व्याख्या · ब्रह्मसूत्र
ब्रह्मसूत्र — तृतीय अध्याय, प्रथम पाद
26 मूल पद्य 25 संस्करणसे मिलाये गये
इन सूत्रों में जीव की पुनरावृत्ति और उसके विभिन्न गतियों के विषय में तर्कपूर्ण विवेचन किया गया है। यहाँ संशयों का निराकरण करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि कर्मों के फल स्वरूप जीव किस प्रकार विभिन्न योनियों में गति करता है। पाठक को इस भाग में श्रुति और तर्क के माध्यम से पुनर्जन्म की प्रक्रिया का बोध होगा।
तदन्तरप्रतिपत्त्यधिकरणम्
3.1.1 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १
तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ॥ ३.१.१ ॥
पदच्छेद — तदन्तरप्रतिपत्ती , रंहति , संपरिष्वक्तः , प्रश्ननिरूपणाभ्याम्
सूत्रार्थ — ( तदन्तरप्रतिपत्तौ ) जीव अन्य देहकी प्राप्ति में देहके बीजभूत सूक्ष्म भूतोंसे ( संपरिष्वक्तः ) वेष्टित होकर धूम आदि मागं द्वारा स्वर्गलोक में ( रंहति ) जाता है, ( प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ) क्योंकि ' वेत्थ यथा ' यह प्रश्न है और ' इति तु पञ्चम्यामा ० ' यह निरूपण - प्रतिवचन है।
शाङ्करभाष्य
तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्त इति। तदन्तरप्रतिपत्तौ देहान्तरप्रतिपत्तौ देहबीजैर्भूतसूक्ष्मैः संपरिष्वक्तः रंहति गच्छति इत्यवगन्तव्यम् कुतः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् तथा हि प्रश्नः वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति निरूपणं च प्रतिवचनम् द्युपर्जन्यपृथिवीपुरुषयोषित्सु पञ्चस्वग्निषु श्रद्धासोमवृष्ट्यन्नरेतोरूपाः पञ्च आहुतीर्दर्शयित्वा इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति तस्मादद्भिः परिवेष्टितो जीवो रंहति व्रजतीति गम्यते।
नन्वन्या श्रुतिः जलूकावत्पूर्वदेहं न मुञ्चति यावन्न देहान्तरमाक्रमतीति दर्शयति तद्यथा तृणजलायुका इति तत्राप्यप्परिवेष्टितस्यैव जीवस्य कर्मोपस्थापितप्रतिपत्तव्यदेहविषयभावनादीर्घीभावमात्रं जलूकयोपमीयत इत्यविरोधः।
एवं श्रुत्युक्ते देहान्तरप्रतिपत्तिप्रकारे सति याः पुरुषमतिप्रभवाः कल्पनाः व्यापिनां करणानामात्मनश्च देहान्तरप्रतिपत्तौ कर्मवशाद्वृत्तिलाभस्तत्र भवति केवलस्यैवात्मनो वृत्तिलाभस्तत्र भवति इन्द्रियाणि तु देहवदभिनवान्येव तत्र तत्र भोगस्थाने उत्पद्यन्ते मन एव वा केवलं भोगस्थानमभिप्रतिष्ठते जीव एव वा उत्प्लुत्य देहाद्देहान्तरं प्रतिपद्यते शुक इव वृक्षाद्वृक्षान्तरम् इत्येवमाद्याः ताः सर्वा एव अनादर्तव्याः श्रुतिविरोधात्।।
ननु उदाहृताभ्यां प्रश्नप्रतिवचनाभ्यां केवलाभिरद्भिः संपरिष्वक्तो रंहतीति प्राप्नोति अप्शब्दश्रवणसामर्थ्यात् तत्र कथं सामान्येन प्रतिज्ञायते सर्वैरेव भूतसूक्ष्मैः संपरिष्वक्तो रंहतीति अत उत्तरं पठति
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.१.२ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अतएव यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्ममें जो वेदान्तका तात्पर्य है, उसका स्मृति, न्याय, मतान्तर और श्रुतियोंके साथ कोई विरोध नहीं है || २२
* वेदान्तार्थंके व्यविरुद्ध सिद्ध होनेपर उसके साधनभूत ज्ञानके विषयमें विचार उपस्थित होता है, इससे द्वितीय और तृतीय अध्याय में हेतुहेतुमद्भाव - कार्यकारण भाव संगति है, इस प्रकार लिङ्गो - पाधि जीवके प्राण आदि उपकरण सिद्ध होनेपर उस उपाधिवाले जीवको संसारगति आदिका विचार होता है अतः गत पाद और इस पादमें कार्यकारणभाव सम्बन्ध है। इस अध्यायके प्रथमपादमें वैराग्यका निरूपण है, जैसे स्वगं, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुष और स्त्री इन पाँचोंका अग्निरूपसे ध्यान करना चाहिए, यह पञ्चाग्नि विद्या है, जिससे कमद्वारा गमन और आगमनरूप अनर्थ होता है, इससे कर्मफलमें घृणा करनी चाहिए, ऐसी पञ्चाग्निविद्याके उपसंहारमें श्रुति है। यह सब वैराग्यके लिए दिखलाया गया है। द्वितीय पादमें स्वप्न आदि अवस्थाओंकी उक्तिसे ' त्वम् ' पदका अर्थ और ब्रह्मतत्त्व कहा गया है। तृतीय पादमें ' तत् " त्वम् ' का ऐक्य और उसके लिए उपासनाका विचार है। चतुर्थपादमें सम्यग्दर्शनके साधन संन्यास आदि, मुक्तिरूपफलका स्वर्गं आदिके समान तारतम्य नियमका अभाव अर्थात् जैसे स्वर्गं आदि फलमें तारतम्य होता है, वैसे मुक्तिरूप फलमें नहीं होता। प्रसङ्गसे प्राप्त कुछ अन्य देहात्मदूषण भी कहा जायगा।
* जीव इस देहको त्यागकर दूसरे देहकी प्राप्तिमें देहके कारणभूत सूक्ष्मभूतों से सम्बद्ध होकर जाता है कि नहीं? यह प्रश्न उठता है, क्योंकि इन्द्रियोंको साथ ले जाने में तो ' स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः ' यह श्रुति प्रमाण है। परन्तु सूक्ष्मभूतों को साथ ले जाने में कोई श्रुति नहीं है, कारण कि सूक्ष्म भूत सर्वत्र सुलभ हैं। इसलिए जीव सूक्ष्मभूतोंके विना ही जाता है।
पूर्वपक्षमें निराश्रय प्राणकी गति न होनेसे वैराग्य असिद्ध है और सिद्धान्तमें तो भूताश्रय प्राणोंकी गति होने से वैराग्य सिद्ध है। ' राजा प्रहाण - श्वेतकेतु! ‘ वेत्थ यथा ० ' श्वेतकेतु - मैं नहीं जानता, तब राजाने उद्दालकसे इसका उत्तर कहा' असौ वा लोको गौतमाग्निः ' ( हे गौतम! यह स्वर्गलोक अग्नि है ) यहाँ अग्निहोत्र में हवन किया गया दधि आदि जल यजमानके साथ संलग्न होकर स्वर्गलोक प्राप्तकर सोम नामक दिव्य देहरूपसे स्थित ( प्राप्त ) होता है।
कर्मफलके अन्तमें वही सोमरूप दिव्यशरीर द्रवीभूत होकर पर्जन्यमें बहुत होता है। अनन्तर वह जल वृष्टिरूपसे अन्न आदिमें आता है। पुनः वही अन्न भक्षण करनेसे पुरुषमें जाता है। वही जल पुरुषद्वारा शुक्ररूपसे स्त्रीके गर्भ में आहुत होता है, इसप्रकार आप ( जल ) मनुष्यरूप होता है। इसप्रकार प्रश्नोत्तर से यह सिद्ध होता है कि जीव सूक्ष्मभूतों से वेष्टित होकर जाता है।
* ‘ तद्यथातृणजलायुका ' यहाँ कर्मोंसे उपस्थापित प्राप्तव्य देव आदि देह है, उसे ' मैं देव हूँ ' इत्यादि भावनाद्वारा प्राप्तकर जीव पूर्वं देहका त्याग करता है अर्थात् मावी देह विषयक भावनाको लेकर यह कीटका उदाहरण है, इससे कोई विरोध नहीं है। यद्यपि आत्मा व्यापक ब्रह्मरूप है, उसमें गति आदिका असंभव है, तो भी घटाकाशके समान परिच्छिन्न उपाघिकी गति आदिको लेकर उसमें गति आदिका वर्णन है, यह पञ्चाग्निविद्यामें कहा गया है। उससे विरोध होने के कारण अन्य सभी कल्पनाएँ अनादरणीय हैं। उनमें ' व्यापिनां ' इससे सांख्योंकी कल्पना है कि केवल अन्य देहमें कर्मोंके बलसे इन्द्रिय समुदाय व्यक्त होकर अपना - अपना कार्य करता है। बौद्धोंकी कल्पना – केवल आलय विज्ञान ( निर्विकल्पज्ञान ) सन्तानरूप आत्मा है, उसका अन्य देहमें शब्द आदि विषयक सविकल्प ज्ञान नामक वृत्तिलाम होता है। ' इन्द्रियाणि ' इत्यादि भाष्यसे काणादोंकी कल्पना है। ' जीव एव ' इत्यादिसे दिगम्बर जैनोंकी कल्पना है। चार्वाक कहते हैं कि जीवित देह ही आत्मा है, उसके भस्म होनेपर पुनः गमन आदि नहीं होते। इत्यादि सभी कल्पनाएँ श्रुति विरुद्ध हैं॥१
3.1.2 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २
त्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् ॥ ३.१.२ ॥
पदच्छेद — व्यात्मकत्वात् , तु , भूयस्त्वात्
सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थ है। ( व्यात्मकत्वात् ) त्रिवृत्करण श्रुति से अन्य दो भूतोंके मेलनसे जल व्यात्मक है, अतः जलसे अन्य दो भूतोंका गमन सम्बन्ध सिद्ध है | ( भूयस्त्वात् ) कारण कि तेज आदिकी अपेक्षा से शरीरमें जल भूयस्त्व है।
शाङ्करभाष्य
तुशब्देन चोदितामाशङ्कामुच्छिनत्ति। त्र्यात्मिका हि आपः त्रिवृत्करणश्रुतेः तास्वारम्भिकास्वभ्युपगतास्वितरदपि भूतद्वयमवश्यमभ्युपगन्तव्यं भवति। त्र्यात्मकश्च देहः त्रयाणामपि तेजोबन्नानां तस्मिन्कार्योपलब्धेः। पुनश्च त्र्यात्मकः त्रिधातुत्वात् त्रिभिर्वातपित्तश्लेष्मभिः न स भूतान्तराणि प्रत्याख्याय केवलाभिरद्भिरारब्धुं शक्यते। तस्माद्भूयस्त्वापेक्षोऽयम् आपः पुरुषवचसः इति प्रश्नप्रतिवचनयोरप्शब्दः न कैवल्यापेक्षः सर्वदेहेषु हि रसलोहितादिद्रवभूयस्त्वं दृश्यते। ननु पार्थिवो धातुर्भूयिष्ठो देहेषूपलभ्यते नैष दोषः इतरापेक्षया अपां बाहुल्यं भविष्यति दृश्यते च शुक्रशोणितलक्षणेऽपि देहबीजे द्रवबाहुल्यम्। कर्म च निमित्तकारणं देहान्तरारम्भे कर्माणि च अग्निहोत्रादीनि सोमाज्यपयःप्रभृतिद्रवद्रव्यव्यपाश्रयाणि कर्मसमवायिन्यश्च आपः श्रद्धाशब्दोदिताः सह कर्मभिर्द्युलोकाख्येऽग्नौ हूयन्त इति वक्ष्यति तस्मादप्यपां बाहुल्यप्रसिद्धिः। बाहुल्याच्च अप्शब्देन सर्वेषामेव देहबीजानां भूतसूक्ष्माणामुपादानमिति निरवद्यम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — साधन नामक इस तृतीय अध्यायके प्रथम पादमें जीवकी संसार गति आगतिका विचार और वैराग्य निरूपण विचार किया जाता है।
द्वितीय अध्याय में वेदान्त प्रतिपादित ब्रह्म दर्शनमें स्मृति और न्यायके विरोधका परिहार किया गया है। परपक्ष अनपेक्षित है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन और श्रुतिविरोधका परिहार किया गया है, और उनमें जीवसे व्यतिरिक्त जीवके उपकरण तत्त्व ब्रह्मसे उत्पन्न होते हैं, यह कहा गया है।
अब उपकरपति जीवक संसार गतिका प्रकार उसकी अन्य अवस्थाएँ, ब्रह्मतत्त्व, विद्याका भेद और अभेद, गुणों का उपसंहार और अनुपसंहार, सम्यग्ज्ञानसे पुरुषार्थकी सिद्धि, सम्यग्ज्ञानके उपायविधिका भेद और मुक्तिफलका अनियम, इस विषय समुदायका तृतीय अध्यायमें निरूपण किया जायगा और प्रसंगसे आया हुआ कुछ अन्य भी कहा जायगा।
वहाँ प्रथम पादमें पञ्चाग्नि विद्याका आश्रय कर ' तस्माज्जु गुप्सेत् ' ( उससे - गमनागमन में दुःख होनेसे स्वर्ग आदिमें घृणा करे ) इस प्रकार अन्तमें श्रवणसे संसार गतिका प्रभेद वैराग्यकें लिए दिखलाया जाता है | मुख्यप्राण सचिव जीव इन्द्रिय, मन, अविद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा जन्मान्तर संस्कारोंके साथ पूर्वं देहका त्यागकर अन्य देहको प्राप्त होता है, यह अवगत हुआ।
क्योंकि ' अथैनमेते ० ' ( मरण समय में ये वाक् आदि इन्द्रियां जीवके प्रति हृदय में एकत्रित हो जाती हैं ) यहाँसे लेकर ' अन्यन्नवतरं ० ' ( अन्य अधिक सुन्दर और कल्याणतर रूप देहकी रचना करता है ) यहाँ तक संसार प्रकरणस्थ श्रुति है तथा धर्म और अधर्मके फल उपभोगका संभव भी है। वह जीव क्या देहके बीजभूत सूक्ष्म भूतोंसे असम्बन्धित होकर जाता है अथवा सम्बन्धित? इसपर विचार किया जाता है। तब क्या प्राप्त होता है? असम्बन्धित होकर जाता है। किससे?
इससे कि इन्द्रियोंके ग्रहणके समान भूतों का ग्रहण श्रुत नहीं है। स एतास्तेजो मात्रा : ० ' ( वह इन [ प्राणोंको ] तेजोमात्राको सम्यक् प्रकारसे ग्रहणकर हृदयमें ही अनुक्रान्त होता है ) यहाँ ' तेजोमात्रा ः ' शब्द से श्रुति करणोंका ग्रहण कहती है, क्योंकि वाक्यशेषमें चक्षु आदिका कथन है। इसप्रकार भूतमात्राओंके ग्रहणका कथन नहीं है और भूतमात्रा सर्वत्र सुलभ हैं। जहाँ देहका आरम्भ होना चाहिए वहाँ ही वे हैं, उससे उनको साथ ले जाना निष्प्रयोजन है, इसलिए जीव असम्बन्धित होकर ही जाता है।
ऐसा प्राप्त होनेपर आचार्य कहते हैं- ' तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः ' तदन्तरप्रतिपत्तौ - देहसे अन्य देहकी प्राप्तिमें देह के कारण सूक्ष्मभूतों से सम्बन्धित होकर जाता है, ऐसा समझना चाहिए, किससे? इससे कि ऐसा प्रश्न और निरूपण है | जैसे कि ' वेत्थ यथा ० ' ( प्रहाण हे श्वेतकेतु!
क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन करनेपर जल ( सोम, घृत आदि रस ) ' पुरुष ' - शरीर संज्ञाको कैसे प्राप्त होता है ) यह प्रश्न है, और स्वर्गं, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुष और स्त्री इन पाँच अग्नियोंमें श्रद्धा, सोम, वृष्टि, अन्न और शुक्ररूप ये पांच आहुतियाँ दिखलाकर ' इति तु पञ्चम्यामा ० ' ( इसप्रकार पाँचवी आहुतिके प्रक्षेप होनेपर जल ' पुरुष ' शब्दवाची होता है ) ऐसा निरूपण - प्रतिवचन है। इसलिए जीव जलसे परिवेष्टित होकर जाता है, ऐसा ज्ञात होता है।
परन्तु ' तद्यथा तृणजलायुका ० ' ( उसमें - देह संचारमें जैसे तृणजलायुका - घासका कोट विशेष ) तृणजलायुका ं इसप्रकार अन्य श्रुति जलूका - कीटके समान जबतक जीव अन्य देहको प्राप्त नहीं होता तबतक पूर्व देहका त्याग नहीं करता, ऐसा दिखलाती है। उसमें भी जलसे परिवेष्टित जीवके कसे उपस्थापित प्राप्त करने योग्य देहविषयक भावनाका दीर्घमावमात्र जलूकासे उपमित है, अतः कोई विरोध नहीं है।
इसप्रकार अन्य देहकी प्राप्तिका प्रकार श्रुतिसे उक्त होनेपर जो पुरुषबुद्धिसे उत्पन्न हुई कल्पनाएँ हैं- - आत्मा और इन्द्रियाँ व्यापक हैं, अन्य देहके प्राप्त होनेपर कर्मवश उसमें वृत्तिलाभ होता है। उस देहमें केवल आत्माका ही वृत्तिलाभ होता है, इन्द्रियाँ तो देहके समान तत् तत् भोगवस्थानमें नवीन ही उत्पन्न होती हैं। अथवा केवल मन ही मोग स्थानके प्रति जाता है।
अथवा जैसे शुक एक वृक्षसे कूदकर अन्य वृक्षको प्राप्त होता है, वैसे जोव ही एक देहसे कूदकर अन्य देहको प्राप्त करता है, इत्यादि सभी कल्पनाएँ अनादरणीय हैं, क्योंकि श्रुतिके साथ उनका विरोध है॥॥
परन्तु उदाहृत प्रश्न और प्रतिवचन द्वारा केवल जलसे परिवेष्टित जीव जाता है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि जलशब्द के श्रवणकी सामर्थ्य है, तो सभी सूक्ष्म भूतोंसे परिवेष्टित होकर जाता है, ऐसा सामान्यरूपसे प्रतिज्ञा कैसे की है? इससे उत्तर कहते हैं -
तु शब्दसे पूर्वोक्त शङ्काका उच्छेद करते हैं -
— त्रिवृत्करण श्रुतिसे जल त्र्यात्मक है, उस जलको देहका आरम्भक स्वीकार करनेपर अन्य दो भूत- तेज और पृथिवी में भी आरम्भकत्व अवश्य स्वीकार करना चाहिए | और देह व्यात्मक है, क्योंकि तेज, जल और अन्न तीनोंका भी उसमें कार्य उपलब्ध होता है। पुनः भी देह व्यात्मक है, कारण कि वात, पित्त और कफसे त्रिधातु है। अन्य भूतोंका प्रत्याख्यान ( त्याग ) कर केवल जलसे वह आरब्ध नहीं हो सकता।
इसलिए ' जल पुरुषात्मक होता है ' ऐसा जो प्रश्न और प्रतिवचनमें जल शब्द है वह केवल जलकी अपेक्षा से नहीं है किन्तु भूयस्त्वकी अपेक्षासे है, क्योंकि सब देहों में रस- लोहित आदि द्रवीभूत द्रव्योंका बाहुल्य देखा जाता है। परन्तु पार्थिव धातु भी देहों में अधिकतर उपलब्ध होता है? यह दोष नहीं है, कारण कि अन्योंकी अपेक्षासे जल बहुत होगा। शुक्रशोणितरूप देहके कारणमें मी द्रव बाहुल्य देखने में आता है। अन्य ( स्वर्गीय ) देहके आरम्भमें कर्म निमित्तकारण हैं।
अग्निहोत्र आदि कर्म सोम, घृत, पय आदि द्रव द्रव्यके आश्रित होते हैं, और कर्म सम्बन्धी जल श्रद्धाशब्दसे कहा गया है, वह कमोंके साथ स्वर्गलोक नामक अग्निमें हुत किया जाता है, ऐसा आगे कहेंगे। इससे भी जलका बाहुल्य प्रसिद्ध है। और बाहुल्य होनेसे अप् - जल शब्दसे सभी देहके बीज सूक्ष्मभूतोंका ग्रहण है, यह निर्दोष है॥२
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * खाये, पीये गये अन्न और जलका पारिपाक यह तेजका कार्य है। स्नेह और स्वेद आदि जलका कार्य है और गन्ध आदि पृथिवीका कार्य है, इसलिए देह व्यात्मक है। परन्तु इस देहमें प्राण और अवकाश रूप कार्योंकी भी साथ - साथ उपलब्धि होती हैं, अतः देह पाँच भूतात्मक है। इस अरुचिसे भाष्यमें ' पुनश्च ' इत्यादिसे दूसरी व्याख्या करते हैं॥ २
3.1.3 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र ३
प्राणगतेश् च ॥ ३.१.३ ॥
पदच्छेद — प्राणगतेः च
सूत्रार्थ — और ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति ' इस श्रुति में जीवके साथ इन्द्रियों की गति प्रतिपादित है, इससे भी जीव सूक्ष्म भूतोंसे परिवेष्टित जाता है |
शाङ्करभाष्य
प्राणानां च देहान्तरप्रतिपत्तौ गतिः श्राव्यते तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति इत्यादिश्रुतिभिः सा च प्राणानां गतिर्नाश्रयमन्तरेण संभवतीत्यतः प्राणगतिप्रयुक्ता तदाश्रयभूतानामपामपि भूतान्तरोपसृष्टानां गतिरर्थादवगम्यते न हि निराश्रयाः प्राणाः क्वचिद्गच्छन्ति तिष्ठन्ति वा जीवतो दर्शनात्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वाग् आदिका अग्नि आदिमें गमन प्रतिपादित है, इससे जीवके साथ इन्द्रियाँ नहीं जाती। ( इति चेन्न
) ऐसा यदि कहो तो यह
विरोध होनेसे अग्नि आदिमें युक्त नहीं है, ( माक्तत्वात् ) क्योंकि ' तमुत्क्रामन्तं ' इत्यादि श्रुतियोंके साथ गति प्रतिपादक श्रुति गौण है। तींश्च गच्छन्तीति संभवति। नच जीवस्य प्राणोपाधिप्रत्याख्याने गमनमवकल्प्यते। नापि
और अन्य देहकी प्राप्तिमें ' तमुकामस्तं ० ' ( उस जीवके उत्क्रान्त होनेके अनन्तर प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रान्त होनेके अनन्तर सब प्राण - इन्द्रियाँ उत्क्रमण करते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्राणों की गति सुनाई जाती है। प्राणोंकी वह गति आश्रयके विना उपपन्न नहीं हो सकती, अतः प्राणोंकी गतिसे प्रयुक्त प्राणोंके आश्रयभूत अन्य भूतोंसे सम्बद्ध जलकी भी गति अर्थतः अवगत होती है। क्योंकि निराश्रय प्राण न कहीं जाते हैं अथवा न कहीं रहते हैं, कारण कि जीवित देहमें प्राण साश्रय देखनेमें आते हैं॥ ३
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.५ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.4 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र ४
(इस सूत्रका मूल पाठ स्कैनमें स्पष्ट नहीं पढ़ा जा सका)
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा हो, परन्तु प्राण देहान्तर प्राप्ति में जीवके साथ नहीं जाते, क्योंकि अग्नि आदिमें गति - श्रुति है | जैसे ' यत्रास्य ० ' ( जिस समय इस मृत पुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है और प्राण वायुमें लीन हो जाता है ) इत्यादिसे श्रुति मरण कालमें वाणी आदि प्राण अग्नि आदि देवोंको प्राप्त होते हैं, ऐसा दिखलाती है। यदि ऐसा कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि वह गोण है। वाक् आदि इन्द्रियोंकी अग्नि आदि गतिश्रुति गौण है, कारण कि लोम और केशों में ऐसा देखनेमें नहीं आता। ' ओषधीर्लोमानि ० ' ( लोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें लीन हो जाते हैं ) ऐसी वहाँ श्रुति है। लोम और केश कूदकर व्योषधि और वनस्पतिको प्राप्त होते हैं, ऐसा संभव नहीं हैं। इसलिए जीवका प्राण उपाधि परित्याग करनेपर गमन नहीं हो सकता और प्राणोंके विना अन्य देहका उपभोग मी उपपन्न नहीं होता। और प्राणोंका जीवके साथ गमन अन्यत्र ( तमुत्क्रामन्तं ) विस्पष्ट सुनाया गया है | अतः वाणी आदिके अधिष्ठातृ और वाक् आदिके उपकारक अग्नि आदि देवताओंके मरण - कालमें उपकारकी निवृत्ति मात्रकी अपेक्षासे वाक् आदि अग्नि आदिमें लीन होते हैं, ऐसा उपचार किया गया है || ४ ||
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.५ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.5 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र ५
प्रथमेऽश्रवणाद् इति चेन् न ता एव ह्य् उपपत्तेः ॥ ३.१.५ ॥
पदच्छेद — प्रथमे , अश्रवणात् , इति चेत् , न , ताः , एव , हि , उपपत्तेः
सूत्रार्थ — द्युलोक आदि पाँच अग्नियोंमें ( प्रथमे ) प्रथम द्युलोक नामक अग्निमें ( मश्रवणात् ) ' तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नी ' इत्यादि श्रुतिसे श्रद्धाका आहुतित्व श्रवण है जलका नहीं है, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो, तो यह युक्त नहीं है, ( हि ) क्योंकि ' आपो हास्मै ' इत्यादि श्रुतिसे जल ही लक्षित होता है। ( उपपत्तेः ) कारण कि ऐसे प्रश्न और प्रतिवचनकी उपपत्ति है |
शाङ्करभाष्य
स्यादेतत् कथं पुनःपञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इत्येतत् निर्धारयितुं पार्यते यावता नैव प्रथमेऽग्नावपां श्रवणमस्ति इह हि द्युलोकप्रभृतयः पञ्चाग्न्यः पञ्चानामाहुतीनामाधारत्वेनाधीताः तेषां च प्रमुखेअसौ वाव लोको गौतमाग्निः इत्युपन्यस्यतस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति इति श्रद्धा होम्यद्रव्यत्वेन आवेदिता न तत्र आपो होम्यद्रव्यतया श्रुताः यदि नाम पर्जन्यादिषूत्तरेषु चतुर्ष्वग्निष्वपां होम्यद्रव्यता परिकल्प्येत परिकल्प्यतां नाम तेषु होतव्यतयोपात्तानां सोमादीनामब्बहुलत्वोपपत्तेः प्रथमे त्वग्नौ श्रुतां श्रद्धां परित्यज्य अश्रुता आपः परिकल्प्यन्त इति साहसमेतत् श्रद्धा च नाम प्रत्ययविशेषः प्रसिद्धिसामर्थ्यात् तस्मादयुक्तः पञ्चम्यामाहुतावपां पुरुषभाव इति चेत् नैष दोषः हि यतः तत्रापि प्रथमेऽग्नौ ता एवापः श्रद्धाशब्देनाभिप्रेयन्ते कुतः उपपत्तेः एवं ह्यादिमध्यावसानसंगानात् अनाकुलमेतदेकवाक्यमुपपद्यते इतरथा पुनः पञ्चम्यामाहुतौ अपां पुरुषवचस्त्वप्रकारे पृष्टे प्रतिवचनावसरे प्रथमाहुतिस्थाने यद्यनपो होम्यद्रव्यं श्रद्धां नामावतारयेत् ततः अन्यथा प्रश्नोऽन्यथा प्रतिवचनमित्येकवाक्यता न स्यात्।इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति च उपसंहरन् एतदेव दर्शयति।
श्रद्धाकार्यं च सोमवृष्ट्यादि स्थूलीभवदब्बहुलं लक्ष्यते सा च श्रद्धाया अप्त्वे युक्तिः। कारणानुरूपं हि कार्यं भवति। न च श्रद्धाख्यः प्रत्ययः मनसो जीवस्य वा धर्मः सन् धर्मिणो निष्कृष्य होमायोपादातुं शक्यते पश्वादिभ्य इव हृदयादीनि इति आप एव श्रद्धाशब्दा भवेयुः। श्रद्धाशब्दश्चाप्सूपपद्यते वैदिकप्रयोगदर्शनात् श्रद्धा वा आपः इति। तनुत्वं श्रद्धासारूप्यं गच्छन्ति आपो देहबीजभूता इत्यतः श्रद्धाशब्दाः स्युः यथा सिंहपराक्रमो नरः सिंहशब्दो भवति।
श्रद्धापूर्वककर्मसमवायाच्च अप्सु श्रद्धाशब्द उपपद्यते मञ्चशब्द इव पुरुषेषु श्रद्धाहेतुत्वाच्च श्रद्धाशब्दोपपत्तिःआपो हास्मै श्रद्धां संनमन्ते पुण्याय कर्मणे इति श्रुतेः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह शङ्का होती है— जब प्रथम अग्निमें जलका श्रवण नहीं है, तो ' पञ्चम्यामा ० ' ( पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है ) यह निर्धारण किस प्रकार हो सकता है? क्योंकि यहाँ द्युलोक आदि पाँच अग्नियां पांच आहुतियोंके आधाररूपसे अधीत हैं। उनमें से प्रथममें ' असौ वाव ० ' ( हे गौतम!
यह द्युलोक अग्नि है ) ऐसा उपन्यासकर ' तस्मिन्नेतस्मिन्न ० ' ( इस द्युलोकरूप अग्निमें देवयजमान श्रद्धाका हवन करते हैं ) इसप्रकार श्रद्धा होम्यद्रव्यरूपसे प्रतिपादित है, किन्तु वहाँ होम्यद्रव्यरूपसे जल श्रुत नहीं है। यदि पर्जन्य आदि उत्तर चार अग्नियोंमें जलकी होम्यद्रव्यरूपसे कल्पना करे तो भले कल्पना करे, क्योंकि उनमें हवनीयरूपसे गृहीत सोम आदिमें जलके आधिक्यकी उपपति है। किन्तु प्रथम अग्निमें तो श्रुत श्रद्धाका परित्यागकर अश्रुत जलकी कल्पना करते हो, यह केवल साहस है।
इस प्रकार प्रसिद्धिकी सामथ्यसे श्रद्धा प्रत्यय - विश्वास विशेष है, इसलिए पाँचवी आहुतिमें जल का पुरुष भाव युक्त नहीं है। ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि वहाँ भी प्रथम अग्निमें श्रद्धा शब्दसे वहो जल अभिप्रेत है। किससे? इससे कि ऐसी उपपत्ति है। इसप्रकार आदि, मध्य और अन्तमें संगान - एकार्थता होनेसे विना आयासके ही यह एक वाक्य उपपन्न होता है। अन्यथा पाँचवीं आहुति में ' जल पुरुष संज्ञक किसप्रकार होता है '?
ऐसा प्रश्न करनेपर प्रतिवचन के अवसर में यदि प्रथम आहुति के स्थानमें जलसे भिन्न हौम्यद्रव्यरूपसे श्रद्धाको ले आओ, तो प्रश्न एक प्रकारका और प्रतिवचन अन्य प्रकारका इसप्रकार एक वाक्यता नहीं होगी। ' इति तु ' ( ऐसे पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है ) इस तरह उपसंहार करती हुई श्रुति यही दिखलाती है, और श्रद्धाके कार्य सोम, वृष्टि आदि उत्तरोत्तर स्थूल होते हुए जलभूयस्त्व देखने में आते हैं। वही श्रद्धाके जल होने में युक्ति है। कारण के अनुरूप ही कार्य होता है।
जैसे पशु आदिसे हृदय आदि अवयव निकालकर होमके लिए ग्रहण किये जा सकते हैं, वैसे श्रद्धा नामक प्रत्यय - विश्वास मन अथवा जीवका धर्मं होते हुए धर्मीसे निकालकर होमके लिए ग्रहण नहीं किया जा सकता, इसलिए जल श्रद्धा शब्द वाच्य होना चाहिए, और श्रद्धा शब्द जलमें उपपन्न होता है, क्योंकि ' श्रद्धा वा आपः ' ( निश्चय श्रद्धा जल है ) इसप्रकार वैदिक प्रयोग देखने में आता है। श्रद्धाका सूक्ष्मत्व सादृश्य जीवके साथ जानेवाले देहके बीजभूत जलमें है, इसलिए जलमें श्रद्धाशब्दका प्रयोग होता है।
जैसे सिंह पराक्रम वाला पुरुष [ गौणरूपसे ] सिंहशब्द वाच्य होता है | श्रद्धा पूर्वक कर्ममें जलका सम्बन्ध होनेसे भी श्रद्धाशब्द जलमें उपपन्न होता है। जैसे पुरुषोंमें मञ्चराब्द उपपन्न होता है। ' आपो हास्मै ० ' ( निश्चय, इस यजमानके पुण्य कर्मके लिए जल श्रद्धा उत्पन्न करता है ) इसप्रकार श्रुतिसे श्रद्धाका हेतु होने से जलमें श्रद्धाशब्दकी उपपत्ति होती है॥५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अब वह जल पुरुषसंज्ञक किसप्रकार होता है, इसका आक्षेप पूर्वक ' प्रथम ' इत्यादिसे समाधान करते हैं। यद्यपि प्रथम अग्निमें साक्षात् जलका श्रवण नहीं है, तो भी प्रश्न और प्रतिवचनकी उपपत्तिसे जलका ही ग्रहण है, क्योंकि ' पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक किसप्रकार होता है ' | यह प्रश्न है। इसके अनुसार ही उत्तर देना उचित है। इसलिए प्रथम अग्निमें भी श्रद्धाशब्दसे जल ही अभिप्रेत है, अन्यथा प्रश्न और प्रतिवचनमें अन्तर होनेसे एकवाक्यता सिद्ध नहीं होगी। किश्च यदि श्रद्धा शब्दसे जल ग्राह्य नहीं है तो जिन पर्जन्य आदि चार अग्नियोंमें जल श्रुत है उनके . विषयमें प्रश्न होता कि चौथी अग्नि में बहुत जल पुरुषात्मक किस प्रकार होता है? पाँचवी आहुति के विषयमें प्रश्न नहीं होता, अतः उपक्रम और उपसंहारसे यहाँ श्रद्धाशब्दसे जलका ही ग्रहण करना चाहिए।
* ' तस्याः श्रद्धाहुतेः सोमः सम्भवति ' ( उस श्रद्धारूप आहुतिसे सोम उत्पन्न होता है ) इत्यादिसे श्रद्धा - सोम आदि पूर्व- पूर्वके परिणाम कहे गये हैं। इसलिए द्रवीभूत पदार्थका परिणाम होनेसे श्रद्धा जल है | ' मञ्चाः क्रोशन्ति ' ( मञ्च क्रोशण करते हैं ) जैसे यहाँ लक्षणासे मञ्चस्थ पुरुष बोलते हैं, यह अर्थ होता है, वैसे जलमें भी श्रद्धाका लाक्षणिक प्रयोग होता है॥ ५
3.1.6 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र ६
अश्रुतत्वाद् इति चेन् नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ३.१.६ ॥
पदच्छेद — अश्रुतत्वात् इति चेत् , न , इष्टादिकारिणाम् , प्रतीतेः
सूत्रार्थ — श्रद्धा शब्दित जलके पुरुषवचस्त्व होनेपर भी जलसे वेष्टित जीव जाता है, यह युक्त नहीं है, ( श्रुतत्वात् ) क्योंकि जल आदिके समान जीव श्रुत नहीं है। ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( इष्टादिकारिणां प्रतीतेः ) क्योंकि ' अथ य इमे ' इत्यादि वाक्यशेषसे इष्टापूतं कर्म कारियोंकी प्रतीति होती है।
शाङ्करभाष्य
अथापि स्यात् प्रश्नप्रतिवचनाभ्यां नाम आपः श्रद्धादिक्रमेण पञ्चम्यामाहुतौ पुरुषाकारं प्रतिपद्येरन् न तु तत्संपरिष्वक्ता जीवा रंहेयुः अश्रुतत्वात् न ह्यत्र अपामिव जीवानां श्रावयिता कश्चिच्छब्दोऽस्ति तस्मात्रंहति संपरिष्वक्तः इत्ययुक्तम् इति चेत् नैष दोषः कुतः इष्टादिकारिणां प्रतीतेः अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति इत्युपक्रम्य इष्टादिकारिणां धूमादिना पितृयाणेन पथा चन्द्रप्राप्तिं कथयतिआकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा इति त एवेहापि प्रतीयन्तेतस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति इति श्रुतिसामान्यात्।
तेषां च अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादिकर्मसाधनभूता दधिपयःप्रभृतयो द्रवद्रव्यभूयस्त्वात्प्रत्यक्षमेव आपः सन्ति ता आहवनीये हुताः सूक्ष्मा आहुत्योऽपूर्वरूपाः सत्यः तानिष्टादिकारिण आश्रयन्ति तेषां च शरीरं नैधनेन विधानेनान्त्येऽग्नावृत्विजो जुह्वति असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा इति ततस्ताः श्रद्धापूर्वककर्मसमवायिन्य आहुतिमय्य आपोऽपूर्वरूपाः सत्यः तानिष्टादिकारिणो जीवान्परिवेष्ट्य अमुं लोकं फलदानाय नयन्तीति यत् तदत्र जुहोतिना अभिधीयते श्रद्धां जुह्वतीति।
तथा च अग्निहोत्रे षट्प्रश्नीनिर्वचनरूपेण वाक्यशेषेणते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतः इत्येवमादिना अग्निहोत्राहुत्योः फलारम्भाय लोकान्तरप्राप्तिर्दर्शिता। तस्मादाहुतीमयीभिरद्भिः संपरिष्वक्ता जीवा रंहन्ति स्वकर्मफलोपभोगायेति श्लिष्यते।।
कथं पुनरिदमिष्टादिकारिणां स्वकर्मफलोपभोगाय रंहणं प्रतिज्ञायते यावता तेषां धूमप्रतीकेन वर्त्मना चन्द्रमसमधिरूढानामन्नभावं दर्शयति एष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं तेवा भक्षयन्ति इतिते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेतांस्तत्र भक्षयन्ति इति च समानविषयं श्रुत्यन्तरम् न च व्याघ्रादिभिरिव देवैर्भक्ष्यमाणानामुपभोगः संभवतीति अत उत्तरं पठति
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रश्न और प्रतिवचनसे पांचवीं आहुतिमें श्रद्धा आदि क्रमसे जल पुरुषाकार प्राप्त करे, ऐसा मी हो, परन्तु उस जलसे परिवेष्टित जीव गमन नहीं करेंगे, क्योंकि अश्रुत है। यहाँ जलके समान जीवोंका श्रवण करानेवाली कोई श्रुति नहीं है। इसलिए जलसे परिवेष्टित होकर जीव जाता है यह अयुक्त है। ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है, किससे? इससे कि इष्टादि कारियोंकी प्रतीति है।
' अथ य इमे ० ' ( तथा जो ये गृहस्थ लोग ग्राममें इष्ट पूर्त और दत्त इस प्रकार कर्म करते हैं वे धूमामिमानी देवताको प्राप्त होते हैं ) ऐसा उपक्रम कर ' आकाशाच्चन्द्रमसमेष ० ' ( वे आकाशसे चन्द्रलोकमें जाते हैं, यह चन्द्रमा राजा सोम है ) इस प्रकार श्रुति इष्ट आदि कर्म करनेवालोंकी धूम आदि पितृयाणमार्गंसे चन्द्रमाकी प्राप्ति कहती है।
' तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ ० ' ( उस द्युलोक अग्निमें देवगण श्रद्धाका होम करते हैं, उस आहुति से सोम राजा उत्पन्न होता है ) इस सामान्य श्रुतिसे वे ही यहाँ भी प्रतीत होते हैं, और उन जीवोंके अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि कर्मोके साधन भूत दधि, पय आदि द्रवी - भूत द्रव्यके आधिक्यसे प्रत्यक्ष ही जल है। आहवनीय अग्निमें हूत वे सूक्ष्म आहुतियाँ अपूर्वरूप होती हुई उन इष्ट आदि कर्म करनेवालोंका आश्रयण करती हैं।
ऋत्विज लोग उनके शरीरको मरणके विधान से अन्त्य अग्निमें ' असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ' ( यह स्वर्गलोकको जावे ) ऐसा कहकर होम करते हैं। इसके अनन्तर श्रद्धापूर्वक कर्मके साथ सम्बद्ध आहुतिमय वह जल अपूर्वरूप होता हुआ उन इष्ट आदि कर्म करनेवाले जीवोंको परिवेष्टित कर फल देनेके लिए उस लोकको ले जाता है, इस प्रकार जो कहा गया है उसीको यहाँ ' श्रद्धां जुह्वति ' ( श्रद्धाको होम करते हैं ) इस श्रुति द्वारा ' हु ' धातुसे अभिधान किया है।
उसी प्रकार अग्निहोत्र में छः प्रश्नोंके निर्वचनरूप ' ते वा एते ० ' ( वे ये दो हुत आहुतियाँ उत्क्रमण करती हैं ) इत्यादि वाक्यशेषसे दो अग्निहोत्र आहुतियोंमें फलारम्भके लिए अन्य लोककी प्राप्ति दिखलाई गई है। इसलिए आहुतिमय जलसे परिवेष्टित जीव अपने कर्मफलोपभोगके लिए जाते हैं, यह युक्त है॥ ६
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # जीवके साथ आहुतिमय जलके गमनमें दूसरी श्रुति भी है- अग्निहोत्र प्रकरण में राजा जनकने याज्ञवल्क्यसे छः प्रश्न किये हैं- ' न त्वेनैनयोः सायं प्रातराहुत्योस्त्वमुत्क्रान्ति न गतिं न प्रतिष्ठां न तृप्तिं न पुनरावृत्ति न लोकं प्रत्युत्थायिनं वेत्थ ' ( इन सायं और प्रातःकालकी आहुतियोंमें उत्क्रान्ति, गति, प्रतिष्ठा, तृप्ति, पुनरावृत्ति और उत्पन्न होनेवाला लोक क्या तुम नही जानते? ) उन प्रश्नोंका निर्वाचन भी ' राज्ञैव ते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतः ततः पृथिव्यां पुरुषे योषिति च पुरुषरूपेणोतिष्ठत : ' ( राजने कहा कि वे ये हुत आहुतियाँ उत्क्रमण करती हैं, वे अन्तरिक्षद्वारा द्युलोकमें जाती हैं, वे आहवनीय द्युलोक में प्रतिष्ठा करती हैं, वे द्युलोकको तृप्त करती हैं, वहाँ से पुनः लोटती हैं, अनन्तर पृथिवीमें, पुनः पुरुषमें, उससे स्त्री में बहुत हुई पुरुषरूपसे उत्थान करती हैं ) इस प्रकार वाक्यशेषसे निश्चित होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि आहुतिमय जलसे परिवेष्टित जीव कर्म फलोपभोगके लिए गमन करता है।। ६
3.1.7 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र ७
भाक्तं वानात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति ॥ ३.१.७ ॥
पदच्छेद — भाक्तम् , वा , अनात्मवित्त्वात् , तथा , हि , दर्शयति
सूत्रार्थ — ( वा ) शब्द शङ्कानिरासार्थं है, इष्ट आदि कर्मकारियोंमें अन्नत्व ( भाक्तम् ) गौण है, अन्यथा ' स्वगंकामो यजेत ' इत्यादि श्रुतिसे विरोध होगा। ( अनात्मवित्त्वात् ) अतः अनात्मवित् होनेसे उनमें देवोंके उपयोग योग्य अन्नत्व विवक्षित है, ( तथाहि दर्शयति ) वैसा ही ' अथ योऽन्याम् ' इत्यादि श्रुति दिखलाती है।
शाङ्करभाष्य
वाशब्दश्चोदितदोषव्यावर्तनार्थः। भाक्तमेषामन्नत्वम् न मुख्यम् मुख्ये ह्यन्नत्वेस्वर्गकामो यजेत इत्येवंजातीयकाधिकारश्रुतिरुपरुध्येत चन्द्रमण्डले चेदिष्टादिकारिणामुपभोगो न स्यात् किमर्थमधिकारिण इष्टादि आयासबहुलं कर्म कुर्युः। अन्नशब्दश्चोपभोगहेतुत्वसामान्यात् अनन्नेऽप्युपचर्यमाणो दृश्यते यथा विशोऽन्नं राज्ञां पशवोऽन्नं विशामिति।
तस्मादिष्टस्त्रीपुत्रमित्रभृत्यादिभिरिव गुणभावोपगतैरिष्टादिकारिभिर्यत्सुखविहरणं देवानाम् तदेवैषां भक्षणमभिप्रेतम् न मोदकादिवच्चर्वणं निगरणं वा।न ह वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति इति च देवानां चर्वणादिव्यापारं वारयति। तेषां च इष्टादिकारिणां देवान्प्रति गुणभावोपगतानामप्युपभोग उपपद्यते राजोपजीविनामिव परिजनानाम्।
अनात्मवित्त्वाच्च इष्टादिकारिणां देवोपभोग्यभाव उपपद्यते तथा हि श्रुतिरनात्मविदां देवोपभोग्यतां दर्शयति अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानाम् इति स चास्मिन्नपि लोके इष्टादिभिः कर्मभिः प्रीणयन्पशुवद्देवानामुपकरोति अमुष्मिन्नपि लोके तदुपजीवी तदादिष्टं फलमुपभुञ्जानः पशुवदेव देवानामुपकरोतीति गम्यते।।
अनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति इत्यस्य अपरा व्याख्या अनात्मविदो ह्येते केवलकर्मिण इष्टादिकारिणः न ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठायिनः पञ्चाग्निविद्यामिह आत्मविद्येत्युपचरन्ति प्रकरणात् पञ्चाग्निविद्याविहीनत्वाच्चेदमिष्टादिकारिणां गुणवादेनान्नत्वमुद्भाव्यते पञ्चाग्निविज्ञानप्रशंसायै पञ्चाग्निविद्येह विधित्सिता वाक्यतात्पर्यावगमात् तथा हि श्रुत्यन्तरं चन्द्रमण्डले भोगसद्भावं दर्शयति स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते इति तथा अन्यदपि श्रुत्यन्तरम्अथ ये शतं पितृ़णां जितलोकानामानन्दाः स एकः कर्म देवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसंपद्यन्ते इति इष्टादिकारिणां देवैः सह संवसतां भोगप्राप्तिं दर्शयति।
एवं भाक्तत्वादन्नभाववचनस्य इष्टादिकारिणोऽत्र जीवा रंहन्तीति प्रतीयते। तस्मात्रंहति संपरिष्वक्तः इति युक्तमेवोक्तम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु इष्ट आदि कर्म करनेवालोंके अपने कर्मफलके उपभोगके लिए गमन विषयक प्रतिज्ञा कैसे की जाती है। क्योंकि ' एष सोमो राजा ० ' ( यह सोम राजा है, यह देवताओंका अन्न है, देवता लोग उसका मक्षण करते हैं ) इस प्रकार यह श्रुति धूम प्रतीक मागंसे उन चन्द्रलोकमें आरुढ हुओंका अन्नभाव दिखलाती है, और ' ते चन्द्रं प्राप्यान्नं ० ' ( वे चन्द्रमाको प्राप्तकर अन्न हो जाते हैं, वहाँ जैसे ऋत्विग्गण सोम राजाको ' आप्यायस्व अपक्षीयस्व ' ऐसा कहकर मक्षण करते हैं, वैसे इनका देवगण भक्षण करते हैं ) यह समान विषयक दूसरी श्रुति है। व्याघ्र आदिसे भक्ष्यमाणोंके समान देवोंसे मक्ष्यमाणोंका उपभोग नहीं हो सकता, अतः उत्तर कहते हैं-
वा शब्द शङ्कित दोषको व्यावृत्तिके लिए है। इन इष्ट आदि कारियों में अन्नत्व गौण है मुख्य नहीं, मुख्य अन्नत्व हो तो ' स्वमकामो यजेत ' इसप्रकारकी अधिकारश्रुति बाधित हो जायगी। यदि इष्ट आदि कारियोंका चन्द्रमण्डलमें उपभोग न हो, तो अधिकारी अधिक परिश्रम साध्य इष्ट आदि कर्म किसलिए करेंगे, और अन्न शब्द ' उपभोग हेतुत्व ' है, इस सामान्यधर्मं से अन्न भिन्न में भी उपचयंमाण- उपचरित होता हुआ देखा जाता है। जैसे ' वैश्य राजाओं का अन्न है, पशु वैश्योंका अन्न है ' ऐसा कहते हैं।
इसलिए इष्ट, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेवक आदिके समान गौणनावको प्राप्त हुए इष्ट आदि कारियों से जो देवताओं का सुख विहरण है वही इनका यहाँ मक्षण अभिप्रेत है, किन्तु मोदक आदिके समान चवंण चबाना अथवा निगलना अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि ' न ह वै देवा ० ' ( देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ) यह श्रुति देवोंके चर्वण आदि व्यापारका निषेध करती है।
देवोंके प्रति गुणभावको प्राप्त हुए इन इष्ट आदि कारियों का भी राजाके आश्रित जीवन निर्वाह करनेवाले परिजनोंके समान उपभोग उपपन्न होता है और अनात्मवित् होनेसे इष्ट आदि कारियोंमें देवोंका उपभोग्यत्व भी उपपन्न होता है।
जैसे कि ' अथ योऽन्यां ० ' ( और जो अन्य देवताकी ' यह अन्य है और मैं अन्य हूँ ' इस प्रकार उपासना करता है वह नहीं जानता, जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है ) यह श्रुति अनात्मवेत्ताओंकी देवोपभोग्यता दिखलाती है अर्थात् जैसे पशु मनुष्यों का भोग्य है, वैसे अज्ञ जीव देवोंका उपकारक होता है।
वह इस लोक में मी इष्ट आदि कर्मोंद्वारा देवोंको प्रसन्न करता हुआ पशुके समान देवोंका उपकारक होता है और परलोकमें भी उनका उपजीवी होकर उनसे आदिष्ट फलका उपभोग करता हुआ पशुके समान देवोंका उपकारक होता है, ऐसा ज्ञात होता है। ' अनात्मवित्त्वात्तथाहि दर्शयति ' इस सूत्रांशकी यह दूसरी व्याख्या है - केवल कर्मी ये इष्ट आदि कारी अनात्मवित् ही हैं वे उपासना और कर्मके समुच्चयका अनुष्ठान करनेवाले नहीं हैं। यहाँ प्रकरणसे पञ्चाग्नि विद्याको गोणरूपसे आत्मविद्या कहते हैं।
पञ्चाग्नि विद्या रहित होनेसे इष्ट आदि कारी देवोंके अन्न हैं, ऐसा पञ्चाग्नि विद्याकी प्रशंसाके लिए भोगसद्भावं दर्शयति - ' स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ( प्र ० ५।४ ) इति। तथान्यदपि गुणवादसे कहा गया है। यहाँ पञ्चाग्नि विद्याका ही विधान करना अभीष्ट है, क्योंकि वाक्यका तात्पर्यं ऐसा ही अवगत होता है। जैसे कि ' स सोमलोके ० ' ( सोम लोकमें विभूति का अनुभवकर वह पुनः लौट आता है ) यह दूसरी श्रति चन्द्रमण्डलमें मोगका सद्भाव दिखलाती है।
उसीप्रकार ' अथ ये शतं ० ' ( जो पितृलोकको जीतनेवाले पितरोंके सौ आनन्द हैं वह गन्धवं लोकका एक आनन्द है, तथा जो गन्धर्व लोकके सौ आनन्द हैं, वह कर्म देवोंका, जो कि कर्मोंके द्वारा देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है ) वह दूसरी श्रुति भी देवोंके साथ वास करनेवाले इष्ट आदि कारियोंकी भोग प्राप्ति दिखलाती है। इसप्रकार अन्नभाव वचन गौण होनेसे यहाँ इष्ट आदि कारी जीव जाते हैं, ऐसा प्रतीत होता है। इसलिए ' रहित संपरिष्वक्तः ' ( जीव परिवेष्टित जाता है ) यह ठीक ही कहा गया है॥ ७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गौतम और प्रवाहण संवादात्मक वाक्योंका पर्यालोचन करनेसे यही सिद्ध होता है कि यहाँ पञ्चाग्निविद्याका अभिधान ही इष्ट है। अतः आहुतिमय जलसे परिवेष्टित होकर जीव जाता है। इसप्रकार गतिके पर्यालोचनसे वैराग्य होता है॥ ७
कृतात्ययाधिकरणम्
3.1.8 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र ८
कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं च ॥ ३.१.८ ॥
पदच्छेद — कृतात्यये , अनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम् , यथेतम् , अनेवम् , च
सूत्रार्थ — ( कृतात्यये ) कर्मोंके उपभोगके अनन्तर ( अनुशयवान् ) उन कर्मोंसे अतिरिक्त कर्म युक्त होकर जीव इस लोकमें आता है, ( दुष्टस्मृतिभ्याम् ) क्योंकि ' तद्य इह रमणीयचरणा ' और ' प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ' इत्यादि श्रुति और स्मृति हैं। और ( यथेतम् ) जिस धूम आदि मार्गंसे वे गये थे उससे अथवा ( अनेवम् च ) उससे विपरीत वक्ष्यमाण बभ्र आदि मार्गद्वारा इस लोकमें आते हैं।
शाङ्करभाष्य
इष्टादिकारिणां धूमादिना वर्त्मना चन्द्रमण्डलमधिरूढानां भुक्तभोगानां ततः प्रत्यवरोह आम्नायते तस्मिन्यावत्संपातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतम् इत्यारभ्य यावत् रमणीयचरणा ब्राह्मणादियोनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः श्वादियोनिमिति। तत्रेदं विचार्यते किं निरनुशया भुक्तकृत्स्नकर्माणोऽवरोहन्ति आहोस्वित्सानुशया इति।
किं तावत्प्राप्तम् निरनुशया इति कुतःयावत्संपातम् इति विशेषणात् संपातशब्देनात्र कर्माशय उच्यते संपतन्ति अनेन अस्माल्लोकात् अमुं लोकं फलोपभोगायेतियावत्संपातमुषित्वा इति च कृत्स्नस्य तस्य कृतस्य तत्रैव भुक्ततां दर्शयतितेषां यदा तत्पर्यवैति इति च श्रुत्यन्तरेणैव एवार्थः प्रदर्श्यते। स्यादेतत् यावदमुष्िम्लोके उपभोक्तव्यं कर्म तावदुपभुङ्क्त इति कल्पयिष्यामीति नैवं कल्पयितुं शक्यतेयत्किंच इत्यन्यत्र परामर्शात् प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किंचेह करोत्ययम्।
तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मणे इति हि अपरा श्रुतिःयत्किंच इत्यविशेषपरामर्शेन कृत्स्नस्येह कृतस्य कर्मणः तत्र क्षयिततां दर्शयति। अपि च प्रायणमनारब्धफलस्य कर्मणोऽभिव्यञ्जकम् प्राक्प्रायणात् आरब्धफलेन कर्मणा प्रतिबद्धस्याभिव्यक्त्यनुपपत्तेः तच्च अविशेषाद्यावत्किंचिदनारब्धफलं तस्य सर्वस्याभिव्य़ञ्जकम् न हि साधारणे निमित्ते नैमित्तिकमसाधारणं भवितुमर्हति न ह्यविशिष्टे प्रदीपसंनिधौ घटोऽभिव्यज्यते न पट इत्युपपद्यते।
तस्मान्निरनुशया अवरोहन्तीत्येवं प्राप्ते ब्रूमः कृतात्ययेऽनुशयवानिति। येन कर्मबृन्देन चन्द्रमसमारूढाः फलोपभोगाय तस्मिन्नुपभोगेन क्षयिते तेषां यदम्मयं शरीरं चन्द्रमस्युपभोगायारब्धम् तत् उपभोगक्षयदर्शनशोकाग्निसंपर्कात्प्रविलीयते सवितृकिरणसंपर्कादिवहिमकरकाः हुतभुगर्चिःसंपर्कादिव च घृतकाठिन्यम् ततः कृतात्यये कृतस्येष्टादेः कर्मणः फलोपभोगेनोपक्षये सति सानुशया एवेममवरोहन्ति केन हेतुना दृष्टस्मृतिभ्यामित्याह।
तथा हि प्रत्यक्षा श्रुतिः सानुशयानामवरोहं दर्शयति तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा इति चरणशब्देनानुशयः सूच्यत इति वर्णयिष्यति। दृष्टश्चायं जन्मनैव प्रतिप्राण्युच्चावचरूप उपभोगः प्रविभज्यमान आकस्मिकत्वासंभवादनुशयसद्भावं सूचयति अभ्युदयप्रत्यवाययोः सुकृतदुष्कृतहेतुत्वस्य सामान्यतः शास्त्रेणावगमितत्वात्।
स्मृतिरपि वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायुःश्रुतवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते इति सानुशयानामेवावरोहं दर्शयति।। कः पुनरनुशयो नामेति केचित्तावदाहुः स्वर्गार्थस्य कर्मणो भुक्तफलस्यावशेषः कश्चिदनुशयो नाम भाण्डानुसारिस्नेहवत् यथा हि स्नेहभाण्डं रिच्यमानं न सर्वात्मना रिच्यते भाण्डानुसार्येव कश्चित्स्नेहशेषोऽवतिष्ठते तथा अनुशयोऽपीति।
ननु कार्यविरोधित्वाददृष्टस्य न भुक्तफलस्यावशेषावस्थानं न्याय्यम् नायं दोषः न हि सर्वात्मना भुक्तफलत्वं कर्मणः प्रतिजानीमहे। ननु निरवशेषकर्मफलोपभोगाय चन्द्रमण्डलमारूढाः बाढम् तथापि स्वल्पकर्मावशेषमात्रेण तत्रावस्थानं न लभ्यते यथा किल कश्चित्सेवकः सकलैः सेवोपकरणैः राजकुलमुपसृप्तश्चिरप्रवासात्परिक्षीणबहूपकरणश्छत्रपादुकादिमात्रावशेषो न राजकुलेऽवस्थातुं शक्नोति एवमनुशयमात्रपरिग्रहो न चन्द्रमण्डलेऽवस्थातुं शक्नोतीति।।न चैतद्युक्तमिव।
न हि स्वर्गार्थस्य कर्मणो भुक्तफलस्यावशेषानुवृत्तिरुपपद्यते कार्यविरोधित्वात् इत्युक्तम्।
नन्वेतदप्युक्तम् न स्वर्गफलस्य कर्मणो निखिलस्य भुक्तफलत्वं भविष्यतीति तदेतदपेशलम् स्वर्गार्थं किल कर्म स्वर्गस्थस्यैव स्वर्गफलं निखिलं न जनयति स्वर्गच्युतस्यापि कंचित्फललेशं जनयतीति न शब्दप्रमाणकानामीदृशी कल्पना अवकल्पते स्नेहभाण्डे तु स्नेहलेशानुवृत्तिर्दृष्टत्वादुपपद्यते तथा सेवकस्योपकरणलेशानुवृत्तिश्च दृश्यते न त्विह तथा स्वर्गफलस्य कर्मणो लेशानुवृत्तिर्दृश्यते नापि कल्पयितुं शक्यते स्वर्गफलत्वशास्त्रविरोधात्।
अवश्यं चैतदेवं विज्ञेयम् न स्वर्गफलस्येष्टादेः कर्मणो भाण्डानुसारिस्नेहवदेकदेशोऽनुवर्तमानोऽनुशय इति यदि हि येन सुकृतेन कर्मणा इष्टादिना स्वर्गमन्वभूवन् तस्यैव कश्चिदेकदेशोऽनुशयः कल्प्येत ततो रमणीय एवैकोऽनुशयः स्यात् न विपरीतः तत्रेयमनुशयविभागश्रुतिरुपरुध्येत तद्य इह रमणीयचरणाः
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — धूम आदि मार्गद्वारा चन्द्रमण्डलमें आरूढ इष्ट आदि कारी भुक्त भोगियोंका वहाँसे प्रत्यावरोहण श्रुतिमें कहा गया है - ' तस्मिन्यावत् ० ' ( वहाँ कर्मोंका क्षय होनेतक रहकर वे पुनः इसी मार्ग से जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं ) यहाँसे आरम्भकर ' रमणीय आचरणवाले ब्राह्मण आदि योनिको प्राप्त होते हैं और पाप आचरणवाले श्वान आदि योनिको प्राप्त होते हैं ' यहाँ तक।
उसमें यह विचार किया जाता है कि जिन्होंने सम्पूर्ण कर्मोंका उपभोग कर लिया है, वे अनुशय ( कर्म ) रहित अवरोहण करते हैं अथवा अनुशय सहित? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - अनुशय रहित अवरोहण करते हैं, किससे? इससे कि ' यावत्सं पातम् ' ( संपात पर्यंन्त ) ऐसा विशेषण है। यहाँ संपातशब्दसे कर्माशय कहा जाता है, क्योंकि इस लोकसे उस लोक में कर्मफलके उपभोगके लिए इस कर्मसे जाते हैं।
' यावत्संपात मुषित्वा ' ( संपात पर्यंन्त रहकर ) यह श्रुति उसके सम्पूर्ण कृत कर्मोंकी वहीं भुक्तता दिखलाती है। ' तेषां यदा ० ' ( जब उनके कमं क्षीण हो जाते हैं तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं ) इस अन्य श्रुति से भी यही अर्थ दिखलाया जाता है। ऐसा हो, परन्तु जब तक उस लोकमें उपभोग योग्य कर्म हैं तब तक जीव उनका उपभोग करेगा, मैं ऐसी कल्पना करूँगा। तो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि ' यत्किञ्च ० ' ( जो कुछ ) ऐसा अन्यत्र परामर्श है।
' प्राप्यान्तं ० ' ( इस लोक में यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्त कर उस लोकसे कर्म करनेके लिए पुन : इस लोक में आ जाता है ) यह दूसरी श्रुति ' यत्किञ्च ' इस अविशेष ( सम्पूर्ण ) परामशंसे यहाँ किये गये समस्त कर्मोंका वहाँ क्षयित्व दिखलाती है, और मरण भी अनारब्ध फलवाले कर्मोंका अभिव्यञ्जक है, क्योंकि मरणसे पूर्व आरब्ध फलवाले कर्मसे प्रतिबद्ध कर्मकी फलके लिए अभिव्यक्ति नहीं हो सकती।
और विशेष न होनेसे वह मरण जिस किस कर्मका फल खारम्भ नहीं हुआ है उस समस्त कर्मोंका अभिव्यञ्जक है, कारण कि साधारण निमित्तके होनेपर नैमित्तिक असाधारण नहीं हो सकता। प्रदीपकी अविशिष्ट ( सामान्य ) संनिधिमें घट अभिव्यक्त होता और पट नहीं, यह उपपन्न नहीं है। इससे जीव अनुशय रहित अवरोहण करते हैं।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' कृतात्ययेऽनुशयवान् ' ( कर्मके क्षय होनेपर अनुशयवान् ) जिस कर्म समूहसे फलके उपभोगके लिए चन्द्रमण्डलमें आरूढ हुए उस कर्म समुदायका उपभोगद्वारा क्षय होने पर उनका उपभोगके लिए चन्द्र - मण्डलमें जो जलमय शरीर आरब्ध हुआ है, वह उपभोगके क्षयदर्शन से उत्पन्न शोकाग्निके सम्पर्क से विलीन हो जाता है। जैसे सूर्य किरणों के सम्पर्क से हिम और करक, जैसे अग्निकी ज्वालाओंके सम्पर्कसे घृतका काठिन्य विलीन हो जाता है।
इसलिए ' कृतात्यये ० ' किये गये इष्ट आदि कर्मफलके उपभोगसे उपक्षय होनेपर अनुशय सहित जीव ही इस लोकमें अवरोहण करते हैं। किस हेतुसे? दृष्टश्रुति और स्मृतिसे, ऐसा कहते हैं। जैसे कि ' तद्य इह ० ' ( उन अनुशयी जीवोंमें जो यहाँ पुण्यकर्मवाले होते हैं वे शीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं। वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा जो अशुभ आचरण ( पाप कर्म ) वाले होते हैं वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं।
वे श्वानयोनि, सूकरयोनि अथवा चण्डालयोनि प्राप्त करते हैं ) यह प्रत्यक्ष श्रुति अनुराय सहित जोवोंका अवरोहण दिखलाती है। यहाँ चरणशब्दसे अनुशय ( कमं ) सूचित होता है, ऐसा वर्णन करेंगे। और जन्मसे ही प्रत्येक प्राणीमें मिन भिन्न रूपसे विभक्त हुआ यह उपयोग देखा गया है, वह आकस्मिकत्वके असंभव से अनुशयके सद्भावको सूचित करता है, क्योंकि अभ्युदय और प्रत्यवाय ( हानि, दुःख ) के सुकृत और दुष्कृत हेतु हैं यह सामान्य रीतिसे शास्त्रद्वारा अवगत होता है।
' वर्णा आश्रमाश्च ० ' ( वर्ण और आश्रम - वाले, अपने कर्म में निष्ठा रखनेवाले मरणानन्तर कर्मफलका अनुभव कर उससे शेष कर्म द्वाराअनुशय नामक कर्म द्वारा विशिष्ट देश, जाति, कुल, रूप, आयु, ज्ञान, आचार, वित्त, सुख और मेघावाले होकर जन्म प्राप्त करते हैं ) यह स्मृति भी अनुशय सहित जीवोंका अवरोहण दिखलाती है। परन्तु वह अनुशय क्या है? कोई तो भाण्डाके अनुसारी स्नेह - तेल आदिके समान स्वर्गके लिए किया गया कर्म जिसका फल भोग लिया गया है, उसका कुछ अवशेष अनुशय है।
जैसे तैलका माण्डा खाली होता हुआ सर्वात्मना खाली नहीं होता, माण्डाके अनुसारी कुछ अवशिष्ट स्नेह रह जाता है, वैसे अनुराय मी जीवके साथ अवस्थित रहता है, ऐसा कहते हैं। परन्तु कार्य - फल विरोधी होनेसे भुक्त फल अदृष्टकी अवशेष अवस्थिति न्याय - युक्त नहीं है। यह दोष नहीं है, क्योंकि कर्म सर्वात्मना भुक्त फल है, हम ऐसी प्रतिज्ञा नहीं करते। परन्तु सम्पूर्ण कर्मफलोपभोगके लिए जीव चन्द्र मण्डलमें आरूढ हुआ है, ठीक, हुआ है, तो मी स्वल्प कर्मके अवशेष से वहाँ अवस्थिति प्राप्त नहीं कर सकता।
जैसे कोई एक सेवक सेवाके सम्पूर्ण उपकरणोंसे राजकुलमें जाय वहाँ उसके बहुत - से उपकरण चिरप्रवाससे नष्ट हो जाँय और छत्र पादुका शेष रह जाँय तो वह राजकुलमें अवस्थित होने के लिए समर्थ नहीं होता। उसी प्रकार अनुशय मात्र परिग्रहवाला चन्द्रमण्डल में अवस्थित नहीं हो सकता। परन्तु यह युक्त - सा प्रतीत नहीं होता, क्योंकि स्वर्गके लिए किया गया कर्म जो भुक्त फल हैं, उसके अवशेषकी अनुवृत्ति फलकी विरोधी होनेसे उपपन्न नहीं होती, ऐसा कहा गया है।
परन्तु यह भी कहा गया है कि स्वर्ग फलवाला समस्त कर्म भुक्त फल नहीं होता। यह मी अयुक्त है कि स्वर्गके लिए किया गया कर्म स्वर्गस्थ को ही सम्पूर्ण स्वर्गफल उत्पन्न नहीं करता, किन्तु स्वगंसे च्युत हुएको भी कुछ फल लेश उत्पन्न करता है। परन्तु श्रुति प्रमाण माननेवालोंके लिए ऐसी कल्पना नहीं हो सकती। स्नेहभाण्डामें तो स्नेहलेशकी अनुवृत्ति देखने में आने से कल्पना युक्त है, और उसीप्रकार सेवकमें भी उपकरण लेशकी अनुवृत्ति देखने में आती है।
परन्तु उसी प्रकार यहाँ तो स्वगं फलवाले कर्मके लेशकी अनुवृत्ति नहीं देखी जाती, और उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, कारण कि स्वर्गं फल प्रतिपादक शास्त्रसे विरोध होता है। अवश्य ही यह इसीप्रकार जाननेयोग्य है – स्वर्गफलवाले इष्ट आदि कर्मका भाण्डानुसारी स्नेहके समान अनुवर्तमान एक देश अनुशय नहीं है, यदि जिस इष्ट आदि सुकृत कर्म द्वारा जीवने स्वर्गका अनुभव किया उसका ही कोई एक देश अनुराय कल्पना करें तो केवल एक ' रमणीय ' ही अनुशय होगा, उससे विपरीत' कपूय ' नहीं होगा।
तब ' तद्य इह रमणीयचरणा अथ य इह कपूयचरणाः ' यह अनुशय विभागकी श्रुति बाधित हो जायगी। इसलिए परलोकमें फल देनेवाले सब कर्मोंके उपभुक्त हो विशेषादनारब्धफलं कृत्स्नमेव कर्माभिव्यनक्ति, तत्र केनचित्कर्मणाऽमुष्मिलोके फलमारभ्यते केनचिदस्मिन्नित्ययं विभागो न संभवतीति- तदप्यनुशय सद्भावप्रतिपादनेजानेपर इस लोकमें फल देनेवाले अवशिष्ट जो अन्य कर्म समुदाय वह अनुशय है उस कर्मवाले अवरोहण करते हैं।
जो यह कहा गया है कि ' यत्किञ्च ' इस अविशेष के परमाशंसे यहाँ किये गये सबं कर्मोंका फलोपभोगसे अन्त प्राप्तकर अनुयय रहित होकर अवरोहण करते हैं, यह ऐसा नहीं है, क्योंकि अनुशयका सद्भाव अवगमित है। जो कुछ यहाँ आमुष्मिक ( परलोक ) फलवाला कर्म किया गया है और आरब्ध भोगवाला कर्म है उन सबका फलके उपभोगसे क्षपणकर, ऐसा अर्थ अवगत होता है।
और जो यह कहा गया है कि मरण अविशेष - समानरूपसे अनारब्ध फलवाले सभी कर्मों की अभिव्यक्ति करता है, तब किसी एक कर्म से परलोकमें फल आरम्भ किया जाता है, और किसी कर्म से इस लोक में, यह विभाग असंभव है। उसका मी अनुशय सद्भावके प्रतिपादनसे निराकरण किया गया है, और मरण अनारब्ध फलवाले कर्मका अभिव्यञ्जक है, ऐसी प्रतिज्ञा किस हेतुसे की जाती है, यह कहना चाहिए।
यदि कहो कि जिसका फल आरब्ध हो गया है ऐसे कर्मसे प्रतिबद्ध अन्य कर्मकी वृत्ति ( फल ) का उद्भव अनुपपन्न होने से उसके शान्त होनेपर मरणकालमें वृत्तिका उद्भव होता है, तो उसपर कहना चाहिएतब तो जैसे मरणके पूर्व जिसका फल आरब्ध है ऐसे कमसे प्रतिबद्ध अन्य कर्मके वृद्ध की अनुपि है, वैसे ही मरणकालमें भी विरुद्ध फलवाले अनेक कर्मोंमें युगपत् फलका आरम्भ असंभव होनेसे बलवान् कर्म से प्रतिबद्ध दुर्बलके वृत्युद्भवको अनुपपत्ति है, अन्य जाति में उपभोग्य फलवाले अनेक कर्म मी एक मरणकालमें युगपत् अभिव्यक्त होते हुए अनारब्ध फलत्व सामान्य धर्मसे एक जातिका आरम्भ करें, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रतिनियत फलत्वका विरोध है अर्थात् प्रत्येक कर्मका भिन्न - भिन्न फल है उससे विरोध है, और मरणकालमें किसी एक कर्मकी अभिव्यक्ति हो और किसी आदि हेतु विना कर्मों का उच्छेद संभाव्य नहीं है।
' कदाचित्सुकृतं कर्म ० ' ( किसी समय संसारमें कर्मका उच्छेद, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि ऐकान्तिक फलत्वका विरोध है। प्रायश्चित् मग्न हुए पुरुषका सुकृत कमं तब तक कूटस्थ रहता है जब तक वह दुःखसे विमुक्त होता है ) इस प्रकारकी स्मृति भी विरुद्ध फलवाले कर्मसे प्रतिबद्ध अन्य कर्मको चिर अवस्थिति दिखलाती है।
यदि अनारब्धफलवाले सब कर्म एक मरण समयमें अभिव्यक्त होते हुए एक जाति - जन्म उत्पन्न करें, तो स्वर्ग, नरक, सर्पादि योनियों में अधिकारके अप्राप्त होनेसे धर्म और अधर्मका उत्पत्ति न होनेपर निमित्तके अभाव से उत्तर जन्म उपपन्न नहीं होगा। और ब्रह्महत्या आदि एक - एक कर्म अनेक जन्मका निमित्त है यह स्मृति वाक्य बाधित हो जायगा। धर्म और अधर्मकेारूप, फल, साधन आदिके ज्ञानके लिए शास्त्र से भिन्न कारणकी संभावना नहीं की जा सकती।
मरण दृष्टफलवाले कार्यादि कर्मका अभिव्यञ्जक नहीं हो सकता और मरणमें यह अभिव्यञ्जकत्व कल्पना अव्यापक भी है। प्रदीपके उपन्यासका भी कर्मके बलाबल के प्रदर्शनसे ही निराकारण किया गया है। स्थूल और सूक्ष्म रूपकी अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्तिके समान इसे जानना चाहिए। जैसे सन्नि के समान होनेपर भी प्रदीप स्थूलरूपको अभिव्यक्त करता है सूक्ष्मको नहीं, अनारब्ध फलवाले कर्म समुदायको समान अवसर प्राप्त होनेपर भी मरण बलवान् कर्मकी वृत्ति ( व्यापार ) का उद्भव करता है दुर्बल के वृत्तिका नहीं।
इसलिए श्रुति ( रमणीयचरणाः ) स्मृति ( ततः शेषेण ) और न्याय ( प्रबलप्रतिबन्धात् ) के विरोध होने से अशेष कर्मकी अभिव्यक्तिका यह स्वीकार असम्बद्ध - अयुक्त है। शेषकर्मके सद्भाव होनेपर मोक्षाभाव प्रसङ्ग होगा, यह संभ्रम भी अनवसर है, क्योंकि सम्यग्दर्शनसे समस्त कर्मक्षय होता है, ऐसो श्रुति है। इससे यह सिद्ध हुआ कि अनुशय सहित ही जीव अवरोहण करते हैं। वे अवरोहण करनेवाले जिस मार्ग से गये थे उससे और उससे विपरीत मागंसे अवरोहण करते हैं।
' यथेतम् ' जैसे गये थे वैसे, ऐसा अर्थ हैं, ' अनेवम् ' उसके विपर्ययसे ऐसा अर्थ है, धूम और आकाश जो पितृयाण मांगते गृहोत हैं, उनका अवरोहणमें कथन होनेसे और ' यथेतम् ' इस शब्दसे जैसे गये थे वैसे, ऐसा प्रतीत होता है। रात्रि आदिका संकीर्तन न होनेसे और अभ्र आदिका ग्रहण होनेसे विपर्यय भी प्रतीत होता है॥ ८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अब गतिके अनन्तर होनेवाली आगतिका ' कृतात्यये ' इत्यादिसे निरूपण किया जाता है। जो यह कहा गया है कि जलसे परिवेष्टित होकर जीव जाता है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि स्वगंसे बवरोहण करनेवालोंके कर्मका अभाव होनेसे तत्सम्बन्धित जलका मी अभाव है, इस प्रकार आक्षेपसंगति पूर्वपक्ष है।
* इसलिए स्वर्ग आदि लोकोंमें सम्पूर्ण कर्मोंके उपभोगद्वारा क्षय होनेपर अनुशय रहित केवल आचरणद्वारा इस लोकमें जीवोंका अवरोहण होता है। इससे आगति अनियमित सिद्ध होती है। पूर्वपक्ष में कर्मका अभाव होनेसे वैराग्यकी दृढता भी नहीं हो सकती। सिद्धान्त में कर्मकी सत्ता होने से आगति में नियम है, इससे वैराग्यकी हृढता है।
* सूत्रस्थ ' दृष्ट ' शब्दका श्रुतार्थं कहकर अब उसका ' दृष्ट ' इत्यादिसे अन्य अर्थं कहते हैं। ' पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन ' ( पुण्य कर्मसे सुखी और पाप कर्मसे दुःखी होता है ) इत्यादि शास्त्रसे सुख और दुःखके हेतु धर्म और अधर्म ज्ञात होते हैं। इससे ' जन्मारभ्यदृष्टो भोगः ' कर्महेतुकः, मोगत्वात्, स्वर्ग भोगवत् ' ( जन्म से लेकर देखा गया मोग कर्म हेतुक है, भोग होने से स्वर्गयोग के समान ) इसप्रकार अनुमान से भी अनुशय सिद्ध होता है। विपक्षमें मोगके हेतु कर्मके न होनेसे भोगोंमें दृष्ट वैलक्षण्य आकस्मिक होगा, इसलिए अनुराय अवश्य मानना चाहिए।
* अब भगवान् भाष्यकार ' तस्मात् ' इत्यादिसे स्वाभिमत अनुशयको कहते हैं। ' जीवमनुशेतेइत्यनुशयः : ' ' स्वर्ग में फल देनेवाले कर्मोंको फलोपभोग से समाप्तकर उनसे भिन्न इस लोक में फल देनेवाले जो कर्म समुदाय है वह अनुशय है। उसके साथ ही जीव अवरोहण करता है। जन्मके आरम्भसे ही - विलक्षण मोग देखने में आता है, इस प्रत्यक्ष लिङ्ग अनुगृहीत ऐहिक अनुशय कर्म विशेष प्रतिपादक ' तद्य इह रमणीयचरणाः, कपूयचरणाः ' इस श्रुति के साथ विरोध होनेसे ' यत्किञ्च ' और ' यावत्सं पातम् ' ये सामान्य शब्द केवल परलोक विषयक कर्मको कहते हैं, ऐसा संकोच करना युक्त है। मरण भी सभी कर्मोंका अभिव्यञ्जक नहीं है, क्योंकि ' रमणीयचरणाः, कपूयचरणा : ' इस अनुशय प्रतिपादक श्रुतिके साथ विरोध होता है।
* मरण समानरूपसे सभी कर्मोंको अभिव्यक्त करता है, इसमें ' यदि ' इत्यादिसे अन्य दोष कहते हैं।
" श्वसूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम्। चण्डालपुल्कसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति॥ ”
( ब्रह्मघ्नश्वान, सूकर, गर्दभ, ऊँठ, बैल, बकरी - भेड़, मृग, पक्षी, चण्डाल और पुल्कस ( जूँ ) की योनिको प्राप्त करता है ) इत्यादि स्मृतिसे विरोध होने के कारण सब कर्म एक जन्म उत्पन्न नहीं कर सकते। अनेक कर्म एक जन्म देते हैं अथवा ब्रह्महत्यादि एक कर्म अनेक जन्मोंको देता है, इस विषयमें तो केवल शास्त्र ही प्रमाण है।
* शेष कर्मोंके अस्तित्वसे मोक्ष नहीं होगा, इसलिए यावत् कर्मोद्वारा फलोपभोगके लिए एक जन्म स्वीकार करना चाहिए, उसके समाप्त होनेपर स्वतः ही मुक्ति सिद्ध होगी, यह ऐक भविक कथन अनवसर है, क्योंकि ' श्लीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ' ( ब्रह्मात्माका साक्षात्कार होनेपर उस ब्रह्मवित् कर्म क्षीण हो जाते हैं ) ' ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ' ( भ ० गी ० ४।३७ ) ( वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममयकर देती है ) इत्यादि श्रुति और स्मृति तत्त्वज्ञानसे यावत् कर्मोंका क्षय कहती हैं।
इसलिए अज्ञानी जीव अनुशय सहित लौटते हैं। लौटनेका मागं इस प्रकार है' तस्मिन्यावत्सं पातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते ' ( छा ० ५/१०/५, ६, ७ ) ( चन्द्र मण्डलमें कर्मोंके क्षय होनेतक रहकर वे पुनः इसी मार्गसे जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं।
वे पहले आकाशको प्राप्त होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर वे घूम होते हैं और धूम होकर अभ्र ( वाष्प ) होते हैं, वह अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है, तब वे जीव इसलोकमें धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उड़द आदि होकर उत्पन्न होते हैं। इसप्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त कष्टप्रद है। उस अन्नको जो - जो मक्षण करता है और जो - जो वीर्यं सेचन करता है, तद्रूप ही वह अनुरायी जीव हो जाता है। उन अनुशयी जीवोंमें जो पुण्यशाली होते हैं वे शीघ्र हो उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं )॥
८
3.1.9 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र ९
चरणाद् इति चेन् न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॥ ३.१.९ ॥
पदच्छेद — चरणात् इति चेत् , न , उपलक्षणार्था , इति , कार्ष्णाजिनिः
सूत्रार्थ — ( चरणात् ) ' रमणीयचरणा : ' इत्यादि श्रुति चरण चारित्र्यसे योनिकी प्राप्ति कहती है, अनुशयसे नहीं ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि ( कार्ष्णाजिनिः ) कार्ष्णाजिनि आचार्य चरणश्रुतिको ( उपलक्षणार्थतेति ) अनुशयका उपलक्षणार्थं मानते हैं।
शाङ्करभाष्य
अथापि स्यात् या श्रुतिरनुशयसद्भावप्रतिपादनायोदाहृता तद्य इह रमणीयचरणाः इति सा खलु चरणात् योन्यापत्तिं दर्शयति नानुशयात् अन्यच्चरणम् अन्योऽनुशयः चरणं चारित्रम् आचारः शीलमित्यनर्थान्तरम् अनुशयस्तु भुक्तफलात्कर्मणोऽतिरिक्तं कर्म अभिप्रेतम् श्रुतिश्च कर्मचरणे भेदेन व्यपदिशति यथाकारी यथाचारी तथा भवति इतियान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि यान्यस्माक्ुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि इति च तस्मात् चरणाद्योन्यापत्तिश्रुतेः नानुशयसिद्धिः इति चेत् नैष दोषः यतोऽनुशयोपलक्षणार्थैव एषा चरणश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिराचार्यो मन्यते।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.१.१० के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * “ अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्च ज्ञानं च शीलमेतद्विदुर्बुधाः॥ "
( सब भूतों में कर्म, मन और वाणीसे अद्रोह, अनुग्रह और ज्ञानको पण्डित लोग शील जानतेकहते हैं ) इसप्रकार स्मृतिमें भी अद्रोह आदि आचार कहा गया है। शास्त्रका अर्थ ज्ञानरूप शील सब कर्मोंका अङ्ग कहा गया है उसका बोधक चरणपद है, वह अपने अङ्गी श्रौत आदि कर्मोंका उपलक्षक है। कर्मको उत्तरारस्था ही तो धर्माधर्मरूप अपूर्व है। इसप्रकार कर्म - चरण में लक्षणासे तदभिन्न अपूर्व नामक अनुशयको सिद्धि होती है। यह आचाय कार्ष्णाजिनिका मत है॥ ९
3.1.10 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १०
आनर्थक्यम् इति चेन् न तदपेक्षत्वात् ॥ ३.१.१० ॥
पदच्छेद — अनर्थक्यम् , इति " चेत् , न , तदपेक्षत्वात्
सूत्रार्थ — चरणश्रुति अपने मुख्य अर्थंका त्यागकर अनुशंयको कहेगी तो चरणश्रुति में ( अनार्थक्यम् ) मनर्थक्य प्रसक्त होगा, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं है, ( तदपेक्षत्वात् ) क्योंकि कर्मोंको आचारकी अपेक्षा है, अतः चरणश्रुति 6 सार्थक है।
शाङ्करभाष्य
स्यादेतत् कस्मात्पुनश्चरणशब्देन श्रौतं शीलं विहाय लाक्षणिकः अनुशयः प्रत्याय्यते ननु शीलस्यैव श्रौतस्य विहितप्रतिषिद्धस्य साध्वसाधुरूपस्य शुभाशुभयोन्यापत्तिः फलं भविष्यति अवश्यं च शीलस्यापि किंचित्फलमभ्युपगन्तव्यम् अन्यथा ह्यानर्थक्यमेव शीलस्य प्रसज्येत इति चेत् नैष दोषः कुतः तदपेक्षत्वात् इष्टादि हि कर्मजातं चरणापेक्षम् न हि सदाचारहीनः कश्चिदधिकृतः स्यात् आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः इत्यादिस्मृतिभ्यः। पुरुषार्थत्वेऽप्याचारस्य न आनर्थक्यम् इष्टादौ हि कर्मजाते फलमारभमाणे तदपेक्ष एवाचारस्तत्रैव कंचिदतिशयमारप्स्यते। कर्म च सर्वार्थकारि इति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिः। तस्मात्कर्मैव शीलोपलक्षितमनुशयभूतं योन्यापत्तौ कारणमिति कार्ष्णाजिनेर्मतम् न हि कर्मणि संभवति शीलात् योन्यापत्तिर्युक्ता न हि पद्भ्यां पलायितुं पारयमाणो जानुभ्यां रंहि
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह भी हो - ' तद्य इह रमणीयचरणा : ' इस प्रकार यह जो श्रुति
७ अनुराय के सद्भावके प्रतिपादन के लिए उदाहृत है, वह चरणसे योनिकी प्राप्तिको दिखलाती है, अनुशय से नहीं। चरण भिन्न है और अनुशय भिन्न है। चरण, चारित्र, आचार और शील ये एकार्थक पर्याय शब्द हैं। अनुराय तो भुक्तफल कर्म से भिन्न कर्म अभिप्रेत है और ' यथाकारी यथाचारी तथा भवति ' ( जैसा कर्म और जैसा आचरण करता है वैसा ही वह होता है ) और ' यान्यनवद्यानि ० ' ( जो अनिन्द्य कर्म उन्हीं का सेवन करना चाहिए दूसरोंका नहीं। हम गुरुजनों के जो शुभ आचरण
हैं तुझे उन्होंका सेवन करना चाहिए ) इसका श्रुति कम और चरणका भेदसे व्यपदेश करती है
। इसलिए चरण से योनिकी प्राप्तिको प्रतिपादक श्रुति से अनुशयको सिद्धि नहीं होतो, ऐसा यदि कहो,
तो यह दोष नहीं हैं, क्योंकि
मानते हैं॥ ८॥ यह चरण श्रुति अनुशयके उपलक्षणके लिए है, ऐसा कार्ष्णाजिनि आचार्य
कर लाक्षणिक अनुशयकी
यह हो ; परन्तु चरण शव्दसे श्रुति प्रतिपादित शीलका त्याग प्रतीति किस प्रकार की जाती है? परन्तु श्रौत विहित वा प्रतिषिद्ध, साधु अथवा असाधुरूप श्रीलका ही शुभाशुभ योनिकी प्राप्ति रूप फल होगा। शीलका भी अवश्य कुछ फल स्वीकार करना चाहिए अन्यथा शीलमें आनर्थक्य ही प्रसक्त होगा? ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है I। किससे? इससे कि - उसकी अपेक्षा है। इष्ट आदि कर्म समुदायको चरणकी अपेक्षा है। ' आचारहीनं न पुनन्ति वेदा : ' ( अचार हीनको वेद - यज्ञादि कर्म पवित्र नहीं करते ) इत्यादि स्मृतियोंसे सदाचार हीन कोई अधिकृत नहीं होता। पुरुषार्थत्व - पुरुष संस्कारत्वमें भी आचार अनर्थक नहीं है। क्योंकि इष्ट आदि कर्मसमुदायके . फलके आरम्भ करनेपर उनकी अपेक्षा रखनेवाला आचार उनमें ही कुछ अतिशय विशेष आरम्भ करता है। कर्म तो सर्व अर्थ करनेवाला है ऐसी श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्धि है। इसलिए कर्म ही शीलसे उपलक्षित अनुशयरूप होकर जन्मको प्राप्ति में कारण है, यह काष्र्णाजिनिका मत है। और
पदच्छेद्र – सुकृतदुष्कृते, एव, इति, तु, बादरिः।
सूत्रार्थ - ( तु ) परन्तु चरणशब्दका अर्थं तो ( सुकृतदुष्कृते एव ) सुकृत और दुष्कृत ही है, ( इति ) ऐसा ( बादरि : ) बादरि आचार्यका मत कर्मके सम्भव होनेपर शीलसे जन्म प्राप्ति युक्त नहीं है। पैरोंसे पलायन करनेमें समर्थं हुआ पुरुष घुटनोंसे पलायन नहीं करता है।। १०
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.११ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.11 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र ११
सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ३.१.११ ॥
शाङ्करभाष्य
बादरिस्त्वाचार्यः सुकृतदुष्कृते एव चरणशब्देन प्रत्याय्येते इति मन्यते चरणम् अनुष्ठान कर्मेत्यनर्थान्तरम्। तथा हि अविशेषेण कर्ममात्रे चरतिः प्रयुज्यमानो दृश्यते यो हि इष्टादिलक्षणं पुण्यं कर्म करोति तं लौकिका आचक्षते धर्मं चरत्येष महात्मेति। आचारोऽपि च धर्मविशेष एव। भेदव्यपदेशस्तु कर्मचरणयोर्ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेनाप्युपपद्यते। तस्मात् रमणीयचरणाः प्रशस्तकर्माणः कपूयचरणा निन्दितकर्माणः इति निर्णयः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु चरणशब्दसे सुकृत और दुष्कृत ही प्रतीत होते हैं, ऐसा बादरि आचार्य मानते हैं। चरण, अनुष्ठान और कर्म ये एकार्थवाची शब्द हैं। जैसे कि ' चर् ' धातु अविशेषरूप से कर्ममात्रमें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है। इससे जो इष्ट आदिरूप पुण्य कर्म करता है उसको लोग ऐसा कहते हैं कि यह महात्मा धर्मका आचरण करता है और आचार भी धर्मं विशेष है। कर्म और चरणमें भेदव्यपदेश तो ' ब्राह्मणपरिव्राजक ' न्यायसे भी उपपन्न होता है। इसलिए ' रमणीयचरणाः ' प्रशस्त कर्मवाले और ' कपूयचरणाः ' निन्दित कर्मवाले, ऐसा निर्णय है॥ ११
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि अक्रोध आदिरूप शील जो साधारण धर्म है वह यज्ञ आदि विशेष कमसे भिन्न है, तो भी चरण शब्द और आचारशब्द मुख्यरूपसे कर्मवाची हैं, शीलवाची नहीं, अतः यहाँ लक्षणाका अवसर नहीं है। यह आचार्य बादरिका मत ही मुख्य सिद्धान्त है। यदि कर्म ही आचार है, तो ' यथाकारी यथाचारी ' यह भेदव्यपदेश क्यों है? यह तो ' ब्राह्मणपरिव्राजक ' न्यायसे समझना चाहिए। जहाँ सामान्यवाची शब्दका विशेषार्थं पदकी संनिधिसे अन्य अर्थ प्राप्त होता है वहाँ यह न्याय प्राप्त होता है। अतः प्रकृतमें कर्म और चरणका परस्पर अभेद होनेपर भी इसी न्यायसे किसी प्रकार भेद कथन होता है, वहां कर्म सामान्यवाची ' यथाकारी ' शब्दसे ' यान्यनवद्यानि कर्माणि ' इसका ग्रहण है और ' यथाकारी ' उपपद रहित ' यथा आचारी ' शब्दसे ' अस्माकं तु सुचरितानि ' इसका ग्रहण है, इससे सदाचार भासता है। इसप्रकार पुण्य और पापरूप कर्म ही अनुशय है, उससे आगति अवश्यंभावी है। इसके अनुसन्धान करनेसे वैराग्य होनेपर ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके साधनों में प्रवृत्ति होती है॥ ११
अनिष्टादिकार्यधिकरणम्
3.1.12 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १२
अनिष्टादिकारिणाम् अपि च श्रुतम् ॥ ३.१.१२ ॥
पदच्छेद — अनिष्टादिकारिणाम् अपि च , श्रुतम्
सूत्रार्थ — ( अनिष्टादिकारिणामपि ) ' ये वे के चास्माल्लोकात्प्रयन्ति ' इत्यादि श्रुतिसे अनिष्ट आदि कर्म करनेवालोंका भी ( श्रुतम् ) चन्द्रलोक गमन श्रुत है।
शाङ्करभाष्य
इष्टादिकारिणश्चन्द्रमसं गच्छन्तीत्युक्तम्। ये त्वितरेऽनिष्टादिकारिणः तेऽपि किं चन्द्रमसं गच्छन्ति उत न गच्छन्तीति चिन्त्यते। तत्र तावदाह इष्टादिकारिण एव चन्द्रमसं गच्छन्तीत्येतत् न कस्मात् यतोऽनिष्टादिकारिणामपि चन्द्रमण्डलं गन्तव्यत्वेन श्रुतम्। तथा हि अविशेषेण कौषीतकिनः समामनन्ति ये वै के चास्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति इति। देहारम्भोऽपि च पुनर्जायमानानां न अन्तरेण चन्द्रप्राप्तिम् अवकल्पतेपञ्चम्यामाहुतौ इत्याहुतिसंख्यानियमात्। तस्मात्सर्व एव चन्द्रमसमासीदेयुः। इष्टादिकारिणामितरेषां च समानगतित्वं न युक्तमिति चेत् न इतरेषां चन्द्रमण्डले भोगाभावात्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इष्ट आदि कर्म करनेवाले चन्द्रलोक में जाते हैं, ऐसा कहा गया है। परन्तु इनसे भिन्न जो ष्ट आदि कर्म करनेवाले हैं, क्या वे भी चन्द्रलोकमें जाते हैं अथवा नहीं जाते, इसपर विचार किया जाता है। इस विषय में पूर्वपक्षी कहते हैं - इष्ट आदि कर्म करनेवाले हो चन्द्रलोकमें जाते हैं, ऐसा कोई नियम नहीं है, किससे? इससे कि अनिष्ट आदि कर्म करनेवालोंका भी चन्द्रलोकमें गन्तव्यरूपसे श्रवण होता है। जैसे कि कौषीतकी शाखावाले अविशेषरूपसे ' ये वै के ० ' ( जो कोई इस लोकसे प्रायण करते हैं वे सब चन्द्रमण्डलमें ही जाते हैं ) ऐसा कहते हैं। पुनर्जन्म पानेवालोंकी देहोत्पत्ति भी चन्द्रलोक प्राप्तिके विना नहीं हो सकती, क्योंकि ' पञ्चम्यामाहुतौ ' ( पाँचवीं आहुतिमें ) इसप्रकार आहुति संख्याका नियम है, इसलिए सभी चन्द्रलोकको प्राप्त होने चाहिए। यदि कहो कि इष्ट आदि कारी और इनसे अन्योंकी समान गति युक्त नहीं है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्योंके चन्द्रमण्डलमें भोगका अभाव है॥ १२
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इसप्रकार इष्ट आदि कारियोंकी गति और आगतिके विचारसे वैराग्यका निरूपणकर अब अनिष्ट आदि कारियोंकी गति और आगतिके विचारसे ' अनिष्ठादि ० ' इत्यादि सूत्रद्वारा वैराग्यका निरूपण करते हैं। ' ये बै के ० ' यह कौषीतकी श्रुति समानरूपसे सबका चन्द्रलोक गमन कहती है। ' वैवस्वतं सङ्गमनं जनानाम् ' ( यमलोक पापीजनोंका गम्यस्थान है ) इससे तो अनिष्ट आदि कारियोंको चन्द्र लोकका दर्शन भी प्राप्त नहीं होता। अतः ' ये त्वितरे ' आदिसे संशय करते हैं। पूर्वपक्ष में पुण्यवान्की ही चन्द्रलोकमें गति है, यह नियम न होनेसे पुण्य व्यर्थं है और पापसे वैराग्यका अदृढफलत्व है। सिद्धान्तमें अनिष्टकारियोंको चन्द्रलोक- दर्शन भी नहीं होता, अतः पुण्यका अर्थवत्व और वैराग्यका दृढफलत्व है।। १२
3.1.13 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १३
संयमने त्व् अनुभूयेतरेषामारोहाव् अरोहौ तद्गतिदर्शनात् ॥ ३.१.१३ ॥
पदच्छेद — संयमने , तु , अनुभूय , इतरेषाम् , आरोहावरोहो , तद्गतिदर्शनात्
सूत्रार्थ — ( तु ) पूर्वपक्षको निवृत्तिके लिए है। ( संयमने ) यमालय में ( अनुभूय ) यमयातनाका अनुभवकर इस लोकमें लौटते हैं, इसप्रकार ( इतरेषाम् ) अनिष्ट आदि कारियोंके ( आरोहावरोही ) आरोह और अवरोह होते हैं, ( तद्गतिदर्शनात् ) क्योंकि ' अयं लोको नास्ति ' इत्यादि श्रुति में उनकी गतिका दर्शन होता है।
शाङ्करभाष्य
तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति। नैतदस्ति सर्वे चन्द्रमसं गच्छन्तीति कस्मात् भोगायैव हि चन्द्रारोहणम् न निष्प्रयोजनम् नापि प्रत्यवरोहायैव यथा कश्चिद्वृक्षमारोहति पुष्पफलोपादानाय न निष्प्रयोजनम् नापि पतनायैव भोगश्च अनिष्टादिकारिणां चन्द्रमसि नास्तीत्युक्तम् तस्मादिष्टादिकारिण एव चन्द्रमसमारोहन्ति नेतरे। ते तु संयमनं यमालयमवगाह्य स्वदुष्कृतानुरूपा यामीर्यातना अनुभूय पुनरेव इमं लोकं प्रत्यवरोहन्ति एवंभूतौ तेषामारोहावरोहौ भवतः कुतः तद्गतिदर्शनात् तथा हि यमवचनसरूपा श्रुतिः प्रयताम् अनिष्टादिकारिणां यमवश्यतां दर्शयति न सांपरायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे इति।वैवस्वतं संगमनं जनानाम् इत्येवंजातीयकं च बह्वेव यमवश्यताप्राप्तिलिङ्गं भवति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है। यह नियम नहीं है कि सब चन्द्रमण्डलमें जाते हैं। यह किससे? इससे कि भोगके लिए ही चन्द्रमण्डल में आरोहण होता है निष्प्रयोजन नहीं, और केवल लौटने के लिए भी नहीं। जैसे कोई पुष्प और फलोंके ग्रहण करनेके लिए ही वृक्षपर चढता है न निष्प्रयोजन और न पठनके लिए ही, और यह कहा गया है कि अनिष्ट आदि कारियों का चन्द्रमण्डल में भोग नहीं है। इसलिए इष्ट आदि कारी ही चन्द्रमण्डलमें आरोहण करते हैं अन्य नहीं। वे अनिष्ट आदि कारी तो संयमन यमालय में प्रवेशकर अपने दुष्कृतोंके अनुसार यमकी यातनाका अनुभवकर फिर भी इस लोकमें लौटते हैं। इसप्रकार उनका आरोह और अवरोह होता है। किससे? उनकी गतिके दर्शन होनेसे। जैसे कि ' न सांपरायः प्रतिमाति ० ' ( वित्त मोहसे मूढ, प्रमाद करनेवाले उस अज्ञको परलोकका साधन नहीं सूझता। स्त्री, पुत्र आदि विशिष्ट यह लोक है, परलोक नहीं है, ऐसा माननेवाला पुरुष बारम्बार मेरे वशको प्राप्त होता है ) इसप्रकार यमवचन रूप श्रुति मरकर जानेवाले अनिष्ट आदि कारियोंको यमकी अधीनता दिखलाती है। और ' वैवस्वतं संगमनं जनानाम् ' ( यमलोक पापीजनोंका गम्य स्थान है ) इसप्रकारके भी बहुत ही यमकी अधीनताकी प्राप्ति के लिङ्ग बोधक श्रुति वाक्य हैं॥ १३
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.१५ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.14 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १४
स्मरन्ति च ॥ ३.१.१४ ॥
पदच्छेद — स्मरन्ति च
सूत्रार्थ — और स्मृतिकार भी ऐसा ही कहते हैं।
शाङ्करभाष्य
अपि च मनुव्यासप्रभृतयः शिष्टाः संयमने पुरे यमायत्तं कपूयकर्मविपाकं स्मरन्ति नाचिकेतोपाख्यानादिषु।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और मनु, व्यास आदि शिष्टोंने संयमन - यमलोक में पापकर्मीका विपाक यमके अधीन है, इसप्रकार नाचिकेतोपाख्यान - आदिमें स्मरण किया है।। १४
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.१५ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.15 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १५
अपि च सप्त ॥ ३.१.१५ ॥
पदच्छेद — अपि च , सप्त
सूत्रार्थ — ( अचि च ) और भी पौराणिक लोग ( सप्त ) रौरव आदि सात नरक पाप कर्म फलके उपभोगकी भूमि कहते हैं।
शाङ्करभाष्य
* अपि च सप्त नरका रौरवप्रमुखा दुष्कृतफलोपभोगभूमित्वेन स्मर्यन्ते पौराणिकैः, तान निष्टादिकारिणः प्राप्नुवन्ति। कुतस्ते चन्द्रं प्राप्नुयुरित्यभिप्रायः।। १५
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और रौरव प्रमुख सात नरक पाप फलके उपभोगकी भूमिरूपसे पौराणिक लोग स्मरण करते हैं। उनको अनिष्ट आदि कारी प्राप्त करते हैं 1। वे चन्द्रलोकको कैसे प्राप्त करें? ऐसा अभिप्राय है॥ १५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * रौरव, महारौरव, वह्नि, वैतरणी, कुम्भी, तामिस्रा और अन्धतामिस्रा इस प्रकार सात मुख्य नरक हैं। जिनका विस्तार पूर्वक वर्णन पुराणोंमें है। ' कूटसाक्षी तथाऽसम्यक्पक्षपातेन यो वदेत्। यश्चान्यदनृतं वक्ति स नरो याति रौरवम्॥
भ्रूणहा पुरहर्ता च गोध्नश्च मुनिसत्तमाः! यान्ति ते नरके घोरे यश्वोच्छ्वासनिरोधकः॥ ' जो झूठी साक्षी दे, तथा पक्षपातसे ठीक - ठीक न बोले और भी जो मिथ्या बोलता हो, वह मनुष्य रौरवमें जाता है। भ्रूणहत्या करनेवाला, ग्रामका हरण करनेवाला, गोघ्त और जो उच्छ्वासका निरोधक है, हे मुनिश्रेष्ठ! वे घोर नरक में जाते हैं ) इस प्रकार अनिष्ट आदि कर्म करनेवाले इन नरकोंको प्राप्त होते हैं॥ १५
3.1.16 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १६
तत्रापि तद्व्यापारादविरोधः ॥ ३.१.१६ ॥
पदच्छेद — तत्र , अपि च , तद्व्यापारात् , अविरोधः
सूत्रार्थ — ( तत्रापि ) उन रौरव आदि नरकोंमें भी ( तद्वयापारात् ) यम प्रयुक्त शासन होनेसे ( अविरोधः ) विरोध नहीं है।
शाङ्करभाष्य
तेष्वपि सप्तसु नरकेषु तस्यैव यमस्याधिष्ठातृत्वव्यापाराभ्युपगमादविरोधः यमप्रयुक्ता एव हि ते चित्रगुप्तादयोऽधिष्ठातारः स्मर्यन्ते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु यह विरुद्ध है कि पापकर्म करनेवाले यमके अधीन यातनाका अनुभव करते हैं, क्योंकि उन रौरव आदि नरकोंमें अन्य चित्रगुप्त आदि अनेक अधिष्ठाता स्मरण किये जाते हैं। नहीं, ऐसा कहते हैं-
उन सात नरकोंमें भी उस यमके ही अधिष्ठातृरूपसे व्यापार स्वीकृत है, अतः विरोध नहीं है, क्योंकि वे चित्रगुप्त आदि यमसे प्रयुक्त हो अधिष्ठातृरूपसे स्मरण किये जाते हैं॥ १६
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.१८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.17 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १७
विद्याकर्मणोर् इति तु प्रकृतत्वात् ॥ ३.१.१७ ॥
पदच्छेद — विद्याकर्मणोः , इति , तु , प्रकृतत्वात्
सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है। ' अर्थतयोः पथोनं ' इत्यादि श्रुति में ' एतयोः ' शब्दसे ( विद्याकर्मणोः ) विद्या और कर्मका ग्रहण होता है, ( प्रकृतत्वात् ) क्योंकि वे ही देवयान और पितृयाणरूपसे प्रकृत हैं।
शाङ्करभाष्य
पञ्चाग्निविद्यायाम्वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यते इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनावसरे श्रूयते अथैतयोः पथोर्न कतरेणचन तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति। जायस्व म्रियस्त्वेत्येतत्तृतीयं स्थानं तेनासौ लोके न संपूर्यते इति।
तत्र एतयोः पथोरिति विद्याकर्मणोरित्येतत् कस्मात् प्रकृतत्वात् विद्याकर्मणी हि देवयानपितृयाणयोः पथोः प्रतिपदे प्रकृते तद्य इत्थं विदुः इति विद्या तया प्रतिपत्तव्यो देवयानः पन्थाः प्रकीर्तितःइष्टापूर्ते दत्तम् इति कर्म तेन प्रतिपत्तव्यः पितृयाणः पन्थाः प्रकीर्तितः तत्प्रक्रियायाम्अथैतयोः पथोर्न कतरेणचन इति श्रुतम्।
एतदुक्तं भवति ये न विद्यासाधनेन देवयाने पथ्यधिकृताः नापि कर्मणा पितृयाणे तेषामेष क्षुद्रजन्तुलक्षणोऽसकृदावर्ती तृतीयः पन्था भवतीति तस्मादपि न अनिष्टादिकारिभिश्चन्द्रमाः प्राप्यते। स्यादेतत् तेऽपि चन्द्रबिम्बमारुह्य ततोऽवरुह्य क्षुद्रजन्तुत्वं प्रतिपत्स्यन्त इति तदपि नास्ति आरोहानर्थक्यात्। अपि च सर्वेषु प्रयत्सु चन्द्रलोकं प्राप्नुवत्सु असौ लोकः प्रयद्भिः संपूर्येत इत्यतः प्रश्नविरुद्धं प्रतिवचनं प्रसज्येत तथा हि प्रतिवचनं दातव्यम् यथा असौ लोको न संपूर्यते।
अवरोहाभ्युपगमादसंपूरणोपपत्तिरिति चेत् न अश्रुतत्वात् सत्यम् अवरोहादप्यसंपूरणमुपपद्यते श्रुतिस्तु तृतीयस्थानसंकीर्तनेन असंपूरणं दर्शयति एतत्तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न संपूर्यते इति तेन अनारोहादेव असंपूरणमिति युक्तम् अवरोहस्येष्टादिकारिष्वप्यविशिष्टत्वे सति तृतीयस्थानोक्त्यानर्थक्यप्रसङ्गात्।
तुशब्दस्तु शाखान्तरीयवाक्यप्रभवामशेषगमनाशङ्कामुच्छिनत्ति एवं सति अधिकृतापेक्षः शाखान्तरीये वाक्ये सर्वशब्दोऽवतिष्ठते ये वै केचिदधिकृता अस्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्तीति।।यत्पुनरुक्तम् देहलाभोपपत्तये सर्वे चन्द्रमसं गन्तुमर्हन्तिपञ्चम्यामाहुतौ
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पञ्चाग्नि विद्यामें ' वेत्थ यथाऽसौ ० ' ( प्रवाहण - यह लोक जिस कारण पूर्ण नहीं होता, क्या वह तू जानता है? ) इस प्रश्नके प्रतिवचन - उत्तरके अवसरमें ' अर्थतयोः पथोर्न ० ' ( जो इन - अचि और धूममेंसे किसी एक मार्गद्वारा नहीं जाते। वे ये क्षुद्र और बारम्बार आने - जानेवाले प्राणी होते हैं। ' उत्पन्न होओ और मरो ' ' यही उनका तृतीय स्थान होता है। इसी कारण यह लोक नहीं मरता ) ऐसी श्रुति है।
उसमें ' एतयोः पथोः ' ( उन दोनों मार्गों के विद्या और कर्मके ) यह अभिप्राय है, किससे? इससे कि वे प्रकृत हैं। विद्या और कर्म ही देवयान और पितृयाण मागंकी प्राप्तिमें प्रकृत हैं, ' तद्य इत्थं विदुः ' ( वे जो कि इसप्रकार जानते हैं ) यह विद्या है, उससे प्राप्तव्य देवयान मार्ग कहा गया है ' इष्टापूर्ते दत्तम् ' ( इष्ट, पूतं और दत्त ) यह कर्म है, उससे प्राप्तव्य पितृयाण मागं कहा गया है।
उसके प्रकरणमें ‘ अथैतयोः पथोः ० ' ( इन दोनों मार्गों में किसी एक मी मागंसे नहीं ) इसप्रकार श्रुत है। तात्पर्य यह है - जो विद्यासाधनद्वारा देवयान मार्गमें अधिकृत नहीं हैं और न कर्मद्वारा पितृयाण मार्ग में अधिकृत हैं, उनको ही यह क्षुद्र जन्तुरूप बारम्बार आवृत्तिरूप तृतीय मार्ग होता है। इससे भी अनिष्ट आदि कारियोंद्वारा चन्द्रलोक प्राप्त नहीं किया जाता। परन्तु यह हो कि वे मी चन्द्रलोकमें आरूढ होकर उससे अवरोहण कर क्षुद्रजन्तुत्वको प्राप्त होंगे।
वह भी नहीं है, क्योंकि ऐसा होने में आरोहण अनर्थक है, और सब मरकर जानेवाले चन्द्रलोकको प्राप्त होनेपर तो यह लोक मरकर जानेवालोंसे भर जायगा, उससे प्रश्नके विरुद्ध उत्तर प्रसक्त होगा। वैसे ही उत्तर देना चाहिए जैसे यह लोक नहीं मरता। यदि कहो कि अवरोहके स्वीकार करनेसे असम्पूर्णताकी उपपत्ति हो जायगी, तो यह युक्त नही है, क्योंकि अश्रुत है। यह ठीक है कि अवरोहसे असम्पूर्णता उपपन्न होती है।
परन्तु ' एतत्तृतीयं स्थानम् ० ' ( यह तृतीय स्थान है उससे यह लोक नहीं भरता ) यह श्रुति तो तृतीय स्थानके कथनसे असम्पूर्णता दिखलाती है। उस अनारोहसे ही असम्पूर्ण है, यह युक्त है। क्योंकि इष्टयादि कारियोंका भी अवरोह समान होनेपर तृतीय स्थानकी उक्तिमें आनथंक्य प्रसङ्ग होगा। ' तु ’ शध्द तो अन्य शाखाके वाक्यसे उत्पन्न हुई सबके गमनकी आशङ्काका उच्छेद करता है।
ऐसा होनेपर ‘ ये वै केचिदधिकृता ' ( जो कोई अधिकृत हुए इस लोकसे प्रायण करते हैं वे सब चन्द्रलोक जाते हैं ) इसप्रकार अन्य शाखा के वाक्य में सर्व शब्द चन्द्रलोक में अधिकृतकी अपेक्षासे अवस्थित है।। १७
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.१८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.18 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १८
न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ ३.१.१८ ॥
पदच्छेद — न , तृतीये , तथा , उपलब्धेः
सूत्रार्थ — ( तृतीये ) तृतीय मार्ग में प्रविष्ट पापी लोगों की देह प्राप्तिके लिए आहुति संख्याका नियम ( न ) नहीं है, ( तथोपलब्धेः ) क्योंकि ' जायस्व म्रियस्व ' इत्यादि श्रुतिमें वैसा हो उपलब्ध होता है।
शाङ्करभाष्य
न तृतीये स्थाने देहलाभाय पञ्चसंख्यानियम आहुतीनामादर्तव्यः कुतः तथोपलब्धेः तथा हि अन्तरेणैवाहुतिसंख्यानियमं वर्णितेन प्रकारेण तृतीयस्थानप्राप्तिरुपलभ्यते जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम् इति। अपि चपञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति मनुष्यशरीरहेतुत्वेन आहुतिसंख्या कीर्त्यते न कीटपतङ्गादिशरीरहेतुत्वेन पुरुषशब्दस्य मनुष्यजातिवचनत्वात्। अपि च पञ्चम्यामाहुतावपां पुरुषवचस्त्वमुपदिश्यते न अपञ्चम्यामाहुतौ पुरुषवचस्त्वं प्रतिषिध्यते वाक्यस्य द्व्यर्थतादोषात्। तत्र येषामारोहावरोहौ संभवतः तेषां पञ्चम्यामाहुतौ देह उद्भविष्यति अन्येषां तु विनैवाहुतिसंख्यया भूतान्तरोपसृष्टाभिरद्भिर्देह आरप्स्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो पुनः यह कहा गया है कि देह लाभ उपपत्तिके लिए सब चन्द्रलोमें जा सकते हैं, क्योंकि ' पाँचवीं आहुति ' ऐसा आहूति संख्याका नियम है। उसके प्रति कहा जाता है- -
तृतीय मार्ग में देहलाभ के लिए आहुतिकी पाँच संख्याका नियम आदरणीय नहीं है। किससे? इससे कि वैसे ही उपलब्धि होती है। जैसे कि ' जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम् ' इसप्रकार आहुति संख्या नियमके विना हो वर्णित प्रकारसे तृतीय स्थानकी प्राप्ति उपलब्ध होती है। और ' पञ्चम्यामाहुतापः ० ' ( पाँचवीं आहुतिमें अप् ( जल ) पुरुष संज्ञक होता है ) यह मनुष्य शरीर के हेतुरूपसे आहुति संख्या कही गई है। कीट, पतङ्ग आदि शरीरके हेतुरूपसे नहीं, क्योंकि पुरुष शब्द मनुष्य जातिवाचक है, और पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है, ऐसा उपदेश किया जाता है, किन्तु पांचवीं आहुतिके न होनेपर जल पुरुष संज्ञक नहीं होता, ऐसा प्रतिषेध नहीं किया जाता, क्योंकि ऐसा होनेसे वाक्यमें दो अर्थ होनेका दोष होगा। उस ( चन्द्रमण्डल ) में जिनका आरोह, अवरोह संभव है उनका शरीर पाँचवीं आहुतिमें उत्पन्न होगा। अन्योंका शरीर तो आहुति संख्या के विना ही अन्य भूतोंसे सम्बद्ध जलसे आरम्भ होगा॥ १८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ‘ पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुष वचसो भवन्ति ( पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है ) यह विधि और पांचवीं आहुतिके विना जल पुरुष संज्ञक नहीं होता यह निषेध, इसप्रकार एकवाक्य के दो अर्थं मानने से वाक्य भेद होता है। इसलिए पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष संज्ञक होता है, इसमें तात्पर्य है मनुष्य देहमात्रकी उत्पत्ति में भी आहुति संख्याका नियम नहीं है। यह आहुति संख्याका नियम तो चन्द्रलोक में जाने और लौटने वालोंके लिए है। चन्द्रलोक में पञ्चाग्नि विद्या और इष्ट आदि कर्म रहित भी नहीं जाते, वे विशेष कर्मके बलसे मनुष्य शरीर त्यागके अनन्तर भी मनुष्य शरीर ग्रहण करते हैं, उनका देह भी आहुति संख्या नियमके विना ही अन्य भूतों से सम्बन्धित जलसे आरम्भ होता है।। १८
3.1.19 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र १९
स्मर्यतेऽपि च लोके ॥ ३.१.१९ ॥
पदच्छेद — स्मर्यंते , अपि , च , लोके
सूत्रार्थ — ( च ) और ( लोके ) लोक में ( अपि ) मी इसप्रकार ( स्मर्यते ) स्मरण किया जाता है।
शाङ्करभाष्य
अपि च स्मर्यते लोके द्रोणधृष्टद्युम्नप्रभृतीनां सीताद्रौपदीप्रभृतीनां च अयोनिजत्वम्। तत्र द्रोणादीनां योषिद्विषया एका आहुतिर्नास्ति धृष्टद्युम्नादीनां तु योषित्पुरुषविषये द्वे अप्याहुती न स्तः। यथा च तत्र आहुतिसंख्यानियमानादरो भवति एवमन्यत्रापि भविष्यति। बलाकापि अन्तरेणैव रेतःसेकं गर्भं धत्त इति लोकरूढिः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और लोक ( महाभारत आदि ) में मी द्रोण, धृष्टद्युम्न आदि तथा सोता, द्रौपदी आदिका अयोनिजत्व स्मरण किया जाता है। उनमेंसे द्रोण आदिको स्त्री विषयक एक आहुति नहीं है और धृष्टद्युम्न आदिकी तो स्त्री और पुरुष विषयक दो आहुति नहीं हैं। जैसे उनमें आहुति संख्या नियमका आदर नहीं है, वैसे अन्यत्र ( अनिष्ट आदि कारीकी देहोत्पत्ति में ) भी होगा। बलाका मी शुक्रसिंचनके विना ही गर्भ धारण करती है। इसप्रकार लोक प्रसिद्धि है।। १ ९
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.२१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.20 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २०
दर्शनाच् च ॥ ३.१.२० ॥
पदच्छेद — दर्शनात् च
सूत्रार्थ — क्योंकि लोक में ऐसा ही देखनेमें आता है।
शाङ्करभाष्य
अपि च चतुर्विधे भूतग्रामे जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिज्जलक्षणे स्वेदजोद्भिज्जयोः अन्तरेणैव ग्राम्यधर्मम् उत्पत्तिदर्शनात् आहुतिसंख्यानादरो भवति। एवमन्यत्रापि भविष्यति।। ननुतेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्ति आण्डजं जीवजमुद्भिज्जम् इत्यत्र त्रिविध एव भूतग्रामः श्रूयते कथं चतुर्विधत्वं भूतग्रामस्य प्रतिज्ञातमिति अत्रोच्यते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और चार प्रकारके भूत समूहमें जरायुज, आण्डज, स्वेदज, और उद्भिज्जरूपमें से स्वेदज और उद्भिज्जमें ग्राम्य धर्मं ( स्त्री पुरुष संपर्क ) के विना ही उत्पत्ति देखनेसे आहुति संख्याका आदर नहीं है, उसी प्रकार अन्यत्र ( अनिष्ट आदि कारीकी देहोत्पत्ति में ) भी होगा॥ २०
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.२१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.21 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २१
तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ ३.१.२१ ॥
पदच्छेद — तृतीयशब्दावरोधः , संशोकजस्य
सूत्रार्थ — ( संशोकजस्य ) संयोकज - स्वेदज प्राणियोंका ( तृतीयशब्दावरोधः ) तृतीयशब्द से उद्भिज्जशब्दसे उपसंग्रह होनेसे विरोध नहीं है।
शाङ्करभाष्य
आण्डजं जीवजमुद्भिज्जम् इत्यत्र तृतीयेनोद्भिज्जशब्देनैव स्वेदजोपसंग्रहः कृतः प्रत्येतव्यः उभयोरपि स्वेदजोद्भिज्जयोः भूम्युदकोद्भेदप्रभवत्वस्य तुल्यत्वात्। स्थावरोद्भेदात्तु विलक्षणो जङ्गमोद्भेद इत्यन्यत्र स्वेदजोद्भिज्जयोर्भेदवाद इत्यविरोधः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु ‘ तेषां खल्वेषां ० ' ( उन पक्षी आदि प्रसिद्ध प्राणियोंके ठीन ही बीज होते है - आण्डज, जीवज ( जरायुज ) और उद्भिज्ज ) इस श्रुतिमें तीन प्रकारका ही भूत समुदाय सुना जाता है, वो फिर यहाँ भूत समुदाय चार प्रकारका है, ऐसी प्रतिज्ञा किस प्रकार की गई है?
इसपर कहते हैं-
' आण्डजं जीवजमुद्भिज्जम् ० ' ( आण्डज - पक्षी आदि, जीवज - मनुष्य आदि
और उद्भिज्ज - वृक्षादि ) इसमें तृतीय उद्भिज्जशब्द से ही स्वेदजका उपसंग्रह किया गया समझना चाहिए,
क्योंकि स्वेदज और उद्भिज्ज इन दोनोंमें मी भूमि और उदकका भेदन कर उत्पन्न होना तुल्य है।
स्थावरके उद्भेदसे तो
अन्यत्र [ वर्णित ] है, जङ्गमका उद्भेद विलक्षण है। इसप्रकार स्वेदज और उद्भिज्जका भेदवाद इसलिए विरोध नहीं है॥ २१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * स्वेदज और उद्भिज्जका भेद कथन तो ' आण्डजानि च जारुजानि
च स्वेदजानि च उद्भिजानि च ' ( ऐत ० ५1३ ) ( आण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्जं ) इस
ऐतरेय श्रुतिमें स्पष्ट है। इसलिए छान्दोग्य और ऐतरेय श्रुति प्रतिपादित तीन तथा चार संख्यामें कोई विरोध नहीं है। चतुर्विध भूतोंका विचार प्रसंगसे किया गया है, इसलिए यह सिद्ध हुआ कि अनिष्ट आदि कारियोंकी चन्द्रलोकप्राप्ति नहीं होती॥ २१
साभाव्यापत्त्यधिकरणम्
3.1.22 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २२
तत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ ३.१.२२ ॥
पदच्छेद — सामाव्यापत्तिः , उपपत्तेः
सूत्रार्थ — - इस लोक में लौटते समय उन जीवोंको ( सामाव्याप्तिः ) आकाश आदि से साम्यकी प्राप्ति होती है, ( उपपत्तेः ) क्योंकि ऐसा ही उपपन्न होता है।
शाङ्करभाष्य
इष्टादिकारिणश्चन्द्रमसमारुह्य तस्मिन्यावत्संपातमुषित्वा ततः सानुशया अवरोहन्तीत्युक्तम् अथावरोहप्रकारः परीक्ष्यते। तत्रेयमवरोहश्रुतिर्भवति अथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति इति। तत्र संशयः किमाकाशादिस्वरूपमेवावरोहन्तः प्रतिपद्यन्ते किं वा आकाशादिसाम्यमिति।
तत्र प्राप्तं तावत् आकाशादिस्वरूपमेव प्रतिपद्यन्त इति कुतः एवं हि श्रुतिर्भवति इतरथा लक्षणा स्यात् श्रुतिलक्षणाविशये च श्रुतिर्न्याय्या न लक्षणा तथा चवायुर्भूत्वा धूमो भवति इत्येवमादीन्यक्षरणि तत्तत्स्वरूपापत्तौ आञ्जस्येन अवकल्पन्ते तस्मादाकाशादिस्वरूपप्रतिपत्तिरिति एवं प्राप्ते ब्रूमः आकाशादिसाम्यं प्रतिपद्यन्त इति चन्द्रमण्डले यत् अम्मयं शरीरमुपभोगार्थमारब्धम् तत् उपभोगक्षये सति प्रविलीयमानं सूक्ष्ममाकाशसमं भवति ततो वायोर्वशमेति ततो धूमादिभिः संपृच्यत इति।
तदेतदुच्यते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुम् इत्येवमादिना। कुत एतत् उपपत्तेः एवं हि एतदुपपद्यते न हि अन्यस्यान्यभावो मुख्य उपपद्यते आकाशस्वरूपप्रतिपत्तौ च वाय्वादिक्रमेणावरोहो नोपपद्यते विभुत्वाच्च आकाशेन नित्यसंबद्धत्वात् न तत्सादृश्यापत्तेरन्यः तत्संबन्धो घटते। श्रुत्यसंभवे च लक्षणाश्रयणं न्याय्यमेव। अत आकाशादितुल्यतापत्तिरेव अत्र आकाशादिभाव इत्युपचर्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह कहा गया है कि इष्ट आदि कारी चन्द्रलोक में आरोहणकर वहाँपर कर्मफलोपभोग पर्यन्त रहकर वहाँसे अनुराय सहित अवरोहण करते हैं। अब अवरोह प्रकारकी परीक्षा की जाती है। वहाँ ' अथैतमेवाध्वानं ० ' ( कर्मफल भोगानन्तर पुनः इसी मागंसे जिस प्रकार गये थे उसीप्रकार लौटते हैं। वे पहले आकाशको प्रात होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर वह घूम होता है और धूम होकर अभ्र होता है, अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है ) यह अवरोह श्रुति है।
उसमें संशय होता है- क्या अवरोहण करनेवाले आकाश आदि स्वरूपको ही प्राप्त होते हैं, अथवा आकाश आदिके साम्यको? उसमें आकाश आदि स्वरूपको ही प्राप्त होते हैं, ऐसा प्राप्त होता है। किससे? इससे कि ऐसी ही श्रुति है। अन्यथा लक्षणा होगी। श्रुति और लक्षणा के संशय में श्रुतिका ग्रहण उचित है लक्षणाका नहीं। उसोप्रकार ' वायुर्भूत्वा धूमो भवति ' ( वायु होकर घूम होता है ) इत्यादि अक्षर मी तत् वत् स्वरूपकी प्राप्तिमें अनायास ही उपपन्न होते हैं, इससे आकाश बादि स्वरूपको प्राप्ति है।
सि ० - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- आकाश आदिके सादृश्यको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमण्डलमें जो जलमय शरीर उपभोगके लिए आरम्भ हुआ था वह उपभोग के क्षय होनेपर प्रविलीन होता हुआ आकाशके समान सूक्ष्म होता है, अनन्तर वायुके वश अधीन होता है उसके पश्चात् धूम आदिसे सम्बद्ध होता है। वह ' यथेतमकाशम् ' ( जिस प्रकार गये थे उसीप्रकार लौटते हैं प्रथम आकाशको प्राप्त होते हैं, आकाशसे वायुको प्राप्त होते हैं ) इत्यादि श्रुतिसे कहा जाता है। यह किससे? उपपत्तिसे। यह ऐसा ही उपपन्न होता है।
अन्यका अन्यभाव मुख्य उपपन्न नहीं होता, और आकाश स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर वायु आदि क्रमसे अवरोह उपपन्न नहीं होता। आकाश विभु होनेसे और उसके साथ नित्य सम्बद्ध होनेसे आकाश के सादृश्य प्राप्तिसे भिन्न उसका सम्बन्ध नहीं का लेनवरोहः स्यादिति॥२३॥ घटता है। और श्रुति असंभवमे लक्षणाका आश्रयण उचित ही है। अतः आकाश आदि सादृश्य प्राप्ति ही यहाँ आकाश आदि भाव है, ऐसा उपचार किया जाता है || २२
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वमें ' तृतीयं स्थानम् ' इस स्थान शब्दको दो मार्गके उपक्रम सामथ्यसे तृतीय मार्गका उपलक्षक कहा गया है। परन्तु यहाँ ऐसी श्रुति नहीं है। इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगतिसे पूर्वपक्ष है।
* ' समानो भावो रूपं येषां ते सभावास्तेषां मावः सामान्यं सारूप्यं सादृश्यम्। ' समान एक सा भाव धर्म है जिनका वे सभाव हैं उनका भाव सामान्य सादृश्य है, क्योंकि उसकी उपपत्ति है यह सूत्रका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है, उसको आगे स्पष्ट करते हैं। ' यथेतमकाशमाकाशाद्वायुम् ' चन्द्र मण्डलमें फलोपभोगके अनन्तर वह अनुशयी जीव आकाश तुल्य सूक्ष्म होता है, अनन्तर पिण्डीकृत अतिसूक्ष्म लिङ्गोपहित होकर वायु द्वारा इतस्तत होता हुआ वायु सम होकर फिर धूमरूप होता है, वहाँसे अभ्ररूप पुनः मेघरूप होकर वृष्टिद्वारा पृथिवीपर आकर व्रीहि, यह आदिरूप होता है, यह श्रुति का सिद्धान्त अर्थ है। अवरोह में विविध भूत साम्य होनेका अनुसंधान करने से वैराग्य होता है || २२ ||
नातिचिराधिकरणम्
3.1.23 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २३
नातिचिरेण विशेषात् ॥ ३.१.२३ ॥
पदच्छेद — न , अतिचिरेण विशेषात्
सूत्रार्थ — जीव ( नातिचिरेण ) स्वल्पकाल ही आकाश आदिके साथ समानरूपसे रहकर वृष्टिद्वारा पृथिवी में प्रवेश करता है, ( विशेषात् ) क्योंकि ' अतो वै दुर्निष्प्रपतरम् ' इत्यादि श्रुतिमें विशेष देखने में आता है।
शाङ्करभाष्य
तत्र अकाशादिप्रतिपत्तौ प्राग्व्रीह्यादिभावापत्तेः भवति विशयः किं दीर्घं दीर्घं कालं पूर्वपूर्वसादृश्येनावस्थायोत्तरोत्तरसादृश्यं गच्छन्ति उताल्पमल्पमिति। तत्रानियमः नियमकारिणः शास्त्रस्याभावादित्येवं प्राप्ते इदमाह नातिचिरेणेति। अल्पमल्पं कालमाकाशादिभावेनावस्थाय वर्षधाराभिः सह इमां भुवमापतन्ति कुत एतत् विशेषदर्शनात् तथा हि व्रीह्यादिभावापत्तेरनन्तरं विशिनष्टि अतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरम् इति तकार एकश्छान्दस्यां प्रक्रियायां लुप्तो मन्तव्यः दुर्निष्प्रपततरं दुर्निष्क्रमतरम् दुःखतरमस्माद्व्रीह्यादिभावान्निःसरणं भवतीत्यर्थः तत् अत्र दुःखं निष्प्रपतनं प्रदर्शयन् पूर्वेषु सुखं निष्प्रपतनं दर्शयति सुखदुःखताविशेषश्चायं निष्प्रपतनस्य कालाल्पत्वदीर्घत्वनिमित्तः तस्मिन्नवधौ शरीरानिष्पत्तेरुपभोगासंभवात्। तस्माद्व्रीह्यादिभावापत्तेः प्राक् अल्पेनैव कालेनावरोहः स्यादिति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यहाँ व्रीहि आदि भावकी प्राप्तिके पूर्व आकाश आदिकी प्राप्तिमें संशय होता है, क्या दीर्घ दोघं काल पूर्व- पूर्व सादृश्यसे अवस्थित होकर उत्तरोत्तर सादृश्यको प्राप्त होते हैं अथवा अल्प- अल्प काल? उसमें नियम नहीं है, क्योंकि नियम करनेवाला शास्त्र नहीं है। ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं— ' नातिचिरेण ' अल्प - अल्प काल आकाश आदिरूपसे अवस्थित होकर वृष्टि धाराओं के साथ इस पृथिवीपर आ गिरते हैं। यह किससे विशेषदर्शन से। जैसे कि व्रीहि आदि भाव प्राप्ति के अनन्तर ' अतो वै खलु ० ' ( इस प्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त कष्ट प्रद है ) इस प्रकार विशेष कहते हैं। इसमें एक ' त ' छान्दस प्रक्रियामें लुप्त हुआ समझना चाहिए। दुर्निष्प्रपततर- दुर्निष्क्रमतर इस व्रीहि आदि मावसे निःसरण दुःखतर होता है, ऐसा अर्थ है। यहाँ वह वचन दुःख पूर्वक नि.सरण दिखलाता हुआ पूर्वभादों में सुख पूर्वक निःसरण दिखलाता है। निष्क्रमण में सुखत्व यौर दुःखत्वका यह विशेष कालके अल्पत्व और दीर्घत्व निमित्तक है, क्योंकि उस अवधि में शरीर की निष्पत्ति - उत्पत्ति न होनेसे उपभोग का असंभव है। इसलिए व्रीहि आदि भाव प्राप्तिसे पूर्व अल्पकालमें ही अवरोहण होना चाहिए॥२३
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अनुशयी जीवका आकाश आदिसे सादृश्य कहकर अब विलम्ब और अविलम्ब गतिके विषयमें विचार करते हैं। पूर्वपक्ष में अधिक काल आकाश आदि सादृश्यसे जीव रहता है, सिद्धान्तमें बल्प- अल्प काल, ' अतो वै खलु ' इस श्रुतिमें विशेषरूपसे कहा गया है कि व्रीहि आदि भावमें आनेपर यहाँ से निकलना दुष्कर होता है, क्योंकि अन्नरूपमें, भक्षण करनेवालेमें, स्त्रीगर्भमें जानेपर अधिक समय लगता है। इस श्रुति वचनसे सिद्ध होता है कि आकाशभावसे लेकर पृथिवी में आने तक अल्पअल्प काल में अवरोहण होता है। व्रीहि आदि भावसे निर्गमन में विलम्ब होता है, इस प्रकारके अनुसंधानसे वैराग्य होता है॥ २३
अन्याधिष्ठिताधिकरणम्
3.1.24 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २४
अन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् ॥ ३.१.२४ ॥
पदच्छेद — अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात्
सूत्रार्थ — अनुशयी जीव पूर्वके समान ( अन्याधिष्ठितेषु ) अन्य जीवोंसे अधिष्ठित व्रीहि आदि में केवल सम्बन्धित होते हैं, ( पूर्ववदभिलापात् ) क्योंकि आकाश आदि माबके सम न कथन है।
शाङ्करभाष्य
तस्मिन्नेवावरोहे प्रवर्षणानन्तरं पठ्यते त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते इति। तत्र संशयः किमस्मिन्नवधौ स्थावरजात्यापन्नाः स्थावरसुखदुःखभाजोऽनुशयिनो भवन्ति आहोस्वित्क्षेत्रज्ञान्तराधिष्ठितेषु स्थावरशरीरेषु संश्लेषमात्रं गच्छन्तीति।
किं तावत्प्राप्तम् स्थावरजात्यापन्नास्तत्सुखदुःखभाजोऽनुशयिनो भवन्तीति कुत एतत् जनेर्मुख्यार्थत्वोपपत्तेः स्थावरभावस्य च श्रुतिस्मृत्योरुपभोगस्थानत्वप्रसिद्धेः पशुहिंसादियोगाच्च इष्टादेः कर्मजातस्यानिष्टफलत्वोपपत्तेः तस्मान्मुख्यमेवेदमनुशयिनां व्रीह्यादिजन्म श्वादिजन्मवत् यथाश्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा इति मुख्यमेवानुशयिनां श्वादिजन्म तत्सुखदुःखान्वितं भवति एवं व्रीह्यादिजन्मापीति।
एवं प्राप्तेब्रूमः अन्यैर्जीवैरधिष्ठितेषु व्रीह्यादिषु संसर्गमात्रमनुशयिनः प्रतिपद्यन्ते न तत्सुखदुःखभाजो भवन्ति पूर्ववत् यथा वायुधूमादिभावोऽनुशयिनां तत्संश्लेषमात्रम् एवं व्रीह्यादिभावोऽपि जातिस्थावरैः संश्लेषमात्रम्। कुत एतत् तद्वदेवेहाप्यभिलापात् कोऽभिलापस्य तद्वद्भावः कर्मव्यापारमन्तरेण संकीर्तनम् यथा आकाशादिषु प्रवर्षणान्तेषु न किंचित्कर्मव्यापारं परामृशति एवं व्रीह्यादिजन्मन्यपि। तस्मान्नास्त्यत्र सुखदुःखभाक्त्वमनुशयिनाम्।
यत्र तु सुखदुःखभाक्त्वमभिप्रैति परामृशति तत्र कर्मव्यापारम् रमणीयचरणाः
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उसी अवरोह के विषय प्रवर्षण - वृष्टिके अनन्तर पढा जाता है - ' त इह ० ( तब वे जीव इस लोक में धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उदड़रूप होकर उत्पन्न होते हैं ) उसमें संशय होता है कि क्या अनुशयी जीव इस अवधि में स्थावर जाति प्राप्त हुए स्थावरके सुख दुःखके भागी होते हैं अथवा अन्य जीवों से अधिष्ठित स्थावर शरीरोंमें केवल संश्लेष- संसगंमात्र प्राप्त करते हैं? तब क्या प्राप्त होता है?
पूर्वपक्षी - अनुशयी जीव स्थावर जातिको प्राप्त होते हुए उसके सुख दुःखके भागो होते हैं। यह किससे? इस कि इसमें ' जन् ' धातुका मुख्यार्थ उपपन्न होता है। और स्थावरभाव श्रुति और स्मृतिमें उपभोगका स्थानरूपसे प्रसिद्ध है, पशु हिंसादिके योग से इष्ट आदि कर्म समूहमें निष्ट फलत्व उपपन्न होता है।
इसलिए अनुशयी जीवोंका यह व्रीहि आदि रूपसे जन्म श्वान आदि जन्म के समान मुख्य ही है, जैसे श्वयोनि, सूकरयोनि अथवा चण्डालयोनि इस प्रकार अनुशयी जीवों का श्वान आदि जन्म मुख्य ही है और उसके सुख - दु : ख से अन्वित होते हैं, वैसे व्रीहि आदि जन्म भी। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - अनुशयी जीव अन्य जीवोंसे अधिष्ठित व्रीहि आदिमें संसर्गमात्र प्राप्त करते हैं, किन्तु उनके सुख - दुःखके भागी नहीं होते। पूर्ववत् -- आकाश आदि भावके समान।
जैसे अनुशयी जीवोंका वायु, धूम आदि भाव उनके साथ केवल संसर्गमात्र है, वैसे ही व्रीहि आदि भाव स्थावर जातिके साथ संसगंमात्र है। यह किससे? इससे कि उसके समान यहाँ भी कथन है। अभिलापका उसके समान माव किया है? कर्मव्यापार ( फल ) के विना कथन। जैसे आकाश आदिसे लेकर वृष्टि पर्यंन्त श्रुति किसी भी कर्मव्यापारका परामर्श नहीं करती, वैसे व्रीहि आदि जन्ममें भी। इसलिए वहाँ अनुशयी सुख - दुःखके भागी नहीं हैं।
जहाँ तो सुख दुःखका मागित्व श्रुतिको अभिप्रेत है वहाँ ' रमणीयचरणाः कपूयचरणा : ' इस प्रकार कर्म व्यापार ( फल ) का परामर्श करती है, और अनुशयी जीवोंका व्रीहि आदि जन्म मुख्य होनेपर तो व्रीहि आदिके काटनेपर, कूटे जानेपर, पकाये जानेपर और मक्षण किये जानेपर उनके अभिमानी अनुशयी जीवोंका प्रवास होना चाहिए, क्योंकि जो जीव जिस शरीरका अभिमानी होता है वह उस शरीर के पीड़ित किये जानेपर प्रवास करता है, यह प्रसिद्ध है। और वहाँ अनुशयियों के व्रीहि आदि मावसे रेतः सिञ्चन भावका कथन नहीं होना चाहिए।
अतः अनुशयी जीवोंका अन्य जीवोंसे अधिष्ठित व्रीहि आदिमें संसर्गमात्र होता है। इससे ' जन् ' धातुके मुख्यार्थत्व और स्थावरभावके उपभोग स्थानत्वका निराकरण करना चाहिए। स्थावरमावके उपयोग स्थानत्वकी हम अवज्ञा ( इनकार ) नहीं करते। किन्तु अपुण्यके सामथ्यसे स्थावरमावको प्राप्त हुए अन्य जीवोंको वह उपभोगका स्थान हो, परन्तु हम ऐसा कहते हैं कि चन्द्रलोकसे अवरोहण करनेवाले अनुशयी जीव स्थावरभावका उपभोग नहीं करते॥ २४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' जायन्ते ' ( जन्म लेते हैं ) इस श्रुति के होनेसे और पूर्व अधिकरण में आकाश आदिसे वृष्टि पर्यन्त सादृश्यके कथनसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। ' स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति ' ( अन्य स्थाणुभावको प्राप्त होते हैं ) और ' शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ' ( शरीरसे उत्पन्न कर्मदोष से मनुष्य स्थावरत्वको प्राप्त होता हैं ) इस प्रकार श्रुति और स्मृति में स्थावरभाव कर्मफलके उपभोगका स्थान कहा गया है, क्योंकि ' न हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' यह सामान्य श्रुति हिंसाका निषेध करती है और ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' इस विशेष श्रुतिवाक्यसे यज्ञमें पशु हिंसाका विधान है। इन श्रुतियोंका अपना - अपना कार्यं है, इससे इष्ट व्यादि कारीको भी पशु हिंसा आदि पापके योगसे स्थावरभाव होता है, अत : उनके सुख - दुःखके भागी होते हैं।
* ‘ यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ' ( छा ० ५।१०।६ ) ( जो - जो अनुशयी सम्बन्धित उस अन्नको मक्षण करता है और जो - जो रेतका स्त्री में सिञ्चन करता है, तद्रूप ही वह जीव हो जाता है ) इस वाक्यशेष में व्रीहि आदिमें प्रविष्ट अनुशयी जीवोंका अन्नद्वारा वीयंके आधान कर्ता पुरुष से जो योग कहा गया है, उसकी अन्यथा अनुपपत्तिसे मी ' त इह व्रीहियवा ' जायन्ते ' यह जन्मश्रुति गौण है। दूसरी बात यह भी है कि यदि श्रुतिको अनुशयी जीवोंका मुख्यरूपसे व्रीहि आदि भाव अभिप्रेत होता, तो व्रीहि आदि देहका नाश होनेपर देहीका उत्क्रमण अवश्य होता है, तो फिर ‘ यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ' इस श्रुतिवाक्यसे विरोध होगा। इससे यहाँ केवल सम्बन्धमात्र अभिप्रेत है | अतः चन्द्रलोकसे अवरोहण करनेवाले अनुशयी जीव स्थावर सम्बन्धी सुख - दुःखका उपभोग नहीं करते॥ २४
3.1.25 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २५
अशुद्धम् इति चेन् न शब्दात् ॥ ३.१.२५ ॥
पदच्छेद — अशुद्धम् , इति चेत् , न , शब्दात्
सूत्रार्थ — अग्निष्टोम आदि याग पशुहिंसा आदिके योगसे ( अशुद्धम् ) अशुद्ध है, ( इति चेन्न ) ऐसा यहि कहो तो युक्त नहीं है, ( शब्दात् ) क्योंकि वह श्रुति प्रमाणक है।
शाङ्करभाष्य
यत्पुनरुक्तम् पशुहिंसादियोगादशुद्धमाध्वरिकं कर्म तस्यानिष्टमपि फलमवकल्पत इत्यतो मुख्यमेवानुशयिनां व्रीह्यादिजन्म अस्तु तत्र गौणी कल्पना अनर्थिकेति तत्परिह्रियते न शास्त्रहेतुत्वाद्धर्माधर्मविज्ञानस्य अयं धर्मः अयमधर्म इति शास्त्रमेव विज्ञाने कारणम् अतीन्द्रियत्वात्तयोः अनियतदेशकालनिमित्तत्वाच्च यस्मिन्देशे काले निमित्ते च यो धर्मोऽनुष्ठीयते स एव देशकालनिमित्तान्तरेष्वधर्मो भवति तेन न शास्त्रादृते धर्माधर्मविषयं विज्ञानं कस्यचिदस्ति। शास्त्राच्च हिंसानुग्रहाद्यात्मको ज्योतिष्टोमो धर्म इत्यवधारितः स कथमशुद्ध इति शक्यते वक्तुम्। ननुन हिंस्यात्सर्वा भूतानि इति शास्त्रमेव भूतविषयां हिंसाम् अधर्म इत्यवगमयति बाढम् उत्सर्गस्तु सः अपवादोऽयं चअग्नीषोमीयं पशुमालभेत इति उत्सर्गापवादयोश्च व्यवस्थितविषयत्वम् तस्माद्विशुद्धं कर्म वैदिकम् शिष्टैरनुष्ठीयमानत्वात् अनिन्द्यमानत्वाच्च तेन न तस्य प्रतिरूपं फलम् जातिस्थावरत्वम्। न च श्वादिजन्मवदपि व्रीह्यादिजन्म भवितुमर्हति तद्धि कपूयचरणानधिकृत्य उच्यते नैवमिह वैशेषिकः कश्चिदधिकारोऽस्ति। अतश्चन्द्रस्थलस्खलितानामनुशयिनां व्रीह्यादिसंश्लेषमात्रं तद्भाव इत्युपचर्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह कहा गया है कि पशु हिंसादिके योग से यज्ञकर्म अशुद्ध है, उसका अनिष्ट फल भी हो सकता है, इससे अनुशयी जीवोंका व्रीहि आदि जन्म मुख्य ही हो तो उसमें गौणी कल्पना अनर्थक होगी, अब उसका परिहार किया जाता है— नहीं, क्योंकि धर्म और अधर्मविज्ञान शास्त्रहेतुक है।
यह धर्म है और यह अधर्म है इस विज्ञानमें शास्त्र ही कारण है, क्योंकि वे दोनों अतीन्द्रिय हैं और उनके देश, काल और निमित्त अनियमित हैं, जिस देश, काल और निमित्तमें जिस धर्मका अनुष्ठान किया जाता है वही अन्य देश, काल और निमित्तमें अधमं हो जाता है, इससे शास्त्रज्ञानके विना धर्माधर्मविषयक ज्ञान किसीको नहीं होता। हिंसा अनुग्रह आदि रूप ज्योतिष्टोम धर्मरूपसे शास्त्रसे निश्चित हुआ है, वह अशुद्ध है, ऐसा कैसे कहा जा सकता है।
परन्तु ' न हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' यह शास्त्र ही भूतविषयक हिंसा अधमं है, ऐसा अवगत कराता है। ठीक है, किन्तु वह तो उत्सगं है। और ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' ( अग्नीषोमीय पशुका आलमन करे ) यह अपवाद है। उत्सर्ग और अपवादका विषय व्यवस्थित ( भिन्न - भिन्न ) है। इसलिए वैदिक कर्म विशुद्ध है, क्योंकि शिष्ट पुरुष उसका अनुष्ठान करते हैं और वह निन्दा करने योग्य नहीं है। इससे स्थावररूपसे प्रतिकूल जन्म उसका फल नहीं है।
वान आदि जन्म के समान भी व्रीहि आदि जन्म नहीं हो सकता, क्योंकि जैसे वह ( श्वानादिजन्म ) कपूयचरणोंका अधिकार कर कहा जाता है, वैसे यहाँ ( व्रीहि आदि रूपसे जन्ममें ) कोई विशेष अधिकार नहीं है। इसलिए चन्द्रमण्डलसे स्खलित - गिरनेवाले अनुशयी जीवोंका व्रीहि आदि भाव - व्रीहि आदि संसर्गमात्र है, ऐसा उपचार किया जाता है।। २५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ' हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' यह उत्सगं है, ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' यह अपवाद - बाधक शास्त्र
बाघ होता है। यदि ऐसा न माना जाय तो यह अपवादशास्त्र अनवकाश होनेसे व्यर्थं सिद्ध होगा। इसलिए शास्त्र विहित होनेसे यागमें पशु हिंसा निषिद्ध नहीं है। वस्तुतः राग आदिसे प्राप्त हिंसाकी निवृत्तिके लिए ' न हिंस्यात् ० ' यह सामान्य श्रुति है, इसलिए इसका ' अग्नीषोमीयं ० ' इस विशेष श्रुतिके साथ कोई विरोध नहीं है॥ २५
3.1.26 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २६
रेतःसिग्योगोऽथ ॥ ३.१.२६ ॥
पदच्छेद — रेतः सिग्योगः , अथ
सूत्रार्थ — व्रीहि आदि मावके अनन्तर अनुशयी जीवोंका रेतः सिग्भाव होता है, क्योंकि ' यो रेतः सिञ्चति ' इत्यादि श्रुतिमें ऐसा कहा गया है।
शाङ्करभाष्य
इतश्च व्रीह्यादिसंश्लेषमात्रं तद्भावः यत्कारणं व्रीह्यादिभावस्यानन्तरमनुशयिनां रेतःसिग्भाव आम्नायते यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति इति न चात्र मुख्यो रेतःसिग्भावः संभवति चिरजातो हि प्राप्तयौवनो रेतःसिग्भवति कथमिव अनुपचरितं तद्भावम् अद्यमानान्नानुगतोऽनुशयी प्रतिपद्यते तत्र तावदवश्यं रेतःसिग्योग एव रेतःसिग्भावोऽभ्युपगन्तव्यः तद्वत् व्रीह्यादिभावोऽपि व्रीह्यादियोग एवेत्यविरोधः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस हेतुसे भी व्रोहि आदि भाव व्रीहि आदि संश्लेष- संसर्ग मात्र है, क्योंकि ' यो यो ह्यन्नमति ० ' ( जो जो अनुशयी सम्बन्धित उस अन्नका भक्षण करता है, जो जो वीर्यका सेचन ( आधान ) करता है, उसका रूप हो वह अनुशयी जीव होता है ) इस प्रकार व्रीहि आदि भावके अनन्तर अनुशयीजीवोंकी रेतः सिग्माव श्रुति है। और यहाँ रेतः सिग्माव मुख्य नहीं हो सकता, क्योंकि चिरकालसे उत्पन्न और प्राप्त यौवनवाला रेतः सिग् ( वीय्यंका आधान कर्ता ) होता है। खाये हुए अन्नके साथ अनुगत हुआ अनुशयी जीव आधान क्रियाके कर्ताका भाव उपचारके विना किस प्रकार प्राप्त करेगा? इससे वहाँ रेतः सेचन कर्ताके साथ सम्बन्ध हो रेतः सिग्माव है, ऐसा अवश्य स्वीकार करना चाहिए। इसी प्रकार व्रीहि आदि भाव भी व्रीहि आदिके साथ सम्बन्ध ही है, इसलिए विरोध नहीं है॥ २६
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.१.२७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.1.27 · तृतीय अध्याय प्रथम पाद सूत्र २७
योनेःशरीरम् ॥ ३.१.२७ ॥
पदच्छेद — योने :, शरीरम्
सूत्रार्थ — ( योने :) योनिमें वीयं सेचनके अनन्तर उस योनिसे सुख दुःख फलोपभोगके लिए ( शरीरम् ) योग्य शरीर उत्पन्न होता है, क्योंकि ' रमणीयचरणाः ' इत्यादि शास्त्र कहता है।
शाङ्करभाष्य
अथ रेतःसिग्भावस्यानन्तरं योनौ निषिक्ते रेतसि योनेरधि शरीरम् अनुशयिनाम् अनुशयफलोपभोगाय जायत इत्याह शास्त्रम् तद्य इह रमणीयचरणाः इत्यादि तस्मादप्यवगम्यते नावरोहे ब्राह्यादिभावावसरे तच्छरीरमेव सुखदुःखान्वितं भवतीति। तस्मात् व्रीह्यादिसंश्लेषमात्रमनुशयिनां तज्जन्मेति सिद्धम्।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — रेतः सिग्भाव — रेतः सेचन कर्ता के साथ सम्बन्ध होनेके अनन्तर योनिमें वीयं प्रक्षेप होनेपर अनुशयी जीवोंका अनुराय - कर्म फलोपभोगके लिए योनिके आश्रित शरीर उत्पन्न होता है, इस प्रकार ' तद्य इह रमणीयचरणाः ० ' ( उन अनुशयी जोवों में जो पुण्यशाली हैं ) इत्यादि श्रुति कहती है। इससे भी ऐसा अवगत होता है कि अवरोह होनेपर व्रीहि आदि भावके अवसरमें उस अनुशयी जीवका सुख दुःखसे अन्वित शरीर ही नहीं होता है। इसलिए अनुशयी जीवोंका व्रीहि आदि जन्म व्रीहि आदि संश्लेषमात्र है, ऐसा सिद्ध हुआ॥ २७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * कर्म करनेवालोंका गति और आगतिरूप संसार दुर्वार है। इस प्रकार विचार करने से वैराग्य होता है, जो तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिमें परम्परया साधन है || २७
उपसंहार
इन सूत्रों का सार यह है कि जीव अपने पूर्व जन्म के संस्कारों और कर्मों के कारण ही विभिन्न योनियों में भ्रमण करता है। यहाँ शास्त्र द्वारा बताए गए विभिन्न गतियों और उनके कारणों के बीच एक तार्किक सामंजस्य स्थापित किया गया है। यह क्रम सिद्ध करता है कि जीव की गति केवल संयोग नहीं, अपितु उसके कर्मों का स्वाभाविक परिणाम है।
In English
Brahma Sutra: The Process of Rebirth and Detachment
This commentary on the Brahma Sutras (Chapter 3, Section 1) explains how a living being moves from one body to another through subtle elements. It uses the 'five fires' teaching to demonstrate how actions lead to rebirth, ultimately aiming to inspire detachment from worldly existence.
This article answers
- Brahma sutra 3.1.1 meaning?
- How does a soul move between bodies in vedanta?
- What is pancha agni vidya?
- Process of rebirth through subtle elements?