व्याख्या · ब्रह्मसूत्र
ब्रह्मसूत्र — तृतीय अध्याय, तृतीय पाद (१–३३)
33 मूल पद्य 32 संस्करणसे मिलाये गये
यह पाद मुख्य रूप से वेदान्त के श्रवण-मनन-निदिध्यासन की प्रक्रिया में श्रुत ज्ञान की प्रमाणिकता और वेदों के वाक्यों की व्याप्ति पर केंद्रित है। यहाँ शास्त्र के वाक्यों की सत्ता, उनके अर्थ की व्यापकता और अन्य विद्याओं के साथ उनके संबंध को तार्किक क्रम में स्पष्ट किया गया है। इस विवेचन से साधक को यह बोध होता है कि ब्रह्म-विद्या केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, अपितु आत्म-साक्षात्कार का प्रत्यक्ष साधन है।
सर्ववेदान्तप्रत्ययाधिकरणम्
3.3.1 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १
सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ॥ ३.३.१ ॥
पदच्छेद — सर्ववेदान्तप्रत्ययम् , चोदनाद्यविशेषात्
सूत्रार्थ — ( सर्ववेदान्तप्रत्ययम् ) सब वेदान्तों में विहित उपासना भिन्न नहीं है, ( चोदनाद्यविशेषात् ) क्योंकि चोदना आदिकी अविशेषता समानता - एकता है।
शाङ्करभाष्य
सर्ववेदान्तप्रत्ययानि विज्ञानानि तस्मिन् तस्मिन् वेदान्ते तानि तान्येव भवितुमर्हन्ति कुतः चोदनाद्यविशेषात् आदिग्रहणेन शाखान्तराधिकरणसिद्धान्तसूत्रोदिता अभेदहेतव इहाकृष्यन्ते संयोगरूपचोदनाख्याविशेषादित्यर्थः। यथा एकस्मिन्नग्निहोत्रे शाखाभेदेऽपि पुरुषप्रयत्नस्तादृश एव चोद्यते जुहुयादिति एवम्यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद इति वाजसनेयिनां छन्दोगानां च तादृश्येव चोदना। प्रयोजनसंयोगोऽप्यविशिष्ट एव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति इति। रूपमप्युभयत्र तदेव विज्ञानस्य यदुत ज्येष्ठश्रेष्ठादिविशेषणान्वितं प्राणतत्त्वम् यथा च द्रव्यदेवते यागस्य रूपम् एवं विज्ञेयं रूपं विज्ञानस्य तेन हि तत् रूप्यते। समाख्यापि सैव प्राणविद्येति। तस्मात् सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वं विज्ञानानाम्। एवं पञ्चाग्निविद्या वैश्वानरविद्या शाण्डिल्यविद्येत्येवमादिष्वपि योजयितव्यम्। ये तु नामरूपादयो भेदहेत्वाभासाः ते प्रथम एव काण्डेन नाम्ना स्यादचोदनाभिधानत्वात् इत्यारभ्य परिहृताः।। इहापि कंचिद्विशेषमाशङ्क्य परिहरति
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — विज्ञेय ब्रह्मके तत्त्वका व्याख्यान किया जा चुका है। अब प्रत्येक वेदान्तमें विज्ञान ( उपासना ) भिन्न है अथवा नहीं? इसका विचार किया जाता है। परन्तु पूर्वापर आदि भेदसे रहित, सैन्धवघनके समान एक रस विज्ञेय ब्रह्मका अवधारण किया गया है, उसमें विज्ञानके भेद अथवा अभेदके विचारका अवसर ही कहाँ है?
क्योंकि ब्रह्मके एक और एक रूप होनेसे कर्म बहुतके समान ब्रह्मके बहुत्वका प्रतिपादन वेदान्तोंमें अभीष्ट है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, और एकरूप ब्रह्ममें अनेक प्रकारके विज्ञानोंका संभव नहीं है, क्योंकि अन्य प्रकारका अर्थ और अन्य प्रकारका विज्ञान अभ्रान्तयथार्थं नहीं होता। यदि एक ब्रह्ममें अनेक विज्ञानोंका भिन्न - भिन्न वेदान्तों में प्रतिपादन अभीष्ट हो तो उनमें से एक अभ्रान्त और अन्य भ्रान्त हैं, इस प्रकार वेदान्तों में अविश्वास प्रसङ्ग हो जायगा।
इसलिए प्रत्येक वेदान्त में ब्रह्म विज्ञानभेदकी आशङ्का नहीं की जा सकती है। और चोदना आदिके अविशेषसे विज्ञानका अभेद भी नहीं कहा जाता, क्योंकि ब्रह्मविज्ञान अचोदनात्मक है। अविधि प्रधान और वस्तु रयंवसायी ब्रह्मवाक्योंसे ब्रह्मविज्ञान उत्पन्न किया जाता है, इसप्रकार आचार्यने ' तत्तु समन्वयात् ' इस सूत्र में कहा है। तो पुनः इस भेद और अभेद विचारको क्यों आरम्भ करते हो? सि ० - इसपर कहते हैं - यह विज्ञानके भेद और अभेदका विचार सगुणब्रह्म विषयक और प्राण आदि विषयक है, इसलिए कोई दोष नहीं है।
यहाँ कर्मके समान उपासनाओंका भेद और भेद संभव है, क्योंकि उपासनाएँ कर्मके समान ही दृष्ट फल और अदृष्ट फलवाली कही जाती हैं। और कई एक तत्त्वज्ञानकी उत्पत्ति द्वारा क्रममुक्ति फलवाली कही जाती हैं। उनमें यह विचार होता है कि क्या प्रत्येक वेदान्तमें विज्ञानभेद है अथवा नहीं? यहाँ पूर्वपक्ष के हेतुओंका उपन्यास किया जाता है। पूर्वपक्षी - नाम भेदप्रतिपत्ति हेतुरूपसे ज्योतिरादिमें प्रसिद्ध है।
अन्य वेदान्तों में विहित विज्ञानों में तैत्तिरीयक, वाजसनेयक, कौथुमक, कौषीतक और शाट्यायन इत्यादि भिन्न - भिन्न नाम हैं। और इसी प्रकार ' वैश्वदेव्यामिशा ० ' ( विश्वदेवोंको अमिक्षा और वाजि देवताओंको वाजिन ) इत्यादिमें रूपभेद भी कर्मभेदका प्रतिपादक प्रसिद्ध है। और यहाँ रूपभेद है, जैसे कि कोई शाखावाले पञ्चाग्निविद्यामें अन्य छठवीं अग्नि भी कहते हैं, और अन्य पाँच ही पढ़ते हैं। इस प्रकार प्राणसंवाद आदिमें कोई शाखावाले न्यून वाग् आदि कहते हैं और कोई लोग अधिक वाक् आदिका पाठ करते हैं।
इस प्रकार धर्मविशेष भी कर्मभेदका प्रतिपादक कार्यादिमें आशङ्कित है। और यहाँ धर्मविशेष भी है - जैसे कि आयर्वणिकोंका शिरोव्रत। इस प्रकार पुनरुक्ति आदि भेदके हेतुओंकी वेदान्तोंमें यथासंभव योजना करनी चाहिए। इसलिए प्रत्येक वेदान्तमें विज्ञानका भेद है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - सब वेदान्त प्रत्यय - विज्ञान तत् तत् वेदान्त में वे वे ही हो सकते हैं। किससे?
इससे कि चंदना आदि अविशेष हैं, आदि पदके ग्रहणसे शाखान्तर अधिकरणमें सिद्धान्तसूत्रों में प्रतिपादित अभेद हेतुओंका यहाँ आकर्षण किया जाता है, क्योंकि संयोग, रूप, चोदना और समाख्याका प्रत्येक शाखा में वैलक्षण्य नहीं है, ऐसा अर्थ है। जैसे एक अग्निहोत्र में शाखाभेद होनेपर भी ' जुहुयात् ' वैसा ही पुरुषप्रयत्न विहित है, वैसे ही ' यो ह व ० ' ( जो ज्येष्ठत्वं और श्रेष्ठत्व गुणविशिष्टको जानता है ) इस प्रकार वाजसनेयी और छान्दोगोंकी गुणरूप • विशेषणों से युक्त प्राणतत्त्व है।
जैसे द्रश्य और देवता यागके रूप हैं, वैसे ही विज्ञानका विज्ञेय रूप है, क्योंकि उससे उसका निरूपण किया जाता है। इसी प्रकार समाख्या- संज्ञा भी वही प्राणविद्या है। इससे विज्ञानोंमें सर्वं वेदान्त प्रत्ययत्व है। एवं प्रश्वाग्निविद्या, वैश्वानर विद्या, शाण्डिल्यविद्या आदिमें योजना करनी चाहिए। जो नाम, रूप आदि भेद हेतु से हैं, प्रथम काण्डमें ही ' न नाम्ना ० ' ( नामसे भेद न होगा, क्योंकि चोदनासे अभिधान नहीं है ) ऐसा आरम्भकर परिहृत किये गये हैं॥ १
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत पादमें ' तत् ' और ' त्वम् ' पदार्थका निरूपण किया गया है। अब अन्तःकरण शुद्धिद्वारा ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्यार्थं निर्धारण के उपयोगी सगुण उपासनाके विषयमें विचार किया जाता है। इसप्रकार हेतुहेतुमद्भावसंगतिसे कहते हैं। पूर्वपक्षमें उपासनाओंका भेद है और सिद्धान्तमें उपासनां एक है, इसपर विचार किया जाता है। परन्तु वेद्यके भेद होनेपर विज्ञानका भेद होता है किन्तु ब्रह्म तो पूर्वापार भेद रहित एक रूप है, अतः उसमें ज्ञान भेदका अवसर ही नहीं है। यदि भेद रहित ब्रह्ममें ज्ञान भेदकी कल्पनाकी जायगी तो वह ज्ञानभेद यथार्थं नहीं होगा, अत : निधर्मक एक ब्रह्ममें ज्ञानभेदकी कल्पना नहीं करनी चाहिए।
* यद्यपि यह विज्ञानके भेद और अभेदका विचार निर्विशेष अद्वितीय ब्रह्मविषयक नहीं है, तो मी गुणब्रह्म विषयक और प्रणादि विषयक हो सकता है, क्योंकि पञ्चाग्निविद्या, प्राणविद्या, दहरविद्या, वैश्वानर आदि विद्या परस्पर भिन्न हैं, ऐसा ' नानाशब्दादिभेदात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।५८ ) इस सूत्रमें कहा जायेगा। यहाँ तो परस्पर भिन्न - भिन्न वे विद्याएँ क्या प्रत्येक शाखा में भिन्न - भिन्न हैं अथवा नहीं? इसप्रकार नाम आदिके भेदसे और विधि आदिके समान होनेसे सन्देह होता है।
पूर्वमीमांसाके शाखान्तर अधिकरणमें पूर्वपक्षका यह सूत्र है - " नामरूपधर्मविशेषपुनरुक्तिनिन्दाशक्तिसमाप्तिवचनप्रायश्चित्तान्यार्थदर्शनाच्छाखान्तरे कर्मभेदः स्यात् ' ( जै ० सू ० २।४।८ ) ( नाम, रूप, धर्मविशेष, पुनरुक्ति, निन्दा, अशक्ति, समाप्तिवचन, प्रायश्चित्त, अन्यार्थदर्शन इनसे अन्य शाखामें कर्मभेद होना चाहिए ) ये सब कर्मके भेदमें हेतु हैं।
जैसे ' अथैष ज्योतिरथैष सर्वज्योतिरेतेन सहस्रदक्षिणेन यजेत ' ( अनन्तर सहस्र दक्षिणा से यह ज्योतिः नामक याग करे ) यहाँ नामभेदसे यह ज्योति याग ज्योतिष्टोम या से भिन्न है। और ' विश्वेदेवोंको अमिक्षा ( पनीर ) और वाजिदेवोंको वाजिन- द्रव भाग दे ' यागका रूप द्रव्य और देवता हैं, उससे ही याग सिद्ध होता है, अतः यहाँ विश्वे देवताके उद्देश्यसे अमिक्षा द्रव्यवाले यागमें, वाजिन गुण विधि नहीं हो सकती, क्योंकि यागका रूप द्रव्य और देवता भिन्न - भिन्न हैं।
अतः ये कर्म भिन्न - भिन्न हैं, वैसे प्रकरणमें तैत्तिरीयक, वाजसनेयक आदि नामभेदसे उपासनाएं भिन्न - भिन्न हैं। भाष्य में आदि पदसे ' ऐन्द्रं दधि ' ऐन्द्रं पयः ' इत्यादि द्रव्यभेद से मी कर्मभेद ग्राह्य है, उसी प्रकार प्रकरण में भी नाम और रूपभेद से वाजसनेयी पञ्चाग्नि और छान्दोगों की fo विद्याका भेद है। इसप्रकार छान्दोग्यमें रेत रहित वागू आदि पाँच अग्नियाँ और रेतसहित वाग् आदि वाजसनेयियों के मंतमें छ अग्नियाँ हैं, अतः प्राण आदि विद्याका भेद है।
कारोरिवाक्योंके अध्ययनमें तैत्तिरीय शाखावाले भूमिमें भोजन करते हैं, यह उन्हींका धर्मविशेष है, और अन्य शाखावाले ऐसा नहीं करते, क्योंकि वह उनका धर्म नहीं है। इसप्रकार अन्य शाखाओं में धर्मविशेषोंसे जैसे कर्मभेद शङ्कित है, वैसे प्रकृतमें भी मुण्डकोपनिषद् के अध्ययनमें जिन लोगों का माथेपर अङ्गारपात्र ( मस्म ) धारण करना धर्मविशेष है अन्योंका नहीं, अतः धर्मविशेषसे विद्याका भेदशङ्कित है।
पुनरुक्ति - अभ्यास, जैसे ' समिधो यजति ' ' तनूनपातं यजति ' यहाँपर ' यजति ' के पुनः पुनः कथनसे पाँच प्रयाजोंका परस्पर भेद सिद्ध होता है, अन्यथा - एक कर्म माननेसे ' यजति ' का पुनः पुनः कथन ब्यर्थं है। वैसे अन्य शाखा में भी अभ्याससे विद्याका भेद है। आदि पदसे निन्दादिका ग्रहण है।
' निन्दावचन – ' प्रातः प्रातरनृतं ते वदन्ति पुरोदयाज्जुह्वति अग्निहोत्रम् ' ( जो सूर्योदयसे पहले अग्निहोत्र करते हैं वे प्रातः अनृत बोलनेवाले होते हैं ) इससे अनुदित होमकी और " यदुदिते सूर्ये प्रातर्जुहुयात् ' ( जो सूर्यके उदित होनेपर प्रातः होम करता हैं वह अतिथिके चले जानेपर शून्य ग्रहमें भोजन ले आता है उसके समान है ) इस वाक्यसे ' उदित होमकी निन्दा श्रुत है, अत : दोनों होमोंका भेद है, क्योंकि एक पुरुष उदित और अनुदित होमका अनुष्ठान नहीं कर सकता। उदित तथा • में भेद है।
ये निन्दा & और प्रायश्चित वेदान्त विद्यामें नहीं हैं, अतः उनका उदाहरण नहीं अनुदित होमके अतिक्रमण से प्रायश्चित्तका विधान है। इसका प्रायश्चित्त के विधानसे मो दोनों होमोंदिया गया है। अशक्ति - जैसे सब शाखाओंमें विहित कर्मके जानने और करनेमें एक व्यक्तिकी असामथ्यसे कर्मका भेद है, वैसे सब वेदान्तके अध्ययन और ज्ञानमें अथवा उपासना करनेमें एक व्यक्तिकी शक्ति न होने से तत् तत् वेदान्तमें विद्याका भेद शङ्कित है।
समाप्ति - सब शाखाओंकी एक रूप समाप्ति नहीं कही जांती, किन्तु अन्य शाखाकी अन्यत्र कर्ममें समाप्ति कही जाती है, इसप्रकार समाप्तिवचन भेदसे भी कर्मका भेद शङ्कत है, वैसे किसी वेदान्तगत ओंकारको सर्वात्मतामें किसीकी अन्यत्र समाप्ति है, इससे विद्याका भेद यति है। अन्यार्थदर्शन -- अथर्ववादसे जैसे कर्मका भेद शति है, वैसे प्रकृत में विद्याका भेद शङ्कत है।
इस प्रकार पूर्वपक्ष सूत्रमें कर्मभेदके लिए कथित हेतुओंको दिखलाया गया है। अब उनमेंसे कोई हेतु सिद्धान्त और पूर्वपक्ष दोनों में यहाँ उपयुक्त होते हैं। वैसे शब्दान्तर, अभ्यास, संख्या, गुण, क्रिया और नामधेय कर्मके भेदक हैं। उनमें नाम, गुण, रूप और अभ्यास इन चारोंका व्याख्यान हो चुका है। किञ्च ' यजेत, जुहुयात् ' इसप्रकार प्रकृति शब्दके भेदसे तत् तत् अवच्छिन्न भवनारूप कर्मका भेद है, वैसे यहाँ भी ' वेद, उपास्ते ' इत्यादि शब्द भेदसे विद्याका भेद है। ' तिस्रआहुती जुहोति ' ( तीन आहुति करे ) इसमें जैसे संख्या से कर्मभेद है, वैसे ' द्वौ संवगौ ' ( छा ० ४।३।४ ) ( देवताओं में वायु और इन्द्रियोंमें प्राण - संवर्ग है ) इसमें द्वित्व संख्यासे संवर्गविद्याका भेद है। नित्य अग्निहोत्रके प्रकरणसे अन्य प्रकरणमें कुण्डपायियों के अयन नामक संवत्सर सत्र में ' मासमग्निहोत्रं जुह्वति ' ( मासपर्यन्त अग्निहोत्र करे ) इसमें श्रुत अग्निहोत्र अन्य प्रकरणमें स्थित होनेके कारण भिन्न कर्म है, इसप्रकार सिद्ध किया गया है, वैसे यहाँ वेदान्तभेद और प्रकरणभेद होनेसे उपासना का भी भेद है।
* उक्त नाम आदिसे प्रत्येक शाखामें अग्निहोत्र आदि कर्मोंका भेद प्राप्त होनेपर शाखान्तराघिकरणमें सिद्धान्त सूत्र है- ' एकं वा संयोगरूपचोदनाख्या विशेषात् ' ( जै ० सू ० २०४ ९ ) ( प्रयोजनका संयोग, रूप- द्रव्य और देवता, चोदना- पुरुषप्रयत्न और आख्या - नाम समान होनेसे शाखान्तरमें एक ही कम है ) चोदनाका अर्थं विधिवाक्य अथवा पुरुषप्रयत्न है ' चोदनेति क्रियाप्रवर्तकं वचनमाहुशबरस्वामिनः ' ( शबरस्वामी क्रिया प्रवर्तक वचनको चोदना कहते हैं ) जैसे ' जुहुयात् ' ' हु ' धातुका अर्थ होम है, तद्विषयक पुरुषप्रयत्न जैसे यहां एक है, वैसे ही ' वेद, उपास्ते ' इत्यादिमें भी पुरुष प्रयत्न एक है।
जैसे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व आदि गुणोंसे युक्त प्राणविद्या एक है, वैसे फल संयोग आदिके समान होनेसे पचाग्निविद्या भी एक ही है। इस प्रकार शाखा भिन्न होनेपर भी विद्याओं में भेद नहीं है। पूर्वपक्षीसे कर्मके भेदमें प्रतिपादित हेतु वस्तुतः वे हेतु नहीं हेत्वाभास हैं। जैसे- ' काठक ' आदि नामसे कर्म भेद युक्त नहीं है, क्योंकि चोदनाका अभिधान नहीं है। काठक आदि ग्रन्थोके नाम हैं कर्मके नहीं, अतः पृथक् नामवाले शाखा ग्रन्थोंके भेद होनेपर भी उनसे विहित कर्म एक ही है।
इससे वे कर्म भी उस ग्रन्थके नामसे कहे जाते हैं। उनमें पृथक् शक्ति की कल्पना गौरव है। पृथक् शाखा ग्रन्थोंमें थोड़ा - सा भेद होनेपर भी कर्म एक ही है। रूप द्रव्य और देवता ) भी कर्मका भेदक नहीं है, क्योंकि समान है। इस प्रकार नामके भेदसे विद्याका मी भेद नहीं है। धर्मविशेष भी भेदक नहीं है, क्योंकि वह अध्ययनका अङ्ग है कर्मका नही | पृथक् शाखाओंमें पुनरुक्ति सिद्ध नहीं है। निन्दा और अन्यार्थदर्शन भी कर्म भेदके साधक नहीं हैं, क्योंकि वे तत् तत् विधिमें स्तुतिमात्र हैं।
अशक्ति भी भेदसाधक नहीं है, क्योंकि अनेक शाखाओंके अध्ययनमें अशक्ति होनेपर भी अपनी शाखाओं में अनुक्तकी अपेक्षा होनेसे अन्य शाखासे उसका ग्रहण सम्भव है। एक भी कर्ममें अङ्ग लोपवैगुण्य आदि होनेसे प्रायश्चित्त हो सकता है, अतः प्रायश्चित्त भी कर्मका भेदक नहीं है। इसी प्रकार समाप्तिवचनका भेद भी भेद प्रयोजक नहीं है। इस रीति से कर्मके अभेद साधक प्रमाणोंका प्राबल्य होनेसे भेद साधक हेतु परिहृत हैं।
पूर्वपक्ष में विद्याके भेदसे गुणोंका अनुपसंहार है, सिद्धान्त में विद्याके एक होने से गुणोंका उपसंहार है।। १
3.3.2 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २
भेदान् नेति चेद् एकस्याम् अपि ॥ ३.३.२ ॥
पदच्छेद — भेदात् , नं , इति · चेत् , न , एकस्याम् अपि । वैसी एक - सी चोदना है । और ' ज्येष्ठश्च ० ' ( वह अपनी ज्ञातिमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है ) इस तरह प्रयोजनका संयोग भी समान है । दोनों स्थलों में विज्ञानका रूप भी वही है जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठ आदि
शाङ्करभाष्य
स्यादेतत् सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वं विज्ञानानां गुणभेदात् नोपपद्यते तथा हि वाजसनेयिनः पञ्चाग्निविद्यां प्रस्तुत्य षष्ठमपरमग्निमामनन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति इत्यादिना छन्दोगास्तु तं न आमनन्ति पञ्चसंख्ययैव च ते उपसंहरन्ति अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद इति येषां च स गुणोऽस्ति येषां च नास्ति कथमुभयेषामेका विद्योपपद्येत न च अत्र गुणोपसंहारः शक्यते प्रत्येतुम् पञ्चसंख्याविरोधात्।
तथा प्राणसंवादे श्रेष्ठात् अन्यान् चतुरः प्राणान् वाक्चक्षुःश्रोत्रमनांसि छन्दोगा आमनन्ति वाजसनेयिनस्तु पञ्चममप्यामनन्ति रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद इति आवापोद्वापभेदाच्च वेद्यभेदो भवति वेद्यभेदाच्च विद्याभेदः द्रव्यदेवताभेदादिवयागस्येति चेत् नैष दोषः यत एकस्यामपि विद्यायामेवंजातीयको गुणभेद उपपद्यते यद्यपि षष्ठस्याग्नेरुपसंहारो न संभवति तथापि द्युप्रभृतीनां पञ्चानामग्नीनाम् उभयत्र प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् न विद्याभेदो भवितुमर्हति न हि षोडशिग्रहणाग्रहणयोरतिरात्रो भिद्यते।
पठ्यतेऽपि च षष्ठोऽग्निः छन्दोगैः तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति इति वाजसनेयिनस्तु सांपादिकेषु पञ्चस्वग्निषु अनुवृत्तायाः समिद्धूमादिकल्पनाया निवृत्तयेतस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित्समित् इत्यादि समामनन्ति स नित्यानुवादः अथाप्युपासनार्थ एष वादः तथापि स गुणः शक्यते छन्दोगैरप्युपसंहर्तुम्। न च अत्र पञ्चसंख्याविरोध आशङ्क्यः सांपादिकाग्न्यभिप्राया हि एषा पञ्चसंख्या नित्यानुवादभूता न विधिसमवायिनी इत्यदोषः। एवं प्राणसंवादादिष्वपि अधिकस्य गुणस्य इतरत्रोपसंहारो न विरुध्यते।
न च आवापोद्वापभेदाद्वेद्यभेदो विद्याभेदश्च आशङ्क्यः कस्यचिद्वेद्यांशस्य आवापोद्वापयोरपि भूयसो वेद्यराशेरभेदावगमात्। तस्मादैकविद्यमेव।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यहाँ भी किसी विशेषकी आशङ्काकर परिहार करते हैं--
सूत्रार्थ - ( इति चेत् ) यदि कहो कि ( भेदात् ) जैसे द्रव्य और देवताके भेदसे यागका भेद होता है, वैसे वेद्यके भेदसे विद्याका भेद है, ( न ) तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ( एकस्यामपि ) एक विद्या में भी इस प्रकारका गुण भेद उपपन्न होता है।
वह हो, परन्तु विज्ञानोंमें सर्ववेदान्त प्रत्ययत्व गुणभेदसे उपपन्न नहीं होता, क्योंकि वाजसनेयी शाखावाले पञ्चाग्निविद्याको प्रस्तुतकर ' तस्याग्निरेव ० ' ( उस - आहुति भूत पुरुषका प्रसिद्ध अग्नि ही अग्नि है ) इत्यादिसे अन्य षष्ठ अग्नि कहते हैं। छान्दोग तो उसका कथन नहीं करते किन्तु ' अथ ह य ० ' ( किन्तु जो इसप्रकार इन पाँच अग्नियोंको जानता है ) इसप्रकार वे पाँच संख्यासे उपसंहार करते हैं।
जिनके मत में वह गुण है और जिनके मत में वह गुण नहीं है उन दोनोंकी एक विद्या किस प्रकार उपपन्न होगी। और यहाँ गुणका उपसंहार भी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि पाँच संख्याका विरोध है। उसीप्रकार प्राणसंवादमें श्रेष्ठ प्राणसे अन्य वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन इन चार प्राणोंका छान्दोग कथन करते हैं, और वाजसनेयी तो ' रेतो वै प्रजापतिः ० ' ( रेत ही प्रजापति हैं, जो ऐसा जानता है, वह प्रजा और पशुओंसे सम्पन्न होता है ) इस तरह पञ्चमका भी कथन करते हैं।
आवाप ( डालना ) उद्वाप ( निकालना ) के भेदसे वेद्यका भेद होता है, वेद्यके भेदसे विद्याका भेद होता है। जैसे द्रव्य और देवताके भेदसे यागका भेद होता है। ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है, क्योंकि एक विद्यामें भी इसप्रकारका गुणभेद उपपन्न होता है। यद्यपि षष्ठ अग्निका उपसंहार संभव नहीं है, तो मी द्यु आदि पाँच अग्नियोंका दोनों स्थलों ( वाजसनेयी और छान्दोग ) में प्रत्यभिज्ञान होनेसे विद्याका भेद नहीं हो सकता। अतिरात्रयाग में षोडशिपात्र के ग्रहण और अग्रहण से अनिरात्रयागका भेद नहीं होता।
और ' तं प्रेतं ० ' ( कर्म वश परलोक में प्रस्थित हुए उस मृतकको ज्ञातिवाले अग्नि प्रति ही ले जाते हैं ) इसप्रकार छान्दोग षष्ठ अग्निको मो पढते हैं। वाजसनेयी तो उपासना के लिए सांपादिक - आरोपित पाँच अग्नियोंमें अनुवृत्त समिधू, धूम आदि कल्पनाकी निवृत्तिके लिए ' तस्याग्निरेव ० ' ( उस मृतक पुरुषके दाहके लिए प्रसिद्ध अग्नि ही अग्नि है और प्रसिद्ध समिध् ही समिध् है ) इत्यादि कहते हैं। वह नित्य अनुवाद है।
यदि यह वाद उपासनाके लिए हो तो मो छान्दोग उस गुणका उपसंहार कर सकते हैं, अतः यहाँ पाँच संख्या के विरोध की आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह पाँच संख्या उपासना के लिए आरोपित अग्निके अभिप्रायसे नित्य अनुवादरूप है विधि सम्बन्धी नहीं है, इसलिए कोई दोष नहीं है। इसीप्रकार प्राणसंवाद आदिमें भी अधिक गुणका अन्यत्र उपसंहार विरुद्ध नहीं है।
और न आवाप, उद्वापके भेदसे वेद्यभेद और विद्याभेदकी आशङ्का करनी चाहिए, क्योंकि किसी वेद्यांशके आवाप और उद्वापमें भी महान् वेद्य राशिका अभेद अवगत होता है, इससे एक ही विद्या है || २
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * वाजसनेयी छः अग्नियाँ मानते हैं और छान्दोग पाँच, अतः संख्या आदिके भेदसे विद्याका भेद होना चाहिए। जैसे एक शाखा में अग्नीषोमीय यागमें एकादश कपालोंका कथन और अन्य शाखा में द्वादश कपालोंका निर्वाप प्रतिपादित है, इससे वहाँ संख्याके भेदसे शाखान्तरका कर्म भी भिन्न माना गया है? यह वेदान्वशास्त्र पूर्वमीमांसा से पृथक् शास्त्र है, अतः यहाँ कर्म न्यायकी समानता नहीं है, क्योंकि यह उपासना मानसिक विद्या है, इससे पुनरुक्ति नहीं है। परन्तु उस मृत . पुरुष दाहके लिए अन्त्येष्टिगत छठवीं अग्निको वाजसनेयियोंने प्रसिद्ध अग्निके समान स्वीकृत किया है, उसका छान्दोगोंने पाँच अग्नियों में अन्तर्भाव किया है, अतः रूपका भेद नहीं है। छान्दोग रेतको न लेकर प्राणके साथ वाणी, चक्षु, श्रोत्र और मनको लेकर पाँच अग्नियाँ मानते हैं और वाजसनेयियोंने जननशक्ति गुणविशिष्ट रेतको अधिक लेकर छ। अग्नियाँ स्वीकार की हैं, इस थोड़े भेदको लेकर विद्याका भेद सिद्ध नहीं होता। यहाँ तक तो गुणभेदको मानकर विद्याका अभेद कहा गया है। सब उसे अस्वीकार कर ' पठ्यतेऽपि ' इत्यादिसे कहते हैं।
# अनग्नि द्य आदि पाँच में उपासना के लिए कल्पित अग्नित्व स्वीकार किया गया है, अतः उनका कल्पित पञ्चत्व अनुवादमात्र है ध्येयरूपसे उनका विधान नहीं है, अतः कोई विरोध नहीं है। अतः वेद्यके एक होने से विद्या भी एक ही है॥ २
3.3.3 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३
स्वाध्यायस्य तथात्वे हि समाचारेऽधिकाराच् च सववच् च तन्नियमः ॥ ३.३.३ ॥
पदच्छेद — स्वाध्यायस्य , तथात्वेन , हि , समाचारे , अधिकारात् , च , सववत् , च , तन्नियमः
सूत्रार्थ — ( स्वाध्यायस्य ) यह शिरोव्रत स्वाध्यायका धर्म है विद्याका नहीं, ( हि ) क्योंकि ( समाचारे ) वेद व्रतोपदेशक सूत्र ग्रन्थमें ( तथात्वेन ) वह स्वाध्यायके धर्मरूप से विहित है, ( अधिकारात् ) कारण कि ' नैतदचीणवतोऽधीते ' यह उसका प्रकरण है। ( च ) और इसत्रकार ( सववत् ) ' सव होम के समान ' ( तन्नियमः ) यह आथर्वणिकोंका नियम है।
शाङ्करभाष्य
स्यादेतत् सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वं विज्ञानानां गुणभेदात् नोपपद्यते तथा हि वाजसनेयिनः पञ्चाग्निविद्यां प्रस्तुत्य षष्ठमपरमग्निमामनन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति इत्यादिना छन्दोगास्तु तं न आमनन्ति पञ्चसंख्ययैव च ते उपसंहरन्ति अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद इति येषां च स गुणोऽस्ति येषां च नास्ति कथमुभयेषामेका विद्योपपद्येत न च अत्र गुणोपसंहारः शक्यते प्रत्येतुम् पञ्चसंख्याविरोधात्।
तथा प्राणसंवादे श्रेष्ठात् अन्यान् चतुरः प्राणान् वाक्चक्षुःश्रोत्रमनांसि छन्दोगा आमनन्ति वाजसनेयिनस्तु पञ्चममप्यामनन्ति रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद इति आवापोद्वापभेदाच्च वेद्यभेदो भवति वेद्यभेदाच्च विद्याभेदः द्रव्यदेवताभेदादिवयागस्येति चेत् नैष दोषः यत एकस्यामपि विद्यायामेवंजातीयको गुणभेद उपपद्यते यद्यपि षष्ठस्याग्नेरुपसंहारो न संभवति तथापि द्युप्रभृतीनां पञ्चानामग्नीनाम् उभयत्र प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् न विद्याभेदो भवितुमर्हति न हि षोडशिग्रहणाग्रहणयोरतिरात्रो भिद्यते।
पठ्यतेऽपि च षष्ठोऽग्निः छन्दोगैः तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति इति वाजसनेयिनस्तु सांपादिकेषु पञ्चस्वग्निषु अनुवृत्तायाः समिद्धूमादिकल्पनाया निवृत्तयेतस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित्समित् इत्यादि समामनन्ति स नित्यानुवादः अथाप्युपासनार्थ एष वादः तथापि स गुणः शक्यते छन्दोगैरप्युपसंहर्तुम्। न च अत्र पञ्चसंख्याविरोध आशङ्क्यः सांपादिकाग्न्यभिप्राया हि एषा पञ्चसंख्या नित्यानुवादभूता न विधिसमवायिनी इत्यदोषः। एवं प्राणसंवादादिष्वपि अधिकस्य गुणस्य इतरत्रोपसंहारो न विरुध्यते।
न च आवापोद्वापभेदाद्वेद्यभेदो विद्याभेदश्च आशङ्क्यः कस्यचिद्वेद्यांशस्य आवापोद्वापयोरपि भूयसो वेद्यराशेरभेदावगमात्। तस्मादैकविद्यमेव।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह भी कहां गया है कि आथर्वणिकोंको विद्याके लिए शिरोव्रत आदिकी अपेक्षा है और अन्य छान्दोगोंको उसकी अपेक्षा नहीं है, इससे विद्याका भेद है, उसका निराकरण किया जाता है - यह शिरोव्रत आदि स्वाध्यायका धर्म है विद्याका नहीं है, यह कैसे अवगत हो? इससे कि इसप्रकार स्वाध्यायके धर्मरूपसे समाचारमें - वेदके व्रतोंके उपदेश परक सूत्रग्रन्थमें यह भी वेद व्रतरूपसे व्याख्यात है, ऐसा आर्थवणिक लोग कहते हैं।
' नैतदचीर्णव्रतोऽधीते ' ( शिरोव्रतका अनुष्ठान नहीं किया है वह इसका अध्ययन नहीं कर सकता ) इसप्रकार अधिकृत विषयक ' एतत् ' शब्द से और ' अध्ययन ' शब्दसे भी यह अपने उपनिषद् अध्ययनका ही धर्म है, ऐसा निर्धारित किया जाता है। परन्तु ' तेषामेवैताम् ० ' ( जिन्होंने विधिवत् शिरोव्रतका अनुष्ठान किया है उन्होंमें ही यह ब्रह्मविद्या कहनी चाहिए ) इस प्रकार ब्रह्मविद्या के संयोगका श्रवण होनेसे सब शाखाओं में एक ही ब्रह्मविद्या है, इसलिए यह शिरोव्रत धर्म भी सर्वत्र सम्बधित होगा?
ऐसा नहीं, क्योंकि वहाँपर भी ' एताम् ' इससे प्रकृत ब्रह्मविद्याका परामर्श है, और ब्रह्मविद्या में प्रकृतत्व ग्रन्थविशेषकी अपेक्षासे है, इसलिए यह धर्मं मी ग्रन्थविशेषका संयोगी - सम्बन्धी होगा। ' सववच्च तन्नियमः ' यह दृष्टान्तका निर्देश है।
जैसे शतौदनपर्यन्त सौर्यादि सात होमोंका अन्य वेदमें कथित त्रेताग्नि - दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय अग्निके साथ सम्बन्ध न होनेसे और आथवंण उदित एक ऋषि नामक अग्नि के साथ सम्बन्ध होने से आणिकही ( वे होम हैं ) यह नियम किया गया है, वैसे हो यह धर्म मी स्वाध्याय विशेष के सम्बन्धसे अथर्वणिकोंमें ही नियमित होता है। इससे भी विद्याका एकत्व निर्दोष है॥ ३
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.3.4 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४
दर्शयति च ॥ ३.३.४ ॥
पदच्छेद — दर्शयति च
सूत्रार्थ — और ' सर्वे वेदा ' इसप्रकार वेद मो सब वेदान्तों में विद्याका एकत्व दिखलाता है।
शाङ्करभाष्य
दर्शयति च वेदोऽपि विद्यैकत्वं सर्ववेदान्तेषु वेद्यैकत्वोपदेशात् सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति इतितथैतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्त एतमग्नावध्वर्यव एतं महाव्रते छन्दोगाः इति च। तथामहद्भयं वज्रमुद्यतम् इति काठके उक्तस्य ईश्वरगुणस्य भयहेतुत्वस्य तैत्तिरीयके भेददर्शननिन्दायै परामर्शो दृश्यते यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य इति। तथा वाजसनेयके प्रादेशमात्रसंपादितस्य वैश्वानरस्य च्छान्दोग्ये सिद्धवदुपादानम् यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते इति। तथा सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वेन अन्यत्र विहितानामुक्थादीनामन्यत्रोपासनविधानाय उपादानात् प्रायदर्शनन्यायेन उपासनानामपि सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वसिद्धिः।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.३.५ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे वेद्य एक होनेसे ब्रह्मविद्या एक है, वैसे उसके समीप पठित होनेसे सगुणविद्या भी सब शाखाओं में एक ही है। इसको सूत्रकार ' दर्शयति च ' इत्यादिसे दिखलाते हैं। जो एक वेदान्तमें विहित उपासनाका अन्य शाखामें सिद्धके समान ग्रहण उसे प्रायदर्शनन्याय कहा जाता है, अतः ब्रह्मविद्या अभिन्न होने के समान उक्थ आदि उपासनाएँ भी सभी शाखाओं में एक ही हैं॥ ४
उपसंहाराधिकरणम्
3.3.5 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५
उपसंहारोर्ऽथाभेदाद्विधिशेषवत्समाने च ॥ ३.३.५ ॥
पदच्छेद — उपसंहारः , अर्थाभेदात् , विधिशेषवत् समाने , च .
सूत्रार्थ — ( विधिशेषवत् ) जैसे सर्वत्र अग्निहोत्र एक होनेसें उसके शेष गुणोंका उपसंहार होता है, वैसे ही ( समाने ) उपासना में मी ( उपसंहार ) गुणोपसंहार करना चाहिए, ( अर्थाभेदात् ) क्योंकि उपास्यके गुणोंसे प्राप्य आसनारूप अर्थका सब शाखाओं में अभेद हैं।
शाङ्करभाष्य
इदं प्रयोजनसूत्रम्। स्थिते चैवं सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वे सर्वविज्ञानानाम् अन्यत्रोदितानां विज्ञानगुणानाम् अन्यत्रापि समाने विज्ञाने उपसंहारो भवति अर्थाभेदात् य एव हि तेषां गुणानामेकत्र अर्थो विशिष्टविज्ञानोपकारः स एव अन्यत्रापि उभयत्रापि हि तदेवैकं विज्ञानम् तस्मादुपसंहारः। विधिशेषवत् यथा विधिशेषाणामग्निहोत्रादिधर्माणाम् तदेव एकमग्निहोत्रादि कर्म सर्वत्रेति अर्थाभेदात् उपसंहरणम् एवमिहापि। यदि हि विज्ञानभेदो भवेत् ततो विज्ञानान्तरनिबद्धत्वाद्गुणानाम् प्रकृतिविकृतिभावाभावाच्च न स्यादुपसंहारः विज्ञानैकत्वे तु नैवमिति। अस्यैव तु प्रयोजनसूत्रस्य प्रपञ्चःसर्वाभेदात् इत्यारभ्य भविष्यति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और वेद मी विद्याका एकत्व दिखलाता है, क्योंकि ' सर्वे वेदा ० ' ( सब वेद जिस पदका प्रतिपादन करते हैं ) इसप्रकार सब वेदान्तोंमें विद्या के एकत्वका उपदेश है, और ' एतं ह्येव ० ' ( इसीका बह, वृच ऋग्वेदी महान् उक्थमें विचार करते हैं, अध्वर्युं इसका अग्निमें और छान्दोग इसका महाव्रतमें विचार करते हैं ) तथा ' महद्भयं ० ' ( वह ब्रह्म महान् मयरूप बौर उठे हुए वज्र के समान हैं ) इस प्रकार वाठकमें उक्त मयहेतुत्व ईश्वर- गुणका ' यदा ह्येवैष ० ' ( और जब यह अज्ञानी इस अद्वय आत्मा में थोड़ा सा
- भी भेद करता है तो इसे मय प्राप्त होता है, क्योंकि वह ब्रह्म ही भेददर्शी विद्वानके लिए मरूप है ) इस प्रकार तैत्तिरीयकमें भेददर्शनकी निन्दाके लिए परामर्श देखा जाता है और वाजसनेयक में प्रादेशमात्रसे संपादित वैश्वानरका, ' यस्त्वेतमेवं ० ' ( जो कोई ' यही मैं हूँ ' इसप्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है ) इसप्रकार छान्दोग्यमें सिद्धके समान उपादान है। इसप्रकार सर्ववेदान्त प्रत्ययरूपसे अन्यत्र विहित उक्थ आदिका अन्यत्र उपासना विधान के लिए ग्रहण होने से प्रायदर्शनन्यायसे उपासनाओं में भी सर्ववेदान्त प्रत्ययत्वकी सिद्धि होती है।४।
यह प्रयोजन सूत्र है | इस प्रकार सम्पूर्ण विज्ञानों में सर्ववेदान्त प्रत्ययत्व सिद्ध होनेपर अन्य शाखाओं में उक्त विज्ञानके गुणोंका अन्य शाखा में भो समान विज्ञानमें उपसंहार होता है, क्योंकि अर्थका अभेद है। उन गुणोंका एक शाखा में विशिष्ट विज्ञानका उपकारकत्व जो एक प्रयोजन है वही अन्य शाखामें भी है। दोनों स्थलों में भी वही एक विज्ञान है, इसलिए गुणोंका उपसंहार है। ' विधिशेषवत् ' - विधिशेषके समान। जैसे विध्यङ्ग अग्निहोत्र आदि धर्मोंका वही अग्निहोत्र आदि कमं सर्वत्र एक है। इसप्रकार अर्थ- प्रयोजनके अभेद होने से उन सब धर्मोंका उपसंहार होता है, उसीप्रकार प्रयोजनके अभिन्न होनेसे यहाँ भी धर्मोंका उपसंहार है। यदि शाखाभेदसे विज्ञानका भेद हो तो उस विज्ञान से भिन्न अन्य विज्ञानमें गुणोंके निरुद्ध होनेसे और प्रकृति विकृतिमावके न होने से उपसंहार नहीं होगा। किन्तु विज्ञानके एक होनेपर तो ऐसा नहीं होगा। इसी प्रयोजन सूत्रका विस्तार ' सर्वाभेदात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।२५ ) इस सूत्र के आरम्भसे होगा।। ५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * शाखाओंका भेद होनेपर भी समान विद्या में श्रुत गुण श्रुतिके अनुसार व्यवस्थित हैं अथवा एक शाखा अश्रुत गुणोंका अन्य शाखा से उपसंहार है। इस प्रकार सन्देह होनेपर पूर्वपक्ष में विद्या एक होनेपर मी तत् तत् शाखामें उक्त गुणोंसे ही उपकारकी सिद्धि होनेसे शाखा - भेदसे गुण व्यवस्थित हैं। सिद्धान्ती - प्रधानके एक होनेपर तत् तत् उपकारक बङ्गोंके उपसंहार में ' विधिशेषवत् ' इत्यादिसे दृष्टान्त कहते हैं।
शङ्का - जैसे आग्नेय यागमें अन्वित गुणोंकी उससे भिन्न सौयंयागमें प्राप्ति होती है, वैसे ही एक विद्यास्थित गुणोंका अन्य विद्यामें उपसंहार क्यों न हो?
समाधान - ' प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्यः ' ( प्रकृति यागके समान विकृति याग करना चाहिए ) ' यत्र समग्राङ्गोपदेशः सा प्रकृतिः ” ( विघिसे जिसमें समग्र अङ्गोका उपदेश हो वह प्रकृति याग है ) ' यत्र वैशेषिकाङ्गानामुपदेशः सा विकृति : ' ( प्रकृति यागके समान और विशेष अङ्गों का जहाँ उपदेश हो वह विकृति याग है ) यहां आग्नेय याग प्रकृति है और सोयं याग विकृति है, यह उक्त न्याय कर्मोंमें तो युक्त है।
परन्तु इस प्रकारका प्रकृति - विकृतिभाव ही विद्याओं में असिद्ध है, अतः उसकी यहाँ प्राप्ति नहीं है। इस प्रकार विद्याके एक होनेसे गुणोंका उपसंहार सिद्ध है।। ५
अन्यथात्वाधिकरणम्
3.3.6 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६
अन्यथात्वं शब्दाद् इति चेन् नाविशेषात् ॥ ३.३.६ ॥
पदच्छेद — अन्यथात्वम् , शब्दात् इति चेत् , न , अविशेषात्
सूत्रार्थ — ( शब्दात् ) ' त्वं न उद्गाय ' ' तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे ' इत्यादि श्रुति ( अन्यथात्वम् ) विद्याका भेद होना चाहिए, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( अविशेषात् ) क्योंकि श्रुतियोंके अभिप्रायमें विशेषता नहीं है, अतः विद्याका भेद नहीं है।
शाङ्करभाष्य
वाजसनेयकेते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेतिते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गाय इति प्रक्रम्य वागादीन्प्राणान् असुरपाप्मविद्धत्वेन निन्दित्वा मुख्यप्राणपरिग्रहः पठ्यते अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् इति। तथा छान्दोग्येऽपितद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्यामः इति प्रक्रम्य इतरान्प्राणान् असुरपाप्मविद्धत्वेन निन्दित्वा तथैव मुख्यप्राणपरिग्रहः पठ्यते अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे इति।
उभयत्रापि च प्राणप्रशंसया प्राणविद्याविधिरध्यवसीयते। तत्र संशयः किमत्र विद्याभेदः स्यात् आहोस्वित् विद्यैकत्वमिति। किं तावत्प्राप्तम् पूर्वेण न्यायेन विद्यैकत्वमिति।
ननु न युक्तं विद्यैकत्वम् प्रक्रमभेदात् अन्यथा हि प्रक्रमन्ते वाजसनेयिनः अन्यथा छन्दोगाः त्वं न उद्गाय इति वाजसनेयिन उद्गीथस्य कर्तृत्वेन प्राणमामनन्ति छन्दोगास्तु उद्गीथत्वेनतमुद्गीथमुपासांचक्रिरे इति तत्कथं विद्यैकत्वं स्यादिति चेत् नैष दोषः न हि एतावता विशेषेण विद्यैकत्वम् अपगच्छति अविशेषस्यापि बहुतरस्य प्रतीयमानत्वात् तथा हि देवासुरसंग्रामोपक्रमत्वम् असुरात्ययाभिप्रायः उद्गीथोपन्यासः वागादिसंकीर्तनम् तन्निन्दया मुख्यप्राणव्यपाश्रयः तद्वीर्याच्च असुरविध्वंसनम् अश्मलोष्टनिदर्शनेन इत्येवं बहवोऽर्था उभयत्राप्यविशिष्टाः प्रतीयन्ते।
वाजसनेयकेऽपि च उद्गीथसामानाधिकरण्यं प्राणस्य श्रुतम् एष उ वा उद्गीथः इति। तस्माच्छान्दोग्येऽपि कर्तृत्वं लक्षयितव्यम्। तस्माच्च विद्यैकत्वमिति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — * वाजसनेयके ' ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ' ( बृह ० १।३।१ ) ‘ ते
वाजसनेयक में ' ते ह देवा ऊचुः ० ' ( उन देवताओंने कहा, हम इस यज्ञमें उद्गीथसे असुरोंका अतिक्रमण करें ) ' ते ह वाचमूचुः ० ' ( उन देवताओंोंने वाक्से कहा, ' तुम हमारे लिए उद्गान करो ' वाणी - बहुत अच्छा ) इस प्रकार उपक्रमकर वाक् आदि प्राण असुर - पापोंसे माक्रान्त हैं, इस प्रकार उनकी निन्दा कर ' अथ हेममासन्यं ० ' ( फिर अपने मुखमें रहनेवाले प्राणसे कहा, ' तुम हमारे लिए उद्गान - उद्गाता सम्बन्धी कर्म करो ' ' तब बहुत अच्छा ' ऐसा कहकर इस प्राणने उनके लिए उद्गान किया ) इस प्रकार मुख्य प्राणका प्ररिग्रह कहते हैं।
ऐसे ही छान्दोग्य में भी ' तद्ध देवा ० ' ( उनमें से देवताओंने यह सोचकर कि इसके द्वारा इनका पराभव करेंगे, उद्गीथका अनुष्ठान किया ) इसप्रकार उपक्रमकर अन्य प्राणोंके असुरोंके पापोंसे आक्रान्त होनेसे उनकी निन्दाकर वैसे ही ' अथ ह य ० ' ( पुन यह जो प्रसिद्ध मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना उसकी उद्गीथरूपसे उपासना की ) इस प्रकार मुख्य प्राणका परिग्रह करते हैं। वाजसनेयक और छान्दोग्य दोनोंमें भी प्राणकी प्रशंसासे प्राणविद्याविधिका निश्चय होता है।
यहाँ संशय होता है कि क्या यहाँ विद्याका भेद है अथवा विद्या एक है? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्व न्यायसे विद्या एक है, यह प्राप्त होता है। परन्तु उपक्रमके भेद से
सूत्रार्थ - ( प्रकरणभेदात् ) प्रकरण मेदसे ( न वा ) द्या एक नहीं है, ( परोवरीयस्त्वादिवत् ) जैसे ' एष परोवरीयानुद्गीथः ' इस श्रुतिसे विहित परोवरीयस्त्वादि गुण विशिष्ट उद्गीथ उपासना, चक्षु, आदित्य आदि गत हिरण्यश्मश्रुत्व आदि गुण विशिष्ट उद्गीथोपासनासे भिन्न है। क्षरमुद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १।१।१ ) इत्येवमुद्गीथावयवस्यों कारस्योपास्यत्वं प्रस्तुत्य रसतविद्याका एकत्व युक्त नहीं है।
क्योंकि वाजसनेयी अन्य प्रकारसे उपक्रम करते हैं और छान्दोग अन्य रीतिसे ' त्वं न उद्गाय ' इसप्रकार वाजसनेयी प्राणको उद्गीथका कर्तारूपसे कहते हैं, और छान्दोग तो ' तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे ' ( उसकी उद्गीथरूपसे उपासना करें ) इसतरह प्राणको उद्गीथरूपसे ( कर्मरूपसे ) कहते हैं, तो इससे विद्याका एकत्व कैसे होगा। पू ० - ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि इतने विशेषसे विद्याका एकत्व निवृत्त नहीं होता, कारण कि बहुत - सा अविशेष भी प्रतीत होता है।
जैसे कि देवासुर संग्रामका उपक्रम, असुरोंके पराभव के लिए संवाद, उद्गोथका उपन्यास, वाक् आदिका संकीर्तन, उनकी निन्दासे मुख्य प्राणका आश्रय और पाषाण लोष्टके दृष्टान्तसे उस प्राणके वीर्यं पराक्रम द्वारा असुरोंका विध्वंस, इसप्रकारके बहुत अर्थं दोनों शाखाओंमें मो समान प्रतीत होते हैं। और ' एष उ वा उद्गीथ ' ( यह उद्गीथ है ) इसप्रकार वाजसनेयकमें भी प्राणकी उद्गीथसामानाधिकरण्य श्रुति है। इससे छान्दोग्यमें भी प्राण में कर्तृत्वकी लक्षणा करनी चाहिए। इसलिए विद्या एक है || ६ ||
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वाधिकरणोंमें विद्याओंके प्रतिपादक वाक्योंमें अविशेष होनेसे समानरूपसे विद्याका एकत्व कहा गया है। अब इस अधिकरण में उसका अपवाद करते हैं। यहाँ पूर्वाधिकरण सिद्धान्तन्यायसे ‘ उद्गीथविद्या ' इसप्रकार एक संज्ञा होने से एक विद्या है, इससे पूर्वपक्ष में परस्पर गुणोंका उपसंहार फल है, यह पूर्वपक्ष सूत्र है। सिद्धान्त में संज्ञा एक होनेपर भी विद्याके एकल्वका अपवाद होने से गुणका अनुपसंहार है। इसलिए कर्ता और कर्मरूप उपास्य के भेदसे विद्याका भेद है || ६
3.3.7 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ७
न वा प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत् ॥ ३.३.७ ॥
शाङ्करभाष्य
न वा विद्यैकत्वमत्र न्याय्यम् विद्याभेद एव अत्र न्याय्यः कस्मात् प्रकरणभेदात् प्रक्रमभेदादित्यर्थः तथा हि इह प्रक्रमभेदो दृश्यते छान्दोग्ये तावत् ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत इत्येवमुद्गीथावयवस्य ओंकारस्य उपास्यत्वं प्रस्तुत्य रसतमत्वादिगुणोपव्याख्यानं तत्र कृत्वा अथखल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति इति पुनरपि तमेव उद्गीथावयवमोंकारमनुवर्त्य देवासुराख्यायिकाद्वारेण तम्प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे इत्याह तत्र यदि उद्गीथशब्देन सकला भक्तिरभिप्रेयेत तस्याश्च कर्ता उद्गाता ऋत्विक् तत उपक्रमश्चोपरुध्येत लक्षणा च प्रसज्येत उपक्रमतन्त्रेण च एकस्मिन्वाक्ये उपसंहारेण भवितव्यम् तस्मात् अत्र तावत् उद्गीथावयवे ओंकारे प्राणदृष्टिरूपदिश्यते वाजसनेयके तु उद्गीथशब्देन अवयवग्रहणे कारणाभावात् सकलैव भक्तिरावेद्यतेत्वं न उद्गाय इत्यपि तस्याः कर्ता उद्गाता ऋत्विक् प्राणत्वेन निरूप्यत इति प्रस्थानान्तरम्।
यदपि तत्र उद्गीथसामानाधिकरण्यं प्राणस्य तदपि उद्गातृत्वेनैव दिदर्शयिषितस्य प्राणस्य सर्वात्मत्वप्रतिपादनार्थमिति न विद्यैकत्वमावहति। सकलभक्तिविषय एव च तत्रापि उद्गीथशब्द इति वैषम्यम्। न च प्राणस्योद्गातृत्वम् असंभवेन हेतुना परित्यज्यते उद्गीथभाववत् उद्गातृभावस्यापि उपासनार्थत्वेन उपदिश्यमानत्वात् प्राणवीर्येणैव च उद्गाता औद्गात्रं करोतीति नास्त्यसंभवः तथा च तत्रैव श्रावितम् वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायत् इति।
न च विवक्षितार्थभेदेऽवगम्यमाने वाक्यच्छायानुकारमात्रेण समानार्थत्वमध्यवसातुं युक्तम् तथा हि अभ्युदयवाक्ये पशुकामवाक्ये चत्रेधा तण्डुलान्विभजेद्ये मध्यमाः स्युस्तानग्नये दात्रे पुरोडाशमष्टाकपालं कुर्यात् इत्यादिनिर्देशसाम्येऽपि उपक्रमभेदात् अभ्युदयवाक्ये देवतापनयोऽध्यवसितः पशुकामवाक्ये तु यागविधिः तथा इहापि उपक्रमभेदात् विद्याभेदः।
परोवरीयस्त्वादिवत् यथा परमात्मदृष्ट्यध्याससाम्येऽपिआकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः इति परोवरीयस्त्वगुणविशिष्टम् उद्गीथोपासनम् अक्ष्यादित्यादिगतहिरण्यश्मश्रुत्वादिगुणविशिष्टोद्गीथोपासनात् भिन्नम् न च इतरेतरगुणोपसंहार एकस्यामपि शाखायाम् तद्वत् शाखान्तरस्थेष्वपि एवंजातीयकेषु उपासनेष्विति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सिद्धान्ती - यहाँ विद्याका एकत्व उचित नहीं है, किन्तु विद्याका भेद ही उचित है, किससे? प्रकरणके भेदसे, उपक्रमके भेदसे, ऐसा अर्थ है। जैसे कि ' ओमित्येतदक्षरम् ० ' ( ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिए ) इस प्रकार उद्गीथके अवयव ओंकारमें उपास्यत्व प्रस्तुत कर और वहाँ रसतम आदि गुणों का उपव्याख्यानकर अनन्तर ' खल्वेतस्यैव ० ' ( निश्चय इसी प्रकृत उद्गीथ अक्षरका उपव्याख्यान होता है ) इस प्रकार यहाँ छान्दोग्यमें उपक्रमभेद देखने में आता है।
फिर भी उसी उद्गीथावयव ॐकारकी अनुवृत्तिकर देवासुर आख्यायिका द्वारा उसको ' प्राणमु ० ' ( उन देवोंने नासिकामें स्थित प्राणके रूपमें उद्गीथकी उपासना की ) इस प्रकार श्रुति कहती है। यहाँ - छन्दोग्यमें यदि उद्गीथ शब्दसे सम्पूर्ण साम भक्ति अभिप्रेत हो और उसका कर्ता उद्गाता ऋत्विक हो, तो उपक्रम का बाध होगा और लक्षणा प्रसक्त होगी। एक वाक्यमें उपक्रमके अनुसार उपसंहार होना चाहिए। इससे यहाँ उद्गीथावयव ॐकारमें प्राण दृष्टिका उपदेश है।
वाजसनेयकमें तो उद्गीथ शब्दसे अवयव ग्रहण करनेमें कारणके न होनेसे सम्पूर्ण साम भक्ति कही जाती है, ' स्वं न उद्गाय ' इसमें भी उसका कर्ता उद्गाता ऋत्विक् प्राणरूपसे निरूपण किया जाता है, इससे यह अन्य प्रस्थान है। वहाँ भी जो प्राणका उद्गीथके साथ सामानाधिकरण्य है वह भी उद्गातृरूपसे दिखलाने के लिए अभिलषित प्राणमें सर्वात्मत्व प्रतिपादनके लिये है, विद्याके एकत्वका वहन नहीं करता।
वहाँ ( वाजसनेयक में ) मी उद्गीथं शब्द सकल भक्ति विषयक ही है इससे दोनों शाखाओंमें वैलक्षण्य है अर्थात् विद्याका भेद है। और प्राणमें उद्गातृत्वका असम्भव हेतु से त्याग नहीं किया जाता, क्योंकि उद्गीथभावके समान उद्गातृमाव भी उपासना के लिए उपदिश्यमान है, और उद्गाता प्राणकी सामथ्यसे ही ओद्गात्र कर्म करता अतः प्राण में उद्गातृत्वका असम्भव नहीं है। और ' वाचा च ह्येव ० ' ( उद्गाताने प्राण प्रधान वाणीसे और आत्मभूत प्राणसे उद्गान किया ) इस प्रकार वहाँ वाजसनेयकमें ही श्रवण कराया गया है।
और इस प्रकार विवक्षित अर्थके भेदके अवगम होनेपर वाक्य छायाके सादृश्यमात्र से समानार्थत्वएकार्थत्वका निश्चय करना युक्त नहीं है, क्योंकि अभ्युदयेष्टि वाक्यमें और पशुकामेष्टि विधायक वाक्यमें ' त्रेधा तण्डुलान् ० ' ( तण्डुलके तीन भाग करे उनमें जो मध्यम हों उनका दातृत्व गुण विशिष्ट अग्नि लिये अष्ट कपाल पुरोडाश करे ) इत्यादि निर्देश साम्य होनेपर भी उपक्रमके भेदसे अभ्युदयवाक्यमें [ हविका ] पूर्व देवतासे अपनय ( वियोग ) निश्चित किया गया है, और पशुकाम वाक्यमें तो यागकी विधि निश्चित की गई है, वैसे ही यहाँ भी उपक्रमके भेदसे विद्याका भेद है।
परोवरीयस्त्वादिके समान। जैसे परमात्मदृष्टिके अध्यासके समान होनेपर भी ' आकाशो ह्येनैभ्यो ० ' ( आकाश ही इन पृथिवी आदिसे बड़ा है, अतः आकाश ही इनका आश्रय है ) ' स एष ० ' ( वह यह उद्गीथ परम उत्कृष्ट है, यह अनन्त है ) इस प्रकार परोवरीयस्त्व गुणविशिष्ट उद्गीथ उपासना अक्षि, आदित्य आदि गत हिरण्यश्मश्रुत्वादिगुण विशिष्ट उद्गीथ उपासनासे भिन्न है, और जैसे एक शाखामें भी अन्योन्य गुणोंका उपसंहार नहीं है, वैसे अन्य शाखा में स्थित इस प्रकारकी उपासनाओंमें भी समझना चाहिए॥७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * बहुत से विरुद्ध रूपोंके भेदसे विद्या एक नहीं है, ऐसा ' न वा ' इत्यदिसे सिद्धान्त कहते हैं। और ' पृथिव्यादिरसानां रसतम ओङ्कारः ' ( पृथिवी आदि रसोंका रसतम ॐ कार है ) आप्ति, समृद्धि ऐसे गुणोंका कथनकर गुण विशिष्ट ॐकारमें प्राण दृष्टिका विधान करनेके लिये यह आख्यायिका प्रस्तुत की गयी है। इसी प्रकार छान्दोग्य में प्राण दृष्टिसे उद्गीथावयव ' ॐ ' उपास्य है, और वाजसनेयक में प्राण उपास्य कहा गया है, इस प्रकार उपास्यभेदसे विद्याका भेद है।
* वाजसनेयकमें उद्गाता प्राण उपास्य है और छान्दोग्य में ॐकार उपास्य है, इस प्रकार विवक्षितार्थ - अन्तरङ्ग उपास्य भेदके स्पष्ट ग्रहण होनेपर बहिरङ्ग अर्थवादको समतामात्रसे उपासनाका एकत्व युक्त नहीं है। इसमें ' तथाहि ' इत्यादिसे दृष्टान्त कहते हैं। ' वि वा एतं प्रजया पशुभिरर्द्धयति ० ' यह अभ्युदयेष्टि प्रतिपादक वाक्य है।
( यजमानने चतुर्दशीमें अमावस्याकी भ्रान्तिसे दर्शयागके लिये दर्श सम्बन्धी अग्नि आदि देवताके लिये तण्डुल, दधि और दूध रूप हवि पूर्वमें ही इन सबका संकल्प किया है, अनन्तर चन्द्रमाको उदय होते हुए देखता है, इसलिए उस यजमानको कालके विपर्यय जन्य अपराधसे वही संकल्पित हवि प्रजा आदिसे रहित करता है और उसके शत्रुओंकी वृद्धि करता है।
इससे कालकी भ्रान्तिवाले यजमानसे जो मध्यम आदि भावसे तीन प्रकारके दधि सहित तण्डुल सङ्कल्प किये गये हैं उनका विभाग करे अर्थात् अग्नि आदि देवतासे वियुक्त करे और दातृत्व आदि गुण विशिष्ट अग्नि, इन्द्र और विष्णु जो दर्श देवताओंसे भिन्न देवता हैं उनके उद्देश्य से दधिमें स्थूल तण्डुलोंका चरू बनाकर और गरम दूधमें छोटे तण्डुलोंका चरू बनाकर होम करे। यह पूर्वमीमांसाके ' ६।५।१ ' प्रथमाधिकरण ( अभ्युदयाधिकरण ) का विषय है।
इसमें सन्देह होता है कि यह अभ्युदयेष्टि दर्शयागसे भिन्न स्वतन्त्र कर्म है अथवा दर्शयागमें ही केवल देवताका अपनय - परिवर्तन है? पूर्वपक्ष - यहाँ कालके अपराध होनेपर अन्य देवोंसे युक्त दर्शयागसे भिन्न प्रायश्चित्तरूप कर्मका विधान है, जैसे पशुकामेष्टि स्वतन्त्र विहित कर्म है। सिद्धान्ती --- दर्शयागसे भिन्न कर्मका विधान नहीं है, क्योंकि दर्शयागमें पूर्व निश्चित देवताओंको हटाकर दातृत्व आदि गुण विशिष्ट अग्नि आदि अपूर्व देवताओंका विधान किया जाता है।
अतः यहाँ दर्शकर्मका भेद नहीं है और ' यः पशुकामः स्यात् सोऽमावस्यामिष्ट्वा वत्सानपाकुर्यात् ' इस विधिसे दर्शयागकी समाप्ति के अनन्तर स्वतन्त्ररूपसे पशुका - मेष्टिका विधान है, अतः समान प्रकरणमें होनेपर भी अभ्युदयेष्टि प्रतिपादक वाक्यके साथ पशुकामेष्टि विधायक वाक्यकी समानता नहीं है। इसी प्रकार प्रकृतमें भी समान निर्देश एक विद्याका प्रयोजक नहीं। इसमें परोवरीयस्त्वगुण विशिष्ट उद्गीथोपासनाको दृष्टान्तरूपसे दिया गया है।
जैसे कि आकाश नामक परमात्माकी दृष्टिके आलम्बनरूपसे उद्गीथको अनन्तशब्दसे कहा गया है। यहां आकाशरूपसे उद्गीथोपासनाका विधान है अन्यत्र हिरण्यश्मश्रुरूपसे उद्गीथोपासनाका विधान है। इन दोनोंमें उद्गीथोपासना समान होनेपर भी आकाशत्व और हिरण्यश्मश्रुत्व गुणभेदसे विद्याका भेद है, वैसे ही वाजसनेयक और छान्दोग्यमें समान जातीय विद्याका भी विधानभेद से भेद ही है॥ ७
3.3.8 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ८
संज्ञातश् चेत् तद् उक्तम् अस्ति तु तद् अपि ॥ ३.३.८ ॥
पदच्छेद — संज्ञातः , चेत् , तत् , उक्तम् , अस्ति , तु , तद् , अपि
सूत्रार्थ — ( चेत् ) यदि कहो कि ( संज्ञातः ) दोनों स्थलोंमें ' उद्गीथविद्या ' इस एक संज्ञासे विद्या एक है, तो ( तदुक्तम् ) ' न वा प्रकरणभेदात् ' इस सूत्र में कहा गया है। ( अस्ति तु तदपि ) और जो भिन्नरूपसे अग्निहोत्र आदि प्रसिद्ध हैं, उनकी भी काठक ग्रन्थमें पठित होनेसे एक काठक संज्ञा होती है। अथोच्येत - संज्ञैकत्वाद्विद्यैकत्वमत्र न्याय्यमुद्गीथ विद्येत्युभयत्राप्येका संज्ञेति-
शाङ्करभाष्य
अथोच्येत संज्ञैकत्वात् विद्यैकत्वमत्र न्याय्यम् उद्गीथविद्येत्युपभयत्रापि एका संज्ञेति तदपि नोपपद्यते उक्तं ह्येतत् न वा प्रकरणभेदात्परोवरीयस्त्वादिवत् इति तदेव च अत्र न्याय्यतरं श्रुत्यक्षरानुगतं हि तत् संज्ञैकत्वं तु श्रुत्यक्षरबाह्यम् उद्गीथशब्दमात्रयोगात् लौकिकैर्व्यवहर्तृभिरुपचर्यते। अस्ति च एतत्संज्ञैकत्वं प्रसिद्धभेदेष्वपि परोवरीयस्त्वाद्युपासनेषु उद्गीथविद्येति तथा प्रसिद्धभेदानामपि अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादीनां काठकैकग्रन्थपरिपठितानां काठकसंज्ञैकत्वं दृश्यते तथेहापि भविष्यति। यत्र तु नास्ति कश्चित् एवंजातीयको भेदहेतुः तत्र भवतु संज्ञैकत्वात् विद्यैकत्वम् यथा संवर्गविद्यादिषु।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यदि ऐसा कहा जाय कि संज्ञाके एकत्वसे विद्याका एकत्व यहाँ उचित है, क्योंकि उभयत्र ' उद्गीथ विद्या ' इस प्रकार एक संज्ञा है। वह मी युक्त नहीं है, कारण कि इसका ' न वा प्रकरणभेदात् ० ' इस सूत्र में निर्णय किया गया है। वही यहाँ प्रकृतमें युक्ततर है, क्योंकि वह श्रुति के अक्षरोंसे अनुगत है, और संज्ञा एकत्व तो श्रुतिके अक्षरोंसे बाह्य है, उद्गीथ शब्दमात्रके प्रयोगसे व्यवहार करनेवाले लौकिक उसका उपचार करते हैं। इस प्रकार प्रसिद्ध भेदवाली परोवरीयस्त्व आदि उपासनाओंमें ' उद्गीथविद्या ' इस प्रकार यह संज्ञा एकत्व है। और एक ही काठक ग्रन्थमें पठिन प्रसिद्ध भेदवाले अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास आदिका मी काठक एक संज्ञात्व देखने में आता है, वैसे यहाँ मी होना चाहिए। परन्तु जहाँ इस प्रकारका कोई भेदका हेतु नहीं है वहाँ संज्ञाके एकत्वसे विद्याका एकत्व हो, जैसे संवर्ग विद्या आदिमें होता है॥ ८
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
व्याप्यधिकरणम्
3.3.9 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ९
व्याप्तेश् च समञ्जसम् ॥ ३.३.९ ॥
पदच्छेद — व्याप्तेः च , समञ्जसम्
सूत्रार्थ — ( व्याप्तेः ) ऋक्, यजु और साममें ॐकारकी व्याप्ति है, अतः किस ॐकारको उपासना करनी चाहिए, ऐसी जिज्ञासा होनेपर ' उद्गीथावयव ॐकारकी ' इस प्रकार उद्गीथ ॐकारका विशेषण है, ( समञ्जसम् ) यही पक्ष दोष रहित है। ' च ' शब्द तु शब्द के अर्थ में है, अत : अध्यास, अपवाद और ऐक्य पक्षका निरास होता है।
शाङ्करभाष्य
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत इत्यत्र अक्षरोद्गीथशब्दयोः सामानाधिकरण्ये श्रूयमाणे अध्यासापवादैकत्वविशेषणपक्षाणां प्रतिभासनात् कतमोऽत्र पक्षोन्याय्यः स्यादिति विचारः।
तत्र अध्यासो नाम द्वयोर्वस्तुनोः अनिवर्तितायामेव अन्यतरबुद्धौ अन्यतरबुद्धिरध्यस्यते यस्मिन् इतरबुद्धिरध्यस्यते अनुवर्तत एव तस्मिन् तद्बुद्धिः अध्यस्तेतरबुद्धावपि यथा नाम्नि ब्रह्मबुद्धावध्यस्यमानायामपि अनुवर्तत एव नामबुद्धिः न ब्रह्मबुद्ध्या निवर्तते यथा वा प्रतिमादिषु विष्ण्वादिबुद्ध्यध्यासः एवमिहापि अक्षरे उद्गीथबुद्धिरध्यस्येत उद्गीथे वा अक्षरबुद्धिरिति।
अपवादो नाम यत्र कस्मिंश्चिद्वस्तुनि पूर्वनिविष्टायां मिथ्याबुद्धौ निश्चितायाम् पश्चादुपजायमाना यथार्था बुद्धिः पूर्वनिविष्टाया मिथ्याबुद्धेः निवर्तिका भवति यथा देहेन्द्रियसंघाते आत्मबुद्धिः आत्मन्येव आत्मबुद्ध्या पश्चाद्भाविन्यातत्त्वमसि इत्यनया यथार्थबुद्ध्या निवर्त्यते यथा वा दिग्भ्रान्तिबुद्धिः दिग्याथात्म्यबुद्ध्या निवर्त्यते एवमिहापि अक्षरबुद्ध्या उद्गीथबुद्धिर्निवर्त्येत उद्गीथबुद्ध्या वा अक्षरबुद्धिरिति।
एकत्वं तु अक्षरोद्गीथशब्दयोरनतिरिक्तार्थवृत्तित्वम् यथा द्विजोत्तमो ब्राह्मणो भूमिदेव इति। विशेषणं पुनः सर्ववेदव्यापिन ओमित्येतस्याक्षरस्य ग्रहणप्रसङ्गे औद्गात्रविशेषस्य समर्पणम् यथा नीलं यदुत्पलम् तदानयेति एवमिहापि उद्गीथो य ओंकारः तमुपासीतेति। एवमेतस्मिन्सामानाधिकरण्यवाक्ये विमृश्यमाने एते पक्षाः प्रतिभान्ति तत्रान्यतमनिर्धारणकारणाभावात् अनिर्धारणप्राप्तौ इदमुच्यते व्याप्तेश्च समञ्जसमिति। चशब्दो़ऽयं तुशब्दस्थाननिवेशी पक्षत्रयव्यावर्तनप्रयोजनः।
तदिह त्रयः पक्षाः सावद्या इति पर्युदस्यन्ते विशेषणपक्ष एवैको निरवद्य इत्युपादीयते। तत्राध्यासे तावत् या बुद्धिः इतरत्र अध्यस्यते तच्छब्दस्य लक्षणावृत्तित्वं प्रसज्येत तत्फलं च कल्प्येत श्रूयत एव फलम्आपयिता ह वै कामानां भवति इत्यादि इति चेत् तन्न तस्य अन्यफलत्वात् आप्त्यादिदृष्टिफलं हि तत् नोद्गीथाध्यासफलम्।
अपवादेऽपि समानः फलाभावः मिथ्याज्ञाननिवृत्तिः फलमिति चेत् न पुरुषार्थोपयोगानवगमात् न च कदाचिदपि ओंकारात् ओकारबुद्धिर्निवर्तेत उद्गीथाद्वा उद्गीथबुद्धिः न चेदं वाक्यं वस्तुतत्त्वप्रतिपादनपरम् उपासनाविधिपरत्वात्। नापि एकत्वपक्षः संगच्छते निष्प्रयोजनं हि तदा शब्दद्वयोच्चारणं स्यात् एकेनैव विवक्षितार्थसमर्पणात्।
न च हौत्रविषये आध्वर्यवविषये वा अक्षरे ओंकारशब्दवाच्ये उद्गीथशब्दप्रसिद्धिरस्ति नापि सकलायाम् साम्नो द्वितीयायां भक्तौ उद्गीथशब्दवाच्यायाम् ओंकारशब्दप्रसिद्धिः येनानतिरिक्तार्थता स्यात्। परिशेषाद्विशेषणपक्षः परिगृह्यते व्याप्तेः सर्ववेदसाधारण्यात् सर्वव्याप्यक्षरमिह मा प्रसञ्जि इत्यत उद्गीथशब्देन अक्षरं विशेष्यते कथं नाम उद्गीथावयवभूत ओंकारो गृह्येतेति।
नन्वस्मिन्नपि पक्षे समाना लक्षणा उद्गीथशब्दस्य अवयवलक्षणार्थत्वात् सत्यमेवमेतत् लक्षणायामपि तु संनिकर्षविप्रकर्षौ भवत एव अध्यासपक्षे हि अर्थान्तरबुद्धिरर्थान्तरे निक्षिप्यत इति विप्रकृष्टा लक्षणा विशेषणपक्षे तु अवयविवचनेन शब्देन अवयवः समर्प्यत इति संनिकृष्टा समुदायेषु हि प्रवृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्तमाना दृष्टाः पटग्रामादिषु। अतश्च व्याप्तेर्हेतोःओमित्येतदक्षरम् इत्येतस्यउद्गीथम् इत्येतद्विशेषणमिति समञ्जसमेतत् निरवद्यमित्यर्थः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' ओमित्येतद् ० ' ( इस उद्गीथावयव ॐ अक्षरकी उपासना करनी चाहिए ) यहाँ अक्षर और उद्गीथ शब्दका सामानाधिकरण्य श्रूयमाण होनेपर अध्यास, अपवाद, एकत्व और विशेषण इन पक्षोंका प्रतिभास होनेसे इनमें कौन - सा पक्ष उचित है, यह विचार होता है। उनमें दो वस्तुओंमें एक वस्तुकी बुद्धि निवृत्त हुए विना ही दूसरी बुद्धि अध्यस्त हो वह बध्यास है, जिसमें अन्य बुद्धि अध्यस्त होती है उसमें अन्य बुद्धिके अध्यस्त होनेपर उस वस्तुकी बुद्धि अनुवृत्त होती है।
जैसे नाम में ब्रह्मबुद्धिका अध्यास होनेपर भी नामबुद्धि अनुवृत्त होती ही है वह ब्रह्मबुद्धिसे निवृत्त नहीं होती। अथवा जैसे प्रतिमा आदिमें विष्णु आदि बुद्धिका अध्यास होता है वह विष्णु आदि बुद्धिसे निवृत्त नहीं होती। वैसे प्रकृतमें मी अक्षर में उद्गीथ बुद्धिका अध्यास है अथवा उद्गीथमें अक्षर बुद्धिका अध्यास है। जहाँ किसी वस्तु में पूर्व निविष्ट मिथ्याबुद्धिका निश्चय होनेपर पश्चात् उत्पन्न होनेवाली यथार्थं बुद्धि पूर्व निविष्ट मिथ्याबुद्धिकी निवर्तक होती है वह अपवाद है।
जैसे देह, इन्द्रिय संघातमें आत्मबुद्धि ' तत्त्वमसि ' इससे अनन्तर उत्पन्न होनेवाली आत्मामें ही आत्मबुद्धि इस अन्य यथार्थ बुद्धिसे निवृत्त हो जाती है। अथवा जैसे दिशाकी भ्रान्ति बुद्धि दिशाकी यथार्थ बुद्धिसे निवृत्त हो जाती है, वैसे ही यहाँपर भी अक्षर बुद्धिसे उद्गीथ बुद्धि निवृत्त हो जाती है अथवा उद्गीथ बुद्धिसे अक्षर बुद्धि निवृत्त हो जाती है। एकत्व तो अक्षर और उद्गीथ शब्दके अभिन्न अर्थ में वृत्तित्व है, जैसे द्विजोत्तम, ब्राह्मण और भूमिदेव।
विशेषण - यह उद्गीय विशेषण सर्व वेदव्यापी ॐ इस अक्षरके ग्रहण के प्रसंग में उद्गाता के कर्म विशेषका समर्पण करता है। जैसे नील जो उत्पल उसे ले आओ अर्थात् नीलगुण विशिष्ट कमल ले आओ, वैसे यहाँ भी उद्गीथ जो ओंकार उसकी उपासना करनी चाहिए। इसप्रकार इस सामानाधिकरण्य वाक्यका विचार करनेपर ये पक्ष प्रतीत होते हैं।
उनमें किसी एक के निर्धारण कारणके न होने से अनिर्धारण प्राप्त होनेपर, सिद्धान्ती यह कहते हैं - ' व्याप्तेश्च समञ्जसम् ' ' च ' शब्द तु शब्दके स्थान में है, और तीनों पक्षोंकी व्यावृत्ति प्रयोजनवाला है। इसलिए यहाँ तीनों समञ्जसमिति। चशब्दोऽयं तुशब्दस्थाननिवेशी पक्षत्रयव्यावर्तनप्रयोजनः। तदिह त्रयः पक्षाः सावद्या इति पर्युदस्यन्ते। विशेषणपक्ष एवैको निरवद्य इत्युपादीयते। तत्राभ्यासे पक्ष सदोष हैं, इससे वे पर्युदस्त हैं। केवल एक विशेषण पक्ष ही निर्दोष है, अतः उसका ग्रहण किया जाता है।
उनमेंसे प्रथम अध्यास में तो जो बुद्धि अन्यत्र अध्यस्त होती है, उस शब्दकी लक्षावृत्ति प्रसक्त होगी और उसके फलकी कल्पना करनी पड़ेगी। यदि कहो कि ' आपयिता ह ० ' ( वह यजमानकी कामनाओंको प्राप्त करानेवाला होता है ) इत्यादि फल श्रुति है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि उसका अन्य फल है अर्थात् वह अन्यका फल है। अति आदिरूपसे ओंकारको दृष्टिका फल है उद्गीथके अध्यासका फल नहीं है। अपवादमें मी फलका अभाव समान है।
यदि कहो कि मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति उसका फल है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि उसका पुरुषार्थरूप फल उपोयोग ज्ञात नहीं होता और कभी भी मोंकारसे मोंकार बुद्धि और उद्गीथसे उद्गीथ बुद्धि निवृत्त नहीं होती, यह वाक्य [ ओमित्येतदक्षमुद्गीथमुपासीत ] वस्तुतत्त्व प्रतिपादन परकं मी नहीं है, कारण कि वह उपासना विधि परक है। इसीप्रकार एकत्व पक्ष भी संगत नहीं है, क्योंकि उस पक्ष में दो वार शब्दका उच्चारण निरर्थक होगा। एक ही वार उच्चारणसे विवक्षितार्थं समर्पित हो जाता है।
हौत्रविषयक reat मध्वर्यविषयक ओंकारशब्दवाच्य अक्षर में भी उद्गीथशव्दकी प्रसिद्धि नहीं है। और सामकी उद्गीथशब्दवाच्य सम्पूर्ण दूसरी भक्ति - भागमें भी मोंकारशब्दकी प्रसिद्धि नहीं है, जिससे उसमें एकार्थत्व हो। अतः परिशेषसे विशेषणपक्ष ही परिगृहीत होता है, क्योंकि ओंकारकी व्याप्ति सर्ववेदसाधारण- समान है।
सर्वव्यापी ॐ अक्षर यहाँ प्रसक्त न हो, अतः उद्गीथ शब्दसे ॐ अक्षर यहाँ विशेषित किया जाता है, किसप्रकार उद्गीथके अवयवभूत ओंकारका प्रकृतमें ग्रहण किया जाय [ इस अभिप्रायसे ] परन्तु इस पक्ष में भी लक्षणाका प्रसंग समान है, कारण कि उद्गीथशब्दका अवयव अर्थ लक्षण से होता है। यह सत्य है, परन्तु लक्षणामें भी वो संनिकर्ष और विप्रकर्ष होता ही है।
अध्यास -पक्षमें अन्य अर्थ विषयक बुद्धि दूसरे अर्थ में प्रक्षिप्त होती है, अतः विप्रकृष्ट लक्षाणा है, विशेषणपक्ष में तो अवयवी वाचक शब्दसे अवयव समर्पित होता है, इससे संनिकृष्ट लक्षणा है। समुदायोंमें प्रवृत्त शब्द अवयवोंमें मी प्रवृत्त होते देखे जाते हैं। जैसे पट, ग्राम नदिमें। इसलिए व्याप्ति हेतुसे ' ॐ ' इस अक्षरका ' उद्गोथ ' यह विशेषण है, इसप्रकार यह समञ्जस निर्दोष है, ऐसा अर्थ है॥ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ॐ अक्षर मोर उद्गीथके सामानाधिकरण्यको इस अधिकरणका विषय बनाकर ' ओमित्येतद् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। सामानाधिकरण्य अध्यास, अपवाद, एकत्व और विशेषण - विशेष्य भाव में होता है। ' भेदबुद्धिपूर्वकाभेदारोप अध्यास : ' ( भेदबुद्धि पूर्वक अभेदका आरोप अध्यास है ) जैसे ‘ सिंहो माणवकः ' ' माणवक सिंह है, माणवकमें माणवकत्व बुद्धि के निवृत्त न होते हुए भी उसमें सिंहबुद्धिसे सिहशब्दका प्रयोग होता है। जैसे यहाँ अध्यास में सामानाधिकरण्य है, वैसे ही प्रकृतमें भी होना चाहिए।
* सिद्धान्ती -
— जिस उद्गीथबुद्धिका ओंकारमें आरोप किया जाता है, उस उद्गीथ अर्थके वाचक उद्गीथशब्दकी ओंकारमें लक्षणा प्रसक्त होगी अर्थात् उस उद्गीथशब्दका लक्षणावृत्तिसे ओंकाररूप लक्ष्यार्थं मानना पड़ेगा, क्योंकि ओंकारमें उद्गीथबुद्धिका विषयत्व गोणरूप से प्रतिपादित है। तथा सम्बन्ध भी असिद्ध होनेसे कल्पनीय होगा, इससे प्रतीकोपासनाका फल भी कल्पनीय होगा, अतः गौरव है | यदि कहो कि ' आपयिता ह वै कामनां भवति ' इस श्रुतिमें फलका श्रवण है? तो यह फल अध्यासका नहीं है, किन्तु उपासनाका है। इसीप्रकार अध्यासके समान अपवादका सो फल नहीं है।
* जैसे पटके अवयवों अथवा ग्रामके अवयवरूप कुछ घरोंके जल जानेपर पट जल गया, ग्राम जल गया, ऐसा व्यवहार लोकमें प्रसिद्ध है। इसप्रकार सर्व वेदव्यापी ॐ कारका निराकरण कर उद्गीथके अवयवरूप ॐ कारमें प्राणदृष्टि विधानके लिए विशेषण ही युक्त है, क्योंकि इसमें कल्पना लाघव है। इससे विशेषण पक्ष निर्दोष है॥ ९
सर्वाभेदाधिकरणम्
3.3.10 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १०
सर्वाभेदादन्यत्रेमे ॥ ३.३.१० ॥
पदच्छेद — सर्वाभेदात् , अन्यत्र , इमे
सूत्रार्थ — किसी शाखा में पठित ( इमे ) वसिष्ठत्व आदि गुण ( अन्यत्र ) अन्य शाखामें मी गृहीत होते हैं, ( सर्वाभिदात् ) क्योंकि सब शाखाओं में प्राणविज्ञानका अभेद है।
शाङ्करभाष्य
वाजिनां छन्दोगानां च प्राणसंवादे श्रैष्ठ्यगुणान्वितस्य प्राणस्य उपास्यत्वमुक्तम् वागादयोऽपि हि तत्र वसिष्ठत्वादिगुणान्विता उक्ताः ते च गुणाः प्राणे पुनः प्रत्यर्पिताः यद्वा अहं वसिष्ठास्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसि इत्यादिना। अन्येषामपि तु शाखिनां कोषीतकिप्रभृतीनां प्राणसंवादेषुअथातो निःश्रेयसादानमेता ह वै देवता अहंश्रेयसे विवदमानाः इत्येवंजातीयकेषु प्राणस्य श्रैष्ठ्यमुक्तम् न त्विमे वसिष्ठत्वादयोऽपि गुणा उक्ताः।
तत्र संशयः किमिमे वसिष्ठत्वादयो गुणाः क्वचिदुक्ता अन्यत्रापि अस्येरन् उत नास्येरन्निति।
तत्र प्राप्तं तावत् नास्येरन्निति कुतः एवंशब्दसंयोगात्अथो य एवं विद्वान्प्राणे निःश्रेयसं विदित्वा इति हि तत्र तत्र एवंशब्देन वेद्यं वस्तु निवेद्यते एवंशब्दश्च संनिहितावलम्बनः न शाखान्तरपरिपठितम् एवंजातीयकं गुणजातं शक्नोति निवेदयितुम् तस्मात् स्वप्रकरणस्थैरेव गुणैर्निराकाङ्क्षत्वमित्येवं प्राप्ते प्रत्याह अस्येरन् इमे गुणाः क्वचिदुक्ता वसिष्ठत्वादयः अन्यत्रापि कुतः सर्वाभेदात् सर्वत्रैव तदेव एकं प्राणविज्ञानमभिन्नं प्रत्यभिज्ञायते प्राणसंवादादिसारूप्यात् अभेदे च विज्ञानस्य कथम् इमे गुणाः क्वचिदुक्ता अन्यत्र न अस्येरन्।
ननु एवंशब्दः तत्र तत्र भेदेन एवंजातीयकं गुणजातं वेद्यत्वाय समर्पयतीत्युक्तम् अत्रोच्यते यद्यपि कौषीतकिब्राह्मणगतेन एवंशब्देन वाजसनेयिब्राह्मणगतं गुणजातम् असंशब्दितम् असंनिहितत्वात् तथापि तस्मिन्नेव विज्ञाने वाजसनेयिब्राह्मणगतेन एवंशब्देन तत् संशब्दितमिति न परशाखागतमपि अभिन्नविज्ञानावबद्धं गुणजातं स्वशाखागताद्विशिष्यते न चैवं सति श्रुतहानिः अश्रुतकल्पना वा भवति एकस्यामपि हि शाखायां श्रुता गुणाः श्रुता एव सर्वत्र भवन्ति गुणवतो भेदाभावात् न हि देवदत्तः शौर्यादिगुणत्वेन स्वदेशे प्रसिद्धः देशान्तरं गतः तद्देश्यैरविभावितशौर्यादिगुणोऽपि अतद्गुणो भवति यथा च तत्र परिचयविशेषात् देशान्तरेऽपि देवदत्तगुणा विभाव्यन्ते एवम् अभियोगविशेषात् शाखान्तरेऽप्युपास्या गुणाः शाखान्तरेऽप्यस्येरन्।
तस्मादेकप्रधानसंबद्धा धर्मा एकत्राप्युच्यमानाः सर्वत्रैव उपसंहर्तव्या इति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वाजसनेयी और छान्दोगोंके प्राणसंवादमें श्रेष्ठत्वगुणसे युक्त प्राणको उपास्य कहा गया है, और उसमें वाग् आदि मी वसिष्ठत्व आदि गुणोंसे युक्त कहे गये हैं। और वे गुण ' यद्वा अहं ० ' ( मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस प्रतिष्ठा से युक्त हो, ऐसा नेत्रने कहा ) इत्यादिसे पुन : प्राणमें प्रत्यर्पित किये गये हैं।
और कौषीतको आदि अन्य शाखावालोंने मी तो ' अथातो निःश्रेयसादानमेता ० ' ( अब श्रेष्ठताका निर्धारण होता है ये देवता अपनी श्रेष्ठताके लिए विवाद करते हुए ) इसप्रकार के प्राणसंवादोंमें प्राणको श्रेष्ठ कहा है। परन्तु ये वसिष्ठत्व आदि गुण नहीं कहे गये हैं। वहां संशय होता है कि किसी शाखा में कहे गये ये वसिष्ठत्व व्यादि गुण क्या वे अन्य शाखा में भी लिये जाते हैं अथवा नहीं लिये जाते? नहीं लिये जाते, ऐसा वहाँ प्राप्त होता है। किससे?
इससे कि ' एवं ' शब्दका संयोग है | ' अथो य एवं विद्वान् ० ' ( प्राण श्रेष्ठ है, इसप्रकार जाननेवाला जो विद्वान् प्राणमें निःश्रेयसको जानकर श्रेष्ठ होता है ) इसप्रकार तत् तत् स्थलोंमें ' एवं ' शब्दसे वेद्य वस्तु निवेदित की जाती है और संनिहितावलम्बी ' एवं ' शब्द अन्य शाखाओं में पठित इस प्रकारके गुण समूहका निवेदन नहीं कर सकता, इसलिए अपने प्रकरण में स्थित गुणोंसे ही निराकांक्षता है।
सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं— कहोंपर उक्त ये वसिष्ठत्व आदि गुण अन्यशाखामें भी गृहीत होते हैं, किससे? इससे कि सर्वत्र अभेद है। सभी शाखाओंमें वही एक अभिन्न प्राणविज्ञान प्रत्यभिज्ञात होता है, क्योंकि प्राणसंवाद आदि समान है। विज्ञानका अभेद होनेपर किसो शाखामें कहे गये ये गुण अन्य शाखाओंमें क्यों नहीं लिये जायँगे। परन्तु ऐसा कहा गया कि ' एवं ' शब्द तत् तत् स्थलमें इसप्रकारके गुण समूहका भेदरूपसे वेद्यत्वके लिए समर्पण करता है।
सि ० - इसपर कहते हैं - यद्यपि कौषीतकि ब्राह्मण गत ' एवं ' शब्दसे वाजसनेयी ब्राह्मणगत गुण समुदाय प्रतिपादित नहीं हैं, क्योंकि वे गुण असंनिहित हैं, तथापि उसी विज्ञानमें वाजसनेयी ब्राह्मणगत ' एवं ' शब्द से वे गुणसमूह प्रतिपादित हैं। इसलिए अभिन्न विज्ञानसे अवबद्ध - सम्बद्ध अन्य शाखागत मी गुण समुदाय अग्ने शाखागत गुण समूहसे भिन्न नहीं होते और ऐसा होनेपर श्रुतहानि अथवा अश्रुत कल्पना भी नहीं होती। एक शाखामें भी श्रुत गुण सर्वत्र ही श्रुत होते हैं, क्योंकि गुणवान्के भेदका अभाव है।
अपने देशमें शौयं आदि गुणरूपसे प्रसिद्ध देवदत्त अन्य देशमें गया हो उस देशवासियों द्वारा उसके शौर्यं आदि गुण अज्ञात होनेपर भी वह उन गुणोंसे रहित नहीं होता, और जैसे परिचय विशेषसे वहाँ अन्यदेशमे भी देवदत्त के गुण अवभासित होते हैं, वैसे ही सम्बन्ध विशेषसे अन्य शाखाके उपास्य गुण भी दूसरी शाखामें लिये जाते हैं। इसलिए एक शाखामें कहे हुए एक प्रधानके साथ सम्बद्ध धर्मोका सभी शाखाओं में उपसंहार होना चाहिए॥ १०
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * विषय समझानेके लिए वाजसनेयी और छान्दोग उमय सम्मत् अर्थ ' वार्जिनां ' इत्यादिसे कहते हैं 1
। वाणी वसिष्ठत्व गुणवाली है, क्योंकि वाग्मी लोकमें सुखपूर्वकं निवासका दर्शन है, नेत्र प्रतिष्ठा गुणसे युक्त हैं, क्योंकि नेत्रवालोंकी पाद प्रतिष्ठा देखनेमें आती है। श्रोत्र सम्पद् गुण विशिष्ट हैं, क्योंकि श्रोत्रवालों को ही श्रवण करनेसे सब शास्त्रीय अर्थों की सम्पत्ति होती है, मन आयतन गुण युक्त है, क्योंकि वह वृत्तिद्वारा सब भोग्य पदार्थों का आश्रय है, वे गुण गुणीकी श्रेष्ठताका निश्चय कर वागू आदिसे प्राणमें ही अर्पित किये गये हैं, ऐसा दोनों शाखाओं में सम्मत अर्थ है। अब इस अधिकरणका ' अन्येषाम् ' इत्यादिसे विषय कहते हैं। यहाँपर गुणों का अनुपसंहार पूर्वपक्षका और और उपसंहार सिद्धान्तका फल है।
* " कौषीतकिश्रुतिस्थ प्राणः, वसिष्ठत्वादिगुणकः, श्रेष्ठ पाणत्वात् वाजिश्रुतिस्थप्राणवत् " ( कौषीतकी श्रुति में स्थित प्राण वसिष्ठत्व आदि गुणवाला है, श्रेष्ठ प्राण होनेसे, वाजिश्रुतिस्थं प्राणके समान ) इसप्रकार अश्रुत गुणोंका अनुमान होनेपर श्रुतकी हानि नहीं है और अश्रुतकी कल्पना भी नहीं है, क्योंकि कोई विरोध नहीं है। इसको ' न चैवसति ' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं॥ १०
आनन्दाद्यधिकरणम्
3.3.11 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ११
आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ३.३.११ ॥
पदच्छेद — आनन्दादयः , प्रधानस्य
सूत्रार्थ — ( प्रधानस्य ) ब्रह्म के ( आनन्दादयः ) आनन्दत्व आदि धर्मोका सर्वत्र उपसंहार होना चाहिए, क्योंकि सब शाखाओं में वैद्य ब्रह्म एक है |
शाङ्करभाष्य
ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनपरासु श्रुतिषु आनन्दरूपत्वं विज्ञानघनत्वं सर्वगतत्वं सर्वात्मत्वंमित्येवंजातीयका ब्रह्मणो धर्माः क्वचित् केचित् श्रूयन्ते। तेषु संशयः किमानन्दादयो ब्रह्मधर्माः यत्र यावन्तः श्रूयन्ते तावन्त एव तत्र प्रतिपत्तव्याः किं वा सर्वे सर्वत्रेति। तत्र यथाश्रुतिविभागं धर्मप्रतिपत्तौ प्राप्तायाम् इदमुच्यते आनन्दादयः प्रधानस्य ब्रह्मणो धर्माः सर्वे सर्वत्र प्रतिपत्तव्याः कस्मात् सर्वाभेदादेव सर्वत्र हि तदेव एकं प्रधानं विशेष्यं ब्रह्म न भिद्यते तस्मात् सार्वत्रिकत्वं ब्रह्मधर्माणाम् तेनैव पूर्वाधिकरणोदितेन देवदत्तशौर्यादिनिदर्शनेन।। ननु एवं सति प्रियशिरस्त्वादयोऽपि धर्माः सर्वे सर्वत्र संकीर्येरन् तथा हि तैत्तिरीयके आनन्दमयमात्मानं प्रक्रम्य आम्नायते तस्य प्रियमेव शिरः। मोदो दक्षिणः पक्षः। प्रमोद उत्तरः पक्षः। आनन्द आत्मा। ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इति। अत उत्तरं पठति
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ब्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंमें बादन्दरूपत्व, निज्ञानघनत्व, सर्वगतत्व और सर्वात्मत्व इसप्रकार के ब्रह्मके धर्म कहीं पर कोई सुने जाते हैं। उनमें संशय होता है — क्या ब्रह्म के आनन्द आदि धर्म जहाँ जितने सुने जाते हैं उतने ही वहाँ प्रतिपत्तव्य हैं अथवा सबकी सर्वत्र प्रतिपत्ति होनी चाहिए? श्रुतिविभाग के अनुसार धर्मोकी प्रतिपत्ति प्राप्त होनेपर यह कहते हैं - प्रधानभूत ब्रह्मके आनन्द आदि सब धर्मं सर्वत्र जानने चाहिए, किससे? सबके साथ अभेद होनेसे ही। वही एक प्रधान विशेष्य ब्रह्म सर्वत्र भिन्न नहीं है। इसलिए पूर्वाधिकरणमें उक्त उसी देवदत्तके शौर्य आदि दृष्टान्त ब्रह्मके धमं सार्वत्रिक हैं॥ ११
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' आनन्दो ब्रह्म ' इसप्रकार ब्रह्म के साथ सामानाधिकरण्यसे पठित वे आनन्द आदि पद जड़त्व, दुःखत्व, मिथ्यात्व आदि ब्रह्ममें कल्पित विरुद्ध धर्मोकी निवृत्ति द्वारा अखण्ड अद्वय ब्रह्मका लक्षणासे बोध कराते हैं, इसलिए व्यर्थं नहीं हैं। ' सच्चिदानन्द अद्वय निर्विशेष ब्रह्म मैं हूँ ' ऐसा बिशेष ज्ञान जितने पदोंसे संभव हो उतने पदोंका उपसंहार युक्त है, अतः ब्रह्मके आनन्दत्व आदि सभी धर्मों का सब शाखाओं में उपसंहार होना चाहिए॥। ११
3.3.12 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १२
प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥ ३.३.१२ ॥
पदच्छेद — प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः , उपचयापचयो , हि , भेदे
सूत्रार्थ — एक शाखा में श्रुत ( प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः ) प्रियशिरस्त्वादि धर्मो की सर्वत्र प्राप्ति नहीं है, ( हि ) क्योंकि प्रिय, मोद, प्रमोद और आनन्द ये परस्परकी और अन्य भोक्ताकी अपेक्षासे ( उपचयापचयो ) वृद्धि और ह्रासरूपसे उपलब्ध होते हैं, ये ( भेदे ) भेदमें ही हो सकते हैं, ब्रह्म तो एक है, अतः उसके धर्म नहीं हो सकते।
शाङ्करभाष्य
प्रियशिरस्त्वादीनां धर्माणां तैत्तिरीयके आम्नातानां नास्ति अन्यत्र प्राप्तिः यत्कारणम् प्रियं मोदः प्रमोद आनन्द इत्येते परस्परापेक्षया भोक्त्रन्तरापेक्षया च उपचितापचितरूपा उपलभ्यन्ते उपचयापचयौ च सति भेदे संभवतः निर्भेदं तु ब्रह्मएकमेवाद्वितीयम् इत्यादिश्रुतिभ्यः। न च एते प्रियशिरस्त्वादयो ब्रह्मधर्माः कोशधर्मास्तु एते इत्युपदिष्टमस्माभिःआनन्दमयोऽभ्यासात् इत्यत्र।
अपि च परस्मिन् ब्रह्मणि चित्तावतारोपायमात्रत्वेन एते परिकल्प्यन्ते न द्रष्टव्यत्वेन एवमपि सुतरामन्यत्राप्राप्तिः प्रियशिरस्त्वादीनाम्।
ब्रह्मधर्मांस्तु एतान्कृत्वा न्यायमात्रमिदम् आचार्येण प्रदर्शितम् प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरिति स च न्यायः अन्येषु निश्चितेषु ब्रह्मधर्मेषु उपासनायोपदिश्यमानेषु नेतव्यः संयद्वामत्वादिषु सत्यकामत्वादिषु च तेषु हि सत्यपि उपास्यस्य ब्रह्मण एकत्वे प्रक्रमभेदादुपासनाभेदे सति न अन्योन्यधर्माणाम् अन्योन्यत्र प्राप्तिः यथा च द्वे नार्यौ एकं नृपतिमुपासाते छत्रेण अन्या चामरेण अन्या तत्रोपास्यैकत्वेऽपि उपासनभेदो धर्मव्यवस्था च भवति एवमिहापीति।
उपचितापचितगुणत्वं हि सति भेदव्यवहारे सगुणे ब्रह्मण्युपपद्यते न निर्गुणे परस्मिन्ब्रह्मणि। अतो न सत्यकामत्वादीनां धर्माणां क्वचिच्छ्रुतानां सर्वत्र प्राप्तिरित्यर्थः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु ऐसा होनेपर प्रियशिरस्त्व आदि सब धर्मं भी सर्वत्र संगृहीत होंगे, क्योंकि तैत्तिरीयकमें आनन्दमय आत्माका उपक्रम कर ' तस्य प्रियमेव शिर : ० ' ( उस आनन्दमय आत्माका प्रियं ही शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा है ) ऐसी श्रुति है, इससे उत्तर कहते हैं— रूपने उपलब्ध होते हैं और उपचय और अपचय भेदके होनेपर संभव हैं।
किन्तु ब्रह्म तो ' एकमेवाद्वितीयम् ' ( एक हो अद्वितीय है ) इत्यादि श्रुतियोंसे भेद रहित ज्ञात होता है। और ये प्रियशिरस्त्वादि ब्रह्मके धर्म नहीं हैं, किन्तु ये कोशोंके धर्मं हैं। ऐसा हम ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' इस सूत्र में कह चुके हैं। परब्रह्म में चित्तकी अवस्थितिके साधनमात्ररूपसे परिकल्पित किये गये हैं, द्रष्टव्यरूपसे नहीं। इसप्रकार भी प्रियशिरस्त्व आदिकी सुतरां अन्य शाखा में अप्राप्ति है।
इन प्रियशिरस्त्व आदिको ब्रह्म - धर्म मानकर प्रियशिरस्त्व आदिकी अप्राप्ति है, यह न्यायमात्र आचार्यने प्रदर्शित किया है। वह न्याय उपासना के लिए उपदिश्यमान संयद्वामत्व आदि और सत्यकामत्व आदि निश्चित ब्रह्मके अन्य धर्मोंमें लेना चाहिए, क्योंकि उनमें उपास्य ब्रह्मके एक होनेपर भी उपक्रमके भेदसे उपासनाका भेद होनेपर अन्योन्य धर्मों की अन्योन्य शाखा में प्राप्ति नहीं है। जैसे दो स्त्रियाँ एक राजाकी उपासनासेवा करती हैं, एक छत्रसे और दूसरी चँवरसे।
उसमें उपास्यके एक होनेपर भी उपासनाका भेद और धर्मकी व्यवस्था होती है, वैसे यहाँ भी होना चाहिए। उपचित और अपचित गुणत्व तो भेद व्यवहारके होनेपर सगुण ब्रह्ममें उपपन्न होता है, निर्गुण परब्रह्म में नहीं। इसलिए किसी शाखा में श्रुत सत्यकामत्व आदि धर्मोकी सब शाखाओं में प्राप्ति नहीं है, ऐसा अर्थ है॥ १२
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.१३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
3.3.13 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १३
इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ ३.३.१३ ॥
पदच्छेद — इतरे , तु , अर्थसामान्यात् । तैत्तिरीयकमें पठित प्रियशिरस्त्वादि धर्मोकी अन्यत्र प्राप्ति नहीं है , क्योंकि प्रिय , मोद , प्रमोद और आनन्द ये परस्परकी और अन्य मोक्ताकी अपेक्षासे उपचित ( वृद्धि ) और अपचित ( हास )
शाङ्करभाष्य
इतरे तु आनन्दादयो धर्मा ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनायैव उच्यमानाः अर्थसामान्यात् प्रतिपाद्यस्य ब्रह्मणो धर्मिण एकत्वात् सर्वे सर्वत्र प्रतीयेरन्निति वैषम्यम् प्रतिपत्तिमात्रप्रयोजना हि ते इति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रार्थ - ( इतरे तु ) आनन्द आदि धर्मोका तो सर्वत्र उपसंहार होना चाहिए, ( अर्थसामान्यात् ) क्योंकि प्रतिपाद्य ब्रह्म सर्वत्र एक है।
सूत्रार्थ - ' इन्द्रियेभ्यः परा ह्यार्थी ' इस श्रुति में ( मध्यानाय )
आध्यान पूर्वक सम्यग्दर्शन के लिए पुरुष परत्वसे प्रतिपादित है, अर्थ आदि नहीं, ( प्रयोजनाभावात्
) क्योंकि इनके परत्व प्रतिपादन में कोई प्रयोजन नहीं है।
परन्तु ब्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिए कहे हुए अन्य आनन्द आदि धर्म अर्थके सामान्यसे प्रतिपाद्य धर्मी ब्रह्मके एक होनेसे सब सर्वत्र प्रतीत होने चाहिए यही वैषम्य है, क्योंकि वे ब्रह्मकी प्रतिपत्ति ज्ञानमात्र प्रयोजनवाले हैं॥ १३
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * संयद्वामत्व आदि धर्मोसे आनन्द आदि मित्र हैं, क्योंकि इनका केवल ब्रह्मका ज्ञान कराना ही प्रयोजन है। अतः सत्य, ज्ञान, आनन्द, आत्मा और ब्रह्म इन शब्दोंका सर्वत्र उपसंहार ( संग्रह ) करना चाहिए। पूर्वपक्ष में सत्य आदि पदोंके अनुपसंहारसे वाक्यार्थका अनवधारण फल है | सिद्धान्त में तो सत्य आदि पदोंके उपसंहारसे वाक्यार्थका अवधारण फल है॥ १३
3.3.14 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १४
स्वप्रधानम् ॥ ३.३.१४ ॥
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — काठक में ' इन्द्रियेभ्यः परा ० ' ( इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय पर - सूक्ष्म अथवा श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन पर है और मनसे बुद्धि पर है ) ऐसा आरम्भकर ' पुरुषान्न ० ' ( पुरुषसे पर और कुछ नहीं है, वही सूक्ष्मत्वको पराकाष्ठा है, वही परागति - उत्कृष्ट गति है ) इसप्रकार कहा जाता है। यहाँ संशय होता है- क्या ये सब अर्थ आदि तत् तत्से पररूपसे प्रतिपादित हैं अथवा पुरुष ही इन सबसे पररूपसे प्रतिपादित है?
उसमें इन सबका पररूपसे प्रतिपादन है, ऐसी मति होती है, क्योंकि ' यह इससे पर, यह इससे पर ' ऐसा श्रुति कहती है। परन्तु बहुत अर्थों में पररूपसे प्रतिपादन करना यदि अभीष्ट हो तो वाक्य भेद होगा? यह दोष नहीं है, कारण कि वाक्यके बहुत्वकी उपपत्ति होती है। परत्वसे युक्त अनेक विषयोंके प्रतिपादनके लिए ये अनेक ही वाक्य समर्थ होते हैं। इसलिए इनमें प्रत्येकका पररूपसे प्रतिपादन है।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- इन सभीसे पुरुष ही परप्रतिपिपादयिषितेषु वाक्यभेदः स्यात्, नैष दोषः, वाक्यबहुत्वोपपत्तेः। बहून्येव होता नि रूपसे प्रतिपादित है, किन्तु इनमेंसे प्रत्येक अर्थ आदिमें परत्व प्रतिपादन युक्त नहीं है, किससे? इससे कि प्रयोजनका अभाव है, अन्योंके पररूपसे ज्ञात होनेपर कोई प्रयोजन देखा अथवा सुना नहीं जाता।
इन्द्रियादिसे पर सर्व अनर्थं समुदायसे रहित परपुरुषके ज्ञात होनेपर तो मोक्षसिद्धिरूप प्रयोजन देखा जाता है, क्योंकि ' निचाय्य तं ० ' ( उस आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट - मुक्त हो जाता है ) ऐसी श्रुति है। और परके प्रतिषेधसे और काष्ठाशन्दसे पुरुष विषयक आदर दिखलाते हुए पुरुषकी प्रतिपत्ति के लिए ही पूर्वापर प्रवाहको उक्ति है, ऐसा दिखलाते हैं - ' आध्यानाय ' इति I
। ' आध्यानपूर्वक तत्त्वज्ञानके लिए ' ऐसा अर्थ है। सम्यग्दर्शनके लिए ही यहाँ आध्यानका उपदेश किया जाता है, आध्यानका ही स्वप्रधानरूपसे उपदेश नहीं किया जाता है॥ १४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपक्षी - अर्थ आदिमें भी परत्व मानना चाहिए, क्योंकि इनका ध्यान भी सप्रयोजन है, ' दशमन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः। भौतिकास्तु शतं पूर्णं सहस्रं त्वमिमानिकाः॥ बौद्धा दशसहस्राणि तिष्ठन्ति विगतज्वराः। पूर्णं शतसहस्रं तु तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः॥ पुरुषं निर्गुणं प्राप्य कालसंख्या न विद्यते। ' ( विष्णुपुराण ) ( इन्द्रियों का ध्यान करनेवाले यहाँ दश मन्वन्तर रहते हैं, भौतिक अभिमान के चिन्तक पूर्ण सौ सहेस्र मन्वन्तर रहते हैं। बुद्धिके चिन्तक दशसहस्र मन्वन्तर कष्ट रहित रहते हैं, अव्यक्तके चिन्तक पूर्ण सौ सहस्र मन्वन्तर रहते हैं 1
। जो निर्गुण पुरुषको प्राप्त करता है उसके लिए कालकी संख्या - अवधि नहीं है ) इसप्रकार प्रामाणिक वाक्यसे भेद मानने में कोई दोष नहीं है, अतः उक्त सब वाक्य प्रत्येक अर्थ आदिको पररूपसे वर्णन करते हैं। पूर्वपक्ष में वाक्यभेद होनेसे विद्याका भेद है, सिद्धान्त में वाक्यकी एकतासे विद्याकी एकता है।
* सिद्धान्ती - ' एवं प्राप्ते ब्रूमः ' इत्यादिसे कहते हैं॥ १४
3.3.15 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १५
आत्मशब्दाच् च ॥ ३.३.१५ ॥
पदच्छेद — आत्मशब्दात् , च
सूत्रार्थ — ' एष सर्वेषु ' इत्यादि श्रुतिसे प्रकृत पुरुष में आत्मशब्दका श्रवण होनेसे यह वाक्य आत्मपरक ही है, क्योंकि श्रुतिसे आत्मा में मानान्तरावेद्यत्व अपूर्वका प्रतिपादन है।
शाङ्करभाष्य
इतश्च पुरुषप्रतिपत्त्यर्थैव इयमिन्द्रियादिप्रवाहोक्तिः यत्कारणम्एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः इति प्रकृतं पुरुषम् आत्मेत्याह अतश्च अनात्मत्वमितरेषां विवक्षितमिति गम्यते तस्यैव च दुर्विज्ञानतां संस्कृतमतिगम्यतां च दर्शयति तद्विज्ञानायैव च यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः इति आध्यानं विदधाति। तत् व्याख्यातम्आनुमानिकमप्येकेषाम् इत्यत्र। एवम् अनेकप्रकार आशयातिशयः श्रुतेः पुरुषे लक्ष्यते नेतरेषु। अपि चसोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् इत्युक्ते किं तत् अध्वनः पारं विष्णोः परमं पदमित्यस्यामाकाङ्क्षायाम् इन्द्रियाद्यनुक्रमणात् परमपदप्रतिपत्त्यर्थ एवायम् आम्नाय इत्यवसीयते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इससे मी इन्द्रिय आदिके प्रवाहकी उक्ति केवल पुरुषकी प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) के लिए ही है, क्योंकि ' एष सर्वेषु भूतेषु ० ' ( सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशित नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंद्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धिसे ही देखा जाता है ) यह श्रुति प्रकृत पुरुषको आत्मरूपसे कहती है। इससे ऐसा ज्ञात होता है कि अन्यों में अनात्मत्व विवक्षित है। और उसीमें दुर्विज्ञेयता और संस्कृतबुद्धि गम्यता दिखलाती है। उसके विज्ञानके लिए ही ' यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः ० ' ( विवेकी पुरुष वाणीका मनमें उपसंहार करे ) इस प्रकार आध्यानका विधान करती है। उसका ' आनुमानिकम ० ' इस सूत्रमें व्याख्यान किया गया है। इस प्रकार श्रुतिसे अनेक प्रकारका आशयातिशय तात्पयं पुरुष में लक्षित होता है, अन्योंमें ही नहीं, और ' सोऽध्वनः ० ' ( यह संसार मार्ग से पार होकर उस विष्णु - व्यापक परमात्माके परमपदको प्राप्त करता है ) ऐसा कहने पर मार्ग से पार विष्णुका परम पद क्या है? ऐसी आकांक्षा होनेपर इन्द्रिय व्यादिके अनुक्रमणसे परमपदकी प्रतिपत्ति के लिए ही यह श्रुति है, ऐसा निश्चित होता है।। १५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * तद्विष्णोः परमं पदम् ' और ' पुरुषान्न परं किञ्चित् ' इसप्रकार उपक्रम और उपसंहारके एकरूप होने से सब वाक्योंका तात्पर्यं पुरुषके प्रतिपादनमें है। इस प्रकार एकवाक्यता निश्चित होनेपर वाक्यभेद और फलभेदको कल्पना युक्त नहीं है॥ १५
आत्मगृहीत्यधिकरणम्
3.3.16 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १६
आत्मगृहीतिर् इतरवद् उत्तरात् ॥ ३.३.१६ ॥
पदच्छेद — आत्मगृहीतिः , इतरवत् , उत्तरात्
सूत्रार्थ — ( आत्मगृहीतिः ) ' आत्मैवेदम ' यहाँ आत्मशब्दसे परमात्मा का ही ग्रहण है अन्यका नहीं, क्योंकि ( इतरवत् ) अन्यके समान, ' आत्मन आकाश : ' इत्यादि अन्य श्रुतियोंमें भी आत्मशब्द से परमात्माका ग्रहण है ( उतरात् ) ' स ईक्षत ' इस प्रकार उत्तर विशेषण वाक्योंसे भी जैसे परमात्माका ही ग्रहण है, वैसे यहाँ मी आत्मशब्द से परमात्माका ही ग्रहण होना चाहिए।
शाङ्करभाष्य
ऐतरेयके श्रूयते आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत्स ईक्षत लोकान्नु सृजा इतिस इमा्लोकानसृजताम्भो मरीचीर्मरमापः इत्यादि। तत्र संशयः किं पर एवात्मा इह आत्मशब्देनाभिलप्यते उत अन्यः कश्चिदिति। किं तावत्प्राप्तम् न परमात्मा इह आत्मशब्दाभिलप्यो भवितुमर्हतीति कस्मात् वाक्यान्वयदर्शनात्।
ननु वाक्यान्वयः सुतरां परमात्मविषयो दृश्यते प्रागुत्पत्तेः आत्मैकत्वावधारणात् ईक्षणपूर्वकस्रष्टृत्ववचनाच्च नेत्युच्यते लोकसृष्टिवचनात् परमात्मनि हि स्रष्टरि परिगृह्यमाणे महाभूतसृष्टिः आदौ वक्तव्या लोकसृष्टिस्तु इह आदावुच्यते लोकाश्च महाभूतसंनिवेशविशेषाः तथा च अम्भःप्रभृतीन् लोकत्वेनैव निर्ब्रवीति अदोऽम्भः परेण दिवम् इत्यादिना।
लोकसृष्टिश्च परमेश्वराधिष्ठितेन अपरेण केनचिदीश्वरेण क्रियत इति श्रुतिस्मृत्योरुपलभ्यते तथा हि श्रुतिर्भवति आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः इत्याद्या स्मृतिरपि स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते। आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत इति ऐतरेयिणोऽपिअथातो रेतसः सृष्टिः प्रजापते रेतो देवाः इत्यत्र पूर्वस्मिन्प्रकरणे प्रजापतिकर्तृकां विचित्रां सृष्टिमामनन्ति आत्मशब्दोऽपि तस्मिन्प्रयुज्यमानो दृश्यते आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः इत्यत्र।
एकत्वावधारणमपि प्रागुत्पत्तेः स्वविकारापेक्षमुपपद्यते ईक्षणमपि तस्य चेतनत्वाभ्युपगमादुपपन्नम्। अपि चताभ्यो गामानयत्ताभ्योऽश्वमानयत्ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् इत्येवंजातीयको भूयान् व्यापारविशेषः लौकिकेषु विशेषवत्सु आत्मसु प्रसिद्धः इहानुगम्यते।
तस्मात् विशेषवानेव कश्चिदिह आत्मा स्यादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः पर एव आत्मा इह आत्मशब्देन गृह्यते इतरवत् यथा इतरेषु सृष्टिश्रवणेषुतस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः इत्येवमादिषु परस्यात्मनो ग्रहणम् यथा च इतरस्मिन् लौकिकात्मशब्दप्रयोगे प्रत्यगात्मैव मुख्य आत्मशब्देन गृह्यते तथा इहापि भवितुमर्हति।
यत्र तुआत्मैवेदमग्र आसीत् इत्येवमादौपुरुषविधः इत्येवमादि विशेषणान्तरं श्रूयते भवेत् तत्र विशेषवत आत्मनो ग्रहणम् अत्र पुनः परमात्मग्रहणानुगुणमेव विशेषणमपि उत्तरम् उपलभ्यते स ईक्षत लोकान्नु सृजा इतिस इमा्लोकानसृजत इत्येवमादि तस्मात् तस्यैव ग्रहणमिति न्याय्यम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐतरेयक में ' आत्मा वा ० ' ( सृष्टिके पहले यह जगत् एकमात्र आत्मा ही था, उसके सिवा और कोई सक्रिय वस्तु नहीं थी। उसने ईक्षण किया कि लोकोंकी रचना करूँ ) और ' स इमाँल्लोकानसृजत ० ' ( उसने अम्भ - स्वर्ग, मरीचि - अन्तरिक्ष, मर - मत्यं और आप - पाताल इन लोकोंकी रचना की ) इत्यादि श्रुति है। उसमें संशय होता है- क्या यहाँ आत्मशब्द से परमात्मा कहा जाता है अथवा अन्य कोई? तब क्या प्राप्त होता है?
पूर्वपक्षी - यहाँ आत्मशब्द से परमात्माका अभिधान नहीं हो सकता, किससे? इससे कि वाक्योंका अन्वय ऐसा देखनेमें खाता है। परन्तु वाक्यान्वय तो सुतरां परमात्मा विषयक देखने में आता है। कारण कि उत्पत्ति के पूर्व आत्मैकत्वका अवधारण है और ईक्षण पूर्वक स्रष्टृत्व वचन है। नहीं, ऐसा कहते हैं, क्योंकि लोकसृष्टिका वचन है | परमात्माको स्रष्टा परिगृहीत करनेपर महाभूत सृष्टि पहले कहनी चाहिए थी, किन्तु यहाँ पहले लोकसृष्टि कही जाती है | लोक तो महाभूतोंके आकार विशेष हैं।
उसी प्रकार ' अदोऽम्मः ० ' ( वह अम्म लोकसे पर है ) इत्यादिसे श्रुति अम्म आदिका लोकरूपसे ही निर्वाचन करती है। लोक सृष्टि परमेश्वरसे अधिष्ठित किसी अन्य ईश्वरसे की जाती है, ऐसा श्रुति और स्मृति में उपलब्ध होता है। क्योंकि ' आत्मैवेदम ० ' ( सृष्टिके पूर्व यह जगत् पुरुषाकार एक आत्मा ही था ) इत्यादि श्रुति है, और ' स वै शारीरी ० ' ( वही प्रथम शरीरी है, वही पुरुष कहा जाता है, चराचर भूतों का आदि कर्ता वह ब्रह्म सबसे पूर्व में था ) ऐसी स्मृति मी है।
ऐतरेय शाखावाले भी ' अथातो . ' अनन्तर इससे रेत कार्यं सृष्टि हुई, देवता प्रजापतिके रेत कार्य हैं। ) यहाँ पूर्व प्रकरण में विचित्र सृष्टिको प्रजापति कर्तृक कहते हैं, और ' आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविध : ' इसमें आत्मशब्द भी उसमें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है, और एकल्वका अवधारण मी उत्पत्तिके पूर्व अपने विकारकी अपेक्षासे उपपन्न होता है, और चेतनत्व स्वीकार होनेसे उसमें ईक्षण मी उपपन्न है।
और ' ताभ्यो ० ' ( स्रष्टा उन प्रजाओंके लिए गौ लाया, उनके लिए अश्व लाया, उनके लिए पुरुष - नराकार शरीर लाया, तदनन्तर प्रजाएँ उससे बोलीं ) इसप्रकारका महान् व्यापारविशेष विशेषवान् लौकिक आत्माओंमें प्रसिद्ध है, उसका यहाँ अनुगम होता है। इसलिए यहाँ विशेष युक्त कोई स्रष्टा आत्मा होना चाहिए। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होने पर हम कहते हैं - यहाँ परमात्मा ही आत्मशब्दसे गृहीत होता है, इतरके समान।
जैसे ' तस्माद्वा ० ' ( उस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि अन्य सृष्टि श्रुतियोंमें आत्मशब्द से परमात्माका ग्रहण है। जैसे अन्य लौकिक आत्मशब्द के प्रयोग में आत्मशब्द से मुख्य प्रत्यगात्मा ही गृहीत होता है, वैसे ही यहाँ भी होना चाहिए। जहाँ तो ' आत्मैवेदमग्र आसीत् ' इत्यादिमें ' पुरुषविधः ' इत्यादि विशेषणान्तर सुना जाता है, वहाँ विशेषयुक्त आत्माका ग्रहण होना चाहिए।
परन्तु यहाँ तो परमात्मा - ग्रहणके अनुकूल ही ' स ईक्षत ० ' ( उसने ईक्षण किया कि मैं लोकोंकी सृष्टि करूँ ) ' स इमाँल्लोकानसृजत '
[ अ ० ३ पा ० ३ ' स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ' ( ऐ ० १1१ ) ' स इमाँल्लोकानसृजत ' ( ऐ ० ग्रहण नहीं है, तो यह ( स्यात् ) परमात्माका ही ग्रहण है। ( अवधारणात् )
आत्मैकत्वकाही अवधारण होता है, अतः यहाँ परमात्माका ग्रहण है। ( उसने इन लोकोंकी सृष्टि की ) इत्यादि आगेका विशेषण मी उपलब्ध होता। इसलिए यहाँ आत्मशब्दसे उसीका ग्रहण उचित है॥ १६
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * आत्मशब्दका प्रयोग ब्रह्म और हिरण्यगर्भ ( प्रजापति ) दोनोंमें उपलब्ध होनेसे संशय होता है। पूवपक्षी - यहां वाक्यान्वयसे तो आत्मशब्दसे हिरण्यगर्भ ग्राह्य है परमात्मा नहीं।
* ऐतरेय श्रुति ( ११, १/२ ) का अर्थ पाठक्रमसे न होकर अर्थक्रम से होना चाहिए, उसने महाभूतों की सृष्टिकर इन लोकोंकी सृष्टि की, क्योंकि तैत्तिरीय श्रुतिमें भूतों की प्रथम सृष्टि है। यहाँ ' पाठक्रमादर्थक्रमो बलीय : ' ' पाठक्रमसे अर्थक्रम बलवान् है ' अन्यथा सृष्टि उत्पन्न नहीं होगी। इसलिए ' आत्मैवेदग्र आसीत् ' यहाँ आत्मशब्द से परमात्माका ग्रहण है, हिरण्यगर्भका नहीं॥ १६
3.3.17 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १७
अन्वयाद् इति चेत् स्याद् अवधारणात् ॥ ३.३.१७ ॥
पदच्छेद — अन्वयात् इति चेत् , स्यात् , अवधारणात् । देखने से परमात्माका
सूत्रार्थ — ( इति चेत् ) यदि कहो कि ( अन्वयात् ) वाक्यान्वयके
शाङ्करभाष्य
वाक्यान्वयदर्शनात् न परमात्मग्रहणमिति पुनः यदुक्तम् तत्परिहर्तव्यमिति अत्रोच्यते स्यादवधारणादिति। भवेदुपपन्नं परमात्मनो ग्रहणम् कस्मात् अवधारणात् परमात्मग्रहणे हि प्रागुत्पत्तेरात्मैकत्वावधारणमाञ्जसमवकल्पते अन्यथा हि अनाञ्जसं तत्परिकल्प्येत। लोकसृष्टिवचनं तु श्रुत्यन्तरप्रसिद्धमहाभूतसृष्ट्यनन्तरमिति योजयिष्यामि यथातत्तेजोऽसृजत इत्येतत् श्रुत्यन्तरप्रसिद्धवियद्वायुसृष्ट्यनन्तरमिति अयूयुजम् एवमिहापि श्रुत्यन्तरप्रसिद्धो हि समानविषयो विशेषः श्रुत्यन्तरेषु उपसंहर्तव्यो भवति।
योऽपि अयं व्यापारविशेषानुगमःताभ्यो गामानयत् इत्येवमादिः सोऽपि विवक्षितार्थावधारणानुगुण्येनैव ग्रहीतव्यः न ह्ययं सकलः कथाप्रबन्धो विवक्षित इति शक्यते वक्तुम् तत्प्रतिपत्तौ पुरुषार्थाभावात् ब्रह्मात्मत्वं तु इह विवक्षितम् तथा हि अम्भःप्रभृतीनां लोकानां लोकपालानां चाग्न्यादीनां सृष्टिं शिष्ट्वा करणानि करणायतनं च शरीरमुपदिश्य स एव स्रष्टाकथं न्विदं मदृते स्यात् इति वीक्ष्य इदं शरीरं प्रविवेशेति दर्शयति स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत इति पुनश्चयदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितम् इत्येवमादिना करणव्यापारविवेचनपूर्वकम्अथ कोऽहम् इति वीक्ष्यस एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् इति ब्रह्मात्मत्वदर्शनमवधारयति तथोपरिष्टात् एष ब्रह्मैष इन्द्रः इत्यादिना समस्तं भेदजातं सह महाभूतैरनुक्रम्यसर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म इति ब्रह्मात्मत्वदर्शनमेव अवधारयति।
तस्मात् इह आत्मगृहीतिरित्यनपवादम्।। अपरा योजना आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात्। वाजसनेयकेकतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः इत्यात्मशब्देनोपक्रम्य तस्यैव सर्वसङ्गविनिर्मुक्तत्वप्रतिपादनेन ब्रह्मात्मतामवधारयति तथा हि उपसंहरति स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म इति। छान्दोग्ये तुसदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् इति अन्तरेणैवात्मशब्दम् उपक्रम्य उदर्केस आत्मा तत्त्वमसि इति तादात्म्यमुपदिशति।
तत्र संशयः तुल्यार्थत्वं किमनयोराम्नानयोः स्यात् अतुल्यार्थत्वं वेति। अतुल्यार्थत्वमिति तावत् प्राप्तम् अतुल्यत्वादाम्नानयोः न हि आम्नानवैषम्ये सति अर्थसाम्यं युक्तं प्रतिपत्तुम् आम्नानतन्त्रत्वादर्थपरिग्रहस्य वाजसनेयके च आत्मशब्दोपक्रमात् आत्मतत्त्वोपदेश इति गम्यते छान्दोग्ये तु उपक्रमविपर्ययात् उपदेशविपर्ययः। ननु छन्दोगानामपि अस्त्युदर्के तादात्म्योपदेश इत्युक्तम् सत्यमुक्तम् उपक्रमतन्त्रत्वादुपसंहारस्य तादात्म्यसंपत्तिः सा इति मन्यते।
तथा प्राप्ते अभिधीयते आत्मगृहीतिःसदेव सोम्येदमग्र आसीत् इत्यत्र च्छन्दोगानामपि भवितुमर्हति इतरवत् यथाकतम आत्मा इत्यत्र वाजसनेयिनामात्मगृहीतिः तथैव कस्मात् उत्तरात् तादात्म्योपदेशात्।अन्वयादिति चेदवधारणात् यदुक्तम् उपक्रमान्वयात् उपक्रमे च आत्मशब्दश्रवणाभावात् न आत्मगृहीतिरिति तस्य कः परिहार इति चेत् सोऽभिधीयते स्यादवधारणादिति।
भवेदुपपन्ना इह आत्मगृहीतिः अवधारणात् तथा हि येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम् इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानमवधार्य तत्संपिपादयिषयासदेव इत्याह तच्च आत्मगृहीतौ सत्यां संपद्यते अन्यथा हि योऽयं मुख्य आत्मा स न विज्ञात इति नैव सर्वविज्ञानं संपद्येत। तथा प्रागुत्पत्तेः एकत्वाधारणम् जीवस्य च आत्मशब्देन परामर्शः स्वापावस्थायां च तत्स्वभावसंपत्तिकथनम् परिचोदनापूर्वकं च पुनः पुनःतत्त्वमसि इत्यवधारणम् इति च सर्वमेतत् तादात्म्यप्रतिपादनायामेव अवकल्पते न तादात्म्यसंपादनायाम्।
न च अत्र उपक्रमतन्त्रत्वोपन्यासो न्याय्यः न हि उपक्रमे आत्मत्वसंकीर्तनम् अनात्मत्वसंकीर्तनं वा अस्ति सामान्योपक्रमश्च न वाक्यशेषगतेन विशेषेण विरुध्यते विशेषाकङ्क्षित्वात्सामान्यस्य। सच्छब्दार्थोऽपि च पर्यालोच्यमानः न मुख्यादात्मनोऽन्यः संभवति अतोऽन्यस्य वस्तुजातस्य आरम्भणशब्दादिभ्योऽनृतत्वोपपत्तेः।आम्नानवैषम्यमपि नावश्यमर्थवैषम्यमावहतिआहर पात्रम्पात्रमाहर इत्येवमादिषु अर्थसाम्येऽपि तद्दर्शनात्।
तस्मात् एवंजातीयकेषु वाक्येषु प्रतिपादनप्रकारभेदेऽपि प्रतिपाद्यार्थाभेद इति सिद्धम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा जो कहा गया है कि वाक्यान्वयके दर्शन से परमात्माका ग्रहण नहीं है, तो उसका परिहार करना चाहिए। इसपर कहते हैं - ' स्यादवधारणात् '। परमात्माका ग्रहण उपपन्न होगा, किससे? इससे कि ऐसा अवधारण है। परमात्माके ग्रहण होनेपर उत्पत्तिके पूर्व आत्मैकत्व ( एक आत्मा ही था ) अवधारण संगत हो सकता है, अन्यथा वह असंगत हो जायगा। ऐतरेयमें लोकसृष्टि श्रुतिवाक्यको तो अन्य श्रुति- तैत्तिरीय श्रुतिमें प्रसिद्ध महाभूत सृष्टि के अनन्तरयोजना करेंगे।
जैसे ' तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) इस छान्दोग्य वाक्यको अन्य तैत्तिरीय श्रुतिमें प्रसिद्ध आकाश और वायुकी सृष्टिके अनन्तर तेजकी सृष्टि की, ऐसी योजना हमने की है, वैसे यहाँ भी योजना करेंगे, क्योंकि एक श्रुतिमें प्रसिद्ध समान विषयक विशेष अन्य श्रुतिमें उपसंहारके योग्य होता है। और ' स्रष्टाने प्रजाके लिए गौका शरीर बनाया ' इत्यादि जो यह व्यापारविशेषका अनुगम है वह भी विवक्षित अर्थके अवधारण अनुसार ही ग्रहण करना चाहिए।
यह सम्पूर्ण कथाग्रन्थ विवक्षित है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसकी प्रतिपत्ति में पुरुषार्थ का अभाव है। यहाँ तो ब्रह्मात्मत्व विवक्षित है।
क्योंकि अम्म आदि लोकों और अग्नि आदि लोकपालोंकी सृष्टिका उपदेश ( रचना ) कर इन्द्रियों और इन्द्रियोंके आयतन शरीरका उपदेश ( रचना ) कर उसो स्रष्टाने ' कथं न्विदं ० ' ( मेरे विना यह कैसे होगा ) ऐसा विचार कर इस शरीर में प्रवेश किया, ऐसा ' स एतमेव ० ' ( वह परमेश्वर इस सीमा ( मूर्द्धा ) को ही विदीर्णकर ब्रह्मरन्ध्र द्वारसे प्रवेशकर गया ) यह श्रुति दिखलाती है।
पुनः ' यदि वाचाभिव्याहृतं ० ' ( यदि मेरे विना वाणीसे बोल लिया जाय, यदि प्राणसे प्राणन व्यापार कर लिया जाय ) इत्यादिसे करण व्यापार विवेचन पूर्वक ' अथ कोऽहम् ' ( तो मैं कौन हूँ ) ऐसा विचार कर ‘ स एतमेव ० ' ( इसप्रकार उसने इस पुरुषको ही पूर्णतम ब्रह्मरूपसे देखा ) इसप्रकार श्रुति ब्रह्मात्मत्व दर्शनका अवधारण करती है, उसीप्रकार आगे भी ' एष ब्रह्मेष इन्द्रः ' ( यह ब्रह्म है, यह इन्द्र हैं ) इत्यादिसे महाभूतोंके साथ समस्त भेद समुदायका उपक्रमकर ' सर्वं तत्प्रज्ञा नेत्रं ० ' ( वह सब प्रज्ञानेत्र प्रज्ञा जिसका नेत्र है ऐसा है, प्रज्ञामें- चिदात्मामें प्रतिष्ठित है, लोकप्रज्ञानेत्र - प्रज्ञा - चैतन्य जिसका नेत्रव्यवहारका कारण है ऐसा, प्रज्ञा ही उसका लय स्थान है, अतः प्रज्ञा ही ब्रह्म है ) यह श्रुति ब्रह्मात्मत्वदर्शनका ही अवधारण करती है, इसलिए यहां परमात्मा ही गृहीत है, यह निरपवाद - बाधरहित है।१७
यह दूसरी योजना है - परमात्माका ग्रहण है, अन्यके समान, उत्तरसे। वाजसनेयकमें ' कतम आमेति ० ' ( आत्मा कौन है? [ याज्ञवल्क्य - ] यह जो प्राणोंमें बुद्धि वृत्तियोंके भीतर रहनेवाला विज्ञानमय ज्योति : स्वरूप पुरुष है ) इस प्रकार श्रुति आत्मशब्दसे उपक्रमकर उसीको सर्वं सङ्गविनिर्मुक्तत्व प्रतिपादन द्वारा ब्रह्मात्मत्व अवधारण करती है। और ' स वा एष महानज ० ' ( यही वह महान् अज आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है ) ऐसा उपसंहार करती है। छान्दोग्यमें तो ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य!
उत्पत्तिके पूर्व यह जगत् एक अद्वितीय सद्रूप ही था ) इसके अनन्तर ही आत्मशब्दसे उपक्रमकर उपसंहार में ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ( वह आत्मा है, वह तू है ) यह श्रुति तादात्म्यका उपदेश करती है। उसमें संशय होता है— क्या इन दोनों श्रुतियोंका तुल्यार्थं है अथवा अतुल्यार्थ है? पूर्वपक्षी - अतुल्यार्थ है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि दोनों श्रुतियाँ अतुल्य हैं। श्रुतियों के विषम होनेपर अर्थकी समानता जानना युक्त नहीं है, कारण कि अर्थका परिग्रह ( स्वीकार ) श्रविके अधीन है।
वाजसनेयकमें तो यह ज्ञात होता है कि आत्मशब्दके उपक्रम से आत्मतत्वका उपदेश है। छान्दोग्यमें तो उपक्रमके विपर्यसे उपदेश विपर्यय है। परन्तु छन्दोगोंके उपसंहार में तादात्म्यका उपदेश है ऐसा कहा गया है। ठीक, कहा गया है। उपसंहार उपक्रमके अधीन है, अतः वह तादात्म्यसंपत्ति ( उपासना ) है, ऐसा मानते हैं। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं -- ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' यहाँ पर छन्दोगोंको भी परमात्माका ग्रहण करना चाहिए, अन्यके समान।
जैसे ' कतम आत्मा ' यहाँ पर वाजसनेयियोंको परमात्माका ग्रहण है, वैसे ही छन्दोगोंको भी परमात्माका ग्रहण करना चाहिए, किससे? इससे कि " उत्तरात् ' आगे तादात्म्यका उपदेश है॥ १६॥
यदि कहो कि अन्यसे परमात्माका ग्रहण नहीं है, तो हम कहते हैं कि परमात्माका ग्रहण है, क्योंकि अवधारण है | जो यह कहा गया है कि उपक्रमके अन्वयसे उपक्रममें आत्मशब्दका श्रवण न होनेसे परमात्माका ग्रहण नहीं है। यदि कहो कि उसका परिहार क्या है?
तो वह कहा जाता है— ' स्यादवधारणात् ' अवधारणसे यहां परमात्माका ग्रहण उपपन्न होता है, क्योंकि ' येनाश्रुतं ० ' ( जिससे अश्रुतश्रुत, अमत मत, और अविज्ञात विज्ञात हो जाता है ) इसप्रकार एक विज्ञानसे सर्व विज्ञानका अवधारणकर उसके संपादन करनेकी इच्छासे ' सदेव ' ऐसा कहा है। वह परमात्माका ग्रहण होनेपर सम्पन्न होता है, अन्यथा जो यह मुख्य आत्मा है वह विज्ञात नहीं है, अत : सर्व विज्ञान सम्पन्न नहीं होगा।
उसीप्रकार उत्पत्तिके पूर्व एकत्व अवधारण, जीवका आत्मशब्दसे [ अनेन जीवेनात्मना ] परामर्श, सुषुप्ति अवस्था में जीव सत्से सम्पन्न होता है, यह कथन, प्रश्न पूर्वक पुनः पुनः ' तत्त्वमसि ' इसप्रकार अवधारण, ये सब तादात्म्य प्रतिपादन होनेपर ही संगत होते हैं, तादात्म्यके संपादन ( आरोप ) में नहीं।
और यहाँ उपक्रम के अधीन उपन्यास उचित नहीं है, क्योंकि उपक्रममें आत्मत्व संकीर्तन अथवा अनात्मत्व संकीर्तन नहीं है और सामान्य उपक्रम वाक्यशेषगत विशेषसे विरुद्ध नहीं है, कारण कि सामान्य विशेषकी आकांक्षावाला होता है।
इसप्रकार पर्यालोचन करते हुए भी मुख्य आत्मासे ' सत् ' शब्दका अर्थं अन्य नहीं हो सकता, क्योंकि इससे अन्य वस्तु समूहमें आरम्भण शब्द आदि मनृतत्व उपपत्ति होती है, और श्रुति वचनकी विषमता मी अर्थकी विषमताको अवश्य नहीं ला सकती, कारण कि . ' आहर पात्रम् ' ( लाओ पात्र ) ' पात्रमाहर ' ( पात्र लाओ ) इत्यादि वाक्यों में अर्थका साम्य होनेपर भी वाक्योंकी विषमता देखने में आती है।
इसलिए इसप्रकारके वाक्योंमें प्रतिपादन प्रकार ( शैली ) का भेद होनेपर भी प्रतिपाद्य अर्थका अभेद है, यह सिद्ध हुआ || १७ ||
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् ' ' प्रज्ञानं ब्रह्म ' ( प्रज्ञान ब्रह्म है ) इसप्रकार उपक्रम और उपसंहारमें आत्मा और ब्रह्मके श्रवण होनेसे एकत्वका निश्चय होता है। इससे और इस प्रकारके प्रवेश आदि लिङ्गों से लोक स्रष्टृत्व आदि लिङ्गोंके बाघ होनेसे प्रत्यग्ब्रह्मका ही ग्रहण करना चाहिए।
स्रष्टा परमेश्वरने जब देवताओंकी सृष्टिकी तब ' ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि ' ( ऐतरेय ) ( उन्होंने उनसे कहा कि हमारे लिए स्थान निर्माण करो जिसमें रहकर अन्न आदिका मक्षण कर सकें, तो उनके लिए गौ आदि शरीर बनाये, परन्तु देवताओंने उनको पसन्द नहीं किया ) अनन्तर ' ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन्सुकृतं बतेति पुरुषो वाघ सुकृतम् ' ( ऐत ० ९।२।३ ) ( स्रष्टाने उनके लिए मनुष्याकार शरीर बनाया, तब देवता उसे प्राप्तकर बहुत प्रसन्न होकर बोले यह सुन्दर बना है, यह सुकृतमय है, इससे पुण्य आदिका सम्पादन किया जा सकता है ) इसी आशयको कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीयारण्यक के सायणभाष्यमें इस प्रकार स्पष्ट किया गया है - ' यद्यपि मिथुनजन्माः पश्वादि देहाः सर्वेऽप्यन्नमयास्तथापि मनुष्यदेहस्य ज्ञानकर्माधिकारित्वेन प्राधान्यमभिप्रेत्य तेषु पुरुषसृष्टिरत्राभिहिता ' ( यद्यपि पशु आदि मिथुन जन्म और सब अन्नमय हैं . तो मी मनुष्य शरीर ज्ञान, कर्ममें अधिकारी होनेसे यहाँ सबसे प्रधान कहा गया है ) इत्यादि कथाके जाननेसे मोक्ष सिद्ध नहीं होता।
यहाँ तो ' ब्रह्म सबका आत्मा - स्वरूप है ' केवल यही विवक्षित है, क्योंकि उसके ज्ञानसे परम पुरुषार्थं सिद्ध होता है।
* मेरे विना यदि वाणी आदि अपने अपने व्यापार कर लें तो ' मैं कौन हूँ- मैं क्या करने वाला हूँ ' इसप्रकार ' त्वम् ' पदार्थका विचारकर स्वयं ही इसी शोधित व्यात्माको पूर्ण ब्रह्मरूपसे अनुभव किया। इसप्रकार अनुप्रवेश आदि लिङ्गोंसे भी ऐतरेयमें आत्मशंब्दसे परमात्माका ही ग्रहण है, प्रजापतिका नहीं।। १७
कार्याख्यानाधिकरणम्
3.3.18 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १८
कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ ३.३.१८ ॥
पदच्छेद — कार्याख्यानात् , अपूर्वम्
सूत्रार्थ — - ' श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्ति ' इत्यादि श्रुति अनग्नता सूचनका ही ( अपूर्वम् ) प्राणविद्याका अङ्गरूपसे अपूर्वका विधान करती है, ( कार्याख्यानात् ) क्योंकि ' द्विजो नित्यमुपस्पर्शेत् ' इत्यादि स्मृतिविधि सम्पूर्ण अनुष्ठानाङ्गरूपसे शुद्धिके लिए विधि प्राप्त आचमनका प्राणविद्या में भी अनग्नता विधानके लिए अनुवाद है।
शाङ्करभाष्य
छन्दोगा वाजसनेयिनश्च प्राणसंवादे श्वादिमर्यादं प्राणस्य अन्नमाम्नाय तस्यैव आपो वास आमनन्ति अनन्तरं च च्छन्दोगा आमनन्ति तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति इति वाजसनेयिनश्चामनन्ति तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वा चाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते तस्मादेवंविदशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेदेतमेव तदनमनग्नं कुरुते इति। तत्र च आचमनम् अनग्नताचिन्तनं च प्राणस्य प्रतीयते तत्किमुभयमपि विधीयते उत आचमनमेव उन अनग्नताचिन्तनमेवेति विचार्यते।
किं तावत्प्राप्तम् उभयमपि विधीयत इति कुतः उभयस्याप्यवगम्यमानत्वात् उभयमपि च एतत् अपूर्वत्वात् विध्यर्हम्। अथवा आचमनमेव विधीयते विस्पष्टा हि तस्मिन्विधिविभक्तिः तस्मादेवंविदशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेत् इति तस्यैव स्तुत्यर्थम् अनग्नतासंकीर्तनमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः न आचमनस्य विधेयत्वमुपपद्यते कार्याख्यानात्0 0प्राप्तमेव हि इदं कार्यत्वेन आचमनं प्रायत्यार्थं स्मृतिप्रसिद्धम् अन्वाख्यायते।
ननु इयं श्रुतिः तस्याः स्मृतेर्मूलं स्यात् नेत्युच्यते विषयनानात्वात् सामान्यविषया हि स्मृतिः पुरुषमात्रसंबद्धं प्रायत्यार्थमाचमनं प्रापयति श्रुतिस्तु प्राणविद्याप्रकरणपठिता तद्विषयमेव आचमनं विदधती विदध्यात् न च भिन्नविषययोः श्रुतिस्मृत्योः मूलमूलिभावोऽवकल्पते न च इयं श्रुतिः प्राणविद्यासंयोगि अपूर्वमाचमनं विधास्यतीति शक्यमाश्रयितुम् पूर्वस्यैव पुरुषमात्रसंयोगिन आचमनस्य इह प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् अत एव च नोभयविधानम् उभयविधाने च वाक्यं भिद्येत तस्मात् प्राप्तमेव अशिशिषतामशितवतां च उभयत आचमनम् अनूद्यएतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते इति प्राणस्य अनग्नताकरणसंकल्पः अनेन वाक्येन आचमनीयास्वप्सु प्राणविद्यासंबन्धित्वेन अपूर्व उपदिश्यते।
न च अयमनग्नतावादः आचमनस्तुत्यर्थ इति न्याय्यम् आचमनस्याविधेयत्वात्। स्वयं च अनग्नतासंकल्पस्य विधेयत्वप्रतीतेः। न च एवं सति एकस्य आचमनस्य उभयार्थता अभ्युपगता भवति प्रायत्यार्थता परिधानार्थता चेति क्रियान्तरत्वाभ्युपगमात् क्रियान्तरमेव हि आचमनं नाम प्रायत्यार्थं पुरुषस्य अभ्युपगम्यते तदीयासु तु अप्सु वासःसंकल्पनं नाम क्रियान्तरमेव परिधानार्थं प्राणस्य अभ्युपगम्यत इत्यनवद्यम्।
अपि चयदिदं किंचा श्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतंगेभ्यस्तत्तेऽन्नम् इत्यत्र तावत् न सर्वान्नाभ्यवहारश्चोद्यत इति शक्यं वक्तुम् अशब्दत्वादशक्यत्वाच्च सर्वं तु प्राणस्यान्नमिति इयमन्नदृष्टिश्चोद्यते तत्साहचर्याच्चआपो वासः इत्यत्रापि न अपामाचमनं चोद्यते प्रसिद्धास्वेव तु आचमनीयास्वप्सु परिधानदृष्टिश्चोद्यत इति युक्तम् न हि अर्धवैशसं संभवति। अपि च आचामन्तीति वर्तमानापदेशित्वात् नायं शब्दो विधिक्षमः।
ननु मन्यन्त इत्यपि समानं वर्तमानापदेशित्वम् सत्यमेव तत् अवश्यविधेये तु अन्यतरस्मिन् वासःकार्याख्यानात् अपां वासःसंकल्पनमेव अपूर्वं विधीयते न आचमनम् पूर्ववद्धि तत् इत्युपपादितम्।
यदप्युक्तम् विस्पष्टा च आचमने विधिविभक्तिरिति तदपि पूर्ववत्त्वेनैव आचमनस्य प्रत्युक्तम् अत एव आचमनस्याविधित्सितत्वात्एतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते इत्यत्रैव काण्वाः पर्यवस्यन्ति न आमनन्तितस्मादेवंवित् इत्यादि तस्मात् माध्यंदिनानामपि पाठे आचमनानुवादेन एवंवित्त्वमेव प्रकृतप्राणवासोवित्त्वं विधीयत इति प्रतिपत्तव्यम्। योऽप्ययमभ्युपगमः क्वचिदाचमनं विधीयताम् क्वचिद्वासोविज्ञानमिति सोऽपि न साधुःआपो वासः इत्यादिकाया वाक्यप्रवृत्तेः सर्वत्रैकरूप्यात्।
तस्मात् वासोविज्ञानमेव इह विधीयते न आचमनमिति न्याय्यम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — छन्दोग और वाजसनेयी प्राणसंवादमें श्वान आदि पर्यन्त प्राणका अन्न कहकर उसीका जल वस्त्र है, ऐसा कहते हैं। और इसके अनन्तर छन्दोग ' तस्माद्वा ० ' ( इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्वं और पश्चात् इसका जलसे परिधान - आच्छादन करते हैं ) ऐसा कहते हैं। वाजसनेयी तो ' तद्विद्वांसः श्रोत्रिया ० ' ( ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजनकर आचमन करते हैं। इससे इसीको वे उस प्राणको अनग्न करना मानते हैं ) ऐसा कहते हैं।
' तस्मादेवंविद ० ' ( इसलिए ऐसा जाननेवाला भोजन के पूर्व आचमन करे तथा मोजनकर आचमन करे उसीको वह उस प्राणको अनग्न करता है ) इन शाखाओंमें आचमन और प्राणका अनग्नरूपसे चिन्तन प्रतीत होता है। उसपर विचार किया जाता है कि क्या उन दोनोंका विधान किया जाता है, अथवा आचमनका वा केवल अनग्नता - चिन्तनका ही? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - दोनोंका ही विधान किया जाता है, किससे? इससे कि दोनोंका ही अवगम होता है।
और अपूर्व होनेसे ये दोनों भी विधिके योग्य हैं, अथवा केवल आचमनका ही विधान किया जाता है, क्योंकि उसमें विधि बोधकविभक्ति स्पष्टरूपसे प्रतीत होती है - ' तस्मादेवंविद् ० ' ( इसीसे ऐसा जाननेवाला पुरुष मोजनके पूर्व आचमन करे तथा भोजनकर आचमन करे ) और अनग्नताका संकीर्तन मी उसीकी स्तुति के लिए है।
सिद्धान्ती --- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- आचमन विधेय नहीं हो सकता, क्योंकि कार्यरूपसे आख्यान है। कार्यरूपसे स्मृति में प्रसिद्ध जो यह आचमन शुद्धिके लिए प्राप्त है, उसका अन्वाख्यानअनुवाद करता है। परन्तु यह श्रुति उस स्मृतिकी मूल होगी? नहीं, ऐसा कहते हैं क्योंकि विषय नाना - भिन्न - भिन्न हैं। सामान्य विषयक स्मृति शुद्धिके लिए पुरुषमात्र संबन्धित आचमन प्राप्त कराती है, श्रुति तो प्राणविद्याके प्रकरण में पठित है, इसलिए तद्विषयक आचमनका ही विधान करती हुई विधान करेगी।
भिन्न विषयक श्रुति और स्मृतिमें मूल मूलिमाव नहीं हो सकता है। और यह श्रुति प्राणविद्या संयोगो अपूर्व आचमनका विधान करेगो, ऐसा आश्रय नहीं किया जा सकता है। कारण कि पुरुषमात्र संयोगी पूर्व आचमनका ही यहाँ प्रत्यभिज्ञान होता है, इससे दोनोंका विधान नहीं है।
दोनोंका विधान होनेपर वाक्यभेद हो जायगा, इसलिए जो मोजन करना चाहते हैं और जिन्होंने भोजनकर लिया है, उन दोनों को ही प्राप्त हुए आचमनका अनुवादकर ' एतमेव ० ' ( उसोको उस प्राणको अनग्न करते हुए मानते हैं ) इस वाक्यसे प्राणको अनग्न करनेका संकल्प आचमनीय जलमें प्राणविद्याके सम्बन्धिरूपसे अपूर्वं उपदेश किया जाता है। और यह अनग्नतावाद आचमनकी स्तुति के लिए है, यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि व्याचमन विधेय नहीं है, और अनग्नता संकल्प स्वयं विधेय प्रतीत होता है।
परन्तु ऐसा होनेपर एक आचमनके एक शुद्धि प्रयोजन और दूसरा परिधान प्रयोजन इस प्रकार दो प्रयोजन स्वीकृत नहीं हैं, कारण कि अन्य क्रियाको स्वीकार किया गया है। आचमन अन्य क्रिया है, वह केवल पुरुषकी शुद्धिके लिए अभ्युपगत है और उसीके ( आचमन योग्य ) जलमें वस्त्रसंकल्प अन्य क्रिया है, वही प्राणके परिधानके लिए स्वीकार की जाती है, अतः दोष रहित है।
और ' यदिदं किञ्च ० ' ( श्वान, कृमि और कोट पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तेरा अन्न है ) यहाँ सब अन्नके भक्षणका विधान किया जाता है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह श्रुति प्रतिपादित नहीं है और शक्य भी नहीं है। ' सब प्राणका अन्न है ' यह केवल अन्नदृष्टिका विधान किया जाता है।
अत : उसके साहचर्य से ' जल वस्त्र है ' यहाँ भी जलके आचमनका विधान नहीं किया जाता, किन्तु आचमनके योग्य प्रसिद्ध जलमें प्राणके परिधान दृष्टिका विधान किया जाता है, यह युक्त है, कारण कि अर्ध विनाशका सम्भव नहीं है। और मो ' आचामन्ति ' ( आचमन करते हैं ) इस प्रकार वर्तमानका कथन होनेसे यह शब्द विधिके · योग्य नहीं है। परन्तु ' मन्यन्ते ' यहाँ भी तो समान वर्तमानापदेश है?
यद्यपि यह ठीक है, तथापि दोनोमें से किसी एकके अवश्य विधेय होनेपर वस्त्रका कार्यरूपसे कथन होनेसे जलका वस्त्ररूपसे अपूर्वं संकल्प ही विधान किया जाता है। आचमन विधेय नहीं है, क्योंकि वह पूर्ववत् - पहले ही स्मृति से प्राप्त है, ऐसा प्रतिपादन किया जा चुका है। और यह मी जो कहा गया है कि आचमनमें विधि विभक्ति ( प्रत्यय ) स्पष्ट है, वह भी आचमनसे पूर्व प्राप्त होनेसे निराकृत है।
अतएव ( अविधेय होनेसे ) आचमनकी विधि अमीष्ट न होनेके कारण ' एतमेव ० ' ' इसीको प्राणको अनग्न करते हुए मानते हैं ' यहाँ पर काण्व पर्यवसान करते हैं और ' तस्मादेवंवित् ' इत्यादि नहीं मानते हैं। इससे माध्यन्दिन शाखावालोंके पाठमें मो आचमनके अनुवादसे ' एवंवित्त्वम् ' ऐसा जाननेवाले को ही प्रकृत प्राणको वस्त्र जाननेवाला विधान किया जाता है, ऐसा समझना चाहिए।
कहीं पर आचमनका विधान किया जाता है और कहींपर वस्त्रविज्ञानका, यह जो स्वीकार है वह भी ठोक नहीं है, क्योंकि ' जल वस्त्र है ' इत्यादि वाक्यकी प्रवृत्ति सर्वत्र एकरूप है। अतः यहाँ वस्त्रविज्ञानका ही अभिधान किया जाता है आचमनका नहीं, यह युक्त है।। १८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस व्याख्यानमें गुणोंका उपसंहार अस्पष्ट होनेके कारण पाद संगति ठीक नहीं होती, इस अरुचिसे भगवान् माष्यकार ' अपरा ' इत्यादिसे दूसरी व्याख्या करते हैं। परन्तु यहाँ संशय होता है किछान्दोग्यमें ' सदेव सोम्य ' यह सत् शब्द आत्मवाची है अथवा सत्तारूप जातिका? कारण कि दोनोंमें समानरूपसे सत् शब्दका प्रयोग देखने आत्मा है। इसे ' तन्त्र ' इत्यादिसे दिखलाते हैं। पूर्वपक्षमें उक्त दोनों श्रुतियोंके अर्थका भेद है, क्योंकि दोनों छान्दोग्य श्रुति भिन्न - भिन्न हैं। ' सदेव सोम्य ' यह उपक्रम . है। इसमें सत्ता जाति युक्त सत् और उपसंहारमें ' स आत्मा तत्त्वमसि ' आत्मपदार्थं कहा गया है। इस प्रकार उपक्रम और उपसंहारमें भेद है, तो उनके अधीन होनेवाला अर्थं एक कैसे हो सकेगा? बृहदारण्यकमें तो ' कतम आत्मेति ' आत्मशब्द से उपक्रम है और ' स वा एष महानज आत्मा ' आत्मशब्द से ही उपसंहार है, इस प्रकार उपक्रम और उपसंहारके एक होनेसे अर्थ भी एक ही है।
' आत्मा तत्त्वमसि ' इस उपसंहार वाक्यमें छन्दोगों को भी तादात्म्यका उपदेश है, तथापि यह उपसंहार ' संदेव सोम्य ' इस उपक्रमके अधीन है। उपक्रममें ' सत् ' शब्दका अन्वय है, आत्मशब्दका नहीं, इसलिए यहाँ ' सत् ' शब्दसे परमात्माका उपदेश नहीं है, किन्तु तद्भावसे उपासनाका उपदेश है। पूर्वपक्ष में छान्दोग्यमें ' सत् ' शब्द सत्ता जातिका वाचक होने से ब्रह्मात्मत्व - अभेदरूपसे उपासनाका उपदेश है, और बृहदारण्यकमें निर्गुण ब्रह्मविद्याका उपदेश है। इस प्रकारके भेद होनेसे एकके गुणोंका अन्य में उपसंहार नहीं हो सकता ; सिद्धान्त में दोनों श्रुतियोंद्वारा ब्रह्मविद्याका अभेद होनेसे गुणों का उपसंहार है। सिद्धान्ती - तादात्म्यके उपदेश से यहाँ परमात्माका ही ग्रहण है।। १६।।
* यहाँ ' सदेव सोम्य ' इस उपक्रममें ' सत् ' शब्द सत्ता जातिका वाचक नहीं है, किन्तु सत्ता के आश्रयका। यद्यपि यहाँ ' सत् ' का सामान्य ज्ञान है, तो मी विशेष जिज्ञासा होनेपर वह आत्मा है, ऐसा कहा गया है, इसलिए अनिर्णीत उपक्रमके अधीन उपसंहार नहीं होता, किन्तु निर्णीत उपसंहारसे ही अनिर्णीत उपक्रमका अर्थ किया जाता है। इससे उपसंहारमें आत्मशब्द होनेसे उपक्रममें ' सत् ' शब्द मी आत्मवाची है, अतः दोनों छान्दोग्य श्रुतियोंमें कोई वैषम्य नहीं है। यदि वचनोंमें अथवा उपक्रममें विषमता मानें तो भी अर्थका भेद नहीं है, क्योंकि वाजसनेयक में ' त्वम् ' अर्थ आत्मा लक्ष्यरूपसे ददर्थं परब्रह्ममें पर्यवसित है, उसका प्रतिपादन है, छान्दोग्य में ' तत् ' अर्थ ' त्वम् ' अर्थ में पर्यवसित होकर ' तत्त्वमसि ' वाक्यसे प्रतिपादित है, अतः इस तरह प्रकार के भेद होनेपर मी वाक्योंके अर्थका - ऐक्य होनेसे विद्या भी एक ही है। इस अधिकरण के पूर्वपक्ष में तादात्म्यसे हिरण्यगर्भ की उपासना है, सिद्धान्त में ब्रह्मभाव प्रतिपादित है।। १७।।
* ' मे किमन्नं किं वासः ' ( मेरा क्या अन्न है और क्या वस्त्र है ) इसप्रकार प्राणने वाणी आदिसे पूछा, वाणी आदिने कहा - ' यदिदं किञ्चा श्वभ्य आ कृमिभ्यस्तत्तेऽन्नमापो वसः ' ( कृमिसे लेकर श्वान पर्यन्त जो यह प्रसिद्ध अन्न है वह तेरा अन्न है और जल तेरा वस्त्र है ) इसप्रकार श्वान आदिसे उपलक्षित जो सब प्राणी अन्न खाते हैं वह अन्न तेरा अन्न है और जल वस्त्र है। इसप्रकार उपासकको ध्यान करना चाहिए। इस विषयमें दोनों शाखाओंकी किसी समान श्रुतिको कहकर दोनों शाखाओं की उक्त विशेष श्रुतियां मी ' अनन्तर ' इत्यादिसे उद्धृत की गई हैं। बृहदारण्यकश्रुतिमें आचमन और अनग्नरूपसे चिन्तन ये दोनों ही अपूर्व हैं। अतः ' तत्किम् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। आचमन और अनग्नरूपसे चिन्तन यदि इन दोनों का विधान मानें तो वाक्य भेद हो जायगा, इस अरुचिसे ' अथवा ' आदिसे अन्य पक्षको कहते हैं। यह आचमन प्रशस्त है, क्योंकि इससे प्राणको अनग्न मानते हैं। पूर्वपक्ष में प्राणविद्याका अङ्गरूपसे अपूर्व आचमनका जो विधान है उसका अन्य शाखाओंमें उपसंहार करना चाहिए, सिद्धान्तमें आचमन विधेय न होनेसे उसका अङ्गरूपसे उपसंहार नहीं है।
* प्रसिद्धानुवादेनाप्रसिद्धं विधेयम् ' ( प्रसिद्धका अनुवाद कर अप्रसिद्धका विधान होता है ) इस न्यायसे ' एवम् ' इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं। किश्व अन्य प्रमाणसे अप्राप्त ही विधेय होता है, बाचमन तो स्मृति विहित है, अतः वह विधेय नहीं हो सकता है। अनग्नतावाद आचमनकी स्तुतिके लिए नहीं है, क्योंकि आचमन स्तुत्य नहीं है। अनग्नताका संकल्प स्वयं विधेय प्रतीत होता है, इसलिए विधेय किसीकी स्तुतिके लिए नहीं होता। याचमनके दो प्रयोजन भी नहीं है, कारण कि आचमन भिन्न क्रिया है और अनग्नता संकल्प - वस्त्रसंकल्प भिन्न क्रिया है। इसलिए उन दोनोंका प्रयोजन भी भिन्न - भिन्न है।
* यदिदं ' यहाँ ध्यान विधि और उत्तर वाक्यमें क्रिया विधि इस प्रकार अर्ध विनाश होगा | इसलिए ' आचमेत् ' यह विधि नहीं है, किन्तु ' उपांशुयाजमन्तरा यजति ' इसके द्वारा पूर्व ही विहित होनेके कारण ' विष्णुरुपांशु यष्टव्यः ' ( विष्णु याग करना चाहिए ) इसके समान अनुवाद है, इसलिए ' एवंवित् ० ' यह वाक्य काण्व याखामें पठित नहीं है, यही इसे विधिवाक्य न माननेमें लिङ्ग है, अतः आचमन विधेय नहीं है॥ १८
समानाधिकरणम्
3.3.19 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र १९
समान एवं चाभेदात् ॥ ३.३.१९ ॥
पदच्छेद — समाने , एवम् , च , अभेदात्
सूत्रार्थ — जैसे भिन्न शाखाओं में विद्या एक और गुणोंका उपसंहार है, ( एवम् ) वैसे ( समाने ) एक शाखा में भी हो सकता है, ( अभेदात् ) क्योंकि उपास्यका अभेद है।
शाङ्करभाष्य
वाजसनेयिशाखायाम् अग्निरहस्ये शाण्डिल्यनामाङ्किता विद्या विज्ञाता तत्र च गुणाः श्रूयन्ते स आत्मानमुपासीत मनोमयं प्राणशरीरं भारूपम् इत्येवमादयः तस्यामेव शाखायां बृहदारण्यके पुनः पठ्यते मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किंच इति। तत्र संशयः किमियम् एका विद्या अग्निरहस्यबृहदारण्यकयोः गुणोपसंहारश्च उत द्वे इमे विद्ये गुणानुपसंहारश्चेति।
किं तावत्प्राप्तम् विद्याभेदः गुणव्यवस्था चेति कुतः पौनरुक्त्यप्रसङ्गात् भिन्नासु हि शाखासु अध्येतृवेदितृभेदात् पौनरुक्त्यपरिहारमालोच्य विद्यैकत्वमध्यवसाय एकत्रातिरिक्ता गुणा इतरत्रोपसंह्रियन्ते प्राणसंवादादिषु इत्युक्तम् एकस्यां पुनः शाखायाम् अध्येतृवेदितृभेदाभावात् अशक्यपरिहारे पौनरुक्त्ये न विप्रक्रष्टदेशस्था एका विद्या भवितुमर्हति।
न च अत्र एकमाम्नानं विद्याविधानार्थम् अपरं गुणविधानार्थम् इति विभागः संभवति तदा हि अतिरिक्ता एव गुणा इतरत्रेतरत्र च आम्नायेरन् न समानाः समाना अपि तु उभयत्राम्नायन्ते मनोमयत्वादयः। तस्मात् नान्योन्यगुणोपसंहार इत्येवं प्राप्ते ब्रूमहे यथा भिन्नासु शाखासु विद्यैकत्वं गुणोपसंहारश्च भवति एवमेकस्यामपि शाखायां भवितुमर्हति उपास्याभेदात्।
तदेव हि ब्रह्म मनोमयत्वादिगुणकम् उभयत्रापि उपास्यम् अभिन्नं प्रत्यभिजानीमः उपास्यं च रूपं विद्यायाः न च विद्यमाने रूपाभेदे विद्याभेदमध्यवसातुं शक्नुमः नापि विद्याभेदे गुणव्यवस्थानम्। ननु पौनरुक्त्यप्रसङ्गात् विद्याभेदोऽध्यवसितः नेत्युच्यते अर्थविभागोपपत्तेः एकं हि आम्नानं विद्याविधानार्थम् अपरं गुणविधानार्थम् इति न किंचिन्नोपपद्यते।
ननु एवं सति यदपठितमग्निरहस्ये तदेव बृहदारण्यके पठितव्यम् स एष सर्वस्येशानः इत्यादि यत्तु पठितमेवमनोमयः इत्यादि तन्न पठितव्यम् नैष दोषः तद्बलेनैव प्रदेशान्तरपठितविद्याप्रत्यभिज्ञानात् समानगुणाम्नानेन हि विप्रकृष्टदेशां शाण्डिल्यविद्यां प्रत्यभिज्ञाप्य तस्याम् ईशानत्वादि उपदिश्यते अन्यथा हि कथं तस्याम् अयं गुणविधिरभिधीयते। अपि च अप्राप्तांशोपदेशेन अर्थवति वाक्ये संजाते प्राप्तांशपरामर्शस्य नित्यानुवादतयापि उपपद्यमानत्वात् न तद्बलेन प्रत्यभिज्ञा उपेक्षितुं शक्यते।
तस्मादत्र समानायामपि शाखायां विद्यैकत्वं गुणोपसंहारश्चेत्युपपन्नम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वाजसनेयो शाखा के अग्निरहस्य में शाण्डिल्य नामक अङ्कित विद्या विज्ञात है, उसमें ' स आत्मानमुपासीत ० ' ( वह मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशरूप आत्माकी उपासना करे ) इत्यादि गुण सुने जाते हैं। और उसी शाखाके बृहदारण्यकमें पुनः ' मनोमयोऽयं पुरुषो ० ' ( प्रकाश ही जिसका सत्य - स्वरूप है, ऐसा यह पुरुष मनोमय है, वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा धान अथवा यव होता है उतने ही परिमाणवाला है।
वह यह सबका स्वामी और अधिपति है, तथा यह जो कुछ है सभीका प्रकर्षरूपसे शासन करता है ) इसप्रकार पढा जाता है। यहाँ संशय होता है - प्रग्निरहस्य और बृहदारण्यक इन दोनोंमें क्या यह एक विद्या और गुणोंका उपसंहार है अथवा वे दो विद्याएँ हैं और गुणोंका उपसंहार नहीं है? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - विद्याका भेद और गुणोंकी व्यवस्था है, ऐसा प्राप्त होता है। किससे? इससे कि पुनरुक्तिका प्रसङ्ग है।
मिन्न शाखाओं में अध्येता और वेदिताके भेदसे पुनरुक्ति परिहारका पर्यालोचनकर विद्याकी एकताका निश्चय कर एक विद्या में मिन्न गुणोंका अन्य विद्या में उपसंहार होता है, प्राणसंवाद आदिमें ऐसा कहा गया है, और एक शाखा में अध्येता और वेदिताका भेद न होनेसे पुनरुक्तिका परिहार अशक्य होनेपर दूर स्थानमें स्थित एक विद्या नहीं हो सकती।
और यहाँ एक श्रुति विद्या विधानके लिए और दूसरी श्रुति गुणविधान के लिए हो, ऐसा विभाग भी नहीं हो सकता ऐसी अवस्थिति में अतिरिक्त गुणोंकी ही भिन्न - भिन्न स्थलोंमें श्रुति होगी न कि समान गुणोंको। परन्तु दोनों स्थलों में मनोमयत्व आदि समान गुणों की श्रुति है, इसलिए एक दूसरेके गुणों का उपसंहार नहीं है। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होने पर हम कहते हैं -- जैसे भिन्न - भिन्न शाखाओं में विद्याका अभेद और गुणोंका उपसंहार होता है, वैसे एक शाखा में मी होना चाहिए, क्योंकि उपास्यका अभेद है।
मनोमयत्व आदि गुणोंसे युक्त वही एक ब्रह्म दोनों स्थलोंमें मी उपास्य है, ऐसी हम प्रत्यभिज्ञा करते हैं। और विद्याका रूप उपास्य है, रूपके अभेदके विद्यमान होने पर विद्या - भेदके निश्चय करने के लिए हम समर्थ नहीं हैं। विद्याके अभेद होनेपर गुणोंकी पृथक् व्यवस्था मी नहीं है। परन्तु पुनरुक्ति के प्रसंगसे विद्याका भेद निश्चित किया गया है?
नहीं, ऐसा कहते हैंक्योंकि अर्थका विभाग हो सकता है।- एक श्रुति विद्या विधानके लिए और दूसरी श्रुति गुणविधानके लिए है, इसप्रकार कुछ भी अनुपपन्न नहीं होता। परन्तु ऐसा होने पर अग्निरहस्य में जो गुण अपठित हैं उन्हींको बृहदारण्यकमें ' स एष सर्वस्येशान : ' ( वह यह सबका स्वामी है ) इत्यादि वे ही गुण पढने चाहिए, और जो ' मनोमयः ' इत्यादि पठित हैं उनको नहीं पढना चाहिए। यह दोष नहीं है, क्योंकि उसके बलसे ही अन्य प्रदेशमें पठित विद्याका प्रत्यभिज्ञान होता है।
समान गुणोंकी श्रुतिसे दूर स्थानमें स्थित शाण्डिल्यविद्याका प्रत्यभिज्ञान कराकर उसमें ईशानत्व - स्वामित्व आदिका उपदेश किया जाता है, नहीं तो उसमें यह गुण विधान कैसे कहा जायगा। किव अप्राप्त अंशके उपदेशसे वाक्यके अर्थवान् होनेपर प्राप्त अंशका परामर्शं नित्य अनुवादरूपसे भी उपपन्न होता है, अतः उसके बलसे प्रत्यभिज्ञाकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। इसलिए यहाँ एक शाखामें मी विद्याका एकत्व और गुणोंका उपसंहार है ऐसा उपपन्न होता है॥। १ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # जैसे ' अग्निहोत्रं जुहोति ' इस अग्निहोत्र वाक्यमें होमरूप कर्मको विधि है और ' दध्ना जुहोति ' इस वाक्य में दधि गुणकी विधि है, वैसे यहाँ भी विद्याका भेद नहीं होना चाहिए। इसका समाधान ' न च ' इत्यादिसे करते हैं। यह विद्याका अभेद और गुणोंका उपसंहार मानें तो समान गुणोंकी पुनरुक्ति व्यथं होगी, इसलिए अभ्यास से प्रयाज आदि भेदके समान विद्याका भेद है। पूर्वपक्ष में विद्याका भेद और गुणों का अनुपसंहार है, सिद्धान्तमें विद्याका अभेद और गुणोंका उपसंहार है।
* जहाँ बहुत गुणोंका श्रवण हो वह प्रधानविधि और अन्य स्थलमें उसका अनुवादकर गुणविधि होती है, अतः बृहदारण्यकमें प्रधानविधि और अग्निरहस्यमें गुणविधि है। यह न्यायनिर्णयका मत है, किन्तु रत्नप्रमामें अग्निरहस्यमें प्रधानविधि और वृहदारण्यकमें गुणविधि मानी गई है। इसप्रकार विभागके उपपन्न होनेपर विद्या एक है॥ १ ९
संबन्धाधिकरणम्
3.3.20 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २०
सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ ३.३.२० ॥
पदच्छेद — सम्बन्धात् एवम् , अन्यत्र , अपि
सूत्रार्थ — ( सम्बन्धात् ) एक शाखा में विभागरूपसे अधीत शाण्डिल्यविद्या में एक विद्यात्वसम्बन्धसे परस्पर गुणोपसंहार जैसे पूर्वमें कहा गया है, ( एवम् ) वैसे ( अन्यत्रापि ) अन्य स्थलमेंसत्यविद्या में भी एक विद्यात्व सम्बन्धसे परस्पर गुणोपसंहार हो सकता है।
शाङ्करभाष्य
बृहदारण्यकेसत्यं ब्रह्म इत्युपक्रम्य तद्यत्तत्सत्यमसौस आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः इति तस्यैव सत्यस्य ब्रह्मणः अधिदैवतमध्यात्मं च आयतनविशेषमुपदिश्य व्याहृतिशरीरत्वं च संपाद्य द्वे उपनिषदावादिश्येते तस्योपनिषदहः इति अधिदैवतम्तस्योपनिषदहम् इति अध्यात्मम्। तत्र संशयः किमविभागेनैव उभे अपि उपनिषदावुभयत्रानुसंधातव्ये उत विभागेन एका अधिदैवतम् एका अध्यात्ममिति। तत्र सूत्रेणैवोपक्रमते यथा शाण्डिल्यविद्यायां विभागेनाप्यधीतायां गुणोपसंहार उक्तः एवमन्यत्रापि एवंजातीयके विषये भवितुमर्हति एकविद्याभिसंबन्धात् एका हि इयं सत्यविद्या अधिदैवतम् अध्यात्मं च अधीता उपक्रमाभेदात् व्यतिषक्तपाठाच्च कथं तस्यामुदितो धर्मः तस्यामेव न स्यात्। यो ह्याचार्ये कश्चिदनुगमनादिराचारश्चोदितः स ग्रामगतेऽरण्यगते च तुल्यवदेव भवति। तस्मात् उभयोरप्युपनिषदोः उभयत्र प्राप्तिरिति।। एवं प्राप्ते प्रतिविधत्ते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — बृहदारण्यकर्मे ' सत्यं ब्रह्म ' ( सत्य ब्रह्म है ) इसप्रकार उपक्रमकर ' तद्यत्तत्सत्यमसौ ० ' ( वह जो सत्य है, सो यह आदित्य है। जो इस आदित्य - मण्डल में पुरुष है और जो भी यह दक्षिणनेत्र में पुरुष है ) इसप्रकार उसी सत्य ब्रह्मके अधिदैवंत और अध्यात्म स्थानविशेषका उपदेशकर व्याहृति शरीरत्वका संपादनकर दो उपनिषदोंका - रहस्यनामोंका उपदेश किया जाता है। ' अहः ' उसका अधिदैवत उपनिषद् - रहस्य नाम है, ' अहम् ' उसका अध्यात्म उपनिषद् रहस्य नाम है।
यहाँ संशय होता है कि क्या अविभागसे ही दोनों उपनिषदोंका दोनों स्थलोंमें अनुसंधान करना चाहिए अथवा विभागसे ही एक अधिदैवत और एक अध्यात्मका? उसपर सूत्रसे ही उपक्रम करते हैं— जैसे विभागसे अधीत होनेपर भी शाण्डिल्यविद्या में गुणोंका उपसंहार कहा गया है, ऐसे इसप्रकारके विषयमें अन्य स्थलोंमें भी गुणोपसंहार उक्त एवमन्यत्राप्येवं जातीय के विषये भवितुमर्हति एकविद्याभिसंबन्धात्। एका हीयं सत्यविद्याऽधिदैवमध्यात्मं चाधीता, उपक्रमाभेदादूव्यतिषक्तपाठाच्च।
कथं होना चाहिए, क्योंकि एक विद्याका सम्बन्ध है। उपक्रमका अभेद होने से और परस्पर सम्बद्ध पाठ होनेसे अधिदेवत और अध्यात्मरूपसे अधीत यह सत्यविद्या एक ही है। उस एक विद्यामें कथित धमं उसीमें क्यों न हों? क्योंकि जो आचार्यके विषय में कोई अनुगन आदि आचार विहित है, वह ग्रामगत आचार्यमें अथवा अरण्यगत आचार्यमें एक - सा ही होता है। इसलिए दोनों उपनिषदोंकी भी दोनों स्थलोंमें प्राप्ति है॥ २०
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यहाँ आदित्यपदसे आदित्यमण्डलका ग्रहण नहीं है, किन्तु उस मण्डलमें इन्द्रियात्मक जो पुरुष है, वही अध्यात्म नेत्र स्थानमें स्थित है, ऐसा उपदेशकर ' तस्य भूरिति शिरः ' भुव इति बाहु, स्वरिति प्रतिष्ठा ' ( बृह ० ५/५/३ ) ( उसका ' भू ' यह शिर है, ' भुव ' यह बाहु है और ' स्वः ' यह पाद हैं ) इसप्रकार व्यहृतिरूप शरीर कहकर दो उपनिषदोंका - देवताके रहस्यनामोंका - श्रुतिसे उपदेश किया जाता है।
उस आदित्य- मण्डलस्थ पुरुषका नाम ' अह ' है, क्योंकि वह प्रकाशक है | नेत्रस्थ पुरुषका नाम ' अहम् ' है, क्योंकि वह प्रत्यक है। इसप्रकार अधिदैवत और अध्यात्म ये दो नाम इस अधिकरण के विषय हैं। यहाँ जिसके ये दो नाम हैं, उस सत्यसंज्ञक ब्रह्मके एक होनेसे और उसके स्थानभेदका कथन होनेसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। जैसे पूर्व अधिकरण में विद्याके एक होनेसे परस्पर गुणोंका उपसंहार है, वैसे भिन्न स्थलस्थ एक विद्यामें भी गुणोंका उपसंहार हो सकता है।
' सत्यं ब्रह्म ' इसप्रकार उपक्रमका अभेद है, और ' तावेतौ अक्ष्यादित्यपुरुषौ अन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ ० ' ( बृह ० ५/५ | १ ) ( वे ये दोनों - अक्षि पुरुष और आदित्य पुरुष एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हैं ) सूर्य किरणोंकी चक्षुमें और चक्षुकी आदित्य में प्रतिष्ठा है। इस रीतिसे उपक्रमके अभेद और परस्पर सम्बन्धित पाठसे विद्या एक है, अतः दोनों उपनिषदोंकी दोनों स्थलोंमें प्राप्ति है।
पूर्वपक्षमें प्रत्येक स्थानमें दोनों नामोंका अनुष्ठान है, सिद्धान्त में जिस - जिस स्थान में जो - जो नाम है उस उसका अनुष्ठान है | २० ||
3.3.21 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २१
न वा विशेषात् ॥ ३.३.२१ ॥
पदच्छेद — न , वा , विशेषात्
सूत्रार्थ — ( न वा ) दोनों उपनिषदोंकी दोनों स्थलोंमें प्राप्ति नहीं है, ( विशेषात् ) क्योंकि विशेष है अर्थात् उपासनाका स्थानविशेषके साथ सम्बन्ध है।
शाङ्करभाष्य
नैव उभयोः उभयत्र प्राप्तिः कस्मात् विशेषात् उपासनस्थानविशेषोपनिबन्धादित्यर्थः। कथं स्थानविशेषोपनिबन्ध इति उच्यते य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः इति हि आधिदैविकं पुरुषं प्रकृत्यतस्योपनिषदहः इति श्रावयतियोऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः इति च आध्यात्मिकं पुरुषं प्रकृत्यतस्योपनिषदहम् इति तस्येति च एतत् संनिहितावलम्बनं सर्वनाम तस्मात् आयतनविशेषव्यपाश्रयेणैव एते उपनिषदावुपदिश्येते कुत उभयोरुभयत्र प्राप्तिः। ननु एक एवायम् अधिदैवतमध्यात्मं च पुरुषः एकस्यैव सत्यस्य ब्रह्मण आयतनद्वयप्रतिपादनात् सत्यमेवमेतत् एकस्यापि तु अवस्थाविशेषोपादानेनैव उपनिषद्विशेषोपदेशात् तदवस्थस्यैव सा भवितुमर्हति अस्ति चायं दृष्टान्तः सत्यपि आचार्यस्वरूपानपाये यत् आचार्यस्य आसीनस्य अनुवर्तनमुक्तम् न तत् तिष्ठतो भवति यच्च तिष्ठत उक्तम् न तदासीनस्येति। ग्रामारण्ययोस्तु आचार्यस्वरूपानपायात् तत्स्वरूपानुबद्धस्य च धर्मस्य ग्रामारण्यकृतविशेषाभावात् उभयत्र तुल्यवद्भाव इति अदृष्टान्तः सः। तस्मात् व्यवस्था अनयोरुपनिषदोः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा प्राप्त होनेपर समाधान करते हैं-
अथवा दोनोंकी दोनों स्थलोंमें प्राप्ति नहीं है, किससे? विशेषसे – उपासनाका स्थान - विशेषके साथ सम्बन्ध होनेसे। स्थानविशेषके साथ उपनिबन्ध ( सम्बन्ध ) किस प्रकार है?
इस पर कहते हैं' य एष एतस्मिन् ० ' ( जो यह इस मण्डलमें पुरुष है ) इस प्रकार आधिदैविक पुरुषको प्रस्तुतकर ' तस्योपनिषदहः ' उसका उपनिषद् - रहस्य नाम ' अहः ' है, ऐसा श्रुति श्रवण कराती है, और ' योऽयं ० ' ( जो यह दक्षिण अक्षिमें पुरुष है ) इस प्रकार आध्यात्म पुरुषका उपक्रमकर ' उसका उपनिषद् - रहस्य नाम ' अहम् ' है, ऐसा श्रवण कराती है। ' तस्य ' यह शब्द संनिहितका आलम्बन करनेवाला सर्वनाम है, इसलिए स्थान विशेष अवलम्बनसे ये दोनों उपनिषद् - रहस्य उपदेश किये जाते हैं।
अतः दोनोंकी दोनों स्थलों में कैसे प्राप्ति हो सकती है? परन्तु अधिदेवित और अध्यात्मरूपसे यह एक ही पुरुष है, क्योंकि एक ही सत्य ब्रह्मका दो स्थानों में प्रतिपादन है। हाँ, यह ठीक है, परन्तु एक ब्रह्मके भी अवस्थाविशेषके ग्रहणसे उपनिषद् - विशेषका उपदेश होनेसे उस अवस्थामें आए हुएका ही वह उपनिषद् हो सकता है।
और यह दृष्टान्त भी है - आचार्यके स्वरूपका अपाय - विनाश न होनेपर भी बैठे हुए आचार्यका जो अनुवर्तन कहा गया है वह खड़े हुएका नहीं होता, और जो खड़े हुएका कहा गया है वह बैठे हुएका नहीं होता। परन्तु ग्राम और अरण्यमें तो आचार्यके स्वरूपका अपाय न होनेसे और स्वरूपके साथ अनुबद्ध - सम्बन्धित घर्ममें ग्राम और अरण्यकृत विशेष न होनेसे दोनों स्थलोंमें एक - सा भाव है, इसलिए वह दृष्टान्त नहीं है, अतः इन दोनों उपनिषदोंकी व्यवस्था है॥ २१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # ये दोनों नाम भिन्न - भिन्न उपासना स्थानके साथ सम्बन्ध रखते हैं। अतः ' तस्योपनिषदहः ' और ' तस्योपनिषदहम् ' उस आदित्य पुरुषका नाम ' अहः ' और अक्षिस्य पुरुषका नाम ' अहम् ' है। इन दोनों वाक्योंमें सर्वनाम ' तत् ' पद निकटवर्तीका ही आलम्बन करता है, इसलिए प्रथम ' तत् ' शब्द आदित्यस्थ पुरुषका और द्वितीय ' तत् ' पद अक्षिस्थ पुरुषका परामर्श करता है, क्योंकि स्थानभेदसे विशेष्यका भी भेद माना जाता है। विशेष्यके एक होनेपर भी विशेषण युक्त होनेसे विशिष्टमें भेद माना गया है, इसलिए इन दोनों उपनिषदोंकी - ' अहः ' और ' अहम् ' नामोंकी भिन्न - भिन्न व्यवस्था है अर्थात् सत्यविद्या एक होनेपर भी अधिदैवित और अध्यात्मभेद से भिन्न है।। २१
3.3.22 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २२
दर्शयति च ॥ ३.३.२२ ॥
पदच्छेद — दर्शयति , च
सूत्रार्थ — और ' तस्यैतस्य तदेव रूपम् ' इत्यादि श्रुति ऐसा ही दिखलाती है।
शाङ्करभाष्य
दर्शयति च वेदोऽपि विद्यैकत्वं सर्ववेदान्तेषु वेद्यैकत्वोपदेशात् सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति इतितथैतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्त एतमग्नावध्वर्यव एतं महाव्रते छन्दोगाः इति च। तथामहद्भयं वज्रमुद्यतम् इति काठके उक्तस्य ईश्वरगुणस्य भयहेतुत्वस्य तैत्तिरीयके भेददर्शननिन्दायै परामर्शो दृश्यते यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य इति। तथा वाजसनेयके प्रादेशमात्रसंपादितस्य वैश्वानरस्य च्छान्दोग्ये सिद्धवदुपादानम् यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते इति। तथा सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वेन अन्यत्र विहितानामुक्थादीनामन्यत्रोपासनविधानाय उपादानात् प्रायदर्शनन्यायेन उपासनानामपि सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वसिद्धिः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इसप्रकारके धर्मोकी व्यवस्था है- उनका परस्पर उपसंहार नहीं है, इस विषय में ' तस्यै - तस्य ० ' ( उस इस चक्षुस्थ पुरुषका वही रूप है जो इस आदित्यान्तर्गत पुरुषका रूप है। जो उस पुरुष के पर्व ( गिट्टे ) हैं वही इसके पर्व हैं, जो उसका नाम है वही इसका नाम है ) यह लिङ्गदर्शन है। यह लिङ्गदर्शन कैसे है? उसे कहते हैं - अक्षि और आदित्य इस स्थानभेदसे भिन्न परस्परमें उपसंहारके अयोग्य इन धर्मोको देखकर श्रुति आदित्य पुरुष गत रूप आदिका यहाँ अतिदेशसे अक्षि पुरुष में ' तस्यैतस्य ते देव रूपम् ' इत्यादिसे उपसंहार करती है। इसलिए ये दोनों उपनिषद् - रहस्य व्यवस्थित हैं, ऐसा निणं है॥ २२
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' अहः ' और ' अहम् ' इन नामोंकी व्यवस्था में अतिदेश ही लिङ्ग है, यह ' दर्शयति च ' इससे दिखलाते हैं। विद्याके अभिन्न होनेसे हो यदि धर्मोंका उपसंहार हो तो ' तस्यैतस्य ' यह अतिदेश व्यर्थं होगा, इसलिए एक विद्यामें भी स्थानभेदसे कथित गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता॥ २२
संभृत्यधिकरणम्
3.3.23 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २३
संभृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ॥ ३.३.२३ ॥
पदच्छेद — संभतिद्युव्याप्ति , अपि · च , छत
सूत्रार्थ — ( संभृतिद्युव्याप्ति ) संभृति, द्यव्याप्ति आदि विभूतियोंका भी शाण्डिल्यविद्या आदिमें उपसंहार नहीं करना चाहिए, ( अतरच ) क्योंकि आयतन विशेषका योग है।
शाङ्करभाष्य
ब्रह्मज्येष्ठा वीर्या संभृतानि ब्रह्माग्रे ज्येष्ठं दिवमाततान इत्येवं राणायनीयानां खिलेषु वीर्यसंभृतिद्युनिवेशप्रभृतयो ब्रह्मणो विभूतयः पठ्यन्ते तेषामेव च उपनिषदि शाण्डिल्यविद्याप्रभृतयो ब्रह्मविद्याः पठ्यन्ते तासु ब्रह्मविद्यासु ता ब्रह्मविभूतय उपसंह्रियेरन् न वेति विचारणायाम् ब्रह्मसंबन्धादुपसंहारप्राप्तौ एवं पठति। संभृतिद्युव्याप्तिप्रभृतयो विभूतयः शाण्डिल्यविद्याप्रभृतिषु नोपसंहर्तव्याः अत एव च आयतनविशेषयोगात्।
तथा हि शाण्डिल्यविद्यायां हृदयायतनत्वं ब्रह्मण उक्तम् एष म आत्मान्तर्हृदये इति तद्वदेव दहरविद्यायामपि दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः इति उपकोसलविद्यायां तु अक्ष्यायतनत्वम् य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते इति एवं तत्र तत्र तत्तत् आध्यात्मिकमायतनम् एतासु विद्यासु प्रतीयते आधिदैविक्यस्तु एता विभूतयः संभृतिद्युव्याप्तिप्रभृतयः तासां कुत एतासु प्राप्तिः।
नन्वेतास्वपि आधिदैविक्यो विभूतयः श्रूयन्ते ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यःएष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भातियावान्वायमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते इत्येवमाद्याः सन्ति च अन्या आयतनविशेषहीना अपि इह ब्रह्मविद्याः षोडशकलाद्याः सत्यमेवमेतत् तथाप्यत्र विद्यते विशेषः संभृत्याद्यनुपसंहारहेतुः समानगुणाम्नानेन हि प्रत्युपस्थापितासु विप्रकृष्टदेशास्वपि विद्यासु विप्रकृष्टदेशगुणा उपसंह्रियेरन्निति युक्तम् संभृत्यादयस्तु शाण्डिल्यादिवाक्यगोचराश्च गुणाः परस्परव्यावृत्तस्वरूपत्वात् न प्रदेशान्तरवर्तिविद्याप्रत्युपस्थापनक्षमाः।
न च ब्रह्मसंबन्धमात्रेण प्रदेशान्तरवर्तिविद्याप्रत्युपस्थापनमित्युच्यते विद्याभेदेऽपि तदुपपत्तेः एकमपि हि ब्रह्म विभूतिभेदैरनेकधा उपास्यत इति स्थितिः परोवरीयस्त्वादिवद्भेददर्शनात्। तस्मात् वीर्यसंभृत्यादीनां शाण्डिल्यविद्यादिषु अनुपसंहार इति।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.३.२५ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ब्रह्मकी वीयं समृद्धि स्वगं व्याप्ति आदि विभूतियां कही गई हैं, उनका ब्रह्मके साथ सम्बन्ध होनेसे सब ब्रह्मविद्याओंमें उपसंहार पूर्वपक्ष है। सिद्धान्तमें इनका उपसंहार नहीं है।। २३
पुरुषाद्यधिकरणम्
3.3.24 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २४
पुरुषविद्यायामपि चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३.३.२४ ॥
पदच्छेद — पुरुष विद्यायाम् , इव , च , इतरेषाम् , अनाम्नानात्
सूत्रार्थ — ( पुरुषविद्यायामिव ) ताण्डी आदिमें पुरुष विद्यामें जिस प्रकार पुरुषकी यज्ञरूपसे कल्पना की जाती है, उसी प्रकार ( इतरेषाम् ) तैत्तिरीयोंकी पुरुषविद्या में ( अनाम्नानात् ) पठितं न होनेसे ताण्डी आदि गत पुरुष यज्ञधमं तैत्तिरीयकमें उपसंहार नहीं करने चाहिए।
शाङ्करभाष्य
अस्ति ताण्डिनां पैङ्गिनां च रहस्यब्राह्मणे पुरुषविद्या तत्र पुरुषो यज्ञः कल्पितः तदीयमायुः त्रेधा विभज्य सवनत्रयं कल्पितम् अशिशिषादीनि च दीक्षादिभावेन कल्पितानि अन्ये च धर्मास्तत्र समधिगता आशीर्मन्त्रप्रयोगादयः। तैत्तिरीयका अपि कंचित् पुरुषयज्ञं कल्पयन्ति तस्यैवंविदुषो यज्ञस्यात्मा यजमानः श्रद्धा पत्नी इत्येतेनानुवाकेन। तत्र संशयः किमितरत्र उक्ताः पुरुषयज्ञस्य धर्माः तैत्तिरीयकेषु उपसंहर्तव्याः किं वा नोपसंहर्तव्या इति।
पुरुषयज्ञत्वाविशेषात् उपसंहारप्राप्तौ आचक्ष्महे नोपसंहर्तव्या इति कस्मात् तद्रूपप्रत्यभिज्ञानाभावात तदाहाचार्यः पुरुषविद्यायामिवेति यथा एकेषां शाखिनां ताण्डिनां पैङ्गिनां च पुरुषविद्यायामाम्नानम् नैवम् इतरेषां तैत्तिरीयाणामाम्नानमस्ति तेषां हि इतरविलक्षणमेव यज्ञसंपादनं दृश्यते पत्नीयजमानवेदिवेदबर्हिर्यूपाज्यपश्वृत्विगाद्यनुक्रमणात्। यदपि सवनसंपादनम् तदपि इतरविलक्षणमेव यत्प्रातर्मध्यंदिन्ायं च तानि इति।
यदपि किंचित् मरणावभृथत्वादिसामान्यम् तदपि अल्पीयस्त्वात् भूयसा वैलक्षण्येन अभिभूयमानं न प्रत्यभिज्ञापनक्षमम्।
न च तैत्तिरीयके पुरुषस्य यज्ञत्वं श्रूयतेविदुषःयज्ञस्य इति हि न च एते समानाधिकरणे षष्ठ्यौ विद्वानेव यो यज्ञस्तस्येति न हि पुरुषस्य मुख्यं यज्ञत्वमस्ति व्यधिकरणे तु एते षष्ठ्यौ विदुषो यो यज्ञस्तस्येति भवति हि पुरुषस्य मुख्यो यज्ञसंबन्धः सत्यां च गतौ मुख्य एवार्थ आश्रयितव्यः न भाक्तः।आत्मा यजमानः इति च यजमानत्वं पुरुषस्य निर्ब्रुवन् वैयधिकरण्येनैव अस्य यज्ञसंबन्धं दर्शयति।
अपि चतस्यैवंविदुषः इति सिद्धवदनुवादश्रुतौ सत्याम् पुरुषस्य यज्ञभावम् आत्मादीनां च यजमानादिभावं प्रतिपित्समानस्य वाक्यभेदः स्यात्। अपि च ससंन्यासामात्मविद्यां पुरस्तादुपदिश्य अनन्तरम्तस्यैवंविदुषः इत्याद्यनुक्रमणं पश्यन्तः पूर्वशेष एव एष आम्नायः न स्वतन्त्र इति प्रतीमः तथा च एकमेव फलमुभयोरप्यनुवाकयोरुपलभामहे ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति इति इतरेषां तु अनन्यशेषः पुरुषविद्याम्नायः आयुरभिवृद्धिफलो ह्यसौप्रह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद इति समभिव्याहारात्।
तस्मात् शाखान्तराधीतानां पुरुषविद्याधर्माणामाशीर्मन्त्रादीनामप्राप्तिः तैत्तिरीयके।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.३.२५ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * छान्दोग्यगत विद्याको कहते हैं - ' पुरुषो वा यज्ञस्तस्य ' ( छा ० ३।१६।१ ) ' पुरुष ही यज्ञ है उसके जो चौबीस वर्षं हैं वह प्रातः सवन है ' ' उसके जो चौवालीस वर्षं हैं वह माध्यन्दिन सवन है ' ' उसके जो अवशिष्ट अड़तालीस वर्ष हैं वह तृतीय सवन है ' ( छा ० ३ | १६ | ३ ) सोमयागमें सोमरस निकालने समयको संवन कहा जाता है। इस प्रसिद्ध यज्ञके सादृश्यके लिए इन तीन सवनोंकी कल्पनाकी गई है।
' स यदशिशिषति ० ' ( वह जो खानेकी अभिलाषा करता है, जो पीना चाहता है जो रमण ( प्रसन्न ) नहीं होता वही इसकी दीक्षा है और पुनः वह जो खाता है जो पीता है जो रति करता है वह उपसदोंकी सदृश्यताको प्राप्त होता है [ दोक्षणीयेष्टि, प्रयणीयेष्टि, उपसदिष्टि, उदयनीयेष्टि और अवभृथेष्टि इस प्रकार पाँच उपसदिष्टियाँ होती हैं ] तथा जो हँसता है, मक्षण करता है जो मैथुन करता है वे स्तुत शास्त्रकी समानताको प्राप्त होते हैं, तथा जो तप, दान आदि हैं वह इसकी दक्षिणा है, मरण हो अवभृथ स्नान है | ( छा ० ३१ ३,४,५ ) वसु आदि अथवा ये मेरे प्राण प्रातः सवन और माध्यन्दिन सवन हैं।
इस प्रकार ये तीन सवन आयुपर्यन्त चलते रहते हैं। यह आशीष - फल- कामना है ' अक्षितमस्यच्युतमसि प्राणस शितमसि ' ( छा ० ३ | १७१४ ) ( तू अक्षय है, तू अच्युत - अविनाशी है और अतिसूक्ष्म प्राण है ) इस प्रकार एक सौ चालीस वर्षं जीवन फल है, ऐसा दिखलाया गया है। संशयके लिए अन्य शाखा में पुरुषं विद्याको ' तैत्तिरीयक ' इत्यादिसे कहते हैं - पहाँ पर ' विदुषो यज्ञस्य ' इन षष्ठी विभक्तयन्त दो पदोंका सामानाधिकरण्य है अथवा वैयधिकरण्य? इसका निश्चय न होने से संशय होता है।
पूर्वपक्षमें गुणोंका उपसंहार और सिद्धान्त में गुणोंका अनुपसंहार है। ' तस्यैवं विदुषो यज्ञस्य ' ( उस ऐसा जाननेवालेके यज्ञका आत्मा यजमान है, श्रद्धा पत्नी, शरीर समिधा, उरु स्थल वेदी, रोम बहि - कुशा, वेद- कुशमुष्टि शिखा, हृदय यूप, काम आज्य, मन्युक्रोध- पशु, तप अग्नि शमन करनेवाला दम दक्षिणा, वाणी होता, प्राण उद्गाता, नेत्र सर्वयु और मन ब्रह्मा है ) इस प्रकार अनेक धर्मोकी विषमता होनेसे एकरूपकी प्रत्यभिज्ञा नहीं होती।
छान्दोग्यमें तीन प्रकारसे विभक्त किये गये बायुमें सवनत्वकी कल्पना की गई है और तैत्तिरीयक प्रातःकाल आदिमें सवनत्वको कल्पना की गई है, इसप्रकार दोनों में वैलक्षण्य है, अतः गुणोंका उपसंहार नहीं होना चाहिए।
* ‘ यन्मरणं तदवभृथः यद्रमते तदुपसदः ' ( तै ० ६ | ५ | २ | १ ) ऐसा तैत्तिरीयकमें बल्प सादृश्य अधिक वैषम्यको अपने अनुकूल नहीं कर सकता। जैसे हाथी और ऊँठमें चार पादका अल्प साम्य दोनोंके हाथी अथवा ऊँठ होनेमें समर्थ नहीं है। छान्दोग्यमें पुरुष और यज्ञका ऐक्य है और तैत्तिरीयकमें भेद है, इस दूसरे वैरूप्यको ' न च ' इत्यादिसे कहते हैं।। २४
वेधाद्याधिकरणम्
3.3.25 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २५
वेधाद्यर्थभेदात् ॥ ३.३.२५ ॥
सूत्रार्थ — इन मन्त्रों और कर्मोंका विद्यानें उपसंहार नहीं होना चाहिए, क्योंकि वेध आदि का भेद है।
शाङ्करभाष्य
अस्त्याथर्वणिकानामुपनिषदारम्भे मन्त्रसमाम्नायः सर्वं प्रविध्य हृदयं प्रविध्य धमनीः प्रवृज्य शिरोऽभिप्रवृज्य त्रिधा विपृक्तः इत्यादिः ताण्डिनाम् देव सवितः प्रसुव यज्ञम् इत्यादिः शाट्यायनिनाम् श्वेताश्वो हरितनीलोऽसि इत्यादिः कठानां तैत्तिरीयाणां च शं नो मित्रः शं वरुणः इत्यादिः वाजसनेयिनां तु उपनिषदारम्भे प्रवर्ग्यब्राह्मणं पठ्यते देवा ह वै सत्रं निषेदुः इत्यादि कौषीतकिनामपि अग्निष्टोमब्राह्मणम् ब्रह्म वा अग्निष्टोमो ब्रह्मैव तदहर्ब्रह्मणैव ते ब्रह्मोपयन्ति तेऽमृतत्वमाप्नुवन्ति य एतदहरुपयन्ति इति।
किमिमे सर्वे प्रविध्यादयो मन्त्राः प्रवर्ग्यादीनि च कर्माणि विद्यासु उपसंह्रियेरन् किं वा न उपसंह्रियेरन् इति मीमांसामहे। किं तावत् नः प्रतिभाति उपसंहार एव एषां विद्यास्विति कुतः विद्याप्रधानानामुपनिषद्ग्रन्थानां समीपे पाठात्। ननु एषां विद्यार्थतया विधानं नोपलभामहे बाढम् अनुपलभमाना अपि तु अनुमास्यामहे संनिधिसामर्थ्यात् न हि संनिधेः अर्थवत्त्वे संभवति अकस्मादसावनाश्रयितुं युक्तः।
ननु नैषां मन्त्राणां विद्याविषयं किंचित्सामर्थ्यं पश्यामः कथं च प्रवर्ग्यादीनि कर्माणि अन्यार्थत्वेनैव विनियुक्तानि सन्ति विद्यार्थत्वेनापि प्रतिपद्येमहीति नैष दोषः सामर्थ्यं तावत् मन्त्राणां विद्याविषयमपि किंचित् शक्यं कल्पयितुम् हृदयादिसंकीर्तनात् हृदयादीनि हि प्रायेण उपासनेषु आयतनादिभावेनोपदिष्टानि तद्द्वारेण चहृदयं प्रविध्य इत्येवंजातीयकानां मन्त्राणाम् उपपन्नमुपासनाङ्गत्वम् दृष्टश्च उपासनेष्वपि मन्त्रविनियोगः भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना इत्येवमादिः तथा प्रवर्ग्यादीनां कर्मणाम् अन्यत्रापि विनियुक्तानां सताम् अविरुद्धो विद्यासु विनियोगः वाजपेय इव बृहस्पतिसवस्य इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः नैषामुपसंहारो विद्यास्विति कस्मात् वेधाद्यर्थभेदात् हृदयं प्रविध्य इत्येवंजातीयकानां हि मन्त्राणां येऽर्था हृदयवेधादयः भिन्नाः अनभिसंबद्धाः ते उपनिषदुदिताभिर्विद्याभिः न तेषां ताभिः संगन्तुं सामर्थ्यमस्ति।
ननु हृदयस्य उपासनेष्वप्युपयोगात् तद्द्वारक उपासनासंबन्ध उपन्यस्तः नेत्युच्यते हृदयमात्रसंकीर्तनस्य हि एवमुपयोगः कथंचिदुत्प्रेक्ष्येत न च हृदयमात्रमत्र मन्त्रार्थःहृदयं प्रविध्य धमनीः प्रवृज्य इत्येवंजातीयको हि न सकलो मन्त्रार्थो विद्याभिरभिसंबध्यते अभिचारविषयो ह्येषोऽर्थः तस्मादाभिचारिकेण कर्मणासर्वं प्रविध्य इत्येतस्य मन्त्रस्याभिसंबन्धः तथादेव सवितः प्रसुव यज्ञम् इत्यस्य यज्ञप्रसवलिङ्गत्वात् यज्ञेन कर्मणा अभिसंबन्धः तद्विशेषसंबन्धस्तु प्रमाणान्तरादनुसर्तव्यः एवमन्येषामपि मन्त्राणाम् केषांचित् लिङ्गेन केषांचिद्वचनेन केषांचित्प्रमाणान्तरेणेत्येवम् अर्थान्तरेषु विनियुक्तानाम् रहस्यपठितानामपि सताम् न संनिधिमात्रेण विद्याशेषत्वोपपत्तिः दुर्बलो हि संनिधिः श्रुत्यादिभ्य इत्युक्तं प्रथमे तन्त्रे श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात् इत्यत्र।
तथा कर्मणामपि प्रवर्ग्यादीनामन्यत्र विनियुक्तानां न विद्याशेषत्वोपपत्तिः न ह्येषां विद्याभिः सह ऐकार्थ्यं किंचिदस्ति वाजपेये तु बृहस्पतिसवस्य स्पष्टं विनियोगान्तरम् वाजपेयेनेष्ट्वा बृहस्पतिसवेन यजेत इति अपि च एकोऽयं प्रवर्ग्यः सकृदुत्पन्नो बलीयसा प्रमाणेन अन्यत्र विनियुक्तः न दुर्बलेन प्रमाणेन अन्यत्रापि विनियोगमर्हति अगृह्यमाणविशेषत्वे हि प्रमाणयोः एवं स्यात् न तु बलवदबलवतोः प्रमाणयोरगृह्यमाणविशेषता संभवति बलवदबलवत्त्वविशेषादेव।
तस्मात् एवंजातीयकानां मन्त्राणां कर्मणां वा न संनिधिपाठमात्रेण विद्याशेषत्वमाशङ्कितव्यम् अरण्यानुवचनादिधर्मसामान्यात्तु संनिधिपाठ इति संतोष्टव्यम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' ब्रह्मज्येष्ठा ० ' ( ब्रह्म ही जिनका कारण है, ऐसे पराक्रम विशेष (
आकाशको उत्पन्न करना ) निर्विघ्न समृद्ध हुए वह ज्येष्ठ ब्रह्म देवताओंकी उत्पत्तिके पूर्व स्वर्गमें व्याप्त
हुआ ) इस प्रकार राणायनीय शाखावालोंके खिलकाण्डों में वीयं समृद्धि, स्वर्गव्याप्ति आदि ब्रह्मकी
विभूतियां कही जाती हैं।
। उन ब्रह्मविद्याओंमें उन और उन्हींके उपनिषद्में शाण्डिल्यविद्या आदि ब्रह्मविद्याएं पढी जाती हैं ब्रह्मविभूतियोंका उपसंहार होना चाहिए अथवा नहीं? ऐसा विचार
उपस्थित होनेपर ब्रह्मके सम्बन्धसे उपसंहार प्राप्त होनेपर ऐसा कहते हैं — संभृति, द्युव्याप्ति आदि
विभूतियों का शाण्डिल्यविद्या
। जैसे कि शाण्डिल्यविद्यामें आदिमें उपसंहार नहीं होना चाहिए, अतएव च आयतनविशेष के सम्बन्धसे ' एष म आत्मान्तर्हृदये ' ( यह मेरा आत्मा हृदयके मीतर है ) इस प्रकार ब्रह्मका हृदय आयतन कहा गया है। उसी प्रकार दहरविद्या में भी ' दहरं पुण्डरीकं ० ' ( इस ब्रह्मपुरके मीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है ) इस प्रकार ब्रह्मका हृदय स्थान कहा गया है। उपकोसलविद्यामें तो ' य एषो ० ' ( जो यह अक्षिमें पुरुष दिखाई देता है ) इस तरह ब्रह्मका नेत्र स्थान कहा गया है।
इस प्रकार तत् तत् स्थलमें तत् - वत् आध्यात्मिक आयतन इन विद्याओं में प्रतीत होता है। परन्तु संभृति, व्याप्ति आदि ये विभूतियाँ आधिदैविकी हैं, उन विभूतियोंकी इन विद्याओंमें प्राप्ति किस प्रकार हो सकती है!
इन विद्याओंमें भी आधिदैनिकी विभूतियोंकी ' ज्यायान्दिवो ० ' ( आत्मा द्यु लोकसे बड़ा, इन लोकोंसे बड़ा है ) ' एष उ एव ० ' ( यही आत्मा मामनी है, क्योंकि सम्पूर्ण लोकोंमें आदित्य, चन्द्र और अग्नि आदिके रूपमें यही दीप्त होता है ) ' यावान्वा ० ' ( जितना यह भौतिक आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत आकाश है, द्युलोक और पृथिवी ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं और इस प्रकरण में स्थानविशेष रहित भी अन्य षोडशकला आदि ब्रह्मविद्याएँ हैं।
यह सत्य ही है, तो मी यहाँ विशेष है वह संभृति आदिके अनुपसंहारका हेतु है, क्योंकि समान गुणों श्रुति उपस्थापित दूर स्थानों में स्थित विद्याओंमें भी दूर स्थानस्थ गुणों का उपसंहार होना चाहिए, यह युक्त है | परन्तु संभृति आदि गुण और शाण्डिल्य आदि वाक्य विषयक मनोमयत्व आदि गुण परस्पर व्यावृत्त ( भिन्न ) स्वरूपवाले होने से अन्य प्रदेश में स्थित विद्याके उपस्थापन करनेमें समर्थ नहीं हैं।
उसीप्रकार केवल ब्रह्म सम्बन्धसे अन्य प्रदेशवर्ती विद्याका उपस्थापन होता है, ऐसा नहीं कहा जाता है, कारण कि विद्याके भेद होनेपर भी ब्रह्मका सम्बन्ध उपपन्न होता है। एक ब्रह्मकी भी भिन्नभिन्न विभूतियों द्वारा अनेकप्रकारसे उपासना की जाती है, ऐसी स्थिति है, क्योंकि परोवरीयस्त्व आदिके समान भेद देखने में आता है। इसलिए वीयं संभृति आदि गुणोंका शाण्डिल्यविद्या आदिमें उपसंहार नहीं है | २३ |
ताण्डी और पैङ्गीके रहस्यब्राह्मणमें पुरुषविद्या है, वहाँ पुरुष यज्ञरूपसे कल्पित है, उसकी आयुका तीन प्रकार विभागकर तीन सवन कल्पित किये गये हैं, मोजनकी इच्छा आदि दीक्षा आदि भावसे कल्पित किये गये हैं। आशीर्वाद प्रयोग, मन्त्र प्रयोग आदि अन्य धर्मं वहाँपर समधिगत हैं। तैत्तिरीयक मी ' तस्यैवं विदुषो ० ' ( उस ऐसा जाननेवालेके यज्ञका आत्मा यजमान है और श्रद्धा पत्नी है ) इस अनुवाकसे किसी पुरुषयज्ञ की कल्पना करते हैं।
यहाँ संशय होता है कि क्या जो पुरुषके धर्म अन्योन्य शाखा में उक्त हैं वे तैत्तिरीयकों में उपसंहार नहीं होने चाहिए अथवा क्या उपसंहार होने चाहिए? पुरुष यज्ञत्वके अविशेष होनेसे उपसंहार प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - उपसंहार नहीं होना चाहिए, किससे? उसके रूपका प्रत्यभिज्ञान न होनेसे। उसे आचार्य कहते हैं - ' पुरुष विद्यायामिव ' जैसे एक शाखावालोंकी ताण्डी और पैङ्गियोंकी पुरुषविद्या में श्रुति है, वैसे अन्य तैत्तिरीयकों की श्रुति नहीं है।
उनका यज्ञ संपादन अन्यसे विलक्षण देखने में आता है, क्योंकि उसमें पत्नी, यजमान, वेद, वेदी, बर्हि, यूप, आज्य, पशु, ऋत्विक् आदिका अनुक्रम है।
और जो मी सवन संपादन है वह मी ' यत्प्रातर्मध्यंदिनं सायं च तानि ' ( जो प्रातः, मध्यदिन और सायंकाल हैं वे सवन हैं ) इसप्रकार छान्दोग्यगत सवन संपादनसे विलक्षण ही है, और उन दोनों विद्याओंमें जो कुछ थोड़ा - सा मी मरणावभृथत्व आदि साम्य है, वह भी बहुत अल्प होनेसे अधिक वैलक्षण्यसे अभिभूत हुआ प्रत्यभिज्ञान कराने में असमर्थ है, तैत्तिरीयकगत पुरुषमें यज्ञत्व श्रुति नहीं है।
और ' विदुषो यज्ञस्य ' ये दोनों सामानाधिकरण्य षष्ठी नहीं हैं, विद्वान् ही जो यज्ञ है उसका, इसप्रकार, क्योंकि पुरुष मुख्य यज्ञ नहीं है, किन्तु विद्वान् जो यज्ञ उसका, इस प्रकार ये दोनों षष्ठी व्यधिकरण में हैं। कारण कि पुरुषमें मुख्य यज्ञ सम्बन्ध होता है। व्यवस्था हो सकने पर मुख्य अर्थका ही आश्रयण होना चाहिए गौणका नहीं। ' आत्मा यजमानः ' ( आत्मा यजमान है ) यह भी पुरुषमें यजमानत्व कहता हुआ वैयधिकरण्यरूपसे ही उसमें यज्ञत्व सम्बन्ध दिखलाता है।
और भी ' तस्यैवं विदुषः ' ( उस ऐसा जानेवालेका ) ऐसे सिद्धके समान अनुवादरूप श्रुतिके होनेपर पुरुषमें यज्ञमाव
आदि भावके प्रतिपादनकी इच्छा रखनेवालेके मतमें वाक्यभेद हो और आत्मा आदिमें यजमान जायगा। और संन्यास सहित
आत्मविद्याका पूर्व में उपदेशकर अनन्तर ' तस्यैवं विदुषः ' इत्यादि अनु-
पूर्वशेष ही है स्वतन्त्र नहीं है, ऐसा हम जानते हैं। और ' ब्रह्मणो क्रमणको देखते हुए यह श्रुति महिमानमाप्नोति ' ( ब्रह्मकी
महिमाको प्राप्त होता है ) इसप्रकार दोनों अनुवाकोंका एक ही फल हम उपलब्ध करते हैं। दूसरोंको -
पैङ्गी और ठाण्डियोंको पुरुषविद्या श्रुति तो किसी अन्यका शेष ( अङ्ग ) नहीं है, ' एष ह ० ' ( जो ऐसा
जानता है वह एक सौ सोलह वर्षं जीवित रहता है ) इस प्रकार यह श्रुति
, क्योंकि ऐसा समभिव्याहार - सहोच्चारण है। इससे सिद्ध होता है कि आयुकी अभिवृद्धि फलवाली है अन्य शाखाओंमें अधीत आशीर्वाद, मन्त्र आदि पुरुषविद्याके धर्मोकी तैत्तिरीयकमें प्राप्ति नहीं है | २४ |
आथर्वणकों ( अथर्ववेदियों ) के उपनिषद् के आरम्भ में ' सर्व प्रविध्य ० ' ( हे देव! मेरे शत्रुके सब अङ्गोंको छिन्न भिन्नकर, विशेषतः हृदयको विदीर्णकर शिराओंको तोड़ डाल, मस्तकका सर्व ओरसे नाश कर, इसप्रकार मेरा शत्रु तीन प्रकारसे छिन्न भिन्न हो ) इत्यादि मन्त्र श्रुति है। और ताण्डियोंके उपनिषद्के आरम्भ में ' देवः सवितः ० ' ( हे विश्व प्रकाशक! हे उत्पत्तिका हेतु भूत सूर्यदेव! तुम यज्ञ और यज्ञपतिको उत्पन्न करो ) इत्यादि मन्त्र पाठ है।
शाट्यायनियोंके उपनिषद् के आरम्भमें ' श्वेताश्वो ० ' ( श्वेत अश्ववाले हे इन्द्र! तुम हरितमणिके समान नील हो ) इत्यादि श्रुति है। कठ और तैत्तिरीयोंके उपनिषद् के आरम्भ में ' शं नो ० ' ( मित्र - आदित्य! हमारे लिए सुखकर हो, वरुण हमारे लिए सुखकर हो ) इत्यादि मन्त्र हैं। वाजसनेयी शाखावालोंके उपनिषद्के आरम्भ में ' देवा ह वै ० ' ( पूर्वकालमें इन्द्र आदि देवता सत्र याग करने को बैठे ) इत्यादि प्रवग्यं ब्राह्मण पढा जाता है।
कौषीतकियोंके मी ' ब्रह्म वा ० ' ( अग्निष्टोम ब्रह्म ही है, जिस दिनमें वह किया जाय वह दिन ब्रह्म है, ब्रह्म वह ब्रह्मको प्राप्त होता है, जो उस दिवसमें कर्म करता है वह अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इस नकार अग्निष्टोमब्राह्मण है। क्या ये सब प्रविष्य आदि मन्त्र और प्रवग्यं आदि कर्म विद्याओंमें उपसंहार करने चाहिए अथवा उपसंहार नहीं करने चाहिए? इसप्रकार हम विचार करते हैं, तब हमें क्या प्रतीत होता है? पूर्वपक्षी - इनका विद्याओंमें उपसंहार ही है। किससे?
इससे कि उनका विद्या प्रधान उपनिषद् ग्रन्थोंके समीप पाठ है। परन्तु इनका विद्याके प्रयोजनरूप से विधान हमें उपलब्ध नहीं होता? हाँ, ठीक है। यद्यपि इनका विधान उपलब्ध नहीं होता, तो मी हम संनिधिको सामथ्यसे विधानका अनुमान करेंगे, क्योंकि संनिधिमें प्रयोजनवत्त्व संभव होनेपर विना कारण उसका अवलम्बन न करना युक्त नहीं है।
परन्तु इन मन्त्रोंमें विद्याविषयक कुछ भी सामर्थ्य हम नहीं देखते हैं और प्रवर्ग्य आदि कर्म जो अन्य प्रयोजनके लिए ही प्रयुक्त हैं, वे विद्यारूप प्रयोजन के लिए भी हैं, ऐसा हम कैसे समझें यह दोष नहीं है, उन मन्त्रोंमें विद्याविषयक भी कुछ सामर्थ्य की कल्पना की जा सकती है, क्योंकि हृदय आदिका संकीर्तन है। उपासनाओं में प्रायः हृदय आदिका स्थान आदि मावसे उपदेश दिया गया है, और उसके द्वारा ' हृदयं प्रविध्य ' इसप्रकारके मन्त्रोंको उपासना अङ्गत्व उपपन्न है।
उपासनाओं में भी ' भूः प्रपद्येऽमुना ० ' ( इस पुत्रके साथ मैं भूलोकको प्राप्त होता हूँ ) इत्यादि मन्त्रोंका विनियोग देखा गया है। इसीप्रकार अन्यत्र विनियुक्त होते हुए प्रवग्यं यदि कर्मोंका विद्यामें विनियोग वाजपेयमें बृहस्पतिसव के समान अविरुद्ध है।
सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं— इन मन्त्रों और कर्मोंका विद्याओं में उपसंहार नहीं है, किससे? वेध आदि अर्थका भेद होनेसे। ' हृदयं प्रविध्य ' इसप्रकारके मन्त्रोंके जो मर्थ हैं, वे उपनिषद् में उक्त विद्याओंसे भिन्न सम्बन्ध रहित हैं, इसलिए उन मन्त्रोंमें उन विद्याओंके साथ सम्बन्ध होनेकी सामर्थ्यं नहीं है। परन्तु हृदयका उपासनाओं में उपयोग होनेसे उनके द्वारा उपासनाके साथ सम्बन्ध उपन्यस्त है?
नहीं, ऐसा कहते हैं- हृदय संकीर्तन मात्र के इसप्रकार के उपयोग की मले किसी प्रकार कल्पना की जाय, परन्तु यहाँ केवल हृदय आथवंण मन्त्रका अर्थ नहीं है। ' हृदयं प्रविध्य धमनीः प्रवृज्य ' इसप्रकारका सम्पूर्ण मन्त्रार्थं विद्याओंके साथ अभिसम्बन्धित नहीं होता, क्योंकि यह अभिचार विषयक अर्थ है, इसलिए ' सर्वं प्रविध्य ' ( शत्रुके सब अङ्गोंको विदीरण कर ) इस मन्त्रका आभिचारिक कर्मके साथ सम्बन्ध है।
उसी प्रकार ' देव सवितः प्रसुव यज्ञम् ' इस मन्त्रका यज्ञप्रसव लिङ्गसे यज्ञकर्मके साथ सम्बन्ध है। उसका विशेष सम्बन्ध तो अन्य प्रमाणसे अनुसन्धान करना चाहिए।
इसीप्रकार अन्य कुछ मन्त्रोंका भी लिङ्गसे, कुछका वचनसे, कुछका अन्य प्रमाण ( प्रकरण ) से, ऐसे अन्य अर्थों में विनियोग हुआ है और रहस्य - उपनिषद् में पठित होते हुए भी संनिधिमात्रसे उनका विद्याशेषत्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि ' श्रुतिलिङ्गवाक्य ० ' ( श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्याके समवाय- एक ही विषय में यथासम्भव एकसे अधिकका समावेश प्राप्त होनेपर पूर्व - पूर्व की अपेक्षा पर दुर्बल होता है - बाधित होता है, क्योंकि अर्थ- बङ्गाङ्गिनिर्णयरूप विनियोगको बोधन कराने में व्यवहित होने के कारण विलम्बित हो जाता है ) इससूत्र में श्रुति आदिसे संधि दुर्बल है, ऐसा पूर्वमीमांसा ग्रन्थमें कहा गया है।
इसीप्रकार अन्यत्र विनियुक्त प्रवग्यं आदि मं भी विद्याके शेष नहीं हो सकते, क्योंकि इनकी विद्याके साथ किश्विदपि एकार्थता नहीं है और ' वाजपेयेनेष्ट्वा ० ' ( वाजपेय याग कर बृहस्पति सव नामक याग करे ) इसप्रकार वाजपेय में तो बृहस्पतिसवका अन्य विनियोग स्पष्ट है। और यह एक प्रवग्यं कर्म एक वार उत्पन्न होकर बलवान् प्रमाणसे एकत्र विनियुक्त हो पुन। उसका दुर्बल प्रमाणसे अन्यत्र भी विनियोग हो, यह युक्त नहीं है, क्योंकि दो प्रमाणों में विशेषता गृहीत न होनेपर तो ऐसा होगा।
परन्तु बलवान् और दुर्बल दो प्रमाणोंमें अगृहीत विशेषता नहीं हो सकती, कारणकि बलवत्त्व और दुर्बलवत्व विशेष है, इसलिए इस प्रकारके मन्त्रोंमें अथवा कर्मोंमें संनिधि पाठमात्र से विद्याशेषत्वको आशङ्का नहीं करनी चाहिए। अरण्य में उनका अनुवचन आदि समान धर्म होनेसे केवल संनिधिमें पाठ है, ऐसा सन्तोष करना चाहिए || २५ ||
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' फलवत्संनिधावफलं तदङ्गम् ' ( फलवालेको संनिधिमें फल रहित उसका अङ्ग होता है ) इस न्याय से अन्यत्र विनियुक्त भी ये मन्त्र और विद्याके अङ्ग हो सकते हैं, अतः इनका उपसंहार होता है 1। यद्यपि इनका विद्याके प्रयोजनरूपसे विधान नहीं है, तो भी ' मन्त्रादयः तत्तद्विद्याशेषाः फलवद्विद्यासंनिहितत्वात् तैत्तिरीयकगतपुरुषयज्ञवत् ' ( मन्त्र आदि तत् तत् विद्या के अङ्ग हैं, फलवाली विद्या संनिहित होनेसे, तैत्तिरीय गत पुरुष यज्ञके समान ) इस प्रकार हम उसका अनुमान करेंगे। क्योंकि तत् तत् वाक्यसे अन्यत्र विनियुक्त कर्मोका मी संनिधिसे विद्यामों में विनियोग विरुद्ध नहीं है। जैसे ' ब्रह्मवर्चसकामो बृहस्पतिसवेन यजेत ' ( ब्रह्मतेजकी कामनावाला बृहस्पतिसव नामका यज्ञ करे ) इस वाक्यसे ब्रह्मवचंस फल में विनियुक्त बृहस्पतिसवका ' वाजपेयेनेष्ट्वा बृहस्पतिसवेन यजेत ' ( वाजपेय यज्ञकर बृहस्पतिसव याग करें ) वाजपेय प्रकरण में स्थित इस वाक्यसे वाजपेयके उत्तर अङ्गरूपसे विरोध नहीं है। पूर्वपक्ष में इन मन्त्रों और कर्मोंका उत् तत् संनिहित विद्यामें उपसंहार होता है, सिद्धान्त में उपसंहार नहीं होता।
* पूर्वपक्षीने पहले यह कहा था कि लिङ्गादिसे यद्यपि प्रवर्ग्यादि कर्म अन्यत्र प्रयुक्त होते हैं तो मी संनिधिके बलसे विद्यामें भी इनका विनियोग हो सकता है, क्योंकि विरोध · नहीं है। इसपर सिद्धान्ती ' तथा ' इत्यादिसे आगे कहते हैं-
* उपनिषद् वाक्योंके साथ वेध आदि सब वाक्योंका अरण्य में जाकर आचार्यद्वारा अध्ययन किया जाता है, अत : अरण्यानुवचन ( अरण्य में अध्ययन ) आदि धर्मोकी समानतासे केवल संनिधिमें पाठ है, अन्य कोई प्रयोजन नहीं है। इसलिए वेध आदि मन्त्रों और प्रवग्यं आदि कर्मोंका विद्याओं में उपसंहार नहीं है॥ २५
हान्यधिकरणम्
3.3.26 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २६
हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात् कुशाच्छन्दस्स्तुत्युपगानवत्तदुक्तम् ॥ ३.३.२६ ॥
पदच्छेद — हानौ , तु , उपायनशब्दशेषत्वात् कुशा च्छन्दस्तुत्युपगानंवत् , तत् , उत्तम्
सूत्रार्थ — ( हानी ) जिन श्रुतियोंमें ब्रह्मज्ञानियों के अन्त समय में ( तु ) केवल पापकी हानि सुनी जाती है, वहाँपर पुत्र आदिके द्वारा दाय आदि उपायनका भो उपादान करना चाहिए, ( उपायनशब्दशेषत्वात् ) क्योंकि उपायनशब्द हानशब्द अङ्गरूपसे कहा गया है, ( कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत् ) इसे पूर्वमीमांसा में प्रतिपादित कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानके समान समझना चाहिए, ( तदुक्तम् ) कारण कि ' अपितु वाक्यशेषत्वात् ' इस जैमिनीय सूत्रमें ऐसा ही कहा गया है। अथवा हानिशब्द विधूनन अर्थमें ही समझना चाहिए, क्योंकि उपायनयन्दके समीप पठित विधूननशब्द उपाय शब्दका अङ्ग है इसमें पूर्वके समान कुशा आदि दृष्टान्त दिया गया है।
शाङ्करभाष्य
अस्ति ताण्डिनां श्रुतिः अश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसंभवामि इति तथा आथर्वणिकानाम् तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् इति तथा शाट्यायनिनः पठन्ति तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् इति तथैव कौषीतकिनः तत्सुकृतदुष्कृते विधूनुते तस्य प्रिया ज्ञातयः सुकृतमुपयन्त्यप्रिया दुष्कृतम् इति।
तदिह क्वचित् सुकृतदुष्कृतयोर्हानं श्रूयते क्वचित्तयोरेव विभागेन प्रियैरप्रियैश्चोपायनम् क्वचित्तु उभयमपि हानमुपायनं च तद्यत्रोभयं श्रूयते तत्र तावत् न किंचिद्वक्तव्यमस्ति यत्राप्युपायनमेव श्रूयते न हानम् तत्राप्यर्थादेव हानं संनिपतति अन्यैरात्मीययोः सुकृतदुष्कृतयोरुपेयमानयोः आवश्यकत्वात्तद्धानस्य यत्र तु हानमेव श्रूयते नोपायनम् तत्रोपायनं संनिपतेद्वा न वेति विचिकित्सायाम् अश्रवणादसंनिपातः विद्यान्तरगोचरत्वाच्च शाखान्तरीयस्य श्रवणस्य।
अपि च आत्मकर्तृकं सुकृतदुष्कृतयोर्हानम् परकर्तृकं तु उपायनम् तयोरसत्यावश्यकभावे कथं हानेनोपायनमाक्षिप्येत तस्मादसंनिपातो हानावुपायनस्येति।। अस्यां प्राप्तौ पठति हानाविति। हानौ तु एतस्यां केवलायामपि श्रूयमाणायाम् उपायनं संनिपतितुमर्हति तच्छेषत्वात् हानशब्दशेषो हि उपायनशब्दः समधिगतः कौषीतकिरहस्ये तस्मादन्यत्र केवलहानश्रवणेऽप्युपायनानुवृत्तिः।
यदुक्तम् अश्रवणात् विद्यान्तरगोचरत्वात् अनावश्यकत्वाच्च असंनिपात इति तदुच्यते भवेदेषा व्यवस्थोक्तिः यद्यनुष्ठेयं किंचिदन्यत्र श्रुतम् अन्यत्र निनीष्येत न त्विह हानमुपायनं वा अनुष्ठेयत्वेन संकीर्त्यते विद्यास्तुत्यर्थं तु अनयोः संकीर्तनम् इत्थं महाभागा विद्या यत्सामर्थ्यादस्य विदुषः सुकृतदुष्कृते संसारकारणभूते विधूयेते ते च अस्य सुहृद्दुर्हृत्सु निविशेते इति स्तुत्यर्थे च अस्मिन्संकीर्तने हानानन्तरभावित्वेनोपायनस्य क्वचिच्छ्रुतत्वात् अन्यत्रापि हानश्रुतावुपायनानुवृत्तिं मन्यते स्तुतिप्रकर्षलाभाय प्रसिद्धा च अर्थवादान्तरापेक्षा अर्थवादान्तरप्रवृत्तिः एकविंशो वा इतोऽसावादित्यः इत्येवमादिषु कथं हि इह एकविंशता आदित्यस्याभिधीयेत अनपेक्ष्यमाणेऽर्थवादान्तरे द्वादश मासाः पञ्चर्तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य एकविंशः इत्यस्मिन् तथात्रिष्टुभौ भवतः सेन्द्रियत्वाय इत्येवमादिवादेषुइन्द्रियं वै त्रिष्टुप् इत्येवमाद्यर्थवादान्तरापेक्षा दृश्यते।
विद्यास्तुत्यर्थत्वाच्च अस्योपायनवादस्य कथमन्यदीये सुकृतदुष्कृते अन्यैरुपेयेते इति नातीवाभिनिवेष्टव्यम्। उपायनशब्दशेषत्वादिति च शब्दशब्दं समुच्चारयन् स्तुत्यर्थामेव हानावुपायनानुवृत्तिं सूचयति गुणोपसंहारविवक्षायां हि उपायनार्थस्यैव हानावनुवृत्तिं ब्रूयात्। तस्मात् गुणोपसंहारविचारप्रसङ्गेन स्तुत्युपसंहारप्रदर्शनार्थमिदं सूत्रम्।
कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवदिति उपमोपादानम् तद्यथा भाल्लविनाम्कुशा वानस्पत्याः स्थता मा पात इत्येतस्मिन्निगमे कुशानामविशेषेण वनस्पतियोनित्वश्रवणे शाट्यायनिनाम्औदुम्बराः इति विशेषवचनात् औदुम्बर्यः कुशा आश्रीयन्ते यथा च क्वचित् देवासुरच्छन्दसामविशेषेण पौर्वापर्यप्रसङ्गे देवच्छन्दांसि पूर्वाणीति पैङ्ग्याम्नानात्प्रतीयते यथा च षोडशिस्तोत्रे केषांचित्कालाविशेषप्राप्तौसमयाध्युषिते सूर्ये इत्यार्चश्रुतेः कालविशेषप्रतिपत्तिः यथैव च अविशेषेणोपगानं केचित्समामनन्ति विशेषेण भाल्लविनः यथा एतेषु कुशादिषु श्रुत्यन्तरगतविशेषान्वयः एवं हानावप्युपायनान्वय इत्यर्थः।
श्रुत्यन्तरकृतं हि विशेषं श्रुत्यन्तरेऽनभ्युपगच्छतः सर्वत्रैव विकल्पः स्यात् स च अन्याय्यः सत्यां गतौ तदुक्तं द्वादशलक्षण्याम् अपि तु वाक्यशेषत्वादितरपर्युदासः स्यात्प्रतिषेधे विकल्पः स्यात् इति।। अथवा एतास्वेव विधूननश्रुतिषु एतेन सूत्रेण एतच्चिन्तयितव्यम् किमनेन विधूननवचनेन सुकृतदुष्कृतयोर्हानमभिधीयते किं वा अर्थान्तरमिति।
तत्र च एवं प्रापयितव्यम् न हानं विधूननमभिधीयतेधूञ्कम्पने इति स्मरणात्दोधूयन्ते ध्वजाग्राणि इति च वायुना चाल्यमानेषु ध्वजाग्रेषु प्रयोगदर्शनात् तस्मात् चालनं विधूननमभिधीयते चालनं तु सुकृतदुष्कृतयोः कंचित्कालं फलप्रतिबन्धनात् इत्येवं प्रापय्य प्रतिवक्तव्यम् हानावेव एष विधूननशब्दो वर्तितुमर्हति उपायनशब्दशेषत्वात् न हि परपरिग्रहभूतयोः सुकृतदुष्कृतयोः अप्रहीणयोः परैरुपायनं संभवति यद्यपि इदं परकीययोः सुकृतदुष्कृतयोः परैरुपायनं न आञ्जसं संभाव्यते तथापि तत्संकीर्तनात्तावत् तदानुगुण्येन हानमेव विधूननं नामेति निर्णेतुं शक्यते।
क्वचिदपि च इदं विधूननसंनिधावुपायनं श्रूयमाणं कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत् विधूननश्रुत्या सर्वत्रापेक्ष्यमाणं सार्वत्रिकं निर्णयकारणं संपद्यते। न च चालनं ध्वजाग्रवत् सुकृतदुष्कृतयोर्मुख्यं संभवति अद्रव्यत्वात्। अश्वश्च रोमाणि विधून्वानः त्यजन् रजः सहैव तेन रोमाण्यपि जीर्णानि शातयति अश्व इव रोमाणि विधूय पापम् इति च ब्राह्मणम् अनेकार्थत्वाभ्युपगमाच्च धातूनां न स्मरणविरोधः। तदुक्तमिति व्याख्यातम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' अश्व इव रोमाणि ० ' ( जिस प्रकार अश्व अपने रोएँ झाड़कर रोम कम्पन द्वारा श्रम और धूलि आदि दूर कर निर्मल हो जाता है, वैसे ही हार्द ब्रह्म के ज्ञानसे धर्माधमं रूप पापको झाड़कर धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसंभवामि ' ( छा ० ८ | १३ | १ ) इति। तथाऽऽथर्वणिकातथा राहुके मुख से निकले हुए चन्द्रमाके समान अनर्थके आश्रयभूत इस शरीरको त्यागकर कृतकृत्य हो ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ) ऐसी वाण्डियोंकी श्रुति है।
' तथा विद्वान् ० ' ( उसी प्रकार विद्वान् नामरूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ) ऐसी आथवंणिकोंकी श्रुति है। और ' तस्य पुत्रा दायमुप ० ' ( उसके मृतक विद्वान्के पुत्र - शिष्य धनको प्राप्त करते हैं, सुहृद पुण्य कर्म और शत्रु पाप कर्मको प्राप्त करते हैं ) इसी प्रकार शाट्यायनियोंकी श्रुति है।
और ' तत्सुकृतदुष्कृते ० ' ( शरीर त्यागके समय विद्वान् उस विद्याबलसे सुकृत और दुष्कृतका त्याग करता है, उसके प्रिय बन्धु सुकृतको और द्वेषी दुष्कृतको प्राप्त होते हैं ) ऐसी कौषीतकियोंकी श्रुति है। इन उदाहृत वाक्योंमें कहींपर सुकृत और दुष्कृतके त्यागकी श्रुति है, कहीं पर उन दोनोंके ही विभागसे प्रिय और बप्रिय पुरुषोंसे ग्रहणकी श्रुति है और कहीं पर तो हान और उपायन दोनोंका मी श्रवण है। उसमें जहाँ दोनोंकी श्रुति है वहाँ तो कुछ भी वक्तव्य नहीं है।
परन्तु जहाँ ग्रहणकी ही श्रुति है और त्यागकी नहीं है, वहीं मी असे ही त्याग प्राप्त हो जाता है, • क्योंकि दूसरोंसे अपने सुकृत और दुष्कृतके ग्रहण किये जानेपर तो उसका त्याग आवश्यक है। परन्तु जहाँ केवल त्यागका ही श्रवण है उपायन- ग्रहणका नहीं है, वहाँ ग्रहण प्राप्त होता है कि नहीं? ऐसा सन्देह प्राप्त होनेपर ग्रहणका श्रवण न होनेसे ग्रहण प्राप्त नहीं होता।
अन्य शाखा में ग्रहणका श्रवण अन्य विद्याविषयक है और सुकृत, दुष्कृतका त्याग आत्मकर्तृक है और उपाय परक है, अतः त्याग और ग्रहण दोनोंका आवश्यकभाव न होनेसे किस प्रकार हानसे उपायनका आक्षेप किया जाय, इससे हानमें उपायनकी प्राप्ति नहीं है। सिद्धान्ती — ऐसी शङ्काके प्राप्त होनेपर कहते हैं- ' हानौ स्विति ' इस श्रुतिमें केवल हानके श्रूयमाण होनेपर भी उपायनका संनिपात होना युक्त है, क्योंकि उपायन हानका शेष है, कौषीतकिरहस्य में उपायनशब्द हानशब्दके शेषरूपसे समधिगत है।
इसलिए अन्य शाखामें केवल हानशब्दकी श्रुति होनेपर भी उपायनकी अनुवृत्ति होती है। और जो यह कहा गया है कि श्रुति न होनेसे, विद्यान्तरका विषय होनेसे, अनावश्यक होनेसे उपायनका संनिपात प्राप्त नहीं है।
उसपर कहते हैं- यदि एक स्थानमें श्रुत अनुष्ठेयको अन्य शाखामें ले जानेकी इच्छा हो तो यह उक्त व्यवस्था हो सकती है, परन्तु यहाँ तो हान ( त्याग ) अथवा उपायन ( ग्रहण ) अनुष्ठेयरूपसे नहीं कहा जाता है, किन्तु इन दोनोंका केवल विद्याकी स्तुति के लिए संकीर्तन है - ऐसी महाभागाविद्या है जिसकी सामथ्यसे इस विद्वान्के संसारके कारणभूत सुकृत और दुष्कृत छूट ( निवृत्त ) हो जाते हैं, वे इसके सुहृद और द्वेषीमें प्रवेश करते हैं।
स्तुत्यथंक इस संकीर्तनमें हान के अनन्तर भाविरूपसे उपायनके कहींपर श्रुत होनेसे अन्य शाखामें भी हानके श्रुत होनेपर स्तुतिप्रकर्षं लाभके लिए उपायनकी अनुवृत्ति मानी जाती है, और एक अर्थवादकी अपेक्षासे अन्य अर्थवादी प्रवृत्ति ' एकविंशो ० ' ( इस लोकसे वह आदित्य निश्चय ही इक्कीसवां है ) इत्यादिमें प्रसिद्ध है, क्योंकि ' द्वादशमासाः ० ' ( द्वादश मास, पाँच ऋतु, ये तीन लोक और यह आदित्य इक्कीसवाँ है ) इस अन्य अर्थवादकी अपेक्षा न होनेपर यहां आदित्यको इक्कीसवां किस प्रकार अभिधान किया जाता है।
इस प्रकार ' सेन्द्रियत्व के लिए दो त्रिष्टुम् होते हैं '। इत्यादि वादोंमें भी ' इन्द्रिय ही त्रिष्टुम् है ' इत्यादि अन्य ( स्थानान्तर स्थित ) अर्थवादकी अपेक्षा देखी जाती है। विद्या स्तुत्यर्थंक होनेसे इस उपायनवादमें अन्य कृत सुकृत- दुष्कृत अन्योंसे कैसे प्राप्त किये जाते हैं, इस प्रकार अत्यन्त अभिनिवेश नहीं करना चाहिए | क्योंकि ' उपायनशब्दशेषत्वात् ' ( उपायन शब्द हानका बङ्ग है ) इस सूत्र में
हानमें उपायनकी अनुवृत्ति स्तुति के ' शब्द ' पदका उच्चारण करते हुए सूत्रकार सूचित करते हैं कि
अर्थकी ही हानमें अनुवृत्ति कहते, लिए ही है। यदि गुणोंके उपसंहारकी विवक्षा होती तो उपायन इसलिए गुणोंपसंहार विचारके प्रसंगसे स्तुतिके लिए उपसंहारका
प्रदर्शन करने के लिए यह सूत्र है। ' कुशाछन्दस्तुत्युपगानवत् ' ' कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानके समान इस उपमाका ग्रहण है। जैसे ‘ कुशा वानस्पत्याः ० ' ( हे कुश! तुम वनस्पतिसे उत्पन्न हुए हो, तुम हमारी रक्षा करो ) इस भाल्लवियोंकी श्रुति में कुयोंकी समानरूपसे वनस्पति से उत्पत्तिरूपसे श्रवण होनेपर शाट्यायनियों का ' औदुम्बराः कुशा : ' ( उदम्बरसे उत्पन्न हुए कुशा ) इस प्रकार विशेष वचनके श्रवणसे उदम्बरसे उत्पन्न हुए कुशोंका आश्रवण किया जाता है।
जैसे देवछन्द और असुरछन्दका समानरूपसे पूर्वापर प्रसंग होनेपर ' देवच्छन्दासि पूर्वाणि ' ( देव छन्द पूर्व हैं ) ऐसा पैङ्गियोंकी श्रुतिसे प्रतीत होता है 1। और जैसे षोडशीके स्तोत्रमें कुछको काल विशेष प्राप्त न होनेपर ' समयाध्युषिते सूर्ये ' ( आधे सूर्य अस्त होने के समय षोडशी स्तोत्र करना चाहिए ) ऐसी ऋचाका अध्ययन करनेवालोंकी श्रुति होने से कालविशेष प्रतीत होता है।
और जैसे कोई उपगान अविशेषरूपसे कहते हैं मोर माल्लवी हान में उपायनका अन्वय है, ऐसा अर्थ एक बुतिकृत विशेषका अन्य श्रुतिमें स्वीकार न करने विशेषरूपसे उपगान कहते हैं। जैसे इन कुशा आदिमें अन्य श्रुति स्थित विशेषका अन्वय है, वैसे ही वालेको सर्वत्र ही विकल्प हो जायगा। गति व्यवस्थाके होनेपर वह विकल्प उचित नहीं है।
द्वादशं अध्यायवाले पूर्वमीमांसा ग्रन्थ में ' अपि तु ० ' ( दीक्षितो न ददाति, न जुहोति न पचति - दीक्षितको दान नहीं करना चाहिए, होम नहीं करना चाहिए और पाक नहीं करना चाहिए ) ऐसी श्रुति है। उससे ' अहरहर्दद्यात् ' ( प्रतिदिन दान करना चाहिए ) इसका ' न दीक्षितो ददाति ' इस वाक्यशेषसे इतरदीक्षितसे भिन्नका पर्युदास है, क्योंकि यदि पर्युदास न हो, तो प्रतिषेवमें विकल्प होगा, वह अन्याय है ) ऐसा कहा गया है।
अथवा इन्हीं विधूनन श्रुतियोंके विषय में इस सूत्र से यह विचार करना चाहिए -- क्या इस विधूनन वचन से सुकृत और दुष्कृतके हानका विधान किया जाता है अथवा अन्य अर्थका संशय होने पर ऐसा प्राप्त होना चाहिए कि विधूनन शब्द हानका अभिधान नहीं करता, क्योंकि ' धूञ् कम्पने ' ( धूञ् धातुका अर्थ कम्पन है ) ऐसा पाणिनिकी स्मृति है।
और ' दोधूयन्ते ध्वजाग्राणि ' ( ध्वजाके अग्रभाग वार वार हिलते हैं ) इसप्रकार वायु द्वारा चलायमान जाके अग्रभागों में विधूनन शब्दका प्रयोग देखने में आता है, इससे चालन हो विधूतन अभिहित है। सुकृत और दुष्कृतका चालन तो कुछ समय तक फलके प्रतिबन्धसे अभिहित है। ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त कर निराकरण करना चाहिए। यह विधूनन शब्द हानमें ही वर्तने योग्य है, क्योंकि उपायन शब्दका शेष है,. कारण कि दूसरे से परिगृहीत होनेवाले अत्यक्त सुकृत दुष्कृतका अन्यसे उपायन नहीं हो सकता।
यद्यपि अन्यके सुकृत और दुष्कृतका अन्यसे उपायन मुख्यरूप से सम्भव नहीं होता, तो मी उसके संकीर्तनसे उसके अनुकूल हान ही विधूनन है, ऐसा निर्णय किया जा सकता है। विधूननकी संनिधिमें कहीं पर भी श्रूयमाण उपायन कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानके समान विधूनन श्रुतिसे सर्वत्र अपेक्ष्यमाण होता हुआ सर्वत्र निर्णयका कारण सम्पन्न होता है। और सुकृतदुष्कृतका ध्वजाके अग्रभाग के समान मुख्य चालन नहीं हो सकता, क्योंकि वे अद्रव्य हैं।
रोमोंका विधूनन करनेवाला अश्व रजका त्याग करता हुआ उसके साथ जीणं रोमोंको भी झाड़ता है— इस विषय में ' अश्व इव ० II ' ( जैसे अश्व रोमोंका विधूनन करता है, वैसे विद्वान् पापका विधूनन कर ) ऐसा ब्राह्मण है। धातुओंके अनेक अर्थ स्वीकार करनेसे उक्त स्मृतिके साथ विरोध नहीं है। ' तदुक्तम् ' ( वह कहा गया है ) इसका व्याख्यान हो चुका है॥ २६
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यज्ञकी पुरुषाकार कल्पनाकर उसमें ' सेन्द्रियत्वके लिए
दो त्रिष्टुम् होते हैं ' ऐसा सामवेद ब्राह्मणमें कहा गया है। यद्यपि ' त्रिष्टुम् ' छन्दोमात्र है इन्द्रिय नहीं,
तो भी अन्यप्रकरणस्थ ' इन्द्रियं बै त्रिष्टुभ् ' इस यजुर्वेदवाक्यके सम्बन्धसे उसमें इन्द्रियत्वकी कल्पना
की जाती है, त्रिष्टुभ् छन्दमें इन्द्रि - यत्वकी कल्पना इसलिए की गई है कि त्रिष्टुम् छन्दमें एकादश अक्षर हैं और इन्द्रियाँ भी एकादश हैं। अन्य शाखागत उपायन दूसरी शाखा में भी स्तुति प्रकर्षके लिए गृहीत है। यदि यहाँ उपायनकी विवक्षा होती है तो सूत्रकार ' उपायनशेषत्वात् ' इस प्रकार उसका उपसंहार करते न कि ' उपायनशब्दशेषत्वात् ' इस प्रकार उपायनशब्दका। अतः विद्यास्तुतिको सूचित करनेके लिए उपाय शब्दका उपसंहार कहा। यहाँ गुणोंके उपसंहारके विचार प्रसंगसे स्तुतिमें दूसरी स्तुतिके उपसंहारको भी दिखलाया गया है। एक शाखा में स्थिति विशेष अन्य शाखामें भी ग्राह्य है।
* उद्गाताओंके स्तोत्र गणनाके लिए दारुमय शिलाकाको कुशा कहा जाता है। छन्दोंमें— ' नवाक्षराणि छन्दांसि आसुराणि अन्यानि देवानि ' ( नौ अक्षरवाले छन्द असुर छन्द हैं और अन्य देव छन्द हैं ) कहीं पर ‘ छन्दोभिः स्तुवते ' ( छन्दोंसे स्तवन करते हैं ) इन मन्त्रोंमें विशेष न होनेसे सब छन्दोंकी प्राप्ति होनेपर ' देवच्छन्दासि पूर्वाणि ' ऐसा पैङ्गियोंकी श्रुतिसे विशेष प्रतीत होता है। स्तुतिमें - अतिरात्र यागमें षोडशी पात्रका ग्रहण होनेपर उसके ग्रहणके अङ्गभूत स्तोत्र कब होते हैं?
इसप्रकार छन्दोगों द्वारा पूछे जानेपर ' समयाध्युषिते सूर्ये ' इस श्रुतिसे कालविशेष प्रतीत होता है। उपगान —— ऋत्विज उपगायन्ति ' ( ऋत्विज उपगान करें ) यह सामान्य श्रुति है। इससे ' नाध्वर्युरूपगायति ' ( अध्वर्यु उपगान न करे ) इस दूसरी श्रुति से अध्वर्युंसे भिन्न ऋत्विज उपगान करें। इस प्रकार विशेषका ग्रहण है।
कुशा आदि वाक्योंकी दूसरी विशेष श्रुतियोंके साथ एकवाक्यता इसलिए की गई है कि विकल्प प्राप्त न हो, सामान्य और विशेष इन दोनों श्रुति वाक्योंकी एक वाक्यतारूप गतिके होनेपर वाक्य भेदकर ' अध्वर्यु उपगान न करे ' ऐसा विषेध होने से और ' ऋत्विज उपगान करें ' ऐसी सामान्य श्रुतिके होनेसे ' अध्वर्युं उपगान करें ' ' अध्वर्युं उपगान न करे ' इसप्रकार सर्वत्र विकल्प करना युक्त नहीं है।
' ब्रीहिमियजेत यवैर्वा यजेत ' ( धान अथवा यवोंसे याग करे ) यहाँ तो अगल्या विकल्पका आलम्बन युक्त है, क्योंकि विकल्प न्याय संगत नहीं है। ज्योतिष्टोम प्रकरण में ' दीक्षितो न जुहोति ' यह श्रुति है बौर ' यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात् ' यह अन्यत्र श्रुति है। यदि यहाँ ' न दीक्षित ' वाक्य होमका प्रतिषेधक हो, तो यज्ञार्थक होनेसे निषेध अनुष्ठेय है अथवा ' यावज्जीवम् ' इस विधि से होम अनुष्ठेय है? ऐसा विकल्प होगा। परन्तु वह न्याय संगत नहीं है।
यहाँ ' यावज्जीव ' वाक्यके प्रति ' न दीक्षित ' वाक्यके शेष होनेसे ' न ' इतर पर्युदासार्थंक है, अतः नकार दीक्षितसे भिन्न लोगोंका लक्षक है होमका प्रतिषेधक नहीं है। परन्तु मीमांसा शास्त्र में ' नन् ' के दो अर्थ माने गये हैं - एक निषेध और दूसरा पर्युदास।
' प्रतिषेधः स विज्ञेयः क्रियया सह यत्र नज् ' ( जहाँपर क्रिया - विधि प्रत्ययके साथ ' नव् ' का सम्बन्ध हो वहाँ प्रतिषेव होता है ) जैसे ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' | ' पर्युदासः स विज्ञयो यत्रोत्तरपदेन नज् ' ( जहाँ ' नन् ' विधि प्रत्यय में भिन्न धात्वर्थंके साथ अथवा कर्ता आदिके साथ सम्बन्धित हो वह पर्युदास है ) जैसे ' दीक्षितो न जुहोति ' इसका विशेष विस्तार मीमांसा शास्त्रमें देखना चाहिए।
इसलिए ' अदीक्षित जीवन पर्यन्त होम करे ' इसप्रकार एक वाक्यता है, ऐसा ' न दीक्षिताधिकरण ' के सिद्धान्तसूत्रका अर्थ है।
* इसप्रकार विधूननका हानि अर्थसिद्ध होनेपर जहाँ केवल हानका श्रवण हो वहाँपर मी उपायनका उपसंहार है। यहाँ पूर्वपक्ष में स्तुति प्रकर्षकी असिद्धि है, सिद्धान्त में उसकी सिद्धि है॥ २६
सांपरायाधिकरणम्
3.3.27 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २७
सांपराये तर्तव्याभावात् तथा ह्य् अन्ये ॥ ३.३.२७ ॥
पदच्छेद — सांप ये , तर्तव्याभावात् , तथा , हि , अन्ये
सूत्रार्थ — ( सांपराये ) देह त्यागके समय विद्याकी सामर्थ्य से सुकृत, दुष्कृतकी हानि होती है, ( वर्तव्याभावात् ) क्योंकि विद्वान्को कुछ मध्यमें प्राप्तव्य नहीं है, ( हि ) क्योंकि ( अन्ये ) अन्य शाखावाले ' अश्व इव रोमाणि विधूय पापम् ' ( तथा ) ऐसा ही कहते हैं।
शाङ्करभाष्य
देवयानेन पथा पर्यङ्कस्थं ब्रह्म अभिप्रस्थितस्य व्यध्वनि सुकृतदुष्कृतयोर्वियोगं कौषीतकिनः पर्यङ्कविद्यायामामनन्ति स एतं देवयानं पन्थानमासाद्याग्निलोकमागच्छति इत्युपक्रम्यस आगच्छति विरजां नदीं तां मनसैवात्येति तत्सुकृतदुष्कृते विधूनुते इति। तत् किं यथाश्रुतं व्यध्वन्येव वियोगवचनं प्रतिपत्तव्यम् आहोस्वित् आदावेव देहादपसर्पणे इति विचारणायाम् श्रुतिप्रामाण्यात् यथाश्रुति प्रतिपत्तिप्रसक्तौ पठति सांपराय इति। सांपराये गमन एव देहादपसर्पणे इदं विद्यासामर्थ्यात्सुकृतदुष्कृतहानं भवति इति प्रतिजानीते हेतुं च आचष्टे तर्तव्याभावादिति न हि विदुषः संपरेतस्य विद्यया ब्रह्म संप्रेप्सतः अन्तराले सुकृतदुष्कृताभ्यां किंचित्प्राप्तव्यमस्ति यदर्थं कतिचित्क्षणानक्षीणे ते कल्पेयाताम्। विद्याविरुद्धफलत्वाच्च विद्यासामर्थ्येन तयोः क्षयः स च यदैव विद्या फलाभिमुखी तदैव भवितुमर्हति। तस्मात् प्रागेव सन् अयं सुकृतदुष्कृतक्षयः पश्चात्पठ्यते। तथा हि अन्येऽपि शाखिनः ताण्डिनः शाट्यायनिनश्च प्रागवस्थायामेव सुकृतदुष्कृतहानमामनन्ति अश्व इव रोमाणि विधूय पापम् इतितस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् इति च।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — देवयान मार्गसे पर्यंङ्कस्थ ब्रह्मको ओर प्रस्थान करनेवाले पुरुषके सुकृत- दुष्कृतका अर्धमागं में वियोग कौषीतकी शाखावाले पर्यङ्कविद्यामें कहते हैं - ' स एतं देवयानं ० ' ( वह इस देवयान मार्गको प्राप्तकर अग्निलोकको प्राप्त होता है ) ऐसा आरम्भकर ' स आगच्छति ० ' ( वह विरजा नदीको प्राप्त होता है, उसे मनसे ही लांघ जाता है, उससे सुकृत, दुष्कृतका त्याग करता है ) यहाँ श्रुतिके अनुसार उस ( सुकृतदुष्कृत ) का अर्धमार्ग में ही वियोगवचन समझना चाहिए अथवा आरम्भमें ही देह से प्रयाण करनेपर ऐसा विचार प्राप्त होनेपर श्रुतिप्रामाण्यसे श्रुति के अनुसार प्राप्ति प्रसक्त होनेपर [ सूत्रकार ] कहते हैं - ' सांपराये '।
सांपरायसमय में - गमनकालमें देहसे निकलनेपर विद्याकी सामर्थ्य से यह सुकृत, दुष्कृत हान होता है, ऐसी प्रतिज्ञा करते हैं। उसका हेतु कहते हैं - ' तर्तव्याभावात् '। विद्यासे ब्रह्म सम्प्राप्तकी इच्छावाले मृत विद्वान्को मध्यमें सुकृत और दुष्कृतद्वारा कुछ मी प्राप्तव्य नहीं है, जिसके लिए कुछ एक क्षणोंके लिए सुकृत और दुष्कृतके क्षीण न होने की कल्पना की जाय।
परन्तु उनका विद्यासे विरुद्ध फल है, अतः विद्याकी सामथ्यसे उन दोनोंका क्षय होता है और वह विद्या जब फलाभिमुख होती है तब उनका क्षय होना युक्त है। इसलिए देहपातसे पहले ही वर्तमान यह सुकृत दुष्कृत क्षय पश्चात् पढा जाता है।
इसलिए अन्य ताण्डी और शाट्यायनी शाखावाले भी ‘ अश्व इव ० ' ( जैसे अश्व रोम झाड़ देता है वैसे विद्वान् पाप मुक्त होकर ) और ' तस्य दायमु ० ' ( उस मृत विद्वानके पुत्र- शिष्य धन ग्रहण करते हैं, सुहृद पुण्यकर्म और द्वेषी पापकर्म ग्रहण करते हैं ) इसप्रकार पूर्वावस्थामें ही सुकृत- दुष्कृतकी हानि कहते हैं॥। २७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इसमें विद्या सुकृत- दुष्कृतक्षयका हेतु है, इसकी असिद्धि पूर्वपक्षका फल है, सिद्धान्त में उसकी सिद्धि फल है। सिद्धान्ती - देहपातसे पूर्व ही विद्याकी सामथ्यंसे कर्मोंके क्षय होनेपर विद्वान् उत्तर मार्गसे ब्रह्मको प्राप्त होता है, विना कर्मनाश हुए उत्तर मागंसे गमन संभव नहीं है, अतः पाठक्रमसे अर्थक्कम बलवान् है || २७
3.3.28 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २८
छन्दत उभयाविरोधात् ॥ ३.३.२८ ॥
पदच्छेद — छन्दतः , उमयाविरोधात्
सूत्रार्थ — ( छन्दतः ) जीवित पुरुष अपनी इच्छासे विद्याका अनुष्ठान कर सकता है, इससे उसका कर्मक्षय भी जीवनकालमें होगा, ( उमयाविरोधात् ) इसप्रकार उपपत्ति और ताण्डी आदि श्रुति दोनोंके साथ विरोध नहीं होगा।
शाङ्करभाष्य
यदि च देहादपसृप्तस्य देवयानेन पथा प्रस्थितस्य अर्धपथे सुकृतदुष्कृतक्षयोऽभ्युपगम्येत ततः पतिते देहे यमनियमविद्याभ्यासात्मकस्य सुकृतदुष्कृतक्षयहेतोः पुरुषयत्नस्य इच्छातोऽनुष्ठानानुपपत्तेः अनुपपत्तिरेव तद्धेतुकस्य सुकृतदुष्कृतक्षयस्य स्यात् तस्मात् पूर्वमेव साधकावस्थायां छन्दतोऽनुष्ठानं तस्य स्यात् तत्पूर्वकं च सुकृतदुष्कृतहानम् इति द्रष्टव्यम् एवं निमित्तनैमित्तिकयोरुपपत्तिः ताण्डिशाट्यायनिश्रुत्योश्च संगतिरिति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — देहसे निष्क्रमित देवयान मार्गसे प्रस्थान करनेवाले पुरुषके सुकृत, दुष्कृतका क्षय यदि अर्धमागंमें स्वीकार किया जाय, तो देहपात होनेपर सुकृत- दुष्कृत क्षयके हेतुभूत यम - नियम सहित विद्याके अभ्यासरूप पुरुषप्रयत्न में अपनी इच्छासे अनुष्ठानकी उपपत्ति न होनेके कारण उससे होनेवालो सुकृत, दुष्कृत क्षयको अनुपपत्ति ही होगी। इससे पूर्व में साधकावस्था में अपनी इच्छासे उसका अनुष्ठान होना चाहिए और अनुष्ठान पूर्वक सुकृत, दुष्कृतका हान है, ऐसा समझना चाहिए। इसप्रकार निमित्त, नैमित्तिककी उपपत्ति ताण्डी और शाट्यायनी इन दोनों श्रुतियोंकी संगति होगो॥ २८
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.२९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
गतेरर्थवत्त्वाधिकरणम्
3.3.29 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र २९
गतेर् अर्थवत्त्वम् उभयथान्यथा हि विरोधः ॥ ३.३.२९ ॥
पदच्छेद — गतेः , अर्थतत्त्वम् , उमयथा , अन्यथा , हि , विरोधः
सूत्रार्थ — ( गतेः ) देवयान मार्गकी ( अर्थवत्त्वम् ) अर्थवत्ता ( उभयथा ) विभागसे हो सकती है | सगुणविद्या में देवयानमार्ग है निर्गुणविद्या में नहीं है, ( अन्यथा ) यदि देवयानमार्गका
शाङ्करभाष्य
क्वचित् पुण्यपापाहानसंनिधौ देवयानः पन्थाः श्रूयते क्वचिन्न तत्र संशयः किं हानावविशेषेणैव देवयानः पन्थाः संनिपतेत् उत विभागेन क्वचित्संनिपतेत् क्वचिन्नेति। यथा तावत् हानावविशेषेणैव उपायनानुवृत्तिरुक्ता एवं देवयानानुवृत्तिरपि भवितुमर्हतीत्यस्यां प्राप्तौ आचक्ष्महे गतेः देवयानस्य पथः अर्थवत्त्वम् उभयथा विभागेन भवितुमर्हति क्वचिदर्थवती गतिः क्वचिन्नेति न अविशेषेण। अन्यथा हि अविशेषेणैव एतस्यां गतावङ्गीक्रियमाणायां विरोधः स्यात् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति इत्यस्यां श्रुतौ देशान्तरप्रापणी गतिर्विरुध्येत कथं हि निरञ्जनोऽगन्ता देशान्तरं गच्छेत् गन्तव्यं च परमं साम्यं न देशान्तरप्राप्त्यायत्तम् इत्यानर्थक्यमेवात्र गतेर्मन्यामहे।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कहीं पर पुण्य - पाप हाकी संनिधिमें देवयानमार्ग की श्रुति है और कहींपर नहीं है, यहाँ संशय होता है कि क्या हानमें समानरूपसे हीं देवयानमार्गका संनिपात है अथवा विभागसे कहींपर संनिपात होता है और कहीं पर नहीं होता? जैसे हानमें समानरूरसे उपायनकी अनुवृत्ति कही गई है, वैसे देवयानकी अनुवृत्ति भी होनी चाहिए। सिद्धान्ती - इसके प्राप्त होनेपर हम कहते हैं— गतिकादेवयानमार्गका अर्थवत्त्व उभयथा - विभागसे होना चाहिए, कहींपर अर्थवती गति है और कहीं पर नहीं। अविशेषसे सर्वत्र गति नहीं है, अन्यथा - अविशेषसे ही इस गतिके अङ्गीकार करनेपर तो विरोध होगा। ' पुण्यपापे ० ' ( विद्वान् पुण्य - पाप दोनोंको त्यागकर निर्मल हो परम साम्य ( ब्रह्म ) को प्राप्त होता है ) इस श्रुतिमें अन्य देश प्रापक गति विरुद्ध है, क्योंकि गति आदि रहित ब्रह्मस्वरूप देशान्तर में कैसे जायगा और प्रापणीय परम साम्य देशांन्तर प्राप्तिके अधीन नहीं है। इसलिए हम यहाँ निर्गुणविद्यामें गतिको निष्प्रयोजन मानते हैं॥ २ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — सगुणविद्या में देवयान गति प्रयोजनवाली है और निर्गुणविद्यामें नहीं, अतः समानरूपसे सर्वत्र गमन इष्ट नहीं है | देशसे व्यवहित वस्तुकी प्राप्तिमें तो मार्ग अपेक्षणीय है, किन्तु ब्रह्मविद्या में मागंकी अपेक्षा नहीं है॥ २ ९
3.3.30 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३०
उपपन्नस् तल्लक्षणार्थोपलब्धेर् लोकवत् ॥ ३.३.३० ॥
पदच्छेद — उपपन्नः , तल्लक्षणार्थोपलब्धेः , लोकवत्
सूत्रार्थ — ( उपपन्नः ) गतिकी विभागसे व्यवस्था युक्त ही है, ( तल्लक्षणार्थोपलब्धे 1 ) क्योंकि गतिकारणभूत अर्थ सगुण उपासनाओंमें उपलब्ध होता है, ( लोकवत् ) जैसे लोकमें सेतु वासियोंको ग्रामकी प्राप्ति के लिए मार्गकी अपेक्षा होती है, किन्तु आरोग्य प्राप्ति में उसकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे यहाँ भी है।
शाङ्करभाष्य
उपपन्नश्चायम् उभयथाभावः क्वचिदर्थवती गतिः क्वचिन्नेति तल्लक्षणार्थोपलब्धेः गतिकारणभूतोऽर्थः पर्यङ्कविद्यादिषु सगुणेषु उपासनेषु उपलभ्यते तत्र हि पर्यङ्कारोहणम् पर्यङ्कस्थेन ब्रह्मणा सह संवदनम् विशिष्टगन्धादिप्राप्तिश्च इत्येवमादि बहुदेशान्तरप्राप्त्यायत्तं फलं श्रूयते तत्र अर्थवती गतिः न तु सम्यग्दर्शने तल्लक्षणार्थोपलब्धिरस्ति न हि आत्मैकत्वदर्शिनामाप्तकामानाम् इहैव दग्धाशेषक्लेशबीजानाम् आरब्धभोगकर्माशयक्षपणव्यतिरेकेण अपेक्षितव्यं किंचिदस्ति तत्र अनर्थिका गतिः। लोकवच्च एष विभागो द्रष्टव्यः यथा लोके ग्रामप्राप्तौ देशान्तरप्रापणः पन्था अपेक्ष्यते न आरोग्यप्राप्तौ एवमिहापीति। भूयश्च एनं विभागं चतुर्थाध्याये निपुणतरमुपपादयिष्यामः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कहीं पर गति प्रयोजनवाली है और कहींपर नहीं, ऐसा दोनों प्रकारका विभाग युक्ति युक्त है, क्योंकि गति कारणक प्रयोजन उपलब्ध होता है। गति कारणभूत प्रयोजन पर्यङ्कविद्या आदि सगुण उपासनाओं में उपलब्ध होता है। उनमें पर्यङ्कारोहण, पर्यङ्कस्थ ब्रह्माके साथ संवाद और विशिष्ट गन्ध आदिकी प्राप्ति, इत्यादि अनेक भिन्न - भिन्न देशोंकी प्राप्तिके अधीन फलकी श्रुति है, वहाँ गति प्रयोजन वाली है, किन्तु तत्त्वज्ञानमें गति कारणभूत अर्थकी उपलब्धि नहीं है, कारण कि आत्मैकत्वदर्शी, आप्तकाम यहाँ दग्ध हो गये हैं सम्पूर्ण क्लेश और उनके कारणीभूत बीज- अविद्या जिनके, उनको एताहरा महानुभावों को प्रारब्धभोग कर्म और आशय क्षयके अतिरिक्त कुछ मी फल अपेक्षणीय नहीं है। यहाँ गति प्रयोजन रहित है। और यह विभाग लोक व्यवहार के समान समझना चाहिए, जैसे लोकमें ग्राम प्राप्ति के लिए देशान्तर प्रापक मार्गकी अपेक्षा होती है, किन्तु आरोग्य प्राप्तिमें नहीं होती, वैसे यहाँ प्रकृतमें भी समझना चाहिए। पुनः इस विभागको चतुर्थ अध्यायमें अधिक निपुणता से उपपादन करेंगे || ३०
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.३१ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
अनियमाधिकरणम्
3.3.31 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३१
अनियमस्सर्वेषामविरोधश्शब्दानुमानाभ्याम् ॥ ३.३.३१ ॥
पदच्छेद — अनियमः , सर्वासाम् , अविरोधः , शब्दानुमानाभ्याम्
सूत्रार्थ — ( सर्वासाम् ) सभी सगुण उपासनाओं में ( अनियम : ) अविशेषरूपसे देवयान मार्ग होना चाहिए, ( अविरोध : ) इससे - प्रकरण से विरोध नहीं है, ( शब्दानुमानाभ्याम् ) क्योंकि ' तद्य इत्थं विदु : ' इत्यादि श्रुति और ' शुक्लकृष्णे गती ह्येते ' इत्यादि स्मृति है।
शाङ्करभाष्य
सगुणासु विद्यासु गतिरर्थवती न निर्गुणायां परमात्मविद्यायाम् इत्युक्तम् सगुणास्वपि विद्यासु कासुचिद्गतिः श्रूयते यथा पर्यङ्कविद्यायाम् उपकोसलविद्यायां पञ्चाग्निविद्यायां दहरविद्यायामिति न अन्यासु यथा मधुविद्यायां शाण्डिल्यविद्यायां षोडशकलविद्यायां वैश्वानरविद्यायामिति। तत्र संशयः किं यास्वेषा गतिः श्रूयते तास्वेव नियम्येत उत अनियमेन सर्वाभिरेव एवंजातीयकाभिर्विद्याभिरभिसंबध्येतेति।
किं तावत्प्राप्तम् नियम इति यत्रैव श्रूयते तत्रैव भवितुमर्हति प्रकरणस्य नियामकत्वात् यद्यन्यत्र अश्रूयमाणापि गतिः विद्यान्तरं गच्छेत् श्रुत्यादीनां प्रामाण्यं हीयेत सर्वस्य सर्वार्थत्वप्रसङ्गात्। अपि च अर्चिरादिका एकैव गतिः उपकोसलविद्यायां पञ्चाग्निविद्यायां च तुल्यवत्पठ्यते तत् सर्वार्थत्वेऽनर्थकं पुनर्वचनं स्यात्। तस्मान्नियम इत्येवं प्राप्ते पठति अनियम इति। सर्वासामेव अभ्युदयप्राप्तिफलानां सगुणानां विद्यानाम् अविशेषेण एषा देवयानाख्या गतिर्भवितुमर्हति।
ननु अनियमाभ्युपगमे प्रकरणविरोध उक्तः नैषोऽस्ति विरोधः शब्दानुमानाभ्यां श्रुतिस्मृतिभ्यामित्यर्थः तथा हि श्रुतिः तद्य इत्थं विदुः इति पञ्चाग्निविद्यावतां देवयानं पन्थानमवतारयन्तीये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते इति विद्यान्तरशीलिनामपि पञ्चाग्निविद्याविद्भिः समानमार्गतां गमयति।
कथं पुनरवगम्यते विद्यान्तरशीलिनामियं गतिरिति ननु श्रद्धातपःपरायणानामेव स्यात् तन्मात्रश्रवणात् नैष दोषः न हि केवलाभ्यां श्रद्धातपोभ्याम् अन्तरेण विद्याबलम् एषा गतिर्लभ्यते विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः परागताः। न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः इति श्रुत्यन्तरात् तस्मात् इह श्रद्धातपोभ्यां विद्यान्तरोपलक्षणम्।
वाजसनेयिनस्तु पञ्चाग्निविद्याधिकारेऽधीयते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते इति तत्र श्रद्धालवो ये सत्यं ब्रह्मोपासते इति व्याख्येयम् सत्यशब्दस्य ब्रह्मणि असकृत्प्रयुक्तत्वात्। पञ्चाग्निविद्याविदां च इत्थंवित्तयैव उपात्तत्वात् विद्यान्तरपरायणानामेव एतदुपादानं न्याय्यम्।अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् इति च मार्गद्वयभ्रष्टानां कष्टामधोगतिं गमयन्ती श्रुतिः देवयानपितृयाणयोरेव एनान् अन्तर्भावयति।
तत्रापि विद्याविशेषादेषां देवयानप्रतिपत्तिः। स्मृतिरपि शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः इति। यत्पुनः देवयानस्य पथो द्विराम्नानम् उपकोसलविद्यायां पञ्चाग्निविद्यायां च तत् उभयत्रापि अनुचिन्तनार्थम्। तस्मादनियमः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सगुण विद्याओं में गति प्रयोजनवाली है, किन्तु निर्गुण परमात्मविद्यामें नहीं, ऐसा पूर्व अधिकरणमें कहा गया है। सगुण विद्याओंमें भी कुछ विद्याओं की गति श्रुति है -- जैसे ' पर्यङ्कविद्या, उपकोसलविद्या, पञ्चाग्निविद्या और दहरविद्यामें। ' अन्य विद्याओंमें गति श्रुति नहीं है - जैसे ' मधुविद्या, शाण्डिल्यविद्या, षोडशकलविद्या और वैश्वानरविद्यामें। यहाँ संशय होता है- क्या जिनमें यह गतिश्रुति है उनमें ही नियमित है अथवा अनियमसे इस प्रकारकी सभी विद्याओं के साथ सम्बन्धित है, तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - नियम प्राप्त होता है। जिन विद्याओं में गति सुनी जाती है उनमें ही होनी चाहिए, क्योंकि प्रकरण नियामक है। अन्य विद्यामें न सुनी हुई गति भी यदि अन्य विद्या में प्राप्त हो तो श्रुति आदिमें प्रामाण्यकी हानि होगी, कारण कि सबमें सर्वार्थवत्त्व प्रसङ्गहोगा। और अचिरादि एक ही गति उपकोसलविद्या और पञ्चाग्निविद्या में समानरूपसे जैसे पढी जाती है, वह यदि सब विद्याओंके लिए हो तो पुनर्वचन अनर्थक हो जायगा, इसलिए गतिका नियम है I
। सि ० - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं— अनियम है। यह देवयान नामक गति अभ्युदय प्राप्ति फलवाली समस्त सगुण विद्याओं में समानरूपसे होनी चाहिए। परन्तु अनियमको स्वीकार करनेपर प्रकरणका विरोध कहा गया है? यह विरोध नहीं है, क्योंकि इसमें शब्द और अनुमान - श्रुति और स्मृति हैं, ऐसा अर्थ है।
जैसे कि चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते ' ( का ० ५।१०।१ ) इति विद्यान्तरशीलिनामपि पञ्चाग्निविद्या' तद्य इत्थं विदुः ० ' ( वहाँ इस लोकके प्रति उत्थित हुए अधिकारी गृहस्थोंमें जो इस प्रकार पञ्चाग्निको जानते हैं ) यह श्रुति पञ्चाग्नि विद्याके उपासकों के लिए देवयान पथका अवतरण करती हुई ' ये चेमे ० ' ( और जो अरण्यसे उपलक्षित वैखानस और परिव्राजक श्रद्धा और तपसे उपलक्षित ब्रह्मका ध्यान करते हैं ) अन्य विद्या अनुशीलन करनेवालोंका मी पञ्चाग्निविद्या जाननेवालोंके समान मार्ग ज्ञान कराती है।
परन्तु यह कैसे अवगत हो कि अन्य विद्याका अनुशीलन करनेवालोंकी यह गति है? परन्तु श्रद्धा और तपमें संलग्न अरण्यवासियों को ही यह गति प्राप्त होनी चाहिए, क्योंकि केवल उनका श्रवण है।
यह दोष नहीं है, कारण कि विद्याबलके विना केवल श्रद्धा और तपसे यह गति प्राप्त नहीं होती, क्योंकि ' विद्यया तदारोहन्ति ० ' ( विद्यासे - उपासनासे उस ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं, जहाँ जानेवालेकी कामनाएँ निवृत्त यान्त हो जाती हैं, वहाँ दक्षिण मार्ग उपलक्षित केवल कर्मी नहीं जाते और अविद्वान् उपासना रहित तपस्वी भी नहीं जाते ) यह अन्य श्रुति है। इससे ज्ञात होता है कि यहाँ श्रद्धा और तपसे अन्य विद्याओंका उपलक्षण है।
वाजसनेयी तो पञ्चाग्निविद्या के प्रकरण में ' य एवमेतद्विदुः ० ' ( वे जो गृहस्थ इस प्रकार इस पञ्चाग्निविद्याको जानते हैं तथा जो संन्यासी अथवा वानप्रस्थ श्रद्धा युक्त होकर सत्यकी उपासना करते हैं ) ऐसा कहते हैं। वहाँ जो श्रद्धालु सत्य ब्रह्मकी उपासना करते हैं, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए, क्योंकि सत्य शब्द ब्रह्ममें अनेकवार प्रयुक्त हुआ है।
पश्चाग्निविद्याविदोंका ' य इत्थं विदु : ' इस वाक्य से ' इत्थंवित्त्व ' ( इस प्रकार जाननेवाला ) रूपसे ग्रहण होनेके कारण अन्य विद्या में संलग्न उपासकोंका यह ग्रहण युक्त है।
और ' अथ य एतौ ० ' ( और जो उत्तर और दक्षिण दोनों मार्गों को नहीं जानते अर्थात् देवयान एवं दक्षिण मार्गके साधन भूत ब्रह्मोपासना अथवा कर्मका अनुष्ठान नहीं करते वे कीट, पतङ्ग और सर्प आदि होते हैं ) यह श्रुति दोनों मार्गोंसे भ्रष्ट हुए लोगोंको दुःखदायक अधोगतिका बोध कराती हुई देवयान और पितृयानमें ही इन उपासकोंका अन्तर्भाव करती है। उनमें भी उपासना विशेषसे इन उपासकोंको देवयानकी प्राप्ति होती है।
और ' शुक्लकृष्णे ० ' ( उपासना और कर्मके अधिकारी जनोंके लिए देवयान और पितृयान मागं सनातन माने गये हैं। इनमें एकके द्वारा गया हुआ परम गतिको प्राप्त होता है और दूसरे द्वारा गया हुआ जन्म मृत्युको प्राप्त होता है ) ऐसी स्मृति भी है। देवयान मार्गका उपकोसलविद्या और पञ्चाग्निविद्यामें जो दो वार कथन है वह दोनों विद्याओंमें ध्यानके लिए है, अतः गतिका अनियम है॥ ३१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जो प्रकरणके बलसे गतिका नियम कहा गया है, वह श्रुति और स्मृतिसे बाधित है, क्योंकि श्रुति प्रकरण से बलवती है। इसलिए समस्त सगुण उपासनाओंमें समानरूपसे गति होनी चाहिए। ' ये चेमे sरण्ये . ० ' ' इस श्रुति वाक्य में लक्षणाकी गई है, इससे श्रद्धा और तप अन्य सगुण उपासनाके उपलक्षक हैं।
* तत् तत् स्थलमें मार्ग श्रुति प्रतिदिन मार्ग ध्यानके लिए है, क्योंकि प्रकरणसे मागं ध्यान उपासनाका अङ्ग कहा गया है। जिनमें मागं श्रुति नहीं है वे मार्ग ध्यानके विना भी विद्याकी सामथ्यंसे अचिरादि मार्ग प्राप्त करते हैं। यह सूचित करनेके लिए ' पुनः ' कथन है। इसलिए देवयान मार्गकी प्रतीकसे भिन्न सम्पूर्ण उपासनाओं में समानरूपसे प्राप्ति होती है। पूर्वपक्ष में पूर्वके समान गतिका नियम है, सिद्धान्त में गतिका अनिमम है॥ ३१
यावदधिकाराधिकरणम्
3.3.32 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३२
यावदधिकारम् अवस्थितिर् आधिकारिकाणाम् ॥ ३.३.३२ ॥
पदच्छेद — यावदधिकारम् , अवस्थितिः , आधिकारिकाणाम्
सूत्रार्थ — ( अधिकारकाणाम् ) लोक व्यवस्थाके हेतुभूत अधिकारोंमें विनियुक्त, यथार्थ - ज्ञानसे क्षीण कर्मवाले अपान्तरतमा आदि तत्त्वज्ञानियोंकी ( यावदधिकारम् ) प्रारब्धकर्मों तक ( अवस्थिति : ) अवस्थिति है।
शाङ्करभाष्य
विदुषो वर्तमानदेहपातानन्तरं देहान्तरमुत्पद्यते न वा इति चिन्त्यते।
ननु विद्यायाः साधनभूतायाः संपत्तौ कैवल्यनिर्वृत्तिः स्यात् न वेति नेयं चिन्ता उपपद्यते न हि पाकसाधनसंपत्तौ ओदनो भवेत् न वेति चिन्ता संभवति नापि भुञ्जानः तृप्येत् न वेति चिन्त्यते उपपन्ना तु इयं चिन्ता ब्रह्मविदामपि केषांचित् इतिहासपुराणयोर्देहान्तरोत्पत्तिदर्शनात् तथा हि अपान्तरतमा नाम वेदाचार्यः पुराणर्षिः विष्णुनियोगात् कलिद्वापरयोः संधौ कृष्णद्वैपायनः संबभूवेति स्मरन्ति वसिष्ठश्च ब्रह्मणो मानसः पुत्रः सन् निमिशापादपगतपूर्वदेहः पुनर्ब्रह्मादेशान्मित्रावरुणाभ्यां संबभूवेति भृग्वादीनामपि ब्रह्मण एव मानसपुत्राणां वारुणे यज्ञे पुनरुत्पत्तिः स्मर्यते सनत्कुमारोऽपि ब्रह्मण एव मानसः पुत्रः स्वयं रुद्राय वरप्रदानात् स्कन्दत्वेन प्रादुर्बभूव एवमेव दक्षनारदप्रभृतीनां भूयसी देहान्तरोत्पत्तिः कथ्यते तेन तेन निमित्तेन स्मृतौ।
श्रुतावपि मन्त्रार्थवादयोः प्रायेणोपलक्ष्यते। ते च केचित् पतिते पूर्वदेहे देहान्तरमाददते केचित्तु स्थित एव तस्मिन् योगैश्वर्यवशात् अनेकदेहादानन्यायेन। सर्वे च एते समधिगतसकलवेदार्थाः स्मर्यन्ते। तत् एतेषां देहान्तरोत्पत्तिदर्शनात् प्राप्तं ब्रह्मविद्यायाः पाक्षिकं मोक्षहेतुत्वम् अहेतुत्वं वेति।। अत उत्तरमुच्यते न तेषाम् अपान्तरतमःप्रभृतीनां वेदप्रवर्तनादिषु लोकस्थितिहेतुष्वधिकारेषु नियुक्तानाम् अधिकारतन्त्रत्वात्स्थितेः।
यथासौ भगवान्सविता सहस्रयुगपर्यन्तं जगतोऽधिकारं चरित्वा तदवसाने उदयास्तमयवर्जितं कैवल्यमनुभवति अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता इति श्रुतेः यथा च वर्तमाना ब्रह्मविदः आरब्धभोगक्षये कैवल्यमनुभवन्ति तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये इति श्रुतेः एवम् अपान्तरतमःप्रभृतयोऽपीश्वराः परमेश्वरेण तेषु तेष्वधिकारेषु नियुक्ताः सन्तः सत्यपि सम्यग्दर्शने कैवल्यहेतौ अक्षीणकर्माणो यावदधिकारमवतिष्ठन्ते तदवसाने च अपवृज्यन्त इत्यविरुद्धम्।
सकृत्प्रवृत्तमेव हि ते फलादानाय कर्माशयमतिवाहयन्तः स्वातन्त्र्येणैव गृहादिव गृहान्तरम् अन्यमन्यं देहं संचरन्तः स्वाधिकारनिर्वर्तनाय अपरिमुषितस्मृतय एव देहेन्द्रियप्रकृतिवशित्वात् निर्माय देहान् युगपत् क्रमेण वा अधितिष्ठन्ति न च एते जातिस्मरा इत्युच्यन्ते त एवैते इति स्मृतिप्रसिद्धेः यथा हि सुलभा नाम ब्रह्मवादिनी जनकेन विवदितुकामा व्युदस्य स्वं देहम् जानकं देहमाविश्य व्युद्य तेन पश्चात् स्वमेव देहमाविवेश इति स्मर्यते।
यदि हि उपयुक्ते सकृत्प्रवृत्ते कर्मणि कर्मान्तरं देहान्तरारम्भकारणमाविर्भवेत् ततः अन्यदप्यदग्धबीजं कर्मान्तरं तद्वदेव प्रसज्येतेति ब्रह्मविद्यायाः पाक्षिकं मोक्षहेतुत्वम् अहेतुत्वं वा शङ्क्येत न तु इयमाशङ्का युक्ता ज्ञानात्कर्मबीजदाहस्य श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धत्वात्। तथा हि श्रुतिः भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इतिस्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः इति चैवमाद्या। स्मृतिरपि यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा इतिबाजीन्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः। ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संपद्यते पुनः इति चैवमाद्या। न च अविद्यादिक्लेशदाहे सति क्लेशबीजस्य कर्माशयस्य एकदेशदाहः एकदेशप्ररोहश्च इत्युपपद्यते न हि अग्निदग्धस्य शालिबीजस्य एकदेशप्ररोहो दृश्यते प्रवृत्तफलस्य तु कर्माशयस्य मुक्तेषोरिव वेगक्षयात् निवृत्तिःतस्य तावदेव चिरम् इति शरीरपातावधिक्षेपकरणात्। तस्मादुपपन्ना यावदधिकारम् आधिकारिकाणामवस्थितिः।
न च ज्ञानफलस्य अनैकान्तिकता तथा च श्रुतिः अविशेषेणैव सर्वेषां ज्ञानान्मोक्षं दर्शयति तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम् इति। ज्ञानान्तरेषु च ऐश्वर्यादिफलेष्वासक्ताः स्युर्महर्षयः ते पश्चादैश्वर्यक्षयदर्शनेन निर्विण्णाः परमात्मज्ञाने परिनिष्ठाय कैवल्यं प्रापुरित्युपपद्यते ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् इति स्मरणात्।
प्रत्यक्षफलत्वाच्च ज्ञानस्य फलविरहाशङ्कानुपपत्तिः कर्मफले हि स्वर्गादावनुभवानारूढे स्यादाशङ्का भवेद्वा न वेति अनुभवारूढं तु ज्ञानफलम् यत्सांक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म इति श्रुतेःतत्त्वमसि इति सिद्धवदुपदेशात् न हितत्त्वमसि इत्यस्य वाक्यस्य अर्थः तत् त्वं मृतो भविष्यसीति एवं परिणेतुं शक्यः।तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्च इति च सम्यग्दर्शनकालमेव तत्फलं सर्वात्मत्वं दर्शयति। तस्मात् ऐकान्तिकी विदुषः कैवल्यसिद्धिः।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — विद्वानुका वर्तमान शरीर पात होनेपर दूसरा शरीर उत्पन्न होता है कि नहीं? इसप्रकार विचार किया जाता है। परन्तु साधनभूत विद्याकी प्राप्ति होनेपर मोक्ष निष्पन्न होता हैं कि नहीं, यह विचार उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि पाककी साधन सम्पत्ति होनेपर ओदन पाक होगा कि नहीं, ऐसा विचार नहीं हो सकता, और भोजन करनेवाला तृप्त होगा कि नहीं, ऐसा भी विचार नहीं किया जाता।
किन्तु यह विचार तो युक्त है, क्योंकि कुछ ब्रह्मवेत्ताओं की मी अन्य शरीरकी उत्पत्ति इतिहास और पुराण में देखने में आती है। जैसे कि अपान्तरतमा नामके वेदाचार्य पुराण ऋषि विष्णुके आदेश से कलि और द्वापुरकी सन्धिमें कृष्णद्वैपायनरूपमें उत्पन्न हुए, ऐसा स्मृतिकार कहते हैं। और वशिष्ठ ब्रह्मा के मानस पुत्र होते हुए निमिके शापसे पूर्व देहका त्यागकर ब्रह्माकी आज्ञासे फिर मित्रा और वरुणसे उत्पन्न हुए।
इसीप्रकार ब्रह्मा के मानस पुत्र भृगु आदिकी भी वरुणके यज्ञ में पुनः उत्पत्ति सुनी जाती है। ब्रह्मा के मानस पुत्र सनत्कुमार भी स्वयं रुद्रको वरदान देनेके कारण कार्तिकेयरूपसे उत्पन्न हुए। इसीप्रकार दक्ष नारद आदिकी तत् तत् निमित्तसे अनेक शरीरोंकी उत्पत्ति स्मृतिमें कही जाती है। और श्रुति ( वेद ) में भी मन्त्र और अर्थवादमें प्रायः ऐसा उपलब्ध होता है।
कई एक तो वे पूर्वदेहके पातं होनेपरं अन्य देह ग्रहण करते हैं, और कई एक तो उस देह के विद्यमान होते ही योग ऐश्वयं बलसे अनेक अन्य शरीर धारण न्यायसे अन्य शरीरका ग्रहण करते हैं। और वे सब समधिगत सकल वेद अर्थवाले सम्यक् ज्ञाता स्मरण किये जाते हैं। इसलिए इनकी देहान्तरोत्पत्ति के दर्शन होनेसे ब्रह्मविद्या मोक्षकी पाक्षिक हेतु है अथवा अहेतु है, ऐसा प्राप्त होता है।
सिद्धान्ती - इससे उत्तर कहा जाता है- नहीं, लोक स्थिति के हेतुभूत वेदप्रवर्तन आदि अधिकारों में नियुक्त इन अपान्तरतमा आदिकी अवस्थिति अधिकारके अधीन है। जैसे यह भगवान् सूर्यं सहस्रयुगपर्यन्त जगत्का अधिकार चलाकर उसकी समाप्ति होनेपर उदय और अस्त से रहित कैवल्यका अनुभव करते हैं, क्योंकि ' अथ तत ऊध्वं ० ' ( प्राणियोंके न होनेपर प्रारब्ध कर्म क्षीण होनेपर केवल ब्रह्मस्वरूप हो न उदित ही होगा और न व्यस्त ही होगा केवल मध्यमें - अपने में ही स्थिर रहेगा ) ऐसी श्रुति है।
और जैसे वर्तमान ब्रह्मवेत्ता प्रारब्धकर्मो के भोगके क्षय होनेपर कैवल्यका अनुभव करते हैं, क्योंकि ' तस्य तावदेव ० ' ( उसके मोक्ष में उतना ही विलम्ब है जब तक कि वह देह बन्धन - लिङ्ग शरीरसे मुक्त नहीं होता, उसके पश्चात् वह सत्सपन्न - ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ) यह श्रुति है।
वैसे ही ईश्वर द्वारा तत् तत् अधिकारोंमें नियुक्त होते हुए अपान्तरतमा आदि ईश्वर कैवल्यके हेतुभूत तत्त्वज्ञानके होनेपर भी कर्मोके क्षीण न होनेतक अधिकारमें रहते हैं और कर्मोंके क्षीण होनेपर मुक्त हो जाते हैं, इसमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि अधिकारका फल देनेके लिए एक वार प्रवृत्त हुए कर्माशयको समाप्त करते हुए एक घरसे दूसरे घरके समान स्वतन्त्रता से ही अन्य अन्य देहमें संचार करते हुए अपने अधिकारको सम्पन्न करनेके लिए पूर्वं स्मृतिका लोप हुए विना ही देह, इन्द्रियोंकी प्रकृति ( स्वभाव ) को अपने अधीन कर युगपत् अथवा क्रमसे छानेक देहोंका निर्माणकर उसमें अधिष्ठित होते हैं।
वे जातिस्मर नहीं कहे जाते, क्योंकि ' त एवैते ० ' ( ये वे ही हैं ) ऐसा स्मृतिमें प्रसिद्ध है। जैसे ' सुलमा नामकी ब्रह्मवादिनी जनकके साथ विवादकी कामनासे अपने देहका त्यागकर जनकके शरीरमें प्रवेशकर उसके साथ विवादकर पश्चात् अपने हो शरीरमें प्रवेश किया ' ऐसी स्मृति है। यदि एक वार प्रवृत्त हुए उपयुक्त कर्ममें दूसरे देहकी उत्पत्ति के
हो तो अन्य मी जिसका बीज दग्ध नहीं हुआ है ऐसा कर्मान्तर कारणभूत अन्य कर्मका आविर्भाव उसीप्रकार प्रसक्त होगा। इससे
ब्रह्मविद्या- पाक्षिक मोक्षका हेतु है अथवा अहेतु है, ऐसी आशङ्का
नहीं है, क्योंकि ज्ञानसे कर्म बीजका दाह श्रुति और स्मृति में प्रसिद्ध होगी। परन्तु यह आशङ्का युक्त
( कार्य - कारणरूप से उस परब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर इस जीवकी है | जैसे ' मिद्यते हृदयग्रन्थिः ० '
धर्मोंके तादात्म्याध्यासरूप गांठ टूट जाती है, आत्मविषयक सब हृदय ग्रन्थि जड़ - चेतन और उनके संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके
सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ) और ' स्मृतिलम्भे ० ' ( तथा स्मृति- ' मैं
ग्रन्थियों की निवृत्ति हो जाती है ) इत्यादि श्रुति है। और ' यथैषांसि ० ' ब्रह्म हूँ ' की प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण ( हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि इन्धनको भस्ममयकर देती है, वैसे ही ज्ञान सम्पूर्ण कर्मोंको भस्ममय - निर्बीज कर देता है ) और ' बीजान्यग्न्युपदग्धानि ० ' ( जैसे अग्निसे भूने गये बीज फिर नहीं उगते, वैसे ही ज्ञानाग्निसे दग्ध हुए क्लेशोंसे पुनः शरीर उत्पन्न नहीं होता ) इत्यादि स्मृति मी है।
उसीप्रकार अविद्या आदि क्लेशोंके दाह होनेपर क्लेशके बीज कर्माशयके एक देशका दाह हो और एक देशका प्ररोह हो, यह उपपन्न नहीं होता। अग्निसे दग्ध शाली बीजके एक देशका प्ररोह नहीं देखा जाता। जैसे छोड़े हुए बाणकी निवृत्ति वेग क्षय होनेसे होती है, वैसे प्रवृत्त फलवाले कर्माशयको निवृत्ति भी वेगक्षय ( भोगक्षय ) होने पर होती है।
क्योंकि ' तस्य तावदेव चिरम् ० ' ( उसे तभी तक विलम्ब है ) इसप्रकार शरीर पात पर्यन्त विलम्ब होता है, इसलिए अधिकार पर्यन्त अधिकारियों की अवस्थिति उपपन्न है | ज्ञानके फलमें व्यभिचार नहीं है, क्योंकि ' तद्यो यो ० ' ( उसे देवों में से जिसजिसने जाना वही तद्रूप हो गया। इसीप्रकार ऋषियों और मनुष्यों में से भी जिसने उसे जाना वह्न तद्रूप - ब्रह्मरूप हो गया ) यह श्रुति समानरूपसे सबका ज्ञानसे मोक्ष दिखलाती है।
ऐश्वर्यं आदि फलको देनेवाली अन्य उपासनाओं में महर्षि लोग आसक्त हुए, अनन्तर वे ऐश्वयं क्षय दर्शनसे विरक्त होकर परमात्माके ज्ञानमें पूर्णरूप से निष्ठावान् होकर कैवल्यको प्राप्त हुए, ऐसा उपपन्न है, क्योंकि ' ब्रह्मणा सह ते ० ' ( महाप्रलय प्राप्त होनेपर और पर हिरण्यगर्भका अन्त होनेपर विमल अन्तःकरणवाले ज्ञानी ब्रह्माके साथ ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त होते हैं ) ऐसी स्मृति - कूर्मपुराण हैं। प्रत्यक्ष फलवाला होने से ज्ञानमें फल अभावको आशङ्का नहीं हो सकती।
परन्तु अनुभव में न आनेवाला कर्म - फल स्वर्गं आदिमें ' होगा कि नहीं ' ऐसो आयङ्का हो सकती है। ज्ञानका फल तो अनुभवमें आरूढ है अर्थात् सिद्ध है, क्योंकि ' यत्साक्षादपरोक्षाद्बह्म ' ( जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है ) ऐसी श्रुति है, और ' तत्त्वमसि ' इसप्रकार सिद्धवत् उपदेश है। ' तत्त्वससि ' इस वाक्यका अर्थ ' वह तू मृत होगा ' इसप्रकार परिणित नहीं किया जा सकता। ‘ तद्वैतत् ' ( उसे आत्मरूप से अनुभव करते हुए ऋषि वामदेवने जाना-
—मैं मनु हुआ और सूर्य मी ) यह श्रुति तत्त्वज्ञान कालमें ही उसका फल सर्वात्मत्व दिखलाती है। इसलिए विद्वानुकी कैवल्य सिद्धि अव्यभिचरित है॥ ३२
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' मेधातिथेर्मेष ' इस मन्त्रमें इन्द्रका मेषरूपसे जन्म उपलब्ध होता है। ' वसिष्ठ उर्वशी पुत्रो जात : ' ( वसिष्ठ उवंशीका पुत्र उत्पन्न हुआ ) यह सामवेदका अर्थवाद है। इसप्रकार मोक्ष ज्ञानका फल न होनेसे ब्रह्मलोक प्राप्तिरूप फल सगुणविद्या फलके समान होनेके कारण अचिरादि मार्गका उपसंहार पूर्वपक्ष में फल है, सिद्धान्तमें उपर्युक्त व्यवस्थाकी सिद्धि फल है।
* अज्ञानके दो अंश हैं - एक आवरण और दूसरा विक्षेप | आवरण तो ज्ञानसे निवृत्त हो जाता है, जैसे प्रकाशसे अन्धकार | दूसरा विक्षेप - प्रारब्धकमं, वह भोगसे क्षय होता है। इसलिए ज्ञान होनेपर मी प्रारब्ध जन्य शरीर रहता है, अतः ज्ञानके मोक्षरूप फलमें व्यभिचार नहीं है।
* ' तत्त्वमसि ' ( तत् तस्य त्वम् असि भविष्यसि ' तू उपासना करके मरणानन्तर उस ब्रह्मका होगा ) इस श्रुति वाक्यका यह अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि वर्तमानकालके उपदेशमें भविष्यत्का और जीवित दशा में मरणका अध्याहार अयुक्त है और कल्पना गौरव भी है। इसलिए ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे आत्मज्ञानके उत्पत्तिकालमें ही विद्वानुको सर्वात्मभाव फल प्राप्त होता है। अतः निर्गुणविद्या में सगुण विद्याके समान अर्चिरादि मार्गका उपसंहार नहीं है॥ ३२
अक्षरध्यधिकरणम्
3.3.33 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३३
अक्षरधियां त्ववरोधस्सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम् ॥ ३.३.३३ ॥
पदच्छेद — अक्षरधियाम् , तु , अवरोधः , सामान्यतद्भ ( वाभ्याम् , औपसदवत् , तद् , उक्तम्
सूत्रार्थ — ( अक्षरधियाम् ) ब्रह्म विषयक विशेष प्रतिषेधक सत्र बुद्धियोंका सर्वत्र ( अवरोध :) उपसंहार होना चाहिए, ( सामान्यतद्भावाभ्याम् ) क्योंकि द्वैत निरसन द्वारा ब्रह्मप्रतिपादन प्रकार सर्वत्र समान है और वही प्रतिपाद्य ब्रह्म सर्वत्र एकरूपसे प्रत्यभिज्ञात होता है। ( मपसदवत् ) जैसे उपसद इष्टि मन्त्र सर्वत्र समान हैं, ( तदुक्तम् ) यह जैमिनीय सूत्रमें कहा गया है।
शाङ्करभाष्य
वाजसनेयके श्रूयते एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहम् इत्यादि तथा आथर्वणे श्रूयते अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णम् इत्यादि तथैव अन्यत्रापि विशेषनिराकरणद्वारेण अक्षरं परं ब्रह्म श्राव्यते तत्र च क्वचित् केचित् अतिरिक्ता विशेषाः प्रतिषिध्यन्ते तासां विशेषप्रतिषेधबुद्धीनां किं सर्वासां सर्वत्र प्राप्तिः उत व्यवस्थेति संशये श्रुतिविभागात् व्यवस्थाप्राप्तौ उच्यते अक्षरविषयास्तु विशेषप्रतिषेधबुद्धयः सर्वाः सर्वत्रावरोद्धव्याः सामान्यतद्भावाभ्याम् समानो हि सर्वत्र विशेषनिराकरणरूपो ब्रह्मप्रतिपादनप्रकारः तदेव च सर्वत्र प्रतिपाद्यं ब्रह्म अभिन्नं प्रत्यभिज्ञायते तत्र किमिति अन्यत्र कृता बुद्धयः अन्यत्र न स्युः।
तथा चआनन्दादयः प्रधानस्य इत्यत्र व्याख्यातम् तत्र विधिरूपाणि विशेषणानि चिन्तितानि इह प्रतिषेधरूपाणीति विशेषः प्रपञ्चार्थश्चायं चिन्ताभेदः।
औपसदवदिति निदर्शनम् यथा जामदग्न्येऽहीने पुरोडाशिनीषूपसत्सु चोदितासु पुरोडाशप्रदानमन्त्राणाम्अग्नेर्वेर्होत्रं वेरध्वरम् इत्येवमादीनाम् उद्गातृवेदोत्पन्नानामपि अध्वर्युभिरभिसंबन्धो भवति अध्वर्युकर्तृकत्वात्पुरोडाशप्रदानस्य प्रधानतन्त्रत्वाच्चाङ्गानाम् एवमिहापि अक्षरतन्त्रत्वात् तद्विशेषणानां यत्र क्वचिदप्युत्पन्नानाम् अक्षरेण सर्वत्राभिसंबन्ध इत्यर्थः। तदुक्तं प्रथमे काण्डे गुणमुख्यव्यतिक्रमे तदर्थत्वान्मुख्येन वेदसंयोगः इत्यत्र।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वाजसनेयकमें ' एतद्वैत्तदक्षरम् ० ' ( याज्ञवल्क्य - हे गार्गी! जो तुमने मुझसे पूछा कि आकाश किसमें ओत - प्रोत है, वह यह है, ब्रह्मवेत्ता तो उस तत्त्वको अक्षर कहते हैं, वह अस्थूल, अनणु, अह्रस्व, अदीर्घ अलोहित और अस्नेह है ) इत्यादि श्रुति कहती है। उसी प्रकार आथर्वण में ' अथ परा ० ( तथा जिससे वह अक्षर परमात्मा अधिगत होता है, वह परा विद्या है।
वह जो अदेश्य - सब बुद्धि इन्द्रियोंका अविषय, अग्राह्य - कर्मेन्द्रियोंका अविषय, अगोत्र- अनन्वय और अवर्ण है ) इत्यादि श्रुति कहती है। इसी प्रकार अन्य शाखा में भी विशेष निराकरण द्वारा अक्षर पर ब्रह्मका श्रवण कराया जाता है। उनमें कहींपर कुछ अतिरिक्त अधिक विशेषोंका प्रतिषेध होता है।
क्या उन विशेष प्रतिषेधक बुद्धियोंकी सर्वत्र प्राप्ति है अथवा व्यवस्था है, ऐसा संशय होनेपर श्रुतियोंके विभागसे निषेध बुद्धियोंकी तत्वद् शाखा में व्यवस्था प्राप्त होनेपर कहा जाता है— अक्षर विषयक सब विशेष प्रतिषेधक बुद्धियोंका सर्वत्र उपसंहार होना चाहिए, क्योंकि सामान्य और तद्भाव है। विशेष निराकरणात्मक ब्रह्मका प्रति पादन प्रकार सर्वत्र समान है। और वही प्रतिपाद्य ब्रह्म सर्वत्र अभिन्नरूपसे प्रत्यभिज्ञात होता है।
वहाँ एक शाखा में की गई बुद्धियाँ अन्य शाखायें क्यों नहीं होनी चाहिए। उसी प्रकार ' आनन्दादयः प्रधानस्य ' इस सूत्र में व्याख्यान किया गया है। उसमें विधि रूप विशेषणोंका विचार किया गया है और यहाँ निषेधरूप विशेषणोंका विचार किया जाता है, इतना इन दोनों अधिकरणों में विशेष ( भेद ) है। और यह पुन : किये जानेवाला विचार विशेष उसीके विस्तार के लिए है। मोपसदके समान। यह दृष्टान्त है।
जैस जमदग्नि द्वारा किये गये अहीन ( चार दिनमें अनुष्ठित अहीन नाकक सोमयाग में पुरोडाश युक्त उपसद इष्टियोंका विधान होनेपर ' अग्नेर्वेहोत्रं वेरध्वरम् ' ( देवताओंका होत्र और अध्वर कर्म अग्निसे ही सम्पन्न होते हैं ) इत्यादि उद्गाताके वेदमें उत्पन्न हुए पुरोडाश प्रदान मन्त्रोंका भी अध्वर्युंके साथ सम्बन्ध होता है, क्योंकि पुरोडाय प्रदान अध्वर्युं कर्तृक होता है और अङ्ग प्रधानके अधीन होते हैं।
वैसे ही यहाँ भी अक्षर के अधीन होनेसे जहाँ कहीं पर भी उत्पन्न हुए उनके विशेषणोंका सर्वत्र अक्षरके साथ सम्बन्ध है, ऐसा अर्थ है। वह प्रथम काण्डमें ' गुणमुख्यव्यतिक्रमे ० ' ( गुण और मुख्यका विरोध होनेपर मन्त्रात्मक वेदका मुख्य - बलवत्तर मध्वर्युंके साथ संप्रयोग है, क्योंकि उत्पत्ति विधि विनियोगके लिए होती है ) यहाँपर कहा गया है॥ ३३
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस अधिकरणमें अक्षर ब्रह्मकी प्रमिति करानेवाले निषेध शब्द विषय हैं, उन श्रुतियोंमें जहाँपर जितने निषेधों का श्रवण है वे सम्पूर्ण द्वैतका निषेध कर सकते हैं कि नहीं? इस प्रकार संभव और असंभव होने के कारण ' तासाम् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। पूर्वपक्ष में लाघव फल है अर्थात् उन निषेध शब्दोंकी तत् - वत् शाखा में व्यवस्था है, सिद्धान्त में दोनों दोषोंका अभाव फल है, क्योंकि यदि श्रुत निषेध शब्दोंसे अश्रुत निषेध शब्द भी लक्ष्य हों, तो लक्षणा प्रसक्त होगी, यदि ये लक्ष्य न हों तो सम्पूर्ण द्वैतका निषेध बसिद्ध होनेसे निर्विशेष ब्रह्मज्ञानका अभाव दोष होगा, अत : एक शाखागत निषेध वाक्योंका अन्य शाखागत विषेध वाक्योंके साथ एक वाक्यता होनेसे उपसंहार युक्त है।
* जमदग्निः पुष्टिकामश्चतूरात्रेणायजत ' ( पुष्टिकी कामनावाले जमदग्निने चार दिनमें अनुष्ठित अहीन नामक सोम याग किया ) जमदग्निकृत होनेसे इस यज्ञका नाम भी जामदग्न्यहीन पड़ा है। उसमें ' पुरोडाशिन्य उपसदो भवन्ति ' इससे पुरोडाश साध्य उपसद इष्टियों का तैत्तिरीयमें विधान है, इन इष्टियों का कर्ता अध्वर्यु ' है, अतः ' अग्नेर्वेर्होत्रं वेरध्वरम् ' इत्यादि सामवेदमें उत्पन्न हुए मन्त्रों का इन उपसद् इष्टियोंमें विनियोग होनेसे अध्वयु से ही उनका प्रयोग होना चाहिए, उद्गातासे नहीं। मन्त्रोंका सामवेदमें उत्पन्न होनेसे उद्गातासे प्रयोग हो और विनियोग विधिसे अध्वर्यु से प्रयोग हो इसप्रकार गुण और मुख्यका विरोध होनेपर मुख्य बलवत्तर अध्वर्युके साथ मन्त्रात्मक वेदका संप्रयोग है, क्योंकि उत्पत्ति विधि विनियोगके लिए होती है, यह सूत्र का अर्थ है। सामवेदीय मन्त्र उत्पत्ति परक हैं और उनका विनियोग यजुर्वेद में है, अतः उत्पद्यमान विनियुज्यमानके लिए होता है, इससे उनका अध्वर्युसे ही संप्रयोग होना युक्त है। अधिक शाबरभाष्य में देखना चाहिए॥ ३३
उपसंहार
इन सूत्रों का सार यह है कि वेदान्त के वाक्य केवल उपदेश मात्र नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित करने वाले प्रमाण हैं। यहाँ विभिन्न मतभेदों और शंकाओं का समाधान करते हुए यह सिद्ध किया गया है कि शास्त्र की सत्ता अन्य सांसारिक विद्याओं से भिन्न और सर्वोपरि है। अंततः, ये सूत्र साधक को श्रुत ज्ञान और आत्म-अनुभव के अटूट संबंध को समझने में सहायता करते हैं।
In English
Brahma Sutra 3.3.1 Commentary
This text explains Brahma Sutra 3.3.1 from the third chapter of the Brahma Sutras. Through the commentary of Satyānanda Saraswati, it discusses whether different Upanishadic meditations (upasana) are essentially the same or distinct, concluding that while they appear different due to names and rituals, they all lead to the same Brahman.
This article answers
- Brahma sutra 3.3.1 meaning?
- Are different vedanta upasanas the same?
- Difference between vajasaneya and chandogya vidya?
- Purpose of discussing differences in vedanta vidya?