श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — द्वितीय अध्याय, तृतीय पाद

52 मूल पद्य 47 संस्करणसे मिलाये गये

इन सूत्रों में आकाश जैसी दृश्य वस्तुओं की उत्पत्ति और उनके अस्तित्व के संबंध में उठने वाले संदेहों का निराकरण किया गया है। यहाँ तर्क द्वारा यह सिद्ध किया जाता है कि जो वस्तु श्रुतियों द्वारा बाधित है, उसका वास्तविक अस्तित्व नहीं हो सकता। इस क्रम में पाठक को जगत के सूक्ष्म तत्वों और आत्मा की नित्यता के बीच के भेद का बोध होता है।

उत्पत्त्यसंभवाधिकरणम्

2.3.1 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १

(इस सूत्रका मूल पाठ स्कैनमें स्पष्ट नहीं पढ़ा जा सका)

शाङ्करभाष्य

एवमेव क्रमादिद्वारकोऽपि विप्रतिषेधः श्रुत्यन्तरेषूपलक्ष्यते। विप्रतिषेधाच्च पर पक्षाणामनपेक्षितत्वं स्थापितम्, तद्वत्स्वपक्षस्यापि विप्रतिषेधादेवानपेक्षितत्वमाशङ्कयेतेत्यतः सर्ववेदान्तगतसृष्टिश्रुत्यर्थनिर्मलत्वाय परः प्रपञ्च आरभ्यते। तदर्थनिर्मलत्वे च फलं यथोक्ताशङ्कानिवृत्तिरेव। तत्र प्रथमं तावदाकाशमाश्रित्य चिन्त्यते - किमस्याकाशस्योत्पत्तिरस्त्युत नास्तीति? तत्र तावत्प्रतिपद्यते - ' न वियदश्रुतेः ' इति। न खल्वाकाशमुत्पद्यते। कस्मात्? अश्रुतेः। न ह्यस्योत्पत्तिप्रकरणे श्रवणमस्ति। छान्दोग्ये हि ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६।२।१ ) इति सच्छन्दवाच्यं ब्रह्म प्रकृत्य ' तदैक्षत ' ' तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६।२। ३ ) इति च पञ्चानां महाभूतानां मध्यमं तेज आदि कृत्वा त्रयाणां तेजोबन्नानामुत्पत्तिः श्राव्यते। श्रुतिश्च नः प्रमाणमतीन्द्रियार्थविज्ञानोत्पत्तौ न चात्र आकाशकी उत्पत्ति नहीं है॥ १

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.३.३ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती —

द्वितीयाध्याये ] तृतीयः पादः।

[ अत्र पादे पञ्चमहाभूतजीवादिश्रुतीनां विरोधपरिहारः ]

( इस पादमें पञ्चमहाभूत और जीव आदि श्रुतियोंमें विरोधका

परिहार है )

( १ वियदधिकरणम्। सू ० १-७ )

विदः॥ १

2.3.2 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २

सूत्र २.३.२

अस्ति तु ॥ २.३.२ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 505

पदच्छेद — अस्ति , तु

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पक्षान्तरके परिग्रह अर्थ में है, ( अस्ति ) छान्योग्यमें आकाशको उत्पत्ति प्रतिपादकश्रुतिके न होनेपर भी तैत्तिरीयमें है, इसलिए विरोध वैसा ही है। और कुछ नहीं कहते। इसीप्रकार क्रम आदि द्वारक मी अन्य श्रुतियोंमें विरोध उपलक्षित होता है। और विरोध होने से पर पक्षोंका अनपेक्षत्व स्थापन किया गया है, उसीप्रकार स्वपक्षमें भी अनपेक्षत्वकी आशङ्का हो सकती है, इसलिए सर्ववेदान्तगत सृष्टि श्रुतिके अर्थकी निर्मलता के लिए अब आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है।

और उसके अर्थके निर्मल होनेपर यथोक्त शङ्काकी निवृत्ति ही फल है। उसमें पहले तो आकाशको अश्रयकर विचार किया जाता है— इस आकाशकी उत्पत्ति है अथवा नहीं है? उसमें प्रथम ' न वियदश्रुतेः ' ऐसा प्राप्त होता है। आकाश उत्पन्न नहीं होता, किससे? इससे कि श्रुति नहीं है, उसकी उत्पत्तिके प्रकरणमें श्रुति नहीं है, क्योंकि छान्दोग्यमें ही ' सदेव ० ' ( हे सोम्य!

आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) इस प्रकार सत् शब्द वाच्य ब्रह्मको प्रस्तुतकर ' तदैक्षत ० ' ( उसने ईक्षण किया, उसने तेज उत्पन्न किया ) इसप्रकार पांच महाभूतों में मध्यम तेजको आदि ( आरम्भ ) कर तेज़, जल और अन्न तीनोंकी उत्पत्ति सुनाई जाती है। अतीन्द्रिय अर्थके विज्ञानकी उत्पत्ति में हमारे मतमें श्रुति प्रमाण है। परन्तु यहाँ आकाशकी उत्पत्ति प्रतिपादक श्रुति नहीं है, इसलिए

शाङ्करभाष्य

II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य | अ ० २ पा ० ३

तुशब्दः पक्षान्तरपरिग्रहे। मा नामाकाशस्य छान्दोग्ये भूदुत्पत्तिः, श्रुत्यन्तरे वस्ति। तैत्तिरीया हि समामनन्ति - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इति प्रकृत्य ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २।१ ) इति। ततश्च श्रुत्योर्विप्रतिषेधः - क्वचित्तेजःप्रमुखा सृष्टिः क्वचिदाकाशप्रमुखेति। नन्वेकवाक्यताऽनयोः श्रुत्योर्युक्ता, सत्यं सा युक्ता, नतु सावगन्तुं शक्यते। कुतः? ' तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६ | २ | ३ ) इति सकृच्छ्रुतस्य स्रष्टुः स्रष्टव्यद्वयेन संबन्धानुपपत्तेः ' तत्त'जोऽसृजत ', ' तदाकाशमसृजत ' इति। ननु सकृच्छुतस्यापि कर्तुः कर्तव्यद्वयेन संबन्धो दृश्यते यथा सूपं पक्त्वौदनं पचतीति, एवं तदाकाशं सृष्ट्वा ततेजोऽसृजतेति योजयिष्यामि। नैवं युज्यते, प्रथमजत्वं हि छान्दोग्ये तेजसोऽवगम्यते, तैत्तिरीयके वाकाशस्य, न चोभयोः प्रथमजत्वं संभवति। एतेनेतरश्रुत्यक्षरविरोधोऽपि व्याख्यातः। ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ०२।१ ) इत्यत्रापि तस्मादाकाशः संभूतस्तस्मात्तेजः संभूतमिति सकृच्छ्रुतस्यापादानस्य संभवनस्य च वियत्तेजोभ्यां युगपत्संबन्धानुपपत्तेः। ' वायोरग्निः ' ( तै ० २1१ ) इति च पृथगाम्नानात्॥२

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.३.३ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — पदच्छेद - न, वियत्, अश्रुतेः।

) क्योंकि उसकी उत्पत्ति

सूत्रार्थ --- ( वियत् ) आकाश ( न ) उत्पन्न नहीं होता, ( आश्रुतेः प्रतिपादक श्रुति नहीं है।

* वेदान्तेषु तत्र तत्र भिन्नप्रस्थाना उत्पत्तिश्रुतय उपलभ्यन्ते।

केचिदाकाशस्योत्पत्तिमामनन्ति केचिन्न। तथा केचिद्वायोरुत्पत्तिमामनन्ति केचिन्न। एवं जीवस्य प्राणानां च।

वेदान्तोंमें तत् तत् स्थलोंपर भिन्न प्रस्थानवाली ( भिन्न प्रकरणस्थ ) उत्पत्ति श्रुतियाँ उपलब्ध होती हैं। कुछ श्रुतिवाक्य आकाशकी उत्पत्ति कहते हैं, कुछ नहीं कहते। उसीप्रकार कुछ श्रुतिवाक्य वायुकी उत्पत्ति कहते हैं, कुछ नहीं कहते। एवं कुछ श्रुतिवाक्य जीव और प्राणोंकी उत्पत्ति कहते हैं

सत्यानन्दी - दीपिका

* गत पादमें वेदान्तसमन्वयकी स्थापनाके लिए सांख्य आदि मतोंमें भ्रान्ति मूलकता सिद्ध की गई है | अब वेदान्त समन्वयकी स्थिति के लिए भूत, मोक्तृविषयक सृष्टि श्रुतियोंमें परस्पर विरोधका निराकरण करते हैं। जीवको अनुत्पत्ति के प्रसंगसे आकाशकी भी उत्पत्तिके असंभवकी आशङ्का कर उसका परिहार करते हुए प्रथम ' न वियदश्रुतेः ' इससे एक देशीके मतको कहते हैं। जैसे परस्पर और पूर्वापर विरोध होनेके कारण पर पक्ष उपेक्ष्य है, वैसे श्रुति पक्ष भी उपेक्ष्य है।

इसप्रकार की शङ्काकी निवृत्ति के लिए दृष्टान्तसंगति से यह पाद आरम्भ किया जाता है। तैत्तिरीयक आकाश और वायुकी उत्पत्ति कहते हैं, छान्दोग नहीं कहते। ' सर्व एत आत्मनो व्युच्चरन्ति ' ( ये सब आत्माचे निकलते हैं ) ' एतस्माज्जायते प्राणः ' ( मुण्ड २1१1३ ) ( इससे प्राण उत्पन्न होते हैं ) इसप्रकार माध्यंदिन और आथर्णविक जीव और प्राणकी उत्पत्ति कहते हैं। कहीं आकाश पूर्वक सृष्टि है, कहीं तेजपूर्वक सृष्टि है, इसप्रकार क्रमका विरोध है।

' स इमाँल्लोकान सृजत ' ( ऐ ० ११२ ) ( उसने इन लोकों को उत्पन्न किया ) इसप्रकार अक्रम है। एवं कहीं सात प्राण, कहीं आठ प्राण, इसप्रकार संख्या पूर्वक विरोध। इस तरह श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे प्रथम आकाशकी उत्पत्ति और अनुत्पत्ति विषयक श्रुतियों को लेकर विचार किया जाता है। पूर्वपक्षमें आकाशकी उत्पत्ति श्रुति नहीं है, अतः आकाशकी उत्पत्ति नहीं है॥ १॥

* ' वायोरग्निः ० ' इस अन्य श्रुतिमें भी विरोध है, क्योंकि छान्दोग्य श्रुतिमें तो सत्से तेजकी उत्पत्ति और तैत्तिरीय श्रुतिमें वायुसे अग्नि ( तेज ) की उत्पत्ति कही गई है। इसलिए दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता नहीं हो सकती॥ २

2.3.3 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३

सूत्र २.३.३

गौण्यसंभवाच् छब्दाच् च ॥ २.३.३ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 506

पदच्छेद — गौणी , असंभवात्

सूत्रार्थ — ( गौणी ) आकाशकी उत्पत्ति श्रुति गौणी है, मुख्य नहीं, ( असंवात् ) क्योंकि आकाशको उत्पत्ति में समवायिकारण आदि सामग्रीका अभाव है और व्यापक होनेसे उसमें नित्यत्वका अनुमान होता है। अतः आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। ' तु ' शब्द अन्य पक्षके ग्रहण करनेमें हैं | आकाशकी उत्पत्ति छान्दोग्यमें मत हो, परन्तु अन्य श्रुतिमें तो है।

' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ऐसा प्रस्तुतकर ' तस्माद्वा ० ' ( इस प्रत्यगभिन्न उस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इसप्रकार तैत्तिरीय शाखावाले कहते हैं। इससे ' कहीं तेज प्रमुख सृष्टि है और कहीं आकाश प्रमुख सृष्टि है ' इस तरह दो श्रुतियोंमें विरोध है। परन्तु इन श्रुतियोंमें एक वाक्यता युक्त है। सत्य, वह युक्त है, किन्तु वह अवगत नहीं हो सकती।

क्योंकि ' तत्तेजो ० ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) इसप्रकार एक वार श्रुत स्रष्टाका ' तत्तेजोऽसृजत ' ' तदकाशमसृजत ' ( . उसने आकाश उत्पन्न किया ) इसप्रकार दो स्रष्टव्योंके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। परन्तु एक वार श्रुत कर्ताका भी दो कर्तव्यों के साथ सम्बन्ध देखा जाता है, जैसे ' दाल पकाकर चावल ( भात ) पकाता है ' वैसे ' उसने आकाशको उत्पन्नकर उसने तेज उत्पन्न किया ' ऐसी योजना करूँगा?

किन्तु ऐसा युक्त नहीं हैं, क्योंकि छान्दोग्यमें तेजकी प्रथम उत्पत्ति अवगत होती है और तैत्तिरीयमें आकाशकी, और दोनोंकी प्रथम उत्पत्ति असंभव है, इस विरोध कथनसे अन्य श्रुतिवाक्योंके साथ विरोध भी व्याख्यात हुआ। क्योंकि ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इसमें भी ' उससे आकाश उत्पन्न हुआ ' ' उससे तेज उत्पन्न हुआ ' इसप्रकार एक वार श्रुत अपादान ( पञ्चम्यन्त तस्मात् ) और संभवन ( उत्पत्ति ) का आकाश और तेज के साथ युगपत् सम्बन्ध नहीं हो सकता और ' वायोरग्निः ' ( वायुसे अग्नि उत्पन्न

शाङ्करभाष्य

नास्ति वियत उत्पत्तिः अश्रुतेरेव। या त्वितरा वियदुत्पत्तिवादिनी श्रुतिरुदाहृता सा गौणी भवितुमर्हति कस्मात् असंभवात्। न ह्याकाशस्योत्पत्तिः संभावयितुं शक्या श्रीमत्कणभुगभिप्रायानुसारिपु जीवत्सु ते हि कारणसामग्र्यसंभवादाकाशस्योत्पत्तिं वारयन्ति समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणेभ्यो हि किल सर्वमुत्पद्यमानं समुत्पद्यते द्रव्यस्य चैकजातीयकमनेकं च द्रव्यं समवायिकारणं भवति न चाकाशस्यैकजातीयकमनेकं च द्रव्यमारम्भकमस्ति यस्मिन्समवायिकारणे सति असमवायिकारणे च तत्संयोगे आकाश उत्पद्येत तदभावात्तु तदनुग्रहप्रवृत्तं निमित्तकारणं दूरापेतमेव आकाशस्य भवति। उत्पत्तिमतां च तेजःप्रभृतीनां पूर्वोत्तरकालयोर्विशेषः संभाव्यते प्रागुत्पत्तेः प्रकाशादिकार्यं न बभूव पश्चाच्च भवतीति आकाशस्य पुनर्न पूर्वोत्तरकालयोर्विशेषः संभावयितुं शक्यते किं हि प्रागुत्पत्तेरनवकाशमसुषिरमच्छिद्रं बभूवेति शक्यतेऽध्यवसातुम् पृथिव्यादिवैधर्म्याच्च विभुत्वादिलक्षणात् आकाशस्य अजत्वसिद्धिः। तस्माद्यथा लोके आकाशं कुरु आकाशो जातः इत्येवंजातीयको गौणः प्रयोगो भवति यथा चघटाकाशः करकाकाशः गृहाकाशः इत्येकस्याप्याकाशस्य एवंजातीयको भेदव्यपदेशो गौणो भवति वेदेऽपि आरण्यानाकाशेष्वालभेरन् इति एवमुत्पत्तिश्रुतिरपि गौणी द्रष्टव्या।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — होती है ) ऐसी पृथक् ( दूसरी ) श्रुति है। २।।

. इस विरोधके होनेपर कोई कहता है-

आकाशकी उत्पत्ति नहीं है, क्योंकि श्रुति नहीं है। जो आकाशकी उत्पत्ति प्रतिपादक अन्य श्रुति उदाहृत है वह गौणी होनी युक्त है, क्योंकि असंभव है। श्रीमान् कणादके अभिप्रायका अनुसरण करनेवालोंके जीवित रहनेपर आकाशकी उत्पत्तिकी संभावना नहीं की जा सकती, कारण कि वे कारण सामग्रीके असंभवसे आकाशकी उत्पत्तिका वारण करते हैं। सम्पूर्ण उत्पद्यमान कार्यं समवायी, असमवायी और निमित्तकारणों से उत्पन्न होता है।

एकजातीय अनेक द्रव्य द्रव्यका समवायिकारण होते हैं | परन्तु आकाशके एक प्रकारके अनेक आरम्भक द्रव्य नहीं हैं, जिस समवायिकारण के होने पर और उनके संयोग असमवायिकारणके होनेपर आकाश उत्पन्न हो। उन कारणोंके न होनेसे उनके अनुग्रहसे प्रवृत्त आकाशका निमित्तकारण तो दूर ही रहा।

तेजकी उत्पत्ति के पूर्व प्रकाश आदि कार्य नहीं थे उत्पत्तिके पश्चात् होते हैं, इसप्रकार उत्पत्तिमत् तेजः प्रभृतिमें पूर्वोत्तर कालमें विशेषकी संभावना की जा सकती है, किन्तु इसप्रकार आकाशके पूर्वोत्तरकालमें विशेषकी संभावना नहीं की जा सकती। उत्पत्तिके पूर्वं अनवकाश, असुषिर और अच्छिद्र था, क्या ऐसा निश्चय किया जा सकता है? पृथिवी आदिसे विरुद्ध धर्म और विभूत्व आदिरूप होनेसे आकाश अज सिद्ध होता है।

इसलिए जैसे लोकमें ' आकाश करो ' ' आकाश उत्पन्न हुआ ' इस प्रकारका गौण प्रयोग होता है, और जैसे घटाकाश, करकाकाश, गृहाकाश इसप्रकारका एक आकाशमें भी भेद व्यपदेश गौण होता है। वेदमें भी ' अरण्यवासी पशुओंका आकाशमें आलमन करे ' ऐसा गौण व्यवहार होता है, वैसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति भी गौण समझनी चाहिए॥ ३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — फल | मुख्य सिद्धान्तके साथ श्रुतियोंका

७ अविरोध होपर एकवाक्यता होनेसे ब्रह्म में समन्वयं सिद्ध

* अध्यायकी समाप्ति पर्यन्त अधिकरणोंमें प्रथम विरोधसे श्रुतिका अप्रामाण्य पूर्वपक्षका होता है, ऐसा फल और क्रम है। दो श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेपर ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' इस अध्ययन विधिसे गृहीत श्रुतियाँ अप्रामाणिक नहीं हो सकतीं, इससे आकाशकी उत्पत्ति असंभव है। इस तर्क से छान्दोग्य श्रुति मुख्य और तैत्तिरीय श्रुति गौण माननेपर कोई विरोध नहीं होगा। इसप्रकारसे वैशेषिक मतका विवरण करते हैं- ' आकाशो नोत्पद्यते सामग्रीशून्यत्वात् आत्मवत् ' ' अकाश उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि सामग्री नहीं है जैसे आत्मा। '

* और जैसे वेदमें एक आकाशमें ' आकाशेषु ' यह बहुवचन प्रयोग गौण है, वैसे आकाशकी उत्पत्ति प्रतिपादिक अति भी गौण है॥ ३

2.3.4 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४

सूत्र २.३.४

गौण्यसंभवाच् छब्दाच् च ॥ २.३.४ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 508

पदच्छेद — शब्दात् च

सूत्रार्थ — - और वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम् ' इत्यादि श्रुतिमें आकाशमें अमृत शब्दका प्रयोग देखा जाता है, अतः आकाशकी उत्पत्ति नहीं होती।

शाङ्करभाष्य

नास्ति वियत उत्पत्तिः अश्रुतेरेव। या त्वितरा वियदुत्पत्तिवादिनी श्रुतिरुदाहृता सा गौणी भवितुमर्हति कस्मात् असंभवात्। न ह्याकाशस्योत्पत्तिः संभावयितुं शक्या श्रीमत्कणभुगभिप्रायानुसारिपु जीवत्सु ते हि कारणसामग्र्यसंभवादाकाशस्योत्पत्तिं वारयन्ति समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणेभ्यो हि किल सर्वमुत्पद्यमानं समुत्पद्यते द्रव्यस्य चैकजातीयकमनेकं च द्रव्यं समवायिकारणं भवति न चाकाशस्यैकजातीयकमनेकं च द्रव्यमारम्भकमस्ति यस्मिन्समवायिकारणे सति असमवायिकारणे च तत्संयोगे आकाश उत्पद्येत तदभावात्तु तदनुग्रहप्रवृत्तं निमित्तकारणं दूरापेतमेव आकाशस्य भवति। उत्पत्तिमतां च तेजःप्रभृतीनां पूर्वोत्तरकालयोर्विशेषः संभाव्यते प्रागुत्पत्तेः प्रकाशादिकार्यं न बभूव पश्चाच्च भवतीति आकाशस्य पुनर्न पूर्वोत्तरकालयोर्विशेषः संभावयितुं शक्यते किं हि प्रागुत्पत्तेरनवकाशमसुषिरमच्छिद्रं बभूवेति शक्यतेऽध्यवसातुम् पृथिव्यादिवैधर्म्याच्च विभुत्वादिलक्षणात् आकाशस्य अजत्वसिद्धिः। तस्माद्यथा लोके आकाशं कुरु आकाशो जातः इत्येवंजातीयको गौणः प्रयोगो भवति यथा चघटाकाशः करकाकाशः गृहाकाशः इत्येकस्याप्याकाशस्य एवंजातीयको भेदव्यपदेशो गौणो भवति वेदेऽपि आरण्यानाकाशेष्वालभेरन् इति एवमुत्पत्तिश्रुतिरपि गौणी द्रष्टव्या।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.३.५ के अनुवादके साथ है।)

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.5 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५

सूत्र २.३.५

स्याच् चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥ २.३.५ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 508

पदच्छेद — स्यात् , च , एकस्य , ब्रह्मशब्दवत्

सूत्रार्थ — ( ब्रह्मशब्दवत् ) जैसे एक ही प्रकरण में विषय भेदसे ' अन्नं ब्रह्म ' यहाँ ब्रह्म शब्द गौण है और ' आनन्दो ब्रह्म ' यहाँ मुख्य है, वैसे प्रकृत में भी विषय भेदसे ( एकस्य ) एक ही ' संभूतः ' शब्द गौण और मुख्य ( स्यात् ) होता है।

शाङ्करभाष्य

इदं पदोत्तरं सूत्रम्। स्यादेतत्। कथं पुनरेकस्य संभूतशब्दस्य तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः इत्यस्मिन्नधिकारे परेषु तेजःप्रभृतिष्वनुवर्तमानस्य मुख्यत्वं संभवति आकाशे च गौणत्वमिति।

अत उत्तरमुच्यते स्याच्चैकस्यापि संभूतशब्दस्य विषयविशेषवशाद्गौणो मुख्यश्च प्रयोगः ब्रह्मशब्दवत् यथैकस्यापि ब्रह्मशब्दस्य तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रह्म इत्यस्मिन्नधिकारेऽन्नादिषु गौणः प्रयोगः आनन्दे च मुख्यः यथा च तपसि ब्रह्मविज्ञानसाधने ब्रह्मशब्दो भक्त्या प्रयुज्यते अञ्जसा तु विज्ञेये ब्रह्मणि तद्वत्।

कथं पुनरनुत्पत्तौ नभसः एकमेवाद्वितीयम् इतीयं प्रतिज्ञा समर्थ्यते ननु नभसा द्वितीयेन सद्वितीयं ब्रह्म प्राप्नोति कथं च ब्रह्मणि विदिते सर्वं विदितं स्यादिति तदुच्यते एकमेव इति तावत्स्वकार्यापेक्षयोपपद्यते यथा लोके कश्चित्कुम्भकारकुले पूर्वेद्युर्मृद्दण्डचक्रादीनि च उपलभ्य अपरेद्युश्च नानाविधान्यमत्राणि प्रसारितान्युपलभ्य ब्रूयात् मृदेवैकाकिनी पूर्वेद्युरासीत् इति स च तयावधारणया मृत्कार्यजातमेव पूर्वेद्युर्नासीदित्यभिप्रेयात् न दण्डचक्रादि तद्वदद्वितीयश्रुतिरधिष्ठात्रन्तरं वारयति यथा मृदोऽमत्रप्रकृतेः कुम्भकारोऽधिष्ठाता दृश्यते नैवं ब्रह्मणो जगत्प्रकृतेरन्योऽधिष्ठाता अस्तीति।

न च नभसापि द्वितीयेन सद्वितीयं ब्रह्म प्रसज्यते लक्षणान्यत्वनिमित्तं हि नानात्वम् न च प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मनभसोर्लक्षणान्यत्वमस्ति क्षीरोदकयोरिव संसृष्टयोः व्यापित्वामूर्तत्वादिधर्मसामान्यात् सर्गकाले तु ब्रह्म जगदुत्पादयितुं यतते स्तिमितमितरत्तिष्ठति तेनान्यत्वमवसीयते तथा च आकाशशरीरं ब्रह्म इत्यादिश्रुतिभ्योऽपि ब्रह्माकाशयोरभेदोपचारसिद्धिः अत एव च ब्रह्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानसिद्धिः अपि च सर्वं कार्यमुत्पद्यमानमाकाशेनाव्यतिरिक्तदेशकालमेवोत्पद्यते ब्रह्मणा च अव्यतिरिक्तदेशकालमेवाकाशं भवतीति अतो ब्रह्मणा तत्कार्येण च विज्ञातेन सहविज्ञातमेवाकाशं भवति यथा क्षीरपूर्णे घटे कतिचिदब्बिन्दवः प्रक्षिप्ताः सन्तः क्षीरग्रहणेनैव गृहीता भवन्ति न हि क्षीरग्रहणादब्बिन्दुग्रहणं परिशिष्यते एवं ब्रह्मणा तत्कार्यैश्चाव्यतिरिक्तदेशकालत्वात् गृहीतमेव ब्रह्मग्रहणेन नभो भवति।

तस्माद्भाक्तं नभसः संभवश्रवणमिति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आकाश अज है ऐसा श्रुति कहती है, क्योंकि ' वायुश्चान्तरिक्षं ० ' ( वायु और अन्तरिक्ष ये अमृत हैं ) ऐसा श्रुति कहती है। अमृतकी उत्पत्ति उपपन्न नहीं होती। ' आकाशवत्सर्वगतश्च ० ' ( आकाशके समान सर्वगत और नित्य है ) इसप्रकार आकाशसे सर्वगतत्व और नित्यत्व धर्मोसे ब्रह्मको उपमा देती हुई श्रुति वे धर्मं आकाशके भी सूचित करती है। इससे उस प्रकारके सवंगत और नित्यकी उत्पत्ति उपपन्न नहीं होती। ' स यथा ० ' ( जैसे यह आकाश अनन्त है वैसे ही आत्मा अनन्त है ऐसा समझना चाहिए ) और ' आकाशशरीरं ब्रह्म ' ( ब्रह्म आकाश शरीर है ) ' आकाश आत्मा ० ' ( आकाश आत्मा है ) इसप्रकार यह उदाहरण है। जैसे नील उत्पलका विशेषण होता है, वैसे आकाश उत्पत्ति वाला हो तो वह ब्रह्मका विशेषण नहीं हो सकता। इससे यह ज्ञात होता है कि नित्य ही आकाशके तुल्य ब्रह्म है॥ 8॥

यह सूत्र कुछ शङ्का के होनेपर उत्तर रूप है। ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इस अधिकार ( प्रकरण ) में अनुवर्तमान एक ही ' संभूतः ' शब्द अनन्तरोक्त तेज आदिमें मुख्य और आकाश में गौण कैसे हो सकता है? ऐसी शङ्का है। अतः इसका उत्तर कहा जाता है— ' संभूतः ' शब्द यद्यपि एक है, तो भी विषय विशेषके कारण ब्रह्म शब्द के समान उसका गौण और मुख्य प्रयोग होता है।

जैसे एक ब्रह्म शब्दका भी ' तपसा ब्रह्म ० ' ( तपसे ब्रह्मको जानने की इच्छाकर, तप ब्रह्म है ) इस अधिकार में अन्न आदिमें गौण और आनन्दमें मुख्य प्रयोग हैं | और जैन ब्रह्मविज्ञानके साधन तनमें ब्रह्मशब्द गौणवृत्तिसे प्रयुक्त है किन्तु मुख्यरूपसे तो विज्ञेय ब्रह्म में प्रयुक्त है, वैसे यहाँ भी समझना चाहिए। परन्तु आकाशकी उत्पत्ति न होनेपर ' एकमेवा ० ' ( एक ही अद्वितीय है ) इस प्रतिज्ञाका किस प्रकार समर्थन होगा?

परन्तु दूसरे आकाशसे ब्रह्म सद्वितीय प्राप्त होता है, ब्रह्मके विदित होनेपर सर्वं किस प्रकार विदित होगा? उसको कहते हैं- ' एकमेव ' यह तो स्वकार्यकी अपेक्षासे उपपन्न होता है। जैसे लोकमें कुम्हारके घरमें पहले दिन मृत्तिका, दण्ड, चक्र आदिको देखकर और दूसरे दिन अनेक प्रकार के फैले हुए पात्रों को उपलब्धकर कोई यह कहे कि पहले दिन केवल एक मृत्तिका ही थी, वह उस निश्चयसे मृत्तिकाका कार्य समूह ही प्रथम दिन नहीं था, इस अभिप्रायसे कहता है, किन्तु दण्ड, चक्र आदि नहीं थे, इस अभिप्रायसे नहीं।

वैसे ही अद्वितीय श्रुति अन्य अधिष्ठाताका निषेध करती है। जैसे घट आदि पात्रोंकी प्रकृति ( उपादानकारण ) मृत्तिकाका कुम्भकार अधिष्ठाता देखा जाता है, वैसे जगत् के उपादान कारण ब्रह्मका अन्य अधिष्ठाता नहीं है। और आकाश द्वितीयसे भी ब्रह्म सद्वितीय है, ऐसा प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि लक्षणभेदसे नानात्व है। परन्तु उत्पत्तिके पूर्व ब्रह्म और आकाश में लक्षणभेद नहीं है, कारण कि क्षीर और उदकके समान संसृष्टोंमें व्यापित्व और अमूर्तत्व धर्मं समान हैं।

परन्तु सृष्टिकालमें तो ब्रह्म जगत्‌को उत्पन्न करनेके लिए यत्न करता है और अन्य आकाश निश्चल रहता है, उससे दोनों का भेद निश्चित होता है। उसी प्रकार ' भाकाशशरीरं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतियोंसे भी ब्रह्म और आकाशका अभेदोपचार सिद्ध होता है। अतएव ब्रह्मविज्ञानसे सर्व विज्ञानकी सिद्धि होती है, और उत्पद्यमान सब कार्य आकाशसे अव्यतिरिक्त देश काल में ही उत्पन्न होते हैं, और ब्रह्मसे अभिन्न देश कालमें ही आकाश होता है, अतः ब्रह्म और उसके कार्यके विज्ञान होने के साथ आकाश विज्ञात ही होता है।

जैसे दूध पूर्णं घटमें कुछ जल बिन्दु प्रक्षिप्त होते हुए दूधके ग्रहणसे ही गृहीत होते हैं। दूध ग्रहणसे जलबिन्दुका ग्रहण अवशिष्ट नहीं होता, वैसे ब्रह्म और उसके कार्योंके साथ [ आकाशका ] अभिन्न देश काल होनेसे ब्रह्म के ग्रहणसे आकाश गृहीत ही होता है, इसलिए आकाशकी सम्भव श्रुति गौण है।। ५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.6 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६

सूत्र २.३.६

प्रतिज्ञाहानिर् अव्यतिरेकात् ॥ २.३.६ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 510

पदच्छेद — प्रतिज्ञाहानिः , अव्यतिरेकात् , शब्देभ्यः

सूत्रार्थ — ( अव्यतिरेकात् ) उपनिषद् प्रतिपादित ब्रह्मसे संम्पूर्ण वस्तुओंका अभेद होने से ( प्रतिज्ञाहानिः ) एकके विज्ञानसे सबके विज्ञानकी प्रतिज्ञा बाधित नहीं होती। ( शब्देभ्यः ) ' सदेव सोम्य ' ' ऐतदात्म्यमिदं ' इसप्रकार कार्यं कारणके अभेद प्रतिपादन परक श्रुतियोंसे भी प्रतिज्ञाकी सिद्धि अवगत होती है।

शाङ्करभाष्य

येनाश्रुत््रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम् इति आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् इति कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति इति न काचन मद्बहिर्धा विद्यास्ति इति चैवंरूपा प्रतिवेदान्तं प्रतिज्ञा विज्ञायते तस्याः प्रतिज्ञाया एवमहानिरनुपरोधः स्यात् यद्यव्यतिरेकः कृत्स्नस्य वस्तुजातस्य विज्ञेयाद्ब्रह्मणः स्यात् व्यतिरेके हि सति एकविज्ञानानेन सर्वं विज्ञायत इतीयं प्रतिज्ञा हीयेत।

स चाव्यतिरेक एवमुपपद्यते यदि कृत्स्नं वस्तुजातमेकस्माद्ब्रह्मण उत्पद्येत।

शब्देभ्यश्च प्रकृतिविकाराव्यतिरेकन्यायेनैव प्रतिज्ञासिद्धिरवगम्यते तथा हि येनाश्रुत््रुतं भवति इति प्रतिज्ञाय मृदादिदृष्टान्तैः कार्यकारणाभेदप्रतिपादनपरैः प्रतिज्ञैषा समर्थ्यते तत्साधनायैव चोत्तरे शब्दाः सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् तदैक्षत तत्तेजोऽसृजत इत्येवं कार्यजातं ब्रह्मणः प्रदर्श्य अव्यतिरेकं प्रदर्शयन्ति ऐतदात्म्यमिद्र्वम् इत्यारभ्य आ प्रपाठकपरिसमाप्तेः तद्यद्याकाशं न ब्रह्मकार्यं स्यात् न ब्रह्मणि विज्ञाते आकाशं विज्ञायेत ततश्च प्रतिज्ञाहानिः स्यात् न च प्रतिज्ञाहान्या वेदस्याप्रामाण्यं युक्तं कर्तुम्।

तथा हि प्रतिवेदान्तं ते ते शब्दास्तेन तेन दृष्टान्तेन तामेव प्रतिज्ञां ज्ञापयन्ति इदं सर्वं यदयमात्मा ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् इत्येवमादयः तस्माज्ज्वलनादिवदेव गगनमप्युत्पद्यते।। यदुक्तम् अश्रुतेर्न वियदुत्पद्यत इति तदयुक्तम् वियदुत्पत्तिविषयश्रुत्यन्तरस्य दर्शितत्वात् तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः इति। सत्यं दर्शितम् विरुद्धं तु तत्तेजोऽसृजत इत्यनेन श्रुत्यन्तरेण न एकवाक्यत्वात्सर्वश्रुतीनाम्।

भवत्वेकवाक्यत्वमविरुद्धानाम् इह तु विरोध उक्तः सकृच्छ्रुतस्य स्रष्टुः स्रष्टव्यद्वयसंबन्धासंभवाद्द्वयोश्च प्रथमजत्वासंभवाद्विकल्पासंभवाच्चेति नैष दोषः तेजःसर्गस्य तैत्तिरीयके तृतीयत्वश्रवणात् तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः आकाशाद्वायुः वायोरग्निः इति अशक्या हीयं श्रुतिरन्यथा परिणेतुम् शक्या तु परिणेतुं छान्दोग्यश्रुतिः तदाकाशं वायुं च सृष्ट्वा तत्तेजोऽसृजत इति न हीयं श्रुतिस्तेजोजनिप्रधाना सती श्रुत्यन्तरप्रसिद्धामाकाशस्योत्पत्तिं वारयितुं शक्नोति एकस्य वाक्यस्य व्यापारद्वयासंभवात् स्रष्टा त्वेकोऽपि क्रमेणानेकं स्रष्टव्यं सृजेत् इत्येकवाक्यत्वकल्पनायां संभवन्त्यां न विरुद्धार्थत्वेन श्रुतिर्हातव्या न चास्माभिः सकृच्छ्रुतस्य स्रष्टुः स्रष्टव्यद्वयसंबन्धोऽभिप्रेयते श्रुत्यन्तरवशेन स्रष्टव्यान्तरोपसंग्रहात् यथा च सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान् इत्यत्र साक्षादेव सर्वस्य वस्तुजातस्य ब्रह्मजत्वं श्रूयमाणं न प्रदेशान्तरविहितं तेजःप्रमुखमुत्पत्तिक्रमं वारयति एवं तेजसोऽपि ब्रह्मजत्वं श्रूयमाणं न श्रुत्यन्तरविहितं नभःप्रमुखमुत्पत्तिक्रमं वारयितुमर्हति।

ननु शमविधानार्थमेतद्वाक्यम् तज्जलानिति शान्त उपासीत इति श्रुतेः नैतत्सृष्टिवाक्यम् तस्मादेतन्न प्रदेशान्तरप्रसिद्धं क्रममनुरोद्धुमर्हतीति तत्तेजोऽसृजत इत्येतत्सृष्टिवाक्यम् तस्मादत्र यथाश्रुति क्रमो ग्रहीतव्य इति।

नेत्युच्यते न हि तेजःप्राथम्यानुरोधेन श्रुत्यन्तरप्रसिद्धो वियत्पदार्थः परित्यक्तव्यो भवति पदार्थधर्मत्वात्क्रमस्य अपि च तत्तेजोऽसृजत इति नात्र क्रमस्य वाचकः कश्चिच्छब्दोऽस्ति अर्थात्तु क्रमो गम्यते स च वायोरग्निः इत्यनेन श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेन क्रमेण निवार्यते विकल्पसमुच्चयौ तु वियत्तेजसोः प्रथमजत्वविषयावसंभवानभ्युपगमाभ्यां निवारितो तस्मान्नास्ति श्रुत्योर्विप्रतिषेधः।

अपि च छान्दोग्ये येनाश्रुतं श्रुतं भवति इत्येतां प्रतिज्ञां वाक्योपक्रमे श्रुतां समर्थयितुमसमाम्नातमपि वियत् उत्पत्तावुपसंख्यातव्यम् किमङ्ग पुनस्तैत्तिरीयके समाम्नातं नभो न संगृह्यते। यच्चोक्तम् आकाशस्य सर्वेणानन्यदेशकालत्वाद्ब्रह्मणा तत्कार्यैश्च सह विदितमेव तद्भवति अतो न प्रतिज्ञा हीयते न च एकमेवाद्वितीयम् इति श्रुतिकोपो भवति क्षीरोदकवद्ब्रह्मनभसोरव्यतिरेकोपपत्तेरिति।

अत्रोच्यते न क्षीरोदकन्यायेनेदमेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं नेतव्यम् मृदादिदृष्टान्तप्रणयनाद्धि प्रकृतिविकारन्यायेनैवेदं सर्वविज्ञानं नेतव्यमिति गम्यते क्षीरोदकन्यायेन च सर्वविज्ञानं कल्प्यमानं न सम्यग्विज्ञानं स्यात् न हि क्षीरज्ञानगृहीतस्योदकस्य सम्यग्विज्ञानगृहीतत्वमस्ति न च वेदस्य पुरुषाणामिव मायालीकवञ्चनादिभिरर्थावधारणमुपपद्यते सावधारणा चेयम् एकमेवाद्वितीयम् इति श्रुतिः क्षीरोदकन्यायेन नीयमाना पीड्येत।

न च स्वकार्यापेक्षयेदं वस्त्वेकदेशविषयं सर्वविज्ञानमेवाद्वितीयतावधारणं चेति न्याय्यम् मृदादिष्वपि हि तत्संभवात् न तदपूर्ववदुपन्यसितव्यं भवति श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः येनाश्रुतं श्रुतं भवति इत्यादिना। तस्मादशेषवस्तुविषयमेवेदं सर्वविज्ञानं सर्वस्य ब्रह्मकार्यतापेक्षयोपन्यस्यत इति द्रष्टव्यम्।। यत्पुनरेतदुक्तम् असंभवाद्गौणी गगनस्योत्पत्तिश्रुतिरिति अत्र ब्रूमः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं-

‘ येनाश्रुतं श्रुतं ० ' ( जिससे अश्रुत श्रुत, अमत मत और अविज्ञात विज्ञात हो जाता है ) ' आत्मनि खल्वरे ० ' ( हे मैत्रेयी! निश्चय ही आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर यह सब विदित हो जाता है ) ' कस्मिन्नु भगवो ० ' ( हे भगवन्! किसके विज्ञात होनेपर यह सब विज्ञात हो जाता है ) और ' न काचन ० ' ( मुझसे भिन्न और कोई विद्या नहीं है ) इसप्रकारकी प्रतिज्ञा प्रत्येक वेदान्तमें ज्ञात होती है।

यदि सम्पूर्ण वस्तु समूह विज्ञेय ब्रह्मसे अभिन्न हो तो उस प्रतिज्ञाकी इसप्रकार अहानिअबाध होगा। भिन्न होनेपर तो ' एकके विज्ञानसे सबका विज्ञान होता है ' इस प्रतिज्ञाकी हानि होगी। वह अव्यतिरेक ( अभिन्नत्व ) इसप्रकार उपपन्न होता है - यदि सम्पूर्णं वस्तु समूह एक ब्रह्मसे उत्पन्न हो, और श्रुतियोंसे और ' प्रकृतिविकार - अव्यतिरेक न्यायसे ' ही प्रतिज्ञाकी सिद्धि अवगत होती है।

जैसे ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' इसप्रकार प्रतिज्ञाकर कार्यं और कारणके अभेद प्रतिपादन परक मृत्तिका आदि दृष्टान्तोंसे इस प्रतिज्ञाका समर्थन किया जाता है और उसके सिद्ध करनेके लिए उत्तरशब्द - श्रुति ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य!

आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' तदैक्षत ० ' ( उस- सत्ने ईक्षण - संकल्प किया, उसने तेज उत्पन्न किया ) इसप्रकार ब्रह्मसे कार्य समूहकी उत्पत्ति दिखलाकर ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( एतद्रूप ही यह सब है ) ऐसा आरम्भकर प्रपाठक- अध्यायकी समाप्ति पर्यन्त अव्यतिरेक ( अभेद ) दिखलाते हैं। इसलिए यदि आकाश ब्रह्मका कार्यं न हो तो ब्रह्म विज्ञात होनेपर आकाश विज्ञात नहीं होगा और उससे प्रतिज्ञाका बाध होगा।

प्रतिज्ञाकी हानिसे वेदका अप्रामाण्य करना युक्त नहीं है, क्योंकि ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( यह सब आत्मा ही है ) ' ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् ' ( यह अमृत ब्रह्म ही आगे है ) इत्यादि वे वे श्रुतिवाक्य प्रत्येक उपनिषद् में तत्, तत् दृष्टान्तसे उसी प्रतिज्ञाका ज्ञापन करते हैं। इसलिए अग्नि आदिके समान ही आकाश भी उत्पन्न होता है। जो यह कहा गया है कि श्रुतिके न होने से आकाश उत्पन्न नहीं होता, वह प्रयुक्त है।

क्योंकि ' तस्माद्वाएतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इसप्रकार आकाशकी उत्पत्ति विषयक अन्य श्रुति दिखलाई गई है। ठीक, दिखलाई गई है। परन्तु ' तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) इस अन्य श्रुतिसे तो वह विरुद्ध है। ऐसा नहीं, कारण कि सर्व श्रुतियोंकी एकवाक्यता है। पू ० – अविरुद्ध वाक्योंकी एक वाक्यता भले हो, किन्तु यहाँ तो विरोध कहा गया है। कारण कि एक वार श्रुत स्रष्टाका दो स्रष्टव्योंके साथ सम्बन्धका सम्भव नहीं है, दोनोंकी प्रथमोत्पत्तिका असम्भव और विकल्पका असम्भव है।

सि ० - यह दोष नहीं है, क्योंकि ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन ० ' ( इस प्रत्यगभिन्न उस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ, आकाशसे वायु और वायुसे अग्नि ) इसप्रकार तैत्तिरीयकमें तेजकी सृष्टि तीसरी सुनी गई है, अतः यह श्रुति अन्यथा परिणत नहीं की जा सकती है। परन्तु ' तदाकाशं ० ' ' उसने आकाश और वायुको उत्पन्नकर उसने तेज उत्पन्न किया ' इसप्रकार छान्दोग्य श्रुति तो परिणतकी जा सकती है।

यह श्रुति तेजकी उत्पत्ति प्रधान होती हुई अन्य श्रुतिमें प्रसिद्ध आकाशकी उत्पत्तिका निवारण करनेमें समर्थ नहीं है, क्योंकि एक वाक्यमें दो व्यापारोंका सम्भव नहीं है। स्रष्टा एक होनेपर भी वह क्रमसे अनेक स्रष्टव्योंको उत्पन्न करे, इसप्रकार एकवाक्यता की कल्पनाका सम्भव होनेपर विरुद्ध अर्थसे श्रुतिकी हानि नहीं करनी चाहिए। एक वार श्रुत स्रष्टाका दो स्रष्टव्यों के साथ सम्बन्ध हमें भी अभीष्ट नहीं है, क्योंकि अन्य श्रुतिके वाले अन्य स्रव्यका संग्रह होता है।

जैसे ' सर्वं खल्विदं ० ' ( निश्चय यह सब ब्रह्म हो है यह उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है ) इसमें समस्त कार्य समुदायकी ब्रह्मते साक्षात् उत्पत्ति श्रयमाण है वह अन्य स्थानोंमें विहित तेज प्रमुख उत्पत्ति क्रमका वारण नहीं करती, वैसे तेजकी मी ब्रह्मसे श्रूयमाण उत्पत्ति अन्य श्रुतिमें

० विहित आकाश प्रमुख उत्पत्ति क्रमका वारण करने से समर्थ नहीं है। पू ० - परन्तु ' तज्जलानिति शान्त उपासीत ' ( उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला, और उसीमें चेष्टा करनेवाला है, अतः शान्त होकर उसकी उपासना करनी चाहिए ) इस श्रुतिसे यह वाक्य शसके विधान के लिए है। इसलिए यह सृष्टिवाक्य नहीं है, अतः यह अन्य प्रदेश में प्रसिद्ध क्रमका विरोध नहीं कर सकता। ' तत्तेजोऽसृजत ' यह सृष्टि वाक्य है। इससे यहाँ श्रुतिके अनुसार क्रमका ग्रहण करना चाहिए।

सि ० - नहीं, ऐसा कहते हैंतेजकी प्रथमता के अनुरोधसे अन्य तैत्तिरीय श्रुवि प्रसिद्ध आकाश पदार्थं परित्याग करने योग्य नहीं होता, क्योंकि क्रम पदार्थका धर्म है। और ' तत्तेजोऽसृजत ' इस श्रुतिमें क्रम वाचक कोई शब्द नहीं है | परन्तु अथतः क्रम अवगत होता है? ता उसका ' वायोरग्निः ' ( वायुसे अग्नि ) इस अन्य श्रुति प्रसिद्ध क्रमसे निवारण होता है।

आकाश और तेजके प्रथमोत्पत्ति विषयक विकल्प और समुच्चय तो असम्भव और अस्वीकार से निरस्त हैं, अतः श्रुतियों ( तैत्तिरीय और छान्दोग्य ) में विरोध नहीं है। किञ्च छान्दोग्यमें ' येनाश्रुतं ० ' ( जिससे अश्रुत श्रुत हो जाता है ) इस वाक्योपक्रममें इस श्रुतप्रतिज्ञाके समर्थन के लिए अश्रु • आकाशका भी उत्पत्तिप्रकरण में उपसंख्यान ( ग्रहण ) करना चाहिए। तो हे अङ्ग! तैत्तिरीयमें पठित आकाशका संग्रह क्यों न हो?

और जो यह कहा गया है कि आकाशका सबके साथ अनन्य देश काल होने के कारण ब्रह्म और उसके कार्योंके साथ वह विदित ही होता है, अतः प्रतिज्ञाकी हानि नहीं होती। और ' एकमेवाद्वितीयम् ' इस श्रुतिका मी बाध नहीं होता। क्योंकि क्षीर और उदकके समान ब्रह्म और आकाशका अव्यतिरेक- अभेद उपपन्न होता है।

सिद्धान्ती — इसपर कहते हैं— क्षीरोदक न्यायसे ' एक विज्ञानसे सर्वं विज्ञान ' नहीं लेना चाहिए, किन्तु मृत्तिका आदि दृष्टान्तोंके ग्रहण करनेसे प्रकृतिविकार न्यायसे यह सर्व विज्ञान लेना चाहिए, यह ज्ञात होता है। क्षीरोदक न्यायसे कल्प्यमान सर्वविज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि क्षीरज्ञानसे गृहीत उदकका यथार्थ ज्ञानसे ग्रहण नहीं है।

वेदका अर्थनिश्चय पुरुषोंके समान मायासे मिथ्या भाषण और उससे वञ्चना आदिसे उपपन्न नहीं होता, किन्तु ' एकमेवाद्वितीयम् ' यह सावधारण श्रुति क्षीरोदक न्यायसे ली जाय तो बाधित होगी। ' सर्वविज्ञान ' और ' एक ही अद्वितीय है ' यह निश्चय स्वकार्यकी अपेक्षासे वस्तु एक देश विषयक है, यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि मृत्तिका आदिमें भी उसका सम्भव है, और ' श्वेतकेतो यन्नु ० ' ( उद्दालक - हे सोम्य श्वेतकेतु!

तू जो ऐसा महामना, पण्डितमन्य और अविनीत हो जिस आदेश से अश्रुतश्रुत हो जाता है, वह आदेश तुमने आचार्य से पूछा हैं? ) इत्यादिसे उसका अपूर्ववत् उपन्यास है, ऐसा समझना चाहिए || ६ || सत्यानन्दी - दीपिका

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.7 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ७

सूत्र २.३.७

यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ २.३.७ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 514

पदच्छेद — यावद्विकारम् , तु विभागः , लोकवत्

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पूर्वपक्ष के निवारण के लिए है, ( यावद्विकारम् ) जितने घट शरावादि विकार हैं, ( विभागः ) उन सबका विभाग है और विभक्त होनेसे वे सब कार्य हैं, ( लोकवत् ) उन लौकिक पदार्थोंके समान आकाश भी विभक्त होनेसे कार्य है।

शाङ्करभाष्य

तुशब्दोऽसंभवाशङ्काव्यावृत्त्यर्थः। न खल्वाकाशोत्पत्तावसंभवाशङ्का कर्तव्या यतो यावत्किंचिद्विकारजातं दृश्यते घटघटिकोदञ्चनादि वा कटककेयूरकुण्डलादि वा सूचीनाराचनिस्त्रिंशादि वा तावानेव विभागो लोके लक्ष्यते न त्वविकृतं किंचित्कुतश्चिद्विभक्तमुपलभ्यते विभागश्चाकाशस्य पृथिव्यादिभ्योऽवगम्यते तस्मात्सोऽपि विकारो भवितुमर्हति। एतेन दिक्कालमनःपरमाण्वादीनां कार्यत्वं व्याख्यातम्।

नन्वात्माप्याकाशादिभ्यो विभक्त इति तस्यापि कार्यत्वं घटादिवत्प्राप्नोति न आत्मन आकाशः संभूतः इति श्रुतेः यदि ह्यात्मापि विकारः स्यात् तस्मात्परमन्यन्न श्रुतमित्याकाशादि सर्वं कार्यं निरात्मकमात्मनः कार्यत्वे स्यात् तथा च शून्यवादः प्रसज्येत आत्मत्वाच्चात्मनो निराकरणशङ्कानुपपत्तिः न ह्यात्मागन्तुकः कस्यचित् स्वयंसिद्धत्वात् न ह्यात्मा आत्मनः प्रमाणमपेक्ष्य सिध्यति तस्य हि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणान्यसिद्धप्रमेयसिद्धये उपादीयन्ते न ह्याकाशादयः पदार्थाः प्रमाणनिरपेक्षाः स्वयं सिद्धाः केनचिदभ्युपगम्यन्ते आत्मा तु प्रमाणादिव्यवहाराश्रयत्वात्प्रागेव प्रमाणादिव्यवहारात्सिध्यति न चेदृशस्य निराकरणं संभवति आगन्तुकं हि वस्तु निराक्रियते न स्वरूपम् य एव हि निराकर्ता तदेव तस्य स्वरूपम् न ह्यग्नेरौष्ण्यमग्निना निराक्रियते तथा अहमेवेदानीं जानामि वर्तमानं वस्तु अहमेवातीतमतीततरं चाज्ञासिषम् अहमेवानागतमनागततरं च ज्ञास्यामि इत्यतीतानागतवर्तमानभावेनान्यथाभवत्यपि ज्ञातव्ये न ज्ञातुरन्यथाभावोऽस्ति सर्वदा वर्तमानस्वभावत्वात् तथा भस्मीभवत्यपि देहे नात्मन उच्छेदः वर्तमानस्वभावादन्यस्वभावत्वं वा न संभावयितुं शक्यम् एवमप्रत्याख्येयस्वभावत्वादकार्यत्वमात्मानः कार्यत्वं च आकाशस्य।।

यत्तूक्तं समानजातीयमनेकं कारणद्रव्यं व्योम्नो नास्तीति तत्प्रत्युच्यते न तावत्समानजातीयमेवारभते न भिन्नजातीयमिति नियमोऽस्ति न हि तन्तूनां तत्संयोगानां च समानजातीयत्वमस्ति द्रव्यगुणत्वाभ्युपगमात् न च निमित्तकारणानामपि तुरीवेमादीनां समानजातीयत्वनियमोऽस्ति।

स्यादेतत् समवायिकारणविषय एव समानजातीयत्वाभ्युपगमः न कारणान्तरविषय इति तदप्यनैकान्तिकम् सूत्रगोवालैर्ह्यनेकजातीयैरेका रज्जुः सृज्यमाना दृश्यते तथा सूत्रैरूर्णादिभिश्च विचित्रान्कम्बलान्वितन्वते सत्त्वद्रव्यत्वाद्यपेक्षया वा समानजातीयत्वे कल्प्यमाने नियमानर्थक्यम् सर्वस्य सर्वेण समानजातीयकत्वात्। नाप्यनेकमेवारभते नैकम् इति नियमोऽस्ति अणुमनसोराद्यकर्मारम्भाभ्युपगमात्। एकैको हि परमाणुर्मनश्चाद्यं कर्मारभते न द्रव्यान्तरैः संहत्य इत्यभ्युपगम्यते।

द्रव्यारम्भ एवानेकारम्भकत्वनियम इति चेत् न परिणामाभ्युपगमात्। भवेदेष नियमः यदि संयोगसचिवं द्रव्यं द्रव्यान्तरस्यारम्भकमभ्युपगम्येत तदेव तु द्रव्यं विशेषवदवस्थान्तरमापद्यमानं कार्यं नामाभ्युपगम्यते तच्च क्वचिदनेकं परिणमते मृद्बीजादि अङ्कुरादिभावेन क्वचिदेकं परिणमते क्षीरादि दध्यादिभावेन नेश्वरशासनमिति अनेकमेव कारणं कार्यं जनयतीति। अतः श्रुतिप्रामाण्यादेकस्माद्ब्रह्मण आकाशादिमहाभूतोत्पत्तिक्रमेण जगज्जातमिति निश्चीयते तथा चोक्तम् उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि इति।।

यच्चोक्तम् आकाशस्योत्पत्तौ न पूर्वोत्तरकालयोर्विशेषः संभावयितुं शक्यत इति तदयुक्तम् येनैव विशेषेण पृथिव्यादिभ्यो व्यतिरिच्यमानं नभः स्वरूपवदिदानीमध्यवसीयते स एव विशेषः प्रागुत्पत्तेर्नासीदिति गम्यते यथा च ब्रह्म न स्थूलादिभिः पृथिव्यादिस्वभावैः स्वभाववत् अस्थूलमनणु इत्यादिश्रुतिभ्यः एवमाकाशस्वभावेनापि न स्वभाववदनाकाशमिति श्रुतेरवगम्यते तस्मात्प्रागुत्पत्तेरनाकाशमिति स्थितम्।

यदप्युक्तं पृथिव्यादिवैधर्म्यादाकाशस्याजत्वमिति तदप्यसत् श्रुतिविरोधे सत्युत्पत्त्यसंभवानुमानस्याभासत्वोपपत्तेः उत्पत्त्यनुमानस्य च दर्शितत्वात् अनित्यमाकाशम् अनित्यगुणाश्रयत्वात् घटादिवदित्यादिप्रयोगसंभवाच्च आत्मन्यनैकान्तिकमिति चेत् न तस्यौपनिषदं प्रत्यनित्यगुणाश्रयत्वासिद्धेः विभुत्वादीनां च आकाशस्योत्पत्तिवादिनं प्रत्यसिद्धत्वात्।

यच्चोक्तमेतत् शब्दाच्चेति तत्रामृतत्वश्रुतिस्तावद्वियति अमृता दिवौकसः इतिवद्द्रष्टव्या उत्पत्तिप्रलययोरुपपादितत्वात् आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः इत्यपि प्रसिद्धमहत्त्वेनाकाशोपमानं क्रियते निरतिशयमहत्त्वाय न आकाशसमत्वाय यथा इषुरिव सविता धावति इति क्षिप्रगतित्वायोच्यते न इषुतुल्यगतित्वाय तद्वत् एतेनानन्तत्वोपमानश्रुतिर्व्याख्याता ज्यायानाकाशात् इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ब्रह्मणः सकाशादाकाशस्योनपरिमाणत्वसिद्धिः न तस्य प्रतिमास्ति इति च ब्रह्मणोऽनुपमानत्वं दर्शयति अतोऽन्यदार्तम् इति च ब्रह्मणोऽन्येषामाकाशादीनामार्तत्वं दर्शयति।

तपसि ब्रह्मशब्दवदाकाशस्य जन्मश्रुतेर्गौणत्वमित्येतदाकाशसंभवश्रुत्यनुमानाभ्यां परिहृतम्। तस्माद्ब्रह्मकार्यं वियदिति सिद्धम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — योग्य नहीं है। इसलिए समस्त वस्तु विषयक यह सर्वविज्ञान सबके ब्रह्म कार्यत्वकी अपेक्षासे उपन्यस्त

* पूर्वपक्षीने देशकालके अभेदसे ब्रह्म और उसके कार्यके साथ आकाश भी विदित होता है, इसमें ' क्षीरोदक ' का दृष्टान्त दिया है। परन्तु क्षीरके ज्ञानसे तद् देश कालसे अभिन्न जलबिन्दु ज्ञात नहीं होते, कारण कि वे क्षीरसे अत्यन्त भिन्न हैं। यहाँ तो कार्यकारण न्यायसे प्रतिज्ञा सिद्ध हो सकती है, क्योंकि कार्य कारणका अभेद है अन्यका नहीं, अतः आकाश आदि समस्त जगत् ब्रह्मका कार्य है। इसकी अपेक्षा से ही ' एकके विज्ञान से सर्वविज्ञानकी ' प्रतिज्ञाका उपन्यास किया गया है || ६ ||

और जो यह कहा गया है कि उत्पत्तिके असम्भव होनेसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति गौणी है, इसपर हम कहते हैं-

' तु ' शब्द असम्भवकी आशङ्का निवृत्तिके लिए है | आकाशकी उत्पत्तिमें असंभवकी आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो कुछ घट, घटिका, उदञ्चन आदि अथवा कटक, केयूर, कुण्डल आदिअथवा सुई, बाण, खड्ग आदि विकार समूह देखा जाता है, वही लोकमें विभक्त देखनेमें आता है, और अविकृत पदार्थं किसीसे किंचित् विभक्त होकर उपलब्ध नहीं होता। आकाशका पृथिवी आदिसे विभाग अवगत होता है, इसलिए वह भी कार्य होना चाहिए। इससे ( विभागसिद्धिसे ) दिशा, काल, मन, परमाणु आदि कार्यरूपसे व्याख्यात हुए।

परन्तु आत्मा मी आकाश आदिसे विभक्त है, इससे उसको भी घट आदिके समान कार्यत्व प्राप्त होता है? ऐसा नहीं, क्योंकि ' आत्मन आकाशः संभूतः ' ऐसी श्रुति है। यदि आत्मा भी कार्य हो तो उससे पर अन्य कुछ मी श्रुति प्रतिपादित नहीं है, अत : आत्मा कार्य होनेपर आकाश आदि सब कार्यं निरात्मक हो जायेंगे और उससे शून्यवाद प्रसक्त होगा। सबका आत्मा ( स्वरूप ) होनेसे आत्माके निराकरणकी शङ्का अनुपपन्न है। आत्मा किस कारणका आगन्तुक कार्य नहीं है, क्योंकि वह स्वयं सिद्ध है।

अपने में प्रमाणकी अपेक्षाकर आत्मा सिद्ध नहीं होता है, उसके प्रत्यक्ष आदि प्रमाण अप्रसिद्ध प्रमेयकी सिद्धिके लिए गृहीत होते हैं, क्योंकि नैकान्तिकम् ; सूत्रगोवालैर्ह्यनेकजातीयैरे का रज्जुः सृज्यमाना दृश्यते। तथा सूत्रैरूर्णा - आकाश आदि पदार्थ प्रमाण निरपेक्ष स्वयं सिद्ध हैं, ऐसा किसीने भी स्वीकार नहीं किया है। आत्मा तो प्रमाण आदि व्यवहारका आश्रय होनेसे प्रमाण आदि व्यवहारसे पूर्व ही सिद्ध है, ऐसे स्वयं सिद्ध आत्माका निराकरण नहीं हो सकता है।

आगन्तुक वस्तुका ही निराकरण होता है, स्वरूपका निराकरण नहीं होता। जो हि निराकर्ता है वही उसका स्वरूप है। अग्निके औष्ण्यका अग्निसे निराकरण नहीं होता। उसी प्रकार मैं ही इस समय वर्तमान वस्तुको जानता हूँ, मैने ही भूत और उससे मी पूर्वकी वस्तुओंको जाना था, मैं ही भविष्य और उससे भी दूर भविष्यकी वस्तुओंको जानूंगा, इसप्रकार अतीत अनागत और वर्तमानरूपसे ज्ञातत्र्य वस्तुके अन्यथाभाव होनेपर भी ज्ञाताका अन्यथाभाव नहीं होता है, क्योंकि वह सर्वदा वर्तमान स्वभाव है।

इसीप्रकार देहके मस्मीभूत होनेपर भी वर्तमानस्वभाव होनेसे आत्माके उच्छेद ( विनाश ) अथवा अन्यथास्वभावत्वको संभावना नहीं की जा सकती। इस प्रकार निराकरणके अयोग्यस्वभाव होनेसे आत्मा अकार्य है और आकाश कार्यं है। जो यह कहा गया है कि समानजातीय अनेक कारणद्रव्य आकाशके नहीं हैं, उसका निराकरण किया जाता हैसमानजातीय ही आरम्मक होते हैं भिन्नजातीय आरम्भक नहीं होते, ऐसा कोई नियम नहीं है। तन्तु और उनका संयोग समानजातीय नहीं हैं, कारण कि उनको द्रव्य और गुणरूपसे स्वीकार किया गया है।

इस प्रकार तुरी, वेम आदि निमित्तकारणों का भी समान जातीयत्व नियम नहीं है। अच्छा, ऐसा हो कि समवायिकारण विषयक ही समान जातीयत्व स्वीकार हो अन्य कारण विषयक नहीं। वह भी व्यभिचरित है, क्योंकि अनेक जातीय सूत्र गोवालों ( ऊन ) से सृज्यमान एक रस्सी देखी जाती है, वैसे ही लोग सूत्र और उनसे विचित्र कम्बल बुनते हैं। अथवा सत्त्व और द्रव्यत्वकी अपेक्षासे समान जातीयत्वकी कल्पना की जाय तो नियम निष्फल है, क्योंकि सब सबके साथ समानजातीय हैं।

अनेक ही आरम्भ हैं एक नहीं यह नियम भी नहीं है, कारण कि परमाणु और मन आद्य कर्मके आरम्भक स्वीकार किये गये हैं। एक - एक परमाणु और मन आद्य कर्मका आरम्भ करते हैं अन्य द्रव्यसे संहत होकर नहीं, ऐसा स्वीकार किया जाता है। यदि कहो कि द्रव्यके आरम्भमें ही यह अनेक आरम्भकत्व नियम है, तो युक्त नहीं है, क्योंकि परिणामको स्वीकार किया है। यह नियम हो सकता है यदि संयोग सचिव द्रव्य अन्य द्रव्यका आरम्भक स्वीकार किया जाय।

परन्तु वही द्रव्य सविशेष अन्य अवस्थाओं को प्राप्त हुआ कार्यं नामसे स्वीकार किया जाता है। वह कहीं अनेक मृत्तिका बीजादि अङ्कर आदि भावसे परिणत होता है, और कहीं एक क्षीर आदि दधि आदि भावसे परिणत होता है। यह कोई ईश्वरका आदेश नहीं है कि अनेक कारण ही कार्यको उत्पन्न करते हैं। अतः श्रुतिप्रामाण्यसे एक ब्रह्मसे आकाश आदि महाभूतों की उत्पत्ति क्रमसे जगत् उत्पन्न हुआ, ऐसा निश्चित होता है।

इस प्रकार कहा है – ' उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ' ( उपसंहार देखनेसे ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है, ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि क्षीरके समान उपपन्न होगा )। और जो यह कहा गया है कि आकाशकी उत्पत्ति में पूर्व और उत्तरकालमें कुछ विशेष - वैलक्षण्य संभावित नहीं हो सकता, यह कथन अयुक्त है, क्योंकि जिस विशेषसे ही पृथिवी आदिसे व्यतिरिक्त हुआ आकाश स्वरूपवत् वर्तमानमें निश्चित होता है वही विशेष उत्पत्तिके पूर्व नहीं था, ऐसा ज्ञात होता है।

जैसे ' अस्थूलमनणु ' ( वह स्थूल नहीं है अणु नहीं है ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्म स्थूल आदि पृथिवी आदि स्वभावोंसे स्वभाववाला नहीं होता, वैसे आकाशके स्वभावसे भी स्वभाव वाला ब्रह्म नहीं है, ऐसा ' अनाकाशम् ' ( आकाश रहित ) इस श्रुति से अवगत होता है। इसलिए अकाशकी उत्पत्तिके पूर्व ब्रह्म अनाकारा था, ऐसा निश्चित हुआ है।

जो यह कहा गया है कि पृथिवी आदिसे विरुद्ध धर्म ( विभुत्व, निरवयवत्ववाला ) होनेसे आकाश उत्पत्ति रहित है, वह मी ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुतिके साथ विरोध होनेपर उत्पत्ति के असंभवका अनुमान आभासमात्र उपपन्न होता है, और उत्पत्तिका अनुमान दिखलाया गया है' आकाश अनित्य है, अनित्य गुणका आश्रय होनेसे, घट आदिके समान, इत्यादि प्रयोगका संभव है। यदि कहो कि अनित्य गुणाश्रयत्व हेतुका आत्मामें व्यभिचार है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि औपनिषवादीके मत में आत्मामें अनित्य गुणाश्रयत्व असिद्ध है।

और आकाशके उत्पत्तिवादी प्रति आकाश में विभुत्व आदि असिद्ध हैं। ' शब्दाच्च ' ( शब्दसे भी ) जो यह कहा गया है — उसमें अमृतत्व श्रुति तो स्वर्ग में देवता अमृत हैं इसके समान समझनी चाहिए। कारण कि आकाशकी उत्पत्ति और प्रलयका उपपादन किया गया है। ' आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' ( आकाश के समान सर्वगत और नित्य है ) यह भी प्रसिद्ध महत्त्वसे [ ब्रह्म में ] निरतिशय महत्त्व दिखलाने के लिए आकाशके साथ उपमान किया है आकाश समत्व के लिए नहीं।

जैसे ' बाणके समान सविता दौड़ता है ' यह क्षिप्रगति के लिए कहा जाता है बाणके तुल्य गतिके लिए नहीं, इससे अनन्तत्व उपमानवाली श्रुतिका मी व्यख्यान हुआ। ' ज्यायानाकाशात् ' ( आकाशसे बड़ा ) इत्यादि श्रुतियोंसे आकाशका परिमाण ब्रह्मसे छोटा सिद्ध होता है। ' न तस्य ० ' ( उसकी उपमा नहीं है ) यह श्र ुति ब्रह्मको अनुपमत्व प्रतिपादित करतो है।

' अतोऽन्यदार्तम् ' ( उससे अन्य आर्त- अनित्य हैं ) यह श्रुति ब्रह्मसे अन्य आकाश आदिका अनित्यत्व दिखलाती है | जैसे तपमें ब्रह्म शब्द गौण है, वैसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति गौण है, इसका आकाशकी उत्पत्ति श्रुति और अनुमानसे परिहार किया गया है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आकाश ब्रह्मका कार्य है॥७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि आकाशकी उत्पत्ति श्रुति गौण मानें तो ब्रह्मके समान आकाश अनादि और अनन्त सिद्ध होनेपर ' एकमेवाद्वितीयम् ' इत्यादि अद्वैत प्रतिपादक श्रुतिका बाघ होगा ' एक ब्रह्मके विदित होनेपर सब विदित हो जाता है ' इस प्रतिज्ञाका बाध होगा, कारण कि ब्रह्मके जाननेपर अन्यका ज्ञान होनेपर मी आकाशका ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि वह ब्रह्मके समान पृथक्तत्त्व है। पू ० - ' तदुच्यते ' आदिसे कहते हैं | ५ |

* सिद्धान्ती — अपौरुषेय वेद वाक्योंमें अप्रामाण्य कल्पना करनेकी अपेक्षा एकवाक्यता द्वारा प्रामाण्य मानना युक्त है। बलवती श्रुतिके साथ दुर्बल श्रुतिकी एकवाक्यता युक्त है। तैत्तिरीय श्रुति प्रबल है, क्योंकि उसमें हेतुवाचक पञ्चमीसे क्रम पूर्वक उत्पत्ति कही गई है। छान्दोग्यमें केवल ' तत्तेजोऽसृजत ' तेजकी उत्पत्ति श्रुत है, इसलिए तैत्तिरीय श्रुतिके अनुसार तेजकी उत्पत्ति प्रतिपादक छान्दोग्य श्रुतिको परिणत करना चाहिए, इससे तेजकी उत्पत्ति तीसरे नम्बर में होगी। इसप्रकार दोनों श्र तियोंकी एकवाक्यतासे कोई विरोध नहीं है।

* ‘ सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान् ' इस श्रुतिमें सम्पूर्ण जगत्की ब्रह्मसे . उत्पत्ति माननेपर भी जैसे ‘ तत्तेजोऽसृजंत ' ऐसा कहने से कोई विरोध नहीं है, वैसे क्रम बोधक तैत्तिरीय श्रुतिके साथ छान्दोग्य श्रुतिका विरोध नहीं होना चाहिए। पू ० - ' तज्जलान् ' यह श्रुति तो ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थः ' ( जो शब्द जिसके लिए होता है वही शब्दका अर्थ होता है ) इस न्यायके अनुसार शम परक है सृष्टि परक नहीं। इससे छान्दोग्य श्रुति में प्रसिद्ध सृष्टि क्रमका बाध नहीं हो सकता, क्योंकि ' तत्तेजोऽसृजत ' यह सृष्टिवाक्य है, अतः श्रुतिके अनुसार तेजकी प्रथमता स्वीकार करनी चाहिए।

* आकाश और तेजके प्रथमोत्पत्ति विषयक और समुच्चय ( गौके दक्षिण और वाम शृङ्गके समान एक साथ उत्पन्न होना ) न सम्भव है और न स्वीकार किया गया है, क्योंकि वस्तुमें विकल्प नहीं होता और समुच्चयमें कोई प्रमाण नहीं है। समुच्चय होने में ' वायोरग्निः ' इस श्रौत क्रमका बाध होगा, अतः दोनों श्रुतियोंमें विरोध नहीं है।

' आकाशो नोत्पद्यते सामग्रीशून्यत्वात् ' यह आकाशकी उत्पत्तिके असंभवमें पूर्वपक्षीका अनुमान है। सिद्धान्ती - ' भाकाशः, विकारः, विभक्तत्वात् घटादिवत् ' ' आकाश उत्पन्न होता है, क्योंकि वह विभक्त है जैसे घट आदि ' यह सत्प्रतिपक्ष हेतु। ' और जो अविकार है वह अविभक्त है जैसे आत्मा ' इस अन्वयव्यतिरेकसे भी आकाश कार्यं सिद्ध होता है। इससे दिशा आदि मी कार्य हैं, क्योंकि वे भी विभक्त हैं। सत्ता - स्फूर्ति ही आत्माकी स्वयं सिद्धि है, आत्माकी सिद्धिके लिए किसी प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है।

इस विषय में सुरेश्वराचार्यंने कहा है-

i " प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं प्रमित्तिस्तथा। यस्य प्रसादात्सिध्यन्ति तत्सिद्धी किमपेक्ष्यते॥ "

( प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति जिसके प्रसादसे सिद्ध होते हैं उसको सिद्धिमें किसकी अपेक्षा है? ) इससे जो देहके नाशसे आत्माका नाश मानते हैं उनका भी खण्डन हुआ समझना चाहिए।

* यह समानजातीयत्व नियम कारणमात्र विषयक है अथवा निमित्तकारण वा समवायिकारण विषयक है? प्रथम विकल्प तो तन्तु और उनके संयोग में बाधित है, क्योंकि तन्तु द्रव्य और संयोग गुण है। द्वितीयपक्ष में ' न च ' आदि कहते हैं। तृतीयविकल्प क्या समवायिकारणतावच्छेदक धर्मसे सजातीय है अथवा सत्त्व सत्ता से सजातीय है? ' स्यादेतत् ' आदिसे कहते हैं।

* क्या यह अनेक रम्भकत्व नियम आरम्भकमात्र में है अथवा द्रव्यके आरम्भकमें है? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अदृष्टवाले आत्माके साथ संयुक्त परमाणु और मन आद्यकर्मके आरम्भक हैं। उस प्रथम क्रियाका एक - एक परमाणु और मन समवायिकारण है। द्वितीयपक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि वही द्रव्य भिन्न - भिन्न अवस्थासे कार्य नामसे व्यवहारमें आता है। इसके अतिरिक्त ' यह द्रव्य है यह गुण है ' यह परिभाषा कणादसे कल्पित है 1

। उससे श्रुति अर्थंका निर्णय नहीं हो सकता। अतः ' आत्मन आकाशः संभूतः ' आदि श्रुति प्रमाणसे एक ही ब्रह्मसे आकाश आदि समस्त जगत्‌की उत्पत्ति निश्चित होती है। जिस शब्द आदि आश्रयरूप विलक्षणताको लेकर आकाश पृथिवी आदि से भिन्न ज्ञात होता है, वह वैलक्षण्य उत्पत्तिके पूर्व नहीं था। इसमें ' अनाकाशम् ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है।

* ' अकाश, उत्पन्न नहीं होता, सामग्री शून्य होनेसे। ' यह अनुमान ' आकाश उत्पन्न होता है, विभक्त होनेसे घट आदिके समान ' इस अनुमानसे बाधित है, अतः अनुत्पत्ति प्रतिपादक अनुमान आभासमात्र है। कणादके अनुयायी आत्माको विभु नित्य मानकर भी ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न आदि अनित्य गुणों का आश्रय मानते हैं। उनके मतमें तो अनित्य गुणाश्रयत्व हेतुका व्यभिचार मले हो, परन्तु वेदान्तमत में यह दोष नहीं है, क्योंकि निर्गुण आत्मा अनित्य गुणोंका आश्रय ही नहीं है। किश्व जैसे ' निर्जरा अमरा देवा : ' स्वर्गस्थ देवताओं में अमरत्व गौण है, वैसे आकाशमें मी नित्यत्व आदि गौण हैं। और ' आत्मन आकाशः संभूतः ' इस उत्पत्ति श्रुति और उक्त अनुमानसे आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध होती है। अत : ‘ आत्मन आकाशः संभूतः ' इस बलवती तैत्तिरीय श्रुतिसे ' तेत्तेजोऽसृजत ' छान्दोग्य श्रविसे प्रतिपादित तेजकी प्रथमोत्पत्ति के गौण होनेसे दोनोंमें एकवाक्यता है, अतः स्रष्टा ब्रह्म में वेदान्त समन्वययुक्त है॥ ७

मातरिश्वाधिकरणम्

2.3.8 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ८

सूत्र २.३.८

एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥ २.३.८ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 518

पदच्छेद — एतेन , मातरिश्वा , व्याख्यातः

सूत्रार्थ — ( एतेन ) आकाश उत्पत्तिवाला है, इस कथन से ( मातरिश्वा ) वायु भी आकाशोंपाधिक ब्रह्मसे उत्पन्न होता है, ( व्याख्याता ) यह व्याख्यान हुआ।

शाङ्करभाष्य

अतिदेशोऽयम्। एतेन वियद्व्याख्यानेन मातरिश्वापि वियदाश्रयो वायुर्व्याख्यातः। तत्राप्येते यथायोगं पक्षा रचयितव्याः न वायुरुत्पद्यते छन्दोगानामुत्पत्तिप्रकरणेऽनाम्नानादित्येकः पक्षः अस्ति तु तैत्तिरीयाणामुत्पत्तिप्रकरणे आम्नानम् आकाशाद्वायुः इति पक्षान्तरम् ततश्च श्रुत्योर्विप्रतिषेधे सति गौणी वायोरुत्पत्तिश्रुतिः असंभवात् इत्यपरोऽभिप्रायः असंभवश्च सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः इत्यस्तमयप्रतिषेधादमृतत्वादिश्रवणाच्च। प्रतिज्ञानुपरोधाद्यावद्विकारं च विभागाभ्युपगमादुत्पद्यते वायुरिति सिद्धान्तः। अस्तमयप्रतिषेधोऽपरविद्याविषय आपेक्षिकः अग्न्यादीनामिव वायोरस्तमयाभावात्। कृतप्रतिविधानं च अमृतत्वादिश्रवणम्। ननु वायोराकाशस्य च तुल्ययोरुत्पत्तिप्रकरणे श्रवणाश्रवणयोरेकमेवाधिकरणमुभयविषयमस्तु किमतिदेशेनासति विशेष इति उच्यते सत्यमेवमेतत् तथापि मन्दधियां शब्दमात्रकृताशङ्कानिवृत्त्यर्थोऽयमतिदेशः क्रियते संवर्गविद्यादिषु ह्युपास्यत वायोर्महाभागत्वश्रवणात् अस्तमयप्रतिषेधादिभ्यश्च भवति नित्यत्वाशङ्का कस्यचिदिति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह अतिदेश है। इस आकाशके व्याख्यानसे मातरिश्वापि आकाशाश्रय वायु मी व्याख्यात हुआ। उसमें भी यथायोग्य इन पक्षोंकी रचना करनी चाहिए - वायु उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि छान्दोग्य के उत्पत्तिप्रकरणमें पठित नहीं है, यह एक पक्ष है। तैत्तिरीयोंके उत्पत्ति प्रकरण में तो श्रुति है— ' आकाशाद्वायुः ' ( आकाशसे वायु उत्पन्न होता है ) यह अन्य पक्ष है। उससे श्रुतियोंका विरोध होनेपर वायुकी उत्पत्ति श्रुति गौण हैं, क्योंकि उत्पत्तिका असंभव है, यह अन्य अभिप्राय है।

' सैषाऽनस्तमिता ०, ' ( यह जो वायु है, वह अस्त - विनाश न होनेवाला देवता है ) इस प्रकार अस्तमयके प्रतिषेध और अमृतत्व आदिके श्रवणसे वायुकी उत्पत्तिका असम्भव है। प्रतिज्ञाका बाध न होनेसे और सम्पूर्ण विकारका विभाग स्वीकार होनेसे वायु उत्पन्न होता है, यह सिद्धान्त है। अस्तमयका प्रतिषेध अपरविद्या विषयक और आपेक्षिक है, क्योंकि अग्नि आदिके समान वायु अस्त नहीं होता। अमृतत्व आदि श्रुतिका समाधान किया जा चुका है।

परन्तु उत्पत्ति प्रकरण में वायु और आकाशका [ तैत्तिरीयमें ] श्रवण और ( छान्दोग्यमें ) अश्रवण तुल्य है, तो उमय विषयक ( दोनोंका ) एक ही अधिकरण हो, विशेष के न होनेपर अतिदेशका क्या प्रयोजन है? कहते हैं - यह सत्य है, तथापि स्वल्पबुद्धिवाले पुरुषोंकी शब्दमात्रसे उत्पन्न हुई आशङ्काकी निवृत्तिके लिए यह अतिदेश किया है, क्योंकि संवर्गविद्या आदिमें उपास्यरूपसे वायुमें महाभागत्वका श्रवण है। अस्तमयके प्रतिषेध आदिसे किसीको नित्यत्व की आशङ्का हो सकती है॥ ८

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

असंभवाधिकरणम्

2.3.9 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ९

सूत्र २.३.९

असंभवस् तु सतोऽनुपपत्तेः ॥ २.३.९ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 519

पदच्छेद — असंभवः , तु , सतः , अनुपपत्तेः

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द शङ्काको निवृत्तिके लिए है ( सतः ) सत्स्वरूप ब्रह्मकी ( असम्भवः ) उत्पत्ति असम्भव है, ( अनुपपत्तेः ) क्योंकि सत्सामान्यसे सत्सामान्यकी उत्पत्तिकी अनुपपत्ति है अर्थात् अतिशयके न होनेपर प्रकृति - विकारभावको अनुपपत्ति है।

शाङ्करभाष्य

वियत्पवनयोरसंभाव्यमानजन्मनोरप्युत्पत्तिमुपश्रुत्य ब्रह्मणोऽपि भवेत्कुतश्चिदुत्पत्तिरिति स्यात्कस्यचिन्मतिः तथा विकारेभ्य एवाकाशादिभ्य उत्तरेषां विकाराणामुत्पत्तिमुपश्रुत्य आकाशस्यापि विकारादेव ब्रह्मण उत्पत्तिरिति कश्चिन्मन्येत तामाशङ्कामपनेतुमिदं सूत्रम् असंभवस्त्विति। न खलु ब्रह्मणः सदात्मकस्य कुतश्चिदन्यतः संभव उत्पत्तिराशङ्कितव्या कस्मात् अनुपपत्तेः। सन्मात्रं हि ब्रह्म न तस्य सन्मात्रादेवोत्पत्तिः संभवति असत्यतिशये प्रकृतिविकारभावानुपपत्तेः नापि सद्विशेषात् दृष्टविपर्ययात् सामान्याद्विशेषा उत्पद्यमाना दृश्यन्ते मृदादेर्घटादयः न तु विशेषेभ्यः सामान्यम् नाप्यसतः निरात्मकत्वात् कथमसतः सज्जायेत इति च आक्षेपश्रवणात्। स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः इति च ब्रह्मणो जनयितारं वारयति। वियत्पवनयोः पुनरुत्पत्तिः प्रदर्शिता न तु ब्रह्मणः सा अस्तीति वैषम्यम्। न च विकारेभ्यो विकारान्तरोत्पत्तिदर्शनाद्ब्रह्मणोऽपि विकारत्वं भवितुमर्हति मूलप्रकृत्यनभ्युपगमेऽनवस्थाप्रसङ्गात् या मूलप्रकृतिरभ्युपगम्यते तदेव च नो ब्रह्मेत्यविरोधः।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.३.११ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' तत्तेजोऽसृजत ' इस श्रुतिका ' आकाशाद्वायुः ' इस तैत्तिरीय श्रुतिसे विरोध है कि नहीं? इस प्रकार संशय होनेपर गौण पक्ष, पूर्वपक्ष और सिद्धान्तपक्षका ' तत्रापि ' इत्यादिसे अतिदेश करते हैं। तेजकी आकाशके अनन्तर उत्पत्ति तैत्तिरीयमें निर्णीत है। यदि उसमें वायु और तेजका आनन्तर्य समान हो, तो ' वायोरग्निः ' इस क्रम श्रुतिका बाघ होता है।

और यदि दोनोंका पूर्वापर्यं मानें तो छान्दोग्यमें प्रतिपादित तेजकी प्रथमोत्पत्तिका मङ्ग होता है, इससे दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता नहीं होती। ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर ' ततश्च ' इत्यादिसे गौणवादीका अभिप्राय कहते हैं - छान्दोग्यमें वायुकी उत्पत्ति नहीं कही गई है, और ' वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम् ' ( बृह ० २३1२ ) ( वायु और आकाश ये अविनाशी हैं ) ' वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिः ' ( बृह ० ३।३।२ ) ( वायु ही व्यष्टि और वायु समष्टि है ) इस प्रकार वायु सर्वात्मा है।

इससे ' आकाशाद्वायुः ' यह उत्पत्ति श्रुति गौणी है। सिद्धान्ती – ' वायु उत्पन्न होता है विभक्त होनेसे घट आदिके समान ' ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' इस प्रतिज्ञाका बाध न होनेसे और विभाग होने से वायुकी उत्पत्ति श्रुति मुख्य है। अतः आकाश और वायुको उत्पन्नकर तेज उत्पन्न किया, इस प्रकार दोनों श्रुतियोंकी एक वाक्यतासे ब्रह्ममें समन्वय सिद्ध है। यहाँ अतिदेश संगति है।

* वायु असृत है, यह देवताओं में अमृतत्व व्यवहार के समान गौण है। किव संवर्गविद्यामें ' वापुह्येवैतान्सर्वान् ० संवृङ्क्ते ' ( प्रलयकालमें वायु ही अग्नि आदि इन सबका संहार करता है ) इस विषय में श्रुति अभिप्रायका विचार किये बिना किसीको वायुमें नित्यत्वकी शङ्का हो सकती है, उसकी निवृत्तिके लिए यह अतिदेश किया गया है। इस प्रकार दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता होनेसे ब्रह्ममें समन्वय है | ८ |

* ‘ अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवम् ० ( कठ ० ३।१५ ) ( जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे पर और ध्रुव है ) ' न चास्य कश्विजनिता ० ' ( श्वेत ० ६। ९ ) ( उसका कोई उत्पत्ति कर्ता नहीं है ) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मको अनादि और अनन्त कहती हैं। उनका ' त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ' ( तुम विश्वतोमुख उत्पन्न हुए हो ) इस उत्पत्ति श्रुतिके साथ विरोध होनेपर सन्देह होता है।

जैसे गत अधिकरणमें बसम्भवोत्पत्तिवाले आकाश और वायुकी श्रुतिबलसे उत्पत्ति कही गई है, वैसे श्रुतिबलसे ब्रह्मकी ब्रह्मसे उत्पत्ति हो। इसप्रकार दृष्टान्तसंगीतसे पूर्वपक्ष करते हैं- जैसे वायु आदिमें अमृतत्व आदि ' आत्मन भाकाशः संभूत आकाशाद्वायुः ' इत्यादि उत्पत्ति श्रुतिके बलसे आपेक्षिक माने गये हैं, वैसे ब्रह्मके अनादित्व आदि मी आपेक्षिकं मानने चाहिए।

और ' ब्रह्म कुतश्चिजायते कारणत्वात् आकाशवत् ' ( ब्रह्म किसीसे उत्पन्न होता है कारण होनेसे आकाशके समान ) इस अनुमान से अनुगृहीत ' स्वं जातो भवसि ' यह जन्म श्रुति अधिक बलवती है। अनादिको कारण न माननेपर अनवस्था भी नहीं होगी, क्योंकि बीजाङ्करके समान अनादित्व उपपन्न हो सकता है। जैसे एक दीप अन्य दीपसे उत्पन्न होता है, वैसे एक ब्रह्मसे अन्य ब्रह्म उत्पन्न होता है, अतः ' त्वं जातो भवसि ' इस उत्पत्ति श्रुति से " अनाद्यनन्तं ० ' अनादि श्रुतिको गौण मानना चाहिए।

इससे अनादि और अनन्त ब्रह्मका समन्वय असिद्ध है। सिद्धान्ती - ' ब्रह्म नोत्पद्यते कारणशून्यत्वात् नरविषाणवत, व्यतिरेकेण घटवत् ' ( ब्रह्म उत्पन्न नहीं होता, कारण शून्य होनेसे जैसे नर विषाण ' जो कारण शून्य नहीं वह अनुत्पन्न मी नहीं है जैसे घट ) इस अनुमानसे अनुगृहीत अनादि प्रतिपादक श्रुतियाँ उत्पत्ति श्रुतिसे अधिक बलवती हैं। अतः कारणत्व हेतुके बाध होनेसे जन्मश्रुतिका कार्य - कारणके

अभेदको लेकर व्याख्यान करना चाहिए। अतः ब्रह्म समन्वयका कोई विरोध नहीं है || ९ ||

तेजोधिकरणम्

2.3.10 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १०

सूत्र २.३.१०

तेजोऽतस् तथा ह्य् आह ॥ २.३.१० ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 520

पदच्छेद — तेजः , अतः , तथा , हि , आह

सूत्रार्थ — ( तेज : ) तेज अतः ) वायु से उत्पन्न होता है, ( हि ) क्योंकि ( तथा ) ऐसा ही ( मह ) ' वायोरग्निः ' यह श्रुति I कहती है। किसी अन्यसे सम्भव व उ उत्पत्तिको आशङ्का नहीं करनी चाहिए, किससे? इससे कि उपपत्ति नहीं है | सन्मात्र ही ब्रह्म है, उसकी सन्मात्र से ही उत्पत्ति सम्भव नहीं है, कारण कि अतिशयके न होनेपर प्रकृत्ति विकारभाव नहीं हो सकता है।

सद्विशेषसे भी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि दृष्ट ( प्रत्यक्ष ) सं विपर्यय ( विरोध ) है | सामान्य से ही विशेष उत्पन्न होते हुए देखे जाते हैं, जैसे मृत्तिका आदि से घट आदि। परन्तु विशेषोंसे सामान्य उत्पन्न होते हुए नहीं देखे जाते। इसप्रकार असत् ( शून्य ) से भी सत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वह निरात्मक है ' कथमसतः सज्जायेत ' ( असत् से सत् किस प्रकार उत्पन्न होगा? ) ऐसे आक्षेपका श्रवण है।

' सं कारणं ० ' ( वह सबका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता taar स्वामी है, उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न स्वामी है ) यह श्रुति ब्रह्मके उत्पत्तिकर्ताका वारण करती है। आकाश और वायुकी उत्पत्ति दिखलाई गयी है। परन्तु वह ब्रह्मको नहीं है, ऐसा वैषम्य है। विकारोंसे अन्य विकारोंकी उत्पत्ति देखनेसे ब्रह्म भी विकार हो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मूलप्रकृतिका स्वीकार न करनेपर अनवस्था प्रसङ्ग होगा। जो मूलप्रकृति स्वीकार की जाती है

शाङ्करभाष्य

छान्दोग्ये सन्मूलत्वं तेजसः श्रावितम् तैत्तिरीयके तु वायुमूलत्वम् तत्र तेजोयोनिं प्रति श्रुतिविप्रतिपत्तौ सत्याम् प्राप्तं तावद्ब्रह्मयोनिकं तेज इति। कुतः सदेव इत्युपक्रम्य तत्तेजोऽसृजत इत्युपदेशात् सर्वविज्ञानप्रतिज्ञायाश्च ब्रह्मप्रभवत्वे सर्वस्य संभवात् तज्जलान् इति च अविशेषश्रुतेः एतस्माज्जायते प्राणः इति च उपक्रम्य श्रुत्यन्तरे सर्वस्याविशेषेण ब्रह्मजत्वोपदेशात् तैत्तिरीयके च स तपस्तप्त्वा। इदं सर्वमसृजत।

यदिदं किंच इत्यविशेषश्रवणात् तस्मात् वायोरग्निः इति क्रमोपदेशो द्रष्टव्यः वायोरनन्तरमग्निः संभूत इति एवं प्राप्ते उच्यते तेजः अतः मातरिश्वनः जायत इति कस्मात् तथा ह्याह वायोरग्निः इति। अव्यवहिते हि तेजसो ब्रह्मजत्वे सति असति वायुजत्वे वायोरग्निः इतीयं श्रुतिः कदर्थिता स्यात्।

ननु क्रमार्थैषा भविष्यतीत्युक्तम् नेति ब्रूमः तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः इति पुरस्तात् संभवत्यपादानस्य आत्मनः पञ्चमीनिर्देशात् तस्यैव च संभवतेरिहाधिकारात् परस्तादपि तदधिकारे पृथिव्या ओषधयः इत्यपादानपञ्चमीदर्शनात् वायोरग्निः इत्यपादानपञ्चम्येवैषेति गम्यते अपि च वायोरूर्ध्वमग्निः संभूतः इति कल्प्यः उपपदार्थयोगः क्लृप्तस्तु कारकार्थयोगः वायोरग्निः संभूतः इति तस्मादेषा श्रुतिर्वायुयोनित्वं तेजसोऽवगमयति।

नन्वितरापि श्रुतिर्ब्रह्मयोनित्वं तेजसोऽवगमयति तत्तेजोऽसृजत इति न तस्याः पारंपर्यजत्वेऽप्यविरोधात् यदापि ह्याकाशं वायुं च सृष्ट्वा वायुभावापन्नं ब्रह्म तेजोऽसृजतेति कल्प्यते तदापि ब्रह्मजत्वं तेजसो न विरुध्यते यथा तस्याः श्रृतम् तस्या दधि तस्या आमिक्षेत्यादि दर्शयति च ब्रह्मणो विकारात्मनावस्थानम् तदात्मान््वयमकुरुत इति तथा च ईश्वरस्मरणं भवति बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः इत्याद्यनुक्रम्य भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः इति।

यद्यपि बुद्ध्यादयः स्वकारणेभ्यः प्रत्यक्षं भवन्तो दृश्यन्ते तथापि सर्वस्य भावजातस्य साक्षात्प्रणाड्या वा ईश्वरवंश्यत्वात् एतेनाक्रमसृष्टिवादिन्यः श्रुतयो व्याख्याताः तासां सर्वथोपपत्तेः क्रमवत्सृष्टिवादिनीनां त्वन्यथानुपपत्तेः। प्रतिज्ञापि सद्वंश्यत्वमात्रमपेक्षते न अव्यवहितजन्यत्वम् इत्यविरोधः।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.३.११ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सामान्यसे सामान्यको उत्पत्ति मत हो, सामान्य ब्रह्मसे

विशेष तेजकी उत्पत्ति हो इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगति से पूर्वपक्ष है। पूर्वपक्षमें कार्यमात्र ब्रह्मका विवर्त

होनेसे कल्पित वायु तेजका कारण नहीं हो सकता, इसलिए ब्रह्म ही तेजका कारण है। अतः ' वायोः '

यह पञ्चमी विभक्ति क्रममें है उपादान अर्थ में नहीं है।

* ' वायोरग्निः ' यहाँ तो प्रकृति रूप अपादान कारक तो निरपेक्ष पञ्चमीसे प्रतीत होता है और पञ्चमीका अपादान अर्थं निश्चित है। विरोध होनेपर निश्चितसे कल्पितका बाध होता है, अतः वायुसे अग्नि उत्पन्न होती है।

* जैसे गौसे दूध, दूधसे दही, दहीसे पनीर। पनीर साक्षात् दहीसे उत्पन्न होनेपर मी परम्परासे गौसे उत्पन्न होने में कोई विरोध नहीं है, वैसे साक्षात् अथवा परम्परासे सब विकार ब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं। ‘ तज्जलान् ' ' इदं सर्वमसृजत ' इत्यादि अक्रम प्रतिपादक श्रुतियां साक्षात् अथवा परम्परासे सब पदार्थं ब्रह्मसे उपन्न होते हैं इस अर्थ में उपपन्न होती हैं। अता बलवतो क्रम बोधक श्रुतियोंके अनुसार ' तत्तेजोऽसृजत ' इस प्रकारकी अक्रम बोधक श्रुतियोंको एकवाक्यता होनेसे गति हो सकती है अन्यथा नहीं, इसप्रकार क्रम अथवा अक्रम बोधक श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है। इसलिए वेदान्तका ब्रह्ममें समन्वय सिद्ध है || १० |

अबधिकरणम्

2.3.11 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ११

सूत्र २.३.११

आपः ॥ २.३.११ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.११ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 522

सूत्रार्थ — जल तेजसे उत्पन्न होता है, क्योंकि ' अग्नेराप ' यह श्रुति है | इससे ' वायोरग्निः ' यह अपादान पञ्चमी है, ऐसा ज्ञात होता है। और ' वायोरूर्ध्वमग्निः ' ( वायु के अनन्तर अग्नि उत्पन्न हुआ ) इसप्रकार उपपदके अर्थके योगकी कल्पना करनी पड़ती है, और ' बायोरग्निः ' ( वायु से अग्नि उत्पन्न हुआ ) इसमें कार के अर्थका योग तो निश्चित है। इसलिए यह श्रुति तेज वायुकारणक बोध कराती है अर्थात् तेजका कारण वायु है।

परन्तु ' तत्तेजोऽसृजत ' यह अन्य श्रुति भी तेजको ब्रह्मकारणत्व बोध कराती है। ऐसा नहीं, क्योंकि परम्परासे तेज ब्रह्मसे उत्पन्न होनेपर भी उस श्रुतिका विरोध नहीं है। यदि आकाश और वायुको उत्पन्नकर वायुभावापन्न ब्रह्मने तेज उत्पन्न किया, ऐसी कल्पना की जाय, तो मी तेज + ब्रह्मसे उत्पन्न होता है इसमें विरोध नहीं है। जैसे ‘ तस्याः शृतं ० ' ( गौका गरम किया हुआ दूध, उसकी दही, उसकी आमिक्षा - पनीर ) इत्यादि।

' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( उसने स्वयं अपनेको रचा ) यह श्रुति ब्रह्मकी विकाररूपसे अवस्थिति दिखलाती है। इसप्रकार भववद्गीता भी है- ' बुद्धिर्ज्ञानमसंमोह : ' ( बुद्धि, ज्ञान और अमूढता ) इत्यादि उपक्रम कर ' मवन्ति भावा ० ' ( प्राणियोंके नाना प्रकारके बुद्धि आदि भाव मेरेसे ही होते हैं ) यद्यपि बुद्धि आदि स्वकारणोंसे प्रत्यक्ष उत्पन्न होते हुए देखे जाते हैं, तो भी सम्पूर्ण पदार्थ साक्षात् वा परम्परासे ईश्वरसे उत्पन्न होते हैं।

इस कथनसे क्रम रहित सृष्टि प्रतिपादक श्रुतियोंका व्याख्यान हो गया, क्योंकि उनकी सर्वप्रकारसे उपपत्ति होती है। परन्तु क्रम युक्त सृष्टि प्रतिपादक श्रुतियाँ अन्यथा अनुपपन्न हैं, इससे प्रतिज्ञा भी सत्से उत्पत्ति मात्रको अपेक्षा करती है, अव्यवहित उत्पत्तिकी

शाङ्करभाष्य

नहीं, इसलिए बविरोध है॥ १०॥

' अतस्तथाह्याह ' इत्यनुवर्तते। आपोऽतस्तेजसो जायन्ते। कस्मात्? तथाह्याह‘ तदपोऽसृजत ' इति ‘ अग्नेरापः ' इति च। सति वचने नास्ति संशयः। तेजसस्तु सृष्टि व्याख्याय पृथिव्या व्याख्यास्यन्नपोऽन्तरियामित्याप इति सूत्रयांबभूव॥ ११

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जिनकी उत्पत्तिकी सम्भावना नहीं है ऐसे आकाश और वायुकी मी उत्पत्ति सुनकर ब्रह्मकी भी उत्पत्ति किसीसे होगी, ऐसी किसीकी बुद्धि हो सकती है। उसी प्रकार आकाश आदि विकारोंसे ही उत्तर ( वायु आदि ) विकारोंकी उत्पत्ति सुनकर आकाशकी भी उत्पत्ति विकार ब्रह्मसे ही होगी, ऐसा कोई मानें, उस शङ्काका निवारण करनेके लिए ' असंभवस्तु ० ' यह सूत्र है। सदात्मक ब्रह्मकी

छान्दोग्यमें तेजको सत् मूलत्व सुनाया गया है अर्थात् तेजका मूल सत् है और तैत्तिरीयकमें तो वायु मूलत्व अर्थात् तेजका मूल वायु कहा गया है। उन दोनोंमें तेजके कारण के प्रति श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेपर ब्रह्म कारणक तेज है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि ' सदेव ' ' सत् ही इसप्रकार आरम्भकर ‘ तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) ऐसा उपदेश है। ' तज्जलान् ' इस अविशेष श्रुतिसे सबको ब्रह्म जन्य होनेपर सर्वविज्ञान प्रतिज्ञाका सम्भव है।

' एतस्माज्जायते प्राणः ' ( इससे प्राण उत्पन्न होता है ) ऐसा उपक्रमकर अन्य श्रुतिमें सब समानरूपसे ब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, इसप्रकार उपदेश है। और तैत्तिरीयकमें ' स तपस्तप्त्वा ० ' ( उसने तप ( ज्ञान ) करके ही यह जो कुछ है सबकी रचनाकी ) यह अविशेष श्रुति है। इसलिए ' वायोरग्निः ' ( वायुसे अग्नि उत्पन्न हुआ ) इसप्रकार वायुके अनन्तर अग्नि उत्पन्न हुआ यह क्रमोपदेश समझना चाहिए। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं -- तेज अतः - वायुसे उत्पन्न होता है, किससे?

इससे कि ' वायोरग्निः ' ऐसा कहा है। तेजकी ब्रह्म व्यवधान रहित ( सीधी ) उत्पत्ति होनेपर और वायुसे उत्पत्ति न होनेपर ' वायोरग्निः ' यह श्रुति बाधित हो जायगी। परन्तु यह जो कहा गया है कि यह श्रुति क्रमके लिए होगी। हम कहते हैं कि ऐसा नहीं, क्योंकि ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इसप्रकार पूर्व में उत्पत्ति क्रिया के अपादान आत्माका पञ्चमीसे निर्देश है, उसी उत्पत्ति क्रियाका यहाँ अधिकार है। आगे भी उसके अधिकारमें ' पृथिव्या ओषधयः ० ' ( पृथिवीसे ओषधियाँ उत्पन्न हुई ) इसप्रकार

अपादान पञ्चमीका दर्शन -निर्देश है।

' अतस्तथाह्याह ' इसकी पूर्व सूत्रसे अनुवृत्ति है। जल अत : - तेजसे उत्पन्न होता है, क्योंकि ‘ तदपोऽसृजत ' ( उसने जल उत्पन्न किया ) और ' अग्नेराप : ' ( अग्निसे जल उत्पन्न हुआ ) इसप्रकार श्रुतियाँ कहती हैं। श्रुतिवाक्य होनेपर संशय नहीं है। तेजकी सृष्टिका व्याख्यान कर पृथिवीकी सृष्टिका व्याख्यान करते हुए सूत्रकारने मध्यमें जलकी सृष्टि भी आ जाय, इसलिए ' आप ' इस सूत्रकी रचना की।। ११

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * केवल श्रुतिका अविरोध जाननेके लिए ही यह अतिदेय नहीं है, किन्तु पश्चमभूत पृथिवीके उत्पत्तिक्रमका निर्णय करने के लिए भी है। इसलिए तेजोभावापन्न ब्रह्मसे जलके उत्पन्न होनेपर इन श्रुतियों में कोई विरोध नहीं है अर्थात् इनका ब्रह्ममें समन्वय है।। ११

पृथिव्यधिकरणम् |

2.3.12 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १२

सूत्र २.३.१२

अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ २.३.१२ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 523

पदच्छेद — ( पृथिवी ) , अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः

सूत्रार्थ — ( पृथिवी ) अन्नशब्द से यहाँ पृथिवी विवक्षित है ओदन आदि नहीं, ( अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ) क्योंकि ' तत्त ' जोऽसृजत ' इसप्रकार महाभूतोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है, ' यत्कृष्णं तदन्नस्य ' ( जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है ) इसप्रकार पृथिवीत्व के ज्ञापक कृष्णरूपका श्रवण है और ' अद्भ्य पृथिवी ' इसप्रकार अन्य श्रुति है।

शाङ्करभाष्य

‘ ता आप ऐक्षन्त बह्वयः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त ' ( छा ० ६।२।४ ) इति श्रूयते। तत्र संशयः - किमनेनान्नशब्देन व्रीहियवाद्यभ्यवहार्यं वा ओदनाद्युच्यते, किंवा पृथिवीति। तत्र प्राप्तं तावद्द्व्रीहियवाद्योदनादि वा परिग्रहीतव्यमिति। तत्र ह्यन्नशब्दः प्रसिद्धो लोके, वाक्यशेषोऽप्येतमर्थमुपोद्वलयति। ' तस्माद्यत्र क्वचन वर्षति तदेव भूयिष्ठमनं भवति ' इति। व्रीहियवाद्येव हि सति वर्षणे बहु भवति न पृथिवीति। एवं प्राप्ते ब्रूमः पृथिव्ये - वयमन्नशब्देनाद्भयो जायमाना विवक्ष्यत इति।

कस्मात्? अधिकाराद्रूपाच्छब्दान्तराच्च। अधिकारस्तावत् ' तत्तेजोऽसृजत ' ' तदपोऽसृजत ' इति महाभूतविषयो वर्तते। तत्र क्रमप्राप्तां पृथिवीं महाभूतं विलङ्घन्य नाकस्माद्व्रीह्यादिपरिग्रहो न्याय्यः। तथा रूपमपि वाक्यशेषे पृथिव्यनुगुणं दृश्यते- ' यत्कृष्णं तदन्नस्य ' इति। न ह्योदनादेरभ्यवहार्यस्य कृष्णत्वनियमो ऽस्ति, नापि व्रीह्मादीनाम्। * ननु पृथिव्या अपि नैव कृष्णत्वनियमोऽस्तिः पयः पाण्डुरस्याङ्गाररोहितस्य च क्षेत्रस्य दर्शनात्। नायं दोषः ; बाहुल्यापेक्षत्वात्।

भूयिष्ठं हि पृथिव्याः कृष्णं रूपं न तथा श्वेतरोहिते। पौराणिका अपि पृथिवीछायां शर्वरीमुपदिशन्ति। सा च कृष्णाभासेत्यतः कृष्णं रूपं पृथिव्या इति श्लिष्यते। श्रुत्यन्तरमपि समानाधिकारम् -'अद्भयः पृथिवी ' इति भवति। ' तद्यदपां शर आसीत्तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत् ' ( बृ ० १।२।२ ) इति च। पृथिव्यास्तु व्रीह्यादेरुत्पत्ति दर्शयति- ' पृथिव्या ओषधयः ओषधीभ्योऽन्नम् ' इति च। एवमधिकारादिषु पृथिव्याः प्रतिपादकेषु सत्सु कुतो व्रीह्यादिप्रतिपत्तिः? प्रसिद्धिरप्यधिकारादिभिरेव बाध्यते।

वाक्यशेषोऽपि पार्थिवत्वादन्नाद्यस्य तद्वारेण पृथिव्या एवाद्भयः प्रभवत्वं सूचयतीति द्रष्टव्यम्। तस्मात्पृथिवीयमन्नशब्देति॥ १२

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' ता आप ऐक्षन्त ० ' ( उस जलने ईक्षण किया ' हम बहुत हो जायँ - अनेक रूपसे उत्पन्न हों ' उसने अन्नकी रचना की ) ऐसी श्रुति है। यहाँ संशय होता है कि क्या इस अन्न शब्दसे व्रीहि, यव आदि कहे जाते हैं अथवा मक्ष्य ओदन आदि वा पृथिवो कही जाती है।

पूर्वपक्षी - यहाँ व्रीहि, यव आदि अथवा ओदन आदिका ग्रहण करना चाहिए, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि लोकमें अन्तशब्द उनमें प्रसिद्ध है, और ' तस्माद्यत्र क्वचन ० ' ( इससे जहाँ कहीं वृष्टि होती है वहाँ बहुत अन्न होता है ) यह वाक्यशेष भी इसी अर्थको पुष्ट करता है, क्योंकि वृष्टि होनेपर व्रीहि, यव आदि ही बहुत होते हैं, पृथिवी नहीं। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं— जलसे जायमान यह पृथिवी ही अन्नशब्दसे विवक्षित है, किससे? इससे कि अधिकार - प्रकरण है, रूप है और अन्य श्रुति है।

' तत्तेजोऽसृजत ' ' तदपोऽसृजत ' ( उसने तेजकी सृष्टि की, उसने जलकी सृष्टि की ) इसप्रकार महाभूत विषयक अधिकार है। उसमें क्रमप्राप्त महाभूत पृथिवीका उलङ्घनकर अकस्मात् व्रोहि, यव आदिका ग्रहण उचित करता है, ( तल्लिङ्गात् ) क्योंकि ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् ' इत्यादि श्रुतियोंसे उस परमात्माका सर्व नियतृत्व लिङ्ग सुना गया है। इसलिए परमेश्वरसे अधिष्ठित भूत स्रष्टा है, केवल नहीं। इसप्रकार श्रुतियोंकी एक वाक्यता है।

8 किमिमानि वियदादीनि भूतानि स्वयमेव स्वविकारान्सृजन्ति, आहोस्वित्परनहीं हैं। इसप्रकार ' यत्कृष्णं तदन्नस्य ' ( जो कृष्णरूप है वह अन्नका है ) इस वाक्यशेषमें रूप भी पृथिवीके अनुकूल ही देखा जाता है, क्योंकि मक्ष्य ओदन आदिमें कृष्णरूप होनेका नियम नहीं है। और व्रीहि आदिमें भी नहीं है। परन्तु पृथिवीका भी कृष्णरूप होनेका नियम नहीं है, क्योंकि दूध - सा सफेद, अङ्गार - सा रक्त क्षेत्र देखनेमें आता है। यह दोष नहीं है, कारण कि बहुलताकी अपेक्षासे है।

पृथिवीका बहुधा कृष्ण ही रूप है, उसीप्रकार खेत और रक्त नहीं है। पौराणिक भी पृथिवीकी छायाको रात्रि कहते हैं। रात्रि तो कृष्णरूप है, अतः पृथिवीका कृष्णरूप है यह संगत है। इसप्रकार ' अद्द्भ्यः पृथिवी ' ( जलसे पृथिवी उत्पन्न होती है ) और ' तद्यदपां शर ० ' ( सृष्टिकालमें उस जलका जो स्थूल भाग ( फेन ) वह संहत हो गया, यह पृथिवी हो गई ) इसप्रकार यह समान प्रकरण वाली अन्य श्रुतियाँ भी हैं।

' पृथिव्या ओषधयः ० ' ( पृथिवीसे ओषधियाँ और ओषधियों से अन्न होता है ) यह श्रुति पृथिवीसे व्रीहि आदिकी उत्पत्ति दिखलाती है। इसप्रकार पृथिवीके प्रतिपादक अधिकार आदिके होते हुए अन्नशब्दसे व्रीहि आदिकी प्रतिपत्ति कैसे होगी? प्रसिद्धिका भी प्रकरण आदिसे बाध होता है। वाक्यशेष भी अन्न आदिके पार्थिव होनेसे उसके द्वारा पृथिवीका ही जल प्रभवत्व सूचित करता है, ऐसा समझना चाहिए। इसलिए यह पृथिवी ही अन्न शब्द वाच्य है।। १२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ' अतः ' अद्भ्यः पृथिवी ' इस बलवती तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार ' अन्नमसृजत ' इस छान्दोग्य श्रुतिको गौण मानने से भूतसृष्टिवांचक श्रुतियोंका ब्रह्ममें समन्वय अविरुद्ध है।। १२

तदभिध्यानाधिकरणम्

2.3.13 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १३

सूत्र २.३.१३

तदभिध्यानाद् एव तु तल्लिङ्गात् सः ॥ २.३.१३ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 524

पदच्छेद — तदमिध्यानाद् एव तु तल्लिङ्गात् , सः

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है ( स ) वह ईश्वर ही ( तदभिध्यानादेव ) तत्-

शाङ्करभाष्य

भाष्यकिमिमानि वियदादीनि भूतानि स्वयमेव स्वविकारान्सृजन्ति आहोस्वित्परमेश्वर एव तेन तेन आत्मनावतिष्ठमानोऽभिध्यायन् तं तं विकारं सृजतीति संदेहे सति प्राप्तं तावत् स्वयमेव सृजन्तीति कुतः आकाशाद्वायुर्वायोरग्निः इत्यादिस्वातन्त्र्यश्रवणात्। ननु अचेतनानां स्वतन्त्राणां प्रवृत्तिः प्रतिषिद्धा नैष दोषः तत्तेज ऐक्षत ता आप ऐक्षन्त इति च भूतानामपि चेतनत्वश्रवणादिति।।एवं प्राप्ते अभिधीयते स एव परमेश्वरस्तेन तेन आत्मना अवतिष्ठमानोऽभिध्यायन् तं तं विकारं सृजतीति कुतः तल्लिङ्गात्। तथा हि शास्त्रम् यः पृथिव्यां तिष्ठन्यः पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति इत्येवंजातीयकम् साध्यक्षाणामेव भूतानां प्रवृत्तिं दर्शयति तथा सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति इति प्रस्तुत्य सच्च त्यच्चाभवत् तदात्मानं स्वयमकुरुत इति च तस्यैव च सर्वात्मभावं दर्शयति। यत्तु ईक्षणश्रवणमप्तेजसोः तत्परमेश्वरावेशवशादेव द्रष्टव्यम् नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इतीक्षित्रन्तरप्रतिषेधात् प्रकृतत्वाच्च सत ईक्षितुः तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति इत्यत्र।।म्

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — क्या ये आकाश आदि भूत स्वयं ही अपने विकारोंको उत्पन्न करते हैं अथवा परमेश्वर ही यहाँ सत् ईक्षणकर्ता प्रकृत है।। १३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # आकाश आदि भूत अपने कार्योंको स्वयं ही उत्पन्न करते हैं अथवा आकाश आदि भूतोंके अधिष्ठातृ देवता विकारोंकी सृष्टि करनेमें प्रवृत्त होते हैं? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि ' रचनानुपपत्तेश्च ' इस न्यायसे विरोध है। द्वितीयपक्ष ' ता आप ऐक्षन्त ' इसप्रकार जल आदि में ईक्षण सुना जाता है, अत : प्रकाश आदि भूतोंके अधिष्ठातृ देवता ही स्वतन्त्ररूपसे तत् तत् कार्यकी सृष्टि करते हैं, क्योंकि वे मी चेतन हैं। इससे समस्त जगत्का कारण ब्रह्म है, यह बाधित है।

* परमेश्वर ही आकाश आदि भावापन्न होकर तत् तत् विकारोंकी सृष्टि करता है, अतः ब्रह्म समन्वयमें कोई विरोध नहीं है॥ १३

विपर्ययाधिकरणम्

2.3.14 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १४

सूत्र २.३.१४

विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ २.३.१४ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 525

पदच्छेद — विपर्ययेण , तु , क्रम :, अतः , उपपद्यते , च

सूत्रार्थ — ( तु ) किन्तु ( अतः ) उत्पत्तिक्रम से ( विपर्ययेण ) विपरीतक्रमसे ही ( क्रमः ) तत्, तत् - रूपसे अवस्थित हुआ ईक्षण करता हुआ उस उस विकारको उत्पन्न करता है, ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपक्षीये भूत स्वयं ही अपने विकारोंको उत्पन्न करते हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्यों? क्योंकि ' आकाशाद्वायुर्वायोरग्निः ' ( आकाशसे वायु और वायुसे अग्नि उत्पन्न हुआ है ) इत्यादि स्वतन्त्रताका श्रवण होता है। परन्तु स्वतन्त्र अचेतनों की प्रवृत्ति निषिद्ध है।

यह दोष नहीं है, क्योंकि ' तत्तेजो ऐक्षत ० ' ( उस तेजने ईक्षण किया उस जलने ईक्षण किया ) इसप्रकार भूतोंमें भी चेतनत्वका श्रवण होता है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - वही परमेश्वर तत्, तत्- रूपसे अवस्थित हुआ ईक्षण करता हुआ तत्, तत् विकारको उत्पन्न करता है, किससे? इससे कि उसका लिङ्ग है।

जैसे कि ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् ० ' ( जो पृथिवीमें रहता हुआ पृथिवीके आभ्यन्तर है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथिवी शरीर है और भीतर रहकर पृथिवीका नियमन करता है ) इसप्रकारकी श्रुति साध्यक्ष ही भूतों की प्रवृत्ति दिखलाती है। इसप्रकार ' सोऽकामयत ० ' ( उसने कामनाकी बहुत होऊ, उत्पन्न होऊँ ) ऐसा प्रस्तुतकर ‘ सच्च त्यच्चामवत् ' ( वह सत्- मूर्त और स्यत् - अमृतं हुआ, उसने स्वयं अपनेको रक्षा ) यह श्रुति उसका ही सर्वात्मभाव दिखलाती है।

जल और तेजकी जो ईक्षण श्रुति है वह परमेश्वरके आवेश ( सम्बन्ध ) के अधीन ही समझनी चाहिए, क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ० ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इससे अन्य ईक्षिताका प्रतिषेध है और ' तदैक्षत ० ' ( उसने ईक्षण किया बहुत होऊँ उत्पन्न होऊँ )

शाङ्करभाष्य

भूतानामुत्पत्तिक्रमश्चिन्तितः अथेदानीम् अप्ययक्रमश्चिन्त्यते किमनियतेन क्रमेणाप्ययः उत उत्पत्तिक्रमेण अथवा तद्विपरीतेनेति। त्रयोऽपि च उत्पत्तिस्थितिप्रलया भूतानां ब्रह्मायत्ताः श्रूयन्ते यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति इति। तत्रानियमोऽविशेषादिति प्राप्तम् अथवा उत्पत्तेः क्रमस्य श्रुतत्वात्प्रलयस्यापि क्रमाकाङ्क्षिणः स एव क्रमः स्यादिति।।

एवं प्राप्तं ततो ब्रूमः विपर्ययेण तु प्रलयक्रमः अतः उत्पत्तिक्रमात् भवितुमर्हति तथा हि लोके दृश्यते येन क्रमेण सोपानमारूढः ततो विपरीतेन क्रमेणावरोहतीति अपि च दृश्यते मृदो जातं घटशरावादि अप्ययकाले मृद्भावमप्येति अद्भ्यश्च जातं हिमकरकादि अब्भावमप्येतीति।

अतश्चोपपद्यत एतत् यत्पृथिवी अद्भ्यो जाता सती स्थितिकालव्यतिक्रान्तौ अपः अपीयात् आपश्च तेजसो जाताः सत्यः तेजः अपीयुः एवं क्रमेण सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं च अनन्तरमनन्तरतरं कारणमपीत्य सर्वं कार्यजातं परमकारणं परमसूक्ष्मं च ब्रह्माप्येतीति वेदितव्यम् न हि स्वकारणव्यतिक्रमेण कारणकारणे कार्याप्ययो न्याय्यः। स्मृतावप्युत्पत्तिक्रमविपर्ययेणैवाप्ययक्रमस्तत्र तत्र दर्शितः जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीयते। ज्योतिष्यापः प्रलीयन्ते ज्योतिर्वायौ प्रलीयते इत्येवमादौ।

उत्पत्तिक्रमस्तु उत्पत्तावेव श्रुतत्वान्नाप्यये भवितुमर्हति न च असौ अयोग्यत्वादप्ययेनाकाङ्क्ष्यते न हि कार्ये ध्रियमाणे कारणस्याप्ययो युक्तः कारणाप्यये कार्यस्यावस्थानानुपपत्तेः कार्याप्यये तु कारणस्यावस्थानं युक्तम् मृदादिष्वेवं दृष्टत्वात्।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.३.१५ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # गत अधिकरणमें भूतोंका उत्पत्तिक्रम कहकर अब बुद्धिस्थ उनका लयक्रम कहा जाता है, इसप्रकार प्रसंगसंगति है। सिद्धान्तमें भूतोंके प्रतिलोमतः लय ध्यान पूर्वक प्रत्यग्ब्रह्ममें मनका समाघान फल है और पूर्वपक्षमें कारणका नाश होनेपर कार्यका नाश होता है, इससे सम्पूर्ण लयके आधार भूत ब्रह्मकी असिद्धि होनेसे मनका समाधान असिद्ध है। जो प्रलय नहीं मानते उनके लिए ' यतो वा ० ' इत्यादि श्रुति

७ प्रमाण है। जिस प्रकार साक्षात् अथवा परम्परासे समस्त कार्यं ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता है, उस प्रकार प्रलयमें भी साक्षात् अथवा परम्परासे ब्रह्म में ही लय होता है॥ १४

अन्तराविज्ञानाधिकरणम्

2.3.15 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १५

सूत्र २.३.१५

अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गाद् इति चेन् नाविशेषात् ॥ २.३.१५ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 527

पदच्छेद — अन्तरा , विज्ञानमनसी , क्रमेण , तल्लिङ्गात् , इति चेत् , न , अविशेषात्

सूत्रार्थ — ( अन्तरा ) आत्मा और भूतोंके मध्य में ( तल्लिङ्गात् ) ' एतस्माज्जायते प्राणः ० ' इत्यादि सृष्टि बोधक वाक्य से ( विज्ञानमनसी ) बुद्धि, इन्द्रिय और मनका अनुक्रम होता है, इससे आत्मासे बुद्धि, इन्द्रिय और मन उत्पन्न होते हैं। ( क्रमेण ) इस क्रमसे सृष्टि क्रमका विरोध है, ( इति चेन्न ) तो यह युक्त नहीं है, ( अविशेषात् ) क्योंकि इन्द्रिय, बुद्धि और मनके भौतिक होनेसे भूतोत्पत्ति क्रमसे इन्द्रिय आदिके उत्पत्तिक्रमका साम्य है, इसलिए कोई विरोध नहीं है।

शाङ्करभाष्य

भूतानामुत्पत्तिप्रलयावनुलोमप्रतिलोमक्रमाभ्यां भवत इत्युक्तम् आत्मादिरुत्पत्तिः प्रलयश्चात्मान्तः इत्यप्युक्तम्। सेन्द्रियस्य तु मनसो बुद्धेश्च सद्भावः प्रसिद्धः श्रुतिस्मृत्योः बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च। इन्द्रियाणि हयानाहुः इत्यादिलिङ्गेभ्यः तयोरपि कस्मिंश्चिदन्तराले क्रमेणोत्पत्तिप्रलयावुपसंग्राह्यौ सर्वस्य वस्तुजातस्य ब्रह्मजत्वाभ्युपगमात्। अपि च आथर्वणे उत्पत्तिप्रकरणे भूतानामात्मनश्चान्तराले करणान्यनुक्रम्यन्ते एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च।

खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी इति। तस्मात्पूर्वोक्तोत्पत्तिप्रलयक्रमभङ्गप्रसङ्गो भूतानामिति चेत् न अविशेषात् यदि तावद्भौतिकानि करणानि ततो भूतोत्पत्तिप्रलयाभ्यामेवैषामुत्पत्तिप्रलयौ भवत इति नैतयोः क्रमान्तरं मृग्यम् भवति च भौतिकत्वे लिङ्गं करणानाम् अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वाक् इत्येवंजातीयकम् व्यपदेशोऽपि क्वचिद्भूतानां करणानां च ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेन नेतव्यः।

अथ त्वभौतिकानि करणानि तथापि भूतोत्पत्तिक्रमो न करणैर्विशिष्यते प्रथमं करणान्युत्पद्यन्ते चरमं भूतानि प्रथमं वा भूतान्युत्पद्यन्ते चरमं करणानीति आथर्वणे तु समाम्नायक्रममात्रं करणानां भूतानां च न तत्रोत्पत्तिक्रम उच्यते तथा अन्यत्रापि पृथगेव भूतक्रमात्करणक्रम आम्नायते प्रजापतिर्वा इदमग्र आसीत्स आत्मानमैक्षत स मनोऽसृजत तन्मन एवासीत्तदात्मानमैक्षत तद्वाचमसृजत इत्यादिना। तस्मान्नास्ति भूतोत्पत्तिक्रमस्य भङ्गः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रलय क्रम है, क्योंकि अपने कारणमें ही कार्योंका लय देखा जाता है ( उपपद्यते च ) और ऐसा उपपन्न होता है।

भूतोंके उत्पत्तिक्रमका विचार किया गया। अब प्रलय क्रमका विचार किया जाता है — क्या अनियत क्रमसे प्रलय होता है अथवा उत्पत्तिक्रमसे वा उसके विपरीतक्रमसे?

' यतो वा ० ' ( जिससे निश्चय ही ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके आश्रयसे जीवित रहते हैं और प्रवेश करते हुए जिसमें ये लीन होते हैं ) यह श्रुति भूतोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ये तीनों ब्रह्म के अधीन कहती है | परन्तु श्रुतिमें किसी प्रकारका विशेष न होनेसे प्रलयके विषयमें कोई नियम नहीं है, ऐसा प्राप्त होता है।, अथवा उत्पत्ति क्रम श्रुतिमें प्रतिपादित होनेसे क्रमाकांक्षा प्रलयका मो वही ( सृष्टि ) क्रम होना चाहिए।

ऐसा प्राप्त होता है, सि ० . - अतः हम कहते हैं - प्रलयक्रम अतः - उत्पत्तिक्रम से विपरीत होना चाहिए, जैसे लोकमें देखा जाता है कि जिस क्रमसे सीढियोंपर चढता है उससे विपरीत क्रमसे उतरता है, और भी देखा जाता है कि मृत्तिकासे उत्पन्न हुए घट, शराव आदि लयकालमें मृत्तिका - भावको प्राप्त होते हैं और जलसे उत्पन्न हुए हिम, करक आदि जलभावको प्राप्त होते हैं। इससे यह उपपन्न होता है कि जलसे उत्पन्न होती हुई पृथिवी स्थिति कालका अवसान होनेपर जलमें लीन होती है।

तेजसे उत्पन्न होता हुआ जल तेजमें लीन होता है। इसप्रकार क्रमसे अनन्तर अनन्तरंतर सूक्ष्म सूक्ष्मतर कारणमें लीन होकर सम्पूर्ण कार्यं समुदाय परमकारण परम सूक्ष्म ब्रह्म में लय होता है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि अपने कारणका व्यतिक्रमकर कारणके कारणमें कार्यंका लय उचित नहीं है | क्योंकि ‘ जगत्प्रतिष्ठा ० ' ( हे देवर्षे!

जगत् की आधार भूत पृथिवी जलमें प्रलीन होती है, एवं जल तेजमें लीन होता है और तेज वायुमें लीन होता है ) इत्यादि स्मृतियोंमें भी उत्पत्ति क्रमसे विपरीतरूपले प्रलय क्रम तत् तत् स्थलमें दिखलाया गया है। उत्पत्तिक्रम तो उत्पत्ति में श्रुत है, इससे वह प्रलय में होना युक्त नहीं। और अयोग्य होनेसे भी वह ( उत्पत्तिक्रम ) प्रलयसे आकांक्षित नहीं है। कार्यके रहनेपर कारणका विनाश युक्त नहीं है, क्योंकि कारण के विनाश होनेपर कार्यकी अवस्थिति नहीं हो सकती।

कार्यके विनाश - प्रलय होनेपर कारणकी अवस्थिति युक्त है, क्योंकि मृत्तिका आदिमें इसप्रकार देखा जाता है॥ १५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * बुद्धि, इन्द्रिय और मनके उत्पत्ति क्रमका विचार किया जाता है — भूतोंका उत्पत्तिक्रम इन्द्रियों के उत्पत्तिक्रमसे विरुद्ध हैं कि नहीं और इन्द्रियाँ भौतिक हैं कि नहीं? इस प्रकार संशय होता है। ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इस श्रुतिमें इन्द्रियोंका उत्पत्तिक्रम मूतोंके उत्पत्तिक्रमसे पूर्व है और ' आत्मन आकाशः संभूतः ' इस तैत्तिरीय श्रुतिमें आकाश आदि भूतोंकी उत्पत्तिक्रम पहले है। इस प्रकार इन्द्रियोंके उत्पत्तिक्रमसे भूतोंके उत्पत्ति और प्रलयक्रमका बाध होता है। किश्व ' एतस्माज्जायते प्राण : ' इस श्रुतिमें इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भूतोंकी उत्पत्तिसे पृथक होनेसे इन्द्रियाँ भौतिक भी नहीं है। अतः आथवंण और तैत्तिरीय श्रुतियों का परस्पर विरोध होनेसे श्रुतियोंका ब्रह्म में समन्वय असिद्ध है। सिद्धान्तमें उत्पत्ति श्रुतियोंका विरोध न होनेपर उसका ब्रह्ममें समन्वय सिद्ध है। सिद्धान्ती – न, अविशेषात् ' आदिसे कहते हैं। ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इस श्रुतिमें भूतोंसे इन्द्रियोंका पृथक् ग्रहण ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायसे गौण है।। १५

चराचरव्यपाश्रयाधिकरणम्

2.3.16 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १६

सूत्र २.३.१६

चराचरव्यपाश्रयस् तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस् तद्भावभावित्वात् ॥ २.३.१६ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 528

पदच्छेद — चराचरव्यपाश्रयः , तु , स्यात् , तद्वयपदेशः , माक्तः , तद्भावभावित्वात्

सूत्रार्थ — ( तद्वयपदेशः ) जन्म और मरणका जो यह लौकिक व्यवहार है, ( चराचरव्यपाश्रयः ) वह स्थावर और जङ्गम देह विषयक मुख्य है और ( माक्तः ) जीवमें गौण है, ( तद्भावमावित्वात् ) क्योंकि जन्म - मरणका व्यपदेश देहकी उत्पत्ति और नाशके अन्वय और व्यतिरेकका अनुसरण करता है। देहका प्रादुर्भाव होनेसे ही जातकर्म आदिका विधान है, अतः जीवके नित्यत्व प्रतिपादक शास्त्रका कोई विरोध नहीं है।

शाङ्करभाष्य

स्तो जीवस्याप्युत्पत्तिप्रलयौ जातो देवदत्तो मृतो देवदत्त इत्येवंजातीयकाल्लौकिकव्यपदेशात् जातकर्मादिसंस्कारविधानाच्च इति स्यात्कस्यचिद्भ्रान्तिः तामपनुदामः। न जीवस्योत्पत्तिप्रलयौ स्तः शास्त्रफलसंबन्धोपपत्तेः शरीरानुविनाशिनि हि जीवे शरीरान्तरगतेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारार्थौ विधिप्रतिषेधावनर्थकौ स्याताम् श्रूयते च जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते इति। ननु लौकिको जन्ममरणव्यपदेशो जीवस्य दर्शितः सत्यं दर्शितः भाक्तस्त्वेष जीवस्य जन्ममरणव्यपदेशः।

किमाश्रयः पुनरयं मुख्यः यदपेक्षया भाक्त इति उच्यते चराचरव्यपाश्रयः स्थावरजङ्गमशरीरविषयौ जन्ममरणशब्दौ स्थावरजङ्गमानि हि भूतानि जायन्ते च म्रियन्ते च अतस्तद्विषयौ जन्ममरणशब्दौ मुख्यौ सन्तौ तत्स्थे जीवात्मन्युपचर्येते तद्भावभावित्वात् शरीरप्रादुर्भावतिरोभावयोर्हि सतोर्जन्ममरणशब्दौ भवतः नासतोः न हि शरीरसंबन्धादन्यत्र जीवो जातो मृतो वा केनचिल्लक्ष्यते स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसंपद्यमानः स उत्क्रामन् म्रियमाणः इति च शरीरसंयोगवियोगनिमित्तावेव जन्ममरणशब्दौ दर्शयति।

जातकर्मादिविधानमपि देहप्रादुर्भावापेक्षमेव द्रष्टव्यम् अभावाज्जीवप्रादुर्भावस्य। जीवस्य परस्मादात्मन उत्पत्तिर्वियदादीनामिवास्ति नास्ति वेत्येतदुत्तरेण सूत्रेण वक्ष्यति देहाश्रयौ तावज्जीवस्य स्थूलावुत्पत्तिप्रलयौ न स्तः इत्येतदनेन सूत्रेणावोचत्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — भूतों की उत्पत्ति और प्रलय जिस अनुलोम और प्रतिलोम क्रमसे होते हैं, वह कहा गया है। • और यह भी कहा जा चुका है कि आत्मासे उत्पत्ति आदि और आत्मा पर्यन्त प्रलय होता है। ' बुद्धि तु ० ' ( बुद्धिको सारथि जान, मनको लगाम समझ, विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको अश्व कहते हैं ) इत्यादि लिङ्गोंसे इन्द्रिय सहित मन और बुद्धिका सद्भाव श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है। समस्त वस्तुओंको ब्रह्म जन्य स्वीकार करनेसे उनके भी क्रमसे उत्पत्ति और प्रलयका किसीके मध्य में संग्रह करना चाहिए। ' एतस्माज्जायते प्राणः ० ' ( उससे प्राण उत्पन्न होता है, मन, सब इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और विश्वको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है ) इस प्रकार आथर्वणमें उत्पत्तिके प्रकरणमें भूत और आत्माके मध्यमें इन्द्रियोंका अनुक्रम है। यदि कहो कि इससे भूतों की पूर्वोक्त उत्पत्ति और प्रलयक्रमका भङ्ग होगा ; तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अविशेष है - यदि इन्द्रियाँ मौतिक हैं, तो भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयसे ही इनकी उत्पत्ति और प्रलय होते हैं, अतः इनके लिए अन्य क्रमकी खोज नहीं

* स्तो जीवस्याप्युत्पत्तिप्रलयौ, जातो देवदत्तो मृतो देवदत्त इत्येवंजातीयका लौकि करनी चाहिए | ' अन्नमयं हि सोम्य मन ० ' ( हे सोम्य! मन अन्नमय, प्राण जलमय और वाणी तेजोमयी है ) इस प्रकारका इन्द्रियों के भौतिकत्वमें लिङ्ग है। कहीं पर भूत और इन्द्रियोंका व्यपदेश ( शब्द प्रयोग ) भी ब्राह्मण - परिव्राजक न्यायसे ग्रहण करना चाहिए। यदि इन्द्रियाँ अभौतिक हैं, तो मी भूतोंका उत्पत्तिक्रम इन्द्रियोंसे पृथक् नहीं है- - प्रथम इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं अनन्तर भूत, अथवा प्रथम भूत उत्पन्न होते हैं पश्चात् इन्द्रियां। आथर्वणमें तो भूत और करणोंका केवल पाठक्रम है, वहाँ उत्पत्ति क्रम नहीं कहा। इस प्रकार ' प्रजापतिर्वा इदमग्र आसीत् ० ' ( आरम्भमें यह प्रजापति था उसने अपने विषय में ईक्षण किया, उसने मन की रचनाकी, वह मन ही था, उसने अपने विषय में ईक्षण किया, उसने वाणी उत्पन्न की ) इत्यादिसे अन्य स्थलोंमें भी करणक्रम भूतक्रमसे पृथक् ही कहा जाता है। इससे भूतोत्पत्तिक्रमका भङ्ग नहीं है।। १५।।

जीवके भी उत्पत्ति और प्रलय होते हैं, क्योंकि देवदत्त उत्पन्न हुआ, देवदत्त मर गया, इस सम्बन्धकी उपपत्ति होती है। शरीर विनाश के साथ जीवका विनाश हो तो अन्य शरीरगत इष्टकी प्राप्ति और अनिष्ट परिहार के लिए विधि और निषेध व्यर्थ हो जायेंगे। और ' जीवापेतं ० ' ( जीव रहित यह शरीर मरता है जीव नहीं मरता ) ऐसी श्रुति है। परन्तु लौकिक जन्म - मरणका व्यपदेश तो जीवमें दिखलाया गया है। सत्य, दिखलाया गया है। यह जन्म - मरण व्यपदेश जीवमें गौण है, तो पुनः इस मुख्य व्यपदेशका आश्रय कौन है, जिसको अपेक्षासे यह गौण है? कहते हैं — चर ( जंगम ) और अचर ( स्थावर ) शरीरोंके आश्रित यह मुख्य है। स्थावर और जंगम शरीर विषयक ही जन्म - मरण शब्द है, क्योंकि स्थावर और जंगम भूत उत्पन्न होते और मरते हैं, इसलिए उनमें जन्म - मरण शब्द मुख्य होते हुए उसमें स्थित जीवात्मामें गौण हैं, क्योंकि तद्भाव भावो हैं 1

। शरीरके आविर्भाव और तिरोभाव होते हुए जन्म और मरण शब्द होते हैं, न होनेपर नहीं होते। शरीर सम्बन्धके विना अन्यत्र ' जीव उत्पन्न हुआ अथवा मर गया ' ऐसा किसीसे नहीं देखा जाता। और ' स वा अयं ' ( वह यह पुरुष जन्म लेते समय शरीरको आत्ममावसे प्राप्त होता है वह शरीरसे निकलते हुए मरा हुआ होता है ) यह श्रुति शरीर के संयोग और वियोग निमित्तक जन्म मरण शब्द दिखलाती है। जात कर्म आदिका विधान मी देहके आविर्भावकी अपेक्षासे समझना चाहिए, क्योंकि जीवके प्रादुर्भावका अभाव है। tant परमात्मा से आकाश आदिके समान उत्पत्ति है अथवा नहीं, यह आगे सूत्रसे कहेंगे। देहाश्रय स्थूल उत्पत्ति और प्रलय जीवोंमें नहीं हैं, ऐसा सूत्रकारने इस सूत्र से कहा है।। १६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पहले ' तत्त्वमसि ' इस श्रुति वाक्यस्थ ' तत् ' पद वाच्य कारणका निर्णय करनेके लिए भूत श्रुतियोंके परस्पर विरोधका परिहार किया गया है ; अब पादकी समाप्ति पर्यन्त ' त्वम् ' पदके अर्थकी शुद्धिके लिए जीव श्रुतियोंके विरोधका परिहार किया जाता है। पूर्वपक्षमें जीव और ब्रह्मका ऐक्य सिद्ध है और सिद्धान्तमें वह सिद्ध है।। १६

आत्माधिकरणम्

2.3.17 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १७

सूत्र २.३.१७

नात्मा श्रुतेर् नित्यत्वाच् च ताभ्यः ॥ २.३.१७ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 529

पदच्छेद — न , आत्मा , अश्रु , ते ) , नित्यत्वात् , च , ताभ्यः । प्रकारका लौकिक व्यवहार होता है और जातकर्म आदि संस्कारोंका विधान है , किसीको इस प्रकारकी भ्रान्ति हो , हम उसको निवृत्त करते हैं - जीवकी उत्पत्ति और प्रलय नहीं होते , क्योंकि शास्त्रफलके

शाङ्करभाष्य

अस्त्यात्मा जीवाख्यः शरीरेन्द्रियपञ्जराध्यक्षः कर्मफलसंबन्धी स किं व्योमादिवदुत्पद्यते ब्रह्मणः आहोस्विद्ब्रह्मवदेव नोत्पद्यते इति श्रुतिविप्रतिपत्तेर्विशयः कासुचिच्छ्रुतिषु अग्निविस्फुलिङ्गादिनिदर्शनैः र्जीवात्मनः परस्माद्ब्रह्मण उत्पत्तिराम्नायते कासुचित्तु अविकृतस्यैव परस्य ब्रह्मणः कार्यप्रवेशेन जीवभावो विज्ञायते न च उत्पत्तिराम्नायत इति। तत्र प्राप्तं तावत् उत्पद्यते जीव इति कुतः प्रतिज्ञानुपरोधादेव।

एकस्मिन्विदिते सर्वमिदं विदितम् इतीयं प्रतिज्ञा सर्वस्य वस्तुजातस्य ब्रह्मप्रभवत्वे सति नोपरुध्येत तत्त्वान्तरत्वे तु जीवस्य प्रतिज्ञेयमुपरुध्येत। न च अविकृतः परमात्मैव जीव इति शक्यते विज्ञातुम् लक्षणभेदात् अपहतपाप्मत्वादिधर्मको हि परमात्मा तद्विपरीतो हि जीवः।

विभागाच्चास्य विकारत्वसिद्धिः यावान् हि आकाशादिः प्रविभक्तः स सर्वो विकारः तस्य च आकाशादेरुत्पत्तिः समधिगता जीवात्मापि पुण्यापुण्यकर्मा सुखदुःखयुक् प्रतिशरीरं प्रविभक्त इति तस्यापि प्रपञ्चोत्पत्त्यवसरे उत्पत्तिर्भवितुमर्हति। अपि च यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः इति प्राणादेर्भोग्यजातस्य सृष्टिं शिष्ट्वा सर्व एत आत्मानो व्युच्चरन्ति इति भोक्तृ़णामात्मनां पृथक्सृष्टिं शास्ति।

यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः। तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति इति च जीवात्मनामुत्पत्तिप्रलयावुच्येते सरूपवचनात् जीवात्मानो हि परमात्मना सरूपा भवन्ति चैतन्ययोगात् न च क्वचिदश्रवणमन्यत्र श्रुतं वारयितुमर्हति श्रुत्यन्तरगतस्याप्यविरुद्धस्याधिकस्यार्थस्य सर्वत्रोपसंहर्तव्यत्वात्। प्रवेशश्रुतिरप्येवं सति विकारभावापत्त्यैव व्याख्यातव्या तदात्मानं स्वयमकुरुत इत्यादिवत्। तस्मादुत्पद्यते जीव इति।।

एवं प्राप्ते ब्रूमः नात्मा जीव उत्पद्यत इति कस्मात् अश्रुतेः न ह्यस्योत्पत्तिप्रकरणे श्रवणमस्ति भूयःसु प्रदेशेषु। ननु क्वचिदश्रवणमन्यत्र श्रुतं न वारयतीत्युक्तम् सत्यमुक्तम् उत्पत्तिरेव त्वस्य न संभवतीति वदामः कस्मात् नित्यत्वाच्च ताभ्यः चशब्दादजत्वादिभ्यश्च नित्यत्वं ह्यस्य श्रुतिभ्योऽवगम्यते तथा अजत्वम् अविकारित्वम् अविकृतस्यैव ब्रह्मणो जीवात्मनावस्थानं ब्रह्मात्मना चेति न चैवंरूपस्योत्पत्तिरुपपद्यते।

ताः काः श्रुतयः न जीवो म्रियते स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म न जायते म्रियते वा विपश्चित् अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि स एष इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यः तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः इत्येवमाद्या नित्यत्ववादिन्यः सत्यः जीवस्योत्पत्तिं प्रतिबध्नन्ति।

ननु प्रविभक्तत्वाद्विकारः विकारत्वाच्चोत्पद्यते इत्युक्तम् अत्रोच्यते नास्य प्रविभागः स्वतोऽस्ति एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा इति श्रुतेः बुद्ध्याद्युपाधिनिमित्तं तु अस्य प्रविभागप्रतिभानम् आकाशस्येव घटादिसंबन्धनिमित्तम् तथा च शास्त्रम् स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः इत्येवमादि ब्रह्मण एवाविकृतस्य सतोऽस्यैकस्यानेकबुद्ध्यादिमयत्वं दर्शयति तन्मयत्वं च अस्य तद्विविक्तस्वरूपानभिव्यक्त्या तदुपरक्तस्वरूपत्वम् स्त्रीमयो जाल्म इत्यादिवत् द्रष्टव्यम्।

यदपि क्वचिदस्योत्पत्तिप्रलयश्रवणम् तदप्यत एवोपाधिसंबन्धान्नेतव्यम् उपाध्युत्पत्त्या अस्योत्पत्तिः तत्प्रलयेन च प्रलय इति तथा च दर्शयति प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्ति इति तथोपाधिप्रलय एवायम् नात्मविलयः इत्येतदपि अत्रैव मा भगवान्मोहान्तमापीपदन्न वा अहमिमं विजानामि न प्रेत्य संज्ञास्ति इति प्रश्नपूर्वकं प्रतिपादयति न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति इति।

प्रतिज्ञानुपरोधोऽप्यविकृतस्यैव ब्रह्मणो जीवभावाभ्युपगमात् लक्षणभेदोऽप्यनयोरुपाधिनिमित्त एव अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहि इति च प्रकृतस्यैव विज्ञानमयस्यात्मनः सर्वसंसारधर्मप्रत्याख्यानेन परमात्मभावप्रतिपादनात्। तस्मात् नैवात्मोत्पद्यते प्रविलीयते चेति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रार्थ - ( आत्मा ) जीव ( न ) उत्पन्न नहीं होता, ( अश्रुतेः ) क्योंकि उसकी उत्पत्ति विषयक श्रुति नहीं है, ( ताभ्यः ) ' स वा एष महानज आत्मा ' ( च ) और ' अजो नित्यः ' इत्यादि श्रुतियोंसे जीव नित्य प्रतीत होता है।

शरीर और इन्द्रियरूपी पञ्जरका स्वामी और कर्मफलका सम्बन्धी जीव नामक आत्मा है, क्या वह आकाश आदिके समान ब्रह्मसे उत्पन्न होता है अथवा ब्रह्मके समान उत्पन्न नहीं होता है? इस प्रकार श्रुतियों के परस्पर विरोध होनेसे संशय होता है। किन श्रुतियोंमें अग्नि विस्फुलिङ्ग आदि दृष्टान्तोंसे जीवात्मा की परब्रह्मसे उत्पत्ति कही जाती है, और किन श्रुतियोंमें अविकृत परब्रह्म का ही कार्यमें प्रवेशके द्वारा जीवभावसे जाना जाता है, परन्तु उत्पत्ति नहीं कही जाती।

इस प्रकार संशय होनेपर यह प्राप्त होता है कि जीव उत्पन्न होता है, किससे? इससेकि प्रतिज्ञाका अनुपरोध- अबाध ही है। ' एकस्मिन्विदेते ० ' ( एकके विदित होनेपर सब विदित होता है ) यह प्रतिज्ञा सम्पूर्ण वस्तु समूहके ब्रह्म जन्य होनेपर बाषित नहीं होगी। जीवके अन्य तत्त्व होनेपर तो यह प्रतिज्ञा बाधित होगी। अविकृत परमात्मा ही जीव है, इस प्रकार मी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि लक्षणभेद है। परमात्मा पापरहित आदि धर्मवाला है और जीव उससे विपरीत है और विभागसे भी जीवमें विकारत्व सिद्ध है।

जो आकाश आदि प्रविभक्त हैं। वे सब विकार हैं, उन आकाश आदिकी उत्पत्ति मी निश्चित है। इस प्रकार जीवात्मा पुण्य पाप कर्म - वाला, सुख दुःखसे युक्त प्रति शरीर में विभक्त है, अतः प्रपञ्चकी उत्पत्तिके अवसरमें उसकी भी उत्पत्ति हो सकती है।

और भी ' यथाग्नेः ० ' ( जैसे अग्निसे छोटी - छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे इस आत्मासे प्राण निकलते है ) इसप्रकार प्राण आदि भोग्य समुदायकी सृष्टि कहकर ' सर्व एव ( ये सब आत्मासे निकलते हैं ) इसप्रकार श्रुति मोक्ता जोवात्माओं की पृथक् सृष्टिका उपदेश करती है और ' यथा सुदी - प्तात् ० ' ( जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्निसे उसीके समानरूपवाली सहस्रशः चिनगारियां निकलती हैं, हे सोम्य!

उसी प्रकार उस अक्षरसे अनेकों भाव उत्पन्न होते हैं और उसीमें लीन हो जाते हैं ) इस प्रकार जीवात्माओं की उत्पत्ति और प्रलय कहे जाते हैं, क्योंकि श्रुतिमें सरूपवचन ( जीववचन ) है | जीवात्मा परमात्मा के समान होते हैं, क्योंकि चैतन्यका योग है। कहींपर अश्रवण अन्यत्र श्रुतका वारण नहीं कर सकता, क्योंकि अन्य श्रुतिगत अविरुद्ध अधिक अर्थका मी सर्वत्र उपसंहार ( ग्रहण ) करना चाहिए।

ऐसा होनेपर ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' इत्यादि श्रुति के समान प्रवेश श्रुतिका भी विकारभावापत्ति से ही व्याख्यान करना चाहिए। इससे जीवात्मा उत्पन्न होता है। सिद्धान्ती -- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- आत्मा जीव उत्पन्न नहीं होता, किससे? इससे कि श्रुति नहीं है। अनेक स्थलोंमें उत्पत्ति प्रकरण में इसकी श्रुति नहीं है। परन्तु जो यह कहा गया है कि कहींपर अश्रवण अन्यत्र श्रुतका वारण नहीं करता। ठीक कहा है, किन्तु हम कहते हैं कि उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती,

इससे कि उन श्रुतियों से वह नित्य प्रतिपादित है। च शब्द से अजत्व आदि धर्मोंसे अवगत होता है। उसका नित्यत्व तथा अजत्व, अविकारित्व और अविकृत ब्रह्मका ही जीवरूपसे और ब्रह्मरूपसे अवस्थान श्रुतियोंसे ही अवगत होता है। अतः इसप्रकार रूपवाले जीवकी उत्पत्ति युक्त नहीं है। वे कौनसी श्रुतियाँ हैं?

' न जीवो म्रियते ' ( जीव मरता नहीं ) ' स वा एष ० ' ( वह यह महान् अज आत्मा है, अजर, अमर, अमृत और समय ब्रह्म है ) ' न जायते ० ' ( विद्वान् जन्मता मरता नहीं है ) ' भजो ० ' ( यह जन्म रहित, नित्य, शाश्वत और पुराण है ) ' तत्सृष्ट्वा ० ' ( उसे उत्पन्नकर उसमें प्रविष्ट हुआ ) ' अनेन ० ' ( इस जीव रूपसे अनुप्रवेशकर नाम और रूपको अभिव्यक्त करूँ ) ' स एष इह ० ' ( वह यह इसमें नखाग्रपर्यन्त प्रविष्ट है ) ' तत्त्वमसि ' ( वह तू है ) ' अहं ब्रह्मास्मि ' ( मैं ब्रह्म हूँ ) ' अयमात्मा ० ( यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियाँ जीवका नित्यत्व कहती हुई जीवकी उत्पत्तिका निषेध करती हैं।

परन्तु ऐसा कहा गया है कि जीवात्मा विभक्त होनेसे विकार है और विकार होनेसे उत्पन्न होता है। इसपर कहते है - इसका विभाग स्वतः नहीं है, क्योंकि ' एको देव : ० ' ( एक देव सब भूतोंमें गूढ, सर्वव्यापी और सब भूतोंका अन्तरात्मा है ) ऐसी श्रुति है। जैसे आकाशका विभाग घट आदि सम्बन्ध निमित्तक मासता है, वैसे बुद्धि आदि उपाधिके निमित्तसे इसमें ( जीवमें ) प्रविभाग मासता है।

जैसे कि ' स वा अयमात्मा ० ' ( यह आत्मा ब्रह्म है, वह विज्ञानमय, मनोमय प्राणमय, चक्षुमंय और श्रोत्रमय है ) इत्यादि शास्त्र अविकृत एक होते हुए भी ब्रह्मा अनेक बुद्धि आदि मयत्व दिखलाता है। [ स्त्रीपरतन्त्र कामीपुरुषको ] जैसे ' स्त्रीमय जाल्म ' ( काम जड़ ) कहा जाता है, वैसे विविक्तस्वरूपकी अनभिव्यक्ति से उस बुद्धि आदिसे उपरोक्त स्वरूपत्व ( तादात्म्यापन्नत्व ) इसका तन्मयत्व है, ऐसा समझना चाहिए।

जो भी कहीं पर इसके उत्पत्ति और प्रलयका श्रवण है, वह भी इस उपाधिके सम्बन्धसे समझना चाहिए। उपाधिकी उत्पत्ति से इसकी उत्पत्ति और उसके प्रलयसे प्रलय है। और जैसे ' प्रज्ञानघने ० ' ( भूतोंके द्वारा यह प्रज्ञानधन समुत्थान- अभिव्यक्त होकर इन भूतोंके नाशके साथ ही साथ नष्ट हो जाता है, मरणानन्तर संज्ञा नहीं रहती ) यह श्रुति दिखलाती है। इस प्रकार उपाधिका ही यह प्रलय है आत्माका प्रलय नहीं है, यह भी ' अत्रैव मा भगवान् ० ' ( मैत्रेयी - हे भगवन्! यहीं मुझे मोहको प्राप्त करा दिया है।

मैं इसे विशेषरूपसे नहीं समझती कि मरणानन्तर संज्ञा नहीं है ) इस प्रकार प्रश्न पूर्वक प्रतिपादन करते हैं— ' न वा अरेऽहं मोहं ० ' ( याज्ञवल्क्य - हे मैत्रेयी! मैं मोहकी बात नहीं कर रहा हूँ। अरी! यह आत्मा निश्चय ही अविनाशी है, अपरिणामी है विषयोंके साथ उनका सम्बन्ध नहीं है ) इस प्रकार अविकृत ब्रह्मा ही जीवभाव स्वीकार करनेसे प्रतिज्ञाका अबाध है। इनका ( जीव और ब्रह्मका ) लक्षणभेद भी उपाधि निमित्तक ही है।

कारण कि ' अत ऊर्ध्व ० ' ( इसके आगे विमोक्षके लिए उपदेश कीजिए ) यह भी प्रकृत विज्ञानमय आत्माके ही सब धर्मोके निराकरणसे परमात्मभाव प्रतिपादित करता है। इससे आत्मा न उत्पन्न होता है और न प्रविलय होता है॥ १७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' अग्नेर्विस्फुलिङ्गवदेतस्मात्परमात्मनः सर्वे जीवात्मनो ब्युच्चरन्ति ' ( जैसे अग्निसे चिनगारियाँ निकलती हैं वैसे इस परमात्मासे सब जीव निकलते हैं ) इत्यादि जीवोत्पत्ति प्रतिपादक श्रुतियों और ' स एष इह प्रविष्ट आनखाप्रेभ्य अज आत्मा ' ० ( बृह ० ११४१७ ) ( यह इस शरीर में नखके अग्र पर्यन्त प्रविष्ट है वह आत्मा अज है ) इत्यादि जीवकी अनुत्पत्ति सूचक श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे संशय होता है। परन्तु देहके जन्म - मरणसे जीवका जन्म - मरण मत हो, क्योंकि अन्य देहसे भोगे जानेवाले स्वर्ग आदिके निमित्त विधि आदिका असंभव हो जायगा। परन्तु कल्पके आदि और अन्तमें जैसे आकाशकी उत्पत्ति और प्रलय होते हैं, वैसे जीवको भी उत्पत्ति और प्रलय हों, क्योंकि उनका सम्भव है। इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगतिसे पूर्वपक्ष है। इसलिए जीवकी उत्पत्ति मानना चाहिए, इससे ‘ एक विज्ञान से सर्वविज्ञान ' यह प्रतिज्ञा भी सिद्ध होगी, अन्यथा प्रतिज्ञाका बाध होगा।

* ' तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( उसने स्वयं अपने को किया ) इसके समान प्रवेश श्रुतिका ' विकार जीवरूपसे ईश्वर प्रविष्ट हुआ ऐसा अर्थं करना चाहिए। अतः प्रवेशश्रुति गौण है और उत्पत्ति श्रुति मुख्य है।

* उत्पत्ति आदि श्रुवियाँ तो आत्मामें अव्यस्त उत्पत्ति आदिका अनुवादमात्र करती हैं, आत्माका नित्यत्व प्रतिपादक श्रुतियाँ बलवती हैं, इसलिए कोई विरोध नहीं है। अतः जीवात्माकी उत्पत्ति और प्रलय नहीं होते हैं॥ १७

ज्ञाधिकरणम् |

2.3.18 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १८

सूत्र २.३.१८

ज्ञोऽव एव ॥ २.३.१८ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 533

पदच्छेद — ज्ञः , अतः , एव

सूत्रार्थ — [ जीव ] ( ज्ञः ) स्वयं ज्योति : स्वरूप है, [ अतएव ] क्योंकि उसकी उत्पत्ति नहीं होती है।

शाङ्करभाष्य

* स किं कणभुजानामिवागन्तुक चैतन्यः ; स्वतोऽचेतनः, आहोस्वित्सांख्यानामिव नित्यचैतन्यस्वरूप एवेति वादिविप्रतिपत्त ेः संशयः। किं तावत्प्राप्तम्? आगन्तुकमात्मनश्चैतन्यमात्ममनः संयोगजमग्निघटसंयोगजरोहितादिगुणवदिति प्राप्तम्। नित्यचैतन्यत्वे हि सुप्तमूच्छितग्रहाविष्टानामपि चैतन्यं स्यात्। ते पृष्टाः सन्तो न किंचिद्वयमचेतयामहोति जल्पन्ति, स्वस्थाश्च चेतयमाना दृश्यन्ते। अतः कादाचित्कचैतन्यत्वादागन्तुकचैतन्य आत्मेति।

* एवं प्राप्ते ऽभिधीयते -- ज्ञो नित्यचैतन्योऽयमात्मात एव यस्मादेव नोत्पद्यते परमेव ब्रह्माविकृनमुपाधिसंपर्काजीवभावेनावतिष्ठते। परस्य हि ब्रह्मणश्चैतन्यस्वरूपत्वमाम्नातम् - ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( बृ ० ३।९।२८ ), ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० २1१1१ ), अनन्तरोऽबाह्य कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव ' ( बृ ० ४ | ५ | १३ ), इत्यादिषु श्रुतिषु। तदेव चेत्परं ब्रह्म जीवस्तस्माजीवस्यापि नित्यचैतन्यस्वरूपत्वमग्न्यौष्ण्यप्रकाशवदिति गम्यते।

विज्ञानमयप्रक्रियायां च श्रुतयो भवन्ति —– ' असुप्तः ' सुप्तानभिचाकशीति ' ( बृ ० ४ | ३ | ११ ) ' अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति ' ( वृ ० ४ | ३ | ९ ) इति, ' हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ' ( वृ ० ४ | ३ | ३० ) इत्येवंरूपा :। ' अथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा ' ( छा ० ८ | १२ | ४ ) इति च सर्वैः करणद्वारैरिदं वेदेदं वेदेति विज्ञानेनानुसंधानात्तद्रूपत्वसिद्धिः। नित्यचैतन्यस्वरूपत्वे घ्राणाद्यानर्थक्यमिति चेत्न, गन्धादिविषयविशेषपरिच्छेदार्थत्वात्।

तथा हि दर्शयति- ' गन्धाय घ्राणम् ' इत्यादि। * यत्तु सुप्तादयो न चेतयन्त इति तस्य श्रुत्यैव परिहारोऽभिहितः। सुषुप्तं प्रकृत्य ' यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति। नहि द्रष्टुर्दृष्येर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विमक्तं यत्पश्येत् ' ( बृ ० ४ | ३ | २३ ) इत्यादिना। एतदुक्तं भवति - विषयाभावादियमचेतयमानता, न चैतन्याभावादिति। यथा वियदाश्रयस्य प्रकाशस्य प्रकाश्याभावादनभिव्यक्तिर्न स्वरूपाभावात्तद्वत्। वैशेषिकादितर्कश्च श्रुतिविरोध आभासीभवति।

तस्मान्नित्यचैतन्यस्वरूप एवात्मेति निश्चिनुमः॥ १८

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वह ( जीवात्मा ) क्या कणादमतके समान बागन्तुक चैतन्य वाला होता हुआ स्वतः अचेतन है, अथवा सांख्योंके समान नित्य चैतन्य स्वरूप ही है? इस प्रकार वादियोंको विप्रतिपत्तिसे संशय होता है। तो क्या प्राप्त हुआ? अग्नि और घटके संयोगसे [ घटमें ] उत्पन्न हुए रक्त आदि गुणोंके समान जीवात्मामें आत्मा और मनके संयोगसे जन्य आगन्तुक चैतन्य है, ऐसा प्राप्त हुआ। नित्य चैतन्य होनेपर सुप्त, मूच्छित और ग्रहाविष्टोंको भी चैतन्यकी प्राप्ति होगी।

परन्तु वे पूछे जानेपर ' हम कुछ भी नहीं जानते हैं ऐसा बोलते हैं और स्वस्थ होनेपर चेतनता युक्त देखे जाते हैं। इसलिए कभी कभी चैतन्य होनेसे जीवात्मा आगन्तुक चैतन्य है। ऐसा प्राप्त होने पर कहते हैं - यह आत्माज्ञ - नित्य चैतन्यरूप है, अतएव - क्योंकि वह उत्पन्न नहीं होता, इससे अविकृत परब्रह्म हो उपाधिके सम्बन्धसे जीवभाव से अवस्थित है।

कारण कि ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है ) ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' अनन्तरो ० ' ( अन्तर रहित, बाह्य रहित, कृत्स्न विज्ञानैकरस है ) इत्यादि श्रुतियों में परब्रह्मका ही चैतन्यस्वरूप कहा गया है। यदि वही परब्रह्म जीव है तो इससे अग्निकी उष्णता और प्रकाशके समान जीवका भी नित्य चैतन्यस्वरूप है, ऐसा ज्ञान होता है।

और ‘ असुप्तः सुप्तानभिचाकशीति ' ( स्वयं न सोता हुआ सोये हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करता है ) ' अत्रायं ० ' ( स्वप्नावस्था में यह पुरुष स्वयं ज्योति : स्वरूप होता है ) ' नहि विज्ञातुः ० ' ( विज्ञाताकी विज्ञान शक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता ) इस प्रकरकी श्रुतियाँ विज्ञानमयके प्रकरण में हैं।

' अथ यो वेदेदं ० ' ( जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं सूंघें वह आत्मा है ) इस प्रकार सब इन्द्रियों द्वारा इसको जानता है, इसको जानता है इत्याकारक विज्ञानके साथ अनुसंधान होनेसे तद्रूपत्व- ज्ञानरूपत्व सिद्ध होता है। यदि यह कहो कि नित्य चैतन्यस्वरूप होनेपर घ्राण आदि व्यर्थ होंगे, तो ऐसा नहीं, क्योंकि वे गन्ध आदि विषय विशेषाकारवृत्ति के लिए हैं। उसी प्रकार ' गन्धाय घ्राणम् ' ( गन्ध विषयक अन्तःकरणी वृत्तिके लिए प्राण है ) इत्यादि श्रुति दिखलाती है।

सुप्त आदि नहीं जानते, ऐसा जो कहा गया है, उसका सुषुप्तका उपक्रमकर ' यद्वै तन्न पश्यति ० ( सुषुप्तावस्थामें वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता, द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है, उस समय उससे अन्य विभक्त द्वितीय नहीं है, जिसे देखे ) इत्यादि श्रुतिसे ही परिहार कहा गया है। तात्पर्य यह है कि विषयके अभावसे यह चेतनताका अभाव है चैतन्यके अभावसे नहीं। जैसे आकाश आश्रय प्रकाशको प्राकश्यके अमावसे अनभिव्यक्ति है स्वरूपके अभावसे नहीं।

वैशेषिक आदिके तर्क तो श्रुतिके विरोध होनेपर अभास होते हैं। इससे हम यह निश्चय करते हैं कि नित्य चैतन्य स्वरूप ही आत्मा है॥ १८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जीवात्मा विषयक उत्पत्ति और प्रलयका प्रतिषेधकर अब उसे स्वप्रकाशरूप सिद्ध करनेके लिए पूर्वपक्षकी अवतरणिका दिखाते हैं - ' आत्मैवास्य ज्योति : ' ( बृह ० ४।३।६ ) ( आत्मा ही इसको ज्योति है ) इत्यादि श्रुति आत्माको स्वप्रकाश कहती हैं। और ' पश्यञ्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रम् ' ( बृह ० १।४।७ ) ( दर्शन करता हुआ चक्षु है, श्रवण करता हुआ श्रोत्र है ) इत्यादि श्रतियाँ अनित्य ज्ञानका प्रतिपादन करती हैं। इस प्रकार श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेपर संशय होता है कि जीव ब्रह्मरूप होनेसे नित्यज्ञानरूप होनेपर ज्ञानकी उत्पत्तिके इन्द्रिय आदि साधन व्यर्थ होंगे, इससे आत्मा अनित्य ज्ञानवाला मानना चाहिए। सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में मी ज्ञानका अभाव प्रतीत होता है। अतः आत्मा और मनके संयोगसे जीवात्मामें ज्ञान उत्पन्न होता है, यह पूर्वपक्ष है। पूर्वोक्त जीवकी अनुत्पत्तिरूप हेतुको लेकर स्वप्रकाशत्वके साधनसे हेतुहेतुमद्भाव संगति है।

* आत्मा नित्य चैतन्यस्वरूप और असङ्ग है, अतः उसका विषयोंके साथ स्वतः सम्बन्ध न होनेके कारण विषयोंके साथ सम्बन्ध घटकी भूत वृत्तियोंके लिए इन्द्रिय आदि ज्ञानके साधन अवश्य स्वीकृत हैं। यहाँ परिच्छेदका अर्थ वृत्ति है।

* सुषुप्ति में बुद्धि, इन्द्रिय, विषय आदि निशेष ज्ञानकी उत्पादक सामग्री नहीं है। इससे विशेषज्ञानके अभाव होनेसे स्वरूपात्मक ज्ञानका अभाव नहीं होता। और ' शृण्वन् श्रोत्रम् ' इस श्रुतिसे जो जीवात्माका ज्ञान अनित्य कहा गया है, वह भी वृत्ति विषयक है, ' आत्मा न ज्ञानं द्रव्यत्वात् ' ' आत्मा ज्ञान स्वरूप नहीं है, क्योंकि वह द्रव्य है ' यह तर्क ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतियोंसे afra है, क्योंकि निरवयव आत्माका निरवयव मनके साथ सम्बन्ध न होनेसे उसमें अनित्य ज्ञान उत्पन्न ही नहीं होगा और समवायके न होनेसे अपनेमें समवाय सम्बन्धसे उत्पन्न ज्ञानद्वारा आत्मा वेद्य है, यह अयुक्त है, क्योंकि कर्मकर्तृभाव विरोध है। जिसको वैशेषिक मतमें ज्ञान कहा जाता है, वस्तुतः वह वृत्तिज्ञान है, ' कामः सङ्कल्पः ' इत्यादि श्रुति ' सब मन ही है ' ऐसा कहती है। इसलिए आत्मा नित्य चैतन्य स्वरूप है॥ १८

उत्क्रान्तिगत्यधिकरणम्

2.3.19 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १९

सूत्र २.३.१९

उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॥ २.३.१९ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.१९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 535

सूत्रार्थ — ' अस्माच्छरीरादुत्क्रामति ' ' चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' ' तस्माल्लोकात्पुनरेति ' इस प्रकार उत्क्रमण, गति और आगतिके श्रवणसे जीव अणु है, अतः जीवकी सर्वव्यापक प्रतिपादक ' सर्वव्यापी ' श्रुतिका ' एषोऽणुरात्मा ' इस श्रुतिके साथ विरोध है। इदानीं तु किं परिमाणो जीव इति चिन्त्यते - किमणुपरिमाण उत मध्यमपरिमाण

शाङ्करभाष्य

इदानीं तु किंपरिमाणो जीव इति चिन्त्यते किमणुपरिमाणः उत मध्यमपरिमाणः आहोस्वित् महापरिमाण इति। ननु च नात्मोत्पद्यते नित्यचैतन्यश्चायमित्युक्तम् अतश्च पर एव आत्मा जीव इत्यापतति परस्य च आत्मनोऽनन्तत्वमाम्नातम् तत्र कुतो जीवस्य परिमाणचिन्तावतार इति उच्यते सत्यमेतत् उत्क्रान्तिगत्यागतिश्रवणानि तु जीवस्य परिच्छेदं प्रापयन्ति स्वशब्देन च अस्य क्वचिदणुपरिमाणत्वमाम्नायते तस्य सर्वस्यानाकुलत्वोपपादनायायमारम्भः। तत्र प्राप्तं तावत् उत्क्रान्तिगत्यागतीनां श्रवणात्परिच्छिन्नोऽणुपरिमाणो जीव इति उत्क्रान्तिस्तावत् स यदास्माच्छरीरादुत्क्रामति सहैवैतैः सर्वैरुत्क्रामति इति गतिरपि ये वै के चास्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति इति आगतिरपि तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मणे इति आसामुत्क्रान्तिगत्यागतीनां श्रवणात्परिच्छिन्नस्तावज्जीव इति प्राप्नोति न हि विभोश्चलनमवकल्पत इति सति परिच्छेदे शरीरपरिमाणत्वस्यार्हतपरीक्षायां निरस्तत्वात् अणुरात्मेति गम्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जीव किस परिमाणवाला है अर्थात् जीवका क्या परिमाण है, अब यह विचार किया जाता है – क्या वह अणुपरिमाणवाला है, वा मध्यम परिमाणवाला है अथवा महत्परिमाणवाला है? परन्तु यह कहा जा चुका है कि यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और नित्यचैतन्य है, अतः जीव परमात्मा है, ऐसा प्राप्त होता है, परमात्मा अनन्त है ऐसा श्रुतिमें कहा गया है, तो पुनः जीवके परिमाण विषयक चिन्ता - विचारका अवतरण कैसे हुआ? कहते हैं - यह ठीक है, तो भी उत्कान्ति, गति, आगतिका श्रवण जीवका परिच्छिन्नत्व प्राप्त कराता है। कहींपर श्रुति स्वशब्दसे इसको अणुपरिमाण कहती है। उन सबका अनाकुलत्व - अबाधत्व उपपादन करने के लिए यह आरस्म है। ऐसा प्राप्त हुआ।

पूर्वपक्षी - जीव परिच्छिन्न और आणु परिमाण है, क्योंकि उत्क्रान्ति, गति और आगतिका श्रवण हैं, ' स यदास्माच्छरीरादु ० ' ( वह जब मरण समय इस शरीर से उत्क्रमण करता है तब इन सबके साथ उत्क्रमण करता है ) यह उत्क्रान्ति श्रुति है। ' ये वै के ' ( और जो कोई इस लोकसे प्रयाण करते हैं, वे सब चन्द्रलोकको ही जाते हैं ) यह श्रुति गति भी कहती है। और ' तस्माल्लोकात् ० ' ( उस लोकसे पुन : इस कर्मलोक में आता है ) इस प्रकार यह श्रुति आर्गात भी कहती है। इन उत्क्रान्ति, गति, और आगति विषयक श्रुतियोंसे जीव परिच्छिन्न है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि विभुको गति नहीं हो सकती है। परिच्छिन्नत्व प्राप्त होनेपर शरीर परिमाणका अहंत मतकी परीक्षा में निराकरण होने से आत्मा - अणु है, ऐसा ज्ञात होता है॥ १ ९

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.२१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.20 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २०

सूत्र २.३.२०

स्वात्मना चोत्तरयोः ॥ २.३.२० ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 536

पदच्छेद — स्वात्मना च , उत्तरयोः

सूत्रार्थ — ( उत्तरयोः ) उत्क्रमणके अनन्तर होनेवाले गमन और आगमनका ( स्वात्मना ) स्वात्मा कर्ता के साथ सम्बन्ध होनेसे आत्मा अणु सिद्ध होता है।

शाङ्करभाष्य

उत्क्रान्तिः कदाचिदचलतोऽपि ग्रामस्वाम्यनिवृत्तिवद्देहस्वाम्यनिवृत्त्या कर्मक्षयेणावकल्पेत उत्तरे तु गत्यागती नाचलतः संभवतः स्वात्मना हि तयोः संबन्धो भवति गमेः कर्तृस्थक्रियात्वात् अमध्यमपरिमाणस्य च गत्यागती अणुत्वे एव संभवतः सत्योश्च गत्यागत्योरुत्क्रान्तिरप्यपसृप्तिरेव देहादिति प्रतीयते न हि अनपसृप्तस्य देहाद्गत्यागती स्याताम् देहप्रदेशानां च उत्क्रान्तावपादानत्ववचनात् चक्षुष्टो वा मूर्ध्नो वान्येभ्यो वा शऱीरदेशेभ्यः इति स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति शुक्रमादाय पुनरैति स्थानम् इति चान्तरेऽपि शरीरे शारीरस्य गत्यागती भवतः तस्मादप्यस्याणुत्वसिद्धिः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कदाचित् उत्क्रान्ति तो अचल आत्माकी भी ग्रामके स्वामित्वको निवृत्ति के समान देहके स्वामित्व निवृत्तिसे कर्मक्षय होनेसे हो सकती है। परन्तु आगेकी गति और आगति तो अचल आत्माकी नहीं हो सकती, क्योंकि उनका सम्बन्ध अपने आत्माके साथ होता है, कारण कि ' गम् ' धातु कर्तृनिष्ठ क्रिया है। मध्यम परिमाण रहित जीवके अणु होनेपर ही गति और आगति हो सकती हैं। गति और आगतिके होने पर देहसे अपसृप्ति ( बाहर निकलना ) ही उत्क्रान्ति है, ऐसा प्रतीत होता है। देहसे बाहर न निकले हुए की गति और आगति नहीं होती। ' चक्षुष्टो ० ' ( उसीसे यह आत्मा चक्षुसे, मूर्धा अथवा शरीरके अन्य भागोंसे बाहर निकलता है ) इसप्रकार देह प्रदेश उत्क्रान्तिमें अपादानरूपसे कहे गये हैं। ‘ एतास्तेजो ० ' ( वह आत्मा इन तेजोमात्राओं ( इन्द्रिय समूह ) का सम्यक् प्रकारसे ग्रहणकर हृदयमें ही अनुक्रान्त- अभिव्यक्त ज्ञानवान् होता है ) ' शुक्रमादाय ० ' ( प्रकाशक इन्द्रिय मात्राको लेकर आत्मा पुन : जागरित स्थानमें आता है ) इसप्रकार शरीरके आन्तर भी जीवात्माकी गति और आगति होती हैं। इससे भी इस ( जीव ) की अणुत्व सिद्धि है || २० ||

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.२१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.21 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २१

सूत्र २.३.२१

नाणुरतच्छ्रुतेर् इति चेन् नेतराधिकारात् ॥ २.३.२१ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 536

पदच्छेद — न , अणुः , अतच्छ्रुतेः , इति चेत् , न , इतराधिकारात्

सूत्रार्थ — ( नाणुः ) जीव अणु परिमाण नहीं है, ( अतच्छ्रुतेः ) क्योंकि ' सर्वभ्यापी ' इत्यादि श्रुति जीवको सर्वत कहती हैं, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो 6 युक्त नहीं है, ( इतराधिकारात् ) इतर- ब्रह्मका प्रकरण है।

शाङ्करभाष्य

अथापि स्यात् नाणुरयमात्मा कस्मात् अतच्छ्रुतेः अणुत्वविपरीतपरिमाणश्रवणादित्यर्थः स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्येवंजातीयका हि श्रुतिरात्मनोऽणुत्वे विप्रतिषिध्येतेति चेत् नैष दोषः कस्मात् इतराधिकारात् परस्य हि आत्मनः प्रक्रियायामेषा परिमाणान्तरश्रुतिः परस्यैवात्मनः प्राधान्येन वेदान्तेषु वेदितव्यत्वेन प्रकृतत्वात् विरजः पर आकाशात् इत्येवंविधाच्च परस्यैवात्मनस्तत्र तत्र विशेषाधिकारात्। ननु योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु इति शारीर एव महत्त्वसंबन्धित्वेन प्रतिनिर्दिश्यते शास्त्रदृष्ट्या तु एष निर्देशो वामदेववद्द्रष्टव्यः। तस्मात्प्राज्ञविषयत्वात्परिमाणान्तरश्रवणस्य न जीवस्याणुत्वं विरुध्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तो मी शङ्का होती है कि यह जीवात्मा अणु नहीं है, किससे? इससे कि अतच्छ्रति है - अणु परिमाणके विपरीत परिमाणकी श्रुति है, ऐसा अर्थ है। ' स वा एष महानज ० ' ( यह महान् II अज आत्मा है जो वह प्राणों में विज्ञानमय है ) ' आकाशवत् ० ' ( आकाशके समान सवंगत और नित्य है ) ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस प्रकारकी श्रुतियाँ आत्माको अणु मानने पर विरुद्ध होंगी। पू ० - ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है, क्यों? क्योंकि इतरका अधिकार है - परमात्मा के प्रकरणमें यह अन्य परिमाणकी श्रुति है, क्योंकि परमात्मा ही मुख्यरूपसे वेदान्तोंमें वेदितव्यरूपसे प्रकृत है। और ' विरजः ० ' ( वह विरज हैं और आकाश पर है ) इसप्रकारके वचनोंसे परमात्माका ही तत् तत् स्थलमें विशेष अधिकार है। परन्तु ' योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' ऐसा शारीर ( जीवात्मा ) का ही महत्त्व सम्बन्धिरूपसे प्रतिनिर्देश किया जाता है। यह निर्देश तो शास्त्रदृष्टिसे वामदेव के समान समझना चाहिए। इसलिए अन्य परिमाण विषयक श्रुति प्राज्ञ ( परमात्मा ) विषयक होनेसे जीवका अणुत्व विरुद्ध नहीं है॥२१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * शास्त्रदृष्टिसे जैसे गर्भस्थ वामदेवने ' अहं मनुरभवं सूर्यश्च ' ( मैं ही मनु हुआ और सूर्य भी ) जीव होते हुए भी परमार्थं दृष्टिसे कहा है, वैसे विकाररूप जीव कारण ब्रह्मसे परमार्थसे अभिन्न होनेके कारण अभेददृष्टिसे महत्त्व परिमाणका निर्देश है। इससे जीवमें स्वतः अणुत्वका विरोध नहीं है अर्थात् जीवात्मा अणु है॥ २१

2.3.22 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २२

सूत्र २.३.२२

स्वशब्दोन्मानाभ्यां च ॥ २.३.२२ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 537

पदच्छेद — स्वशब्दोन्मानाभ्याम् , च

सूत्रार्थ — ' एषोऽणुरात्मा ' इस अणुत्व वाचक श्रुति और ' बालाग्रशत भागस्य ' इस श्रुतिमें अत्यन्त अपकृष्ट परिमाणसे जीव अणु है।

शाङ्करभाष्य

इतश्चाणुरात्मा यतः साक्षादेवास्याणुत्ववाची शब्दः श्रूयते एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश इति प्राणसंबन्धाच्च जीव एवायमणुरभिहित इति गम्यते। तथोन्मानमपि जीवस्याणिमानं गमयति वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः इति आराग्रमात्रो ह्यवरोऽपि दृष्टः इति च उन्मानान्तरम्।। नन्वणुत्वे सति एकदेशस्थस्य सकलदेहगतोपलब्धिर्विरुध्यते दृश्यते च जाह्नवीह्रदनिमग्नानां सर्वाङ्गशैत्योपलब्धिः निदाघसमये च सकलशरीरपरितापोपलब्धिरिति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इससे भी जीवात्मा अणु है, क्योंकि ' एषोऽणुरात्मा ० ' ( यह अणु - सूक्ष्म आत्मा, केवल विशुद्ध विज्ञानसे जानने योग्य है, जिस शरीरमें प्राण पांच प्रकारका होकर प्रविष्ट है ) इसप्रकार साक्षात् ही इसका अणुत्व वाचक शब्द ( श्रुति ) सुना जाता है। और ऐसा ज्ञात होता है कि प्राणके सम्बन्धसे यह जीव ही अणु कहा गया है। उसीप्रकार ' बालाग्रशतभागस्य ० ' ( सौ भागों में विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौव माग है, उसके समान जीवको जानना चाहिए ) यह उन्मान ( अत्यन्त सूक्ष्मपरिमाण ) मी जीवको अणु बतलाता है। ' आराप्रमात्रो ० ' ( लकड़ो के डण्डेमें लगे सूक्ष्म लोह कण्टकके समान अकारवाला आत्मा देखा गया है ) यह अन्य उन्मान - अत्यन्त अपकृष्ट परिमाण है || २२

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.२४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.23 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २३

सूत्र २.३.२३

अविरोधश् चन्दनवत् ॥ २.३.२३ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 538

पदच्छेद — अविरोधः , चन्दनवत्

सूत्रार्थ — - ( चन्दनवत् ) जैसे शरीर के एक अवयव में स्थित चन्दन बिन्दु शरीर व्यापी सुखको उत्पन्न करता है, वैसे अणु जीव भी देहव्यापी शीत आदिकी उपलब्धि करेगा, अतः ( अविरोधः ) कोई विरोध नहीं है।

शाङ्करभाष्य

यथा हि हरिचन्दनबिन्दुः शरीरैकदेशसंबद्धोऽपि सन् सकलदेहव्यापिनमाह्लादं करोति एवमात्मापि देहैकदेशस्थः सकलदेहव्यापिनीमुपलब्धिं करिष्यति त्वक्संबन्धाच्चास्य सकलशरीरगता वेदना न विरुध्यते त्वगात्मनोर्हि संबन्धः कृत्स्नायां त्वचि वर्तते त्वक्च कृत्स्नशरीरव्यापिनीति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु जीवके अणु होनेपर देहके एक देशस्थित जीवको सम्पूर्ण शरीर गत उपलब्धिका विरोध होगा, क्योंकि गङ्गा अथवा तालाब में स्नान करनेवालोंको सर्वाङ्गमें शैत्यकी उपलब्धि और उष्णकालमें सम्पूर्ण शरीरमें परितापकी उपलब्धि देखने में आती है। इससे उत्तर कहते हैं-

जैसे शरीरके एक देश से सम्बद्ध होता हुआ भी हरिचन्दन बिन्दु सकल देहव्यापी आह्लाद उत्पन्न करता है, वैसे आत्मा भी देहके एक देशस्थ होता हुआ सकल देहव्यापी उपलब्धि करेगा। इसका त्वचा के सम्बन्धसे सम्पूर्ण शरीर गत वेदना विरुद्ध नहीं है, क्योंकि त्वक् और आत्माका सम्बन्ध सम्पूर्ण त्वचा में है और त्वक् समस्त शरीरव्यापी है।। २३

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.२४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.24 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २४

सूत्र २.३.२४

अवस्थितिवैशेष्याद् इति चेन् नाभ्युपगमाद् धृदि हि ॥ २.३.२४ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 538

पदच्छेद — अवस्थितिवैशेष्यात् , इति चेत् , न , अभ्युपगमाद् , हृदि , हि

सूत्रार्थ — ( अवस्थितिवैशेष्यात् ) प्रत्यक्षरूपसे चन्दनबिन्दुकी शरीरके एक भागमें अवस्थिति देखी जाती है, परन्तु जीवकी इसप्रकार नहीं देखी जाती। अतः अतुल्य होने से चन्दन दृष्टान्त युक्त नहीं है, इति चेन्न ) तो यह कथन युक्त नहीं है, ( अभ्युपगमात् ) क्योंकि जीवका अणुत्व स्वीकार है, ( हृदि ) अल्पपरिमाण हृदय में ' हृद्यन्तज्र्ज्योति : ' इत्यादि श्रुतिमें जीवका पाठ है, ( हि ) इससे जीवका अणुत्व स्वीकार है, इसप्रकार दृष्टान्त में भी वैषम्य नहीं है।

शाङ्करभाष्य

अत्राह यदुक्तमविरोधश्चन्दनवदिति तदयुक्तम् दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोरतुल्यत्वात् सिद्धे हि आत्मनो देहैकदेशस्थत्वे चन्दनदृष्टान्तो भवति प्रत्यक्षं तु चन्दनस्यावस्थितिवैशेष्यमेकदेशस्थत्वं सकलदेहाह्लादनं च आत्मनः पुनः सकलदेहोपलब्धिमात्रं प्रत्यक्षम् नैकदेशवर्तित्वम् अनुमेयं तु तदिति यदप्युच्येत न च अत्रानुमानं संभवति किमात्मनः सकलशरीरगता वेदना त्वगिन्द्रियस्येव सकलदेहव्यापिनः सतः किं वा विभोर्नभस इव आहोस्विच्चन्दनबिन्दोरिवाणोरेकदेशस्थस्य इति संशयानतिवृत्तेरिति अत्रोच्यते नायं दोषः कस्मात् अभ्युपगमात्। अभ्युपगम्यते हि आत्मनोऽपि चन्दनस्येव देहैकदेशवृत्तित्वमवस्थितिवैशेष्यम् कथमिति उच्यते हृदि ह्येष आत्मा पठ्यते वेदान्तेषु हृदि ह्येष आत्मा स वा एष आत्मा हृदि कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः इत्याद्युपदेशेभ्यः। तस्माद्दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोरवैषम्यात् युक्तमेवैतत् अविरोधश्चन्दनवत् इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यहाँ कहते हैं -- जो यह कहा गया है कि चन्दनके समान अविरोध है, वह प्रयुक्त है, क्योंकि दृष्टान्त और दाष्टन्तिकमें समानता नहीं है, आत्माका देहके एकदेशस्थत्व सिद्ध होनेपर चन्दन दृष्टान्त हो सकता है। परन्तु चन्दनका अवस्थितिविशेष एक देशमें स्थिति और सम्पूर्ण देहमें आह्लाद तो प्रत्यक्ष है। और पुनः आत्माका सम्पूर्ण देहमें उपलब्धि मात्र प्रत्यक्ष है न कि एक देशवर्तित्व है।

* यदि कहो कि वह अनुमेय है, तो यहाँ अनुमान भी नहीं हो सकता, क्योंकि क्या आत्माकी सकल शरीरमें प्राप्त वेदना त्वक् इन्द्रियके समान सकल शरीरव्यापी आत्माकी है अथवा आकाशके समान व्यापक आत्माकी है अथवा हरिचन्दन बिन्दुके समान एक देशस्थ अणु आत्माकी है। इसप्रकार के यथा लोके मणिप्रदीप प्रभृतीनामपवरकै कदेशवर्तिनामपि प्रभाऽपवरकव्यापिनी सती कृत्स्ने surar के कार्य करोति, तद्वत्। स्यात्कदाचिच्चन्दनस्य सावयवत्वात्सूक्ष्मावयवयी निवृत्ति नहीं होती। पू ० - इसपर कहते हैं - यह दोष नहीं है, क्यों?

क्योंकि अभ्युपगम है। आत्माका भी चन्दनके समान देहके एकदेश में वृत्तित्व - अवस्थिति विशेषत्व स्वीकार किया जाता है। कैसे? कहते हैं - ' हृदि ह्येष आत्मा ' ' यह आत्मा हृदयमें है ' ' स वा एष ० ' ( वह यह आत्मा हृदयमें है ) ' कतम आत्मेति ० ' ( आत्मा कौन है? ) यह जो प्राणोंमें - बुद्धि वृत्तियों के मीतर रहनेवाला विज्ञानमय है, हृदयके अन्तर ज्योतिः स्वरूप है ) इत्यादि उपदेशोंसे वेदान्त - वाक्योंमें हृदयमें ही यह आत्मा पढा जाता है।

इसलिए दृष्टान्त और दार्शन्तिकमें वैषम्य न होनेसे चन्दनके समान यह अविरोध युक्त है || २४ |

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' आत्मा, " अल्पः, व्यापी कार्यकारित्वात् चन्दनबिन्दुवत् ' ( आत्मा अणु है, क्योंकि व्यापी कार्य करनेवाला है, जैसे चन्दन बिन्दु ) इस अनुमानसे आत्माकी चन्दन बिन्दुके समान एक देश अवस्थिति सिद्ध होती है। परन्तु इस अनुमानका हेतु व्यभिचारी है, क्योंकि त्वगिन्द्रियमें हेतु है साध्य नहीं है। त्वक् समस्त शरीरव्यापी है, इसलिए व्यभिचारी हेतु पक्षमें साध्यकी सिद्धि नहीं कर सकता। इस प्रकार त्वचाके दृष्टान्तसे संशयकी निवृत्ति नहीं हो सकती है। यह दोष नहीं है, क्योंकि आत्माके अणुत्वमें केवल अनुमान प्रमाण नहीं है, किन्तु ' स वा एष आत्मा हृदि ' इत्यादि श्रुति मी प्रमाण है, इसलिए चन्दन दृष्टान्त के साथ कोई विरोध नहीं है॥ २४

2.3.25 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २५

सूत्र २.३.२५

गुणाद्वा लोकवत् ॥ २.३.२५ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 539

पदच्छेद — गुणाद , वा , लोकवत्

सूत्रार्थ — ( वा ) अथवा ( लोकवत् ) जैसे लोकमें गृहमध्यवर्ती दीपकके अल्प होनेपर भी ( गुणात् ) उसके प्रमारूप गुणसे गृहव्यापी प्रकाश आदि कार्य होते हैं, वैसे ही आत्मा के अणु होने पर भी आत्मनिष्ठ चैतन्य गुणको व्यापक माननेसे व्यापी गुणसे व्यापी कार्य हो जायगा।

शाङ्करभाष्य

चैतन्यगुणव्याप्तेर्वा अणोरपि सतो जीवस्य सकलदेहव्यापि कार्यं न विरुध्यते यथा लोके मणिप्रदीपप्रभृतीनामपवरकैकदेशवर्तिनामपि प्रभा अपवरकव्यापिनी सती कृत्स्नेऽपवरके कार्यं करोति तद्वत्। स्यात् कदाचिच्चन्दनस्य सावयवत्वात्सूक्ष्मावयवविसर्पणेनापि सकलदेह आह्लादयितृत्वम् न त्वणोर्जीवस्यावयवाः सन्ति यैरयं सकलदेहं विसर्पेत् इत्याशङ्क्य गुणाद्वा लोकवत् इत्युक्तम्।। कथं पुनर्गुणो गुणिव्यतिरेकेणान्यत्र वर्तेत न हि पटस्य शुक्लो गुणः पटव्यतिरेकेणान्यत्र वर्तमानो दृश्यते। प्रदीपप्रभावद्भवेदिति चेत् न तस्या अपि द्रव्यत्वाभ्युपगमात् निबिडावयवं हि तेजोद्रव्यं प्रदीपः प्रविरलावयवं तु तेजोद्रव्यमेव प्रभा इति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अथवा चैतन्य गुणकी व्याप्तिसे जीवके अणु होनेपर भी सकल देहव्यापी कार्यं विरुद्ध नहीं है। जैसे लोकमें गृहके एक देशवर्ती मणि, प्रदीप आदिकी भी प्रभा गृहव्यापी होती हुई सम्पूर्ण गृहमें कार्य ( प्रकाश ) करती है। इसप्रकार प्रकरणमें भी समझना चाहिए। चन्दन सावयव है, अतः सूक्ष्म अवयवोंके फैलनेसे कदाचित् वह सकल देहमें आह्लाद कर सकता है, परन्तु अणु जीवके अवयव नहीं है जिससे कि वह सकल देहमें फैले। ऐसी आशङ्काकर ' गुणाद्वा लोकवद् ' ऐसा कहा है || २५ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अणु आत्मा निरवयव है और चन्दन सावयत्र है, इससे कार्यमें भी विषमता है, इस अरुचिसे प्रदीपका दृष्टान्त दिया गया है।। २५

2.3.26 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २६

सूत्र २.३.२६

व्यतिरेको गन्धवत् तथा हि दर्शयति ॥ २.३.२६ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 540

पदच्छेद — व्यतिरेकः , गन्धवत्

सूत्रार्थ — ( गन्धवत् ) जैसे गुण होते हुए भी गन्धकी स्थिति गुणी द्रव्यसे पृथक् उपलब्ध होती है, वैसे आत्मा गुण चैतन्यकी आत्मासे ( व्यतिरेकः ) पृथक् अवस्थिति हो सकती है।

शाङ्करभाष्य

यथा गुणस्यापि सतो गन्धस्य गन्धवद्द्रव्यव्यतिरेकेण वृत्तिर्भवति अप्राप्तेष्वपि कुसुमादिषु गन्धवत्सु कुसुमगन्धोपलब्धेः एवमणोरपि सतो जीवस्य चैतन्यगुणव्यतिरेको भविष्यति। अतश्चानैकान्तिकमेतत् गुणत्वाद्रूपादिवदाश्रयविश्लेषानुपपत्तिरिति गुणस्यैव सतो गन्धस्य आश्रयविश्लेषदर्शनात्। गन्धस्यापि सहैवाश्रयेण विश्लेष इति चेत् न यस्मान्मूलद्रव्याद्विश्लेषः तस्य क्षयप्रसङ्गात् अक्षीयमाणमपि तत्पूर्वावस्थातो गम्यते अन्यथा तत्पूर्वावस्थैर्गुरुत्वादिभिर्हीयेत। स्यादेतत् गन्धाश्रयाणां विश्लिष्टानामवयवानामल्पत्वात् सन्नपि विश्लेषो नोपलक्ष्यते सूक्ष्मा हि गन्धपरमाणवः सर्वतो विप्रसृता गन्धबुद्धिमुत्पादयन्ति नासिकापुटमनुप्रविशन्त इति चेत् न अतीन्द्रियत्वात्परमाणूनाम् स्फुटगन्धोपलब्धेश्च नागकेसरादिषु न च लोके प्रतीतिः गन्धवद्द्रव्यमाघ्रातमिति गन्ध एव आघ्रात इति तु लौकिकाः प्रतियन्ति। रूपादिष्वाश्रयव्यतिरेकानुपलब्धेर्गन्धस्याप्ययुक्त आश्रयव्यतिरेक इति चेत् न प्रत्यक्षत्वादनुमानाप्रवृत्तेः तस्मात् यत् यथा लोके दृष्टम् तत् तथैव अनुमन्तव्यं निरूपकैः नान्यथा न हि रसो गुणो जिह्वयोपलभ्यत इत्यतो रूपादयोऽपि गुणा जिह्वयैवोपलभ्येरन्निति नियन्तुं शक्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु गुण गुणीको छोड़कर अन्यत्र किस प्रकार रहेगा? क्योंकि पटका शुक्ल गुण पट व्यतिरिक्त अन्यत्र वर्तमान होता हुआ नहीं देखा जाता। यदि कहो कि प्रदीप प्रमाके समान हो जायगा, तो यह युक्त नहीं है, कारण कि वह भी द्रव्य माना गया है। घन अवयव तेजोद्रव्य ही प्रदीप है और प्रविरल अवयव तेजोद्रव्य ही तो प्रभा है। इससे उत्तर कहते हैं-

जैसे गुण होते हुए भी गन्धकी गन्धवद् द्रव्यसे अतिरिक्त वृत्ति होती है, क्योंकि गन्ध युक्त कुसुम आदि अप्राप्त होनेपर मी कुसुम गन्धकी उपलब्धि होती है, वैसे जीवके अणु होनेपर भी चैतन्य गुणका व्यतिरेक होगा। इसमे ' गुण होनेसे रूप आदिके समान आश्रयसे उसका विश्लेष अनुपपन्न है ' यह व्यभिचरित है। कारण कि गुण होते हुए गन्धका ही आश्रयसे विश्लेश देखा जाता है। यदि कहो कि गन्धका भी आश्रयके साथ ही विश्लेश होता है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि जिस मूल द्रव्यसे विश्लेष है उसका क्षय प्रसंग होगा।

परन्तु वह मूलद्रव्य पूर्वावस्थासे अक्षीण होता हुआ ज्ञात होता है, अन्यथा वह पूर्व अवस्थिति गुरुत्व आदिसे रहित हो जायगा। ऐसा होनेपर भी पृथक हुए गंधके आश्रय अवयवोंके अल्प होनेसे विशेष होता हुआ भी वह उपलक्षित - ज्ञात नहीं होता। क्योंकि चारों ओर फैले हुए सूक्ष्म गन्ध परमाणु नसिका पुटमें प्रवेश करते हुए गंधज्ञान उत्पन्न करते हैं, ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं है, क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं और नाग केसरमें स्पष्ट गंधकी उपलब्धि होती है।

लोक में ' गन्धवद् द्रव्य मैंने सूंघा ' ऐसी प्रतीति नहीं होती, प्रत्युत ' गन्ध ही मैंने सूंघा ' इसप्रकार लोग अनुभव करते हैं। यदि कहो कि रूप आदिकी आश्रयसे व्यतिरिक्त उपलब्धि नहीं होती, तो एतावता गंधका मी आश्रय व्यतिरेक अयुक्त है, तो यह ठीक नहीं है, कारण कि प्रत्यक्ष होनेसे अनुमान प्रवृत्त नहीं होगा। अतः जो जैसे लोकमें देखा गया हो उसका उसके अनुसार ही निरूपकों से अनुमान करना चाहिए अन्यथा नहीं।

रस गुण जिह्वासे उपलब्ध होता है, तो इससे रूप आदि गुण भी जिह्वा से ही उपलब्ध हों, ऐसा नियम नहीं किया जा सकता॥ २६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सिद्धान्ती पूर्वपक्ष वारणके लिए अनुमान कहते हैं - ' ज्ञानं न गुणिव्यतिरिक्तदेशव्यापी गुणस्वात, रूपवत् ' ( ज्ञान गुणी आत्मासे अधिक देश व्यापी नहीं है, क्योंकि वह गुण है जैसे रूप ) प्रभाके द्रव्य होनेसे उसमें व्यभिचार नहीं है। पू ० – - परन्तु गंधमें व्यभिचार है, इसलिए वह हेतु पक्षमें साध्यको सिद्ध नहीं कर सकता। अतः ज्ञान भी गन्धके समान आत्मासे अधिक देशवृत्ति हो सकता है॥ २६

2.3.27 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २७

सूत्र २.३.२७

व्यतिरेको गन्धवत् तथा हि दर्शयति ॥ २.३.२७ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 541

पदच्छेद — तथा , च , दर्शयति

सूत्रार्थ — ( च ) और ' आ लोमभ्य आ नखाग्रेभ्यः ' इत्यादि श्रुति ( तथा ) आत्माका ज्ञानसे सम्पूर्ण शरीर व्यापित्व ( दर्शयति ) प्रतिपादित करती है।

शाङ्करभाष्य

यथा गुणस्यापि सतो गन्धस्य गन्धवद्द्रव्यव्यतिरेकेण वृत्तिर्भवति अप्राप्तेष्वपि कुसुमादिषु गन्धवत्सु कुसुमगन्धोपलब्धेः एवमणोरपि सतो जीवस्य चैतन्यगुणव्यतिरेको भविष्यति। अतश्चानैकान्तिकमेतत् गुणत्वाद्रूपादिवदाश्रयविश्लेषानुपपत्तिरिति गुणस्यैव सतो गन्धस्य आश्रयविश्लेषदर्शनात्। गन्धस्यापि सहैवाश्रयेण विश्लेष इति चेत् न यस्मान्मूलद्रव्याद्विश्लेषः तस्य क्षयप्रसङ्गात् अक्षीयमाणमपि तत्पूर्वावस्थातो गम्यते अन्यथा तत्पूर्वावस्थैर्गुरुत्वादिभिर्हीयेत। स्यादेतत् गन्धाश्रयाणां विश्लिष्टानामवयवानामल्पत्वात् सन्नपि विश्लेषो नोपलक्ष्यते सूक्ष्मा हि गन्धपरमाणवः सर्वतो विप्रसृता गन्धबुद्धिमुत्पादयन्ति नासिकापुटमनुप्रविशन्त इति चेत् न अतीन्द्रियत्वात्परमाणूनाम् स्फुटगन्धोपलब्धेश्च नागकेसरादिषु न च लोके प्रतीतिः गन्धवद्द्रव्यमाघ्रातमिति गन्ध एव आघ्रात इति तु लौकिकाः प्रतियन्ति। रूपादिष्वाश्रयव्यतिरेकानुपलब्धेर्गन्धस्याप्ययुक्त आश्रयव्यतिरेक इति चेत् न प्रत्यक्षत्वादनुमानाप्रवृत्तेः तस्मात् यत् यथा लोके दृष्टम् तत् तथैव अनुमन्तव्यं निरूपकैः नान्यथा न हि रसो गुणो जिह्वयोपलभ्यत इत्यतो रूपादयोऽपि गुणा जिह्वयैवोपलभ्येरन्निति नियन्तुं शक्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आत्माका हृदयमें स्थान और अणुपरिमाण कहकर उसका ही ' आ लोमभ्य ० ' ( हम अपने इस आत्माको लोमपर्यन्त और नखपर्यन्त ज्योंका त्यों देखते हैं ) यह श्रुति चैतन्य गुणसे समस्त शरीर व्यापित्व दिखलाती है॥। २७

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.२९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.28 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २८

सूत्र २.३.२८

पृथगुपदेशात् ॥ २.३.२८ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 541

पदच्छेद — पृथक् , उपदेशात्

सूत्रार्थ — ' प्रज्ञया शरीरं समारुह्य ० ' इस श्रुतिसे आत्मा और ज्ञानका कर्तृकरणरूपसे ( पृथक् ) पृथक् ( उपदेशात् ) उपदेश है, अतः जीवका गुणद्वारा सकल शरीर व्यापित्व है।

शाङ्करभाष्य

प्रज्ञया शरीरं समारुह्य इति च आत्मप्रज्ञयोः कर्तृकरणभावेन पृथगुपदेशात् चैतन्यगुणेनैव अस्य शरीरव्यापिता गम्यते। तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय इति च कर्तुः शारीरात्पृथग्विज्ञानस्योपदेशः एतमेवाभिप्रायमुपोद्बलयति। तस्मादणुरात्मेति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' प्रज्ञया शरीरं ० ' ( प्रज्ञाद्वारा शरीर पर सम्यग्रूपसे आरूढ होकर सुख, दुःखका अनुभव करता है ) इसप्रकार आत्मा और प्रज्ञाका कर्तृ - करणभावसे पृथक् उपदेश होनेसे उसकी चैतन्यगुणद्वारा ही शरीर व्यापिता ज्ञात होती है। ' तदेषां ० ' ( सुषुप्ति में यह वाग् आदि प्राणोंके विषय ग्रहण करने की सामर्थ्य को अपने चैतन्य गुणसे ग्रहण कर सोता है ) इस प्रकार कर्ता जीवात्मासे पृथक् विज्ञानका उपदेश इसी ( चैतन्यगुण व्याप्ति विषयक ) अभिप्रायको पुष्ट करता है, इसलिए आत्मा अणु है || २८ ||

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.२९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.29 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २९

सूत्र २.३.२९

तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २.३.२९ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.२९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 541

पदच्छेद — तद्गुणसारत्वात् , तु , तद्वयपदेशः , प्राज्ञवत्

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है, ( तद्गुणसारत्वात् ) बुद्धि और आत्माके तादात्म्य होने से जीवमें बुद्धिके अणुत्व, उत्क्रमण, गमन, आगमन, सुख - दुःख आदि गुण प्रधान हैं उससे उसमें ( तद्वयपदेश : ) अणुत्व व्यपदेश होता है, वह स्वाभाविक नहीं है ( प्राज्ञवत् ) जैसे परमात्माकी सगुणोपासनाओंमें दहर आदि उपाधियोंके कारण उसमें अणुत्वादि व्यवहार होता है।

शाङ्करभाष्य

तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति। नैतदस्ति अणुरात्मेति उत्पत्त्यश्रवणात् परस्यैव तु ब्रह्मणः प्रवेशश्रवणात् तादात्म्योपदेशाच्च परमेव ब्रह्म जीव इत्युक्तम् परमेव चेद्ब्रह्म जीवः तस्माद्यावत्परं ब्रह्म तावानेव जीवो भवितुमर्हति परस्य च ब्रह्मणो विभुत्वमाम्नातम् तस्माद्विभुर्जीवः तथा च स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु इत्येवंजातीयका जीवविषया विभुत्ववादाः श्रौताः स्मार्ताश्च समर्थिता भवन्ति।

न च अणोर्जीवस्य सकलशरीरगता वेदनोपपद्यते त्वक्संबन्धात्स्यादिति चेत् न कण्टकतोदनेऽपि सकलशरीरगतैव वेदना प्रसज्येत त्वक्कण्टकयोर्हि संयोगः कृत्स्नायां त्वचि वर्तते त्वक्च कृत्स्नशरीरव्यापिनीति पादतल एव तु कण्टकनुन्नो वेदनां प्रतिलभते। न च अणोर्गुणव्याप्तिरुपपद्यते गुणस्य गुणिदेशत्वात् गुणत्वमेव हि गुणिनमनाश्रित्य गुणस्य हीयेत प्रदीपप्रभायाश्च द्रव्यान्तरत्वं व्याख्यातम्।

गन्धोऽपि गुणत्वाभ्युपगमात्साश्रय एव संचरितुमर्हति अन्यथा गुणत्वहानिप्रसङ्गात् तथा चोक्तं भगवता द्वैपायनेन उपलभ्याप्सु चेद्गन्धं केचिद्ब्रूयुरनैपुणाः। पृथिव्यामेव तं विद्यादपो वायुं च संश्रितम् इति। यदि च चैतन्यं जीवस्य समस्तशरीरं व्याप्नुयात् नाणुर्जीवः स्यात् चैतन्यमेव हि अस्य स्वरूपम् अग्नेरिवौष्ण्यप्रकाशौ नात्र गुणगुणिविभागो विद्यत इति। शरीरपरिमाणत्वं च प्रत्याख्यातम्। परिशेषाद्विभुर्जीवः।। कथं तर्हि अणुत्वादिव्यपदेश इत्यत आह तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेश इति।

तस्या बुद्धेः गुणास्तद्गुणाः इच्छा द्वेषः सुखं दुःखमित्येवमादयः तद्गुणाः सारः प्रधानं यस्यात्मनः संसारित्वे संभवति स तद्गुणसारः तस्य भावस्तद्गुणसारत्वम्। न हि बुद्धेर्गुणैर्विना केवलस्य आत्मनः संसारित्वमस्ति बुद्ध्युपाधिधर्माध्यासनिमित्तं हि कर्तृत्वभोक्तृत्वादिलक्षणं संसारित्वम् अकर्तुरभोक्तुश्चासंसारिणो नित्यमुक्तस्य सत आत्मनः तस्मात्तद्गुणसारत्वाद्बुद्धिपरिमाणेनास्य परिमाणव्यपदेशः तदुत्क्रान्त्यादिभिश्च अस्योत्क्रान्त्यादिव्यपदेशः न स्वतः।

तथा च वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते इत्यणुत्वं जीवस्योक्त्वा तस्यैव पुनरानन्त्यमाह तच्चैवमेव समञ्जसं स्यात् यद्यौपचारिकमणुत्वं जीवस्य भवेत् पारमार्थिकं च आनन्त्यम् न हि उभयं मुख्यमवकल्पेत न च आनन्त्यमौपचारिकमिति शक्यं विज्ञातुम् सर्वोपनिषत्सु ब्रह्मात्मभावस्य प्रतिपिपादयिषितत्वात्। तथेतरस्मिन्नप्युन्माने बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यवरोऽपि दृष्टः इति च बुद्धिगुणसंबन्धेनैव आराग्रमात्रतां शास्ति न स्वेनैवात्मना।

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः इत्यत्रापि न जीवस्य अणुपरिमाणत्वं शिष्यते परस्यैवात्मनश्चक्षुराद्यनवग्राह्यत्वेन ज्ञानप्रसादगम्यत्वेन च प्रकृतत्वात् जीवस्यापि च मुख्याणुपरिमाणत्वानुपपत्तेः तस्माद्दुर्ज्ञानत्वाभिप्रायमिदमणुत्ववचनम् उपाध्यभिप्रायं वा द्रष्टव्यम्। तथा प्रज्ञया शरीरं समारुह्य इत्येवंजातीयकेष्वपि भेदोपदेशेषु बुद्ध्यैवोपाधिभूतया जीवः शरीरं समारुह्य इत्येवं योजयितव्यम् व्यपदेशमात्रं वा शिलापुत्रकस्य शरीरमित्यादिवत् न ह्यत्र गुणगुणिविभागोऽपि विद्यत इत्युक्तम्।

हृदयायतनत्ववचनमपि बुद्धेरेव तदायतनत्वात्। तथा उत्क्रान्त्यादीनामप्युपाध्यायत्ततां दर्शयति कस्मिन्नु अहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृजत इति उत्क्रान्त्यभावे हि गत्यागत्योरप्यभावो विज्ञायते न हि अनपसृप्तस्य देहाद्गत्यागती स्याताम्। एवमुपाधिगुणसारत्वाज्जीवस्याणुत्वादिव्यपदेशः प्राज्ञवत्।

यथा प्राज्ञस्य परमात्मनः सगुणेषूपासनेषु उपाधिगुणसारत्वादणीयस्त्वादिव्यपदेशः अणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा मनोमयः प्राणमयः प्राणशरीरः सर्वगन्धः सर्वरसः सत्यकामः सत्यसंकल्पः इत्येवंप्रकारः तद्वत्।। स्यादेतत् यदि बुद्धिगुणसारत्वादात्मनः संसारित्वं कल्प्येत ततो बुद्ध्यात्मनोर्भिन्नयोः संयोगावसानमवश्यंभावीत्यतो बुद्धिवियोगे सति आत्मनो विभक्तस्यानालक्ष्यत्वादसत्त्वमसंसारित्वं वा प्रसज्येतेति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-

तु शब्द [ पूर्व ] पक्षकी व्यावृत्ति करता है। आत्मा अणु है, यह ठीक नहीं है, क्योंकि आत्माकी उत्पत्तिके अश्रवणसे परब्रह्म के ही प्रवेश श्रवणसे और तादात्म्यके उपदेशसे परब्रह्म ही जीव है, ऐसा कहा गया है। यदि परब्रह्म ही जीव है तो उससे जितना परब्रह्म है उतना ही जीव हो सकता है। परब्रह्मको श्रुतियों में विभु कहा गया है उससे जीव मी विभु है।

उसी प्रकार ' स वा एष ० ' ( वह यह महान् अज आत्मा है जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है ) इस प्रकारके जीव विषयक श्रौत और स्मार्तं विभुत्ववाद समर्थित होते हैं। और अणु जीवमें सम्पूर्ण शरीर गत वेदना उपपन्न नहीं होती। यदि कहो कि त्वक् के सम्बन्धसे होगी, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि त्वचा में काँटा चुभने पर भी सकल शरीर गत ही वेदना प्रसक्त होगी, कारण कि त्वचा और काँटेका संयोग ( सम्बन्ध ' ) सम्पूर्ण त्वचा में है और त्वक् समस्त शरीर व्यापी है।

परन्तु काँटा चुभनेवालेको पैर के तलवेमें वेदना उपलब्ध होती है। अणुके गुणकी व्याप्ति उपपन्न नहीं होती, कारण कि गुणका गुणो प्रदेश होता है। यदि गुण गुणीके अनाश्रित होकर रहे तो गुणका गुणत्व ही न रहेगा। प्रभा तो अन्य द्रव्य है, ऐसा व्याख्यान किया जा चुका है। गन्ध भी गुण स्वीकार करने से आश्रय सहित ही संचारके योग्य हो सकता है, अन्यथा गुणत्वकी हानि प्रसक्त होगी।

इस प्रकार भगवान् द्वैपायनने कहा - ' उपलभ्याप्सु ० ' ( जलमें गन्ध उपलब्धकर कई अनिपुण पुरुष उसमें गन्ध है ऐसा कहते हैं, परन्तु जल और वायुमें स्थित गन्ध पृथिवीका ही है ऐसा जानना चाहिए ) यदि जीवका चैतन्य समस्त शरीरको व्याप्त करेगा तो जीव अणु न होगा, क्योंकि जैसे औष्य और प्रकाश अग्निका स्वरूप है, वैसे चैतन्य ही जीवका स्वरूप है। इसमें गुणगुणिविभाग नहीं है। जीवका शरीर परिमाण तो पूर्व ही खण्डित किया जा चुका है। परिशेषसे जीव विभु है। तो उसमें अणुत्व आदि व्यपदेश किस प्रकार है?

इसपर कहते हैं - ' तद्गुणसारत्वात्तु तद्वयपदेशः ' उसके बुद्धिके गुण वे तद्गुण - इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख इत्यादि, तद्गुण सार प्रधान जिस आत्माके संसारित्वमें संभव है वह तद्गुणसार, उसका भाव तद्गुणसारत्व है, क्योंकि बुद्धिके गुणोंके बिना केवल आत्मामें संसारित्व नहीं है। अकर्ता, अभोक्ता, असंसारी, नित्य मुक्त होते हुए आत्माका कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि रूप संसारित्व बुद्धि उपाधिके धर्मोके अध्यासके कारण ही है।

इसलिए तद्गुणसारत्व होनेसे बुद्धिके परिमाणसे इसका परिमाणव्यपदेश है और बुद्धिकी उत्क्रान्ति आदिसे जीवकी उत्क्रान्ति आदिका व्यपदेश है। उसके परिमाण और उत्क्रमण आदि स्वाभाविक नहीं हैं। और इसी प्रकार ' बालाग्रशतभागस्य ० ' ( सो सागों में विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौवाँ भाग है उसके समान जीवको जानना चाहिए, किन्तु वह स्वतः अनन्तके लिए समर्थ है ) इसप्रकार जीवको अणु कहकर पुनः उसको ही श्रुति अनन्त कहती है। वह तभी संगत हो सकता है जब जीवमें अणुत्व गौण हो और आनन्त्य पारमार्थिक हो।

दोनों मुख्य नहीं हो सकते, और आनन्त्य गौण है, ऐसा जाननेको समर्थ नहीं है। सभी उपनिषदों में ब्रह्मात्मभाव प्रतिपादन करना अभिलषित है। उसी प्रकार ' बुद्धेर्गुणेन ० ' ( बुद्धि गुण निमित्तक आत्मामें अध्यस्त गुणसे- अध्यस्त आत्मगुणसे जीव भी आरके नोकके समान आकारवाला देखा गया है ) इस तरह अन्य उन्मानमें बुद्धिगुणके सम्बन्धसे ही आराग्रपरिमाणका उपदेश करता है अपने स्वरूपसे नहीं।

' एषोऽणुरात्मा ० ' ( यह आत्मा अणु है ; विशुद्ध ज्ञानद्वारा जानने योग्य है ) इसमें भी जीवके अणुपरिमाणका उपदेश नहीं है, क्योंकि परमात्मा ही चक्षु आदिसे अग्राह्य और ज्ञान प्रसादगम्य होनेसे प्रकृत है, जीवका मी अणुपरिमाण मुख्य नहीं हो सकता। जीव अणुत्व वचन दुर्विज्ञेयत्व अभिप्रायसे अथवा उपाधिके अभिप्रायसे समझना चाहिए।

इस प्रकार ' प्रज्ञया ० ' ( प्रज्ञाद्वारा शरीरपर समारुढ होकर सुख दुःखका अनुभव करता है ) इस प्रकारके भेदोपदेशोंमें मी उपाधिरूप बुद्धिसे ही जीव शरीरपर समारोहण कर, ऐसी योजना करनी चाहिए। अथवा ' शिलापुत्रका शरीर ' इत्यादिके समान यह व्यपदेशमात्र है। यहाँ गुण गुणी विभाग भी नहीं हैं, ऐसा कहा जा चुका है I

। ' जीवका स्थान हृदय है, यह वचन भी बुद्धिके अभिप्रायसे है, क्योंकि बुद्धिका ही स्थान हृदय है। उसी प्रकार ' कस्मिन्न्वहमु ० ' ( किसके उत्कान्त होनेपर मैं उत्कान्त होऊँगा और किसके प्रतिष्ठित होने पर प्रतिष्ठित होऊँगा ) ' स प्राणमसृजत ' ( उसने प्राण उत्पन्न किया ) इसप्रकार उत्क्रान्ति आदि उपाधि के अधीन हैं, ऐसा श्रुति दिखलाती है। उत्क्रान्तिके अभाव होनेपर गति और आगतिका भी अभाव जाना जाता है। देहसे न निकले हुए की गति और आगति नहीं होती। इसप्रकार उपाधि गुणकी प्रधानतासे प्राज्ञके समान जीवमें अणुत्व आदि व्यपदेश है। जैसे ' अणीयान्त्रीहेर्वा यवाद्वा ' ( हृदय कमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे मी सूक्ष्म है ) ' मनोमय : ० ' ( वह ब्रह्म मनोमय, प्राणशरीर, सर्वगन्ध, सर्वरस, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है ) इसप्रकार सगुण उपासनाओंमें उपाधिके गुणोंकी प्रधानतासे प्राज्ञ- परमात्मामें अणुत्व मादिका व्यपदेश है, वैसे यहां भी समझना चाहिए || २ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस अधिकरणमें आत्मा के अणुत्व और विभुत्व प्रतिपादक श्रुतियोंका परस्पर विरोध होने से उनमें अप्रामाण्य प्राप्त होनेपर पूर्वपक्षीद्वारा जीव अणु है और ईश्वर विभु हैं, इस प्रकार दोनों का भेदकर श्रुतियोंका अविरोध दिखलाया गया है। सिद्धान्ती - जीव अणु नहीं है, क्योंकि ' तत्सृष्ट्वा ० ' ' ' अनेन जीवेनात्मना ' इत्यादि श्रुतियोंसे शरीर आदि कार्यमें जीवरूपसे परब्रह्मका ही प्रवेश प्रतिपादित है, और ' तत्त्वमसि ' इत्यादि श्रुतियोंसे जीवकी ब्रह्मरूपता उपदिष्ट है, अतः ब्रह्मका परिमाण ही जीवका परिमाण है इसमें ' स वा एष महानज आत्मा ' ' नित्यः सर्वगतः स्थाणुः ' ( म ० गी ० २२४ ) इत्यादि श्रुति और स्मृति भी प्रमाण हैं।

* अब तक तो चैतन्यको आत्माका गुण मानकर उसीकी व्याप्तिसे गुणी आत्माका अणुत्व निराकृत किया गया है। आगे चैतन्य जीवका स्वरूप है गुण नहीं है, इसे ' चैतन्यमेव ' आदिसे कहते हैं। आत्मा में अणुत्वका व्यपदेश औपाधिक है। जैसे ' अन्तरा विज्ञानमनसी ' ( ब्र ० सू ० २।३।१५ ) ( विज्ञान और मनके बीच में ) ' हृदि हि ' ( ब्र ० सू ० २ | ३ | २४ ) ( हृदय में ) इस प्रकार बुद्धिके गुणों का अध्यास होनेसे आत्मामें अणुत्व आदि व्यवहार होता है, स्वतः नहीं।

* किश्व जैसे पत्थरसे बनी मूर्ति पत्थर ही है, तो भी ' पत्थर की मूर्ति ' ऐसा केवल काल्पनिक भेद व्यवहार होता है। वैसे प्रकरण में भी समझना चाहिए।। २ ९

2.3.30 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३०

सूत्र २.३.३०

यावदात्मभावित्वाच् च न दोषस् तद्दर्शनात् ॥ २.३.३० ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 544

पदच्छेद — यावदात्ममावित्वात् च , न दोषः , तद्दर्शनात्

सूत्रार्थ — बुद्धिका संयोग ( ' यावदात्म भावित्वात् ) जबतक आत्मज्ञानसे संसारकी निवृत्ति नहीं होती तबतक रहता है। ( न दोष : ) अतः उक्त दोष नहीं है ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि देहका वियोग होनेपर भी बुद्धिका संयोग ' समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ' इत्यादि श्रुतिमें देखा जाता है।

शाङ्करभाष्य

नेयमनन्तरनिर्दिष्टदोषप्राप्तिराशङ्कनीया कस्मात् यावदात्मभावित्वाद्बुद्धिसंयोगस्य यावदयमात्मा संसारी भवति यावदस्य सम्यग्दर्शनेन संसारित्वं न निवर्तते तावदस्य बुद्ध्या संयोगो न शाम्यति यावदेव चायं बुद्ध्युपाधिसंबन्धः तावदेवास्य जीवत्वं संसारित्वं च परमार्थतस्तु न जीवो नाम बुद्ध्युपाधिपरिकल्पितस्वरूपव्यतिरेकेणास्ति न हि नित्यमुक्तस्वरूपात्सर्वज्ञादीश्वरादन्यश्चेतनो धातुर्द्वितीयो वेदान्तार्थनिरूपणायामुपलभ्यते नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ श्रोतृ मन्तृ विज्ञातृ तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः ।

कथं पुनरवगम्यते यावदात्मभावी बुद्धिसंयोग इति तद्दर्शनादित्याह तथा हि शास्त्रं दर्शयति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव इत्यादि तत्र विज्ञानमय इति बुद्धिमय इत्येतदुक्तं भवति प्रदेशान्तरे विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः इति विज्ञानमयस्य मनआदिभिः सह पाठात् बुद्धिमयत्वं च तद्गुणसारत्वमेवाभिप्रेयते यथा लोके स्त्रीमयो देवदत्त इति स्त्रीरागादिप्रधानोऽभिधीयते तद्वत् स समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति इति च लोकान्तरगमनेऽप्यवियोगं बुद्ध्या दर्शयति केन समानः तयैव बुद्ध्येति गम्यते संनिधानात् तच्च दर्शयति ध्यायतीव लेलायतीव इति एतदुक्तं भवति नायं स्वतो ध्यायति नापि चलति ध्यायन्त्यां बुद्धौ ध्यायतीव चलन्त्यां बुद्धौ चलतीवेति।

अपि च मिथ्याज्ञानपुरःसरोऽयमात्मनो बुद्ध्युपाधिसंबन्धः न च मिथ्याज्ञानस्य सम्यग्ज्ञानादन्यत्र निवृत्तिरस्तीत्यतो यावद्ब्रह्मात्मतानवबोधः तावदयं बुद्ध्युपाधिसंबन्धो न शाम्यति दर्शयति च वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इति।।

ननु सुषुप्तप्रलययोर्न शक्यते बुद्धिसंबन्ध आत्मनोऽभ्युपगन्तुम् सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति इति वचनात् कृत्स्नविकारप्रलयाभ्युपगमाच्च तत्कथं यावदात्मभावित्वं बुद्धिसंबन्धस्येति अत्रोच्यते

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा हो, यदि बुद्धिके गुणकी प्रधानतासे आत्मामें संसारित्वको कल्पना करो, तो परस्पर भिन्न बुद्धि और आत्मा संयोगका अवसान ( अन्त ) अवश्यंभावी है, इससे बुद्धिका वियोग होनेपर विभक्त बात्मा के अनालक्ष्य होनेसे उसका असत्त्व अथवा असंसारित्व प्रसक्तं होगा? इसपर उत्तर कहते हैं-

पूर्व में कही हुई यह दोष प्राप्तिकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, किससे? इससे कि बुद्धिका संयोग यावदात्मभावी है। जबतक यह आत्मा संसारी है, जबतक इसका तत्त्वज्ञानसे संसारित्व निवृत्त नहीं होता, तबतक इसका बुद्धिके साथ सम्बन्ध निवृत्त नहीं होता। जबतक यह बुद्धिरूप उपाधिका सम्बन्ध है तब तक जीवमें जीवत्व और संसारित्व हैं।

वास्तवमें तो बुद्धि उपाधिके सम्बन्धसे परिकल्पित स्वरूपसे व्यतिरिक्त जीव नाम है ही नहीं, क्योंकि ' नान्योऽतो ० ' ( इससे अन्य द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है ) ' नान्यदतो ० ' ( इससे अन्य द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है ) ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे नित्य मुक्त स्वरूप सर्वज्ञ ईश्वरसे अन्य द्वितीय चेतन तत्त्व वेदान्त अर्थका निरूपण करनेपर उपलब्ध नहीं होता। परन्तु बुद्धिका संयोग यावदात्मभावी है, यह कैसे जाना जाता है?

इसके उत्तरमें ' वह श्रुतिमें प्रतिपादित है ' ऐसा सूत्रकारने कहा है। जैसे कि ' योऽयं विज्ञानमयः ० ' ( जो यह प्राणोंमें विज्ञानमय है बुद्धि में ज्योतिःस्वरूप पुरुष, वह समान - बुद्धि के सहय हुआ इस लोक और परलोक में संचार करता है, [ बुद्धि वृत्तिके अनुसार ] मानो ध्यान करता है। [ प्राणवृत्ति होकर ] मानों अत्यर्थं चेष्टा करता है ) इत्यादि शास्त्र दिखलाता है।

इसमें ' विज्ञानमयः ' इस पदसे ' बुद्धिमय ' यह उक्त होता है, क्योंकि अन्य स्थलमें ' विज्ञानमयो ० ' ( विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षु मंय, श्रोत्रमय ) इस प्रकार विज्ञानमयका मन आदिके साथ पाठ है। बुद्धिमयत्वसे तद्गुणसारत्व ही अभिप्रेत है। जैसे लोकमें स्त्री में राग आदिकी प्रधानतासे ' देवदत्त स्त्रीमय है ' कहा जाता है | ‘ स समान : ० ' ( वह बुद्धि समान होकर दोनों लोकोंमें संचरण करता है ) यह श्रुति लोकान्तर गमन करनेमें आत्माका बुद्धि के साथ अवियोग प्रतिपादित करती है। किसके समान?

सान्निध्यसे उस बुद्धिके समान ऐसा ज्ञात होता है। उस ( समानत्व ) को ' ध्यायतीव लेलायतीव ' ( ध्यान करता - सा प्रतीत होता है, चलता - सा प्रतीत होता है ) यह श्रुति दिखलाती है। तात्पर्य यह है कि यह आत्मा स्वतः न ध्यान करता है और न चलता ही है। परन्तु बुद्धिके ध्यानस्थ होनेपर वह ध्यान करता - सा प्रतीत होता है और बुद्धिके चलने पर वह चलता - सा ज्ञात होता है। आत्माका यह बुद्धिरूप उपाधिके साथ सम्बन्ध मिथ्याज्ञान पुरः सर है। मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति यथार्थज्ञानके विना नहीं होतीं।

इसलिए जबतक ï ब्रह्मात्माका अज्ञान है तबतक यह बुद्धिरूप उपाधि सम्बन्ध निवृत्त नहीं होता। ऐसा ' वेदाहमेतं . ' ( मैं इस अज्ञानातीत प्रकाशस्वरूप महान् पुरुषको जानता हूँ। उसे ही जानकर मृत्युको पार करता है इसके सिवा परमपद प्राप्तिका कोई अन्य मार्ग नहीं है ) यह श्रुति भी दिखलाती है॥ ३०

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.३१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.31 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३१

सूत्र २.३.३१

पुंस्त्वादिवत् त्व् अस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ॥ २.३.३१ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 546

पदच्छेद — पुंस्त्वादिवत् , तु , अस्य , सतः , अभिव्यक्तियोगात्

सूत्रार्थ — ( पुंस्त्वादिवत् ) जैसे बाल्यावस्था में विद्यमान ही पुंस्त्व आदि यौवन में विकसित होते हैं, वैस ( सत : ) सुषुप्ति अवस्था में सूक्ष्मरूपसे विद्यमान ( अस्य ) बुद्धि संयोग जाग्रत् आदि अवस्था में ( अभिव्यक्तियोगात् ) अभिव्यक्त होता है। इसलिए बुद्धि सम्बन्ध यावदात्ममावी है।

शाङ्करभाष्य

यथा लोके पुंस्त्वादीनि बीजात्मना विद्यमानान्येव बाल्यादिष्वनुपलभ्यमानान्यविद्यमानवदभिप्रेयमाणानि यौवनादिष्वाविर्भवन्ति न अविद्यमानान्युत्पद्यन्ते षण्डादीनामपि तदुत्पत्तिप्रसङ्गात् एवमयमपि बुद्धिसंबन्धः शक्त्यात्मना विद्यमान एव सुषुप्तप्रलययोः पुनः प्रबोधप्रसवयोराविर्भवति एवं हि एतद्युज्यते न हि आकस्मिकी कस्यचिदुत्पत्तिः संभवति अतिप्रसङ्गात्। दर्शयति च सुषुप्तादुत्थानमविद्यात्मकबीजसद्भावकारितम् सति संपद्य न विदुः सति संपद्यामह इति त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा इत्यादिना। तस्मात्सिद्धमेतत् यावदात्मभावी बुद्ध्याद्युपाधिसंबन्ध इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सुषुप्ति और प्रलय में आत्माका बुद्धिके साथ सम्बन्ध स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य! सुषुवि में यह सत् ( परब्रह्म ) के साथ सम्पन्न हो जाता है यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) ऐसा श्रुतिवचन है। और सम्पूर्ण विकारका प्रलय स्वीकार किया गया है, तो बुद्धि सम्बन्ध यावदात्मभावी कैसे है? इसपर कहते हैं—

जैसे लोकमें पुंस्त्व आदि बीजरूपसे विद्यमान ही बाल्य आदिमें अनुपलब्ध एवं अविद्यमान के समान अभिप्रेत होनेपर भी यौवन आदिमें आविर्भूत होते हैं, अविद्यमान उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि षण्ड ( नपुंसक ) आदिमें भी उसकी उत्पत्तिका प्रसंग हो जायगा, वैसे यह बुद्धि सम्बन्ध भी सुषुप्ति और प्रलय में शक्तिरूपसे विद्यमान ही पुनः प्रबोध ( जाग्रत् ) और प्रसव ( सृष्टिकाल ) में आविभूत होता है, क्योंकि यह ऐसा ही युक्त - संगत है। किसीकी आकस्मिक ( विना कारण ) उत्पत्ति नहीं हो सकती, कारण कि अतिप्रसंग हो जायगा। और “ सति संपद्य ० ' ( सुषुप्ति में यह सम्पूर्ण प्रजा सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत् ( ब्रह्म ) को प्राप्त हो गयी ) इससे ' त इह ० ’ ( वे इस लोकमें वाघ या सिंह जो सुषुप्ति पूर्वं होते हैं, वे ही पुनः होते हैं ) इत्यादिते श्रुति अविद्यत्मक बीजके सद्भावसे किया हुआ सुषुप्तिसे उत्थान दिखलाती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि बुद्धि आदिरूप उपाधिका सम्बन्ध यावदात्मभावी है।। ३१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि बुद्धिका सम्बन्ध यावदात्ममावी मानें तो सुषुप्ति में सम्बन्ध के होनेपर ब्रह्मसंपत्ति नहीं होगी और प्रलय में होनेपर प्रलय न होगा। परन्तु स्थूल और सूक्ष्मरूपसे सम्बन्ध विद्यमान है॥ ३१

2.3.32 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३२

सूत्र २.३.३२

नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वान्यथा ॥ २.३.३२ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 547

पदच्छेद — नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः , अन्यतरनियमः , वा , अन्यथा

सूत्रार्थ — अन्तःकरणका अस्तित्व अवश्य मानना चाहिए | ( अन्यथा ) यदि उसे न मानें तो ( नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः ) आत्मा, इन्द्रिय आदि साधन विद्यमान होने से नित्योपलब्धिका प्रसङ्ग होगा। यदि साधन होते हुए भी अनुपलब्धि मानें तो नित्यानुपलब्धि प्रसङ्ग आ जायगा। ( वा ) अथवा ( अन्यतरनियम : ) आत्मा वा इन्द्रियका प्रतिबन्ध मानना होगा, तो वह मी ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा अविक्रिय है और इन्द्रियोंकी भी अकस्मात् शक्तिका प्रतिबन्ध नहीं हो सकता है, इसलिए उपलब्धि सामान्य कारण अन्तःकरणको अवश्य मानना चाहिए।

शाङ्करभाष्य

तच्चात्मन उपाधिभूतम् अन्तःकरणं मनो बुद्धिर्विज्ञानं चित्तमिति च अनेकधा तत्र तत्राभिलप्यते क्वचिच्च वृत्तिविभागेन संशयादिवृत्तिकं मन इत्युच्यते निश्चयादिवृत्तिकं बुद्धिरिति तच्चैवं भूतमन्तःकरणमवश्यमस्तीत्यभ्युपगन्तव्यम् अन्यथा ह्यनभ्युपगम्यमाने तस्मिन्नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः स्यात् आत्मेन्द्रियविषयाणामुपलब्धिसाधनानां संनिधाने सति नित्यमेवोपलब्धिः प्रसज्येत अथ सत्यपि हेतुसमवधाने फलाभावः ततो नित्यमेवानुपलब्धिः प्रसज्येत न चैवं दृश्यते। अथवा अन्यतरस्यात्मन इन्द्रियस्य वा शक्तिप्रतिबन्धोऽभ्युपगन्तव्यः न च आत्मनः शक्तिप्रतिबन्धः संभवति अविक्रियत्वात् नापि इन्द्रियस्य न हि तस्य पूर्वोत्तरयोः क्षणयोरप्रतिबद्धशक्तिकस्य सतोऽकस्माच्छक्तिः प्रतिबध्येत। तस्मात् यस्यावधानानवधानाभ्यामुपलब्ध्यनुपलब्धी भवतः तन्मनः। तथा च श्रुतिः अन्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषम् इति मनसा ह्येव पश्यति मनसा श्रृणोति इति च कामादयश्चास्य वृत्तय इति दर्शयति कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव इति। तस्माद्युक्तमेतत् तद्गुणसारत्वात्तद्व्यपदेश इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आत्माका उपाधिभूत वह अन्तःकरण भिन्न भिन्न स्थलों पर मन, बुद्धि, विज्ञान और चित्त इस तरह अनेक प्रकारसे कहा जाता है। कहीं वृत्तिविभागसे संशय आदि वृत्तिवालेको मन कहते हैं, और निश्चय आदि वृत्तिवालेको बुद्धि कहते हैं। इसप्रकारका वह अन्तःकरण अवश्य है, यह स्वीकार करना चाहिए। अन्यथा - उसके स्वीकार न किये जानेपर नित्योपलब्धि अथवा नित्य अनुपलब्धिका प्रसङ्ग होगा। उपलब्धिके साधन भूत आत्मा, इन्द्रिय और विषयके सन्निधान होनेपर नित्य ही उपलब्धि प्रसक्त होगी।

यदि हेतुके संनिधान होनेपर भी फलका अभाव है, तो नित्य ही अनुपलब्धि प्रसक्त होगी। परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता। अथवा आत्मा वा इन्द्रिय दोनोंमें से एककी शक्तिका प्रतिबन्ध स्वीकार करना चाहिए। आत्माकी शक्तिका प्रतिबन्ध तो संभव नहीं है, क्योंकि वह अविक्रिय है। इन्द्रियका भी शक्ति प्रतिबन्ध संभव नहीं है, क्योंकि पूर्व और उत्तर क्षणमें अप्रतिबद्ध शक्ति वालेकी शक्ति अकस्मात् प्रतिबद्ध नहीं हो सकती, इसलिए जिसकी सावधानी और असावधानीसे उपलब्धि और अनुपलब्धि होती हैं वह मन है।

तथा ' अन्यत्र मना ० ' ( अन्यत्र मन था, अतः मैंने नहीं देखा, अन्यत्र मन था, इससे नहीं सुना, इसप्रकार मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है ) यह श्रुति है | ' कामः संकल्पः ० ' ( काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लज्जा, प्रज्ञा, भय यह सब मन ही है ) यह श्रुति कामादि मनकी वृत्तियाँ हैं, ऐसा दिखलाती है। इससे ' तद्गुणसारवात्तद्वयपदेशः ' यह युक्त है |॥ ३२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * आत्माकी बुद्धिरूप उपाधिके सद्भावमें अनेक प्रमाण हैं - ' चेतसा वेदितव्यः ' ( शुद्ध चित्तसे जानना चाहिए ) ' चित्तं च चेतयितव्यं च ' ( प्र ० ४।८ ) ( चित्त और चित्तका विषय ) ' मनसेवानुद्रष्टव्यम् ' ( मनसे ही देखना चाहिए ) ' यस्तु विज्ञानवान्मवति ' ( कठ ० १ | ३ | ६ ) ( परन्तु जो बुद्धिरूप सारथि युक्त होता है ) ' मनसस्तु परा बुद्धि : ' ( कठ ० १ | ३ | १० ) ( मनसे बुद्धि पर है ) इत्यादि श्रुतियोंसे अन्तःकरण चित्त, मन, विज्ञान, बुद्धि अनेक नामोंसे प्रतिपादित है। इन्द्रिय और विषय आदिके होनेपर भी कदाचित् विषयोपलब्धि होती है कदाचित् नहीं होती इसका कारण केक्ल मन ही है, अतएव यह कथन युक्त ही है कि बुद्धिके गुणोंकी प्रधानतासे आत्मामें अणुत्व, संसारित्व आदि व्यवहार होते हैं स्वतः नहीं॥ ३२

कर्त्रधिकरणम्

2.3.33 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३३

सूत्र २.३.३३

कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॥ २.३.३३ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 548

पदच्छेद — कर्ता , शास्त्रार्थवत्त्वात् । क्योंकि ऐसा माननेसे

सूत्रार्थ — - ( कर्ता ) आत्मा ही कर्ता है बुद्धि नहीं, ( शास्त्रार्थवत्त्वात् ) विधि आदि शास्त्र सार्थक होता है।

शाङ्करभाष्य

तद्गुणसारत्वाधिकारेणैवापरोऽपि जीवधर्मः प्रपञ्च्यते। कर्ता च अयं जीवः स्यात् कस्मात् शास्त्रार्थवत्त्वात् एवं च यजेत जुहुयात् दद्यात् इत्येवंविधं विधिशास्त्रमर्थवद्भवति अन्यथा तदनर्थकं स्यात् तद्धि कर्तुः सतः कर्तव्यविशेषमुपदिशति न च असति कर्तृत्वे तदुपपद्येत। तथेदमपि शास्त्रमर्थवद्भवति एष हि द्रष्टा श्रोता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तद्गुणसारत्वके प्रकरणसे ही जीवके अन्य धर्मका मी विस्तारसे विचार किया जाता है। यह जीव कर्ता होना चाहिए, क्योंकि इससे शास्त्र अर्थवान् ( सार्थक ) होता है। इसप्रकार ' यजेत ' ( याग करे ) ' जुहुयात् ' ( होम करे ) ' दद्याद् ' ( दान करे ) इसप्रकारका विधि शास्त्र प्रयोजनवाला होता है, अन्यथा वह निरर्थक होगा, क्योंकि वह शास्त्र कर्ता के होनेपर कर्तव्य विशेषका उपदेश करता है | कर्ताके न होनेपर वह उपपन्न नहीं होगा। इसप्रकार ' एष हि द्रष्टा ० ' ( यही आत्मा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्ता और विज्ञानरूप है ) यह शास्त्र भी सार्थक होता है॥ ३३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत अधिकरणमें आत्मा में अणुत्वको अध्यस्त कहकर वास्तविक महत्त्वकी स्थापना की गई है। अब इस प्रसंग में आत्माके कर्तृत्व धर्मका विचार किया जाता है कि यह नित्य चिद्रूप महान् आत्मा कर्ता है कि नहीं? ' असङ्गो ह्ययं पुरुष : ' इस असङ्गत्व प्रतिपादक श्रुति और ' यजेत ' इस विधिं श्रुतिका परस्पर विरोध होनेसे संशय होता है, परन्तु सिद्धान्त में ' तद्गुणसारत्वसे ' आत्मामें कर्तृत्व औपाधिक है। उससे विधि - निषेध शास्त्र, बन्ध - मोक्ष शास्त्र सार्थक होता है और ' शास्त्रफलं प्रयोक्तरि ' ( विधि - याग आदिसे उत्पन्न स्वर्गं व्यादि फल यजमानको प्राप्त होता है। इस जैमिनि न्यायसे भी भोक्ता आत्मा ही कर्ता सिद्ध होता है बुद्धि नहीं। पूर्वपक्ष में श्रुतियों का विरोध है और सिद्धान्तमें उनका अविरोध है॥३३

2.3.34 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३४

सूत्र २.३.३४

उपादानाद् विहारोपदेशाच् च ॥ २.३.३४ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 548

सूत्रार्थ — जीवकर्ता है, क्योंकि उसके विषयमें विहारका उपदेश है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च जीवस्य कर्तृत्वम् यज्जीवप्रक्रियायां संध्ये स्थाने विहारमुपदिशति स ईयतेऽमृतो यत्र कामम् इति स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते इति च।। इतश्चास्य कर्तृत्वम् यज्जीवप्रक्रियायामेव करणानामुपादानं संकीर्तयति तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय इति प्राणान्गृहीत्वा इति च।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इससे भी जीव कर्ता है, क्योंकि ' स ईयते ० ' ( वह अकेला विचरनेवाला अमृत जीव जहाँ इच्छा होती है वहाँ चला जाता है ) और ' स्वे शरीरे ० ' ( उसी प्रकार प्राणोंको ग्रहण कर वह अपने शरीरमें यथेष्ट विचरता है ) इसप्रकार श्रुति जीवकी प्रक्रिया में स्वप्नावस्था में विहारका उपदेश करती है॥ ३४

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.३७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.35 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३५

सूत्र २.३.३५

उपादानात् ॥ २.३.३५ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 549

सूत्रार्थ — - जीव कर्ता है, क्योंकि श्रुतिमें इसके द्वारा इन्द्रियोंका ग्रहण कहा गया है।

शाङ्करभाष्य

इतश्चास्य कर्तृत्वम्, यज्जीवप्रक्रियायामेव करणानामुपादानं संकीर्तयति - ' तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय ' ( बृह ० २१।१।१७ ) इति, ' प्राणान्गृहीत्वा ' ( बृह ० २।१।१८ ) इति च॥ ३५

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इससे मी जीव कर्ता है, क्योंकि ' तदेषां ' ( वह बुद्धि द्वारा इन वाग् आदि इन्द्रियोंकी शक्तिको ग्रहणकर सोता है ) और ' प्राणान्गृहीत्वा ० ' ( उसी प्रकार यह प्राणोंको ग्रहणकर अपने शरीरमें यथेष्ट विचरता है ) इस प्रकार श्रुति जीवके प्रकरण में ही इन्द्रियोंका ग्रहण वर्णन करती है॥ ३५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.३७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.36 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३६

सूत्र २.३.३६

व्यपदेशाच् च क्रियायां न चेन् निर्देशविपर्ययः ॥ २.३.३६ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 549

पदच्छेद — व्यपदेशात् , च , क्रियायाम् , न चेत् , निर्देशविपर्ययः

सूत्रार्थ — ( च ) और ( व्यपदेशात् ) ' विज्ञानं यज्ञं तनुते ' यहाँ विज्ञान शब्द वाच्य जीव ( क्रियायाम् ) लौकिक आदि क्रियाका कर्ता कहा गया है, ( न चेत् ) यदि विज्ञान शब्द जीव परक न मानकर बुद्धि परक मानें तो ( निर्देशविपर्ययः ) निर्देश विपर्यय होगा अर्थात् बुद्धिके करण होनेसे तद्वाचक विज्ञान पदमें प्रथमापेक्षा ' विज्ञानेन ' इस प्रकार तृतीया होगी।

शाङ्करभाष्य

इतश्च जीवस्य कर्तृत्वम् यदस्य लौकिकीषु वैदिकीषु च क्रियासु कर्तृत्वं व्यपदिशति शास्त्रम् विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च इति। ननु विज्ञानशब्दो बुद्धौ समधिगतः कथमनेन जीवस्य कर्तृत्वं सूच्यत इति नेत्युच्यते जीवस्यैवैष निर्देशः न बुद्धेः न चेज्जीवस्य स्यात् निर्देशविपर्ययः स्यात् विज्ञानेनेत्येवं निरदेक्ष्यत् तथा हि अन्यत्र बुद्धिविवक्षायां विज्ञानशब्दस्य करणविभक्तिनिर्देशो दृश्यते तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय इति इह तु विज्ञानं यज्ञं तनुते इति कर्तृसामानाधिकरण्यनिर्देशाद्बुद्धिव्यतिरिक्तस्यैवात्मनः कर्तृत्वं सूच्यत इत्यदोषः।। अत्राह यदि बुद्धिव्यतिरिक्तो जीवः कर्ता स्यात् स स्वतन्त्रः सन् प्रियं हितं चैव आत्मनो नियमेन संपादयेत् न विपरीतम् विपरीतमपि तु संपादयन्नुपलभ्यते न च स्वतन्त्रस्यात्मनः ईदृशी प्रवृत्तिरनियमेनोपपद्यत इति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इससे भी जीव कर्ता है, क्योंकि ' विज्ञानं यज्ञ ं तनुते ० ' ( विज्ञान जीव यज्ञका विस्तार करता है और कर्मोंका भी विस्तार करता है ) इस प्रकार यह श्रुति जीवका लौकिक और वैदिक क्रियाओंमें कर्तृत्व व्यपदेश करती है। परन्तु विज्ञान शब्द तो बुद्धिमें निश्चित है, तो फिर उससे जीव कर्ता है, यह किस प्रकार सूचित किया जाता है? नहीं, ऐसा कहते हैं — यह जीवका ही निर्देश है बुद्धिका नहीं। यदि यह निर्देश जीवका न हो तो निर्देश विपर्यय होगा ' विज्ञानेन ' ( विज्ञानसे ) ऐसा निर्देश होगा। इस प्रकार ' तदेषां ' ( बुद्धि द्वारा इन्द्रियोंकी शक्तिको ग्रहण कर वह सोता है ) इस तरह अन्य श्रुतिमें विज्ञानशब्दसे बुद्धिकी विवक्षा में विज्ञानशब्दका करण विभक्तिसे निर्देश देखा जाता है। किन्तु यहाँ तो ' विज्ञानं यज्ञ ' तनुते ' इस प्रकार कर्ताके सामानाधिकरण्य निर्देश से बुद्धिसे व्यतिरिक्त आत्माका ही कर्तृत्व सूचित होता है, अतः दोष नहीं है॥ ३६

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.३७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.37 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३७

सूत्र २.३.३७

उपलब्धिवदनियमः ॥ २.३.३७ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 550

पदच्छेद — उपलब्धिवत् अनियमः

सूत्रार्थ — - ( उपलब्धिवत् ) जैसे उपलब्धिमें स्वतन्त्र होता हुआ भी इष्ट और अनिष्ट उपलब्ध करता है, वैसे ( अनियम : ) इष्ट और अनिष्टका भी अनियमसे संपादन करता है।

शाङ्करभाष्य

यथायमात्मोपलब्धिं प्रति स्वतन्त्रोऽपि अनियमेनेष्टमनिष्टं च उपलभते एवमनियमेनैवेष्टमनिष्टं च संपादयिष्यति उपलब्धावप्यस्वातन्त्र्यम् उपलब्धिहेतूपादानोपलम्भादिति चेत् न विषयप्रकल्पनामात्रप्रयोजनत्वादुपलब्धिहेतूनाम् उपलब्धौ तु अनन्यापेक्षत्वमात्मनः चैतन्ययोगात्। अपि च अर्थक्रियायामपि नात्यन्तमात्मनः स्वातन्त्र्यमस्ति देशकालनिमित्तविशेषापेक्षत्वात् न च सहायापेक्षस्य कर्तुः कर्तृत्वं निवर्तते भवति ह्येधोदकाद्यपेक्षस्यापि पक्तुः पक्तृत्वम् सहकारिवैचित्र्याच्च इष्टानिष्टार्थक्रियायामनियमेन प्रवृत्तिरात्मनो न विरुध्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इस प्रकार कहते हैं - यदि बुद्धिसे भिन्न जीव कर्ता हो तो वह स्वतन्त्र होता हुआ अपना और हित नियमसे संपादन करेगा विपरीत नहीं, किन्तु विपरीत मी संपादन करता हुआ उपलब्ध होता है। स्वतन्त्र आत्माकी अनियमसे ऐसी प्रवृत्ति उपपन्न नहीं होती, मतः उत्तर कहते हैं—

जैसे यह आत्मा उपलब्धिके प्रति स्वतन्त्र होता हुआ भी अनियमसे इष्ट और अनिष्ट उपलब्ध करता है, वैसे अनियमसे ही इष्ट और अनिष्टका संपादन करेगा। यदि कहो कि उपलब्धिमें भी आत्मा स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि उपलब्धिके हेतुका उपादान ( ग्रहण ) उपलब्ध है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि उपलब्धि हेतुओं का प्रयोजन केवल विषयकी कल्पना मात्र है। उपलब्धिमें तो आत्माको अन्यकी अपेक्षा नहीं है, कारण कि चैतन्यका योग है | और अर्थ - क्रिया में भी आत्माको अत्यन्त स्वतन्त्रता नहीं है, क्योंकि देश - काल और निमित्तविशेषकी अपेक्षा है। सहकारीकी अपेक्षा करनेवाले कर्ताका कर्तृत्व निवृत्त नहीं होता, क्योंकि काष्ठ, जल आदिकी अपेक्षा करनेवाले पाचकमें भी पाककर्तृत्व व्यवहार होता है। सहकारीके वैचित्र्यसे ही इष्ट और अनिष्ट अर्थ क्रियामें नियमके विना आत्माकी प्रवृत्ति विरुद्ध नहीं है॥ ३७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि जीव स्वतन्त्र है तो सवंदा इष्टका संपादन करेगा, अन्यथा वह

कर्ता ही नहीं होगा, क्योंकि ‘ स्वतन्त्रः कर्ता ' ( पा ० सू ० १ | ४ | ५४ ) कर्ता स्वतन्त्र होता है। परन्तु

जीवके स्वतन्त्र होनेपर मी कारककी विचित्रतासे उसकी प्रवृत्ति अनियमित है। यदि आत्मा विषय सम्बन्धके लिए करणोंकी अपेक्षा करता है तो वह स्वतन्त्र कैसे है? केवल स्वभिन्नकी अपेक्षा न करनेका नाम स्वतन्त्रता प्रसक्त होगी, इससे स्वभिन्न कारकोंका प्रयोजक होकर जो स्वयं कारकोंसे प्रेरित न हो वह स्वतन्त्र है। इस प्रकार स्वतन्त्र होता हुआ भी जीव इष्ट साधनताकी भ्रान्तिसे अनिष्ट साधनका मी अनुष्ठान करता है, अतः अनियमित प्रवृत्ति और स्वतन्त्रता दोनों जीवमें अविरुद्ध हैं।। ३७

2.3.38 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३८

सूत्र २.३.३८

शक्तिविपर्ययात् ॥ २.३.३८ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 550

सूत्रार्थ — बुद्धिको कर्त्री मानें तो करणशक्तिका विपर्यय होगा।

शाङ्करभाष्य

इतश्च विज्ञानव्यतिरिक्तो जीवः कर्ता भवितुमर्हति। यदि पुनर्विज्ञानशब्दवाच्या बुद्धिरेव कर्त्री स्यात् ततः शक्तिविपर्ययः स्यात् करणशक्तिर्बुद्धेर्हीयेत कर्तृशक्तिश्चापद्येत सत्यां च बुद्धेः कर्तृशक्तौ तस्या एव अहंप्रत्ययविषयत्वमभ्युपगन्तव्यम् अहंकारपूर्विकाया एव प्रवृत्तेः सर्वत्र दर्शनात् अहं गच्छामि अहमागच्छामि अहं भुञ्जे अहं पिबामि इति च तस्याश्च कर्तृशक्तियुक्तायाः सर्वार्थकारि करणमन्यत्कल्पयितव्यम् शक्तोऽपि हि सन् कर्ता करणमुपादाय क्रियासु प्रवर्तमानो दृश्यते ततश्च संज्ञामात्रे विवादः स्यात् न वस्तुभेदः कश्चित् करणव्यतिरिक्तस्य कर्तृत्वाभ्युपगमात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इससे भी विज्ञानसे भिन्न जीव कर्ता हो सकता है। पुनः यदि विज्ञान

शब्द वाच्य बुद्धि ही कर्त्री होगी तो उससे शक्तिका विपर्यय होगा - बुद्धिकी करण शक्तिका नाश होगा

और उसको कर्तृशक्ति प्रसक्त होगी। और बुद्धिमें कर्तृशक्तिके होनेपर उसमें ही अहंप्रत्यय विषयता क्योंकि ' मैं जाता हूँ ' ' मैं आता हूँ ' ' मैं खाता हूँ ' ' मैं पान करता हूँ ' इस प्रकार अहंकार पूर्वक ही सर्वत्र प्रवृत्ति देखने में आती है। कर्तृशक्ति युक्त उसको सर्वार्थकारी अन्यकरणकी कल्पना करनी चाहिए | कर्ता समर्थ होता हुआ भी करणका ग्रहणकर क्रियाओंमें प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है। उससे केवल नाममें विवाद है वस्तु में कोई भेद नहीं है, क्योंकि करणसे व्यतिरिक्त कर्ता स्वीकार किया गया है || ३८ |

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.४० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.39 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३९

सूत्र २.३.३९

समाध्यभावाच् च ॥ २.३.३९ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.३९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 551

पदच्छेद — समाध्यमावात् च

सूत्रार्थ — - और आत्मा के कर्ता न होनेपर वेदान्त में प्रतिपादित ब्रह्मके साक्षात्कारका साधनभूत समाधिका अभाव हो जायगा, अतः आत्मा कर्ता है।

शाङ्करभाष्य

योऽप्ययमौपनिषदात्मप्रतिपत्तिप्रयोजनः समाधिरुपदिष्टो वेदान्तेषु आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम् इत्येवंलक्षणः सोऽप्यसत्यात्मनः कर्तृत्वे नोपपद्येत। तस्मादप्यस्य कर्तृत्वसिद्धिः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' आत्मा वा अरे ० ' ( हे मैत्रेयी! आत्मा दर्शन करनेके योग्य है, अतः उसका श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए, अन्वेषण करना चाहिए, उसकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिए ) और ' ओमित्येवं ० ' ( ओम्, इस प्रकार उस आत्माका ध्यान करो ) इस प्रकारकी जो यह औपनिषद् आत्मप्रतिपत्तिरूप प्रयोजनवाली समाधि - निदिध्यासन वेदान्तवाक्योंमें उपदिष्ट है वह भी आत्मा कर्ता न होनेपर उपपन्न नहीं होगी। इससे भी आत्मा कर्ता सिद्ध होता है॥३ ९

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.४० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

तक्षाधिकरणम्

2.3.40 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४०

सूत्र २.३.४०

यथा च तक्षोभयथा ॥ २.३.४० ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 551

पदच्छेद — यथा च तक्षः , उभयथा

सूत्रार्थ — ( च ) परन्तु ( यथा ) जैसे लोक में ( तक्षः ) बढई ( उमयथा ) वसुला आदि करणों की अपेक्षा कर्ता होकर दुःखी होता है और उनकी अपेक्षा न कर स्वरूपसे अकर्ता एवं सुखी होता है, वैसे आत्मा भी बुद्धि आदि करणोंकी अपेक्षा कर्ता, संसारी है, उनकी अपेक्षा न कर स्वरूपसे अकर्ता एवं परमानन्दघन ही है।

शाङ्करभाष्य

एवं तावच्छास्त्रार्थवत्त्वादिभिर्हेतुभिः कर्तृत्वं शारीरस्य प्रदर्शितम् तत्पुनः स्वाभाविकं वा स्यात् उपाधिनिमित्तं वेति चिन्त्यते। तत्रैतैरेव शास्त्रार्थवत्त्वादिभिर्हेतुभिः स्वाभाविकं कर्तृत्वम् अपवादहेत्वभावादिति। एवं प्राप्ते ब्रूमः न स्वाभाविकं कर्तृत्वमात्मनः संभवति अनिर्मोक्षप्रसङ्गात् कर्तृत्वस्वभावत्वे ह्यात्मनो न कर्तृत्वान्निर्मोक्षः संभवति अग्नेरिवौष्ण्यात् न च कर्तृत्वादनिर्मुक्तस्यास्ति पुरुषार्थसिद्धिः कर्तृत्वस्य दुःखरूपत्वात्।

ननु स्थितायामपि कर्तृत्वशक्तौ कर्तृत्वकार्यपरिहारात्पुरुषार्थः सेत्स्यति तत्परिहारश्च निमित्तपरिहारात् यथाग्नेर्दहनशक्तियुक्तस्यापि काष्ठवियोगाद्दहनकार्याभावः तद्वत् न निमित्तानामपि शक्तिलक्षणेन संबन्धेन संबद्धानामत्यन्तपरिहारासंभावात्। ननु मोक्षसाधनविधानान्मोक्षः सेत्स्यति न साधनायत्तस्य अनित्यत्वात्।

अपि च नित्यशुद्धमुक्तात्मप्रतिपादनात् मोक्षसिद्धिरभिमता तादृगात्मप्रतिपादनं च न स्वाभाविके कर्तृत्वेऽवकल्पेत तस्मात् उपाधिधर्माध्यासेनैवात्मनः कर्तृत्वम् न स्वाभाविकम् तथा च श्रुतिः ध्यायतीव लेलायतीव इति आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः इति च उपाधिसंपृक्तस्यैवात्मनो भोक्तृत्वादिविशेषलाभं दर्शयति। न हि विवेकिनां परस्मादन्यो जीवो नाम कर्ता भोक्ता वा विद्यते नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इत्यादिश्रवणात्।

पर एव तर्हि संसारी कर्ता भोक्ता च प्रसज्येत परस्मादन्यश्चेच्चितिमाञ्जीवः कर्ता बुद्ध्यादिसंघातव्यतिरिक्तो न स्यात् न अविद्याप्रत्युपस्थापितत्वात्कर्तृत्वभोक्तृत्वयोः तथा च शास्त्रम् यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति इत्यविद्यावस्थायां कर्तृत्वभोक्तृत्वे दर्शयित्वा विद्यावस्थायां ते एव कर्तृत्वभोक्तृत्वे निवारयति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् इति तथा स्वप्नजागरितयोरात्मन उपाधिसंपर्ककृतं श्रमं श्येनस्येवाकाशे विपरिपततः श्रावयित्वा तदभावं सुषुप्तौ प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तस्य श्रावयति तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् इत्यारभ्य एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा संपदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्दः इत्युपसंहारात्।।

तदेतदाहाचार्यः यथा च तक्षोभयथा इति। त्वर्थे च अयं चः पठितः।

नैवं मन्तव्यम् स्वाभाविकमेवात्मनः कर्तृत्वम् अग्नेरिवौष्ण्यमिति यथा तु तक्षा लोके वास्यादिकरणहस्तः कर्ता दुःखी भवति स एव स्वगृहं प्राप्तो विमुक्तवास्यादिकरणः स्वस्थो निर्वृतो निर्व्यापारः सुखी भवति एवमविद्याप्रत्युपस्थापितद्वैतसंपृक्त आत्मा स्वप्नजागरितावस्थयोः कर्ता दुःखी भवति सः तच्छ्रमापनुत्तये स्वमात्मानं परं ब्रह्म प्रविश्य विमुक्तकार्यकरणसंघातोऽकर्ता सुखी भवति संप्रसादावस्थायाम् तथा मुक्त्यवस्थायामप्यविद्याध्वान्तं विद्याप्रदीपेन विधूय आत्मैव केवलो निर्वृत्तः सुखी भवति।

तक्षदृष्टान्तश्चैतावतांशेन द्रष्टव्यः तक्षा हि विशिष्टेषु तक्षणादिव्यापारेष्वपेक्ष्यैव प्रतिनियतानि करणानि वास्यादीनि कर्ता भवति स्वशरीरेण तु अकर्तैव एवमयमात्मा सर्वव्यापारेष्वपेक्ष्यैव मनआदीनि करणानि कर्ता भवति स्वात्मना तु कर्तैवेति। न तु आत्मनस्तक्ष्ण इवावयवाः सन्ति यैः हस्तादिभिरिव वास्यादीनि तक्षा मनआदीनि करणान्यात्मोपाददीत न्यस्येद्वा।।

यत्तूक्तम् शास्त्रार्थवत्त्वादिभिर्हेतुभिः स्वाभाविकमात्मनः कर्तृत्वमिति तन्न विधिशास्त्रं तावद्यथाप्राप्तं कर्तृत्वमुपादाय कर्तव्यविशेषमुपदिशति न कर्तृत्वमात्मनः प्रतिपादयति न च स्वाभाविकमस्य कर्तृत्वमस्ति ब्रह्मात्मत्वोपदेशात् इत्यवोचाम तस्मादविद्याकृतं कर्तृत्वमुपादाय विधिशास्त्रं प्रवर्तिष्यते। कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः इत्येवंजातीयकमपि शास्त्रमनुवादरूपत्वाद्यथाप्राप्तमेवाविद्याकृतं कर्तृत्वमनुवदिष्यति। एतेन विहारोपादाने परिहृते तयोरप्यनुवादरूपत्वात्।

ननु संध्ये स्थाने प्रसुप्तेषु करणेषु स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते इति विहार उपदिश्यमानः केवलस्यात्मनः कर्तृत्वमावहति तथोपादानेऽपि तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय इति करणेषु कर्मकरणविभक्ती श्रूयमाणे केवलस्यात्मनः कर्तृत्वं गमयत इति अत्रोच्यते न तावत्संध्ये स्थानेऽत्यन्तमात्मनः करणविरमणमस्ति सधीः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति इति तत्रापि धीसंबन्धश्रवणात् तथा च स्मरन्ति इन्द्रियाणामुपरमे मनोऽनुपरतं यदि।

सेवते विषयानेव तद्विद्यात्स्वप्नदर्शनम् इति कामादयश्च मनसो वृत्तयः इति श्रुतिः ताश्च स्वप्ने दृश्यन्ते तस्मात्समना एव स्वप्ते विहरति विहारोऽपि च तत्रत्यो वासनामय एव न तु पारमार्थिकोऽस्ति तथा च श्रुतिः इवकारानुबद्धमेव स्वप्नव्यापारं वर्णयति उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् इति लौकिका अपि तथैव स्वप्नं कथयन्ति आरुक्षमिव गिरिश्रृङ्गम् अद्राक्षमिव वनराजिमिति तथोपादानेऽपि यद्यपि करणेषु कर्मकरणविभक्तिनिर्देशः तथापि तत्संपृक्तस्यैवात्मनः कर्तृत्वं द्रष्टव्यम् केवले कर्तृत्वासंभवस्य दर्शितत्वात् भवति च लोकेऽनेकप्रकारा विवक्षा योधा युध्यन्ते योधै राजा युध्यत इति।

अपि च अस्मिन्नुपादाने करणव्यापारोपरममात्रं विवक्ष्यते न स्वातन्त्र्यं कस्यचित् अबुद्धिपूर्वकस्यापि स्वापे करणव्यापारोपरमस्य दृष्टत्वात्।

यस्त्वयं व्यपदेशो दर्शितः विज्ञानं यज्ञं तनुते इति स बुद्धेरेव कर्तृत्वं प्रापयति विज्ञानशब्दस्य तत्र प्रसिद्धत्वात् मनोऽनन्तरं पाठाच्च तस्य श्रद्धैव शिरः इति च विज्ञानमयस्यात्मनः श्रद्धाद्यवयवत्वसंकीर्तनात् श्रद्धादीनां च बुद्धिधर्मत्वप्रसिद्धेः विज्ञानं देवाः सर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते इति च वाक्यशेषात् ज्येष्ठत्वस्य च प्रथमजत्वस्य बुद्धौ प्रसिद्धत्वात् स एष वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरक्रमो यद्यज्ञः इति च श्रुत्यन्तरे यज्ञस्य वाग्बुद्धिसाध्यत्वावधारणात्।

न च बुद्धेः शक्तिविपर्ययः करणानां कर्तृत्वाभ्युपगमे भवति सर्वकारकाणामेव स्वस्वव्यापारेषु कर्तृत्वस्यावश्यंभावित्वात् उपलब्ध्यपेक्षं त्वेषां करणानां करणत्वम् सा चात्मनः न च तस्यामप्यस्य कर्तृत्वमस्ति नित्योपलब्धिस्वरूपत्वात्। अहंकारपूर्वकमपि कर्तृत्वं नोपलब्धुर्भवितुमर्हति अहंकारस्याप्युपलभ्यमानत्वात् न चैवं सति करणान्तरकल्पनाप्रसङ्गः बुद्धेः करणत्वाभ्युपगमात्। समाध्यभावस्तु शास्त्रार्थवत्त्वेनैव परिहृतः यथाप्राप्तमेव कर्तृत्वमुपादाय समाधिविधानात्।

तस्मात्कर्तृत्वमप्यात्मन उपाधिनिमित्तमेवेति स्थितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसप्रकार शास्त्रार्थवत्त्व आदि हेतुओंसे जीवात्माका कर्तृत्व दिखलाया जा चुका है। किन्तु वह स्वाभाविक है अथवा उपाधि निमित्तक है, इसपर विचार किया जाता है। उस विचारमें इन शास्त्रार्थवत्त्व आदि हेतुओंसे स्वाभाविक कर्तृत्व है, क्योंकि उसका अपवादक कोई हेतु नहीं है। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - आत्मा में स्वाभाविक कर्तृत्व संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर आत्माका मोक्षाभाव प्रसंग होगा।

आत्माका कर्तृत्व स्वाभाविक होनेपर जैसे अग्निका औष्ण्यसे गोक्ष नहीं होता, वैसे ही आत्माका कर्तृत्वसे मोक्ष नहीं हो सकता। कर्तृत्वसे मुक्त न हुएके पुरुषार्थंकी सिद्धि नहीं होती, क्योंकि कर्तृत्व दुःखरूप है। परन्तु कर्तृत्व शक्तिकी स्थिति होनेपर भी कर्तृत्व कार्यके परिहारसे पुरुषार्थं सिद्ध हो जायगा और उसका परिहार कारणके परिहारसे हो जायगा। जैसे दाहशक्ति युक्त अग्निमें काष्ठ वियोगसे दहन कार्यका अभाव है, वैसे यहाँ भी समझना चाहिए।

परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि शक्तिरूप सम्बन्ध से सम्बद्ध निमित्तोंका अत्यन्त परिहार नहीं हो सकता। परन्तु मोक्ष साधनके विधानसे मोक्ष सिद्ध हो जायगा? नहीं, क्योंकि जो साधनके अधीन है वह अनित्य है, और नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त आत्मा के प्रतिपादनसे मोक्ष सिद्धि अभिमत है, उसप्रकार का आत्मप्रतिपादन स्वाभाविक कर्तृत्वमें नहीं हो सकता, इसलिए उपाधि धर्मके अध्याससे ही आत्मामें कर्तृत्व है स्वाभाविक नहीं है। जैसे कि ' ध्यायतीव ० ' ( मानो ध्यान करता है, मानो चलता है ) यह श्रुति है।

और ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं ० ' ( शरीर, इन्द्रिय और मनसे युक्तको विवेकी लोग भोक्ता संसारी कहते हैं ) इसप्रकार श्रुति उपाधि सम्बद्ध आत्मामें ही मोक्तृत्व आदि विशेष लाभ दिखलाती है। क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतिसे विवेकियोंको दृष्टिमें परब्रह्म से अन्य कर्ता भोक्ता नामका जीव नहीं है। तो इससे परमात्मा ही संसारी, कर्ता, भोक्ता है ऐसा प्रसक्त होगा।

चेतन युक्त कर्ता जीव यदि परमात्मासे अन्य हो तो बुद्धि आदि संघातसे व्यतिरिक्त न होगा, ऐसा नहीं, क्योंकि कर्तृत्व, मोक्तृत्व अविद्या से प्रत्युपस्थापित है, तथा ' यत्र हि द्वतमिव ० ' ( जिस अवस्था में द्वैत - सा होता है वहीं अन्य अन्यको देखता है ) इसप्रकार अविद्या अवस्थामें कर्तृत्व, भोक्तृत्व दिखलाकर ' यत्र त्वस्य ० ' ( किन्तु जहाँ इसके लिए सब आत्मा ही हो गया है वहाँ किसके द्वारा किसे देखे ) इसप्रकार विद्या अवस्थामें कर्तृत्व, मोक्तृत्वका श्रुति निवारण करती है।

उसी प्रकार स्वप्न और जागरित अवस्थामें आकाश में उड़नेवाले श्येनके श्रमके समान आत्माका उपाधिके सम्पर्कसे उत्पन्न हुए श्रमका श्रवण कराकर श्रुति सुषुप्ति में प्राज्ञ आत्मा के साथ सम्पर्क ऐक्य हुएका श्रमाभाव श्रवण कराती है - ' तद्वा ० ' ( इस ज्योतिः स्वरूप आत्माका आसकाम, आत्मकाम, अकाम और शोक शून्य स्वरूप है ) ऐसा आरम्भकर ' एषास्य ० ' ( यह इस पुरुषकी परगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परम लोक है, यह इसका परम आनन्द है ) ऐसा उपसंहार है।

इससे आचार्यने ' यथा च तक्षोमयथा ' यह कहा है। सूत्रस्थ यह ' च ' शब्द ' तु ' अर्थ में पठित है। और ऐसा नहीं मानना चाहिए कि अग्निकी उष्णताके समान आत्माका कर्तृत्व स्वाभाविक है।

परन्तु जैसे लोकमें बसुला आदि करण युक्त हाथ वाला तक्ष [ बढ़ई ] कर्ता होकर दुःखी होता है, वही अपने घर जाकर बसुला आदि करणोंसे विमुक्त हुआ स्वस्थ, शान्त, व्यापार शून्य और सुखी होता है, वैसे ही अविद्यासे प्रत्युपस्थापित द्वैतसे सम्बद्ध आत्मा स्वप्न और जागरित अवस्थाओं में कर्ता होकर दुःखी होता है, वह आत्मा उस श्रमको निवृत्त करनेके लिए स्वस्वरूप परब्रह्ममें प्रवेशकर कार्य - करण संघातसे मुक्त होता हुआ सुषुप्ति अवस्थामें अकर्ता होकर सुखी होता है।

उसी प्रकार मुक्ति अवस्था में भी व्यविद्या अन्धकारको विद्या प्रदीपसे निवृत्तकर आत्मा ही केवल शान्त और सुखी होता है। तक्ष दृष्टान्त इतने अंश में समझना चाहिए। तक्ष ही तक्षण [ छीलना ] आदि विशिष्ट व्यापारोंसे प्रतिनियत वसुला आदि करणोंकी अपेक्षासे ही कर्ता होता है, अपने शरीरसे तो अकर्ता ही है ; वैसे यह आत्मा समस्त व्यापारोंमें मन आदि करणोंकी अपेक्षासे ही कर्ता होता है, अपने स्वरूपसे तो अकर्ता ही है।

तक्षके समान आत्माके अवयव नहीं हैं जिससे कि जैसे तक्ष हस्त आदि द्वारा वसुला आदिका ग्रहण और त्याग करता है, वैसे आत्मा मी मन आदि करणोंका ग्रहण करे अथवा त्याग करे। जो यह कहा गया है कि शास्त्रार्थवत्त्व आदि हेतुओंसे आत्माका स्वाभाविक कर्तृत्व है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि विधि शास्त्र तो यथाप्राप्त [ लोक प्रसिद्ध ] कर्तृत्वको लेकर कर्तव्य विशेषका उपदेश करता है, आत्मामें कतृत्वका प्रतिपादन नहीं करता।

आत्माका कर्तृत्व स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि उसमें ब्रह्मात्मत्वका उपदेश है, ऐसा हम कह चुके हैं। इसलिए अविद्याकृत कर्तृत्व को लेकर विधि शास्त्र प्रवृत्त होगा। ' कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष : ' इसप्रकारका शास्त्र भी अनुवादरूप होनेसे यथाप्राप्त अविद्याकृत कतृत्वका ही अनुवाद करेगा। इससे विहार और उपादानका परिहार हुआ, क्योंकि वे भी अनुवादरूप हैं।

परन्तु स्वप्नावस्थामें करणोंके प्रसुप्त होने अपने शरीरमें यथेष्ट परिवर्तन करता है, इसप्रकार उपदेश किया हुआ विहार केवल आत्मामें कर्तृत्व को सिद्ध करता है, एवं उपादानमें मी ' तदेषां प्राणानां ० ' [ वह बुद्धिसे इन इन्द्रियोंकी शक्तिकी ग्रहण कर सोता है . ] इसप्रकार करणोंमें श्रयमाण कर्म और करण विभक्ति केवल आत्माका कर्तृत्व ज्ञात कराती .।

इसपर कहते हैं— स्वप्नावस्था में आत्माका करणोंसे अत्यन्त विराम नहीं हैं, क्योंकि ' सधीः स्वप्नो ० ' ( बुद्धि सहित स्वप्न होकर इस लोकका अतिक्रमण करता है ) इसप्रकार स्वप्नमें भी बुद्ध साथ सम्बन्धका श्रवण है। जैसे कि ' इन्द्रियाणामुपरमे ० ' ( इन्द्रियोंके उपरत होनेपर यदि मन उपरत न होकर विषयोंका सेवन करता है तो उसको स्वप्नदर्शन समझना चाहिए ) ऐसी स्मृति भी है, ' कामादयश्च मनसो वृत्तय : ' ( काम आदि मनकी वृत्तियाँ हैं ) ऐसी श्रुति है।

वे वृत्तियाँ स्वप्नमें देखी जाती हैं, इसलिए आत्मा स्वप्न में मन सहित ही विहार करता है। और स्वप्नावस्थाका विहार भी वासनामय ही है पारमार्थिक नहीं है। इसप्रकार ' उतेव स्त्रीभिः ० ' ( स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता हुआ, मित्रोंके साथ हँसता हुआ तथा व्याघ्र आदि से मय देखता हुआ रहता है ) यह श्रुति ' हव ' से अनुबद्ध ही स्वप्न व्यापारका वर्णन करती है। लोग भी उसी प्रकार स्वप्नका वर्णन करते हैं- मानो मैं गिरिके शिखरपर चढा, मानों मैंने वनपंक्ति देखीं '।

वैसे ही उपादान में भी यद्यपि करणोंमें द.मं विभक्ति और करण विभक्तिका निर्देश है, तो भी उनसे सम्बंधित आत्माका ही कर्तृत्व समझना चाहिए, क्योंकि केवल आत्मा में कतृत्वका असंभव दिखलाया गया है। ' योधा युद्ध करते हैं योधाओं द्वारा राजा युद्ध करता है ' इसतरह लोकमें अनेक प्रकारकी विवक्षा होती है और इस उपादानमें करण के व्यापारका विराममात्र विवक्षित है, किसीका स्वातन्त्र्य विवक्षित नहीं है, क्योंकि स्वप्न में अबुद्धिपूर्वकमी करणका व्यापार उपरम देखा जाता हैं।

' विज्ञानं यज्ञं तनुते ' ( विज्ञान यज्ञका विस्तार करता है ) यह जो व्यपदेश दिखलाया गया है, वह बुद्धि में कर्तृत्व प्राप्त कराता है, क्योंकि विज्ञानशब्द उसमें प्रसिद्ध है और मनके अनन्तर उसका पाठ है। ' तस्य श्रद्धैव शिरः ' ( उसका श्रद्धा ही शिर है ) विज्ञानमय आत्माके श्रद्धा आदि अवयव कहे गये हैं और श्रद्धा आदि बुद्धि के धर्मरूपसे प्रसिद्ध हैं। तथा ' विज्ञानं देवा : ' ० ( सब देव विज्ञानको ब्रह्मरूपसे, ज्येष्ठरूपसे उपासना करते हैं ) ऐसा वाक्यशेष है।

ज्येष्ठत्व और प्रथमजत्व बुद्धिमें प्रसिद्ध हैं, क्योंकि ' स वा एष ० ' ( जो वाणी और चित्तका उत्तरोत्तर क्रम है, वही यह यज्ञ है ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें यज्ञ वाणी और बुद्धिसे साध्य अवधारित होता है। करणोंमें कर्तृत्व स्वीकार करनेपर बुद्धिकी शक्तिका विपर्यय नहीं होता, क्योंकि सब कारकोंका अपने अपने व्यापारमें कर्तृत्व अवश्यंभावी है। परन्तु उन करणोंमें करणत्व उपलब्धिकी अपेक्षासे है और वह उपलब्धि आत्माकी है। उसमें इसका कर्तृत्व नहीं है, क्योंकि वह नित्य उपलब्धि स्वरूप है।

महङ्कार पूर्वक कर्तृत्व भी उपलब्धाका नहीं हो सकता, क्योंकि अहङ्कार भी उपलभ्यमान है। ऐसा होनेपर अन्य करणकी कल्पनाका प्रसङ्ग भी नहीं है, क्योंकि बुद्धिको करणरूपसे स्वीकृत किया गया है। समाधिके अभावका तो शास्त्रार्थवत्त्वसे ही परिहार किया जा चुका है, क्योंकि यथा प्राप्त कर्तृत्वको लेकर ही समाधि ( निदिध्यासितव्यः ) का विधान है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आत्मामें कर्तृत्व भी उपाधि निमित्त ही है॥ ४०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि विधि शास्त्र कर्ता के विना अनुपपन्न होता हुआ अपनी सार्थकता के लिए आत्मा में स्वाभाविक कर्तृत्व सिद्ध करता है। इसका समाधान ' तत्र ' आदिसे कहते हैं।

* जैसे ' योधा युध्यन्ते योधै राजा युध्यते ' यहाँ पहले योधाओं में कतृत्वकी विवक्षासे प्रथमा - कतृ - विभक्ति है, पुनः उनमें करणत्वकी विवक्षासे ' योध ' : ' तृतीया विभक्ति है। वैसे ही ' विज्ञानं यज्ञं तनुते ' यहाँ कर्तृत्व विवक्षा में ' विज्ञान ' पदमें प्रथमा है और ' तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय ' यहाँ करणत्वकी विवक्षा विज्ञानपदसे तृतीया विभक्ति है, पूर्वमें विज्ञान जीव है, ऐसा अङ्गीकार कर ' विज्ञानं यज्ञं तनुते ' यह श्रुति कही गई। अब उस श्रुतिसे उपाधि रहित आत्मामें कर्तृत्व प्राप्त होने पर यहाँ विज्ञानशब्द बुद्धिवाचक है, अतः उसमें कर्तृत्व है। आत्मामें तो बुद्धि उपाधिसे कर्तृत्व है स्वतः नहीं। ' स एष वाच : ० ' ( चित्तसे देवताका ध्यान कर वाणी द्वारा मन्त्र आदि उच्चारण किये जाते हैं और मन्त्रोंसे यज्ञ सम्पन होता है, इसप्रकार चित्त और वाणीका पूर्वोत्तरमाव ही यज्ञ है )।

# अखण्ड साक्षी चैतन्य बुद्धि वृत्तियोंसे भिन्न होता हुआ विषयावच्छिन्नरूपसे उत्पन्न होता है, विषयावच्छिन्न चैतन्यको उपलब्धिमें बुद्धि आदि करण हैं, इसलिए बुद्धि उपहित आत्मामें कर्तृत्व है, केवल आत्मामें नहीं। इस प्रकार बुद्धि विशिष्ट आत्मा में कर्तृत्व मानने से विशेषणीभूत जड़ बुद्धि में करणत्वकी उपपत्ति हो सकती है, अतः अन्य करणकी कल्पना युक्त नहीं है। हाँ, जो केवल बुद्धिको कर्त्री मानते हैं, उनको तो अन्य करणकी कल्पना दुर्वार है। अतः आत्मामें औपाधिक कर्तृत्वको लेकर विधि आदि शास्त्र प्रवृत्त होते हैं। इसलिए ' असङ्गत्व ' प्रतिपादक श्रुतियोंके साथ विधिद्वारा कर्तृत्व प्रतिपादकश्रुतियोंका कोई विरोध नहीं है। पूर्वपक्ष में आत्माका स्वाभाविक कर्तृत्व है, सिद्धान्त में औपाधिक कर्तृत्व है॥ ४०

परायत्ताधिकरणम्

2.3.41 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४१

सूत्र २.३.४१

परात् तु तच्छ्रुतेः ॥ २.३.४१ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 556

शाङ्करभाष्य

यदिदमविद्यावस्थायामुपाधिनिबन्धनं कर्तृत्वं जीवस्याभिहितम् तत्किमनपेक्ष्येश्वरं भवति आहोस्विदीश्वरापेक्षमिति भवति विचारणा। तत्र प्राप्तं तावत् नेश्वरमपेक्षते जीवः कर्तृत्व इति कस्मात् अपेक्षाप्रयोजनाभावात् अयं हि जीवः स्वयमेव रागद्वेषादिदोषप्रयुक्तः कारकान्तरसामग्रीसंपन्नः कर्तृत्वमनुभवितुं शक्नोति तस्य किमीश्वरः करिष्यति न च लोके प्रसिद्धरस्ति कृष्यादिकासु क्रियास्वनडुहादिवत् ईश्वरोऽपरोऽपेक्षितव्य इति।

क्लेशात्मकेन च कर्तृत्वेन जन्तून्संसृजत ईश्वरस्य नैर्घृण्यं प्रसज्येत विषमफलं च एषां कर्तृत्वं विदधतो वैषम्यम्। ननु वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् इत्युक्तम् सत्यमुक्तम् सति तु ईश्वरस्य सापेक्षत्वसंभवे सापेक्षत्वं च ईश्वरस्य संभवति सतोर्जन्तूनां धर्माधर्मयोः तयोश्च सद्भावः सति जीवस्य कर्तृत्वे तदेव चेत्कर्तृत्वमीश्वरापेक्षं स्यात् किंविषयमीश्वरस्य सापेक्षत्वमुच्येत। अकृताभ्यागमश्चैवं जीवस्य प्रसज्येत।

तस्मात्स्वत एवास्य कर्तृत्वमिति एतां प्राप्तिं तुशब्देन व्यावर्त्य प्रतिजानीते परादिति अविद्यावस्थायां कार्यकरणसंघाताविवेकदर्शिनो जीवस्याविद्यातिमिरान्धस्य सतः परस्मादात्मनः कर्माध्यक्षात्सर्वभूताधिवासात्साक्षिणश्चेतयितुरीश्वरात्तदनुज्ञया कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणस्य संसारस्य सिद्धिः तदनुग्रहहेतुकेनैव च विज्ञानेन मोक्षसिद्धिर्भवितुमर्हति कुतः तच्छ्रुतेः यद्यपि दोषप्रयुक्तः सामग्रीसंपन्नश्च जीवः यद्यपि च लोके कृष्यादिषु कर्मसु नेश्वरकारणत्वं प्रसिद्धम् तथापि सर्वास्वेव प्रवृत्तिष्वीश्वरो हेतुकर्तेति श्रुतेरवसीयते तथा हि श्रुतिर्भवति एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते।

एष ह्येवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते इति य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानमन्तरो यमयति इति च एवंजातीयका।। ननु एवमीश्वरस्य कारयितृत्वे सति वैषम्यनैर्घृण्ये स्याताम् अकृताभ्यागमश्च जीवस्येति नेत्युच्यत

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पदच्छेदे - परात्, तु, तच्छ्रुतेः।

सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द शङ्काकी निवृत्तिके लिए है, जीवका कर्तृत्व आदि स्वभावतः नहीं है, ( परात् ) परमात्मासे प्राप्त होता है, ( तच्छ्रतेः ) क्योंकि ' एष ह्येव ' इत्यादि श्रुतिमें ऐसा प्रतिपादित है।

अविद्या अवस्थामें जो यह उपाधि निमित्तक जीवमें कर्तृत्व कहा गया है, क्या वह ईश्वरकी अपेक्षाके विना होता है अथवा ईश्वरकी अपेक्षासे होता है, इस प्रकार विचार होता है। इसमें पूर्वपक्ष प्राप्त होता है— जीव अपने कर्तृत्वमें ईश्वरकी अपेक्षा नहीं करता, किससे? इससे कि अपेक्षाका प्रयोजन नहीं है। यह जीव स्वयं ही राग, द्वेष आदि दोषोंसे प्रयुक्त होता हुआ कारक सामग्री से सम्पन्न होकर कर्तृत्व अनुभव करने में समर्थ होता है। उसका ईश्वर क्या करेगा?

लोकमें ऐसी प्रसिद्धि नहीं है कि कृषि आदि क्रयाओं में अनडुह ( बैल ) आदिके समान ईश्वर अपेक्षितव्य है। क्लेशात्मक कर्तृत्वसे जन्तुओंको उत्पन्न करनेवाले ईश्वरमें नैघृण्य प्रसक्त होगा और इन प्राणियोंके विषम फलवाले कर्तृत्वको उत्पन्न करनेवाले ईश्वर में वैषम्य प्रसक्त होगा। परन्तु यह कहा जा चुका है कि ' वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् ' ( प्राणियों के कर्मकी अपेक्षासे ईश्वर में वैषम्य और नैघृण्य नहीं है ) ठीक, ऐसा कहा जा चुका है। परन्तु ईश्वरमें सापेक्षत्व होनेपर ही यह उपपन्न होगा।

प्राणियोंके धर्माधर्म होनेपर ईश्वर में सापेक्षत्व संभव है। जीवका कर्तृत्व होनेपर उनका ( धर्म और अधर्मका ) सद्भाव है। यदि वही कर्तृत्व ईश्वरकी अपेक्षासे हो तो ईश्वरका - सापेक्षत्व किस विषयका कहा जायगा। ऐसा होनेपर जीवको अकृताभ्यागम प्रसक्त होगा, इससे जीवका स्वतः ही कर्तृत्व है। इस पूर्वपक्षकी प्राप्तिको ' तु ' शब्द से निराकरण कर सूत्रकार प्रतिज्ञा करते हैं - ' परात् ' इत्यादि।

अविद्यावस्था में कार्य - करण संघातके साथ अभेददर्शी और अविद्यारूप अन्धकारसे अन्ध होते हुए जीवके कर्तृत्व, मोक्तृत्वरूप संसारकी सिद्धि कर्मोंके अध्यक्ष, सम्पूर्णं भूतोंके अधिष्ठान साक्षी, चेतयिता परमात्मा ईश्वरसे उसकी अनुज्ञाद्वारा है, उसके अनुग्रह हेतुक विज्ञानसे मोक्ष सिद्धि हो सकती है, किससे? इससे कि उसकी श्रुति है। यद्यपि राग आदि दोषोंसे प्रयुक्त एवं सामग्री सम्पन्न जीव है।

यद्यपि लोकमें कृषि आदि कर्मोंमें ईश्वर कारणरूपसे प्रसिद्ध नहीं है, तो मी सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंमें ईश्वर हेतु कर्ता ( प्रयोजककर्ता ) है, ऐसा श्रुतिसे निश्चित होता है। जैसे कि ' एष ० ' ( यही जिसको ऊपर ले जाना चाहता है उससे साधु कर्म कराता है और जिसको नीचे ले जाना चाहता है उससे यही अशुभ कर्म कराता है ) और ' य आत्मनि ० ' ( जो आत्मा में रहकर आत्माका नियमन करता है ) इस प्रकारकी श्रुतियाँ हैं॥४१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे चन्दन आदि सामग्रीके होनेपर धर्मके अभाव में सुखके अभावका यद्यपि ज्ञान नहीं होता, तो भी ' पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति ' ( बृह ० ३।२।१३ ) ( यह पुरुष पुण्य कर्मसे पुण्यशाली होता है ) इत्यादि शास्त्र प्रमाणसे सुखके प्रति धर्ममें हेतुता सिद्ध होती है, वैसे शास्त्रबलसे ईश्वर भी कारयिता सिद्ध होता है॥ ४१

2.3.42 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४२

सूत्र २.३.४२

कृतप्रयत्नापेक्षस् तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ॥ २.३.४२ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 557

पदच्छेद — कृतप्रयत्नापेक्षः , तु , विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है, ( विहित प्रतिषिद्धा वैयर्थ्यादिभ्यः ) वेदमें विहित और प्रतिषिद्ध कर्म व्यर्थं आदि न हों, इसलिए ईश्वर अपने कारयितृत्व में ( कृतप्रयत्नापेक्षः ) जीव कृत प्रयत्नकी अपेक्षा करता है।

शाङ्करभाष्य

तुशब्दश्चोदितदोषव्यावर्तनार्थः।

कृतो यः प्रयत्नो जीवस्य धर्माधर्मलक्षणः तदपेक्ष एवैनमीश्वरः कारयति अतश्चैते चोदिता दोषा न प्रसज्यन्ते जीवकृतधर्माधर्मवैषम्यापेक्ष एव तत्तत्फलानि विषमं विभजेत्पर्जन्यवत् ईश्वरो निमित्तत्वमात्रेण यथा लोके नानाविधानां गुच्छगुल्मादीनां व्रीहियवादीनां च असाधारणेभ्यः स्वस्वबीजेभ्यो जायमानानां साधारणं निमित्तं भवति पर्जन्यः न हि असति पर्जन्ये रसपुष्पफलपलाशादिवैषम्यं तेषां जायते नाप्यसत्सु स्वस्वबीजेषु एवं जीवकृतप्रयत्नापेक्ष ईश्वरः तेषां शुभाशुभं विदध्यादिति श्लिष्यते।

ननु कृतप्रयत्नापेक्षत्वमेव जीवस्य परायत्ते कर्तृत्वे नोपपद्यते नैष दोषः परायत्तेऽपि हि कर्तृत्वे करोत्येव जीवः कुर्वन्तं हि तमीश्वरः कारयति अपि च पूर्वप्रयत्नमपेक्ष्य इदानीं कारयति पूर्वतरं च प्रयत्नमपेक्ष्य पूर्वमकारयदिति अनादित्वात्संसारस्येति अनवद्यम्।

कथं पुनरवगम्यते कृतप्रयत्नापेक्ष ईश्वर इति विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः इत्याह एवं हि स्वर्गकामो यजेत ब्राह्मणो न हन्तव्यः इत्येवंजातीयकस्य विहितस्य प्रतिषिद्धस्य च अवैयर्थ्यं भवति अन्यथा तदनर्थकं स्यात् ईश्वर एव विधिप्रतिषेधयोर्नियुज्येत अत्यन्तपरतन्त्रत्वाज्जीवस्य तथा विहितकारिणमप्यनर्थेन संसृजेत् प्रतिषिद्धकारिणमप्यर्थेन ततश्च प्रामाण्यं वेदस्यास्तमियात् ईश्वरस्य च अत्यन्तानपेक्षत्वे लौकिकस्यापि पुरुषकारस्य वैयर्थ्यम् तथा देशकालनिमित्तानाम् पूर्वोक्तदोषप्रसङ्गश्च इत्येवंजातीयकं दोषजातमादिग्रहणेन दर्शयति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु इस प्रकार ईश्वरको कारयितृत्व होनेपर वैषम्य और नैघृण्य प्रसक्त होंगे और जीवको अकृभ्यागम प्रसक्त होगा। नहीं, ऐसा कहते हैं-

' तु ' शब्द शङ्कित दोषोंकी व्यवृत्तिके लिए है। जीवसे किया गया जो धर्माधर्मरूप प्रयत्न है उसकी अपेक्षा करनेवाला ईश्वर उसको कराता है, उससे वे शङ्कित दोष प्रसक्त नहीं होते। जीवकृत धर्माधर्मके वैषम्यको अपेक्षा करनेवाला ही ईश्वर मेंघके समान केवल निमित्तरूपसे तत् तत् फलों को विषमरूपसे विभक्त करता है। जैसे लोकमें अपने - अपने असाधारण बीजोंसे जायमान अनेक प्रकारके गुच्छ, गुल्म ( छोटी लताएँ ) व्रीहि, यव आदिके प्रति साधारण कारण पर्जन्य होता है।

पर्जन्यके न होनेपर उनमें रस, पुष्प, फल, पत्र आदिका वैषम्य उत्पन्न नहीं होता है। और अपने - अपने बीजके न होनेपर भी वैषम्य उत्पन्न नहीं होता, वैसे ही जीव कृत प्रयत्नकी अपेक्षा करनेवाला ईश्वर उनके शुभ और अशुभका विधान करे, यह युक्त है। परन्तु जीवका परमेश्वर अधीन कर्तृत्व होनेपर ईश्वरमें जीवकृत प्रयत्नकी अपेक्षा उपपन्न नहीं होती। यह दोष नहीं है, क्योंकि ईश्वरसे प्राप्त कर्तृत्व होनेपर भी जीव करता ही है, करते हुए उसको ईश्वर कराता है।

और पूर्व प्रयत्नकी अपेक्षाकर इस समय उसे कराता है, और पूर्वतर प्रयत्नकी अपेक्षाकर पूर्व में कराया, इस प्रकार संसारके अनादि होनेसे दोष नहीं है। परन्तु यह कैसे अवगत हो कि ईश्वर जीव कृत प्रयत्नको अपेक्षा करनेवाला है? ' विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ' ऐसा कहा है।

ऐसा होनेपर ' स्वर्गकामो यजेत ' ( स्वर्गकी कामना करनेवाला याग करे ) ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' ( ब्राह्मणका हनन नहीं करना चाहिए ) इसप्रकार के विहित और प्रतिषिद्ध व्यथं नहीं होते, अन्यथा वे निरर्थक हो जायँगे, ईश्वर ही विधि और प्रतिषेधमें नियुक्त करे, क्योंकि जीव अत्यन्त परतन्त्र है। वैसे [ वेद ] विहित कर्म करनेवालेका अनर्थके साथ और प्रतिषिद्ध करनेवालेका अर्थके साथ सम्बन्ध होने लग जायगा तो उसे वेदका प्रामाण्य अस्त हो जायगा।

ईश्वरकी अत्यन्त अनपेक्षा होनेपर लौकिक पुरुषार्थं भी व्यर्थ हो जायगा, वैसे ही देश, काल और निमित्तोंके पूर्वोक्त दोष प्रसङ्ग इसप्रकारके दोष समुदाय आदिके ग्रहणसे दिखलाते हैं॥४२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जीवोंको न किये कर्मो का फल भी भोगना पड़ेगा। ईश्वरमें वैषम्य और नैघृण्य दोष प्रसक्त होगा, इसलिए जीवकृत शुभाशुभ कर्मोकी अपेक्षा करनेवाले ईश्वर में कारयित्व होनेसे ' एष ह्येव साधुकर्म कारयति ' इत्यादि श्रुतिका ' स्वर्गकामो यजेत ' ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि विधि - प्रतिषेध श्रुतियोंके साथ कोई विरोध नहीं है॥४२

अंशाधिकरणम्

2.3.43 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४३

सूत्र २.३.४३

अंशो नानाव्यपदेशाद् अन्यथा चापि दाशकितवादित्वम् अधीयत एके ॥ २.३.४३ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 558

पदच्छेद — अंशः , नानाव्यपदेशात् , अन्यथा , च , अपि , दाशकितवादित्वम् , अधीयते , एके

सूत्रार्थ — ( अंशः ) जीव ईश्वरका कल्पित अंश है, ( नानाव्यपदेशात् ) क्योंकि ' य आत्मनि तिष्ठन् ' इत्यादि श्रुतिमें दोनोंका भेद व्यपदेश है, ( अन्यथा चापि ) और उसी प्रकार अन्यथा - अभेदका मी व्यपदेश है, कारण कि ( एके ) एक शाखावाले ( दाशकितवादित्वम् ) ' ब्रह्म दाशा ' इसप्रकार ब्रह्ममें दाश कितवत्व आदिका ( अधीयते ) पाठ करते हैं।

शाङ्करभाष्य

जीवेश्वरयोरुपकार्योपकारकभाव उक्तः स च संबद्धयोरेव लोके दृष्टः यथा स्वामिभृत्ययोः यथा वा अग्निविस्फुलिङ्गयोः ततश्च जीवेश्वरयोरप्युपकार्योपकारकभावाभ्युपगमात् किं स्वामिभृत्यवत्संबन्धः आहोस्विदग्निविस्फुलिङ्गवत् इत्यस्यां विचिकित्सायाम् अनियमो वा प्राप्नोति। अथवा स्वामिभृत्यप्रकारेष्वेव ईशित्रीशितव्यभावस्य प्रसिद्धत्वात्तद्विध एव संबन्ध इति प्राप्नोति।।

अतो ब्रवीति अंश इति जीव ईश्वरस्यांशो भवितुमर्हति यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गः अंश इवांशः न हि निरवयवस्य मुख्योंऽशः संभवति कस्मात्पुनः निरवयवत्वात् स एव न भवति नानाव्यपदेशात् सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानमन्तरो यमयति इति च एवंजातीयको भेदनिर्देशो नासति भेदे युज्यते।

ननु च अयं नानाव्यपदेशः सुतरां स्वामिभृत्यसारूप्ये युज्यत इति अत आह अन्यथा चापीति न च नानाव्यपदेशादेव केवलादंशत्वप्रतिपत्तिः किं तर्हि अन्यथा चापि व्यपदेशो भवत्यनानात्वस्य प्रतिपादकः तथा ह्येके शाखिनो दाशकितवादिभावं ब्रह्मण आमनन्त्याथर्वणिका ब्रह्मसूक्ते ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मैवेमे कितवाः इत्यादिना दाशा य एते कैवर्ताः प्रसिद्धाः ये च अमीदासाः स्वामिष्वात्मानमुपक्षपयन्ति ये च अन्ये कितवा द्यूतकृतः ते सर्वे ब्रह्मैव इति हीनजन्तूदाहरणेन सर्वेषामेव नामरूपकृतकार्यकरणसंघातप्रविष्टानां जीवानां ब्रह्मत्वमाह तथा अन्यत्रापि ब्रह्मप्रक्रियायामेवायमर्थः प्रपञ्च्यते त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी।

त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवति विश्वतोमुखः इति सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते इति च नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इत्यादिश्रुतिभ्यश्च अस्यार्थस्य सिद्धिः। चैतन्यं च अविशिष्टं जीवेश्वरयोः यथाग्निविस्फुलिङ्गयोरौष्ण्यम्। अतो भेदाभेदावगमाभ्यामंशत्वावगमः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जीव और ईश्वरका उपकार्य - उपकारक भाव कहा गया, और लोकमें वह सम्बद्धोंका ही देखा जाता है, जैसे स्वामी और सेवकका अथवा जैसे अग्नि और विस्फुलिङ्गका। उससे जोव और ईश्वरका भी उपकार्योपकारकभाव स्वीकार होनेसे क्या वह स्वामी और सेवकके समान है अथवा अग्नि और विस्फुलिङ्गके समान है? इसप्रकार संशय होनेपर अनियम प्राप्त होता है। अथवा स्वामी और सेवकके प्रकारोंमें जिस प्रकारका ईशितृ और ईशितव्यभाव प्रसिद्ध है उसी प्रकारका ही सम्बन्ध प्राप्त होता है।

इससे कहते हैं - ' अंश : ' इत्यादि। जीव ईश्वरका अंश हो सकता है, जैसे अग्निका विस्फुलिङ्ग। अंशके समान अंश है, कारण कि निरवयवका मुख्य अंश संभव नहीं है। परन्तु निरवयव होनेसे परमात्मा ही जीव क्यों नहीं होता है? ' नानाव्यपदेशात् ' ( भेदका व्यपदेश है ) ' सोऽन्वेष्टव्यः ० ' ( उसका अन्वेषण करना चाहिए और उसकी विशेष जिज्ञासा करनी चाहिए ) ' एतमेव ० ' ( उसीको जानकर मुनि होता है ) ' य आत्मनि ० ' ( जो आत्माके अन्तर रहकर आत्माका नियमन करता है ) इस प्रकारका भेदनिर्देश भेद न होनेपर नहीं घटता।

परन्तु यह भेदव्यपदेश स्वामी और सेवक सासुतरां घट सकता है। इसपर कहते हैं - ' अन्यथा चापि ' अन्य प्रकारसे भी। केवल भेदव्यपदेश से ही अंशत्व ज्ञान नहीं होता, किन्तु अन्य प्रकारसे मी अभेद प्रतिपादक व्यपदेश है। जैसे एक आथर्वण शाखावाले ' ब्रह्मदाशा ० ' ( ब्रह्म ही दाश धीवर हैं, ब्रह्म ही दास हैं ब्रह्म ही ये कितवजुआरी हैं ) इत्यादिसे ब्रह्मसूक्त में ब्रह्मके दारा और कितव आदि भावका कथन करते हैं। दाशा - जो ये कैवर्तरूपसे प्रसिद्ध हैं।

और ये जो दास हैं -- स्वामी के लिए अपनेको उपक्षय करते हैं। और जो अन्य कितव द्यूत करनेवाले हैं, वे सब ब्रह्म ही हैं। इसप्रकार हीन जन्तुओंके उदाहरण से नाम - रूपकृत कार्यकरण संघात में प्रविष्ट सभी जीवोंको ब्रह्म कहा है।

इसी प्रकार अन्यत्र ब्रह्म प्रकरणमें भी यही अर्थ विस्तृत किया जाता है - ' त्वं स्त्री ० ' ( तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू कुमार है अथवा कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर दण्डके सहारे चलता है, तू ही [ प्रपञ्चरूपसे ] उत्पन्न होकर अनेकरूप हो जाता है ) और ' सर्वाणि रूपाणि ० ' ( सत्र रूपोंका निर्माणकर नाम रखकर शब्द व्यवहार करता हुआ रहता है ) ' नान्यो ० ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतियोंसे उसी अर्थकी सिद्धि होती है।

जैसे अग्नि और विस्फुलिङ्गका औष्य समान है, वैसे जीव और ईश्वरका चैतन्य समान है। अतः भेद और अभेदके अवगमसे अंशत्वका अवगम होता है॥ ४३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * आत्मामें वित्यत्व, अकर्तृत्व आदि कहकर अब उसका ब्रह्मके साथ अभेद सिद्ध करते हैं, इसप्रकार हेतुहेतुमद्भाव संगति से इस अधिकरणका आरम्भ है। पूर्वपक्ष में प्रत्यक्से अभिन्न ब्रह्म असिद्ध है और सिद्धान्त में सिद्ध है, इसप्रकार दोनोंमें मेद है || ४३

2.3.44 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४४

सूत्र २.३.४४

मन्त्रवर्णात् ॥ २.३.४४ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 560

पदच्छेद — मन्त्रवर्णात् च

सूत्रार्थ — और ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ० ' इस मन्त्रसे जीवमें अंशत्व अवगम होता है।

शाङ्करभाष्य

मन्त्रवर्णश्चैतमर्थमवगमयति तावानस्य महिमा। ततो ज्याया््च पुरुषः। पादोऽस्य सर्वा भूतानि। त्रिपादस्यामृतं दिवि इति अत्र भूतशब्देन जीवप्रधानानि स्थावरजङ्गमानि निर्दिशति अहिंसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः इति प्रयोगात् अंशः पादो भाग इत्यनर्थान्तरम् तस्मादप्यंशत्वावगमः।। कुतश्च अंशत्वावगमः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जीवमें अंशका अवगम किससे होता है?

' तावानस्य ० ' ( उतनी ही इस ( गायत्र्याख्य ब्रह्म ) की महिमा है, तथा इससे भी निर्विकार पुरुष उत्कृष्ट है। सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका त्रिपाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है ) यह मन्त्रवर्णं उसी अर्थका अवगम कराता है। यहाँ श्रुति भूतशब्दसे जीवप्रधान स्थावर और जङ्गमोंका निर्देश करती है, क्योंकि ' अहिंसन् ० ' ( तीर्थों - शास्त्रोक्तं कर्मोंसे अन्यत्र सब भूतोंकी अहिंसा करता हुआ ) ऐसा प्रयोग है। अंश, पाद, माग इनका अन्य अर्थं नहीं है अर्थात् एकार्थं वाची शब्द हैं। इससे भी जीवमें अंशत्वका अवगम होता है॥ ४४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ' तावानस्य ० ' इस मन्त्र में भूतशब्द से ' भवन्तीति भूतानि ' इस व्युत्पत्ति से कार्यमात्रका ग्रहण है, क्योंकि ' भर्हिसन् सर्वभूतान्यन्यन्त्र ' इस मन्त्र में भूतशब्द प्राणीमात्रका वाचक है। यद्यपि ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ' इस मन्त्रमें भूतोंको पाद शब्दसे निर्देश किया गया है, तो भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि अंश, पाद, भाग एकार्थवाची शब्द हैं, इसलिए जीव ईश्वरका अंश है॥ ४४

2.3.45 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४५

सूत्र २.३.४५

अपि स्मर्यते ॥ २.३.४५ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 560

पदच्छेद — अपि च , स्मयंते

सूत्रार्थ — ( अपिच ) और ( स्मर्यते ) ' ममैवांशो ० ' इस स्मृतिमें भी जीव ईश्वरका अंश कहा गया है।

शाङ्करभाष्य

ईश्वरगीतास्वपि च ईश्वरांशत्वं जीवस्य स्मर्यते ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः इति तस्मादप्यंशत्वावगमः। यत्तूक्तम् स्वामिभृत्यादिष्वेव ईशित्रीशितव्यभावो लोके प्रसिद्ध इति यद्यप्येषा लोके प्रसिद्धिः तथापि शास्त्रात्तु अत्र अंशांशित्वमीशित्रीशितव्यभावश्च निश्चीयते निरतिशयोपाधिसंपन्नश्चेश्वरो निहीनोपाधिसंपन्नाञ्जीवान् प्रशास्तीति न किंचिद्विप्रतिषिध्यते।। अत्राह ननु जीवस्येश्वरांशत्वाभ्युपगमे तदीयेन संसारदुःखोपभोगेनांशिन ईश्वरस्यापि दुःखित्वं स्यात् यथा लोके हस्तपादाद्यन्यतमाङ्गतेन दुःखेन अङ्गिनो देवदत्तस्य दुःखित्वम् तद्वत् ततश्च तत्प्राप्तानां महत्तरं दुःखं प्राप्नुयात् अतो वरं पूर्वावस्थः संसार एवास्तु इति सम्यग्दर्शनानर्थक्यप्रसङ्गः स्यात् इति अत्रोच्यते

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और जीव में अंशत्वका अवगम किससे होता है?

' ममैवांशो ० ' ( इस जीव लोक ( देह ) में यह सनातन जीवात्मा मेरा अंश है ) इसप्रकार भगवद्लोके प्रसिद्ध इति, यद्यप्येषा लोके प्रसिद्धिस्तथापि शास्त्रात्त्वत्रांशांशित्वमीशित्रीशितव्यगीता में भी जीवको ईश्वरका अंश स्मरण किया जाता है। इससे भी अंशत्वका अवगम ( ज्ञान ) होता है। जो यह कहा गया है कि स्वामी और सेवकमें ईशितृ और ईशितव्यमाव लोकमें प्रसिद्ध है। यद्यपि लोक में ऐसी प्रसिद्धि है, तथापि यहाँ शास्त्र से अंशांशित्व, ईशितृ और ईशितव्यभाव निश्चय किया जाता है। निरतिशय उपाधि सम्पन्न ईश्वर हीन उपाधि सम्पन्न जीवोंपर शासन करता है, इसमें कुछ भी विरुद्ध नहीं है।।। ४५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अविद्यासे कल्पित भेदको लेकर जीव ईश्वरका अंशांशिभाव है। इसप्रकार शास्त्र और शासक भाव भी औपाधिक ही है। इस विषयमें सुरेश्वाराचार्यने भी कहा है-

ईशेशितव्यसम्बन्धः प्रत्यगज्ञानहेतुजः। सम्यग्ज्ञाने तमोध्वस्तावीश्वराणामपीश्वरः॥ ( ईश और ईशितव्यका सम्बन्ध प्रत्यगात्माके अज्ञान हेतुसे उत्पन्न होता है। सम्यग्ज्ञान होनेपर अज्ञानतमके ध्वस्त होनेसे वह ईश्वरोंका भी ईश्वर है )।। ४५

2.3.46 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४६

सूत्र २.३.४६

प्रकाशादिवत् तु नैवं परः ॥ २.३.४६ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 561

पदच्छेद — प्रकाशादिवत् , न , एवम् , परः

सूत्रार्थ — - जैसा जीवात्मा दुःखी होता है, ( एवम् ) वैसे ( परः ) परमात्मा ( प्रकाशादिवत् ) प्रकाश आदि समान ( न ) दुःखी नहीं होता।

शाङ्करभाष्य

यथा जीवः संसारदुःखमनुभवति नैवं पर ईश्वरोऽनुभवतीति प्रतिजानीमहे जीवो हि अविद्यावेशवशात् देहाद्यात्मभावमिव गत्वा तत्कृतेन दुःखेन दुःखी अहम् इति अविद्यया कृतं दुःखोपभोगम् अभिमन्यते नैवं परमेश्वरस्य देहाद्यात्मभावो दुःखाभिमानो वा अस्ति जीवस्याप्यविद्याकृतनामरूपनिर्वृत्तदेहेन्द्रियाद्युपाध्यविवेकभ्रमनिमित्त एव दुःखाभिमानः न तु पारमार्थिकोऽस्ति यथा च स्वदेहगतदाहच्छेदादिनिमित्तं दुःखं तदभिमानभ्रान्त्यानुभवति तथा पुत्रमित्रादिगोचरमपि दुःखं तदभिमानभ्रान्त्यैवानुभवति अहमेव पुत्रः अहमेव मित्रम् इत्येवं स्नेहवशेन पुत्रमित्रादिष्वभिनिविशमानः ततश्च निश्चितमेतदवगम्यते मिथ्याभिमानभ्रमनिमित्त एव दुःखानुभव इति।

व्यतिरेकदर्शनाच्च एवमवगम्यते तथा हि पुत्रमित्रादिमत्सु बहुषूपविष्टेषु तत्संबन्धाभिमानिष्वितरेषु च पुत्रो मृतो मित्रं मृतमित्येवमाघोषिते येषामेव पुत्रमित्रादिमत्त्वाभिमानस्तेषामेव तन्निमित्तं दुःखमुत्पद्यते न अभिमानहीनानां परिव्राजकादीनाम्। अतश्च लौकिकस्यापि पुंसः सम्यग्दशनार्थवत्त्वं दृष्टम् किमुत विषयशून्यादात्मनोऽन्यद्वस्त्वन्तरमपश्यतो नित्यचैतन्यमात्रस्वरूपस्येति तस्मान्नास्ति सम्यग्दर्शनानर्थक्यप्रसङ्गः ।

प्रकाशादिवदिति निदर्शनोपन्यासः प्रकाशः सौरश्चान्द्रमसो वा वियद्व्याप्य अवतिष्ठमानः अङ्गुल्याद्युपाधिसंबन्धात् तेषु ऋजुवक्रादिभावं प्रतिपद्यमानेषु तत्तद्भावमिव प्रतिपद्यमानोऽपि न परमार्थतस्तद्भावं प्रतिपद्यते यथा च आकाशो घटादिषु गच्छत्सु गच्छन्निव विभाव्यमानोऽपि न परमार्थतो गच्छति यथा च उदशरावादिकम्पनात्तद्गते सूर्यप्रतिबिम्बे कम्पमानेऽपि न तद्वान्सूर्यः कम्पते एवमविद्याप्रत्युपस्थापिते बुद्ध्याद्युपहिते जीवाख्ये अंशे दुःखायमानेऽपि न तद्वानीश्वरो दुःखायते।

जीवस्यापि दुःखप्राप्तिरविद्यानिमित्तैवेत्युक्तम्। तथा च अविद्यानिमित्तजीवभावव्युदासेन ब्रह्मभावमेव जीवस्य प्रतिपादयन्ति वेदान्ताः तत्त्वमसि इत्येवमादयः। तस्मान्नास्ति जैवेन दुःखेन परमात्मनो दुःखित्वप्रसङ्गः।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.३.४७ के अनुवादके साथ है।)

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.४७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.47 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४७

सूत्र २.३.४७

स्मरन्ति च ॥ २.३.४७ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 562

पदच्छेद — स्मरन्ति } च

सूत्रार्थ — और जीव दुःखसे परमेश्वर दुःखीं नहीं होता, इस विषयमें ' तत्र या परमात्मा ० ' यह स्मृति भी है। है, वैसे ' मैं ही पुत्र हूँ ' ' मैं ही मित्र हूँ ' इस प्रकार स्नेहवश पुत्र, मित्र आदिमें अभिनिवेश करता हुआ पुत्र, मित्र आदि विषयक दुःखका भी उनके अभिमान भ्रान्तिसे अनुभव . करता है। उससे यह निश्चित अवगत होता कि मिथ्याभिमान भ्रम निमित्तक ही दुःखका अनुभव है और व्यतिरेक दर्शनसे भी ऐसा अवगत होता है।

जैसे कि पुत्र, मित्र आदि परिवारवाले उनमें सम्बन्धके अभिमानी और उस सम्बन्ध अभिमान रहित बहुतोंके बैठे रहनेपर वहाँ ' पुत्र मरा, मित्र मरा ' इत्यादि उद्घोषित होनेपर उन्हें ही तन्निमित्तक दुःख उत्पन्न होता है जिन्हें पुत्र मित्र आदिमत्त्वका अभिमान है, उनके अभिमान रहित संन्यासी आदिको नही होता।

इससे लौकिक पुरुषका भी सम्यग्दर्शन सार्थक देखा जाता है, तो विषय शून्य आत्मासे भिन्न वस्तुको न देखनेवाले, नित्य चैतन्यमात्र स्वरूपमें स्थित पुरुषके विषय में कहना ही क्या है, इसलिए सम्यग्दर्शनका अनर्थक प्रसङ्ग नहीं है।

' प्रकाश आदिके समान ' यह दृष्टान्तका उपन्यास है - जैसे सूर्य अथवा चन्द्रमाका प्रकाश व्याकाशको व्याप्तकर अवस्थित होता हुआ अङ्गुलि आदि उपाधिके सम्बन्धसे उनमें ऋजु वक्रभाव प्राप्त होनेपर तत् तत् भाव - सा प्राप्त होता हुआ भी परमार्थसे तद्भावको प्राप्त नहीं होता, अथवा जैसे घट आदिके चलते होनेपर चलता हुआ - सा प्रतीयमान मी आकाश परमार्थसे नहीं चलता, अथवा जैसे जलपात्र आदिके कम्पनसे उद्गत सूर्य प्रतिविम्बके काँपने पर भी उस प्रतिविम्बवाला सूर्य नहीं काँपता है, वैसे अविद्या से प्रत्युपस्थापित बुद्धि आदि उपहित जीव नामक अंशके दुःखित - सा होनेपर भी उस अंशवाला ईश्वर दुःखी नहीं होता।

जीवकी दुःखप्राप्ति भी अविद्या निमित्तक ही है, ऐसा कहा जा चुका है। इस प्रकार ' तत्त्वमसि ' इत्यादि वेदान्त अविद्यानिमित्तक जीवभावका निरसन कर जीवके ब्रह्मभावका ही प्रतिपादन करते

शाङ्करभाष्य

स्मरन्ति च व्यासादयः यथा जैवेन दुःखेन न परमात्मा दुःखायत इति तत्र यः परमात्मा हि स नित्यो निर्गुणः स्मृतः। न लिप्यते फलैश्चापि पद्मपत्रमिवाम्भसा। कर्मात्मा त्वपरो योऽसौ मोक्षबन्धैः स युज्यते। स सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते पुनः इति। चशब्दात् समामनन्ति च इति वाक्यशेषः तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति इति एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः इति च।।

अत्राह यदि तर्ह्येक एव सर्वेषां भूतानामन्तरात्मा स्यात् कथमनुज्ञापरिहारौ स्यातां लौकिकौ वैदिकौ चेति। ननु च अंशो जीव ईश्वरस्य इत्युक्तम् तद्भेदाच्चानुज्ञापरिहारौ तदाश्रयावव्यतिकीर्णावुपपद्येते किमत्र चोद्यत इति उच्यते नैतदेवम् अनंशत्वमपि हि जीवस्याभेदवादिन्यः श्रुतयः प्रतिपादयन्ति तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि इत्येवंजातीयकाः।

ननु भेदाभेदावगमाभ्यामंशत्वं सिध्यतीत्युक्तम् स्यादेतदेवम् यद्युभावपि भेदाभेदौ प्रतिपिपादयिषितौ स्याताम् अभेद एव त्वत्र प्रतिपिपादयिषितः ब्रह्मात्मत्वप्रतिपत्तौ पुरुषार्थसिद्धेः स्वभावप्राप्तस्तु भेदोऽनूद्यते न च निरवयवस्य ब्रह्मणो मुख्योंऽशो जीवः संभवतीत्युक्तम् तस्मात्पर एवैकः सर्वेषां भूतानामन्तरात्मा जीवभावेनावस्थित इत्यतो वक्तव्या अनुज्ञापरिहारोपपत्तिः। तां ब्रूमः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यहाँ कहते हैं— जैसे लोकमें हाथ, पैर आदिमें से किसी एक अङ्गगत दुःखसे अङ्गी देवदत्तको दुःख होता है, वैसे जीवको ईश्वरका अंश स्वीकार करनेपर उसके संसार दुःख के उपभोग से अंशी ईश्वरको मी दुःख होगा। उससे उसे ( ब्रह्मको ) प्राप्त हुए जनोंको महान् दुःख ( समष्टि दुःख ) प्राप्त होगा। इसलिए पूर्वावस्था वाला संसार ही तो श्रेष्ठ है, इससे सम्यग्ज्ञानको निरर्थक प्रसङ्ग होगा। इसपर कहते हैं- -

जैसे जीव संसारदुःखका अनुभव करता है, वैसे परमेश्वर अनुभव नहीं करता, ऐसी हम प्रतिज्ञा करते हैं। जीव अविद्याके आवेशके बलसे देह आदिमें आत्मभाव - सा प्राप्त कर तत्कृत दुःखसे ' मैं दुःखी हूँ ' इस प्रकार अविद्याकृत दुःखके उपभोगका अभिमान करता है, वैसे परमात्माको देह आदिमें आत्मभाव अथवा दुःखाभिमान नहीं है। जीवका भी अविद्याकृत नाम रूपसे निवृत्त संपादित देह, इन्द्रिय आदि उपाधिके अविवेक भ्रमनिमित्तक ही दुःखाभिमान है पारमार्थिक नहीं है। जैसे अपने देहगत दाह छेदन आदि निमित्तक दुःखका उस देहके आत्माभिमानको भ्रान्तिसे अनुभव करता

' तत्र यः परमात्मा ० ' ( उन दोनोंमें जो परमात्मा है वह नित्य निर्गुण कहा गया है, जैसे कमलपत्र जलसे लिप्त नहीं होता, वैसे यह कर्मफलोंसे लिप्त नहीं होता है। और जो अन्य कर्मात्मा ( जीवात्मा ) है वह बन्ध और मोक्षसे युक्त होता है, वह इस सतरह राशिसे पुनः युक्त होता है ) इस प्रकार व्यास आदि कहते हैं कि जीव- सम्बन्धी दुःखसे परमात्मा दुःखी नहीं होता है। ' च ' शब्दसे ' समामनन्ति ' ( और श्रुतियाँ कहती हैं ) ऐसा वाक्यशेष है। ' तयोरन्यः ० ', ( उनमें एक उसके स्वादिष्ट फलोंको भोगता है और दूसरा उन्हें न भोगता हुआ देखता रहता है ) ' एकस्तथा ० ' ( उसीप्रकार सम्पूर्ण भूतका एक ही अन्तरात्मा संसारके दुःखसे लिप्त नहीं होता, किन्तु उससे बाहर रहता है ) ऐसी श्रुतियाँ हैं। ४७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते॥ पञ्चदशी १ - २३॥

* पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्रणा, मन और बुद्धि इस सतरह तत्त्वोंके समुदायको प्राप्त करना बन्ध है और ज्ञानद्वारा उनसे मुक्त होना मोक्ष है। यह जीवमें होता है, किन्तु नित्यमुक्त परमात्मामें नहीं।। ४७

2.3.48 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४८

सूत्र २.३.४८

अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज् ज्योतिरादिवत् ॥ २.३.४८ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 564

पदच्छेद — अनुज्ञापरिहारी , देहसम्बन्धात् , ज्योतिरादिवत्

सूत्रार्थ — ( अनुज्ञापरिहारौ ) ' मित्रं सेव्यम् ' ' शत्रुः परिहर्तव्य : ' इस प्रकार अनुज्ञा और परिहार एक आत्मामें भी ( देहसम्बन्धात् ) ) देहके साथ तादात्म्य सम्बन्धसे उपपन्न हैं, ( ज्योतिरादिवत् ) जैसे अग्नि एक होनेपर भी श्मशानकी अग्नि परिहरणीय है अन्य नहीं।

शाङ्करभाष्य

ऋतौ भार्यामुपेयात् इत्यनुज्ञा गुर्वङ्गनां नोपगच्छेत् इति परिहारः तथा अग्नीषोमीयं पशुं संज्ञपयेत् इत्यनुज्ञा न हिंस्यात्सर्वा भूतानि इति परिहारः एवं लोकेऽपि मित्रमुपसेवितव्यमित्यनुज्ञा शत्रुः परिहर्तव्य इति परिहारः एवंप्रकारावनुज्ञापरिहारौ एकत्वेऽप्यात्मनः देहसंबन्धात् स्यात्।

देहैः संबन्धो देहसंबन्धः कः पुनर्देहसंबन्धः देहादिरयं संघातोऽहमेव इत्यात्मनि विपरीतप्रत्ययोत्पत्तिः दृष्टा च सा सर्वप्राणिनाम् अहं गच्छामि अहमागच्छामि अहमन्धः अहमनन्धः अहं मूढः अहममूढः इत्येवमात्मिका न हि अस्याः सम्यग्दर्शनादन्यन्निवारकमस्ति प्राक्तु सम्यग्दर्शनात्प्रततैषा भ्रान्तिः सर्वजन्तुषु। तदेवमविद्यानिमित्तदेहाद्युपाधिसंबन्धकृताद्विशेषादैकात्म्याभ्युपगमेऽप्यनुज्ञापरिहाराववकल्पेते।

सम्यग्दर्शिनस्तर्ह्यनुज्ञापरिहारानर्थक्यं प्राप्तम् न तस्य कृतार्थत्वान्नियोज्यत्वानुपपत्तेः हेयोपादेययोर्हि नियोज्यो नियोक्तव्यः स्यात् आत्मनस्त्वतिरिक्तं हेयमुपादेयं वा वस्त्वपश्यन् कथं नियुज्येत न च आत्मा आत्मन्येव नियोज्यः स्यात्। शरीरव्यतिरेकदर्शिन एव नियोज्यत्वमिति चेत् न तत्संहतत्वाभिमानात् सत्यं व्यतिरेकदर्शिनो नियोज्यत्वम् तथापि व्योमादिवद्देहाद्यसंहतत्वमपश्यत एव आत्मनो नियोज्यत्वाभिमानः न हि देहाद्यसंहतत्वदर्शिनः कस्यचिदपि नियोगो दृष्टः किमुतैकात्म्यदर्शिनः।

न च नियोगाभावात् सम्यग्दर्शिनो यथेष्टचेष्टाप्रसङ्गः सर्वत्राभिमानस्यैव प्रवर्तकत्वात् अभिमानाभावाच्च सम्यग्दर्शिनः। तस्माद्देहसंबन्धादेवानुज्ञापरिहारौ ज्योतिरादिवत् यथा ज्योतिष एकत्वेऽप्यग्निः क्रव्यात्परिह्रियते नेतरः यथा च प्रकाश एकस्यापि सवितुरमेध्यदेशसंबद्धः परिह्रियते नेतरः शुचिभूमिष्ठः तथा भौमाः प्रदेशा वज्रवैडूर्यादय उपादीयन्ते भौमा अपि सन्तो नरकलेबरादयः परिह्रियन्ते तथा मूत्रपुरीषं गवां पवित्रतया परिगृह्यते तदेव जात्यन्तरे परिवर्ज्यते तद्वत्।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.३.४९ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यहाँ ' इदं मया कर्तव्यम् ( यह मुझे करना चाहिए ) ऐसी बुद्धि जिसमें हो वह नियोज्य कहा जाता है | भ्रान्ति अभावकाल ( सुषुप्ति ) में जब अज्ञानी भी नियोज्य नहीं है, तब आत्मवित् के विषयमें तो फिर जहना ही क्या है। अनात्मामें आत्माभिमान ही तो प्रवर्तक है, वह तत्त्ववित्का आत्मज्ञान से निवृत्त हो जाता है, अतः वह किससे भी प्रवृत्त्य नहीं है। जैसे - क्रव्यात् क्रव्यं मांसमत्ति इति क्रव्यात् अग्निः ' श्मशान अग्निका परिहार किया जाता है अन्यका नहीं, वैसे आत्मा एक होनेपर भी उपाधिके सम्बन्धसे अनुज्ञा और परिहारके योग्य होता है और उपाधि रहित होने से वह अनुज्ञा और परिहारसे मुक्त हो जाता है॥ ४८

2.3.49 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४९

सूत्र २.३.४९

असन्ततेश् चाव्यतिकरः ॥ २.३.४९ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.४९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 565

पदच्छेद — असन्वतेः , च , अव्यतिकरः

सूत्रार्थ — ( च ) परन्तु ( असन्ततेः ) जीवात्माका सब शरीरोंके साथ सम्बन्ध न होनेसे ( अव्यतिकर : ) कर्मफलका संकर नहीं होगा।

शाङ्करभाष्य

स्यातां नाम अनुज्ञापरिहारावेकस्यात्मनो देहविशेषयोगात् यस्त्वयं कर्मफलसंबन्धः स च ऐकात्म्याभ्युपगमे व्यतिकीर्येत स्वाम्येकत्वादिति चेत् नैतदेवम् असंततेः न हि कर्तुर्भोक्तुश्चात्मनः संततः सर्वैः शरीरैः संबन्धोऽस्ति उपाधितन्त्रो हि जीव इत्युक्तम् उपाध्यसंतानाच्च नास्ति जीवसंतानः ततश्च कर्मव्यतिकरः फलव्यतिकरो वा न भविष्यति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसपर हम कहते हैं - यदि एक ही सब भूतोंका अन्तरात्मा हो तो लौकिक और वैदिक विधि और निषेध कैसे होंगे? परन्तु ऐसा कहा जा चुका है कि जीव ईश्वरका अंश है। जीव और ईश्वरमें भेद होनेसे तदाश्रय अनुज्ञा ( विधि ) और परिहार ( प्रतिषेध ) असंकर होकर उपपन्न होंगे, तो यहाँ शङ्का किस प्रकार करते हो?

कहते हैं - यह ऐसा नहीं है, क्योंकि ' तत्सृष्ट्वा ० ' ( उसे उत्पन्न कर उसमें ही अनुप्रवेश किया ) ' नान्यो ० ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) ' मृत्योः स ० ' ( जो इसमें नाना - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इसप्रकारकी अभेद प्रतिपादक श्रुतियाँ जीवको अनंश प्रतिपादित करती हैं। परन्तु भेद और अभेदके अवगमसे अंशत्व सिद्ध होता है, ऐसा कहा गया है।

यह ऐसा होता यदि भेद और अभेद दोनोंका प्रतिपादन करना इष्ट होता, परन्तु अभेद ही यहाँ प्रतिपादित करना अभीष्ट है, क्योंकि ब्रह्मात्मत्व प्रतिपत्ति होनेपर पुरुषार्थं की सिद्धि है। अविद्याकृत भेदका तो केवल अनुवाद किया जाता है और यह भी कहा जा चुका है कि निरवयव ब्रह्मका मुख्य अंश जीव नहीं हो सकता। इसलिए एक परमात्मा ही सब भूतोंका अन्तरात्मा जीवरूपसें अवस्थित है, इससे अनुज्ञा और परिहारकी उपपत्ति कहनी चाहिए? उसको हम कहते हैं-

' ऋतौ मार्यामुपेयात् ' ( मासिक धर्मकी शुद्धि के अनन्तर स्त्रीके साथ गृहस्थ करना चाहिए ) यह विधि है और ' गुर्वङ्गनां ० ' ( गुरु पत्नी के साथ प्रसङ्ग नहीं करना चाहिए ) यह निषेध है। ' अग्नीषोमीयं ० ' ( अग्नीषोमीय पशुका वध करना चाहिए ) यह विधि है और ' न हिंस्यात् ० ' ( किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिए ) यह निषेध है।

इस प्रकार लोकमें मी ' मित्रमुपसेवितव्यम् ' ( मित्रका उपसेवन करना चाहिए ) यह विधि है और ' शत्रुः परिहर्तव्यः ' ( शत्रुका त्याग करना चाहिए ) यह निषेध है | इस प्रकारके विधि और प्रतिषेध आत्माके एक होनेपर भी देहके सम्बन्धसे होंगे। देहोंके साथ सम्बन्ध देह सम्बन्ध है | परन्तु देहसम्बन्ध क्या है?

यह देहादि संघात ' मैं ही हूँ ' इस प्रकार आत्मामें विपरीत प्रत्ययकी उत्पत्ति | वह ' मैं जाता हूँ, मैं आता हूँ, मैं अन्ध हूँ, मैं अन्ध नहीं हूँ, मैं मूढ हूँ, मैं मूढ नहीं हूँ, इस रूपसे सब प्राणियों में देखी जाती है। इसका सम्यग्दर्शनसे भिन्न निवारक नहीं है। तत्त्वज्ञान पूर्व यह भ्रान्ति सब प्राणियों में सन्तत ( निरन्तर ) है। इस कारण अविद्या निमित्त देह आदि उपाधिके सम्बन्ध से किये गये विशेष ( भेद ) से एकात्मत्व स्वीकार करनेपर भी विधि और प्रतिषेध हो सकते हैं।

तब सम्यग्दर्शीके विधि और प्रतिषेध व्यर्थ हो जायँगे। नहीं, क्योंकि वह कृतार्थं होनेसे नियोज्य नहीं हो सकता है, इसलिए हेय और उपादेय में ही नियोज्य नियुक्त करने योग्य होता है। परन्तु आत्मासे भिन्न हेय और उपादेय वस्तुको न देखता हुआ वह कैसे नियुक्त होगा? और आत्मा अपनेमें ही नियोज्य नहीं होता। यदि कहो कि शरीरसे पृथक् अपनेको जाननेवाला ही नियोज्य है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि देह आदि संघातमें अभिमान वाला है।

यद्यपि यह ठीक हैं कि देह आदि संघातसे मिन्न अपनेको जाननेवाला नियोज्य है, तथापि आकाश आदिके समान देह आदिसे असंहत अपनेको न जाननेवालेमें नियोज्यत्व अभिमान है। देह आदिसें असंहतत्व देखनेवाले किसीका भी नियोग नहीं देखा गया है, तब आत्मैकत्वदर्शीके विषय में तो कहना हो क्या है। नियोगके न होनेसे सम्यग्दर्शीमें यथेष्ट चेष्टाका प्रसङ्ग भी नहीं है, क्योंकि सर्वत्र अभिमान ही प्रवर्तक है सम्यदर्शमें अभिमान नहीं है। अतः देहके सम्बन्धसे ही ज्योति आदिके समान विधि और निषेध हैं।

जैसे ज्योति एक होनेपर मी क्रव्यात् अति ( श्मशानकी अग्नि ) का परिहार किया जाता है, अन्यका नहीं। अथवा जैव एक सूर्यका भी अपवित्र देश सम्बद्ध प्रकाश परिहृत होता है अन्य पवित्र भूमिस्थ प्रकाश परिहृत नहीं होता। और वज्र, वैडूर्य आदि भूमि प्रदेशोंका उपादान ( ग्रहण ) होता है, परन्तु नरकलेवर आदि मौम होते हुए भी परिहृत होते हैं। और जैसे गौका मूत्र और गोबर पवित्ररूपसे गृहीत होते हैं, वे ही अन्य जातिके त्याग किये जाते हैं। ऐसा यहाँ प्रकरणमें भी समझना चाहिए | ४८ |

आत्माके एक होनेपर मी देह विशेष सम्बन्धसे विधि और निषेध होंगे। परन्तु जो यह कर्मफल सम्बन्ध है उसका एक आत्माके स्वीकार करनेमें संकर हो जायगा, क्योंकि स्वामी एक है। ऐसा यदि कहो तो यह ऐसा नहीं हैं, क्योंकि असन्तति है। कर्ता भोक्ता आत्माका सब शरीरोंके साथ सन्तत सम्बन्ध नहीं है। यह कहा जा चुका है कि जीव उपाधिके अधीन है। उपाधिके सन्तत न होनेसे जीव भी सन्तत नहीं है। उससे कर्म संकर अथवा फलसंकर नहीं होगा॥ ४ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * तद्गुणसारत्वात् ' ( ब्र ० सू ० २।३।३० ) इस सूत्र से बुद्धि उपहित आत्माको ही कर्ता मोक्ता स्थापित किया गया है। देह भेदसे बुद्धि भेद, बुद्धि भेदसे कर्ता मोक्ताका भी भेद माना गया है। एक बुद्धिका दूसरे शरीर के साथ सम्बन्ध न होनेसे तदुपहितका भी सम्बन्ध नहीं है, अतः शरीर भेदसे जीवका भेद होनेपर कर्म अथवा कर्मफलका संकर नहीं होगा।। ४ ९

2.3.50 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५०

सूत्र २.३.५०

आमास एव च ॥ २.३.५० ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.५०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 566

पदच्छेद — आभासः " एव , च

सूत्रार्थ — ( च ) और ( आभास एव ) जीव परमात्माका अभास ही है, अतः कर्म अथवा कर्मफलका संकर नहीं है।

शाङ्करभाष्य

* आभास एव चैष जीवः परस्यात्मनो जलसूर्यकादिवत्प्रतिपत्तव्यः। न स एव साक्षात्। नापि वस्त्वन्तरम्। अतश्च यथा नैकस्मिञ्जलसूर्यके कम्पमाने जलसूर्यकान्तरं कम्पते, एवं नै कस्मिञ्जीवे कर्मफलसंबन्धिनि जीवान्तरस्य तत्संबन्धः। एवमप्यव्यतिकर एव कर्मफलयोः। आभासस्य चाविद्याकृतत्वात्तदाश्रयस्य संसारस्याविद्याकृतत्वोपपत्तिरिति, तद्व्युदासेन च पारमार्थिकस्य ब्रह्मात्मभावस्योपदेशोपपत्तिः। येषां तु बहव आत्मनस्तेच सर्वे सर्वगतास्तेषामेवैष व्यतिकरः प्राप्नोति। कथम्?

बहदो विभवश्वात्मानश्चैतन्यमात्रस्वरूपा निगुणा निरतिशयाश्च। तदर्थं साधारणं प्रधानं तन्निमित्तैषां भोगापवर्गसिद्धिरिति सांख्याः। सति बहुत्वे विभुत्वे च घटकुड्यादिसमाना द्रव्यमात्रस्वरूपाः स्वतोऽचेतना आत्मानस्तदुपकरणानि चाणूनि मनांस्यचेतनानि। तत्रात्मद्रव्याणां मनोद्रव्याणां च संयोगान्नवेच्छादयो वैशेषिका आत्मगुणा उत्पद्यन्ते। ते चाव्यतिकरेण प्रत्येकमात्मसु समवयन्ति स संसारः। तेषां नवानामात्मगुणानामत्यन्तानुत्पादो मोक्ष इति काणादाः।

तत्र सांख्यानां तावच्चैतन्य स्वरूपत्वात्सर्वात्मनां संनिधानाद्यविशेषाच्चै कस्य सुखदुःखसंबन्धे सर्वेषां सुखदुःखसंबन्धः प्राप्नोति। स्यादेतत् - प्रधानप्रवृत्तेः पुरुषकैवल्यार्थत्वाद् व्यवस्था भविष्यति। अन्यथा हि स्वविभूतिख्यापनार्था प्रधानप्रवृत्तिः स्यात्। तथा चानिर्मोक्षः प्रसज्येतेति। नैतत्सारम्, नह्यभिलषित सिद्धिनिबन्धना व्यवस्था शक्या विज्ञातुम्। उपपत्त्या तु कयाचिद्व्यवस्थोच्येत।

असत्यां पुनरुपपत्तौ कामं मा भूदभिलषितं पुरुषकैवल्यम्, प्राप्नोति तु व्यवस्थाहेत्वभावाद्व्यतिकरः। काणादानामपि यदैकेनात्मना मनः संयुज्यते, तदाऽऽत्मान्तरैरपि नान्तरीयकः संयोगः स्यात्संनिधानाद्यविशेषात्। ततश्च हेत्व विशेषात्फला विशेष इत्येकस्यात्मनः सुखदुःखयोगे सर्वात्मनामपि समानं सुखदुःखित्वं प्रसज्येत॥ ५०

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जगत सूर्य प्रतिबिम्ब आदिके समान यह जीव परमात्माका आभास - प्रतिबिम्ब ही समझना चाहिए। वह साक्षात् परमात्मा ही नहीं है और अन्य वस्तु मी नहीं है, इससे जैसे एक जलसूर्यक ( जलगत सूर्य प्रतिबिम्ब ) के काँपनेपर अन्य जलसूयंक नहीं काँपता है, वैसे ही एक जीव कर्मफल सम्बन्धी होनेपर अन्य जीवका उस ( कर्मफल ) के साथ सम्बन्ध नहीं होता।

इस प्रकार भी कमं और फलका असंकर ही है और आभास अविद्याकृत होनेसे उसके आश्रित संसारमें भी अविद्याकृतत्व उपपन्न है उसके निराकरण से पारमार्थिक ब्रह्मात्वभावका उपदेश उपपन्न होता है। परन्तु जिनके मत आत्मा अनेक हैं और वे सब सर्वगत ( व्यापक ) हैं उनके मतमें ही यह संकर प्राप्त होता है। किस प्रकार? आत्मा बहुत, विभु, चैतन्यमात्र स्वरूप, निर्गुण और निरतिशय हैं, उनके लिए प्रधान साधारण हैं, तन्निमित्तक उनका मोग और अपवगं सिद्ध होता है, ऐसा सांख्य मानते हैं।

आत्मा अनेक और विभू होने पर घट, कोठरी आदिके समान द्रव्यमात्र स्वरूप, स्वत : आत्मा अचेतन हैं और उनके उपकरण मन अणु और अचेतन हैं। उनमें आत्मद्रव्य और मनोद्रव्य के संयोग से इच्छा आदि नौ आत्माके विशेष गुण उत्पन्न होते हैं। वे संकरके विना प्रत्येक आत्मामें समवायसम्बन्धसे रहते हैं वह संसार है, और उन नौ आत्मगुणोंकी अत्यन्त अनुत्पत्ति मोक्ष है, ऐसा काणाद मानते हैं।

उनमें सांख्योंके मतमें चैतन्यस्वरूप होने से सब आत्माओंके संनिधान आदिके अविशेष होनेके कारण एक आत्माके सुख दुःखके साथ सम्बन्ध होनेपर सबको सुख दुःखका सम्बन्ध प्राप्त होता है। ऐसा ही हो, परन्तु प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुषके कैवल्य के लिए होनेसे [ सुख - दुःखकी ] व्यवस्था हो जायगो, अन्यथा प्रधानकी प्रवृत्ति अपनी विभूति प्रसिद्धि के लिए होगी, तो इससे मोक्षाभाव प्रसक्त होगा।

यह युक्त नहीं है, क्योंकि अभिलषित सिद्धिके अधीन व्यवस्था अवगत नहीं हो सकती, यदि कहो कि किसी उपपत्ति से व्यवस्था हो जायगी, तो उपपत्तिके न होनेपर यथेष्ट अभिलषित पुरुष कैवल्य नहीं होगा, अपितु व्यवस्थाका हेतु न होनेसे संकर प्राप्त होता है। कणाद अनुयायियों के मतमें भी जब एक आत्माके साथ मनका संयोग होता है, तब अन्य आत्माओंके साथ भी अवश्य संयोग होगा, क्योंकि निधन आदि समान हैं।

उससे हेतु ( मन संयोग ) के अविशेष होने से फल मी अविशेष ( समान ) होगा, तो इस प्रकार एक आत्मामें सुख - दुःखका सम्बन्ध होनेपर सब आत्माओं में भी समान सुख दुःख प्रसक्त होंगे।। ५०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे घटाकाश घट उपाधिसे महाकाशका अंश - सा है, वैसे जीव बुद्धि उपाधि से परमात्माका अंश - सा है, यह कहा जा चुका है। परन्तु इस अवच्छेदवादमें अरुचि प्रदर्शित करनेके लिए ' एव ' और ' एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥

' ( क ० २२४ ९ ) इत्यादि श्रुति सिद्ध प्रतिबिम्बवादको सूचित करनेके लिए भगवान् सूत्रकारने ' आभास एव च ' इस सूत्र में ' आभास ' पद दिया है | अनुपहित परमात्मा जीव नहीं हो सकता है, क्योंकि उपाधिका अनुभव होता है और जीव परमात्मासे भिन्न भी नहीं है, क्योंकि ' स एष इह प्रविष्टः ' ( बृह ० १ ४ ०७ ) इत्यादि अभेद प्रतिपादक श्रुतिसे विरोध होता है, अतः अविद्या, तत्कार्यं बुद्धिमें परमात्माका प्रतिबिम्ब ही जीव है। वैशेषिक मतमें आत्मा अनेक जड़ और द्रव्य हैं, और मन जड़ अनेक और द्रव्य हैं।

उन दोनोंके संयोगसे आत्मामें बुद्धि ( ज्ञान ) इच्छा, प्रयत्न, सुख, दुःख, द्वेष, धर्म, अधर्म और भावना नामका संस्कार ये नौ विशेष गुण उत्पन्न होते हैं। इनसे आत्माको संसार होता है।

जब सब पदार्थोंका तत्त्वज्ञान होता है तो पुनः ये गुण उत्पन्न नहीं होते यही आत्माका मोक्ष है अर्थात् इनके मतमें श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण और मन ये छः इन्दियाँ, छः उनके विषय, छः विषयोंके ज्ञान, सुख, दुःख और शरीर, इस प्रकार इक्कीस दुःखोंका ध्वंसरूप मोक्ष है उनके मतमें भी आत्मा सर्वगत होनेसे कर्मफलका संकर प्राप्त होता है॥५०

2.3.51 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५१

सूत्र २.३.५१

अदृष्टानियमात् ॥ २.३.५१ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.५१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 567

सूत्रार्थ — अदृष्ट के नियम न होनेसे कर्मफलका संकर हो I

शाङ्करभाष्य

बहुष्वात्मस्वाकाशवत्सर्वगतेषु प्रतिशरीरं बाह्याभ्यन्तराविशेषेण संनिहितेषु मनोवाक्कायैर्धर्माधर्मलक्षणमदृष्टमुपार्ज्यते। सांख्यानां तावत् तदनात्मसमवायि प्रधानवर्ति। प्रधानसाधारण्यान्न प्रत्यात्मं सुखदुःखोपभोगस्य नियामकमुपपद्यते। काणादानामपि पूर्ववत्साधारणेनात्ममनःसंयोगेन निर्वर्तितस्यादृष्टस्यापि अस्यैवात्मन इदमदृष्टमिति नियमे हेत्वभावादेष एव दोषः।। स्यादेतत् अहमिदं फलं प्राप्नवानि इदं परिहराणि इत्थं प्रयतै इत्थं करवाणि इत्येवंविधा अभिसंध्यादयः प्रत्यात्मं प्रवर्तमाना अदृष्टस्यात्मनां च स्वस्वामिभावं नियंस्यन्तीति नेत्याह

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह हो कि अदृष्ट निमित्तक नियम हो जायगा, इसपर कहते हैं कि ऐसा नहीं -

आकाशके समान सर्वगत प्रत्येक शरीर में अन्तर बाहर समानरूपसे संनिहित अनेक आत्माओं में मन, वाणी और शरीर द्वारा धर्माधर्मरूप अदृष्ट उपार्जन किया जाता है। सांख्यों के मत में वह मदृष्ट अनात्मसमवायी प्रधानवतीं है। प्रधानके साधारण होनेसे प्रत्येक आत्मामें वह सुख दुःखके उपभोगका नियामक उपपन्न नहीं होता। काणादोंके मतमें भी पूर्वके समान साधारण आत्मा और मनके संयोग से संपादित अदृष्टके ' यह अदृष्ट इसी आत्माका है ' इस नियममें हेतुके न होनेसे यही दोष है॥ ५१

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.५३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.52 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५२

सूत्र २.३.५२

अभिसन्ध्यादिष्व् अपि चैवम् ॥ २.३.५२ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.५२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 568

पदच्छेद — अभिसन्ध्यादिषु , च , एवम्

सूत्रार्थ — ( अभिसन्ध्यादिष्वपि ) संकल्प आदिमें मी ( चैवम् ) अदृष्टका नियामकत्व नहीं है, अतः पूर्वोक्त दोष वैसे ही है।

शाङ्करभाष्य

अमिसंध्यादीनामपि साधारणेनैवात्ममनःसंयोगेन सर्वात्मसंनिधौ क्रियमाणानां नियमहेतुत्वानुपपत्तेरुक्तदोषानुषङ्ग एव।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा हो परन्तु मैं इस फलको प्राप्त करूँ, इसका परिहार करूँ, इसप्रकार प्रयत्नकर ऐसा करूँ ’ इसप्रकारके संकल्प आदि प्रत्येक में प्रवर्तमान होते हुए अदृष्ट और आत्माके स्वस्वमिभावका नियमन करेंगे। नहीं, ऐसा कहते हैं-

साधारण आत्ममन संयोगसे सम्पूर्ण आत्मायोंकी संनिधिमें उत्पन्न किये हुए संकल्प आदिमें मी नियमका हेतुत्व नहीं हो सकता, अतः उक्त - अनियम दोष तदवस्थ ही है॥ ५२

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.३.५३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.3.53 · द्वितीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५३

सूत्र २.३.५३

प्रदेशभेदाद् इति चेन् नान्तर्भावात् ॥ २.३.५३ ॥

द्वितीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र २.३.५३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 568

पदच्छेद — प्रदेशात् , इति , चेत् , न , अन्तर्भावात्

सूत्रार्थ — ( प्रदेशात् ) आत्माओंके विभु होनेपर भी शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेश में मन संयोग हो, उसी आत्मप्रदेशसे संकलन आदिका नियम होगा, ( इति चेन्न ) ऐसा नहीं, ( अन्तर्भावात् ) क्योंकि सब शरीरोंमें उन आत्माओंका अन्तर्भाव है, अतः उक्त दोष ज्योंका त्यों है।

शाङ्करभाष्य

अथोच्येत विभुत्वेऽप्यात्मनः शरीरप्रतिष्ठेन मनसा संयोगः शरीरावच्छिन्न एव आत्मप्रदेशे भविष्यति अतः प्रदेशकृता व्यवस्था अभिसंध्यादीनामदृष्टस्य सुखदुःखयोश्च भविष्यतीति तदपि नोपपद्यते कस्मात् अन्तर्भावात् विभुत्वाविशेषाद्धि सर्व एवात्मानः सर्वशरीरेष्वन्तर्भवन्ति तत्र न वैशेषिकैः शरीरावच्छिन्नोऽप्यात्मनः प्रदेशः कल्पयितुं शक्यः कल्प्यमानोऽप्ययं निष्प्रदेशस्यात्मनः प्रदेशः काल्पनिकत्वादेव न पारमार्थिकं कार्यं नियन्तुं शक्नोति शरीरमपि सर्वात्मसंनिधावुत्पद्यमानम् अस्यैव आत्मनः नेतरेषाम् इति न नियन्तुं शक्यम्।

प्रदेशविशेषाभ्युपगमेऽपि च द्वयोरात्मनोः समानसुखदुःखभाजोः कदाचिदेकेनैव तावच्छरीरेणोपभोगसिद्धिः स्यात् समानप्रदेशस्यापि द्वयोरात्मनोरदृष्टस्य संभवात् तथा हि देवदत्तो यस्मिन्प्रदेशे सुखदुःखमन्वभूत् तस्मात्प्रदेशादपक्रान्ते तच्छरीरे यज्ञदत्तशरीरे च तं प्रदेशमनुप्राप्ते तस्यापि इतरेण समानः सुखदुःखानुभवो दृश्यते स न स्यात् यदि देवदत्तयज्ञदत्तयोः समानप्रदेशमदृष्टं न स्यात्।

स्वर्गाद्यनुपभोगप्रसङ्गश्च प्रदेशवादिनः स्यात् ब्राह्मणादिशरीरप्रदेशेष्वदृष्टनिष्पत्तेः प्रदेशान्तरवर्तित्वाच्च स्वर्गाद्युपभोगस्य। सर्वगतत्वानुपपत्तिश्च बहूनामात्मनाम् दृष्टान्ताभावात् वद तावत् त्वम् के बहवः समानदेशाश्चेति रूपादय इति चेत् न तेषामपि धर्म्यंशेनाभेदात् लक्षणभेदाच्च न तु बहूनामात्मनां लक्षणभेदोऽस्ति अन्त्यविशेषवशाद्भेदोपपत्तिरिति चेत् न भेदकल्पनाया अन्त्यविशेषकल्पनायाश्च इतरेतराश्रयत्वात् आकाशादीनामपि विभुत्वं ब्रह्मवादिनोऽसिद्धम् कार्यत्वाभ्युपगमात्।

तस्मादात्मैकत्वपक्ष एव सर्वदोषाभाव इति सिद्धम्।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यदि ऐसा कहा जाय कि आत्माके विभू होनेपर भी शरीर में स्थित मनके साथ उसका संयोग शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेशमें ही होगा, इससे संकल्प आदिकी, अदृष्टकी, सुख दुःखको प्रदेशकृत व्यवस्था होगी, वह भी उपपन्न नहीं है, किससे? इससे कि उनका अन्तर्भाव है। सब आत्माओंका विभूत्व समान होनेसे सब शरीरोंमें अन्तर्भाव है। इसप्रकार सब आत्माओंका समस्त शरीरोंमें अन्तर्भाव होनेपर वैशेषिक लोग शरीरावच्छिन्न प्रदेशकी भी आत्मामें कल्पना नहीं कर सकते।

निष्प्रदेश- निरवयव आत्मामें कल्पित किया हुआ यह प्रदेश मी काल्पनिक होनेसे पारमार्थिक कार्यके नियमन करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। सब आत्माओं की संनिधिमें उत्पन्न हुआ शरीर भी इसी आत्माका है अन्योंका नहीं है, ऐसा नियम नहीं किया जा सकता। प्रदेश विशेष स्वीकार करनेपर भी समान सुख दुःखके भागी दो आत्माओं का उपभोग कदाचित् एक ही शरीरसे सिद्ध हो जायगा, क्योंकि दो आत्माओंका अदृष्ट एक प्रदेशमें मी संभव है।

जैसे कि जिस प्रदेशमें देवदत्तने सुख दुःखका अनुभव किया उसका शरीर उस प्रदेशसे दूर हो और यज्ञदत्तका शरीर उस प्रदेश में प्राप्त हो, तो उसको भी दूसरेके समान सुख दुःखका अनुभव देखा जाता है, वह अनुभव यदि देवदत्त और यज्ञदत्तका अदृष्ट समान प्रदेश वाला न हो तो नहीं होगा। और प्रदेशवादीको स्वर्ग आदिके अनुपभोगका प्रसङ्ग आ जायगा, क्योंकि ब्राह्मण आदि शरीर प्रदेशों में अदृष्ट निष्पन्न होता है और स्वर्ग आदि उपभोग प्रदेशान्तरवर्ती है।

अनेक आत्माओंका सर्वगत होना युक्त नहीं है, कारण कि इसमें दृष्टान्त नहीं है। तुम कहो तो बहुत और समान प्रदेशवाले कौन - से पदार्थं हैं? यदि कहो कि रूप आदि हैं, तो युक्त नहीं है, क्योंकि उनका भी धर्मीके अंशरूपसे अभेद और लक्षणमें भेद है। परन्तु बहुत आत्माओं में लक्षण भेद नहीं है। यदि कहो कि अन्त्यविशेष के बलसे भेदकी उपपत्ति है तो यह ठीक नहीं है, कारण कि भेद कल्पना और अन्त्यविशेषकी कल्पनामें अन्योन्याश्रय है।

ब्रह्मवादीके मतमें आकाश आदिका भी विभुत्व असिद्ध है, क्योंकि उनमें कार्यत्व स्वीकार है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आत्माके एकत्व पक्षमें ही सब दोषोंका अभाव है || ५३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि कहो कि रूप आदि अनेक समान प्रदेशवाले हैं? कारण कि घट आदि में सब विद्यमान हैं, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह दृष्टान्त हमें सम्मत नहीं है। रूप तेजोमात्र है, रस जलमात्र है और गन्ध पृथिवीमात्र है, इस प्रकार तत् तत् गुण स्व स्व धर्मीके अंशरूपसे धर्मी से अभिन्न हैं, अतः तेज आदि धर्मी से भिन्न घटका अभाव है।

इस प्रकार आत्मामें लक्षण भेद न होनेसे भेद नहीं है | अतः ' देवदत्तात्मा यज्ञदत्तात्मनो न भिन्नः, आत्मत्वात् यज्ञदत्तात्मवत् ' ( देवदत्तका आत्मा यज्ञदत्तात्मासे भिन्न नहीं है, क्योंकि आत्मा है, जैसे यज्ञदत्तका आत्मा ) यद्यपि आत्माओं में लक्षण भेद न होनेसे भेद सिद्ध नहीं होता, तो भी अन्त्यविशेषके भेदसे भेद सिद्ध हो जायगा।

यह भी युक्त नहीं है, कारण कि आत्माका भेद सिद्ध हो तो विशेष सिद्ध हो, विशेष सिद्ध हो तो आत्मभेद सिद्ध हो, इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष है, इसलिए आत्मामें भेद असिद्ध है। यदि अनेक आत्माओंके विभु होनेमें आकाश, दिक् आदिका दृष्टान्त उपस्थित करो तो वेदान्तसिद्धान्तमें सम्मत नहीं है, कारण ि ' आत्मन आकाशः संभूतः ' इत्यादि श्रुति में आकाश आदिकी उत्पत्ति कही गई है।

कार्य अनित्य और परिच्छिन्न होता है विभु नहीं, अतः आत्माको एक और विभू स्वीकृत करनेसे उक्त दोष नहीं होंगे, क्योंकि बुद्धि आदि उपाधि से ये सब व्यवहार उपपन्न होते हैं, इस प्रकार भूत और मोक्तृत्व आदि श्रुतियोंका विरोध न होनेपर अद्वितीय ब्रह्ममें समन्वय सिद्ध होता है।। ५३

उपसंहार

इन सूत्रों का सार यह है कि दृश्य जगत के गुण और तत्व परिवर्तनशील एवं नाशवान हैं, जबकि आत्मा नित्य और अपरिवर्तनीय है। यह विवेचन तर्क और शास्त्र के माध्यम से सूक्ष्म जगत तथा स्थूल जगत के अंतर को स्पष्ट करते हुए जीव की वास्तविक स्थिति को प्रतिपादित करता है।

In English

Brahma Sutra: Resolving Contradictions in Creation

This commentary by Swami Satyananda Saraswati explains Brahma Sutra 2.3.1-3. It addresses doubts regarding the origin of space (akasha) and resolves contradictions between different Vedic texts to prove that space is eternal and not created.

This article answers

  • Brahma sutra 2.3.1 meaning?
  • Is akasha or space created according to vedanta?
  • Brahma sutra second chapter third pada explanation?
  • Why is the origin of space considered secondary in vedanta?

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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