचक पदसे पच्चीस संख्याका ग्रहण करनेपर भी ( न ) प्रधान श्रुति- प्रतिपादित नहीं है, ( नानाभावाद ) क्योंकि नाना भाव है ( अतिरेकाच्च ) आत्मा और आकाश अतिरिक्त कहे गए हैं, इससे सप्तविंशति तत्त्व मानने पड़ेंगे। इससे तो अपसिद्धान्त होगा, अतः प्रधान आदि तत्त्वोंका ग्रहण युक्त नहीं है।

शाङ्करभाष्य

एवं परिहृतेऽप्यजामन्त्रे पुनरप्यन्यस्मान्मन्त्रात्सांख्यः प्रत्यवतिष्ठते यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः। तमेव मन्य आत्मानं विद्वान्ब्रह्मामृतोऽमृतम् इति। अस्मिन्मन्त्रे पञ्च पञ्चजना इति पञ्चसंख्याविषया अपरा पञ्चसंख्या श्रूयते पञ्चशब्दद्वयदर्शनात् त एते पञ्च पञ्चकाः पञ्चविंशतिः संपद्यन्ते तया च पञ्चविंशतिसंख्यया यावन्तः संख्येया आकाङ्क्ष्यन्ते तावन्त्येव च तत्त्वानि सांख्यैः संख्यायन्ते मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त।

षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः इति तया श्रुतिप्रसिद्धया पञ्चविंशतिसंख्यया तेषां स्मृतिप्रसिद्धानां पञ्चविंशतेस्तत्त्वानामुपसंग्रहात्प्राप्तं पुनः श्रुतिमत्त्वमेव प्रधानादीनाम्। ततो ब्रूमः न संख्योपसंग्रहादपि प्रधानादीनां श्रुतिमत्त्वं प्रत्याशा कर्तव्या कस्मात् नानाभावात् नाना ह्येतानि पञ्चविंशतिस्तत्त्वानि नैषां पञ्चशः पञ्चशः साधारणो धर्मोऽस्ति येन पञ्चविंशतेरन्तराले पराः पञ्च पञ्च संख्या निविशेरन् न ह्येकनिबन्धनमन्तरेण नानाभूतेषु द्वित्वादिकाः संख्या निविशन्ते।

अथोच्येत पञ्चविंशतिसंख्यैवेयमवयवद्वारेण लक्ष्यते यथा पञ्च सप्त च वर्षाणि न ववर्ष शतक्रतुः इति द्वादशवार्षिकीमनावृष्टिं कथयन्ति तद्वदिति तदपि नोपपद्यते अयमेवास्मिन्पक्षे दोषः यल्लक्षणाश्रयणीया स्यात्। परश्चात्र पञ्चशब्दो जनशब्देन समस्तः प़ञ्चजना इति भाषिकस्वरेणैकपदत्वनिश्चयात् प्रयोगान्तरे च पञ्चानां त्वा पञ्चजनानाम् इत्यैकपद्यैकस्वर्यैकविभक्तिकत्वावगमात् समस्तत्वाच्च न वीप्सा पञ्च पञ्च इति। तेन न पञ्चकद्वयग्रहणं पञ्च पञ्चेति।

न च पञ्चसंख्याया एकस्याः पञ्चसंख्यया परया विशेषणम् पञ्च पञ्चकाः इति उपसर्जनस्य विशेषणेनासंयोगात् नन्वापन्नपञ्चसंख्याका जना एव पुनः पञ्चसंख्यया विशेष्यमाणाः पञ्चविंशतिः प्रत्येष्यन्ते यथा पञ्च पञ्चपूल्य इति पञ्चविंशतिः पूलाः प्रतीयन्ते तद्वत् नेति ब्रूमः युक्तं यत्पञ्चपूलीशब्दस्य समाहाराभिप्रायत्वात् कतीति सत्यां भेदाकाङ्क्षायां पञ्च पञ्चपूल्य इति विशेषणम् इह तु पञ्च जना इत्यादित एव भेदोपादानात्कतीत्यसत्यां भेदाकाङ्क्षायां न पञ्च पञ्चजना इति विशेषणं भवेत् भवदपीदं विशेषणं पञ्चसंख्याया एव भवेत् तत्र चोक्तो दोषः तस्मात्पञ्च पञ्चजना इति न पञ्चविंशतितत्त्वाभिप्रायम्।

अतिरेकाच्च न पञ्चविंशतितत्त्वाभिप्रायम् अतिरेको हि भवत्यात्माकाशाभ्यां पञ्चविंशतिसंख्यायाः आत्मा तावदिह प्रतिष्ठां प्रत्याधारत्वेन निर्दिष्टः यस्मिन् इति सप्तमीसूचितस्य तमेव मन्य आत्मानम् इत्यात्मत्वेनानुकर्षणात् आत्मा च चेतनः पुरुषः स च पञ्चविंशतावन्तर्गत एवेति न तस्यैवाधारत्वमाधेयत्वं च युज्येत अर्थान्तरपरिग्रहे वा तत्त्वसंख्यातिरेकः सिद्धान्तविरुद्धः प्रसज्येत तथा आकाशश्च प्रतिष्ठितः इत्याकाशस्यापि पञ्चविंशतावन्तर्गतस्य न पृथगुपादानं न्याय्यम् अर्थान्तरपरिग्रहे चोक्तं दूषणम्।

कथं च संख्यामात्रश्रवणे सत्यश्रुतानां पञ्चविंशतितत्त्वानामुपसंग्रहः प्रतीयेत जनशब्दस्य तत्त्वेष्वरूढत्वात् अर्थान्तरोपसंग्रहेऽपि संख्योपपत्तेः। कथं तर्हि पञ्च पञ्चजना इति उच्यते दिक्संख्ये संज्ञायाम् इति विशेषस्मरणात्संज्ञायामेव पञ्चशब्दस्य जनशब्देन समासः ततश्च रूढत्वाभिप्रायेणैव केचित्पञ्चजना नाम विवक्ष्यन्ते न सांख्यतत्त्वाभिप्रायेण ते कतीत्यस्यामाकाङ्क्षायां पुनः पञ्चेति प्रयुज्यते पञ्चजना नाम ये केचित् ते च पञ्चैवेत्यर्थः सप्तर्षयः सप्तेति यथा।।

के पुनस्ते पञ्चजना नामेति तदुच्यते

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इस प्रकार अजामन्त्रमें सांख्याभिमत प्रधानादिका परिहार होनेपर भी अन्य मन्त्रके आधारपर सांख्य पुनः पूर्वपक्ष करता है - ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना ० ' ( जिसमें पाँच पञ्चजन और [ अव्याकृत संज्ञक ] आकाश भी प्रतिष्ठित है, उस आत्माको हो मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ।

उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ ) इस मन्त्र में ' पञ्च पञ्चजना ' इस प्रकार पाँच संख्या विषयक दूसरी पाँच संख्याका श्रवण है, क्योंकि दो वार पञ्चशब्द देखने में आता है, वे ये पाँच पंचक मिलकर पच्चीस होते हैं।

एवं पच्चीस संख्यासे जितने सांख्यवालोंकी आकांक्षा होती है उतने ही तत्त्व सांख्योंने गिने हैं - ' मूलप्रकृति ० ' ( मूल प्रकृति अविकृति है अर्थात् किसीकी विकृति नहीं है, महदादि सात प्रकृति और विकृति दोनों हैं, सोलह तत्त्व विकार ही हैं, पुरुष न प्रकृति है और न विकृति ही ) श्रुति प्रसिद्ध उस पच्चीस संख्यासे उन स्मृति प्रसिद्ध पच्चीस तत्त्वोंका उपसंग्रह होनेसे प्रधान आदि श्रुति प्रतिपादित हैं, ऐसा पुनः प्राप्त हुआ।

सिद्धान्ती - इस विषयमें हम कहते हैं - संख्या के संग्रहसे भी प्रधानादि श्रुति प्रतिपादित हैं ऐसी आशा नहीं करनी चाहिए, किससे? इससे कि नानाभाव है अर्थात् ये पच्चीस तत्त्व नाना - पृथक ही हैं, इनमें प्रत्येक पञ्चकका साधारण धर्म नहीं है, जिससे कि पच्चीस संख्या के बौचमें दूसरी पाँच - पाँच संख्याएँ अन्तर्भूत हों, क्योंकि किसी एक अनुगत धर्मके विना पृथक् भूत पदार्थोंमें द्वित्व आदि संख्या प्रविष्ट नहीं होती।

यदि कहो कि जैसे ' पञ्च सप्त च वर्षाणि ० ( पाँच और सात वर्ष अर्थात् बारह वर्ष इन्द्रद्वादशवार्षिकी मनावृष्टि कथयन्ति तद्वदिति। तदपि नोपपद्यते, अयमेवास्मिन्पक्षे दोषो वृष्टि नहीं की ) यहाँ बारह वर्षकी अनावृष्टि कहते हैं, वैसे [ पञ्च पञ्च ] इस अवान्तर अवयव संख्या द्वारा पच्चीस संख्या ही लक्षित होती है, यह कथन भी युक्त नहीं है। इस पक्ष में यही दोष है कि लक्षणा ग्रहण करनी पड़ती है।

और यहाँ अन्य पञ्चशब्द जनशब्दके साथ समस्त होकर पञ्चजन हुआ है, कारण कि भाषिकस्वरसे एकपदत्व निश्चय होता है। एवं ' पञ्चानां त्वा पञ्चजनानाम् ' ( तुझे पञ्चपञ्च जनके ) इस अन्य प्रयोगमें एक पद, एक स्वर और एक विभक्ति प्रतीत होती है। समस्त पद होनेसे पञ्च पञ्च ऐसी वीप्सा ( दो बार कथन ) भी नहीं है और इससे ' पञ्च पञ्च ' इस प्रकार दो

का भी ग्रहण नहीं है 1। किञ्च पञ्च पञ्चका : ' ( पांच पंचक ) इस प्रकार एक पाँच संख्याका दूसरी पाँच संख्या के साथ विशेषण - अन्वय नहीं होता, क्योंकि ( एक ) विशेषणका अन्य विशेषण के साथ सम्बन्ध ( अन्वय ) नहीं होता, पू०- परन्तु पाँच संख्याको प्राप्त हुए जन ही फिर पाँच संख्यासे विशेष्यमाण होकर पच्चीस प्रतीत होंगे। जैसे कि ' पञ्च पञ्चपूल्यः ' ( पाँच पूली पञ्चक ) यहाँ पच्चीस पूली प्रतीत होती हैं। इसके समान प्रकरणमें भी समझना चाहिए।

सि ० - हम कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, क्योंकि पञ्चपूली शब्दमें समाहार अभिप्रेत होनेसे कितनी पञ्चपूली हैं इस प्रकार भेदकी आकांक्षा होने पर ' पञ्च पञ्चपूल्यः ' ( पाँच पूली पंचक ) इस प्रकार पाँच पूलीका विशेषण पुनः पाँच युक्त है। परन्तु यहाँ तो ' पञ्चजना : ' ( पाँच जन ) ऐसा आरम्भसे ही भेद ( विशेषण ) का ग्रहण है, अत : ‘ कितने ' इस प्रकार भेदकी आकांक्षा न होनेपर ' पञ्च पञ्चजनाः ' ( पाँच पंचजन ) इस तरह पञ्चजनका पञ्च ( संख्या ) विशेषण नहीं हो सकता।

यदि विशेषण हो तो भी केवल पाँच संख्याका होगा | जनपदका नहीं ] इस पक्षमें तो दोष ( उपसर्जनस्य विशेषणेना संयोगात् ) कहा गया है। इसलिए ' पञ्च पञ्चजना ः ' यइ प्रयोग पच्चीस तत्त्व के अभिप्रायसे नहीं है, और संख्याकी अधिकतासे मी पच्चीस तत्त्व के अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि आत्मा और आकाशको लेकर पच्चीस संख्यासे अधिक होता है।

यहाँ तत्त्वोंकी प्रतिष्ठा के आधाररूपसे आत्माका निर्देश है, क्योंकि ' यस्मिन् ' इसे सप्तमी अर्थात् सप्तम्यन्त ‘ यत् ' पदसे सूचितका ' तमेव मन्ये ० ' ( उसीको मैं आत्मा मानता हूँ ) इस प्रकार आत्मरूप से अनुकर्षण है। आत्मा चेतन पुरुष है और वह सांख्याभिमत पच्चीस तत्त्वोंके अन्तर्गत ही है, इसलिए उसीमें आधाराधेयभाव अयुक्त है। तत्त्वोंसे भिन्न अर्थका ग्रहण किया जाय तो सांख्यसिद्धान्तसे विरुद्ध तत्त्वसंख्या में अधिकता प्रसक्त होगी।

इसी प्रकार पच्चीस तत्त्वोंके अन्तर्भूत आकाशका ' आकाशश्च प्रतिष्ठित : ' ( और आकाश प्रतिष्ठित है ) इस प्रकार पृथक् ग्रहण अयुक्त है। अन्य अर्थका ग्रहण करनेपर तो उक्त दोष ( अधिक संख्या ) है। संख्या मात्रका श्रवण होनेपर श्रुति अप्रतिपादित पच्चीस तत्त्वोंका संग्रह किस प्रकार प्रतीत होता है? क्योंकि जनशब्द तो तत्त्वोंमें रूढ़ नहीं है, अन्य अर्थका संग्रह करनेसे भी संख्या उपपन्न होती है, तो ' पञ्च पञ्चजनाः ' यह किस प्रकार है?

कहते हैं' दिक्संख्ये ० ' ( दिशा और संख्या वाचक शब्दोंके संज्ञा ( नाम ) अर्थमें सुबन्त उत्तर पदके साथ समास होता है ) इस विशेष सूत्रसे संज्ञामें पञ्च शब्दका जनपदके साथ समास है। वस्तुतः रूढित्व के अभिप्रायसे कुछ पञ्चजन नाम यहाँ विवक्षित हैं सांख्याभिमत पच्चीस तत्त्वोंके अभिप्रायसे नहीं। वे कितने हैं? इस प्रकारकी आकाँक्षा होनेपर उसके उत्तरमें यहाँ पुनः पञ्च शब्दका प्रयोग किया गया है। जैसे सप्तर्षि सात हैं, वैसे पञ्चजन नामवाले जो कोई हैं वे भी पाँच ही हैं, ऐसा अर्थ है॥। ११

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ‘ यस्मिन्पञ्च पञ्चजना : ' इस मन्त्र में पठित पञ्चजनशब्द यौगिक है अथवा रूढ़, यह निश्चय न होनेसे सांख्य तत्त्वोंका प्रतिपादन करता है अथवा अन्य पदार्थका " ऐसा संशय उत्पन्न होता है। जैसे तत्त्वविद्याके प्रकरण में प्रसिद्ध अजा बकरीरूप अर्थ में तात्पर्यं न होनेसे अजामन्त्रगत अजापदसे रूढ़ि अर्थका त्यागकर तेज आदिका ग्रहण किया गया है, वैसे ही ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना : ' इस मन्त्र में पंचजन शब्दसे मनुष्योंमें तात्पर्यके अभाव होनेसे रूढिका त्यागकर सांख्याभिमत पच्चीस तत्त्वोंका ग्रहण करना चाहिए, इस प्रकार दृष्टान्तसंगतिसे मन्त्रको उद्धृतकर ' एवम् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं। इस प्रकार ' मूल प्रकृति, महत्, अहङ्कार, शब्दादि पाँच तन्मात्राएँ ये सात, एकादश इन्द्रियाँ, एवं पांच स्थूलभूत ये सोलह केवल विकार और पुरुष सांख्यशास्त्र में २५ तत्त्व गिने जाते हैं। ' इसलिए प्रधान आदि श्रुति प्रतिपादित हैं।

* ‘ यस्मिन्पञ्च पञ्चजनाः ' इस मन्त्रमें पच्चीस संख्या के ग्रहण करनेसे भी प्रधान आदि श्रुति प्रतिपादित नहीं हैं, क्योंकि पुरुष, प्रधान, महत् आदि भिन्न - भिन्न पदार्थ हैं, इनमें अनुगत कोई एक धर्म नहीं है, अतः भिन्न - भिन्न पदार्थों में द्वित्व संख्या पञ्च पञ्च दो बार संख्याका प्रवेश भी नहीं होता अर्थात् इतर पञ्चक में न रहनेवाले पाँच - पाँच तत्त्वोंमें अनुगत साधारण धर्मका अभाव ही यहाँ पृथग्भाव विवक्षित है।

यद्यपि पाँच ज्ञानेन्द्रियोंमें ज्ञान कारणत्व, पाँच कर्मेन्द्रियोंमें कर्मकारणत्व और पाँच तन्मात्राओंमें स्थूलप्रकृतित्व है, तोमि ' यस्मिन् ' इस प्रकार आत्मा और आकाशके पृथक् कथन के कारण सत्त्व, रज, तम, महत् और अहंकार इन पाँचोंका एक समूह, मन और चार भूतोंको मिलाकर इन पाँचोंका एक और समूह, इन दोनों पंचकों में प्रत्येकमें अनुवृत्त इतर पँचकोंसे व्यावृत्त धर्म नहीं है। क्योंकि ' पञ्चजन ' एक समस्त पद है।

' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना : ' इस मन्त्र में पञ्चजन शब्द समस्त पद है, क्योंकि संहितामें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भेदसे स्वर तीन होते हैं। ब्राह्मण में उदात्त और अनुदात्त दो ही स्वर होते हैं। यह नियम ऐतरेय ब्राह्मण, सामवेद ब्राह्मण, शुक्ल यजुर्वेद - शतपथ ब्राह्मणमें माना जाता है।

इसलिए इस मन्त्र में प्रथम पञ्चशब्द आद्युदात्त है, द्वितीय पञ्चशब्द सर्वानुदात्त है और जनशब्द अन्तोदात्त है, द्वितीय पञ्चशब्द और जनशब्दमें समास के बिना अन्त्य आकार उदात्त और उसके पूर्वं वर्णं अनुदात्त नहीं हो सकते।

' समासस्य ' ( पा ० सू ० ६ | १ | २२३ ) इस सूत्रसे समासका अन्त उदात्त होता है और ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' ( पा ० सू ० ६।१।१५८ ) इस सूत्र से जिस पदमें जिस वर्णके स्थान में उदात्त अथवा स्वरितका विधान हैं, उस एक वर्णको छोड़कर उस पदके शेष सब स्वर उदात्त होते हैं, ऐसा विधान है, इसलिए मन्त्र में अन्त्य स्वर उदात्त होनेसे एक पदत्वका निश्चय होता है। ‘ छन्दोगा बह्वृचाश्चैव तथा वाजसनेयिनः ऊचनीचस्वरं प्राहुः स बैभाषिक उच्यते॥

' ‘ सामवेद, ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद इनके ब्राह्मण ग्रन्थोंमें उदात्त और अनुदात्त स्वरको भाषिकस्वर कहते हैं ' उसमें ' स्वरितोऽनुदात्तो वा ' इस सूत्र से जो मन्त्र दशामें स्वरित अथवा अनुदात्त रहता है, वह ब्राह्मणदशामें उदात्त होता है, ऐसा अपवाद स्वीकार किया है, इसलिए अन्त्य आकारसे पूर्वस्थित अनुदात्त स्वरोंको ब्राह्मणदशामें उदात्तत्व प्राप्त हुआ, ' उदात्तमनुदात्तमनन्त्यम् ' इस सूत्र से मन्त्रदशा में अन्त्य मिन्न एवं अग्रिम पदसे मिलकर उच्चार्यमाण उदात्तस्वरमें अनुदात्तत्वका विधान है।

इसलिए यहाँ नकारोत्तरवर्त्ती आकार अग्रिम ' आकाशश्च ' पदके साथ मिलकर पठ्यमान अनुदात्त होता है, यह मन्त्रानुदात्त स्वरभाषिक है। इससे एक पदत्वका निश्चय होता है। ' पञ्च - पञ्चजना : ' इसमें अन्तोदात्त मान्त्रिक स्वर है, और ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना : ' इसमें अन्तानुदात्त ब्राह्मस्वर है, दोनों प्रकारसे पदके एक होनेके कारण समास सिद्ध होता है! पुर्वपक्षमें पञ्चजन शब्द व्यस्त है, सिद्धान्तमें एक समस्त पद है, क्योंकि इसमें एक स्वर और एक विभक्तिका मी नियम है।

अत : आज्य ग्रहण मन्त्र में ' पञ्चानां त्वा पञ्चजनानां यन्त्राय धन्रय गृह्णामि ' ( हे आज्य! पाँच देवताओंके कर्ममें यन्त्ररूपसे अवस्थित, ऐहिक और पारलौकिक भोग धारण करनेमें समर्थं अपने शरीरकी रक्षाके लिए तुझे ग्रहण करता हूँ ) यह यजमानकी उक्ति है। इसमें भी पञ्चजन शब्द समस्त है।

* ' पञ्चजनाः ' यदि यह समस्त पद न हो तो दो पञ्चशब्दोंसे उक्त दो पञ्चत्वोंका परस्पर अन्वय है अथवा उनका जन पदार्थके साथ अन्वय है अथवा पञ्चत्व विशिष्ट जनोंके साथ अन्य पञ्चत्वका अन्वय है? इनमेंसे प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि एक पञ्च संख्या दूसरी पाँच संख्याका विशेषण नहीं होती, कारण कि विशेषणका विशेषणके साथ साक्षात् अन्वय नहीं होता, सबं अप्रधान विशेषणोंका प्रधान विशेष्यके साथ अन्वय होता है। यदि अप्रधान - गुणोंका भी अन्वय मानें तो वाक्य भेद हो जायगा।

दूसरा पक्ष मी युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें दस संख्याकी प्रतीति होती है पच्चोसकी नहीं। तीसरे पक्ष दृष्टान्त द्वारा पच्चीस संख्याकी प्रतीति होती है। इसमें दृष्टान्तको विषम कहकर शङ्काका ' नेति ब्रूमः ' इत्यादिसे सिद्धान्ती निराकरण करते हैं। ' पञ्चानां पूलानां सुमहारः पञ्चपूल्यः ' यहाँ पर ' संख्यापूर्वी द्विगु : ' ( पा ० सू ० २।१।५२ ) इस सूत्र से समासका विधान है।

अनन्तर ' द्विगो : ' इस सूत्र से ' ङीप् ' . ( ईकार ) का विधान होनेसे समाहारकी प्रतीति होनेपर समाहार ( समुदाय ) कितने हैं? इस आकांक्षा में ' पञ्च ' इस प्रकार अन्य पदका अन्वय होना युक्त है। परन्तु ' पञ्चजना ः ' इसके अन्त में ' डीप् ' न होनेसे पञ्चपूली ( धानके गट्टेको पूली कहा जाता है ) के समान समाहारकी प्रतीति नहीं होती, और जनपद में पहले ही पञ्चत्वका ग्रहण होनेके कारण संख्याकी आकांक्षा न होने से ' पञ्च ' इस दूसरे पदका अन्वय नहीं हो सकता, क्योंकि अन्वय आकांक्षा के अधीन होता है।

यदि मानें तो एक विशेषणका अन्य विशेषणके साथ अन्वय नहीं होता किन्तु प्रधानके साथ ही होता है, इस न्यायके साथ विरोध होगा। वस्तुतः ' पञ्चजनाः ' यहाँ तो ' पञ्च चामी जना इति पञ्चजनाः ' ' सप्तर्षि ' ' दक्षिणाग्निः ' आदिकी तरह कर्मधार्यं समास है, ' पञ्चपूली ' की तरह समाहार नहीं है। पञ्चजन घटकी भूत पंच संख्या जनोंकी व्यावर्तक है, पांच संख्यासे ही जनोंका भेद प्रतीत होता है।

समाहारका यहाँ मान नहीं है, अत : कितने समुदाय हैं, इस प्रकारकी आकांक्षाके न होनेसे ' पञ्च पञ्चजनाः ' इस पश्च संख्याको ' पञ्चजन ' का विशेषण मानकर पच्चीस संख्याका लाभ नहीं हो सकता। सूत्रस्थ ' नानाभावात् ' इस पदकी व्याख्या कर अब ' अतिरेकात् ' की व्याख्या करते हैं- यदि पच्चीस संख्या मानें तो आत्मा और आकाशको लेकर पच्चीससे अधिक सताईस संख्या हो जायगी, जो सांख्य सिद्धान्त के विरुद्ध है।

* ' यस्मिन् ' इस प्रकार आत्मामें तत्त्वोंकी आधारताका वर्णन भी विरुद्ध होगा, क्योंकि सांख्य मत महत् आदि तत्त्वोंका आधार स्वतन्त्र प्रधान ही है, असङ्ग पुरुष तत्त्वोंका आधार नहीं है। किश्च सांख्यमतमें जगत्‌को सत्य माना गया है, इससे ' जगत् में मिथ्यात्व बोधक ' नेहनानाऽस्ति किञ्चन ' इत्यादि वाक्यशेष के साथ विरोध होगा। अतः ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना : ' इस मन्त्रसे सांख्य सिद्ध पच्चीस तत्वोंकी सिद्धि नहीं हो सकती है। पूर्वपक्ष में ब्रह्ममें उद्धृत वाक्योंके समन्वयकी असिद्धि फल हैं, सिद्धान्त में ' प्राणस्य प्राणमुत ' इत्यादि वाक्योंके समन्वयकी सिद्धि फल है॥११

1.4.12 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १२

सूत्र १.४.१२

प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १.४.१२ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 339

पदच्छेद — प्राणादयः , वाक्यशेषात्

सूत्रार्थ — ( प्राणादयः ) यहाँ पञ्चजन शब्दसे प्राण, चक्षु, श्रोत्र, अन्न और मन कहे गये हैं, ( वाक्यशेषात् ) क्योंकि ' प्राणस्य प्राण ० ' इस वाक्यशेषमें स्थित हैं।

शाङ्करभाष्य

यस्मिन्पञ्च पञ्चजनाः इत्यत उत्तरस्मिन्मन्त्रे ब्रह्मस्वरूपनिरूपणाय प्राणादयः पञ्च निर्दिष्टाः प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः इति तेऽत्र वाक्यशेषगताः संनिधानात्पञ्चजना विवक्ष्यन्ते।

कथं पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोगः तत्त्वेषु वा कथं जनशब्दप्रयोगः समाने तु प्रसिद्ध्यतिक्रमे वाक्यशेषवशात्प्राणादय एव ग्रहीतव्या भवन्ति जनसंबन्धाच्च प्राणादयो जनशब्दभाजो भवन्ति जनवचनश्च पुरुषशब्दः प्राणेषु प्रयुक्तः ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः इत्यत्र प्राणो ह पिता प्राणो ह माता इत्यादि च ब्राह्मणम्।

समासबलाच्च समुदायस्य रूढत्वमविरुद्धम् कथं पुनरसति प्रथमप्रयोगे रूढिः शक्याश्रयितुम् शक्या उद्भिदादिवदित्याह प्रसिद्धार्थसंनिधाने ह्यप्रसिद्धार्थः शब्दः प्रयुज्यमानः समभिव्याहारात्तद्विषयो नियम्यते यथा उद्भिदा यजेत यूपं छिनत्ति वेदिं करोति इति तथा अयमपि पञ्चजनशब्दः समासान्वाख्यानादवगतसंज्ञाभावः संज्ञ्याकाङ्क्षी वाक्यशेषसमभिव्याहृतेषु प्राणादिषु वर्तिष्यते।

कैश्चित्तु देवाः पितरो गन्धर्वा असुरा रक्षांसि च पञ्च पञ्चजना व्याख्याताः अन्यैश्च चत्वारो वर्णा निषादपञ्चमाः परिगृहीताः क्वचिच्च यत्पाञ्चजन्यया विशा इति प्रजापरः प्रयोगः पञ्चजनशब्दस्य दृश्यते तत्परिग्रहेऽपीह न कश्चिद्विरोधः आचार्यस्तु न पञ्चविंशतेस्तत्त्वानामिह प्रतीतिरस्तीत्येवंपरतया प्राणादयो वाक्यशेषात् इति जगाद।। भवेयुस्तावत्प्राणादयः पञ्चजना माध्यंदिनानाम् येऽन्नं प्राणादिष्वामनन्ति काण्वानां तु कथं प्राणादयः पञ्चजना भवेयुः येऽन्नं प्राणादिषु नामनन्तीति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पुनः वे पञ्चजन नामके कौन हैं? वह कहते है-

' यस्मिन्पञ्च ० ' ( जिसमें पाँच पञ्चजन हैं ) इससे अग्रिम मन्त्रनें ब्रह्मस्वरूपका निरूपण करनेके लिए ' प्राणस्य प्राणमुत O · ( जो उसे प्राणके प्राण, चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र, अन्नके अन्न, तथा मनके मनको जानते हैं वे ब्रह्मज्ञ हैं ) इस प्रकार प्राणादि पाँच निर्दिष्ट हैं। संनिहित होने के कारण वाक्यशेषमें स्थित वे प्राण आदि ' यस्मिन् ' इस मन्त्रमें पञ्चजन शब्दसे विवक्षित हैं। पूर्वपक्षी - प्राणादिमें जन शब्दका प्रयोग कैसे है?

सिद्धान्ती -- तत्त्वों में जनशब्दका प्रयोग कैसे है? प्रसिद्धि - रूढिका दोनों पक्षोंमें त्याग समान होनेपर भी वाक्यशेषके बलसे [ पञ्चजनशब्दसे ] प्राण आदि पाँच ही ग्रहण योग्य हैं और मनुष्यके साथ सम्बन्ध होनेसे भी प्राण आदि जनशब्दके भागी होते हैं। ' ते वा एते ० ' ( वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष हैं ) इसमें जनवाचक पुरुष शब्द प्राणोंमें प्रयुक्त है। और उसी प्रकार ' प्राणो ह पिता ० ' ( प्राण पिता है, प्राण माता है ) इत्यादि ब्राह्मण है। समासके बलसे समुदायको रूढ माननेमें कोई विरोध नहीं है।

परन्तु पञ्चजनशब्द के प्रथम प्राणादिमें प्रयोगकी असिद्धि होनेसे रूढिका किस प्रकार आश्रय किया जा सकता है? ऐसा कहा है कि उद्भिद आदिके समान पञ्चजन शब्दकी भी रूढि हो सकती है। प्रसिद्धार्थक पदके सन्निधानमें प्रयुक्त हुए अप्रसिद्धार्थं वाचक शब्दका समभिव्याहार के बलसे तद्विषयक अर्थ होता है ऐसा नियम है।

जैसे ' उद्भिदा यजेत ' ( पशुकामना वाला उद्भिद नामक याग करे ) ' यूपं छिनत्ति ' ( यूपका छेदनसे संस्कार करे ) और ' वेदिं करोति ' ( वेदिका संस्कार करे ) इत्यादिमें होता है, वैसे ही यह ' पञ्चजन ' शब्द भी समासके कथन से संज्ञाभावको प्राप्त होकर संज्ञीकी आकांक्षा करता हुआ वाक्यशेष और समभिव्याहुत - सहोच्चरित प्राण आदिमें प्रवृत्त होगा। कई एक लोगोंने तो ऐसा व्याख्यान किया है कि देव, पितर, गन्धर्व, असुर और राक्षस ये पाँच पञ्चजन हैं।

दूसरोंने चार वर्णं और पाँचवें निषाद् ( ब्राह्मणके द्वारा शूद्रासे उत्पन्न, सन्तान ) का ग्रहण किया है। और कहोंपर ' यत्पाञ्चजन्यया विंशा ' इस प्रकार पञ्चजन शब्दका प्रयोग प्रजाके लिए दिखाई देता है। उसका ग्रहण करनेपर भी कोई विरोध नहीं है। आचार्यने तो, पच्चीस तत्त्वोंकी यहाँ प्रतीति नहीं होती, इस अभिप्राय से ' प्राणादयो वाक्यशेषात् ' यह सूत्र कहा है॥ १२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यहाँ पञ्चजनशब्दसे प्राण आदि पाँचका ग्रहण करना चाहिए सांख्याभिमत तत्वोंका नहीं, क्योंकि ' जायन्ते इति जनाः ' इस व्युत्पत्ति से कार्यमात्रका वाचक जन शब्द है अथवा मनुष्यों में मी जनशब्द प्रसिद्ध है। पूर्वपक्षी - ' जायन्ते इति जनाः ' ' जो उत्पन्न होते हैं वे जन हैं ' इस व्युत्पत्तिके अनुसार महत् आदि और उनके जनक होनेसे प्रधान भी जनशब्द वाच्य हो सकता है, इस प्रकार यौगिक अर्थका सम्भव होनेपर रूढिका आश्रयकर लक्षणाका प्रयास क्यों किया जाय? सिद्धान्ती - यहाँ समास के बलसे प्राण आदि समुदायमें पश्चजन शब्द रूढ माननेमें भी कोई विरोध नहीं है, इसलिए यहाँ यौगिक अर्थका ग्रहण करना युक्त नहीं है। अब इसपर पूर्वपक्षी ' कथम् ' आदिसे आक्षेप करते हैं।

* परन्तु पश्च जनशब्दकी प्राणादिमें पहले लौकिक प्रसिद्धि नहीं है, तो फिर पञ्च जनशब्द की प्राण आदिमें रूढि क्यों ग्रहण की जाती है? समाधान - यह नियम नहीं है, क्योंकि ' स्युः पुर्मासः पञ्चजनाः ' यह अमरकोश है और प्रसिद्ध अर्थ वाचक शब्दके समीपमें प्रयुज्यमान अप्रसिद्ध अर्थ वाचक शब्दका सहोच्चरित होनेसे वही अर्थ होता है जो प्रसिद्धार्थं वाचक शब्दका होता है।

जैसे ' उद्भिदा यजेत ' यद्यपि उद्भिद शब्द वृक्षोंमें प्रसिद्ध है, तो मी यहाँ सन्निहित और सहोच्चरित ' यजेत ' पदके योग से यह ' उद्भिद् ' शब्द उद्भिद् नामके यागमें रूढ है। ' यूपं छिनत्ति ' यहाँ ' छिनत्ति ' पदके समभिव्याहारसे ' यूप ' शब्द दारू में रूढ है।

' वेदि करोति ' यहाँ ' करोति ' पदके योगसे ' वेदि ' शब्द संस्कार योग्य स्थण्डिल विशेष में रूढ है अर्थात् गाहपत्य और आहवनीयके मध्य में चार अंगुल पृथिवी - को खोदकर संस्कृत किया गया स्थान वेदि कहलाता है, वैसे ' पञ्चजन ' शब्द मी ' दिक्संख्ये संज्ञायाम् ' इस सूत्रद्वारा समस्तपद होनेसे किसीकी संज्ञामें रूढ ज्ञात होता है, संज्ञीको आकांक्षा होनेपर सन्निहित वाक्यशेष और समभिव्याहारके बलसे ' पञ्चजन ' शब्द प्राण आदिमें रूढ निश्चित होता है।

किञ्च पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच भूत और अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश ये पाँच क्लेश, इन पच्चीसका यहाँ ' पञ्च पञ्चजनाः ' शब्द से ग्रहण हो सकता है, और ' जायन्ते इति जना : ' इस योगवृत्तिका भी यहाँ सम्भव है, क्योंकि प्राण आदि उत्पत्तिवाले हैं। इस प्रकार सांख्याभिमत पच्चीस तत्त्वोंसे भिन्न जिस अर्थ परक ' पञ्चजन ' शब्दकी व्याख्याकी जाय तो कोई विरोध नहीं है, इस आशय से आचार्यने ' प्राणादयो वाक्यशेषात् ' इस सूत्र की रचनाकी है॥ १२

1.4.13 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १३

(इस सूत्रका मूल पाठ स्कैनमें स्पष्ट नहीं पढ़ा जा सका)

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्राण आदिमें अन्नका पाठ करनेवाले जो माध्यन्दिनं शाखावाले हैं उनके मतमें तो प्राणादि पञ्चजन मले हों, परन्तु काण्वशाखावाले जो प्राण आदिमें अन्नका पाठ नहीं करते, उनके मत्रमें तो प्राण आदि पञ्चजन किस प्रकार होंगे? इसके लिए उत्तर पढते ( कहते ) हैं—

ज्योतिषै के पामसत्यन्ने॥ १३

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.४.१४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

कारणत्वाधिकरणम्

1.4.14 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १४

सूत्र १.४.१४

कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १.४.१४ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 341

पदच्छेद — कारणत्वे , न , च , आकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः । काण्वशाखावालोंके पाठमें ' प्राणस्त्र प्राणमुतं ' इस मन्त्रमें अन्नका ग्रहण न होनेसे भी ज्योतिसे उसकी पञ्च संख्या की पूर्ति हो जायगो , क्योंकि वे भी ' यस्मिन्पञ्च पञ्चजना : ' इस मन्त्रसे पूर्वमन्त्र में

शाङ्करभाष्य

प्रतिपादितं ब्रह्मणो लक्षणम् प्रतिपादितं ब्रह्मविषयं गतिसामान्यं वेदान्तवाक्यानाम् प्रतिपादितं च प्रधानस्याशब्दत्वम् तत्रेदमपरमाशङ्क्यते न जन्मादिकारणत्वं ब्रह्मणो ब्रह्मविषयं वा गतिसामान्यं वेदान्तवाक्यानां प्रतिपादयितुं शक्यम् कस्मात् विगानदर्शनात् प्रतिवेदान्तं ह्यन्यान्या सृष्टिरुपलभ्यते क्रमादिवैचित्र्यात्।

तथा हि क्वचित् आत्मन आकाशः संभूतः इत्याकाशादिका सृष्टिराम्नायते क्वचित्तेजआदिका तत्तेजोऽसृजत इति क्वचित्प्राणादिका स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम् इति क्वचिदक्रमेणैव लोकानामुत्पत्तिराम्नायते स इमा्लोकानसृजत।

अम्भो मरीचीर्मरमापः इति तथा क्वचिदसत्पूर्विका सृष्टिः पठ्यते असद्वा इदमग्र आसीत्ततो वै सदजायत इति असदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासीत्तत्समभवत् इति च क्वचिदसद्वादनिराकरणेन सत्पूर्विका प्रक्रिया प्रतिज्ञायते तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत् इत्युपक्रम्य कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत् इति क्वचित्स्वयंकर्तृकैव व्याक्रिया जगतो निगद्यते तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियत इति।

एवमनेकधा विप्रतिपत्तेर्वस्तुनि च विकल्पस्यानुपपत्तेर्न वेदान्तवाक्यानां जगत्कारणावधारणपरता न्याय्या स्मृतिन्यायप्रसिद्धिभ्यां तु कारणान्तरपरिग्रहो न्याय्य इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः सत्यपि प्रतिवेदान्तं सृज्यमानेष्वाकाशादिषु क्रमादिद्वारके विगाने न स्रष्टरि किंचिद्विगानमस्ति कुतः यथाव्यपदिष्टोक्तेः यथाभूतो ह्येकस्मिन्वेदान्ते सर्वज्ञः सर्वेश्वरः सर्वात्मैकोऽद्वितीयः कारणत्वेन व्यपदिष्टः तथाभूत एव वेदान्तान्तरेष्वपि व्यपदिश्यते तद्यथा सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इति अत्र तावज्ज्ञानशब्देन परेण च तद्विषयेण कामयितृत्ववचनेन चेतनं ब्रह्म न्यरूपयत् अपरप्रयोज्यत्वेनेश्वरं कारणमब्रवीत् तद्विषयेणैव परेणात्मशब्देन शरीरादिकोशपरम्परया चान्तरनुप्रवेशनेन सर्वेषामन्तः प्रत्यगात्मानं निरधारयत् बहु स्यां प्रजायेय इति चात्मविषयेण बहुभवनानुशंसनेन सृज्यमानानां विकाराणां स्रष्टुरभेदमभाषत तथा इदं सर्वमसृजत।

यदिदं किं च इति समस्तजगत्सृष्टिनिर्देशेन प्राक्सृष्टेरद्वितीयं स्रष्टारमाचष्टे तदत्र यल्लक्षणं ब्रह्म कारणत्वेन विज्ञातम् तल्लक्षणमेवान्यत्रापि विज्ञायते सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत इति तथा आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजै इति च एवंजातीयकस्य कारणस्वरूपनिरूपणपरस्य वाक्यजातस्य प्रतिवेदान्तमविगीतार्थत्वात्। कार्यविषयं तु विगानं दृश्यते क्वचिदाकाशादिका सृष्टिः क्वचित्तेजआदिकेत्येवंजातीयकम्।

न च कार्यविषयेण विगानेन कारणमपि ब्रह्म सर्ववेदान्तेष्वविगीतमधिगम्यमानमविवक्षितं भवितुमर्हतीति शक्यते वक्तुम् अतिप्रसङ्गात्। समाधास्यति चाचार्यः कार्यविषयमपि विगानम् न वियदश्रुतेः इत्यारभ्य। भवेदपि कार्यस्य विगीतत्वमप्रतिपाद्यत्वात्। न ह्ययं सृष्ट्यादिप्रपञ्चः प्रतिपिपादयिषितः। न हि तत्प्रतिबद्धः कश्चित्पुरुषार्थो दृश्यते श्रूयते वा। न च कल्पयितुं शक्यते उपक्रमोपसंहाराभ्यां तत्र तत्र ब्रह्मविषयैर्वाक्यैः साकमेकवाक्यताया गम्यमानत्वात्।

दर्शयति च सृष्ट्यादिप्रपञ्चस्य ब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थताम् अन्नेन सोम्य शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ इति। मृदादिदृष्टान्तैश्च कार्यस्य कारणेनाभेदं वदितुं सृष्ट्यादिप्रपञ्चः श्राव्यत इति गम्यते। तथा च संप्रदायविदो वदन्ति मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः सृष्टिर्या चोदितान्यथा। उपायः सोऽवताराय नास्ति भेदः कथंचन इति।

ब्रह्मप्रतिपत्तिप्रतिबद्धं तु फलं श्रूयते ब्रह्मविदाप्नोति परम् तरति शोकमात्मवित् तमेव विदित्वाति मृत्युमेति इति। प्रत्यक्षावगमं चेदं फलम् तत्त्वमसि इत्यसंसार्यात्मत्वप्रतिपत्तौ सत्यां संसार्यात्मत्वव्यावृत्तेः।। यत्पुनः कारणविषयं विगानं दर्शितम् असद्वा इदमग्र आसीत् इत्यादि तत्परिहर्तव्यम् अत्रोच्यते

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रार्थ -- ( एकेषाम् ) काण्वशाखावालोंके पाठमें पूर्वोक्त प्राणादिमें ( अन्ने असति ) अन्न के न होनेके कारण ( ज्योतिषा ) ' तद्देवा ' इस पूर्ववाक्यस्थ ज्योतिसे पञ्चसंख्या की पूर्ति करनी चाहिए।

असत्यपि काण्वानामान्ने ज्योतिषा तेषां पञ्चसंख्या पूर्येत। तेऽपि हि ' यस्मिन्पञ्च ब्रह्मस्वरूपका निरूपण करनेके लिए ही ' तद्देवा ज्योतिषां ० ' ( उस आदित्यादि ज्योतियों के ज्योतिःस्वरूप अमृतकी देवगण ' आयु ' इस प्रकार उपासना करते हैं ) इस प्रकार ज्योतिका अध्ययन करते हैं। परन्तु दोनों शाखावालोंके पाठमें समानरूपसे पढ़ी हुई इस ज्योतिका एक ही मन्त्रमें प्राप्त पाँच संख्यासे कुछ लोग - काण्वशाखावाले क्यों ग्रहण करते हैं और कुछ लोग - माध्यन्दिन शाखावाले क्यों ग्रहण नहीं करते?

कारण कि अपेक्षा - आकाँक्षाका भेद है, ऐसा कहते हैं। [ प्राणस्य प्राणमुत ] इस एक ही मन्त्रमें अन्नका ग्रहण होनेसे प्राणादि पाँच जनका माध्यन्दिनोंको लाभ होने के कारण पूर्वमन्त्र में पठित ज्योतिकी अपेक्षा नहीं होती। अन्नका ग्रहण न होनेसे एक ही मन्त्रमें प्राणादि पञ्चजनका लाभ न होनेके कारण काण्वशाखावालोंको ज्योतिकी अपेक्षा होती है अर्थात् चार होनेपर भी पाँचवाँ कौन है? ऐसी अपेक्षा रहती है।

जैसे एक ही अतिरात्रसत्र में वचनभेदसे कहीं षोडशी ( यज्ञपात्र ) का ग्रहण होता है और कहींपर ग्रहण नहीं होता, वैसे अपेक्षाके भेदसे एक ही मन्त्रमें पठित ज्योतिका ग्रहण और अग्रहण होता है। इस प्रकार प्रधान विषयक कोई भी श्रुतिप्रसिद्धि नहीं है, स्मृति और न्यायप्रसिद्धिका तो आगे परिहार करेंगे॥ १३॥

सूत्रार्थ - ( कारणत्वे ) ब्रह्मके जगत् कारण होने में तो ( न ) कोई विरोध नहीं है, क्योंकि ( आकाशादिषु ) सृज्यमान आकाशादि पदार्थोंके विषयमें ( यथाव्यपदिष्टोक्त : ) यादृश ईश्वर एक उपनिषद् में कारणरूप से व्यपदिष्ट है, ( च ) और तादृश ही अन्य उपनिषद् में भी कारणरूपसे कथित है।

[ ' जन्माद्यस्य यतः ' इत्यादि सूत्रोंसे जगद् जन्मादिकारणत्व ] ब्रह्मका लक्षण कहा जा चुका है, [ ' गतिसामान्यात् ' इत्यादि सूत्रोंसे ] सब वेदान्तवाक्य समानरूपसे ब्रह्म के ही कारणत्व बोधक हैं, यह भी कहा जा चुका है। एवं [ ‘ ईक्षतेर्नाशब्दम् इत्यादि सूत्रोंसे ' ] प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है, यह भी कहा गया। अब यहाँ दूसरी आशङ्का होती है— ब्रह्म जगत् के जन्मादिका कारण है, सम्पूर्ण वेदान्तवाक्योंकी ब्रह्मविषयक कारण गति - ज्ञान समान है, ऐसा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता है। किससे?

इससे कि विगान - विरोध देखा जाता है। प्रत्येक उपनिषद् में क्रमादिके वैचित्र्यसे भिन्न - भिन्न सृष्टि उपलब्ध होती है। जैसे कि कहीं पर ' आत्मन आकाशः ० ' ( आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इस प्रकार आकाशपूर्वक सृष्टि कही गई है। कहींपर ' तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) इस प्रकार तेजपूर्वक सृष्टि, कहीं पर ' स प्राणमसृजत ० ' ( उसने प्राण उत्पन्न किया, प्राणसे श्रद्धा उत्पन्न की ) इस प्रकार प्राण पूर्वक सृष्टि कही गई है।

कहींपर ' स इमाँल्लोकानसृजत ० ' ( उसने इन लोकोंकी सृष्टिकी - जलमयशरीरवाला स्वर्गलोक, सूर्यकिरणसे व्याप्त अन्तरिक्षलोक, मनुष्यलोक और जलमय पाताल लोक ) इस प्रकार क्रमके विना ही लोकोंकी सृष्टि कही गई है। उसी प्रकार कहीं पर ' असद्वा ० ' ( पहले यह ( जगत् ) असत् ही था। उसीसे सत् - नामरूपात्मक व्यक्त उत्पन्न हुआ ) और ' असदेवेदमप्र ० ' ( पूर्व में यह असत् ही था, वह सत् हुआ, वह सम्यक् अभिव्यक्त हुआ अर्थात् अंकुरित हुआ ) इस प्रकार असत् पूर्वक सृष्टि कही गई है।

कहींपर असद्वादका निराकरणकर ' तक आहुरसदे ० ' ( उस जगत्कारणके विषय में किन्होंने ऐसा भी कहा है कि आरम्भमें यह असत् ही था ) इस प्रकार उपक्रमकर ' कुतस्तु खलु ' ( किन्तु हे सोम्य! ऐसा कैसे हो सकता है, भला असत् से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है, अतः हे सोम्य! पूर्व में यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था, ऐसा [ आरुणिने ] कहा ) इस प्रकार सत्पूर्वक सृष्टिकी प्रतिज्ञा की जाती है। कहीं पर ' तद्धेदे ० ' ( वह यह जगत् सृष्टिके पूर्व अव्याकृत था।

वह नाम रूपसे ही व्याकृत - व्यक्त हुआ ) इस प्रकार जगत्की अभिव्यक्ति स्वयं कर्तृक- अपने आप ही कही जाती है! इस प्रकार अनेक रीतिसे सृष्टि आदि विषयक श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे और वस्तु विकल्पकी अनुपपत्ति होनेसे वेदान्तवाक्योंमें जगत् - कारणकी अवधारणपरता युक्त नहीं है, अतः स्मृति और न्याय प्रसिद्धिसे ब्रह्मसे भिन्न कारणका ग्रहण करना युक्त है।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं — प्रत्येक उपनिषद् में सृज्यमान आकाश आदिमें क्रम आदि द्वारक विरोध होनेपर भी स्रष्टा विषयमें कुछ भी विरोध नहीं, किससे? इससे कि जैसा एकत्र स्रष्टाका व्यपदेश है वैसा अन्यत्र भी है। एक उपनिषद् में जैसा सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वात्मा, एक अद्वितीय ब्रह्म कारणरूपसे व्यपदिष्ट है, वैसा ही अन्य उपनिषदोंमें भी व्यपदिष्ट है।

जैसे ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' यहाँ ज्ञानशब्दसे उस ब्रह्मविषयक [ सोऽकामयत ] कामयितृत्व वचनसे चेतन ब्रह्मका निरूपण करती हुई श्रुति ईश्वर को स्वतन्त्ररूपसे कारण कहती है। अनन्तरोक्त ब्रह्मविषयक आत्मशब्द से और शरीर आदि कोश परम्परा द्वारा सबके अन्तर अनुप्रवेश करनेसे सबके भीतर प्रत्यगात्माका निर्धारण किया है। ' बहु स्यां ० ' ( मैं बहुत हो जाऊँ अर्थात् मैं उत्पन्न हो जाऊँ ) इस प्रकार आत्मविषयक अनेक स्वरूप होनेके कथनसे सृज्यमान विकारोंका स्रष्टासे अभेद कहा है।

उसी प्रकार ' इदं सर्व ० ' ( उसने यह जो कुछ है इस सबकी रचनाकी ) इस प्रकार समस्त जगत् की सृष्टिके निर्देशसे सृष्टिके पूर्व केवल अद्वितीय स्रष्टाको श्रुति कहती है। जिस प्रकार यहाँ तैत्तिरीय उपनिषदमें जो सर्वज्ञत्व आदि लक्षणवाला ब्रह्म जगत् - कारणरूपसे विज्ञात है उस प्रकारके लक्षणवाला ब्रह्म ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य! पहले यह सारा प्रपञ्च एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' तदैक्षत ० ' ( उस सत्ने ईक्षण किया मैं बहुत हो जाऊँ अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ।

इस प्रकार ईक्षण कर उसने तेज उत्पन्न किया ) उसी प्रकार ' आत्मा वा ० ' ( सृष्टि के पूर्व यह सब जगत् केवल आत्मरूप ही था, दूसरा कोई सचेष्ट पदार्थ नहीं था, उसने ईक्षण किया कि मैं लोकोंकी सृष्टि करूँ ) इस प्रकार अन्यत्र - छान्दोग्यादि उपनिषदोंमें भी जाना जाता है। क्योंकि कारणस्वरूप निरूपण परक इस प्रकारके वाक्य समुदायका प्रत्येक उपनिषद् में अर्थ विषयक अविरोध है। परन्तु कहीं आकाशकी प्रथम सृष्टि, कहीं तेजकी प्रथम सृष्टि इस प्रकारका कार्य विषयक विरोध तो देखा जाता हैं।

कार्यं विषयक विरोध होनेसे भी सब वेदान्तोंमें अविरुद्धरूपसे प्रतीयमान कारण ब्रह्म भी अविवक्षित होना योग्य है ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा माननेपर अतिप्रसङ्ग हो जायगा। ' न वियदश्रुते . ' इस सूत्र से आरम्भकर कार्य विषयक विरोधका भी आचार्यं समाधान करेंगे। वेदान्त प्रतिपाद्य न होनेके कारण कार्य विषयक विरोध भले ही हो, परन्तु यह सृष्टि आदि प्रपञ्च वेदान्तवाक्योंसे प्रतिपादन करनेकी इच्छाका विषय ही नहीं है 1

। क्योंकि प्रपञ्चसे सम्बद्ध कोई भी पुरुषार्थ न देखा जाता है और न सुना जाता है और न उसकी कल्पना ही की जा सकती हैं। कारण कि उपक्रम और उपसंहारसे तत् तत् उपनिषदों में स्थित ब्रह्मविषयक वाक्योंके साथ सृष्टिवाक्योंकी एक वाक्यता अवगत होती है।

' अन्नेन सोम्य शुङ्गेन ० ( हे सोम्य! अन्नरूप कार्यंसे जलरूपमूलको खोज - प्राप्तकर, हे सोम्य! जलरूप कार्यं लिङ्गसे तेजरूप मूलको प्राप्तकर और हे सोम्य! तेजरूप कार्यसे सद्रूप मूलका निश्चयकर ) इसप्रकार श्रुति ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति के लिए सृष्टि आदि प्रपञ्च दिखलाती है। ऐसा ज्ञात होता है कि मृत्तिका आदि दृष्टान्तों द्वारा कार्यका कारणके साथ अभेद कहनेके लिए श्रुति सृष्टि आदि प्रपञ्च श्रवण करावी है।

' मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः ० ( [ उपनिषदोंमें ] मृत्तिका, लोहखण्ड और विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्तों द्वारा भिन्न - भिन्न प्रकारसे सृष्टिका निरूपण किया है वह [ ब्रह्मात्मैक्यमें ] बुद्धि प्रवेश करनेका उपायमात्र है, वस्तुतः उनमें कुछ भी भेद नहीं है ) इसप्रकार संप्रदायविद् आचार्य गौड़पाद कहते हैं।

' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ० ( ब्रह्मवित् परब्रह्मको प्राप्त होता है ) ' तरति ० ' ( आत्मवित् शोकमय संसारसे मुक्त हो जाता है ' तमेव ० ' ( उसे ही जानकर पुरुष मृत्युको पार करता है ) इसप्रकार ब्रह्मज्ञानसे सम्बद्ध फलकी श्रुति है ) ब्रह्मज्ञानसे विद्वानुको परमानन्दकी प्राप्ति, शोककी निवृत्ति और मृत्युका अतिक्रमणरूप फल प्रत्यक्ष अनुभव में आनेवाला है, क्योंकि जब ' तत्त्वमसि ' इसप्रकार असंसारी आत्मत्वका अपरोक्ष अनुभव होता है तब संसारी आत्मत्त्रकी निवृत्ति हो जाती है || १४ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व ग्रन्थके साथ इस अधिकरणको संगति कहनेके लिए ' प्रतिपादितम् ' इत्यादिसे वृत्तका अनुवाद करते हैं। पूर्वके तीन अधिकरणोद्वारा प्रधानको श्रुति अप्रतिपादित कहनेसे जगत्कारणत्व लक्षणसे ब्रह्म ही बुद्धिस्थ होता है, उसी बुद्धिस्थ निर्गुण ब्रह्म में वेदान्तवाक्योंका समन्वय है, इस प्रकार पूर्वग्रन्थसे सिद्ध किया गया है। उसमें लक्षण और समन्वय दोनों ही असिद्ध हैं, क्योंकि श्रुतियोंका परस्पर विरोध देखनेमें आता है। इस प्रकार पूर्वं ग्रन्थके साथ इस अधिकरणकी ' तत्र ' इत्यादिसे आक्षेप संगति कहते हैं। पूर्वपक्षी सृष्टि विषयक विरोध दिखलाकर अब ' तथा ' आदिके कारण विषयक विरोध भी दिखाते हैं।

8 कार्यं विषयक विरोध होनेसे कारण विषयक विरोध नहीं हो सकता, अन्यथा अतिप्रसंग हो जायगा अर्थात् प्रतिदिन स्वप्न सृष्टियाँ नाना प्रकारकी होती हैं, इससे ' मैं वही हूँ ' इस प्रकार जिस द्वष्टाकी प्रत्यभिज्ञा होती है उसमें भी नानात्व प्रसक्त होगा। यह दोषं सर्वत्र लागू होनेसे केवल अनिष्ट ही होगा। सृष्टिमें विरोध मानकर स्रष्टामें अविरोध दिखलाया गया है। सृष्टि विषयक भी विरोध नहीं है, अब इसे ' समाधास्यति ' आदिसे कहते हैं।

* ब्रह्म में ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ' इसका उपपादन करनेके लिए ही जगत् कारणत्वका अध्यारोप किया है। वेदोंमें सृष्टिका जो भिन्न - भिन्न वर्णन है वह स्वप्नसृष्टिके समान है अर्थात् जैसे स्वप्न सृष्टि में उत्पत्ति - क्रमका नियम नहीं है, वैसे जाग्रत् प्रपञ्चमें भी नहीं है। स्वप्न प्रपञ्चकी तरह यह सारा जाग्रत् प्रपञ्च भी भ्रममात्र है। इसलिए सृष्टि आदिके प्रतिपादनमें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है, किन्तु ' अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चः प्रपञ्च्यते ' ( अध्यारोप और अपवाद द्वारा निष्प्रपञ्च ब्रह्मका प्रपञ्चरूपसे वर्णन किया गया है ) इस प्रकार अध्यारोप और अपवादरूपसे अद्वितीय ब्रह्म के प्रतिपादन में ही तात्पर्य है॥ १४

1.4.15 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १५

सूत्र १.४.१५

समाकर्षात् ॥ १.४.१५ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 345

सूत्रार्थ — ' असदेवेदमग्र आसीत् ' इसप्रकार अनभिव्यक्त नाम रूप वाची असत् शब्दसे सत्का ही आकर्षण होता है, अतः असत् कारण विषयक आशङ्काका यहाँ अवकाश नहीं है।

शाङ्करभाष्य

असद्वा इदमग्र आसीत् इति नात्रासन्निरात्मकं कारणत्वेन श्राव्यते यतः असन्नेव स भवति। असद्ब्रह्मेति वेद चेत्। अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद।

सन्तमेनं ततो विदुः इत्यसद्वादापवादेनास्तित्वलक्षणं ब्रह्मान्नमयादिकोशपरम्परया प्रत्यगात्मानं निर्धार्य सोऽकामयत इति तमेव प्रकृतं समाकृष्य सप्रपञ्चां सृष्टिं तस्माच्छ्रावयित्वा तत्सत्यमित्याचक्षते इति चोपसंहृत्य तदप्येष श्लोको भवति इति तस्मिन्नेव प्रकृतेऽर्थे श्लोकमिममुदाहरति असद्वा इदमग्र आसीत् इति यदि त्वसन्निरात्मकमस्मिञ्श्लोकेऽभिप्रेयेत ततोऽन्यसमाकर्षणेऽन्यस्योदाहरणादसंबद्धं वाक्यमापद्येत तस्मान्नामरूपव्याकृतवस्तुविषयः प्रायेण सच्छब्दः प्रसिद्ध इति तद्व्याकरणाभावापेक्षया प्रागुत्पत्तेः सदेव ब्रह्मासदिवासीदित्युपचर्यते।

एषैव असदेवेदमग्र आसीत् इत्यत्रापि योजना तत्सदासीत् इति समाकर्षणात् अत्यन्ताभावाभ्युपगमे हि तत्सदासीत् इति किं समाकृष्येत तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत् इत्यत्रापि न श्रुत्यन्तराभिप्रायेणायमेकीयमतोपन्यासः क्रियायामिव वस्तुनि विकल्पस्यासंभवात् तस्माच्छ्रुतिपरिगृहीतसत्पक्षदार्ढ्यायैवायं मन्दमतिपरिकल्पितस्यासत्पक्षस्योपन्यस्य निरास इति द्रष्टव्यम्।

तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् इत्यत्रापि न निरध्यक्षस्य जगतो व्याकरणं कथ्यते स एष इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यः इत्यध्यक्षस्य व्याकृतकार्यानुप्रवेशित्वेन समाकर्षात् निरध्यक्षे व्याकरणाभ्युपगमे ह्यनन्तरेण प्रकृतावलम्बिना स इत्यनेन सर्वनाम्ना कः कार्यानुप्रवेशित्वेन समाकृष्येत चेतनस्य चायमात्मनः शरीरेऽनुप्रवेशः श्रूयते अनुप्रविष्टस्य चेतनत्वश्रवणात् पश्यंश्चक्षुः श्रृण्वञ्श्रोत्रं मन्वानो मनः इति अपि च यादृशमिदमद्यत्वे नामरूपाभ्यां व्याक्रियमाणं जगत्साध्यक्षं व्याक्रियते एवमादिसर्गेऽपीति गम्यते दृष्टविपरीतकल्पनानुपपत्तेः श्रुत्यन्तरमपि अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि इति साध्यक्षामेव जगतो व्याक्रियां दर्शयति व्याक्रियतं इत्यपि कर्मकर्तरि लकारः सत्येव परमेश्वरे व्याकर्तरि सौकर्यमपेक्ष्य द्रष्टव्यः यथा लूयते केदारः स्वयमेवेति सत्येव पूर्णके लवितरि यद्वा कर्मण्येवैष लकारोऽर्थाक्षिप्तं कर्त्रन्तरमपेक्ष्य द्रष्टव्यः यथा गम्यते ग्राम इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु ' असद्वा ० ( सृष्टिके पहले यह असत् ही था ) इत्यादि जो कारण विषयक विरोध दिखलाया गया है, उसका परिहार करना चाहिए। इसपर सूत्रकार कहते हैं—

' असद्वा ० ( सृष्टिके पहले यह असत् ही था ) इस तैत्तिरीय श्रुति में स्वरूप रहित असत्का कारणरूपसे श्रवण नहीं कराया जाता है, क्योंकि ' असन्नेव स भवति ० ' ( यदि पुरुष ब्रह्म असत् है, ऐसा जानता है तो वह स्वयं भी असत् हो जाता है, यदि ऐसा जानता है कि ब्रह्म ' सत् ' है तो ब्रह्मवेत्ता उसे सत् समझते हैं ) इसप्रकार असद्वादके अपवाद से सत्स्वरूप ब्रह्मको अन्नमय आदि कोशपरम्परासे • प्रत्यगात्मरूपसे निर्धारणकर ' सोऽकामयत ' ( उस परमात्माने कामना की ) इस प्रकार उसी प्रकृत ब्रह्मका समाकर्षणकर उसीसे विस्तृत सृष्टिका श्रवण कराकर ' तत्सत्यमि ० ' ( वह सत्य है ऐसा लोग कहते हैं ) इसप्रकार उपसंहारकर ' तदप्येष ० ' ( उसके विषय में ही श्लोक है ) इसप्रकार उसी प्रकृत ब्रह्मरूप अर्थ में ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' इस मन्त्रको उदाहरणरूपसे कहते हैं।

यदि इस श्लोक में स्वरूपरहित असत् अभिप्रेत हो तो अन्यका समाकर्षण होनेपर अन्यका उदाहरण देनेसे वाक्य असम्बद्ध हो जायगा अर्थात् जिस सत् प्रकृतका यहाँ समाकर्षण किया गया है उससे भिन्न असत्का उदाहरण होनेसे यह वाक्य असम्बद्ध हो जायगा। इसलिए नाम रूपसे अभिव्यक्त वस्तुमें प्रायः सत् शब्द प्रसिद्ध है, अतः सृष्टिसे पहले नाम - रूपके व्याकृताभावकी अपेक्षासे सत् ही ब्रह्म असत् - सा था ऐसा उपचार किया जाता है अर्थात् गौणवृत्तिसे असत् शब्दसे उपचार किया जाता है।

' असदेवेदमग्र आसीत् ' इस मन्त्रमें भी यहां योजना है, क्योंकि ' तत्सदासीत् ' ( वह सत् था ) इस वाक्य घटक ' तत् ' पदसे पूर्ववाक्य गत ' सत् ' का समाकर्षण ग्रहण है। यदि अत्यन्ताभावरूप असत् को स्वीकार करें तो ' तत्सदासीत् ' इसमें किसका समाकर्षण करेंगे अर्थात् स्वरूप शून्य असत्का समाकर्षण असंभव है और असत्का सद्रूपसे ग्रहण करना भी असंगत है।

' तर्द्धक ० ' ( उसीके विषयमें किन्होंने ऐसा भी कहा है कि सृष्टिके पहले यह असत् ही था ) इसमें भी अन्य श्रुतिके अभिप्राय से यह किसी एकीय मतका उपन्यास नहीं है अर्थात् इस मन्त्रका ' किसी शाखावाले कारणको असत् कहते हैं ' यह अर्थ नहीं है, क्योंकि क्रियाके समान वस्तुमें विकल्पका संभव नहीं है, इसलिए यहाँ यह समझना चाहिए कि श्रुति परिगृहीत सत् पक्षको दृढ़ करने के लिए मन्दमति पुरुषोंसे परिकल्पितं असत् पक्षका उपन्यासकर यह परिहार है।

' तद्धेदं ० ' ( उत्पत्ति से पूर्वं यह जगत् अव्याकृत था ) इसमें भी अध्यक्ष रहित जगत्का व्याकरण नहीं कहा जाता। ' स एष ० ' ( वह यह व्याकर्ता इस शरीर में नखाग्रपर्यन्त प्रवेश किए हुए हैं ) इसप्रकार अध्यक्षका व्याकृत वस्तुओंमें प्रवेश कर्तृत्वरूपसे समाकर्षण है। अध्यक्ष विना ही व्याकरण - नामरूपसे जगत्‌की अभिव्यक्ति स्वीकार करें तो [ स एष इह प्रविष्ठः ] इस अनन्तर ग्रन्थवर्ती प्रकृत अर्थका अवलम्बन करने वाले ' स ' इस सर्वनामसे कार्यमें अनुप्रवेशित्व से किसका समाकर्षण होगा?

और चेतन आत्माका शरीरमें यह अनुप्रवेश सुना जाता है, क्योंकि ' पश्यंश्चक्षु ० ' ( देखनेके कारण वह चक्षु द्रष्टा है, सुननेके कारण श्रोत्र श्रोता है, मनन करनेके कारण मन - मता है ) इसप्रकार अनुप्रवेश करनेवालेमें चेतनत्वका श्रवण है। और वर्तमान समय में नामरूपसे व्याकृत हुआ यह जगत् जैसा सकर्तृक व्याकृत होता है, वैसा ही आदि सृष्टि में था, ऐसा ज्ञात होता है।

क्योंकि दृष्ट - प्रत्यक्ष सिद्धसे विपरीत कल्पना नहीं की जा सकती है ' अनेन जीवेनात्मना ० ' ( मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों ( तेज, जल और अन्न ) देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ ) इसप्रकार दूसरी श्रुति भी जगत्की अभिव्यक्ति सकर्तृक ही दिखलाती है।

' व्याक्रियते ' यह कर्मकर्तामें लकार अभिव्यक्तिकर्ता परमेश्वरके होनेपर भी सौकर्यकी अपेक्षासे समझना चाहिए | जैसे केदार काटनेवाले किसी पूर्णक नामक व्यक्ति के रहनेपर मी ' लूयते केदार : ' ( क्यारी स्वयं ही कट रही है ) यह प्रयोग होता है, अथवा जैसे ' गम्यते ग्रामः ' ( ग्राम प्राप्त किया जाता है ) इसमें कर्ताका . आक्षेप किया जाता है, वैसे ही अर्थसे आक्षिप्त कर्ताकी अपेक्षासे कर्मके अर्थ में ही यह लकार समझना चाहिए।।१५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ‘ व्याक्रियते ' यह लकार कर्म में प्रयुक्त है, यह लोक प्रसिद्ध है कि कर्ताके विना कर्मकी सिद्धि नहीं होती, लकार कर्म में प्रयुक्त होनेसे कर्ता अर्थतः सिद्ध हो जाता है। इस विषयमें ' गम्यते ग्रामः ' यह लौकिक उदाहरण भी है। इससे यह सिद्ध हुआ कि श्रुतियोंका कारणके विषयमें अविरोध होनेसे उनका ब्रह्ममें समन्वय है।। १५

बालाक्यधिकरणम्

1.4.16 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १६

सूत्र १.४.१६

जगद्वाचित्वात् ॥ १.४.१६ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 347

सूत्रार्थ — ' यो ह वै बालाके ' इस श्रुतिमें कर्मशब्द सम्पूर्ण प्रपञ्चका वाचक होनेके कारण इसका कर्ता परमात्मा ही हैं।

शाङ्करभाष्य

कौषीतकिब्राह्मणे बालाक्यजातशत्रुसंवादे श्रूयते यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः इति। तत्र किं जीवो वेदितव्यत्वेनोपदिश्यते उत मुख्यः प्राणः उत परमात्मेति विशयः। किं तावत्प्राप्तम् प्राण इति।

कुतः यस्य वैतत्कर्म इति श्रवणात् परिस्पन्दलक्षणस्य च कर्मणः प्राणाश्रयत्वात् वाक्यशेषे च अथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति इति प्राणशब्दश्रवणात् प्राणशब्दस्य च मुख्ये प्राणे प्रसिद्धत्वात् ये चैते पुरस्ताद्बालाकिना आदित्ये पुरुषश्चन्द्रमसि पुरुषः इत्येवमादयः पुरुषा निर्दिष्टाः तेषामपि भवति प्राणः कर्ता प्राणावस्थाविशेषत्वादादित्यादिदेवतात्मनाम् कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते इति श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेः।

जीवो वायमिह वेदितव्यतयोपदिश्यते तस्यापि धर्माधर्मलक्षणं कर्म शक्यते श्रावयितुम् यस्य वैतत्कर्म इति सोऽपि भोक्तृत्वाद्भोगोपकरणभूतानामेतेषां पुरुषाणां च कर्तोपपद्यते वाक्यशेषे जीवलिङ्गमवगम्यते यत्कारणं वेदितव्यतयोपन्यस्तस्य पुरुषाणां कर्तुर्वेदनायोपेतं बालाकिं प्रति बुबोधयिषुरजातशत्रुः सुप्तं पुरुषमामन्त्र्य आमन्त्रणशब्दाश्रवणात्प्राणादीनामभोक्तृत्वं प्रतिबोध्य यष्टिघातोत्थापनात्प्राणादिव्यतिरिक्तं जीवं भोक्तारं प्रतिबोधयति तथा परस्तादपि जीवलिङ्गमवगम्यते तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्त्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते एवमेवैत आत्मान एतमात्मानं भुञ्जन्ति इति प्राणभृत्त्वाच्च जीवस्योपपन्नं प्राणशब्दत्वम्।

तस्माज्जीवमुख्यप्राणयोरन्यतर इह ग्रहणीयः न परमेश्वरः तल्लिङ्गानवगमादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः परमेश्वर एवायमेतेषां पुरुषाणां कर्ता स्यात् कस्मात् उपक्रमसामर्थ्यात्।

इह हि बालाकिरजातशत्रुणा सह ब्रह्म ते ब्रवाणि इति संवदितुमुपचक्रमे स च कतिचिदादित्याद्यधिकरणान्पुरुषानमुख्यब्रह्मदृष्टिभाज उक्त्वा तूष्णीं बभूव तमजातशत्रुः मृषा वै खलु मा संवदिष्ठा ब्रह्म ते ब्रवाणि इत्यमुख्यब्रह्मवादितयापोद्य तत्कर्तारमन्यं वेदितव्यतयोपचिक्षेप यदि सोऽप्यमुख्यब्रह्मदृष्टिभाक्स्यात् उपक्रमो बाध्येत तस्मात्परमेश्वर एवायं भवितुमर्हति। कर्तृत्वं चैतेषां पुरुषाणां न परमेश्वरादन्यस्य स्वातन्त्र्येणावकल्पते।

यस्य वैतत्कर्म इत्यपि नायं परिस्पन्दलक्षणस्य धर्माधर्मलक्षणस्य वा कर्मणो निर्देशः तयोरन्यतरस्याप्यप्रकृतत्वात् असंशब्दितत्वाच्च नापि पुरुषाणामयं निर्देशः एतेषां पुरुषाणां कर्ता इत्येव तेषां निर्दिष्टत्वात् लिङ्गवचनविगानाच्च नापि पुरुषविषयस्य करोत्यर्थस्य क्रियाफलस्य वायं निर्देशः कर्तृशब्देनैव तयोरुपात्तत्वात् पारिशेष्यात्प्रत्यक्षसंनिहितं जगत्सर्वनाम्नैतच्छब्देन निर्दिश्यते क्रियत इति च तदेव जगत्कर्म ननु जगदप्यप्रकृतमसंशब्दितं च सत्यमेतत् तथाप्यसति विशेषोपादाने साधारणेनार्थेन संनिधानेन संनिहितवस्तुमात्रस्यायं निर्देश इति गम्यते न विशिष्टस्य कस्यचित्त विशेषसंनिधानाभावात् पूर्वत्र च जगदेकदेशभूतानां पुरुषाणां विशेषोपादानादविशेषितं जगदेवेहोपादीयत इति गम्यते।

एतदुक्तं भवति य एतेषां पुरुषाणां जगदेकदेशभूतानां कर्ता किमनेन विशेषेण यस्य वा कृत्स्नमेव जगदविशेषितं कर्मेतिवाशब्द एकदेशावच्छिन्नकर्तृत्वव्यावृत्त्यर्थः ये बालाकिना ब्रह्मत्वाभिमताः पुरुषाः कीर्तिताः तेषामब्रह्मत्वख्यापनाय विशेषोपादानम्। एवं ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेन सामान्यविशेषाभ्यां जगतः कर्ता वेदितव्यतयोपदिश्यते परमेश्वरश्च सर्वजगतः कर्ता सर्ववेदान्तेष्ववधारितः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कौषीतकिब्राह्मणमें बालाकि और अजातशत्रुके संवादमें ' यो वै बालाक ० ' ( हे बालाकि! जो इन पुरुषोंका कर्ता है अथवा यह सम्पूर्ण प्रपञ्च जिसका कर्म है वही जानने योग्य है ) ऐसी श्रुति। इसमें वेदितव्यरूपसे क्या जीव उपदिष्ट है अथवा मुख्य प्राण वा परमात्मा? ऐसा संशय होता है। तब क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्षी - प्राण उपदिष्ट है, क्यों? क्योंकि ' यस्य वैतत्कर्म ' ऐसी श्रुति है। चलनात्मक कर्म प्राणके आश्रित है।

और ' अथास्मिन्प्राण ० ' ( जाग्रत् और स्वप्न जनक कर्मकी उपरति अनन्तर सुषुप्ति में इस प्राणमें ही सब एक होता है ) इस तरह वाक्यशेषमें प्राणशब्दका श्रवण है और प्राणशब्द मुख्यप्राण में प्रसिद्ध है। ' आदित्ये पुरुष : ० ' ( आदित्य में पुरुष है, चन्द्रमा में पुरुष है ) इस प्रकार बालाकिने पहले इन जिन आदित्यादि पुरुषोंका निर्देश किया है उनका भी कर्ता प्राण है, क्योंकि आदित्य आदि देवता प्राणकी भिन्न - भिन्न अवस्थाएं हैं, ' कतम एको देव ० ' ( शाकल्य – एक देव कौन है?

याज्ञवल्क्य - प्राण, वह ब्रह्म है, उसीको त्यत् ( परोक्ष ) ऐसा कहते हैं ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें प्रसिद्ध है। अथवा यहाँ वेदितव्यरूपसे यह जीव उपदिष्ट है। उसका भी धर्माधर्मरूप कर्म ' यस्य वैतत्कर्म ' इसप्रकार सुनाया जा सकता है। वह भी मोक्ता होने से भोग के साधनभूत इन पुरुषोंका अदृष्टद्वारा कर्ता हो सकता है।

और वाक्यशेषमें भी जीवका लिङ्ग अवगत होता है, क्योंकि वेदितव्यरूपसे उपन्यस्त जो पुरुषोंका कर्ता है उसका ज्ञान प्राप्त करनेके लिए प्राप्त बालाकिको बोध करानेके अभिलाशी अजातशत्रुने सुप्त पुरुषको पुकारा उस आमन्त्रण शब्दको न सुननेके कारण प्राणादि अभोक्ता हैं ऐसा बोध कराकर पुनः लाठीके प्रहारसे उस सुप्तपुरुषके जागनेसे यह समझाया कि प्राण आदि से भिन्न जीव भोक्ता है।

तथा अग्रिम वाक्यमें भी ' तद्यथा ० ' ( जैसे स्वामी अपने सेवक आदि द्वारा उपहृत वस्तुका उपभोग करता है और वे सेवक आदि उस स्वामीसे आजीविका पाते हैं, वैसे यह प्रज्ञात्मा इन आत्माओं द्वारा उपभोग करता है और ये आत्माएँ - देवता या इन्द्रियादि उस प्रज्ञात्मा के आश्रित भोग प्राप्त करती हैं ) इसप्रकार जीवलिङ्ग अवगत होता है। प्राणधारी होनेसे भी जीव में प्राणशब्द युक्त है। इसलिए जीव और मुख्यप्राणमें से एकका यहाँ ग्रहण करना चाहिए, परमेश्वरका नहीं, क्योंकि उसका लिङ्ग ज्ञात नहीं है।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह परमेश्वर ही इन पुरुषोंका कर्ता हो, किससे? इससे कि उपक्रमकी ऐसी सामर्थ्य है। यहाँ बालाकिने अजातशत्रुके साथ ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इसप्रकार बातचीत आरम्भकी और आदित्य आदिमें रहनेवाले अमुख्यब्रह्मदृष्टि भागी कुछ पुरुषोंको कहकर वह चुप हो गया। ' मृषा वै खलु ० ' ( तुमने मुझसे यह मिथ्या कहा कि मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करता हूँ ) इसप्रकार अजातशत्रुने बालाकिका अमुख्यब्रह्मवादिरूपसे निषेधकर उनके कर्ता अन्यको वेदितव्यरूपसे आक्षेप किया।

यदि वह वेदितव्य भी अमुख्य ब्रह्म ( ब्रह्मसे भिन्न ) दृष्टिका भागी हो तो उपक्रम बाधित होगा। इसलिए यह परमेश्वर ही होना चाहिए। परमेश्वरसे अन्य इन पुरुषों का स्वतन्त्ररूपसे कर्ता नहीं हो सकता। किञ्च यस्य वैतत्कर्भ ' यह निर्देश भो चलनात्मक अथवा धर्माधर्मात्मक कर्मके विषय में नहीं है, क्योंकि इन दोनों में से कोई भी प्रकृत नहीं है और श्रुति प्रतिपादित नहीं हैं। पुरुषोंके लिए भी यह निर्देश नहीं है, क्योंकि इन पुरुषोंका कर्ता, इस प्रकार उनका निर्देश हो गया है।

एवं लिङ्ग और वचनका भेद है अर्थात् ' यस्य वैतत्कर्म ' यहाँ एकवचन और नपुंसक लिङ्ग हैं और पुरुषोत्पादन अथवा उसका फल पुरुष जन्मका भी यह निर्देश नहीं है, क्योंकि कर्तृशब्द से ही दोनोंका ग्रहण किया गया है। परिशेषसे प्रत्यक्ष संनिहित जगत्का सर्वनाम ' एतत् ' शब्दसे निर्देश किया जाता है, जो किया जाय वह कर्म है, इस व्युत्पत्तिसे वह जगत् ही कर्म है। परन्तु जगत् भी अप्रकृत और श्रुति अप्रतिपादित है।

यह सत्य है, तो मी ऐसा ज्ञात होता है कि विशेष वस्तुका ग्रहण न होनेसे साधारण अर्थके साथ संनिधान से संनिहित वस्तुमात्रका यह निर्देश है किसी विशिष्ट वस्तुका नहीं, क्यों के विशेष संनिधान नहीं है। पूर्ववाक्य में जगत् के एक देशभूत पुरुषोंका विशेषरूपसे ग्रहण करनेसे यह ज्ञात होता है कि अविशेषित ( सामान्य ) जगत्का ही यहाँ ग्रहण है। तात्पर्य यह है— जगत् के एक देशभूत इन पुरुषोंका जो कर्ता है। इस विशेष कथनका क्या प्रयोजन है? जिसका तो सामान्यरूपसे सारा जगत् ही कर्म है।

[ यस्य वा एतत् कर्म ] श्रुतिस्थ ' वा ' शब्द एक देशके कर्तृत्वकी व्यावृत्तिके लिए है। बालाकि द्वारा ब्रह्मरूपसे अभिमत जो पुरुष कहे गये हैं वे अब्रह्म हैं ऐसा कहनेके लिए विशेषका ग्रहण है। इस प्रकार ब्राह्मणपरिव्राजक न्यायसे सामान्य और विशेषसे जगत्का कर्ता वेदितव्यरूपसे उपदिष्ट है। सभी वेदान्तोंमें यह निर्णय है कि परमेश्वर ही समस्त जगत्‌का कर्ता है || १६ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व अधिकरणमें एक वाक्यस्थ सत् आदि शब्दोंके बलसे असत् शब्दका अर्थं किया गया है | यहाँ तो ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इसप्रकार बालाकि वाक्यस्थ ब्रह्मशब्दसे प्राणशब्द ब्रह्मपरक नहीं माना जा सकता, क्योंकि यहाँ वाक्यभेद है, इसप्रकार प्रत्युदाहरणसंगतिसे ' किं तावत् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं | ‘ यो वै बालाके ० ' इत्यादि वाक्य समुदाय इस अधिकरणका विषय वाक्य है। किसी समय एक गर्ग गोत्रीय विद्याभारसे गर्वित बालाकि ब्राह्मणने काशीराज अजातशत्रुके पास आकर कहा' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' ( मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश देता हूँ ) अनन्तर उसने राजाको आदित्य, चन्द्रमा, विद्युत्, आकाश, वायु, अग्नि और जल आदिके अभिमानी अनेक देवताओं का उपदेश किया। परन्तु राजा इन सबको जानता था, राजाने कहा - हे ब्रह्मन्! यदि इससे अधिक जानते हो तो कहो! बालाकि को चुप देखकर राजाने उसे परमात्माको समझानेके लिए उपदेश किया है। पूर्वपक्षीने राजाके इस वचनको प्राणविषयक मानकर पूर्वपक्ष किया है। अब ' जीवो वा ' आदिसे जीवके विषयमें पूर्वपक्ष करते हैं।

* ' एतत्कर्म ' इस नपुंसक एकवचन ' एतत् ' शब्द से ' पुरुषा : ' इस पुल्लिंग और बहुवचनका परामर्श नहीं हो सकता। ' पुरुषा : ' इसप्रकार पुरुषोंमें बहुवचन और पुल्लिंग है जब कि ' एतत्कर्म ' यहाँ एक वचन और नपुंसक लिङ्ग है, इससे ' यस्य वैतत्कर्म ' इस वाक्य में पुरुषोंका परामर्श नहीं हो सकता। पुरुषोत्पादक कर्ता व्यापार ' करोति ' का अर्थ उत्पादन और उत्पादनका फल पुरुष जन्म इन दोनोंका ही कर्तृशब्दसे ग्रहण हो चुका है, अतः उनका पृथक् निर्देश नहीं किया गया है। क्रिया और फलके बिना कर्तृत्व अनुपपन्न है, इसलिए कर्तृशब्दसे दोनोंका ग्रहण होता है। परिशेषसे यहाँ संनिहित जगत् ही कर्मशब्द ग्राह्य है और उसका कर्ता परमेश्वर ही है।

* ब्राह्मणपरिव्राजकन्याय -- ' ब्राह्मणा भोजयितव्याः परिव्राजकाश्च ' ( ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और परिव्राजकोंको भी ) इस वाक्यमें जैसे ब्राह्मणशब्द परिव्राजकसे मित्र ब्राह्मणका वाचक है, वैसे ही ' एतत्कर्म ' यह कर्म शब्द भी पुरुषोंसे भिन्न समस्त जगत्का वाचक है। यद्यपि कर्मशब्द परिस्पन्दन तथा धर्माधर्ममें रूठ है और रूढि योगसे बलवती होती है, तो मी प्रकरणमें वह अपेक्षित नहीं है, क्योंकि ' क्रियते इति कर्म ' इस योगसे उन दोनोंका भी ग्रहण हो सकता है। जहाँ योगसे रूढ्यर्थका संग्रह नहीं होता वहाँ रूढिका पृथक् ग्रहण किया जाता है। अथवा ब्राह्मण कहने पर स्वतः परिव्राजकका ग्रहण होनेपर भी विशेष बोधके लिए जैसे परिव्राजकका पृथक् ग्रहण है, वैसे ही कर्मशब्दसे आदित्य आदि पुरुषोंका ग्रहण होनेपर उनमें अब्रह्मत्व बोध कराने के लिए देवता निरूपित कर्तृत्वका श्रुतिमें पृथक् ग्रहण किया गया है। अतः सब वेदान्तोंमें परमेश्वर ही इस सम्पूर्ण प्रपञ्चका कर्ता और वेदितव्यरूप से प्रतिपादित है। पूर्वपक्ष में यह वाक्य प्राणोपासना परक है, अतः वह ब्रह्म में समन्वित नहीं है, सिद्धान्तमें यह वाक्य ज्ञेयब्रह्ममें समन्वित है॥१६

1.4.17 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १७

सूत्र १.४.१७

जीवमुख्यप्राणलिङ्गान् नेति चेत् तद्व्याख्यातम् ॥ १.४.१७ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 350

पदच्छेद — जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् , न , इति चेत् , तत् , व्याख्यातम्

सूत्रार्थ — ( जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् ) पूर्ववाक्यमें जीव और मुख्यप्राणके लिङ्ग होनेसे ( न ) यह श्रुति ब्रह्मपरक नहीं है, ( इति चेत् ) ऐसा यदि कहो तो ( व्याख्यातम् ) प्रदर्दनाधिकरणमें उसका व्याख्यान हो गया है |

शाङ्करभाष्य

अथ यदुक्तं वाक्यशेषगताज्जीवलिङ्गान्मुख्यप्राणलिङ्गाच्च तयोरेवान्यतरस्येह ग्रहणं न्याय्यं न परमेश्वरस्येति तत्परिहर्तव्यम् अत्रोच्यते परिहृतं चैतत् नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् इत्यत्र त्रिविधं ह्यत्रोपासनमेवं सति प्रसज्येत जीवोपासनं मुख्यप्राणोपासनं ब्रह्मोपासनं चेति न चैतन्न्याय्यम् उपक्रमोपसंहाराभ्यां हि ब्रह्मविषयत्वमस्य वाक्यस्यावगम्यते तत्रोपक्रमस्य तावद्ब्रह्मविषयत्वं दर्शितम् उपसंहारस्यापि निरतिशयफलश्रवणाद्ब्रह्मविषयत्वं दृश्यते सर्वान्पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां च भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येति य एवं वेद इति। नन्वेवं सति प्रतर्दनवाक्यनिर्णयेनैवेदमपि वाक्यं निर्णीयेत न निर्णीयते यस्य वैतत्कर्म इत्यस्य ब्रह्मविषयत्वेन तत्र अनिर्धारितत्वात् तस्मादत्र जीवमुख्यप्राणशङ्का पुनरुत्पद्यमाना निवर्त्यते प्राणशब्दोऽपि ब्रह्मविषयो दृष्टः प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः इत्यत्र जीवलिङ्गमप्युपक्रमोपसंहारयोर्ब्रह्मविषयत्वादभेदाभिप्रायेण योजयितव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह कहा गया है कि वाक्यशेषगत भोक्तृत्व जीव लिङ्गसे और स्पन्दनरूप मुख्यप्राण लिङ्ग यहाँ जीव और प्राणमें से किसी एकका ग्रहण करना युक्त है परमेश्वरका नहीं, उसका परिहार करना चाहिए, इसपर कहते हैं - ' नोपासा त्रैविध्यादा ० ' इस सूत्रमें उसका परिहार किया गया है, क्योंकि ऐसा होनेपर यहाँ जीवोपासना, मुख्यप्राणोपासना और ब्रह्मोपासना इस प्रकार तीन उपासनाएँ प्रसक्त होंगी, परन्तु युक्त नहीं है, कारण कि उपक्रम और उपसंहारसे [ यो वै बालाके ] यह वाक्य ब्रह्म विषयक अवगत होता है।

( उन दोनों में उपक्रम ब्रह्म विषयक दिखलाया गया है। ' और ' सर्वान्पाप्मनो ० ' ( जो उसे इस प्रकार जानता है वह सब पापोंका नाशकर सब भूतों में श्रेष्ठत्व, स्वराज्य और आधिपत्य प्राप्त करता है ) इस प्रकार उपसंहार भी निरतिशय फलका श्रवण होनेसे ब्रह्मविषयक देखा जाता है। परन्तु ऐसा होनेपर तो प्रतर्दनवाक्यके निर्णय से इस वाक्यका भी निर्णय हो जाता, किन्तु निर्णय नहीं होता, क्योंकि ' यस्य वैतत्कर्म ' इसका ब्रह्म विषयरूपसे वहाँ निर्धारण नहीं किया गया है।

इसलिए यहाँ पुन : उत्पन्न हुई जीव ओर मुख्यप्राण शङ्काका निवारण किया जाता है। ' प्राणबन्धनं हि ० ' ( हे सोम्य! मन प्राणरूप बन्धनवाला ही है ) इसमें प्राणशब्द भी ब्रह्मविषयक देखा गया है। उपक्रम और उपसंहार ब्रह्मविषयक होनेसे जीव लिङ्गकी मी अभेदाभिप्रायसे ही योजना करनी चाहिए॥ १७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' सर्वान्पाप्मनोऽपहत्य ' इस श्रौत उपसंहारसे यह निश्चय होता है कि बालाकि और अजातशत्रुके संवादरूप वाक्य समुदायमें ब्रह्म ही वेदितव्यरूपसे उपदिष्ट है। जीव और मुख्यप्राणकी उपासना पक्षमें ब्रह्मविषयक उपक्रमका और सर्व पापनिवृत्ति, स्वराज्य - निरतिशय फलकी प्राप्ति और आधिपत्य बोधक उपसंहारका स्पष्ट विरोध है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके विना जीव और प्राणकी उपासना से सर्वपापकी निवृत्ति और स्वराज्यकी प्राप्ति असम्भव है || १७ ||

1.4.18 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १८

सूत्र १.४.१८

अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् अपि चैवम् एके ॥ १.४.१८ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 351

पदच्छेद — अन्यार्थम् , तु , जैमिनिः , प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् , अपि , च , एवम् , एके

सूत्रार्थ — ( जैमिनिस्तु ) आचार्य जैमिनि तो ऐसा मानते हैं कि इस प्रकरणमें जीवका परामर्श ( अन्यार्थम् ) ब्रह्मज्ञानके लिए है। ( प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् ) ' क्वैष एतद्बालाके ' क्योंकि ऐसा प्रश्न और ' यदा सुप्तः स्वप्नं न कश्चन ० ' ऐसा उत्तर है, ( अपि च ) किव ( एके ) वाजसनेयिशाखावाले ( एवम् ) ' य एष विज्ञानमय : ० ' इस प्रश्न और ' य एषोऽन्तहृदय ' इस उत्तर द्वारा स्पष्ट कहते हैं कि विज्ञानात्मा परमात्मासे भिन्न है।

शाङ्करभाष्य

अपि च नैवात्र विवदितव्यम् जीवप्रधानं वेदं वाक्यं स्यात् ब्रह्मप्रधानं वेति यतोऽन्यार्थं जीवपरामर्शं ब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थमस्मिन्वाक्ये जैमिनिराचार्यो मन्यते कस्मात् प्रश्नव्याख्यानाभ्याम्।

प्रश्नस्तावत्सुषुप्तपुरुषप्रतिबोधनेन प्राणादिव्यतिरिक्ते जीवे प्रतिबोधिते पुनर्जीवव्यतिरिक्तविषयो दृश्यते क्वैष एतद्बालाके पुरुषोऽशयिष्ट क्व वा एतदभूत्कुत एतदागात् इति प्रतिवचनमपि यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति इत्यादि एतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः इति च सुषुप्तिकाले च परेण ब्रह्मणा जीव एकतां गच्छति परस्माच्च ब्रह्मणः प्राणादिकं जगज्जायत इति वेदान्तमर्यादा।

तस्माद्यत्रास्य जीवस्य निःसंबोधस्वस्थतारूपः स्वापः उपाधिजनितविशेषविज्ञानरहितं स्वरूपम् यतस्तद्भ्रंशरूपमागमनम् सोऽत्र परमात्मा वेदितव्यतया श्रावित इति गम्यते।

अपि चैवमेके शाखिनो वाजसनेयिनोऽस्मिन्नेव बालाक्यजातशत्रुसंवादे स्पष्टं विज्ञानमयशब्देन जीवमाम्नाय तद्व्यतिरिक्तं परमात्मानमामनन्ति य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत एतदागात् इति प्रश्ने प्रतिवचनेऽपि य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्शेते इति आकाशशब्दश्च परमात्मनि प्रयुक्तः दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः इत्यत्र सर्व एत आत्मानो व्युच्चरन्ति इति चोपाधिमतामात्मनामन्यतो व्युच्चरणमामनन्तः परमात्मानमेव कारणत्वेनामनन्तीति गम्यते।

प्राणनिराकरणस्यापि सुषुप्तपुरुषोत्थापनेन प्राणादिव्यतिरिक्तोपदेशोऽभ्युच्चयः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और यहाँ विवाद भी नहीं करना चाहिए कि यह वाक्य जीव प्रधान है अथवा ब्रह्म प्रधान, कारण कि इस वाक्यमें आचार्य जैमिनि जीव परामर्श को अन्यार्थक -ब्रह्म - प्रतिपत्ति के लिए मानते हैं ; किससे? इससे कि प्रश्न और व्याख्यान - उत्तर हैं। सोये हुए पुरुषको उठाकर प्राणादिसे अन्य जीवके . प्रतिबोधित होनेपर ' क्वैष एतद् बालाके पुरुषो ० ' ( हे बालाकि!

यह पुरुष कहाँ सोता था, यह शयन कहाँ हुआ था अर्थात् यह सुप्त पुरुष किसको प्राप्त हुआ था और ऐक्य भ्रंशरूप आगमन कहाँसे हुआ ) इस प्रकार जीवसे भिन्न विषयक फिर प्रश्न देखा जाता है। और ' यदा सुप्तः ० ( सोता हुआ पुरुष जब कोई स्वप्न नहीं देखता तब इस प्राणमें ही एक होता है ) इत्यादि और ' एतस्मादात्मनः ० ' " ( इस आत्मासे विस्फुलिङ्गोंकी तरह वाग् आदि प्राण अपने - अपने स्थानपर जाते हैं, प्राणोंसे देव और देवोंसे लोक निकलते - उत्पन्न होते हैं ) प्रतिवचन भी है।

सुषुप्तिकाल में जीव परब्रह्म के साथ एक हो जाता है और परब्रह्मसे प्राणादि जगत् उत्पन्न होता है, यह वेदान्त मर्यादा - सिद्धान्त है। इससे ज्ञात होता है कि जिसमें इस जीवका मान रहित स्वच्छतारूप स्वाप है अर्थात् उपाधि जनित विशेष विज्ञान रहित स्वरूप हैं, जिस स्वरूपसे वह पतनरूप आगमन है, वह परमात्मा यहाँ वेदितव्यरूपसं सुनाया जाता है अर्थात् प्रतिपादित है।

और इस प्रकार एक वाजसनेय शाखावाले बालांकि और अजातशत्रुके इसी संवादमें विज्ञानमय शब्दसे जीवका स्पष्ट श्रवण कराके उससे अन्य परमात्माको ' य एष विज्ञानमयः ' ( यह जो विज्ञानमय पुरुष हैं, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था? और यह कहाँसे आया? ) इस प्रश्नमें और ' य एष ० ' ( हृदयमें जो यह आकाश है उसमें सोता है ) इस प्रतिवचनमें भी कहते हैं। ' दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश : ' ( इसमें जो सूक्ष्म आकाश है ) इस छान्दोग्य श्रुतिमें माकाश शब्द परमात्मा में प्रयुक्त है।

' सर्व एत आत्मनो ० ( ये सब आत्मासे निकलते हैं ) इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि उपाधि युक्त आत्माओंका अन्यमेंसे निकलना श्रवण कराते हुए परमात्माका ही कारणरूप से प्रतिपादन करते हैं। प्राणके निराकरण में सुषुप्त पुरुषके उत्थानके साथ प्राणांदिसे अतिरिक्त जीवके उपदेशरूप हेतुका भो संग्रह कर लेना चहिए अर्थात् प्राणके निराकरण में यह भी हेतु है।। १८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * प्रथम सूत्रमें भोवतृत्व आदि जीव लिङ्गसे ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है। परन्तु इस सूत्रमें, जीवलिङ्गसे जीवके कथन द्वारा ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि ' क्वैष एतद् बालाके ० ' इन वाक्योंमें जीवका परामर्श ब्रह्म के जाननेके लिए है।

* ' सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ० ( छा ० ६/८/१ ) ( हे सोम्य! सुषुप्ति में जीव सत् ब्रह्म के साथ एक होता है ) इस प्रकार सुषुप्ति में जीवका आविर्भाव और तिरोभाव ब्रह्म में ही होता है। चेतन जीव जड़ प्राणके साथ कदापि एक नहीं हो सकता। ' प्राणस्य प्राणम् ' ( वह तो प्राणका प्राण है ) इस प्रकार यहाँ प्राण शब्द ब्रह्मका प्रतिपादक है। इसलिए यहाँ परमात्मा ही सबका कारणरूपसे उपदिष्ट और वेदितव्य है। यहाँ जीव निराकरणकी तरह प्राणके निराकरणमें भी यह सूत्र हेतु समझना चाहिए। अतः यह सिद्ध हुआ कि उक्त वाक्य जीवके परमार्थरूप प्रतिपादन द्वारा ब्रह्ममें ही समन्वित है॥१८

वाक्यान्वयाधिकरणम्

1.4.19 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १९

सूत्र १.४.१९

वाक्यान्वयात् ॥ १.४.१९ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.१९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 352

सूत्रार्थ — - ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्य : ' इस श्रुतिमें द्रष्टव्य आदि रूपसे उपदिष्ट आत्मा परमात्मा ही है, क्योंकि उपक्रम आदिके पर्यालोचनसे ज्ञात होता हैं कि ब्रह्म में ही वाक्यका अन्वय है।

शाङ्करभाष्य

ब्रृहदारण्यके मैत्रेयीब्राह्मणेऽभिधीयते न वा अरे पत्युः कामाय इत्युपक्रम्य न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् इति तत्रैतद्विचिकित्स्यते किं विज्ञानात्मैवायं द्रष्टव्यश्रोतव्यत्वादिरूपेणोपदिश्यते आहोस्वित्परमात्मेति।

कुतः पुनरेषा विचिकित्सा प्रियसंसूचितेनात्मना भोक्त्रोपक्रमाद्विज्ञानात्मोपदेश इति प्रतिभाति तथात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानोपदेशात्परमात्मोपदेश इति। किं तावत्प्राप्तम् विज्ञानात्मोपदेश इति कस्मात् उपक्रमसामर्थ्यात्।

पतिजायापुत्रवित्तादिकं हि भोग्यभूतं सर्वं जगत् आत्मार्थतया प्रियं भवतीति प्रियसंसूचितं भोक्तारमात्मानमुपक्रम्यानन्तरमिदमात्मनो दर्शनाद्युपदिश्यमानं कस्यान्यस्यात्मनः स्यात् मध्येऽपि इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्ति इति प्रकृतस्यैव महतो भूतस्य द्रष्टव्यस्य भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञानात्मभावेन ब्रुवन्विज्ञानात्मन एवेदं द्रष्टव्यत्वं दर्शयति तथा विज्ञातारमरे केन विजानीयात् इति कर्तृवचनेन शब्देनोपसंहरन्विज्ञानात्मानमेवेहोपदिष्टं दर्शयति तस्मादात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानवचनं भोक्त्रर्थत्वाद्भोग्यजातस्यौपचारिकं द्रष्टव्यमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः परमात्मोपदेश एवायम् कस्मात् वाक्यान्वयात्।

वाक्यं हीदं पौर्वापर्येणावेक्ष्यमाणं परमात्मानं प्रत्यन्वितावयवं लक्ष्यते कथमिति तदुपपाद्यते अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन इति याज्ञवल्क्यादुपश्रुत्य येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहि इत्यमृतत्वमाशासानायै मैत्रेय्यै याज्ञवल्क्य आत्मविज्ञानमुपदिशति न चान्यत्र परमात्मविज्ञानादमृतत्वमस्तीति श्रुतिस्मृतिवादा वदन्ति तथा चात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानमुच्यमानं नान्यत्र परमकारणविज्ञानान्मुख्यमवकल्पते न चैतदौपचारिकमाश्रयितुं शक्यम् यत्कारणमात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञायानन्तरेण ग्रन्थेन तदेवोपपादयति ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद इत्यादिना यो हि ब्रह्मक्षत्रादिकं जगदात्मनोऽन्यत्र स्वातन्त्र्येण लब्धसद्भावं पश्यति तं मिथ्यादर्शिनं तदेव मिथ्यादृष्टं ब्रह्मक्षत्रादिकं जगत्पराकरोतीति भेददृष्टिमपोद्य इदं सर्वं यदयमात्मा इति सर्वस्य वस्तुजातस्यात्माव्यतिरेकमवतारयति दुन्दुभ्यादिदृष्टान्तैश्च तमेवाव्यतिरेकं द्रढयति अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः इत्यादिना च प्रकृतस्यात्मनो नामरूपकर्मप्रपञ्चकारणतां व्याचक्षाणः परमात्मानमेवैनं गमयति तथैवैकायनप्रक्रियायामपि सविषयस्य सेन्द्रियस्य सान्तःकरणस्य प्रपञ्चस्यैकायनमनन्तरमबाह्यं कृत्स्नं प्रज्ञानघनं व्याचक्षाणः परमात्मानमेवैनं गमयति।

तस्मात्परमात्मन एवायं दर्शनाद्युपदेश इति गम्यते।। यत्पुनरुक्तं प्रियसंसूचितोपक्रमाद्विज्ञानात्मन एवायं दर्शनाद्युपदेश इति अत्र ब्रूमः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बृहदारष्यकके मैत्रेयीब्राह्मण में ' न वा अरे पत्युः ' ( अरे मैत्रेयी! स्त्रीको पतिके लिए पति प्रिय नहीं होता ) इस प्रकार आरम्भकर आगे ' न वा अरे ० ' ( अरे मैत्रेयी! सबके प्रयोजनके लिए सब प्रिय नहीं होते, अपने प्रयोजन - सुख के लिए सब प्रिय होते हैं, अतः ' अरी मैत्रेयी! आत्मा ही दर्शनके योग्य है, अतः उसका श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए, अरी मैत्रेयी!

निश्चय ही आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञानसे यह सब विदित हो जाता है ) इस प्रकार अध्ययन करते हैं। यहाँ यह संशय होता है कि क्या यह विज्ञानात्मा ही द्रष्टव्य श्रोतव्यादिरूपसे उपदिष्ट है अथवा परमात्मा? मला यह संशय क्यों होता है? प्रियशब्द से सूचित भोक्ता आत्माका उपक्रम होनेके कारण प्रतीत होता है कि विज्ञानात्माका उपदेश है। उसी प्रकार आत्मविज्ञानसे सबके विज्ञानका उपदेश होने से परमात्माका उपदेश प्रतीत होता है। तब क्या प्राप्त होता है?

पूर्वपक्षी - विज्ञानात्माका यह उपदेश है, किससे? इससे उपक्रमको सामर्थ्य है। पति, स्त्री, पुत्र, वित्त आदि भोग्यरूप सारा जगत् आत्माके लिए प्रिय होता है, इसप्रकार प्रिय शब्द से संसूचित मोक्ता आत्माका उपक्रमकर अनन्तर उपदेश किए हुए आत्मा के दर्शनादि किसी अन्य आत्माके होंगे? मध्यमें मी ' इदं महद्भूत ० ' ( यह महान्, सत्य, अनन्त, अपार और विज्ञानेकरस इन भूतोंसे विशेषरूपसे समु स्थित होकर उन्हीं के साथ नष्ट हो जाता है।

इसप्रकार मर जानेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती ) इसप्रकार प्रकृत द्रष्टव्य महान् भूतका ही भूतोंसे विज्ञानात्मरूपसे समुत्थान कहती हुई श्रुति विज्ञात्मा ही द्रष्टव्य है ऐसा दिखलाती है। इसीप्रकार ' विज्ञातारमरे ० ' ( अरे मैत्रेयी! विज्ञाताको किससे जाने ) इसप्रकार कर्तृवाचकशब्दसे उपसंहार करती हुई श्रुति विज्ञाता विज्ञानात्मा ही . उपदिष्ट है ऐसा दिखालाती है | इससे यह समझना चाहिए कि आत्मविज्ञानसे सबका विज्ञान होता है, यह वचन

लिए होनेसे भोग्य समूहमें गौण है।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - परमात्माका ही यह उपदेश है, किससे? इसमें ही वाक्योंके अन्वय होनेसे। पूर्वापर के पर्यालोचनसे इस वाक्यके अवयव अवेक्ष्यमाण परमात्मा में ही अन्वित लक्षित होते हैं। कैसे अन्वित होते हैं? उसका उपपादन करते हैं ' अमृतत्वस्य ० ' ( अमृतत्वकी तो वित्तसे आशा नहीं है ) इस प्रकार याज्ञवल्क्यसे सुनकर ' येनाहं ० ' ( जिससे में अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी? हे भगवन्!

जो अमृतत्वका साधन जानते हों वही मुझे बतलावें ) इस तरह अमृतत्वकी आशा रखनेवाली मैत्रेयीको याज्ञवल्क्य इस आत्मविज्ञानका उपदेश करते हैं। परमात्मविज्ञानके सिवा अमृतत्वकी प्राप्ति नहीं है, ऐसा श्रुति और स्मृति वचन कहते हैं।

उसी प्रकार आत्मविज्ञानसे कहा हुआ जो सर्वविज्ञान है वह पर कारण विज्ञानके विना मुख्यरूप से नहीं हो सकता, यह कथन औपचारिक भी ग्रहण नहीं किया जा सकता, क्योंकि आत्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञाकर ' ब्रह्म तं ० ' ( ब्राह्मण जाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मण जातिको आत्मासे भिन्न समझता है ) इत्यादि अग्रिम ग्रन्थसे उसीका उपपादन करता है।

निश्चय जो ब्रह्म क्षत्र आदि जगत्को आत्मासे अन्यत्र ( भिन्न ) स्वतन्त्ररूप से सत्तावाला देखता है, वही मिथ्यादृष्ट ब्रह्म क्षत्रादि जगत् उस मिथ्यादर्शीको कल्याणमार्गसे भ्रष्ट कर देता है, इस प्रकार भेददृष्टिका निषेधकर ' इदं सर्व ० ' ( यह जो कुछ है वह सब यह आत्मा है ) इस तरह सम्पूर्ण वस्तुसमूहको आत्मासे अभिन्न अवतरण कहता है। ' दुन्दुभि आदि दृष्टान्तोंसे ' उसी अभेदको दृढ करता है।

' अस्य महतो ० ' ( जो यह ऋग्वेद है वह इस सत्य ब्रह्मका निःश्वास है ) इत्यादिसे प्रकृत आत्मामें नाम, रूप, कर्म प्रपञ्चकी कारणताके व्याख्यानकी इच्छा करते हुए इस परमात्माका अवगम - बोध कराते हैं। ' उसी प्रकार एकायनप्रक्रिया में मी ' विषय, इन्द्रिय और अन्तःकरणके साथ सम्पूर्ण प्रपञ्चका एक आधार बाह्य और माभ्यान्तर भेद शून्य, अखण्ड और प्रज्ञानैकरसके व्याख्यानकी इच्छा करते हुए याज्ञवल्क्य इस परमात्माका ही बोध कराते हैं, इससे ज्ञात होता है कि परमात्माका ही यह दर्शनादि उपदेश है॥ १ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' इस उपक्रमके बलसे जैसे पूर्वाधिकरणका विषयवाक्य ब्रह्म परक माना गया है वैसे ' न वा अरे पत्युः कामाय ' इस प्रकार मैत्रेयीब्राह्मणमें जीवका उपक्रम होनेसे यह वाक्य जीव परक होना चाहिए, इस तरह दृष्टान्तसंगतिसे ' किं तावत् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं।

* ' आत्मनस्तु कामाय ' इसप्रकार उपक्रममें आत्मशब्दसे विज्ञानात्माका ही ग्रहण है। मरण समयमें सब भूतोंसे समुस्थान भी विज्ञानात्मका होता है, यह मध्यमें वर्णन है और उपसंहारमें कर्तृवाची शब्दसे विज्ञानात्माका उपदेश है। इसलिए उपक्रम, मध्य और उपसंहारसे यहाँ विज्ञानात्मा ही द्रष्टव्य आदिरूपसे उपदिष्ट है। किश्च ' आत्मा के ज्ञानसे सबका ज्ञान हो जाता है ' यह प्रतिज्ञा है, यद्यपि वह जीव पक्षमें मुख्यरूपसे सम्भव नहीं है, क्योंकि भोक्ता आत्मासे भोग्य समुदाय अत्यन्त भिन्न है, तो भी गौणरूपसे सम्भव है, कारण कि भोग्य समुदाय भोक्ताके लिए होता है, भोक्ता जीवका ज्ञान होनेपर तदाश्रित मोग्य समूहका भी ज्ञान सुतरां हो जाता है, इसलिए ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि श्रुति वाक्योंसे जीवात्माका ही द्रष्टव्य आदिरूपसे उपदेश है।

* सि ० - पूर्वापर वाक्योंके पर्यालोचनसे ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि वाक्योंमें परमात्माका ही उपदेश अवगत होता है, क्योंकि सारा मैत्रेयीव्राह्मण ज्ञेय ब्रह्ममें ही समन्वित है |

* जैसे दुन्दुभि, शंख और वीणाके सामान्य शब्दके ज्ञानसे गृह्यमाण तत् तत् अवान्तर विशेष शब्द शुक्तिके ग्रहणसे ग्राह्य रजतके समान समान्यशब्दमें कल्पित हैं, उससे भिन्न नहीं हैं, वैसे आत्मा के मानसे मास्य सब आत्ममात्र है यह निश्चित है इस प्रकार एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानको प्रतिज्ञा होनेसे ब्रह्मका निश्चय होता है। सर्वस्रष्टृत्वादि लिङ्गसे भी ब्रह्मका निश्चय होता है।

किंच ' स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनम् ' ( बृ ० २ | ४ | ११ ) ( जैसे सब जलोंका समुद्र एकमात्र आश्रय है, वैसे सब स्पर्शोका त्वक् एकमात्र आश्रय है ) यहाँ कार्यका कारणमें लय श्रुतिको विवक्षित है, अतः प्रपञ्वरूप कार्यका ब्रह्ममें लय प्रतिपादन करनेके लिए ' एवं सर्वेषामात्मैकायनम् ' ( सबका आत्मा एकमात्र आश्रय है ) इस वाक्यका अध्याहार करना चाहिए। इस प्रकार एकायन ( प्रलयकाल ) प्रक्रियासे प्रपञ्चका आश्रय ब्रह्म सिद्ध होता है।

अतः जीवसे समस्त जगत् की उत्पत्ति आदिके संभव न होनेसे मैत्रेयी ब्राह्मणमें उपदिष्ट आत्मा परमात्मा ही है। किच ' अमृतत्व फलसे उपक्रम, मध्यमें आत्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा, अन्तमें ' महद्भूतमनन्तं ' इत्यादिसे मैत्रेयीब्राह्मणमें ब्रह्म ही प्रतिपाद्य है जीवात्मा नहीं। उसके विज्ञानसे ही मोक्तृभोग्यसमूहके ज्ञानकी प्रतिज्ञां भी सिद्ध होती है। अतः ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें परमात्मा ही द्रष्टव्य आदि रूपसे उपदिष्ट है। इसका फल पूर्वके समान है।। १ ९

1.4.20 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २०

सूत्र १.४.२०

प्रतिज्ञासिद्धेर् लिङ्गम् आश्मरथ्यः ॥ १.४.२० ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 355

पदच्छेद — प्रतिज्ञासिद्ध :, लिङ्गम् , आश्मरथ्यः

सूत्रार्थ — ( प्रतिज्ञासिद्धेः ) एकके विज्ञानसे सबका ज्ञान होता है ' इस प्रतिज्ञाकी सिद्धिमें ( लिङ्गम् ) जीव ब्रह्मके अभेदांशको लेकर जीवका उपक्रम हेतु है, ऐसा ( आश्मरथ्यः ) आरमरथ्य आचार्यका मत है।

शाङ्करभाष्य

अस्त्यत्र प्रतिज्ञा आत्मनि विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति इदं सर्वं यदयमात्मा इति च। तस्याः प्रतिज्ञायाः सिद्धिं सूचयत्येतल्लिङ्गम् यत्प्रियसंसूचितस्यात्मनो द्रष्टव्यात्वादिसंकीर्तनम्। यदि हि विज्ञानात्मा परमात्मनोऽन्यः स्यात् ततः परमात्मविज्ञानेऽपि विज्ञानात्मा न विज्ञायत इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं यत्प्रतिज्ञातम् तद्धीयेत। तस्मात्प्रतिज्ञासिद्ध्यर्थं विज्ञानात्मपरमात्मनोरभेदांशेनोपक्रमणमित्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह कहा गया है कि प्रिय शब्दसे सूचित भोक्ता आत्माके उपक्रमसे विज्ञानात्माका ही यह दर्शन आदि उपदेश है, उसपर हम कहते हैं—-

' आत्मनि विज्ञाते ० ' ( आत्माका विज्ञान होनेपर इस सम्पूर्ण प्रपश्वका ज्ञान हो जाता है ) और ' इदं सर्व ० ' ( यह आत्मा ही यह सब कुछ है ) ऐसी यहां प्रतिज्ञा है। प्रिय शब्दसे संसूचित आत्माका जो द्रष्टव्यत्वादि संकीर्तन है, यह लिङ्ग उस प्रतिज्ञाकी सिद्धिको सूचित करता है। यदि विज्ञानात्मा परमात्मासे अन्य हो तो परमात्माका विज्ञान होनेपर भी विज्ञानात्मा विज्ञात न होगा, इस प्रकार एक का विज्ञान होनेसे सबका विज्ञान होता है यह जो प्रतिज्ञा की गई है वह बाधित हो जायगी। इसलिए प्रतिज्ञाकी सिद्धिके लिए जीवात्मा और परमात्माके अभेदांशको लेकर उपक्रम है, इस प्रकार आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं॥२०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अग्नि और विस्फुलिङ्गोंकी तरह जीव और ब्रह्मका भेद तथा अभेद है। अभेद अंशको लेकर ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' यह जीवात्माका उपक्रम प्रतिज्ञाका साधक है, यह आश्मरथ्य आचार्यका मत है॥२०

1.4.21 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २१

सूत्र १.४.२१

उत्क्रमिष्यत एवं भावाद् इत्य् औडुलोमिः ॥ १.४.२१ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 356

पदच्छेद — उत्क्रमिष्यतः , एवंभावात् इति , ओडुलोमिः

सूत्रार्थ — ( उत्क्रमिष्यतः ) ब्रह्म साक्षात्कार होनेके अनन्तर देह आदि संघातसे उत्क्रमण करते हुए जीवका ( एवं भावात् ) परमात्मा के साथ ऐक्य होता है। इस भविष्यत् अभेदको लेकर जीवका उपक्रम है, ( औडुलोभिः ) यह औडुलोभि आचार्यका मत है।

शाङ्करभाष्य

विज्ञानात्मन एव देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघातोपाधिसंपर्कात्कलुषीभूतस्य ज्ञानध्यानादिसाधनानुष्ठानात्संप्रसन्नस्य देहादिसंघातादुत्क्रमिष्यतः परमात्मनैक्योपपत्तेरिदमभेदेनोपक्रमणमित्यौडुलोमिराचार्यो मन्यते। श्रुतिश्चैवं भवति एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते इति। क्वचिच्च जीवाश्रयमपि नामरूपं नदीनिदर्शनेन ज्ञापयति यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् इति यथा लोके नद्यः स्वाश्रयमेव नामरूपं विहाय समुद्रमुपयन्ति एवं जीवोऽपि स्वाश्रयमेव नामरूपं विहाय परं पुरुषमुपैतीति हि तत्रार्थः प्रतीयते दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोस्तुल्यतायै।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिके संघातरूप उपाधिके सम्बन्धसे कलुषित विज्ञानात्माका ही ज्ञान, ध्यान आदि साधनों के अनुष्ठानसे संप्रसन्न हुए दृष्ट देहादि संघातसे उत्क्रमण होनेपर परमात्माके साथ ऐक्य उपपन्न होता है, अत : यह : उपक्रम अभेदसे है, ऐसा ओडुलोमि आचार्य मानते हैं। श्रुति भी ऐसी ही है - ' एष सम्प्रसादो ० ' ( यह सम्प्रसाद - जीव इस शरीरसे समुत्थानकर आनात्माभिमान त्यागकर परमज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित होता है ) कहीं पर जीवाश्रय नाम रूपको भी ओडुलोमि आचार्य नदीके दृष्टान्तसे ज्ञापन कराते हैं- ' यथा नद्यः स्यन्दमानाः ० ' जैसे लोकमें नदियाँ स्वाश्रय नामरूपका त्यागकर समुद्रको प्राप्त होती हैं, वैसे जीव भी स्वाश्रय नाम - रूपका त्यागकर परम पुरुषको प्राप्त प्रोत है, यहाँ दृष्टान्त और दाष्टन्तिकी तुल्यताके लिए ऐसा अर्थ प्रतीत होता है || २१ |

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * देह आदि संघात के साथ सम्बन्ध होनेसे जीवका परमात्मासे संसारदशामें भेद है और ब्रह्मात्मत्व साक्षात्कार होनेपर अविद्या तथा देह आदि संघातसे मुक्त होनेसे मुक्तिदशामें जीवका परमात्मा के साथ अभेद होता है। इस प्रकारं पाञ्चरात्र भी कहते हैं-

' आमुक्तेर्भेद एव स्याज्जीवस्य च परस्य च। मुक्तस्य तु न भेदोऽस्ति भेदहेतोरभावतः '॥

( मुक्ति पर्यन्त जीव और परमात्माका भेद ही है, मुक्तिदशामें तो भेद हेतुके अभाव होनेसे जीवका परमात्मा के साथ भेद नहीं है ) इस भविष्यत् वृत्ति अभेदको लेकर ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' यह उपक्रम है। इस विषय में ' एष सम्प्रसादः ' यह श्रुति भी है। अब तक तो देहादि उपाधिसे जीवात्मा कलुषित कहा गया है, परन्तु अब तो जीवमें ' क्वचिच्च ' आदिसे नाम - रूप प्रपञ्चका आश्रयस्वरूप कालुष्य स्वाभाविक है, जैसे पार्थिव परमाणुमें श्यामत्व स्वाभाविक है वह पाकद्वारा निवृत्त हो जाता है, वैसे ज्ञान ध्यान आदिसे उस कालुष्यको निवृत्तकर जीव परसे पर दिव्य पुरुषको प्राप्त होता है। इस विषयमें नदीका दृष्टान्त है। इस मतमें भविष्यत् वृत्तिको लेकर ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वाक्य कभेद परक समझने चाहिए। ' सिद्धान्त में ' ब्रह्मात्मैक्य ज्ञानसे पूर्व जीवभेद आदि प्रपञ्च भ्रान्तिमात्र - मिथ्या है, औडुलोमिके मतमें सत्य है। सिद्धान्तमें नाम रूप उपाधिके धर्म हैं और इस मतमें जीवात्मा हैं। इस प्रकार दोनोमें अन्तर है॥२१

1.4.22 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २२

सूत्र १.४.२२

अवस्थितेर् इति काशकृत्स्नः ॥ १.४.२२ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 357

पदच्छेद — अवस्थितेः , इति , काशकृत्स्नः

सूत्रार्थ — ( इति काशकृत्स्नर ) ऐसा काशकृत्स्न आचार्यका मत है कि ( अवस्थितेः ) अविद्या कल्पितभेदसे ब्रह्म ही जीवरूपसे अवस्थित है, इसलिए जीवसे उपदेशका उपक्रम है।

शाङ्करभाष्य

अस्यैव परमात्मनोऽनेनापि विज्ञानात्मभावेनावस्थानादुपपन्नमिदमभेदेनोपक्रमणमिति काशकृत्स्न आचार्यो मन्यते। तथा च ब्राह्मणम् अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि इत्येवंजातीयकं परस्यैवात्मनो जीवभावेनावस्थानं दर्शयति मन्त्रवर्णश्च सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते इत्येवंजातीयकः। न च तेजःप्रभृतीनां सृष्टौ जीवस्य पृथक्सृष्टिः श्रुता येन परस्मादात्मनोऽन्यस्तद्विकारो जीवः स्यात्।

काशकृत्स्नस्याचार्यस्याविकृतः परमेश्वरो जीवः नान्य इति मतम् आश्मरथ्यस्य तु यद्यपि जीवस्य परस्मादनन्यत्वमभिप्रेतम् तथापि प्रतिज्ञासिद्धेः इति सापेक्षत्वाभिधानात्कार्यकारणभावः कियानप्यभिप्रेत इति गम्यते औडुलोमिपक्षे पुनः स्पष्टमेवावस्थान्तरापेक्षौ भेदाभेदौ गम्येते।

तत्र काशकृत्स्नीयं मतं श्रुत्यनुसारीति गम्यते प्रतिपिपादयिषितार्थानुसारात् तत्त्वमसि इत्यादिश्रुतिभ्यः एवं च सति तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पते विकारात्मकत्वे हि जीवस्याभ्युपगम्यमाने विकारस्य प्रकृतिसंबन्धे प्रलयप्रसङ्गान्न तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पेत। अतश्च स्वाश्रयस्य नामरूपस्यासंभवादुपाध्याश्रयं नामरूपं जीवे उपचर्यते। अत एवोत्पत्तिरपि जीवस्य क्वचिदग्निविस्फुलिङ्गोदाहरणेन श्राव्यमाणा उपाध्याश्रयैव वेदितव्या।।

यदप्युक्तं प्रकृतस्यैव महतो भूतस्य द्रष्टव्यस्य भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञानात्मभावेन दर्शयन्विज्ञानात्मन एवेदं द्रष्टव्यत्वं दर्शयतीति तत्रापीयमेव त्रिसूत्री योजयितव्या।

प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः इदमत्र प्रतिज्ञातम् आत्मनि विदिते सर्वमिदं विदितं भवति इदं सर्वं यदयमात्मा इति च उपपादितं च सर्वस्य नामरूपकर्मप्रपञ्चस्यैकप्रसवत्वादेकप्रलयत्वाच्च दुन्दुभ्यादिदृष्टान्तैश्च कार्यकारणयोरव्यतिरेकप्रतिपादनात् तस्या एव प्रतिज्ञायाः सिद्धिं सूचयत्येतल्लिङ्गम् यन्महतो भूतस्य भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञानात्मभावेन कथितम् इत्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते अभेदे हि सत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञातमवकल्पत इति।

उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः उत्क्रमिष्यतो विज्ञानात्मनो ज्ञानध्यानादिसामर्थ्यात्संप्रसन्नस्य परेणात्मनैक्यसंभवादिदमभेदाभिधानमित्यौडुलोमिराचार्यो मन्यते। अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः अस्यैव परमात्मनोऽनेनापि विज्ञानात्मभावेनावस्थानादुपपन्नमिदमभेदाभिधानमिति काशकृत्स्न आचार्यो मन्यते।

ननूच्छेदाभिधानमेतत् एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्ति इति कथमेतदभेदाभिधानम् नैष दोषः विशेषविज्ञानविनाशाभिप्रायमेतद्विनाशाभिधानम् नात्मोच्छेदाभिप्रायम् अत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्ति इति पर्यनुयुज्य स्वयमेव श्रुत्या अर्थान्तरस्य दर्शितत्वात् न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति इति।

एतदुक्तं भवति कूटस्थनित्य एवायं विज्ञानघन आत्मा नास्योच्छेदप्रसङ्गोऽस्ति मात्राभिस्त्वस्य भूतेन्द्रियलक्षणाभिरविद्याकृताभिरसंसर्गो विद्यया भवति संसर्गाभावे च तत्कृतस्य विशेषविज्ञानस्याभावात् न प्रेत्य संज्ञास्ति इत्युक्तमिति। यदप्युक्तम् विज्ञातारमरे केन विजानीयात् इति कर्तृवचनेन शब्देनोपसंहाराद्विज्ञानात्मन एवेदं द्रष्टव्यमिति तदपि काशकृत्स्नीयेनैव दर्शनेन परिहरणीयम्।

अपि च यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति इत्यारभ्याविद्याविषये तस्यैव दर्शनादिलक्षणं विशेषविज्ञानं प्रपञ्च्य यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् इत्यादिना विद्याविषये तस्यैव दर्शनादिलक्षणस्य विशेषविज्ञानस्याभावमभिदधाति पुनश्च विषयाभावेऽप्यात्मानं विजानीयादित्याशङ्क्य विज्ञातारमरे केन विजानीयात् इत्याह ततश्च विशेषविज्ञानाभावोपपादनपरत्वाद्वाक्यस्य विज्ञानधातुरेव केवलः सन्भूतपूर्वगत्या कर्तृवचनेन तृचा निर्दिष्ट इति गम्यते।

दर्शितं तु पुरस्तात्काशकृत्स्नीयस्य पक्षस्य श्रुतिमत्त्वम्।

अतश्च विज्ञानात्मपरमात्मनोरविद्याप्रत्युपस्थापितनामरूपरचितदेहाद्युपाधिनिमित्तो भेदः न पारमार्थिक इत्येषोऽर्थः सर्वैर्वेदान्तवादिभिरभ्युपगन्तव्यः सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् आत्मैवेदं सर्वम् ब्रह्मैवेदं सर्वम् इदं सर्वं यदयमात्मा नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ इत्येवंरूपाभ्यः श्रुतिभ्यः स्मृतिभ्यश्च वासुदेवः सर्वमिति क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् इत्येवंरूपाभ्यः भेददर्शनापवादाच्च अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुः मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति इत्येवंजातीयकात् स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म इति च आत्मनि सर्वविक्रियाप्रतिषेधात् अन्यथा च मुमुक्षूणां निरपवादविज्ञानानुपपत्तेः सुनिश्चितार्थत्वानुपपत्तेश्च निरपवादं हि विज्ञानं सर्वाकाङ्क्षानिवर्तकमात्मविषयमिष्यते वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः इति च श्रुतेः तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः इति च स्थितप्रज्ञलक्षणस्मृतेश्च।

स्थिते च क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्वविषये सम्यग्दर्शने क्षेत्रज्ञः परमात्मेति नाममात्रभेदात्क्षेत्रज्ञोऽयं परमात्मनो भिन्नः परमात्मायं क्षेत्रज्ञाद्भिन्न इत्येवंजातीयक आत्मभेदविषयोऽयं निर्बन्धो निरर्थकः एको ह्ययमात्मा नाममात्रभेदेन बहुधाभिधीयत इति। न हि सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायाम् इति कांचिदेवैकां गुहामधिकृत्यैतदुक्तम् न च ब्रह्मणोऽन्यो गुहायां निहितोऽस्ति तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् इति स्रष्टुरेव प्रवेशश्रवणात्।

ये तु निर्बन्धं कुर्वन्ति ते वेदान्तार्थं बाधमानाः श्रेयोद्धारं सम्यग्दर्शनमेव बाधन्ते कृतकमनित्यं च मोक्षं कल्पयन्ति न्यायेन च न संगच्छन्त इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — काशकृत्स्न आचार्य इस प्रकार मानते हैं कि इसी परमात्भाकी इस जीवात्मरूपसे अवस्थिति होनेके कारण अभेदरूपसे यह उपक्रम युक्त है। उसी प्रकार ' अनेन जीवेनात्मना ० ' ( मैं इस जीवात्मरूपसे तेज़, जल और अन्न इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेशकर नाम और रूपको अभिव्यक्ति करूँ ) इस प्रकारका ब्राह्मणवाक्य परमात्माका ही जीवात्मरूपसे अवस्थान दिखलाता है।

और ' सर्वाणि रूपाणि ० ' ( सर्वज्ञ समस्त चराचरको उत्पन्न कर उनका नाम रख और उनमें प्रवेशकर भाषण आदि व्यवहार करता हुआ रहता है ) इस प्रकारका मन्त्र भी है। तेज आदिकी सृष्टिमें जीवकी पृथक् सृष्टि श्रुत नहीं है जिससे कि जीव परमात्मासे अन्य एवं उसका विकार हो। काशकृत्स्न आचार्यका यह उ है कि अविकृत परमेश्वर ही जीव है अन्य नहीं है।

आश्मरथ्यको तो यद्यपि जीवात्माका परमात्मासे अनन्यत्व अभिप्रेत है, तो भी ' प्रतिज्ञासिद्धेः ' इस प्रकार सापेक्षत्वाभिधानसे यत्किञ्चित् कार्यकारणभाव अभिप्रेत है, ऐसा ज्ञाता होता है। पुनः ओडुलोमिके पक्ष में तो संसारदशा की अपेक्षासे भेद और मोक्षावस्थाकी अपेक्षासे अभेद स्पष्ट प्रतीत होता है। उन सब मतोंमें आचार्यं काशकृत्स्नका मत श्रुति अनुरूप ज्ञात होता है, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' इत्यादि श्रुतियों से प्रतिपादनके अभीष्ट अर्थके अनुसार है।

श्रुति अनुरूप होने से उसके ज्ञानसे अमृतत्व हो सकता है। यदि जीवको ब्रह्मका विकारात्मक स्वीकार किया जाय तो प्रकृति के साथ सम्बन्ध होनेपर विकारका लय प्रसङ्ग हो जानेसे उसके ज्ञानसे अमृतत्व संभव नहीं है। अतः स्वाश्रय नामरूपका असम्भव होनेसे उपाधि आश्रय नामरूपका जीवमें उपचार होता है। इसी कारण कहीं अग्नि और विस्फुलिङ्गोंके उदाहरणसे सुनाई हुई जीवको उत्पत्ति भी उपाधिके आश्रित ही समझनी चाहिए।

जो यह कहा गया है कि प्रकृत द्रष्टव्य महान् सत्य स्वरूपका ही विज्ञानात्मरूपसे भूतोंसे समुत्थान दिखलाते हुए मुनि याज्ञवल्क्य विज्ञानात्मा ही यह द्रष्टव्य है ऐसा दिखलाते हैं। उसमें भी इस त्रिसूत्रीकी योजना करनी चाहिए। ' प्रतिज्ञासिद्धेः ' यहाँपर आत्मनि विदिते ० ( आत्माके विदित होनेपर सब विदित हो जाता है ) और ' इदं सर्व ० ' ( यह सब दृश्य प्रपश्च आत्मा ही है ) ऐसी प्रतिज्ञा की गई है।

नाम, रूप और कर्म रूप सारे प्रपञ्चका आत्मरूपत्व उपपादित है, क्योंकि एक उत्पत्ति स्थान और एक प्रलयस्थान होनेसे और दुन्दुभि आदि दृष्टान्तोंसे कार्य और कारणका अभेद प्रतिपादित है। जो महान् सत्य भूत द्रष्टव्य ब्रह्मका भूतोंसे विज्ञानात्मरूपसे समुत्थान कहा गया है वह लिङ्ग इसी प्रतिज्ञाकी सिद्धिको सूचित करता है, ऐसा आश्मरथ्य आचार्यका मत है, क्योंकि अभेद होनेपर प्रतिज्ञात एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान उपपन्न होता है।

' उत्क्रमिष्यतः ० ' उत्क्रमण करने वाले ज्ञान, ध्यान आदिकी सामर्थ्य से सम्यक् प्रसन्न हुए विज्ञानात्माका परमात्माके साथ ऐक्य सम्भव होनेसे यह अभेद कथन युक्त है, ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं। ' अवस्थितेरिति ० ' इसी परमात्माकी विज्ञानात्मरूप से अवस्थिति होनेसे यह अभेदका अभिधान उपपन्न है, ऐसा काशकृत्स्न आचार्य मानते हैं।

परन्तु ' एतेभ्यो भूतेभ्यः ० ' ( यह प्रकृत द्रष्टव्य आत्मा ही पाँच भूतरूप उपाधि से जीवभावको प्राप्त होकर, विद्यासे उपाधिकी निवृत्तिके अनन्तर नाशको प्राप्त हो जाता है, देहेन्द्रिय भावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती ) इस प्रकार यह तो उच्छेदका अभिधान है, यह अभेदका अभिधान कैसे है? यह दोष नहीं है, क्योंकि यह विनाशका अभिधान तो विशेष विज्ञानके विनाश के अभिप्रायसे है आत्मोच्छेदके अभिप्रायसे नहीं है, कारण कि ' अत्रैव मा भगवानमू ० ' ( हे भगवन्!

शरीरपातके अनन्तर कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती, ऐसा कहकर ही आपने मुझे मोहमें डाल दिया है ) इस प्रकार पर्यनुयोग ( शंका ) कर श्रुतिने स्वयं ही अन्य अर्थको दिखलाया है। ' न वा अरे ० ' ( याज्ञवल्क्यअरे मैत्रेयी! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ। नाशहेतु रहित होनेसे यह बात्मा अविनाशी है, देह, इन्द्रिय आदिके साथ इसका संसर्ग नहीं है ) तात्पर्य यह है कि यह आत्मा कूटस्थ, नित्य, विज्ञानैकरस है, इसके उच्छेदका प्रसंग ही नहीं है।

अविद्याकृत भूतेन्द्रियात्मक मात्राओं के साथ इसके संसर्गका अभाव विद्यासे होता है। संसर्गके अभाव होनेपर संसर्गकृत विशेष विज्ञानके अभाव होने ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' ऐसा कहा है। ' विज्ञातारमरे ० ' ( हे मैत्रेयी! विज्ञाताको किससे जाने ) इस प्रकार कर्तृवाचक शब्दसे उपसंहार होनेसे विज्ञानात्मका ही यह द्रष्टव्यरूप उपदेश है, ऐसा जो कहा है, उसका भी काशकृत्स्नके दर्शनसे ही परिहार करना चाहिए।

और भी ' यत्र हि ० ' ( परन्तु जहाँ- अविद्यावस्थामें द्वैत - सा होता है वहाँ अन्य अन्यको देखता है ) ऐसा आरम्भकर अविद्या विषयमें उसीके दर्शन आदि रूप विशेष विज्ञानका प्रपञ्चकर ' यत्र त्वस्य ० ' ( किन्तु जहाँ विद्यावस्था में इसके लिए यमिष्यते ; ' वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः ' ( मुण्ड ० ३।२।६ ) इति च श्रुतेः। ‘ तत्र को मोहः कः सब आत्मा ही हो गया है वहाँ किससे किसे देखे ) इत्यादिसे विद्याविषयमें उसके हो दर्शन आदि रूप विशेषविज्ञानका अभाव कहते हैं।

और विषयके अभाव में भी ' आत्माको विशेषरूपसे जाने ' ऐसी . आशङ्काकर ' विज्ञातारमरे ० ' ऐसा कहा है। यह वाक्य विशेषविज्ञानके अभावका उपपादन करता है इससे ऐसा ज्ञात होता है कि केवल विज्ञानैकरस ही भूतपूर्व गति अविद्यादशा से कर्तृवाचक ' तृच् ' प्रत्ययसे निर्दिष्ट है। और यह पहले ही दिखलाया गया है कि काशकृत्स्नका सिद्धान्त श्रुति अनुरूप है।

इसलिए विज्ञानात्मा और परमात्माका भेद अविद्यासे उपस्थापित नाम - रूपसे रचित - कल्पित देहादि उपाधिसे है पारमार्थिक नहीं है, ऐसा अर्थ सब वेदान्तवादियोंको स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि ‘ सदेव ० ’ ( हे सोम्य!

आरम्भ में यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' आत्मैवेदं ० ' ( आत्मा ही यह सब है ) ' ब्रह्मदं ० ' ( ब्रह्म ही यह सब है ) ' इदं सर्व ० ' ( यह सब आत्मा ही है ) ‘ नान्यो ० ' ( इससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) ' नान्यदतो ० ' ( इससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इस प्रकारकी श्रुतियाँ और ' वासुदेवः सर्वमिति ' ( सब वासुदेव है ) ' क्षेत्रज्ञं चापि ० ' ( हे भारत!

सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे जान ) ' समं . सर्वेषु ० ' ( सम्पूर्ण भूतों में समभाव से स्थित परमेश्वरको देखता है ) इस प्रकारकी स्मृतियाँ हैं। ' अन्यो ο ' ( यह अन्य है, मैं अन्य हूँ इस प्रकार जो उपासना करता है, वह पशुके समान है, तत्त्व को नहीं जानता ) ' मृत्योः स ० ' ( जो अद्वितीय आत्मामें अनेक - सा देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) इस प्रकारकी श्रुतियोंसे भेद दर्शनका अपवाद है।

क्योंकि ' स वा एष ० ( वही यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है ) इस प्रकार आत्मामें सब क्रियाओंका प्रतिषेध है, अन्यथा मुमुक्षुओंको अपवाद ( बाध ) रहित ज्ञानकी अनुपपत्ति होगी और सुनिश्चितार्थत्वतत्त्व निश्चयकी भी अनुपपत्ति होगी, क्योंकि सर्व आकांक्षाओंका निवर्तक अपवाद रहित आत्मविषयक विज्ञान ही इष्ट है।

कारण कि ' वेदान्तविज्ञान ० ' ( जिन्होंने वेदान्तविज्ञानसे ज्ञेय अर्थका अच्छी प्रकार निश्चय कर लिया है ) और ' तत्र को मोह : ० ' ( उस समय एकत्व देखनेवाले उस विद्वान्को क्या मोह और क्या शोक है ) ऐसी श्रुतियाँ हैं। ' स्थितप्रज्ञका लक्षण करनेवाली स्मृति भी है '।

इस प्रकार क्षेत्रज्ञ और परमात्माका एकत्व विषयक सम्यग् ज्ञान निश्चित होनेपर क्षेत्रज्ञ परमात्मा इस प्रकार नाममात्रके भेद होनेसे यह क्षेत्रज्ञ परमात्मासे भिन्न है, यह परमात्मा क्षेत्रज्ञ से भिन्न है इस प्रकारका आत्मामें भेद विषयक आग्रह व्यर्थ है।

यह एक ही आत्मा नाममात्रके भेदसे बहुत प्रकारसे कहा जाता है | ‘ सत्यं ० ' ( ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है, जो पुरुष उसे बुद्धिरूप परमाकाशमें निहित जानता है ) यह कथन किसी एक गुहाके उद्देश्यसे नहीं कहा गया है [ किन्तु समष्टि बुद्धिरूप गुहा उद्देश्यसे है ] और ब्रह्मसे अन्य मी गुहामें निहित नहीं है, क्योंकि ' तत्सृष्ट्वा ० ' ( इसे रचकर वह इसमें अनुप्रविष्ट हो गया ) इस प्रकार स्रष्टाके ही अनुप्रवेशकी श्रुति है।

परन्तु जो आचार्य [ भेदादिका ] आग्रह करते हैं वे वेदान्तार्थं ( अत्यन्त दुःख निवृत्ति ) का बाध करते हुए श्रेय द्वार - सम्यग् ज्ञानका ही बाघ करते हैं | कार्य और अनित्य मोक्षकी कल्पना करते हैं और न्यायका अनुसरण नहीं करते || २२ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # परन्तु यह मत असंगत है, क्योंकि सत्य कार्य करण संघातवाला जीव यदि ब्रह्मसे अत्यन्त मिन है तो मुक्ति में उसका ब्रह्मके साथ अभेद अनुपपन्न है, इस अरुचिसे ' अवस्थितेरिति ' आदि सूत्र कहते हैं। आश्मरथ्य आचार्यके मतमें अग्नि और विस्फुलिङ्गों की तरह जीवकी परमात्मासे उत्पत्ति होनेके कारण जीव और ब्रह्मका भेद सत्य है। भेद अंशको लेकर दोनोंमें कार्यकारण भाव है। ' प्रतिज्ञासिद्धे : ' ' एकके विज्ञानसे सबका ज्ञान हो जाता है, इस प्रतिज्ञाकी सिद्धिमें अभेद अंशको लेकर यह जीविका उपक्रम है।

* यद्यपि ' यथाग्नेः क्षुद्राविस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः ' ( जैसे अग्निसे छोटी - छोटी चिनगारियां निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मासे प्राण उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि श्रुतिसे जीवकी उत्पत्तिका श्रवण होता है, तो भी यह कथन उपाधिकी उत्पत्तिको लेकर समझना चाहिए। .

* ' आत्मनि विदिते ० ' इस श्रुतिसे एकके विज्ञानसे सबके ज्ञानकी प्रतिज्ञा दिखलाई गई है और ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' इस शास्त्र से आत्माकी सर्वात्मकता दिखलाकर उक्त प्रतिज्ञाका उपपादन किया गया है। यदि भेद सत्य हो तो एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा उपपन्न नहीं होगी। भेदाभेद वादमें अभेद पक्षको लेकर प्रतिज्ञा उपपन्न होती है।

* ' एतेभ्यो भूतेभ्यः ' इस श्रुतिका तात्पर्य विम्ब - प्रतिबिम्बवादमें है। जैसे उदकपूर्ण पात्र में बिम्बभूत सूर्यादिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उस प्रतिबिम्बके आधार भूत जलका नाश होने पर प्रतिबिम्ब नष्ट हुआ प्रतीत होता है, वस्तुता उसका बिम्बरूप होना ही नाश कहा जाता है।

' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' ' मरणानन्सर संज्ञा नहीं रहती ' इस श्रुतिभागका भी यही तात्पर्य है कि बुद्धि आदि उपाधिवश बिम्बभूत परमात्मा ही प्रतिबिम्बरूपसे जीवभावको प्राप्त हुआ हैं, ' अहं ब्रह्मास्मि ' इस प्रकार प्रत्यगभिन्न ब्रह्मज्ञान | से अविद्या और तन्मूलक उपाधिके विलय होने पर प्रतिबिम्बरूप जीव कहाँ गया? ऐसा सन्देह होता है। परन्तु वह तो कहीं गया नहीं, केवल बिम्बभूत परमात्मरूपसे अवस्थित है। पहले भी ब्रह्मस्वरूप ही है, किन्तु उपाधिवश पृथक् -सा प्रतीत होता है।

अब उपाधि के विलय होने पर बिम्बरूपसे प्रतीत होता है ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' सुषुप्ति में भी यह श्रुत्यर्थं लगाया जाता है, उसमें जाग्रत, स्वप्न विषयक विशेषज्ञान नहीं रहता, क्योंकि उसमें ज्ञानके हेतुभूत मन इन्द्रिय आदिका विलय हो जाता है, इस अभिप्राय ऐसा श्रुति में वर्णन है, स्वरूपभूत ज्ञानको लेकर नहीं, कारण कि यह कूटस्थ नित्य ज्ञान स्वरूप है।

किञ्च मैत्रेयीकी यह शङ्का है कि ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' इस वाक्यमें मरणानन्तर आत्मोका नाश प्रतीत होता है, उसके नाश हो जानेसे ज्ञानसे प्रतिपादित अमृतत्वकी प्राप्ति अयुक्त है। तब याज्ञवल्क्यने आत्माको अविनाशी कहकर मैत्रेयीकी शङ्का निवृत्त की, अत : ' न प्रेत्य संज्ञास्ति ' यह वाक्य विशेष विज्ञानके नाशके अभिप्रायसे है आत्माके नाशके अभिप्रायसे नहीं।

* आरमरथ्य मोर मोडलोमि इन दोनों के मतमें सत्यभेदका अङ्गीकार होनेसे ' केन ' ऐसा आक्षेप युक्त नहीं है। काशकृत्स्नके मतमें तो जीव ब्रह्मका अत्यन्त अभेद है, इसलिए विज्ञान के कारकका अभाव होनेसे ' केन ' यह आक्षेप युक्त है। उस मतमें मनः कल्पित विज्ञातृत्व मुक्त ब्रह्मात्मामें अविद्याशा में कर्तृवाचक ' तृच् ' प्रत्यय द्वारा विज्ञातृत्वका प्रयोग किया गया है।

* भेदाभेदवादी आश्मरथ्यका मत और मोक्षदशा में अभेदवादी ओडुलोमिका मत ' एकमेवाद्वितीयम् ' ' नेह नानास्ति किञ्चन ' ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि भेद बाधक और अभेद प्रतिपादक श्रुतियोंसे बाधित है। भेदाभेदवादी मोक्षको ज्ञान और कर्म साध्य मानते हैं, उनके मतसे मोक्षमें अनित्यत्व दोष तो वज्रलेप है। जो क्रिया साध्य है ' वह अनित्य है, यह न्याय है, इस न्यायसे भी बाधित है। वेदान्तमतमें अनर्थको निवृत्ति ज्ञान साध्य होनेसे और नित्यमुक्त आत्ममात्र होनेसे कोई दोष नहीं है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीव ब्रह्मका अत्यन्त अभेद है और • मैत्रेय ब्राह्मण प्रत्यगभिन्न ब्रह्ममें ही समन्वित है। पूर्वपक्ष में ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' यह वाक्य जीवोंपसनापरक है और सिद्धान्तमें ज्ञेय प्रत्यगभिन्न ब्रह्म में इस वाक्यका समन्वय फल है।। २२

प्रकृत्यधिकरणाम्

1.4.23 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २३

सूत्र १.४.२३

प्रकृतिश् च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ॥ १.४.२३ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 361

पदच्छेद — प्रकृतिः , च , प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्

सूत्रार्थ — ( प्रकृतिश्च ) ब्रह्म उपादानकारण और निमित्तकारण भी है, ( प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ) क्योंकि ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' इस प्रकार एक विज्ञानसे सर्व विज्ञानकी प्रतिज्ञा और ' यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन ० ' इस तरह दृष्टान्तका सामंजस्य है।

शाङ्करभाष्य

यथाभ्युदयहेतुत्वाद्धर्मो जिज्ञास्यः एवं निःश्रेयसहेतुत्वाद्ब्रह्मापि जिज्ञास्यमित्युक्तम् ब्रह्म च जन्माद्यस्य यतः इति लक्षितम् तच्च लक्षणं घटरुचकादीनां मृत्सुवर्णादिवत्प्रकृतित्वे कुलालसुवर्णकारादिवन्निमित्तत्वे च समानमित्यतो भवति विमर्शः किमात्मकं पुनर्ब्रह्मणः कारणत्वं स्यादिति।

तत्र निमित्तकारणमेव तावत्केवलं स्यादिति प्रतिभाति कस्मात् ईक्षापूर्वककर्तृत्वश्रवणात् ईक्षापूर्वकं हि ब्रह्मणः कर्तृत्वमवगम्यते स ईक्षांचक्रे स प्राणमसृजत इत्यादिश्रुतिभ्यः ईक्षापूर्वकं च कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलालादिषु दृष्टम् अनेककारकपूर्विका च क्रियाफलसिद्धिर्लोके दृष्टा स च न्याय आदिकर्तर्यपि युक्तः संक्रमयितुम्। ईश्वरत्वप्रसिद्धेश्च ईश्वराणां हि राजवैवस्वतादीनां निमित्तकारणत्वमेव केवलं प्रतीयते तद्वत्परमेश्वरस्यापि निमित्तकारणत्वमेव युक्तं प्रतिपत्तुम्।

कार्यं चेदं जगत्सावयवमचेतनमशुद्धं च दृश्यते कारणेनापि तस्य तादृशेनैव भवितव्यम् कार्यकारणयोः सारूप्यदर्शनात् ब्रह्म चानेवंलक्षणमवगम्यते निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् इत्यादिश्रुतिभ्यः पारिशेष्याद्ब्रह्मणोऽन्यदुपादानकारणमशुद्ध्यादिगुणकं स्मृतिप्रसिद्धमभ्युपगन्तव्यम् ब्रह्मकारणत्वश्रुतेर्निमित्तत्वमात्रे पर्यवसानादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः प्रकृतिश्चोपादानकारणं च ब्रह्माभ्युपगन्तव्यम् निमित्तकारणं च न केवलं निमित्तकारणमेव कस्मात् प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्।

एवं हि प्रतिज्ञादृष्टान्तौ श्रौतौ नोपुरुध्येते। प्रतिज्ञा तावत् उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम् इति तत्र चैकेन विज्ञातेन सर्वमन्यदविज्ञातमपि विज्ञातं भवतीति प्रतीयते तच्चोपादानकारणविज्ञाने सर्वविज्ञानं संभवति उपादानकारणाव्यतिरेकात्कार्यस्य निमित्तकारणाव्यतिरेकस्तु कार्यस्य नास्ति लोके तक्ष्णः प्रासादव्यतिरेकदर्शनात्।

दृष्टान्तोऽपि यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् इत्युपादानकारणगोचर एवाम्नायते तथा एकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्यात् एकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्यात् इति च। तथान्यत्रापि कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति इति प्रतिज्ञा यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति इति दृष्टान्तः।

तथा आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् इति प्रतिज्ञा स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः इति दृष्टान्तः। एवं यथासंभवं प्रतिवेदान्तं प्रतिज्ञादृष्टान्तौ प्रकृतित्वसाधनौ प्रत्येतव्यौ। यत इतीयमपि पञ्चमी यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते इत्यत्र जनिकर्तुः प्रकृतिः इति विशेषस्मरणात्प्रकृतिलक्षण एवापादाने द्रष्टव्या।

निमित्तत्वं त्वधिष्ठात्रन्तराभावादधिगन्तव्यम् यथा हि लोके मृत्सुवर्णादिकमुपादानकारणं कुलालसुवर्णकारादीनधिष्ठातृ़नपेक्ष्य प्रवर्तते नैवं ब्रह्मण उपादानकारणस्य सतोऽन्योऽधिष्ठातापेक्ष्योऽस्ति प्रागुत्पत्तेः एकमेवाद्वितीयम् इत्यवधारणात् अधिष्ठात्रन्तराभावोऽपि प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधांदेवोदितो वेदितव्यः अधिष्ठातरि ह्युपादानादन्यस्मिन्नभ्युपगम्यमाने पुनरप्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानस्यासंभवात्प्रतिज्ञादृष्टान्तोपरोध एव स्यात्।

तस्मादधिष्ठात्रन्तराभावादात्मनः कर्तृत्वमुपादानान्तराभावाच्च प्रकृतित्वम्।। कुतश्चात्मनः कर्तृत्वप्रकृतित्वे

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह कहा गया है कि जैसे अभ्युदयका हेतु होनेसे धर्मं जिज्ञास्य है, वैसे मोक्षका हेतु होनेसे ब्रह्म जिज्ञास्य हैं। और जन्माद्यस्य

' यतः ' इस सूत्र से ब्रह्मका लक्षण कहा गया है। उस लक्षणसे ब्रह्म निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ' ( वे ० ६।१ ९ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः। पारिशेष्याद्ब्रह्मणोऽन्यदुघट, आभूषण आदिके प्रति मृत और सुवर्ण आदिकें समान उपादानकारण और कुम्हार, सुवर्णकार आदिके समान निमित्तकारण है यह समान है, इससे संशय होता है कि ब्रह्म किस प्रकारका कारण है? पूर्वपक्षी - ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों कारणोंमें से ब्रह्म केवल निमित्तकारण ही है, किससे? इससे कि ईक्षण पूर्वक कर्तृत्वका श्रवण है। ' स ईक्षांचक्रे ' ( उसने ईक्षण किया ) ' स प्राणमसृजत ' ( उसने प्राणकी सृष्टि की ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतीत होता है कि ब्रह्म ईक्षण पूर्वक कर्ता है। ईक्षापूर्वक कर्तृत्व कुम्हार मादि निमित्तकारणोंमें ही देखा जाता है। अनेक कारक ( कर्ता

कर्ता,, कर्मादि ) पूर्वक क्रियाके फलकी सिद्धि लोकमें देखी गई है। और वह न्याय आदिकर्ता में भी संक्रमित करना युक्त है। और ईश्वरत्वकी प्रसिद्धिसे भी [ ब्रह्म निमित्तकारण है ], क्योंकि जैसे राजा वैवस्वत मनु आदि ईश्वर केवल निमित्तकारण ही प्रतीत होते हैं, वैसे परमेश्वरको भी केवल निमित्त कारण समझना युक्त है। और कार्यरूप यह जगत् सावयव, अचेतन और अशुद्ध देखा जाता है। उसका कारण मी वैसा ही होना चाहिए, क्योंकि कार्य कारणमें सादृश्य देखा जाता है।

परन्तु ' निष्कल ० ' ( अवयव रहित, अक्रिय, शान्त दोषरहित और निर्लेप ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्म ऐसा प्रतीत नहीं होता। अतः परिशेषसे अर्थात् प्रकृत ब्रह्मके प्रतिषेध और अन्यत्र प्रसक्तिके अभाव होनेसे ब्रह्मसे भिन्न अशुद्धि आदि गुणयुक्त स्मृति प्रसिद्ध [ प्रधानको ] उपादान कारण स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि ब्रह्ममें कारणत्व प्रतिपादक श्रुतिका निमित्तकारणमात्रमें पर्यवसान है।

सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं --- ब्रह्मको प्रकृति अर्थात् उपादानकारण और निमित्तकारण स्वीकार करना चाहिए। केवल निमित्तकारण ही नहीं, किससे? इससे कि प्रतिज्ञा और दृष्टान्तका अनुपरोध है। ब्रह्मको उभय कारण मानने से श्रुति - प्रतिपादित प्रतिज्ञा और दृष्टान्त बाधित नहीं होते। ' उत तमादेश ' ( क्या तूने गुरुसे वह आदेश पूछा है? जिससे अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और अविज्ञात विशेषरूपसे ज्ञात हो जाता है ) यह प्रतिज्ञा है।

उसमें ऐसा प्रतीत होता है कि एकके विज्ञात होनेसे अन्य सब अविज्ञात भी विज्ञात हो जाते हैं। वह सर्वविज्ञान उपादानकारणके विज्ञान होनेपर संभव है, क्योंकि कार्यं उपादानकारण से अभिन्न होता है। किन्तु निमित्तकारणसे कार्य अभिन्न नहीं होता, कारण कि लोक में बढई - कारीगर महल से भिन्न देखने में आता है। ' यथा सोम्यैकेन ० ( हे सोम्य!

जैसे एक मृत्पिण्डके विज्ञान से सब मृत्तिकाके विकारोंका ज्ञान हो जाता है कि विकार केवल वाणी के आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ) तथा ' एकेन लोहमणिना ० ' ( एक लोहमणि - सुवर्णम के विज्ञात होनेपर सब सुवर्ण विकार ज्ञात हो जाते हैं ) और ' एकेन नखनिकृन्तनेन ० ( एक नहन्ना - लोहfuosh ज्ञानसे सब लोहके विकार ज्ञात हो जाते हैं ) इसप्रकार दृष्टान्त भी उपादानकारण विषयक कहा गया है। उसी प्रकार अन्य स्थलोंमें भी ' कस्मिन्नु भगवो ० ' ( शौनक - हे भगवन्!

किसके जान लिए जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ) ऐसी प्रतिज्ञा है, और ' यथा पृथिव्यामो ० ' ( जैसे पृथिवीमें औषधियाँ उत्पन्न होती हैं ) ऐसा दृष्टान्त है। तथा ' आत्मनि ० ( हे मैत्रेयी!

निश्चय ही आत्माक्वा दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इन सबका ज्ञान हो जाता है ) ऐसी प्रतिज्ञा है और ' सयथा ० ' ( वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस दुन्दुभि ( नक्कारे ) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किन्तु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है ) ऐसा दृष्टान्त है। इस प्रकार यथासंभव प्रत्येक वेदान्तमें उपादानकारण सिद्ध करनेवाली प्रतिज्ञा और दृष्टान्त समझने चाहिए।

' यतो वा ० ' ( जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं ) इस श्रुतिस्थ ' यत : ' इस पदमें यह पञ्चमी विभक्ति ' जनिकर्तुः ' ( जायमानकी प्रकृतिकी संज्ञा उपादान होती है ) इस विशेष सूत्रसे प्रकृतिरूप अपादान अर्थमें ही समझनी चाहिए। ब्रह्मको निमित्तकारण तो अन्य अधिष्ठाताके न होनेसे समझना चाहिए।

जैसे लोकमें मृत्तिका, सुवर्ण आदि उपादानकारण कुम्हार सुवर्णकार आदि अधिष्ठाताओंकी अपेक्षा रखकर प्रवृत्त होते हैं, वैसे उपादानकारण सत् ब्रह्मको अन्य अधिष्ठाता की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि जगत् की उत्पत्तिके पूर्व सजातीय, विजातीय, स्वगत भेदशून्य केवल एक अद्वितीय था, ऐसा अवधारण है। अन्य अधिष्ठाताका अभाव भी प्रतिज्ञा और दृष्टान्तके बाधाभावसे ही कहा गया समझना चाहिए।

उपादानकारणसे अन्य अधिष्ठाताके स्वीकार किये जानेपर फिर भी एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानका असंभव होनेसे प्रतिज्ञा और दृष्टान्तका बाध ही होगा। इसलिए अन्य अधिष्ठाता न होनेसे आत्मा कर्ता है और अन्य उपादानके न होनेसे प्रकृति है।। २३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' जन्माद्यस्य यतः ' इस लक्षणसूत्र से ब्रह्म सामान्यतः कारण प्रतिपादित है, तो ब्रह्म केवल कर्ता होने से निमित्तकारण ही है अथवा उपादान और निमित्त दोनों कारण है। इसप्रकार विशेष जिज्ञासा के होनेपर इस अधिकरणका आरम्भ किया जाता है, सामान्यज्ञान विशेषविचारका हेतु है, अतः कार्य कारणभाव संगतिसे इस अधिकरणका आरम्भ है। यद्यपि इस अधिकरणको जन्मादि अधिकरणके अनन्तर देना उपयुक्त था, तो भो निश्चित तात्पर्यवाले वेदान्तोंसे केवल ईश्वर निमित्तकारण मतका निराकरण सहज समझकर समन्वयाध्याय के अन्तमें दिया है, अतः यह

. प्रकृति अघिकरण सार्थक है। पूर्व अधिकरणमें सर्वविज्ञान प्रतिज्ञा मुख्य होनेसे ' आत्मा व वरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि वाक्य में द्रष्टव्यशब्दसे जीवपरत्वका निरास किया गया है। परन्तु वह अयुक्त है, क्योंकि कर्ता और उपादानके मित्र - मित्र होनेसे यह सर्वविज्ञान प्रतिज्ञा गोण है। इसप्रकार ' तत्र ' इत्यादिसे आक्षेप करते हैं। पूर्वपक्ष में द्वैतसिद्धि फल है, और सिद्धान्तमें अद्वैत सिद्धि फल है।

ब्रह्म नोपादानं ईश्वरत्वाद् राजादिवत् ' ( जैसे राजा उपादान कारण नहीं है, क्योंकि वह ईश्वर है, वैसे ईश्वर होनेसे ब्रह्म भी उपादान नहीं ) ' जगत् न ब्रह्मप्रकृतिकं तद्विलक्षणत्वात् कुलालविलक्षणघटवत् ' ( जगत् ब्रह्म उपादान कारण वाला नहीं है, क्योंकि वह उससे विलक्षण है, यथा घट कुलालसे विलक्षण है ) इसलिए ब्रह्मसे भिन्न कार्यके सदृश सांख्य स्मृतिमें प्रसिद्ध प्रधान हो कारण होना युक्त है।

* ' यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्सम्प्रवतीह विश्वम् ( मु ० १1१1७ ) ( जैसे जीवत पुरुषसे केश और लोम उत्पन्न होते हैं, वैसे ही उस अक्षरसे यह विश्व प्रकट होता है ) यह भी दृष्टान्त है। उभयकारणरूप ब्रह्मके जाननेसे तदभिन्न सम्पूर्ण कार्य प्रपञ्च ज्ञात हो जाता है। इसप्रकार प्रतिज्ञा और दृष्टान्तरूप लिङ्गसे ब्रह्मको उपादानकारण सिद्धकर आगे ' यतः ' आदि से पञ्चमी विभक्तिसे निमित्तकरण सिद्ध करते हैं || २३ ||

1.4.24 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २४

सूत्र १.४.२४

अभिध्योपदेशाच् च ॥ १.४.२४ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 364

पदच्छेद — अभिध्योपदेशात् , च

सूत्रार्थ — ' से कामयात ' इसप्रकार अभिध्यान- संकल्पका उपदेश होनेसे आत्मा कर्ता- निमित्तकारण है और ' बहु स्याम् ' ( मैं बहुत होऊ ) इसप्रकार अभिध्यानका उपदेश होनेसे प्रकृति - उपादानकारण भी है।

शाङ्करभाष्य

अभिध्योपदेशश्चात्मनः कर्तृत्वप्रकृतित्वे गमयति सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय इति तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति च। तत्राभिध्यानपूर्विकायाः स्वातन्त्र्यप्रवृत्तेः कर्तेति गम्यते। बहु स्यामिति प्रत्यगात्मविषयत्वाद्बहुभवनाभिध्यानस्य प्रकृतिरित्यपि गम्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आत्मा, निमित्तकारण और उपादानकारण कैसे है?

' सोऽकामयत ० ' ( उसने कामनाकी कि मैं बहुत हो जाऊँ अर्थात् मैं उत्पन्न होऊ ) और ' तदैक्षत ० ' ( उसने ईक्षण - संकल्प किया कि मैं बहुत होऊ ) इसप्रकार सृष्टि संकल्पका उपदेश आत्मामें कर्तृत्व और प्रकृतित्व बोधित करता है। उसमें संकल्प पूर्वक स्वतन्त्र प्रवृत्तिसे आत्मा कर्ता - निमित्तकारण है, ऐसा प्रतीत होता है और ' बहु स्यां ' इसप्रकार बहुत होनेका संकल्प प्रत्यगात्मविषयक होनेसे ऐसा ज्ञात होता है कि आत्मा प्रकृति उपादानकारण मी है॥२४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ब्रह्म में दोनों प्रकारकी कारणताका उपपादन चार सूत्रोंसे करते हैं- अनागत वस्तु विषयक इच्छा या संकल्पका नाम अभिध्या है। ' बहु स्यां ' इसप्रकार बहुत होनेका संकल्प आत्मविषयक होनेसे यह प्रतीत होता है कि कार्य और कारणका अभेद है।। २४

1.4.25 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २५

सूत्र १.४.२५

साक्षाच् चोभयाम्नानात् ॥ १.४.२५ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 365

पदच्छेद — साक्षात् च , उभयाम्नानात्

सूत्रार्थ — ( साक्षाच्चोभयाम्नानात् ) ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' इसप्रकार आकाश शब्दसे ब्रह्मका ग्रहणकर साक्षात् जगत्की उत्पत्ति और प्रलय सुने जाते हैं, अतः ब्रह्म ही जगत्का उपादानकारण है |

शाङ्करभाष्य

प्रकृतित्वस्यायमभ्युच्चयः। इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म यत्कारणं साक्षाद्ब्रह्मैव कारणमुपादाय उभौ प्रभवप्रलयावाम्नायेते सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते। आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति इति। यद्धि यस्मात्प्रभवति यस्मिंश्च प्रलीयते तत्तस्योपादानं प्रसिद्धम् यथा व्रीहियवादीनां पृथिवी। साक्षात् इति च उपादानान्तरानुपादानं सूचयति आकाशादेव इति। प्रत्यस्तमयश्च नोपादानादन्यत्र कार्यस्य दृष्टः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उपादान कारण होनेमें यह दूसरा हेतु है, इससे भो ब्रह्म प्रकृति है। क्योंकि ' सर्वाणि हवा इमानि ० ( ये समस्त भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, आकाश में हो लीन होते हैं ) इस श्रुतिमें साक्षात् ब्रह्मका ही कारणरूपसे ग्रहणकर उत्पत्ति और प्रलय दोनों कहे गये हैं, क्योंकि • यह प्रसिद्ध है कि जो जिससे उत्पन्न होता है और जिसमें लय होता है वह उसका उपादान होता है, जैसे धान, यव आदिका पृथिवी उपादानकारण है। श्रुतिस्थ ' आकाशादेव ' इस ' एव ' से सूचित अन्य उपादानके अग्रहणको भगवान सूत्रकार ' साक्षात् ' पदसे दिखलाते हैं। कार्यका प्रलय भी उपादानसे भिन्नमें नहीं देखा गया है॥२५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र १.४.२६ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

1.4.26 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २६

सूत्र १.४.२६

आत्मकृतेः परिणामात् ॥ १.४.२६ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 365

पदच्छेद — आत्मकृतेः , परिणामात्

सूत्रार्थ — ( आत्मकृतेः ) ' तदात्मानं स्वयमकरुत ' इसमें आत्मसम्बन्धी कृतिका श्रवण है, अतः ब्रह्म उभयकारण है, ( परिणामात् ) क्योंकि कर्तारूपसे पुर्वसिद्ध वस्तु भी विवर्तरूपसे साध्य हो सकती है, इससे ब्रह्म कृतिका कर्म विषय है।

शाङ्करभाष्य

* इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्मप्रक्रियायाम् ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( तै ० २।७ ) इत्यात्मनः कर्मत्वं कर्तृत्वं च दर्शयति। आत्मानमिति कर्मत्वं, स्वयमकुरुतेति कर्तृत्वम्। कथं पुनः पूर्वसिद्धस्य सतः कर्तृत्वेन व्यवस्थितस्य क्रियमाणत्वं शक्यं संपादयितुम्? परिणामादिति ब्रूमः। पूर्वसिद्धोऽपि हिं सन्नात्मा विशेषेण विकारात्मना परिणमयामासात्मानमिति। विकारात्मना च परिणामो मृदाद्यासु प्रकृतिषूपलब्धः। स्वयमिति च विशेषणान्निमित्तान्तरानपेक्षत्वमपि प्रतीयते। परिणामादिति वा पृथक्सूत्रम्। तस्यैषोऽर्थः- इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्मण एव विकारात्मना परिणामः सामानाधिकरण्येनाम्नायते ' सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च ' ( तै ० २२६ ) इत्यादिनेति॥ २६

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस हेतुसे मी ब्रह्म प्रकृति है, क्योंकि ब्रह्मप्रक्रिया में ' तदात्मानं ० ' ( उसने स्वयं अपनेको ही नामरूपात्मक जगत् - रूपसे रचा ) इस प्रकार यह श्रुति आत्माको कर्म और कर्तृरूपसे दिखलाती है। ' आत्मानम् ' इस पदसे कर्मत्व और ' स्वयमकुरुत ' इस पदसे आत्मामें कर्तृत्व दिखलाती है। परन्तु पूर्वसिद्ध एवं कर्तारूपसे व्यवस्थित पदार्थको क्रियाविषयत्व कैसे सम्पादन किया जा सकता है? परिमाणसे, ऐसा हम कह सकते हैं। पूर्वसिद्ध होते हुए की आत्माने अविद्याबलसे अपनेको [ आकाशादि ] विशेष विकाररूपसे परिणत किया। विकाररूपसे परिणाम मृत्तिका आदि उपादानकारणोंमें उपलब्ध है। यहाँ ' स्वयम् ' इस विशेषणसे प्रतीत होता है क उसे अन्य निमित्तको अपेक्षा भी नहीं | अथवा ' परिणामात् ' इतना अंश पृथक् सूत्र है। उसका यह अर्थ है कि इस कारण से भी ब्रह्म प्रकृति है, क्योंकि ‘ सच्चत्यच्चाभवत् ' ( वह ब्रह्म ही मूर्त और अमूर्त हुआ, निर्वचन योग्य तथा निर्वचन के अयोग्य सब हुआ ) इत्यादि श्रुति सामानाधिकरण्यसे ब्रह्मका ही विकाररूपसे यह परिणाम कहती है || २६ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ‘ तदात्मानं स्वयमकुरुत ' इस श्रुति में ' आत्मानम् ' यह द्वितीयान्तपद II कर्मवाचक है और ' तत् स्वयमकुरुत ' यह प्रथमान्त ' तत् ' पद कर्तृवाचक है, एकमें ही कर्मकर्तृभाव विरुद्ध है। आत्मसम्बन्धी कृति - व्यापार आत्मकृति कही जाती है। कृतिके साथ आत्माका सम्बन्ध विषयरूपसे और आश्रयरूपसे है। पूर्वसिद्ध पदार्थ कृतिका आश्रय और विषय साध्य होता है, इसलिए एक हीं आत्मा कृतिका आश्रय - कर्ता और विषय कर्म हो यह विरुद्ध है?

परन्तु पूर्वं सिद्ध वस्तु भी साध्य होती है, जैसे मृत्तिका आदि उपादानकारणों में घट आदिका विकाररूपसे परिणाम उपलब्ध होता है, वैसे आत्माका मी परिणाम हो सकता है। यहाँ परिणामका अर्थ विवर्त है। इसलिए ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( तत् पद वाच्य आत्माने स्वयं अपनेको साध्य - जगद्रूपसे परिणत किया ) यहाँ आत्मा ही कृतिका कर्म और कृतिका आश्रय - कर्ता है | ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इत्यादि श्रुति भी आत्मा ही सर्वात्मक है ऐसा कहती हैं।

जैसे रज्जु सर्प आदि आकारसे प्रतीत होनेपर भी स्वयं विकार रहित है, वैसे ब्रह्म जगद्रूप परिणत होनेपर भी स्वयं विकार रहित है।

अब ' परिणामात् ' इतने अंशको पृथक् सूत्र मानकर व्याख्या करते हैं- जैसे ' मृद्घट : ' ( घट मृत्तिका है ) इस सामानाधिकरण्यसे मृत्तिका घटका उपादानकारण है, वैसे ‘ सच्च त्यच्चाभवत् ' ( ब्रह्म मूर्त - पृथिवी, जल और तेज, अमूर्त - वायु और आकाश हुआ ) यथा ' देवदत्तो व्याघ्रोऽभवन् ' ( योगबल से देवदत्त स्वयं व्याघ्र हुआ ) इत्यादि श्रुति, स्मृति से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्म ही उभयकारण है || २६ ||

1.4.27 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २७

सूत्र १.४.२७

योनिश्व हि गीयते ॥ १.४.२७ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 366

पदच्छेद — योनिः च , हि , गीयते

सूत्रार्थ — ( हि ) क्योंकि ( योनिश्च गीयते ) ' यद्भूतयोनि परिपश्यन्ति ' यहाँ प्रकृतिवाचक योनि शब्दसे मी आत्मा कहा गया है, अतः ब्रह्म ही उपादान और निमित्तकरण है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्म योनिरित्यपि पठ्यते वेदान्तेषु कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ' ( मुण्ड ० ३।१।३ ) इति। ' यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ' ( मुण्ड ० १।१।६ ) इति च। योनिशब्दश्च प्रकृतिवचनः समधिगतो लोके - ' पृथिवी योनिरोषधिवनस्पतीनाम् ' इति। स्त्रीयोनेरप्यस्त्येवावयवद्वारेण गर्भ प्रत्युपादानकारणत्वम्। क्वचित्स्थानवचनोऽपि योनिशब्दो दृष्ट : -- ' योनिष्ट इन्द्र निषदे अकारि ' ( ऋ ० सं ० १।१०४ | १ ) इति। वाक्यशेषात्त्वत्र प्रकृतिवचनता परिगृह्यते ' यथोर्णनामिः सृजते गृह्णते च ' ( मु ० १ | १ | ७ ) इत्येवंजातीयकात्। एवं प्रकृतित्वं ब्रह्मणः प्रसिद्धम्। यत्पुनरिदमुक्तमीक्षा पूर्वकं कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलालादिषु लोके दृष्टं नोपादानेष्वित्यादि, तत्प्रत्युच्यते - न लोकवदिह भवितव्यम्। न ह्ययमनुमान गभ्यो ऽर्थः। शब्दगम्यत्वात्वस्यार्थस्य यथाशब्दमिह भवितव्यम्। शब्दरचेक्षितुरीश्वरस्य प्रकृतित्वं प्रतिपादयतीत्यवोचाम। पुनश्चैतत्सर्वं विस्तरेण प्रतिवक्ष्यामः || २७ ||

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस हेतुसे भी ब्रह्म प्रकृति है, क्योंकि ' कर्तारमीशं ' ( ब्रह्माके भी उत्पत्तिस्थान उस जगत्कर्ता ईश्वर पुरुषको देखता है ) और ' यद्भूतयोनिं ० ' ( जो सम्पूर्ण भूतोंका कारण उसे विवेकी लोग सब ओर देखते हैं ) इसप्रकार वेदान्तों- उपनिषदों में ब्रह्म योनि है, ऐसा भी पढ़ा जाता I ' पृथिवी योनि ० ' ( ओषधि और वनस्पतिकी योनि पृथिवो है ) इसप्रकार व्यवहारमें निश्चित किया जाता है कि योनिशब्द प्रकृति वाचक है।

स्त्रीकी योनि मी अवयव - शोणित द्वारा गर्भके प्रति उपादान कारण ही है। ' योनिष्ट इन्द्र ' ( हे इन्द्र! आपके बैठनेके लिए मैंने स्थान बनाया है ) इस प्रकार कहीं स्थान वाचक भो योनि शब्द देखा गया है। किञ्च ' यथोर्णनामिः ० ' ( जिस प्रकार मकड़ी जालेको बनाति और निगल जाती हैं ) इसप्रकार के वाक्यशेषसे यहाँ योनिशब्द प्रकृति वाचक ग्रहण किया . जाता है। इसप्रकार ब्रह्ममें उपादानकारणत्व प्रसिद्ध है।

ईक्षापूर्वक कर्तृत्व लोकमें कुम्हार आदि निमित्तकारणों में देखा गया है उपादानकारणोंमें नहीं, इत्यादि जो कहा गया है, उसका निराकरण करते हैं — यहाँ लोकके समान नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह अनुमानगम्य अर्थ नहीं है, किन्तु शब्दगम्य है, . अत : इस अर्थको तो यहाँ शब्द - श्रुतिके अनुसार होना चाहिये। ऐसा हम कह चुके हैं कि शब्द - वेद ईक्षण कर्ता ईश्वर प्रकृति है ऐसा प्रतिपादन करता है। और पुन : यह सब विस्तार पूर्वक आगे भी [ ब्र ० सू ० २।१।४ इत्यादि सूत्रोंसे ] कहेंगे || २७ ||

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.१.१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

सर्वव्याख्यानाधिकरणम्

1.4.28 · प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २८

सूत्र १.४.२८

एतेन सर्वे व्याख्याताः ॥ १.४.२८ ॥

प्रथम अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र १.४.२८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 367

पदच्छेद — एतेन , सर्वे , व्याख्याताः , व्याख्याताः

सूत्रार्थ — ( एतेन ) प्रधान कारणवादके निराकरण से ( सर्वे ) अणु, स्वभाव, असत् आदि को जगत्का कारण मानने वालोंके मत मी ( व्याख्याता : ) निराकृत समझने चाहिए, ' व्याख्याताः ' इस पदका अभ्यास- दूसरी वार उच्चारण अध्याय समाप्तिका द्योतक है।

शाङ्करभाष्य

ईक्षतेर्नाशब्दम् इत्यारभ्य प्रधानकारणवादः सूत्रैरेव पुनः पुनराशङ्क्य निराकृतः तस्य हि पक्षस्योपोद्बलकानि कानिचिल्लिङ्गाभासानि वेदान्तेष्वापातेन मन्दमतीन्प्रति भान्तीति स च कार्यकारणानन्यत्वाभ्युपगमात्प्रत्यासन्नो वेदान्तवादस्य देवलप्रभृतिभिश्च कैश्चिद्धर्मसूत्रकारैः स्वग्रन्थेष्वाश्रितः तेन तत्प्रतिषेधे एव यत्नोऽतीव कृतः नाण्वादिकारणवादप्रतिषेधे तेऽपि तु ब्रह्मकारणवादपक्षस्य प्रतिपक्षत्वात्प्रतिषेद्धव्याः तेषामप्युपोद्बलकं वैदिकं किंचिल्लिङ्गमापातेन मन्दमतीन्प्रति भायादिति अतः प्रधानमल्लनिबर्हणन्यायेनातिदिशति एतेन प्रधानकारणवादप्रतिषेधन्यायकलापेन सर्वेऽण्वादिकारणवादा अपि प्रतिषिद्धतया व्याख्याता वेदितव्याः तेषामपि प्रधानवदशब्दत्वाच्छब्दविरोधित्वाच्चेति। व्याख्याता व्याख्याता इति पदाभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्तिं द्योतयति।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये प्रथमोऽध्यायः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' इस सूत्र से आरम्भ कर अन्य सूत्रोंद्वारा ही पुनः पुनः आशङ्का कर प्रधानकारणवादका निराकरण किया गया है, क्योंकि मन्दमतियों को उस पक्षके पोषक कुछ लिङ्गामास वेदान्तों में आपाततः प्रतीत होते हैं, वह पक्ष कार्य कारणका अभेद स्वीकार करनेसे वेदान्तवादके अतिनिकटवर्ती है और देवलादि कुछ धर्म सूत्रकारोंने अपने ग्रन्थोंमें उसको आश्रय दिया है। इससे उसके प्रतिषेध में अत्याधिक यत्न किया गया है, किन्तु परमाणु आदि कारणवादके प्रतिषेधमें अत्यधिक यत्न नहीं

सत्यानन्दी - दिपिका

' ईक्षतेर्नाशब्दम् ' आदि अशब्दत्वादि हेतुओंसे जैसे प्रधान कारणवादका निराकरण किया गया है, वैसे यहाँ अणु, स्वभाव, असत् कारणवादका निराकरण नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनके लिए भी कारणत्व बोधक शब्द सुने जाते हैं, इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगति से पूर्वपक्ष है। छां . अ . ६, में यह प्रसंग है - अदृश्य सदात्मासे दृश्य जगत् की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? श्वेतकेतुकी इस शङ्काकी निवृति करने तथा जगत् के कारणको समझाने के लिए उह लकने कहा - हे सोम्य! इन बटबीजों में से एक बीजको तोड़ो।

उद्दालक - इसमें क्या देखते हो? श्वेतकेतु - ' न किञ्चन ' कुछ भी नहीं। उद्दालक - ' एतमणिमानं ' इस अणिमाको नहीं देखते हो? हे प्रिय! जिस सुक्ष्म दुर्लक्ष्य बीजको तुम नहीं देखते इसीसे यह किया गया। परन्तु ब्रह्म कारणवाद पक्षके प्रतिपक्ष होनेसे वे भी प्रतिषेध करनेके योग्य हैं।

क्योंकि मन्दमतियोंको आपाततः उनके भी पोषक कुछ वैदिक लिङ्ग प्रतीत हो सकते हैं, इसलिए प्रधानमल्लनिबर्हणन्यायसे अतिदेश करते हैं - इससे - प्रधान कारणवादके प्रतिषेधक न्याय समुदायसे सब अणु आदि कारणवाद मी प्रतिषिद्धरूपसे व्याख्यात हुए समझने चाहिए, कारण कि वे भी प्रधान समान अशब्द और शब्द- श्रुति विरूद्ध हैं। ' व्याख्याता व्याख्याता : ' इसप्रकार पदका अभ्यास - दो बार उच्चारण अध्याय समाप्तिका द्योतक है॥२८

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.१.१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

उपसंहार

ये सूत्र ब्रह्म के स्वरूप को प्रत्यक्ष, अनुमान और श्रुति के माध्यम से स्पष्ट करते हुए विभिन्न संशयों का निवारण करते हैं। इनमें ज्ञान की सूक्ष्मता और प्रमाणों की प्रामाणिकता को जोड़कर ब्रह्म-तत्व की व्यापकता सिद्ध की गई है। अंततः, यह संपूर्ण विवेचन साधक को जगत के कारण और परम सत्ता के वास्तविक स्वरूप तक ले जाता है।

In English

Brahma Sutra: Chapter 1, Section 4

This text explains the Brahma Sutras through the commentary of Shankara. It specifically addresses how the concept of 'Avyakta' (unmanifest nature) used in the Katha Upanishad refers to the physical body via a chariot metaphor rather than the primordial material cause of the universe.

This article answers

  • Brahma sutra 1.4.1 meaning?
  • Difference between prakriti and avyakta in katha upanishad?
  • Meaning of chariot metaphor in katha upanishad?
  • Is avyakta the cause of the world in katha upanishad?
  • Brahma sutra chapter 1 section 4 summary?

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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