श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — द्वितीय अध्याय, चतुर्थ पाद

22 मूल पद्य 19 संस्करणसे मिलाये गये

यहाँ इन सूत्रों का संक्षिप्त परिचय और सार प्रस्तुत है:

इन सूत्रों में प्राण और इन्द्रियों की सूक्ष्मता तथा उनके स्वरूप के विवेचन पर बल दिया गया है। विचार का क्रम प्राणों की उत्पत्ति, उनकी गति और अंततः इन्द्रियों के अधिष्ठान से होता हुआ सूक्ष्म सत्ता तक पहुँचता है। पाठक को यहाँ जीव के सूक्ष्म अंगों और उनके कार्य-कारण संबंध का तार्किक ज्ञान प्राप्त होगा।

अंशाधिकरणम्

2.4.1 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १

सूत्र २.४.१

तथा प्राणाः ॥ २.४.१ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 570

पदच्छेद — तथा , प्राणाः

सूत्रार्थ — ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इत्यादि श्रुतिमें जिस प्रकार आकाश आदिको उत्पत्ति है, ( तथा ) उसी प्रकार ( प्राणाः ) प्राण - इन्द्रियों की उत्पत्ति भी कही गई है। अतः इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं।

शाङ्करभाष्य

तथा प्राणा इति।

कथं पुनरत्र तथा इत्यक्षरानुलोम्यम् प्रकृतोपमानाभावात् सर्वगतात्मबहुत्ववादिदूषणम् अतीतानन्तरपादान्ते प्रकृतम् तत्तावन्नोपमानं संभवति सादृश्याभावात् सादृश्ये हि सति उपमानं स्यात् यथा सिंहस्तथा बलवर्मेति अदृष्टसाम्यप्रतिपादनार्थमिति यद्युच्येत यथा अदृष्टस्य सर्वात्मसंनिधावुत्पद्यमानस्यानियतत्वम् एवं प्राणानामपि सर्वात्मनः प्रत्यनियतत्वमिति तदपि देहानियमेनैवोक्तत्वात्पुनरुक्तं भवेत् न च जीवेन प्राणा उपमीयेरन् सिद्धान्तविरोधात् जीवस्य हि अनुत्पत्तिराख्याता प्राणानां तु उत्पत्तिराचिख्यासिता तस्मात्तथा इत्यसंबद्धमिव प्रतिभाति न उदाहरणोपात्तेनाप्युपमानेन संबन्धोपपत्तेः अत्र प्राणोत्पत्तिवादिवाक्यजातमुदाहरणम् एतस्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति इत्येवंजातीयकम् तत्र यथा लोकादयः परस्माद्ब्रह्मण उत्पद्यन्ते तथा प्राणा अपीत्यर्थः तथा एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च।

खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी इत्येवमादिष्वपि खादिवत्प्राणानामुत्पत्तिरिति द्रष्टव्यम्। अथवा पानव्यापच्च तद्वत् इत्येवमादिषु व्यवहितोपमानसंबन्धस्याप्याश्रितत्वात् यथा अतीतानन्तरपादादावुक्ता वियदादयः परस्य ब्रह्मणो विकाराः समधिगताः तथा प्राणा अपि परस्य ब्रह्मणो विकारा इति योजयितव्यम्।

कः पुनः प्राणानां विकारत्वे हेतुः श्रुतत्वमेव ननु केषुचित्प्रदेशेषु न प्राणानामुत्पत्तिः श्रूयत इत्युक्तम् तदयुक्तम् प्रदेशान्तरेषु श्रवणात् न हि क्वचिदश्रवणमन्यत्र श्रुतं निवारयितुमुत्सहते तस्माच्छ्रुतत्वाविशेषादाकाशादिवत्प्राणा अप्युत्पद्यन्त इति सूक्तम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' इस पादमें लिङ्गशरीर श्रुतियोंके विरोधका

परिहार है '

आकाश आदि भूतविषयक श्रुतियोंके परस्पर विरोधका परिहार तृतीय पादसे किया गया। अब चतुर्थं पादसे इन्द्रिय ( उत्पत्ति, संख्या, स्वरूप ) विषयक श्रुतियोंके विरोधका परिहार किया जाता है। उसमें ' तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेजकी सृष्टिकी ) ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन . ' ( उस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि उत्पत्तिं प्रकरणोंमें प्राणोंकी उत्पत्ति नहीं कही गई है।

और कहीं पर इनकी अनुत्पत्ति सुनी जाती है, क्योंकि ' असद्वा इदमप्र ० ' ( पहले यह असत् अव्याकृत ही था ) ' तदाहुः ० ' ( वे कहते हैं - वह असत् क्या था, [ इसप्रकार विचार करने लगे ] उत्पत्तिके पूर्व वे ऋषि ही असत् थे, वे कहते हैं - वे ऋषि कौन हैं? प्राण ही ऋषि थे ) इसप्रकार उत्पत्तिके पूर्व प्राणोंके सद्भावकी श्रुति है।

और अन्यत्र ' यथाऽग्नेर्ज्वलतः ० ' ( जैसे जलती हुई अग्निसे छोटे - छोटे विस्फुलिङ्ग निकलते हैं वैसे ही इस आत्मासे सम्पूर्ण प्राण निकलते हैं ) ' एतस्माज्जायते ० ' ( इससे प्राण, मन और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं ) ' सप्तः प्राणाः ० ' ( उससे सात प्राण उत्पन्न होते हैं ) ' स प्राणमसृजत ० ' ( उस पुरुषने प्राण हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया, फिर प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन और अन्नको उत्पन्न किया ) इत्यादि स्थलोंमें प्राणोंकी उत्पत्ति पढी जाती | पूर्वपक्षी - तत् तत् स्थलोंमें श्रुतियोंके परस्पर विरोध होनेसे और दोनों में एकपक्षके निर्धारण कारण अनिरूपित होनेसे अप्रितपत्ति प्राप्त होती है अथवा उत्पत्ति के पूर्वं इन्द्रियों के सद्भावकी श्रुति होने से प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति गोणी है, ऐसा प्राप्त होता है।

सिद्धान्ती - इससे यह उत्तर कहते हैं- ' तथा प्राणाः ' परन्तु इस सूत्र में ' तथा ' यह अक्षर किस प्रकार अनुकूल होगा? क्योंकि प्रकृत उपमानका अभाव है। सर्वगत अनेक आत्मा हैं, ऐसा माननेवालेका दूषण गत पादके अन्तमें प्रकृत है, परन्तु सादृश्यके न होनेसे वह दूषण प्राणका उपमान नहीं हो सकता। जैसा सिंह है वैसा बलवर्मा, इसप्रकार सादृश्य होनेपर ही उपमान होता है। जैसे सब आत्माओं की संनिधिमें उत्पन्न हुआ अदृष्ट अनियत है, वैसे प्राण भी सब आत्माओंके प्रति अनियत हैं।

इसप्रकार यदि कहो कि अदृष्ट के साथ साम्य प्रतिपादन करनेके लिए प्राणका उपमान है, तो वह भी देहके अनियम से ही उक्त होने से पुनरुक्त हो जायगा। सिद्धान्तके साथ विरोध होनेके कारण जीवके साथ भी प्राण उपमित नहीं किये जायंगे, कारण कि जीवकी अनुत्पत्ति कही गई है और प्राणोंकी उत्पत्ति कहने की इच्छा है | इसलिए ' तथा ' यह असम्बद्ध सा प्रतीत होता है। परन्तु यह आक्षेप युक्त नहीं है, क्योंकि उदाहरण में गृहीत उपमानसे सम्बन्ध उपपन्न होता है।

इस विषय में ' एतस्मादात्मनः ० ' ( इस आत्मासे सब प्राण, सब लोक, सब देव और सब भूत विविधरूपसे निकलते हैं— उत्पन्न होते हैं ) इसप्रकारका प्राणोत्पत्तिवादी वाक्यसमुदाय उदाहरण है। उसमें जैसे लोक आदि परब्रह्म से उत्पन्न होते हैं, वैसे प्राण मी परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं यह अर्थ है।

उसप्रकार - एतस्माज्जायते प्राणो ० ' ( इससे प्राण उत्पन्न होता है, मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और विश्वको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है ) इत्यादि श्रुतियोंमें भी आकाश आदिके समान प्राणोंकी उत्पत्ति है, ऐसा समझना चाहिए। अथवा ' पानव्यापञ्च तद्वत् ' ( और सोमपान करनेसे व्यापत् - वमन हो, तो उसके समान ) इत्यादि स्थलोमें व्यवहित उपमानके सम्बन्धका भी आश्रयण किया गया है।

जैसे गत पादके आरम्भमें उक्त आकाश आदि परब्रह्मके विकार निश्चित हैं, वैसे प्राण भी परब्रह्मके विकार हैं, ऐसी योजना करनी चाहिए। पुनः प्राणोंके विकारत्वमें हेतु कौन है? विकारत्व प्रतिपादक श्रुति ही हेतु है। परन्तु जो यह कहा गया है कि कई स्थलोंमें प्राणोंकी उत्पत्ति नहीं सुनी जाती, तो वह अयुक्त है, क्योंकि अन्य स्थलोंमें उनकी उत्पत्तिका श्रवण है।

कहींपर अश्रवण अन्यत्र श्रुतका निवारण करनेमें उत्साह नहीं करता, इसलिए यह कथन सुसंगत है कि श्रवण ( श्रुति ) के समान होनेसे आकाश आदिके समान प्राण भी उत्पन्न होते हैं॥ १

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * भूत और भोक्ता के विचारके अनन्तर मौतिक प्राणोंका उत्पत्तिविषयक विचार है, अतः दोनों पादोंकी हेतुहेतुमद्भाव संगति है। यद्यपि प्राणोंकी उत्पत्ति न मानने से ' एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा सिद्ध नहीं होती ' इसलिए वियदधिकरण न्याय से प्राणोंकी उत्पत्ति सिद्ध होती है, तो भी प्रलय में प्राणोंके सद्भाव प्रतिपादक श्रुतिकी गति कहनेके लिए यह अधिकरण है, इसलिए पुनरुक्ति नहीं है। इस अधिकरणका विषय प्राण है। पूर्वपक्षमें उक्त श्रुतियोंमें अप्रामाण्य है। यहाँ गोणीवादी कहते है कि प्रलय में प्राणोंकी अस्तित्व बोधक श्रुति निरवकाश होनेसे विशेष बलवती है। इसलिए प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति जीवोत्पत्ति श्रुतिके समान गौणी है, इसप्रकार इनका अविरोध है।

* ' तथा ' शब्द उपमानका द्योतक होता है अर्थात् वह यथाका आकर्षण करता है। परन्तु यहाँ उपमान नहीं है। क्या अव्यवहित पूर्वमें प्रतिपादित परपक्ष दूषण प्राणका उपमान है, अथवा अदृष्ट वा जीव है? इन तीनों विकल्पोंका क्रमश। समाधान भाष्य में स्पष्ट है। जैसे आकाश आदि परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, वैसे प्राण भी परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, इसप्रकार उपमानोपमेय सिद्ध होता है, अतः तथा असम्बद्ध नहीं है।

* दान्तिकका निकटवर्ती दृष्टान्त होना चाहिए? परन्तु ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि जैमिनि मुनिने व्यवहित दृष्टान्तका भी ग्रहण किया है। जैसे पूर्वमीमांसाके तृतीय अध्यायमें अश्व प्रतिग्रहेष्टि अधिकरण है। उसका यह विषय वाक्य है- ' यावतोऽश्वान्प्रतिगृह्णीयात्तावतो वारुणांश्चतुष्कपालानिर्वपेत् ' ( जितने अश्वदान करे उतने ही वरुणके लिए चनुष्कपालोंमें निष्पन्न पुरोडाश होम करे ) इसके उत्तर अधिकरणमें यह वारुणीष्टि अश्व दाताको करनी चाहिए कि प्रतिग्रहीतको?

ऐसा संशय होने पर पूर्वपक्ष में ' प्रतिगृह्णीयात् ' इस श्रुतिके बलसे दान लेनेवालेको करनी चाहिए। सिद्धान्त में दाताको करनी चाहिए, ऐसा निर्णय किया गया है। वहाँ ' प्रतिगृह्णीयात् ' - प्रतिग्राह्येत् ( दद्यात् ) ( दान देनेवाला ) ऐसा अर्थ करना चाहिए। इसप्रकार निर्णय होनेपर पुनः सन्देह होता है कि इष्टिका विधान वैदिक अश्वदानमें है अथवा लौकिक अश्वदानमें?

' न केसरिणो ददाति ' ( अश्वोंका दान नहीं करना चाहिए ) इस स्मृतिके अनुसार लौकिक अश्वदानमें इष्टि करनी चाहिए इसका समर्थन करते हुए ' दोषात्त्विष्टिलौकिके स्यात् ' ( जै ० सू ० ३।४।२८ ) यह सूत्र कहा गया है। सिद्धान्ती - ' भन्न हि वरुणो वा एतं गृह्णाति योऽश्वं प्रतिगृह्णाति ' ( जो अश्वका दान करता है उसको जलोदर रोग होता है ) इससे सम्बन्ध होनेके कारण वैदिक अश्वदानमें इस वारुणीष्टिका विधान है लोकमें नहीं, अतः यज्ञ सम्बन्धी अश्वदानमें यह इष्टि है ऐसा विचार किया गया है।

आगे वमनाधिकरणमें ' पानव्यापच्च तद्वत् ' ( जै ० सू ० ३।४। ३२ ) ( यदि सोमपानसे वमन हो, तो ' एतं सौमेन्द्रं श्यामाकं चरुं निर्वपेत् ' ( सोम और इन्द्र सम्बन्धी श्यामक चरुका होम करे ) इसप्रकार सोमपान निमित्त वमन होनेपर चरुका विधान किया गया है। यहाँपर सन्देह होता है कि क्या इस चरुका विधान वैदिक सोमपान निमित्त वमनमें है अथवा लौकिक सोमपान निमित्त वमनमें? पूर्वपक्ष - ' पानव्यापच्च तद्वत् ' उक्त चरुका विधान लौकिक सोमपान निमित्त वमन में होना चाहिए।

' तद्वत् ' ' उसी प्रकार ' अर्थात् ' दोषाविष्टिलौकिके स्यात् ' ( दोष होनेसे लौकिक अश्वदानमें इष्टि करनी चाहिए ) इस सूत्र में कहे हुए के समान। जैसे यहाँ ' तद्वत् ० ' ( जै ० सू ० ३।४।३२ ) के द्वारा व्यवहित ' दोषात्तु ' ( जै ० सू ० ३।४।२८ ) इत्यादि से उपमान दिया गया है। उसीप्रकार यहाँ व्यवहित उपमानका सम्बन्ध उपपन्न है अर्थात् गत पादके आरम्भमें जैसे आकाश आदि परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, वैसे प्राण भी परब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं।। १

2.4.2 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २

सूत्र २.४.२

गौण्यसंभवात् तत्प्राक् श्रुतेश् च ॥ २.४.२ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 573

सूत्रार्थ — इन्द्रियोंकी उत्पत्ति प्रतिपादक श्रुति गौणी नहीं हो सकती, अतः इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं।

शाङ्करभाष्य

यत्पुनरुक्तं प्रागुत्पत्तेः सद्भावश्रवणाद्गौणी प्राणानामुत्पत्तिश्रुतिरिति तत्प्रत्याह गौण्यसंभवादिति गौण्या असंभवो गौण्यसंभवः न हि प्राणानामुत्पत्तिश्रुतिर्गौणी संभवति प्रतिज्ञाहानिप्रसङ्गात् कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति इति हि एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय तत्साधनायेदमाम्नायते एतस्माज्जायते प्राणः इत्यादि सा च प्रतिज्ञा प्राणादेः समस्तस्य जगतो ब्रह्मविकारत्वे सति प्रकृतिव्यतिरेकेण विकाराभावात्सिध्यति गौण्यां तु प्राणानामुत्पत्तिश्रुतौ प्रतिज्ञा इयं हीयेत।

तथा च प्रतिज्ञातार्थमुपसंहरति पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् इति ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् इति च तथा आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् इत्येवंजातीयकासु श्रुतिषु एषैव प्रतिज्ञा योजयितव्या।

कथं पुनः प्रागुत्पत्तेः प्राणानां सद्भावश्रवणम् नैतन्मूलप्रकृतिविषयम् अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः इति मूलप्रकृतेः प्राणादिसमस्तविशेषरहितत्वावधारणात् अवान्तरप्रकृतिविषयं त्वेतत् स्वविकारापेक्षं प्रागुत्पत्तेः प्राणानां सद्भावावधारणमिति द्रष्टव्यम् व्याकृतविषयाणामपि भूयसीनामवस्थानां श्रुतिस्मृत्योः प्रकृतिविकारभावप्रसिद्धेः।

वियदधिकरणे हि गौण्यसंभवात् इति पूर्वपक्षसूत्रत्वात् गौणीजन्मश्रुतिः असंभवात् इति व्याख्यातम् प्रतिज्ञाहान्या च तत्र सिद्धान्तोऽभिहितः इह तु सिद्धान्तसूत्रत्वात् गौण्या जन्मश्रुतेरसंभवात् इति व्याख्यातम् तदनुरोधेन तु इहापि गौणी जन्मश्रुतिः असंभवात् इति व्याचक्षाणैः प्रतिज्ञाहानिरुपेक्षिता स्यात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह कहा गया है कि उत्पत्तिके पूर्व प्राणोंके सद्भावके श्रवणसे प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति गोणी है। उसपर कहते हैं — ' गौण्यसंभवात् ' गौणीका असंभव वह गौण्यसंभव है। प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति गौणी नहीं हो सकती, क्योंकि प्रतिज्ञाकी हानिका प्रसङ्ग आता है। ' कस्मिन्नु ० ' ( हे भगवन्!

किसके विज्ञात होनेपर यह सब विज्ञात होता है ) इस प्रकार एकके विज्ञानसे सबके विज्ञानकी प्रतिज्ञाकर उसके साधनके लिए ' एतस्माज्जायते ० ' ( उससे प्राण उत्पन्न होता है ) इत्यादि श्रुति है। वह प्रतिज्ञा प्राण आदि समस्त जगत् ब्रह्मका विकार होनेपर प्रकृतिसे व्यतिरिक्त विकार के अमावसे सिद्ध होती है। परन्तु प्राणोंकी उत्पत्ति श्रुति गौणी होनेपर तो यह प्रतिज्ञा बाधित होगी।

इस प्रकार ' पुरुष एवेदं ० ' ( यह समस्त जगत्, कर्म और तप- ज्ञान पुरुष ही है, वह पर और अमृतरूप ब्रह्म है ) और ब्रह्मैवेदं ० " ( यह समस्त जगत् वरिष्ठ ब्रह्म ही है ) यह श्रुति प्रतिज्ञात अर्थका उपसंहार करती है। और इस तरह ' आत्मनो वा अरे ० ' ( हे मैत्रेयी! आत्माके दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञानसे यह सब विदित होता है ) इस प्रकारकी श्रुतियोंमें ही इस प्रतिज्ञाकी योजना करनी चाहिए। तो पुनः उत्पत्तिके पूर्व प्राणोंके सद्भावकी श्रुति किस प्रकार है?

यह मूल प्रकृति - विषयक नहीं है, क्योंकि ' अप्राणो ह्यमनाः ० ' ( अप्राण, मनोहीन, विशुद्ध एवं श्रेष्ठ अक्षरसे मी उत्कृष्ट है ) इस प्रकार मूलप्रकृति प्राण व्यादि समस्त विशेषोंसे रहित अवधारित होती है। उत्पत्तिके पहले प्राणोंके सद्भावका अवधारण यह स्वविकारको अपेक्षासे अवान्तर प्रकृति विषयक है, ऐसा समझना चाहिए। कारण कि व्याकृत विषयक बहुत सी अवस्थाओं का भी प्रकृति - विकारभाव श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है।

वियदधिकरण में ' गौण्यसंभवात् ' इसके पूर्वपक्ष सूत्र होनेसे जन्म श्रुति गौणी है, क्योंकि मुख्यका असंभव है, इस प्रकार व्याख्यान किया गया है और प्रतिज्ञाकी हानि होनेसे वहाँ सिद्धान्त कहा गया है। यहाँ तो सिद्धान्त सूत्र होनेसे ' गौणी जन्म श्रुतिका असंभव होनेसे ' ऐसा व्याख्यान किया है। परन्तु उसके अनुसार यहाँ भी ' जन्म श्रुति गौणी है, असंभव होनेसे ' ऐसा व्याख्यान करनेवालोंसे प्रतिज्ञा हानिकी उपेक्षाकी जायगी॥ २

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि कहो कि उत्पत्ति श्रुतिके समान प्रतिज्ञा भी गौण हो, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहारका पर्यालोचन करनेसे विवक्षित अद्वितीयत्वकी प्रतिज्ञाके अनुसार प्राणोत्पत्ति मुख्य ही है। मुण्डकोपनिषद् के समान अन्य उपनिषदोंमें भी प्रतिज्ञा देखी जाती है, इसलिए यह प्रतिज्ञा मुख्य ही है। प्राणोंकी उत्पत्तिके मुख्य होनेमें यह प्रतिज्ञा हेतुरूपसे समझनी चाहिए।

* अब प्रलयमें प्राणोंके अस्तित्व विषयक विचार किया जाता है- ' ऋषयो वाव ते अग्रेऽसदासीत् ' ' प्राणा वाव ऋषयः ' यह वाक्य परकारण ब्रह्म विषयक नहीं है, क्योंकि ' अप्राणो ह्यमनाः ' इत्यादि श्रुति से वह तो प्राण आदि सब विशेषोंसे रहित निश्चित होता है। परन्तु प्राणके सद्भाव प्रतिपादक वाक्य अवान्तर प्रकृति - हिरण्यगर्म विषयक है, कारण कि अपने कार्यकी उत्पत्ति के पूर्व हिरण्यगर्भका सद्भाव निश्चित है। यह प्राण - हिरण्यगर्भका सद्भाव अवान्तर प्रलयमें सिद्ध होता है, उसके सद्भावकी श्रुति है।

कारण कि ' एतस्माज्जायते प्राणः ० ' ( इससे प्राण उत्पन्न होता है ) ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' ( पूर्व में हिरण्यगर्भं हुआ ) इत्यादि श्रुति हिरण्यगर्भको उत्पत्ति कहती हैं। और ' आदिकर्ता स भूतानाम् ' ( वह भूतोंका आदि कर्ता है ) इत्यादि स्मृतिमें हिरण्यगर्भको स्थूल जगत्का कारण कहा गया है। इस प्रकार परब्रह्मकी अपेक्षासे हिरण्यगर्भ कार्य और अपने कार्यकी अपेक्षा कारणरूपसे श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है, अतः अवान्तर प्रकृति विषयक प्राणके अस्तित्वकी श्रुति है।

और यहाँ वियदधिकरणके अनुसार सूत्रकी व्याख्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करनेसे प्रतिज्ञाका बाध हो जायगा, इसलिए ' एतस्माज्जायते प्राण : ' इत्यादि श्रुति प्रतिपादित प्राणोत्पत्ति मुख्य ही है।। २

2.4.3 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३

सूत्र २.४.३

गौण्यसंभवात् तत्प्राक् श्रुतेश् च ॥ २.४.३ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 574

पदच्छेद — तत्प्राश्रुतेः , च

सूत्रार्थ — ' जायते ' यह जन्म वाचक पद आकाश आदिकी अपेक्षासे प्राणोंमें श्रुत होनेसे प्राणों की उत्पत्ति मुख्य है।

शाङ्करभाष्य

यत्पुनरुक्तं प्रागुत्पत्तेः सद्भावश्रवणाद्गौणी प्राणानामुत्पत्तिश्रुतिरिति तत्प्रत्याह गौण्यसंभवादिति गौण्या असंभवो गौण्यसंभवः न हि प्राणानामुत्पत्तिश्रुतिर्गौणी संभवति प्रतिज्ञाहानिप्रसङ्गात् कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति इति हि एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय तत्साधनायेदमाम्नायते एतस्माज्जायते प्राणः इत्यादि सा च प्रतिज्ञा प्राणादेः समस्तस्य जगतो ब्रह्मविकारत्वे सति प्रकृतिव्यतिरेकेण विकाराभावात्सिध्यति गौण्यां तु प्राणानामुत्पत्तिश्रुतौ प्रतिज्ञा इयं हीयेत।

तथा च प्रतिज्ञातार्थमुपसंहरति पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् इति ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् इति च तथा आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् इत्येवंजातीयकासु श्रुतिषु एषैव प्रतिज्ञा योजयितव्या।

कथं पुनः प्रागुत्पत्तेः प्राणानां सद्भावश्रवणम् नैतन्मूलप्रकृतिविषयम् अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः इति मूलप्रकृतेः प्राणादिसमस्तविशेषरहितत्वावधारणात् अवान्तरप्रकृतिविषयं त्वेतत् स्वविकारापेक्षं प्रागुत्पत्तेः प्राणानां सद्भावावधारणमिति द्रष्टव्यम् व्याकृतविषयाणामपि भूयसीनामवस्थानां श्रुतिस्मृत्योः प्रकृतिविकारभावप्रसिद्धेः।

वियदधिकरणे हि गौण्यसंभवात् इति पूर्वपक्षसूत्रत्वात् गौणीजन्मश्रुतिः असंभवात् इति व्याख्यातम् प्रतिज्ञाहान्या च तत्र सिद्धान्तोऽभिहितः इह तु सिद्धान्तसूत्रत्वात् गौण्या जन्मश्रुतेरसंभवात् इति व्याख्यातम् तदनुरोधेन तु इहापि गौणी जन्मश्रुतिः असंभवात् इति व्याचक्षाणैः प्रतिज्ञाहानिरुपेक्षिता स्यात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इससे आकाश आदिके समान प्राणोंकी भी जन्मश्रुति मुख्य ही है ; क्योंकि ' जायते ' ऐसा एक उत्पत्ति वाचक पद प्राणोंमें पहले श्रुत है, उसकी उत्तर आकाश आदिमें भी एतस्माज्जायते प्राणः ' यहाँपर अनुवृत्ति होती है। आकाश आदिका जन्म मुख्य है, ऐसा ९ प्रतिष्ठापित किया जा चुका है, उसके सादृश्वसे प्राणों का भी जन्म मुख्य ही हो सकता है। कारण कि एक प्रकरणमें और एक वाक्य में एक वार उच्चरित और बहुतों से सम्बद्ध हुआ एक शब्द कहीं मुख्य और कहीं गौण है, ऐसा निश्चित नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे वाक्य विरूप ( भेद ) प्रसङ्ग हो जायगा। इस प्रकार ‘ स प्राणमसृजत ० ' ( उसने प्राणको उत्पन्न किया, प्राणसे श्रद्धाको ) यहाँ भी प्राणोंमें श्रुत ' सृज् ' धातु अनन्तर उत्पन्न होनेवाले अन्य श्रद्धा आदिमें अनुवृत्त होता है। जहाँ भी पश्चात् श्रुत उत्पत्ति वाचक शब्द पूर्वोके साथ सम्बन्धित होता है वहाँ भी यही न्याय है। जैसे ' सर्वाणि भूतानि ० ' ( सत्र भूत निकलते हैं ) इस प्रकार यह अन्तमें पठित ' न्युच्चरन्ति ' शब्द पूर्व प्राण आदिसे भी सम्बन्धित होता है || ३ ||

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.४.४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.4.4 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४

सूत्र २.४.४

तत्पूर्वकत्वाद् वाचः ॥ २.४.४ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 575

पदच्छेद — तत्पूर्वकत्वात् , वाचः

सूत्रार्थ — ( वाच : ) ' अन्नमयं हि सोम्य ० ' इत्यादिसे मन और प्राण सहित वाणी में ( तत्पूर्वकत्वात् ) ब्रह्मप्रकृतिक तेज, जल और अन्न पूर्वकत्व कथन है, अतः इन्द्रियोंकी उत्पत्ति श्रुति है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च आकाशादीनामिव प्राणानामपि मुख्यैव जन्मश्रुतिः यत् जायते इत्येकं जन्मवाचिपदं प्राणेषु प्राक्श्रुतं सत् उत्तरेष्वाकाशादिष्वनुवर्तते एतस्माज्जायते प्राणः इत्यत्र आकाशादिषु मुख्यं जन्मेति प्रतिष्ठापितम् तत्सामान्यात्प्राणेष्वपि मुख्यमेव जन्म भवितुमर्हति न हि एकस्मिन्प्रकरणे एकस्मिंश्च वाक्ये एकः शब्दः सकृदुच्चरितो बहुभिः संबध्यमानः क्वचिन्मुख्यः क्वचिद्गौण इत्यध्यवसातुं शक्यम् वैरूप्यप्रसङ्गात्। तथा स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम् इत्यत्रापि प्राणेषु श्रुतः सृजतिः परेष्वप्युत्पत्तिमत्सु श्रद्धादिष्वनुषज्यते। यत्रापि पश्चाच्छ्रुत उत्पत्तिवचनः शब्दः पूर्वैः संबध्यते तत्राप्येष एव न्यायः यथा सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति इत्ययमन्ते पठितो व्युच्चरन्तिशब्दः पूर्वैरपि प्राणादिभिः संबध्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यद्यपि ' तत्तेजोऽसृजत ' इस प्रकरणमें प्राणों की उत्पत्ति पठित नहीं है, कारण कि तेज, जल और अन्न इन तीन भूतोंकी उत्पत्तिका ही श्रवण है, तथापि वाक्, प्राण और मनका ब्रह्म प्रकृतिक तेज, जल और अन्न पूर्वक अभिधान होनेसे और उनके सादृश्यसे सब इन्द्रियोंमें ब्रह्म प्रभवत्व सिद्ध होता है। जैसे कि ' अन्नमयं हि सोम्य ० ' ( हे सोम्य! मन अन्नमय, प्राण जलमय और वाणी तेजोमयी है ) इसी प्रकरणमें वाणी, प्राण और मन तेज जल और अन्नपूर्वक कहे गये हैं। उसमें यदि उनके अन्नमयत्व आदि मुख्य ही हैं तो उससे उनमें ब्रह्म जन्यत्व ही हैं, और यदि उनमें अन्नमयत्व आदि गौण हों, तो भी ब्रह्म कर्तृक नाम, रूपके व्यकरण ( अभिव्यक्ति ) में श्रवण होनेसे ' येनाश्रुतं श्रुतं भवति ' ( जिससे अश्रुत श्रुत होता है ) इसप्रकार उपक्रम होने से ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( एतद्रूप - आत्मरूप ही यह सब है ) ऐसा उपसंहार होनेसे और अन्य श्रुतिमें प्रसिद्ध होने से मन बादिमें अन्नमयत्व आदि वचन ब्रह्म कार्यत्व विस्तारके लिए ही है, ऐसा ज्ञात होता है। इससे भी प्राण ब्रह्मके विकार हैं, यह सिद्ध होता है॥ ४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यहाँ वाणी प्राण और मनका उपलक्षण है, इसलिए सूत्रस्थ वाणी पदसे प्राण बोर मनका भी ग्रहण करना चाहिए। यहाँ प्राणोत्पत्ति श्रुतियों का सृष्टिके पूर्व प्राणोंके सद्भाव प्रतिपादक श्रुति साथ कोई विरोध नहीं है, अतः कारण ब्रह्म में समन्वय सिद्ध है॥ ४

सप्तगत्यधिकरणम्

2.4.5 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ५

सूत्र २.४.५

सप्त गतेर् विशेषितत्वाच् च ॥ २.४.५ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 576

पदच्छेद — सप्त , गते , विशेषितत्वात् च

सूत्रार्थ — - ( सप्त ) इन्द्रियाँ सात हैं, ( गतेः ) क्योंकि श्रुतिसे उनके सप्तत्वका ज्ञान होता है, ( च ) और ( विशेषितत्वात् ) ' सप्त वै शीर्षण्याः प्राणाः ' इस शास्त्र से शीर्षण्यत्वसे वे इन्द्रियाँ विशेषित हैं।

शाङ्करभाष्य

उत्पत्तिविषयः श्रुतिविप्रतिषेधः प्राणानां परिहृतः संख्याविषय इदानीं परिह्रियते। तत्र मुख्यं प्राणमुपरिष्टाद्वक्ष्यति संप्रति तु कति इतरे प्राणा इति संप्रधारयति।

श्रुतिविप्रतिपत्तेश्चात्र विशयः क्वचित्सप्त प्राणाः संकीर्त्यन्ते सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् इति क्वचिदष्टौ प्राणा ग्रहत्वेन गुणेन संकीर्त्यन्ते अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः इति क्वचिन्नव सप्त वै शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाञ्चौ इति क्वचिद्दश नव वै पुरुषे प्राणा नाभिर्दशमी इति क्वचिदेकादश दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः इति क्वचिद्द्वादश सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनम् इत्यत्र क्वचित्त्रयोदश चक्षुश्च द्रष्टव्यं च इत्यत्र एवं हि विप्रतिपन्नाः प्राणेयत्तां प्रति श्रुतयः।

किं तावत्प्राप्तम् सप्तैव प्राणा इति। कुतः गतेः यतस्तावन्तोऽवगम्यन्ते सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् इत्येवंविधासु श्रुतिषु विशेषिताश्चैते सप्त वै शीर्षण्याः प्राणाः इत्यत्र। ननु प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त इति वीप्सा श्रूयते सा सप्तभ्योऽतिरिक्तान्प्राणान्गमयतीति नैष दोषः पुरुषभेदाभिप्रायेयं वीप्सा प्रतिपुरुषं सप्त सप्त प्राणा इति न तत्त्वभेदाभिप्राया सप्त सप्त अन्येऽन्ये प्राणा इति।

नन्वष्टत्वादिकापि संख्या प्राणेषु उदाहृता कथं सप्तैव स्युः सत्यमुदाहृता विरोधात्त्वन्यतमा संख्या अध्यवसातव्या तत्र स्तोककल्पनानुरोधात्सप्तसंख्याध्यवसानम् वृत्तिभेदापेक्षं च संख्यान्तरश्रवणमिति मन्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्राणों की उत्पत्ति विषयक श्रुतियोंके परस्पर विरोधका परिहार किया गया। अब संख्याविषयक श्रुतिविरोधका परिहार किया जाता है। उनमें मुख्य प्राणको सूत्रकार आगे कहेंगे। अभी तो अन्य प्राण ( इन्द्रिय ) कितने हैं, यह निर्णय करते हैं। और श्रुति विरोधसे यहाँ संशय है। ' सप्त प्राणाः ० ' ( उससे सात प्राण उत्पन्न होते हैं ) इस तरह कहीं पर सात प्राण कहे जाते हैं, और ' अष्टौ ग्रहा ० ' आठ ग्रह और आठ अतिग्रह ) इस प्रकार कहीं आठ प्राण ग्रहत्व गुणसे वर्णित हैं।

और ‘ सप्त वै शीर्षण्याः ० ' ( सात शीर्षण्य प्राण हैं और दो नीचे के हैं ) इस तरह कहीं नौ प्राण कहे जाते हैं, और कहीं ' नव वै पुरुषे ० ' ( पुरुष - देहमें नौ प्राण हैं और दसवीं नाभि है ) इसप्रकार दस प्राण पठित हैं, और ' दशेमे पुरुषे ० ' ( देहमें दस प्राण हैं और ग्यारहवाँ मन है ) कहीं एकादश हैं, और ' सर्वेषां स्पर्शानां ० ' ( समस्त स्पर्शोका त्वक् एक अयन - स्थान है ) इस तरह कहीं द्वादश हैं, और कहीं ' चक्षुश्च द्रष्टव्यं च ' ( चक्षु और द्रष्टव्य ) इस तरह तेरह हैं।

इसप्रकार प्राणोंकी इयत्ताके प्रति [ संख्याविषयक ] श्रुतियाँ परस्पर विरुद्ध हैं। तब क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्ष - प्राण सात हैं, किससे? अवगतिसे, क्योंकि ' सप्त प्राणाः ० ' ( उससे सात प्राण उत्पन्न होते हैं ) इसप्रकारको श्रुतियोंमें उतने ही अवगत होते हैं, और ' सप्त वै शीर्षण्याः ० ' ( शिरमें रहनेवाले प्राण सात हैं ) इस श्रुतिमें ये विशेषित हैं।

परन्तु ' प्राणा गुहाशया निहिता : ० ' ( हृदयमें स्थित प्राण अपने स्थान में सात - सात स्थापित हैं ) इसप्रकार वीप्सा सुनी जाती है, वह सातसे अधिक प्राणोंका बोध कराती है। यह दोष नहीं है, क्योंकि यह वीप्सा प्रत्येक पुरुषमें सात सात प्राण हैं, इसप्रकार पुरुष भेदके अभिप्रायसे है। सात सात अन्य अन्य प्राण हैं, इस तरह तत्त्वभेदके अभिप्रायसे नहीं है। परन्तु आठ आदि संख्या मी प्राणोंमें उदाहृत है, तो पुनः सात ही किस प्रकार होंगे? यह ठीक है, उदाहृत है।

परन्तु संख्या विषयक श्रुति विरोध होनेसे किसी एक संख्याका निश्चय करना चाहिए। उसमें अल्प कल्पनाके अनुसार सात संख्याका निश्चय है, और अन्य संख्याका श्रवण ( प्राणोंकी ) वृत्ति भेदकी अपेक्षासे ही है, ऐसा मानते हैं॥ ५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * आकाश आदिकी उत्पत्तिके समान प्राणोंकी भी उत्पत्ति कही गई। बे प्राण कितने हैं, अब उनका संख्या विषयक विचार किया जाता है, इसप्रकार आश्रयाश्रयिमाव संगतिसे कहते हैं। परन्तु इस विषय में श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेचे संशय होनेपर पूर्वपक्ष दिखलाते हैं -कहीं सातनेत्र, श्रोत्र, घ्राण, रसना, त्वक् ये पांच ज्ञानेन्द्रिय, वाणी और मन ये सात प्राण हैं। नेत्र आदि सात और हस्त - कर्मेन्द्रिय, इसप्रकार आठ हैं, ये बन्धनके हेतु होनेसे ग्रह हैं, और इनके रूप आदि विषय अतिग्रह हैं। विषय इन्द्रियोंसे स्वतन्त्र और इनको आकर्षित करते हैं, इससे इन्द्रियाँ विषयके अधीन होती हैं। दो नेत्र, दो श्रोत्र, दो नासिकाएँ और वाणी ये सात शिरमें रहनेवाले प्राण हैं, गुदिया और लिङ्गेन्द्रिय ये दो नीचे के, इसप्रकार मिलकर नौ होते हैं। अथवा कहीं उक्त नौ प्राण और दसवीं नाभि, इसप्रकार दस प्राण हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन यह एकादश हैं | ये बुद्धिके साथ मिलकर बारह प्राण होते हैं और अहंकार के साथ तेरह हैं। इसप्रकार प्राणोंकी संख्या विषयक श्रुतियोंका परस्पर विरोध है॥ ५

2.4.6 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ६

सूत्र २.४.६

हस्तादयस् तु स्थितेऽतो नैवम् ॥ २.४.६ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 577

पदच्छेद — हस्तादय :, तु , स्थिते , अतः , न , एवम्

सूत्रार्थ — ( तु ) पूर्वपक्ष निरासार्थं है, ( हस्तादयः ) ' हस्तौ वै ग्रहः ' इत्यादि श्रुतिमें हाथ आदि भी अधिक प्राण प्रतिपादित हैं, ( स्थिते ) इससे सात से अधिक प्राणोंके होनेपर ( अतः ) इस कारण ( नैवम् ) सात ही प्राण नहीं हो सकते।

शाङ्करभाष्य

हस्तादयस्त्वपरे सप्तभ्योऽतिरिक्ताः प्राणाः श्रूयन्ते हस्तो वै ग्रहः स कर्मणातिग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति इत्येवमाद्यासु श्रुतिषु स्थिते च सप्तत्वातिरेके सप्तत्वमन्तर्भावाच्छक्यते संभावयितुम् हीनाधिकसंख्याविप्रतिपत्तौ हि अधिका संख्या संग्राह्या भवति तस्यां हीना अन्तर्भवति न तु हीनायामधिका अतश्च नैवं मन्तव्यम् स्तोककल्पनानुरोधात्सप्तैव प्राणाः स्युरिति।

उत्तरसंख्यानुरोधात्तु एकादशैव ते प्राणाः स्युः तथा च उदाहृता श्रुतिः दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः इति आत्मशब्देन च अत्र अन्तःकरणं परिगृह्यते करणाधिकारात्।

नन्वेकादशत्वादप्यधिके द्वादशत्रयोदशत्वे उदाहृते सत्यमुदाहृते न त्वेकादशभ्यः कार्यजातेभ्योऽधिकं कार्यजातमस्ति यदर्थमधिकं करणं कल्प्येत शब्दस्पर्शरूपरसगन्धविषयाः पञ्च बुद्धिभेदाः तदर्थानि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाः पञ्च कर्मभेदाः तदर्थानि च पञ्च कर्मेन्द्रियाणि सर्वार्थविषयं त्रैकाल्यवृत्ति मनस्तु एकम् अनेकवृत्तिकम् तदेव वृत्तिभेदात् क्वचिद्भिन्नवद्व्यपदिश्यते मनो बुद्धिरहंकारश्चित्तं च इति तथा च श्रुतिः कामाद्या नानाविधा वृत्तीरनुक्रम्याह एतत्सर्वं मन एव इति।

अपि च सप्तैव शीर्षण्यान्प्राणानभिमन्यमानस्य चत्वार एव प्राणा अभिमताः स्युः स्थानभेदाद्ध्येते चत्वारः सन्तः सप्त गण्यन्ते द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके एका वाक् इति न च तावतामेव वृत्तिभेदा इतरे प्राणा इति शक्यते वक्तुम् हस्तादिवृत्तीनामत्यन्तविजातीयत्वात्।

तथा नव वै पुरुषे प्राणा नाभिर्दशमी इत्यत्रापि देहच्छिद्रभेदाभिप्रायेणैव दश प्राणा उच्यन्ते न प्राणतत्त्वभेदाभिप्रायेण नाभिर्दशमी इति वचनात् न हि नाभिर्नाम कश्चित्प्राणः प्रसिद्धोऽस्ति मुख्यस्य तु प्राणस्य भवति नाभिरप्येकं विशेषायतनमिति अतो नाभिर्दशमी इत्युच्यते। क्वचिदुपासनार्थं कतिचित्प्राणा गण्यन्ते क्वचित्प्रदर्शनार्थम् तदेवं विचित्रे प्राणेयत्ताम्नाने सति क्व किं परम् आम्नानमिति विवेक्तव्यम् कार्यजातवशात्त्वेकादशत्वाम्नानं प्राणविषयं प्रमाणमिति स्थितम्।।

इयमपरा सूत्रद्वययोजना सप्तैव प्राणाः स्युः यतः सप्तानामेव गतिः श्रूयते तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति इत्यत्र।

ननु सर्वशब्दोऽत्र पठ्यते तत्कथं सप्तानामेव गतिः प्रतिज्ञायत इति विशेषितत्वादित्याह सप्तैव हि प्राणाश्चक्षुरादयस्त्वक्पर्यन्ता विशेषिता इह प्रकृताः स यत्रैव चाक्षुषः पुरुषः पराङ्पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति एकीभवति न पश्यतीत्याहुः इत्येवमादिना अनुक्रमणेन प्रकृतगामी च सर्वशब्दो भवति यथा सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्या इति ये निमन्त्रिताः प्रकृता ब्राह्मणास्त एव सर्वशब्देनोच्यन्ते नान्ये एवमिहापि ये प्रकृताः सप्त प्राणास्त एव सर्वशब्देनोच्यन्ते नान्य इति।

नन्वत्र विज्ञानमष्टममनुक्रान्तम् कथं सप्तानामेवानुक्रमणम् नैष दोषः। मनोविज्ञानयोस्तत्त्वाभेदाद्वृत्तिभेदेऽपि सप्तत्वोपपत्तेः। तस्मात्सप्तैव प्राणा इति एवं प्राप्ते ब्रूमः हस्तादयस्त्वपरे सप्तभ्योऽतिरिक्ताः प्राणाः प्रतीयन्ते हस्तो वै ग्रहः इत्यादिश्रुतिषु ग्रहत्वं च बन्धनभावः गृह्यते बध्यते क्षेत्रज्ञः अनेन ग्रहसंज्ञकेन बन्धनेनेति स च क्षेत्रज्ञो नैकस्मिन्नेव शरीरे बध्यते शरीरान्तरेष्वपि तुल्यत्वाद्बन्धनस्य तस्माच्छरीरान्तरसंचारि इदं ग्रहसंज्ञकं बन्धनम् इत्यर्थादुक्तं भवति।

तथा च स्मृतिः पुर्यष्टकेन लिङ्गेन प्राणाद्येन स युज्यते।

तेन बद्धस्य वै बन्धो मोक्षो मुक्तस्य तेन च इति प्राङ्मोक्षात् ग्रहसंज्ञकेन बन्धनेन अवियोगं दर्शयति आथर्वणे च विषयेन्द्रियानुक्रमणे चक्षुश्च द्रष्टव्यं च इत्यत्र तुल्यवद्धस्तादीनीन्द्रियाणि सविषयाण्यनुक्रामति हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च इति तथा दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्माच्छरीरान्मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति इत्येकादशानां प्राणानामुत्क्रान्तिं दर्शयति।

सर्वशब्दोऽपि च प्राणशब्देन संबध्यमानोऽशेषान्प्राणानभिदधानो न प्रकरणवशेन सप्तस्वेवावस्थापयितुं शक्यते प्रकरणाच्छब्दस्य बलीयस्त्वात् सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्याः इत्यत्रापि सर्वेषामेव अवनिवर्तिनां ब्राह्मणानां ग्रहणं न्याय्यम् सर्वशब्दसामर्थ्यात् सर्वभोजनासंभवात्तु तत्र निमन्त्रितमात्रविषया सर्वशब्दस्य वृत्तिराश्रिता इह तु न किंचित्सर्वशब्दार्थसंकोचने कारणमस्ति तस्मात्सर्वशब्देन अत्र अशेषाणां प्राणानां परिग्रहः। प्रदर्शनार्थं च सप्तानामनुक्रमणमित्यनवद्यम्।

तस्मादेकादशैव प्राणाः शब्दतः कार्यतश्चेति सिद्धम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सिद्धान्ती — इस पर कहते हैं—

परन्तु ' हस्तौ वै ग्रहः ० ' ( हस्त ही ग्रह हैं, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहीत हैं, क्योंकि प्राणी हस्तोंसे ही कर्म करता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें अन्य हस्त आदि सातोंसे अतिरिक्त प्राण सुने जाते हैं। प्राण सात से अतिरिक्त निश्चित होनेपर उनमें सातके अन्तर्भाव की संभावना की जा सकती है, क्योंकि न्यून और अधिक संख्या की विप्रतिपत्ति होनेपर अधिक संख्या ही ग्राह्य होती है, कारण कि उसमें न्यूनका अन्तर्भाव होता है, परन्तु न्यूनमें अधिक संख्याका अन्तर्भाव नहीं होता।

इससे अल्प कल्पनाके अनुसार सात ही प्राण होंगे, ऐसा नहीं मानना चाहिए। किन्तु उत्तर संख्याके अनुरोधसे तो एकादश ही वे प्राण होंगे जैसे कि ' दशेमे पुरुषे ० ' ( देहमें ये दस प्राण हैं और मन एकादश है ) इस प्रकार श्रुति उदाहृत है। यहाँ आत्मशब्द से अन्तःकरणका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि करणका प्रकरण है। परन्तु एकादश से अधिक द्वादश, त्रयोदश उदाहृत हैं? ठीक उदाहृत है। परन्तु एकादश कार्यं समुदायसे अधिक कार्य नहीं है, जिसके लिए अधिक करणकी कल्पनाकी जाय।

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध विषयक पाँच प्रकारकी बुद्धि है, उसके लिए पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं। वचन, आदान- ग्रहण, विहरण ( चलना ) उत्सर्ग ( मलादिका त्याग ) आनन्द ( विषय जन्य - सुख अनुभव ) ये पाँच कर्मके भेद हैं, उनके लिए पाँच कर्मेन्द्रिय हैं। सब पदार्थोंको विषय करनेवाला, तथा त्रिकाल विषयक वृत्तिवाला मन एक है और वह अनेक वृत्तियोंवाला है। उसका ही ' मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तं च ' ( मन, बुद्धि, अहङ्कार और वित्त ) इस प्रकार वृत्तिके भेदसे कहोंपर भिन्नके समान व्यपदेश किया जाता है।

उसी प्रकार श्रुति अनेक प्रकारकी काम आदि वृत्तियोंका अनुक्रम कर कहती है- ' एतत्सर्वं मन एव ० ' ( यह सब मन हा है )। और सात ही शीर्षण्य प्राणोंके माननेवालेको चार ही प्राण अभिमत होंगे, ये चार होते हुए स्थानभेदसे सात गिने जाते हैं ( दो श्रोत्र, दो नेत्र, दो नासिका, एक वाणी ) तब अन्य प्राण उनके वृत्तिभेद हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि हस्त आदिकी वृत्तियाँ अत्यन्त विजातीय हैं।

इसप्रकार ' नव वै पुरुषे ० ' ( देहमें नौ ही प्राण हैं और दसवीं नाभि है ) यहाँ मी देहके छिद्र भेदके अभिप्रायसे दस प्राण कहे जाते हैं, प्राणतत्त्वके भेदके अभिप्रायसे नहीं, कारण कि ' नामि दसवीं है ' ऐसा वचन है | नाभि नामका कोई प्राण प्रसिद्ध नहीं है, किन्तु मुख्य प्राणका नामि भी एक विशेष स्थान है, अतः ' नामि दसवीं ' ऐसा कहा i जाता है। कहीं उपासना के लिए कई प्राण गिने जाते हैं और कहीं प्रदर्शन के लिए।

इसप्रकार प्राणोंकी संख्याविषयक भिन्न - भिन्न श्रुतियों के होनेपर किस स्थलमें किस अर्थ विषयक यह श्रुति है, ऐसा विचार करना चाहिए। कार्य समुदायके बलसे प्राण विषयक एकादशत्व प्रतिपादक श्रुति प्रमाण है, यह निश्चित होता है।

दोनों सूत्रोंकी यह दूसरी योजना है - प्राण सात ह होंगे, क्योंकि ' तमुत्क्रामन्तं ० ' ( उस जीवके शरीर से उत्क्रमण करनेपर उसके अनन्तर ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके पीछे उत्क्रमण करनेपर अनन्तर सम्पूर्ण प्राण ( इन्द्रियवर्ग ) उत्क्रमण करते हैं ) इस श्रुतिमें सातकी गति सुनी जाती है। परन्तु इस श्रुतिमें सवं शब्द मी पठित है, तो सातकी ही गतिकी किस प्रकार प्रतिज्ञा की जाती है?

विशेषित होने से, ऐसा कहते हैं, क्योंकि ' स यत्रैष ० ' ( जिस समय यह चाक्षुष पुरुष सर्वं ओरसे व्यावृत्त होता है, उस समय मुमूषु रूपज्ञान हीन हो जाता है ) ( चक्षु इन्द्रिय लिङ्गात्मासे एक रूप हो जाती है, तो लोग ' नहीं देखता ' ऐसा कहते हैं ) इत्यादि अनुक्रमणसे चक्षु आदिसे त्वक् पर्यन्त सात ही विशेषित प्राण यहाँ प्रकृत हैं। ' सर्वे प्राणाः ' यहाँपर सर्वशब्द प्रकृतगामी होता है अर्थात् सात इन्द्रियोंको विषय करता है।

जैसे " सब ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिए " यहां जो निमन्त्रित प्रकृत ब्राह्मण हैं वे ही सर्वं शब्दसे कहे जाते हैं अन्य नहीं। वैसे ही यहाँ मी जो प्रकृत सात प्राण हैं वे ही सर्वशब्दसे कहे जाते हैं अन्य नहीं, परन्तु यहाँ आठवें विज्ञानका अनुक्रमण भी है, तो सातका ही अनुक्रमण कैसे कहते हो?

यह दोष नहीं है, क्योंकि मन और विज्ञानका अभेद होनेसे वृत्ति भेद हैं— ' हस्तो वै ग्रहः ' ( ही ग्रह है ) इत्यादि श्रुतियोंमें दूसरे हस्त आदि सातसे अतिरिक्त प्राण होनेपर भी सप्तत्वकी उपपत्ति होती है, इसलिए सात ही प्राण हैं। ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते जाता है और वह एक ही शरीरमें नहीं बाँधा जाता है, क्योंकि अन्य शरीरोंमें भी बन्धन प्रतीत होते हैं, ग्रहत्व बन्धनभाव ग्रहीत होता है।

क्षेत्रज्ञ - जीव इस ग्रह नामक बन्धनसे बांधा तुल्य है, इससे यह ग्रह संज्ञक बन्धन अन्य शरीरमें संचारशील है, ऐसा अर्थसे उक्त होता है। जैसे कि ' पुर्यष्टकेन लिङ्गेन ० ' ( वह प्राण आदि पुर्यष्टक लिङ्गसे युक्त होते हैं।

उससे बद्धका बन्धन और उससे मुक्तका मोक्ष होता है ) यह स्मृति मोक्षके पूर्व इस ग्रह संज्ञक बन्धन से अवियोग दिखलाती है, और आथर्वणमें विषय और इन्द्रियके अनुक्रमणमें ' चक्षुश्च द्रष्टव्यं च ' ( चक्षु और द्रष्टव्य ) इसमें समानरूपसे सविषय हस्त आदि इन्द्रियोंको ' हस्तौ चादतव्यं ० ' ( हस्त और ग्रहणं करनेयोग्य वस्तु, उपस्थ और आनन्दयितव्य, पायु और विसर्जनीय, पाद और गन्तव्य स्थान ) इस प्रकार गिनाते हैं।

इसप्रकार ' दशेमे पुरुषे ० ' ( देहमें ये दश प्राण हैं और मन ग्यारहा है ये जिस समय इस मयं शरीरसे उत्क्रमण करते हैं उस समय अपने सम्बन्धियोंको रोदन कराते हैं इसलिए रुद्र कहलाते हैं ) यह श्रुति एकादश प्राणोंकी उत्क्रान्ति दिखलाती है। सर्वं शब्द भी प्राणशब्द के साथ सम्बन्धित होता हुआ वशेष प्राणोंका अभिधान करता हुआ प्रकरण के बलसे सातमें ही अवस्थापित नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रकरण से श्रुति बलवती है।

' सब ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ' यहाँपर भी पृथिवीपर रहनेवाले समस्त ब्राह्मणोंका ही ग्रहण न्याय है, कारण कि सर्व शब्दकी सामथ्यं है | परन्तु सबके भोजनका संभव न होनेसे वहाँ सर्वशब्दकी वृत्ति निमन्त्रित ब्राह्मणमात्र विषयक ग्रहण की जाती है।

परन्तु यहाँ तो सर्वशब्दके अर्थके संकोचमें कोई भी कारण नहीं है, इसलिए यहाँ सर्वशब्दसे समस्त प्राणोंका परिग्रह है और प्रदर्शनके लिए सातोंका अनुक्रमण है, यह भी दोषरहित है, अतः शब्द ( श्रुति ) से और कार्यसे एकादश ही प्राण हैं, यह सिद्ध हुआ || ६ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * हस्त आदिकी अदान आदि वृत्तियाँ श्रोत्र आदि से अत्यन्त विलक्षण हैं। यदि वे श्रोत्र आदिकी वृत्ति हों, तो अन्ध, बधिर आदिसे आदान - प्रदान आदि नहीं होंगे। इसलिए ' सप्त प्राणाः प्रभवन्ति ' यह उपासनाके लिए है और ' अष्टौ ग्रहाः ' यह उपलक्षणार्थं है, कारण कि पायु, उपस्थ और पाद ये भी समानरूपसे बंधक हैं। अतः एकादश कार्य हैं, तदनुसार ' दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मकादशः ' यह एकादश इन्द्रिय प्रतिपादक श्रुति प्रमाण है।

* ' वागादिपञ्च श्रवणादिपञ्च प्राणादिपञ्चाश्रमुखानि पञ्च।

बुद्ध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीमाहुः॥ ' ( वि ० चू ० )

( वागादि पांच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पाँच ज्ञानेन्द्रियां, प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान ये पाँच प्राण, आकाश आदि पाँच सूक्ष्मभूत, अन्तःकरण चतुष्टय, अविद्या, काम और कर्म इनको पुर्यष्टक अथवा लिङ्गशरीर कहते हैं, क्योंकि आत्माके ज्ञापक हैं ) मरण समय ये सब जीवके साथ रहते हैं जबतक जीव इनसे मुक्त नहीं होता तबतक उसका मोक्ष नहीं होता है।

* इसप्रकार संख्या विषयक श्रुतियोंका परस्पर विरोध न होनेपर एकादश इन्द्रियोंके कारणभूत ब्रह्ममें श्रुतियोंका समन्वय सिद्ध है || ६ ||

प्राणाणुत्वाधिकरणम्

2.4.7 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ७

सूत्र २.४.७

अणवश्व ॥ २.४.७ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 580

पदच्छेद — अणवः , च

सूत्रार्थ — और प्राण ( इन्द्रियाँ ) अणु सूक्ष्म हैं, क्योंकि वे इन्द्रियोंसे अग्राह्य हैं।

शाङ्करभाष्य

* अधुना प्राणानामेव स्वभावान्तरमभ्युच्चिनोति। अणवश्चैते प्रकृताः प्राणाः प्रतिपत्तव्याः। अणुत्वं चैषां सौक्ष्म्यपरिच्छेदौन परमाणुतुल्यत्वम्, कृत्स्नदेहव्यापिकार्यानुपपत्तिप्रसङ्गात्। सूक्ष्मा एते प्राणाः, स्थूलाश्चेत्स्युर्मरणकाले शरीरान्निर्गच्छन्तो बिलादहिरिवोपलभ्येरप्रियम ( णस्य पार्श्वस्थैः। परिच्छिन्ना इचैते प्राणाः, सर्वगताश्चेत्स्युरुत्कान्तिगत्यगतिश्रुतिव्याकोपः स्यात्। तद्गुगसारत्वं च जीवस्य न सिध्येत्। सर्वगतानामपि वृत्तिलाभः शरीरदेशे स्यादिति चेत् - न, वृत्तिमात्रस्य करणत्वोपपत्तेः। यदेव ह्युपलब्धिसाधनं वृत्तिरन्यद्वा तस्यैव नः करणत्वम्, संज्ञामात्रे विवाद इति करणानां व्यापित्वकल्पना निरर्थिका। तस्मात्सूक्ष्माः परिच्छिन्नाश्च प्राणा इत्यध्यवस्यामः॥ ७

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अब सूत्रकार प्राणोंके इन्द्रियोंके ही अन्य स्वभावका समुच्चय कहते हैं। ये प्रकृत प्राण अणु समझने चाहिए। इन प्राणोंकी अणुता - सूक्ष्मता और परिच्छिन्नता है, परमाणु तुल्यता नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर समस्त देह व्यापी कार्यकी अनुपपत्तिका प्रसङ्ग होगा। ये प्राण सूक्ष्म हैं, यदि स्थूल होते, तो मरण कालमें बिलसे निकले हुए सर्प के समान म्रियमाण पुरुष के शरीर से निकलते हुए वे पाश्वस्थ लोगोंसें उपलब्ध होते और ये प्राण परिच्छिन्न हैं। यदि सर्वगत हों, तो उत्क्रान्ति, गति और आगति श्रुतिका विरोध होगा और जीवमें अन्तःकरण गुण प्रधानत्व सिद्ध नहीं होगा। यदि कहो कि सर्वंगतोंका भी शरीर प्रदेश में वृत्तिलाम हो जायगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिमात्रमें करणत्व हो सकता है। वृत्ति हो अथवा अन्य हो जो उपलब्धिका साधन है वही हमारे मतमें करण है। संज्ञामात्रमें विवाद है, अतः करणोंमें व्यापित्व कल्पना निर्थक है, इससे हम ऐसा निश्चय करते कि इन्द्रिय सूक्ष्म और परिच्छन्न हैं॥ ७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ‘ प्राणाः सर्वे अनन्ताः ' ( सब प्राण अनन्त हैं ) यह श्रुति इन्द्रियोंको विभु कहती है। सांख्यमतमें महङ्कार जगत् व्यापी है, अतः इन्द्रियाँ उसका कार्यं होनेसे वे भी व्यापक सिद्ध होती हैं, किन्तु तत् तत् देहमें उनकी अभिव्यक्तिरूप प्रदेश वृत्तियाँ हैं। विभु होनेसे इन्द्रियोंकी उत्क्रान्ति आदि नहीं होते, इसप्रकार आक्षेप संगतिसे सांख्योंका पूर्वपक्ष है। इसप्रकार प्राणके परिमाणविषयक सन्देह होने पर सिद्धान्त कहते हैं - इन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं विभु नहीं, क्योंकि अनुद्भूतरूप और स्परांवाली हैं। यदि इन्द्रियाँ व्यापक हों, तो दूर और समीपस्थ सब पदार्थोंका ज्ञान प्रसक्त होगा और उत्कान्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियोंका बाध होगा। यदि बुद्धि व्यापक हो तो मात्मामें बुद्धिरूप उपाधि से ' एषोरणुरात्मा ' इस प्रकार अणुत्व सिद्ध नहीं होगा और जीवमें ' तद्गुणसारत्व ' न्यायका बाघ होगा। इसलिए ' प्राणाः

अनन्ता : ' इस प्रकार श्रुति इन्द्रियोंमें प्रतिपादित अनन्तत्व उपासना के लिए है, अतः उसका उत्क्रान्ति आदि श्रुति के साथ कोई विरोध नहीं है।। ७

प्रणष्ठयाधिकरणम्

2.4.8 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ८

सूत्र २.४.८

श्रेष्ठश् च ॥ २.४.८ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 581

पदच्छेद — श्रेष्ठः , च

सूत्रार्थ — और मुख्य प्राण भी इन्द्रियोंके समान ब्रह्मसे उत्पन्न होता है |

शाङ्करभाष्य

मुख्यश्च प्राण इतरप्राणवद्ब्रह्मविकारः इत्यतिदिशति। तच्च अविशेषेणैव सर्वप्राणानां ब्रह्मविकारत्वमाख्यातम् एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च इति सेन्द्रियमनोव्यतिरेकेण प्राणस्योत्पत्तिश्रवणात् स प्राणमसृजत इत्यादिश्रवणेभ्यश्च। किमर्थः पुनरतिदेशः अधिकाशङ्कावारणार्थः नासदासीये हि ब्रह्मप्रधाने सूक्ते मन्त्रवर्णो भवति न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।

आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्नपरः किंचनास इति आनीत् इति प्राणकर्मोपादानात् प्रागुत्पत्तेः सन्तमिव प्राणं सूचयति तस्मादजः प्राण इति जायते कस्यचिन्मतिः तामतिदेशेनापनुदति। आनीच्छब्दोऽपि न प्रागुत्पत्तेः प्राणसद्भावं सूचयति अवातम् इति विशेषणात् अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः इति च मूलप्रकृतेः प्राणादिसमस्तविशेषरहितत्वस्य दर्शितत्वात् तस्मात्कारणसद्भावप्रदर्शनार्थ एवायम् आनीच्छब्द इति।

श्रेष्ठः इति च मुख्यं प्राणमभिदधाति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च इति श्रुतिनिर्देशात् ज्येष्ठश्च प्राणः शुक्रनिषेककालादारभ्य तस्य वृत्तिलाभात् न चेत्तस्य तदानीं वृत्तिलाभः स्यात् योनौ निषिक्तं शुक्रं पूयेत न संभवेद्वा श्रोत्रादीनां तु कर्णशष्कुल्यादिस्थानविभागनिष्पत्तौ वृत्तिलाभान्न ज्येष्ठत्वम्। श्रेष्ठश्च प्राणः गुणाधिक्यात् न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुम् इति श्रुतेः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — मुख्य प्राण भी अन्य प्राणोंके समान ब्रह्मका विकार है, इस प्रकार सुत्रकार अतिदेश करते हैं। वह ब्रह्मविकारत्व सब प्राणोंका समानरूपसे ही कहा गया है। ' एतस्माज्जायते ० ' ( इससे प्राण, मन और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं ) और ' स प्राणमसृजत ' ( उसके प्राणको उत्पन्न किया ) इत्यादि श्रुतियोंसे भी इन्द्रिय सहित मनसे अतिरिक्त प्राणकी उत्पत्तिका श्रवण होता है। तो पुनः यह अतिदेश किस लिए है? अधिक शङ्काके परिहार के लिए है।

क्योंकि नासदासीय नामक ब्रह्म प्रधान सूक्तमें ' न मृत्युरासीदमृतं ' ( महाप्रलयकाल में मृत्यु नहीं थी और अमृत भी नहीं था, रात्रि तथा दिवसके चिह्न भूत चन्द्र और सूर्य नहीं थे, स्वधाके साथ अर्थात् पितृदेय भी नहीं था, वह अकेला व्यापार रहित [ ब्रह्म ] था, उससे पर अन्य कुछ नहीं था ) यह मन्त्रवर्ण है।

' आनीत् ' ( वह चेष्टा युक्त है ) यह शब्द प्राणकर्मका ग्रहण होनेसे उत्पत्तिके पूर्वं प्राणको विद्यमानकी माँति सूचित करता है इससे प्राण उत्पत्ति रहित है, इस प्रकार किसीको बुद्धि उत्पन्न हो सकती है, उसका अतिदेशसे निराकरण करते हैं। ' आनीत् ' शब्द मी उत्पत्ति के पूर्व प्राणके सद्भावको सूचित नहीं करता, क्योंकि ' अवातम् ' ( वात रहित ) यह विशेषण है और ' अप्राणो ० ' ( वह अप्राण, मन रहित और शुद्ध है ) इस प्रकार मूलप्रकृति प्राण आदि समस्त विशेषोंसे रहित दिखलाई गई है।

इसलिए यह ' आनीत् ' शब्द कारणके सद्भाव प्रदर्शन के लिए ही है। ' प्राणो वा ० ' ( प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं ) इस श्रुति निर्देश से ' श्रेष्ठ ' यह शब्द मुख्य प्राणका अभिधान करता है। प्राण ज्येष्ठ है, क्योंकि वीर्यं निषेककाल ( गर्भाधान काल ) से लेकर उसका वृत्तिलाभ होता है। यदि उस समय उसका वृत्तिलाभ न हो तो गर्मामें निषिक्त शुक्र दूषित हो जाता अथवा उसका संभव न होता।

श्रोत्र आदि तो ज्येष्ठ नहीं है, क्योंकि कणं- शष्कुलि आदि स्थान विभाग निष्पन्न होनेपर उनका वृत्तिलाभ होता है, और गुणोंके आधिक्यसे प्राण श्रेष्ठ है, क्योंकि ' न वै ० ' ( तुम्हारे विना हम जीवित रहनेमें समर्थ नहीं हैं ) ऐसी श्रुति है || ८ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * वाणी आदिके जीवनका हेतुत्व प्राणका गुण है, इस गुणके अधिक्यसे प्राण श्रेष्ठ है। इसप्रकार ' आनीत् ' इस श्रुतिके साथ विरोध न होनेसे प्राणोत्पत्ति श्रुतिका ब्रह्ममें समन्वय है। मतः मख्य प्राण मी अन्य इन्द्रियोंके समान ब्रह्मसे उत्पन्न होता है || ८ ||

वायुक्रियाधिकरणम्

2.4.9 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ९

सूत्र २.४.९

न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥ २.४.९ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 582

पदच्छेद — न , वायुक्रिये , पृथगुपदेशात्

सूत्रार्थ — ( न वायुक्रिये ) मुख्य प्राण न वायु है और न इन्द्रियोंका व्यापार, किन्तु वायु विशेष है | ( पृथगुपदेशात् ) क्योंकि ' स वायुना ज्योतिषा ' ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इत्यादि श्रुतिमें उसका पृथक उपदेश है।

शाङ्करभाष्य

स पुनर्मुख्यः प्राणः किंस्वरूप इति इदानीं जिज्ञास्यते। तत्र प्राप्तं तावत् श्रुतेः वायुः प्राण इति एवं हि श्रूयते यः प्राणः स वायुः स एष वायुः पञ्चविधः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः इति। अथवा तन्त्रान्तरीयाभिप्रायात् समस्तकरणवृत्तिः प्राण इति प्राप्तम् एवं हि तन्त्रान्तरीया आचक्षते सामान्या करणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्चेति।।

अत्रोच्यते न वायुः प्राणः नापि करणव्यापारः कुतः पृथगुपदेशात् वायोस्तावत् प्राणस्य पृथगुपदेशो भवति प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च इति न हि वायुरेव सन् वायोः पृथगुपदिश्येत। तथा करणवृत्तेरपि पृथगुपदेशो भवति वागादीनि करणान्यनुक्रम्य तत्र तत्र पृथक्प्राणस्यानुक्रमणात् वृत्तिवृत्तिमतोरभेदात् न हि करणव्यापार एव सन् करणेभ्यः पृथगुपदिश्येत। तथा एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च।

खं वायुः इत्येवमादयोऽपि वायोः करणेभ्यश्च प्राणस्य पृथगुपदेशा अनुसर्तव्याः।

न च समस्तानां करणानामेका वृत्तिः संभवति प्रत्येकमेकैकवृत्तित्वात् समुदायस्य च अकारकत्वात् ननु पञ्जरचालनन्यायेन एतद्भविष्यति यथा एकपञ्जरवर्तिन एकादशपक्षिणः प्रत्येकं प्रतिनियतव्यापाराः सन्तः संभूय एकं पञ्जरं चालयन्ति एवमेकशरीरवर्तिन एकादशप्राणाः प्रत्येकं प्रतिनियतवृत्तयः सन्तः संभूय एकां प्राणाख्यां वृत्तिं प्रतिलप्स्यन्त इति नेत्युच्यते युक्तं तत्र प्रत्येकवृत्तिभिरवान्तरव्यापारैः पञ्जरचालनानुरूपैरेवोपेताः पक्षिणः संभूय एकं पञ्जरं चालयेयुरिति तथा दृष्टत्वात् इह तु श्रवणाद्यवान्तरव्यापारोपेताः प्राणा न संभूय प्राण्युरिति युक्तम् प्रमाणाभावात् अत्यन्तविजातीयत्वाच्च श्रवणादिभ्यः प्राणनस्य।

तथा प्राणस्य श्रेष्ठत्वाद्युद्धोषणम् गुणभावोपगमश्च तं प्रति वागादीनाम् न करणवृत्तिमात्रे प्राणेऽवकल्पते। तस्मादन्यो वायुक्रियाभ्यां प्राणः। कथं तर्हीयं श्रुतिः यः प्राणः स वायुः इति उच्यते वायुरेवायम् अध्यात्ममापन्नः पञ्चव्यूहो विशेषात्मनावतिष्ठमानः प्राणो नाम भण्यते न तत्त्वान्तरम् नापि वायुमात्रम् अतश्चोभे अपि भेदाभेदश्रुती न विरुध्येते।।

स्यादेतत् प्राणोऽपि तर्हि जीववत् अस्मिन् शरीरे स्वातन्त्र्यं प्राप्नोति श्रेष्ठत्वात् गुणभावोपगमाच्च तं प्रति वागादीनामिन्द्रियाणाम् तथा हि अनेकविधा विभूतिः प्राणस्य श्राव्यते सुप्तेषु वागादिषु प्राण एवैको जागर्ति प्राण एवैको मृत्युना अनाप्तः प्राणः संवर्गो वागादीन् संवृङ्क्ते प्राण इतरान्प्राणान्रक्षति मातेव पुत्रान् इति तस्मात्प्राणस्यापि जीववत् स्वातन्त्र्यप्रसङ्गः तं परिहरति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उस मुख्य प्राणका क्या स्वरूप है, इसप्रकारकी अब जिज्ञासा होती है। श्रुतिसे ऐसा प्राप्त होता है कि प्राण वायु है, क्योंकि ' यः प्राणः स वायुः ० ' ( जो प्राण है वह वायु है वह वायु प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान भेदसे पाँच प्रकारका है ) ऐसी श्रुति है। अथवा अन्य ( सांख्य ) शास्त्रके अभिप्रायसे प्राण समस्त करणोंकी वृत्ति है, ऐसा प्राप्त होता है। क्योंकि ' इन्द्रियोंकी सामान्य वृत्ति प्राण आदि पाँच वायु है ' अन्य तन्त्रवाले ऐसा कहते हैं।

इसपर कहते हैं—- प्राण वायु नहीं है और उसी प्रकार करणोंका व्यापार भी नहीं है। किससे? इससे कि उसका पृथगुपदेश है। ' प्राण एव ० ' ( प्राण ही मनोमय ब्रह्मका चतुर्थपाद है, वह वायुरूप ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है ) इसप्रकार प्राणका वायुसे पृथक् उपदेश है। प्राण वायु होता हुआ वायुसे पृथक् उपदिष्ट नहीं होना चाहिए।

इसीप्रकार प्राणका इन्द्रिय व्यापारसे भी पृथक् उपदेश है, कारण कि वाणी आदि इन्द्रियोंक अनुक्रम कर तत् तत् प्रकरण में प्राणका पृथक् अनुक्रम है और वृत्ति और वृत्तिमानका अभेद है, . करणोंका व्यापार होता हुआ उसका करणोंसे पृथक् उपदेश नहीं होना चाहिए। उसीप्रकार ' एतस्माज्जायते ० ' ( इससे प्राण, मन तथा सब इन्द्रियाँ, आकाश और वायु उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंका जिनमें प्राणका वायु और इन्द्रियोंसे पृथक् उपदेश है उनका मी अनुसरण करना चाहिए।

समस्त करणोंकी एक वृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि प्रत्येक इन्द्रियकी पृथक् एक एक वृत्ति है और समुदाय कारक नहीं है। परन्तु पञ्जर चालन न्याय से यह हो जायगा - जैसे एक पिंजरामें वर्तमान एकादश पक्षी प्रत्येक प्रतिनियत व्यापारवाले होते हुए भी मिलकर एक पिंजराको चलाते हैं, वैसे ही एक शरीरवर्ती एकादश त्राण प्रत्येक प्रतिनियत व्यापारवाले होते हुए भी मिलकर एक प्राण नामक वृत्तिको प्राप्त करेंगे।

नहीं, ऐसा कहते हैं -- प्रत्येकमें रहनेवाले पिंजरा संचालनके अनुरूप अवान्तर व्यापारों से युक्त पक्षी मिलकर एक पिजराको हिलावें उसमें तो यह युक्त है, क्योंकि वैसा देखानेमें आता है। यहाँ तो श्रवण आदि अवान्तर व्यापारोंसे युक्त इन्द्रियाँ मिलकर प्राणन व्यापार करें यह युक्त नहीं है, कारण कि प्रमाण नहीं है और प्राणन व्यापार श्रवण मदिसे अत्यन्त विलक्षण है।

इसीप्रकार प्राण में श्र ेष्ठत्व आदि उद्घोष और उसके प्रति वाक् आदिका गुणभाव स्वीकार यह करणवृत्तिमात्र प्राण में नहीं हो सकता, इसलिए प्राण वायु और इन्द्रियोंके व्यापार से भिन्न है। तो ' यः प्राणः स वायुः ' ( जो प्राण है वह वायु है ) यह श्रुति कैसे उपपन्न होगी? कहते हैं - यह वायु ही अध्यात्मभावापन्न पाँच प्रकारका होकर विशेषरूपसे अवस्थित होता हुआ प्राण नामसे कहा जाता है, वह न अन्य तत्त्व है और न वायुमात्र है, इसलिए भेद श्रुति और अभेद श्रुति दोनों मी विरुद्ध नहीं हैं॥ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इन्द्रियोंका विचार कर उनके व्यापारसे प्राणको पृथक् करनेके लिए प्राणकी उत्पत्तिका अतिदेश किया गया है। अब प्राणकी उत्पत्ति के अनन्तर प्रसंग संगति से उसके स्वरूपका विचार किया जाता है। क्या मुख्य प्राण वायुमात्र है वा इन्द्रियोंका साधारण व्यापार है अथवा अन्य तत्त्व है? इसप्रकार वायु और प्राण में भेद और अभेद श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे संशय होनेपर ' तन्त्र ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष दिखलाते हैं। सिद्धान्ती - ' अत्रोच्यते ' इत्यादिसे कहते हैं। किव मनोमय ब्रह्मके वाक्, प्राण, नेत्र और श्रोत्र ये चार पाद श्रुतिमें कहे गये हैं। प्राण अधिदैविक वायुद्वारा अभिव्यक्त होकर अपने व्यापार करनेमें समर्थ होता है, इसलिए श्रुतियोंमें प्राण और वागादि इन्द्रियोंके परस्पर संवादरूप लिङ्गसे और पृथक् उत्पत्तिरूप लिङ्गसे प्राण इन्द्रिय और उनके व्यापारसे पृथक् है।

* प्राण प्रत्येक इन्द्रियका व्यापार है अथवा समुदायका? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि जो व्यापार नेत्र इन्द्रियसे साध्य है वह श्रोत्र इन्द्रियसे साध्य नहीं है। नेत्रका व्यापार रूप आदिका ग्रहण है, श्रोत्रका व्यापार शब्द ग्रहण है। प्रत्येक इन्द्रियका भिन्न - भिन्न व्यापार है। इनमें किसीका भी प्राणन व्यापार नहीं है। द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि उस समुदायमेंसे एक, दो, तीन अथवा चार इन्द्रियोंके न होनेसे प्राणन कार्य नहीं होगा। अतः प्राणन व्यापार श्रोत्र आदिके श्रवण आदि व्यापारसे अत्यन्त भिन्न है।

* यदि प्राणको इन्द्रियोंका व्यापार मानें, तो वाणी आदि ही प्रधान होंगे, तब श्रुतिगत प्राण और इन्द्रिय संवादसे विरोध होगा, इसलिए प्राण वायु और इन्द्रियोंके व्यापारसे भिन्न है, अतः देहमें प्राप्त प्राण आदि पाँच भेदवाला विकाररूपसे स्थित वायु ही प्राण है, यह अभेद श्रुतिका भाव है || ९ |

2.4.10 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १०

सूत्र २.४.१०

चक्षुरादिवत् तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॥ २.४.१० ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 585

पदच्छेद — चक्षुरादिवत् , तु , तत्सहशिष्टयादिभ्यः

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है। प्राण जीवात्मा के समान स्वतन्त्र नहीं है, किन्तु ( चक्षुरादिवत् ) चक्षु आदिके समान पराधीन है, क्योंकि प्राणोंके संवाद प्रकरण में ( तत्सहशिष्टाचादिभ्यः ) चक्षु मादिके साथ प्राणका उपदेश है और उसमें अचेतनत्व आदिका प्रतिपादन है!

शाङ्करभाष्य

तुशब्दः प्राणस्य जीववत् स्वातन्त्र्यं व्यावर्तयति। यथा चक्षुरादीनि राजप्रकृतिवत् जीवस्य कर्तृत्वं भोक्तृत्वं च प्रति उपकरणानि न स्वतन्त्राणि तथा मुख्योऽपि प्राणः राजमन्त्रिवत् जीवस्य सर्वार्थकरत्वेन उपकरणभूतः न स्वतन्त्रः। कुतः तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः तैश्चक्षुरादिभिः सहैव प्राणः शिष्यते प्राणसंवादादिषु समानधर्मणां च सह शासनं युक्तं बृहद्रथंतरादिवत् आदिशब्देन संहतत्वाचेतनत्वादीन् प्राणस्य स्वातन्त्र्यनिराकरणहेतून् दर्शयति।। स्यादेतत् यदि चक्षुरादिवत् प्राणस्य जीवं प्रति करणभावोऽभ्युपगम्येत विषयान्तरं रूपादिवत् प्रसज्येत रूपालोचनादिभिर्वृत्तिभिर्यथास्वं चक्षुरादीनां जीवं प्रति करणभावो भवति। अपि च एकादशैव कार्यजातानि रूपालोचनादीनि परिगणितानि यदर्थमेकादश प्राणाः संगृहीताः न तु द्वादशमपरं कार्यजातमवगम्यते यदर्थमयं द्वादशः प्राणः प्रतिज्ञायत इति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा हो, परन्तु तब प्राणको भी इस शरीर में जीवके समान स्नातन्त्र्य प्राप्त होता है, क्योंकि वह श्रेष्ठ है . और वाणी आदि इन्द्रियाँ उसके अङ्गरूपसे स्वीकार हैं। इसीप्रकार ' सुप्तेषु ० ' ( वाक् आदि इन्द्रियोंके सुप्त होनेपर अकेला प्राण ही जागता है, अकेला प्राण ही मृत्युसे व्याप्त नहीं होता, वाक् आदिका अपनेमें संहरण करता है, अतः प्राण संवर्ग है, जैसे माता पुत्रोंकी रक्षा करती है, वैसे प्राण अन्य प्राणों - इन्द्रियोंकी रक्षा करता है ) इसप्रकार प्राणकी अनेक प्रकारकी विभूति सुनी जाती है। इसलिए प्राण में भी जीवके समान स्वातन्त्र्य प्रसंग है। उसका परिहार करते हैंमी राजमन्त्रीके समान जीवका सर्वार्थं साधक होनेसे उपकरण भूत हैं स्वतन्त्र नहीं है। किससे? इससे कि उनके साथ इनका उपदेश आदि है। प्राणसंवाद आदिमें उन चक्षु आदिके साथ ही प्राणका शासन ( उपदेश ) किया जाता है और समान धर्मवालोंका बृहत् ( बृहदादित्ये प्रोतम् छा ० २ | १४ | १ ) रथान्तर ( रथन्तरमग्नौ प्रोतम् छा ० २।१२।१ ) आदिके समान एक साथ शासन युक्त है। भगवान् सूत्रकार सूत्रस्थ आदि शब्दसे संहतत्व, अचेतनत्व आदि प्राणके स्वातन्त्र्य निवारक हेतुओंको - दिखलाते हैं॥ १०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि प्राणको इन्द्रियोंका व्यापार न मानें, तो वह जीवके समान इस शरीमें स्वतन्त्र कर्ता, मोक्ता होगा? ' प्राणो न भोक्ता भोगोपकरणत्वात्, चक्षुरादिवत् ' ( प्राण भोक्ता नहीं है, क्योंकि भोगका साधन है जैसे चक्षु आदि ) जैसे बृहत् और स्थान्तर नामवाले सामविशेषका सर्वत्र साथ प्रयोग है अथवा सामत्व होनेके कारण दोनोंमें सादृश्य होनेसे साथ पाठ है, वैसे ही उपकरण रूपसे प्राणका इन्द्रियोंके साथ सादृश्य होने से उनके साथ पाठ है। ' प्राणो न भोक्ता सावयवत्वात् जड़त्वात् भौतिकत्वाच्च देहवत् ' ( प्राण मोक्ता नहीं है, क्योंकि वह देहके समान सावयव, जड़ और मौतिक है ) इसलिए प्राण इन्द्रियोंके समान उपकरण होने से इस शरीरमें स्वतन्त्र भोक्ता नहीं है॥ १०

2.4.11 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ११

सूत्र २.४.११

अकरणत्वाच् च न दोषस् तथा हि दर्शयति ॥ २.४.११ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.११ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 585

पदच्छेद — अकरणत्वात् , च , न दोषः , तथा , हि , दर्शयति । ' तु ' शब्द जीवके समान प्राणकी स्वतन्त्रताकी व्यावृत्ति करता है । जैसे चक्षु आदि इन्द्रियाँ राजसेवकके समान जीवके कर्तृत्व , भोक्तृत्वके प्रति उपकरण हैं स्वतन्त्र नहीं हैं , वैसे ही मुख्य प्राण

शाङ्करभाष्य

न तावद्विषयान्तरप्रसङ्गो दोषः अकरणत्वात्प्राणस्य न हि चक्षुरादिवत् प्राणस्य विषयपरिच्छेदेन करणत्वमभ्युपगम्यते। न च अस्य एतावता कार्याभाव एव कस्मात् तथा हि श्रुतिः प्राणान्तरेष्वसंभाव्यमानं मुख्यप्राणस्य वैशेषिकं कार्यं दर्शयति प्राणसंवादादिषु अथ ह प्राणा अहं श्रेयसि व्यूदिरे इत्युपक्रम्य यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठः इति च उपन्यस्य प्रत्येकं वागाद्युत्क्रमणेन तद्वृत्तिमात्रहीनं यथापूर्वं जीवनं दर्शयित्वा प्राणोच्चिक्रमिषायां वागादिशैथिल्यापत्तिं शरीरपातप्रसङ्गं च दर्शयन्ती श्रुतिः प्राणनिमित्तां शरीरेन्द्रियस्थितिं दर्शयति तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामि इति च एतमेवार्थं श्रुतिराह प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायम् इति च सुप्तेषु चक्षुरादिषु प्राणनिमित्तां शरीररक्षां दर्शयति यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यति इति तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति इति च प्राणनिमित्तां शरीरेन्द्रियपुष्टिं दर्शयति कस्मिन्न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि इति स प्राणमसृजत

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा हो, यदि प्राणका नेत्र आदिके समान जीवके प्रति करणभाव स्वीकार किया जाय, तो उसके भी रूप आदिके समान अन्य विषय प्रसक्त होगा। रूप आदिके आलोचन आदि अपनी वृत्तियों द्वारा चक्षु आदिका जीवके प्रति करणभाव होता है। और रूप अलोचन आदि एकादश कार्यं समुदायकी ही गणना की गई है, जिनके लिए एकादश इन्द्रियोंका संग्रह किया गया है, किन्तु बारहवाँ अन्य कार्य समुदाय अधिगत नहीं होता, जिसके लिए इस बारहवें प्राणकी प्रतिज्ञाकी जाय। अतः इसका उत्तर कहते हैं—

सूत्रार्थ - ( अकरणत्वाच्च ) प्राणको ज्ञानमें करण न होनेसे ( न दोषः ) चक्षु आदिके समान अन्य विषय प्रसङ्गका दोष नहीं है, ( ही ) क्योंकि ( तथा ) उसीप्रकार ' तान्वरिष्ठः ' इत्यादि श्रुति शरीर और इन्द्रियोंका धारणरूप कार्यं प्राणमें ( दर्शयति ) दिखलाती है।

यहाँ अन्य विषय प्रसङ्गदोष नही है, क्योंकि प्राण अकरण है। प्राणका चक्षु आदिके समान विषय परिच्छेद - निश्चयसे करणत्व स्वीकार नहीं किया जाता।

इतने मात्रसे इसका कार्यमाव नहीं है, क्योंकि श्रुति अन्य प्राणोंमें न होनेवाला मुख्य प्राणका विशेषकार्यं प्राणसंवाद आदिमें दिखलाती है' अथ ह प्राणा ० ' ( अनन्तर प्राणोंने अपनी श्रेष्ठता के लिए विवाद किया ) इसप्रकार आरम्भकर ‘ यस्मिन् व ० ' ( प्रजापति – तुममेंसे जिसके उत्क्रान्त होनेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ - सा दिखाई देने लगे घही तुममें श्रेष्ठ है ) ऐसा उपन्यास कर प्रत्येक वाक् आदिके उत्क्रमणसे केवल उसकी वृत्तिमात्र हीन पूर्वके समान जीवन दिखलाकर प्राणके उत्क्रमणकी इच्छा होनेपर वाक् आदिकी शैल्यप्राप्ति और शरीरपात प्रसङ्गको दिखलाती हुई श्रुति प्राण निमित्तक शरीर और इन्द्रियों की स्थिति दिखलाती है।

‘ तान्वरिष्ठः प्राण उवाच ० ' ( उनसे मुख्यप्राणने कहा – मोहको मत प्राप्त हो, मैं ही अपनेको पाँच प्रकारसे विभक्तकर इस कार्य करण संघातरूप शरीरको अवलम्बन कर धारण करता हूँ ) यह श्रुति भी इसी को कहती है। ' प्राणेन ० ' ( इस निकृष्ट शरीर नामक गृहकी प्राणसे रक्षा करता हुआ ) इसप्रकार यह श्रुति [ सुषुप्ति में ] चक्षु आदिके सुप्त होनेपर प्राण निमित्तक शरोरकी रक्षा दिखलाती है।

' यस्मात्कस्माच्चाङ्गात् ० ' ( जिस किसी अङ्गसे प्राण उत्क्रमण करता है, वह ( रस ) उसी जगह सूख जाता है ) और ' तेन यदश्नाति ० ' ( उस प्राणद्वारा जीव जो खाता है और जो पीता है उससे अन्य प्राणोंका रक्षण करता है ) इसप्रकार श्रुति प्राण निमित्तक शरीर और इन्द्रियों की पुष्टि दिखलाती है।

' कस्मिन्वहमुत्क्रान्त ० ', ( किसके देहसे उत्क्रान्त होनेपर मैं उत्कान्त होऊँगा और किसके देहमें प्रतिष्ठित होनेपर मैं प्रतिष्ठित होऊँगा ) यह विचार कर ' स प्राणमसृजत ० ' ( उसने प्राणको उत्पन्न किया ) इसप्रकार श्रुति जीवकी उत्क्रान्ति और प्रतिष्ठा प्राण निमित्तक दिखलाती है।। ११

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.४.१२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.4.12 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १२

सूत्र २.४.१२

पञ्चवृत्तिर् मनोवत् व्यपदिश्यते ॥ २.४.१२ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 587

पदच्छेद — पञ्चवृत्तिः , मनोवत् , व्यपदिश्यते

सूत्रार्थ — प्राणको ' प्राणोऽपानो ० ' इत्यादि श्रुति से ( मनोवत् ) मनके समान ( पञ्चवृत्तिः ) पाँच वृत्तिवाला ( व्यपदिश्यते ) कहा जाता है।

शाङ्करभाष्य

इतश्चास्ति मुख्यस्य प्राणस्य वैशेषिकं कार्यम् यत्कारणं पञ्चवृत्तिरयं व्यपदिश्यते श्रुतिषु प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः इति वृत्तिभेदश्चायं कार्यभेदापेक्षः प्राणः प्राग्वृत्तिः उच्छ्वासादिकर्मा अपानः अवाग्वृत्तिर्निश्वासादिकर्मा व्यानः तयोः संधौ वर्तमानो वीर्यवत्कर्महेतुः उदानः ऊर्ध्ववृत्तिरुत्क्रान्त्यादिहेतुः समानः समं सर्वेष्वङ्गेषु योऽन्नरसान्नयति इत्येवं प़ञ्चवृत्तिः प्राणः मनोवत् यथा मनसः पञ्च वृत्तयः एवं प्राणस्यापीत्यर्थः। श्रोत्रादिनिमित्ताः शब्दादिविषया मनसः पञ्च वृत्तयः प्रसिद्धाः न तु कामः संकल्पः

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.४.१५ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' यद्भोगकरणं तत् सविषयं दृष्टम् ' इस व्याप्तिका शरीरमें व्यभिचार है, क्योंकि शरीर एवं इन्द्रियोंका धारण और उत्क्रमण आदि प्राणके असाधारण कार्य हैं, अतः प्राणके निर्विषय होनेपर भी शरीर आणि समान उसमें उपकरणत्व अवश्यंभावी है।। ११.।।

* काम आदि वृत्तिके समान शब्द आदि विषयक मनकी वृत्तिरूप ज्ञानमें पश्चत्य संख्याका नियम नहीं है, इससे प्राण और मनका उपमानोपमेय भाव नहीं हो सकता, इस अरुचि से ' नन्वत्रापि ' इत्यादिसे अन्य पक्षका ग्रहण किया गया है। ' प्रमाण ० ' यह उपमान योगमतको मानकर कहा गया है। परन्तु सिद्धान्तमें भ्रम और निद्रा ये अविद्याकी वृत्ति हैं मनकी नहीं। इस अरुचिसे सिद्धान्ती ' बहुवृत्तित्वमात्रेण ' आदिसे अपना मत अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रकार प्राण और वायुकी भेद और भेद श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है॥ १२

श्रेष्ठाणुत्वाधिकरणम्

2.4.13 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १३

सूत्र २.४.१३

अणुश्च ॥ २.४.१३ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 588

पदच्छेद — अणुः च

सूत्रार्थ — मुख्य प्राण अणु - सूक्ष्म और परिच्छिन्न है।

शाङ्करभाष्य

योजना करनी चाहिए॥ १२॥

* अणुश्चायं मुख्यः प्राणः प्रत्येतव्यः, इतरप्राणवत्। अणुत्वं चेहापि सौक्ष्म्यपरिच्छेदौ, न परमाणुतुल्यत्वम्, पञ्चभिर्वृत्तिभिः कृत्स्नशरीरव्यापित्वात्, सूक्ष्मः प्राणः उत्कान्तौ पार्श्वस्थेनानुपलभ्यमानत्वात् परिच्छिन्न श्चोत्कान्ति गत्या गतिश्रुतिभ्यः। ननु विभुत्वमपि प्राणस्य समाम्नायते -- ' समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एमिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण ' ( बृह ० १।३।२२ ) इत्येवमादिप्रदेशेषु।

तदुच्यते - आधिदैविकेन समष्टिव्यष्टिरूपेण हैरण्यगर्भेण प्राणात्मनैवैतद्विभुत्वमाम्नायते,

नाध्यात्मिकेन। अपि च समः प्लुषिणेत्यादिना साम्यचचनेन प्रतिप्राणिवर्तिनः प्राणस्य

परिच्छेद एव प्रदर्श्यते तस्माददोषः॥ १३

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.४.१५ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत अधिकरणमें प्राणकी उत्पत्ति और स्वरूप कहकर अब परिमाणको अतिदेशसे कहते हैं' अणवश्च ' इस सूत्रमें और ' प्राणाः सर्वे अनन्ताः ' इस श्रुतिमें उपासनाके लिए इन्द्रियोंमें अनन्तता प्रतिपादित है और यहाँ प्राणका विभुत्व आधिदैविक है, इससे यहाँ पुनरुक्ति नहीं है। टीकाकार कहते हैं कि वहाँ प्रसङ्गसे सांख्यके आक्षेपका निराकरण है और यहाँ श्रुति विरोधका परिहार है, अतः पुनरुक्ति नहीं है। इसलिए सूक्ष्म और परिच्छिन्न श्रुतियोंका विभुत्व श्रुतिसे विरोध न होनेसे ब्रह्ममें समन्वय है॥ १३

ज्योतिराद्यधिकरणम्

2.4.14 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १४

सूत्र २.४.१४

निश्चीयते ॥ २.४.१४ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 590

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.४.१५ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — गत अधिकरणमें प्राण में आध्यात्मिक और आधिदैविक विभागसे अणुत्व और विभुत्व की व्यवस्था की गई है। अब प्रसंगसंगति से आध्यात्मिक प्राणोंकी स्वकार्यमें प्रवृत्ति अधिदैविक देवताके अधीन है अथवा नहीं? ऐसा सन्देह होता है, क्योंकि ' वाचा हि नामान्यभिवदति चक्षुषा रूपाणि पश्यति ' ( वाणीसे नामोंका उच्चारण करता है और चक्षुसे रूप देखता है ) इसप्रकार अन्वयव्यतिरेक युक्त तृतीया श्रुतिसे वाग् आदिकी स्वतन्त्र प्रवृत्तिका निषेध है, और ' अग्निर्वाग्भूत्वा ' इत्यादि श्रुति अचेतन अग्नि आदिका उपादान कारण कहती है। परन्तु अग्नि यादि उनके अधिष्ठातृ देवता हैं, ऐसा नहीं कहती। किञ्च जीव अधिष्ठाता विद्यमान है, और अनेक देवताओंके अधिष्ठाता होनेपर परस्पर विरोधसे कोई भी कार्य नहीं हो सकेगा। इसलिए इन्द्रियाँ अपने कार्यमें स्वतन्त्र प्रवृत्त होतों हैं। सिद्धान्ती - ' एवं प्राप्त इदमुच्यते ' आदिसे सिद्धान्त कहते हैं।

मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः चक्षुरादित्यम् ' ( मृत पुरुषकी वाणी अग्नि में, प्राण वायु में और चक्षु आदित्यमें लीन होते हैं ) इत्यादि श्रुति भी अग्नि आदि और वाक् आदिका अधिष्ठात्रविष्ठेयभाव सम्बन्ध दिखलाती है। रथ आदिकी बैल आदि अधिष्ठित होनेपर प्रवृत्ति देखी जाती है और .. दूध आदि अधिष्ठित न होते हुए भी दधि आदि रूपसे प्रवृत्त होते देखे जाते हैं। यद्यपि इस तरह दोनों प्रकारसे प्रवृत्तिका संभव है, तो भी वाणी आदि श्रुति प्रमाणसे अग्नि आदि देवताओंसे अघिष्ठित होकर ही अपने कार्यमें प्रवृत्त होते हैं॥ १४

2.4.15 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १५

सूत्र २.४.१५

ज्योतिर् आद्यधिष्ठानं तु तदामननात्प्राणवता शब्दात् ॥ २.४.१५ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 590

पदच्छेद — प्राणवता , शब्दात्

सूत्रार्थ — ( प्राणवता ) प्राणवान् जीवके साथ इन्द्रियोंका स्वस्वामिभाव सम्बन्ध है, अतः वही मोक्ता है, ( शब्दात् ) क्योंकि इसमें ' स चाक्षुषः पुरुषो ' इत्यादि श्रुति है।

शाङ्करभाष्य

ते पुनः प्रकृताः प्राणाः किं स्वमहिम्नैव स्वस्मै स्वस्मै कार्याय प्रभवन्ति आहोस्विद्देवताधिष्ठिताः प्रभवन्ति इति विचार्यते। तत्र प्राप्तं तावत् यथास्वं कार्यशक्तियोगात् स्वमहिम्नैव प्राणाः प्रवर्तेरन्निति अपि च देवताधिष्ठितानां प्राणानां प्रवृत्तावभ्युगम्यमानायां तासामेवाधिष्ठात्रीणां देवतानां भोक्तृत्वप्रसङ्गात् शारीरस्य भोक्तृत्वं प्रलीयेत अतः स्वमहिम्नैव एषां प्रवृत्तिरिति एवं प्राप्ते इदमुच्यते ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु इति। तुशब्देन पूर्वपक्षो व्यावर्त्यते।

ज्योतिरादिभिरग्न्याद्यभिमानिनीभिर्देवताभिरधिष्ठितं वागादिकरणजातं स्वकार्येषु प्रवर्तत इति प्रतिजानीते। हेतुं च व्याचष्ठे तदामननादिति तथा हि आमनन्ति अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् इत्यादि अग्नेश्चायं वाग्भावो मुखप्रवेशश्च देवतात्मना अधिष्ठातृत्वमङ्गीकृत्य उच्यते न हि देवतासंबन्धं प्रत्याख्याय अग्नेः वाचि मुखे वा कश्चिद्विशेषसंबन्धो दृश्यते तथा वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् इत्येवमाद्यपि योजयितव्यम्।

तथा अन्यत्रापि वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च इत्येवमादिना वागादीनाम् अग्न्यादिज्योतिष्ट्वादिवचनेन एतमेवार्थं द्रढयति। स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् इति च एवमादिना वागादीनामग्न्यादिभावापत्तिवचनेन एतमेवार्थं द्योतयति। सर्वत्र च अध्यात्माधिदैवतविभागेन वागाद्यग्न्याद्यनुक्रमणम् अनयैव प्रत्यासत्त्या भवति। स्मृतावपि वागध्यात्ममिति प्राहुर्ब्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः।

वक्तव्यमधिभूतं तु वह्निस्तत्राधिदैवतम् इत्यादिना वागादीनामग्न्यादिदेवताधिष्ठितत्वं सप्रपञ्चं प्रदर्शितम्। यदुक्तम् स्वकार्यशक्तियोगात्स्वमहिम्नैव प्राणाः प्रवर्तेरन्निति तदयुक्तम् शक्तानामपि शकटादीनामनडुहाद्यधिष्ठितानां प्रवृत्तिदर्शनात् उभयथोपपत्तौ च आगमात् वागादीनां देवताधिष्ठितत्वमेव निश्चीयते।। यदप्युक्तम् देवतानामेवाधिष्ठात्रीणां भोक्तृत्वप्रसङ्गः न शारीरस्येति तत्परिह्रियते

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस हेतु से भी मुख्यत्राणका विशेष कार्य है, क्योंकि ' प्राणोऽपानो ० ' ( प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान ) इस प्रकार श्रुतियों में यह प्राण पाँच वृत्तिवाला कहा जाता है। प्राण - प्राग्वृत्तिजिसका व्यापार बाहर उच्छ्वास आदि देहधारण कर्म है। अपान - अर्वाग्वृत्ति- जिसका व्यापार मीतर आकर्षण और निश्वास कर्म है। व्यान इन दोनोंकी सन्धिमें वर्तमान होता हुआ वीर्यवान् कर्मका हेतु है। उदान ऊर्ध्वं वृत्तिवाला और उत्क्रान्ति आदि ( गति, आगति ) का हेतु है।

जो सब अङ्गों में समानरूपसे अन्नरसों को ले जाता है वह समान है, इसप्रकार कार्यभेदकी अपेक्षा यह वृत्तिभेद है। ऐसे मनके समान प्राण मी पांच वृत्तिवाला है। जैसे मनकी पाँच वृत्तियाँ है, वैसे प्राणकी भी पाँच वृत्ति हैं, यह अर्थ है। श्रोत्र आदि निमित्तसे शब्द आदि विषयक मनकी पाँच वृत्तियाँ प्रसिद्ध हैं। परन्तु ' कामः संकल्पः ' इत्यादि श्रतिमें पठित काम, संकल्प आदि वृत्तियोंका यहाँ ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनके ग्रहणसे पाँच संख्या से अधिक हो जायंगी।

परन्तु यहाँ मी श्रोत्र आदि निरपेक्ष भूत और भविष्यत् आदि विषयक अन्य भी मनकी वृत्तियाँ हैं, इसप्रकार पाँच संख्या से अधिकता समान है, यदि ऐसा हो तो ' पर मतसे अविरुद्ध अनुमत होता है ' इस न्यायसे यहाँ भी योगशास्त्रमें प्रसिद्ध मनकी पाँच वृत्तियों का ग्रहण किया जाता है – ' प्रवण ० ' ( प्रमाण - प्रमिति, विपर्यय ( भ्रम ) विकल्प ( शशविषाणादिज्ञान ) निद्रा और स्मृति ) अथवा अनेक वृत्तिवाला होनेसे मन प्राणका दृष्टान्त है, ऐसा समझना चाहिए।

अथवा ' प्राण भी जीवका उपकरण है पाँच वृत्तिवाला होनेसे मनके समान ' ऐसी

सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्ष के निरासार्थं है, ( ज्योतिराद्यधिष्ठानम् )

चक्षु आदि इन्द्रियों आदि देवताके अधीन चेष्टा होतो है, ( तदामननात् ) क्योंकि ' अग्निर्वाग्भूत्वा '

इत्यादि श्रुतियाँ है।

और यह मुख्य प्राण अन्य प्राणोंके समान अणु सूक्ष्म समझना चाहिए, यहाँ भी अणुत्व सूक्ष्म और परिच्छिन्न है, परमाणु तुल्य नहीं है। प्राण सूक्ष्म है, क्योंकि पाँच वृत्तियोंद्वारा सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त और उत्क्रान्तिके समयमें पार्श्वस्थ लोगोंसे उपलब्ध नहीं होता। परिच्छिन्न भी है, क्योंकि उत्क्रान्ति, गति और मागतिकी श्रुतियाँ हैं। परन्तु ' समः प्लुषिणा ' ( पूतिका ( मच्छरसे सूक्ष्म जन्तु ) के समान, मच्छर के समान, हाथीके समान, इन तीन लोकोंके समान और इस सबके समान ) इत्यादि . स्थलों में प्राणकी विभुत्व प्रतिपादिक श्रुति है। सिद्धान्ती - उसपर कहते हैं - आधिदैविक समष्टि - व्यष्टिरूप हिरण्यगर्भकी प्राणरूपसे ही यह विभुत्व श्रुति है, आध्यात्मिकरूपसे नहीं। और ' पूतिकाके समान ' इत्यादि साम्य - वचनसे प्रत्येक प्राणी में वर्ती प्राणको परिच्छिन्न ही दिखलाया जाता है, इसलिए दोष नहीं है॥ १६॥

क्या वे प्रकृत प्राण अपनी महिमासे ही अपने अपने कार्यके लिए समर्थ होते हैं, अथवा देवता अधिष्ठित होते हुए समर्थ होते हैं? इसपर विचार किया जाता है। पूर्वपक्षी - अपनी कार्यशक्तिके योग से अपनी महिमासे ही प्राण अपने कार्यमें प्रवृत्त होने चाहिए, क्योंकि देवतासे अधिष्ठित प्राणोंकी प्रवृत्ति स्वीकार करनेपर उन अधिष्ठातृ देवताओंको ही मोक्तृत्व प्रसंग होनेसे शारीरका भोक्तृत्व लुप्त हो जायगा, अतः अपनी महिमासे ही इनकी प्रवृत्ति है, ऐसा यहाँ प्राप्त होता है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है - ' ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु ' ' तु ' शब्दसे पूर्वपक्ष की व्यावृत्ति की जाती है I

। ज्योति आदिसे अग्नि आदि अभिमानी देवताओंसे अधिष्ठित वाणी आदि करण समुदाय अपने कार्यमें प्रवृत्त होता है, ऐसी प्रतिज्ञा करते हैं। हेतुका व्याख्यान करते हैं - ' तदामननात् ' इसीप्रकार ' अग्निर्वाग्भूत्वा ० ' ( अग्नि वाक् होकर मुखमें प्रविष्ट हुई ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं। अग्निका यह वाक्भाव और मुख प्रवेश देवतारूपसे अधिष्ठातृत्व अङ्गीकारकर कहा जाता है, क्योंकि देवतासम्बन्धका निराकरणकर अग्निका वाणी अथवा मुखमें कोई विशेष सम्बन्ध दिखाई नहीं देता।

इसी प्रकार ' वायुः प्राणो भूत्वा ० ' ( वायु प्राण होकर नासिका में प्रविष्ट हुआ ) इत्यादिकी भी योजना करनी चाहिए। इसीप्रकार अन्यत्र भी ' वागेव ० ' वाणी ही ब्रह्माका चतुर्थ पाद है, वह अग्निरूप ज्योतिसे दोप्त होता है और अपना कार्य करता है ) इत्यादिसे वाक् आदि अग्नि आदि ज्योति हैं, आदि वचनसे इसी अर्थको श्रुति दृढ करती है। ' स ह बै ० ' ( उसे प्रसिद्ध प्राणने उद्गीथ कर्म में प्रधान वाग्देवताको मृत्यु ( अनृतवदन आदि ) से पार पहुँचाया।

वह वाक् जब मृत्युसे मुक्त हुई तब वह अग्नि हो ८।१२।४ ) इत्येवंजातीयका शारीरेणैव प्राणानां संबन्धं श्रावयति। अपि चानेकत्वात्प्रतिगई ) इत्यादि श्रुतिवाक् आदिमें अग्नि आदि भावकी प्राप्ति वचनसे इसी अर्थको सूचित करती है। और सर्वत्र अध्यात्म और अधिदैवत विभागसे वाणी आदि और अग्नि आदि अनुक्रमण इस प्रत्यासत्तिसम्बन्धसे होता है।

स्मृतिमें भी ' वागध्यात्ममिति ० ' ( तत्त्वदर्शी ब्राह्मण वाणीको आध्यात्म कहते हैं, वक्तव्यको अधिभूत और उसमें अग्निको अधिदैवत कहते हैं ) इत्यादिसे वाक् आदि अग्नि आदि देवताओंसे अधिष्ठित हैं, ऐसा विस्तार पूर्वक दिखलाया गया है। जो यह कहा गया है कि प्राण

है, क्योंकि रथ आदि समर्थ अपनी कार्यशक्तिके योगसे अपनी ही महिमासे प्रवृत्त होंगे, यह अयुक्त होनेपर भी बैल आदि अधिष्ठित होकर उनमें प्रवृत्ति देखी जाती है।

दोनों प्रकारसे उपपत्ति होनेपर मी आगमसे वाणी आदिमें देवता अधिष्ठितत्व निश्चित होता है॥ १४

॥

जो यह कहा गया है कि अधिष्ठातृ देवताओंको भोक्तृत्व प्रसंग

होगा और जीवको नहीं, उसका परिहार किया जाता है-

संघातके स्वामी जीवसे ही इन

प्राणोंके अधिष्ठातृ देवताओंके होनेपर भी प्राणवान् कार्यकरण प्राणोंका सम्बन्ध श्रुति से अवगत होता है। जैसे कि ' अथ यत्रैतद ० '

( जिसमें यह चक्षु कृष्णतारासे उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है, उसे रूप ग्रहण के

लिए नेत्रेन्द्रिय है, जो ऐसा जानता है कि मैं इसे सूँघूँ वह आत्मा है, उसे गन्ध ग्रहणके लिए

घ्राण है ) इसप्रकारकी श्रुति करणमधिष्ठात्रीणां देवतानां न भोक्तृत्वमस्मि शरीरेऽवकल्पते। इको हायमस्मि शरीरे जीवात्मा के साथ ही प्राणोंका सम्बन्ध श्रवण कराती है। और प्रत्येक करणमें अधिष्ठातृ देवताओं के अनेक होनेसे उनका इस शरीर में मोक्तृत्व नहीं हो सकता, क्योंकि इस शरीरमें यह एक ही जीवात्मा प्रतिसंधान आदिके संभवसे भोक्ता अवगत होता है॥ १५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' जिस मैंने रूपको देखा वही मैं श्रवण करता हूँ ' इत्यादि प्रतिसंधानसे इस शरीर में एक ही जीवात्मा मोक्ता सिद्ध होता है। इसप्रकारका अनुसंधान अनेक भोक्ता माननेपर सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिए इस शरीरमें अनेक देवता भोक्ता नहीं हो सकते॥ १५

2.4.16 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १६

सूत्र २.४.१६

तस्य च नित्यत्वात् ॥ २.४.१६ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 591

पदच्छेद — तस्य च नित्यत्वात्

सूत्रार्थ — ( च ) और ( तस्य ) जीवके स्वकर्मोपार्जित शरीर में कर्तृत्व और मोक्तृत्व द्वारा ( नित्यत्वात् ) नित्य होने से देवताओं में भोक्तृत्व नहीं है।

शाङ्करभाष्य

तस्य च शारीरस्यास्मिन् शरीरे भोक्तृत्वेन नित्यत्वम् पुण्यपापोपलेपसंभवात् सुखदुःखोपभोगसंभवाच्च न देवतानाम् ता हि परस्मिन्नैश्वर्ये पदेऽवतिष्ठमाना न हीनेऽस्मिन् शरीरे भोक्तृत्वं प्रतिलब्धुमर्हन्ति श्रुतिश्च भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान्पापं गच्छति इति। शारीरेणैव च नित्यः प्राणानां संबन्धः उत्क्रान्त्यादिषु तदनुवृत्तिदर्शनात् तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति इत्यादिश्रुतिभ्यः। तस्मात् सतीष्वपि करणानां नियन्त्रीषु देवतासु न शारीरस्य भोक्तृत्वमपगच्छति करणपक्षस्यैव हि देवता न भोक्तृपक्षस्येति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और वह जीव इस शरीर में मोक्तारूपसे नित्य है, क्योंकि उसमें पुण्य पापके सम्बन्धका संभव है और सुख, दुःखके उपभोगका संभव है, किन्तु देवताओं में नहीं, कारणकि वे परम ऐश्वयं पदपर अवतिष्ठमान होते हुए इस दूषित शरीरमें मोक्तृत्व प्राप्त करनेके लिए योग्य नहीं हैं ' पुण्यमेवामु ० '

नहीं होता ) यह श्रुति है | और ( प्राजापत्य पदमें स्थित देवताओं को पुण्यही प्राप्त होता है पाप प्राप्त

( उसके उत्कान्त होने के अनन्तर जीवात्माके साथ प्राणोंका नित्य सम्बन्ध है, क्योंकि ' तमुत्कामन्तं ० ' प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रान्त होनेके अनन्तर उसके पीछे

सब प्राण उत्क्रमण करते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे उत्क्रान्ति आदिमें उनकी अनुवृत्ति देखी जाती है। इसलिए

इन्द्रियोंके नियामक देवताओंके होंने पर भी जीवका भोक्तृत्व हटता नहीं, क्योंकि करण पक्षके ही देवता हैं

मोक्तृपक्षके नहीं हैं।। १६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अदृष्टद्वारा जीव इन्द्रियोंका अधिष्ठाता है, इसलिए रथ

स्वामीके समान भोक्ता है, देवता तो प्रकाशके समान इन्द्रियों के उपकारक होनेसे सारथीके समान अधिष्ठाता हैं, इससे देवता करणपक्ष हैं और जीव मोक्तृपक्षका है। ' चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ' यह श्रुति साधनमात्रका प्रतिपादन करती है, इसलिए इन श्रुतियोंका ' अग्निर्वाग्भूत्वा ' इत्यादि देवताधिष्ठात्री श्रुतिके साथ विरोध नहीं है।। १६

इन्द्रियाधिकरणम्

2.4.17 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १७

सूत्र २.४.१७

त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशाद् अन्यत्र श्रेष्ठात् ॥ २.४.१७ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 591

पदच्छेद — ते , इन्द्रियाणि , तद्वयपदेशात् , अन्यत्र , श्रेष्ठात्

सूत्रार्थ — ( श्रेष्ठात् ) मुख्यप्राणडे ( अन्यत्र ) अन्य ( ते ) वागादि ( इन्द्रियाणि ) इन्द्रिय शब्दसे कहे जाते हैं, ( तद्वयपदेशात् ) क्योंकि ' एतस्माज्जायते प्राण : ' इत्यादि श्रुतिसे उसका भेदसे व्यपदेश है।

शाङ्करभाष्य

मुख्यश्चैकः इतरे चैकादश प्राणा अनुक्रान्ताः तत्रेदम परं संदिह्यते किं मुख्यस्यैव प्राणस्य वृत्तिभेदा इतरे प्राणाः आहोस्वित् तत्त्वान्तराणीति। किं तावत्प्राप्तम् मुख्यस्यैवेतरे वृत्तिभेदा इति कुतः श्रुतेः तथा हि श्रुतिः मुख्यमितरांश्च प्राणान्संनिधाप्य मुख्यात्मतामितरेषां ख्यापयति हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवन् इति प्राणैकशब्दत्वाच्च एकत्वाध्यवसायः इतरथा ह्यन्याय्यमनेकार्थत्वं प्राणशब्दस्य प्रसज्येत एकत्र वा मुख्यस्येतरत्र लाक्षणिकत्वमापद्येत।

तस्माद्यथैकस्यैव प्राणस्य प्राणाद्याः पञ्च वृत्तयः एवं वागाद्या अप्येकादशेति एवं प्राप्ते ब्रूमः तत्त्वान्तराण्येव प्राणाद्वागादीनीति कुतः व्यपदेशभेदात् कोऽयं व्यपदेशभेदः ते प्रकृताः प्राणाः श्रेष्ठं वर्जयित्वा अवशिष्टा एकादशेन्द्रियाणीत्युच्यन्ते श्रुतावेवं व्यपदेशभेददर्शनात् एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च इति ह्येवंजातीयकेषु प्रदेशेषु पृथक् प्राणो व्यपदिश्यते पृथक्च इन्द्रियाणि।

ननु मनसोऽप्येवं सति वर्जनम् इन्द्रियत्वेन प्राणवत् स्यात् मनः सर्वेन्द्रियाणि च इति पृथग्व्यपदेशदर्शनात् सत्यमेतत् स्मृतौ तु एकादशेन्द्रियाणीति मनोऽपि इन्द्रियत्वेन श्रोत्रादिवत् संगृह्यते प्राणस्य तु इन्द्रियत्वं न श्रुतौ स्मृतौ वा प्रसिद्धमस्ति। व्यपदेशभेदश्चायं तत्त्वभेदपक्षे उपपद्यते तत्त्वैकत्वे तु स एवैकः सन् प्राण इन्द्रियव्यपदेशं लभते न लभते च इति विप्रतिषिद्धम्। तस्मात्तत्त्वान्तरभूता मुख्यादितरे।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र २.४.१८ के अनुवादके साथ है।)

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.४.२० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.4.18 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १८

सूत्र २.४.१८

भेदश्रुतेर् वैलक्षण्याच् च ॥ २.४.१८ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 592

सूत्रार्थ — ' अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः ' इत्यादि श्रुतिमें प्राणका इन्द्रियोंसे पृथक् श्रवण है, अतः वागादि इन्द्रियाँ प्राणसे पृथक् तत्त्व हैं। यह दूसरा सन्देह किया जाता है कि क्या अन्य प्राण मुख्यप्राणके ही वृत्तिभेद हैं अथवा अन्य तत्त्व हैं? तो क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्षी - अन्य प्राण मुख्यप्राणके ही वृत्तिभेद हैं, किससे? श्रुतिसे।

जैसे कि ' हन्तास्यैव ० ' ( अच्छा, हम सब इसी प्राणके रूप हो जायँ - ऐसा निश्चयकर वे वागादि सब इसीके रूप हो गये ) यह श्रुति मुख्य और अन्य प्राणोंको एक दूसरेके समीप स्थापित कर अन्य प्राणोंका मुख्यप्राणरूपत्व ख्यापन करती है। इस प्रकार उन सबको उद्देश्य कर ' प्राण ' इस एक शब्दका प्रयोग होनेसे उनके एकत्वका निश्चय होता है। अन्यथा प्राणशब्दको अनेकार्थत्व अन्याय ( वाक्यभेद ) प्रसक्त होगा अथवा एकमें मुख्यत्व और अन्य में लाक्षणिकत्व प्रसक्त होगा।

इसलिए जैसे एक ही प्राणकी प्राण आदि पाँच वृत्तियाँ हैं वैसे ही वाक् आदि एकादश भी प्राणकी ही वृत्तियाँ हैं सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वाक् आदि मुख्यप्राणसे अन्य ही तत्त्व हैं। किससे? व्यपदेशके भेदसे। यह व्यपदेश भेद क्या है? श्रेष्ठको ( प्राणको ) छोड़कर वे अवशिष्ट प्रकृत प्राण एकादश इन्द्र हैं, ऐसे कहे जाते हैं, क्योंकि श्रुतिमें ही ऐसा व्यपदेश भेद देखा जाता है।

' एतस्माजायते प्राणो ० ' ( उससे प्राण, मन और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं ) इस प्रकारके श्रुतिवाक्यों में प्राणका पृथक् व्यपदेश किया जाता है और इन्द्रियों का पृथक्।

परन्तु ऐसा होनेपर मन भी प्राणके समान इन्द्रिय नहीं होना चाहिए | क्योंकि ' मनः सर्वेन्द्रियाणि च ' इस प्रकार पृथक् व्यपदेश देखने में आता है | यह ठीक है, किन्तु स्मृतिमें तो ' एकादशेन्द्रियाणि ' इससे मनका भी श्रोत्र आादिके समान इन्द्रियरूप से संग्रह किया जाता है | परन्तु प्राण इन्द्रिय है, ऐसा श्रुति ७ और स्मृतिमें प्रसिद्ध नहीं है। यह व्यपदेशभेद तत्त्वभेद पक्षमें उपपन्न होता है।

तत्त्व ( पदार्थ ) के एक होनेपर तो ' वह प्राण एक होता हुआ इन्द्रिय व्यपदेशको प्राप्त होता है नहीं होता है ' ऐसा विरुद्ध है। इसलिए अन्य - वागादि इन्द्रियां मुख्यप्राणसे अन्य तत्त्वभूत हैं॥ १७॥ और वागादि इन्द्रिय तत्त्वान्तरभूत क्यों हैं?

शाङ्करभाष्य

भेदेन वागादिभ्यः प्राणः सर्वत्र श्रूयते ते ह वाचमूचुः इत्युपक्रम्य वागादीनसुरपाप्मविध्वस्तानुपन्यस्य उपसंहृत्य वागादिप्रकरणम् अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः इत्यसुरविध्वंसिनो मुख्यस्य प्राणस्य पृथगुपक्रमणात्। तथा मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुत इत्येवमाद्या अपि भेदश्रुतय उदाहर्तव्याः। तस्मादपि तत्त्वान्तरभूता मुख्यादितरे।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उन एकादश प्राणोंके विषयमें

और मुख्य प्राण एक और अन्य एकादश प्राण अनुक्रान्त हैं।

सूत्रार्थ - और सुषुप्ति में प्राणकी स्थिति है और वाग् आदि इन्द्रियोंकी नहीं है, इस वैलक्षण्यसे मी वागादि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणसे भिन्न तत्त्व हैं।

वैलक्षण्यं च भवति मुख्यस्येतरेषां च। सुप्तेषु वागादिषु मुख्य एको जागर्ति स एव चैको मृत्युनाऽनाप्त आप्तास्त्वितरे। तस्यैव च स्थित्युक्तातिभ्यां देहधारणपतनहेतुत्वं

प्राणका वागादिसे सर्वत्र भेदसे श्रवण होता है, ' ते ह वाचमूचुः ' ( देवताओंने वाणी से कहा ) इस प्रकार उपक्रम कर असुरोंसे पाप विद्ध वाक् आदि इन्द्रियोंको कहकर और वाक् आदिके प्रकरणको समाप्तकर ' अथ हेममासन्यं ० ' ( अनन्तर मुखस्थ इस प्राणको कहा ) इस प्रकार असुरोका विध्वंस करनेवाले मुख्य प्राणका पृथक् उपक्रम है। उसी प्रकार ' मनो वाचं ० ' ( मन, वाक् और प्राण उनको प्रजापतिने अपने लिए किया > ) इत्यादि श्रुतियाँ भी उदाहरणरूपसे देनी चाहिएँ। इससे भी अन्यवाक् आदि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणसे भिन्न तत्त्व हैं॥ १८

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.४.२० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

2.4.19 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १९

सूत्र २.४.१९

भेदश्रुतेर् वैलक्षण्याच् च ॥ २.४.१९ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.१९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 593

शाङ्करभाष्य

भेदेन वागादिभ्यः प्राणः सर्वत्र श्रूयते ते ह वाचमूचुः इत्युपक्रम्य वागादीनसुरपाप्मविध्वस्तानुपन्यस्य उपसंहृत्य वागादिप्रकरणम् अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः इत्यसुरविध्वंसिनो मुख्यस्य प्राणस्य पृथगुपक्रमणात्। तथा मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुत इत्येवमाद्या अपि भेदश्रुतय उदाहर्तव्याः। तस्मादपि तत्त्वान्तरभूता मुख्यादितरे।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और वागादि इन्द्रिय अन्य तत्त्व क्यों हैं?

मुख्य प्राण और अन्यों ( वागादि ) में वैलक्षण्य भी है। वाक् आदि इन्द्रियोंके सुषुप्त होनेपर अकेला मुख्य प्राण जागता है और वही एक मृत्युसे व्याप्त नहीं होता और अन्य प्राण तो आक्रान्त होते हैं। वही स्थिति और उत्क्रान्तिसे देह धारण और पतनका हैतु है, किन्तु इन्द्रियाँ नहीं हैं। इन्द्रियाँ विषयके ज्ञानमें निमित्त हैं, किन्तु प्राण नहीं है इस प्रकारका प्राण और इन्द्रियोंमें महान् लक्षणभेद है, इससे मी वे अन्य तत्त्व सिद्ध होते हैं।

जो यह कहा गया है कि ' वे एतस्यैव ० ' ( वे सब . उसके ही रूप हुए ) इस श्रुतिसे इन्द्रियाँ प्राण ही हैं, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि वहाँ भी पूर्वापरके पर्यालोचनसे भेद प्रतीत होता है।

जैसे कि ' वदिष्याम्येवाहमिति ० ' ( वाकमे व्रत किया कि ' मैं बोलती ही रहूंगी ' ) इस प्रकार वाक् आदि इन्द्रियोंका अनुक्रम कर ' तानि मृत्युः ० ' ( मृत्युने श्रम होकर उनको व्याप्त किया, इससे वाणी श्रान्त ही होती है ) इस प्रकार वाक आदि इन्द्रियाँ श्रमरूप मृत्युसे ग्रस्त होती हैं, ऐसा कहकर ‘ अर्थममेव ० ' ( परन्तु यह मध्यम प्राण मृत्युसे . आक्रन्त नहीं होता ) इस प्रकार श्रुति मृत्युसे अनभिभूत उस प्राणका पृथक अनुक्रम करती है।

' अयं नै ' ( निश्चत यही हममें श्रेष्ठ है ) इस प्रकार श्रुति उसकी श्रेष्ठताका अवधारण करती है। इसलिए उसके साथ विरोध न होनेसे के प्रयोगे चारकर्तृकमेव सत्सैन्य संकलनं हेतुकर्तृत्वाद्राजाऽऽत्मन्यध्यारोपयति संकलघाक् आदिमें स्व व्यापार लाभ प्राणके अधीन है, ऐसा वाक् आदिका प्राण रूप होना है, ऐसा समझना चाहिए, तादात्म्य नहीं। अतएव प्राण शब्द इन्द्रियोंमें लाक्षणिक सिद्ध होता है।

जैसे कि ' त एतस्यैव ० ' ( वे सब इसीके रूप हो गये, अतः वे इसीके नामसे ' प्राण ' इस प्रकार कहे जाते हैं ) यह श्रुति मुख्यप्राण विषयक प्राण शब्दकी इन्द्रियोंमें लाक्षणिक वृत्ति दिखलाती है, इससे वाक् आदि इन्द्रियाँ प्राणसे पृथक् तत्त्व हैं।। १ ९

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र २.४.२० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

संज्ञामूर्ति क्लृप्त्यधिकरणम्

2.4.20 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २०

सूत्र २.४.२०

संज्ञामूर्तिकॢप्तिस् तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥ २.४.२० ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.२०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 594

पदच्छेद — संज्ञामूर्तिवलृप्तिः , तु , त्रिवृत्कुर्वतः , उपदेशात्

सूत्रार्थ — - ( तु ) पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है। ( त्रिवृत्कुर्वतः ) ' तासां त्रिवृतम् ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित त्रिवृत् कर्ता परमेश्वर ही, ( संज्ञामूर्तिक्लृप्ति :) संज्ञा - नाम, मूर्ति - रूपका व्याकर्ता है जीव नहीं, ( उपदेशात् ) क्योंकि ' व्याकरवाणि ' इत्यादि श्रतिमें उसमें ही व्याकरण कर्तृत्व का उपदेश है।

शाङ्करभाष्य

सत्प्रक्रियायां तेजोबन्नानां सृष्टिमभिधायोपदिश्यते सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति। तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति तत्र संशयः किं जीवकर्तृकमिदं नामरूपव्याकरणम् आहोस्वित्परमेश्वरकर्तृकमिति।

तत्र प्राप्तं तावत् जीवकर्तृकमेवेदं नामरूपव्याकरणमिति कुतः अनेन जीवेनात्मना इति विशेषणात् यथा लोके चारेणाहं परसैन्यमनुप्रविश्य संकलयानि इत्येवंजातीयके प्रयोगे चारकर्तृकमेव सत् सैन्यसंकलनं हेतुकर्तृत्वात् राजा आत्मन्यध्यारोपयति संकलयानीत्युत्तमपुरुषप्रयोगेण एवं जीवकर्तृकमेव सत् नामरूपव्याकरणं हेतुकर्तृत्वात् देवता आत्मन्यध्यारोपयति व्याकरवाणीत्युत्तमपुरुषप्रयोगेण। अपि च डित्थडवित्थादिषु नामसु घटशरावादिषु च रूपेषु जीवस्यैव व्याकर्तृत्वं दृष्टम्।

तस्माज्जीवकर्तृकमेवेदं नामरूपव्याकरणमित्येवं प्राप्ते अभिधत्ते संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्त्विति। तुशब्देन पक्षं व्यावर्तयति।

संज्ञामूर्तिक्लृप्तिरिति नामरूपव्याक्रियेत्येतत् त्रिवृत्कुर्वत इति परमेश्वरं लक्षयति त्रिवृत्करणे तस्य निरपवादकर्तृत्वनिर्देशात् येयं संज्ञाक्लृप्तिः मूर्तिक्लृप्तिश्च अग्निः आदित्यः चन्द्रमाः विद्युदिति तथा कुशकाशपलाशादिषु पशुमृगमनुष्यादिषु च प्रत्याकृति प्रतिव्यक्ति च अनेकप्रकारा सा खलु परमेश्वरस्यैव तेजोबन्नानां निर्मातुः कृतिर्भवितुमर्हति कुतः उपदेशात् तथा हि सेयं देवता इत्युपक्रम्य व्याकरवाणि इत्युत्तमपुरुषप्रयोगेण परस्यैव ब्रह्मणो व्याकर्तृत्वमिहोपदिश्यते।

ननु जीवेन इति विशेषणात् जीवकृर्तृकत्वं व्याकरणस्याध्यवसितम् नैतदेवम् जीवेन इत्येतत् अनुप्रविश्य इत्यनेन संबध्यते आनन्तर्यात् न व्याकरवाणि इत्यनेन तेन हि संबन्धे व्याकरवाणि इत्ययं देवताविषय उत्तमपुरुष औपचारिकः कल्प्येत न च गिरिनदीसमुद्रादिषु नानाविधेषु नामरूपेषु अनीश्वरस्य जीवस्य व्याकरणसामर्थ्यमस्ति येष्वपि च अस्ति सामर्थ्यम् तेष्वपि परमेश्वरायत्तमेव तत् न च जीवो नाम परमेश्वरादत्यन्तभिन्नः चार इव राज्ञः आत्मना इति विशेषणात् उपाधिमात्रनिबन्धनत्वाच्च जीवभावस्य तेन तत्कृतमपि नामरूपव्याकरणं परमेश्वरकृतमेव भवति परमेश्वर एव च नामरूपयोर्व्याकर्तेति सर्वोपनिषत्सिद्धान्तः आकाशो ह वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता इत्यादिश्रुतिभ्यः तस्मात् परमेश्वरस्यैव त्रिवृत्कुर्वतः कर्म नामरूपव्याकरणम्।

त्रिवृत्करणपूर्वकमेवेदम् इह नामरूपव्याकरणं विवक्ष्यते प्रत्येकं नामरूपव्याकरणस्य तेजोबन्नोत्पत्तिवचनेनैवोक्तत्वात् तच्च त्रिवृत्करणमग्न्यादित्यचन्द्रविद्युत्सु श्रुतिर्दर्शयति यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्य इत्यादिना तत्राग्निरिति इदं रूपं व्याक्रियते सति च रूपव्याकरणे विषयप्रतिलम्भादग्निरिति इदं नाम व्याक्रियते एवमेवादित्यचन्द्रविद्युत्स्वपि द्रष्टव्यम्।

अनेन च अग्न्याद्युदाहरणेन भौमाम्भसतैजसेषु त्रिष्वपि द्रव्येष्वविशेषेण त्रिवृत्करणमुक्तं भवति उपक्रमोपसंहारयोः साधारणत्वात् तथा हि अविशेषेणैव उपक्रमः इमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्ित्रवृदेकैका भवति इति अविशेषेणैव च उपसंहारः यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपम् इत्येवमादिः यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानां समासः इत्येवमन्तः।।

तासां तिसृणां देवतानाम् बहिस्त्रिवृत्कृतानां सतीनाम् अध्यात्ममपरं त्रिवृत्करणमुक्तम् इमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्ित्रवृदेकैका भवति इति तदिदानीम् आचार्यो यथाश्रुत्येवोपदर्शयति आशङ्कितं कंचिद्दोषं परिहरिष्यन्

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — · सत्के प्रकरण में तेज, जल और अन्नकी सृष्टि कहकर " सेयं देवतैक्षत ० ' ( उस सत् नामक देवताने ईक्षण किया ' मैं इस जीवरूपसे ' इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेशकर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ और उनमेंसे एक - एक देवताको त्रिवृत् त्रिवृत् करूँ ) इस प्रकार उपदेश किया जाता है। यहाँ संशय होता है कि क्या यह नाम, रूपका व्याकरण जीवकर्तृक है अथवा पमेश्वर कर्तृक है? पूर्वपक्षी - यहाँ यह प्राप्त होता है कि यह नाम - रूपका व्याकरण ( रचना ) जीव कतृक है, किससे?

इससे कि ' अनेन जीवेनात्मना ० ', ( इस जीव रूपसे ) ऐसा विशेषण है। जैसे लोकमें ' चार ( दूत ) द्वारा पर सैन्यमें प्रवेशकर मैं गणना करूँ ' इस प्रकारके प्रयोगमें सैन्य गणना चार कर्तृक होती हुई भी प्रयोजक कर्ता होने से राजा ' मैं गणना करूँ ' इस प्रकार उत्तम पुरुषके प्रयोगसे उसका अपनेमें अध्यारोप करता है, वैसे नाम, रूपका व्याकरण जीव कर्तृक होते हुए मी प्रयोजक कर्ता होने से देवता ' व्याकरवाणि ' ( व्याकरण करूं ) इस प्रकार उत्तमपुरुषके प्रयोगसे उसका अपने में अध्यारोप करता है।

और डित्थ डवित्थ आदि नामोंमें और घट शराव आदि रूपोंमें जीवका ही व्याकरण कर्तृत्व देखा गया है। इसलिए यह नाम, रूप व्याकरण जीव - कर्तृक ही है। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं' संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु '। ' तु ' शब्द से पूर्वपक्षको व्यावृत्ति करते हैं।

' संज्ञा मूर्तिक्लृप्ति ' नाम और रूपका व्याकरण ' त्रिवृत्कुर्वत ' यह परमेश्वरको लक्षित सूचित करता है, क्योंकि त्रिवृत्करणमें निरपवाद उसका ही कर्तृरूप से निर्देश है | अग्नि, आदित्य, चन्द्रमा, विद्युत् इस प्रकार जो यह नामका व्याकरण तथा कुश, काश, पलाश आदिमें और पशु, मृग, मनुष्य आदिमें प्रत्येक जाति और प्रत्येक व्यक्तिमें अनेक प्रकारका जो यह रूप व्याकरण है वह तेज, जल और अन्नके निर्माता परमेश्वरकी हो कृति हो सकती है। किससे? उपदेशसे।

जैसे कि ' सेयं देवतैक्षत ' ( उस देवताने ' ईक्षण किया ) इस प्रकार उपक्रम कर ‘ व्याकरवाणि ' ( व्याकरण करूं ) इस तरह उत्तमपुरुषके प्रयोगसे परब्रह्मका ही व्याकरणकर्तृत्व यहाँ उपदेश किया जाता है। परन्तु ' जीवेन ' इस विशेषणसे व्याकरण जीव कर्तृक निश्चित किया गया है। यह ऐसा नहीं है, क्योंकि ' जीवेन ' इसका ' अनुप्रविश्य ' ( अनुप्रवेशकर ) इसके साथ सम्बन्ध है, परन्तु आनन्तर्य होनेके कारण ' व्याकरवाणि ' इससे सम्बन्धित नहीं है।

उससे सम्बन्ध होनेपर ' व्याकरवाणि ' यह देवता विषयक उत्तमपुरुष गौपचारिक कल्पना करना पड़ेगा। और गिरि, नदी, समुद्र आदि नाना प्रकारके नाम और रूपोंके व्याकरण करनेकी अनीश्वर जीवमें सामथ्यं नहीं है, और जिनमें भी सामथ्यं है, उनमें भी वह परमेश्वर के अधीन ही है, और जैसे दूत राजासे अत्यन्त मिन है, वैसे जीव परमेश्वरसे अत्यन्त भिन्न नहीं है। क्योंकि ' आत्मना ' यह विशेषण है, और जीवभाव तो केवल उपाधि निमित्तक है। इसलिए उससे जीव कृत नाम, रूप व्याकरण भी परमेश्वर कृंत ही होता है।

और ' आकाशो बै ० ' ( आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाहक है ) इत्यादि श्रुतियोंसे परमेश्वर ही नाम और रूपका व्याकर्ता है, यह सब उपनिषदों का सिद्धान्त है। इसलिए नाम, रूपका व्याकरण त्रिवृत् करनेवाले परमेश्वरका ही कर्म है। यहाँ यह नाम, रूपका व्याकरण त्रिवृत्करण पूर्वक ही विवक्षित है, कारण कि प्रत्येक नाम, रूपका व्याकरण तेज, जल और अन्नकी उत्पत्ति वचनसे ही उक्त है।

उस त्रिवृत्करणको अग्नि, आदित्य, चन्द्र और विद्युतमें ' यदग्ने रोहितं ० ' ( अग्निका जो रोहितरूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्लरूप है वह जलका है और जो कृष्णरूप है वह अन्नका है ) इत्यादिसे श्रुति दिखलाती है। उसमें ' अग्नि ' यह रूपका व्याकरण किया जाता है, रूपके व्याकरण होनेपर विषयके उपलम्भसे ' अग्नि ' यह नामका व्याकरण है। इसी प्रकार आदित्य, चन्द्र और विद्युत् में भी समझना चाहिए।

और इन अग्नि आदि उदाहरणोंसे पार्थिव, जलीय और तेजस तीनों द्रव्यों में भी समानरूपसे त्रिवृत्करण उक्त होता है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहार उन तीनोंमें साधारण है। जैसे कि ' इमास्तिस्रो ० ' ( ये तीन देवता प्रत्येक त्रिवृत् त्रिवृत् होते हैं ) इस प्रकार यह समानरूपसे उपक्रम है, और समानरूपसे यह उपसंहार है ' यदु रोहित ० ' ( जो कुछ रोहित - सा है वह तेजका रूप है ) इस प्रकार यह आदि है और ' यदविज्ञात ० ' ( तथा जो कुछ अविज्ञात - सा है वह इन देवताओंका ही समुदाय है ) यह अन्त है॥ २०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * उत्पत्ति और उत्पादना ( उत्पन्न करना ) ये दोनों क्रमसे कार्य और कर्ताके व्यापाररूपसे प्रसिद्ध हैं। उसमें गत दो पादोंसे जगत् उत्पत्ति श्रुति विषयक विरोधका परिहार किया गया है। अब उत्पादन श्रुति विरोधका परिहार किया जाता है। उसमें मी सूक्ष्म भूत विषयक उत्पादन तो परमेश्वर कृत ही है, इसमें सब श्रुतियाँ समन्वित हैं। परन्तु स्थूल भूतोंके उत्पादनमें श्रुतियोंका विरोध है, उनके निराकरणके लिए इस अधिकरणका आरम्भ है। किञ्च नाम और रूपके भेदसे इन्द्रियाँ प्राणसे भिन्न हैं, यह कहा गया। अब प्रसङ्ग संगति से स्थूल नाम, रूप कर्तृक विचार किया जाता है। पूर्वपक्षमें जीव ही भूतोंका स्रष्टा है, और सिद्धान्तमें ब्रह्म सबका स्रष्टा है।

* तेज, जल और अन्न ( पृथिवी ) प्रत्येकके तीन - तीन भाग हुए। एक भाग अपना और दो भाग अन्यके, इस प्रकार ' त्रिवृत्करण ' सिद्ध होता है। यह पञ्चीकरणका भी उपलक्षण समझना चाहिए। पदका अन्वय पदार्थको योग्यताके अधीन होता है, अतः जीवरूपसे उनमें अनुप्रवेशकर में ( पर देवता ) ही स्थूल नाम और रूपको ' व्याकरवाणि ' व्यक्त करूंगा, ऐसा अन्वय तो युक्त है। परन्तु जीवद्वारा उनको ' व्याकरवाणि ' व्यक्त करूँगा . यह अन्वय युक्त नहीं है। इसलिए ' व्याकरवाणि ' यह उत्तम पुरुषका प्रयोग परदेवता विषयक ही है, जीव विषयक नहीं॥ २०

2.4.21 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २१

सूत्र २.४.२१

मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश् च ॥ २.४.२१ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.२१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 597

पदच्छेद — मांसादि , भौमम् , यथाशब्दम् , इतरयोः , च

सूत्रार्थ — ( मांसादि ) माँस, पुरीष आदि ( मौमम् ) त्रिवृत्कृत अन्नात्मक भूमिके कार्य हैं ( च ) और इसी प्रकार ( यथाशब्दम् ) ' मूत्रं लोहितम् ' इत्यादि श्रुतिके अनुसार ( इतरयोश्च ) मूत्र, आदि जल आदि कार्य हैं।

शाङ्करभाष्य

भूमेस्त्रिवृत्कृतायाः पुरुषेणोपभुज्यमानाया मांसादिकार्यं यथाशब्दं निष्पद्यते तथा हि श्रुतिः अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः इति त्रिवृत्कृता भूमिरेवैषा व्रीहियवाद्यन्नरूपेण अद्यत इत्यभिप्रायः तस्याश्च स्थविष्ठं रूपं पुरीषभावेन बहिर्निर्गच्छति मध्यममध्यात्मं मांसं वर्धयति अणिष्ठं तु मनः। एवमितरयोरप्तेजसोर्यथाशब्दं कार्यमवगन्तव्यम् मूत्रं लोहितं प्राणश्च अपां कार्यम् अस्थि मज्जा वाक् तेजसः इति।। अत्राह यदि सर्वमेव त्रिवृत्कृतं भूतभौतिकम् अविशेषश्रुतेः तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोत् इति किंकृतस्तर्ह्ययं विशेषव्यपदेशः इदं तेजः इमा आपः इदमन्नम् इति तथा अध्यात्मम् इदमन्नस्याशितस्य कार्यं मांसादि इदमपां पीतानां कार्यं लोहितादि इदं तेजसोऽशितस्य कार्यमस्थ्यादि इति अत्रोच्यते

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' इमास्तिस्रो ० ' ( ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत् त्रिवृत् होता है ) इसप्रकार बाह्य पदार्थमें त्रिवृत्कृत उन तीन देवताओंका दूसरा आध्यात्मिक त्रिवृत्करण कहा गया है। प्रकार मूत्र, लोहित ( रक्त ) और जल के कार्य हैं और हड्डी, मज्जा और वाक् तेजके कार्यं हैं॥ २१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * प्रत्येक त्रिवृत्कृत भूमि आदि स्थूल, मध्यम और सूक्ष्मरूपसे तीन - तीन प्रकारके हैं, और वायुरूप प्राण जलका कार्य कहा गया है वह औपचारिक समझना चाहिए। प्राणकी प्राय। जलके अधीन स्थिति होने से वह जलका कार्य कहा गया है, अतः कोई विरोध नहीं है।। २१

2.4.22 · द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २२

सूत्र २.४.२२

वैशेष्यात् तु तद्वादस् तद्वादः ॥ २.४.२२ ॥

द्वितीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र २.४.२२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 597

पदच्छेद — वैशेष्यात् , तु , तद्वादः , तद्वादः

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द शङ्कित दोषकी निवृत्ति करता है। पृथिवी आदिका त्रिवृत्करणत्व समान होनेपर भी ( वैशेष्यात् ) पृथिवी आदिके आधिक्यसे ( तद्वादः ) यह पृथिवी है, यह जल है इत्यादि व्यवहार होता है। सूत्रस्थ द्वितीय तद्वाद : ' पद अध्यायको समाप्तिका सूचक है अब आचार्य मशङ्कित किसी एक दोषके परिहारकी इच्छा करते हुए उसको श्रुति के अनुसार ही दिखलाते हैंपुरुषद्वारा त्रिवृत्कृत उपभोग की हुई भूमिका मांस आदि कार्यं श्रुतिके अनुसार निष्पन्न होता है। जैसे कि ‘ अन्नमशितं ० ' ( खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है, उसका जो अत्यन्त स्थूल भाग है वह मल है, जो मध्यम माग है वह माँस और जो अत्यन्त सूक्ष्म है वह मन हो जाता है ) यह श्रुति है। यह त्रिवृत्कृत भूमि ही व्रीहि, यव आदि अन्नरूपसे खाई जाती है, ऐसा अभिप्राय है। उसका स्थूलतमरूप पुरीषभाव से बाहर निकलता है, मध्यमरूप अध्यात्म माँसको बढ़ाता है और अत्यन्त सूक्ष्म तो मन है। इस प्रकार अन्य - जल और तेजका भी श्रुतिके अनुसार कार्यं समझना चाहिए | इस

शाङ्करभाष्य

तुशब्देन चोदितं दोषमपनुदति विशेषस्य भावो वैशेष्यम् भूयस्त्वमिति यावत् सत्यपि त्रिवृत्करणे क्वचित्कस्यचिद्भूतधातोर्भूयस्त्वमुपलभ्यते अग्नेस्तेजोभूयस्त्वम् उदकस्याब्भूयस्त्वम् पृथिव्या अन्नभूयस्त्वम् इति। व्यवहारप्रसिद्ध्यर्थं चेदं त्रिवृत्करणम् व्यवहारश्च त्रिवृत्कृतरज्जुवदेकत्वापत्तौ सत्याम् न भेदेन भूतत्रयगोचरो लोकस्य प्रसिध्येत्। तस्मात्सत्यपि त्रिवृत्करणे वैशेष्यादेव तेजोबन्नविशेषवादो भूतभौतिकविषय उपपद्यते। तद्वादस्तद्वादः इति पदाभ्यासः अध्यायपरिसमाप्तिं द्योतयति।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यहाँ कहते हैं - तासां ० ' ( उसमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत् त्रिवृत किया ) इस सामान्य श्रुति यदि भूत- मौतिक सभी त्रिवृत्कृत हैं, तो ' इदं तेज ० ' ( यह तेज, यह जल और यह अन्न है ) और ' अध्यात्ममिदमन्न ० ' ( शरीरमें जो माँस आदि है वह खाये हुए अन्नका कार्य है, यह लोहित आदि पीये हुए जलका कार्य है और यह अस्थि आदि खाये हुए तेज ( घृत तेल आदि ) का कार्य है ) इस श्रुतिमें यह विशेष व्यपदेश क्यों किया है? इसपर कहते हैं-

तु शब्द से शङ्कित दोषका निराकरण करते हैं। विशेषका माव वैशेष्य है अर्थात् भूयस्त्व है। त्रिवृत्करण होनेपर भी ' अग्नेस्तेजोभूयस्त्वम् ० ' ( अग्निमें तेजो भूयस्त्व है, उदकमें जल भूयस्त्व है और पृथिवीमें अन्न भूयस्त्व है ) इस प्रकार कहीं पर किसी भूत धातुका भूयस्त्व उपलब्ध होता है। यह त्रिवृत्करण व्यवहार प्रसिद्धि के लिए है। त्रिवृत्कृत रज्जुके समान एकत्वका प्रसङ्ग होनेपर लोकमें भूतत्रयविषयक भेद से व्यवहार सिद्ध न होगा। इसलिए त्रिवृत्करण होनेपर भी भूत- भौतिक विषयक तेज, जल, अन्न ऐसा विशेषवाद वैशेष्यसे ही उपपन्न होता है। ' तद्वादः तद्वाद : ' यह पदका अभ्यास - पुनः कथन अध्यायकी परिसमाप्तिको सूचित करता है।। २२

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

उपसंहार

इन सूत्रों का सार यह है कि प्राण और इन्द्रियाँ केवल भौतिक तत्व नहीं हैं, बल्कि वे एक सूक्ष्म और नित्य आधार पर टिकी हुई हैं। यह विवेचन सिद्ध करता है कि दृश्य जगत की समस्त क्रियाएँ एक सूक्ष्म सत्ता के अधीन हैं जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ती है। इस प्रकार ये सूत्र जीव के सूक्ष्म स्वरूप और उसके कार्य-कारण क्रम को आपस में जोड़ते हैं।

In English

Brahma Sutra: The Origin of Prana

This text explains Brahma Sutra 2.4.1, focusing on the origin of life forces (pranas) and senses. Through the commentary of Satyānanda Sarasvatī, it clarifies that just as elements like space and earth originate from Brahman, so too do the pranas.

This article answers

  • Brahma sutra 2.4.1 meaning?
  • Origin of prana in vedanta?
  • Relationship between brahman and life forces?
  • How are senses produced according to brahma sutras?

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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