व्याख्या · ब्रह्मसूत्र
ब्रह्मसूत्र — तृतीय अध्याय, द्वितीय पाद
41 मूल पद्य 40 संस्करणसे मिलाये गये
ये सूत्र जीव की अविद्या और उसके वास्तविक स्वरूप के बीच के सूक्ष्म संबंध को स्पष्ट करते हैं। इनमें जगत की उत्पत्ति, जीव की अज्ञानता और ब्रह्म के साथ उसके तादात्म्य को सिद्ध करने के लिए विभिन्न प्रमाणों का क्रमिक विवेचन किया गया है। पाठक को यहाँ से जीव की बंधन-मुक्ति और उसकी सत्ता के वास्तविक आधार का बोध होगा।
संध्याधिकरणम्
3.2.1 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १
सन्ध्ये सृष्टिराह हि ॥ ३.२.१ ॥
पदच्छेद — संध्ये , सृष्टिः , आह हि
सूत्रार्थ — ( संध्ये ) स्वप्नावस्था में ( सृष्टि : ) सृष्टि व्यावहारिक सत्य है, ( हि ) क्योंकि ( आह ) ' अथ रथान् ' यह श्रुति ऐसा ही कहती है।
शाङ्करभाष्य
संध्ये सृष्टिरिति संध्यमिति स्वप्नस्थानमाचष्टे वेदे प्रयोगदर्शनात् संध्यं तृतीय््वप्नस्थानम् इति द्वयोर्लोकस्थानयोः प्रबोधसंप्रसादस्थानयोर्वा संधौ भवतीति संध्यम् तस्मिन्संध्ये स्थाने तथ्यरूपैव सृष्टिर्भवितुमर्हति कुतः यतः प्रमाणभूता श्रुतिरेवमाह अथ रथान्नथयोगान्पथः सृजते इत्यादिस हि कर्ता इति च उपसंहारात् एवमेवावगम्यते।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.२.२ के अनुवादके साथ है।)
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.2 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २
निर्मातारं चैके पुत्रादयश् च ॥ ३.२.२ ॥
पदच्छेद — निर्मातारम् , च , एके , पुत्रादयः , च
सूत्रार्थ — ( च ) और ( एके ) कुछ शाखावाले स्वप्नमें ( निर्मातारम् ) कामोंका निर्माता परमात्मा है, ऐसा कहते हैं, यहाँ ( पुत्रादयः ) पुत्र आदि काम शब्दसे अभिप्रेत हैं, क्योंकि श्रुतिमें काम शब्दसे उनका कथन है।
शाङ्करभाष्य
अपि च एके शाखिनः अस्मिन्नेव संध्ये स्थाने कामानां निर्मातारमात्मानमामनन्ति य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः इति पुत्रादयश्च तत्र कामा अभिप्रेयन्ते काम्यन्त इति। ननु कामशब्देनेच्छाविशेषो एवोच्येरन् नशतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व इति प्रकृत्य अन्तेकामानां त्वा कामभाजं करोमि इति प्रकृतेषु तत्र तत्र पुत्रादिषु कामशब्दस्य प्रयुक्तत्वात्। प्राज्ञं चैनं निर्मातारं प्रकरणवाक्यशेषाभ्यां प्रतीमः प्राज्ञस्य हीदं प्रकरणम् अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात् इत्यादि तद्विषय एव च वाक्यशेषोऽपि तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते। तस्िम्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन इति। प्राज्ञकर्तृका च सृष्टिस्तथ्यरूपा समधिगता जागरिताश्रया तथा स्वप्नाश्रयापि सृष्टिर्भवितुमर्हति तथा च श्रुतिः अथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यान्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्तः इति स्वप्नजागरितयोः समानन्यायतां श्रावयति। तस्मात्तथ्यरूपैव संध्ये सृष्टिरिति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — गत पादमें पश्चाग्नि विद्याका उदाहरण देकर जीवकी संसार गतिका प्रभेद विस्तार से कहा गया है | अब तो उसकी ही भिन्न - भिन्न अवस्थाएँ विस्तारपूर्वक कही जाती हैं। ' स तत्र प्रस्वपिति ' ( वह जहाँ सोता है ) इस प्रकार उपक्रम कर ' न तन्त्र स्था ० ' ( उस अवस्थामें न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले अश्व आदि हैं और न मार्ग ही हैं, परन्तु वह रथ, रथमें जोते जानेवाले अश्व आदि और रथके मार्गों की रचना कर लेता है ) इत्यादि श्रुति कहती है।
उसमें संशय होता है- क्या जाग्रत् के समान स्वप्न में भी पारमार्थिक ( व्यावहारिक ) सृष्टि है अथवा मायामयी? पूर्वपक्षी - स्वप्नावस्था में तथ्यरूप सृष्टि है, वहां ऐसा प्राप्त होता है। संध्य स्वप्नावस्थाको कहते हैं, क्योंकि ' संध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम् ' ( तृतीय स्वप्न स्थान संध्य है ) इस प्रकार वेदमें प्रयोग देखनेमें आता है। दो . लोक स्थान अथवा प्रबोध और सुषुप्ति अवस्थाकी जो संधिमें होता है, वह संध्य कहा जाता है। उस संध्य अवस्था में सत्यरूप ही सृष्टि हो सकती है। किससे?
इससे कि ' अथ रथान् ० ( वह रथ, रथमें जोते जानेवाले अश्व और रथके मार्गोंकी रचना करता है ) इत्यादि प्रमाण भूत श्रुति ऐसा कहती है, क्योंकि ' स हि कर्ता ' ( वही कर्ता है ) और इस प्रकारके उपसंहारसे ऐसा ही अवगत होता है॥ १॥
* अपि चैके शाखिनोऽस्मिन्नेव संध्ये स्थाने कामानां निर्मातारमात्मानमाम-
और कुछ शाखावाले इसी स्वप्नावस्था में ' य एष सुप्तेपु ० ' ( इन्द्रिय आदिके सुप्त होनेपर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थों की रचना करता हुआ जागता रहता है ) इसप्रकार कामोंका निर्माता आत्माको मानते हैं। वहाँ पुत्र आदि कामयन्दसे अभिप्रेत हैं, क्योंकि उनकी कामना की जाती है। परन्तु कामशब्दसे इच्छाविशेष ही कहने चाहिए? ऐसा नहीं, क्योंकि ' शतायुषः ० ' ( हे नचिकेता!
तू सौ वर्षकी आयुवाले पुत्र और पौत्र माँग ले ) ऐसा प्रस्तुत कर अन्त में ' कामानां ० ' ( मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ ) इसप्रकार तत् तत् स्थानमें प्रकृत पुत्रं बादिमें काम शब्दको प्रयुक्त किया गया है। इसके निर्माता इस प्राज्ञको हम प्रकरण और वाक्यशेषसे प्रतीत करते हैं। क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( वह धर्मसे पृथक् और अधर्मसे पृथक् है ) इत्यादि यह प्राज्ञका ही प्रकरण है।
और ' तदेव शुक्रं ० ' ( वह शुद्ध है, वह ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है उसमें सब लोक आश्रित हैं, कोई भी उसका उलङ्घन नहीं कर सकता ) यह वाक्यशेष भी तद्विषयक ही है। जैसे प्राज्ञकर्तृक जाग्रत् आश्रय सृष्टि सत्यरूपसे निश्चित की गई है, वैसे स्वप्न आश्रय सृष्टि मी हो सकती है।
इसीप्रकार ' अथ खल्वाहुः ० ' ( इससे अवश्य ही कोई ऐसा कहते हैं कि यह ( स्वप्न स्थान ) इसका जागरित देश ही है, क्योंकि जिन पदार्थोंको यह जागनेपर देखता है, उन्होंको सोया हुआ भी देखता है ) यह श्रुति स्वप्न और जाग्रदवस्थाको समान रीतिका श्रवण कराती है, इसलिए स्वप्न में सत्यरूप ही सृष्टि है॥ २
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत पादमें वैराग्य सिद्धिके लिए पश्चाग्नि विद्याके उदाहरणसे गति और आगतिका विशेष विचार किया गया है। अब वैराग्यद्वारा साध्य ' तत् त्वम् ' पदार्थका विवेक जो वाक्यार्थ ज्ञानका साधन है उसका इस पादमें निरूपण किया जाता है। इसप्रकार हेतुहेतुमद्भाव संगति से द्वितीयपादका आरम्भ है। इस पादके ' न स्थानतोऽपि ' इस ११ सूत्र के पहले उद्देश्यरूपसे प्रथम जिज्ञासित ' त्वम् ' पदार्थका अवस्थामोंद्वारा विवेचन है।
तदनन्तर पाद समाप्ति पर्यन्त ' तत् ' पदार्थका विवेचन है। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि ' तत्त्वमसि ' इस वाक्य में ' तत् ' ' त्वम् ' यहाँपर ' त्वम् ' को उद्देश्य कर ' तत् ' का विधान किया गया है, इसलिए उद्देश्यरूपसे ' त्वम् ' का प्रथम विवेचन है और विधेयरूपसे प्रतिपादित ' तत् ' का अनन्तर। गत पादमें जीवकी गति और आगतिके विचारसे जाग्रदवस्थाका निरूपण किया गया है। अब उस क्रमसे ' त्वम् ' पदार्थमें स्वयं ज्योतिष्ठत्व सिद्ध करनेके लिए स्वप्नावस्थाका निरूपण किया जाता है।
जाग्रदवस्था के अनन्तर होनेवाली स्वप्नावस्था श्रुतिमें प्रतिपादित है, उसको उद्देश्यकर रथ आदिका अभाव और उसकी सृष्टि दोनों कहे गये हैं। इसको ' तत्र ' आदिसे कहते हैं। ' आरम्भण ' अधिकरण में प्रपञ्चमात्रमें पारमार्थिकत्वका निषेध किया गया है। परन्तु पूर्वं पक्ष में स्वप्नसृष्टि सत्यरूप है, क्योंकि ' अथ रथान् ' इत्यादि श्रुति है। तथा उपक्रम और उपसंहारसे कर्ता मी एक ही है। यहाँ संध्य स्वप्नावस्थाको कहा जाता है।
पूर्वपक्ष में जाग्रत् अवस्थाके समान स्वप्नसे भी जीवके लिए विवेक असिद्ध है और सिद्धान्त में स्वप्न प्रतीतिमात्र होनेसे विवेक सिद्ध है, जिससे जीवमें स्वयं प्रकाशत्व सिद्ध होता है॥ १॥
* " स्वप्नार्थाः सत्याः प्राज्ञनिर्मित्तत्वात् आकाशादिवत् " ( स्वप्नके पदार्थ सत्य हैं, क्योंकि प्राज्ञसे निर्मित हैं, जैसे आकाश आदि ) इसप्रकार श्रुति और अनुमानसे स्वप्न सृष्टि जागरित सृष्टिके समान सत्य सिद्ध होती है।। २
3.2.3 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३
मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ॥ ३.२.३ ॥
पदच्छेद — मायामात्रम् , तु , कात्स्न्र्त्स्न्येन , अनभिव्यक्तस्वरूपत्वात्
सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पूर्वपक्षको व्यावृत्ति करता है, ( मायामात्रम् ) स्वप्न सृष्टि मायामात्र है, क्योंकि ( कार्त्स्न्येन ) देश, काल आदि समस्त धर्मोसे ( अनभिव्यक्त स्वरूपत्वात् ) अभिव्यक्त स्वरूप नहीं है।
शाङ्करभाष्य
तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति। नैतदस्ति यदुक्तम् संध्ये सृष्टिः पारमार्थिकीति मायैव संध्ये सृष्टिः न परमार्थगन्धोऽप्यस्ति कुतः कात्स्न्र्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् न हि कात्स्न्र्येन परमार्थवस्तुधर्मेण अभिव्यक्तस्वरूपः स्वप्नः किं पुनरत्र कात्स्न्र्यमभिप्रेतम् देशकालनिमित्तसंपत्तिः अबाधश्च।
न हि परमार्थवस्तुविषयाणि देशकालनिमित्तानि अबाधश्च स्वप्ने संभाव्यन्ते न तावत्स्वप्ने रथादीनामुचितो देशः संभवति न हि संवृते देहदेशे रथादयोऽवकाशं लभेरन् स्यादेतत् बहिर्देहात् स्वप्नं द्रक्ष्यति देशान्तरितद्रव्यग्रहणात् दर्शयति च श्रुतिः बहिर्देहात्स्वप्नम् बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा। स ईयतेऽमृतो यत्र कामम् इति स्थितिगतिप्रत्ययभेदश्च न अनिष्क्रान्ते जन्तौ सामञ्जस्यमश्नुवीत इति।
नेत्युच्यते न हि सुप्तस्य जन्तोः क्षणमात्रेण योजनशतान्तरितं देशं पर्येतुं विपर्येतुं च ततः सामर्थ्यं संभाव्यते क्वचिच्च प्रत्यागमनवर्जितं स्वप्नं श्रावयति कुरुष्वहमद्य शयानो निद्रयाभिप्लुतः स्वप्ने पञ्चालानभिगतश्च अस्मिन्प्रतिबुद्धश्च इति देहाच्चेदपेयात् पञ्चालेष्वेव प्रतिबुध्येत तानसावभिगत इति कुरुष्वेव तु प्रतिबुध्यते येन च अयं देहेन देशान्तरमश्नुवानो मन्यते तमन्ये पार्श्वस्थाः शयनदेश एव पश्यन्ति यथाभूतानि च अयं देशान्तराणि स्वप्ने पश्यति न तानि तथाभूतान्येव भवन्ति परिधावंश्चेत्पश्येत् जाग्रद्वत् वस्तुभूतमर्थमाकलयेत्।
दर्शयति च श्रुतिरन्तरेव देहे स्वप्नम् स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति इत्युपक्रम्यस्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते इति। अतश्च श्रुत्युपपत्तिविरोधाद्बहिष्कुलायश्रुतिः गौणी व्याख्यातव्या बहिरिव कुलायात् अमृतश्चरित्वेति यो हि वसन्नपि शरीरे न तेन प्रयोजनं करोति स बहिरिव शरीराद्भवति इति। स्थितिगतिप्रत्ययभेदोऽप्येवं सति विप्रलम्भ एवाभ्युपगन्तव्यः।। कालविसंवादोऽपि च स्वप्ने भवति रजन्यां सुप्तो वासरं भारते वर्षे मन्यते तथा मुहूर्तमात्रवर्तिनि स्वप्ने कदाचित् बहून् वर्षपूगान् अतिवाहयति।
निमित्तान्यपि च स्वप्ने न बुद्धये कर्मणे वा उचितानि विद्यन्ते करणोपसंहाराद्धि नास्य अश्वरथादिग्रहणाय चक्षुरादीनि सन्ति रथादिनिर्वर्तनेऽपि कुतोऽस्य निमेषमात्रेण सामर्थ्यं दारूणि वा। बाध्यन्ते चैते रथाश्वादयः स्वप्नदृष्टाः प्रबोधे स्वप्न एव च एते सुलभबाधा भवन्ति आद्यन्तयोर्व्यभिचारदर्शनात् रथोऽयमिति हि कदाचित्स्वप्ने निर्धारितः क्षणेन मनुष्यः संपद्यते मनुष्योऽयमिति निर्धारितः क्षणेन वृक्षः।
स्पष्टं चाभावं रथादीनां स्वप्ने श्रावयति शास्त्रम् न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति इत्यादि। तस्मान्मायामात्रं स्वप्नदर्शनम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण कहते हैं-
तु शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है। जो यह कहा गया है कि स्वप्नमें सृष्टि पारमार्थिक है, यह नहीं है, स्वप्न में सृष्टि माया ही है उसमें तो परमार्थका गन्ध - लेय भी नहीं है। किससे? इससे कि उसका सर्वात्मना स्वरूप अभिव्यक्त नहीं है। समस्त परमार्थं वस्तुके धर्मसे स्वप्न अभिव्यक्तस्वरूप नहीं है। परन्तु यहाँ कात्स्यसे क्या अभिप्रेत है? देश, काल, निमित्तरूप संपत्ति और अबाध अभिप्रेत हैं। परमार्थं वस्तु विषयक देश, काल, निमित्त और अबाध स्वप्नमें संभाव्य नहीं है।
रथ आदि का स्वप्न में उचित देश संभव नहीं, क्योंकि संकीर्ण देह देशमें रथ आदि अवकाश प्राप्त नहीं कर सकेंगे। यह शङ्का होती है कि देहसे बाहर स्वप्न देखेमा, कारण कि देशसे व्यवधान वाले पदार्थोंका ग्रहण होता है I। और ' बहिष्कुलायाद ० ' ( वह अमृतधर्मा शरीरसे बाहर विचरता है, जहाँ वासना होती वहां चला जाता है ) यह श्रुति देहसे बाहर स्वप्न दिखलाती है और ऐसी स्थिति, गति मौर प्रतीतिका भेद जीवके शरीरसे बाहर निकले विना संगत नहीं हो सकता।
नहीं, ऐसा कहते हैं, क्योंकि सुप्त जीव में सैकड़ों योजनोंसे व्यवहित देशको क्षणमात्रमें प्राप्त करने और वहाँसे लौटकर आनेकी सामर्थ्यं की संभावना नहीं की जा सकती, और कहीं ' मैं इसी कुरुदेशमें सोता हुआ निद्रासे अभिभूत होकर स्वप्नमें पंचाल देशोंमें गया था और पुनः यहींपर जाग गया ' इसप्रकार [ प्रबुद्ध पुरुष ] प्रत्यागमनके विना [ पाश्वस्थ लोगोंको ] स्वप्न सुनाता है।
यदि देहसे निकल गया होता तो पंचाल देशों में जागता, क्योंकि यह उन देशोंमें गया था, किन्तु कुरुदेशमें ही जाग्रत् होता है, तो जिस देहसे यह अपनेको अन्य देश व्याप्त मानता है, उस देहको अन्य समीपस्थ लोग शयनदेश में ही देखते हैं। यह जिसप्रकारके देशान्तरोंको स्वप्नमें देखता है वे उसी प्रकारके नहीं होते।
यदि दौड़ता हुआ ( पदार्थ ) देखे तो जागरितके समान यथार्थं अर्थको ग्रहण करना चाहिए, और ' स यत्रैतत् ० ' ( जिस समय यह आत्मा स्वप्नवृत्तिसे विचरता है ) ऐसा उपक्रम कर ' स्वे शरीरे ० ' ( यह अपने शरीरमें यथेच्छ विचरता है ) इसप्रकार श्रुति शरीरके भीतर ही स्वप्न दिखलाती है। अत : श्रुति और उपपत्तिसे विरोध होनेसे ' बहिष्कुलाय ' यह श्रुति गौणी है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए - ' मानो देहसे बाहर अमृतधर्मा भ्रमण कर ' जो शरीरमें रहता हुआ भी उससे प्रयोजन नहीं रखता वह शरीरसे बाहर - सा होता है।
ऐसा होनेपर स्थिति, गति और प्रत्ययभेदका भी विभ्रम ही स्वीकार करना चाहिए। स्वप्न में काल विरोध भी होता है, रातको सोया हुआ भारतवर्ष में दिन मानता है। इस प्रकार मुहूर्त मात्रवत्ति स्वप्न में बहु वर्षं समुदायका अतिवहन करता है और स्वप्न में ज्ञान अथवा कर्मके लिए उचित निमित्त भी विद्यमान नहीं होते, क्योंकि इन्द्रियों के उपसंहार होनेसे रथ आदि ग्रहण करनेके लिए इसे चक्षु आदि भी नहीं हैं। इस प्रकार निमेषमात्र में रथ आदि निर्माणके लिए इसे सामथ्यं अथवा लकड़ी कहाँ हैं?
स्वप्न दृष्ट ये रथ आदि पदार्थं जाग्रत् होनेपर वाधित हो जाते हैं, स्वप्नमें इनके बाध सुलभ होते हैं, कारण कि स्वप्नके आदि और अन्तमें इनका व्यभिचार देखनेमें आता है, यह रथ है, ऐसा कभी स्वप्नमें निश्चित हुआ पदार्थ क्षणमें मनुष्य हो जाता है, यह मनुष्य है, ऐसा निर्धारित हुआ क्षणमें वृक्ष हो जाता है, इसलिए ' न तत्र रथा ० ' ( उस स्वप्नावस्थामें न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले अश्व आदि हैं और न मागं ही हैं ) इत्यादि शास्त्र स्वप्न में रथ आदिका अभाव स्पष्ट श्रवण कराता है।
इससे स्वप्न दर्शन मायामात्र है।। ३
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ‘ स्वप्नरथादयः प्रातीतिकाः जाग्रद्रथादौ क्लृप्तसामग्रीं विना दृष्टत्वात् शुक्तिरुप्यादिवत् ' ( स्वप्न रथ आदि प्रातिभासिक हैं, क्योंकि जागरित रथ आदिमें क्लृप्त सामग्री के बिना देखे जाते हैं, जैसे शुक्तिरजत आदि ) इससे वे मायामात्र हैं - अविद्याका परिणाममात्र हैं, और कात्स्म्यं देश, काल, निमित्त और अबाध यथार्थं वस्तु विषयक होते हैं, शुक्तिरजतके समान प्रातिभासिक स्वप्न पदार्थों में नहीं होते। जिन पदार्थोंको स्वप्नमें जैसे देखता है वे वैसे नहीं होते, स्वप्न में वृक्ष आदि पदार्थ दौड़ते हुए दिखाई देते हैं किन्तु होते स्थिर हैं, अतः स्वप्न पदार्थ जागरितके समान सत्य नहीं है || ३ ||
3.2.4 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ४
सूचकश् च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ ३.२.४ ॥
पदच्छेद — सूचकः , च , हि , श्रुतेः , आचक्षते , च , तद्विदः
सूत्रार्थ — ( सूचकः ) स्वप्न भविष्यत् के शुभ और अशुभका सूचक है, ( हि ) क्योंकि ( श्रुतेः ) ' यदा कर्मसु ' इत्यादि श्रुतिसे ऐसा अवगत होता है ( च ) और ( तद्विद : ) स्वप्न शास्त्रवेत्ता भो ( आचक्षते ) स्वप्नको शुभाशुभका सूचक ही कहते हैं।
शाङ्करभाष्य
मायामात्रत्वात्तर्हि न कश्चित्स्वप्ने परमार्थगन्धोऽस्तीति नेत्युच्यते सूचकश्च हि स्वप्नो भवति भविष्यतोः साध्वसाधुनोः तथा हि श्रूयते यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति।
समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने इति तथापुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति स एनं हन्ति इत्येवमादिभिः स्वप्नैरचिरजीवित्वमावेद्यत इति श्रावयति आचक्षते च स्वप्नाध्यायविदः कुञ्जरारोहणादीनि स्वप्ने धन्यानि खरयानादीन्यधन्यानि इति मन्त्रदेवताद्रव्यविशेषनिमित्ताश्च केचित्स्वप्नाः सत्यार्थगन्धिनो भवन्तीति मन्यन्ते। तत्रापि भवतु नाम सूच्यमानस्य वस्तुनः सत्यत्वम् सूचकस्य तु स्त्रीदर्शनादेर्भवत्येव वैतथ्यम् बाध्यमानत्वादित्यभिप्रायः। तस्मादुपपन्नं स्वप्नस्य मायामात्रत्वम्।।
यदुक्तम् आह हि इति तदेवं सति भाक्तं व्याख्यातव्यम् यथालाङ्गलं गवादीनुद्वहति इति निमित्तमात्रत्वादेवमुच्यते न तु प्रत्यक्षमेव लाङ्गलं गवादीनुद्वहति एवं निमित्तमात्रत्वात् सुप्तो रथादीन्सृजतेस हि कर्ता इति च उच्यते न तु प्रत्यक्षमेव सुप्तो रथादीन्सृजति। निमित्तत्वं तु अस्य रथादिप्रतिभाननिमित्तमोदत्रासादिदर्शनात्तन्निमित्तभूतयोः सुकृतदुष्कृतयोः कर्तृत्वेनेति वक्तव्यम्।
अपि च जागरिते विषयेन्द्रियसंयोगात् आदित्यादिज्योतिर्व्यतिकराच्च आत्मनः स्वयंज्योतिष्ट्वं दुर्विवेचनमिति तद्विवेचनाय स्वप्न उपन्यस्तः तत्र यदि रथादिसृष्टिवचनं श्रुत्या नीयेत ततः स्वयंज्योतिष्ट्वं न निर्णीतं स्यात् तस्माद्रथाद्यभाववचनं श्रुत्या रथादिसृष्टिवचनं तु भक्त्येति व्याख्येयम्। एतेन निर्माणश्रवणं व्याख्यातम्।
यदप्युक्तम् प्राज्ञमेनं निर्मातारमामनन्ति इति तदप्यसत् श्रुत्यन्तरेस्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपिति इति जीवव्यापारश्रवणात् इहापिय एष सुप्तेषु जागर्ति इति प्रसिद्धानुवादाज्जीव एवायं कामानां निर्माता संकीर्त्यते तस्य तु वाक्यशेषेणतदेव शुक्रं तद्ब्रह्म इति जीवभावं व्यावर्त्य ब्रह्मभाव उपदिश्यते तत्त्वमसि इत्यादिवत् इति न ब्रह्मप्रकरणं विरुध्यते।
न चास्माभिः स्वप्नेऽपि प्राज्ञव्यापारः प्रतिषिध्यते तस्य सर्वेश्वरत्वात् सर्वास्वप्यवस्थास्वधिष्ठातृत्वोपपत्तेः पारमार्थिकस्तु नायं संध्याश्रयः सर्गः वियदादिसर्गवत् इत्येतावत्प्रतिपाद्यते न च वियदादिसर्गस्याप्यात्यन्तिकं सत्यत्वमस्ति प्रतिपादितं हितदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः इत्यत्र समस्तस्य प्रपञ्चस्य मायामात्रत्वम्। प्राक् तु ब्रह्मात्मत्वदर्शनात् वियदादिप्रपञ्चो व्यवस्थितरूपो भवति संध्याश्रयस्तु प्रपञ्चः प्रतिदिनं बाध्यते इत्यतो वैशेषिकमिदं संध्यस्य मायामात्रत्वमुदितम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — मायामात्र होनेसे तो फिर स्वप्नमें परमार्थका कोई गन्ध भी नहीं है, नहीं, ऐसा कहते हैंस्वप्न भविष्यके शुभ और अशुभका सूचक होता है। जैसे कि ' यदा कर्मसु ० ' ( पुरुष जिस समय काम्य कर्मोंमें स्वप्न में स्त्रीको देखे तो उस स्वप्नके दर्शन होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ) यह श्रुति है।
तथा ' कृष्ण दान्तवाले कृष्ण पुरुषको स्वप्न में देखता है वह स्वप्न दृष्ट उस स्वप्न द्रष्टाको मार डालता है ' इत्यादि स्वप्नोंसे अल्प जीवित्व सूचित होता है, ऐसा श्रुति श्रवण कराती है। और स्वप्न शास्त्रवेत्ता कहते हैं कि स्वप्नमें हाथीपर आरोहण आदि धन्य- शुभ हैं और गर्दमपर सवारी आदि अन्य - अशुभ हैं। और मन्त्र, देवता, द्रव्यविशेष निमित्तक कोई कोई स्वप्न सत्य अर्थसे युक्त होते हैं, ऐसा मानते हैं।
स्वप्न में भी सूचित हुई वस्तु मले ही सत्य हो, परन्तु सूचक स्त्री दर्शन आदि तो असत्य ही होते हैं, क्योंकि वे बाध्यमान हैं, ऐसा अभिप्राय है। इससे स्वप्न में मायामात्रत्व उपपन्न है I। जो यह कहा गया है कि ' आह हि ' ( क्योंकि श्रुति कहती है ) ऐसा होनेपर श्रुति और युक्तिसे स्वप्नके मायामात्रयत्व सिद्ध होनेपर वह गौण है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए। जैसे हल बैल आदिका वहन करता है, ऐसा निमित्तमात्रसे कहा जाता है।
परन्तु हल प्रत्यक्षरूपसे बैल आदिका वहन नहीं करता, वैसे ही निमित्तमात्रसे सुप्त पुरुष रथ आदिका निर्माण करता है और वही कर्ता है, ऐसा कहा जाता है, परन्तु सुप्तपुरुष प्रत्यक्षरूपसे रथ आदिका निर्माण नहीं करता। इसका निमित्तत्व तो रथ आदिकी प्रतीतिसे उत्पन्न हषं और त्रास आदिके दर्शनसे उनके निमित्तरूप सुकृत और दुष्कृतके कर्तृरूपसे हैं, ऐसा कहना चाहिए।
और जाग्रत् में विषय इन्द्रियोंके संयोगसे और आदित्य बादि ज्योति के संकरसे आत्मामें स्वयं ज्योतिष्टुका विवेचन दुष्कर है, अतः उसके विवेचनके लिए स्वप्नका उपन्यास किया गया है। उसमें यदि रथ आदि सृष्टि वचन श्रुतिसे ( मुख्यवृत्तिसे ) तत्परक लिया जाय, तो आत्माका स्वयं ज्योतिष्टु निर्णीत नहीं होगा। इसलिए रथ आदि अभाव वचव मुख्यवृत्तिसे और रथ आदि सृष्टि वा गौण वृत्ति से है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए। इससे निर्माण श्रुतिका व्याख्यान हुआ।
और जो यह कहा गया है कि इस प्राज्ञको स्वप्नका निर्माता कहते हैं, वह मी युक्त नहीं है, क्योंकि ' स्वयं ' विहत्य ० ' ( स्वयं ही इस स्थूल शरीरको अचेतकर तथा स्वयं अपने वासनामय देहको रचकर, अन्तःकरण वृत्ति प्रकाशसे तथा स्वयं ज्योतिः स्वरूपसे उस वासनामयको विषय करता हुआ शयन करता है ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें जीव व्यापारका श्रवण है। और ' य एष ० ' ( जो यह इन्द्रियों के सुप्त होनेपर जागता है ) यहाँ भी प्रसिद्धके अनुवादसे यह जीव ही कामोंका निर्माता कहा जाता है।
किन्तु उसका ' तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ' ० ( वही शुक्र है और वह ब्रह्म है ) इस वाक्यशेषसे जीवभाव व्यावृत्तकर ' तत्त्वमसि ' इत्यादिके समान ब्रह्मभाव उपदेश किया जाता है, इससे ब्रह्म प्रकरणका विरोध नहीं है। और हम स्वप्नमें भी प्राज्ञके व्यापारका प्रतिषेध नहीं करते हैं, क्योंकि वह सबका ईश्वर होनेसे सब अवस्थाओं में भी अधिष्ठाता हो सकता है। परन्तु आकाश आदि सृष्टिके समान यह स्वप्न आश्रय सृष्टि पारमार्थिक नहीं है, केवल इतना ही प्रतिपादित किया जाता है।
और आकाश आदि सृष्टि भी आत्यन्तिक सत्य नहीं है, क्योंकि ' तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ' इस सूत्रमें सम्पूर्णं प्रपञ्चमें मायामात्रत्व प्रतिपादित है। ब्रह्मात्मत्व ज्ञानके पूर्व आकाश आदि प्रपञ्च व्यव : स्थितरूप होता है, और स्वप्न आश्रय प्रपञ्च तो प्रतिदिन बाधित होता है। अतः स्वप्नमें यही विशेष मायामात्रत्व कहा गया है॥ ४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि मन्त्र के प्रभावसे, देवताके अनुग्रहसे अथवा ओषधि आदिके सेवन से स्वप्न सत्यके सूचक होते हैं और वे सत्य होते हैं, तो भी स्वप्न पदार्थं सत्य नहीं होते? क्योंकि वे बाधित होते हैं। जैसे रज्जुसर्प, शुक्तिरजत आदि सत्यमय तथा हर्षके सूचक होनेपर भी बाधित होने से प्रतीतिमात्र हैं। और जो इस पादके प्रथम सूत्र में ' सन्ध्ये सृष्टिराह हि ' इसके अनुसार ' अथ रथान्स्थयोगान्पथः सृजते ’ इस श्रुतिसे स्वप्न सृष्टिको सत्य कहा गया है वह श्रुति कथन गौण है, वह केवल निमित्तमात्रको
७ लेकर कहा गया है। अतः स्वप्न भोक्ता पुण्य, पाप द्वारा स्वप्न सृष्टिका निमित्तमात्र है, अतः उस सुप्तका स्वप्नकर्तृत्व गौण है।
* ' अन्नायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' यह श्रुति स्वप्नको लेकर आत्मामें स्वयं ज्योतिष्ट्रका प्रति पादन करती है। रथ आदि सृष्टि वचन रथ आदि सृष्टि परक नहीं है, क्योंकि एक ही श्रुतिमें रथ आदिका अभाव और रथ आदि सृष्टि परस्पर विरूद्ध हैं, अतः रथ आदि अभाव वचन मुख्य है और रथ आदि सृष्टि वचन गौण है॥ ४
3.2.5 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ५
पराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥ ३.२.५ ॥
सूत्रार्थ — ( तु ) परन्तु ( अस्य ) जीवका ( तिरोहितम् ) अविद्या आदिसे आवृत्त ऐश्वथं ( पराभिध्यानात् ) परमात्मके ध्यास से अभिव्यक्त होता है, ( ततोहि ) क्योंकि ( बन्धविपर्ययौ ) ईश्वरज्ञान न होनेसे जीवका बन्ध और ज्ञान होनेसे मोक्ष होता है। ऐसा ' ज्ञात्वा देव ' इत्यादि श्रुतिमें प्रतिपादित है।
शाङ्करभाष्य
अथापि स्यात् परस्यैव तावदात्मनोंऽशः जीवः अग्नेरिव विस्फुलिङ्गः तत्रैवं सति यथा अग्निविस्फुलिङ्गयोः समाने दहनप्रकाशनशक्ती भवतः एवं जीवेश्वरयोरपि ज्ञानैश्वर्यशक्ती ततश्च जीवस्य ज्ञानैश्वर्यवशात् सांकल्पिकी स्वप्ने रथादिसृष्टिर्भविष्यतीति। अत्रोच्यते सत्यपि जीवेश्वरयोरंशांशिभावे प्रत्यक्षमेव जीवस्येश्वरविपरीतधर्मत्वम्। किं पुनर्जीवस्य ईश्वरसमानधर्मत्वं नास्त्येव न नास्त्येव विद्यमानमपि तत् तिरोहितम् अविद्यादिव्यवधानात्। तत्पुनस्तिरोहितं सत् परमेश्वरमभिध्यायतो यतमानस्य जन्तोर्विधूतध्वान्तस्य तिमिरतिरस्कृतेव दृक्शक्तिः औषधवीर्यात् ईश्वरप्रसादात् संसिद्धस्य कस्यचिदेवाविर्भवति न स्वभावत एव सर्वेषां जन्तूनाम् कुतः ततो हि ईश्वराद्धेतोः अस्य जीवस्य बन्धमोक्षौ भवतः ईश्वरस्वरूपापरिज्ञानात् बन्धः तत्स्वरूपपरिज्ञानात्तु मोक्षः। तथा च श्रुतिः ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः। तस्याभिध्यानात्तृतीयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः इत्येवमाद्या।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु ऐसा भी हो कि जैसे विस्फुलिङ्ग अग्निका अंश है, वैसे ही जीव परमात्माका अंश है। ऐसा होनेपर जैसे अग्नि और विस्फुलिङ्गमें दहन और प्रकाशन शक्ति समान है, वैसे जीव और ईश्वरमें भी ज्ञान और ऐश्वर्यशक्ति समान होगी, उससे जीवके ज्ञान और ऐश्वयंके बलसे स्वप्न में सांकल्पिकी रथ आदि सृष्टि हो जायगी। इसपर कहते हैं - जीव और ईश्वरका अंशांशिभाव होनेपर भी प्रत्यक्षरूपसे जीव में ईश्वरसे विपरीत धर्म हैं, तो क्या जीवमें ईश्वरके समान धर्म नहीं हैं?
नहीं है, ऐसा नहीं, क्योंकि समान धर्मं विद्यमान होता हुआ भी अविद्याके व्यवधानसे वह तिरोहित है। परन्तु वह तिरोहित होता हुआ भी परमेश्वरका ध्यान करनेवाले यत्नशील विनष्ट अज्ञान निष्पाप किसी एक सिद्ध पुरुषमें ईश्वर के प्रसादसे वह पुनः आविर्भूत होता है, जैसे ओषधके बलसे किसी एक प्राणीकी रतौंधी से तिरकृत दृक्शक्ति आविर्भूत होती है। स्वभावसे सभी प्राणियोंकी ज्ञान ऐश्वयं शक्ति आविर्भूत नहीं होती। किससे? ' ततो हि ' ईश्वररूप हेतुसे, अस्य - जीवका बन्ध और मोक्ष होता है।
ईश्वर स्वरूपका परिज्ञान न होनेसे बन्ध और उसके स्वरूप परिज्ञानसे मोक्ष होता है। क्योंकि ' ज्ञात्वा देवं ० ' ( ' यह मैं हूँ ' इसप्रकार परमात्माका ज्ञान होनेपर अविद्या आदि सम्पूर्णं क्लेशों का नाश हो जाता है और क्लेशोंका क्षय हो जानेपर जन्म मृत्युकी निवृत्ति हो जाती है। तथा उसका ध्यान करनेसे शरीरपातके अनन्तर [ विराट् और हिरण्यगर्भकी अपेक्षा ] कारण ब्रह्मरूप सर्वैश्वर्यमयी तृतीय अवस्थाकी प्राप्ति होती है और पुनः आप्तकाम होकर कैवल्य पदको प्राप्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुति है॥ ५
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.६ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.6 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ६
देहयोगाद्वा सोऽपि ॥ ३.२.६ ॥
पदच्छेद — देहयोगात् , वा , सः , अपि
सूत्रार्थ — ( सोऽपि ) जीवके ऐश्वयंका वह तिरोभाव भी ( देहयोगात् ) देह आदिके योगसे होता है। ( वा ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है।
शाङ्करभाष्य
कस्मात्पुनर्जीवः परमात्मांश एव सन् तिरस्कृतज्ञानैश्वर्यो भवति युक्तं तु ज्ञानैश्वर्ययोरतिरस्कृतत्वम् विस्फुलिङ्गस्येव दहनप्रकाशनयोः इति। उच्यते सत्यमेवैतत् सोऽपि तु जीवस्य ज्ञानैश्वर्यतिरोभावः देहयोगात् देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनादियोगात् भवति। अस्ति च अत्रोपमा यथा अग्नेर्दहनप्रकाशनसंपन्नस्याप्यरणिगतस्य दहनप्रकाशने तिरोहिते भवतः यथा वा भस्मच्छन्नस्य एवमविद्याप्रत्युपस्थापितनामरूपकृतदेहाद्युपाधियोगात् तदविवेकभ्रमकृतो जीवस्य ज्ञानैश्वर्यतिरोभावः।
वाशब्दो जीवस्य ईश्वरात् अन्यत्वशङ्काव्यावृत्त्यर्थः। नन्वन्य एव जीवः ईश्वरादस्तु तिरस्कृतज्ञानैश्वर्यत्वात् किं देहयोगकल्पनया नेत्युच्यते न हि अन्यत्वं जीवस्य ईश्वरादुपपद्यते सेयं देवतैक्षत इत्युपक्रम्यअनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य इत्यात्मशब्देन जीवस्य परामर्शात्तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति च जीवाय उपदिशति ईश्वरात्मत्वम् अतः अनन्य एव ईश्वराज्जीवः सन् देहयोगात्तिरोहितज्ञानैश्वर्यो भवति।
अतश्च न सांकल्पिकी जीवस्य स्वप्ने रथादिसृष्टिर्घटते यदि च सांकल्पिकी स्वप्ने रथादिसृष्टिः स्यात् नैवानिष्टं कश्चित्स्वप्नं पश्येत् न हि कश्चिदनिष्टं संकल्पयते। यत्पुनरुक्तम् जागरितदेशश्रुतिः स्वप्नस्य सत्यत्वं ख्यापयतीति न तत्साम्यवचनं सत्यत्वाभिप्रायम् स्वयंज्योतिष्ट्वविरोधात् श्रुत्यैव च स्वप्ने रथाद्यभावस्य दर्शितत्वात् जागरितप्रभववासनानिर्मितत्वात्तु स्वप्नस्य तत्तुल्यनिर्भासत्वाभिप्रायं तत्। तस्मादुपपन्नं स्वप्नस्य मायामात्रत्वम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परमात्माका अंश होता हुआ मी जीव तिरस्कृत ज्ञानैश्वर्यवान् पुनः क्यों होता है? प्रत्युत जैसे विस्फुलिङ्गके दहन और प्रकाशन अतिरस्कृत हैं, वैसे ईश्वरांय जीवके ज्ञान और ऐश्वयं अतिरस्कृत होने चाहिए। कहते हैं - यह सत्य है, किन्तु जीवका ' सोऽपि ' ज्ञानेश्वयं तिरोभाव मी देहयोगात्देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय, वेदना आदिके योगसे होता है।
यहाँ दृष्टान्त भी है - जैसे दहन और प्रकाश सम्पन्न होते हुए मी अरणिगत अग्निके दहन और प्रकाशन तिरोहित होते हैं, अथवा जिस प्रकार भस्मसे आच्छादित अग्निके दहन और प्रकाश तिरोहित होते हैं, उसी प्रकार अविद्या से प्रत्युपस्थापित ( खड़े किए हुए ) नाम और रूपसे होनेवाली देह आदि उपाधिके साथ सम्बन्ध होने से जीवके उपाधिके अविवेकभ्रमसे होनेवाले ज्ञान और ऐश्वयं तिरोहित होते हैं। ' वा ' शब्द जीव और ईश्वरमें अन्यत्व शङ्का व्यावृत्ति के लिए है।
परन्तु जोव ईश्वरसे अन्य ही है, क्योंकि उसके ज्ञान और ऐश्वर्यं तिरस्कृत हैं . देहयोगकी कल्पनासे क्या प्रयोजन? नहीं, ऐसा कहते हैं— जीवमें ईश्वरसे अन्यत्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि ' सेयं देवतैक्षत ' ( उस देवताने ईक्षण किया ) इस प्रकार आरम्भ कर ' अनेन जीवेना ० ' ( मैं इस जीवात्मरूपसे ही उन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम, रूपका व्याकरण करूं ) इस प्रकार आत्मशब्दसे जीवका परामर्श है। ' तत्सत्यं ० ' ( वह सत्य है, वह आत्मा है, हे श्वेतकेतु!
वह तू है ) यह श्रुति जोवको ईश्वरात्मत्व उपदेश करती है। अत : जीव ईश्वरसे अनन्य होता हुआ ही देह सम्बन्धसे तिरोहित ज्ञानेश्वर्यवान् होता है। इससे जीवको स्वप्नमें संकल्पसे जन्य रथ आदि सृष्टि नहीं घटती है। और यदि स्वप्नमें संकल्प जन्य रथ आदि सृष्टि हो, तो कोई भी अनिष्ट स्वप्न नहीं देखे, क्योंकि कोई भी अनिष्ट संकल्प नहीं करता।
और जो यह कहा गया है कि जागरित देश श्रुति स्वप्नमें सत्यत्वका कथन करती हैं, किन्तु वह साम्य वचन स्वप्नमें सत्यत्वके अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि आत्मामें स्वयं ज्योतिष्ट से विरोध होता है और श्रुतिसे ही स्वप्नमें आदिका अभाव दिखलाया गया है। जाग्रत्में उत्पन्न हुई वासनासे निर्मित होनेके कारण स्वप्नका जाग्रत् के समान अवभास होता है, इस अभिप्रायसे वह साम्य वचन है। इसलिए स्वप्न में मायामात्रत्व युक्त है॥ ६
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि स्वप्न में प्रतीयमान प्रकाश सत्य हो, तो जाग्रत् के समान आत्माका स्वप्रकाशत्व स्पष्ट प्रतीत नहीं होगा। स्वप्नको प्रातिभासिक माननेपर तो उसमें सूर्य आदि बाह्य प्रकाश और इन्द्रिय आदिके न होने से भी जो स्वप्न पदार्थों का अवभास होता है वह स्वयं ज्योतिः स्वरूप आत्मा से होता है। ' अथ स्थान्स्थयोगान्सृजते ' यह साम्यवचन स्वप्न में सत्यत्व के अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि उसी श्रुति में ' न तन्त्र रथा ० ' इस प्रकार रथ आदिका अभाव भी कहा गया है। यह जो जाग्रत् और स्वप्नका साम्य वचन श्रुतिमें है, उसका यह अभिप्राय है कि जाग्रत् अवस्थाके पदार्थोंके जैसे स्वप्न में पदार्थ मान होते हैं, परन्तु वे सत्य नहीं है, अतः स्वप्न मायामात्र है।। ६
तदभावाधिकरणम्
3.2.7 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ७
तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च ॥ ३.२.७ ॥
पदच्छेद — तदभावः , नाडीषु , तच्छ्रुतेः , आत्मनि च
सूत्रार्थ — ( तदभावः ) प्रकृत स्वप्नंका अभावरूप सुषुप्ति ( नाडीषु ) नाड़ियों में प्रवेशके द्वारा ( आत्मनि ) आत्मामें होती है, ( तच्छ्रुतेः ) क्योंकि तत् तत् श्रुतियों में ऐसा ही कहा गया है।
शाङ्करभाष्य
स्वप्नावस्था परीक्षिता सुषुप्तावस्थेदानीं परीक्ष्यते।
तत्रैताः सुषुप्तविषयाः श्रुतयो भवन्ति क्वचिच्छ्रूयते तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति इति अन्यत्र तु नाडीरेवानुक्रम्य श्रूयते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते इति तथान्यत्र नाडीरेवानुक्रम्य तासु तदा भवति यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति इति तथान्यत्र य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्शेते इति तथान्यत्र सतासोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति इति तथा प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् इति च।।
तत्र संशयः किमेतानि नाड्यदीनि परस्परनिरपेक्षतया भिन्नानि सुषुप्तिस्थानानि आहोस्वित्परस्परापेक्षतया एकं सुषुप्तिस्थानमिति। किं तावत्प्राप्तम् भिन्नानीति कुतः एकार्थत्वात् न हि एकार्थानां क्वचित्परस्परापेक्षत्वं दृश्यते व्रीहियवादीनाम् नाड्यादीनां च एकार्थता सुषुप्तौ दृश्यतेनाडीषु सृप्तो भवतिपुरीतति शेते इति च तत्र तत्र सप्तमीनिर्देशस्य तुल्यत्वात्।
ननु नैवं सति सप्तमीनिर्देशो दृश्यते सता सोम्य तदा संपन्नो भवति इति नैष दोषः तत्रापि सप्तम्यर्थस्य गम्यमानत्वात् वाक्यशेषो हि तत्र आयतनैषी जीवः सत् उपसर्पतीत्याह अन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते इति प्राणशब्देन तत्र प्रकृतस्य सत उपादानात् आयतनं च सप्तम्यर्थः सप्तमीनिर्देशोऽपि तत्र वाक्यशेषे दृश्यते सति संपद्य न विदुः सति संपद्यामहे इति। सर्वत्र च विशेषविज्ञानोपरमलक्षणं सुषुप्तं न विशिष्यते। तस्मादेकार्थत्वात् नाड्यादीनां विकल्पेन कदाचित् किंचित्स्थानं स्वापायोपसर्पति इति।।
एवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते तदभावो नाडीष्वात्मनि चेति। तदभाव इति तस्य प्रकृतस्य स्वप्नदर्शनस्य अभावः सुषुप्तमित्यर्थः नाडीष्वात्मनि चेति समुच्चयेन एतानि नाड्यादीनि स्वापायोपसर्पति न विकल्पेन इत्यर्थः कुतः तच्छ्रुतेः तथा हि सर्वेषामेव नाड्यादीनां तत्र तत्र सुषुप्तिस्थानत्वं श्रूयते तच्च समुच्चये संगृहीतं भवति विकल्पे ह्येषाम् पक्षे बाधः स्यात्।
ननु एकार्थत्वाद्विकल्पो नाड्यादीनां व्रीहियवादिवत् इत्युक्तम् नेत्युच्यते न हि एकविभक्तिनिर्देशमात्रेण एकार्थत्वं विकल्पश्च आपतति नानार्थत्वसमुच्चययोरप्येकविभक्तिनिर्देशदर्शनात् प्रासादे शेते पर्यङ्के शेते इत्येवमादिषु तथा इहापि नाडीषु पुरीतति ब्रह्मणि च स्वपितीति उपपद्यते समुच्चयः तथा च श्रुतिः तासु तदा भवति यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति इति समुच्चयं नाडीनां प्राणस्य च सुषुप्तौ श्रावयति एकवाक्योपादानात् प्राणस्य च ब्रह्मत्वं समधिगतम् प्राणस्तथानुगमात् इत्यत्र।
यत्रापि निरपेक्षा इव नाडीः सुषुप्तिस्थानत्वेन श्रावयति आसु तदा नाडीषु सृप्तो भवति इति तत्रापि प्रदेशान्तरप्रसिद्धस्य ब्रह्मणोऽप्रतिषेधात् नाडीद्वारेण ब्रह्मण्येवावतिष्ठत इति प्रतीयते न चैवमपि नाडीषु सप्तमी विरुध्यते नाडीभिरपि ब्रह्मोपसर्पन् सृप्त एव नाडीषु भवति यो हि गङ्गया सागरं गच्छति गत एव स गङ्गायां भवति।
भवति च अत्र रश्मिनाडीद्वारात्मकस्य ब्रह्मलोकमार्गस्य विवक्षितत्वात् नाडीस्तुत्यर्थं सृप्तिसंकीर्तनम् नाडीषु सृप्तो भवति इत्युक्त्वातं न कश्चन पाप्मा स्पृशति इति ब्रुवन् नाडीः प्रशंसति ब्रवीति च पाप्मस्पर्शाभावे हेतुम्तेजसा हि तदा संपन्नो भवति इति तेजसा नाडीगतेन पित्ताख्येन अभिव्याप्तकरणो न बाह्यान् विषयानीक्षत इत्यर्थः अथवा तेजसेति ब्रह्मण एवायं निर्देशः श्रुत्यन्तरेब्रह्मैव तेज एव इति तेजःशब्दस्य ब्रह्मणि प्रयुक्तत्वात् ब्रह्मणा हि तदा संपन्नो भवति नाडीद्वारेण अतस्तं न कश्चन पाप्मा स्पृशतीत्यर्थः ब्रह्मसंपत्तिश्च पाप्मस्पर्शाभावे हेतुः समधिगतःसर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः इत्यादिश्रुतिभ्यः एवं च सति प्रदेशान्तरप्रसिद्धेन ब्रह्मणा सुषुप्तिस्थानेनानुगतो नाडीनां समुच्चयः समधिगतो भवति।
तथा पुरीततोऽपि ब्रह्मप्रक्रियायां संकीर्तनात् तदनुगुणमेव सुषुप्तिस्थानत्वं ज्ञायते य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्शेते इति हृदयाकाशे सुषुप्तिस्थाने प्रकृते इदमुच्यते पुरीतति शेते इति पुरीतदिति हृदयपरिवेष्टनमुच्यते तदन्तर्वर्तिन्यपि हृदयाकाशे शयानः शक्यतेपुरीतति शेते इति वक्तुम् प्राकारपरिक्षिप्तेऽपि हि पुरे वर्तमानः प्राकारे वर्तत इत्युच्यते हृदयाकाशस्य च ब्रह्मत्वं समधिगतम्दहर उत्तरेभ्यः इत्यत्र।
तथा नाडीपुरीतत्समुच्चयोऽपिताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते इत्येकवाक्योपादानात् अवगम्यते। सत्प्राज्ञयोश्च प्रसिद्धमेव ब्रह्मत्वम्। एवमेतासु श्रुतिषु त्रीण्येव सुषुप्तिस्थानानि संकीर्तितानि नाड्यः पुरीतत् ब्रह्म चेति तत्रापि द्वारमात्रं नाड्यः पुरीतच्च ब्रह्मैव तु एकम् अनपायि सुषुप्तिस्थानम्। अपि च नाड्यः पुरीतद्वा जीवस्योपाध्याधार एव भवति तत्रास्य करणानि वर्तन्त इति न हि उपाधिसंबन्धमन्तरेण स्वत एव जीवस्याधारः कश्चित्संभवति ब्रह्माव्यतिरेकेण स्वमहिमप्रतिष्ठितत्वात्।
ब्रह्माधारत्वमप्यस्य सुषुप्ते नैव आधाराधेयभेदाभिप्रायेण उच्यते कथं तर्हि तादात्म्याभिप्रायेण यत आह सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति इति स्वशब्देन आत्मा अभिलप्यते स्वरूपमापन्नः सुप्तो भवतीत्यर्थः। अपि च न कदाचिज्जीवस्य ब्रह्मणा संपत्तिर्नास्ति स्वरूपस्यानपायित्वात् स्वप्नजागरितयोस्तूपाधिसंपर्कवशात् पररूपापत्तिमिवापेक्ष्य तदुपशमात्सुषुप्तेः स्वरूपापत्तिर्विवक्ष्यते स्वमपीतो भवति इति अतश्च सुप्तावस्थायां कदाचित्सता संपद्यते कदाचिन्न संपद्यते इत्ययुक्तम्।
अपि च स्थानविकल्पाभ्युपगमेऽपि विशेषविज्ञानोपशमलक्षणं तावत्सुषुप्तं न क्वचिद्विशिष्यते तत्र सति संपन्नस्तावत् एकत्वात् न विजानातीति युक्तम्तत्केन कं विजानीयात् इति श्रुतेः नाडीषु पुरीतति च शयानस्य न किंचित् अविज्ञाने कारणं शक्यं विज्ञातुम् भेदविषयत्वात्यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत् इति श्रुतेः।
ननु भेदविषयस्याप्यतिदूरादिकारणमविज्ञाने स्यात् बाढमेवं स्यात् यदि जीवः स्वतः परिच्छिन्नोऽभ्युपगम्येत यथा विष्णुमित्रः प्रवासी स्वगृहान् न पश्यतीति न तु जीवस्योपाधिव्यतिरेकेण परिच्छेदो विद्यते उपाधिगतमेवातिदूरादिकारणम् अविज्ञाने इति यद्युच्येत तथाप्युपाधेरुपशान्तत्वात् सत्येव संपन्नः न विजानातीति युक्तम्।
न च वयमिह तुल्यवत् नाड्यादिसमुच्चयं प्रतिपादयामः न हि नाड्यः सुप्तिस्थानं पुरीतच्च इत्यनेन विज्ञानेन किंचित्प्रयोजनमस्ति न ह्येतद्विज्ञानप्रतिबद्धं किंचित्फलं श्रूयते नाप्येतद्विज्ञानं फलवतः कस्यचिदङ्गमुपदिश्यते। ब्रह्म तु अनपायि सुप्तिस्थानम् इत्येतत्प्रतिपादयामः तेन तु विज्ञानेन प्रयोजनमस्ति जीवस्य ब्रह्मात्मत्वावधारणं स्वप्नजागरितव्यवहारविमुक्तत्वावधारणं च। तस्मादात्मैव सुप्तिस्थानम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — स्वप्नावस्थाकी परीक्षा हो चुकी, अब सुषुप्ति अवस्थाकी परीक्षा की जाती है। यहाँ सुषुप्ति विषयक ये श्रुतियाँ हैं। कहीं ' तद्यत्रैतत्सुप्तः ० ' ( जिस समय समस्त करणवृत्तिका उपसंहार कर जीव सोता है उस समय में [ बाह्य विषय संपर्क जनित कालुष्य रहित होनेसे ] संप्रसन्न होता हुआ स्वप्नको नहीं जानता, क्योंकि उस समय यह इन नाडियोंमें प्रविष्ट होता है ) ऐसी श्रुति है।
अन्यत्र तो ' तामिः प्रत्यवसृप्य ० ' ( उन नाड़ियों द्वारा पुरीतत् में बुद्धिके साथ जाकर वह शरीर में व्याप्त होकर शयन करता है ) इसप्रकार नाड़ीका अनुक्रमणकर सुना जाता है। इसप्रकार अन्यत्र नाड़ीका अनुक्रमणकर ' तासु तदा भवति ० ' ( उन नाड़ियों में तब होता है जब कि सुप्त कोई स्वप्न नहीं देखता, अनन्तर वह इस प्राणमें ही एक होता है ) ऐसी श्रुति है। इसीप्रकार अन्यत्र ' य एषो ० ' ( जो यह हृदयमें आकाश है उसमें सोता है ) ऐसी श्रुति है। इसीप्रकार अन्यत्र ' सता सोम्य ० ' ( उस समय हे सोम्य!
यह सत्से सम्पन्न हो जाता है यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) ऐसी श्रुति है। तथा ' प्राज्ञेनात्मना ० ' ( इसीप्रकार यह पुरुष प्राज्ञात्मासे आलङ्गित होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और नभीतरका ) ऐसी श्रुति है। उसमें संशय होता है- क्या ये नाड़ी आदि परस्पर निरपेक्ष होकर भिन्न भिन्न सुषुप्ति स्थान हैं अथवा परस्पर अपेक्षासे एक सुषुप्ति स्थान है, तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - भिन्न स्थान हैं, किससे? इससे कि एकार्थत्व है।
एकार्थक व्रीहि, यव आदिका कहीं परस्पर सापेक्षत्व नहीं देखा जाता है। नाड़ी आदिकी एकार्थता तो सुषुप्ति में देखी जाती है - ' नाडीषु सृप्तो भवति ' ' पुरीतति शेते ' इसप्रकार तत् तत् श्रुतिमें सप्तमीका निर्देश तुल्य है। परन्तु ' सता सोम्य ० ' ( उस समय, हे सोम्य! यह सत्से सम्पन्न हो जाता है ) यहाँ ' सत् में ' ऐसा सप्तमीका निर्देश नहीं देखा जाता। यह दोष नहीं है, क्योंकि वहाँ पर भी सप्तमी अथं गम्यमान है। उसमें ' आयतनामिलाषी जीव सत् में प्रविष्ट होता है ' इसप्रकार वाक्यशेष मी कहता है।
क्योंकि ' अन्यन्त्र ० ' ( अन्यत्र स्थान न प्राप्तकर प्राणका ही आश्रय लेता है ) इसप्रकार वहाँ प्राण शब्दसे प्रकृत सत्का ग्रहण है . और सप्तमीका अर्थं आयतन है। और ' सति संपद्य ० ' ( सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि सत्को प्राप्त हो गये ) इस तरह वहां सप्तमी निर्देश मी वाक्यशेषमें देखा जाता है। विशेष विज्ञानका उपरमरूप सुषुप्त सर्वत्र समान है। इसलिए नाड़ी आदि एकार्थक होनेसे जीव विकल्पसे कभी किसी स्थानमें शयन के लिए प्रवेश करता है।
ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन किया जाता है - ' तदभावो नाडीष्वात्मनि चेति ' तदभाव उस प्रकृत स्वप्न दर्शनका अभाव सुषुप्ति है, ऐसा अर्थ है। नाड़ी और आत्मामें - इन नाड़ी बादिमें समुच्चयसे जीव शयनके लिए प्रवेश करता है विकल्पसे नहीं, यह अर्थ है। किससे? उसकी श्रुति होनेसे। जैसे कि सभी नाड़ी आदिका तत् तत् श्रुतियोंमें सुषुप्ति - स्थानत्व श्रवण होता है। वह समुच्चय होनेपर संगृहीत होता है, विकल्प होनेपर इनका पक्षमें बाध होगा।
परन्तु ऐसा कहा गया है कि एकार्थक होनेसे व्रीहि यव आदिके समान नाड़ी आदिका विकल्प है। नहीं, ऐसा कहा जाता है - एक समान विभक्तिके निर्देश मात्रसे एकार्थत्व और विकल्पका प्रसंग नहीं होता, क्योंकि नानार्थत्व और समुच्चयमें भी एक विभक्तिका निर्देश ' प्रासादमें सोता है पलङ्गपर शयन करता है ' इत्यादिमें दर्शन होता है, इसीप्रकार यहाँ भी नाड़ियोंमें, पुरीतत् में और ब्रह्ममें सोता है, इसप्रकार समुच्चय उपपन्न होता है।
और ' तासु तदा ० ' ( उन नाड़ियोंमें, जीव तब होता है जब सोया हुआ किसी स्वप्नको नहीं देखता, अनन्तर इस प्राणमें एक रूप होता है ) इसत्रकार यह श्रुति नाड़ियों और प्राणका सुषुप्ति में समुच्चय श्रवण कराती है, क्योंकि एक वाक्यसे ग्रहण है, और ' प्राणस्तथानुगमात् ' इस सूत्रमें प्राण में ब्रह्मत्वका निश्चय किया गया है।
' आसु तदा ० ' ( उस समय इन नाड़ियों में प्रविष्ट होता है ) ऐसी श्रुति जहाँ अन्यकी अपेक्षासे रहित - सी नाड़ियों में सुषुप्तिस्थानत्व श्रवण कराती है, वहाँ भी अन्य श्रुतियोंमें प्रसिद्ध ब्रह्मका प्रतिषेध न होने से नाड़ीद्वारा ब्रह्ममें ही जीव अवस्थित होता है ऐसा प्रतीत होता है, ऐसा होनेपर नाड़ियों में सप्तमी विरुद्ध नहीं है, क्योंकि नाड़ीद्वारा मी ब्रह्ममें प्रवेश करता हुआ जीव नाड़ियोंमें ही प्रविष्ट होता है। जो गङ्गा द्वारा सागरमें जाता है वह गङ्गामें गया हुआ होता है।
और यहाँ पर रश्मि - नाड़ी द्वारात्मक ब्रह्मलोकका मागं विवक्षित होनेसे नाड़ीकी स्तुति के लिए प्रवेश कथन है- ' नाडीषु सृप्तो भवति ( नाड़ियोंमें प्रविष्ट होता है ) ऐसा कहकर ' तं न कश्चन ० ' ( तब इसे कोई पाप स्पर्शं नहीं करता ) इसप्रकार कहती हुई श्रुति नाड़ीकी प्रशंसा करती है। और ' तेजसा हि ० ( और तेजसे व्याप्त हो जाता है ) इसप्रकार श्रुति पापं स्पर्शके अभावमें हेतु कहती है। नाड़ीगत पित्त नामक तेजसे अभिव्याप्त इन्द्रियवाला वह बाह्य विषयोंको नहीं देखता ऐसा अर्थ है।
अथवा ' तेजसा ' ( तेजसे ) यह ब्रह्मका ही निर्देश है, क्योंकि अन्य श्रुतिमें ' ब्रह्मैव तेज एव ' ( ब्रह्म ही है - तेज ही है ) इसप्रकार तेज शब्द ब्रह्ममें प्रयुक्त है, तब जीव नाड़ी द्वारा ब्रह्मके साथ सम्पन्न होता है। छतः इसे कोई पाप स्पर्शं नही करता ' ऐसा अर्थ है। और ' सर्वे ' पाप्मानो ० ' ( सम्पूर्णं पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पाप शून्य है ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्मसंपत्ति पापस्पर्श के अभावमें हेतु समधिगत है।
ऐसा होनेपर अन्य श्रुतियोंमें सुषुप्ति स्थानरूपसे प्रसिद्ध ब्रह्मके साथ अनुगत नाड़ी आदिका समुच्चय समधिगत - ज्ञात होता है। इसप्रकार पुरीतत्का मी ब्रह्मके प्रकरणमें संकीर्तन होनेसे . ब्रह्म के अनुगण ही सुषुप्तिस्थानरूपसे ज्ञात होता है - ' य एषोऽन्तर्हृदयः ० ' ( यह जो हृदय के मीतर आकाश है उसमें शयन करता है ) इसप्रकार सुषुप्ति स्थानरूपसे प्रकृत हृदय आकाश के विषयमें ' पुरोतति शेते ' ( पुरीतत्में शयन करता है ) ऐसा कहा जाता है।
हृदयके परिवेष्टनको ' पुरीतत् ' कहा जाता है, उसके अन्तर्वर्ती मी हृदय आकशमें शयन करता हुआ पुरीतत् में शयन कहता है ऐसा कहा जा सकता है। कोटसे घिरे हुए नगरमें रहता हुआ कोटमें रहता है ऐसा कहा जाता है, और ' दहर उत्तरेभ्यः ' इसमें हृदयाकाशको ब्रह्मत्व निश्चित किया गया है। तथा ' तामिः प्रत्यवसृप्य ' ( नाड़ियों द्वारा प्रवेशकर पुरीतत् में सोता है ) इस श्रुतिसे नाड़ी और पुरीतत्का समुच्चय बी एक वाक्य उपादानसे अवगत होता है। सत् बोर प्रान ब्रह्म है, यह प्रसिद्ध है।
इसप्रकार इन श्रुतियोंमें नाड़ी, पुरीत और ब्रह्म ये तीन ही सुषुप्ति स्थान कहे गये हैं। उनमें भी नाड़ी और पुरीतत् द्वारमात्र हैं, एक अविनाशी ब्रह्म ही सुषुप्तिका स्थान है, और नाड़ियाँ अथवा पुरीतत् जीवको उपाधिका आधार ही है, क्यों उनमें इसके करण रहते हैं।
उपाधि सम्बन्धके विना जीवका स्वतः . ही कोई आधार नहीं हो सकता, क्योंकि जीव ब्रह्मसे अभिन्न होनेसे स्वमहिमा में प्रतिष्ठित है, इस जीवका सुषुप्ति में ब्रह्माधारत्व भी आधार और आधेयके भेदके अभिप्रायसे नही कहा जाता है, किन्तु तादात्म्यके अभिप्राय से। क्योंकि ' सता सोम्य ' ( उस समय हे सोम्य? यह सत् के साथ सम्पन्न हो जाता है - यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) यह श्रुति ऐसा कहती है।
स्वशब्दसे आत्मा कहा जाता है सोया हुआ अपने स्वरूपको प्राप्त होता है, यह अर्थ है, और कदाचित् मी जीवकी ब्रह्मके साथ संपत्ति न हो ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका स्वरूप अविनाशी है | स्वप्न और जाग्रत्में तो उपाधिके संपर्कवश भिन्नरूपताकी प्राप्ति - सी होती है, उसकी अपेक्षा करके सुषुप्ति में उसके उपशम होनेसे स्वरूपकी प्राप्ति ' स्वमपीतो भवति ' ( यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) इस प्रकार विवक्षित है।
और इससे सुषुप्ति अवस्थामें कभी सत्से सम्पन्न होता है और कभी सम्पन्न नहीं होता, यह कथन युक्त नहीं है। यदि स्थान विकल्प स्वीकार भी किया जाय तो भी विशेष विज्ञानका अभावरूप सुषुप्तका कहीं भेद नहीं है। सुषुप्तिमें सत् के साथ सम्पन्न होकर उसके साथ एकत्व होनेसे नहीं जानता है, यह युक्त है, क्योंकि ' तत्केन कं विजानीयात् ० ' ( और वहाँ किसके द्वारा किसे जाने ) ऐसी श्रुति है।
नाड़ियों और पुरीतत् में शयन करनेवाले जीवके अज्ञानमें किसी कारणको नहीं जाना जा सकता, कारण कि ' यत्र वाऽन्यदिव ० ' ( जहाँ जाग्रत् वा स्वप्नावस्थामें आत्मासे स्वीकार किया जाय। जैसे प्रवासी विष्णुमित्र अपने घरको नहीं देखता। परन्तु जीवका उपाधिके विना परिच्छेद नहीं है।
यदि कहो कि उपाधिगत अतिदूर आदि अज्ञानमें कारण हैं, तो मी उपाधि उपशान्त होनेसे सत् में ही सम्पन्न होता हुआ नहीं जानता यह युक्त है, और यहाँ हम ब्रह्मके समान नाड़ी आदि समुच्चयका पतिपादन नहीं करते, क्योंकि नाड़ियाँ और पुरीतत् सुषुप्तिस्थान हैं इस विज्ञानसे कोई प्रयोजन नहीं है, और इस विज्ञानसे प्रतिबद्ध कोई फल भी नहीं सुना जाता, और यह विज्ञान किसी फलवाले [ अङ्गी ] का बङ्गरूपसे भी उपदिष्ट नहीं है। अविनाशी ब्रह्म तो सुषुप्ति स्थान है यह प्रतिपादन करते हैं।
इस विज्ञानसे तो जीवका ब्रह्मात्मत्व निश्चय और स्वप्न - जागरित व्यवहारसे विमुक्तत्व निश्चय प्रयोजन है। इसलिए आत्मा ही सुषुप्तिका स्थान है॥ ७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जीवात्मा स्वयं ज्योतिःस्वरूप है, इस निर्णय के लिए स्वप्नावस्थाका निरूपण किया गया है। ' वह ब्रह्म है ' अब इसके लिए सुषुप्ति अवस्थाका प्रतियोगि- अनुयोगिभाव संगति से विचार किया जाता है। ' तद्यत्रैतत्सुप्तः ' इस श्रुतिमें सुषुप्तिका स्थान नाड़ी प्रतिपादित है, और ' तामिः प्रत्यवसृप्य ' इस श्रुतिसे सुषुप्तिका स्थान नाड़ी और पुरीतत् कहा गया है, इसप्रकार ' तासु तदा भवति ' इसमें पुरीतत् और परमात्मा जीवके सुषुप्तिस्थान प्रतिपादित हैं, मोर ' य एषोऽन्तर्हृदयः ' ' सता सोम्य ' प्राज्ञेनात्मना ' इत्यादि श्रुतियोंमें केवल परमात्मा सुषुप्तिस्थान कहा गया है। इसप्रकार नाड़ी, पुरीतत् और परमात्मा इन तीनों में सप्तमी विभक्ति समान है, अतः संशय होता है कि क्या ये तीनों परस्परकी अपेक्षा रहित भिन्न भिन्न सुषुप्तिके स्थान हैं अथवा परस्परकी अपेक्षया एक सुषुप्ति स्थान है?
* पूर्वपक्षमें जीवके सुषुप्तिस्थानका विकल्प होनेसे ब्रह्मक्यका अनिर्णय फल है और सिद्धान्तमें नाड़ी द्वारा पुरीतत्में जाकर हृदयके भीतर ब्रह्ममें ही शयन करता है, इसप्रकार ब्रह्मेक्य निर्णय फल है।
* सिद्धान्ती — समुच्चयसे ही एक सुषुप्ति स्थान है। यदि विकल्प मानें तो जिस समय नाड़ियों में सुषुप्तिस्थान होगा उस समय पुरीतत् आदि सुषुप्तस्थान नहीं होंगे, ऐसी परिस्थिति में पुरीतत् आदिको सुषुप्तिस्थानत्व प्रतिपादक श्रुतिका बाध होगा। और जैसे ' महलमें सोता है, पलङ्ग पर सोता है ' यहाँ महलका प्रयोजन पलङ्गका धारण है, और पलङ्गका प्रयोजन शयन है। इसप्रकार प्रयोजन भिन्न - भिन्न होनेपर भी दोनोंमें सप्तमी विभक्ति है, और साक्षात् अथवा परम्परासे शयन के साधन होनेसे दोनोंमें समुच्चय भी है, वैसे यहाँ भी पुरीतत् आदि नाड़ियों द्वारा जीवका संचार होनेसे ब्रह्ममें ही शयन है और ' तासु तदा भवति ' इस एक श्रुतिवाक्यसे प्राण और नाड़ियोंका ग्रहण भी है, इससे भी इनका समुच्चय है। यहाँ सप्तमीका अर्थ आधार है निरपेक्ष नहीं है, इसलिए समुच्चयका सप्तमी श्रुतिसे बाघ नहीं है।
* हम नाड़ी आदिका ब्रह्मके साथ समुच्चय नहीं मानते, किन्तु गुणप्रधानभाव मानते हैं अर्थात् ब्रह्म मुख्य सुषुप्तिस्थान है और नाड़ी आदि द्वार होनेसे गौण हैं, इस प्रकार सुषुप्तिस्थानके विकल्पका निराकरण कर अब ' न हि नाड्यः ' इत्यादिसे उसके फल आदिका मी खण्डन करते हैं || ७ ||
3.2.8 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ८
अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ३.२.८ ॥
पदच्छेद — अतः , प्रबोधः , अस्मात्
सूत्रार्थ — परमात्मा ही सुषुप्ति स्थान है, ( अत : ) अतएव ( अस्मात् ) परमात्मा से जीवका ( प्रबोध ० ) उत्थान स्वाप प्रकरण में ' सत आगम्य ' इत्यादि श्रुतियोंसे उपदिष्ट है।
शाङ्करभाष्य
यस्माच्च आत्मैव सुप्तिस्थानम् अत एव च कारणात् नित्यवदेव अस्मादात्मनः प्रबोधः स्वापाधिकारे शिष्यतेकुत एतदागात् इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनावसरे यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः इत्यादिनासत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — क्योंकि परमात्मा हो सुषुप्ति स्थान है, इसी कारण से स्वाप प्रकरणमें ' कुत एतदागात् ० ' ( यह कहाँसे आया ) इस प्रश्नके प्रतिवचन ( उत्तर ) के अवसर में ' यथाऽग्ने : ० ' ( जैसे अग्निसे अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मासे समस्त प्राण ) इत्यादि श्रुति से इस आत्मासे नित्यप्रतिदिन - सा जीवके प्रबोधका उपदेश किया जाता है। और ' सतं आगम्य ' ( ये सम्पूर्णं प्रजाएँ सत्से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्से आई हैं ) यह श्रुति भी है। सुषुप्तिस्थानोंके विकल्प होनेपर तो कभी नाडियोंसे, कमी पुरीतत्से और कमी परमात्मासे जीवका प्रबोध होता है, ऐसा उपदेश करती, उससे भी परमात्मा ही सुषुप्ति स्थान है॥ ८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' सत आगम्य ' इत्यादि श्रुतिसे जीवका ब्रह्मसे ही उत्थान कहा गया है, कहीं भी नाड़ि आदिमें जीवके उत्थानकी अपादनता नहीं कही गई है। इससे भी ब्रह्म ही जीवका मुख्य सुषुप्ति स्थान है। सुषुप्ति में जीवके उपाधिलकी अपेक्षा ब्रह्मके साथ जीवका अभेद कहा जाता है, इससे भेद औपाधिक है || ८ ||
कर्मानुस्मृतिशब्दविध्यधिकरणम्
3.2.9 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ९
स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ३.२.९ ॥
पदच्छेद — स एव , तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः
सूत्रार्थ — ( स एव तु ) जो जीव सोता है वही उठता है, ( कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ) क्योंकि अवशेष कर्म, आत्माकी अनुस्मृति, शब्द और विधिसे ऐसा ही ज्ञात होता है।
शाङ्करभाष्य
तस्याः पुनः सत्संपत्तेः प्रतिबुध्यमानः किं य एव सत्संपन्नः स एव प्रतिबुध्यते उत स वा अन्यो वा इति चिन्त्यते। तत्र प्राप्तं तावत् अनियम इति कुतः यदा हि जलराशौ कश्चिज्जलबिन्दुः प्रक्षिप्यते जलराशिरेव स तदा भवति पुनरुद्धरणे च स एव जलबिन्दुर्भवति इति दुःसंपादम् तद्वत् सुप्तः परेणैकत्वमापन्नः संप्रसीदतीति न स एव पुनरुत्थातुमर्हति तस्मात् स एव ईश्वरो वा अन्यो वा जीवः प्रतिबुध्यते इति।।
एवं प्राप्ते इदमाह स एव तु जीवः सुप्तः स्वास्थ्यं गतः पुनरुत्तिष्ठति नान्यः कस्मात् कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः विभज्य हेतुं दर्शयिष्यामि कर्मशेषानुष्ठानदर्शनात्तावत्स एवोत्थातुमर्हति नान्यः तथा हि पूर्वेद्युरनुष्ठितस्य कर्मणः अपरेद्युः शेषमनुतिष्ठन्दृश्यते न चान्येन सामिकृतस्य कर्मणः अन्यः शेषक्रियायां प्रवर्तितुमुत्सहते अतिप्रसङ्गात् तस्मादेक एव पूर्वेद्युरपरेद्युश्च एकस्य कर्मणः कर्तेति गम्यते।
इतश्च स एवोत्तिष्ठति यत्कारणम् अतीतेऽहनि अहमदोऽद्राक्षमिति पूर्वानुभूतस्य पश्चात्स्मरणम् अन्यस्योत्थाने नोपपद्यते न ह्यन्यदृष्टम् अन्योऽनुस्मर्तुमर्हति सोऽहमस्मीति च आत्मानुस्मरणमात्मान्तरोत्थाने नावकल्पते।
शब्देभ्यश्च तस्यैवोत्थानमवगम्यते तथा हि पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैवइमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्तित इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति इत्येवमादयः शब्दाः स्वापप्रबोधाधिकारपठिता न आत्मान्तरोत्थाने सामञ्जस्यम् ईयुः।
कर्मविद्याविधिभ्यश्चैवमेवावगम्यते अन्यथा हि कर्मविद्याविधयोऽनर्थकाः स्युः अन्योत्थानपक्षे हि सुप्तमात्रो मुच्यत इत्यापद्येत एवं चेत्स्यात् वद किं कालान्तरफलेन कर्मणा विद्यया वा कृतं स्यात्।
अपि च अन्योत्थानपक्षे यदि तावच्छरीरान्तरे व्यवहरमाणो जीव उत्तिष्ठेत् तत्रत्यव्यवहारलोपप्रसङ्गः स्यात् अथ तत्र सुप्त उत्तिष्ठेत् कल्पनानर्थक्यं स्यात् यो हि यस्मिन् शरीरे सुप्तः सः तस्मिन् नोत्तिष्ठति अन्यस्मिन् शरीरे सुप्तः अन्यस्मिन्नुत्तिष्ठतीति कोऽस्यां कल्पनायां लाभः स्यात् अथ मुक्त उत्तिष्ठेत् अन्तवान्मोक्ष आपद्येत निवृत्ताविद्यस्य च पुनरुत्थानमनुपपन्नम् एतेन ईश्वरस्योत्थानं प्रत्युक्तम् नित्यनिवृत्ताविद्यत्वात्।
अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशौ च दुर्निवारावन्योत्थानपक्षे स्याताम्। तस्मात्स एवोत्तिष्ठति नान्य इति। यत्पुनरुक्तम् यथा जलराशौ प्रक्षिप्तो जलबिन्दुर्नोद्धर्तुं शक्यते एवं सति संपन्नो जीवो नोत्पतितुमर्हतीति तत्परिह्रियते युक्तं तत्र विवेककारणाभावात् जलबिन्दोरनुद्धरणम् इह तु विद्यते विवेककारणम् कर्म च अविद्या च इति वैषम्यम् दृश्यते च दुर्विवेचयोरप्यस्मज्जातीयैः क्षीरोदकयोः संसृष्टयोः हंसेन विवेचनम्।
अपि च न जीवो नाम कश्चित्परस्मादन्यो विद्यते यो जलबिन्दुरिव जलराशेः सतो विविच्येत सदेव तु उपाधिसंपर्काज्जीव इत्युपचर्यते इत्यसकृत्प्रपञ्चितम् एवं सति यावदेकोपाधिगता बन्धानुवृत्तिः तावदेकजीवव्यवहारः उपाध्यन्तरगतायां तु बन्धानुवृत्तौ जीवान्तरव्यवहारः स एवायमुपाधिः स्वापप्रबोधयोः बीजाङ्कुरन्यायेन इत्यतः स एव जीवः प्रतिबुध्यत इति युक्तम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उस सत्संपत्तिसे पुन | जागनेवाला कौन है, क्या जो सत्सम्पन्न हुआ है वही जाग्रत होता है अथवा उससे वह अन्य है? ऐसा विचार किया जाता है। पूर्वपक्षी— उसमें अनियम है, ऐसा प्राप्त होता है। किससे? इससे कि जब जलराशिमें कोई जलबिन्दु प्रक्षिप्त किया जाता है तब वह जलराशि हो हो जाता है, पुनः उद्धरण करनेपर वही जलबिन्दु है, ऐसा कहना कठिन है। उसीप्रकार सुप्त पुरुष परमात्मा के साथ एकत्वको प्राप्त हुआ अत्यन्त प्रसन्न होता है, अतः वही पुनः उत्थानके लिए युक्त नहीं है।
इसलिए वही ईश्वर अथवा अन्य जीव प्रतिबुद्ध होता है | सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं - वही जीव सुप्त - स्वास्थ्य ( स्वरूप प्राप्ति ) प्राप्तकर पुनः उठता है अन्य ' नहीं। किससे? कर्म, अनुस्मृति ( प्रत्यभिज्ञा ) शव्द और विधिसे। विभागकर हेतुको दिखलाऊँगा - कर्मशेषके अनुष्ठान दर्शनसे वही जीव उठनेके लिए युक्त है, अन्य नहीं। जैसे कि पूर्व दिनमें अनुष्ठित कर्मके अवशिष्ट अंशको दूसरे दिन अनुष्ठित करता हुआ देखा जाता है।
एकसे आधे किये गये कमंकी शेष क्रियामें अन्य प्रवृत्त होने में समर्थ नहीं है, क्योंकि अतिप्रसङ्ग है। इसलिए एक ही पूर्व और अपर ( दूसरे ) दिन एक कर्मका कर्ता है, ऐसा ज्ञात होता है।
इससे भी वही सुषुप्तिसे उठता है, क्योंकि पूर्व दिनमें ' मैंने यह देखा था ' इसप्रकार पूर्व अनुभूतका पश्चात् स्मरण अन्यके उठनेपर उपपन्न नहीं होता, कारण कि अन्यसे दृष्ट पदार्थंका अन्य अनुस्मरण करनेके लिए युक्त नहीं है | इसप्रकार ' सोऽहम् ' ( वह मैं हूँ ) इसप्रकार अपना अनुस्मरण अन्य आत्माके उठनेपर संभव नहीं है | श्रुतियोंसे भी उसका ही उत्थान अवगत होता है, क्योंकि ' पुनः प्रतिन्यायं ० ' ( पुनः जिस प्रकार आया था और जहाँसे आया था वह प्रतियोनि जीव उस जागरित स्थानको लौट जाता है ) ' इमाः सर्वाः ० ' ( इसप्रकार यह सारी प्रजा प्रतिदिन जाती हुई उस ब्रह्मलोकको नहीं जानती ) ' त इह व्याघ्रो ० ' ( वे इस लोक में व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो - जो मी [ सुषुप्ति आदि पूर्व ] हुए होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं ) इत्यादि सुषुप्ति और जागरितके प्रकरण में पठित श्रुतियाँ अन्य आत्माके उत्थान में संगत नहीं होंगी।
कर्मविधि और विद्याविधि से भी ऐसा ही अवगत होता है, अन्यथा कर्मविधि और विद्याविधि अनर्थक हो जायँगी। अन्यके उत्थान पक्षमें . सोये हुए सभी मुक्त हो जायँगे, ऐसा प्रसक्त होगा। यदि ऐसा हो तो इसका उत्तर दो कि कालान्तरमें फल देनेवाले कर्म और विद्यासे क्या प्रयोजन होगा? और अन्य उत्थान पक्षमें यदि अन्य शरीरमें व्यवहार करनेवाला जीव [ इस शरीरमें ] उठे तो वहाँपर होनेवाले व्यवहारका लोप हो जायगा।
यदि उसमें सोया हुआ उठे तो कल्पना व्यर्थ होगी, क्योंकि जो जिस शरीरमें सुप्त है वह उसमें नहीं उठता है अन्य शरीरमें सुप्त मन्यशरीरमें उठता है, तो इस कल्पनामें लाभ क्या होगा? यदि मुक्त जीव उठेगा तो अनित्य मोक्ष प्रसक्त होगा, क्योंकि निवृत्त अविद्यावालेका पुनरुत्थान अनुपपन्न है। इससे ईश्वरके उत्थानका निराकरण हुआ, क्योंकि वह नित्य निवृत्त अविद्यावाला है। अन्य उत्थानपक्षमें अकृताभ्यागम और कृतकर्मकी हानि दुर्निवार होगी, इसलिए वही उठता है अन्य नहीं।
जो यह कहा गया है कि जैसे जलराशिमें प्रक्षित जलबिन्दु निकाला नहीं जा सकता, वैसे सत् ( ब्रह्म ) में सम्पन्न हुआ जीव उठ नहीं सकता, उसका परिहार किया जाता है— विवेक ( भेद ) कारण के अभावसे वहाँ जलबिन्दुका अनुद्धरण युक्त है, परन्तु यहाँ तो विवेकके कारण कर्म और अविद्या हैं, अतः वैषम्य है। यद्यपि संसृष्ट जल और क्षोरका विवेचन हम लोगों से दुष्कर है, तो भी उनका हँससे विवेचन देखा जाता है। किञ्च जीव कोई परमात्मासे अन्य नहीं है जो जलराशिमें जलबिन्दुके समान सत्से विविक्तपृथक् किया जाय।
सद् ब्रह्म ही तो उपाधिके सम्बन्धसे जोव है, ऐसा उपचार किया जाता है। यह वार वार विस्तारसे कहा गया है। ऐसा होनेपर जबतक एक उपाधिगत बन्धको अनुवृत्ति है तब- . तक एक जीव व्यवहार होता है 1। बन्धकी अनुवृत्ति अन्य उपाधिगत होनेपर अन्य जीव व्यवहार होता है सुषुप्ति और जागरितमें वहाँ यह उपाधि बोजाङ्करन्याय से है, इसलिए वही जोव प्रतिबुद्ध होता है, यह युक्त है॥ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ब्रह्मसे जीवके उत्थानकी श्रुति होनेसे ब्रह्म ही सुषुप्तिस्थान है, यह ठीक नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिसे अन्यका भी उत्थान संभव है, अत : नाड़ी आदि सुषुप्तिस्थान हो सकते हैं। इसप्रकार ' अनियम ' आदि आक्षेप संगतिसे पूर्वपक्ष करते हैं। सिद्धान्ती - ' तस्याः ' आदिसे कहते हैं।
* अनादि अनिर्वचनीय अविद्या आदि उपाधि भेदसे कल्पित जीव वस्तुतः परमात्मा से मिन्न नहीं है, किन्तु उपाधिके उद्भव और अभिभवसे वह उद्भूत - सा और अभिभव - सा प्रतीत होता है। इसलिए उसका सुषुप्ति में उपाधिके लयसे लय और जाग्रत्में उपाधिके उद्भवसे उद्भव होता है। इस प्रकार उपाधिके उद्भवसे वही जीव उठता है। पूर्वपक्ष में तत्वज्ञान व्यर्थ है, क्योंकि सुषुप्तिसे जीवकी पुनरावृत्ति न होने से मुक्तिसिद्ध है, सिद्धान्तमें तो अज्ञात ब्रह्मरूपस्थितिका अज्ञानके बल से पूनः उत्थान अवश्यंभावी है, अतः अज्ञानकी निवृत्ति के लिए तत्त्वज्ञान अपेक्षित है॥ ९
मुग्धेऽर्ध संपत्त्यधिकरणम्
3.2.10 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १०
मुग्धेर्ऽधसंपत्तिः परिशेषात् ॥ ३.२.१० ॥
पदच्छेद — मुग्धे , अर्धसंपत्तिः , परिशेषात्
सूत्रार्थ — ( मुग्धे ) मूर्च्छावस्था में जीवकी ( अर्धसंपत्ति : ) अर्ध सुषुप्ति है, क्योंकि ( परिशेषात् ) परिशेषसे ऐसा ही ज्ञात होता है।
शाङ्करभाष्य
अस्ति मुग्धो नाम यं मूर्छित इति लौकिकाः कथयन्ति स तु किमवस्थ इति परीक्षायाम् उच्यते तिस्रस्तावदवस्थाः शरीरस्थस्य जीवस्य प्रसिद्धाः जागरितं स्वप्नः सुषुप्तमिति चतुर्थी शरीरादपसृप्तिः न तु पञ्चमी काचिदवस्था जीवस्य श्रुतौ स्मृतौ वा प्रसिद्धा अस्ति तस्माच्चतसृणामेवावस्थानामन्यतमावस्था मूर्छा इति।। एवं प्राप्ते ब्रूमः न तावन्मुग्धो जागरितावस्थो भवितुमर्हति न ह्ययमिन्द्रियैर्विषयानीक्षते।
स्यादेतत् इषुकारन्यायेन मुग्धो भविष्यति यथा इषुकारो जाग्रदपि इष्वासक्तमनस्तया नान्यान्विषयानीक्षते एवं मुग्धो मुसलसंपातादिजनितदुःखानुभवव्यग्रमनस्तया जाग्रदपि नान्यान्विषयानीक्षत इति न अचेतयमानत्वात् इषुकारो हि व्यापृतमना ब्रवीति इषुमेवाहमेतावन्तं कालमुपलभमानोऽभूवमिति मुग्धस्तु लब्धसंज्ञो ब्रवीति अन्धे तमस्यहमेतावन्तं कालं प्रक्षिप्तोऽभूवम् न किंचिन्मया चेतितमिति। जाग्रतश्चैकविषयविषक्तचेतसोऽपि देहो विध्रियते मुग्धस्य तु देहो धरण्यां पतति। तस्मान्न जागर्ति।
नापि स्वप्नान्पश्यति निःसंज्ञकत्वात्। नापि मृतः प्राणोष्मणोर्भावात् मुग्धे हि जन्तौ मृतोऽयं स्यान्न वा मृत इति संशयानाः ऊष्मास्ति नास्तीति हृदयदेशमालभन्ते निश्चयार्थम् प्राणोऽस्ति नास्तीति च नासिकादेशम् यदि प्राणोष्मणोरस्तित्वं नावगच्छन्ति ततो मृतोऽयमित्यध्यवसाय दहनायारण्यं नयन्ति अथ तु प्राणमूष्माणं वा प्रतिपद्यन्ते ततो नायं मृत इत्यध्यवसाय संज्ञालाभाय भिषज्यन्ति पुनरुत्थानाच्च न दिष्टं गतः न हि यमं गतः यमराष्ट्रात्प्रत्यागच्छति।
अस्तु तर्हि सुषुप्तः निःसंज्ञत्वात् अमृतत्वाच्च न वैलक्षण्यात् मुग्धः कदाचिच्चिरमपि नोच्छ्वसिति सवेपथुरस्य देहो भवति भयानकं च वदनम् विस्फारिते नेत्रे सुषुप्तस्तु प्रसन्नवदनस्तुल्यकालं पुनः पुनरुच्छ्वसिति निमीलिते अस्य नेत्रे भवतः न चास्य देहो वेपते पाणिपेषणमात्रेण च सुषुप्तमुत्थापयन्ति न तु मुग्धं मुद्गरघातेनापि। निमित्तभेदश्च भवति मोहस्वापयोः मुसलसंपातादिनिमित्तत्वान्मोहस्य श्रमनिमित्तत्वाच्च स्वापस्य। न च लोकेऽस्ति प्रसिद्धिः मुग्धः सुप्त इति।
परिशेषादर्धसंपत्तिर्मुग्धतेत्यवगच्छामः निःसंज्ञत्वात् संपन्नः इतरस्माच्च वैलक्षण्यादसंपन्नः इति।।
कथं पुनरर्धसंपत्तिर्मुग्धतेति शक्यते वक्तुम् यावता सुप्तं प्रति तावदुक्तं श्रुत्या सता सोम्य तदा संपन्नो भवति इतिअत्र स्तेनोऽस्तेनो भवतिनैतं सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतम् इत्यादि जीवे हि सुकृतदुष्कृतयोः प्राप्तिः सुखित्वदुःखित्वप्रत्ययोत्पादनेन भवति न च सुखित्वप्रत्ययो दुःखित्वप्रत्ययो वा सुषुप्ते विद्यते मुग्धेऽपि तौ प्रत्ययौ नैव विद्येते तस्मात् उपाध्युपशमात् सुषुप्तवन्मुग्धेऽपि कृत्स्नसंपत्तिरेव भवितुमर्हति नार्धसंपत्तिरिति।
अत्रोच्यते न ब्रूमः मुग्धेऽर्धसंपत्तिर्जीवस्य ब्रह्मणा भवतीति किं तर्हि अर्धेन सुषुप्तपक्षस्य भवति मुग्धत्वम् अर्धेनावस्थान्तरपक्षस्य इति ब्रूमः दर्शिते च मोहस्य स्वापेन साम्यवैषम्ये। द्वारं चैतत् मरणस्य यदास्य सावशेषं कर्म भवति तदा वाङ्मनसे प्रत्यागच्छतः यदा तु निरवशेषं कर्म भवति तदा प्राणोष्माणावपगच्छतः। तस्मादर्धसंपत्तिं ब्रह्मविद इच्छन्ति। यत्तूक्तम् न पञ्चमी काचिदवस्था प्रसिद्धास्तीति नैष दोषः कादाचित्कीयमवस्थेति न प्रसिद्धा स्यात्। प्रसिद्धा चैषा लोकायुर्वेदयोः।
अर्धसंपत्त्यभ्युपगमाच्च न पञ्चमी गण्यत इत्यनवद्यम्।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.२.११ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * तीन अवस्थाओंसे आत्माका विवेचन कर, अब मुच्छसे उसका विवेचन करते हैं - मूर्छा प्रसिद्ध अवस्थाओं के अन्तर्गत है अथवा उनसे भिन्न पाँचवी अवस्था है? इस प्रकार संशय होता है। उत्थित पुरुष में ' वही मैं हूँ ' इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञासे जैसे सुषुप्ति में विशेष ज्ञानका अभाव है, वैसे मूर्च्छामें भी है, इस समान लिङ्गसे मूर्छा सुषुप्ति ही है। सिद्धान्ती - प्रसिद्ध इन चार अवस्थाओंसे मूर्छा पृथक् अवस्था है। उनमेंसे प्रथम जागरितका ' न तवात् ' इत्यादि माध्यसे निवारण करते हैं। इषुकारमें इन्द्रिय जन्य ज्ञान और देह धारण आदि हैं, किन्तु मूच्छित में दोनों नहीं हैं, इसलिए इषुकार उदारहण विषम है।
* जैसे सुषुप्ति में विशेष ज्ञानका अभाव है, वैसे मूर्च्छा में भी है, इस प्रकारकी दोनों में समानता होनेपर भी लक्षणों और निमित्तोंके भेदसे इन दोनोंका परस्पर भेद है। इस तरह समानता और विलक्षणतासे मूर्च्छा आधि सुषुप्ति है। मुग्ध सुषुप्ति के सब धर्मोसे असम्पन्न होनेसे सुषुप्त नहीं है, इसी प्रकार मृतावस्थाके सब धर्मोसे रहित होने से वह मृतक भी नहीं है। इसलिए मूर्च्छा कुछ अंश में सुसुप्तिके सम होनेसे अर्धं सुषुप्ति ही है। इस पर पूर्वंसक्षी ' कथं पुनः ' इत्यादिसे शङ्का करते हैं।
* चेतना आदि रहित सुषुप्तिके आधे धर्मोके समान मूच्छित सुषुप्ति के आधे धर्मोसे सम्पन्न होता है और कंपन आदि धर्मोके साम्य होनेसे आधा मरण पक्षमें है, इस प्रकार मूर्छा अर्धसुषुप्ति कही गई है। पूर्वपक्ष में प्रसिद्ध अवस्थाओंसे पृथक् आत्माका मूर्च्छासे विवेक करनेके लिए की असिद्धि फल है, सिद्धान्तमें वह पृथक् निश्चित है॥ १०
उभयलिङ्गाधिकरणम्
3.2.11 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ११
न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ॥ ३.२.११ ॥
पदच्छेद — न , स्थानतः , अपि , परस्य , उमयलिङ्गम् , सर्वत्र , हि | पर ब्रह्ममें ( उभय
सूत्रार्थ — ( स्थानतः ) स्वभाव से अथवा उपाधिभेदसे भी ( परस्य ) लिङ्गम् ) सविशेष और निर्विशेष दो रूप उपपन्न ( न ) नहीं होते, ( हि ) क्योंकि
शाङ्करभाष्य
येन ब्रह्मणा सुषुप्त्यादिषु जीव उपाध्युपशमात्संपद्यते तस्येदानीं स्वरूपं श्रुतिवशेन निर्धार्यते। सन्त्युभयलिङ्गाः श्रुतयो ब्रह्मविषयाः सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः इत्येवमाद्याः सविशेषलिङ्गाःअस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम् इत्येवमाद्याश्च निर्विशेषलिङ्गाः। किमासु श्रुतिषु उभयलिङ्गं ब्रह्म प्रतिपत्तव्यम् उत्तान्यतरलिङ्गम् यदाप्यन्यतरलिङ्गम् तदापि सविशेषम् उत निर्विशेषम् इति मीमांस्यते। तत्र उभयलिङ्गश्रुत्यनुग्रहात् उभयलिङ्गमेव ब्रह्म इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः न तावत्स्वत एव परस्य ब्रह्मण उभयलिङ्गत्वमुपपद्यते न हि एकं वस्तु स्वत एव रूपादिविशेषोपेतं तद्विपरीतं च इत्यवधारयितुं शक्यम् विरोधात्। अस्तु तर्हि स्थानतः पृथिव्याद्युपाधियोगादिति तदपि नोपपद्यते न हि उपाधियोगादप्यन्यादृशस्य वस्तुनोऽन्यादृशः स्वभावः संभवति न हि स्वच्छः सन् स्फटिकः अलक्तकाद्युपाधियोगादस्वच्छो भवति भ्रममात्रत्वादस्वच्छताभिनिवेशस्य उपाधीनां च अविद्याप्रत्युपस्थापितत्वात्। अतश्च अन्यतरलिङ्गपरिग्रहेऽपि समस्तविशेषरहितं निर्विकल्पकमेव ब्रह्म प्रतिपत्तव्यम् न तद्विपरीतम् सर्वत्र हि ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनपरेषु वाक्येषुअशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् इत्येवमादिषु अपास्तसमस्तविशेषमेव ब्रह्म उपदिश्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — मुग्ध वह है जिसे लोग मूच्छित कहते हैं। उसकी अवस्था कौन - सी है? इस परीक्षा में कहा जाता है - शरीर में स्थित जोवको तीन अवस्थाएँ तो प्रसिद्ध हैं -- जागरित, स्वप्न और सुषुप्ति। चतुर्थ अवस्था शरीरसे उत्क्रान्ति है। जीवको कोई पाँचवीं अवस्था तो श्रुति, स्मृतिमें प्रसिद्ध नहीं है। इसलिए मूर्च्छा चार अवस्थाओं में से ही एक अवस्था है।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैंमूच्छित जागरित अवस्थावाला नहीं हो सकता, क्योंकि यह इन्द्रियोंसे विषयोंका ईक्षण नहीं करता। परन्तु यहाँ ऐसी शङ्का होती है कि मूच्छित इषुकार न्यायसे होगा, जैसे इषुकार ( बाज बनानेवाला ) जागता हुआ मी बाण में आसक्तमनवाला है, इससे अन्य विषयोंको नहीं देखता, वैसे मूसल प्रहार आदिसे उत्पन्न हुए दु : ख अनुभवसे मनके व्यग्र होनेके कारण जागता हुआ मी [ मुन्ध ] अन्य विषयोंको नहीं देखता है, ऐसा नहीं है, क्योंकि वह अचेतयमान चेतनारहित है।
किन्तु इषुकार तो व्यापृत मना होकर कहता है - मैं इतने काल पर्यन्त बाण को ही उपलब्ध करता हुआ था। मूच्छित तो चेतना प्राप्त कर कहता हैइतना समय तो मैं घोर अन्धकारमें पड़ा था मैंने कुछ भी नहीं जाना। एक विषयमें आसक्त चित्तवाले जाग्रत पुरुषका भी देह खड़ा रहता है, किन्तु मूच्छितका देह तो पृथिवीपर गिर जाता है। इसलिए मुग्ध जागता नहीं और स्वप्नों को भी नहीं देखता, क्योंकि वह चेतना रहित है।
मृतक भी नहीं है, क्योंकि उसमें प्राण और गर्मी विद्यमान हैं, मुग्ध प्राणी के विषयमें यह मर गया है अथवा नहीं मरा, इस प्रकार संशय करते हुए लोग इसमें गर्मी है कि नहीं, यह निश्चय करनेके लिए हृदय मागका स्पर्श करते हैं। प्राण है कि नहीं, इस निश्चयके लिए नासिका देशका स्पर्श करते हैं। यदि प्राण और गर्मीका अस्तित्व अनुभव नहीं करते तो यह भर गया है, ऐसा निश्चयकर उसे जलाने के लिए जंगलमें ले जाते हैं।
यदि उसमें प्राण और गर्मी प्राप्त करते हैं, तो यह मृत नहीं है, ऐसा निश्चय कर चेतना प्राप्त करने के लिए चिकित्सा करते हैं। पुनः उत्थान होनेसे मुग्ध मृत नहीं है, क्योंकि यमको प्राप्त कर पुनः यमलोक से लौटकर नहीं आता। तब मुग्ध सुषुप्त हो, क्योंकि वह चेतना रहित और अमृत ( मरा नहीं ) है। ऐसा नहीं, क्योंकि दोनोंमें वैलक्षण्य है। मुग्ध प्राणी कभी चिरकालतक उच्छ्वास नहीं लेता, उसका शरीर काँपता है, मुख भयानक और नेत्र विस्फारित होते हैं।
किन्तु सुषुप्त तो प्रसन्न वदन और समकालमें पुनः पुनः उच्छ्वास लेता है, उसके नेत्र निमोलित होते हैं, उसका शरीर काँपता नहीं है, हाथ के स्पर्शमात्रसे उसे लोग उठाते हैं। परन्तु मुग्धको तो मुद्गरके प्रहारसे मी नहीं उठा सकते। मूर्च्छा और सुषुप्ति के कारण भी भिन्न - भिन्न होते हैं, क्योंकि मूर्च्छाका मूसल प्रहार आदि निमित्त हैं और सुषुप्तिका परिश्रम आदि निमित्त हैं। और लोकमें यह प्रसिद्ध नहीं है कि मुग्ध सुप्त है, इसलिए परिशेषसे मूर्च्छा अर्धं सुषुप्ति है, ऐसा हम समझते हैं।
चेतना रहित होने से वह सम्पन्न है और सुषुप्तसे वैलक्षण्य होनेसे असम्पन्न है। परन्तु मूर्च्छा अर्धं सुषुप्ति है, यह कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य! उस समय सत्के साथ सम्पन्न होता है ) ' अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति ' ( यहाँ सुषुप्ति में चोर अचोर होता है ) और ( इस सेतुरूप आत्माका दिन - रात अतिक्रमण नहीं करते। इसे न जरा न मृत्यु, न शोक और न सुकृत अथवा दुष्कृत हो प्राप्त हो सकते हैं ) इत्यादि श्रुतिसे सुप्तके प्रति ऐसा कहा गया है।
जीवमें सुखित्व और दुःखित्व प्रतीति की उत्पत्ति से सुकृत और दुष्कृतकी प्राप्ति होती है, सुखित्व प्रत्यय अथवा दुःखित्व प्रत्यय सुषुप्तके विद्यमान नहीं हैं, इस प्रकार मुग्धमें भी वे दोनों प्रत्यय नहीं हैं। इसलिए सुषुप्तके समान मुग्धमें भी उपाधिके उपशम होने से अद्ध सम्पत्ति होती है, ऐसा हम नहीं कहते, किन्तु हम ऐसा कहते हैं कि मुग्धत्व अर्ध पक्ष में सम्पूर्ण सुषुप्ति होनी चाहिए, अधं सुषुप्ति नहीं। इस पर कहते हैं— मूर्च्छामेिं जोवकी ब्रह्मके साथ और अर्ध अन्य अवस्था पक्षमें होता है।
मूर्च्छाका सुषुप्तिसे साम्य और वैषम्य दिखलाया गया है। यह मरणका द्वार है। जब इस मूच्छितका 2 अवशेष कर्म होता है तब वाणी और मन अपने स्थान में लौट आते हैं और जब इसका अवशेष कर्म नहीं होता है तब प्राण और औष्ण्य चले जाते हैं। इसलिए ब्रह्मवेत्ता मूर्च्छाको अर्धं सुषुप्ति कहते हैं। और जो यह कहा गया है कि कोई पाँचवीं अवस्था प्रसिद्ध नहीं है। यह दोष नहीं है, क्योंकि यह अवस्था कादाचित्क होनेसे भले प्रसिद्ध न हो परन्तु लोक और आयुर्वेद ग्रन्थोंमें यह प्रसिद्ध है।
अर्ध संपत्ति स्वीकार होनेसे पाँचवीं अवस्था नहीं गिनी जाती, इसलिए कोई दोष नहीं है | १० |
सुषुप्ति आदि उपाधिके उपशान्त होनेसे जीव जिस ब्रह्मके साथ सम्पन्न होता है, अब उसका स्वरूप श्रुतिकी सामथ्यसे निर्धारित किया जाता है। ब्रह्मविषयक श्रुतियाँ दो लिङ्गवाली हैं- ' सर्व कर्मा ० ' ( समस्त विश्व इसका कर्म है, सब दोषोंसे रहित इसका काम है, सब गन्ध इसका सुखकर है, और वह सर्वरस है ) इत्यादि श्रुति सविशेष लिङ्गक है। और ' अस्थूलम ० ' ( वह न स्थूल है, न अणु है, न ह्रस्व है और न दीर्घं है ) इत्यादि श्रुति निर्वेशेष लिङ्गक है!
क्या इन श्रुतियोंमें दोनों लिङ्गवाला ब्रह्म समझना चाहिए अथवा दोनोंमें एक लिङ्गवाला? यदि दोनोंमें एक लिङ्गवाला समझा जाय तो भी क्या वह सविशेष है अथवा निर्विशेष, ऐसा विचार किया जाता है। उसमें दोनों लिङ्गवाली श्रुतियों के अनुग्रहसे दोनों लिङ्गवाला ब्रह्म समझना चाहिए। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं — परब्रह्मका स्वतः उमर्यालिङ्गत्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि स्वतः ही एक वस्तु रूप आदि विशेष युक्त और रूप आदि विशेष रहित हो, इसप्रकार विरोध होनेसे अवधारण नहीं किया जा सकता।
यदि कहो कि स्थानत : --- पृथिवी आदि उपाधिके योगसे ऐसा हो, तो वह भी उपपन्न नहीं होता, क्योंकि उपाधि योग भी अन्य प्रकारकी वस्तुका अन्य प्रकारका स्वभाव संभव नहीं है, स्वभावतः स्वच्छ होता हुआ स्फटिक अलक्तक ( लाख ) आदि उपाधिके योगसे अस्वच्छ नहीं हो जाता, उसमें अस्वच्छ का अभिनिवेश भ्रममात्र है, कारण कि उपाधियाँ अविद्यासे उपस्थापित होती हैं। अतः अन्यतर लिङ्गका परिग्रह करनेपर भी समस्त विशेषोंसे रहित निर्विशेष ही ब्रह्म समझना चाहिए उससे विपरीत नहीं।
क्योंकि ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादन परक ' अशब्दमस्पर्शम ० ' ( वह शब्दरहित, स्पर्शरहित और रूप रहित अव्यय है ) इत्यादि वाक्योंमें सर्वत्र समस्त विशेष रहित ब्रह्म ही उपदिष्ट है॥ ११
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व अधिकरणोंमें स्वप्न आदि अवस्थाओंकी उक्ति से उनसे अलिप्त स्वप्रकाश ब्रह्मात्मक उद्देश्यरूप ' त्वम् ' पदार्थका परिशोधनकर अब विधेय ' तत् ' पदार्थका परिशोधन आरम्भ करते हुए पहले उसका निर्विशेषरूप कहते हैं॥ ११
3.2.12 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १२
भेदाद् इति चेन् न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥ ३.२.१२ ॥
पदच्छेद — न भेदात् इति चेत् , न , प्रत्येकम् , अतद्वचनात्
सूत्रार्थ — सभी वेदान्त वाक्योंसे निर्विशेष ब्रह्म ही उपदिष्ट है, ( न ) यह कथन युक्त नहीं है, ( भेदात् ) क्योंकि ' चतुष्पाद् ब्रह्म ' इसप्रकार श्रुतिमें भेदका कथन है। ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो, तो नहीं, क्योंकि ( प्रत्येकम् ) प्रत्येक उपाधि में ( अतद्वचनात् ) ' यश्चायमस्यां ' इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्म अभेदका ही श्रवण है।
शाङ्करभाष्य
अथापि स्यात् यदुक्तम् निर्विकल्पमेकलिङ्गमेव ब्रह्म नास्य स्वतः स्थानतो वा उभयलिङ्गत्वमस्तीति तन्नोपपद्यते कस्मात् भेदात् भिन्ना हि प्रतिविद्यं ब्रह्मण आकारा उपदिश्यन्ते चतुष्पात् ब्रह्म षोडशकलं ब्रह्म वामनीत्वादिलक्षणं ब्रह्म त्रैलोक्यशरीरवैश्वानरशब्दोदितं ब्रह्म इत्येवंजातीयकाः तस्मात् सविशेषत्वमपि ब्रह्मणोऽभ्युपगन्तव्यम्। ननु उक्तं नोभयलिङ्गत्वं ब्रह्मणः संभवतीति अयमप्यविरोधः उपाधिकृतत्वादाकारभेदस्य अन्यथा हि निर्विषयमेव भेदशास्त्रं प्रसज्येत इति चेत् नेति ब्रूमः कस्मात् प्रत्येकमतद्वचनात् प्रत्युपाधिभेदं हि अभेदमेव ब्रह्मणः श्रावयति शास्त्रम् यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा इत्यादि। अतश्च न भिन्नाकारयोगो ब्रह्मणः शास्त्रीय इति शक्यते वक्तुम् भेदस्य उपासनार्थत्वात् अभेदे तात्पर्यात्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — मले ही ऐसा हो, परन्तु जो यह कहा गया है कि ब्रह्म निर्विशेष एक लिङ्ग ही है और वह स्वतः अथवा उपाधिसे उभय लिङ्ग नहीं है, वह उपपन्न नहीं होता, किससे भेदसे। प्रत्येक विद्या में ब्रह्मके आकार भिन्न भिन्न ही उपदेश किये जाते हैं। जैसे ' ब्रह्म चतुष्पाद है, ब्रह्म सोलह कालाओंवाला है, ब्रह्म वामनीयत्व आदिरूप है, ब्रह्म त्रैलोक्य शरीरवाला है और ब्रह्मवैश्वानर शब्दसे कथित है ' इसप्रकारके आकार ब्रह्म के उपदिष्ट हैं। इसलिए ब्रह्म सविशेष है ऐसा मी स्वीकार करना चाहिए | परन्तु यह जो कहा गया है कि ब्रह्म उमय लिङ्गवाला नहीं हो सकता। यह भी विरोध नहीं है, क्योंकि आकार भेद उपाधिकृत है, अन्यथा भेदशास्त्र निर्विषयक ही प्रसक्त होगा। सिद्धान्ती - ऐसा यदि कहो, तो नहीं, ऐसा हम कहते हैं। किससे? इससे कि प्रत्येक में ' अतद्वचन - ऐसा नहीं ' ऐसा वचन है। ' यश्चायमस्यां ० ' ( इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और शरीरमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि यह अत्मा है ) इत्यादि शास्त्र प्रत्येक उपाधि भेदमें ब्रह्म अभेदका ही श्रवण कराता है। इसलिए ब्रह्ममें भिन्न आकारका योग शास्त्रीय है, ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि भेद उपासना के लिए है और अभेद में तात्पर्य है॥ १२
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.१४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.13 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १३
अपि चैमेके ॥ ३.२.१३ ॥
पदच्छेद — अपि च , एवम् , एके
सूत्रार्थ — ( अपि च एके ) और कोई शाखाबाले ' मृत्युमाप्नोति ' ' नेह नानास्ति किञ्चन ' ( एवम् ) इस प्रकार श्रुति वाक्यसे भेदकी निन्दा पूर्वक परमात्मा के अभेदका कथन करते हैं।
शाङ्करभाष्य
अपि चैवं भेददर्शननिन्दापूर्वकमभेददर्शनमेवैके शाखिनः समामनन्ति - ' मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' ( क ० ४ | ११ ) इति। तथाऽन्येऽपि ' मोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्म मे तत् ' ( श्वे ० १।१२ ) इति समस्तत्य भोग्यभोक्तृनियन्तृलक्षणस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मैकस्वभावतामधीयते॥ १३
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इसप्रकार भेद दर्शनकी निन्दा पूर्वक अभेद दर्शनका ही कोई शाखावाले श्रवण कराते हैं-- ' मनसैवेदमाप्तव्यं ' ( मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करना चाहिए, इस ब्रह्मतत्त्वमें नाना कुछ भी नहीं है। जो पुरुष इसमें भेद - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) इसप्रकार अन्य शाखावाले भी ' भोक्ता भोग्यं ० ' ( मोक्ता [ जीव ] भोग्य [ जगत् ] और प्रेरक [ ईश्वर ] का विचार कर मेरेसे यह तीन प्रकारसे कहा हुआ वह सब ब्रह्म ही है ) इसप्रकार भोग्य, भोक्ता और नियन्तारूप सम्पूर्ण प्रपञ्च ब्रह्मक स्वरूप है, ऐसा अध्ययन करते हैं।। १३
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.१४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.14 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १४
अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ ३.२.१४ ॥
पदच्छेद — अरूपवत् एव हि तत्प्रधानत्वात्
सूत्रार्थ — ( अरूपवदेव ) रूप आदि आकार रहित ब्रह्मका ही अवधारण करना चाहिए, ( तत्प्रधानत्वात् ) क्योंकि ' अस्थूलम ' इत्यादि श्रुतिमें निर्विशेष ब्रह्म प्रधान है।
शाङ्करभाष्य
रूपाद्याकाररहितमेव हि ब्रह्म अवधारयितव्यम् न रूपादिमत् कस्मात् तत्प्रधानत्वात्अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्मदिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजःतदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः इत्येवमादीनि वाक्यानि निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मतत्त्वप्रधानानि न अर्थान्तरप्रधानानि इत्येतत्प्रतिष्ठापितम्तत्तु समन्वयात् इत्यत्र तस्मादेवंजातीयकेषु वाक्येषु यथाश्रुतं निराकारमेव ब्रह्म अवधारयितव्यम्। इतराणि तु आकारवद्ब्रह्मविषयाणि वाक्यानि न तत्प्रधानानि उपासनाविधिप्रधानानि हि तानि तेष्वसति विरोधे यथाश्रुतमाश्रयितव्यम् सति तु विरोधे तत्प्रधानानि अतत्प्रधानेभ्यो बलीयांसि भवन्ति इत्येष विनिगमनायां हेतुः येन उभयीष्वपि श्रुतिषु सतीषु अनाकारमेव ब्रह्म अवधार्यते न पुनर्विपरीतमिति।। का तर्ह्याकारवद्विषयाणां श्रुतीनां गतिः इत्यत आह
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु साकारका उपदेश करनेवाली और निराकारका उपदेश करनेवाली ब्रह्मविषयक श्रुतियोंके होनेपर निराकार ब्रह्मका ही कैसे अवधारण किया जाता है और उसके विपरीत नहीं? इसलिए इसका उत्तर कहते हैं-
रूप आदि आकार रहित ही ब्रह्मका अवधारण करना चाहिए, रूप आदिसे युक्तका नहीं, किससे? इससे कि उसकी प्रधानता है।
जैसे ' अस्थूलम ० ' ( वह न स्थूल है, न ह्रस्व है और न दीर्घं है ) ' अशब्दम ० ' ( वह शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित और अव्यय है ) ' आकाशो वै ० ' ( आकाश नाम और रूपात्मक प्रपञ्चका निर्वाहक है, वे नाम और रूप जिसके भीतर हैं वह ब्रह्म है ) ' दिव्यो ह्यमूर्त : ० ' ( वह निश्चय ही स्वयं प्रकाश, अमृत्तं, बाहर - भीतर विद्यमान तथा अज पुरुष है ) ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह यह ब्रह्म कारण रहित, कार्यरहित, विजातीय द्रव्यसे रहित और अबाह्य है, यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है ) इत्यादि वाक्य निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मतत्त्व प्रधानक हैं, अन्य अर्थ प्रधानक नहीं हैं, ऐसा ' तत्तु समन्वयात् ' इस सूत्र में प्रतिष्ठापित किया गया है।
इसलिए इसप्रकारके वाक्योंमें यथाश्रुत निराकार ब्रह्मका ही अवधारण करना चाहिए। साकार ब्रह्मविषयक अन्य वाक्य तो साकार ब्रह्म प्रधान नहीं है, वे उपासना विधि प्रधान हैं। उनके विरोध न होनेपर यथाश्रुतका आश्रय करना चाहिए। विरोध होनेपर तो तत्प्रधान - निराकार प्रधान वाक्य अतत्प्रधान- निराकार अप्रधान वाक्योंसे बलवान् होते हैं, यही विनिगमनमें हेतु है, जिससे दोनों प्रकारकी श्रुतियोंके विद्यमान होनेपर भी निराकार ब्रह्म ही अवधारित होता है, उससे विपरीत साकार ब्रह्म अवधारित नहीं होता॥ १४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * दोनों प्रकारकी श्रुतियोंके होनेपर निर्विशेष ब्रह्मके ग्रहण करनेमें ' तत्परातत्परविरोधे तत्परं बलवत् ' ( तत्पर और अवत्पर वाक्योंके विरोध होनेपर तत्पर वाक्य बलवान् होता है ) यह न्याय नियामक है। इसलिए ' अस्थूलम ' इत्यादि तत्पर- निराकार ब्रह्मपरक वाक्य ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्यादि अतत्पर - अनिराकार परक ( साकार ) वाक्योंसे बलवान् होते है। अतः नियामकके होनेसे निर्विशेष ब्रह्मका व्यवधारण करना चाहिए॥ १४
3.2.15 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १५
प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥ ३.२.१५ ॥
पदच्छेद — प्रकाशवत् , च , अवैयथ्यम् । [ क्वचित्पुस्तके ' प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ' इति पाठ : ]
सूत्रार्थ — ( प्रकाशवत् ) जैसे सूर्य आदि प्रकाश वक्र अङ्गुलि आदि उपाधि वक्र - सा प्रतीत होता है, वैसे ब्रह्म ( च ) मी पृथिवी आदि उपाधिके सम्बन्धसे तत् तत् आकार - सा हो जाता है। वह आकार उपासनाके लिए है। ( अवैयथ्यम् ) अत। साकार विषयक श्रुतियाँ व्यथं नहीं हैं।
शाङ्करभाष्य
यथा प्रकाशः सौरश्चान्द्रमसो वा वियद्व्याप्य अवतिष्ठमानः अङ्गुल्याद्युपाधिसंबन्धात् तेषु ऋजुवक्रादिभावं प्रतिपद्यमानेषु तद्भावमिव प्रतिपद्यते एवं ब्रह्मापि पृथिव्याद्युपाधिसंबन्धात् तदाकारतामिव प्रतिपद्यते तदालम्बनो ब्रह्मण आकारविशेषोपदेश उपासनार्थो न विरुध्यते एवम् अवैयर्थ्यम् आकारवद्ब्रह्मविषयाणामपि वाक्यानां भविष्यति न हि वेदवाक्यानां कस्यचिदर्थवत्त्वम् कस्यचिदनर्थवत्त्वमिति युक्तं प्रतिपत्तुम् प्रमाणत्वाविशेषात्। नन्वेवमपि यत्पुरस्तात्प्रतिज्ञातम् नोपाधियोगादप्युभयलिङ्गत्वं ब्रह्मणोऽस्तीति तद्विरुध्यते नेति ब्रूमः उपाधिनिमित्तस्य वस्तुधर्मत्वानुपपत्तेः उपाधीनां च अविद्याप्रत्युपस्थापितत्वात्। सत्यामेव च नैसर्गिक्यामविद्यायां लोकवेदव्यवहारावतार इति तत्र तत्र अवोचाम।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तब साकार ब्रह्मविषयक श्रुतियोंकी क्या गति होगी? इसपर कहते हैं—
जैसे आकाशको व्याप्त कर अवस्थित हुया सूर्य अथवा चन्द्रमाका प्रकाश अङ्गुलि आदि उपाधिके सम्बन्धसे उन अङ्गुलि बादिमें सीधा, वक्र आदि भाव प्राप्त होनेपर तद्भाव - सा प्राप्त होता है, वैसे ब्रह्म भी पृथिवी आदि उपाधिके सम्बन्धसे उसके आकारताको प्राप्त - सा होता है। उसका आलम्बन उपासनाके लिए ब्रह्ममें आकार विशेषका उपदेश विरुद्ध नहीं है। इसप्रकार आकारवद् ब्रह्मविषयक वाक्य भी प्रयोजन रहित नहीं होंगे। वेद वाक्योंमें कोई सार्थक और कोई निरर्थक है, ऐसा समझना युक्त नहीं है, क्योंकि दोनोंमें प्रमाणत्व समान है। परन्तु ऐसा माननेपर भी जो पहले प्रतिज्ञा की गई है कि उपाधि योग भी ब्रह्म उमयलिङ्ग नहीं है, वह विरुद्ध है? नहीं ऐसा हम कहते हैं— उपाधिनिमित्तक वस्तुका धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि उपाधियाँ अविद्याद्वारा उपस्थापित हैं | नैसर्गिक ( स्वाभाविक ) अविद्याके होनेपर ही लौकिक और वैदिक व्यवहारोंका अवतार होता है, ऐसा हमने तत् तत् स्थलमें कहा है।। १५
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.१९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.16 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १६
आह च तन्मात्रम् ॥ ३.२.१६ ॥
पदच्छेद — आह , च , तन्मात्रम्
सूत्रार्थ — ( च ) इसलिए ' यथा सैन्धवघनः ' इत्यादि श्रुति ( तन्मात्रम् ) निर्विशेष ब्रह्मको ( आ ) कहती है।
शाङ्करभाष्य
आह च श्रुतिः चैतन्यमात्रं विलक्षणरूपान्तररहितं निर्विशेषं ब्रह्म स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव इति। एतदुक्तं भवति नास्य आत्मनोऽन्तर्बहिर्वा चैतन्यादन्यद्रूपमस्ति चैतन्यमेव तु निरन्तरमस्य स्वरूपम् यथा सैन्धवघनस्यान्तर्बहिश्च लवणरस एव निरन्तरो भवति न रसान्तरम् तथैवेति।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.२.१७ के अनुवादके साथ है।)
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.१९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.17 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १७
दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ ३.२.१७ ॥
पदच्छेद — दर्शयति , च , अथो , अपि , स्मयंते
सूत्रार्थ — ' अयात आदेश : ' इत्यादि श्रुति निषेध मुखसे निर्विशेष ब्रह्मको ही ( दर्शयति ) दिखलाती है। ( अथो ) तथा ( स्मयते ) ' बनादिमत्परं ब्रह्म ' इत्यादि स्मृतिमें ( अपि ) भी ऐसी ही उपदेश है।
शाङ्करभाष्य
दर्शयति च श्रुतिः पररूपप्रतिषेधेनैव ब्रह्म निर्विशेषत्वात् अथात आदेशो नेति नेतिअन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधियतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह इत्येवमाद्या। बाष्कलिना च बाध्वः पृष्टः सन् अवचनेनैव ब्रह्म प्रोवाचेति श्रूयते स होवाचाधीहि भो इति स तूष्णीं बभूव तं ह द्वितीये तृतीये वा वचन उवाच ब्रूमः खलु त्वं तु न विजानासि। उपशान्तोऽयमात्मा इति। तथा स्मृतिष्वपि परप्रतिषेधेनैवोपदिश्यते ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते इत्येवमाद्यासु। तथा विश्वरूपधरो नारायणो नारदमुवाचेति स्मर्यते माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं मां ज्ञातुमर्हसि इति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' स यथा सैन्धवघनः ० ' ( जैसे लवण पिण्ड आन्तर और बाहरसे रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयी! वैसे ही यह आत्मा आन्तर - बाह्य भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है ) इसप्रकार यह श्रुति विलक्षण रूपान्तरसे रहित चैतन्यमात्र निर्विशेष ब्रह्मको कहती है। तात्पर्य यह है - इस आत्माका आन्तर अथवा बाहर चैतन्यरूपसे अन्यरूप नहीं है, किन्तु चैतन्य हो इसका निरन्तर स्वरूप है। जैसे लवण पिण्डके आन्तर और बाहर लवण रस ही निरन्तर होता है, अन्य रस नहीं होता, वैसे ही | १६ |
और ' अथात आदेशो ० ' ( इसके अनन्तर ब्रह्म मूर्त नहीं है और अमृतं मी नहीं है यह उपदेश है ) अन्यदेव ० ' ( वह विदित - कार्यसे अन्य और अविदित - कारणसे अन्य है ) और ' यतो वाचो ० ' ( जहाँसे मन सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती हैं ) इत्यादि श्रुति पररूप- आनत्मरूप प्रतिषेघसे ही ब्रह्मको दिखलाती है, क्योंकि वह निविशेषरूप है। वाष्कलिसे पूछे गये बाध्वने अवचनसे ही ब्रह्मको कहा ' स होवाच ० ' ( उसने कहा - हे भगवन् बाध्व! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिए, ऐसा पूछे जाने पर वह तूणी रहा, द्वितीय अथवा तृतीय वार पूछनेपर उसने उससे कहा- हम कह रहे हैं, किन्तु तुम उसे नहीं जान रहे हो यह बात्मा उपशान्त- द्वैतरहित है ) ऐसी श्रुति है। इसप्रकार ' ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि ० ' ( जो ज्ञेय है उसे यथावत् कहूँगा जिसे जानकर मनुष्य परमानन्दको प्राप्त होता है। वह अनादिमत् परब्रह्म न सत् - इन्द्रिय वेद्य और न असतु - परोक्ष कहा जाता है ) इत्यादि स्मृतियोंमें भी परके प्रतिषेधते हो उसका उपदेश किया जाता है। और विश्वरूप धारण करनेवाले नारायणने नारदसे कहा— ' माया ह्येषा ० ' ( हे नारद! यह माया मैंने रची है, जो कि तुम मुझे सर्वभूत गुणोंसे युक्त देखते हो इसप्रकार द्वैतयुक्त मुझे देखनेके लिए तुम योग्य नहीं हो ) ऐसी स्मृति है॥१७
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.१९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.18 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १८
अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ ३.२.१८ ॥
पदच्छेद — अतः 1 एव च , उपमा , सूर्यकादिवत्
सूत्रार्थ — ( अतएव ) क्योंकि इस चैतन्यस्वरूप आत्माका पर प्रतिषेधसे उपदेश किया जाता है, इसलिए इसकी ( सूर्यकादिवत् ) जलगत सूर्यं प्रतिबिम्बके साथ ( उपमा ) उपमा दी जाती है।
शाङ्करभाष्य
यत एव च अयमात्मा चैतन्यरूपो निर्विशेषो वाङ्मनसातीतः परप्रतिषेधोपदेश्यः अत एव च अस्योपाधिनिमित्तामपारमार्थिकीं विशेषवत्तामभिप्रेत्य जलसूर्यकादिवदित्युपमा उपादीयते मोक्षशास्त्रेषु यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन्। उपाधिना क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा इति।एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् इति चैवमादिषु।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और क्योंकि यह आत्मा चैतन्यरूप, निर्विशेष, वाणी और मनका अविषय पर द्वैत प्रतिषेधसे उपदेश्य है, इसलिए इसमें उपाधि निमित्तक अपारमार्थिक संविशेषके अभिप्रायसे ' यथा ह्ययं ० ' ( जैसे यह ज्योतिःस्वरूप सूर्यं स्वतः एक होनेपर भी भिन्न - भिन्न जलोंमें प्रतिबिम्बित होता हुआ उपाधिसे अनेक प्रकारका भासता है, वैसे ही यह स्वयं प्रकाशरूप यज आत्मा शरीरोंमें उपाधिसे अनेक भिन्नभिन्न आकाररूपसे मासता है ) और ' एक एव ० ' ( एक ही भूतात्मा प्रत्येक भूतमें अवस्थित होता हुआ जलगत चन्द्रप्रतिबिम्बके समान एकधा और अनेकधा दिखाई देता है ) इत्यादि मोक्षशास्त्रों में जलगत सूर्यं प्रतिबिम्बके समान उपमाका ग्रहण किया जाता है॥ १८
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.१९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.19 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १९
अत्र प्रत्यवस्थीयते अम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् ॥ ३.२.१९ ॥
पदच्छेद — अम्बुवत् , अग्रहणात् , तु , न , तथात्वम्
सूत्रार्थ — ( अम्बुवत् ) जैसे जलका सूयंसे पृथक् ग्रहण होता है, वैसे यहाँ उपाधिका पृथक् ( अग्रहणात् ) ग्रहण नहीं होता, इसलिए ( न तथात्वम् ) यह सूर्य दृष्टान्त युक्त नहीं है |
शाङ्करभाष्य
न जलसूर्यकादितुल्यत्वमिहोपपद्यते तद्वदग्रहणात् सूर्यादिभ्यो हि मूर्तेभ्यः पृथग्भूतं विप्रकृष्टदेशं मूर्तं जलं गृह्यते तत्र युक्तः सूर्यादिप्रतिबिम्बोदयः न तु आत्मा मूर्तः न चास्मात्पृथग्भूता विप्रकृष्टदेशाश्चोपाधयः सर्वगतत्वात् सर्वानन्यत्वाच्च। तस्मादयुक्तोऽयं दृष्टान्त इति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसमें शङ्का उठायी जाती है-
यहाँ जलगत सूर्यं प्रतिबिम्ब वादिके साथ समानता उपपन्न नहीं होती, क्योंकि आत्माका उसके समान ग्रहण नहीं होता। मूर्तं सूर्यं आदिसे पृथग्भूतं दूर देशस्थ मूर्त जल सबसे गृहीत होता है, इसलिए उसमें सूर्य आदि प्रतिबिम्बका उदय होना युक्त है। परन्तु आत्मा मूर्त नहीं है और उपाधियाँ इससे पृथग्भूत और दूर देवस्थ नहीं हैं, क्योंकि आत्मा सर्वग और सबसे अभिन्न है। इसलिए यह दृष्टान्त युक्त नहीं है।। १ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपक्षी आत्मामें उक्त दृष्टान्तकी विषमताका प्रतिपादन करते हैं -- रूपादि युक्त सूर्यका रूप आदि युक्त जल में प्रतिबिम्ब युक्त है। परन्तु आत्मा तो रूपादि रहित, सर्वगत और सनसे अभिन्न है, अत : उपाधियाँ उससे भिन्न और दूरस्थ नहीं हो सकतीं, इसलिए उसका माया द्वारा बुद्धि आदिमें प्रतिबिम्ब युक्त नहीं है॥ १ ९
3.2.20 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २०
वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवं दर्शनाच् च ॥ ३.२.२० ॥
पदच्छेद — वृद्धिह्रासभाक्त्वम् , अन्तर्भावात् उभयसामञ्जस्थात् , एवम्
सूत्रार्थ — जैसे जलगत सूर्य प्रतिबिम्ब जलगत वृद्धि और हासका भागी - सा होता है ( एवम् ) वैसे निर्विशेष ब्रह्म भी उपाधिके ( अन्तर्भावात् ) अन्तर्भाव से ( वृद्धिह समाक्त्वम् ) आधिगत वृद्धि और ह्रासका मागी - सा होता है, इस प्रकार ( उमयसामञ्जस्यात् ) दृष्टान्त और दान्तिक दोनोंमें सामञ्जस्य है।
शाङ्करभाष्य
युक्त एव तु अयं दृष्टान्तः विवक्षितांशसंभवात् न हि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः क्वचित् कंचित् विवक्षितमंशं मुक्त्वा सर्वसारूप्यं केनचित् दर्शयितुं शक्यते सर्वसारूप्ये हि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभावोच्छेद एव स्यात् न चेदं स्वमनीषया जलसूर्यकादिदृष्टान्तप्रणयनम् शास्त्रप्रणीतस्य तु अस्य प्रयोजनमात्रमुपन्यस्यते। किं पुनरत्र विवक्षितं सारूप्यमिति तदुच्यते वृद्धिह्रासभाक्त्वमिति। जलगतं हि सूर्यप्रतिबिम्बं जलवृद्धौ वर्धते जलह्रासे ह्रसति जलचलने चलति जलभेदे भिद्यते इत्येवं जलधर्मानुविधायि भवति न तु परमार्थतः सूर्यस्य तथात्वमस्ति एवं परमार्थतोऽविकृतमेकरूपमपि सत् ब्रह्म देहाद्युपाध्यन्तर्भावात् भजत इवोपाधिधर्मान्वृद्धिह्रासादीन्। एवमुभयोर्दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः सामञ्जस्यादविरोधः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यहाँ इस शङ्कका समाधान किया जाता है -
यह दृष्टान्त तो युक्त ही है, क्योंकि इसमें विवक्षितांशका संभव है। दृष्टान्त और दार्शन्तिकमें क्वचित् किञ्चित् विवक्षित अंशको छोड़कर सर्वरूपसे सादृश्य कोई भी नहीं दिखा सकता। सम्पूर्णरूप से सादृश्य होनेपर तो दृष्टान्त - दाष्टन्तिकभावका उच्छेद ही हो जायगा, और यह जल सूयंक आदि दृष्टान्त अपनी बुद्धिसे नहीं रचा गया है, किन्तु शास्त्र रचित इसके प्रयोजनमात्रका उपन्यास किया जाता है। यहाँ विवक्षित सारूप्य क्या है? उसे कहते हैं - वृद्धि और ह्रासका भागी होना सारूप्य है। जलगत सूर्यं प्रतिबिम्ब जलकी बृद्धि होनेपर बढ़ता है, जलके ह्रास होनेपर क्षीण होता है, जल के हिलने पर हिलता है, जलके भिन्न होनेपर भिन्न होता है, इस प्रकार जलके धर्मोका अनुयायी होता है, परन्तु परमार्थतः सूर्य वैसा नहीं है, वैसे परमार्थतः अविकृत, एकरूप होता हुआ भी ब्रह्म देह आदि उपाधिके अन्तर्भावसे वृद्धि और ह्रास आदि उपाधिके धर्मोंको मजता ( प्राप्त होता ) सा है। इस प्रकार दृष्टान्त और दान्तिक दोनोंके सामञ्जस्यसे अविरोध है।। २०
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.२१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.21 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २१
वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवं दर्शनाच् च ॥ ३.२.२१ ॥
पदच्छेद — दर्शनात् च
सूत्रार्थ — प्रतिबिम्बरूप देहान्तरानुप्रवेश परब्रह्मका ' पुरश्चक्रे द्विपदः ' इत्यादि श्रुतियोंमें देखा जाता है, अतः निःशेष ब्रह्म सिद्ध है।
शाङ्करभाष्य
युक्त एव तु अयं दृष्टान्तः विवक्षितांशसंभवात् न हि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः क्वचित् कंचित् विवक्षितमंशं मुक्त्वा सर्वसारूप्यं केनचित् दर्शयितुं शक्यते सर्वसारूप्ये हि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभावोच्छेद एव स्यात् न चेदं स्वमनीषया जलसूर्यकादिदृष्टान्तप्रणयनम् शास्त्रप्रणीतस्य तु अस्य प्रयोजनमात्रमुपन्यस्यते। किं पुनरत्र विवक्षितं सारूप्यमिति तदुच्यते वृद्धिह्रासभाक्त्वमिति। जलगतं हि सूर्यप्रतिबिम्बं जलवृद्धौ वर्धते जलह्रासे ह्रसति जलचलने चलति जलभेदे भिद्यते इत्येवं जलधर्मानुविधायि भवति न तु परमार्थतः सूर्यस्य तथात्वमस्ति एवं परमार्थतोऽविकृतमेकरूपमपि सत् ब्रह्म देहाद्युपाध्यन्तर्भावात् भजत इवोपाधिधर्मान्वृद्धिह्रासादीन्। एवमुभयोर्दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः सामञ्जस्यादविरोधः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' पुरश्चक्रे द्विपदः ० ' ( परमेश्वरने दो पैरोंवाले पुर- मनुष्यादि शरीर बनाये और चार पैरोंवाले पशु शरीर बनाये। पहले वह पुरुष पक्षी ( लिङ्ग शरीरी ) होकर शरीर में प्रविष्ट हुआ ) ' अनेन जीवेन ० ' ( इस जीवरूपसे प्रवेश कर ) इसप्रकार श्रुति परब्रह्मका ही देह आदि उपाधियोंमें अनुप्रवेश दिखलाती है। इसलिए ' अतएव चोपमा सूर्यकादिवत् ' यह युक्त है। इससे सिद्ध हुआ कि निर्विशेष एक लिङ्ग ( आकारवाला ) ही ब्रह्म है न उमय लिङ्गवाला है और न विपरीत लिङ्गवाला है।
यहाँ कोई दो अधिकरणोंकी कल्पना करते हैं- प्रथम तो यह कि सम्पूर्ण प्रपञ्चसे शून्य एक आकार ब्रह्म है अथवा प्रपञ्चसे युक्त अनेक आकार युक्त है। द्वितीय तो सर्व प्रपञ्च शून्य स्थित होनेपर क्या सद्रूप ब्रह्म है, वा बोधरूप है अथवा उभयरूप है? इसपर हम कहते हैं- - अन्य अधिकरणका आरम्भ सर्वथा अनर्थक है। यदि परब्रह्मका अनेक लिङ्गत्व निराकर्तव्य है . इसलिए यह प्रयास है, तो इसका ' न स्थानतोऽपि ' इस पूर्व अधिकरणसे निराकरण हो गया है, इससे ' प्रकाशवच्च ' यह अग्रिम अधिकरण व्यथं ही होगा।
ब्रह्म सद्रूप ही है ज्ञानरूप नही है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ' विज्ञानघन एव ' इत्यादि श्रुतियों में वैयथ्यं प्रसङ्ग आ जायगा। अथवा चैतन्य रहित ब्रह्म चैतन्य जीवका आत्मरूप से कैसे उपदिष्ट होगा। ब्रह्म ज्ञानरूप ही है सद्रूप नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि ' अस्तीत्येवोपलब्धव्यः ' ( है, इस प्रकार उपलब्धि करनी चाहिए ) इत्यादि श्रुतियोंका वैयथ्यं प्रसङ्ग होगा। जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसा बोध कैसे स्वीकार किया जायगा?
इस प्रकार ब्रह्म उभय लक्षण ही है, इस प्रकार भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि ' न स्थानतोऽपि इस सूत्र में पूर्व स्वीकार के साथ विरोध प्रसङ्ग होगा। सत्तासे रहित ज्ञान और ज्ञानसे रहित सत्ता से युक्त ब्रह्म है, ऐसी प्रतिज्ञा करनेवालेको पूर्व अधिकरण में प्रतिषिद्ध वही सप्रपञ्चत्व ब्रह्ममें प्रसक्त होगा अर्थात् प्रपञ्च युक्त ब्रह्म होगा। यदि कहो कि श्रुति प्रतिपादित होनेसे यह दोष नहीं है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि एकका अनेक स्वभाव नहीं हो सकता।
यदि कहो कि सत्ता ही ज्ञान है और ज्ञान ही सत्ता है, इन दोनोंकी परस्पर व्यावृत्ति नहीं है, तो मी ब्रह्म सद्रूप है वा बोध रूप है अथवा उभयरूप है? यह विकल्प निराश्रय हो जायगा। सूत्रोंकी योजना तो हमने एक अधिकरणरूपसे कर ली है। और ब्रह्मविषयक श्रुतियोंके साकार और निराकार ब्रह्मका प्रतिपादन करनेसे परस्पर विरोध होनेके कारण निराकार ब्रह्मके परिगृहीत होनेपर अन्य श्रुतियोंकी गति अवश्य कहनी चाहिए। और उस गतिके लिए ' प्रकाशवञ्च ' इत्यादि सूत्रोंका अधिक अर्थ संगत है।
जो भी कहते हैं कि साकार वादिनी श्रुतियाँ प्रपञ्च विलयद्वारा निराकार ब्रह्मके ज्ञानके लिए ही हैं उनका पृथक् प्रयोजन नहीं है, वह भी समीचीन - सा देखने में नहीं आता। कैसे?
ये जो परविद्या प्रकरणमें ' युक्ता ह्यस्य ० ' ( जैसे रथमें जुते अश्व हैं वैसे शरीररूप रथमें जोड़े हुए इसके इन्द्रियरूप अश्व शत और दश हैं, यह परमेश्वर ही हरि - इन्द्रियरूप अश्व है, यही दरा, सहस्र, अनेक और अनन्त है ) इत्यादि जो कोई विस्तारसे कहे जाते हैं, वे प्रविलयके लिए होते हैं, क्योंकि ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह यह ब्रह्म कारण रहित, कार्यं रहित विजातीय द्रव्यसे रहित और अबाह्य है ) ऐसा उपसंहार है।
परन्तु ' मनोमय : ० ' ( मनोमयः, प्राण शरीर और चैतन्यरूप है ) इत्यादि जो उपासना विधानके प्रकरणमें विस्तारसे कहे जाते हैं, वे प्रलयार्थक हों यह युक्त नहीं है, कारण कि ' स क्रतुं कुर्वीत ' ( वह ध्यान करे ) इसप्रकारकी प्रकृत गुणानामुपासनार्थत्वेऽवकल्यमाने न लक्षणया प्रविलयार्थत्वमवकल्पते। सर्वेषां च उपासना विधि के साथ उन साकार वाक्योंका सम्बन्ध है | श्रुति से अभिधावृत्तिसे इसप्रकारके गुण उपासनार्थक संभव होनेपर उनका लक्षणावृत्तिसे प्रलयार्थत्व नहीं हो सकता।
और यदि सब उपासनासाकार वाक्योंका साधारण प्रविलयार्थं माना जाय, तो ' अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ' यह विनिगमन - नियामक कारण वचन अनवकाश हो जायगा। और उनका फल भी उपदेशके अनुसार कहींपर पाप क्षय, कहीं पर ऐश्वर्य प्राप्ति और कहीं पर क्रममुक्ति इसप्रकार अवगत होता है, इसलिए उपासना वाक्यों और ब्रह्मवाक्योंकी पृथक् अर्थता ( पृथक् पृथक् अर्थ ) युक्त है, एकवाक्यता ( एकार्थवत्ता ) नहीं। इनकी एकवाक्यताकी कल्पना किसप्रकारकी जाती है यह कहना चाहिए।
यदि कहो कि प्रयाज और दर्शपूर्णभास वाक्योंके समान एक नियोगकी प्रतीति होनेसे एकवाक्यता है, तो ऐसा नहीं, क्योंकि ब्रह्मवाक्यों में नियोगका अभाव है। ब्रह्मवाक्य वस्तुमात्र पर्यवसायी हैं नियोगका उपदेश करने वाले नहीं हैं, ऐसा ' तत्तु समन्वयात् ' इस सूत्र में विस्तार से प्रतिष्ठापित किया गया है। यहाँ किविषयक नियोग अभिप्रेत है? यह कहना चाहिए, क्योंकि जो पुरुषको नियुक्त करता हुआ किसी अपने व्यापार में ' करो ' इसप्रकार नियुक्त करता है वह नियोग है।
द्वैत प्रपञ्चका प्रविलय यहाँ नियोगका विषय होंगा, क्योंकि द्वैतप्रपञ्चके प्रविलापित किये विना ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान नहीं होता, इसलिए ब्रह्मतत्त्वके ज्ञान में प्रतिबन्धकीभूत द्वैतप्रपञ्चका प्रविलापन करना चाहिए। जैसे स्वर्गकामनावालेको यागका अनुष्ठान करना चाहिए, ऐसा उपदेश किया जाता है, वैसे मुमुक्षुके लिए प्रपञ्च प्रविका उपदेश किया जाता है।
जैसे अन्धकारमें स्थित घटादि पदार्थोंको जानने की इच्छा करनेवाला उसके प्रतिबन्धकीभूत तमका प्रावलय करता है, वैसे ब्रह्मतत्त्वको जानने की इच्छा करने वालेको उस तत्त्व के प्रतिबन्धकीभूत प्रपञ्चका प्रविलय करना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मस्वभाववाला प्रपञ्च है किन्तु प्रपञ्च स्वभाववाला ब्रह्म नहीं है। इस नाम, रूप प्रपञ्च के प्रविलापन से ब्रह्मतत्त्वका बोध होता है। सि ० - हम यहाँ पूछते हैं - यह प्रपञ्च प्रविलय क्या है?
क्या जैसे अग्नि उष्णताके सम्पर्कसे घृतके काठिन्यका प्रविलय होता है, वैसे प्रपञ्चका प्रविलय करना चाहिए अथवा एक चन्द्रमामें नेत्र दोष कृत अनेक चन्द्र प्रपञ्चके समान ब्रह्ममें अविद्याकृत नामरूप प्रपञ्चका विद्यासे प्रविलय करना चाहिए | उनमें यदि कहो कि विद्यमान यह देह आदिरूप आध्यात्मिक प्रपञ्च और पृथिवी आदिरूप बाह्य प्रपञ्चका प्रविलय करना चाहिए, उसके प्रविलय करने में तो पुरुषमात्र असमर्थ है, इसलिए उसके प्रविलयका उपदेश अशक्य विषयक ही होगा।
और एक आदि मुक्त पुरुषसे पृथिवी आदिका प्रविलय किया गया होता, तो इस समय जगत् पृथिवी आदिसे शून्य होता। ऐसा यदि कहो कि एक ब्रह्ममें अविद्यासे अध्यस्त यह प्रपञ्च विद्या प्रविलापित किया जाता है, तो ' एकमेवाद्वितीयं ० ' ( एक ही अद्वितीय ब्रह्म है ) ' तत्सत्यं ० ' ( वह सत्य है, वह आत्मा है वह तू है ) इसप्रकार अविद्या से अध्यस्त प्रपञ्चके प्रत्याख्यानसे ब्रह्म ही वेदितव्यं है। उस ब्रह्मका ज्ञान होनेपर विद्या स्वयं उत्पन्न होती है और उससे अविद्याका बाध होता है।
उस अविद्या से अध्यस्त इस सम्पूर्ण नामरूपात्मक प्रपञ्चका स्वप्न प्रपञ्चके समान प्रविलय हो जाता है | ब्रह्म अविदित होनेपर ' ब्रह्मज्ञान करो ' ' प्रपञ्चका प्रविलय करो ' ऐसा शतवार कहने पर मी ब्रह्मका विज्ञान अथवा प्रपञ्चका विलय नहीं होता। परन्तु ब्रह्मके विदित होनेपर उसके ज्ञानविषयक वा प्रपञ्च प्रलयविषयक नियोग होगा। ऐसा नहीं, क्योंकि निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मतत्त्वके विज्ञानसे ही दोनों सिद्ध होते हैं।
रज्जुस्वरूपके प्रकाशसे ही रज्जुस्वरूपका ज्ञान और अविद्यासे अध्यस्त सर्प आदि प्रपञ्चका प्रविलय होता है, क्योंकि जो सिद्ध है उसको पुनः सिद्ध नहीं किया जाता। जो जीव प्रपश्चावस्था में नियोज्य अवगत होता है वह प्रपञ्च पक्षका ही है अथवा ब्रह्म पक्षका हो? प्रथम विकल्पमें प्रपञ्च रहित ब्रह्मतत्त्व के प्रतिपादनसे पृथिवी आदिके समान जीवका भी प्रविलय हो गया है, अतः किसका प्रपञ्चके प्रविलयमें नियोग कहा जाय अथवा किसको नियोगनिष्ठत्व से मोक्ष प्राप्तव्य कहा जाय।
द्वितीय विकल्प में भी अनियोज्य स्वभाव ब्रह्म ही जीवका स्वरूप है और जीवत्व तो अविद्याकृत ही है, ऐसा प्रतिपादित होनेपर ब्रह्ममें नियोज्यके अभाव होनेसे नियोगका अभाव ही है। और परविद्या के प्रकरणमें पठित ' द्रष्टव्य ' आदि शब्दोंकी भी तत्त्वके अभिमुख करने में प्रधानता है वे तत्त्वज्ञानमें विधिप्रधान नहीं हैं। लोक व्यवहार में भी ' यह देखो, यह सुनो ' इस प्रकारके निर्देशोंमें ' ' एकाग्र मन करो ' ऐसा कहा जाता है ' साक्षात् ज्ञान करो ' ऐसा नहीं कहा जाना।
ज्ञेयके अभिमुखको भी कभी ज्ञान उत्पन्न होता है और कभी नहीं उत्पन्न होता। इसलिए जो ज्ञान कराना चाहता है, उससे उस ( ज्ञानार्थी ) को ज्ञानका विषय ही दिखलाना चाहिए। उसके दिखलानेपर विषय और प्रमाणके अनुसार उसको स्वयं ही ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। अन्य प्रमाणसे अन्य प्रकारसे प्रसिद्ध अर्थमें नियुक्तको मी अन्यथाज्ञान नहीं होता। यदि ' मैं नियुक्त हूँ ' ऐसा समझकर अन्यथाज्ञान करे तो वह ज्ञान नहीं है, किन्तु वह मानसी क्रिया है। यदि स्वयं ही अन्यथा उत्पन्न हो तो वह भ्रान्ति ही होगी।
ज्ञान तो प्रमाण जन्य और यथाभूत विषयक होता है वह सौ नियोगोंसे मी नहीं कराया जा सकता, और सो प्रतिषेधोंसे भी उसका निवारण नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह पुरुषके अधीन नहीं है, वह तो वस्तुके अधीन है। इससे भी नियोगका अभाव है। और दूसरी बात यह है कि यदि वेदवाक्योंका नियोग निष्ठारूपसे पर्यवसान होता है तो जो यह स्वीकार किया गया है कि जीव अनियोज्य ब्रह्मस्वरूप है, वह अप्रमाणक हो जायगा।
यदि शास्त्र ही जीव को अनियोज्य ब्रह्मस्वरूप कहे और उसके ज्ञानमें पुरुषको नियुक्त करे, तो एक ब्रह्मशास्त्रमें दो अर्थकी प्रतिपादकता और विरुद्ध अर्थ प्रतिपादकता प्रसक्त होगी। और ब्रह्मशास्त्रका तात्पर्यं यदि नियोगमें है तो श्रुतकी हानि और अश्रुतकी कल्पना, कर्मफलके समान मोक्षफलमें अदृष्टफलत्व और अनित्यत्व आदि दोष किसीसे भी वारण नहीं किये जा सकते। इसलिए ब्रह्मवाक्य अवगति निष्ठ ही हैं नियोग निष्ठ नहीं हैं। अतः एक नियोगकी प्रतीतिसे उनको एक वाक्यता है यह कथन अयुक्त है।
और ब्रह्म वाक्योंमें नियोगका सद्भाव स्वीकार किये जानेपर भी निष्प्रपञ्च उपदेशोंमें और सप्रपञ्च उपदेशों में उसका एकत्व असिद्ध है, क्योंकि अन्य शब्द आदि प्रमाणोसे नियोगका भेद अवगत होनेपर सर्वत्र एक नियोग है, ऐसा आश्रय नहीं किया जा सकता। प्रयाजवाक्य और दर्शपूर्णमासवाक्योंमें अधिकार अंशमें अभेद होनेसे एकत्व युक्त है। परन्तु यहाँ सगुण और निर्गुण विधि वाक्योंमें एकत्वका कोई अधिकारांश नहीं है।
भारूपत्व . आदि गुण प्रपञ्चके प्रविलय करनेमें उपकारी नहीं हैं और न प्रपञ्च प्रविलय मारूपत्व आदि गुणोंका उपकारी है, क्योंकि वे परस्पर विरोधी हैं। एक घर्मी में सम्पूर्ण प्रपञ्चका प्रविलय और पञ्चके एक देशकी अपेक्षा, इन दोनोंका समावेश करना युक्त नहीं है। इसलिए साकार और निराकार उपदेशोंका हमसे कहा गया विभाग युक्ततर है॥ २१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * स्वसिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिए किसी एक देशीकी व्याख्याका ' अन्न केचिद् ' इत्यादिसे उत्थान करते हैं - वे पूर्वोक्त सूत्रोंमें दो अधिकरणोंकी कल्पला करते हैं ' न स्थानतोऽपि ( ब्रह्मसूत्र ३।२।११ ) तक इस एक अधिकरणसे ब्रह्ममें निष्प्रपञ्चत्व सिद्ध होनेपर ' ब्रह्मका क्या स्वरूप है? ऐसा सन्देह होनेपर ' प्रकाशवच्च ( ब्रह्मसूत्र ३।२।१५ ) इत्यादि द्वितीय अधिकरण प्रवृत्त हुआ। ब्रह्म केवल सद्रूप ही नहीं है, किन्तु ज्ञानरूप भी है, क्योंकि ' सत्यं ज्ञानम्, ' सदेव सोम्य ० ' इत्यादि श्रुतियाँ द्विरूप ब्रह्ममें सार्थक हैं। ' सिद्धान्त -- ' आह च तन्मात्रम् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।२।१६ ) ब्रह्म सद्रूप ही है, क्योंकि ज्ञान सत्तासे भिन्न है। इस प्रकार ' अत्र वयं वदामः ' इत्यादिसे दूसरे अधिकरणको दूषित करते हैंद्वितीय अधिकरणका क्या ब्रह्मके अनेक रूपत्वका निरास प्रयोजन है वा ज्ञानरूपत्वका निरास अथवा सत्ताका निरास? इस प्रकार विकल्प कर सर्वथा अनर्थक्यका विस्तार दिखलाते हुए प्रथम विकल्प से ' यदि तावत् ' इत्यादिसे गतार्थता कहते हैं।
* पर विद्याके प्रकरणमें ' युक्ता ह्यस्य ० ' इत्यादि आकार प्रतिपादक श्रुतियां यद्यपि प्रपञ्श्व प्रविलयद्वारा तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिए उपयुक्त हैं, क्योंकि ' तदेतद्ब्रह्म ० ' इसप्रकार उपसंहारमें निर्विशेष ब्रह्म हो प्रतिपादित है, तो भी ' मनोमयः प्राण शरीर : ' इस तरह उपासना विधानके प्रकरणर्मे पठित श्रुतियाँ प्रपञ्चके प्रविलयके लिए नहीं हो सकतीं, कारण कि ईश्वरमें अनेक इन्द्रियोंका कथन प्राणी भेदसे है। प्राणी अनन्त हैं, उनकी इन्द्रियाँ भी अनन्त हैं, ये सभी इन्द्रियाँ ईश्वरकी हैं, ऐसा मानकर ईश्वरकी अनन्त इन्द्रियाँ ' युक्ता ह्यस्य ' इत्यादि श्रुतिमें कही गई हैं। ' युक्ता ह्यस्य ' जीवभावको प्राप्त हुए ईश्वरके हरि - दश इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियाँ विषयोंका आहरण करती हैं अथवा विषय इन्द्रियोंका हरण करते हैं इसलिए हरि कहे जाते हैं।
* साकार और निराकार प्रतिपादक श्रुतियोंके विद्यमान होनेपर ब्रह्म निराकार ही है, इसमें ' अस्थूलम ' इत्यादि श्रुतियोंका निर्विशेष ब्रह्म में वालयं ही नियामक है। इसको कहने के लिए ' अरूपवदेव कि तत्प्रधानत्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।२।१४ ) यह सूत्र सार्थक होता है।
* परन्तु प्रपञ्चका प्रविलय होनेपर ब्रह्मका भी लय हो जायगा, क्योंकि दोनोंका अभेद है? ऐसा नहीं, क्योंकि कार्यका स्वरूप कारण होता है किन्तु कारणका स्वरूप कार्य नहीं होता। इसलिए कार्यका लय होनेपर कारणका लय नहीं होता। जैसे घटके लयसे मृत्तिकाका लय नहीं होता, अतः प्रपञ्चके विलय से ब्रह्मका विलय नहीं होता। किञ्च सत्य प्रपञ्चके विलयमें विधि है अथवा कल्पित प्रपञ्चके विलय में? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि सत्य वस्तुको ज्ञानसे निवृत्ति नहीं होती, कारण कि दोनों का परस्पर विरोध नहीं है, अतः माकाश ग्रसन विधिके समान इस प्रपञ्चका लय अशक्य है। इस अनादि संसार में अभी तक कोई मुक्त हुआ है कि नहीं? प्रथम पक्ष ' एकेन ' आदिसे कहते 1 द्वितीय विकल्पमें तो शुकदेव आदिके मुक्ति प्रतिपादक शास्त्र से विरोध होगा। इससे सिद्ध होता है कि सत्य प्रपञ्चकी निवृत्ति ज्ञानसे नहीं होती है।
* दूसरे विकल्पको भी ' अथाविद्याध्यस्तो ' इत्यादिसे दूषित करते हैं। ब्रह्मज्ञान और प्रपञ्च के विलय में जो विधि कहते हैं, क्या वह संज्ञात ब्रह्ममें है अथवा ज्ञात ब्रह्म में? प्रथम पक्षका ' अनावेदिते ' इत्यादि से समाधान किया गया हैं। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' आदि वेदान्त वाक्योंके श्रवणसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे ब्रह्मका साक्षात्कार और अविद्याकृत प्रपञ्चका विलय सिद्ध है। अतः पूर्व सिद्ध ब्रह्म में विधि नहीं। इस प्रकार विषयके अमावसे नियोगका अभाव कहकर अब आगे ' नियोज्योऽपि ' इत्यादिसे नियोज्यके अभावसे मो उसका अभाव कहते हैं।
** ब्रह्म वाक्योंमें नियोग स्वीकार करनेपर भी दोनों उपदेशों में एक नियोग नहीं हो सकता, क्योंकि भिन्न - भिन्न क्रिया वाचक शब्दोंसे भेद ही ज्ञात होता है। जैसे ' यजति ' ' ददाति ' वैसे प्रकृतमें ' वेद ' ' उपासीत ' यह शब्द भेद है, निर्गुण और सगुण यह रूपभेद, प्रकरण भेद, मुक्ति और मभ्युदयरूप फल भेद, इन प्रामाणोंसे निर्गुण ज्ञान और सगुण उपासना विषयक नियोग भेद सिद्ध होता है, अतः दोनों वाक्योंमें एक नियोग असिद्ध है। इसलिए ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्यादि साकार श्रुतियोंका कल्पित आकार में और उसकी उपासनासे अभ्युदय आदिकी सिद्धिमें तात्पर्य है और ' अस्थूलम ० ' इत्यादि निर्गुण श्रुतियोंका ब्रह्मात्मतत्त्व की अवगति - ज्ञानमें तात्पर्य है, अतः हमारा कहा हुआ यह विभाग ही अधिक युक्त है || २१
प्रकृतैतावत्त्वाधिकरणम्
3.2.22 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २२
प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॥ ३.२.२२ ॥
पदच्छेद — प्रकृतैतावत्त्वम् , हि , प्रतिषेधति , ततः , ब्रवीति ; च , भूयः
सूत्रार्थ — ( हि ) क्योंकि ( प्रकृतैतावत्त्वम् ) प्रकरणमें प्रतिपादित ब्रह्मके इयत्ता परिच्छिन्न मूर्त और अमूर्तरूपका ( प्रतिषेधति ) ' नेति नेति ' यह शब्द प्रतिषेध करता है | ( च ) और ( ततः ) उस प्रतिषेधसे आगे ( भूयः ) पुनः ( ब्रवीति ) ' अन्यत्परमस्ति ' इस प्रकार कहता है, इसलिए शून्यवादका प्रसङ्ग नहीं है।
शाङ्करभाष्य
द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च इत्युपक्रम्य पञ्चमहाभूतानि द्वैराश्येन प्रविभज्य अमूर्तरसस्य च पुरुषशब्दोदितस्य माहारजनादीनि रूपाणि दर्शयित्वा पुनः पठ्यते अथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्ति इति।
तत्र कोऽस्य प्रतिषेधस्य विषय इति जिज्ञासामहे न ह्यत्र इदं तदिति विशेषितं किंचित्प्रतिषेध्यमुपलभ्यते इतिशब्देन तु अत्र प्रतिषेध्यं किमपि समर्प्यतेनेति नेति इति इतिपरत्वात् नञ्प्रयोगस्य इतिशब्दश्चायं संनिहितालम्बनः एवंशब्दसमानवृत्तिः प्रयुज्यमानो दृश्यते इति ह स्मोपाध्यायः कथयति इत्येवमादिषु संनिहितं चात्र प्रकरणसामर्थ्याद्रूपद्वयं सप्रपञ्चं ब्रह्मणः तच्च ब्रह्म यस्य ते द्वे रूपे।
तत्र नः संशय उपजायते किमयं प्रतिषेधो रूपे रूपवच्च उभयमपि प्रतिषेधति आहोस्विदेकतरम् यदाप्येकतरम् तदापि किं ब्रह्म प्रतिषेधति रूपे परिशिनष्टि आहोस्विद्रूपे प्रतिषेधति ब्रह्म परिशिनष्टि इति।। तत्र प्रकृतत्वाविशेषादुभयमपि प्रतिषेधतीत्याशङ्कामहे द्वौ चैतौ प्रतिषेधौ द्विः नेतिशब्दप्रयोगात् तयोरेकेन सप्रपञ्चं ब्रह्मणो रूपं प्रतिषिध्यते अपरेण रूपवद्ब्रह्म इति भवति मतिः।
अथवा ब्रह्मैव रूपवत् प्रतिषिध्यते तद्धि वाङ्मनसातीतत्वादसंभाव्यमानसद्भावं प्रतिषेधार्हम् न तु रूपप्रपञ्चः प्रत्यक्षादिगोचरत्वात् प्रतिषेधार्हः अभ्यासस्त्वादरार्थः इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः न तावदुभयप्रतिषेध उपपद्यते शून्यवादप्रसङ्गात् कंचिद्धि परमार्थमालम्ब्य अपरमार्थः प्रतिषिध्यते यथा रज्ज्वादिषु सर्पादयः तच्च परिशिष्यमाणे कस्मिंश्चिद्भावे अवकल्पते कृत्स्नप्रतिषेधे तु कोऽन्यो भावः परिशिष्येत अपरिशिष्यमाणे चान्यस्मिन् य इतरः प्रतिषेद्धुमारभ्यते प्रतिषेद्धुमशक्यत्वात् तस्यैव परमार्थत्वापत्तेः प्रतिषेधानुपपत्तिः।
नापि ब्रह्मप्रतिषेध उपपद्यते ब्रह्म ते ब्रवाणि इत्याद्युपक्रमविरोधात्असन्नेव स भवति। असद्ब्रह्मेति वेद चेत् इत्यादिनिन्दाविरोधात्अस्तीत्येवोपलब्धव्यः इत्याद्यवधारणविरोधात् सर्ववेदान्तव्याकोपप्रसङ्गाच्च। वाङ्मनसातीतत्वमपि ब्रह्मणो न अभावाभिप्रायेणाभिधीयते न हि महता परिकरबन्धेनब्रह्मविदाप्नोति परम्सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्येवमादिना वेदान्तेषु ब्रह्म प्रतिपाद्य तस्यैव पुनः अभावोऽभिलप्येतप्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् इति हि न्यायः।
प्रतिपादनप्रक्रिया तु एषा यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह इति एतदुक्तं भवति वाङ्मनसातीतमविषयान्तःपातिप्रत्यगात्मभूतं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं ब्रह्मेति। तस्माद्ब्रह्मणो रूपप्रपञ्चं प्रतिषेधति परिशिनष्टि ब्रह्म इत्यवगन्तव्यम्।। तदेतदुच्यते प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधतीति। प्रकृतं यदेतावत् इयत्तापरिच्छिन्नं मूर्तामूर्तलक्षणं ब्रह्मणो रूपं तदेष शब्दः प्रतिषेधति। तद्धि प्रकृतं प्रपञ्चितं च पूर्वस्मिन्ग्रन्थे अधिदैवतमध्यात्मं च।
तज्जनितमेव च वासनालक्षणमपरं रूपम् अमूर्तरसभूतं पुरुषशब्दोदितं लिङ्गात्मव्यपाश्रयं माहारजनाद्युपमाभिर्दर्शितम् अमूर्तरसस्य पुरुषस्य चक्षुर्ग्राह्यरूपयोगित्वानुपपत्तेः। तदेतत् सप्रपञ्चं ब्रह्मणो रूपं संनिहितालम्बनेन इतिकरणेन प्रतिषेधकं नञं प्रति उपनीयत इति गम्यते। ब्रह्म तु रूपविशेषणत्वेन षष्ठ्या निर्दिष्टं पूर्वस्मिन्ग्रन्थे न स्वप्रधानत्वेन। प्रपञ्चिते च तदीये रूपद्वये रूपवतः स्वरूपजिज्ञासायाम् इदमुपक्रान्तम् अथात आदेशो नेति नेति इति।
तत्र कल्पितरूपप्रत्याख्यानेन ब्रह्मणः स्वरूपावेदनमिति निर्णीयते। तदास्पदं हि इदं समस्तं कार्यम्नेति नेति इति प्रतिषिद्धम्। युक्तं च कार्यस्य वाचारम्भणशब्दादिभ्योऽसत्त्वमिति नेति नेतीति प्रतिषेधनम् न तु ब्रह्मणः सर्वकल्पनामूलत्वात्।
न च अत्र इयमाशङ्का कर्तव्या कथं हि शास्त्रं स्वयमेव ब्रह्मणो रूपद्वयं दर्शयित्वा स्वयमेव पुनः प्रतिषेधति प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् इति यतः नेदं शास्त्रं प्रतिपाद्यत्वेन ब्रह्मणो रूपद्वयं निर्दिशति लोकप्रसिद्धं तु इदं रूपद्वयं ब्रह्मणि कल्पितं परामृशति प्रतिषेध्यत्वाय शुद्धब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनाय च इति निरवद्यम्। द्वौ च एतौ प्रतिषेधौ यथासंख्यन्यायेन द्वे अपि मूर्तामूर्ते प्रतिषेधतः यद्वा पूर्वः प्रतिषेधो भूतराशिं प्रतिषेधति उत्तरो वासनाराशिम्।
अथवानेति नेति इति वीप्सा इयम् इति इति यावत्किंचित् उत्प्रेक्ष्यते तत्सर्वं न भवतीत्यर्थः परिगणितप्रतिषेधे हि क्रियमाणे यदि नैतद्ब्रह्म किमन्यद्ब्रह्म भवेदिति जिज्ञासा स्यात् वीप्सायां तु सत्यां समस्तस्य विषयजातस्य प्रतिषेधात् अविषयः प्रत्यगात्मा ब्रह्मेति जिज्ञासा निवर्तते। तस्मात् प्रपञ्चमेव ब्रह्मणि कल्पितं प्रतिषेधति परिशिनष्टि ब्रह्म इति निर्णयः।। इतश्च एष एव निर्णयः यतः ततः प्रपञ्चप्रतिषेधात् भूयो ब्रह्म ब्रवीति अन्यत्परमस्ति इति।
अभावावसाने हि प्रतिषेधे क्रियमाणे किमन्यत्परमस्तीति ब्रूयात्। तत्रैषा अक्षरयोजना नेति नेति इति ब्रह्म आदिश्य तमेव आदेशं पुनर्निर्वक्ति नेति नेति इत्यस्य कोऽर्थः न हि एतस्माद्ब्रह्मणो व्यतिरिक्तमस्तीत्यतःनेति नेति इत्युच्यते न पुनः स्वयमेव नास्ति इत्यर्थः तच्च दर्शयति अन्यत्परम् अप्रतिषिद्धं ब्रह्म अस्तीति।
यदा पुनरेवमक्षराणि योज्यन्ते न हि एतस्मात्इति नइति न इति प्रपञ्चप्रतिषेधरूपात् आदेशनात् अन्यत्परमादेशनं ब्रह्मणः अस्तीति तदाततो ब्रवीति च भूयः इत्येतत् नामधेयविषयं योजयितव्यम् अथ नामधेय्त्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् इति हि ब्रवीति इति। तच्च ब्रह्मावसाने प्रतिषेधे समञ्जसं भवति अभावावसाने तु प्रतिषेधे किम्सत्यस्य सत्यम् इत्युच्येत तस्माद्ब्रह्मावसानः अयं प्रतिषेधः नाभावावसानः इत्यध्यवस्यामः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' द्वे वा ब्रह्मणो ० ' ( ब्रह्म के दो रूप हैं मूर्त और अमूर्त ) इस प्रकार उपक्रम कर पाँच महाभूत दो राशि में विभक्तकर पुरुषशब्दसे कथित अमूर्तसारके महारजन ( हरिद्रा - हल्दी के समान ) आदि रूप दिखलाकर ' अथात आदेशो ० ' ( अब इसके अनन्तर ' नेति नेति ' यह ब्रह्मका आदेश है ' नेति नेति ' इससे बढ़कर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है अतः ब्रह्म है ) इस प्रकार श्रुति पुनः कहती है। यहाँ इस प्रतिषेधका विषय ( प्रतिषेध्य ) क्या है, ऐसी हम जिज्ञासा करते हैं।
क्योंकि यहाँ ' यह वह ' ऐसा विशेषित कोई प्रतिषेध्य उपलब्ध नहीं होता। ' इति ' शब्द तो यहाँ किसी भी प्रतिषेध्यका समर्पण करता है, क्योंकि ' नेति ' नेति ' इसमें नञ् ( न ) प्रयोग ' इति ' परक है, और संनिहितका आलम्बन करनेवाला यह ' इति ' शब्द ‘ एवं ' शब्दका तुल्यार्थंक ' इति ह स्मोपाध्यायः ० ' ( ऐसा उपाध्यायने कहा ) इत्यादिमें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है। और यहाँ प्रकरणकी सामर्थ्य से प्रपञ्च युक्त ब्रह्म के दो रूप सन्निहित हैं ; जिसके ये दो रूप हैं वह ब्रह्म है।
यहाँपर हमें संशय उत्पन्न होता है- क्या यह प्रतिषेध दो रूपों और रूपवत् इन दोनोंका प्रतिषेध करता है अथवा दोनोंमें एकका? यद्यपि एकका प्रतिषेध करता है तो भी क्या ब्रह्मका प्रतिषेध करता है और दो रूपोंको अवशिष्ट रखता है, अथवा दो रूपोंका प्रतिषेव करता है और ब्रह्मको अवशिष्ट रखता है? पूर्वपक्षी - प्रकृतत्व के समान होनेसे यहाँ दोनों का प्रतिषेध करता है ऐसी हम आशङ्का करते हैं। ये दो प्रतिषेध हैं, क्योंकि ' नेति ' शब्दका दो वार प्रयोग है।
उन दो शब्दों में एकसे प्रपञ्च युक्त ब्रह्म के रूपका प्रतिषेत्र किया जाता है और दूसरेसे रूपवद् ब्रह्मका, ऐसी मति होती है, अथवा रूपवद् ब्रह्मका ही प्रतिषेध होता है, क्योंकि वाणी और मनसे अतीत होने से उसका अस्तित्व नहीं हो सकता अतः वह प्रतिषेधके योग्य है, किन्तु रूपप्रपञ्च प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों का विषय होने से प्रतिषेधके योग्य नहीं है। ' नेति नेति ' यह अभ्यास ( दो वार कथन ) तो आदरके लिए है।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं—- शून्यवादके प्रसङ्ग होनेसे दोनोंका प्रतिषेध उपपन्न नहीं होता, क्योंकि किसी परमार्थका आश्रयकर अपरमार्थका प्रतिषेध किया जाता है। जैसे रज्जु आदि - में सर्प आदिका। परन्तु वह किसी भावके परिशिष्ट होनेपर हो सकता है, किन्तु दोनों सबके प्रतिषेध होनेपर कौन अन्य भाव अवशिष्ट रहेगा?
अन्य भावके अवशिष्ट न होनेपर जिस अन्य भावका प्रतिषेध आरम्भ किया जाता है, उसका प्रतिषेध न हो सकने के कारण उसीमें परमार्थत्व प्रसक्त होनेसे प्रतिtant अनुपपत्ति है, और ब्रह्मका भी प्रतिषेध युक्त नहीं है, क्योंकि ' ब्रह्म ते ब्रवाणि ' ( मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ ) इत्यादि उपक्रमसे विरोध होता है और ' असन्नेव ० ' ( यदि पुरुष ' ब्रह्म असत् है ' ऐसा जानता है, तो वह स्वयं असत् ही हो जाता है ) इत्यादि निन्दासे विरोध होता है और ' अस्तीत्येवोपलब्धव्यः ' ( है, इसप्रकार उसकी उपलब्धि करनी चाहिए ) इत्यादि अवधारणका विरोध है और सब वेदान्तों के विरोधका प्रसङ्ग आता है।
ब्रह्म वाणी और मनका अविषय है, तो भी वह अभाव के अभिप्रायसे नहीं कहा जाता, क्योंकि ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( ब्रह्मवेत्ता परब्रह्मको प्राप्त होता है ) ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्योंसे वेदान्तोंमें महान् प्रयत्नसे ब्रह्मका प्रतिपादन कर पुन : उसीका अभाव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ' प्रक्षालनाद्धि ० ' ( कीचड़को अङ्ग में लगाकर धोनेकी अपेक्षा उसका दूरसे ही अस्पर्श श्रेष्ठ है ) ऐसा ही न्याय है।
' यतो वाचो निवर्तन्ते ० ' ( जहाँ से मन सहित वांणी उसे न पाकर लौट आती हैं ) यह तो [ ब्रह्म के ] प्रतिपादन करनेकी प्रक्रिया है। तात्पर्य यह है कि ब्रह्म वाणी और मनसे अतीत है, इससे वह विषयोंके अन्तर्भूत नहीं है, अतः प्रत्यगात्मरूप, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभाव है। इसलिए श्रुति ब्रह्मके रूपप्रपञ्चका प्रतिषेध करती है और ब्रह्मको अवशिष्ट रखती है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए।
इससे यह कहते हैं - ' प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ' प्रकृत ब्रह्मका जो इयत्तासे परिच्छिन्न मूर्त और अमूर्तरूप है उसका यह श्रुति प्रतिषेध करती है, क्योंकि उस प्रकृत अधिदैवत और अध्यात्मका पूर्वग्रन्थ में विस्तारसे वर्णन किया गया है, उससे उत्पन्न हुआ वासनालक्षण दूसरा रूप अमूर्तका सारभूत जो पुरुषशब्दसे कहा गया है और लिङ्गाव्यपाश्रय है और महारजन आदि उपमाओंसे दिखलाया गया है, क्योंकि अमूर्तका सारभूत पुरुष चक्षुसे ग्राह्यरूपसे युक्त नहीं हो सकता।
ब्रह्मका वह सप्रपञ्चरूप संनिहितका आश्रयण करनेवाले ' इति ' के द्वारा प्रतिषेधक ' नञ ' के प्रति विषय रूप से स्थापित किया जाता है, ऐसा ज्ञात होता है। ब्रह्म तो रूपके विशेषणरूप से षष्ठी द्वारा पूर्व ग्रन्थ में निर्दिष्ट है स्व प्रधानरूपसे नहीं।
उसके दो रूपों का विस्तारपूर्वक वर्णन होनेसे रूपवत् के स्वरूपकी विज्ञासा होनेपर ' अथात आदेशो नेति नेति ' ऐसा उपक्रम किया गया है | यहाँ कल्पितरूपके प्रत्याख्यान द्वारा ब्रह्मका यह स्वरूप ज्ञान है, ऐसा निर्णय होता है, क्योंकि तद्विषयक यह समस्त कार्य ' नेति नेति ' इससे प्रतिषिद्ध है, और वाचारम्भण शब्द आदिसे कार्य असत् - मिथ्या है | अतः ' नेति नेति ' इससे उसका प्रतिषेव युक्त है किन्तु ब्रह्मका नहीं, क्योंकि वह सर्वकल्पनाओंका मूल है।
यहाँ पर यह शङ्का नहीं करनी चाहिए कि स्वयं ही शास्त्र ब्रह्म के दो रूप दिखलाकर पुन। स्वयं ही ' प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ' इसप्रकार उसका प्ररिषेध कैसे करता है, क्योंकि यह शास्त्र ब्रह्म के दो रूपों का प्रतिपाद्यरूपसे निर्देश नहीं करता, किन्तु लोक प्रसिद्ध और ब्रह्ममें कल्पित इन दोनों रूपों का प्रतिषेध्यत्व और शुद्ध ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादन करनेके लिए परामर्श करता है, इसप्रकार कोई दोष नहीं है।
ये दो प्रतिषेव यथासंख्य न्यायसे मूर्त और अमूर्त दो रूपोंका प्रतिषेध करते हैं। अथवा पूर्व ( नेति ) प्रतिषेध भूतसमुदायका प्रतिषेध करता है और दूसरा प्रतिषेध वासना राशिका प्रतिषेध करता है। ' अथवा ' नेति नेति ' यह वीप्सा है, इससे जिस किसीकी कल्पनाकी जा सकती है, वह सब ब्रह्म नहीं है, ऐसा अर्थ है। क्योंकि परिगणित प्रतिषेध किये जानेपर यदि यह ब्रह्म नहीं है, तो क्या अन्य ब्रह्म है, ऐसी जिज्ञासा होगी।
और वीप्सा होनेपर तो सम्पूर्ण विषय समुदायके प्रतिषेध होनेसे प्रत्यगात्मा ब्रह्म अविषय है, इस प्रकार जान लेनेपर जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है। इसलिए यह निषेध शास्त्र ब्रह्ममें कल्पित प्रपश्वका ही प्रतिषेध करता है और ब्रह्मका परिशेष ( अवशिष्ट ) करता है, ऐसा निर्णय है। और इससे मो यही निर्णय है, क्योंकि उस प्रतिषेधसे ' अन्यत्परमस्ति ' ( अन्य ब्रवीति --- ' अन्यत्परमस्ति ' ( बृह ० २ | ३ | ६ ) इति। अभावावसाने हि प्रतिषेधे क्रियमाणे परम है ) ऐसा श्रुति पुन : कहती है।
प्रतिषेधका अभावमें पर्यवसान करनेपर तो श्रुति ' अन्यत्परमस्ति ' ऐसा क्यों कहती। यहाँ इसप्रकार अक्षर योजना है - ' नेति नेति ' इस प्रकार ब्रह्मका आदेशकर पुनः उसी आदेशका निर्वचन करती है। ' नेति नेति ' इसका क्या अर्थ है उस ब्रह्मसे अतिरिक्त कुछ नहीं है, अत : ' नेति नेति ' ऐसा कहा जाता है, ब्रह्म स्वयं ही नहीं है, ऐसा अर्थ नहीं है। मोर अन्य परम अप्रतिषिद्ध ब्रह्म है, ऐसा अवशिष्ट उस ब्रह्मको दिखलाती है।
यदि इसप्रकार अक्षरोंकी योजना की जाय कि ' नेति नेति ' यह नहीं, यह नहीं, इस उपदेश से ब्रह्म उपदिष्ट नहीं है, प्रपञ्च प्रतिषेधरूप आदेश से ' अन्यत्परमस्ति ' यह आदेश ब्रह्मका नहीं है, तो ' ततो ब्रवीति च भूय : ' इस सूत्रांशकी नाम विषयक योजना करनी चाहिए। ' सत्यस्थ सत्यमिति ० ' ( सत्यका सत्य प्राण ही सत्य है, उनका ही यह सत्य है ) इसप्रकार नामधेयको श्रुति कहती है।
और वह नामधेय, प्रतिषेधका ब्रह्म में पर्यवसान होने पर संगत होता है, और प्रतिषेधका अभाव में पर्यवसान होनेपर तो सत्यसा सत्य कौन कहा जायगा। इसलिए यह प्रतिषेधावसानक ब्रह्म है अभाव अवसानक नहीं है, ऐसा हम निश्चय करते हैं।। २२
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पृथिवी, जल और तेज ये तीन भूत मूर्त हैं। वायु और आकाश ये दो अमूर्त हैं। इस प्रकार दो राशियोंको कहकर दो अमूर्तं भूतोंका सार ' करणात्मा हिरण्यगर्भो य एष एतस्मिन्सूर्यमण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षिणि पुरुषः ' ( इस सूर्यमण्डल में जो यह इन्द्रियरूप हिरण्यगर्भ पुरुष है और दक्षिण नेत्रमें जो यह पुरुष है ) इसप्रकार पुरुष शब्दसे कहा गया है।
उसका वासनामय विचित्र स्वरूप ‘ तद्यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वादिकं यथेन्द्रगोपः ' ( बृ ० २।३।६ ) ( जैसा हल्दी में रङ्गा हुआ वस्त्र, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र, जैसा इन्द्रगोप - वीरबहूटी ) इत्यादि उपमाओंसे कहा गया है। कोई लोग श्रुतिको उपलक्षण मानकर ' सूक्ष्म पाँच भूत अमूर्त हैं और पञ्चीकृत पाँच भूत मूर्त हैं ' इससे अमूर्तोंके रस कहनेसे करणोंमें पाँच भौतिकत्वकी सिद्धि करते हैं। और यहाँ ' नेति नेति ' इस प्रतिषेधकका प्रतिषेध्य विकल्पकर माध्यमें दिखलाया गया है।
निषेव श्रुतियोंसे ब्रह्मका जो निर्विशेषरूप सिद्ध किया गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि वे तो ब्रह्मका मी निषेध करते हैं, इसप्रकार दृष्टान्त संगतिसे पूर्वपक्ष करते हैं। पूर्वपक्षोने ' नेति नेति ' से रूपवद् ब्रह्म और दो रूपोंका निषेध किया है। परन्तु निरधिष्ठानक निषेध नहीं देखा जाता, अतः सबका निषेध युक्त नहीं है। इस अरुचिसे ' अथवा ' इत्यादि से कहते हैं।
पूर्वपक्ष में ' तत्त्वमसि ' इस वाक्य स्थित ' तत् ' ( ब्रह्म ) पदार्थ के अभाव होनेसे अभेदकी असिद्धि है और सिद्धान्त में ' तत् ' पदार्थका अस्तित्व होनेसे अभेद सिद्ध है।
* उपाधिके हट जाने अथवा निषेव किये जानेपर मो उपहितका निषेध नहीं हो सकता। जैसे मुखके आगेसे दर्पण आदिके हटाये जानेपर मुखका अभाव अथवा अप्रतीति नहीं होती, वैसे ही अविद्या और अविद्यासे कल्पित प्रपञ्चके प्रतिषेध करनेपर भी उपहित ब्रह्मका अभाव वा अप्रतीति नहीं हो सकती। अतः निर्विशेष ब्रह्म श्रुति सिद्ध है।
* ' द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे ' इसप्रकार प्रधान होनेसे यहाँ दो रूप ही प्रकृत हैं, अतः उनका ही ' नेति नेति ' से प्रतिषेध है। ब्रह्म तो षष्ठी विभक्तिसे निर्दिष्ट होनेसे अप्रधान है। यदि षष्ठी विभक्तिसे निर्दिष्टका भी प्रधानरूपसे स्वीकार कर निषेध करें, तो ' राज्ञो भृत्यो नास्ति ' ( राजाका सेवक नहीं है ) यहाँपर सेवकके निषेधसे राजाका मी निषेध प्रसक्त होगा? अतः ब्रह्म निषेध्य नहीं है। शङ्का - प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे सिद्ध द्वैत्तका निषेध करनेपर उसके साथ विरोध होगा? समाधान - किन्तु मारम्भाधिकरण में प्रत्यक्ष आदिकी व्यावहारिक प्रमाणता स्थापन की गई है, पारमार्थिक नहीं, अतः ' वाचारम्भणं विकारो नामधेयं ० ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे कार्यमात्रमें मिध्यात्व सिद्ध होता है | इसलिए पारमार्थिक दृष्टिसे ही कार्यमात्र में मिध्यात्वका उपपादन कर ' नेति नेति ' इससे निषेध किया गया है। किन्तु व्यावहारिक सत्ताको लेकर प्रत्यक्ष आदिका निषेध नहीं किया जाता, अतः कोई विरोध नहीं है।
* यदि प्रपञ्च प्रतिषेधसे पृथक् ' अन्यत्परमस्ति ' यह आदेश ब्रह्मविषयक नहीं, तो ' सत्यस्यसत्यमिति ' इसप्रकार प्रश्न और प्रतिवचन अनुपपन्न होंगे और शून्यवाद प्रसक्त होगा। यदि ब्रह्म पर्यन्त प्रतिषेध माना जाय तो यह प्रश्न और प्रतिवचन संगत होते हैं। इसलिए परमार्थं सब्रह्म पर्यन्त ही प्रतिषेध मानना युक्त है।। २२
3.2.23 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २३
तदव्यक्तमाह हि ॥ ३.२.२३ ॥
पदच्छेद — तत् , अव्यक्तम् आह हि
सूत्रार्थ — ( तदव्यक्तम् ) वह ब्रह्म अव्यक्त है, ( हि ) क्योंकि ( आह ) ' न चक्षुषा गृह्यते ' इत्यादि श्रुति ऐसा कहती है।
शाङ्करभाष्य
यत्तत् प्रतिषिद्धात्प्रपञ्चजातादन्यत् परं ब्रह्म तदस्ति चेत् कस्मान्न गृह्यत इति उच्यते तत् अव्यक्तमनिन्द्रियग्राह्यम् सर्वदृश्यसाक्षित्वात्। आह हि एवं श्रुतिः न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वास एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेयत्तदद्रेश्यमग्राह्यम्यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने इत्याद्या स्मृतिरपि अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते इत्याद्या।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रतिषिद्ध प्रपञ्च समूहसे अन्य जो परब्रह्म है यदि वह है तो गृहीत क्यों नहीं होता? कहते हैंवह अव्यक्त है इन्द्रिय अग्राह्य है, क्योंकि वह सम्पूर्ण दृश्यका साक्षी है। और ' न चक्षुषा ० ' ( उस आत्मका न नेत्रसे ग्रहण किया जाता है, न वाणीसे, न अन्य इन्द्रियोंसे और न तप अथवा कर्मसे ही ) ' स एष ० ' ( नेति नेति, ऐसा कहकर मधुकाण्ड में निरूपण किया है वह आत्मा अग्राह्य है, क्योंकि उसका ग्रहण नहीं किया जाता ) ' यत्तददेश्यमग्राह्यम् ' ( यह जो अदृश्य और अग्राह्य है ) ' यदाह्येवैष ० ( जिस समय वह साधक इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वाच्य और निराधार ब्रह्म में अभय स्थिति प्राप्त करता है उस समय यह अमयको प्राप्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुति इसप्रकार कहती है। और ' अव्यक्तोऽयम् ० ' ( यह आत्मा अव्यक्त - इन्द्रियोंका अविषय, यह अचिन्त्य - मनका अविषय और यह विकार रहित कहा जाता है ) इत्यादि स्मृति भी ऐसा ही कहती है॥ २३
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.२८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.24 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २४
अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ ३.२.२४ ॥
पदच्छेद — अपि च , संराधने , प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्
सूत्रार्थ — ( अपि ) और योगी लोग उस अव्यक्त आत्माको ( संराधने ) ध्यानके समय देखते हैं, ( प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ) क्योंकि ' कश्चिद्धीरः ' ' यं विनिद्रों ' इत्यादि श्रुति और स्मृतिसे ऐसा अवगत होता है।
शाङ्करभाष्य
अपि च एनमात्मानं निरस्तसमस्तप्रपञ्चमव्यक्तं संराधनकाले पश्यन्ति योगनः संराधनं च भक्तिध्यानप्रणिधानाद्यनुष्ठानम्। कथं पुनरवगम्यते संराधनकाले पश्यन्तीति प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् श्रुतिस्मृतिभ्यामित्यर्थः। तथा हि श्रुतिः पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् इतिज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः इति चैवमाद्या। स्मृतिरपि ये विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः। ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः।। योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् इति चैवमाद्या।। ननु संराध्यसंराधकभावाभ्युपगमात्परापरात्मनोरन्यत्वं स्यादिति नेत्युच्यते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और समस्त प्रपञ्चसे शून्य, अव्यक्त इस आत्माको योगी लोग संराधन समय में देखते हैं। भक्ति, ध्यान, प्रणिधान आदिका अनुष्ठान संराधन है। परन्तु यह कैसे जाना जाता है कि योगी लोग उसे ध्यान कालमें देखते हैं? प्रत्यक्ष और अनुमानसे- श्रुति और स्मृतिसे [ ऐसा अवगत होता है ] ऐसा अर्थ है | जैसे कि ' पराञ्चि खानि ० ' ( स्वयम्भु ईश्वरने छिद्रोपलक्षित इन्द्रियोंको बहिर्मुखकर हिंसित कर दिया है, इससे जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्मा को नहीं। जिसने अमृतत्व - मोक्षकी इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियोंको रोक लिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यागात्माको देख पाता है ) और ' ज्ञानप्रसादेन ० ' ( ज्ञान प्रसादसे पुरुष विशुद्ध चित्त हो जाता है और तभी वह ध्यान करते हुए उस निष्कल आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करता है ) इत्यादि श्रुति और ' यं विनिद्रा ० ' ( निद्रारहिततमोगुण रहित, श्वासको जीतनेवाले, सन्तुष्ट और संयतेन्द्रिय पुरुष ध्यान करते हुए जिस ज्योतिको देखते हैं, उस योगलभ्य आत्माको नमस्कार है, उस सनातन भगवान्को योगी लोग सम्यग्रूपसे देखते हैं ) इत्यादि स्मृति भी है॥ २४
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.२८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.25 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २५
प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश् च कर्मण्यभ्यासात् ॥ ३.२.२५ ॥
पदच्छेद — प्रकाशादिवत् , च , अवशेष्यम् , प्रकाशः , च , कर्मणि , अभ्यासात्
सूत्रार्थ — ( प्रकाशादिवत् ) जैसे प्रकाश आदि अङ्गुलि आदि उपाधिमें मिन्न - सा प्रतीत होने पर भी वस्तुतः एकरूप है, वैसे ( प्रकाशः ) परमात्मा भी ( कर्मणि ) ध्यान आदिमें भिन्न- सा माता हुआ ( अवशेष्यम् ) वस्तुतः एक रूप है, ( अभ्यासात् ) क्योंकि ' तत्त्वमसि ' इत्यादि अभेद श्रुतिका अभ्यास है।
शाङ्करभाष्य
यथा प्रकाशाकाशसवितृप्रभृतयः अङ्गुलिकरकोदकप्रभृतिषु कर्मसु उपाधिभूतेषु सविशेषा इवावभासन्ते न च स्वाभाविकीमविशेषात्मतां जहति एवमुपाधिनिमित्त एवायमात्मभेदः स्वतस्तु ऐकात्म्यमेव। तथा हि वेदान्तेषु अभ्यासेन असकृत् जीवप्राज्ञयोरभेदः प्रतिपाद्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु संराध्य और संराधकभाव स्वीकार करनेसे पर और अपर आत्माओं में भेद हो जायगा? नहीं, ऐसा कहते हैं-
जैसे प्रकाश, आकाश, सविता आदि अङ्गुलि, कमण्डलु, जल आदि उपाधि भूत कम में विशेष मासते हैं, परन्तु अपने स्वाभाविक साधारणरूपको नहीं छोड़ते, वैसे ही यह आत्मभेद
लिङ्ग - ज्ञापक है अर्थात् अनन्त परमात्मा के साथ एक हो जाता है, क्योंकि ( तथाहि लिङ्गम् ) वैसा ही ' स यो ह वै ० ' इत्यादि श्रुति है। उपाधि निमित्तक ही है स्वतः तो एक रूप ही है, क्योंकि वेदान्त वाक्यों में अभ्याससे अनेक वार जीव और प्राज्ञका अभेद प्रतिपादित किया जाता है || २५
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.२८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.26 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २६
अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ॥ ३.२.२६ ॥
पदच्छेद — अतः , अनन्तेन , तथा , हि , लिङ्गम्
सूत्रार्थ — ( अतः ) भेदके औपाधिक होनेसे विद्यासे उसकी निवृत्ति
शाङ्करभाष्य
अतश्च स्वाभाविकत्वादभेदस्य अविद्याकृतत्वाच्च भेदस्य विद्यया अविद्यां विधूय जीवः परेण अनन्तेन प्राज्ञेन आत्मना एकतां गच्छति। तथा हि लिङ्गम् स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतिब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति इत्यादि।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इससे अभेदके स्वाभाविक होनेसे और भेदके अविद्याकृत होनेसे विद्या द्वारा अविद्याकी निवृत्तिकर जीव पर अनन्त प्राज्ञात्मा के साथ एकताको प्राप्त होता है, क्योंकि ' स यो ह बै ० ' ( जो उस परब्रह्मको जानता है वह ब्रह्म ही हो जाता है ) ' ब्रह्मैव ० ' ( ब्रह्म होकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इत्यादि लिङ्ग- ज्ञापक है।। २६
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.२८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.27 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २७
उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ॥ ३.२.२७ ॥
पदच्छेद — उभयव्यपदेशात् , तु , अहिकुण्डलवत्
सूत्रार्थ — - ( अहिकुण्डलवत् ) जैसे सर्परूपसे अभेद है और कुण्डल आदि रूपसे भेद है, वैसे ही ( उमयव्यपदेशात् ) ध्यातृ और ध्येयभावसे और ' तत्त्वमसि ' आदिसे जीव और ईश्वरमें भेद और अभेद दोनोंका व्यपदेश है। ( तु ) शब्द विलक्षणताका द्योतक है। तस्तिन्ने व संराध्यसंराधकभावे मतान्तरमुपन्यस्यति स्वमतविशुद्धये। क्वचिज्जीव-
शाङ्करभाष्य
तस्मिन्नेव संराध्यसंराधकभावे मतान्तरमुपन्यस्यति स्वमतविशुद्धये। क्वचित् जीवप्राज्ञयोर्भेदो व्यपदिश्यते ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः इति ध्यातृध्यातव्यत्वेन द्रष्टृद्रष्टव्यत्वेन चपरात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् इति गन्तृगन्तव्यत्वेनयः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति इति नियन्तृनियन्तव्यत्वेन च। क्वचित्तु तयोरेवाभेदो व्यपदिश्यते तत्त्वमसिअहं ब्रह्मास्मिएष त आत्मा सर्वान्तरःएष त आत्मान्तर्याम्यमृतः इति। तत्रैवमुभयव्यपदेशे सति यद्यभेद एव एकान्ततो गृह्यते भेदव्यपदेशो निरालम्बन एव स्यात्। अत उभयव्यपदेशदर्शनात् अहिकुण्डलवदत्र तत्त्वं भवितुमर्हति यथा अहिरित्यभेदः कुण्डलाभोगप्रांशुत्वादीनीति च भेदः एवमिहापीति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उसी संराध्य- संराधकभावमें स्वमतकी विशुद्धिके लिए अन्य मतका उपन्यास करते है | ' ततस्तु तं पश्यते ० ' ( तो उससे वह ध्यान करता हुआ उस निष्कल आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करता है ) इस तरह कहीं पर ध्यातृ - ध्यातव्यरूपसे और द्रष्टृ - द्रष्टव्यरूपसे, और ' परात्परं ० ' ( परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ) इस प्रकार कहोंपर गन्तृ - गन्तव्यरूपसे, और ' यः सर्वाणि ० ' ( जो सब भूतों का उनके अन्तर रहकर नियमन करता है ) इस प्रकार कहीं पर नियन्तृ - नियन्तव्यरूपसे जीव और परमात्माके भेदका व्यपदेश किया जाता है। और ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' ' एष त ० ' ( यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है ) और ' एष त ० ' ( वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ) इस प्रकार कहीं पर तो उन दोनों में अभेदका ही व्यपदेश किया जाता है। इस प्रकार वहाँ दोनोंके व्यपदेश होनेपर यदि एकान्तत अभेदका ही ग्रहण किया जाय तो भेद व्यपदेश निरालम्बन ही हो जायगा। अतः उमय व्यपदेशके दर्शनसे अहिकुण्डलके समान यहाँ तत्त्व होना युक्त है। जैसे ' सर्प ' इस प्रकार अभेद है और कुण्डल - वलयाकार, आभोग वक्राकार, दीर्घाकार आदि तो भेद है, वैसे यहां भी दोनोंमें जीवरूपसे भेद और ब्रह्मरूपसे अभेद है।। २७
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.२८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.28 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २८
प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥ ३.२.२८ ॥
पदच्छेद — प्रकाशाश्रयवत् , वा , तेजस्त्वात्
सूत्रार्थ — ( वा ) अथवा ( प्रकाशाश्रयवत् ) जैसे प्रकाश और उसके आश्रय सूर्यं दोनोंमें अत्यन्त भेद नहीं है, ( तेजस्त्वात् ) क्योंकि दोनोंमें तेजस्त्व समान है, वैसे जीव और ईश्वरमें मी भेद और अभेद समझना चाहिए।
शाङ्करभाष्य
अथवा प्रकाशाश्रयवदेतत्प्रतिपत्तव्यम् यथा प्रकाशः सावित्रः तदाश्रयश्च सविता नात्यन्तभिन्नौ उभयोरपि तेजस्त्वाविशेषात् अथ च भेदव्यपदेशभाजौ भवतः एवमिहापीति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अथवा प्रकाश और उसके आश्रयके समान यह समझना चाहिए। जैसे सूर्यका प्रकाश और उसका आश्रय सूर्य अत्यन्त भिन्न नहीं हैं, क्योंकि दोनोंमें भी तेजस्त्व समान है, किन्तु दोनों ही भेद व्यपदेशके भागी होते हैं, वैसे यहाँ मी समझना चाहिए॥ २८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे तेजस्त्व समान धर्मको लेकर सूर्यके प्रकाश और सूर्यमें अभेद है और प्रकाशत्व और सूर्यत्वको लेकर दोनोंमें भेद भी है, वैसे आत्मत्वको लेकर जीव और परमेश्वरमें अभेद है और जीवत्व और ईश्वरत्वको लेकर दोनोंमें भेद भी है।। २८
3.2.29 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २९
पूर्ववद्वा ॥ ३.२.२९ ॥
पदच्छेद — पूर्ववत् , वा
सूत्रार्थ — ( वा ) अथवा ( पूर्ववत् ) ' प्रकाशादिवच्चावैशेष्यम् ' इस सूत्र में पहले भेद काल्पनिक और अभेद पारमार्थिक कहा गया है, उसके समान यहाँ भी समझना चाहिए।
शाङ्करभाष्य
यथा वा पूर्वमुपन्यस्तम् प्रकाशादिव़च्चावैशेष्यम् इति तथैव एतद्भवितुमर्हति तथा हि अविद्याकृतत्वाद्बन्धस्य विद्यया मोक्ष उपपद्यते। यदि पुनः परमार्थत एव बद्धः कश्चिदात्मा अहिकुण्डलन्यायेन परस्य आत्मनः संस्थानभूतः प्रकाशाश्रयन्यायेन च एकदेशभूतोऽभ्युपगम्येत ततः पारमार्थिकस्य बन्धस्य तिरस्कर्तुमशक्यत्वात् मोक्षशास्त्रवैयर्थ्यं प्रसज्येत। न चात्र उभावपि भेदाभेदौ श्रुतिः तुल्यवद्व्यपदिशति अभेदमेव हि प्रतिपाद्यत्वेन निर्दिशति भेदं तु पूर्वप्रसिद्धमेवानुवदति अर्थान्तरविवक्षया। तस्मात्प्रकाशादिवच्चावैशेष्यमित्येष एव सिद्धान्तः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अथवा प्रकाश आदिके समान जीव और परमात्माका अभेद जैसे पूर्व में कहा गया है, वैसे ही यह होना युक्त है, क्योंकि बन्धके अविद्याकृत होनेसे विद्यासे मोक्ष उपपन्न होता है। यदि पुनः परमार्थसे ही अहिकुण्डल न्याय से परमात्माका संस्थानभूत अथवा प्रकाशाश्रय न्यायसे एक देश भूत कोई बद्ध जीवात्मा स्वीकार किया जाय, तो पारमार्थिक बन्धका तिरस्कार ( निवृत्ति ) न हो सकनेसे मोक्षशास्त्र व्यर्थं हो जायगा, और यहाँ भेद और अभेद इन दोनोंका श्रुति समानरूपसे व्यपदेश नहीं करती। श्रुति अभेदका ही प्रतिपाद्यरूपसे निर्देश करती है, और पूर्व प्रसिद्ध भेदका तो अन्य अर्थकी विवक्षासे अनुवाद करती है। इसलिए ' प्रकाशादिवच्चावैशेष्यम् ' ' प्रकाश आदिके समान अभेद है ' यही सिद्धान्त है || २ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * भेद और अभेद इन दोनों का एक स्थलमें स्वीकार करनेसे लोकमें उनकी विरोधकथा लुप्त हो जायगी, अतः श्रुतितो अभेदका ही प्रतिपाद्यरूपसे उपन्यास करती है और ब्रह्म सिद्धिकी विवक्षासे अज्ञानावस्था में लोक प्रसिद्ध भेदका अनुवादमात्र करती है।। २ ९
3.2.30 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३०
प्रतिषेधाच् च ॥ ३.२.३० ॥
पदच्छेद — प्रतिषेधात् च
सूत्रार्थ — -- ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतिसे परमात्मासे भिन्न चेतनका और ' नेति नेति ' इत्यादि श्रुतिस्रे ब्रह्म से भिन्न दृश्यमान प्रपञ्चका प्रतिषेध होनेसे अद्वितीय ब्रह्म ही अवशिष्ट है।
शाङ्करभाष्य
इतश्च एष एव सिद्धान्तः यत्कारणं परस्मादात्मनोऽन्यं चेतनं प्रतिषेधति शास्त्रम् नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इत्येवमादि।अथात आदेशो नेति नेतितदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम् इति च ब्रह्मव्यतिरिक्तप्रपञ्चनिराकरणात् ब्रह्ममात्रपरिशेषाच्च एष एव सिद्धान्त इति गम्यते।। यदेतत् निरस्तसमस्तप्रपञ्चं ब्रह्म निर्धारितम् अस्मात्परम् अन्यत्तत्त्वमस्ति नास्तीति श्रुतिविप्रतिपत्तेः संशयः। कानिचिद्धि वाक्यानि आपातेनैव प्रतिभासमानानि ब्रह्मणोऽपि परम् अन्यत्तत्त्वं प्रतिपादयन्तीव तेषां हि परिहारमभिधातुमयमुपक्रमः क्रियते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इससे भी यही सिद्धान्त है, क्योंकि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( उस परमात्मासे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि शास्त्र परमात्मासे अन्य चेतनका प्रतिषेध करता है, और ' अथात ० ' ( अब इसके अनन्तर ‘ नेति नेति ' यह ब्रह्मका आदेश है ) और ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह यह ब्रह्म कारण रहित, कार्य रहित विजातीय द्रव्यसे रहित और अबाह्य है ) इस प्रकार ब्रह्मसे व्यतिरिक्त प्रपञ्चका निराकरण होने से ब्रह्ममात्रका परिशेष होनेसे यही सिद्धान्त है, ऐसा ज्ञात होता है।। ३०
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस प्रकार निषेध वाक्योंका विचार करनेपर निष्प्रपञ्च चिदेकरस ब्रह्म ही ' तत् ' पदसे लक्षित सिद्ध होता है, यही सिद्धान्त है॥ ३०
पराधिकरणम्
3.2.31 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३१
परमतस्सेतून्मानसंबन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ॥ ३.२.३१ ॥
पदच्छेद — परम् , अतः , सेतूम्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः
सूत्रार्थ — ( अतः ) इस ब्रह्मसे ( परम् ) अन्य वस्तु है, क्योंकि ( सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेम्य : ) सेतु, उन्मान, सम्बन्ध और भेदके व्यपदेशोंसे ऐसा ज्ञात होता है।
शाङ्करभाष्य
परम् अतो ब्रह्मणः अन्यत्तत्त्वं भवितुमर्हति कुतः सेतुव्यपदेशात् उन्मानव्यपदेशात् संबन्धव्यपदेशात् भेदव्यपदेशाच्च।
सेतुव्यपदेशस्तावत् अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिः इत्यात्मशब्दाभिहितस्य ब्रह्मणः सेतुत्वं संकीर्तयति सेतुशब्दश्च हि लोके जलसंतानविच्छेदकरे मृद्दार्वादिप्रचये प्रसिद्धः इह च सेतुशब्दः आत्मनि प्रयुक्त इति लौकिकसेतोरिव आत्मसेतोरन्यस्य वस्तुनोऽस्तित्वं गमयतिसेतु तीत्र्वा इति च तरतिशब्दप्रयोगात् यथा लौकिकं सेतुं तीत्र्वा जाङ्गलमसेतुं प्राप्नोति एवमात्मानं सेतुं तीत्र्वा अनात्मानमसेतुं प्राप्नोतीति गम्यते।
उन्मानव्यपदेशश्च भवति तदेतद्ब्रह्म चतुष्पात् अष्टाशफं षोडशकलमिति यच्च लोके उन्मितम् एतावदिदमिति परिच्छिन्नं कार्षापणादि ततोऽन्यद्वस्त्वस्तीति प्रसिद्धम् तथा ब्रह्मणोऽप्युन्मानात् ततोऽन्येन वस्तुना भवितव्यमिति गम्यते। तथा संबन्धव्यपदेशो भवति सता सोम्य तदा संपन्नो भवति इति शारीर आत्माप्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तः इति च मितानां च मितेन संबन्धो दृष्टः यथा नराणां नगरेण जीवानां च ब्रह्मणा संबन्धं व्यपदिशति सुषुप्तौ अतः ततः परमन्यदमितमस्तीति गम्यते।
भेदव्यपदेशश्च एनमर्थं गमयति तथा हि अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते इत्यादित्याधारमीश्वरं व्यपदिश्य ततो भेदेन अक्ष्याधारमीश्वरं व्यपदिशति अथ य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते इति अतिदेशं च अस्य अमुना रूपादिषु करोति तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम इति सावधिकं च ईश्वरत्वमुभयोर्व्यपदिशति ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च इत्येकस्यये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां च इत्येकस्य यथा इदं मागधस्य राज्यम् इदं वैदेहस्येति।
एवमेतेभ्यः सेत्वादिव्यपदेशेभ्यो ब्रह्मणः परमस्तीति।। एवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — समस्त प्रपञ्चसे शून्य इस ब्रह्मका जो निर्धारण किया गया है, इससे भिन्न अन्य तत्त्व है कि नहीं? इस प्रकार श्रुतियोंकी विप्रतिपत्तिसे संशय होता है। आपातत : कोई प्रतिभासमान वाक्य ब्रह्मसे मीन अन्य तत्त्वका प्रतिपादन - सा करते हैं, उनका ही परिहार कहने के लिए यह उपक्रम किया जाता है। पूर्वपक्षी - इस ब्रह्मसे पर अन्य तत्त्व हो सकता है। किससे? इससे कि सेतुका व्यपदेश, उन्मानका व्यपदेश, सम्बन्धका व्यपदेश और भेदका व्यपदेश है। ' अथ य आत्मा ० ' ( जो आत्मा है वह विधारक सेतु है ) इस प्रकार सेतु व्यपदेश आत्मशब्द से अभिहित ब्रह्म सेतु है ऐसा कहता है। और लोकमें सेतु शब्द जल प्रवाहका विच्छेद करनेवाले मृत्तिका, लकड़ी आदिके समूह में प्रसिद्ध है। यहाँ तो सेतुशब्द आत्मामें प्रयुक्त है, इसलिए वह लोकिक सेतुके समान आत्मसेतु से अन्य वस्तुके अस्तित्वका ज्ञान कराता है | क्योंकि ' सेतुं तीर्त्वा ' ( सेतुको तैरकर ) इस प्रकार ' तरति ' शब्दका प्रयोग है। जैसे लौकिक सेतुको तैरकर असेतु जाङ्गल ( वायु प्रधान ) स्थल को प्राप्त होता है, वैसे ही आत्मसेतुको तैरकर असे अनात्माको प्राप्त होता है, ऐसा ज्ञात होता है।
उन्मानका मी व्यपदेश है - ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह ब्रह्म चार पाद वाला, आठखुर वाला और सोलह अवयव वाला है ) लोकमें जो उन्मित है - यह इतना है इस प्रकार परिच्छिन्न जो कार्षापण आदि है उससे अन्य वस्तु है, ऐसा प्रसिद्ध है। उसी प्रकार ब्रह्मके उन्मान से भी उससे अन्य वस्तु होनी चाहिए, ऐसा ज्ञात होता है। तथा ' सता सोम्य ० ' ( हे सोम्य!
उस समय सत्के साथ सम्पन्न होता है ) और ' शारीर आत्मा ० ' ( अन्नमय में स्थित यही आत्मा है ) ' प्राज्ञेनात्मना ० ' ( यह पुरुष प्राज्ञात्मा के साथ संसृष्ट हुआ है ) इस प्रकार सम्बन्धका व्यपदेश होता है। और मित्रों- परिच्छितों कापरिच्छिन्न के साथ सम्बन्ध देखा जाता है, जैसे मनुष्यों का नगर के साथ। और श्रुति सुषुप्ति में जीवों का ब्रह्मके साथ सम्बन्ध कहती है, इसलिए उससे यह अन्य अमित - अपरिच्छिन्न है, यह ज्ञात होता है।
भेदव्यपदेश भी इसी अर्थका बोध कराता है, क्योंकि ' अथ य एषो ० ' ( तथा यह जो आदित्य मण्डलके अन्तर्गत सुवर्णमय - सा पुरुष दिखाई देता है ) इस तरह आदित्य आधारवाले ईश्वरका व्यपदेश कर उसके अनन्तर ' अथ य एष ० ' ( तथा यह जो नेत्रोंके अन्तर्गत पुरुष दिखाई देता है ) इस प्रकार भेदसे नेत्र आधारवाले ईश्वरका व्यपदेश करती है।
और ' तस्यैतस्य ० ' ( उस इस पुरुषका वही रूप है जो उस आदित्यान्तर्गत पुरुषका रूप है, जो उसके पर्व हैं वही इसके पर्व हैं, जो उसका नाम है वही इसका भी नाम है ) इस प्रकार अक्षिस्थ पुरुषका इस आदित्यस्थ पुरुषके साथ रूप आदिमें अतिदेश करती है।
और ' ये चामुष्मात् ० ' ( जो इस आदित्य लोकसे ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंकी कामनाएँ हैं उनका शासन करता है ) इसप्रकार एकका, और ' ये चैतस्मात् ० ' ( जो इस अध्यात्म आत्मासे नीचेके लोक हैं उनका तथा मानवीय कामनाओंका शासन करता है ) इसप्रकार दूसरेका, इस तरह दोनोंका ईश्वरत्व मर्यादित व्यपदेश करती है। जैसे यह मगधका राज्य है और यह वैदेहका। इस तरह इन सेतु आदि व्यपदेशोंसे ब्रह्मसे अन्य वस्तु है || ३१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' नेति नेति ' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्म अतिरिक्त वस्तुका प्रतिषेध किया गया है, परन्तु सेतु आदि श्रुति से अन्य वस्तुका अस्तित्व प्रतीत होता है, इस प्रकार आक्षेप संगति से ' परम ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं। यद्यपि द्युभ्वाद्यधिकरणमें सेतु शब्दको गौण मानकर विधारकरूपसे उसका व्याख्यान किया . गया है, तो भी उन्मान आदि श्रुतियोंके तात्पर्यको न समझकर पूर्वपक्षी शङ्का करते हैं। इससे ब्रह्मकी सिद्धि फल है | ' ब्रह्म सद्वयं सेतुत्वात् लौकिकसेतुवत् ' ' ब्रह्म सद्वितीय है, क्योंकि है, पूर्वपक्ष में उन्मान आदि श्रुतियोंके मुख्य होने से द्वैत सिद्ध होता है। सिद्धान्तमें तो तत् पद लक्ष्य अद्वितीय जैसे लौकिक सेतु ' इस अनुमानसे ब्रह्मसे अतिरिक्त वस्तु सिद्ध होती है। और ' सेतुं तीर्त्वा ' इत्यादि श्रुति से भी ऐसा ज्ञात होता है।
• प्रकाशवत्, अनन्तवत्, ज्योतिष्मत् और आयतनवत् ये चार ब्रह्मके पाद हैं। चार दिशाएँ - कलाएँ यह प्रकाशवत् पाद है। पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यु और समुद्र यह अनन्तवानुपाद है। अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और विद्युत् यह ज्योतिष्मान् पाद है। चक्षु, श्रोत्र, वाक् और मन यह आयतनवान् पाद है | इसप्रकार ब्रह्म चतुष्पाद है। प्रत्येक पादके दो भाग होने से ब्रह्म के आठ खुर होते हैं, और प्रत्येक पादके उक्त चार - चार भाग होनेसे ब्रह्म सोलह अवयवों वाला है। जैसे सोलह पणोंका कार्षापण होता है। इसप्रकार ब्रह्म परिच्छिन्न होनेसे द्वैतसहित है, और सुषुप्ति में जीवके साथ ग्रामके समान सम्बन्धी होनेसे भी ब्रह्म द्वैतसहित है। आधारभेदसे भी वस्तुका भेद होता है। आधार, अतिदेश और अवधिरूपसे भेद तीन प्रकारका कहा गया है। नेत्र और आदित्य मण्डलंका आधाररूपसे कथन है | नेत्रस्थ पुरुषका जो नाम आदि है वही आदित्यस्थ पुरुषका है, यह अतिदेश है। इसी प्रकार एक आदित्य लोकसे ऊपरलोकों और देव कामनाओंका शासक है और दूसरा इससे नीचें लोकों और मनुष्य कामनाओंका शासक है। इसप्रकार शासकत्वकी सीमा निर्धारित है। इसतरह सेतु, सम्बन्ध, उन्मान और भेदके कथनसे ब्रह्म से मिन अन्य कोई अपरिच्छिन्न वस्तु है।। ३१
3.2.32 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३२
सामान्यात् तु ॥ ३.२.३२ ॥
पदच्छेद — सामान्यात् , तु
सूत्रार्थ — परन्तु जैसे लौकिक सेतुजलका व्यवस्थापक है, वैसे ब्रह्म जगत् मर्यादाका व्यवस्थापक है, इसप्रकार सादृश्यसे ब्रह्ममें सेतुत्व उपदिष्ट है।
शाङ्करभाष्य
तुशब्देन प्रदर्शितां प्राप्तिं निरुणद्धि। न ब्रह्मणोऽन्यत् किंचिद्भवितुमर्हति प्रमाणाभावात् न ह्यन्यस्यास्तित्वे किंचित्प्रमाणमुपलभामहे सर्वस्य हि जनिमतो वस्तुजातस्य जन्मादि ब्रह्मणो भवतीति निर्धारितम् अनन्यत्वं च कारणात् कार्यस्य न च ब्रह्मव्यतिरिक्तं किंचित् अजं संभवतिसदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् इत्यवधारणात् एकविज्ञानेन च सर्वविज्ञानप्रतिज्ञानात् न ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्त्वस्तित्वमवकल्पते।
ननु सेत्वादिव्यपदेशाः ब्रह्मव्यतिरिक्तं तत्त्वं सूचयन्तीत्युक्तम् नेत्युच्यते सेतुव्यपदेशस्तावत् न ब्रह्मणो बाह्यस्य सद्भावं प्रतिपादयितुं क्षमते सेतुरात्मेति हि आह न अतः परमस्तीति तत्र परस्मिन् असति सेतुत्वं नावकल्पत इति परं किमपि कल्प्येत न चैतत् न्याय्यम् हठो हि अप्रसिद्धकल्पना अपि च सेतुव्यपदेशादात्मनो लौकिकसेतुनिदर्शनेन सबाह्यवस्तुतां प्रसञ्जयता मृद्दारुमयतापि प्रासङ्क्ष्यत न चैतन्न्याय्यम् अजत्वादिश्रुतिविरोधात् सेतुसामान्यात्तु सेतुशब्द आत्मनि प्रयुक्त इति श्लिष्यते जगतस्तन्मर्यादानां च विधारकत्वं सेतुसामान्यमात्मनः अतः सेतुरिव सेतुः इति प्रकृत आत्मा स्तूयते।सेतुं तीत्र्वा इत्यपि तरतिः अतिक्रमासंभवात् प्राप्नोत्यर्थ एव वर्तते यथा व्याकरणं तीर्ण इति प्राप्तः उच्यते न अतिक्रान्तः तद्वत्।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.२.३३ के अनुवादके साथ है।)
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.३३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.33 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३३
बुद्ध्यर्थः पादवत् ॥ ३.२.३३ ॥
पदच्छेद — बुद्ध्यर्थं , पादवत्
सूत्रार्थ — ( पादवत् ) जैसे ब्रह्म के प्रतीक मनकी उपासना के लिए वाणी आदिकी पादरूपसे कल्पना की गई है, वैसे ' चतुष्पाद् ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतिमें उन्मानकी ( बुद्ध्यर्थः ) उपासना के लिए कल्पना की गई है।
शाङ्करभाष्य
यदप्युक्तम् उन्मानव्यपदेशादस्ति परमिति तत्राभिधीयते उन्मानव्यपदेशोऽपि न ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्त्वस्तित्वप्रतिपत्त्यर्थः किमर्थस्तर्हि बुद्ध्यर्थः उपासनार्थ इति यावत् चतुष्पादष्टाशफं षोडशकलमित्येवंरूपा बुद्धिः कथं नु नाम ब्रह्मणि स्थिरा स्यादिति विकारद्वारेण ब्रह्मण उन्मानकल्पनैव क्रियते न हि अविकारेऽनन्ते ब्रह्मणि सर्वैः पुंभिः शक्या बुद्धिः स्थापयितुम् मन्दमध्यमोत्तमबुद्धित्वात् पुंसामिति। पादवत् यथा मनआकाशयोरध्यात्ममधिदैवतं च ब्रह्मप्रतीकयोराम्नातयोः चत्वारो वागादयो मनःसंबन्धिनः पादाः कल्प्यन्ते चत्वारश्च अग्न्यादय आकाशसंबन्धिनः आध्यानाय तद्वत्। अथवा पादवदिति यथा कार्षापणे पादविभागो व्यवहारप्राचुर्याय कल्प्यते न हि सकलेनैव कार्षापणेन सर्वदा सर्वे जना व्यवहर्तुमीशते क्रयविक्रये परिमाणानियमात् तद्वदित्यर्थः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन किया जाता है-
सिद्धान्ती - तु शब्द से प्रदर्शित प्राप्तिका निरोध करते हैं - ब्रह्मसे अन्य कुछ भी नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमाणका अभाव है। अन्यके सद्भावमें हमें कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। उत्पत्तिमत् सम्पूर्ण वस्नु समुदायका जन्म आदि ब्रह्मसे होता है, ऐसा निर्धारित है। कारणसे कार्य अनन्य होता है | और ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) इस अवधारणसे ब्रह्मसे अतिरिक्त कोई अज नहीं हो सकता।
और एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा होनेके कारण ब्रह्मसे अतिरिक्त वस्तुका अस्तित्व नहीं हो सकता। परन्तु यह जो कहा गया है कि सेतु यदि व्यपदेश ब्रह्मसे अतिरिक्त तत्त्व - पदार्थको सूचित करते हैं। नहीं, ऐसा कहते हैं - सेतु - व्यपदेश तो ब्रह्मसे बाह्य वस्तुके सद्भावके प्रतिपादन करनेमें समर्थ नहीं है, क्योंकि ' सेतुरात्मा ' ( आत्मा सेतु है ) ऐसा कहा है। पुनः ' उससे अन्य है ' ऐसा नहीं कहा है।
वहाँ अन्यके न होनेपर सेतुत्व नहीं हो सकता, इससे किसी भी एक अन्यकी कल्पना करनी चाहिए, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अप्रसिद्धकी कल्पना केवल दुराग्रहमात्र है। और सेतु व्यपदेशसे लौकिक सेतु दृष्टान्तद्वारा आत्मामें सेतुसे बाह्य वस्तुका प्रसङ्ग लानेवाला मृण्मयता तथा काष्ठमयताका भी प्रसङ्ग लायेगा, परन्तु यह न्याय नहीं है, क्योंकि ' आत्मा मज है ' इत्यादि प्रतिपादक श्रुतिसे विरोध होता है। सेतु सामान्य से तो आत्मामें सेतु शब्द प्रयुक्त है, यह सङ्गत है।
जगत् और उसकी मर्यादाओंका विधारकत्व सेतु सादृश्य आत्मामें है, अतः सेतुके समान सेतु, इसप्रकार प्रकृत आत्माकी स्तुति की जाती है। ' सेतुं तीर्त्वा ० ' ( सेतु तैर कर ) इसमें मी ' तृ ' धातु अतिक्रमणरूप अर्थके सम्भव न होनेसे प्राप्तकरणरूप अर्थ में है। जैसे ' व्याकरण तैर गया ' अर्थात् व्याकरणको प्राप्त हुआ है, ऐसा कहा जाता है, अतिक्रान्त हुआ, ऐसा नहीं कहा जाता है, वैसे यहाँ भी समझना चाहिए।। २।।
यह मी जो कहा गया है कि उन्मान व्यपदेश से ब्रह्मसे अन्य है, उसपर कहते हैं - उन्मान व्यपदेश भी ब्रह्मसे अतिरिक्त वस्तुके अस्तित्वकी प्रतिपत्तिके लिए नहीं है, तो किसके लिए है? ' दुद्ध्यर्थः ' उपासनाके लिए है। चार पैरवाला, आठ खुरवाला और सोलह अवयवोंवाला इसप्रकारकी बुद्धि ब्रह्ममें किस प्रकार स्थिर होगी, इसलिए विकार द्वारा ब्रह्म में उन्मानकी कल्पना की जाती है, क्योंकि विकार रहित अनन्त ब्रह्म में सब पुरुष बुद्धिकी स्थापना करनेमें समर्थ नहीं हैं, कारण कि पुरुष मन्द, मध्यम और उत्तम बुद्धिवाले हैं। पादवत् - पादके समान। जैसे मन और आकाश जो आध्यात्म और अधिदैवत ब्रह्मके प्रतीक रूपसे श्रुतिमें पठित हैं। उसमें मन सम्बन्धी वाक् आदि चार पाद और आकाश सम्बन्धी अग्नि आदि चार पाद ध्यानके लिए कल्पित किये जाते हैं, वैसें। अथवा पादवत्पादके समान। जैसे कार्षापण में पाद- विभाग व्यवहार प्राचुर्यके लिए कल्पित किया जाता है, क्योंकि समस्त कार्षापणसे ही सभी लोग सर्वदा व्यवहार नहीं कर सकते, कारण कि क्रय और विक्रय में परिमाणका नियम नहीं है, वैसे ही, ऐसा अर्थ है।। ३३
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे ब्रह्मके अध्यात्म प्रतीक मनके वाक्, प्राण, चक्षु और श्रोत्र यह चार पाद और अधिदेव प्रतीक आकाश अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएं यह चार पाद उपासना के लिए कल्पित हैं, वैसे बुद्धि आदि उपाधि से ब्रह्म में उन्मान उपासना के लिए कल्पित है। अथवा जैसे व्यवहार के लिए कार्षापण ( मुद्रा ) में पाद - विभागकी कल्पना की जाती है, वैसे उपासना के लिए ब्रह्ममें उन्मानकी कल्पना की जाती है॥ ३३
3.2.34 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३४
स्थानविशेषात्प्रकाशादिवत् ॥ ३.२.३४ ॥
पदच्छेद — स्थानविशेषात् , प्रकाशादिवत्
सूत्रार्थ — ( प्रकाशादिवत् ) प्रकाश आदिके समान ( स्थानविशेषात् ) उपाधिके योगसे ब्रह्ममें सम्बन्ध और भेदव्यपदेश उपचरित होते हैं।
शाङ्करभाष्य
इह सूत्रे द्वयोरपि संबन्धभेदव्यपदेशयोः परिहारोऽभिधीयते। यदप्युक्तम् संबन्धव्यपदेशात् भेदव्यपदेशाच्च परमतः स्यादिति तदप्यसत् यत एकस्यापि स्थानविशेषापेक्षया एतौ व्यपदेशावुपपद्येते। संबन्धव्यपदेशे तावदयमर्थः बुद्ध्याद्युपाधिस्थानविशेषयोगादुद्भूतस्य विशेषविज्ञानस्य उपाध्युपशमे य उपशमः स परमात्मना संबन्धः इत्युपाध्यपेक्षया उपचर्यते न परिमितत्वापेक्षया। तथा भेदव्यपदेशोऽपि ब्रह्मण उपाधिभेदापेक्षयैव उपचर्यते न स्वरूपभेदापेक्षया। प्रकाशादिवदिति उपमोपादानम् यथा एकस्य प्रकाशस्य सौर्यस्य चान्द्रमसस्य वा उपाधियोगादुपजातविशेषस्य उपाध्युपशमात्संबन्धव्यपदेशो भवति उपाधिभेदाच्च भेदव्यपदेशः यथा वा सूचीपाशाकाशादिषूपाध्यपेक्षयैवैतौ संबन्धभेदव्यपदेशौ भवतः तद्वत्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इस सूत्र में सम्बन्ध व्यपदेश और भेदव्यपदेश इन दोनोंका भी परिहार कहा जाता है। यह भी जो कहा गया है कि सम्बन्धव्यदेश और भेदव्यपदेश से ब्रह्मसे अन्य होना चाहिए। वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्थानविशेषकी अपेक्षासे एक में भी ये व्यपदेश उपपन्न होते हैं। सम्बन्धव्यपदेश में यह अर्थ - अभिप्राय है- बुद्धि आदि उपाधिरूप स्थान विशेषके योगसे आविर्भूत विशेष विज्ञानका उपाधिके उपशम - लय होनेपर जो उपशम होता है वह परमात्मा के साथ सम्बन्ध है, इसप्रकार उपाधिकी अपेक्षासे उपचार किया जाता है, परिमितत्वकी अपेक्षासे नहीं है। इसप्रकार ब्रह्ममें भेदव्यपदेश भी उपाधिकी अपेक्षासे उपचरित है, स्वरूपभेदकी अपेक्षासे नहीं है। प्रकाशादिवत् -- प्रकाशादिके समान ही यहाँ भी समझना चाहिए।। ३४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ' ( छा ० ६1८1१ ) इत्यादि श्रुतिमें सम्बन्ध व्यपदेश से ब्रह्म से भिन्न वस्तु है, और ' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्यमयः पुरुषो दृश्यते ' ( छा ० १।६।६ ) इत्यादि श्रुतिमें भेदव्यपदेश से ब्रह्म से अन्य वस्तु है | ऐसा ( ब्रह्मसूत्र ३।२।३१ ) में सिद्ध किया गया है | परन्तु वह युक्त नहीं है, क्योंकि उपाधिकी अपेक्षासे दोनों व्यपदेश होते हैं॥ ३४
3.2.35 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३५
उपपत्तेश् च ॥ ३.२.३५ ॥
पदच्छेद — उपपत्तेः च
सूत्रार्थ — सम्बन्ध और भेदव्यपदेश मुख्य नहीं हैं, क्योंकि ( उपपत्तेः ) ' स्वमपीतो भवति ' इत्यादि श्रुतिसे ऐसी ही उपपत्ति होती है।
शाङ्करभाष्य
उपपद्यते च अत्र ईदृश एव संबन्धः नान्यादृशः स्वमपीतो भवति इति हि स्वरूपसंबन्धमेनमामनन्ति स्वरूपस्य च अनपायित्वात् न नरनगरन्यायेन संबन्धो घटते उपाधिकृतस्वरूपतिरोभावात्तुस्वमपीतो भवति इत्युपपद्यते। तथा भेदोऽपि नान्यादृशः संभवति बहुतरश्रुतिप्रसिद्धैकेश्वरत्वविरोधात् तथा च श्रुतिरेकस्याप्याकाशस्य स्थानकृतं भेदव्यपदेशमुपपादयति योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशःयोऽयमन्तः पुरुष आकाशःयोऽयमन्तर्हृदय आकाशः इति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और यहाँपर इसप्रकारका सम्बन्ध उपपन्न होता है अन्य प्रकारका नहीं, क्योंकि ' स्वमपीतो ति ' ( अपने को ही अपीत प्राप्त होता है ) इस प्रकार श्रुति इस स्वरूप सम्बन्धको कहती है, कारण कि स्वरूप अनिवाशी है, अतः नर - नगर न्याय से सम्बन्ध नहीं घटता। उपाधिकृत स्वरूपके तिरोभावसे ' स्वमपीतो भवति ' यह उपपन्न होता है। इसप्रकार भेद भी अन्य प्रकारका सम्भव नहीं है, क्योंकि अधिकतर श्रुतियोंसे प्रसिद्ध अद्वितीय ईश्वरत्वका विरोध होता है। और ' योऽयं बहिर्धा ο ' ( जो भी यह पुरुष - देहसे बाहर आकाश है ) ' योऽयमन्तः ० ' ( जो यह पुरुष - देहके भीतर आकाश है ) और ' योऽयम ० ' ( जो यह हृदयके आन्तर आकाश है ) इसप्रकार श्रुति एक आकाशमें भी स्थानकृत भेद व्यपदेशका उपपादन करती है।। ३५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' स्वमपीतो भवति ' इस श्रुतिसे जीव और ब्रह्मका स्वरूप सम्बन्ध होता है। वस्तुतः जीव ब्रह्म ही हैं, अत : उपाधि कृत जीवस्वरूपके लयसे यह सम्बन्ध भी उपचरित होता है। जैसे एक आकाशमें उपाधिकृत भेदव्यपदेश है, वैसे ही एक ब्रह्ममें भी बुद्धि आदि उपाधिकृत भेदव्यपदेश है, अतः दोनों मुख्य नहीं हैं।। ३५
3.2.36 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३६
तथान्यप्रतिषेधात् ॥ ३.२.३६ ॥
पदच्छेद — तथा , अन्य प्रतिषेधात्
सूत्रार्थ — जैसे सेतुत्व आदि व्यपदेशोंसे अन्य वस्तुकी अप्रतिपत्ति है, ( तथा ) वैसे ही ' आत्मैवाघस्तात् ' इत्यादि श्रुति वाक्योंसे ( अन्यप्रतिषेधात् ) अन्य वस्तुके प्रतिषेध होनेसे अद्वितीय ब्रह्म हो अवधारित होता है। यह उपमाका ग्रहण है। जैसे सूर्य अथवा चन्द्रमा के एक प्रकाश में उपाधिके योगसे उत्पन्न हुए विशेषका उपाधिके उपशमसे सम्बन्ध व्यपदेश और उपाधिभेदसे भेदव्यपदेश होता है। अथवा जैसे सुईके छिद्र, पाश, आकाश आदिमें उपाधिकी अपेक्षा से ही ये सम्बन्ध व्यपदेश और भेदव्यपदेश होते हैं, वैसे
शाङ्करभाष्य
एवं सेत्वादिव्यपदेशान् परपक्षहेतूनुन्मथ्य संप्रति स्वपक्षं हेत्वन्तरेणोपसंहरति। तथान्यप्रतिषेधापि न ब्रह्मणः परं वस्त्वन्तरमस्तीति गम्यते तथा हि स एवाधस्तात्
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उक्त रीतिसे परपक्ष के हेतुभूत सेतु आदि व्यपदेशोंका उन्मथनकर अब स्वपक्षका अन्य हेतु से उपसंहार करते हैं। इसीप्रकार अन्य प्रतिषेधसे भी ब्रह्मसे पर अन्य वस्तु नहीं है, ऐसा ज्ञात होता है | जैसे कि ' स एवाधस्तात् ' ( वही नीचे है ) ' अहमेवाधस्तात् ' ( मैं ही नीचे हूँ ) ' आत्मैवाधस्तात् ' ( आत्मा ही नीचे है ) ' सर्वं तं ० ' ( सभी उसे परास्त कर देते हैं जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है ) ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ( ब्रह्म ही यह सब है ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ( आत्मा ही यह सब है ) ' नेह नानस्तिकिञ्चन ' ( इस ब्रह्ममें नाना कुछ भी नहीं है ) ' यस्मात्परं ० ' ( जिस पुरुषसे उत्कृष्ट अन्य कुछ मी नहीं है ) ' तदेतद्ब्रह्म ० ' ( वह यह ब्रह्म कारण रहित • कार्यरहित, अन्तररहित और अबाह्य है . ) इत्यादि स्वप्रकरण स्थित वाक्य अन्य अर्थरूपसे नहीं लिये जा सकते, वे ब्रह्मसे व्यतिरिक्त अन्य वस्तुका निवारण करते हैं, और सर्वान्तर श्रुतिसे मी ऐसा अवधारण होता है कि परमात्मासे अन्य अन्तरात्मा नहीं है। ३६
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.२.३७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.2.37 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३७
अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ॥ ३.२.३७ ॥
पदच्छेद — अनेन , सर्वगतत्वम् , आयामशब्दादिभ्यः
सूत्रार्थ — ( अनेन ) सेतु बादि व्यपदेशोंमें मुख्यत्व और अन्य वस्तुत्वके निषेधसे ब्रह्ममें ( सर्वगतत्वम् ) सर्वगतत्व सिद्ध होता है, और ( आयामशब्दादिभ्यः ) ' आकाशवत्सर्वं गतश्च नित्यः ' इसप्रकार व्यापक वाचक शब्द आदिसे भी ब्रह्ममें सर्वगतत्व सिद्ध होता है।
शाङ्करभाष्य
अनेन सेत्वादिव्यपदेशनिराकरणेन अन्यप्रतिषेधसमाश्रयणेन च सर्वगतत्वमप्यात्मनः सिद्धं भवति अन्यथा हि तन्न सिध्येत्। सेत्वादिव्यपदेशेषु हि मुख्येष्वङ्गीक्रियमाणेषु परिच्छेद आत्मनः प्रसज्येत सेत्वादीनामेवमात्मकत्वात् तथा अन्यप्रतिषेधेऽप्यसति वस्तु वस्त्वन्तराद्व्यावर्तत इति परिच्छेद एव आत्मनः प्रसज्येत। सर्वगतत्वं च अस्य आयामशब्दादिभ्योऽवगम्यते आयामशब्दः व्याप्तिवचनः शब्दःयावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशःआकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःज्यायान्दिवःज्यायानाकाशात् नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः इत्येवमादयो हि श्रुतिस्मृतिन्यायाः सर्वगतत्वमात्मनोऽवबोधयन्ति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इससे - सेतु आदि व्यपदेशोंके निराकरण और अन्य वस्तु के प्रतिषेधके आश्रयणसे आत्मा में सर्वगतत्व भी सिद्ध होता है, अन्यथा वह सिद्ध न होगा। सेतु आदि व्यपदेश मुख्यार्थं ( मृन्मयत्वादि ) अङ्गीकार किये जाय तो आत्मा में परिच्छिन्नत्व प्रसक्त होगा, क्योंकि सेतु आदि एवमात्मक - परिच्छिन्नात्मक हैं। इसीप्रकार अन्य वस्तु के प्रतिषेध न होनेपर एक वस्तु अन्य वस्तुसे व्यावृत्त होती है, इससे भी आत्मामें परिच्छिन्नत्व ही प्रसक्त होगा। आत्मामें सर्वगतत्व आयामशब्द आदिसे विज्ञात होता है। आयामशब्द व्याप्तिवाचक शब्द है। ' यावान्वा ० ' ( जितना यह भौतिक आकाश है उतना ही यह हृदयान्तर्गत आकाश है ) ' आकाशवत् ० ' ( आत्मा आकाशके समान सर्वंगत और नित्य है ) ' ज्यायान्दिवः ' ( आत्मा द्युलोकसे बड़ा है ) ' ज्यायानाकाशात् ' ( आत्मा आकाशसे बड़ा है ) ' नित्यः सर्वगतः ० ' ( यह आत्मा नित्य, सवंगत स्थाणु, अचल और सनातन है ) इत्यादि श्रुति, स्मृति और न्याय आत्मामें सर्वगतत्व अवबोधित करते हैं।। ३७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इसप्रकार श्रुति, स्मृति और ' अधिष्ठानेनाध्यस्तं जगत् व्याप्तं, अध्यस्तत्वात् रज्वाव्याप्तसर्पवत् ' अधिष्ठान से अध्यस्त जगत् व्याप्त है, अध्यस्त होनेसे, रज्जुसे व्याप्त सपके समान ' इस न्यायसे मी आत्मा सर्वगतत्व सिद्ध होता है।। ३७
फलाधिकरणम्
3.2.38 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३८
फलमत उपपत्तेः ॥ ३.२.३८ ॥
पदच्छेद — फलम् , अतः , उपपत्तेः
सूत्रार्थ — ( फलम् ) कर्मका फल ( अतः ) इस ईश्वरसे ही सबको प्राप्त होता है, ( उपपत्तेः ) क्योंकि इसप्रकार उपपन्न होता है।
शाङ्करभाष्य
तस्यैव ब्रह्मणो व्यावहारिक्याम् ईशित्रीशितव्यविभागावस्थायाम् अयमन्यः स्वभावो वर्ण्यते। यदेतत् इष्टानिष्टव्यामिश्रलक्षणं कर्मफलं संसारगोचरं त्रिविधं प्रसिद्धं जन्तूनाम् किमेतत् कर्मणो भवति आहोस्विदीश्वरादिति भवति विचारणा। तत्र तावत्प्रतिपाद्यते फलम् अतः ईश्वरात् भवितुमर्हति कुतः उपपत्तेः स हि सर्वाध्यक्षः सृष्टिस्थितिसंहारान् विचित्रान् विदधत् देशकालविशेषाभिज्ञत्वात् कर्मिणां कर्मानुरूपं फलं संपादयतीत्युपपद्यते कर्मणस्तु अनुक्षणविनाशिनः कालान्तरभावि फलं भवतीत्यनुपपन्नम् अभावाद्भावानुत्पत्तेः। स्यादेतत् कर्म विनश्यत् स्वकालमेव स्वानुरूपं फलं जनयित्वा विनश्यति तत्फलं कालान्तरितं कर्त्रा भोक्ष्यत इति तदपि न परिशुध्यति प्राग्भोक्तृसंबन्धात् फलत्वानुपपत्तेः यत्कालं हि यत् सुखं दुःखं वा आत्मना भुज्यते तस्यैव लोके फलत्वं प्रसिद्धम् न हि असंबद्धस्यात्मना सुखस्य दुःखस्य वा फलत्वं प्रतियन्ति लौकिकाः। अथोच्येत मा भूत्कर्मानन्तरं फलोत्पादः कर्मकार्यादपूर्वात्फलमुत्पत्स्यत इति तदपि नोपपद्यते अपूर्वस्याचेतनस्य काष्ठलोष्टसमस्य चेतनेनाप्रवर्तितस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः तदस्तित्वे एव प्रमाणाभावात् अर्थापत्तिः प्रमाणमिति चेत् न ईश्वरसिद्धेरर्थापत्तिक्षयात्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — उसी ब्रह्मका व्यावहारिक ईशितृ - ईचितव्यरूप विभाग अवस्थामें यह अन्य स्वभाव फल हेतुत्व वर्णन किया जाता है। जीवोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रितरूप संसार विषयक विविध जो यह कर्मफल प्रसिद्ध है, क्या यह कमसे होता है अथवा ईश्वरसे? ऐसा विचार होता है। उसपर सिद्धान्ती प्रतिपादन करते हैं — फल अत : - ईश्वरसे होना चाहिए। किससे? इससे कि ऐसी उपपत्ति होती है।
वह ईश्वर कर्माध्यक्ष, विचित्र सृष्टि, स्थिति और संहारका कर्ता है, क्योंकि देश विशेष और काल विशेषका अभिज्ञाता है, इसलिए वह कर्म कर्ता जीवों को कर्मके अनुसार फलका संपादन करता है, यह उपपन्न होता है। प्रतिक्षण में विनाश शील कमसे कालान्तरभावी फल होता है, यह अनुपपन्न है, क्योंकि अभावसे भावको उत्पत्ति नहीं हो सकती। यह हो, परन्तु विनष्ट होता हुआ कर्म अपनी स्थितिकालमें अपने अनुरूप कर्मफल उत्पन्नकर विनष्ट हो जाता है और कर्ता कालान्तर में उस कर्मफलको मोगेगा।
वह भी परिशुद्ध ( दोषरहित ) नहीं है, क्योंकि मोक्ता के सम्बन्धसे पहले फलत्व अनुपपन्न है, कारण कि जिस कालमें जो सुख अथवा दुःख आत्मासे उपभुक्त होता है वही लोकमें फलरूपसे प्रसिद्ध है। आत्मासे असम्बद्ध सुख अथवा दुःखको फलरूपये लोग नहीं जानते हैं। यदि ऐसा कहा जाय कि कर्मके अनन्तर फलकी उत्पत्ती मत हो, परन्तु कर्म जन्य अपूर्व से फल उत्पन्न हो जायगा?
तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चेतनसे अप्रवर्तित काष्ठ और लोष्टके समान अचेतन अपूर्वकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, और उसके अस्तित्वमें प्रमाण भी नहीं है। यदि कहो कि अर्थापत्ति प्रमाण है, तो यह युक्त . नहीं है, क्योंकि ईश्वरकी सिद्धिसे अर्थापत्तिका क्षय हो जायगा।। ३८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # इसप्रकार ' तत् ' पदके लक्ष्यार्थका संशोधनकर अब ' तत् ' पदका वाच्यार्थ ' फलमत उपपत्ते : ' इस सूत्र कहते हैं। पूर्वपक्ष में ' तत् ' पदके वाच्य फलदाता ईश्वरकी असिद्धि होनेके कारण ' तत् ' पदके लक्ष्यार्थकी भी स्वतः असिद्धि है, सिद्धान्तमें उसकी सिद्धि है, इसप्रकार दोनोंमें भेद है। यद्यपि ब्रह्म में सर्वगतत्व के समान फलदातृत्व भी व्यवहारदशा में हो सकता है, तो भी कर्ममें फलदातृत्व होने से ईश्वरमें फलदातृत्व अयुक्त है। इसप्रकार आक्षेपसंगति से पूर्वपक्ष है। सिद्धान्तीकर्मफलका दाता ईश्वर है, क्योंकि ' स्वर्गादिकं विशिष्टदेशकालकर्माभिज्ञातृकम्, कर्मफलत्वात्, सेवाफलवत् ' ( स्वर्गादि विशिष्ट देश, काल और कर्मके अभिज्ञद्वारा प्राप्त होता है, क्योंकि फल है, जैसे सेवाफल ) यह उपपत्ति अनुमान है। याग आदि क्रिया जो क्षणिक कर्म है, क्या वह अपने नाशके अनन्तर फल उत्पन्न करता है अथवा अपना फल उत्पन्नकर नष्ट होता है वा अपूर्वसे फल सिद्ध होता है? प्रथम पक्ष तो अयुक्त है, क्योंकि कर्मका नाश अभावरूप है, अतः अमावसे भावकी उत्पत्ति नहीं होती। शेष दो विकल्पोंका समाधान ' स्यादेतत् ' आदिसे करते हैं॥ ३८
3.2.39 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३९
श्रुतत्वाच् च ॥ ३.२.३९ ॥
पदच्छेद — श्रुतत्वात् च
सूत्रार्थ — और ' स वा एष महानज ' इत्यादि श्रुतिसे ईश्वरमें फलदातृत्व श्रुत होनेसे ईश्वर ही फलदाता है।
शाङ्करभाष्य
न केवलम् उपपत्तेरेव ईश्वरं फलहेतुं कल्पयामः किं तर्हि श्रुतत्वादपि ईश्वरमेव फलहेतुं मन्यामहे तथा च श्रुतिर्भवति स वा एष महानज आत्मान्नादो वसुदानः इत्येवंजातीयका।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — हम केवल उपपत्ति - युक्तिसे ईश्वरको फलका हेतु नहीं कहते हैं, किन्तु श्रुति प्रतिपादित होने से भी ईश्वरको ही फलका हेतु हम मानते हैं। क्योंकि ' स वा एष महानज ० ' ( वह यह महान् अज आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला और कर्मफल देनेवाला है ) इसप्रकारकी श्रुति है॥ ३ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' कृतात्ययेऽनुशयवान् ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ११८ ) इस सूत्र में उदाहृत ' तद्य इह रमणीयचरणाः ' इत्यादि श्रुति और स्मृति वाक्योंसे यदि अपूर्वं सिद्ध होता है, तो उन वाक्योंसे ईश्वरमें फलदातृत्व भी स्वीकार करना चाहिए। ऐसा भगवान् सूत्रकार ' श्रुतत्वाच्च ' से कहते हैं॥ ३ ९
3.2.40 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ४०
धर्मं जैमिनिरत एव ॥ ३.२.४० ॥
पदच्छेद — धर्मम् , जैमिनि :, अतः , एव
सूत्रार्थ — जिस श्रुति और उपपत्तिसे सिद्धान्ती ईश्वरको फलदाता मानते हैं, ( अतएव ) उसी श्रुति और उपपत्ति ( जैमिनिः ) जैमिनि आचार्य ( धर्मम् ) धर्मको - यागादिको फलदाता मानते हैं।
शाङ्करभाष्य
जैमिनिस्त्वाचार्यो धर्मं फलस्य दातारं मन्यते अत एव हेतोः श्रुतेः उपपत्तेश्च। श्रूयते तावदयमर्थःस्वर्गकामो यजेत इत्येवमादिषु वाक्येषु तत्र च विधिश्रुतेर्विषयभावोपगमात् यागः स्वर्गस्योत्पादक इति गम्यते अन्यथा हि अननुष्ठातृको याग आपद्येत तत्र अस्य उपदेशवैयर्थ्यं स्यात्। ननु अनुक्षणविनाशिनः कर्मणः फलं नोपपद्यत इति परित्यक्तोऽयं पक्षः नैष दोषः श्रुतिप्रामाण्यात् श्रुतिश्चेत् प्रमाणम् यथायं कर्मफलसंबन्धः श्रुत उपपद्यते तथा कल्पयितव्यः न च अनुत्पाद्य किमप्यपूर्वं कर्म विनश्यत् कालान्तरितं फलं दातुं शक्नोति अतः कर्मणो वा सूक्ष्मा काचिदुत्तरावस्था फलस्य वा पूर्वावस्था अपूर्वं नाम अस्तीति तर्क्यते। उपपद्यते च अयमर्थं उक्तेन प्रकारेण। ईश्वरस्तु फलं ददातीत्यनुपपन्नम् अविचित्रस्य कारणस्य विचित्रकार्यानुपपत्तेः वैषम्यनैर्घृण्यप्रसङ्गात् तदनुष्ठानवैयर्थ्यापत्तेश्च। तस्मात् धर्मादेव फलमिति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जैमिनि आचार्य तो ' अत एव ' - इसी हेतु से श्रुति और उपपत्तिसे धर्मको फलदाता मानते हैं। और यही अर्थं ' स्वर्गकामो यजेत ' ( स्वर्गकी कामनावाला याग करे ) इत्यादि वाक्योंमें सुना जाता है, क्योंकि उसमें विधि श्रुतिके विषयभावकी अवगति से ' याग स्वर्गका उत्पादक है ' ऐसा ज्ञात होता है, अन्यथा अनुष्ठाता न होनेवाला याग होगा, तो ऐसा होनेपर यागका उपदेश व्यर्थ होगा। परन्तु अनुक्षण विनाशी कर्मसे फल उपपन्न नहीं होता, अतः यह पक्ष परित्यक्त है। यह दोष नहीं है, क्योंकि श्रुति प्रमाण है। यदि श्रुतिप्रमाण हो तो जिस प्रकार यह श्रुति प्रतिपादित कर्मफल सम्बन्ध उपपन्न हो उसीप्रकार कल्पना करनी चाहिए, और किसी अपूर्वको उत्पन्न किये विना विनष्ट होता हुआ कर्म कालान्तरमें फल देने में समर्थ नहीं होता, अतः कर्मकी कोई एक सूक्ष्म उत्तरावस्था अथवा फलको पूर्वावस्था अपूर्व नामक है, ऐसा तर्क किया जाता है। और यह अर्थ उक्त प्रकारसे उपपन्न होता है। ईश्वर फल देता है, यह अनुपपन्न है, क्योंकि अविचित्र कारणका विचित्र कार्य अनुपपन्न है, और ' वैषम्य और नैघृण्य ' प्रसंग और अनुष्ठान वैयर्थ्यापत्ति होती है, इसलिए धर्मसे ही फल होता है || ४०
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यह पूर्वपक्ष सूत्र है। ' यजेत ' इस विध्यात्मक लिङ्गार्थका यागविषय है, उसके भावावगमसे याग स्वर्गका साधन है, ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि यदि याग पुरुषके इष्ट स्वर्गका साधन न हो तो प्रेरणा उपपन्न नहीं होगी, इसलिए अपूर्व द्वारा कमसे फल होता है। अब ' ईश्वरस्तु ' इत्यादि सिद्धान्तको दूषित करते हैं— क्या ईश्वर कर्मकी अपेक्षाके विना ही फल देता है अथवा किसीकी अपेक्षासे? प्रथम पक्षमें ' अविचित्रस्य ' इत्यादिसे कहते हैं। द्वितीय पक्षमें - जैसे स्थिति - स्थापकसंस्कारमात्रसे चटाईमें वेष्टन होता है, वैसे ही कर्म जन्य अपूर्वसे फल सिद्ध होता है, तो ईश्वरका क्या प्रयोजन है | अतः धर्मसे ही फल होता है, यह जैमिनि आचार्यका मत है॥ ४०
3.2.41 · तृतीय अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ४१
पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् ॥ ३.२.४१ ॥
पदच्छेद — पूर्वम् , बादरायणः , हेतुव्यपदेशात्
सूत्रार्थ — ( तु ) शङ्कानिवृत्त्यर्थं है, ( बादरायणः ) बादरायण आचार्य तो ( पूर्वम् ) पूर्वोक्त ईश्वरको फलदाता मानते हैं, क्योंकि ( हेतुव्यपदेशात् ) ' एष ह्येव साधु कमं कारयति ' ' अन्नादो वसुदानः ' ' लभते च ततः कामान् ' इत्यादि श्रुति और स्मृतिमें ईश्वरका हेतुरूपसे व्यपदेश है।
शाङ्करभाष्य
बादरायणस्त्वाचार्यः पूर्वोक्तमेव ईश्वरं फलहेतुं मन्यते। केवलात्कर्मणः अपूर्वाद्वा केवलात् फलमित्ययं पक्षः तुशब्देन व्यावर्त्यते। कर्मापेक्षात् अपूर्वापेक्षाद्वा यथा तथास्तु ईश्वरात्फलमिति सिद्धान्तः कुतः हेतुव्यपदेशात् धर्माधर्मयोरपि हि कारयितृत्वेन ईश्वरो हेतुः व्यपदिश्यते फलस्य च दातृत्वेन एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते। एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते इति स्मर्यते च अयमर्थो भगवद्गीतासु यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।। स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान् मयैव विहितान्हितान् इति। सर्ववेदान्तेषु च ईश्वरहेतुका एव सृष्टयो व्यपदिश्यन्ते तदेव च ईश्वरस्य फलहेतुत्वम् यत् स्वकर्मानुरूपाः प्रजाः सृजति। विचित्रकार्यानुपपत्त्यादयोऽपि दोषाः कृतप्रयत्नापेक्षत्वादीश्वरस्य न प्रसज्यन्ते।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बादरायण आचार्यं तो पूर्वोक्त ईश्वरको ही फलका हेतु मानते हैं। केवल कर्मसे अथवा केक्ल अपूर्व से फल होता है, इस पक्ष की ' तु ' शब्द व्यावृत्ति करता है, कर्मकी अपेक्षावाले अथवा अपूर्वकी अपेक्षावाले ईश्वरसे यथा स्यात् तथा फल होता है, यह सिद्धान्त है। किससे? इससे कि हेतुरूपसे व्यपदेश है। धर्म और अधर्मके भी कारयतृरूप से और फलदातृरूपसे ईश्वर हेतु कहा गया है' एष ह्येव ० ' ( यही जिसे ऊपर ले जाना चाहता है उससे साधु कर्म कराता है और यही जिसे नीचे ले जाना चाहता है उससे असाधु कर्म कराता है ) और यह अर्थ ' यो यो ० ' ( जो जो सकामी भक्त जिस जिस विग्रहकी श्रद्धासे पूजा करना चाहता है, उस उस भक्तकी मैं उसके प्रति अचल श्रद्धा उत्पन्न करता हूँ | तथा वह उस श्रद्धा से युक्त हुआ उस देवताके आराधनकी चेष्टा करता है और उस देवतासे मेरेद्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगोंको निःसन्देह प्राप्त होता है ) इस प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा गया है। इसप्रकार सम्पूर्ण वेदान्तोंमें ईश्वर हेतुक सृष्टियोंका व्यपदेश। जो प्रजाओंका अपने कर्म अनुरूप सृजन करता है वही ईश्वरमें फल हेतुत्व है। जीवकृत प्रयत्नकी अपेक्षा होनेसे ईश्वरको विचित्र कार्य अनुपपत्ति आदि दोष भी प्रसक्त नहीं होते हैं॥ ४१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि चन्दन, कण्टक आदि दृष्ट पदार्थोंसे सुख आदिका सम्भव है, तो धर्म और अधर्मके स्वीकार करनेका क्या प्रयोजन? यदि कहो कि श्रुति और स्मृतिके बलसे इनकी अपेक्षा है, तो श्रुति और स्मृति प्रसिद्ध ईश्वरकी अपेक्षा क्यों नहीं हो। यदि ईश्वरकी अपेक्षा नहीं है, तो ईश्वर प्रतिपादक श्रुति, स्मृति बाधित होंगी। इसलिए ईश्वरकी अपेक्षाके विना केवल कर्म अथवा अपूर्व से ही फल हो, यह अयुक्त है। अत : कर्मफलदाता ईश्वर है। इसप्रकार ' तत् ' पदवाच्य ईश्वरके सिद्ध होनेपर ' तत् ' पदका लक्ष्यार्थं मी सिद्ध हुआ समझना चाहिए। इसलिए श्रुति, स्मृति और युक्ति युक्त होनेसे यह सिद्धान्त दोष रहित है॥ ४१
उपसंहार
इन सूत्रों का सार यह है कि जीव का अज्ञान केवल बाहरी जगत का भ्रम नहीं, बल्कि आत्म-स्वरूप की विस्मृति है। विभिन्न उपमानों और प्रमाणों के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि कैसे अविद्या के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाता। अंततः, ये सूत्र जीव की वास्तविक स्थिति और ब्रह्म के साथ उसके संबंध को तार्किक आधार प्रदान करते हैं।
In English
Brahma Sutra 3.2: The Reality of Dream Worlds
This commentary by Swami Satyananda Saraswati explains Brahma Sutras from the third chapter, second section. It discusses whether the dream state is as real as the waking state and concludes that while dreams have a sense of reality because they are created by the self (Prajna), they are ultimately illusory because they lack full spatial and temporal continuity.
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