श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — तृतीय अध्याय, तृतीय पाद (३४–६६)

33 मूल पद्य 33 संस्करणसे मिलाये गये

इन सूत्रों में जीवात्मा और ब्रह्म के बीच के भेदाभास का सूक्ष्म विवेचन किया गया है। यहाँ तर्क द्वारा यह सिद्ध किया जा रहा है कि इंद्रियों और मन के स्तर पर दिखने वाला अंतर वास्तविक नहीं है, बल्कि केवल ज्ञान के अभाव या दृष्टि के दोष के कारण प्रतीत होता है। पाठक को यहाँ आत्म-स्वरूप की एकता और बाह्य जगत के विविधताओं के बीच के संबंध का बोध प्राप्त होगा।

इयदधिकरणम्

3.3.34 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३४

सूत्र ३.३.३४

इयदामननात् ॥ ३.३.३४ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.३४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 737

सूत्रार्थ — विद्या एक ही है, क्योंकि ' द्वा सुपर्णा ' और ' ऋतं पिबन्ती ' इन दोनों मन्त्रोंमें भी इयत्तासे परिच्छिन्न वेद्य एक ही है।

शाङ्करभाष्य

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति इत्यध्यात्माधिकारे मन्त्रमाथर्वणिकाः श्वेताश्वतराश्च पठन्ति तथा कठाः ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्ध्ये। छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः इति। किमत्र विद्यैकत्वम् उत विद्यानानात्वमिति संशयः।

किं तावत्प्राप्तम् विद्यानानात्वमिति कुतः विशेषदर्शनात् द्वा सुपर्णा इत्यत्र हि एकस्य भोक्तृत्वं दृश्यते एकस्य च अभोक्तृत्वं दृश्यतेऋतं पिबन्तौ इत्यत्र उभयोरपि भोक्तृत्वमेव दृश्यते तत् वेद्यरूपं भिद्यमानं विद्यां भिन्द्यादित्येवं प्राप्ते ब्रवीति विद्यैकत्वमिति कुतः यतः उभयोरप्यनयोर्मन्त्रयोः इयत्तापरिच्छिन्नं द्वित्वोपेतं वेद्यं रूपम् अभिन्नम् आमनन्ति।

ननु दर्शितो रूपभेदः नेत्युच्यते उभावप्येतौ मन्त्रौ जीवद्वितीयमीश्वरं प्रतिपादयतः नार्थान्तरम्।द्वा सुपर्णा इत्यत्र तावत् अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति इत्यशनायाद्यतीतः परमात्मा प्रतिपाद्यते वाक्यशेषेऽपि च स एव प्रतिपाद्यमानो दृश्यतेजुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानम् इतिऋतं पिबन्तौ इत्यत्र तु जीवे पिबति अशनायाद्यतीतः परमात्मापि साहचर्यात् छत्रिन्यायेन पिबतीत्युपचर्यते परमात्मप्रकरणं हि एतत् अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात् इत्युपक्रमात् तद्विषय एव च अत्रापि वाक्यशेषो भवति यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् इति।गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि इत्यत्र च एतत्प्रपञ्चितम्।

तस्मान्नास्ति वेद्यभेदः तस्माच्च विद्यैकत्वम्। अपि च त्रिष्वप्येतेषु वेदान्तेषु पौर्वापर्यालोचने परमात्मविद्यैव अवगम्यते तादात्म्यविवक्षयैव जीवोपादानम् नार्थान्तरविवक्षया न च परमात्मविद्यायां भेदाभेदविचारावतारोऽस्तीत्युक्तम्। तस्मात्प्रपञ्चार्थ एव एष प्रयोगः तस्माच्चाधिकधर्मोपसंहार इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' द्वा सुपर्णा ० ' ( सुन्दर पंखवाले नियम्यनियामक माववाले सवंदा साथ ही रहनेवाले, सखासमान आख्यानवाले दो पक्षी शरीर नामक समान एक वृक्षका आश्रयकर रहते हैं उनमेंसे एक तो क्षेत्रज्ञ स्वादिष्ट कर्मफलका भोग करता है और दूसरा भोग न कर केवल साक्षीरूपसे देखता रहता है ) इसप्रकार अध्यात्मप्रकरणमें आथर्वणिक और श्वेताश्वतर मन्त्र पढ़ते हैं।

और ' ऋतं पिबन्तौ ० ' ( ब्रह्मवेत्ता कहते हैं कि शरीरमें बुद्धिरूप गुहाके भीतर प्रकृष्ट ब्रह्म स्थानमें प्रविष्ट हुए अपने कर्म - फलको भोगनेवाले छाया और आतपके समान परस्पर विलक्षण दो [ तत्त्व ] हैं। यही बात जिन्होंने तीन वार नाचिकेताग्निका चयन किया है वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले भी कहते हैं ) इसप्रकार कठ शाखावाले कहते हैं। क्या यहाँपर विद्या एक है अथवा नाना है, ऐसा संशय होता है, तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - विद्या नाना। किससे? इससे कि विशेषका दर्शन है।

' द्वा सुर्पणा ' यहाँ एक भोक्तृत्व देखा जाता है और दूसरे में अभोक्तृत्व देखा जाता है। और ' ऋतं पिबन्तौ ' इसमें दोनों में भी भोक्तृत्व ही देखा जाता है। इसलिए वेद्यका रूप भिन्न होता हुआ विद्याको मिन्न करेगा | सिद्धान्ती –—–— ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं — विद्या एक है, किससे? इससे कि दोनों इन मन्त्रों में भी इयत्ता से परिच्छिन्न, द्वित्व युक्त वेद्यरूप अभिन्न ही कहते हैं। परन्तु रूपका भेद दिखलाया गया है?

नहीं, ऐसा कहते हैं- ये दोनों मन्त्र भी जीव और द्वितीय ईश्वरका प्रतिपादन करते हैं, भिन्न अर्थका नहीं। ' द्वा सुपर्णा ' इस मन्त्रमें तो ' अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ' बुभुक्षा आदिसे अतीत परमात्माका प्रतिपादन होता है, और ' जुष्टं यदा ० ' ( जब अनेक योगमार्गों से सेवित और देह आदिसे भिन्न परमात्मा और उसकी महिमाको देखता है उस समय शोक रहित हो जाता है ) इस वाक्यशेष में भी वही परमात्मा प्रतिपाद्यमान देखा जाता है।

' ऋतं पिबन्तौ ' इस मन्त्रमें तो जीवके पान करनेपर भूख आदिसे बतीत परमात्मा भी साहचयंसे छत्रिन्यायसे पान करता है, ऐसा उपचार होता है, क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( शास्त्रीय धर्मानुष्ठान तथा उसके फल, कर्ता, करण आदिसे पृथक है, अधमंसे पृथक् है ) इस उपक्रमसे यह परमात्माका प्रकरण है। आथर्वणिक आदि वाक्यके समान यहाँ भी ‘ यः सेतुरीजानानामक्षरम् ' ( जो यजन करनेवालोंके लिए सेतुके समान है, जो अक्षर परब्रह्म है ) यह वाक्यशेष परमात्मविषयक ही है।

' गुहा प्रविशवात्मानौ हि ' इस सूत्र में इस विषयका विस्तार पूर्वक विचार किया गया है। इसीसे वेद्यका भेद नहीं है और इससे विद्या एक है। किश्व पूर्वापरका विचार करनेपर इन तीनों ( आथर्वणिक, श्वेताश्वतर और काठक ) वेदान्तों में परमात्मविद्या ही अवगत होती है और जीवका ग्रहण तो तादात्म्यविवक्षासे है अन्य अर्थकी विवक्षासे नहीं है। इससे परमात्मविद्यामें भेद अथवा अभेदके विचार करनेका अवतरण नहीं है, ऐसा कहा जा चुका है। इसलिए यह सूत्र विस्तारके लिए ही हैं और इससे अधिक धर्मोंका उपसंहार है॥ ३४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इन दोनों मन्त्रों में प्रतिपादनका प्रकार भिन्न है और ज्ञेय एक मान होता है, अतः ' किम् ' इत्यादि संशय कहते हैं। ' ऋतं पिबन्तौ ' इस ऋतपान वाक्य में ' अक्षरं ब्रह्म यत्परम् ' ( कठ ० १।३।२ ) ( जो परम अक्षर ब्रह्म है ) इन गुणोंका श्रवण है। और ' द्वा सुपर्णा ' इस सुपर्णवाक्य में अनुपयोग आदि धर्म हैं। पूर्वपक्षमें इन धर्मों का परस्पर अनुपसंहार फल है, सिद्धान्तमें धर्मो का उपसंहार माननेपर ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादक वाक्योंका एक अर्थ होनेसे उपसंहार है॥ ३४

3.3.35 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३५

सूत्र ३.३.३५

अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनोऽन्यथा भेदानुपपत्तिर् इति चेन् नोपदेशवत् ॥ ३.३.३५ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.३५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 738

पदच्छेद — अन्तरा , भूतग्रामवत् , स्वात्मनः

सूत्रार्थ — -- ' यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म ' ' य आत्मा सर्वान्तर : ' इन दोनों श्रुतियोंमें भी ( स्वात्मनः ) स्वात्माके ( अन्तरा ) सर्वान्तरत्वका कथन है। इससे विद्या एक ही है। (

शाङ्करभाष्य

यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः इत्येवं द्विः उषस्तकहोलप्रश्नयोः नैरन्तर्येण वाजसनेयिनः समामनन्ति। तत्र संशयः विद्यैकत्वं वा स्यात् विद्यानानात्वं वेति। विद्यानानात्वमिति तावत्प्राप्तम् अभ्याससामर्थ्यात् अन्यथा हि अनूनानतिरिक्तार्थे द्विराम्नानम् अनर्थकमेव स्यात् तस्मात् यथा अभ्यासात्कर्मभेदः एवमभ्यासाद्विद्याभेद इत्येवं प्राप्ते प्रत्याह अन्तरा आम्नानाविशेषात् स्वात्मनः विद्यैकत्वमिति सर्वान्तरो हि स्वात्मा उभयत्राप्यविशिष्टः पृच्छयते प्रत्युच्यते च न हि द्वावात्मानौ एकस्मिन्देहे सर्वान्तरौ संभवतः तदा हि एकस्य आञ्जसं सर्वान्तरत्वमवकल्पेत एकस्य तु भूतग्रामवत् नैव सर्वान्तरत्वं स्यात् यथा च पञ्चभूतसमूहे देहे पृथिव्या आपोऽन्तराः अद्भ्यस्तेजोऽन्तरमिति सत्यप्यापेक्षिकेऽन्तरत्वे नैव मुख्यं सर्वान्तरत्वं भवति तथेहापीत्यर्थः। अथवा भूतग्रामवदिति श्रुत्यन्तरं निदर्शयति यथा एको देवाः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा इत्यस्मिन्मन्त्रे समस्तेषु भूतग्रामेष्वेक एव सर्वान्तर आत्मा आम्नायते एवमनयोरपि ब्राह्मणयोरित्यर्थः। तस्मात् वेद्यैक्यात् विद्यैकत्वमिति।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.३.३६ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्व ' ( बृह ० ३।४।१ ) इसप्रकार उषस्त चाक्रायणने याज्ञवल्यसे प्रश्न किया उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने प्राण आदिके प्रेरक सबके साक्षी आमाका प्रतिपादन किया, और ' यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( बृह ० ३।५।१ ) इसतरह कहोलके प्रश्नके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने भूख व्यादिसे अतीत ब्रह्मका प्रतिपादन किया है। इसप्रकार इन दोनों ब्राह्मणोंमें प्रश्न आदिके अभ्यास से और सर्वान्तर के प्रत्यभिज्ञानसे एक विद्या है अथवा अनेक? इस प्रकार संशय होनेपर पूर्वपक्ष में अनेक विद्याएँ हैं, क्योंकि ' समिधो यजति ' ' स्वाहाकारं यजति ' जैसे यहाँ ' यजति ' के अभ्याससे कर्मका भेद है, वैसे आत्माके अभ्यास से यहाँ विद्यामें भेद है। इसलिए इनके परस्पर धर्मोंका अनुपसंहार है, सिद्धान्त में इनके धर्मोका परस्पर उपसंहार है। सिद्धान्ती - एक विद्या है, क्योंकि दोनों ब्राह्मणोंमें प्रश्न और प्रतिवचन एक आत्मविषयक है। इसलिए वेद्य एक होनेसे विद्या भी एक है।। ३५

3.3.36 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३६

सूत्र ३.३.३६

अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनोऽन्यथा भेदानुपपत्तिर् इति चेन् नोपदेशवत् ॥ ३.३.३६ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.३६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 739

पदच्छेद — अन्यथा , भेदानुपपत्तिः , इति चेत् , न , उपदेशान्तरवत्

सूत्रार्थ — ( अन्यथा ) यदि विद्याका भेद न माना जाय, तो ( भेदानुपपत्तिः ) श्रुतिभेद अनुपपन्न होता है, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि ( उपदेशान्तरवत् ) जैसे छान्दोग्यमें ' तत्त्वमसि ' इसका नौ वार अभ्यास होनेपर भी विद्याभेद और अनुपपत्ति नहीं है, वैसे प्रकृत में भी समझना चाहिए। सर्वान्तर है ) इसप्रकार उषस्त और कहोलके दो वार प्रश्नोंमें नैरन्वयंसे वाजसनेयी कहते हैं। यहाँ संशय होता है कि विद्या एक है अथवा विद्या नाना है?

पूर्वपक्षी - विद्याएँ अनेक हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि अभ्यासकी सामर्थ्यं है। अन्यथा न्यूनता और अधिकता से रहित अर्थ में दो वार कथन निरर्थक होगा। इससे जैसे ' यजति ' पदके अभ्याससे कर्मका भेद है, वैसे ही अभ्याससे विद्याका भेद है। सिद्धान्ती - – ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण करते हैं- स्वात्मामें सर्वान्तरत्व दोनों श्रुतियोंमें समानरूपसे कहा गया है, अतः विद्या एक है, क्योंकि सबके आभ्यन्तर स्वात्मा के विषय में दोनों स्थलोंमें भी समानरूपसे प्रश्न और प्रतिवचन है।

एक देहमें दो आत्माओंका सर्वान्तरत्व संभव नहीं है, यदि एकका कहो तो सर्वान्तरत्व मुख्यरूपसे हो सकता है और दूसरेका भूतग्राम के समान सर्वान्तरत्व नहीं होगा। जैसे पाँच भूतों के समूहदेह में पृथिवीसे जल आभ्यन्तर है और जलसे तेज आन्तर है इसप्रकार आपेक्षिक आन्तरत्व होनेपर भी उनमें मुख्य सर्वान्तरत्व नहीं है, वैसे यहाँ भी समझना चाहिए, ऐसा अर्थ है।

अथवा मूतग्रामवत् अन्य श्रुतिका दृष्टान्त कहते हैं- जैसे ' एको देवः ० ' ( सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित एक देव हैं, वह सर्वव्यापक और समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है ) इस मन्त्रमें समस्त भूत समुदाय में एक ही सर्वान्तर आत्मा कहा जाता है, वैसे इन दोनों ब्राह्मणोंमें भी एक ही आत्माका

शाङ्करभाष्य

यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः इत्येवं द्विः उषस्तकहोलप्रश्नयोः नैरन्तर्येण वाजसनेयिनः समामनन्ति। तत्र संशयः विद्यैकत्वं वा स्यात् विद्यानानात्वं वेति। विद्यानानात्वमिति तावत्प्राप्तम् अभ्याससामर्थ्यात् अन्यथा हि अनूनानतिरिक्तार्थे द्विराम्नानम् अनर्थकमेव स्यात् तस्मात् यथा अभ्यासात्कर्मभेदः एवमभ्यासाद्विद्याभेद इत्येवं प्राप्ते प्रत्याह अन्तरा आम्नानाविशेषात् स्वात्मनः विद्यैकत्वमिति सर्वान्तरो हि स्वात्मा उभयत्राप्यविशिष्टः पृच्छयते प्रत्युच्यते च न हि द्वावात्मानौ एकस्मिन्देहे सर्वान्तरौ संभवतः तदा हि एकस्य आञ्जसं सर्वान्तरत्वमवकल्पेत एकस्य तु भूतग्रामवत् नैव सर्वान्तरत्वं स्यात् यथा च पञ्चभूतसमूहे देहे पृथिव्या आपोऽन्तराः अद्भ्यस्तेजोऽन्तरमिति सत्यप्यापेक्षिकेऽन्तरत्वे नैव मुख्यं सर्वान्तरत्वं भवति तथेहापीत्यर्थः। अथवा भूतग्रामवदिति श्रुत्यन्तरं निदर्शयति यथा एको देवाः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा इत्यस्मिन्मन्त्रे समस्तेषु भूतग्रामेष्वेक एव सर्वान्तर आत्मा आम्नायते एवमनयोरपि ब्राह्मणयोरित्यर्थः। तस्मात् वेद्यैक्यात् विद्यैकत्वमिति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है ) ' य आत्मा सर्वान्तर : ' ( जो अल्तमा

जो यह कहा गया है कि विद्याभेद स्वीकार न करनेपर मन्त्रोंके भेदकी अनुपपत्ति होती है, उसका परिहार करना चाहिए। इसपर कहते हैं - यह दोष नहीं है, क्योंकि अन्य उपदेशके समान उपपत्ति होती है। जैसे ताण्डियोंके उपनिषद् के छठे अध्याय में ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ( वह आत्मा है, श्वेतकेतु! वह तू है ) इसप्रकार पिता उद्दालक द्वारा नौ वार उपदेश किये जानेपर भी विद्याका भेद नहीं है, वैसे यहाँ भी होगा। परन्तु नौ वार उपदेश किये जानेपर भी विद्याका भेद क्यों नहीं होता?

इससे नहीं होता कि उपक्रम और उपसंहारसे एक अर्थ अवगत होता है। ' भूय एव ० ' ( हे भगवन्? आप मुझे फिर समझाइये ) इसप्रकार एक ही अर्थंकी पुनः पुनः प्रतिपादनकी इच्छाका विषय होनेसे और अन्य आशङ्का के निवारणसे वार वार उपदेश उपपन्न होता है, अतः विद्याका भेद नहीं होता। वैसे ही यहाँ भी प्रश्नरूपके अभेद होनेसे विद्याका भेद नहीं है। ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( उस आत्मा से भिन्न विनाशी है ) इसप्रकार परिसमाप्तिका मी एकरूप होनेसे उपक्रम और उपसंहार एकार्थंविषयक देखनेमें आते हैं।

' यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' इसप्रकार द्वितीय प्रश्न में भी ' एव ' का प्रयोग करनेवाले ऋषि पूर्व प्रश्नगत अर्थका उत्तर प्रश्नमें अनुकर्षणकर दिखलाते हैं। पूर्वं ब्राह्मणमें कार्य - करणसे भिन्न आत्माका अस्तित्व कहा जाता है और उत्तर ब्राह्मण में उसको ही भूख आदि संसार धर्मो अतीत कहा जाता है, इसप्रकार एकार्थता उपपन्न होती है, इससे एक विद्या है।। ३६

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.३७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

व्यतिहाराधिकरणम्

3.3.37 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३७

सूत्र ३.३.३७

व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ॥ ३.३.३७ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.३७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 740

पदच्छेद — व्यतिहारः , विशिषन्ति हि इतरवत्

सूत्रार्थ — ( इतरवत् ) सर्वात्मत्व आदि गुणोंके समान ( व्यतिहारः ) यह व्यतिहार भी उपासना के लिए कहा गया है, ( हि ) क्योंकि श्रुतिको कहनेवाले ' त्वं वा महमस्मि ' इस प्रकार उमयका निर्देशक ( विशिषन्ति ) उन्हें विशिष्ट करते हैं।

शाङ्करभाष्य

यथा तद्योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम् इत्यादित्यपुरुषं प्रकृत्यैतरेयिणः समामनन्ति तथा जाबालाः त्वं वा अहमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि इति। तत्र संशयः किमिह व्यतिहारेण उभयरूपा मतिः कर्तव्या उत एकरूपैवेति। एकरूपैवेति तावदाह न हि अत्र आत्मन ईश्वरेणैकत्वं मुक्त्वा अन्यत्किंचिच्चिन्तयितव्यमस्ति यदि चैवं चिन्तयितव्यविशेषः परिकल्प्येत संसारिणश्च ईश्वरात्मत्वम् ईश्वरस्य संसार्यात्मत्वमिति तत्र संसारिणस्तावदीश्वरात्मत्वे उत्कर्षो भवेत् ईश्वरस्य तु संसार्यात्मत्वे निकर्षः कृतः स्यात्।

तस्मात् ए्ैकरूप्यमेव मतेः। व्यतिहाराम्नायस्तु एकत्वदृढीकारार्थ इत्येवं प्राप्ते प्रत्याह व्यतिहारोऽयम् आध्यानायाम्नायते इतरवत् यथा इतरे गुणाः सर्वात्मत्वप्रभृतयः आध्यानाय आम्नायन्ते तद्वत्। तथा हि विशिंषन्ति समाम्नातारः उभयोच्चारणेन त्वमहमस्म्यहं च त्वमसि इति तच्च उभयरूपायां मतौ कर्तव्यायाम् अर्थवद्भवति अन्यथा हि इदं विशेषेणोभयाम्नम् अनर्थकं स्यात् एकेनैव कृतत्वात्।

ननु उभयाम्नानस्य अर्थविशेषे परिकल्प्यमाने देवतायाः संसार्यात्मत्वापत्तेः निकर्षः प्रसज्येतेत्युक्तम् नैष दोषः ऐकात्म्यस्यैव अनेन प्रकारेणानुचिन्त्यमानत्वात्। ननु एवं सति स एव एकत्वदृढीकार आपद्येत न वयमेकत्वदृढीकारं वारयामः किं तर्हि व्यतिहारेण इह द्विरूपा मतिः कर्तव्या वचनप्रामाण्यात् नैकरूपेत्येतावत् उपपादयामः फलतस्तु एकत्वमपि दृढीभवति। यथा आध्यानार्थेऽपि सत्यकामादिगुणोपदेशे तद्गुण ईश्वरः प्रसिध्यति तद्वत्। तस्मादयमाध्यातव्यो व्यतिहारः समाने च विषये उपसंहर्तव्यो भवतीति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जैसे ' तद्योऽहं ० ' ( जो मैं हूँ वही आदित्य मण्डलस्य पुरुष है और जो वह है वह मैं हूँ ) इस प्रकार आदित्य पुरुषको प्रस्तुतकर ऐतरेयशाखा वाले कहते हैं, और ' त्वं वा ० ' ( हे देवता! तू हो मैं हूँ और मैं ही तू है ) इस प्रकार जाबाल कहते हैं। यहाँ संशय होता है कि क्या यहाँ व्यतिहार ( विशेषणविशेष्यभाव ) से उमयरूप मति करनी चाहिए अथवा एकरूप ही?

पूर्वपक्षी— कहते हैं - एकरूप ही मति करनी चाहिए, क्योंकि इस व्यतिहारमें आत्माका ईश्वरके साथ एकत्व के विना अन्य कुछ भी चिन्तनीय नहीं है। यदि जोवको ईश्वररूपता और ईश्वर में जीवरूपता इस प्रकार चिन्तन योग्य विशेषकी कल्पना की जाय तो संसारी जीवको ईश्वरात्मत्व होनेपर उसका उत्कर्ष होगा और ईश्वरको जीवात्मत्व स्वीकार करनेपर उसका अपकर्ष होगा, इसलिए मति एकरूप ही है। ' त्वं वा ' यह व्यतिहार श्रुति तो एकत्वको दृढ करने के लिए है।

सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण करते हैं - यह व्यतिहार उपासनाके लिए कहा जाता है, अन्यके समान, जैसे सर्वात्मत्व आदि अन्य गुण उपासना के लिए कहे गये हैं, वैसे यह व्यतिहार भी कहा गया है। क्योंकि श्रुति कहनेवाले ' स्व महमस्म्यहं च त्वमसि ' इसी प्रकार दोनों के उच्चारणसे उन्हें इस तरह विशिष्ट करते हैं। और वह उमयोच्चारण उभयरूपसे मति करनेपर सार्थक होता है, नहीं तो इस विशेषसे उभय श्रुति अनर्थक होगी, क्योंकि एकके उच्चारणसे ही एकरूप मति सिद्ध होगी।

परन्तु यह कहा गया है कि उमय श्रतिमें अर्थ विशेषकी कल्पना की जानेपर देवतामें संसारी जीवात्मत्व आजानेसे अपकर्षत्व प्रसक्त होगा। यह दोष नहीं है, क्योंकि एक स्वरूपताका ही इस प्रकारसे अनुचिन्तन है। परन्तु ऐसा होनेपर वही एकत्वका दृढीकरण प्रसक्त होगा। हम एकत्वके दृढीकरणका वारण नहीं करते, किन्तु यहाँ श्रुतिवचन प्रामाण्यसे व्यतिहारसे द्विरूप मति करनी चाहिए एकरूप नहीं, केवल यही हम उपपादन करते हैं। फलत : - अर्थतः तो एकत्व भी दृढ होता है।

जैसे सत्यकामत्व आदि गुणोंका उपदेश आध्यानके लिए होनेपर भी उन गुणोंवाला ईश्वर प्रसिद्ध होता है, वैसे यहां भी समझना चाहिए। इसलिए यह व्यतिहार ध्यान करने योग्य है और समान विषयमें उपसंहार करने योग्य है॥ ३७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जीव और ईश्वर दोनोंके परस्पर विशेषण - विशेष्यभावको व्यतिहार कहा जाता है। यह व्यतिहार श्रुति प्रतिपादित होने से और ' उकृष्टदृष्टिर्निकृष्टे कृता फलवती ' ' निकृष्टमें की गई उत्कृष्ट दृष्टि फलवाली होती है ' इस न्यायसे संशय होनेपर उक्त न्यायसे जीवमें ईश्वर बुद्धि करनी चाहिए। पूर्वपक्ष में लाघव फल है, सिद्धान्तमें उमयश्रुति सार्थक है।

सिद्धान्ती - " त्वं वा महमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि ' इन दोनोंका अनुवादकर इतरेतर भावका विधान होता है, अतः दोनोंमें दो प्रकार के चिन्तनका विधान किया जाता है। यदि एक बुद्धिका विधान होता तो ' तत्त्वमलि ' के समान ' योऽसौ सोऽहम् ' ( जो वह है वह मैं हूँ ) ' त्वमहमस्मि ' इस प्रकार एक उच्चारण ही पर्याप्त था, तो पुनः ' तद्योऽहं सोऽसौ ' ( जो मैं हूँ सो वह है ) ' अहं त्वमसि ' ( मैं तू है ) यह उच्चारण व्यर्थ होगा, अतः दोनों उच्चारणोंकी सार्थकता के लिए दो मति करनी चाहिए। संदिग्ध अर्थ में तो उक्त न्याय चरितार्थ हो सकता है, परन्तु यहाँ तो श्रुति प्रमाण है, अतः अन्योन्यात्मत्वका ध्यान करना चाहिए। ब्रह्म में मनोमयत्व आदिके समान, जीवात्मत्वका ध्यानके लिए आरोप होनेपर भी अपकर्षत्व प्रसक्ता नहीं होता। जहाँ उमय मति होती है, वहाँ एकत्व अर्थसे सिद्ध होता है। इसलिए अहं ग्रहोपासना में इस व्यतिहारका उपसंहार करना चाहिए॥ ३७

सत्याद्यधिकरणम्

3.3.38 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३८

सूत्र ३.३.३८

सैव हि सत्यादयः ॥ ३.३.३८ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.३८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 742

पदच्छेद — सा , एव , हि , सत्यादयः

सूत्रार्थ — ( सैंव ) सत्यविद्या एक ही है, ( हि ) क्योंकि ' तद्यत्तत्सत्यम् ' इसमें प्रकृत उपास्य हिरण्यगर्भका आकर्षण है, अतः विद्याका भेद नहीं हैं, इसलिए सभी ( सत्यादयः ) सत्य आदि गुणोंका अन्यत्र भी उपसंहार होना चाहिए।

शाङ्करभाष्य

स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्म इत्यादिना वाजसनेयके सत्यविद्यां सनामाक्षरोपासनां विधाय अनन्तरमाम्नायते तद्यत्तत्सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः इत्यादि। तत्र संशयः किं द्वे एते सत्यविद्ये किं वा एकैवेति। द्वे इति तावत्प्राप्तम् भेदेन हि फलसंयोगो भवति जयतीमाल्ोकान् इति पुरस्तात्हन्ति पाप्मानं जहाति च इत्युपरिष्टात्। प्रकृताकर्षणं तु उपास्यैकत्वादित्येवं प्राप्तेब्रूमः एकैवेयं सत्यविद्येति कुतःतद्यत्तत्सत्यम् इति प्रकृताकर्षणात्। ननु विद्याभेदेऽपि प्रकृताकर्षणम् उपास्यैकत्वादुपपद्यत इत्युक्तम् नैतदेवम् यत्र तु विस्पष्टात् कारणान्तरात् विद्याभेदः प्रतीयते तत्र एतदेवं स्यात् अत्र तु उभयथा संभवेतद्यत्तत्सत्यम् इति प्रकृताकर्षणात् पूर्वविद्यासंबद्धमेव सत्यम् उत्तरत्र आकृष्यत इति एकविद्यात्वनिश्चयः। यत्पुनरुक्तम् फलान्तरश्रवणाद्विद्यान्तरमिति अत्रोच्यते तस्योपनिषदहः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' स यो हैतं ० ' ( जो भी इस महत्, यक्ष - पूज्य प्रथम उत्पन्न हुएको ' यह सत्य ब्रह्म है ' ऐसा जानता है वह इन लोकोंको जीत लेता है ) इत्यादिसे वाजसनेयकमें नाम अक्षरको उपासनाके साथ सत्यविद्याका विधानकर अनन्तर ' तद्यत्तत्सत्यमसौ ० ' ( वह जो सत्य है वह यह आदित्य है। जो इस आदित्य मण्डल में पुरुष है और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है ) इत्यादि श्रुति है 1। उसमें संशय होता है कि क्या ये दो सत्य दिद्याएँ हैं अथवा एक ही है?

पूर्वपक्षी - दो हैं, ऐसा प्राप्त होता है। क्योंकि ' जयतीमाँल्लोकान् ' ( वह इन लोकोंको जीत लेता है अर्थात् प्राप्त करता है ) इस प्रकार पूर्वकी उपासना में और ' हन्ति पाप्मानं ० ' ( जो ऐसा जानता है वह पापका नाश करता है और उसे त्याग देता है ) ऐसा अन्तिम उपासनामें फलका संयोग भिन्नरूपसे है। प्रकृतका आकर्षण तो उपास्यके एकत्व से है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह सत्य विद्या एक ही है, किससे? इससे कि ' तद्यत्तत्सत्यम् ' इस प्रकार प्रकृतका आकर्षण है।

परन्तु ऐसा कहा गया है कि विद्याका भेद होनेपर भी प्रकृतका आकर्षण उपास्यके एक होनेसे उपपन्न होता है। किन्तु ऐसा नहीं, जहाँ तो विस्पष्ट अन्य कारण ( प्रकरण ) से विद्याका भेद प्रतीत होता है, वहाँ प्रकृतका आकर्षण उपास्यके एक होनेसे भले ही हो, परन्तु यहाँ तो विद्यांका भेद और अभेद दोनों प्रकारोंसे संभव होनेपर ' तद्यत्तत्सत्यम् ' इस प्रकारका प्रकृतका आकषंण होने से पूर्व विद्या से सम्बद्ध सत्यका ही उत्तर विद्या में आकर्षण होता है, इससे एक विद्याका निश्चय होता है।

और जो यह कहा गया है कि अन्य फलकी श्रुति होनेसे विद्याका भेद है, उसपर कहा जाता है - उसके रहस्य नाम ' अहः ' और ' अहम् ' इसप्रकार अन्य अङ्गके उपदेशमें यह अन्य फलका श्रवण केवल स्तुतिमात्र है, अतः दोष नहीं है। किव अर्थवादसे ही फलकी कल्पना होनेपर विद्याके एकत्वमें अवयवों ( अङ्गों ) में श्रूयमाणं बहुत फलोंका मी अवयविनी विद्यामें उपसंहार होना चाहिए। इसलिए वही एक सत्य विद्या तत् तत् विशेषण से युक्त कही जाती है, अतः सत्य आदि सभी गुणोंका एक ही प्रयोग में उपसंहार होना चाहिए।

दूसरे कई टीकाकार इस सूत्रमें वाजसनेयियों का यह वाक्य अक्षिपुरुष और आदित्यपुरुष विषयक है, और छान्दोग्यमें ' अथ य एषो ० ' ( तथा यह जो आदित्य मण्डलके अन्तर्गत सुवर्णमय - सा पुरुष दिखाई देता है ) ' अथ एषो ० ' ( जो यह अक्षिमें पुरुष दिखाई देता है ) इन दोनों वाक्योंका उदाहरण देकर वही यह अक्षिपुरुष और आदित्यपुरुष विषयक विद्या दोनों स्थलोंमें एक ही है, ऐसा मानकर वाजसनेयियोंके उपसंहार योग्य सत्य च्छान्दोग्ये हृदयाकाशस्य सत्यका मत्वादिगुणजातमुपलभ्यते, तदितरत्र वाजसनेयके ' स व्रा एष महाजन आत्मा ' इत्यत्र संबध्यते, यच्चवाजसनेयके वशित्वाद्युपलभ्यते तदपीतरत्र आदि गुणोंका छन्दोगोंको उपसंहार करना चाहिए, ऐसा मानते हैं।

परन्तु यह ठीक ज्ञात नहीं होता, क्योंकि छान्दोग्यमें ज्योतिष्टोम कर्म सम्बन्धी यह उद्गीथाश्रित विद्या ज्ञात होती है, कारण कि उसमें आदि, मध्य और अन्तमें कर्म सम्बन्धी चिह्न है - ' इयमेवग्निः सामः ' ( यह पृथिवी ऋक् और अन्नि साम है ) यह उपक्रममें, ‘ तस्य च ० ' ( ऋक् और साम उसके पर्व हैं, इसीसे वह देव उद्गीथरूप है ) यह मध्यमें और ' य एवं विद्वान् ० ' ( जो इसप्रकार जाननेवाला होकर साम गान करता है ) इसप्रकार उपसंहारमें है। किन्तु इसप्रकार वाजसनेयकमें कोई कर्म सम्बन्धी चिह्न नहीं है।

इसलिए यहाँ उपक्रमके भेदसे विद्याका भेद होनेपर गुणोंकी व्यवस्था ही युक्त है॥ ३८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # ' सत्यम् ' यह नाम ' तत्, यत्, तत् ' इन तीन अक्षरोंका है। प्रथम और अन्तिम अक्षर सत्य हैं और मध्य अक्षर अनृत है। वह दोनों ओरसे सत्यके साथ संपुटित होने से सत्य प्रायः ही होता है, ऐसी सत्यविद्या अङ्गरूपसे नाम अक्षरकी उपासना की गई है। जो वह पूर्वमें कहा गया हृदयाख्य है, वह पूर्वोक्त यक्षत्व आदि गुणवाला ब्रह्म है, वह आदित्य मण्डलमें अक्षिमें जो पुरुष है वह है। उसके ‘ अहः ' और ' अहम् ' दो रहस्य नाम जाननेसे पाप क्षयरूप फल होता है। यहाँ पूर्ववाक्यमें और उत्तरवाक्यमें फल भिन्न - भिन्न है। इस प्रकार श्रुति प्रमाण होनेसे और पूर्वं वाक्यमें जो प्रकृत है उसका उत्तर वाक्यमें आकर्षण होनेसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। पूर्वपक्ष में गुणोंकी व्यवस्थासे अनुष्ठान हैं, सिद्धान्त में एक अनुष्ठान है।

* सिद्धान्ती – केवल विशेष्य ब्रह्मका आकर्षण ठीक नहीं है, क्योंकि ' तत्, यत्, तत् ' इन सर्वनामों से पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त ब्रह्मका आकर्षण कर आदित्यस्थान और अक्षिस्थान आदि गुणों का विधान है। इसलिए उपास्यके एक होनेसे विद्या एक है।

* इसप्रकार दोनों शाखाओंमें उपक्रमके भेदसे विद्याका भेद है। इसलिए अङ्गभूत विद्यासे सत्य विद्या - हिरण्यगर्भ विद्या भिन्न होने से सत्य व्यादि गुणोंका उपसंहार नहीं है, यह एक देशीका आशय है। सिद्धान्त तो पूर्वमें कहा गया है॥ ३८

कामाद्यधिकरणम्

3.3.39 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३९

सूत्र ३.३.३९

कामादीतरत्र तत्र चाऽयतनादिभ्यः ॥ ३.३.३९ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.३९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 744

पदच्छेद — कामादि , इतरत्र , तत्र , च , आयतनादिभ्यः

सूत्रार्थ — ( कामादि ) सत्यकामत्व आदि गुण समूहका ( इतरत्र ) अन्यत्र - बृहदारण्यकमें सर्व वशित्व आदि गुण समूहका भी ( तत्र ) छान्दोग्यमें उपसंहार होना चाहिए,

शाङ्करभाष्य

अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः इति प्रस्तुत्य छन्दोगा अधीयते एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः इत्यादि तथा वाजसनेयिनः स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्शेते सर्वस्य वशी इत्यादि। तत्र विद्यैकत्वं परस्परगुणयोगश्च किं वा नेति संशये विद्यैकत्वमिति। तत्रेदमुच्यते कामादीति सत्यकामादीत्यर्थः यथा देवदत्तो दत्तः सत्यभामा भामेति।

यदेतत् छान्दोग्ये हृदयाकाशस्य सत्यकामत्वादिगुणजातमुपलभ्यते तदितरत्र वाजसनेयकेस वा एष महानज आत्मा इत्यत्र संबध्येत यच्च वाजसनेयके वशित्वादि उपलभ्यते तदपि इतरत्र छान्दोग्येएष आत्मापहतपाप्मा इत्यत्र संबध्येत कुतः आयतनादिसामान्यात् समानं हि उभयत्रापि हृदयमायतनम् समानश्च वेद्य ईश्वरः समानं च तस्य सेतुत्वं लोकासंभेदप्रयोजनम् इत्येवमादि बहुसामान्यं दृश्यते।

ननु विशेषोऽपि दृश्यते छान्दोग्ये हृदयाकाशस्य गुणयोगः वाजसनेयके तु आकाशाश्रयस्य ब्रह्मण इति नदहर उत्तरेभ्यः इत्यत्र च्छान्दोग्येऽपि आकाशशब्दं ब्रह्मैवेति प्रतिष्ठापितत्वात्। अयं तु अत्र विद्यते विशेषः सगुणा हि ब्रह्मविद्या छान्दोग्ये उपदिश्यते अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामान् इत्यात्मवत् कामानामपि वेद्यत्वश्रवणात् वाजसनेयके तु निर्गुणमेव ब्रह्म उपदिश्यमानं दृश्यते अथ उर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहिअसङ्गो ह्ययं पुरुषः इत्यादिप्रश्नप्रतिवचनसमन्वयात्।

वशित्वादि तु स्तुत्यर्थमेव गुणजातं वाजसनेयके संकीर्त्यते तथा च उपरिष्टात्स एष नेति नेत्यात्मा इत्यादिना निर्गुणमेव ब्रह्म उपसंहरति। गुणवतस्तु ब्रह्मण एकत्वात् विभूतिप्रदर्शनाय अयं गुणोपसंहारः सूत्रितः नोपासनाय इति द्रष्टव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' अथ यदिदम ० ' ( अब इस ब्रह्मपुरके मीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है ) इसप्रकार उपक्रम कर छन्दोग ' एष आत्मा ० ' ( यह आत्मा धर्माधर्मसे शून्य, जराहीन, मृत्युरहित, शोकातीत, भोजनेच्छारहित, पिपासा रहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है ) इत्यादि पाठ करते हैं।

उसीप्रकार वाजसनेयी ' स वा एष महानज ० ' ( वह यह महान् अजन्मा आत्मा जो यह प्राणों में विज्ञानमय है, जो यह हृदयमें आकाश है उसमें शयन करता है, वह सबको वश में रखनेवाला है ) इत्यादि अध्ययन करते हैं। उनमें विद्याका एकत्व और परस्पर गुणों का योगउपसंहार है अथवा नहीं? ऐसा संशय होनेपर विद्या एक है, यह सिद्धान्त है। उसपर यह कहते हैं - ' कामादि ' सत्यकाम आदि, ऐसा अर्थ है। जैसे कि ' देवदत्त ' ' दत्त ' कहा जाता है और सत्यभामा मामा कही जाती है।

छान्दोग्य में हृदयाकाशके जो यह सत्यकामत्व आदि गुण समूह उपलब्ध होता है वह अन्यत्र ' स वा एष महानज आत्मा ' इस वाजसनेयकमें सम्बद्ध होता है और जो वाजसनेयक में वशित्व आदि गुण समूह उपलब्ध होता है वह भी अन्यत्र - छान्दोग्यमें ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' यहाँ सम्बन्धित होता है, किससे? इससे कि दोनों में आयतन आदि समान हैं। दोनों शाखाओं में हृदय स्थान समान ही है, वेद्य ईश्वर समान है और लोक मर्यादाके असंकर प्रयोजनवाला उसका सेतुत्व समान है, इत्यादि बहुत सामान्य देखा जाता है।

परन्तु विशेष भी दिखाई देता है - छन्दोग्यमें हृदयाकाशमें गुणोंका योग है और वाजसनेयक में आकाशके आश्रय ब्रह्ममें गुणोंका योग है। ऐसा नहीं, क्योंकि ' दहर उत्तरेभ्य : ' इस सूत्रमें छान्दोग्यमें भी आकाशशब्द ब्रह्म वाचक हो है, ऐसा सिद्धान्त प्रतिष्ठापित किया गया है। परन्तु यहाँ यह विशेष विद्यमान है - छान्दोग्य में सगुण ब्रह्मविद्या उपदिष्ट है - ' अथ य ० ' ( जो यहाँ आत्मको और सत्यकामोंको जानकर परलोक जाते हैं ) इसप्रकार आत्मा के समान सत्यकामोंमें वेद्यत्वका श्रवण है।

वाजसनेयक में तो ' अत ऊर्ध्व ० ' ( अब आगे मुझे मोक्षके लिए उपदेश कीजिए ) ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' ( यह पुरुष असङ्ग है ) इत्यादि प्रश्न और प्रतिवचन के समन्वयसे निर्गुण परब्रह्म ही उपदिश्यमान दिखाई देता है। इसलिए वशित्व आदि गुण समूह तो उसकी स्तुतिके लिए वाजसने में कहा गया है। उसीप्रकार आगे भी ' स एष ० ' ( नेति नेति, ऐसा कहकर जो निरूपण किया गया है, वह यह आत्मा है ) इत्यादिसे श्रुति निर्गुण ब्रह्मका ही उपसंहार करती है।

सगुण ब्रह्मके एक होनेसे उसकी विभूति प्रदर्शनके लिए यह गुणोपसंहार सूत्रित किया गया है। उपासनाके लिए नहीं, ऐसा समझना चाहिए।। ३ ९

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.४० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

आदराधिकरणम्

3.3.40 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४०

सूत्र ३.३.४०

आदरादलोपः ॥ ३.३.४० ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 745

पदच्छेद — आदरात् , अलोपः

सूत्रार्थ — - भोजनका लोप होनेपर भी अग्निहोत्रका ( अलोपः ) लोप नहीं है, ( आदरात् ) क्योंकि ' पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात् ' इत्यादि जाबाल श्रुतिने प्राणाग्निहोत्रका आदर किया है।

शाङ्करभाष्य

छान्दोग्ये वैश्वानरविद्यां प्रकृत्य श्रूयते तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहा इत्यादि तत्र पञ्च प्राणाहुतयो विहिताः तासु च परस्तादग्निहोत्रशब्दः प्रयुक्तःय एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति इतियथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते। एवं सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते इति च।

तत्रेदं विचार्यते किं भोजनलोपे लोपः प्राणाग्निहोत्रस्य उत अलोप इति।तद्यद्भक्तम् इति भक्तागमनसंयोगश्रवणात् भक्तागमनस्य च भोजनार्थत्वात् भोजनलोपे लोपः प्राणाग्निहोत्रस्येत्येवं प्राप्ते न लुप्येतेति तावदाह कस्मात् आदरात् तथा हि वैश्वानरविद्यायामेव जाबालानां श्रुतिः पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात्।

यथा ह वै स्वयमहुत्वाग्निहोत्रं परस्य जुहुयादेवं तत् इति अतिथिभोजनस्य प्राथम्यं निन्दित्वा स्वामिभोजनं प्रथमं प्रापयन्ती प्राणाग्निहोत्रे आदरं करोति या हि न प्राथम्यलोपं सहते नतरां सा प्राथम्यवतोऽग्निहोत्रस्य लोपं सहेतेति मन्यते।

ननु भोजनार्थभक्तागमनसंयोगाद्भोजनलोपे लोपः प्रापितः न तस्य द्रव्यविशेषविधानार्थत्वात् प्राकृते हि अग्निहोत्रे पयःप्रभृतीनां द्रव्याणां नियतत्वात् इहापि अग्निहोत्रशब्दात् कौण्डपायिनामयनवत् तद्धर्मप्राप्तौ सत्याम् भक्तद्रव्यतागुणविशेषविधानार्थम् इदं वाक्यम्तद्यद्भक्तम् इति अतो गुणलोपे न मुख्यस्येत्येवं प्राप्तम् भोजनलोपेऽपि अद्भिर्वा अन्येन वा द्रव्येणाविरुद्धेन प्रतिनिधानन्यायेन प्राणाग्निहोत्रस्यानुष्ठानमिति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — छान्दोग्यमें वैश्वानर विद्याको प्रस्तुतकर ' तद्यद्भक्तं ० ' ( अत : भोजन के समय जो अन्न पहले आवे, उसका हवन करना चाहिए, उस समय वह मोक्ता जो पहली आहुति दे उसे ' प्राणाय स्वाहा ' ऐसा कहकर दे ) इत्यादि श्रुति है। उसमें पाँच प्राण आहुतिथ विहित हैं। और उनमें बागे ' य एतदेवं ० ' ५। २४।२ ) इति, ' यह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते।

एवं सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते ' ( छा ० ( जो इस - वैश्वानरको उस प्रकार जाननेवाला पुरुष अग्निहोत्र करता है ) और ' यथेह क्षुधिता वाला . ' ( जिस प्रकार इस लोक में भूखे बालक सब प्रकार माताकी उपासना करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी . इस ज्ञानीके जोजनरूप अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं कि यह भोजन कब करेगा ) इस प्रकार अग्निहोत्र शब्द प्रयुक्त है। उसपर यह विचार किया जाता है कि भोजनका लोप होनेपर क्या अग्निहोत्र होमका लोप होता है अथवा लोप नहीं होता?

परन्तु ' तद्यद्भक्तम् ' इस प्रकार अन्न आगमन सम्बन्धका श्रवण • होने से और अन्न आगमनको भोजनके लिए होनेसे भोजनका लोप होनेपर प्राणाग्नि होत्रका लोप होना चाहिए? ऐसा प्राप्त होनेपर पूर्वपक्षी कहते हैं- प्राणाग्निहोत्रका लोप नहीं होना चाहिए, किससे? इससे कि उसका श्रुतिमें आदर है।

उसी प्रकार वैश्वानरविद्या में जाबालोंकी ' पूर्वोऽतिथिभ्यो ० ' ( उसको अतिथियोंसे पूर्व भोजन करना चाहिए, जैसे वह अपना अग्निहोत्र होम न कर अन्यका अग्निहोत्र होम करे, वैसे ही वह हैं ) यह श्रुति अतिथि भोजनकी प्रथमताकी निन्दाकर स्वामी भोजनको प्रथम प्राप्त कराती हुई प्रणाग्निहोत्र होममे आदर करती है, क्योंकि जो श्रुति प्रथमताका लोप नहीं सह सकती ऐसे प्रथमतावाले अग्निहोत्रका लोप तो बिल्कुल नही सह सकेगी, ऐसा माना जाता है।

परन्तु भोजन के लिए अन्नके आगमनका प्राणाग्निहोत्रके साथ सम्बन्ध होनेसे भोजन लोप होनेपर उसका लोप प्राप्त है? नहीं, क्योंकि वह द्रव्य विशेषके विधानके लिए है। प्राकृत अग्निहोत्र में दूध आदि द्रव्योंके नियत होनेसें यहाँ मी अग्निहोत्र शब्दसे कुण्डपायियोंके अयनके समान उसके धर्मकी प्राप्ति होनेपर अन्न रूप द्रव्यके एकतारूप गुण विशेषके विधानके लिए ' तद्यद्भक्तम् ' यह वाक्य है। इसलिए गुणके लोप होनेपर मुख्यका लोप नहीं है, ऐसा प्राप्त हुआ।

भोजनका लोप होनेपर भी जलसे अथवा अविरुद्ध अन्य द्रव्यसे प्रतिनिधि न्याय से प्राणाग्निहोत्रका अनुष्ठान है॥ ४०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे कुण्डपायियों के सत्रगत ' मासमग्निहोत्रं जुहोति ' इस मास अग्निहोत्र होममें नित्य अग्निहोत्र वाचक गौण अग्निहोत्रशब्दसे नित्य अग्निहोत्रके धर्म पयः, दधि द्रव्य आदि अतिदेशसे प्राप्त होते हैं, वैसे यहाँ भी प्राणाहुति में अग्निहोत्र शब्दके बलसे पयः, दधि द्रव्य आदि उत्सगंसे प्राप्त होनेपर भोजनार्थं अन्न द्रव्यकी विधिसे उसका अपवाद किया जाता है, अतः अन्न विधिके अपवादार्थक होनेसे अन्नका लोप होनेपर मुख्य अग्निहोत्रका लोप नहीं होता, क्योंकि अपवादके अभावमें उत्सगंसे प्राप्त पय आदि द्रव्यसे अग्निहोत्रकी निष्पत्ति संभव है। ' गुणलोपे न मुख्यस्य ' ( अङ्गके लोप होनेपर मुख्यका लोप नहीं होता ) यह जैमिनि सूत्र है। आरब्ध नित्य आदि कर्म अवश्य अनुष्ठेय होते हैं। यदि उनमें श्रुत द्रव्यकी प्राप्ति न हो तो प्रतिनिधि द्रव्यसे भी कर्म कर्तव्य है। जैसे श्रुत कुशाके अभाव में शरसे कर्म किया जाता है, यह प्रतिनिधि न्याय है। अतः मोजनके लोप होनेपर मी अन्य पय आदि द्रव्यसे प्राणाग्निहोत्रका अनुष्ठान करना युक्त है। पूर्वपक्ष में भोजन लोप होनेपर भी अन्य द्रव्यसे प्राणाग्निहोत्रका अनुष्ठान है, सिद्धान्तमें उसका लोप है।। ४०

3.3.41 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४१

सूत्र ३.३.४१

उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ३.३.४१ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 747

पदच्छेद — उपस्थिते , अतः , तद्वचनात्

सूत्रार्थ — ( उपस्थिते ) भोजन द्रव्यके उपस्थित होनेपर ( अतः ) इसी प्रथम प्राप्त भोजन द्रव्यसे प्राणाग्निहोत्र करना चाहिए, ( तद्वचनात् ) क्योंकि ' तद्यद्भक्तम् ' इत्यादि वाक्य है, और आदर वचन तो भोजन प्राप्ति दशाको लेकर है।

शाङ्करभाष्य

उपस्थिते भोजने अतः तस्मादेव भोजनद्रव्यात् प्रथमोपनिपतितात् प्राणाग्निहोत्रं निर्वर्तयितव्यम् कस्मात् तद्वचनात् तथा हि तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयम् इति सिद्धवद्भक्तोपनिपातपरामर्शेन परार्थद्रव्यसाध्यतां प्राणाहुतीनां विदधाति। ताः अप्रयोजकलक्षणापन्नाः सत्यः कथं भोजनलोपे द्रव्यान्तरं प्रतिनिधापयेयुः।

न च अत्र प्राकृताग्निहोत्रधर्मप्राप्तिरस्ति कुण्डपायिनामयने हिमासमग्निहोत्रं जुहोति इति विध्युद्देशगतोऽग्निहोत्रशब्दः तद्वद्भावं विधापयेदिति युक्ता तद्धर्मप्राप्तिः इह पुनः अर्थवादगतोऽग्निहोत्रशब्दः न तद्वद्भावं विधापयितुमर्हति तद्धर्मप्राप्तौ च अभ्युपगम्यमानायाम् अग्न्युद्धरणादयोऽपि प्राप्येरन् न च अस्ति संभवः अग्न्युद्धरणं तावत् होमाधिकरणभावाय न च अयम् अग्नौ होमः भोजनार्थताव्याघातप्रसङ्गात् भोजनार्थोपनीतद्रव्यसंबन्धाच्च आस्य एव एष होमः तथा च जाबालश्रुतिःपूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात् इति आस्याधारामेव इमां होमनिर्वृत्तिं दर्शयति अत एव च इहापि सांपादिकान्येवाग्निहोत्राङ्गानि दर्शयति उर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः इति वेदिश्रुतिश्चात्र स्थण्डिलमात्रोपलक्षणार्था द्रष्टव्या मुख्याग्निहोत्रे वेद्यभावात् तदङ्गानां च इह संपिपादयिषितत्वात् भोजनेनैव च कृतकालेन संयोगात् न अग्निहोत्रकालावरोधसंभवः एवमन्येऽपि उपस्थानादयो धर्माः केचित्कथंचित् विरुध्यन्ते।

तस्माद्भोजनपक्ष एव एते मन्त्रद्रव्यदेवतासंयोगात् पञ्च होमा निर्वर्तयितव्याः। यत्तु आदरदर्शनवचनम् तत् भोजनपक्षे प्राथम्यविधानार्थम् न ह्यस्ति वचनस्य अतिभारः न तु अनेन अस्य नित्यता शक्यते दर्शयितुम्। तस्मात् भोजनलोपे लोप एव प्राणाग्निहोत्रस्येति।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.३.४२ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ४ ' तद्धोमीयम् ' यहां ' तत् ' शब्दसे भोजन के लिए जो सिद्ध अन्न है उसका आश्रयकर मुखगत होमका विधान है। इसलिए प्रकृत अन्नका ' तत् ' पदसे परामर्शकर भोजन के लिए प्राप्त द्रव्यसे

१. उद्देश्याभावे सत्युपादेयस्याप्रवृत्तेर्मोजनार्थ हव्य लोपे लोप एव प्राणाग्निहोत्रस्य। ' प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा ' इत्यादि पाँच आहुतियाँ सिद्ध होती हैं। भोजनके लोप होनेपर उनका भी लोप ही होता है, इससे ये बाहुतियाँ अन्य द्रव्यका आक्षेप नहीं करतीं। जैसे क्रतुसे प्रयुक्त अप् आनयनके आश्रित गोदोहन पात्रका क्रतुके लोप होनेपर लोप ही होता है।

aara - face अग्निहोत्र के धर्मोकी प्राप्ति न होनेसे ही प्राणाग्निहोत्र में कल्पना से अग्निहोत्रके अङ्गोंका संपादन किया गया है, अन्यथा संपादन व्यर्थ हो जायगा। परन्तु जिन श्रुति और स्मृतियों में स्वामी ( उपासक ) का भोजनकाल अतिथि भोजनकालके पश्चात् विहित है, वह ' पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात् ' इस वचनसे कैसे बाधित होगा? इस विशेषवाक्य से सामान्यवाक्य वाधित होता है, क्योंकि विशेष वचनको सामान्य वचनके बांध में कोई मार नहीं है। सामान्य वचन उपासकसे भिन्न मोक्ता के लिए है। इस प्राथभ्यवचनसे प्राणाग्निहोत्रकी नित्यता सिद्ध नहीं होती। प्राण उपासकको भोजन प्राप्त होनेपर प्राथम्यके अर्थमें आदर होनेसे आदर शब्द अन्यथासिद्ध है। इससे यह शिद्ध हुआ कि भोजनके लोप होनेपर प्राणाग्निहोत्रका लोप ही होता है॥ ४१

तन्निर्धारणाधिकरणम्

3.3.42 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४२

सूत्र ३.३.४२

तन्निर्धारणानियमस्तद्दृष्टेः पृथग्घ्यप्रतिबन्धः फलम् ॥ ३.३.४२ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 748

पदच्छेद — तन्निधारणा नियमः , तद्दृष्टेः , पृथक् , हि , अप्रतिबन्धः फलम्

सूत्रार्थ — ( तन्निर्धारणानियमः ) कर्माजी के आश्रित उपासनाओं का नित्यके समान अनुष्ठान नहीं है, क्योंकि यह अनियम ( तद्दृष्टे : ) ' तेनोमी कुरुतः ' इत्यादि श्रुतिमें प्रतिपादित है। ( पृथग्य प्रतिबन्धः फलम् ) उन उपासनाओंका कर्मफलसे पृथक् अप्रतिबन्ध फल विशेष उपलब्ध होता है। अग्निके सदृश धर्मोके स्वीकार करनेपर ] व्याघात प्रसङ्ग होगा, इसलिए भोजनार्थ प्राप्त द्रव्यके साथ सम्बन्ध होनेसे मुखमें ही यह होम होता है।

उसी प्रकार ' पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात् ' यह जाबाल श्रुति भी मुख में ही इस होमकी निष्पत्ति दिखलाती है। इसीसे यहाँ भी कल्पनासे संपादन किये गये अग्निहोत्रके अङ्गोंको ' उर एव ० ' ( इस वैश्वानर उपासकका वक्षःस्थल वेदी है, लोभ दभं हैं, हृदय गापंत्याग्नि है, म अन्वाहायचन ( दक्षिणाग्नि ) और मुख आहवनीय अग्नि है ) यह श्रुति दिखलाती है।

यहाँ प्राणानिहोत्र में वेदीकी श्रुति स्थण्डिलमात्र उपलक्षणार्थक समझनी चाहिए, क्योंकि मुख्य अग्निहोत्रमें बेदीका अभाव है और प्राणाग्निहोत्र में उसके अङ्गोंका संपादन करना अभीष्ट है। भोजनके द्वारा ही निश्चित होनेवाले कालके साथ [ प्राणाग्निहोत्रका ] सम्बन्ध होनेसे मुख्य अग्निहोत्र के कालके साथ अवरोध सम्भव नहीं है। इसी प्रकार उपस्थान आदि अन्य भी कई एक धर्म कथंचित् विरुद्ध होते हैं। इसलिए मन्त्र, द्रव्य और देवताके सम्बन्धसे भोजन पक्षमें ये पाँच होम निष्पन्न होने चाहिए।

ओर जो आदरदर्शन वचन है, वह तो भोजन पक्षमें प्रथमता विधान करनेके लिए है। इसमें वचनका कोई मार नहीं है, क्योंकि इस ( प्रथमतावचन ) से इस प्राणाग्निहोत्रकी नित्यता नहीं दिखाई जा सकती।

शाङ्करभाष्य

सन्ति कर्माङ्गव्यपाश्रयाणि विज्ञानानि ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत इत्येवमादीनि। किं तानि नित्यान्येव स्युः कर्मसु पर्णमयीत्वादिवत् उत अनित्यानि गोदोहनादिवदिति विचारयामः।

किं तावत्प्राप्तम् नित्यानीति कुतः प्रयोगवचनपरिग्रहात् अनारभ्याधीतान्यपि हि एतानि उद्गीथादिद्वारेण क्रतुसंबन्धात् क्रतुप्रयोगवचनेनैव अङ्गान्तरवत् संस्पृश्यन्ते यत्तु एषां स्ववाक्येषु फलश्रवणम् आपयिता ह वै कामानां भवति इत्यादि तद्वर्तमानापदेशरूपत्वादर्थवादमात्रमेव अपापश्लोकश्रवणादिवत् न फलप्रधानम् तस्मात् यथायस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं श्रृणोति इत्येवमादीनाम् अप्रकरणपठितानामपि जुह्वादिद्वारेण क्रतुप्रवेशात् प्रकरणपठितवत् नित्यता एवमुद्गीथाद्युपासनानामपीत्येवं प्राप्ते ब्रूमः तन्निर्धारणानियम इति।

यान्येतानि उद्गीथादिकर्मगुणयाथात्म्यनिर्धारणानि रसतमः आप्तिः समृद्धिः मुख्यप्राणः आदित्यः इत्येवमादीनि नैतानि नित्यवत् कर्मसु नियम्येरन् कुतः तद्दृष्टेः तथा हि अनित्यत्वमेवंजातीयकानां दर्शयति श्रुतिः तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद इत्यविदुषोऽपि क्रियाभ्यनुज्ञानात् प्रस्तावादिदेवताविज्ञानविहीनानामपि प्रस्तोत्रादीनां याजनाध्यवसानदर्शनात् प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसितां चेदविद्वानुद्गास्यसितां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि इति च।

अपि च एवंजातीयकस्य कर्मव्यपाश्रयस्य विज्ञानस्य पृथगेव कर्मणः फलम् उपलभ्यते कर्मफलसिद्ध्यप्रतिबन्धः तत्समृद्धिः अतिशयविशेषः कश्चित् तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद।

नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति इति तत्रनाना तु इति विद्वदविद्वत्प्रयोगयोः पृथक्करणात्वीर्यवत्तरम् इति च तरप्प्रत्ययप्रयोगात् विद्याहीनमपि वीर्यवदिति गम्यते तच्च अनित्यत्वे विद्याया उपपद्यते नित्यत्वे तु कथं तद्विहीनं कर्म वीर्यवदित्यनुज्ञायेत सर्वाङ्गोपसंहारे हि वीर्यवत्कर्मेति स्थितिः। तथा लोकसामादिषु प्रतिनियतानि प्रत्युपासनं फलानि शिष्यन्ते कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च इत्येवमादीनि।

न चेदं फलश्रवणम् अर्थवादमात्रं युक्तं प्रतिपत्तुम् तथा हि गुणवाद आपद्येत फलोपदेशे तु मुख्यवादोपपत्तिः प्रयाजादिषु तु इतिकर्तव्यताकाङ्क्षस्य क्रतोः प्रकृतत्वात् तादर्थ्ये सति युक्तं फलश्रुतेरर्थवादत्वम्।

तथा अनारभ्याधीतेष्वपि पर्णमयीत्वादिषु न हि पर्णमयीत्वादीनामक्रियात्मकानाम् आश्रयमन्तरेण फलसंबन्धोऽवकल्पते गोदोहनादीनां हि प्रकृताप्प्रणयनाद्याश्रयलाभादुपपन्नः फलविधिः तथा बैल्वादीनामपि प्रकृतयूपाद्याश्रयलाभादुपपन्नः फलविधिः न तु पर्णमयीत्वादिषु एवंविधः कश्चिदाश्रयः प्रकृतोऽस्ति वाक्येनैव तु जुह्वाद्याश्रयतां विवक्षित्वा फलेऽपि विधिं विवक्षतो वाक्यभेदः स्यात्। उपासनानां तु क्रियात्मकत्वात् विशिष्टविधानोपपत्तेः उद्गीथाद्याश्रयाणां फले विधानं न विरुध्यते।

तस्मात् यथा क्रत्वाश्रयाण्यपि गोदोहनादीनि फलसंयोगादनित्यानि एवमुद्गीथाद्युपासनान्यपि इति द्रष्टव्यम्। अत एव च कल्पसूत्रकारा नैवंजातीयकान्युपासनानि क्रतुषु कल्पयांचक्रुः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसपर उत्तर कहते हैं-

सिद्धान्ती – भोजनके उपस्थित होनेपर उस प्रथम प्राप्त भोजन द्रव्यसे ही अग्निहोत्र सम्पन्न करना चाहिए, क्योंकि उसका वचन है। जैसे कि ' तद्यद्भक्तं ० ' ( अतः जो अन्न- भोजन प्रथम प्राप्त हो उसका हवन करना चाहिए ) यह श्रुति सिद्धवत् प्रकृत प्राप्त मक्त भोजनका जो आगमन उसके ( तत् शब्द से ) परामर्शसे परार्थं ( भोजनार्थ - तृप्ति के लिए ) द्रव्यसे साध्य प्राण आहुतियोंका विधान करती है।

वे आहुतियां तृप्तिरूप अर्थकी अप्रयोजक ' - प्रयोजक लक्षण ( आक्षेपत्व ) के अभावसे युक्त होती हुई मोजन के लोप होनेपर किस प्रकार अन्य द्रव्यका प्रतिनिधापन ( प्रतिनिधिन्यायसे आक्षेप ) कर सकेंगी। और यहाँ प्राकृत अग्निहोत्र धर्मकी प्राप्ति नहीं है। कुण्डपायियों के अयनमें तो ' मासपर्यन्त व्यग्निहोत्र होम करे ' इस विधिके उद्देश्य में प्राप्त जो अग्निहोत्र शब्द है वह ' तद्वद्भाव ' प्राकृत अग्निहोत्रके समान भाव - धर्मं विधान कराएगा, इससे उसमें उसके धर्मको प्राप्ति युक्त है।

परन्तु यहां प्राणाग्नि होत्र में अर्थवाद गत अग्निहोत्र शब्द प्रकृत अग्निहोत्रके सहय धर्मोका निधान नहीं करा सकता। यदि प्रकृत अग्निहोत्रके धर्मकी प्राप्ति स्वीकार की जाय तो उस अग्निके उद्धरण आदि भी प्राप्त होने चाहिए। किन्तु यहाँ ( प्राणाग्निहोत्र में ) उनका संभव नहीं है, क्योंकि अग्निका उद्धरण होमके अधिकरणत्वके लिए है, और यह द्रव्यरूप होम प्रकृत अग्निमें नहीं होता, क्योंकि भोजनके लिए हैं, उसका [ प्रकृत

' ओमित्येतदक्षरमु ० ' ( उद्गीथके अवयव इस ॐ अक्षरको उपासना करनी चाहिए ) इत्यादि कर्म- ज्योतिष्टोम आदिके अङ्गोंका आश्रयण करनेवाली उपासनाएँ हैं। क्या ये उपासनाएँ कर्मोंमें पर्णमयीत्व आदिके समान नित्य हैं अथवा गोदोहन आदिके समान अनित्य हैं? इस विषयपर हम विचार करते हैं, तो क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी -- नित्य हैं। किससे? इससे कि प्रयोग वचनका परिग्रह है।

क्रतुके प्रकरण में न पठित होनेवाली इन उपासनाओंका उद्गीथ आदि द्वारा क्रतुके साथ सम्बन्ध होने से क्रतु प्रयोग वचनसे हो अन्य अङ्गके समान ये भी सम्बन्धवाली होती हैं। जो इन विज्ञानोंका अपने वाक्यों में ' आपयिता ह वै ० ' ( जो विद्वान् उपासक इस प्रकार इस उद्गीथरूप अक्षरकी उपासना करता है वह ( यजमानकी ) ( सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करानेवाला होता है ) इत्यादि फलका श्रवण है।

वह फल श्रवण वाक्यमें वर्तमान कालका उपदेश होने से अर्थवाद मात्र ही है- : - अपापश्लोक श्रवण व्यादिके समान फल प्रधान नहीं है। इसलिए जैसे ' यस्य पर्णमयी ० ' ( जिसकी पर्णमयी ( पलायकी ) जुहू होती है वह लोकमें पाप श्लोकका श्रवण नहीं करता ) इत्यादि क्रतुके प्रकरण में अपठितोंका मी जुहू आदि द्वारा क्रतुमें प्रवेश सम्बन्ध होनेसे प्रकरण में पठितके समान नित्यत्व है, वैसे उद्गीथ आदि उपासनाओं को भी समझना चाहिए।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-- उपासना के निर्धारणका अनियम है, ' रसोंमें वह श्रेष्ठ, कामनाओं की प्राप्ति करानेवाला, समृद्धि देनेवाला, मुख्य प्राण आदित्य है ' इत्यादि उद्गीथ आदि कर्माङ्गों यथावत् स्वरूप ' रसतमत्व आदि ' का निर्धारण करनेवाली जो ये उपासनाएं हैं, वेनि कर्माङ्गों के समान [ पर्णमयीत्वके समान ] कर्मोंमें नियमित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि श्रुतिमें ऐसा ही दृष्ट है।

कारण कि इसी प्रकारकी उपासनाएँ अनित्य हैं, श्रुति दिखलाती है' तेनोभौ कुरुत : ० ' ( जो उद्गीथावयव भूत इस ॐ अक्षरको रसतमत्व आदि विशिष्ट जानता है और जो नहीं जानता है वे दोनों ही उसके द्वारा कर्म करते हैं ) इसप्रकार अविद्वान् के लिए भी कमंकी अनुज्ञा है | और ' प्रस्तोतर्या ० ' ( हे प्रस्तोता! जो देवता प्रस्ताव - भक्ति में अनुगत है यदि तू उसे विना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ) ' तां चेदविद्वानुद्गास्यति ० ' ( हे उद्गाता!

यदि तू उसे विना जाने उद्गान करेगा ) और ' तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यति ० ' ( हे प्रतिहर्ता! यदि तू उसे विना जाने प्रतिहार भक्तिका गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ) इसप्रकार प्रस्ताव आदिके देवता के विज्ञानसे रहित प्रस्तोता आदिमें याजनका निश्चय देखा जाता है।

और इसप्रकारके कर्मके आश्रित विज्ञानका कर्मफलसे पृथक् फल उपलब्ध होता है - कर्मफल सिद्धिके प्रतिबन्धसे रहित उसका कोई समृद्धिरूप अतिशय विशेष फल विज्ञानमें उपलब्ध होता है - ' तेनोमौ कुरुतो ० ' ( जो उद्गीथके अवयव भूत इस ॐ अक्षरको रसतमत्वादि विशिष्ट जानता है अथवा जो नहीं जानता वे दोनों ही उसके द्वारा कर्म करते हैं, किन्तु विद्या और अविद्या दोनों भिन्न भिन्न हैं।

जो कर्म विद्या- श्रद्धा और योग से युक्त होकर किया जाता है वही अविद्वान् कर्मसे वीर्यवत्तर - अधिक फलवाला होता है ) इस श्रुतिमें ' नाना तु ' इस शब्द से विद्वान् और अविद्वान् कृत प्रयोगोंमें पृथक्करण होनेसे ' वीर्यवत्तरम् ' इसमें तरप्रत्ययका प्रयोग होनेके कारण उपासना होन कर्म भी वीयंवत् फलवाला होता है, ऐसा ज्ञात होता है। वह विद्या अनित्य होनेपर उपपन्न होता है।

यदि विद्या नित्य हो तो उससे विहीन कर्म वीर्यवत् है, ऐसी अनुज्ञा किस प्रकार होती, क्योंकि सब अङ्गोंका उपसंहार होनेपर कमं वीर्यवत् होता है, ऐसी स्थिति है। तथा लोकदृष्टि आदिसे साम आदिकी प्रत्येक उपासना में – ' कल्पन्ते हास्मै . ' ( इससे जो इसप्रकार जाननेवाला पुरुष लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसके प्रति ऊर्ध्वं और अधोमुख लोक मोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ) इत्यादि प्रतिनियत फल उपदिष्ट हैं।

बोर यह फल श्रुति अर्थवाद मात्र समझना युक्त नहीं है, क्योंकि उसे अर्थवाद माननेपर गुणवाद प्रसक्त होगा। किन्तु फलके उपदेशमें तो मुख्यवाद उपपन्न होता है। प्रयाज आदिमें तो इतिकर्तव्यता की आङ्काक्षा रखनेवाले क्रतुके प्रकृत होनेसे प्रयाज आदि क्रतुके लिए होनेपर उनमें फल श्रुति अर्थवाद हो यह युक्त है। इसीप्रकार कर्मप्रकरणके आरम्भमें पठित न होनेवाले पर्णमयीत्व आदिमें भी फलश्रुति अर्थवाद है। अक्रियात्मक पर्णमयीत्व बादिमें आश्रयके बिना फल सम्बन्ध नहीं हो सकता।

इत्यादि सूत्र से जैमिनि मुनिने पूर्वकाण्ड में कहा है।

* वाजसनेयके - ' वदिष्याम्ये वाहमिति वाग्दधे ( बृह ० १।५।२१ ) इत्यत्राध्यात्मं वागा - किन्तु गोदोहन आदिमें तो प्रकृत जल प्रणयन आदि आश्रय लाभ होनेसे फलार्थं विधि उपपन्न है। उसीप्रकार बैल्व आदिमें भी प्रकृत यूप आदि आश्रय लाभ होनेसे फलार्थं विधि उपपन्न है, परन्तु पर्णंमयीत्व आदिमें इस प्रकारका कोई आश्रय प्रकृत नहीं है, वाक्यसे ही जुहू यादिको आश्रय कहने की इच्छाकर फलमें भी विधिकी विवक्षा करनेवालेको वाक्य भेद होगा। क्रियात्मक होनेसे उपासनाओंका विशिष्ट विधान हो सकता है, अतः उद्गीथ आदिके आश्रित इन उपासनाओंका विधान कर्म फलमें विरुद्ध नहीं है। इसलिए जैसे यज्ञके आश्रित गोदोहन आदि पृथक् फलके सम्बन्धसे अनियमित हैं, वैसे ही उद्गीथ व्यादि उपासनाएँ भी अनियमित हैं, ऐसा समझना चाहिए। अतएव - अनित्य होनेसे ही कल्पसूत्रकारोंने इस प्रकारकी उपासनाओं की क्रतुमें कल्पना नहीं की है॥ ४२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' तेनोभौ कृरुतः ' इसके भी विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है। और साम आदिमें ' यह पृथिवी ऋक् है अग्नि साम है ' इसप्रकार लोक दृष्टिरूप उपासनाओं में कर्म - समृद्धि से भिन्न लोक आदि फल श्रुति में प्रतिपादित हैं।

किव यूपके लिए प्रथम ' खादिरो यूपो भवति ' इस विधिसे ग्रुप विहित होनेके कारण क्रतुको अङ्गरूप यूपकी आङ्काक्षा नहीं है, ' बैल्वमन्नाद्यकामस्य खादिरं वीर्यकामस्य ' ( अन्नाद्य कामनावालेका बैल्वयूप और वीयंका मनावालेका खादिर यूप हो ) अतः यूपके लिए पुन : बैल्व व्यादिका विधान फलके लिए ही है। इसलिए यह फलार्थं विधि है अर्थवाद नहीं है।

इसके अतिरिक्त पणंमयीत्वको कोई प्रकृतका आश्रय नहीं है, यह जुहूको आश्रय मानें तो जुहूको प्रकृति द्रव्यकी बाङ्काक्षा होनेके कारण इसी वाक्यसे क्रतुके अङ्गरूपमें जुहूका प्रकृति द्रव्यके साथ सम्बन्ध विधेय होता है पश्चात् निराकांक्ष जुहूका आश्रयण कर उसी प्रकृति जुहू द्रव्यका फल सम्बन्ध विधेय होता है, इसप्रकार वाक्यभेद हो जायगा। और जैसे स्वयं क्रियात्मक होनेसे यागका विधान है, वैसे उपासनाओंका भी क्रियात्मक ( मानसिक क्रियारूप ) होनेसे विशिष्ट विधान युक्त है।

इसलिए उपासनाएँ गोदोहन आदिके समान अनित्य होनेसे याग आदि कर्मोंके अङ्ग नहीं हो सकतीं। पूर्वपक्ष में उपासनाएँ प्रयोग में नित्य हैं और सिद्धान्तमें अनित्य हैं॥ ४२

प्रदानाधिकरणम्

3.3.43 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४३

सूत्र ३.३.४३

प्रदानवदेव तदुक्तम् ॥ ३.३.४३ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 751

पदच्छेद — प्रदानवत् , एव , तत् , उक्तम्

सूत्रार्थ — ( प्रदानवत् ) ' यथेन्द्राय राज्ञे ' इससे उक्त इन्द्र देवताके एक होनेपर भी राजा, अधिराज आदि गुणभेद देवताका भेद होता है, वैसे एक विद्यामें मी वायु, प्राणके स्वरूप अभेद होनेपर भी आध्यात्मिक आदि अवस्था भेदसे गुणभेद है, अतः प्रयोग भेद है।

शाङ्करभाष्य

सन्ति कर्माङ्गव्यपाश्रयाणि विज्ञानानि ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत इत्येवमादीनि। किं तानि नित्यान्येव स्युः कर्मसु पर्णमयीत्वादिवत् उत अनित्यानि गोदोहनादिवदिति विचारयामः।

किं तावत्प्राप्तम् नित्यानीति कुतः प्रयोगवचनपरिग्रहात् अनारभ्याधीतान्यपि हि एतानि उद्गीथादिद्वारेण क्रतुसंबन्धात् क्रतुप्रयोगवचनेनैव अङ्गान्तरवत् संस्पृश्यन्ते यत्तु एषां स्ववाक्येषु फलश्रवणम् आपयिता ह वै कामानां भवति इत्यादि तद्वर्तमानापदेशरूपत्वादर्थवादमात्रमेव अपापश्लोकश्रवणादिवत् न फलप्रधानम् तस्मात् यथायस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं श्रृणोति इत्येवमादीनाम् अप्रकरणपठितानामपि जुह्वादिद्वारेण क्रतुप्रवेशात् प्रकरणपठितवत् नित्यता एवमुद्गीथाद्युपासनानामपीत्येवं प्राप्ते ब्रूमः तन्निर्धारणानियम इति।

यान्येतानि उद्गीथादिकर्मगुणयाथात्म्यनिर्धारणानि रसतमः आप्तिः समृद्धिः मुख्यप्राणः आदित्यः इत्येवमादीनि नैतानि नित्यवत् कर्मसु नियम्येरन् कुतः तद्दृष्टेः तथा हि अनित्यत्वमेवंजातीयकानां दर्शयति श्रुतिः तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद इत्यविदुषोऽपि क्रियाभ्यनुज्ञानात् प्रस्तावादिदेवताविज्ञानविहीनानामपि प्रस्तोत्रादीनां याजनाध्यवसानदर्शनात् प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसितां चेदविद्वानुद्गास्यसितां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि इति च।

अपि च एवंजातीयकस्य कर्मव्यपाश्रयस्य विज्ञानस्य पृथगेव कर्मणः फलम् उपलभ्यते कर्मफलसिद्ध्यप्रतिबन्धः तत्समृद्धिः अतिशयविशेषः कश्चित् तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद।

नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति इति तत्रनाना तु इति विद्वदविद्वत्प्रयोगयोः पृथक्करणात्वीर्यवत्तरम् इति च तरप्प्रत्ययप्रयोगात् विद्याहीनमपि वीर्यवदिति गम्यते तच्च अनित्यत्वे विद्याया उपपद्यते नित्यत्वे तु कथं तद्विहीनं कर्म वीर्यवदित्यनुज्ञायेत सर्वाङ्गोपसंहारे हि वीर्यवत्कर्मेति स्थितिः। तथा लोकसामादिषु प्रतिनियतानि प्रत्युपासनं फलानि शिष्यन्ते कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च इत्येवमादीनि।

न चेदं फलश्रवणम् अर्थवादमात्रं युक्तं प्रतिपत्तुम् तथा हि गुणवाद आपद्येत फलोपदेशे तु मुख्यवादोपपत्तिः प्रयाजादिषु तु इतिकर्तव्यताकाङ्क्षस्य क्रतोः प्रकृतत्वात् तादर्थ्ये सति युक्तं फलश्रुतेरर्थवादत्वम्।

तथा अनारभ्याधीतेष्वपि पर्णमयीत्वादिषु न हि पर्णमयीत्वादीनामक्रियात्मकानाम् आश्रयमन्तरेण फलसंबन्धोऽवकल्पते गोदोहनादीनां हि प्रकृताप्प्रणयनाद्याश्रयलाभादुपपन्नः फलविधिः तथा बैल्वादीनामपि प्रकृतयूपाद्याश्रयलाभादुपपन्नः फलविधिः न तु पर्णमयीत्वादिषु एवंविधः कश्चिदाश्रयः प्रकृतोऽस्ति वाक्येनैव तु जुह्वाद्याश्रयतां विवक्षित्वा फलेऽपि विधिं विवक्षतो वाक्यभेदः स्यात्। उपासनानां तु क्रियात्मकत्वात् विशिष्टविधानोपपत्तेः उद्गीथाद्याश्रयाणां फले विधानं न विरुध्यते।

तस्मात् यथा क्रत्वाश्रयाण्यपि गोदोहनादीनि फलसंयोगादनित्यानि एवमुद्गीथाद्युपासनान्यपि इति द्रष्टव्यम्। अत एव च कल्पसूत्रकारा नैवंजातीयकान्युपासनानि क्रतुषु कल्पयांचक्रुः।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.३.४४ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' वायुर्वाव संवर्गः ' ' प्राणो वाव संवर्गः ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे वायु और प्राण दोनोंका भेद और ' य प्राणः स वायुः ' इत्यादि श्रुतिवाक्यसे दोनोंका अभेद प्रतिपादित होनेसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। ' अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् ' ऐसा आरम्भकर ' वायु प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् ' ( वायुने प्राण होकर नासिकामें प्रवेश किया ) इसप्रकार पूर्वापरका विचार करनेपर वायु और प्राण एक ही तत्व प्रतीत होते हैं। अतः दोनोंका अपृथग्रूपसे ही अनुचिन्तन है।

* सिद्धान्तो —- जैसे ' अग्निहोत्र ' जुहोति ' इससे उत्पन्न एक ही अग्निहोत्रका दधि, तण्डुल आदि भेदसे और सायं प्रातः कालभेदसे प्रयोगका भेद है, वैसे ' अन्नादो मवति य एवं वेद ' ( तै ० ३।९।१ ) इसप्रकार उत्पन्न संवर्गविद्या एक है, तो भी उत्पन्न विशिष्ट वायु और प्राण नामक गुणों का भेद होने से प्रयोगका भेद है, ऐसा सूत्र से बाहर ' पृथगेव ' इत्यादिसे सिद्धान्त करते हैं और ' तौ वा एतौ द्वौ संवर्गी ' ( छा ० ४।३।३ ) ( वे ये दो संवर्ग हैं ) यह उपास्य भेदवाक्य प्रयोग भेद परक है, इससे ही भेद सिद्ध होता है।

* ' इन्द्राय राज्ञे ' यहाँ तीन पुरोडाश जिसमें हों वह त्रिपुरोडाशिनी कहलाती है। उस इष्टिमें सह प्रदान इष्ट है अथवा भेदसे प्रदान इष्ट है? ऐसा सन्देह होनेपर ' सर्वेषाम् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं। अब ' राजा ' इत्यादि सिद्धान्त कहते हैं - ' राजा, अधिराज और स्वराज ' इसप्रकार विशेषण के भेदसे विशिष्ट देवताका भेद होता है। अध्वर्युंसे ' अनुब्रूहि ' ऐसा प्रेष करनेपर होतासे जो मन्त्र पढ़ा जाता है वह अनुवाक्या है। ' यज ' ' याज्यां पठ ' ( याज्य मन्त्र पढो ) इस प्रेषके अनन्तरका मन्त्र अनुयाज्या है ; ऐसा भेद है। तीन पुरोडाशवाली इष्टिमें प्रथम पुरोडाशमें जो याज्यारूपसे निर्णीत है वह द्वितीय प्रदानमें अनुवाक्या है और जो पूर्व में अनुवाक्या है वह पश्चात् याज्या होती है। क्योंकि ' व्यत्यासमन्वाह ' यह श्रुति व्यत्याससे विधान करती है, इसलिए श्रतिके

अनुसार पुरोडाशका पृथक् प्रक्षेप है || ४३

लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणम्

3.3.44 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४४

सूत्र ३.३.४४

लिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि ॥ ३.३.४४ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 754

पदच्छेद — लिङ्गभूयस्त्वात् , तत् , हि , बलीयः , तद् , अपि

सूत्रार्थ — - वाजसनेयक अग्नि रहस्यमें अग्निविद्या स्वतन्त्ररूपसे प्रतिपादित है, लिङ्गभूयस्त्वात् ) क्योंकि इसमें ' यत्किञ्चेमानि भूतानि ' इत्यादि अनेक लिङ्ग प्रमाण हैं, और प्रकरण आदिकी अपेक्षासे ( तद्धि ) लिङ्ग हो ( बलीय 1 ) बलवान् है | ( तदपि ) इसको मी ' श्रुतिलिङ्ग ० ' इस सूत्रमें जैमिनि कहा है। चार और प्राण ये पांच अन्य हैं इसप्रकार ये सब दश होते हैं, ये दश कृत ( कृत नामक पासोंसे उपलक्षित द्यूत हैं ) इसप्रकार भेदसे ही उपसंहार करती है।

इसलिए वायु और प्राणका पृथक् ही अनुचिन्तन है।

प्रदानके समान --- जैसे ' इन्द्र राजाके लिए, इन्द्र अधिराजके लिए और इन्द्र स्वराजके लिए ग्यारह कपालवाला पुरोडाश - इन तीन पुरोडाश वाली इष्टि व्यर्थं न हो इस निमित्त से संब देवताओंको हवि प्राप्त करानेके लिए एक साथ ही पुरोडाशोंका अवदान करता है, इस वचनसे और इन्द्रका अभेद होनेसे सह प्रदानको आशङ्का होनेपर राजा आदि ( राजा, अधिराज और स्वराज ) गुणभेद और याज्या और अनुवाक्याके व्यत्यासके विधान होने से लेखक्रमके अनुसार ही देवताके पृथक् होनेसे प्रदान पृथक् है।

वैसे ही [ वायु और प्राणके ] स्वरूप अभेद होनेपर भी उपास्य अंशके पृथक् होनेसे अनुचिन्तन ( उपासना ) पृथक् है, ऐसा अर्थ है। वह संकर्ष ( देवता ) काण्डमें कहा गया है - ' नान वा देवता ० ' ( देवता भिन्न - भिन्न हैं, क्योंकि उनका पृथक् ज्ञान होता हैं ) वहाँ द्रव्य और देवता के भेदसे यागका भेद है, ऐसा यहाँ विद्याभेद नहीं है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहार से अध्यात्म और अधिदैव उपदेशों में एक विद्याका विधान प्रतीत होता है।

जैसे सायं और प्रातः कालके भेदसे अग्निहोत्र में प्रवृत्तिका भेद होता है, वैसे ही विद्याके एक होनेपर मी अध्यात्म और

शाङ्करभाष्य

वाजसनेयिनोऽग्निरहस्येनैव वा इदमग्रे सदासीत् इत्येतस्मिन्ब्राह्मणे मनोऽधिकृत्य अधीयते तत्षट्त्रिंशतं सहस्राण्यपश्यदात्मनोऽग्नीनर्कान्मनोमयान्मनश्चितः इत्यादि तथैववाक्चितः प्राणचितश्चक्षुश्चितः श्रोत्रचितः कर्मचितोऽग्निचितः इति पृथगग्नीन् आमनन्ति सांपादिकान्। तेषु संशयः किमेते मनश्चिदादयः क्रियानुप्रवेशिनः तच्छेषभूताः उत स्वतन्त्राः केवलविद्यात्मका इति। तत्र प्रकरणात् क्रियानुप्रवेशे प्राप्ते स्वातन्त्र्यं तावत्प्रतिजानीते लिङ्गभूयस्त्वादिति। भूयांसि हि लिङ्गानि अस्मिन्ब्राह्मणे केवलविद्यात्मकत्वमेषामुपोद्बलयन्ति दृश्यन्ते तद्यत्किंचेमानि भूतानि मनसा संकल्पयन्ति तेषामेव सा कृतिः इतितान्हैतानेवंविदे सर्वदा सर्वाणि भूतानि चिन्वन्त्यपि स्वपते इति च एवंजातीयकानि। तद्धि लिङ्गं प्रकरणाद्बलीयः। तदप्युक्तं पूर्वस्मिन्काण्डे श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात् इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — वाजसनेयकमें ' वदिष्याम्येवाहमिति ० ' ( ऐसा वाणीने व्रत किया कि ' मैं बोलती ही रहूंगी ' ) यहाँ अध्यात्म वाणी आदिमें प्राण श्रेष्ठ अवधारित है और अधिदैवत अग्नि आदिमें वायु श्रेष्ठ अवधारित है। तथा छान्दोग्यमें ' वायुर्वाव संवर्ग : ' ( वायु ही संवर्ग है ) यहाँ अधिदैवत अग्नि आदिमें वायु संवगंरूपसे अवधारित है और ' प्राणो वाव संवर्ग : ' ( प्राण ही संवर्ग है ) यहाँ अध्यात्म वाग् आदिमें प्राण संवर्गरूपसे अवधारित है।

यहाँ संशय होता है कि क्या ये वायु और प्राण पृथक् स्वीकार करने चाहिए अथवा अपृथक् - एक ही? पूर्वपक्षी - स्वरूप के अभेदसे अपृथक् ही है, ऐसा प्राप्त होता है | अभिन्न तत्त्व ( एक स्वरूप ) में पृथग्रू रूप से अनुचिन्तन युक्त नहीं है, ' अग्निर्वाग्भूत्वा ' ( अग्नि वागिन्द्रिय होकर मुखमें प्रवेश किया ) ऐसा आरम्भकर श्रुति अध्यात्म और अधिदेवता स्वरूपाभेद दिखलाती है।

उसीप्रकार ' त एते सर्व ० ' ( ये वाकू, मन और प्राण सभी तुल्य हैं, अध्यात्म और अधिभूत समस्त जगत् इन तीनोंसे व्याप्त है, इन तीनोंसे अतिरिक्त कार्यात्मक अथवा करणात्मक कुछ नहीं है, ये सब अनन्त हैं ) यह श्रुतिवाक्य आध्यात्मिक प्राणोंकी स्वरूपभूत आधिदैविक विभूति दिखलाता। इसीप्रकार अन्यत्र भी तत् तत् स्थलमें अध्यात्म और अधिदैवतका बहुधा तत्त्वाभेद दर्शन होता है।

और कहीं पर ' यः प्राणः स वायुः ' ( जो प्राण है वह वायु है ) यह श्रुतिवाक्य स्पष्टरूपसे प्राण और वायुमें एकत्वका प्रतिपादन करता है। इसप्रकार उदाहृत वाजसनेयी ब्राह्मण में भी . ' यतोदेति सूर्य : ' ( जिस वायुसे सूर्य उदय होता है ) इस उपसंहारश्लोक में ' प्राणाद्वा ० ' ( यह प्राणसे उदित होता है यह प्राणमें मस्त होता है ) इसप्रकार प्राणने ही उपसंहार करते हुए एकत्व दिखलाता है।

' तस्मादेकमेव ० ' ( अतः एक ही व्रतका आचरण करे, प्राण व्यापार करे और अपान व्यापार करे ) इसप्रकार एक प्राणव्रतसे ही उपसंहार करते हुए उसको ही दृढ करता है। इसप्रकार छान्दोग्यमें भी आगे ' महात्मनश्चतुरो देव ० ' ( भुवनोंके रक्षक उस एक प्रजापतिने चार [ अग्नि, सूर्य, दिक्, चन्द्रमा और वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन ] महात्माओं को ग्रस लिया ) यह श्रुति एक ही संवर्गका बोध कराती है ऐसा नहीं कहती है कि एक चारोंका एक संवर्ग है और दूसरे चारोंका दूसरा, इसलिए उपगमन - अनुचिन्तन पृथक् नहीं है।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वायु और प्राणका पृथक् हो अनुचिन्तन स्वीकार करना चाहिए, किससे? उनका पृथक् उपदेश होने से। अध्यात्म और अधिदैवत विभागका उपदेश ध्यानके लिए है, किन्तु वह ध्यानके पृथक् न होनेपर व्यर्थ ही होगा। परन्तु यह जो कहा गया है कि स्वरूपके अभेद होनेसे पृथक् अनुचिन्तन नहीं है। यह दोष नहीं है, क्योंकि तत्त्वके अभेद होनेपर भी अवस्थाभेदसे और उपदेशभेद के बलसे अनुचिन्तनका भेद उपपन्न होता है।

तत्त्वाभेदके अभिप्रायसे उपपद्यमान श्लोक उपन्यास में भी पूर्वकथित ध्येय भेदके निराकरणकी सामथ्यं नहीं है, क्योंकि ' स यथैषां ० ' ( जिसप्रकार इन वागादि प्राणोंमें प्राण मध्यम है, उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है ) इसप्रकार उपमान और उपमेयकरण है। इससे व्रतोपदेशका भी व्याख्यान हुआ।

' एकमेव व्रतम् ' ( एक ही व्रत करना चाहिए ) इसमें ' एव ' वागादिका व्रत निवृत्तकर प्राणव्रतकी प्रतिपत्ति के लिए है | क्योंकि ' तानि मृत्यु : ० ' ( मृत्युने श्रमरूप होकर उन इन्द्रियोंका संग्रहण किया ) इन श्रुतिसे वागादि इन्द्रियाँ मग्नव्रत कही गई हैं। परन्तु वह ' एवकार ' वायुव्रतकी निवृत्ति के लिए नहीं है, कारण कि ' अथातो व्रतमीमांसा ' ( अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है ) इसप्रकार प्रस्तुत कर वायु और प्राणका समानरूपसे अमग्नव्रतत्व निर्धारित किया जाता है।

' एकमेव व्रत चरेत् ' ( एक ही व्रतका आचरण करे ) ऐसा कहकर ' तेनो एतस्यै ० ' ( उस व्रत से वह इस देवता की ही एकरूपताको और समान स्थानत्वको प्राप्त करता है ) इस तरह श्रुति वायु प्राप्ति फलको कहती हुई वायुव्रतको अनिवर्तित दिखलाती है। यहाँ देवता वायु ही होना चाहिए, क्योंकि अपरिच्छन्नात्मत्व प्रेप्सित है, कारण कि सैषाऽनस्तमिता ० ' ( यह जो वायु है वह अस्त न होनेवाला देवता है ) ऐसा पहले प्रयोग किया है।

और ' तौ वा एतौ ० ' ( ये दो संवर्ग हैं, अग्नि आदि देवताओंोंमें वायु और वागादि इन्द्रियोंमें मुख्य प्राण संवर्ग है ) इसप्रकार भेदसे व्यपदेश करती है। ' ते वा एते ० ' ( जिनका ग्रसन होता है, ऐसे अग्नि आदि चार और उनका ग्रसन करनेवाला वायु ये पांच वागादिसे अन्य हैं, और इनसे वागादि

वाजसनेयियों के अतिरहस्य में - ' नैत्र वा इदम ग्रे ० ' ( उत्पत्तिके पूर्व में यह न सत् ही था ) इस ब्राह्मणमें मनको प्रस्तुतकर ' उस मऩने अपने वर्चनीय [ मनोवृत्ति मावित ] मनोमय मनश्चित् छत्तीस सहस्र अग्नियोंको देखा ' इत्यादि कहते हैं। और ' वाक्से सम्पादित, प्राण - घ्राणसे सम्पादित, बक्षुसे सम्पादित, श्रोत्र से सम्पादित, कर्मसे सम्पादित अग्निसे सम्पादित अपनी अपनी वृत्तिरूप अग्नियों को वाक् प्राण आदिने देखा ' इसीप्रकार भिन्न भिन्न सांपादिक अग्नियोंको कहते हैं।

उसमें संशय होता है कि क्या ये मनश्चित् आदि क्रियामें अनुप्रवेशकर उस कर्मके अङ्गभूत हैं अथवा स्वतन्त्र केवल विद्यात्मक हैं? यहाँ प्रकरणसे क्रिया में अनुप्रवेश प्राप्त होनेपर, सिद्धान्ती - स्वतन्त्रताकी प्रतिज्ञा करते हैं- कारण कि बहुत से लिङ्ग हैं।

' तद्यत्किञ्चेमानि ० ' ( उसमें ये भूत - प्राणी मनसे जो कुछ संकल्प करते हैं . वह उन अग्नियोंकी ही कृति - कर्म हैं ) और ' तान्हैतानेवंविदे ० ' ( ऐसी उपासना करनेवाला यदि सोता हो चाहे जागता हो तो भी उसके लिए सर्वदा सब भूत उन उन अग्नियोंका चयन - सम्पादन करते हैं ) इसप्रकारके बहुतसे लिङ्ग इस ब्राह्मण में ' ये अग्नियाँ केवल विद्यात्कक हैं ' ऐसा समर्थन करते हुए देखे जाते हैं। क्योंकि वह लिङ्ग प्रकरणसे बलवान् होता है।

वह भी ' श्रुतिलिङ्ग ० ' ( श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या इनके एक विषय में परस्पर विरोध होनेपर

उत्तरोत्तर पूर्वं पूर्व से दुर्बल है, क्योंकि स्वार्थं - अपने अर्थका बोध करानेमें उत्तर - उत्तरको पूर्व- पूर्वकी

अपेक्षा होनेके कारण विलम्ब होता है ) इसप्रकार पूर्व काण्डमें कहा गया है॥ ४४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' उत्पत्ति के पूर्व यह जगत् न सत् था और न असत् ' ऐसा उपक्रम

कर मनको सृष्टिको कहकर ' उस मनने अपनेको देखा ' इसप्रकार ईक्षण पूर्वक अग्नियोंको देखा, इस तरह मनके उद्देश्य से ' तत्षट् त्रिंशत् ' इत्यादि मन्त्र कहा गया है। इस मन्त्र में पुरुषके आयुरूपसे कल्पित सौ वर्षके अन्तर्गत छत्तीस सहस्र दिन और रात्रिसे मनोवृत्तियाँ अवच्छिन्न हैं, मनोवृत्तियाँ असंख्य होनेपर मी छत्तीस सहस्र ही कही गई हैं, क्योंकि मनोवृत्तियोंको इष्टकारूपसे ही कल्पना की गई है। अतः मनोवृत्तियों द्वारा मनसे सम्पादित अग्नियाँ मनश्चित् अग्नियाँ कही जाती हैं। पूर्वपक्ष में प्रकरणसे ये अग्नियाँ कर्मके अङ्गभूत हैं और सिद्धान्त में इनका पुरुषार्थत्व फल है। जो क्रियाका अङ्ग होता है वह विहित कालमें ही अनुष्ठेय होता है, उसका सर्वदा सबसे अनुष्ठान नहीं हो सकता। परन्तु इस मन्त्र में तो ' सर्वदा ' शब्दसे सब कालके लिए विधान किया गया है, और छत्तीस सहस्र इतनी बड़ी संख्या भी मतश्चित् आदि संपादित अग्नियोंको क्रियाके अङ्ग न होनेमें लिङ्ग है। लिङ्ग प्रकरणसे बलवान् है | अतः ये भावनात्मक उपासनाएँ किसी कर्मके अङ्ग भूत न होकर स्वतन्त्र हैं॥ ४४

3.3.45 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४५

सूत्र ३.३.४५

पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात् क्रियामानसवत् ॥ ३.३.४५ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 756

पदच्छेद — पूर्वविकल्पः , प्रकरणात् स्यात् , क्रिया , मानसवत्

सूत्रार्थ — ये मनश्चित् आदि अग्नियाँ स्वतन्त्र नहीं हैं, किन्तु ( प्रकरणात् ) प्रकरणसे ( पूर्वविकल्पः ) पूर्व में प्रकृत क्रियामय अग्निका यह संकल्पात्मक अग्नि ( क्रिया स्यात् ) अङ्ग है। ( मानसवत् ) जैसे ' मनोग्रहं गृह्णाति ' इत्यादि द्वादशाहमें श्रुत मानस ग्रह बारह दिनके मध्यवर्ती दशम का अङ्ग है।

शाङ्करभाष्य

नैतद्युक्तम् स्वतन्त्रा एतेऽग्नयः अनन्यशेषभूता इति पूर्वस्य क्रियामयस्य अग्नेः प्रकरणात् तद्विषय एव अयं विकल्पविशेषोपदेशः स्यात् न स्वतन्त्रः। ननु प्रकरणाल्लिङ्गं बलीयः सत्यमेवमेतत् लिङ्गमपि तु एवंजातीयकं न प्रकरणाद्बलीयो भवति अन्यार्थदर्शनं हि एतत् सांपादिकाग्निप्रशंसारूपत्वात् अन्यार्थदर्शनं च असत्यामन्यस्यां प्राप्तौ गुणवादेनाप्युपपद्यमानं न प्रकरणं बाधितुमुत्सहते तस्मात् सांपादिका अप्येतेऽग्नयः प्रकरणात्िक्रयानुप्रवेशिन एव स्युः। मानसवत् यथा दशरात्रस्य दशमेऽहनि अविवाक्ये पृथिव्या पात्रेण समुद्रस्य सोमस्य प्रजापतये देवतायै गृह्यमाणस्य ग्रहणासादनहवनाहरणोपह्वानभक्षणानि मानसान्येव आम्नायन्ते स च मानसोऽपि ग्रहकल्पः क्रियाप्रकरणात् क्रियाशेष एव भवति एवमयमप्यग्निकल्प इत्यर्थः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह जो कहा गया है कि ये अग्नियाँ अन्यका अङ्ग न होकर स्वतन्त्र हैं, यह युक्त नहीं है, क्योंकि पूर्व क्रियामय अग्निका प्रकरण होनेसे तद्विषयक ही यह विकल्प विशेषका उपदेश होना चाहिए स्वतन्त्र नहीं। परन्तु लिङ्ग प्रकरणसे बलवान् है? यह कथन ठीक ही है। किन्तु इसप्रकारका लिङ्ग भी प्रकरण से बलवान् नहीं होता, यह लिङ्ग अन्यार्थदर्शन है, क्योंकि सांपादिक अग्निका प्रशंसा रूप है। अन्यार्थदर्शन तो अन्य प्राप्ति न होनेपर गुणवादसे भी उपपन्न होता हुआ प्रकरणका बाघ करने में समर्थ नहीं होता। इसलिए सांपादिक होती हुई भी ये अग्नियां प्रकरणसे क्रियामें अनुप्रवेश करनेवाली ही होनी चाहिए। मानसके समान। जैसे दशरात्र क्रतुके दसवें दिनमें अविवाक्य में पृथिवीरूप पात्र गृह्यमाण समुद्ररूप सोमका प्रजापति देवताके लिए ग्रहण, आसादन, हवन, आहरण, उपह्वान और मक्षण ये मानस ही श्रुतिमें कहे जाते हैं। जैसे वह मानस ग्रहकल्प भी क्रियाप्रकरणसे क्रियाका अङ्ग ही होता है, इसप्रकार यह अग्निकल्प भी ऐसा अर्थ है॥ ४५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सिद्धान्तका उपक्रमकर पूर्वपक्ष करते हैं- मनश्चित् आदि अग्निके विधान करनेके पूर्वमें ' इष्टकामिरग्निं चिनुते ' ( इंटोंसे अन्निका चयन करते हैं ) इसप्रकार जो कहा गया है, और ' स एष त्विष्टकाग्निः ' ( यह तो इंटों द्वारा संपादित अग्नि है ) इसप्रकार यज्ञका अङ्गभूत अग्नि सन्निहित है। उसका यह विकल्प- संकल्प विशेषोपदेश है। इसका अभिप्राय यह है कि जैसे क्रियात्मक अग्नि यागका अङ्ग है, वैसे संकल्पमय अग्नि भी यागका अङ्ग है।

जो यह गया है कि लिङ्ग प्रकरणसे अधिक बलवान् है। arraft वाक्यगत लिङ्ग प्रकरणसे बलवान् है अथवा अर्थवादगत? प्रथम पक्ष तो स्वीकयं है। द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मानस अग्नि विधिके अर्थवादगत लिङ्ग अपने अर्थ प्राप्ति में प्रमाणके न होनेसे प्रकरणसे दुर्बल है।

इसलिए यह बन्यार्थदर्शन लिङ्ग ( अर्थवादरूप ) है, इसलिए प्रकरण से यह संकल्पमय अग्नि भी क्रियामय अग्निके समान कर्मका अङ्ग है ' | ' मानसवत् ' द्वादशाहे श्रूयते ‘ अनया त्वा पात्रेण समुद्रं रसया प्राजापत्यं मनोग्रहं गृह्णाति ( बारह दिन में होनेवाले सोम याग में सुना जाता है - हे समुद्र!

इस पृथिवीरूप पात्रसे सोमरससे कल्पित जिसका प्रजापति देवता है एसे तुझे अध्वर्यु ग्रहण करता है ) यहाँ यह मानस कर्म उक्त बारह दिनके मध्यवर्ती दसवें दिन अर्थात् आदि और अन्तिम दिन छोड़कर मध्यके दशरात्र ही द्विरात्र आदिमें प्रकृति है उसके धर्मोका ही उनमें अतिदेश होनेके कारण उस मध्यरात्र के दशमदिनमें - ग्यारहवें दिनमें उक्त मानस ग्रह सुना जाता है।

इसलिए ऋत्विजोंका ध्यायीरूपसे विधि वाक्यका उच्चारण न होनेके कारण महः ( दशमदिन ) की अविसंज्ञा है, अतः दशम दिन- अविवाक्यमें यह भावनामय मानस कहा है।

इसमें ग्रहण - सोम आधारभूत पात्रका उपादान, आसादन- गृहीत पात्रका शास्त्र विहित स्थानमें स्थापन, सोमका होम - हवन है, हुत शेषका ग्रहण - आहरण है, हवनसे बच्चे हुए भागका भक्षण करनेके लिए ऋत्विजोंका परस्पर अनुज्ञाकरण उपह्वान है, उसके अनन्तर शेष मामका मक्षण यह सब मानस ही है अर्थात् यह सब संकेतसे होता है | वह मानसग्रह द्वादशाह सोमयागसे भिन्न स्वतन्त्र दिन है। इस प्रकार शङ्का कर द्वादशाह संज्ञाके साथ विरोध होने से पृथक् दिन नहीं है, किन्तु प्रकरणके बलसे अविवाक्य अहिनुका बङ्ग है।

जैसे मानसग्रह प्रकरणके बलसे क्रियाका अङ्ग है, वैसे सांपादिक अग्नियाँ भी प्रकरणसे क्रियां अङ्ग हैं || ४५ ||

3.3.46 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४६

सूत्र ३.३.४६

अतिदेशाच् च ॥ ३.३.४६ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 757

पदच्छेद — अतिदेशात् च

सूत्रार्थ — ' एकैक एव तावान् ' इसप्रकार अतिदेशसे भी ये सांपादिक अग्नियां क्रियाके अङ्ग हैं |

शाङ्करभाष्य

अतिदेशश्च एषामग्नीनां क्रियानुप्रवेशमुपोद्बलयति षट्त्रिंशत्सहस्राण्यग्नयोऽर्कास्तेषामेकैक एव तावान्यावानसौ पूर्वः इति सति हि सामान्ये अतिदेशः प्रवर्तते ततश्च पूर्वेण इष्टकाचितेन क्रियानुप्रवेशिना अग्निना सांपादिकानग्नीनतिदिशन् क्रियानुप्रवेशमेव एषां द्योतयति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अग्नियोंका अतिदेश करती हुई श्रुति इनका क्रियानुप्रवेश ही सूचित करती है॥ ४६

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.५० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.3.47 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४७

सूत्र ३.३.४७

विद्यैव तु निर्धारणाद्दर्शनाच् च ॥ ३.३.४७ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 757

पदच्छेद — विद्या , एव तु निर्धारणात्

सूत्रार्थ — ( तु ) पूर्वपक्ष के निवृत्त्यर्थं है, ( विद्या एव ) विद्यात्मक

शाङ्करभाष्य

तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति। विद्यात्मका एव एते स्वतन्त्रा मनश्चिदादयोऽग्नयः स्युः न क्रियाशेषभूताः। तथा हि निर्धारयति ते हैते विद्याचित एव इतिविद्यया हैवैत एवंविदश्चिता भवन्ति इति च।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है। विद्यात्मक ये मनश्चित् आदि अग्नियां स्वतन्त्र ही होनी चाहिए, क्रियाके अङ्गभूत नहीं, क्योंकि ' ते है ते ० ' ( वे ये विद्या भावनासे ही सम्पादित हैं, और ' विद्यया ० ' ( इसप्रकार जाननेवाले उपासकको ये अग्नियाँ विद्यासे ही संपादित होती हैं ) इसप्रकार श्रुति निर्धारण करती है।। ४७

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.५० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.3.48 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४८

सूत्र ३.३.४८

विद्यैव तु निर्धारणाद्दर्शनाच् च ॥ ३.३.४८ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 757

पदच्छेद — दर्शनात् च

सूत्रार्थ — और इन मनश्चित् आदि अग्नियोंके स्वातन्त्र्यमें लिङ्ग भी देखने में आता है। और ' षट्त्रिंशत् ० ' ( छत्तीस सहस्र पूज्य अग्नियाँ हैं, उनमेंसे एक - एक उतनी है जितनो कि वह पूर्व अग्नि है ) इस प्रकार इन अग्नियोंका अतिदेश क्रियानुप्रवेशकी पुष्टि करता है। क्योंकि सादृश्य होनेपर ही अतिदेश प्रवृत्त होता है। इसलिए पूर्वं ईंटोंसे चित् क्रियानुप्रवेशी अग्नि से सांपादिक

शाङ्करभाष्य

तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति। विद्यात्मका एव एते स्वतन्त्रा मनश्चिदादयोऽग्नयः स्युः न क्रियाशेषभूताः। तथा हि निर्धारयति ते हैते विद्याचित एव इतिविद्यया हैवैत एवंविदश्चिता भवन्ति इति च।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इन अग्नियोंकी स्वतन्त्रतामें लिङ्ग भी देखा जाता है, वह ' लिङ्गभूयस्त्वात् ' इस सूत्र में पहले दिखलाया गया है।। ४८

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.५० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.3.49 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४९

सूत्र ३.३.४९

श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच् च न बाधः ॥ ३.३.४९ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.४९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 758

पदच्छेद — श्रुत्यादिबलीयस्त्त्रात् , च , न , बाधः

सूत्रार्थ — ( च ) और ( श्रुत्यादिबलीयस्त्वात् ) श्रुति आदिके बलवान् होनेसे दुर्बल कर्म प्रकरण से मनश्चित् आदि अग्नियोंके स्वातन्त्र्यका ( न बाधः ) बाध नहीं होता।

शाङ्करभाष्य

नैवं प्रकरणसामर्थ्यात्िक्रयाशेषत्वमध्यवसाय स्वातन्त्र्यपक्षो बाधितव्यः श्रुत्यादेर्बलीयस्त्वात् बलीयांसि हि प्रकरणात् श्रुतिलिङ्गवाक्यानीति स्थितं श्रुतिलिङ्गसूत्रे तानि च इह स्वातन्त्र्यपक्षं साधयन्ति दृश्यन्ते कथम् श्रुतिस्तावत् ते हैते विद्याचित एव इति तथा लिङ्गम् सर्वदा सर्वाणि भूतानि चिन्वन्त्यपि स्वपते इति तथा वाक्यमपि विद्यया हैवैत एवंविदश्चिता भवन्ति इति।विद्याचित एव इति हि सावधारणां इयं श्रुतिः क्रियानुप्रवेशेऽमीषामभ्युपगम्यमाने पीडिता स्यात्। ननु अबाह्यसाधनत्वाभिप्रायमिदमवधारणं भविष्यति नेत्युच्यते तदभिप्रायतायां हिविद्याचितः इति इयता स्वरूपसंकीर्तनेनैव कृतत्वात् अनर्थकमवधारणं भवेत् स्वरूपमेव हि एषाम् अबाह्यसाधनत्वमिति अबाह्यसाधनत्वेऽपि तु मानसग्रहवत् क्रियानुप्रवेशशङ्कायां तन्निवृत्तिफलम् अवधारणम् अर्थवद्भविष्यति। तथास्वपते जाग्रते चैवंविदे सर्वदा सर्वाणि भूतान्येतानग्नींश्चिन्वन्ति इति सातत्यदर्शनम् एषां स्वातन्त्र्येऽवकल्पते यथा सांपादिके वाक्प्राणमयेऽग्निहोत्रेप्राणं तदा वाचि जुहोति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु अन्य प्राप्ति न होनेपर लिङ्ग भी किसी अर्थका साधक नहीं होता, इस प्रकार लिङ्गका त्यागकर प्रकरणकी सामथ्यसे ये अग्नियाँ क्रिया के अङ्गरूपसे निश्चित की गई हैं, इससे उत्तर कहते हैं- --

इसप्रकार प्रकरणकी सामर्थ्य से मनश्चित् आदि अग्नियोंमें क्रियाङ्गत्व निश्चित कर स्वातन्त्र्यपक्षका बाध नहीं करना चाहिए, क्योंकि श्रुति आदि बलवान् हैं। श्रुति, लिङ्ग, वाक्य ये प्रकरणसे बलवान् हैं। यह ' श्रुतिलिङ्ग ० ' इस सूत्र में सिद्ध किया गया है। और ये ( श्रुति आदि ) यहाँपर स्वातन्त्र्यपक्षको सिद्ध करते हुए देखे जाते हैं। किस प्रकार? इस प्रकार कि ' ते है ते विद्याचित एव ' ( वे ये अग्नियाँ विद्यासे संपादित ही हैं ) यह श्रुति है।

' सर्वदा ० ' ( सर्वदा सब प्राणी उपासक जागता हो चाहे सोता हो उसके लिए इन अग्नियों का चयन करते हैं ) इस प्रकार यह लिङ्ग है। और ' विद्यया है बैत ० ' ( ऐसा जाननेवाले उपासककी ये अग्नियाँ विद्यासे ही संपादित होती हैं। इस प्रकार यह वाक्य भी है। ' विद्याचित्त एव ' अवधारण ( एव ) सहित यह श्रुति इन अग्नियोंका क्रियामें अनुप्रवेश स्वीकार करनेपर बाधित हो जायगी। परन्तु यह अवधारण बाह्य साधनामावके अभिप्रायसे होगा?

नहीं, ऐसा कहते हैंयदि उसके अभिप्रायमें हो तो ' विद्याचित ' इतने स्वरूप संकीर्तन से ही ' अबाह्य साधनत्व ' सिद्ध होने से ' एव ' यह अवधारण अनर्थक होगा, क्योंकि बाह्य साधनका अभाव तो इन अग्नियोंका स्वरूप ही है। परन्तु इन अग्नियोंके बाह्य साधनका अभाव होनेपर मी मानसग्रहके समान क्रिया अनुप्रवेशकी शङ्का होनेपर उसकी निवृत्तिरूप प्रयोजन होनेसे अवधारण सार्थक हो जायगा।

इस प्रकार ' स्वपते ० ' ( ऐसा जाननेवाला जागता हो चाहे सोता हो उस उपासक के लिए सर्वदा सब प्राणी इन अग्नियों का संम्पादन करते हैं ) यह सातत्यदर्शन इन अग्नियोंके स्वातन्त्र्य होनेपर संगत होता है।

जैसे यथा सांपादिके वाक्प्राणमयेऽग्निहोत्रे ' प्राणं तदा वाचि जुहोति वाचं तदा प्राणे जुहोति ' सांपादिक वाक् प्राणमय अग्निहोत्र में ' प्राणं तदा वाचि ० ' ( ध्यानकाल में प्राणका वाणीमें होम करता है, और ध्यानकाल में वाणीका प्राणमें होम करता है ) ऐसा कहकर ' एते अनन्तेऽमृते ० ' ( इन अनन्त अमृत आहुतियोंका वह जागते अथवा सोते निरन्तर होम करता है ) ऐसा कहा जाता है। इसके समान इन अग्नियोंका क्रियाङ्गत्व नहीं है।

क्रिया अनुप्रवेश में तो क्रियाके प्रयोगका अल्पकालत्व होने से इन मनशचित् आदि अग्नियोंका नैरन्तर्य प्रयोग नहीं हो सकेगा। यह अर्थवादमात्र है, यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि जहाँ पर लिङ् आदि विधायक विस्पष्ट उपलब्ध होते हों वहाँ पर संकीर्तनमात्रका अर्थवाद युक्त है। परन्तु यहाँ तो विस्पष्ट- प्रत्यक्षरूपसे अन्य विधिकी उपलब्धि न होने से संकीर्तनसे हो इन अग्नियोंके विज्ञानविधानकी कल्पना करनी चाहिए।

उसकी संकीर्तन के अनुसार ही कल्पना की जा सकती है, इसलिए सातत्यदर्शन होनेसे वैसे ही [ विज्ञानविधिकी ] कल्पना की जाती है। उससे सामर्थ्य से इनकी स्वातन्त्र्य सिद्धि होती है। इस उक्त न्याय से ' तद्यत्किंचे मानि ० ' ( ये प्राणी मनसे जो कुछ संकल्प करते हैं वह उन अग्नियोंकी ही कृति है ) इत्यादि व्याख्यान हुआ। इसीप्रकार ' एवंविदे ' यह वाक्य भी इन अग्नियोंका पुरुष विशेषके साथ सम्बन्ध कहता हुआ यागके साथ इनके सम्बन्धकी खोज नहीं करता। इसलिए स्वतन्त्रपक्ष ही अधिक श्रेष्ठ है॥४ ९

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.५० की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.3.50 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५०

सूत्र ३.३.५०

अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद्दृष्टश् च तदुक्तम् ॥ ३.३.५० ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 759

पदच्छेद — अनुबन्धादिभ्यः , प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववत् दृष्टः , च , तत् , उक्तम्

सूत्रार्थ — ( अनुबन्धादिभ्यः ) अनुबन्ध आदि हेतुओंसे मनश्चित् आदि अग्नियाँ स्वतन्त्र हैं, ( प्रज्ञान्तर पृथक्त्ववत् ) जैसे शाण्डिल्य आदि अन्य विद्याएँ स्वतन्त्र हैं। क्योंकि ( दृष्टश्च ) राजसूय प्रकरण में पठित होनेपर भी अवेष्टि यागका वर्णत्रय से सम्बन्धित होने के कारण प्रकरणसे पृथक्त्व देखा गया है, ( तदुक्तम् ) इस बातको पूर्वमीमांसा में ' क्रत्वर्थायामिति ' इस सूत्र में कहा गया है।

शाङ्करभाष्य

इतश्च प्रकरणमुपमृद्य स्वातन्त्र्यं मनश्चिदादीनां प्रतिपत्तव्यम् यत् क्रियावयवान् मनआदिव्यापारेष्वनुबध्नाति ते मनसैवाधीयन्त मनसाचीयन्त मनसैव ग्रहा अगृह्यन्त मनसास्तुवन्मनसाशंसन्यत्किंच यज्ञे कर्म क्रियेत यत्किंच यज्ञियं कर्म मनसैव तेषु तन्मनोमयेषु मनश्चित्सु मनोमयमेव क्रियते इत्यादिना संपत्फलो हि अयमनुबन्धः न च प्रत्यक्षाः क्रियावयवाः सन्तः संपदा लिप्सितव्याः।

न च अत्र उद्गीथाद्युपासनवत् क्रियाङ्गसंबन्धात् तदनुप्रवेशित्वमाशङ्कितव्यम् श्रुतिवैरूप्यात् न हि अत्र क्रियाङ्गं किंचिदादाय तस्मिन् अदो नामाध्यवसितव्यमिति वदति षट्त्रिंशत्सहस्राणि तु मनोवृत्तिभेदान् आदाय तेष्वग्नित्वं ग्रहादींश्च कल्पयति पुरुषयज्ञादिवत् संख्या च इयं पुरुषायुषस्याहःसुदृष्टा सती तत्संबन्धिनीषु मनोवृत्तिष्वारोप्यत इति द्रष्टव्यम्। एवमनुबन्धात्स्वातन्त्र्यं मनश्चिदादीनाम्।

आदिशब्दात् अतिदेशाद्यपि यथासंभवं योजयितव्यम् तथा हि तेषामेकैक एव तावान्यावानसौ पूर्वः इति क्रियामयस्याग्नेर्माहात्म्यं ज्ञानमयानामेकैकस्य अतिदिशन् क्रियायामनादरं दर्शयति न च सत्येव क्रियासंबन्धे विकल्पः पूर्वेणोत्तरेषामिति शक्यं वक्तुम् न हि येन व्यापारेण आहवनीयधारणादिना पूर्वः क्रियायामुपकरोति तेन उत्तरे उपकर्तुं शक्नुवन्ति।

यत्तु पूर्वपक्षेऽप्यतिदेश उपोद्बलक इत्युक्तम् सति हि सामान्येऽतिदेशः प्रवर्तत इति तत् अस्मत्पक्षेऽप्यग्नित्वसामान्येनातिदेशसंभवात्प्रत्युक्तम् अस्ति हि सांपादिकानामप्यग्नीनामग्नित्वमिति। श्रुत्यादीनि च कारणानि दर्शितानि।

एवमनुबन्धादिभ्यः कारणेभ्यः स्वातन्त्र्यं मनश्चिदादीनाम् प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववत् यथा प्रज्ञान्तराणि शाण्डिल्यविद्याप्रभृतीनि स्वेन स्वेन अनुबन्धेन अनुबध्यमानानि पृथगेव कर्मभ्यः प्रज्ञान्तरेभ्यश्च स्वतन्त्राणि भवन्ति एवमिति दृष्टश्च अवेष्टेः राजसूयप्रकरणपठितायाः प्रकरणादुत्कर्षः वर्णत्रयानुबन्धात् राजयज्ञत्वाच्च राजसूयस्य तदुक्तं प्रथमे काण्डे क्रत्वर्थायामिति चेन्न वर्णत्रयसंयोगात् इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इससे भी प्रकरणका उपमर्दनकर मनश्चित् आदि अग्नियोंका स्वातन्त्र्य समझना चाहिए, क्योंकि श्रुति क्रियाके अवयवोंको मन आदिके व्यापारोंमें ' ते मनसैवाधीयन्त ० ' ( उन अग्नियोंका मनसे ही आधान करे, मनसे ही ईंटोंका चयन करे मनसे ही यज्ञ पात्र ग्रहण करे, मनसे ही उद्गाता स्तुति करे, मनसे ही होता शंसन- स्तुति करे।

जो कुछ यज्ञमें कम किया जाता है ओर यज्ञ सम्बन्धी कर्म किया जाता है, वह सब मनसे ही [ किया जाता है ] उन मनश्चित् मनोमय अग्नियोंमें मनोमय ही किया जाता है ) इत्यादिसे सम्बद्ध करती .। कारण कि यह अनुबन्ध सम्पद्रूप फलवाला है। प्रत्यक्ष सिद्ध क्रियाके अवयवोंको सम्पत् के साथ सम्बन्धित नहीं करना चाहिए। और यहाँ उद्गीथ आदि उपासना के समान क्रिया बङ्गके साथ सम्बन्ध होने से क्रिया अनुप्रवेशत्वकी आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि श्रुतियाँ विरूप- असमान हैं।

यहाँ किसी क्रिया अङ्गको लेकर उसमें इसका अध्यवसाय करना चाहिए, ऐसा श्रुति नहीं कहती, किन्तु छत्तीस सहस्र मनोवृत्ति भेदोंको लेकर उनमें अग्नित्व और ग्रह आदिकी पुरुषयज्ञ आदिके समान कल्पना करती है और यह छत्तीस सहस्र संख्या पुरुषके आयुष्य के दिनों में प्रत्यक्ष अनुभूत होती हुई तत्सम्बन्धी मनोवृत्तियों में आरोपित की जाती है, ऐसा समझना चाहिए। इसप्रकार अनुबन्धसे मनश्चित् आदि स्वतन्त्र हैं। सूत्रस्थ आदि शब्द से अतिदेश आदिकी भी यथा सम्भव योजना करनी चाहिए।

जैसे कि ' तेषामेकैक ० ' ( उन सांपादिक अग्नियोंमें एक - एक उतनी है जितनी कि वह पूर्व अग्नि हैं। ) इसप्रकार यह श्रुति क्रियामय अग्नि महात्म्यका ज्ञानमय अग्निमें से एक एकमें अतिदेशकर क्रियामें अनादर दिखलाती है। और क्रियासम्बन्ध होनेपर उत्तर अग्नियोंका ( सांपादिक अग्नियोंका ) पूर्व अग्निके साथ विकल्प है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिस आहवनीय हविष्‌के धारण आदि व्यापारसे पूर्व अग्नि क्रियामें उपकारक होती है, उस व्यापारसे उत्तर अग्नियाँ उपकारक नहीं हो सकतीं?

सादृश्य होनेपर ही अतिदेश प्रवृत्त होता है, इसप्रकार पूर्वपक्षमें मी अतिदेश [ क्रियानुप्रवेशका ] पोषक है, ऐसा जो कहा गया है, वह हमारे पक्षमें भी अग्नित्व सादृश्यसे अतिदेशका सम्भव होनेसे निराकृत हुआ, क्योंकि सपादिक अग्नियोंमें अग्नित्व है। इससे श्रुति आदि कारण दिखलाये गये हैं। इसप्रकार अनुबन्ध आदि कारणोंसे मनश्चित् आदि अग्निय स्वतन्त्र हैं, अन्य प्रज्ञाओंकी स्वतन्त्रता के समान।

जैसे अपने - अपने अनुबन्ध सम्बन्धित हुई शाण्डिल्यविद्या आदि अन्य प्रज्ञाएँ कर्मों और अन्य प्रज्ञाओंसे पृथक् स्वतन्त्र ही हैं, इसीप्रकार यहाँ भी समझना चाहिए। राजसूय प्रकरण में पठित अवेष्टि नामक इष्टिका प्रकरणसे उत्कर्ष दृष्ट है, क्योंकि तीनों वर्णोंके साथ सम्बन्धित होनेसे राजसूय क्षत्रिययज्ञ है।

इस बातको ' क्रत्वर्थायामिति ० ' ( यदि यह कहो कि यह लिङ्गदर्शन क्रत्वर्थं अवेष्टिमें हो तो युक्त नहीं है, क्योंकि अवेष्टिमें ब्राह्मण आदि वर्ण त्रयका सम्बन्ध है ) इसप्रकार पूर्वमीमांसा में कहा गया है।। ५०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि मनोवृत्तियोंमें अग्निका ध्यान क्रियाका अङ्ग नहीं है, तो भी वह उद्गीथ ध्यानके समान क्रियाङ्गके आश्रित मानना चाहिए? परन्तु अङ्गाश्रित श्रुतिखे इस श्रुतिका भेद है। मतः क्रियाङ्गरहित मनोवृत्तियों में साङ्ग यज्ञका संपादन पुरुष में यज्ञ ध्यानके समान स्वतन्त्र है।

* यहाँ अतिदेश विकल्पके लिए नहीं है, क्योंकि साध्य वस्तुके एक होनेपर परस्पर अपेक्षा - रहित साधनोंका विकल्प हो सकता है, जैसे व्रीहि और यवका होता है। परन्तु यहाँ तो क्रियाग्नि और ध्यानाग्निका साध्य - फल भिन्न - भिन्न है। इससे समुच्चयका भी निराकरण समझना चाहिए। किञ्च यहाँ क्रियाङ्गत्वको लेकर भी सादृश्य नहीं है, किन्तु अग्नित्व सादृश्य को लेकर अविदेश है, क्योंकि इसमें श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, अनुबन्ध, अतिदेश भी प्रमाणरूप हैं।

इसका पूर्व मीमांसाके एकादश अध्याय में विचार किया गया है— ' राजा स्वराज्यकामो राजसूयेन यजेत ' ( स्वराज्यकी कामना करनेवाला राजा राजसूय याग करे ) इसप्रकार उपक्रम कर आगे ' आग्नेयोऽष्टाकपालों हिरण्यं दक्षिणा ' ' बैश्वदेवं चरूं पिशङ्गी पठौही दक्षिणा ' ' मैत्रावरुणीमामिक्षां वशा दक्षिणा ' ' बार्हस्पत्यं चरुं शितिपृष्ठो दक्षिणा ' ' ऐन्द्रमेकादश कपालमृषभो दक्षिणा ' इसप्रकार अवेष्टि नामकी पांच इष्टियोंका विधान है। इनमें वर्णके भेदसे प्रयोगका भेद सुना जाता है।

यदि ' ब्राह्मणो यजेत ० ' ( यदि ब्राह्मण याग करे तो बाहंस्पत्य चरुको मध्यमें ( तृतीय ) रखकर आहुति करे और अवशिष्ट घृतका अभिधारण करे - घृतकी धारा दे ) इसप्रकार यदि ' वैश्य हो तो वैश्वदेव चरुको मध्यमें रखकर आहुति करे ' ' यदि क्षत्रिय राजा हो तो ऐन्द्र चरु मध्यमें रखकर आहुति करे और अवशिष्ट घृतका अभिधारण करें। ' उसमें आग्नेय आदि चरुमोंमें अङ्गोका विधि शास्त्रसे प्रयोग है। इसीप्रकार ' एतयान्नाद्यकामं याजयेत् ' ( इस अवेष्टि द्वारा अन्नादि कामनावाला यजन करे ) यह एक वचन है।

और वह विधि वाक्यसे किया गया प्रयोग राजसूय यागसे बहिर्भूत अन्न आदिकी अभिलाषासे तीन वर्णों द्वारा की जाने वाली अवेष्टि इष्टिमें जानना चाहिए, राजसूययज्ञके अन्तर्गत नहीं। इसका ' क्रत्वर्थायामिति ' इस जैमिनि - सूत्र में निर्णय किया गया है | इसलिए मनश्चित् आदि अग्नियाँ स्वतन्त्र हैं॥ ५०

3.3.51 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५१

सूत्र ३.३.५१

न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ ३.३.५१ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 761

पदच्छेद — न , सामान्यात् , अपि , उपलब्धः , मृत्युवत् , नहि , लोकापत्तिः

सूत्रार्थ — ( सामान्यादपि ) मनश्चित् आदि अग्नियोंका मानस ग्रहके साथ [ मानसत्व ] सादृश्य होनेपर भी ( न ) वे क्रिया अङ्ग नहीं हैं, ( उपलब्ध : ) क्योंकि पूर्वोक्त श्रुति आदि हेतुओंसे स्वतन्त्र उपलब्ध होती हैं। ( मृत्युवत् ) जैसे ' स वा एष ' ' अग्निर्वै मृत्युः ' इत्यादिसे आदित्य पुरुष और अग्नि दोनोंमें मृत्यु शब्द समान होनेपर भी उनका अत्यन्त साम्य नहीं है। अथवा ( नहि लोकापत्तिः ) ' असो वाव लोको ० ' इत्यादिमें ' समिध् ' आदिके स्वादृश्य होनेपर भी द्युलोकमें अग्निश्वकी प्राप्ति नहीं है।

शाङ्करभाष्य

यदुक्तं मानसवदिति तत्प्रत्युच्यते। न मानसग्रहसामान्यादपि मनश्चिदादीनां क्रियाशेषत्वं कल्प्यम् पूर्वोक्तेभ्यः श्रुत्यादिहेतुभ्यः केवलपुरुषार्थत्वोपलब्धेः न हि किंचित् कस्यचित् केनचित् सामान्यं न संभवति न च तावता यथास्वं वैषम्यं निवर्तते मृत्युवत् यथास वा एष एव मृत्युर्य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः इतिअग्निर्वै मृत्युः इति च अग्न्यादित्यपुरुषयोः समानेऽपि मृत्युशब्दप्रयोगे न अत्यन्तसाम्यापत्तिः यथा चअसौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समित् इत्यत्र न समिदादिसामान्यात् लोकस्याग्निभावापत्तिः तद्वत्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह कहा गया है कि मानसके समान, उसका निराकरण किया जाता है। मानस ग्रहके साथ सादृश्य होनेपर भी मनश्चित् आदि अग्नियोंमें क्रियाङ्गत्वकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पूर्वोक्त श्रुति आदि हेतुमसे उनमें केवल पुरुषार्थत्व उपलब्ध होता है। किसीका किसीके साथ कुछ पुरुष है ) और ' अग्निर्वै मृत्यु : ' ( अग्नि ही मृत्यु है ) इसमें अग्नि और आदित्य पुरुष में मृत्यु शब्दका प्रयोग समान होनेपर भी दोनोंमें अत्यन्त साम्यको प्राप्ति नहीं होती। और जैसे ' असौ वाव लोको ० ' ( हे गौतम? यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है, उसका आदित्य ही समिधा है ) इसमें समिधा बादिके सादृश्यसे द्युलोक में अग्निभावकी प्राप्ति नहीं होती, वैसे ही प्रकरणमें समझना चाहिए॥ ५१

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.५३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.3.52 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५२

सूत्र ३.३.५२

परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात् त्व् अनुबन्धः ॥ ३.३.५२ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 762

पदच्छेद — परेण च शब्द य , ताद्विध्यम् भूयस्त्वात् , तु , अनुबन्धः

सूत्रार्थ — ( परेण ) ' अयं वात्र लोक .० ' इस उत्तर ब्राह्मणके साथ साम्य होने के कारण ( शब्दस्य ) मध्य ब्राह्मणका ( ताद्विध्यम् ) विद्या विधित्व प्रयोजन लक्षित होता है, क्योंकि ( भूयस्त्वावनुबन्धः ) मानस अग्निमें बहुत से अग्निके अन्यत्र संपाद्य होनेसे क्रिया अग्निके साथ उसका पाठ है।

शाङ्करभाष्य

परस्तादपिअयं वाव लोक एषोऽग्निश्चितः इत्यस्मिन् अनन्तरे ब्राह्मणे ताद्विध्यं केवलविद्याविधित्वम् शब्दस्य प्रयोजनं लक्ष्यते न शुद्धकर्माङ्गविधित्वम् तत्र हि विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः परागताः। न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्वनिः इत्यनेन श्लोकेन केवलं कर्म निन्दन् विद्यां च प्रशंसन् इदं गमयति। तथा पुरस्तादपियदेतन्मण्डलं तपति इत्यस्मिन्ब्राह्मणे विद्याप्रधानत्वमेव लक्ष्यते सोऽमृतो भवति मृत्युर्ह्यस्यात्मा भवति इति विद्याफलेनैव उपसंहारात् न कर्मप्रधानता। तत्सामान्यात् इहापि तथात्वम्। भूयांस्तु अग्न्यवयवाः संपादयितव्या विद्यायाम् इत्येतस्मात्कारणात् अग्निना अनुबध्यते विद्या न कर्माङ्गत्वात्। तस्मात् मनश्चिदादीनां केवलविद्यात्मकत्वसिद्धिः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — आगे मी ' अयं वाव लोको ० ' ( यही लोक यह अग्निश्चित् है ) इस अनन्तर ब्राह्मण में श्रुतिका प्रयोजन ताद्विध्य केवल विद्याविधित्व लक्षित होता है, शुद्ध कर्माङ्गविधित्व नहीं, क्योंकि उसमें ' विद्यया तदारोहन्ति ० ' ( विद्यासे उस स्थानको प्राप्त होते हैं जहाँ मनोरथ प्राप्त होते हैं, वहाँ कर्म कुशल नहीं जाते और अविद्वान् तपस्वी भी नहीं जाते ) इस श्लोक से केवल कर्मकी निन्दा करती हुई और विद्याकी प्रशंसा करती हुई श्रुति यह ( विद्याका प्राधान्य ) बोधित करती है। उसी प्रकार पूर्व में भी ' यदेतन्मडलं तपति ' ( जो यह मण्डल तपता है ) इस ब्राह्मण में विद्याका प्रधानत्व हो लक्षित होता है। ' सोऽमृतो भवति ० ' ( वह अमृत होता है, क्योंकि मृत्यु उसकी आत्मा है ) इस प्रकार विद्याफलसे हो उपसंहार होनेसे कर्म प्रधानता नहीं है। पूर्व और उत्तर ब्राह्मणत्त्रके सादृश्यसे यहाँ ( मध्यस्थ ब्राह्मणमें ) मी विद्याकी प्रधानता है। परन्तु विद्या में अग्निके बहुत से अवयव संपादन करने योग्य हैं, इसकारण से विद्या अग्निसे सम्बद्ध होती है, कर्मके अङ्गरूप होने नहीं। इसलिए मनश्चित् आदि अग्नियाँ केवल विद्यात्मक हैं, ऐसी सिद्धि होती॥ ५२

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.३.५३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

ऐकात्म्याधिकरणम्

3.3.53 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५३

सूत्र ३.३.५३

एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ३.३.५३ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 762

पदच्छेद — एके , आत्मनः शरीरे , भावात् । सामान्य न हो , ऐसा संभव नहीं है , और इतने मात्रसे प्रत्येक वस्तुकी अपनी स्वाभाविक विषमता निवृत्त नहीं हो जाती । मृत्युके समान जैसे ' स वा एष ० ' ( वह यही मृत्यु है जो यह इस मण्डलमें

शाङ्करभाष्य

इह देहव्यतिरिक्तस्य आत्मनः सद्भावः समर्थ्यते बन्धमोक्षाधिकारसिद्धये न हि असति देहव्यतिरिक्त आत्मनि परलोकफलाश्चोदना उपपद्येरन् कस्य वा ब्रह्मात्मत्वमुपदिश्येत।

ननु शास्त्रप्रमुख एव प्रथमे पादे शास्त्रफलोपभोगयोग्यस्य देहव्यतिरिक्तस्य आत्मनोऽस्तित्वमुक्तम् सत्यमुक्तं भाष्यकृता न तु तत्रात्मास्तित्वे सूत्रमस्ति इह तु स्वयमेव सूत्रकृता तदस्तित्वमाक्षेपपुरःसरं प्रतिष्ठापितम् इत एव च आकृष्य आचार्येण शबरस्वामिना प्रमाणलक्षणे वर्णितम् अत एव च भगवता उपवर्षेण प्रथमे तन्त्रे आत्मास्तित्वाभिधानप्रसक्तौ शारीरके वक्ष्याम इत्युद्धारः कृतः।

इह च इदं चोदनालक्षणेषु उपासनेषु विचार्यमाणेषु आत्मास्तित्वं विचार्यते कृत्स्नशास्त्रशेषत्वप्रदर्शनाय अपि च पूर्वस्मिन्नधिकरणे प्रकरणोत्कर्षाभ्युपगमेन मनश्चिदादीनां पुरुषार्थत्वं वर्णितम् कोऽसौ पुरुषः यदर्था एते मनश्चिदादयः इत्यस्यां प्रसक्तौ इदं देहव्यतिरिक्तस्य आत्मनोऽस्तित्वमुच्यते तदस्तित्वाक्षेपार्थमिदमादिमं सूत्रम् आक्षेपपूर्विका हि परिहारोक्तिः विवक्षितेऽर्थे स्थूणानिखननन्यायेन दृढां बुद्धिमुत्पादयेदिति।।

अत्र एके देहमात्रात्मदर्शिनो लोकायतिकाः देहव्यतिरिक्तस्य आत्मनोऽभावं मन्यमानाः समस्तव्यस्तेषु बाह्येषु पृथिव्यादिष्वदृष्टमपि चैतन्यं शरीराकारपरिणतेषु भूतेषु स्यादिति संभावयन्तस्तेभ्यश्चैतन्यम् मदशक्तिवत् विज्ञानम् चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः इति च आहुः। न स्वर्गगमनाय अपवर्गगमनाय वा समर्थो देहव्यतिरिक्त आत्मा अस्ति यत्कृतं चैतन्यं देहे स्यात् देह एव तु चेतनश्च आत्मा च इति प्रतिजानते।

हेतुं च आचक्षते शरीरे भावादिति यद्धि यस्मिन्सति भवति असति च न भवति तत् तद्धर्मत्वेनाध्यवसीयते यथा अग्निधर्मावौष्ण्यप्रकाशौ। प्राणचेष्टाचैतन्यस्मृत्यादयश्च आत्मधर्मत्वेनाभिमता आत्मवादिनाम् तेऽपि अन्तरेव देहे उपलभ्यमानाः बहिश्च अनुपलभ्यमानाः असिद्धे देहव्यतिरिक्ते धर्मिणि देहधर्मा एव भवितुमर्हन्ति। तस्मादव्यतिरेको देहादात्मन इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सुत्रार्थ - ( एके ) चार्वाक लोग ( आत्मनः ) देहसे अतिरिक्त आत्माका अस्तित्व नहीं मानते हैं, ( शरीरे ) क्योंकि शरीरके होनेपर ही ( मावात् ) आत्माके धर्मोका अस्तित्व है!

इस अधिकरणमें बन्ध और मोक्षके अधिकारकी सिद्धिके लिए देहसे पृथक् आत्मा के अस्तित्वका समर्थन किया जाता है। देहसे अतिरिक्त आत्माके न होनेपर परलोक फलवाले विधिवाक्योंकी उपपत्ति नहीं होगी और शास्त्र किसको ब्रह्मात्मत्वका उपदेश करेगा। परन्तु शास्त्र के आरम्भ [ पूर्वमीमांसा के ] प्रथम पादमें ही शास्त्रोक्त फलके उपभोगके योग्य, देहसे व्यतिरिक्त आत्माका अस्तित्व कहा गया है। ठीक माष्यकार ( यबरस्वामी ) ने ऐसा कहा है। परन्तु वहाँ देहसे अतिरिक्त आत्माका सद्भाव विषयक सूत्र नहीं है।

यहीं तो स्वयं ही सूत्रकारने आक्षेप पूर्वक देहसे अतिरिक्त आत्माका अस्तित्व प्रतिष्ठापित किया है। आचार्य शबरस्वामीने यहाँसे ही आकर्षण कर प्रमाणलक्षण ( प्रथम अध्याय ) में देहसे पृथक् आत्माका वर्णन किया है। अतएव भगवान् उपवर्षने पूर्वमीमांसा में आत्माके अस्तित्वके कथनका प्रसंग आनेपर हम इसे शारीरकमें कहेंगे, ऐसा कहकर उपरत हुए हैं अर्थात् प्रकरण समाप्त किया है।

और यहाँ चोदना लक्षण - विघिसें ज्ञापित विचार्यमाण उपासनाओं में समस्त शास्त्रका आत्मास्तित्व अङ्ग है, इस प्रदर्शन के लिए आत्माके अस्तित्वका यह विचार किया जाता है। किश्च पूर्वं अधिकरणमें क्रतुके प्रकरणसे उत्कर्षं स्वीकारकर मनश्चित् आदि अग्नियोंमें पुरुषार्थत्व वर्णित किया जाता है। वह पुरुष कौन है, जिसके लिए ये मनश्चित् आदि अग्नियाँ हैं? ऐसा प्रश्न उपस्थित होनेपर देहसे अतिरिक्त यह आत्माका अस्तित्व कहा जाता है। उस अस्तित्वके आक्षेपके लिए यह प्रथम सूत्र है।

आक्षेप पूर्वक कहा गया परिहार स्थूणानिखनन न्यायसे विवक्षित अर्थमें दृढ बुद्धि उत्पन्न करेगा। आत्मविचारके प्रसङ्गमें देहमात्रको मात्मा देखनेवाले कुछ लोकायतिक लोग देहसे व्यतिरिक्त आत्मा का अभाव मानते हुए समस्त धोर व्यस्त बाह्य पृथिवी आदिमें अदृष्ट भी चैतन्य शरीरके आकारमें परिणत भूतोंमें होना चाहिए, इस प्रकार उन भूतोंसे चैतन्यकी संभावना करते हुए मदशक्तिके समान विज्ञान है और चैतन्य विशिष्टकाय पुरुष है, ऐसा कहते हैं।

स्वर्ग में जाने के लिए अथवा मोक्ष प्राप्त करनेके लिए देहसे अतिरिक्त समर्थ आत्मा नहीं है, जिसके प्रभावसे देहमें चैतन्य हो, देह ही चेतन और आत्मा है, ऐसी प्रतिज्ञा करते हैं। इस प्रतिज्ञात अर्थमें होतु कहते हैं— ' शरीरे मावात् ' शरीरके होनेपर ही आत्माके धर्मोका अस्तित्व है। क्योंकि जिसके होनेपर होता है और न होनेपर नहीं होता, वह उसका धर्मरूपसे निश्चित किया जाता है। जैसे अग्निके धर्म औष्ण्य और प्रकाश निश्चित किये जाते हैं।

प्राण, चेष्टा, चैतन्य और स्मृति आदि जो आत्मवादियोंके आत्मघमंरूपसे अभिमत हैं, वे भी देहके अन्दर ही उपलब्ध होते हुए बाहर उपलब्ध नहीं होते हुए देहसे व्यतिरिक्त धर्मोके असिद्ध होनेपर देहके ही धर्मं होने चाहिए। इसलिए देहरूप आत्मासे अतिरिक्त आत्मा नहीं है॥ ५३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — चैतन्य विशिष्ट यह भूतोंका संघात्मक देह ही बात्मा है। इसमें ' यदि ' इत्यादिसे अन्वयव्यतिरेक द्वारा देहको आत्मा सिद्ध करते हैं। किश्व ' मैं गोरा हूँ, मैं कृष्ण हूँ, मैं जाता हूँ ' इत्यादि प्रसिद्ध प्रतीतियों का विषय भी यह देह ही है। अतः देह ही आत्मा है। विशेष विस्तार ( ब्रह्मसूत्र १।१।१ ) में है।। ५३

3.3.54 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५४

सूत्र ३.३.५४

व्यतिरेकस्तद्भावभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ३.३.५४ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 764

पदच्छेद — व्यतिरेकः , तद्भावाभावित्वात् न , तु , उपलब्धिवत्

सूत्रार्थ — ( व्यतिरेकः ) आत्मा देहसे व्यतिरिक्त है, ( तद्भावामावित्वात् ) क्योंकि मृतका - वस्था में देहके होनेपर भी आत्मा के चैतन्य आदि धर्मोका अस्तित्व नहीं है। ( नतूपलब्धिवत् ) जैसे भूतोंकी उपलब्धि भूतोंका धर्म नहीं है, वैसे मौतिक देहकी उपलब्धि भी देहका धर्म नहीं है, किन्तु उससे भिन्न है।

शाङ्करभाष्य

न त्वेतदस्ति यदुक्तमव्यतिरेको देहादात्मन इति व्यतिरेक एव अस्य देहाद्भवितुमर्हति तद्भावाभावित्वात् यदि देहभावे भावात् देहधर्मत्वम् आत्मधर्माणां मन्येत ततो देहभावेऽपि अभावात् अतद्धर्मत्वमेव एषां किं न मन्येत देहधर्मवैलक्षण्यात् ये हि देहधर्मा रूपादयः ते यावद्देहं भवन्ति प्राणचेष्टादयस्तु सत्यपि देहे मृतावस्थायां न भवन्ति देहधर्माश्च रूपादयः परैरप्युपलभ्यन्ते न त्वात्मधर्माश्चैतन्यस्मृत्यादयः।

अपि च सति हि तावत् देहे जीवदवस्थायाम् एषां भावः शक्यते निश्चेतुम् न तु असत्यभावः पतितेऽपि कदाचिदस्मिन्देहे देहान्तरसंचारेण आत्मधर्मा अनुवर्तेरन् संशयमात्रेणापि परपक्षः प्रतिषिध्यते। किमात्मकं च पुनरिदं चैतन्यं मन्यते यस्य भूतेभ्य उत्पत्तिमिच्छति इति परः पर्यनुयोक्तव्यः न हि भूतचतुष्टयव्यतिरेकेण लोकायतिकः किंचित् तत्त्वं प्रत्येति यत् अनुभवनं भूतभौतिकानाम् तत् चैतन्यमिति चेत् तर्हि विषयत्वात्तेषाम् न तद्धर्मत्वमश्नुवीत स्वात्मनि क्रियाविरोधात्।

न हि अग्निरुष्णः सन् स्वात्मानं दहति न हि नटः शिक्षितः सन् स्वस्कन्धमधिरोक्ष्यति। न हि भूतभौतिकधर्मेण सता चैतन्येन भूतभौतिकानि विषयीक्रियेरन् न हि रूपादिभिः स्वरूपं पररूपं वा विषयीक्रियते विषयीक्रियन्ते तु बाह्याध्यात्मिकानि भूतभौतिकानि चैतन्येन। अतश्च यथैव अस्या भूतभौतिकविषयाया उपलब्धेर्भावोऽभ्युपगम्यते एवं व्यतिरेकोऽपि अस्यास्तेभ्यः अभ्युपगन्तव्यः उपलब्धिस्वरूप एव च न आत्मेति आत्मनो देहव्यतिरिक्तत्वम्।

नित्यत्वं च उपलब्धेः ऐकरूप्यात्अहम् इदम् अद्राक्षम् इति च अवस्थान्तरयोगेऽप्युपलब्धृत्वेन प्रत्यभिज्ञानात् स्मृत्याद्युपपत्तेश्च। यत्तूक्तम् शरीरे भावाच्छरीरधर्म उपलब्धिरिति तत् वर्णितेन प्रकारेण प्रत्युक्तम्। अपि च सत्सु प्रदीपादिषु उपकरणेषु उपलब्धिर्भवति असत्सु न भवतीति न च एतावता प्रदीपादिधर्म एव उपलब्धिर्भवति एवं सति देहे उपलब्धिर्भवति असति च न भवतीति न देहधर्मो भवितुमर्हति उपकरणत्वमात्रेणापि प्रदीपादिवत् देहोपयोगोपपत्तेः।

न च अत्यन्तं देहस्य उपलब्धावुपयोगोऽपि दृश्यते निश्चेष्टेऽप्यस्मिन्देहे स्वप्ने नानाविधोपलब्धिदर्शनात्। तस्मादनवद्यं देहव्यतिरिक्तस्य आत्मनोऽस्तित्वम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-

सिद्धान्ती - यह जो कहा गया है कि देहरूप आत्मासे पृथक् आत्मा नहीं है। वह ठीक नहीं है। आत्माका देहसे अतिरिक्त होना ही युक्त है, क्योंकि देहके होनेपर आत्मा के धर्मोंका अभाव है। यदि देहके अस्तित्वमें आत्मधर्मोका सद्भाव होनेसे आत्मधमं देह घमं माने जाँय तो देहके अस्तित्वमें मी आत्मा चैतन्य आदि धर्मोका अभाव होनेसे ये आत्मधर्म देहके धर्मं नहीं है, ऐसा क्यों नहीं माना जाय? क्योंकि वे देहके धर्मोसे विलक्षण हैं।

जो रूप आदि देहके धर्म हैं वे देह पर्यन्त हैं और प्राण, चेष्टा आदि तो मरणावस्थामें देहके होनेपर भी नहीं होते। रूप आदि देहके धर्म दूसरों से मी उपलब्ध होते हैं। परन्तु चैतन्य, स्मृति आदि आत्मधर्म अन्योंसे उपलब्ध नहीं होते। इसप्रकार जीवितावस्था में देहके विद्यमान होनेपर इन धर्मोका अस्तित्व निश्चित किया जा सकता है। परन्तु देह न होनेपर इनका अभाव निश्चित नहीं किया जा सकता, क्योंकि कदाचित् देहके पतित होनेपर मी आत्मधर्म अन्य देहमें संचारसें अनुवृत्त हो सकते हैं।

इसप्रकार केवल संशय से भी परपक्षका प्रतिषेध किया जाता है 1। जिस चैतन्यकी भूतोंसे उत्पत्तिको इच्छा करते हो उस चैतन्यका स्वरूप क्या मानते हो ऐसा वादिसे पूछना चाहिए, क्योंकि लोकायतिक चार भूतोंसे अतिरिक्त किसी पदार्थको नहीं मानते। यदि कहो कि भूत और भौतिकोंका जो अनुभव है वही चैतन्य है, तो उन भूत और मौतिकों में चैतन्यका विषयत्व होनेसे चैतन्य उनका धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि अपनेमें क्रियाका विरोध है।

जैसे अग्नि उष्ण होती हुई अपनेको नहीं जलाती, नट शिक्षित होता हुआ भी अपने कंधोंपर नहीं चढ सकता, वैसे भूत और भौतिकों का धर्मं होते हुए चैतन्यसे भूत भौतिक विषय नहीं किये जा सकते। जैसे रूप आदिसे ( भूत - भौतिक धर्मसे ) अपना रूप अथवा अन्यका रूप विषय नहीं किया जाता। परन्तु बाह्य और आध्यात्मिक भूत - भौतिक पदार्थ चैतन्यसे विषय किये जाते हैं। इसलिए जैसे भूत- भौतिक विषयक इस उपलब्धिका अस्तित्व स्वीकार किया जाता है, वैसे ही उनसे इस उपलब्धिका व्यतिरेक मी स्वीकार करना चाहिए।

' हमारे मत में तो आत्मा उपलब्धि स्वरूप ही हैं ' इस प्रकार आत्मा देहसे व्यतिरिक्त है। और एक रूप होनेसे उपलब्धि नित्य है, कारण कि ' मैंने यह देखा ' इस प्रकार अन्य व्यवस्थाका सम्बन्ध होनेपर भी उपलब्धरूपसे प्रत्यभिज्ञान होता है और स्मृति आदिकी उपपत्ति होती है। जो यह कहा गया कि शरीरमें अस्तित्व होनेसे उपलब्धि शरीरका धर्म है, वह भी वर्णित प्रकारसे निराकृत हुआ।

किञ्च प्रदीप आदि उपकरणोंके विद्यमान होनेपर उपलब्धि होती है उनके विद्यमान न होनेपर नहीं होती, इतनेमात्रसे उपलब्धि प्रदीपका धर्म नहीं हो जाती। इसप्रकार देहके होनेपर उपलब्धि होती है उनके न होनेपर नहीं होती, इससे देहका धर्म नहीं हो सकती, क्योंकि उपलब्धिके उपकरणमात्र से भी प्रदीप आदिके समान देहका उपयोग हो सकता है। किन्तु उपलब्धि में देहका अत्यन्त उपयोग नहीं देखा जाता, कारण कि इस देहके निश्चेष्ट होनेपर भी स्वप्न में अनेक प्रकारकी उपलब्धि देखने में आती है।

इसलिए देहसे अतिरिक्त मा अस्तित्व दोष रहित है॥ ५४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * देहके रूपादि धर्मं बाह्य और नेत्र आदि इन्द्रियोंसे ग्राह्य हैं और आत्मधमं आन्तर हैं वे स्वयं जाने जाते हैं अथवा दूसरेसे अनुमेय हैं। इसलिए तुमको विना इच्छाके भी अनुमान आदि प्रमाण मानने पड़ेंगे, नहीं तो व्यवहारकी सिद्धि नहीं होगी। जैसे कि मुखाकृति देखने से परपुरुषवर्ती सुख आदिका ज्ञान, पर्वत आदिमें धूम आदिसे अग्नि आदिका ज्ञान आदि नहीं होगे, इसलिए ' ज्ञानादयः देहव्यतिरिक्ताश्रयाः देहसत्वेऽप्यसत्त्वात् व्यतिरेकेण देहरूपादिवत् ' ( ज्ञान आदि देह व्यतिरिक्त आश्रित हैं, क्योंकि देहके अस्तित्वमें भी उनका अभाव है, व्यतिरेकसे जैसे देहके रूपादि ) इस प्रकार प्रत्यक्ष से भिन्न अनुमान प्रमाणसे भी आत्मा देहसे पृथक् सिद्ध होता है। मरणकाल में चैतन्य आदि धर्मों के देहमें उपलब्ध न होनेसे उनका अभाव निश्चित नहीं किया जा सकता, क्योंकि तुम्हारे मत में अनुपलब्धि प्रमाण नहीं है और उनके धर्मी आत्माका देहान्तर प्राप्ति से भी अनुपलम्भ उपपन्न होता है। इसप्रकार संशयमात्र से भी परपक्षका प्रतिषेध किया जाता है। ' उपलब्धिवत् ' इस सूत्रस्थ पदका व्याख्यान करनेके लिए अब ' किमात्मकम् ' इत्यादि भूमिका रचते हैं।

* क्या यह चैतन्यं भूतोंसे भिन्न तत्त्व है अथवा रूप आदिके समान भूतोंका धर्म है? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि तुमने चारों भूतोंसे अतिरिक्त पदार्थ स्वीकार नहीं किया है, इसलिए तुम्हारे सिद्धान्तकी हानि होगी। द्वितीय पक्षका ' यदनुभवनम् ' इत्यादिसे निराकरण करते हैं। अनुभव तो चैतन्य है और भूत जड़ हैं, ऐसी स्थिति में चैतन्य जड़ भूतोंका धर्म नहीं हो सकता है। वेदान्तसिद्धान्त में उपलब्धि ही आत्मा है। ' आत्मा, देहाद्भिन्नः ", उपलब्धिरूपत्वात् उपलब्धिवत् ' ( आत्मा देहसे भिन्न है उपलब्धिरूप होनेसे, उपलब्धिके समान ) इससे आत्मा मी उपलब्धिरूप होनेसे नित्य ही है। अब तक तो पूर्वपक्षके मठका अवलम्बन कर कहा गया है। परन्तु आगे अपना अभिमत ' न चास्यन्तं ' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं। ' मैं मनुष्य हूँ ' इत्यादि देह विषयक अभेद ज्ञान भ्रमात्मक है, अतः वह देहको आत्मा सिद्ध करनेमें समर्थ नहीं। इसलिए उपलब्धिस्वरूप आत्माका देहसे पृथक् अस्तित्व सिद्ध है॥ ५४

अङ्गावबद्धाधिकरणम्

3.3.55 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५५

सूत्र ३.३.५५

अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ॥ ३.३.५५ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 766

पदच्छेद — अङ्गावबद्धाः , तु , न , शाखासु , हि , प्रतिवेदम्

सूत्रार्थ — ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है, ( अङ्गावबद्धा :) मङ्गाश्रित उद्गीथ आदि उपासनाएं ( प्रतिवेदम् ) प्रत्येक वेद ( शाखासु ) अपनी - अपनी शाखा में व्यवस्थित ( न ) नहीं होनी चाहिए, किन्तु सर्वं शाखाओंमें अनुवृत्त होनी चाहिए, ( हि ) क्योंकि ' उद्गीथमुपासीत ' इस प्रकार उद्गीथ आदिकी अविशेष श्रुति है।

शाङ्करभाष्य

समाप्ता प्रासङ्गिकी कथा संप्रति प्रकृतामेवानुवर्तामहे।ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतलोकेषु पञ्चविधं सामोपासीतउक्थमुक्थमिति वै प्रजा वदन्ति तदिदमेवोक्थम्इयमेव पृथिवीअयं वाव लोकःएषोऽग्निश्चितः इत्येवमाद्या ये उद्गीथादिकर्माङ्गावबद्धाः प्रत्ययाः प्रतिवेदं शाखाभेदेषु विहिताः ते तच्छाखागतेष्वेव उद्गीथादिषु भवेयुः अथवा सर्वशाखागतेषु इति विशयः। प्रतिशाखं च स्वरादिभेदात् उद्गीथादिभेदानुपादाय अयमुपन्यासः।

किं तावत्प्राप्तम् स्वशाखागतेष्वेव उद्गीथादिषु विधीयेरन्निति कुतः संनिधानात् उद्गीथमुपसीत इति हि सामान्यविहितानां विशेषाकाङ्क्षायां संनिकृष्टेनैव स्वशाखागतेन विशेषेण आकाङ्क्षादिनिवृत्तेः तदतिलङ्घनेन शाखान्तरविहितविशेषोपादाने कारणं नास्ति। तस्मात्प्रतिशाखं व्यवस्थेत्येवं प्राप्ते ब्रवीति अङ्गावबद्धास्त्विति। तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति।

नैते प्रतिवेदं स्वशाखास्वेव व्यवतिष्ठेरन् अपि तु सर्वशाखास्वनुवर्तेरन् कुतः उद्गीथादिश्रुत्यविशेषात् स्वशाखाव्यवस्थायां हिउद्गीथमुपासीत इति सामान्यश्रुतिरविशेषप्रवृत्ता सती संनिधानवशेन विशेषे व्यवस्थाप्यमाना पी़डिता स्यात् न चैतन्न्याय्यम् संनिधानाद्धि श्रुतिर्बलीयसी न च सामान्याश्रयः प्रत्ययो नोपपद्यते। तस्मात् स्वरादिभेदे सत्यपि उद्गीथत्वाद्यविशेषात् सर्वशाखागतेष्वेव उद्गीथादिषु एवंजातीयकाः प्रत्ययाः स्युः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रासङ्गिक कथा समाप्त हुई। अब हम प्रकृत कथाकी अनुवृत्ति करते हैं- ' भोमित्येदक्षरम् ० ' ( ॐ इस अक्षर उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) ' लोकेषु ० ' ( पृथिवी आदि लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए ) ' उक्थमुक्थमिति ० ' ( प्रजा उक्य उक्थ ऐसा कहती हैं, वह उक्थ यही वक्ष्यमाण है, जो उक्थ है, वह यही पृथिवी है ) ' अयं वाव लोकः ० ' ( यह लोक है, यह अग्निश्चित् है ) इत्यादि कर्माङ्गवे सम्बन्धित उद्गीथ आदि उपासनाएँ जो प्रत्येक वेदमें भिन्न - भिन्न शाखाओं में विहित हैं, क्या वे तत् तत् शाखागत उद्गीथ आदिमें होनी चाहिए अथवा सर्वंशाखागत उद्गीथ आदिमें होनी चाहिए? ऐसा संशय होता है। प्रत्येक शाखा में स्वर आदि भेदसे उद्गीथ आदि भेदों को लेकर यह उपन्यास है। तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - अपनी शाखागत उद्गीथ आदिमें ही विद्याओंका विधान करना चाहिए। किससे? इससे कि संनिधान है। ' उद्गीथमुपासीत ' ( उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) इस प्रकार सामान्यसे विहित विद्याओंको विशेषकी आकांक्षा होनेपर संनिकृष्ट स्व शाखागत विशेषसे ही आकाङ्क्षा आदिकी निवृत्ति होती है, अतः उसका अतिक्रमणकर अन्य शाखामें विहित विशेषके उपादानमें कारण नहीं है, इसलिए प्रत्येक शाखामें व्यवस्था है। सिद्धान्ती -

ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - ' अङ्गावबद्धास्तु ' | ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है। ये उपासनाएँ प्रत्येक वेदमें अपनी शाखामें ही व्यवस्थित नहीं होनी चाहिए, किन्तु सर्वं शाखाओं में अनुवृत्त होनो चाहिए, किससे? उद्गीथ आदि श्रुति अविशेष होने से, अपनी शाखा में व्यवस्था होनेपर ' उद्गीथमुपासीत ' यह सामान्य श्रुनि अविशेषरूपसे प्रवृत्त होती हुई संनिधिके बलसे विशेष में व्यवस्थापित होकर बाधित हो, यह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुति संनिधिसे बलवती है। और सामान्यके आश्रयसे विद्या उपपन्न नहीं होती ऐसा भी नहीं है। इससे स्वर आदिके भेद होनेपर मी उद्गोथत्व आदिके अविशेष होने से सब शाखागत उद्गीथ आदिमें इस प्रकारकी उपासनाएँ होनी चाहिए।। ५५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * देहके विद्यमान होनेपर चैतन्य है, किन्तु देहके विद्यमान होनेपर जैसे चैतन्यका अभाव मी है, वैसे उद्गीथ आदिके सद्भावमें उपासना है, किन्तु उद्गीथ आदिके सद्भावमें उपासना के अभाव की आशङ्काकर ' अङ्गावबद्धा ' इत्यादिसे कहते हैं। इस प्रकार प्रासङ्गिक कथा समाप्तकर अब प्रकृत उद्गीथ जादि उपासनाओंकी ‘ ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ' इत्यादिसे अनुवृत्ति करते हैं। ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ’ यथा ‘ पृथिवी हिंकारोऽग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथं आदित्यः प्रतिहारो यौनिधनम् ' ( छा ० २२1१ ) ( हिकार पृथिवी है, प्रस्ताव अग्नि है, उद्गीथ अन्तरिक्ष है, प्रतिहार आदित्य है और विधन द्युलोक हैं, इस प्रकार हिकार आदि पाँच प्रकारके सामकी पृथिवी आदि दृष्टिसे उपासना करनी चाहिए ) उक्थ नामके शस्त्र अप्रगीत ऋक् पृथिवी दृष्टि करनी चाहिए, इष्टिकाचित् अग्निमें लोकदृष्टि करनी चाहिए, इस प्रकार कर्माङ्गके आश्रित उपासनाएँ हैं। ' उद्गीथमुपासीत ' इस प्रकार उद्गीथादि साधारण श्रतिसे और विशेष संनिधिसे संशय होनेपर पूर्वपक्षी - ' स्वश। खागते ' इत्यादिसे कहते हैं, सिद्धान्ती - ' एवं प्राप्ते ब्रवीति ' से कहते हैं।। ५५

3.3.56 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५६

सूत्र ३.३.५६

मन्त्रादिवद्वाविरोधः ॥ ३.३.५६ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 768

पदच्छेद — मन्त्रादिवत् , वा , अविरोधः

सूत्रार्थ — ( अविरोधः ) एक शाखा में विहित उद्गीथ आदिकी अन्य शाखागत उद्गीथ आदिमें प्राप्ति होनेपर भी विरोध नहीं है, ( मन्त्रादिवत् ) जैसे एक शाखागत मन्त्र, कर्म और गुणोंका भी अन्य शाखा में उपसंग्रह देखा जाता है।

शाङ्करभाष्य

अथवा नैवात्र विरोधः शङ्कितव्यः कथमन्यशाखागतेषु उद्गीथादिषु अन्यशाखाविहिताः प्रत्यया भवेयुरिति मन्त्रादिवत् अविरोधोपपत्तेः। तथा हि मन्त्राणां कर्मणां गुणानां च शाखान्तरोत्पन्नानामपि शाखान्तरे उपसंग्रहो दृश्यते येषामपि हि शाखिनाम्कुटरुरसि इत्यश्मादानमन्त्रो नाम्नातः तेषामपि असौ विनियोगो दृश्यते कुक्कुटोऽसीत्यश्मानमादत्ते कुटरुरसीति वा इति येषामपि समिदादयः प्रयाजा नाम्नाताः तेषामपि तेषु गुणविधिराम्नायते ऋतवो वै प्रयाजाः समानत्र होतव्याः इति तथा येषामपिअजोऽग्नीषोमीयः इति जातिविशेषोपदेशो नास्ति तेषामपि तद्विषयो मन्त्रवर्ण उपलभ्यते छागस्य वपाया मेदसोऽनुब्रूहि इति तथा वेदान्तरोत्पन्नानामपिअग्नेर्वेर्होत्रं वेरध्वरम् इत्येवमादिमन्त्राणां वेदान्तरे परिग्रहो दृष्टः तथा बह्वृचपठितस्य सूक्तस्ययो जात एव प्रथमो मनस्वान् इत्यस्यअध्वर्यवे सजनीयं शस्यम् इत्यत्र परिग्रहो दृष्टः। तस्मात् यथा आश्रयाणां कर्माङ्गानां सर्वत्रानुवृत्तिः एवम् आश्रितानामपि प्रत्ययानाम् इत्यविरोधः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अथवा यहाँ ऐसी विरोधकी शङ्का नहीं करनी चाहिए कि अन्य शाखा में विहित उद्गीथ आदि उपासनाएँ अन्य शाखागत उद्गीय आदिमें किस प्रकार होंगी? क्योंकि मन्त्र आदिके समान अविरोध उपपन्न होता है। जैसे कि एक शाखा में विहित मन्त्र, कर्म और गुणोंका अन्य शाखामें अपसंग्रह देखा जाता है। जिन शाखावालोंके ' कुटरुरसि ' ( काण्व संहिता ) ( तू कुक्कुट है ) इसप्रकार अरमादान ( पत्थरादान ) मन्त्र पठित नहीं है।

उनके मी ' कुक्कुटोऽसि ' ( शु ० यजु ० माध्यन्दिन ) ( तू कुक्कुट है ) इस मन्त्रका अश्मादानमें विनियोग देखा जाता है अर्थात् इस मन्त्रको पढकर अश्मका ग्रहण करना चाहिए अथवा ' कुटरुरसि ' इस मन्त्रको पढकर अश्मका ग्रहण करना चाहिए। इसप्रकार जिन शाखावालोंके समिघ् आदि प्रयाज पठित नहीं है, उनकी शाखाओं में भी ' ऋतवो वै ० ' ( ऋतु ही प्रयाज हैं, समानदेश - एकस्थान में ही उनका होम करना चाहिए ) इसप्रकार उनमें गुणविधि कही जाती है।

और जिन शाखावालोंमें ' अजोऽग्नीषोमीयः ' ( अज अग्नीषोमीय है ) इस प्रकार जाति विशेषका उपदेश नहीं है, उन शाखावालोंमें मी ' छागस्य वपाया ० ' ( छाग- बकरा की वपाके मेदके होमार्थं अनुवाक्या कहो ) ऐसा तद्विषयक मन्त्रवर्णं उपलब्ध होता है। तथा अन्य वेदमें उत्पन्न हुए ' अग्नेर्वेर्होत्रं वेरध्वरम् ' ( देवताओंके होत्र और अध्वर कर्म अग्निसे सम्पन्न होते हैं ) इत्यादि मन्त्रोंका भी अन्य वेदमें परिग्रह देखा गया है।

इसीप्रकार ' यो जात एव ० ' ( जो उत्पन्न हुआ हीबालक ही गुणोंसे श्रेष्ठ और मनस्वी हुआ, हे जनो! वह इन्द्र है ) इस बह्वृचों - होताओंद्वारा पठित सूक्तका ' अध्वर्थवे सजनीयं शस्यम् ' ( अध्वर्युद्वारा किये गये प्रयोगमें सजनीय – ' स जनास इन्द्र ' [ हे जनो! वह इन्द्र है ] यह सूक्त कहना चाहिए ) इसमें परिग्रह देखा जाता है। इसलिए जैसे आश्रय कर्माङ्गोको सर्वत्र अनुवृति है, वैसे ही आश्रित उपासनाओंकी भी सर्वत्र अनुवृत्ति है, अतः इसमें कोई विरोध नहीं है।। ५६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व सूत्रमें - एक शाखा में विहित उद्गीथ आदि उपासनाओंका अन्य शाखागत अङ्गके साथ सम्बन्ध होने में जो विरोध प्रतीत हुआ था, उसे अङ्गीकारकर उनका सम्बन्ध कहा गया है। अब उनका विरोध ही नहीं है, क्योंकि एक शाखामें विहित अङ्गोंका अन्य शाखा में स्थित अङ्गों के साथ सम्बन्ध जैसे उपपन्न होता है, वैसे ही यह सम्बन्ध उपपन्न है। अब इसे ' अथवा ' इत्यादिसे कहते हैं।

अविरोधमें क्रमशः मन्त्र, कर्म और गुणोंका ' तथा येषामपि ' इत्यादिसे उदाहरण देते हैं। मन्त्र - यद्यपि यजुर्वेदियों का ' कुक्कुटोऽसि ' ऐसा मन्त्र है ' कुटरुरसि ' ऐसा मन्त्र नहीं है, तो भी तण्डुलपेषण के लिए अश्मादानमें ( पत्थर ग्रहण में ) दोनों मन्त्रोंका विकल्पसे विनियोग होनेके कारण कुटरुरसि ' यह मन्त्र भी प्राप्त होता है। शाखा भेदसे इन दोनों मन्त्रोंकी आनुपूर्वी भिन्न भिन्न होनेपर भी दोनोंके अर्थमें भेद नहीं है। भगवान् माष्यकारने सूत्रस्थ आदि अदसे कर्म और गुणका ग्रहण किया है।

कर्मका उदाहरण - मैत्रायणी शाखावालोंके ' समिधो यजति तनूनपातं यजति, ईडो यजति, बर्हिर्यजति, स्वाहाकारं यजति ' इस प्रकार यागके अङ्गभूत समिघ् आदि पाँच प्रयाज नहीं पढे गये हैं। हेमन्त और शिशिर इन दोनों ऋतुओंको मिलाकर द्वादशमासमें पांच ऋतु हैं, इसप्रकार प्रयाज भी पांच हैं, उनका समानदेश में गुणविधिसे होम करना चाहिए। इसप्रकार एक शाखा में विहित कर्मोंका अन्य शाखामें संग्रह देखनेमें आता है।

गुणका उदाहरण - ' अग्नीषोमीयं पशु॒मालभेत ' इसप्रकार यजुर्वेदियों की श्रुतिमें सामान्यरूपसे अग्नीषोमीय पशु कहा गया है, ' अज ' ऐसा जाति विशेष नहीं। ' छागस्य वपाया मेदसोऽनुब्रूहि ' ' छागो वा मन्त्रवर्णात् ' ( जै ० सू ० ६।६ ) ( मन्त्र वर्णनसे अज लेना चाहिए ) इस मन्त्र के आधार पर यह जैमिनि सूत्र है। इसप्रकार प्रेषमन्त्रलिङ्गसे ' अज ' जाति विशेषका संग्रह होता है। मन्त्रोंका ' तथा ' इत्यादिसे दूसरा उदाहरण कहते हैं -

. ' अग्नेर्वेर्होत्रं वेरध्वरम् ' इसप्रकार साम वेदस्थ मन्त्रोंका यजुर्वेदमें ग्रहण होता है। इसप्रकार जैसे एक शाखा में विहित मन्त्र आदिका अन्य शाखामें परिग्रह होता है, वैसे ही एक शाखा में विहित उद्गीथ आदि उपासनाओंका भी अन्य शाखा में ग्रहण होता है॥ ५६

भूमज्यायस्त्वाधिकरणम्

3.3.57 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५७

सूत्र ३.३.५७

भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्वं तथा हि दर्शयति ॥ ३.३.५७ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 769

पदच्छेद — भूम्नः क्रतुवत् , ज्यायस्त्वम् , तथा , हि , दर्शयति

सूत्रार्थ — ( भूम्नः ) ' प्राचीनशाल औपमन्यवः ' इत्यादिमें समस्तोपासनाका ही ( ज्यायस्त्रम् ) प्रधानरूपसे प्रतिपादन है। ( क्रतुवत् ) जैसे दर्शपूर्णमास यागमें एक ही साङ्गप्रघानका प्रयोग होता है। ( हि ) क्योंकि ' तस्य ह वा ' यह श्रुति भी व्यस्त उपासनाकी निन्दाकर ( तथा ) उसी प्रकार समस्त उपासना की प्रतिपत्ति ( दर्शयति ) दिखलाती है।

शाङ्करभाष्य

प्राचीनशाल औपमन्यवः इत्यस्यामाख्यायिकायां व्यस्तस्य समस्तस्य च वैश्वानरस्य उपासनं श्रूयते। व्यस्तोपासनं तावत् औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से इत्यादि तथा समस्तोपासनमपि तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो वस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ इत्यादि। तत्र संशयः किमिह उभयथापि उपासनं स्यात् व्यस्तस्य समस्तस्य च उत समस्तस्यैवेति।

किं तावत्प्राप्तम् प्रत्यवयवं सुतेजः प्रभृतिषुउपास्से इति क्रियापदश्रवणात्तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते इत्यादिफलभेदश्रवणाच्च व्यस्तान्यप्युपासनानि स्युः इति प्राप्तम्।।

ततोऽभिधीयते भूम्नः पदार्थोपचयात्मकस्य समस्तस्य वैश्वानरोपासनस्य ज्यायस्त्वं प्राधान्येन अस्मिन्वाक्ये विवक्षितं भवितुमर्हति न प्रत्येकम् अवयवोपासनानामपि क्रतुवत् यथा क्रतुषु दर्शपूर्णमासप्रभृतिषु सामस्त्येन साङ्गप्रधानप्रयोग एव एको विवक्ष्यते न व्यस्तानामपि प्रयोगः प्रयाजादीनाम् नाप्येकदेशाङ्गयुक्तस्य प्रधानस्य तद्वत्।

कुत एतत् भूमैव ज्यायानिति तथा हि श्रुतिः भूम्नो ज्यायस्त्वं दर्शयति एकवाक्यतावगमात् एकं हि इदं वाक्यं वैश्वानरविद्याविषयं पौर्वापर्यालोचनात्प्रतीयते तथा हि प्राचीनशालप्रभृतय उद्दालकावसानाः षट् ऋषयः वैश्वानरविद्यायां परिनिष्ठामप्रतिपद्यमानाः अश्वपतिं कैकेयं राजानमभ्याजग्मुः इत्युपक्रम्य एकैकस्य ऋषेरुपास्यं द्युप्रभृतीनामेकैकं श्रावयित्वामूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच इत्यादिना मूर्धादिभावं तेषां विदधातिमूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्यः इत्यादिना च व्यस्तोपासनमपवदति पुनश्च व्यस्तोपासनं व्यावर्त्य समस्तोपासनमेवानुवर्त्यस सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति इति भूमाश्रयमेव फलं दर्शयति।

यत्तु प्रत्येकं सुतेजःप्रभृतिषु फलभेदश्रवणम् तत् एवं सति अङ्गफलानि प्रधान एवाभ्युच्चिनोति इति द्रष्टव्यम्। तथाउपास्से इत्यपि प्रत्यवयवमाख्यातश्रवणं पराभिप्रायानुवादार्थम् न व्यस्तोपासनविधानार्थम्। तस्मात्समस्तोपासनपक्ष एव श्रेयानिति।। केचित्तु अत्र समस्तोपासनपक्षं ज्यायांसं प्रतिष्ठाप्य ज्यायस्त्ववचनादेव किल व्यस्तोपासनपक्षमपि सूत्रकारोऽनुमन्यत इति कल्पयन्ति।

तदयुक्तम्एकवाक्यतावगतौ सत्यां वाक्यभेदकल्पनस्यान्याय्यत्वात् मूर्धा ते व्यपतिष्यत् इति च एवमादिनिन्दाविरोधात् स्पष्टे च उपसंहारस्थे समस्तोपासनावगमे तदभावस्य पूर्वपक्षे वक्तुमशक्यत्वात् सौत्रस्य च ज्यायस्त्ववचनस्य प्रमाणवत्त्वाभिप्रायेणापि उपपद्यमानत्वात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' प्राचीनशाल औपमन्यव ' ( उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल ) इस आख्यायिकामें व्यस्त और समस्तरूपसे वैश्वऩरकी उपासना श्रुति है। ' औपमन्यव कं ० ' ( हे उपमन्युकुमार! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो? इसप्रकार राजा अश्वपतिके प्रश्न करनेपर हे पूज्य राजन्! मैं द्युलोककी उपासना करता हूं, ऐसा उसने उत्तर दिया। राजा- - -तुम जिस आत्माकी उपासना करते हो यह निश्चय ही ' सुतेजा ' नाम से प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है ) इत्यादि व्यस्तोपासना है।

इसीप्रकार ' तस्य ह वा ο ' ( उस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा ( द्युलोक ) है, चक्षु विश्वरूप - सूर्य है, प्राण पृथग्वर्त्मावायु है, देहका मध्य भाग बहुल- आकाश है, बस्ति ही रथि जल है, पृथिवी ही दोनों पाद हैं ) इत्यादि समस्तोपासना भी है। यहाँ संशय होता है कि क्या वैश्वानर वाक्यमें व्यस्त और समस्त दोनों प्रकारकी उपासना होनी चाहिए अथवा समस्त ही, तो क्या प्राप्त होता है?

पूर्वपक्षी - सुतेजा व्यादि प्रत्येक अवयव में ' उपास्से ' इसप्रकार क्रियापदके श्रवणसे और ' तस्मात्तव ' ( इसीसे तुम्हारे कुलमें सुत ( खण्डित सोमद्रव्य ) प्रसुत और मसुत दिखाई देते हैं ) इत्यादि फल भेदके श्रवणसे व्यस्त उपासनाएँ होनी चाहिए, ऐसा प्राप्त होता है। सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं- भूमाका - पदार्थोपचयात्मक समस्त वैश्वानर उपासनाका ज्यायस्त्व - प्राधान्यसे इस वाक्यमें विवक्षित होना युक्त है, किन्तु प्रत्येक अवयवोपासनांका ज्यायस्त्व विवक्षित नहीं है।

क्रतुके समान जैसे दर्शपूर्णमास आदि क्रतुममें समस्तरूपसे अङ्गोसहित प्रधानका एक ही प्रयोग विवक्षित है, व्यस्त प्रयाज आदिका प्रयोग विवक्षित नहीं है, और एकदेशरूप अङ्ग से युक्त प्रधानका भी प्रयोग विवक्षित नहीं है, वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिए। परन्तु भूमा ही ज्यायान् है, यह किससे ज्ञात होता है? इससे कि श्रुति भूमाका ज्यायरत्व दिखलाती है, क्योंकि एकवाक्यता अवगत होती है। यह वैश्वानरविद्या विषयक वाक्य पौर्वापर्यं पर्यालोचनसे एक ही प्रतीत होता है।

जैसे कि प्राचीनशाल आदि उद्दालक पर्यन्त छः ऋषिगण वैश्वानर विद्या में परिनिष्ठाको न प्राप्त होते हुए राजा अश्वपति कैकेयके पास आये, ऐसा उपक्रम कर उसने एक - एक ऋषिको द्यु आदिमेंसे एक - एक उपास्य सुनाकर ' मूर्धा त्वेष ० ' ( यह तो वैश्वानर आत्माका मूर्धा है ) इत्यादिसे श्रुति उन द्यु आदिका मूर्धा आदि रूपसे विधान करती है। और ' मूर्छा ते ० ' ( यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता ) इत्यादिसे व्यस्तोपासनाका अपवाद करती है।

और फिरसे व्यस्तोपासनाकी व्यावृत्ति कर और समस्तोपासना की अनुवृत्तिकर ' स सर्वेषु ० ' ( वह समस्त लोकोंमें, समस्त प्राणियों में और समस्त आत्मालों में अन्न भक्षण करता है ) इसप्रकार भूमाके आश्रित ही फल दिखलाती है।

और जो सुतेजा आदि प्रत्येक अङ्ग में फलभेदका श्रवण है, ऐसा होनेपर भी वह अङ्गोंका फल प्रधानमें ही स्वीकार किया है, ऐसा समझना चाहिए | और ' उपास्से ० ' यह भी प्रत्येक अवयवमें जो क्रियापदका श्रवण है, वह भी अन्य के अभिप्रायका अनुवाद करनेके लिए है, व्यस्त उपासनाके विधानके लिए नहीं है। इसलिए समस्त उपासना पक्ष ही अधिक श्रेष्ठ है।

वेदान्त एक देशी कुछ लोग तो इस अधिकरणमें समस्त उपासना ज्यायस्त्व पक्ष स्थापनकर ज्यायस्त्व वचनसे ही व्यस्त उपासना पक्ष भी सूत्रकारको अनुमत है, ऐसी कल्पना करते हैं। वह युक्त नहीं हैं, क्योंकि एकवाक्यताकी अवगति होनेपर वाक्यभेदकी कल्पना उचित नहीं है। कारण कि ' मूर्धा ते ० ' ( तुम्हारा मस्तक गिर जायगा ) इत्यादि निन्दा वचनका विरोध भी होता है।

और उपसंहारमें समस्त उपासनाका अवगम स्पष्ट होनेपर पूर्वपक्ष में उसका अभाव नहीं कहा जा सकता और सूत्रमें ज्यायस्त्व वचन प्रमाणवत्त्वके अभिप्रायसे भी उपपद्यमान है॥५७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इसमें अश्वपति कैकेय और प्राचीनशाल आदि मुनिगणोंका वैश्वानर विषयक विचार है। द्युलोक आदिमें से जो प्रत्येक अवयवकी वैश्वानररूपसे उपासना वह व्यस्तोपासना है, और उनके अवयवकी उपासना समस्तोपासना है। यहाँ दोनों उपासनाओं में विधि और फलका श्रवण होने से और एकवाक्यताकी उपपत्ति होनेसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। पूर्वपक्षमें फलभेद और ' उपास्से ' क्रियापदके श्रवणसे व्यस्तोपासनाएँ हैं।

* भगवान् माष्यकार वेदान्त एक देशी मतको दूषित करनेके लिए उसका ' केचित् ' इत्यादिसे अनुवाद करते हैं। ' आत्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजा : ' इसप्रकारके वाक्य और प्रकरणसे व्यस्त उपासनाका समस्त उपासना में अन्तर्भाव है। जैसे प्रयाज आदि अङ्गोंका प्रधान दर्शपूर्णमासके फलमें ही उपसंहार है। यदि प्रयाज व्यादि अङ्गों का पृथक् फल माने तो वे दर्शपूर्णमास यागके अङ्ग न होकर पृथक् कर्म होंगे और दर्श आदिसे पृथक् वाक्य होंगे। इसप्रकार वाक्यभेद प्रसक्त होगा। परन्तु ऐसा नहीं माना गया है। ऐसा प्रकृतमें भी समझना चाहिए। सूत्रमें जो ' ज्यायस्त्व ' पद है वह व्यस्त उपासनाओंको अप्रामाणिक बोध करानेके लिए है। अतः यह सिद्ध हुआ कि समस्त उपासना ही करनी चाहिए॥५७

शब्दादिभेदाधिकरणम्

3.3.58 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५८

सूत्र ३.३.५८

नाना शब्दादिभेदात् ॥ ३.३.५८ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 771

पदच्छेद — नाना , शब्दादिभेदात्

सूत्रार्थ — ( नाना ) विद्या मिन - भिन्न है, ( शब्दादिभेदात् ) क्योंकि ' वेद ' ' उपासीत ' इत्यादि शब्दोंका भेद है।

शाङ्करभाष्य

पूर्वस्मिन्नधिकरणे सत्यामपि सुतेजःप्रभृतीनां फलभेदश्रुतौ समस्तस्योपासनं ज्याय इत्युक्तम् अतः प्राप्ता बुद्धिः अन्यान्यपि भिन्नश्रुतीन्युपासनानि समस्य उपासिष्यन्ते इति।

अपि च नैव वेद्याभेदे विद्याभेदो विज्ञातुं शक्यते वेद्यं हि रूपं विद्यायाः द्रव्यदैवतमिव यागस्य वेद्यश्च एक एव ईश्वरः श्रुतिनानात्वेऽप्यवगम्यते मनोमयः प्राणशरीरःकं ब्रह्म खं ब्रह्मसत्यकामः सत्यसंकल्पः इत्येवमादिषु तथाएक एव प्राणःप्राणो वाव संवर्गःप्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्चप्राणो ह पिता प्राणो माता इत्येवमादिषु वेद्यैकत्वाच्च विद्यैकत्वम्। श्रुतिनानात्वमपि अस्मिन्पक्षे गुणान्तरपरत्वात् न अनर्थकम्।

तस्मात् स्वपरशाखाविहितम् एकवेद्यव्यपाश्रयं गुणजातमुपसंहर्तव्यं विद्याकात्स्न्र्याय इत्येवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते नानेति वेद्याभेदेऽपि एवंजातीयका विद्या भिन्ना भवितुमर्हति कुतः शब्दादिभेदात् भवति हि शब्दभेदः वेदउपासीतस क्रतुं कुर्वीत इत्येवमादिः शब्दभेदश्च कर्मभेदहेतुः समधिगतः पुरस्तात्शब्दान्तरे कर्मभेदः कृतानुबन्धत्वात् इति। आदिग्रहणात् गुणादयोऽपि यथासंभवं भेदहेतवो योजयितव्याः।

ननुवेद इत्यादिषु शब्दभेद एव अवगम्यते नयजति इत्यादिवत् अर्थभेदः सर्वेषामेवैषां मनोवृत्त्यर्थत्वाभेदात् अर्थान्तरासंभवाच्च तत् कथं शब्दभेदाद्विद्याभेद इति नैष दोषः मनोवृत्त्यर्थत्वाभेदेऽपि अनुबन्धभेदाद्वेद्यभेदे सति विद्याभेदोपपत्तेः एकस्यापीश्वरस्य उपास्यस्य प्रतिप्रकरणं व्यावृत्ता गुणाः शिष्यन्ते तथा एकस्यापि प्राणस्य तत्र तत्र उपास्यस्य अभेदेऽपि अन्यादृग्गुणोऽन्यत्रोपासितव्यः अन्यादृग्गुणश्चान्यत्र इत्येवमनुबन्धभेदाद्विधिभेदे सति विद्याभेदो विज्ञायते।

न च अत्र एको विद्याविधिः इतरे गुणविधय इति शक्यं वक्तुम् विनिगमनायां हेत्वभावात् अनेकत्वाच्च प्रतिप्रकरणं गुणानां प्राप्तविद्यानुवादेन विधानानुपपत्तेः। न च अस्मिन्पक्षे समानाः सन्तः सत्यकामादयो गुणा असकृच्छ्रावयितव्याः। प्रतिप्रकरणं च इदंकामेनेदमुपासितव्यम् इदंकामेन च इदम् इति नैराकाङ्क्ष्यावगमात् नैकवाक्यतापत्तिः। न च अत्र वैश्वानरविद्यायामिव समस्तचोदना अपरा अस्ति यद्बलेन प्रतिप्रकरणवर्तीन्यवयवोपासनानि भूत्वा एकवाक्यताम् इयुः।

वेद्यैकत्वनिमित्ते च विद्यैकत्वे सर्वत्र निरङ्कुशे प्रतिज्ञायमाने समस्तगुणोपसंहारोऽशक्यः प्रतिज्ञायेत। तस्मात् सुष्ठु उच्यते नाना शब्दादिभेदादिति। स्थिते च एतस्मिन्नधिकरणे सर्ववेदान्तप्रत्ययमित्यादि द्रष्टव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पूर्वं अधिकरणमें सुतेजा आदिमें फलभेदकी श्रुतिके विद्यमान होनेपर भी समस्त उपासना श्रेष्ठ है, ऐसा कहा गया है। इससे भिन्न श्रुतिवाली अन्य उपासनाएँ भी ससस्वरूपसे उपासनाएं होंगी, ऐसी बुद्धि प्राप्त होती है। और वेद्यका अभेद होनेपर भी विद्याका भेद नहीं जाना जा सकता, क्योंकि जैसे द्रव्य और देवता यागके रूप हैं, वैसे ही वेद्यं विद्याका रूप है। ' मनोमयः प्राणशरोर ः ' ( वह ब्रह्म मनोमय और प्राणशरीर - लिङ्गात्मा शरीरवाला है ) ' कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ( सुख ब्रह्म है, व्याकाश ब्रह्म है ) ' सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' ( ईश्वर सत्यकाम और सत्यसंकल्प हैं ) इत्यादिमें और इसीप्रकार ' एक एव प्राण : ' ( प्राण एक ही ) ' प्राणो वाव ० ' ( प्राण ही संवर्ग है ) ' प्राणो वाव ० ' ( प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ट है ) ' प्राणो ह ० ' ( प्राण पिता और प्राण माता है ) इत्यादि स्थलोंमें श्रुतिका भेद होनेपर भी वेद्य एक ही ईश्वर अवगत होता है। वेद्यके एक होनेसे विद्या मी एक ही श्रुत है। श्रुतिभेद भी इस पक्ष में अन्य गुणपरेक होनेसे अनर्थक नहीं है। इसलिए अपनी शाखा और अन्य शाखाओं में विहित एक वेद्यके आश्रित गुण समूहका विद्याकी पूर्णता के लिए उपसंहार करना चाहिए।

सिद्धान्तो — ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन किया जाता है - ' नाना ' वेद्यका अभेद होनेपर भी इसप्रकारकी विद्याका भेद होना युक्त है, किससे? शब्द आदिके भेदसे। ' वेद ' उपासीत ' स क्रतुं कुर्वीत ' ( वह संकल्प करे ) इत्यादि शब्दभेद है।

और शब्दभेद कर्म - भेदका निमित्त है, इस प्रकार पूर्वकाण्डमें — ' शब्दान्तरे कर्मभेदः कृतानुबन्धत्वात् ' ( जै ० सू ० २।२1१ ) ( भिन्न भिन्न शब्द के होने पर कर्मका भी भेद होता है, क्योंकि भिन्नरूपसे उनका विषय माना जाता है अर्थात् धात्वर्थमें भेद होता है ) इस सूत्र में अधिगत होता है। आदि पदके ग्रहणसे गुण आदिको भी यथासंभव भेदके हेतुरूपसे योजना होनी चाहिए। परन्तु ' वेद ' इत्यादिमें शब्दभेद ही प्रतीत होता है? ' यजति ' ददाति ' इत्यादिके समान अर्थं भेद तो अवगत नहीं होता।

क्योंकि ' वेद, उपासीत ' इन सभी शब्दों का मनोवृत्तिरूप एक ही अर्थ है और अन्य ( ज्ञान ) अर्थका असम्भव है, तो शब्दभेदसे विद्याभेद किस प्रकार होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि मनोवृत्तिरूप अर्थका अभेद होनेपर भी अनुबन्धके भेदसे वेद्यका भेद होने पर विद्याभेदकी उपपत्ति होती है। उपास्य ईश्वरके एक होनेपर भी उसके गुण प्रत्येक प्रकरण में व्यावृत्त ( भिन्न भिन्न ) कहे जाते हैं।

उसीप्रकार एक ही प्राण तत् तत् स्थलमें उपास्यरूपसे अभिन्न होनेपर भी एक प्रकारके गुणोंसे युक्त एक स्थलमें उपासनीय है और अन्य प्रकारके गुणोंसे युक्त . अन्य स्थलमें उपासनीय है, इसप्रकार अनुबन्ध भेदसे वेद्यका भेद होनेपर विद्याका भेद ज्ञात होता है। और यहाँ एक विद्या विधि है और अन्य गुणविधियाँ हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसप्रकारकी व्यवस्थामें कोई हेतु नहीं है। प्रत्येक प्रकरणमें गुणोंके अनेक होनेसे प्राप्त विद्या के अनुवादसे गुणोंके विधानकी उपपत्ति नहीं है।

इस पक्षमें समान होते हुए सत्यकाम आदि गुणोंका अनेक वार श्रवण नहीं होना चाहिए। प्रत्येक प्रकरण में इस फलकी कामनावालेसे इस उपास्यको उपासना करनी चाहिए और इस फलकी कामनावालेसे इसकी। इसप्रकार इन उपासनाओंमें नैराकांक्ष्य अवगत होनेसे एक वाक्यता नहीं हो सकती। जैसे वैश्वानरविद्या में अन्य समस्त उपासना विधि है, वैसे यहाँ प्रकृत शाण्डिल्य आदि उपासनाओं में अन्य समस्त उपासना विधि नहीं है, जिसके बलसे प्रत्येक प्रकरणवर्ती अवयव उपासनाएँ होकर एकवाक्यताको प्राप्त करें।

वेद्यके एकत्व निमित्त से विद्याके एक होनेपर सर्वत्र सब विद्याओंमें यदि विना अंकुशके प्रतिज्ञा की जाय तो समस्त गुणोंका उपसंहार जो अशक्य है उसकी प्रतिज्ञा हो जायगी। इसलिए ' नानाशब्दादिभेदात् ' इसप्रकार सूत्रकार देखना चाहिए || ५८।। सत्यानन्दी - दीपिका

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * दहरविद्या आदि ब्रह्मविषयक समस्त उपासनाएं वेद्यके एक होनेपर एक हैं अथवा श्रुति भेदसे भिन्न हैं, तथा संवर्ग प्राण उपासना एक है अथवा भिन्न है? इसप्रकार संशय होनेपर दृष्टान्त संगति से ' पूर्वस्मिन् ' आदिसे पूर्वपक्ष करते हैं। पूर्वपक्ष में वेद्यके एक होनेसे विद्या भी एक है। यदि विद्याका भेद हो तो एक श्रुति विहित विद्याका अन्य श्रुतिमें कथन व्यर्थं होगा। परन्तु विद्याके एक होने से अन्य श्रुतिमें कथन अन्य गुणोंके प्रतिपादनके लिए होनेसे व्यर्थं नहीं होगा। इसलिए अपनी शाखा अथवा अन्य शाखामें एक वेद्यके आश्रित ' सत्यकामः सत्यसंकल्प ' आदि गुण समुदायका भी उपसंहार होना चाहिए।

* जैसे ' एक नारीकाय ' अभिन्न होनेपर भी गुणभेद और भावनाभेदसे भिन्न भिन्नरूपसे इसलिए शब्द आदि भेदसे विद्या नाना है। विद्यानानात्व अधिकरण पादके आरम्भमें ही संगत है, यहाँ तो प्रासङ्गिक है॥ ५८

विकल्पाधिकरणम्

3.3.59 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५९

सूत्र ३.३.५९

विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥ ३.३.५९ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.५९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 774

पदच्छेद — विकल्पः , मविशिष्टफलत्वात्

सूत्रार्थ — ( विकल्पः ) सगुण विद्याओंका विकल्प ही युक्त है, ( अविशिष्टफलत्वात् ) क्योंकि वेद्य वस्तुका साक्षात्काररूप समान फल है।

शाङ्करभाष्य

स्थिते विद्याभेदे विचार्यते किमासामिच्छया समुच्चयो विकल्पो वा स्यात् अथवा विकल्प एव नियमेनेति। तत्र स्थितत्वात् तावद्विद्याभेदस्य न समुच्चयनियमे किंचित्कारणमस्ति। ननु भिन्नानामप्यग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादीनां समुच्चयनियमो दृश्यते नैष दोषः नित्यताश्रुतिर्हि तत्र कारणम् नैवं विद्यानां काचिन्नित्यताश्रुतिरस्ति तस्मान्न समुच्चयनियमः। नापि विकल्पनियमः विद्यान्तराधिकृतस्य विद्यान्तराप्रतिषेधात्। पारिशेष्यात् याथाकाम्यमापद्यते।

ननु अविशिष्टफलत्वादासां विकल्पो न्याय्यः तथा हि मनोमयः प्राणशरीरःकं ब्रह्म खं ब्रह्मसत्यकामः सत्यसंकल्पः इत्येवमाद्याः तुल्यवत् ईश्वरत्वप्राप्तिफला लक्ष्यन्ते नैष दोषः समानफलेष्वपि स्वर्गादिसाधनेषु कर्मसु याथाकाम्यदर्शनात्। तस्मात् याथाकाम्यप्राप्तौ उच्यते विकल्प एव आसां भवितुमर्हति न समुच्चयः कस्मात् अविशिष्टफलत्वात्। अविशिष्टं हि आसां फलमुपास्यविषयसाक्षात्करणम् एकेन च उपासनेन साक्षात्कृते उपास्ये विषये ईश्वरादौ द्वितीयमनर्थकम्।

अपि च असंभव एव साक्षात्करणस्य समुच्चयपक्षे चित्तविक्षेपहेतुत्वात् साक्षात्करणसाध्यं च विद्याफलं दर्शयन्ति श्रुतयः यस्य स्यादद्धा न विचिकित्सास्ति इतिदेवो भूत्वा देवानप्येति इति च एवमाद्याः स्मृतयश्च सदा तद्भावभावितः इत्येवमाद्याः। तस्मात् अविशिष्टफलानां विद्यानामन्यतमामादाय तत्परः स्यात् यावदुपास्यविषयसाक्षात्करणेन तत्फलं प्राप्तमिति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ने ठीक ही कहा है। इस अधिकरणके स्थित होनेपर ' सर्ववेदान्तप्रत्ययम् ' इत्यादि व्यधिकरण प्राप्त होती है, वैसे ' सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' आदि गुणभेदसे और भावनाके अधीन उपासना होनेसे उपास्यके एक होनेपर भी उपासना भिन्न भिन्न है।

* यह जो कहा गया है कि श्रुतिका भेद अन्य गुष्पोंके विधानके लिए है। इसका समाधान ' न चात्रैको ' इत्यादिसे कहते हैं। किश्व फलके भेदसे ' वेद, उपासीत ' इत्यादि विधिके भेदसे और सब गुणोंका ध्यान न हो सकने के कारण विद्या भिन्न भिन्न है। जैसे दहरका ध्यान करनेवालोंका सब लोकों में यथेष्ट गमन है और वैश्वानर उपासक सर्वत्र अन्न मक्षक होते हैं, इसप्रकार फलका भेद है।

इसप्रकार विद्याभेदके सिद्ध होनेपर यह विचार किया जाता है कि क्या इन विद्याओंका उपासककी इच्छासे समुच्चय है अथवा विकल्प है वा नियमसे विकल्प ही है। पूर्वपक्षी - उसमें विद्याभेदके सिद्ध होनेसे समुच्चयके नियममें कोई कारण नहीं है। परन्तु अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि इन भिन्नोंका मी समुच्चयनियम देखा जाता है? यह दोष नहीं है, क्योंकि अग्निहोत्र आदि नित्यत्व श्रुति उनके समुच्चय नियममें कारण है, किन्तु विद्याओं में ऐसी कोई नित्यत्वश्रुति नहीं है, इसलिए उनमें समुच्चयका नियम नहीं है, और इसीप्रकार विकल्पका नियम भी नहीं है, क्योंकि एक विद्यामें अधिकृतका अन्य विद्या में प्रतिषेध नहीं है। परिशेषसे स्वेच्छा पक्ष प्राप्त होता है। परन्तु इन विद्याओं का समान फल होनेसे विकल्प उचित है। क्योंकि ' मनोमयः प्राणशरीरः ' ' कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ‘ सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' इत्यादि श्रुति समानरूपसे ईश्वर प्राप्तिरूप फलवाली देखी जाती है। यह दोष नहीं है, क्योंकि समान फलवाले स्वर्ग आदिके साधनभूत कर्मोंमें भी यथाकाम्य देखने में आता है।

सिद्धान्ती - इसलिए यथाकाम्य पक्षके प्राप्त होनेपर कहते हैं- इन उपासनाओं का विकल्प ही होना चाहिए, समुच्चय नहीं, किससे? इससे कि अविशिष्ट फल है। इन उपासनाओं का उपास्य विषयक साक्षात्कार करना ही समान ( एक फल ) है। एक ही उपासना से उपास्य ईश्वर आदि विषयक साक्षात्कार होनेपर अन्य उपासनाएँ प्रयोजन रहित हैं। समुच्चय पक्षमें तो साक्षात्कारका असंभव ही है, क्योंकि समुच्चय चित्त - विक्षेपका हेतु है | और ' यस्य स्यादद्धा ० ' ( मैं मरकर इसीको प्राप्त होऊँगा, ऐसा जिसका निश्चय है, इस विषय में कोई सन्देह नहीं है, उसे ईश्वरभावकी प्राप्ति होती है ) और ' देवो भूत्वा ० ' ( वह इस लोकमें देव होकर शरीर पातानन्वर देवोंको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुतियाँ और ' सदा तद्भावभावितः ० ' ( सदा उसके भावसे भावित होकर उस उसको प्राप्त होता है ) इत्यादि स्मृतियाँ मी साक्षात्कार द्वारा साध्य विद्या फल दिखलाती हैं। इससे समान फलवाली उन विद्याओंमेंसे एकको लेकर तत्पर हो जब तक उपास्य विषयक साक्षात्कारसे उसका फल प्राप्त हो॥ ५ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस अधिकरणमें विद्याओंके अनुष्ठानका प्रकार निरूपण किया जाता है। अहंग्रह, तटस्थ और अङ्गाश्रित भेदसे उपासनाएं तीन प्रकारकी हैं। उनमेंसे अहंग्रहोपासनाका यहाँ विचार किया जाता है। अहंग्रहोपासना ( उपास्यस्वरूपका स्वाभिन्नरूपसे चिन्तन ) में इच्छानुसार और विकल्प दोनोंका विद्या नानात्वके साथ साम्य होनेसे ' किम् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। पूर्वपक्ष में स्वेच्छासे अनुष्ठान है, ऐसा अनियम है और सिद्धान्त में विकल्पसे अनुष्ठान है, ऐसा नियम है।

* जैसे पुरोडाशरूप एक फल होनेसे व्रीहि और यवका विकल्प है, वैसे ही इन विद्याओं में विकल्प युक्त है। ईश्वर के साक्षात्कार के अनन्तर फलभेद होनेपर भी इन अहं ग्रहोपासनाओंका साक्षात्काररूप फल समान है। किश्व सब उपासनाओंका एक साथ होना असंभव है | अतः यहाँ विकल्प ही युक्त है।। ५ ९

काम्याधिकरणम्

3.3.60 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६०

सूत्र ३.३.६०

काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ॥ ३.३.६० ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.६०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 775

पदच्छेद — काम्याः , तु , यथाकामम् , समुच्चीयेरन् , न , वा , पूर्वहेत्वभावात्

सूत्रार्थ — ( काम्यास्तु ) काम्यविद्याओंका तो ( यथाकामम् ) यथेच्छ ( समुच्चीयेरन्नवा ) समुच्चय करे अथवा न करे, ( पूर्वहेत्वाभावात् ) क्योंकि समान फलरूप विकल्पके प्रयोजक हेतुका अभाव है।

शाङ्करभाष्य

अविशिष्टफलत्वादित्यस्य प्रत्युदाहरणम्। यासु पुनः काम्यासु विद्यासुस य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदितिस यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति इति चैवमाद्यासु क्रियावत् अदृष्टेनात्मना आत्मीयं फलं साधयन्तीषु साक्षात्करणापेक्षा नास्ति ता यथाकामं समुच्चीयेरन् न वा समुच्चीयेरन् पूर्वहेत्वभावात् पूर्वस्य अविशिष्टफलत्वादित्यस्य विकल्पहेतोः अभावात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' समान फल होनेसे ' इस पूर्वोक्त हेतुका यह प्रत्युदाहरण है। परन्तु ' स य एतमेव ० ' ( वह जो ' कोई पुत्रका दीर्घ जीवन चाहनेवाला इस प्रकार इस वायुको गोरूपसे कल्पित दिशाओंके वत्सरूपसे जानता है पुत्र निमित्तसे रोदन नहीं करता - पुत्र मरण जन्य रोदन नहीं करता ) ' स यो नाम ब्रह्म ० ' ( वह जो कोई ' नाम ब्रह्म है ' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँ तक नामको गति होती है वहाँ तक यथेच्छ गति हो जाती है ) इत्यादि जिन काम्य विद्याओं में क्रिया - कर्मके समान अदृष्टरूपसे अपना तत्तत् फल सिद्ध करती हुई साक्षात्कारको अपेक्षा नहीं है I। वे यथेच्छ समुच्चित होनी चाहिए अथवा समुच्चित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यहाँ पूर्वं हेतुका अभाव है। ' अविशिष्ट फल होनेसे ' इस पूर्व विकल्पके हेतुका अभाव है॥ ६०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत अधिकरणमें अहं ग्रहोपासनाका विचार किया गया है। अब इस व्यधिकरणमें तटस्थप्रतीकोपासना ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' आदिके विषयमें विचार किया जाता है। पूर्व अधिकरणमें जैसे अहं ग्रहोपासनाएं विकल्पसे अनुष्ठेय कही गई हैं, वैसे ही प्रतीकोपासनाएँ भी विकल्पसे ही मनुष्ठेय होनी चाहिए, क्योंकि उनमें भी उपासनत्व समान है, इस प्रकार दृष्टान्त संगति से यह पूर्वपक्ष करते हैं। ‘ यथा कामाचारः ' ‘ पुत्रका समरण ' इत्यादि प्रत्येक प्रतीकोपासनाका भिन्न - भिन्न फल है, इसलिए यहाँ विकल्पका नियम नहीं है।। ६०

यथाश्रयभावाधिकरणम्

3.3.61 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६१

सूत्र ३.३.६१

अङ्गेषु यथाश्रयभावः ॥ ३.३.६१ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.६१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 776

पदच्छेद — अङ्गेषु यथाश्रयमावः

सूत्रार्थ — ( अङ्गेषु ) कर्माङ्गोद्गीथ आदि आश्रित उपासनाओं में ( यथाश्रयभावः ) समुच्चयसे अनुष्ठानका नियम है, जैसे क्रतुओंमें आश्रित अङ्गों अनुष्ठानका नियम है।

शाङ्करभाष्य

कर्माङ्गेषु उद्गीथादिषु ये आश्रिताः प्रत्यया वेदत्रयविहिताः किं ते समुच्चीयेरन् किं वा यथाकामं स्युरिति संशये यथाश्रयभाव इत्याह। यथैव एषामाश्रयाः स्तोत्रादयः संभूय भवन्ति एवं प्रत्यया अपि आश्रयतन्त्रत्वात्प्रत्ययानाम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा कहते हैं। जैसे इन उपासनाओं के आश्रयभूत स्तोत्र आदि समुच्चयसे होते हैं, वैसे उपासनाएं भी समुच्चयसे होती हैं, क्योंकि उपासनाएँ आश्रयके अधीन हैं॥ ६१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व अधिकरणमें जैसे प्रतीकोपासनाओंका स्वतन्त्र होनेसे यथेच्छ अनुष्ठान कहा गया है, वैसे यहाँ अङ्गाश्रित उपासनाओंका नहीं है, क्योंकि वे बङ्गोंके अधीन हैं। इस प्रकार प्रत्युदाहरण संगति से -- ' अङ्ग ेषु ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं॥ ६१

3.3.62 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६२

सूत्र ३.३.६२

शिष्टेश् च ॥ ३.३.६२ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.६२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 776

पदच्छेद — शिष्टेः , च

सूत्रार्थ — विधान होनेसे भी अङ्गके समान समुच्चय है।

शाङ्करभाष्य

यथा वा आश्रयाः स्तोत्रादयः त्रिषु वेदेषु शिष्यन्ते एवमाश्रिता अपि प्रत्ययाः नोपदेशकृतोऽपि कश्चिद्विशेषः अङ्गानां तदाश्रयाणां च प्रत्ययानामित्यर्थः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जैसे स्तोत्र आदि आश्रय तीनों वेदोंमें कहे जाते हैं, वैसे आश्रित उपासनाएँ भी कही जाती हैं। अङ्गों और उनके आश्रित उपासनाओं में उपदेशकृत कोई विशेष नहीं है, ऐसा अर्थ॥ ६२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # क्रतुकै अङ्ग और उनके बाश्रित उपासनाएँ तीनों वेदोंमें समान भावसे विहित हैं, अतः बङ्गोंके समान उपासनाओंका भी समुच्चयसे अनुष्ठान है। परन्तु गोदोहनके अनुष्ठानका नियम नहीं है, क्योंकि वह तो चमसके स्थानमें विहित है।। ६२

3.3.63 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६३

सूत्र ३.३.६३

समाहारात् ॥ ३.३.६३ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.६३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 776

सूत्रार्थ — अन्य वेदोक्त प्रणवका अन्यत्र समाहार होनेसे भी अङ्गाश्रित उपासनाओंका समुच्चय है।

शाङ्करभाष्य

होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरति इति च प्रणवोद्गीथैकत्वविज्ञानमाहात्म्यात् उद्गाता स्वकर्मण्युत्पन्नं क्षतं हौत्रात्कर्मणः प्रतिसमादधाति इति ब्रुवन् वेदान्तरोदितस्य प्रत्ययस्य वेदान्तरोदितपदार्थसंबन्धसामान्यात् सर्ववेदोदितप्रत्ययोपसंहारं सूचयति इति लिङ्गदर्शनम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — होतृषदनाद्वैवापि ० ' ( स्वर, व्यञ्जन आदिके प्रमादसे दुष्ट किये गये उद्गीथको भी उद्गाता सम्यक्कृत होताके शंसनसे निर्दोष करता है ) यह श्रुति वाक्य प्रणव और उद्गीथके एकत्व विज्ञानके माहात्म्यसे उद्गाता अपने कर्ममें उत्पन्न हुए दोषका होत्र कमंसे प्रतिसमाधान ( निर्दोष ) करता है, होनेसे सर्वं वेदोक्त उपासनाका उपसंहार सूचित करता है, ऐसा लिङ्गदर्शन है॥ ६३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * समाहरणं - समताकरणं - दोषका संधान करना समाहार है। इस समाहार लिङ्गसे भी उपासनाओंका समुच्चय प्रतीत होता है। जैसे ' जो ऋग्वेदियोंका प्रणव है वह सामवेदियोंका उद्गीथ है ' ( छा ० १/५/५ ) इस प्रकार छान्दोग्यमें प्रणव और उद्गीथकी एक ध्यान विधि है। उसका ' होतृषद - नात् ' इत्यादि फलार्थवाद है। सामवेदस्थ उद्गीथ ध्यानका ऋग्वेदोक्त प्रणवके साथ सम्बन्ध देखा जाता है वही सर्व वेदविहित उपासनाओंके समुच्चय में लिङ्ग है। इस प्रकार दोनों वेदों में प्रणव और उद्गीथके ऐक्य ज्ञानसे सर्ववेदस्थ उपासनाओंका सर्वत्र समुच्चय होना चाहिए॥ ६३

3.3.64 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६४

सूत्र ३.३.६४

गुणसाधारण्यश्रुतेश् च ॥ ३.३.६४ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.६४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 777

पदच्छेद — गुणसाधारण्यश्रुतेः च

सूत्रार्थ — ' तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ' इत्यादि उद्गीथ उपासना में गुणभूत ओंकार तीनों वेदोंमें साधारणरूपसे सुना जाता है।

शाङ्करभाष्य

विद्यागुणं च विद्याश्रयं सन्तम् ओंकारं वेदत्रयसाधारणं श्रावयति तेनेयं त्रयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायति इति च ततश्च आश्रयसाधारण्यात् आश्रितसाधारण्यमिति लिङ्गदर्शनमेव। अथवा गुणसाधारण्यश्रुतेश्चेति यदीमे कर्मगुणा उद्गीथादयः सर्वे सर्वप्रयोगसाधारणा न स्युः न स्यात् ततः तदाश्रयाणां प्रत्ययानां सहभावः ते तु उद्गीथादयः सर्वाङ्गग्राहिणा प्रयोगवचनेन सर्वे सर्वप्रयोगसाधारणाः श्राव्यन्ते ततश्च आश्रयसहभावात्प्रत्ययसहभाव इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' तेनेयं त्रयी ० ' ( उस अक्षरसे ही यह ऋग्वेद आदिरूप त्रयीविद्या प्रवृत्त होती है | ' ॐ ' ऐसा कहकर ही अध्वर्युं श्रवण करता है ' ॐ ' ऐसा कहकर ही होता शंसन करता है तथा ' ॐ ' ऐसा कहकर ही उद्गाता उद्गान करता है ) यह श्रुति विद्याके गुण - विद्या आश्रयभूत ' ॐ ' कारको तोनों वेदों में साधारण- समानरूपसे श्रवण कराती है। उससे आश्रय ' ॐ ' कारके साधारण होनेसे उसके आश्रित उपासनाएँ मी साधारण हैं, यह लिङ्गदर्शन ही है। अथवा ' गुणसाधारण्यश्रुतेः ' यदि उद्गीथ यदि ये सब कर्मगुण सब प्रयोगों में साधारण - समान न होते, तो उनके आश्रित उपासनाओंक सर्वत्र सहभाव न होता। परन्तु वे सब उद्गीथ आदि सर्वाङ्गग्राही प्रयोगवचनसे सब प्रयोगों में समानरूपसे श्रवण कराये जाते हैं | उससे आश्रयके सहभावसे आश्रित उपासनाओंका सहभाव है॥ ६४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * उपास्य ओंकारके साधारण होनेसे उसके बाश्रित उपासनाओंका समुच्चयसे अनुष्ठान प्रतीत होता है। इसमें ' गुण ' इत्यादिसे अन्य हेतु कहते हैं। अन्वयमुखसे उक्त अर्थका ' अथवा ' इत्यादिसे व्यतिरेकमुखसे व्याख्यान करते हैं। इसप्रकार अन्वयव्यतिरेकसे आश्रयके समुच्चयसे आश्रित उपासनाओं का भी समुच्चय है।। ६४

3.3.65 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६५

सूत्र ३.३.६५

न वा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ३.३.६५ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.६५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 777

पदच्छेद — न , वा , तत्सह मावाश्रुतेः

सूत्रार्थ — ( न वा ) अङ्गाश्रित उपासनाओंका समुच्चय नहीं है, ( तत्सहभावाश्रुतेः ) क्योंकि ' ग्रहं गृहीत्वा ' इसप्रकार जैसे अङ्गों के सहभावकी श्रुति है, वैसे अङ्गाश्रित उपासनाओंके सहभावकी ति नहीं है। ऐसा कहता हुआ अन्य वेदमें कथित - उपासनाका अन्य वेदमें उक्त पदार्थके साथ समान सम्बन्ध

शाङ्करभाष्य

न वेति पक्षव्यावर्तनम्। न यथाश्रयभाव आश्रितानामुपासनानां भवितुमर्हति कुतः तत्सहभावाश्रुतेः यथा हि त्रिवेदविहितानामङ्गानां स्तोत्रादीनां सहभावः श्रूयते ग्रहं वा गृहीत्वा चमसं वोन्नीय स्तोत्रमुपाकरोति स्तुतमनुशंसति प्रस्तोतः साम गाय होतरेतद्यज इत्यादिना नैवमुपासनानां सहभावश्रुतिरस्ति। ननु प्रयोगवचन एषां सहभावं प्रापयेत् नेति ब्रूमः पुरुषार्थत्वादुपासनानाम् प्रयोगवचनो हि क्रत्वर्थानामुद्गीथादीनां सहभावं प्रापयेत् उद्गीथाद्युपासनानि तु क्रत्वर्थाश्रयाण्यपि गोदोहनादिवत् पुरुषार्थानीत्यवोचामपृथग्घ्यप्रतिबन्धः फलम् इत्यत्र। अयमेव च उपदेशाश्रयो विशेषः अङ्गानां तदालम्बनानां च उपासनानाम् यदेकेषां क्रत्वर्थत्वम् एकेषां पुरुषार्थत्वमिति। परं च लिङ्गद्वयम् अकारणमुपासनसहभावस्य श्रुतिन्यायाभावात्। न च प्रतिप्रयोगम् आश्रयकात्स्न्र्योपसंहारादाश्रितानामपि तथात्वं विज्ञातुं शक्यम् अतत्प्रयुक्तत्वादुपासनानाम् आश्रयतन्त्राण्यपि हि उपासनानि कामम् आश्रयाभावे मा भूवन् न त्वाश्रयसहभावेन सहभावनियममर्हन्ति तत्सहभावाश्रुतेरेव। तस्मात् यथाकाममेव उपासनान्यनुष्ठीयेरन्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' न वा ' ये शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करते हैं। आश्रित उपासनाओं का आश्रयमावके अनुसार समुच्चय नहीं हो सकता, किससे? उनके सहभावकी श्रुति न होनेसे। जैसे तीनों वेदोंमें विहित स्तोत्र आदि अङ्गका सहभाव ' ग्रहं गृहीत्वा ० ' ( ग्रह पात्रको ग्रहण कर अथवा चमस पात्रको सोमरससे भरकर वह स्तोत्रका आरम्भ करता है, स्तोत्रका अनुशंसन करता है, हे प्रस्तोता! तुम सामका गायन करो, हे होता! तुम इसका याग करो ) इत्यादि श्रुति कहती है, वैसे उपासनाओंके सहभावकी श्रुति नहीं है।

परन्तु प्रयोग वचन - विधि ही इनका सहभाव प्राप्त कराएगा, नहीं, ऐसा हम कहते हैंक्योंकि उपासनाएँ पुरुषार्थ हैं। प्रयोग विधि क्रत्वर्थं उद्गीथ आदिका सहभाव प्राप्त करावे, परन्तु क्रतु अर्थं आश्रय उद्गीथ आदि उपासनाएँ गोदोहन आदिके समान पुरुषार्थं हैं, ऐसा ' पृथग्ध्यप्रतिबन्धः फलम् ' इस सूत्र में हम कह चुके हैं। अङ्ग और उनके आश्रित उपासनाओंमें उपदेशके आश्रयपर यही विशेष है कि इनमें एक क्रत्वर्थ हैं और दूसरे पुरुषार्थं हैं।

और दूसरे दो लिङ्ग उपासनाओंके सहभावमें कारण नहीं है, क्योंकि श्रुति और न्यायका अभाव है। और प्रत्येक प्रयोग में सम्पूर्ण आश्रयोंका उपसंहार होनेसे आश्रितों का भी वैसा ही उपसंहार हो ऐसा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि उपासनाएँ उनसे प्रयुक्त नहीं हैं। आश्रयके अधीन होती हुई भी उपासनाएँ आश्रय के अभाव में मले ही न हों, परन्तु आश्रयोंके सहभाव होनेपर सहभावका नियम नहीं हो सकता, कारण कि उनके सहभाव की श्रुति नहीं है। इसलिए अपनी इच्छाके अनुसार ही उपासनाओंका अनुष्ठान करना चाहिए || ६५ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # उपासनाओं का फल भिन्न भिन्न होने से उनके समुच्चय अनुष्ठान में कोई प्रमाण नहीं है, इस बातको सिद्धान्ती ' न वा ' इत्यादिसे कहते हैं। ' विमतोपास्तयः क्रतौ न समुच्चित्यानुष्ठेयाः, मिन्न फलत्वात् गोदोहनवत् ' ( उक्त उपासनाएँ क्रतुमें समुच्चयसे अनुष्ठेय नहीं है, क्योंकि मित्र फलवाली हैं, जैसे गोदोहन ) ' वीर्यं कामनावाला गोदोहनपात्रसे जलानयन करें यहाँ चमसके स्थानमें विशेष फलके लिए गोदोहनपात्रका ग्रहण किया जाता है। जैसे यहाँ गोदोहन पात्रका भिन्न फल है, अतः वह क्रतुमें ससुच्चयसे अनुष्ठेय नहीं है, वैसे उपासनाओं के विषय में भी समझना चाहिए। ' शिष्टेश्व ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ३ | ६२ ) इसमें उक्त अर्थका ' अयमेव ' इत्यादिसे निराकरण करते हैं। और ' समाहारात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।६३ ) ' गुणसाधारण्य श्रुतेश्च ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।६४ ) इन सूत्रोंमें उक्त दो लिङ्ग अन्य प्रमाणसे प्राप्त अर्थके द्योतक हैं। अर्थवादवाक्य में स्थित होनेके कारण स्वयं साधक नहीं हैं, इसप्रकार ' परञ्च ' इत्यादिसे कहते हैं। ' गुणसाधारण्यश्रुतेश्व ' इससूत्रकी दूसरी व्याख्या ' न च ' इत्यादिसे दूषित करते हैं। इसलिए पुरुषको अपने इच्छानुसार ही उपासनाओंका अनुष्ठान करना चाहिए॥ ६५

3.3.66 · तृतीय अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६६

सूत्र ३.३.६६

विद्यैव तु निर्धारणाद्दर्शनाच् च ॥ ३.३.६६ ॥

तृतीय अध्याय तृतीय पाद · सूत्र ३.३.६६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 779

पदच्छेद — दर्शनात् च

सूत्रार्थ — ' एवं विद्ध वं ब्रह्मा ' इत्यादि श्रुति अङ्गाश्रित उपासनाओंका असहभाव दिखलाती है।

शाङ्करभाष्य

तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति। विद्यात्मका एव एते स्वतन्त्रा मनश्चिदादयोऽग्नयः स्युः न क्रियाशेषभूताः। तथा हि निर्धारयति ते हैते विद्याचित एव इतिविद्यया हैवैत एवंविदश्चिता भवन्ति इति च।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' एवंविद्ध नै ब्रह्मा ० ' ( ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी मी सब ओरसे रक्षा करता है ) यह श्रुति उपासनाओंका असहभाव दिखलाती है। क्योंकि सब उपासनाओंका उपसंहार - समुच्चय होनेपर सब ( ऋत्विज आदि ) के सर्वज्ञ होनेके कारण विज्ञानवाले ब्रह्मासे अन्य परिपालय हैं, ऐसा न कहा जाता। इसलिए [ उपासकके लिए ] उपासनाओंका इच्छानुसार समुच्चय अथवा विकल्प है, यह सिद्ध होता है॥६६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * तीनों वेदोंके ज्ञाता ब्रह्मासे ऋत्विज आदिकी रक्षा होती है, इससे सब उपासनाओं का सहभाव नहीं है। ऐसा ' दर्शनाच्च ' इत्यादिसे कहते हैं। ऋग्वेद आदि विहित बङ्गोंका लोप होनेपर व्याहृति, होम, प्रायश्चित्त आदिको जानना ही ब्रह्माका ' एवं वित्त्व ' है॥ ६६

उपसंहार

इन सूत्रों का सार यह है कि जीव और ब्रह्म के बीच का भेद केवल व्यावहारिक और ज्ञान संबंधी है, न कि वास्तविक। विभिन्न इंद्रियों और मन के कार्यों में जो भिन्नता दिखाई देती है, वह एक ही चेतना की विविध अभिव्यक्तियाँ मात्र हैं। इस प्रकार, ये सूत्र साधक को बाह्य विविधता से ऊपर उठाकर परम एकता के सत्य तक ले जाते हैं।

In English

Brahma Sutra: Unity of Knowledge

This commentary on the Brahma Sutra (3.3.34–36) explains why different Vedic mantras describe a single reality. Through the commentary of Swami Satyananda Saraswati, it argues that despite variations in ritual descriptions, the underlying knowledge of the Self and Brahman is one.

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  • Brahma sutra 3.3.34 meaning?
  • Is the knowledge of brahma one or many?
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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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